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हिंदी कहानी- सिस्टिन चैपल का वह चित्र (Hindi Short Story- Sistine Chapel Ka Woh Chitr)

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क्या यह प्यार एकतरफ़ा था? शायद नहीं. यक़ीनन नहीं. मैं सोचती थी मैं अपने मन के नहीं दिमाग़ के आधीन हूं, तार्किक रूप से सोच कर सही और ग़लत की तुला पर तौलकर ही अपने निर्णय लेती हूं. मुझे गर्व था अपने संस्कारों पर. फिर क्यों मुझे रणधीर की आंखों के प्यार का निमंत्रण बुरा नहीं लगा- ग़लत नहीं लगा? लगता है, जैसे मेरे संस्कारों की सुदृढ़ दीवार में कहीं एक बहुत कमज़ोर स्थल था, जिसमें से अनजाने ही प्यार मेरे जीवन में प्रवेश कर गया था.

सुबह दरवाज़ा खोला, तो देखा बरसात हो रही है. सोते में पता ही नहीं चला. पहलेवाले आंगन भी तो नहीं रहे कि बाहर पड़ी बाल्टी, टिन की छत पर टप-टप पड़ती बूंदों की आवाज़ से नींद खुल जाए. चार मंज़िल इमारत की दूसरी मंज़िल पर मानो किसी बक्से में बना हो फ्लैट, चाहे तो घुटन महसूस करो, चाहे सुरक्षित. कड़ी ठंड के बावजूद चाय बनाकर बालकनी में आ बैठी. छुट्टी का दिन है. न कहीं जाना है, न किसी के आने की उम्मीद ही है. कामवाली बाई के सिवा आता भी कौन है यहां और आज तो न आने का उसके पास अच्छा बहाना है.
हर रोज़ इस समय सामनेवाले पार्क में लोग टहल रहे होते हैं, व्यायाम और योग हो रहा होता है. सड़क पर भी चहल-पहल प्रारंभ हो जाती है. परंतु आज तो सब वीरान है ठीक मेरे घर की ही मानिंद. मानो मैं अकेली ही बच गई हूं सारी सृष्टि में और मुझे अकेली पा मन के भीतर से ही चेहरे निकल-निकलकर और अपना वास्तविक रूप धारण कर मेरे चारों ओर जुटे हैं.
हू-ब-हू वैसे ही जैसे बरसों से उन्हें जानती थी. सच है हमारे पास स़िफर्र् वही लोग नहीं होते, जिन्हें हम देख और छू सकते हैं. बीते जीवन के अनेक संगी-साथी हमारे जीवन में रचे-बसे रहते हैं- अपनी आवाज़ और भाव-भंगिमाओं समेत- किसी अविभाज्य अंग की तरह ही. कुछ अजब संबंध है बारिश से मेरा, अजब सम्मोहन… बरसात होने पर न कुछ काम कर पाती हूं, न सो ही पाती हूं. घंटों बैठी बारिश को ही देखती रहती हूं. प्रकृति की अनुपम देन- बादलों से चूकर आती ये बूंदें. कभी कोमल और धीमी तन सहलाती-सी. कभी क्रोधित अपना प्रचंड रूप दिखाती, जीवनदायिनी भी, प्रलयकारी भी.
ज़िंदगी बदलती तो है, पर क्या इतना भी बदल सकती है- नहीं जानती थी. वह भी तो एक ऐसी ही बरसती शाम थी जब मैं उस बड़े-से होटल से बाहर आई थी. रणधीर की मांजी ने तो कहा भी था कि टैक्सी बुला देती हूं. मैंने ही मना कर दिया, “मैं स्वयं चली जाऊंगी.” मैंने बहुत आत्मविश्‍वास के साथ कहा था. बसों में सफ़र करने की ही आदी थी मैं. पर पांच सितारा उस होटल के आसपास तो क्या, दूर-दूर तक कोई बस स्टॉप नहीं दिखा. सही है पांच सितारा होटल के पास बस स्टॉप का क्या काम? आकाश एक सार स्लेटी रंग का हो रहा था और जल्द बारिश रुकने की कोई उम्मीद न थी. चलते-चलते थक गई, तो राह में आए एक बगीचे में जा बैठी. धीमी-धीमी बारिश हो रही थी. तन सहलाती-सी. चोट पर मरहम लगाती-सी. परंतु जब कांटा भीतर धंसा हो और ज़ख़्म ताज़ा हो, तो सहलाने से पीड़ा और अधिक होती है. वीरान बगीचे में बहुत देर बैठना भी सही नहीं लगा और घर जाने को भी मन नहीं था.

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रणधीर से मेरा परिचय मेरे छोटे भाई अनीश के कारण था और उन दोनों को एक सूत्र में बांधता था उनका क्रिकेट प्रेम, जुनून कहना अधिक उपयुक्त होगा. हमारे घर के ठीक सामने पड़ता था शिवाजी पार्क, जहां हर शाम क्रिकेट खेला जाता और हमारा घर शाम भर के लिए उसी पार्क का हिस्सा बन जाता. कभी क्रिकेट का सामान रखने-उठाने, कभी पानी पीने लड़के हमारे घर आते-जाते रहते. इसी टीम का कप्तान था रणधीर सिंह. गेहुंआ रंग, लंबा-चौड़ा अपने साथियों से पूरा सिर ऊपर उठता हुआ. गेंद फेंकने के अपने अंदाज़ से जाना जाता था. मेरा भाई था तो दुबला-पतला और ठिगना, परंतु ग़ज़ब की फुर्ती थी उसमें. यूं हमारे घर के सभी लोग नाज़ुक बदन ही थे. मैं जब कॉलेज में पढ़ रही थी, तब भी अनेक लोग मुझे स्कूली छात्रा ही समझते रहे.
मां का नौकरी करना उनका शौक़ या अस्मिता की तलाश जैसी बात नहीं थी अपितु बच्चों को अच्छी शिक्षा एवं कुछ सुविधाओं की मूलभूत ज़रूरतें ही पूरीे हो पातीं. अतः मां के नौकरी करने की आवश्यकता महसूस की गई. उन्होंने बीए कर रखा था और पढ़ाने के लिए बीएड करना अनिवार्य था. मैं तब दो वर्ष की रही होऊंगी, जब मां ने पढ़ाई शुरू की. मुझे व्यस्त रखने के लिए वह मेरे हाथ में चित्रों की कोई क़िताब पकड़ा देतीं. उन्होंने पढ़ाना प्रारंभ किया, तो मेरा दाख़िला भी उसी स्कूल में करवा दिया. आना-जाना संग हो जाता, परंतु लौटकर उन्हें ढेरों काम करने होते. मेरा साथ तो पुस्तकों से ही जुड़ा रहा. फ़र्क़ बस इतना पड़ा कि फोटोवाली क़िताबों की जगह कहानियोंवाली क़िताबों ने ले ली.
अनीश के जन्म के समय पहले मां छुट्टी पर थीं, फिर नानी आकर रहीं. मैं कुछ बड़ी हुई, तो घर की देखभाल की कमान मैंने संभाल ली. मां इधर से निश्‍चिंत स्कूल की अन्य गतिविधियों में व्यस्त हो गईर्ं. कभी वार्षिकोत्सव, कभी कोई प्रोजेक्ट और कभी जांचने के लिए परीक्षा-पत्रों का बड़ा-सा बंडल. अनीश तो स्कूल से आते ही खेलने भाग जाता. उसके लिए पढ़ना एक मजबूरी थी. असली शौक़ तो क्रिकेट ही था.
एक दिन इन लोगों का क्रिकेट शुरू होते ही बारिश शुरू हो गई. आसपासवाले लड़के तो अपने-अपने घरों को भाग गए, दूरवाले भीगे हुए हमारे घर आन पहुंचे. चाय को मैंने पूछा, तो मना कर दिया, परंतु उनके चेहरे कुछ और कह रहे थे. मैंने मसालेदार चाय बनाकर सब को पिलाई. रणधीर को बहुत पसंद आई. डरते-डरते बोला, “और मिलेगी क्या?”
उनका इतना सामान पड़ा रहता स्टोर में कि हमारे घुसने तक की जगह न बचती. दूर रहनेवाले लड़कों के तो लेग पैड्स, ग्लव्ज़ तक रखे होते. अधिकतर तो रणधीर ही आता लेने और फिर संभालकर रखने के लिए. रखते समय उसके चेहरे पर अपराधबोध-सा कुछ रहता. कहता, “छोटा-सा स्टोर है, जिसमें आधा तो हमने ही घेर रखा है.” मैं कुछ पढ़ रही होती, तो उसमें रुचि लेता. देशी-विदेशी साहित्य के अलावा मैं अन्य देशों के बारे में, वहां की संस्कृति और कला के बारे में भी पढ़ा करती थी. रणधीर ने कई देश देख रहे थे, सो वह उनके बारे में मुझे बताता. एक बार बोला, “हमारे घर में तो पढ़ने को कोई महत्व ही नहीं देता. लड़कियों को
गहने-कपड़ों के अलावा और कोई शौक़ नहीं. विदेश घूमने भी जाएंगे, तो पुरुष व्यापार बढ़ाने के लिए और स्त्रियां स़िर्फ बाज़ारों में घूमने की ख़ातिर.” शुरू में तो मैं रणधीर से बात करने में थोड़ा हिचकिचाती थी, फिर मन को समझाया कि छोटे भाई का दोस्त ही तो है, वह भी इतना सुसंस्कृत और शालीन स्वभाव का.

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धीरे-धीरे वह बहुत अपना-सा लगने लगा, घर के सदस्य-सा, बहुत बातूनी नहीं था वह, पर उसमें सादगी भरी एकनिष्ठा थी.
एक दिन जब वह क्रिकेट का सामान उठाने आया, तो उसे तेज़ ज़ुकाम के साथ हल्का बुखार भी था. लेकिन उस दिन खेलना आवश्यक था, क्योंकि उनकी टीम का मैच एक अन्य मैदानवाली टीम के संग था. मैंने उसे दवा दी और तुलसी-अदरकवाली चाय पिलाई, तो उसे कुछ राहत मिली. टीम ने बहुत अच्छा खेला और ये लोग मैच जीत गए. जाते समय वह सामान रखने आया, तो कुछ पल खड़ा रहा, मानो कुछ कहना चाहता हो. उसे चुप देख मैंने ही पूछा कि क्या बात है? झिझकता हुआ बोला, “मुझे यहां आकर बहुत अच्छा लगता है. बहुत अपना-सा लगता है यह घर. पूरी उम्र तो नौकर-नौकरानियों के भरोसे पले. बचपन में भी माता-पिता से मिलने, बात करने का समय फिक्स होता था. यह नहीं कि खेलकर आए और मां की गोद में चढ़ गए. बच्चों के छोटे-छोटे डर होते हैं, यह कोई नहीं समझता था. बस, बहादुर होने का आचरण करना पड़ता सदैव. चोट लगने पर भी रोना मना था. हर समय औपचारिकता निभाई जाती. घरभर में आज कोई नहीं जानता कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है. यहां जो अपनापन मिलता है, वह अपने घर में नहीं मिलता.”
सहसा ही उसने हाथ बढ़ाकर कहा, “मुझसे दोस्ती करोगी? सदैव निभाओगी?” तब फेसबुक जैसी चीज़ नहीं होती थी, पर कुछ उसी तरह की दोस्ती का निमंत्रण था वह भी- उतना ही स्पष्ट. मैंने भी उसी रौ में हाथ बढ़ाकर कह दिया, “क्यों नहीं?” अच्छा तो वह मुझे लगता ही था. परंतु यूं दोस्ती का नामकरण किया जाता है, यह नहीं जानती थी.
समय के साथ हमारी मैत्री प्रगाढ़ होती गई. हम अपने मन की बात एक-दूसरे से कहने के लिए, सलाह-मशविरा करने के लिए, अपने डर, अपनी महत्वाकांक्षाएं बांटने के लिए एक-दूसरे पर निर्भर होते चले गए. मेरे जीवन में भी तो अकेलापन था. घर और स्कूल की चक्की में पिसती मां को इतना समय ही कहां मिलता था और अनीश तो अपने यार-दोस्तों में ही मस्त रहता.
इस बात के दो-तीन दिन बाद ही उसने कहा, “मैं तुम्हें फ्रेंड के रूप में खोना नहीं चाहता…” मैंने बीच में ही टोकते हुए कहा, “पर मैंने दोस्ती तोड़ने की बात कब कही तुमसे?”

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सहसा ही हम दोनों ने एक-दूसरे को ‘तुम’ कहकर संबोधित किया था, यह बाद में ध्यान आया.
वह कुछ देर मुझे देखता रहा और फिर धीरे से परंतु आत्मविश्‍वासपूर्वक पूछा, “क्या तुम मुझसे विवाह करोगी?”
प्रश्‍न इतना आकस्मिक था कि मैं थोड़ी देर आश्‍चर्यचकित उसे देखती रही. यूं मैं पिछले कई दिनों से उसके बदलते मनोभावों को देख रही थी, पर वह ऐसा कोई प्रस्ताव रख देगा, यह नहीं सोचा था. लेकिन क्या यह प्यार एकतरफ़ा था? शायद नहीं. यक़ीनन नहीं. मैं सोचती थी मैं अपने मन के नहीं दिमाग़ के आधीन हूं, तार्किक रूप से सोच कर सही और ग़लत की तुला पर तौलकर ही अपने निर्णय लेती हूं. मुझे गर्व था अपने संस्कारों पर. फिर क्यों मुझे रणधीर की आंखों के प्यार का निमंत्रण बुरा नहीं लगा- ग़लत नहीं लगा? लगता है, जैसे मेरे संस्कारों की सुदृढ़ दीवार में कहीं एक बहुत कमज़ोर स्थल था, जिसमें से अनजाने ही प्यार मेरे जीवन में प्रवेश कर गया था. उम्र में मुझसे छह महीने कम, जीवन स्तर में बहुत बड़ा उच्च कुलीन और धनी-नामी परिवार का. और मैं एक अति साधारण परिवार से, पर जब साथ होते, तो ये सब मायने न रखता. न उम्र का हिसाब, न आर्थिक या प्रांतीय भेद. अब मेरा मन पुस्तकों में न लगता. कहानी के नायक में मुझे उसी का चेहरा नज़र आता. प्यार में शायद कुछ तर्कसंगत होता ही नहीं, कोई नियम-क़ानून लागू होता ही नहीं.
मां को प्रमोशन मिला और वे एजुकेशन डायरेक्टर बन गईं. परंतु इसके साथ ही उन्हें दूसरे शहर जाने का आदेश भी मिल गया. पापा तो रिटायर हो ही चुके थे. अतः परिवार को दूसरे शहर जाने में क्या आपत्ति होती, सो उन्होंने अपनी स्वीकृति दे दी. रणधीर ने घर में बात करने का ऐलान किया. मुझे डर लग रहा था, पर वो आश्‍वस्त था, क्योंकि वो माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध जाने को भी तैयार था. उसके माता-पिता ने मना तो नहीं किया, पर ‘सोचते हैं’ कहकर बात को फ़िलहाल टाल दिया. इसी बीच रणधीर को उसके पिता काम के सिलसिले में थोड़े दिनों के लिए अपने संग विदेश ले गए. उन लोगों के जाने के दो दिन के पश्‍चात् उसकी मां का टेलीफोन आया. वह मुझसे मिलना चाहती थीं और एक पांच सितारा होटल में मिलने का समय और जगह बता दी.
ठीक ही तो था. ‘वे मुझसे मिलना चाहती हैं’ यह सोचकर मैं ख़ुश हुई और सलीके से तैयार होकर उनसे मिलने पहुंची. उन्होंने स्नेहपूर्वक मेरा हालचाल पूछा, इधर-उधर की बात की और फिर बोलीं, “तुम एक अच्छी लड़की हो, समझदार लगती हो. मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं, पर हमारे
समाज में रिश्ते लड़के-लड़की के बीच नहीं, परिवारों के बीच तय किए जाते हैं. और प्रायः ही छुटपन में तय कर दिए जाते हैं. उस लड़की की सोचो जिसने इतने वर्ष रणधीर के लिए सपने संजोए हैं. इसकी मंगल कामना के लिए व्रत-उपवास रखे हैं. आसानी से न मानता रणधीर, इसीलिए उसके काका बहाने से उसे विदेश ले गए हैं.
मैं समझती हूं तुम्हारी भावनाओं को, नए युग की सोच को. यह भी जानती हूं कि तुम मेरी मजबूरी समझोगी. तुम लोगों का यहां से जाने का सुन मेरा काम सरल हो गया. रणधीर के लौटने पर मैं उसे संभाल लूंगी. बस, तुम उससे संपर्क करने का प्रयत्न मत करना. इतनी ही गुज़ारिश है मेरी तुमसे. मेरा ढेर सारा आशीर्वाद है तुम्हारे साथ.
पढ़ी-लिखी हो, अपनी ख़ुशी तलाश लोगी. जीवन का ध्येय ढूंढ़ लोगी.”
पारंपरिक राजस्थानी वेशभूषा में भी वे बहुत आधुनिक एवं गरिमामयी लग रही थीं. उनके चेहरे से छलकता स्नेह आकर्षित कर रहा था. और वह मुझे आशीर्वचन कह रही थीं. संस्कारवश मैंने झुककर उनके पैर छूने चाहे, परंतु उन्होंने बीच में ही रोककर मुझे गले लगा लिया और कहा, “बेटियां पैर नहीं छूती हैं और तुम भी तो मेरी बेटी समान हो.” उन्हें वहीं किसी का इंतज़ार करना था, अतः मैं अकेली वहां से बाहर निकली. देखा बारिश हो रही थी. आकाश सलेटी रंग का यूं एकसार था. लगता नहीं था कि जल्दी रुकेगी.
मौसम की मनःस्थिति भी हम मानवों जैसी होती है क्या? रंग-बिरंगे फूलों से लदा वसंत कितना प्रसन्न दिखाई देता है.
फूलों की खिलखिलाहट से, मंद बयार की मस्ती से भरपूर और झड़ते पत्तों के दुख से पतझड़-उदास और थका-हारा, झंझावात और तेज़ बरसात में अपने क्रोध को दर्शाता है मॉनसून, पर वहीं हल्की-हल्की बूंदनियां टपकाता ऐसा प्रतीत होता है, जैसे वर्षभर की संजोई व्यथा आंसू बन पृथ्वी को भिगो रही हो.
शहर छोड़ा, तो बहुत कुछ से नाता टूट गया. ज़िंदगी का एक बहुत बड़ा हिस्सा पीछे रह गया. पर कुछ लोग हैं, जो यादें बनकर संग चले आए हैं मेरा अकेलापन बांटने. पानी बरसने पर आज भी वही दिन सामने आन खड़ा होता है और जिस प्रकार पेड़ की एक शाख हिलाने से अन्य शाखाएं भी साथ हिलने लगती हैं, उनसे भी फल-फूल टपकने लगते हैं. यादों की एक शाख हिलाने से एक के बाद एक यादें आती चली जाती हैं. वृक्ष की शाखाओं की मानिंद ही एक-दूसरे से गुथी रहती हैं हमारी यादें भी.
मां और पापा ने तो बहुत प्रयत्न किया कि मैं कहीं विवाह करने को मान जाऊं. परंतु जिस प्रकार रणधीर की वाग्दता ने उसे लेकर सपने बुने थे- व्रत-उपवास न रखे हों, सपने तो मैंने भी देखे थे न! मैंने अपना जीवन मानसिक रूप से विकलांग बच्चों को सौंप दिया, जिन्हें कुछ अतिरिक्त स्नेह व धैर्य की ज़रूरत पड़ती है और मेरे पास तो अब असीम समय था. बस, बरसात के दिनों में ही न मैं सो पाती हूं, न कुछ काम ही कर पाती हूं. बारिश को देखती अतीत में विचरती रहती हूं; रणधीर ने ही मुझमें प्रेम का एहसास जगाया था, किसी स्वप्नलोक का-सा ही सुख भोगा था मैंने. उसे खोकर ही पीड़ा समझ पाई हूं और पीड़ा के दरिया से गुज़रकर ही तो आज दूसरों के दुख को समझने के क़ाबिल हुई हूं. ज़िंदगी से कोई गिला-शिकवा नहीं. और जब इसी जीवन का नहीं बता सकते कि भविष्य के गर्भ में क्या छुपा है, तो अगले जन्म की बात क्या की जाए?
कल सांझ द्वार पर दस्तक हुई. खोला तो कुरियर था लंबा-चौड़ा-सा एक पार्सल पकड़े. साथ में एक पत्र भी. हस्ताक्षर कर उसे रवाना किया और जल्दी से पत्र खोला. रणधीर का था. लगभग पंद्रह वर्षों के पश्‍चात्. “बहुत मुश्किल से तुम्हारा पता ढूंढ़ पाया हूं. क्रिकेट के साथियों से अनीश का पता मिला और फिर अनीश से तुम्हारा. अभी तक तो यही सोचता रहा कि तुम स्वयं अपनी इच्छा से सारे संबंध तोड़ गई हो, क्योंकि मैं तुम्हारा नया ठिकाना नहीं जानता था, तुम तो जानती ही थी. तुम्हारी नाराज़गी का कारण जानना चाहता था, परंतु पूछता किससे? पिछले हफ़्ते मां की मृत्यु हुई और मृत्यु से कुछ दिन पूर्व उन्होंने तुमसे हुई मुलाक़ात और तुमसे लिए वादे के बारे में बताया. मन के एक कोने में तुम सदैव रही, पर अब तुम्हारा स्थान कुछ और ऊपर हो गया है. लेकिन अब तो बहुत देर हो चुकी है. तुम्हारी तरह मैंने भी अपनी परिस्थिति से समझौता कर लिया है. छोटा-सा एक तोहफ़ा भेज रहा हूं क़बूल कर लेना- रणधीर.”


माइकल एंजलो की पेंटिंग थी. वैटिकन के सिस्टन चैपल की छत पर बना सृष्टि की रचना का सबसे मशहूर चित्र- सृष्टि के रचयिता का आदम की ओर बढ़ा हाथ. न! शायद आदम का अपने रचयिता को छू लेने की अदम्य इच्छा से बढ़ा हाथ. बस, ज़रा-सा ही फासला बाकी है. सदियां बीत चुकी हैं, यह ज़रा-सा फासला तय नहीं हो पाया. कितनी कसक, कितनी विवशता है एक-दूसरे की ओर बढ़े उन दो हाथों में!
परिवार की मान-मर्यादा का ध्यान, अपने संस्कारों एवं सामाजिक व्यवस्था का सम्मान, जाने कितनी वर्जनाओं से बंधे हम! हमने अपने हाथ आगे बढ़ाने से स्वयं ही रोक रखे हैं.

           उषा वधवा

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विक्रम-बेताल की कहानी- पति कौन? (Vikram-Baital Story- The Groom)

Vikram-Baital Story

Vikram-Baital Story, The Groom

विक्रम-बेताल की कहानी- पति कौन? (Vikram-Baital Story- The Groom)

बहुत समय पहले की बात है, धर्मस्थल नाम का एक नगर था, वहां एक विद्वान ब्राह्मण अपने परिवार के साथ रहता था. उसकी एक पुत्री थी, जो बेहद ख़ूबसूरत और रूपवती थी. जब उसकी शादी की उम्र हुई, तो उसके माता, पिता और भाई उसकी शादी के बारे में सोचने लगे.
एक दिन जब ब्राह्मण अपने किसी यजमान की बारात में गया था और भाई पढ़ने गया था, तभी उनके घर में एक ब्राह्मण का लड़का आया. लड़की की मां ने उसके रूप और गुणों को देखकर उससे कहा कि मैं तुमसे अपनी बेटी की शादी करूंगी.

दूसरी तरफ़ उधर ब्राह्मण पिता को भी एक दूसरा लड़का मिल गया और उसने भी उस लड़के को बेटी की शादी का वचन दे दिया. अब ब्राह्मण का लड़का जहां पढ़ने गया था, वहां वह भी एक लड़के से यही वादा कर आया.

कुछ समय बाद बाप-बेटे घर लौटे, तो देखता कि वहां एक तीसरा लड़का और मौजूद है. दो उनके साथ आये थे. अब सब दुविधा में पड़ गए कि क्या किया जाए?

इतने में ही उनकी बेटी को सांप ने काट लिया और वह मर गई. उसके पिता, भाई और तीनों लड़कों ने बड़ी भागदौड़ की, ज़हर झाड़नेवालों को बुलाया, पर सब बेकार साबित हुआ.

अंत में दुखी होकर वे उस लड़की को श्मशान ले गये और क्रिया-कर्म कर आये. तीनों लड़कों में से एक ने तो उसकी हड्डियां चुन लीं और फकीर बनकर जंगल में चला गया. दूसरे ने राख की गठरी बांधी और वहीं झोपड़ी डालकर रहने लगा. तीसरा योगी होकर देश-देश घूमने लगा.

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एक दिन की बात है, वह तीसरा लड़का घूमते-घूमते किसी नगर में पहुंचा और एक तांत्रिक के घर वो रहने लगा. एक दिन वो तांत्रिक अपनी साधना में मग्न था कि उसका बेटा आकर वहां खेलने लगा, जिससे उसे विघ्न महसूस होने लगा. तांत्रिक को बहुत गुस्सा आया. उसने अपने बेटे को झिड़का, मारा-पीटा, फिर भी वह न माना तो ब्राह्मणी ने उसे उठाकर जलते हवन कुंड में पटक दिया.

लड़का जलकर राख हो गया. ब्राह्मण क्रोधित हो उठा, उसने घरवालों से कहा, जिस घर में ऐसे कठोर दिलवाले राक्षसी लोग हों, वहां मैं अब नहीं रह सकता. इतना सुनकर वह तांत्रिक भीतर गया और विद्या की पोथी लाकर एक मंत्र पढ़ा. जलकर राख हो चुका लड़का फिर से जीवित हो गया.

यह देखकर ब्राह्मण ने उससे पूछा कि यह कैसे किया, तो तांत्रिक ने कहा विद्या से. ब्राहम्ण सोचने लगा कि अगर यह पोथी मेरे हाथ पड़ जाए, तो मैं भी उस लड़की को फिर से जीवित कर सकता हूं. इसके बाद उसने भोजन किया और वहीं ठहर गया. जब रात को सब खा-पीकर सो गए, तो वह ब्राह्मण चुपचाप वह पोथी लेकर चल दिया. जिस स्थान पर उस लड़की को जलाया गया था, वहां जाकर उसने देखा कि दूसरे लड़के वहां बैठे बातें कर रहे हैं.

इस ब्राह्मण के यह कहने पर कि उसे संजीवनी विद्या की पोथी मिल गई है और वह मन्त्र पढ़कर लड़की को ज़िंदा सकता है, उन दोनों ने हड्डियां और राख निकाली. ब्राह्मण ने जैसे ही मंत्र पढ़ा, वह लड़की जी उठी. अब तीनों उसके पीछे आपस में झगड़ने लगे कि लड़की से शादी मैं करूंगा.

इतना कहकर बेताल बोला, राजा, बताओ कि वह लड़की किसकी पत्नी बननी चाहिए? अगर तुमने मुंह नहीं खोला, तो तुम्हारी मौत निश्‍चित है.

राजा ने जवाब दिया, जो वहां कुटिया बनाकर रहा, उसकी.

बेताल ने पूछा, क्यों?

राजा बोला, जिसने हड्डियां रखीं, वह तो उसके बेटे के बराबर हुआ, जिसने विद्या सीखकर जीवन-दान दिया, वह बाप के बराबर हुआ. जो राख लेकर रमा रहा, वही उसकी हक़दार है.

राजा का यह जवाब सुनकर बेताल बोला कि राजन तुम बहुत ही चतुर हो, मानना पड़ेगा, लेकिन तुमने अपना मुंह खोला, तो मैं चल पड़ा. बेताल फिर पेड़ पर जा लटका. राजा को फिर लौटना पड़ा.

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पंचतंत्र की कहानी: मूर्ख ब्राह्मण और तीन ठग (Panchtantra Ki Kahani: The Brahmin & Three Crooks)

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किसी गांव में एक ब्राह्मण रहता था. एक दिन वो दावत में गया जहां उसे यजमान से एक बकरा मिली. वो ख़ुशी ख़ुशी उसको लेकर अपने घर जा रहा था. रास्ता लंबा और सुनसान था. आगे जाने पर रास्ते में उसको ठगों ने देखा और सोचा कि क्यों न इससे यह बकरा हथिया लिया जाये. तीनों ठगों ने ब्राह्मण के कंधे पर बकरे को देखकर उसे हथियाने की योजना बनाई.

जैसे ही ब्राह्मण आगे गया एक ठग ने ब्राह्मण को रोककर कहा, “अरे पंडित जी यह क्या अनर्थ कर रहे हैं? आप अपने कंधे पर क्या उठा कर ले जा रहे हैं? आप तो ब्राह्मण हैं और ब्राह्मण होकर कुत्ते को कंधों पर बैठा कर ले जा रहे हैं.”

ब्राह्मण ने क्रोधित होकर उसे झिड़कते हुए कहा, “पागल है क्या? या अंधा हो गया है? दिखाई नहीं देता यहकुत्ता नहीं बकरा है.”

पहले ठग ने फिर कहा, “खैर मेरा काम आपको बताना था. अगर आपको कुत्ता ही अपने कंधों पर ले जाना है तो मुझे क्या? आप जानें और आपका काम.”

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थोड़ी दूर चलने के बाद ब्राह्मण को दूसरा ठग मिला. उसने ब्राह्मण को रोका और कहा, “पंडित जी क्या हो गया है आपको? ब्राह्मण होकर मरी हुई बछिया को कंधे पर लादकर ले जा रहे हैं? उच्चकुल के लोगों को क्या यह शोभा देता है?”

पंडित उसे भी झिड़क कर आगे बढ़ गया. आगे जाने पर उसे तीसरा ठग मिला. उसने भी ब्राह्मण को टोका और कहा कि इस गधे को कंधे पर क्यों ले जा रहे हो? ब्राह्मण अब घबरा गया. उसको लगा कि ये ज़रूर कोई मायावी जीव है, जो बार बार रूप बदल रहा है, वरना इतने सारे लोग झूठ क्यों बोलेंगे?

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थोड़ी दूर जाकर, उसने बकरे को कंधे से उतार दिया और आगे बढ़ गया. इधर तीनों ठग ने उस बकरे को हथिया लिया और उस ब्राह्मण की मूर्खता पर उनको हंसी भी आई.

सीख: कहते हैं कि किसी झूठ को बार-बार बोलने से वह सच की तरह लगने लगता है, इसलिए अपने दिमाग से काम लें और अपने आप पर विश्वास करें.

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– कुंदनिका कापड़िया

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“जब हम सबके बीच होते हैं, तो अकेलेपन के भय से घबरा जाते हैं. पर सचमुच अकेलेपन की स्थिति में प्रवेश करते हैं, तो अच्छा लगता है, आपको कैसा लगता है?” स्त्री हंसी. “ठीक-ठीक पता नहीं. अभी तो नई-नई अकेली पड़ी हूं न.”

दूर से देखने पर लगता था वहां सरू का घना वन है, पर वन के बीचोंबीच आकर खड़े होने पर मालूम हुआ कि वृक्ष एक-दूसरे के उतने पास-पास नहीं हैं, जितने उसने सोचे थे. वे तो खासे दूर-दूर हैं. उनकी डालियां एक-दूसरे से गुंथी हुई नहीं हैं. वे एक-दूसरे से पूरी तरह अपरिचित हों इस तरह खड़े हैं. अपने आप में मगन. उसे थोड़ी हंसी आई. मनुष्य का जीवन भी ऐसा होता है, ख़ासतौर से स्त्री-पुरुष का, पति-पत्नी का जीवन. दूर से देखें, तो लगता है कितने प्रगाढ़ रूप से वे परस्पर आबद्ध हैं. दोनों के स्वप्न, तृप्ति और अनुभूतियां इस तरह एकाकार हो गई हैं कि उनके बीच कोई विभाजक रेखा ही नहीं खींची जा सकती. पर नज़दीक जाकर देखें, तो सरू के इन वृक्षों की ही तरह वे दोनों अलग-अलग और विषाद ओढ़े हों, इस तरह धुंध से घिरे लगते हैं.
शाम अब क्षितिज पर झुक रही थी, अभी कुछ ही देर में सुनहरे रंगों का अंतिम स्पंदन होगा और पूरे आकाश को भर देनेवाला वह बिंब पानी में चू पड़ेगा. पानी के किनारे से सूर्य के टूट पड़ने का यह एक क्षण भव्य विस्मयों से लबालब भरा लगता था. इस नन्हें क्षण में असंख्य विश्वों की असंख्य परिभ्रमणों की गति झलक उठती थी. सूर्यास्त की इस घड़ी की प्रतीक्षा में वह रेत के एक ढूहे पर बैठ गया.
अचानक उसने देखा एक प्रतिबिंब उसके और सूर्य के बीच खड़ा है. उसकी उपस्थिति से अनभिज्ञ एक स्त्री ठीक वहीं, उससे थोड़ा ही आगे समुद्र के पानी के निकट खड़ी थी. उसकी ही तरह वह भी सूर्य की ओर नज़र टिकाए थी. उसके वहां खड़े होने के कारण सूर्य ओट में हो गया था. संतोष ने सोचा उठकर जगह बदल दे, पर उसी समय स्त्री कुछ क़दम आगे गई और सूर्य दिखा, लेकिन फिर पानी में डूब गया. उसके बाद गहरी शांति फैल गई. उस स्त्री ने आगे जाने के पहले अपना मुंह घुमाया. संतोष ने उसका चेहरा देखा. फिर वह उत्तर की ओर पानी के किनारे-किनारे चलने लगा.
वैसे तो आश्चर्य न होता, पर सूर्यास्त के समय लोग आमतौर पर घूम-टहलकर वापस आ जाते हैं, इसके बदले वह घूमने जा रही थी. तिस पर वह अकेली थी. पर उसकी चाल में रंचमात्र भी शिथिलता नहीं थी. इन सारी बातों से संतोष को कौतूहल हुआ. दस वर्ष पहले शायद न होता. अब स्वयं के विस्मित होने, छोटी से छोटी घटना में निहित मधु-बिंदुओं को खोजने का समय था. तिस पर इस स्त्री की तो छटा ही न्यारी थी और वह सूर्य के उस क्षण को देखने के लिए खड़ी थी, जिसे वह स्वयं चिंतन और सौंदर्य का श्रेष्ठ संधिकाल मानता था. इस तरह की सभी, यूं तो छोटी पर आनंददायक बातों के कारण संतोष के मन में एक विचित्र अनुभूति हुई.
रात को वह अपने विश्राम गृह के बरामदे में आराम से कुर्सी डालकर बैठा था और आकाश में बादलों और चांदनी की लीला निहार रहा था. बगीचे में रोशनी कम थी, आकाश में बादलों की ओट में घड़ी में छिपती और घड़ी में बाहर झांकती चांदनी थी, सामने सरू के वृक्ष थे और उसके आगे समुद्र था, जिसके मंद गर्जन से वातावरण मुखरित हो रहा था.
कोई-कोई क्षण अपने आप में पूर्णतः संपूर्ण होते हैं. उनके आगे-पीछे कुछ नहीं होता, स्मरण या आशा या उपेक्षा जैसा कुछ नहीं, मात्र एक अनाम आनंद… ऐसा ही कुछ वह अनुभव कर रहा था कि उसने उस स्त्री को सरू के वन से चढ़ान पर ऊपर जाते हुए देखा और अपनी कुर्सी से उठकर लगभग खड़ा हो गया. प्रकाश की एक रेखा या सुगंध की कोई लहर, आकस्मिक नहीं, बल्कि लंबे समय बाद स्मृति में चढ़ी किसी काव्य-पंक्ति-सी वह स्त्री उसे लगी. क्या वह उसे किसी समय पहचानता रहा होगा? पैंसठ वर्ष के लंबे जीवन में हज़ारों लोगों से मिलना हुआ होगा, उनमें शायद यह स्त्री भी रही होगी. चांदनी के प्रकाश में उसे उस स्त्री का चेहरा अधिक स्पष्ट नहीं दिखाई दिया. फिर भी देखा, नाक सीधी थी, होंठ पतले और थोड़े खुले हुए जैसे कुछ गुनगुना रही हो, बरामदे के क़रीब से गुज़रते समय उसने संतोष की ओर देखा और फिर आगे चली गई. संतोष उसे पीछे से देखता रहा. उसे लगा, सुंदर अलस-भाव से फैली यह नीरवता जैसे अचानक झंकृत हो उठी, मानो कोई प्रिय व्यक्ति अनजाने ही आकर कोई सुंदर भेंट देकर आश्‍चर्य में डाल दे, एक संगीतमय क्षण की भेंट उसे किसने दी?
रात में उसे यही विचार आते रहे कि जीवन को ऐसे महा उपहार देनेवाले हाथ किसके हैं और ये उपहार क्षणिक क्यों होते हैं? और फिर उसे लगा कि क्षणिक तो क्या नहीं होता? शायद यह बात अहम् नहीं थी. उपहार मिलता है, यही सबसे विस्मयकारी, आनंदभरी बात थी.
सुबह वह उठा तो अत्यंत प्रसन्न था. सूरज को निकलने में अभी देर थी. उठकर वह रेत की ढलान से उतरकर सरू के वृक्ष को प्रेम से स्पर्श करता हुआ समुद्र के किनारे खड़ा हुआ कि सुनहरे उजाले का एक बड़ा टुकड़ा समुद्र के जल में तैर उठा. उसने चौंककर ऊपर देखा. ठीक सिर के ऊपर एक बड़ा बादल झिलमिलाता दिखाई पड़ा और फिर नीचे नज़र करने पर उसने उस स्त्री को देखा, घूम-टहलकर वापस लौटती हुई.
‘एक अन्य आश्चर्य उपहार.’ वह मन ही मन गुनगुनाया और बात करने के उद्देश्य से उसकी ओर पलटकर प्रतीक्षा में लगभग खड़ा हो गया. अभी कोई जागा न हो, पवन सोई हो, वृक्ष सोए हों, समुद्र की रेत सोई हो और सूरज अभी मुश्किल से उगनेवाला हो, ऐसे समय घूमना समाप्त करके वापस लौट रही इस स्त्री के विषय में उसे अब सचमुच कौतूहल हो उठा था. क्या और कैसे पूछे, इस पर वह विचार कर ही रहा था कि वह ख़ुद आकर उसके पास खड़ी हो गई. उसके होंठ किंचित् खुले और इसी बीच सिर के ऊपर का वह सुनहरा बादल फट गया और उसमें से प्रकाश का एक प्रपात समुद्र पर ढुलक उठा और वह स्त्री जैसे अपने आपसे कह रही हो, फिर भी संतोष सुन सके इस तरह ज़ोर से बोली, “द लॉर्ड रेइन, लेट द अर्थ रिजॉइस…’
संतोष आनंद से किलकारी मार उठा और उसके आतुर स्वर में साठ वर्ष जाने कहां अदृश्य हो गए. “आप यह पंक्ति जानती हैं?” स्त्री हंसकर बोली, “यह प्रकाश की वर्षा हुई, इसलिए मुझे इस तरह बोलना सूझा… द फ्लड्ज़ लिफ्ट अप देयर वेव्ज़…” संतोष सभी पंक्तियां बोल गया. उसकी आंखों में समुद्र का सुनहरा पानी चमक उठा.
दोनों थोड़ी देर चुपचाप खड़े रहे. सूरज के उजाले की छोटी-छोटी तरंगें बिखरने लगीं और थोड़ी ही देर में आकाश, समुद्र, रेत और सरू के वृक्ष सबके सब सुनहरे हो गए.
“आप विश्राम गृह में ठहरी हैं?”
“हां, तीन नंबर के कॉटेज में. आप पहले कॉटेज में हैं न?”
“हां, कल ही आया. आते ही मुझे यह जगह भा गई. समुद्र के इतने क़रीब मैं इसके पहले कभी नहीं रहा.” वह यूं ही पीछे की ओर घूमा और स्त्री के साथ-साथ चट्टान पर चढ़ने लगा.
“मेरी यहां की यह पहली सुबह है. सब कुछ बहुत ही सुंदर है न?”
“सबसे सुंदर तो है यहां का एकांत. आप विश्वास करेंगे, मैं सुबह जल्दी उठकर तीन मील घूम आई और इतने समय में स़िर्फ एक ही आदमी देखा. वह बैलगाड़ी लेकर किनारे पर खड़ा था और उसमें रेती भर रहा था.”
संतोष का कॉटेज आ गया. कहने न कहने की किसी दुविधा के बिना सरलता से वह बोला, “आ रही हैं? चाय पीकर जाइएगा.”
स्त्री ने उतनी सरलता से इसे स्वीकार कर लिया. “ठीक है, चाय कौन, आप बनाते हैं? आप अकेले आए हैं?”
संतोष ने बरामदे में दो कुर्सियां और एक टेबल लगा दी. “नहीं, मेरे साथ मेरा नौकर है.” और कुर्सी पर बैठते हुए आवाज़ दी, “रंजीत!”
एक छोटा लड़का अंदर से दौड़ता हुआ आया.
“चाय बनाओ, ज़्यादा हां!”
“ठीक है, साहब.” दौड़ते हुए वह अंदर गया.
“दोनों कुर्सी पर बैठ गए. अभी पांच मिनट पहले ही उनकी पहचान हुई थी, फिर भी अपरिचय का भाव उनके बीच से चला गया था. संतोष ने सहज भाव से पूछा, “आप अकेली ही आई हैं?”
“हां, अपने बेटे और बेटी की शादियां एक साथ ही अभी-अभी निबटाई हैं. बेटी लंदन चली गई. बेटा अपनी पत्नी को लेकर कश्मीर गया है. मैं अकेली पड़ गई, इसलिए मैंने सोचा मैं कुछ दिन घूम आऊं.”
‘आपके पति…’ ऐसा कुछ संतोष पूछने जा रहा था, लेकिन इसकी जगह उसने पूछा,
“दोनों बच्चे एक साथ बाहर चले गए, तो घर में आपको बहुत अकेलापन लगा होगा न?”
स्त्री थोड़ी देर चुप रही, फिर से बोली,
“अकेलापन एक तरह से देखें तो वरदान भी माना जा सकता है.”
संतोष उत्तेजित हो गया. “वरदान? आप वरदान में विश्वास करती हैं? कैसी आश्चर्य की बात है. रात में मैं भी वरदान के विषय में ही सोच रहा था…” और फिर वह थोड़ा लज्जित हो गया. उसे लगा, उसने कुछ उतावलापन कर दिया. एक लंबा जीवन जीने के बाद, वह छोटे बच्चे की तरह इतना अधीर, उत्तेजित हो सकता है, इस बात पर उसे आश्चर्य हुआ.
स्त्री मिठास से हंसी. “बेटी के चले जाने पर तो सूनापन बहुत लगा, पर बाद में लगा कि जीवन की एक ऐसी अनुभूति मुझे वरदान स्वरूप मिल गई, जो अब तक अनजानी थी. इसे और संपूर्ण बनाने के लिए मैं यहां आई. नहीं तो आपको मालूम है, अपने सगे-संबंधी ही हमारे एकांत को सबसे अधिक बाधा पहुंचाते हैं. यहां भी किसी सैलानी के साथ बात या परिचय न करना पड़े, इसीलिए मैं भोर में ही घूम आती हूं और रात में देर से घूमने जाती हूं.” संतोष कुछ बोला नहीं.
वही फिर बोली, “मेरे पति सात वर्ष पहले गुज़र गए. उस समय मैं बहुत अकेली पड़ गई थी. पर बच्चे थे, परिवार की ज़िम्मेदारियां थीं. आज सारे काम पूरे हो चुके हैं. अब एक समूचा अकेलापन मिला है. मुझे इसका कौतूहल है कि पथ पर अकेले चलना कितना रमणीय बनाया जा सकता है.” वह हल्के से हंसकर चुप हो गई.
लड़का चाय की ट्रे रख गया. संतोष ने कप में चाय डालकर एक कप उस महिला को दिया और दूसरा ख़ुद लिया. कप के अंदर से निकलती गर्म सुगंधित भाप का वायुमय आकार वह कुछ देर तक निहारता रहा.
फिर बोला, “मैं भी अभी-अभी निवृत्त हुआ हूं. मेरा बिज़नेस था, बच्चों को सौंप दिया. तीन लड़के हैं. तीनों की शादियां हो गई हैं, अब तक बहुत व्यस्त जीवन जिया है, इसलिए मेरे आनंद की बातें प्रायः हाशिये पर रह जाती थीं. अब फुर्सत से कुछ समय अलग-अलग स्थानों पर घूमूंगा, पढ़ूंगा. ख़ूब पढ़ने का मेरा मन है. जब हम सबके बीच होते हैं, तो अकेलेपन के भय से घबरा जाते हैं. पर सचमुच अकेलेपन की स्थिति में प्रवेश करते हैं, तो अच्छा लगता है, आपको कैसा लगता है?”
स्त्री हंसी, “ठीक-ठीक पता नहीं. अभी तो नई-नई अकेली पड़ी हूं न.”
थोड़ी देर तक दोनों चुप रहे, फिर संतोष धीरे-धीरे बोला, “आपने सुबह जो काव्य पंक्तियां बोलीं, उन्हें मैंने बचपन में पढ़ा था. बाद में भूल गया था. कल यहां आते समय ट्रेन में फिर से वो पंक्तियां पढ़ीं, पर वे दूसरी ही तरह हैं.”
“लॉर्ड रेइन- ईश्वर राज्य करता है इस तरह है.”
“पर मुझे लगा ईश्वर बरसता है. लॉर्ड रेइन, प्रकाश के रूप में.”
“भेंट के रूप में?” संतोष हंसा.
स्त्री खड़ी हुई, “मेरा नाम तोषा है. नए ज़माने की छोटी लड़की जैसा नाम है न? पर मेरे पैरेंट्स बहुत नए विचारों के थे. मेरी मां उस ज़माने में एक स्कूल की प्रिंसिपल थीं और विदेश भी घूम आई थीं.” वह सीढ़ियां उतरी. “अच्छा तो…” और विदा में हाथ हिलाती वह अपने कॉटेज में चली गई.
पचपन-साठ की उम्र होगी, पर इतनी लगती नहीं थी. वह उससे पहले कहीं मिला होगा? वह परिचित क्यों लगती थी? या फिर उसकी बातें परिचित थीं? वह मन में ऐसी ही कुछ बातें सोच रहा था. पत्नी की मृत्यु के बाद… पत्नी को बहुत प्यार किया था. बहुत यानी बहुत ही. पत्नी कहती, “दुनिया में कोई पुरुष किसी स्त्री को इतना प्रेम नहीं करता होगा.” उसकी मृत्यु के बाद लंबे समय तक तो ऐसा ही लगा कि उसकी स्वयं की ही मृत्यु हो गई है. कुछ भी ग्रहण करने की संवेदना पूरी तरह नष्ट हो गई थी. यहां तक कि उस अवस्था से बाहर निकलने की इच्छा भी मर गई थी.
बहुत समय के बाद अब कहीं जाकर थोड़ी अकेलेपन में निहित शांति का अनुभव होने लगा था. इस शांति को दूसरी वस्तुओं से भरने की ज़रूरत नहीं थी. उसे अकेला होना अच्छा लगने लगा था. ईश्‍वर ने उसकी प्रिय पत्नी छीन ली थी, पर उसके बीच से वह धीरे-धीरे दूर हटने लगा था. ख़ुद को अच्छी लगनेवाली चीज़ों- पुस्तक, कविता और पानी का समुद्र उनके नज़दीक जाने लगा था. वह मकान समुद्र के इतने नज़दीक था कि उसमें चलते-फिरते, उठते-बैठते समुद्र दिखाई देता. वह दिखाई न देता, तो भी साथ रहता था.
समुद्र तट पर रहनेवालों के लिए समुद्र रोज़ की बात थी. पर उसे तो यह बात बहुत आकर्षक लगती थी. सौंदर्य की अनुभूति मन में हिलोरें लेती रहतीं. समय कोमल क़दमों से बह जाता. और अब यह स्त्री. पत्नी की मृत्यु के बाद पहली बार उसने किसी स्त्री के साथ इतनी निकटता से बात की थी और उसे बहुत अच्छा लगा था.
पैंसठ वर्ष की आयु में आदमी को किस चीज़ की ज़रूरत होती है? वह सोचने लगा. अंतिम घड़ी तक आदमी को किसी न किसी चीज़ की ज़रूरत रहती ही है. अकेले रहना अच्छा लगता था, पर तोषा के साथ बात करना और भी अच्छा लगा था. इसके बाद पूरे दिन उसने तोषा को नहीं देखा. उसे देखने का उसने विशेष प्रयत्न नहीं किया था. सहज ही वह दिख जाएगी, ऐसी उम्मीद भर थी. पर दोपहर-शाम, समुद्र तट या कैंटीन में, कहीं भी वह दिखाई नहीं दी. वह समुद्र तट पर घूमने गया और उसके आस-पास हज़ारों क़दमों के निशान उभर आए. ‘ज्वार आएगा ये सब मिट जाएंगे. कौन कहां चला था, इसकी एक भी निशानी नहीं रहेगी, मृत्यु की तरह वह सब कुछ मिटा डालेगा. मृत्यु ज्वार है या भाटा?’
उसे लगा, तोषा के साथ इस विषय पर बात की जा सकती है. उसने अपने जीवन में कैसे-कैसे अनुभव किए होंगे? इन अनुभवों में हर्ष का अंश अधिक होगा कि शोक का? चेहरे से वह पीड़ित तो नहीं लग रही थी.
दूसरे पूरे दिन भी उसने उसे नहीं देखा, तो वह थोड़ा अधीर हो गया और उसे देखने के लिए हर जगह नज़र दौड़ाता रहा. अंत में शाम को भी जब वह नहीं दिखाई पड़ी, तो वह लगभग व्याकुल हो गया. उस रात हवा ख़ूब खुलकर बह रही थी और हवा ख़ुद समुद्र की तरह जैसे बह रही थी. चांदनी को आर-पार बींधता यह गर्जन बगीचे में, मकानों में, वृक्षों में फैल गया और उसके सामने समुद्र की घनघोर आवाज़ भी मंद पड़ गई. फिर तो संतोष से रहा नहीं गया. वह घर से निकलकर तीसरे नंबर के कॉटेज की ओर चल पड़ा. इस समय सीज़न नहीं था, वेकेशन नहीं था, इसलिए समुद्र तट के इस हॉलीडे होम में सैलानी कम थे. पहले और तीसरे कॉटेज के बीच का निर्जन एकांत पवन के आलिंगन और चांदनी की बरसात में झंकृत हो रहा था.
वह तीन नंबर के कॉटेज पर पहुंचा. दरवाज़ा बंद था. उसने हल्के-से दस्तक दी.
दरवाज़ा खुला. तोषा ही थी. वह कुछ बोली नहीं, केवल दरवाज़े से थोड़ा खिसककर खड़ी हो गई, जिससे संतोष अंदर आ सके. संतोष को देखकर उसे आश्चर्य हुआ हो, ऐसा लगा नहीं. उसके चेहरे पर एक विचित्र भाव था.
कुर्सी पर बैठते हुए संतोष बोला, “आज पूरे दिन आप कहीं दिखाई नहीं दीं, तो मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ. कल भी नहीं दिखाई दी थीं. तबीयत तो ठीक है न?”
तोषा थोड़ी देर चुप रही, फिर उसके होंठों से कुछ इस तरह शब्द बाहर आए, जैसे लंबे अर्से से उसने कुछ बोला न हो, “कल मैं अपने बेटे के कश्मीर पहुंच जाने के तार का इंतज़ार कर रही थी.”
“तार आया?”
तोषा धीरे से उठी. मेज़ पर पड़ा एक काग़ज़ उठाकर संतोष के आगे रख दिया.
संतोष को काटो तो खून नहीं.
वह काग़ज़ दरअसल टेलीग्राम था- बस दुर्घटना में उसके बेटे और बहू के मारे जाने का समाचार.
हृदय एकदम जड़ हो गया.
यह स्त्री. कल यह अकेलेपन की अनुभूति को परिपूर्ण बनाने की बात कर रही थी और आज यह संपूर्ण रूप से अकेली हो गई थी. उसके दाएं-बाएं एक भयानक अकेलापन फैल गया था.
मुझे बहुत अफ़सोस है. बहुत ही अफ़सोस है… संतोष का मन बोलता रहा, पर उसने इन शब्दों को वाणी नहीं दी. वह केवल चुपचाप बैठा रहा.
कल तार आया होगा. तब से लेकर अब तक इस स्त्री ने बिल्कुल अकेले रहकर इस भयंकर आघात को झेला होगा.
खाए-पीए, सोए बिना एक-एक क्षण उसने बिताया होगा. किसी को कुछ बताए बिना, किसी के पास से सहारा पाने की कामना किए बिना.
अचानक उसे कुछ सूझा और वह तेज़ी से उठकर अपने कॉटेज पर गया. वहां जाकर उसने कॉफी बनाई और एक बड़े ग्लास में भरकर, बाहर पागल हवा से उसे बचाता ढांकता तोषा के पास आया. साथ में नींद की गोली भी थी.
“थोड़ी कॉफी पीजिए.” उसने तोषा से
आग्रहपूर्वक कहा और ज़बर्दस्ती ग्लास तोषा के हाथ में रख दिया.
“पीजिए.” उसने फिर आग्रहपूर्वक कहा. “यह गोली ले लीजिए.” उसने लगभग डॉक्टर की तरह आदेश देते हुए कहा.
तोषा ने गोली ली. कॉफी पी. संतोष की ओर उसने पूरी नज़र डालकर देखा. फिर वह एकदम से टूट गई और हिचकी ले-लेकर रोने लगी. काफ़ी देर तक वह रोती रही. संतोष ने उसे रोने दिया. वह बस उसके पास बैठा रहा. बड़ी देर बाद वह थोड़ी शांत हुई.और तब संतोष ने उसके सिर पर हाथ रखा. अचानक उसे लगा वह समझदार परिपक्व स्त्री असल में छोटी, एकदम अकेली पड़ गई एक बच्ची है. इस समय उसे प्रेम और ममता की ज़रूरत है. क्या वह उसे यह दे सकता है? क्या उसके पास किसी व्यक्ति को दी जा सकने लायक उष्मा थी? इतने वर्षों की जीवन-यात्रा के बाद उसने अपने अंदर ऐसा कुछ अर्जित किया था, जो किसी दूसरे व्यक्ति को जीवन जीने में सहायक हो सके.
वह तोषा के सिर पर हाथ फेरता रहा. जैसे किसी बच्चे के बालों को सहला रहा हो. उन उंगलियों में से झरते आश्वासन से धीरे-धीरे तोषा का थरथराता शरीर शांत हो गया.
“आप सो जाइए. मैं कल सुबह फिर आऊंगा.” संतोष उसे उठाकर, हाथ पकड़कर पलंग के पास ले गया. बत्ती बुझाते हुए वह बोला, “दरवाज़ा अंदर से बंद करके सो जाइएगा.”
उस पूरी रात वह सांय-सांय करती हवा को सुनता, सोचता पड़ा रहा. अभी उसे आए मुश्किल से दो-तीन दिन हुए थे. इतने में ही सब कितना विचित्र घटित हो गया था. पूरे समय वह तोषा के बारे में सोचता रहा. अब वह क्या करेगी? कैसे जिएगी? और सहसा उसे लगा- तोषा की जगह उसकी अपनी ऐसी हालत हुई होती तो? एकाकीपन को लेकर उसके बहुत सुरक्षित विचार थे. उसका ऐसा भयावह रूप उसकी कल्पना के बाहर था. तोषा ने भी अकेलेपन को लेकर बहुत रम्य विचार संजोये थे. जैसे वह आनंद का आधार हो. और अब…? कैसे सहन करेगी वह? कहां जाएगी? बार-बार वह सोचता रहा.
व्यवसाय से निवृत्त होने पर उसे लगा था कि वह पूरी तरह मुक्त हो गया है. उम्र उसे कई मामलों में मुक्ति दे रही थी. भविष्य की चिंता से, योजनाएं गढ़ने से, ज़िम्मेदारी उठाने से मुक्ति. पर मनुष्य जब तक मनुष्य रहता है, ज़िम्मेदारियों से कभी मुक्त हो सकता है भला?
उसके बाद तीन दिन तक वह सुबह, दोपहर, शाम तोषा के साथ रहा. उसकी हर छोटी से छोटी बात का ध्यान रखता रहा. तोषा ने चाय पी कि नहीं, खाना खाया कि नहीं. उसे नींद आई कि नहीं. हल्की-फुल्की जाने कितनी बातें की और सुनीं. बचपन के प्रसंगों… स्मरणों के विस्तृत मैदान पर दोनों ने साथ-साथ यात्रा की और बीच-बीच में उसने तोषा को एकांत में भी हो आने दिया, जहां वह अपनी पीड़ा का समाधान स्वयं खोज सके.
संतोष के जाने का दिन नज़दीक आया. यहां छह-सात दिन रहने की उसकी योजना थी. उसके बाद वह डांग के जंगलों के अंदरूनी इलाकों में जाना चाहता था. वहां की वनस्पतियां देखनी थीं, पक्षी देखने थे, जंगल की निःशब्दता सुननी थी और फिर रात में प्राणियों की दिनचर्या का अवलोकन करना था. चारेक दिन वहां रहने के बाद सीधे नैनीताल जाना था.
पर तोषा का क्या कार्यक्रम था? इतने दिनों में वह यह बात पूछ नहीं सका था. इतने देखभाल, धैर्य और आश्वासनभरी बातों से उसे किनारे पर खींच लाने के बाद अपने जाने की बात कहकर उसे शोक के भंवर में धकेल देना क्या उचित होगा? इसमें कोई शक नहीं कि उसकी उपस्थिति से तोषा को अपार सांत्वना मिलती थी.
अगली सुबह वह तोषा के पास गया, तो वह नहा-धोकर बैठी थी. बहुत दिनों के बाद वह आज कुछ स्वस्थ दिखाई दे रही थी. संतोष को देखते ही वह बोली, “चलिए, समुद्र पर चलेंगे?”
समुद्र में उसे पुनः रुचि लेते देख संतोष को अच्छा लगा. किनारे की गीली रेत पर एक-दूसरे से सटकर वे चुपचाप चलते रहे. तोषा के मन में क्या उथल-पुथल चल रही होगी, संतोष उसका अनुमान करने लगा.
सरू के वृक्ष के नीचे कोरी रेत पर वे दोनों बैठ गए. काफ़ी देर तक दोनों में से कोई कुछ न बोला. स्वयं में पर्याप्त होना अच्छा है, अकेले रह पाने में गौरव है. परंतु एक साथ होना, एक-दूसरे को उष्मा का आधार देना- क्या यह अधिक सार्थकता देनेवाली बात नहीं है?
संतोष चौंक गया. ये विचार उसे किस दिशा में ले जा रहे हैं? पैंसठ की उम्र हुई. तोषा भी साठ की तो होगी ही. हो सकता है एक-दो वर्ष कम-ज़्यादा हो. स्त्री-पुरुष की आवश्यकताओं से वे दोनों दूर निकल चुके हैं, पर प्रेम की आवश्यकता से कोई पूरी तरह मुक्त हो सकता है भला?
इस उम्र में लोग क्या कहेंगे? एक-दूसरे का साथ देने में उम्र बाधक हो सकती है? पर इस उम्र के कारण क्या उसे दूसरों की धारणाओं के अनुसार जीने की बाध्यता से मुक्ति नहीं मिल रही थी? पर तोषा क्या कहेगी?
उसने तोषा की ओर देखा. वह समुद्र पर नज़र टिकाए शांत बैठी थी. सहसा पहले दिन की ही तरह, प्रकाश का एक बादल फटा और सुनहरी बरसात समुद्र पर बरस पड़ी.
एक स्वर्णिम क्षण का आविर्भाव हुआ.तोषा के अधरों पर एक मंद मुस्कान खेल गई. ‘द लॉर्ड रेइन….’ उसने कहा.
हर तरह से यह सही था. यहां मनुष्य की कल्पना का राज नहीं चलता. ईश्वर की इच्छा का राज चलता है. और ईश्वर बरसता है…. सदैव.
सहसा संतोष बोल पड़ा, “मैं यहां से नैनीताल जाने की सोच रहा हूं. आज टिकट लेने जा रहा हूं. दो टिकट लाऊं न?” भावावेश में उसका स्वर कांप उठा, “आप भी साथ चलेंगी न?”
तोषा समझ गई. उसे इस तरह आमंत्रित करने के पहले इस अनजान, मृदु, धैर्यवान, प्रेमालु पुरुष ने किन-किन उधेड़बुन को पार किया होगा, इसका उसे ख़्याल आया.
समुद्र पर टिकी अपनी नज़र उठाकर उसने संतोष पर डाली. उन दो निर्दोष आंखों में उसे खालिस सच्चाई दिखाई दी. उसके भीतर एक स्वर्णिम क्षण का उदय हुआ. उसने धीरे से कहा, “ईश्वर की भेंट बरस रही है.”
संतोष उसे देखकर एक मधुर हंसी हंस रहा था.
                                                                                                                                                अनुवादः त्रिवेणी प्रसाद शुक्ल

 

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पंचतंत्र की कहानी: दिन में सपने… (Panchtantra Ki Kahani: Day Dreams)

पंचतंत्र की कहानी, Panchtantra Ki Kahani

पंचतंत्र की कहानी, Panchtantra Ki Kahani

पंचतंत्र की कहानी: दिन में सपने… (Panchtantra Ki Kahani: Day Dreams)

एक गांव में एक लड़की अपनी मां के साथ रहती थी. वो लड़की मन की बहुत चंचल थी. अक्सर सपनों में खो जाया करती थी. एक दिन वो दूध से भरा बर्तन लेकर शहर जाने की सोच रही थी. उसने अपनी मां से पूछा, “मां, मैं शहर जा रही हूं, क्या आपको कुछ मंगवाना है?”

उसकी मां ने कहा, “मुझे कुछ नहीं चाहिए. हां, यह दूध बेचकर जो पैसे मिलें, उनसे तुम अपने लिए चाहो तो कुछ ले लेना.”

पंचतंत्र की कहानी, Panchtantra Ki Kahani
वो लड़की शहर की ओर चल पड़ी. चलते-चलते वो फिर सपनों में खो गई. उसने सोचा कि ये दूध बेचकर भला मुझे क्या फ़ायदा होगा. ज़्यादा पैसे तो मिलेंगे नहीं, तो मैं ऐसा क्या करूं कि ज़्यादा पैसे कम सकूं… इतने में ही उसे ख़्याल आया कि दूध बेचकर जो पैसे मिलेंगे उससे वो मुर्गियां ख़रीद सकती है. वो फिर सपनों में खो गई“दूध बेचकर मुझे पैसे मिलेंगे, तो मैं मुर्गियां ख़रीद लूंगी, वो मुर्गियां रोज़ अंडे देंगी. इन अंडों को मैं बाज़ार में बेचकर काफ़ी पैसे कमा सकती हूं. उन पैसों से मैं और मुर्गियां ख़रीदूंगी, फिर उनके चूज़े निकलेंगे, उनसे और अंडे मिलेंगे… इस तरह तो मैं ख़ूब पैसा कमाऊंगी…

लेकिन फिर इतने पैसों का मैं करूंगी क्या?…हां, मैं उन पैसों से एक नई ड्रेस और टोपी ख़रीदूंगी. जब मैं यह ड्रेस और टोपी पहनकर बाहर निकलूंगी, तो पूरे शहर के लड़के मुझे ही देखेंगे.

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पंचतंत्र की कहानी, Panchtantra Ki Kahani

सब मुझसे दोस्ती करना चाहेंगे. पास आकर हाय-हैलो बोलेंगे. मैं भी इतराकर उनसे बात करूंगी. बड़ा मज़ा आएगा, लेकिन यह देखकर बाकी की सब लड़कियां तो मुझसे जलने लगेंगी. उन्हें जलता देख मुझे मज़ा आएगा. मैं उन्हें घूरकर देखूंगी और अपनी गर्दन इस तरह से स्टाइल में झटककर आगे बढ़ जाऊंगी.”

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यह कहते ही उस लड़की ने अपनी गर्दन को ज़ोर से झटका और गर्दन झटकते ही उसे सामने रखे एक पत्थर से ठोकर भी लग गई और दूध से भरा बर्तन, तो उसने सिर पर रख रखा था, नीचे गिरकर टूट गया. यह देख वो सदमे में आ गई और उसकी तंद्रा टूटी. मायूस होकर वो गांव लौटी.

उसने अपनी मां से माफी मांगी कि उसने सारा दूध गिरा दिया. यह सुनकर उसकी मां ने कहा, “दूध के गिरने की चिंता छोड़ो, लेकिन एक बात हमेशा याद रखो कि जब तक अंडे न फूट जाएं, तब तक चूज़े गिनने से कोई फ़ायदा नहीं…” मां की हिदायत और इशारा दोनों उसको समझ में आ गया. उसकी मां यही कहना चाहती थी कि जब तक हाथ में कुछ हो नहीं, तब तक उसके बारे में यूं ख़्याली पुलाव नहीं पकाना चाहिए.

सीख: ख़्याली पुलाव पकाने से कोई फ़ायदा नहीं. दिन में सपने देखकर उनमें खोने से कुछ नहीं होगा. अगर सच में कुछ हासिल करना है, तो हक़ीक़त में मेहनत करो.

 

पंचतंत्र की कहानी: गौरैया और घमंडी हाथी (Panchtantra Ki Kahani: The Sparrow And The Elephant)

Panchtantra Ki Kahani
Panchtantra Ki Kahani
पंचतंत्र की कहानी: गौरैया और घमंडी हाथी (Panchtantra Ki Kahani: The Sparrow And The Elephant)

एक जंगल में बड़े से पेड़ पर एक गौरैया अपने पति के साथ रहती थी. उसका पति बाहर जाकर खाने-पीने का इंतज़ाम करता और वह घोंसले में रहकर अपने अंडों की रखवाली करती। गोरैया अपने घोंसले में अंडों से चूजों के निकलने का बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी. एक दिन की बात है वो अपने अंडों को से रही थी और उसका पति भी रोज़ की तरह खाने के इंतज़ाम के लिए बाहर गया हुआ था.

Panchtantra Ki Kahani: The Sparrow And The Elephant
उसी जंगल में एक गुस्सैल हाथी में रहता था. वो हाथी वहां आ धमका और आस-पास के पेड़-पौधों को रौंदते हुए तोड़-फोड़ करने लगा. उसी तोड़ फोड़ के दौरान वह उस पेड़ तक भी पहुंच गया, जहां गौरैया रहती थी. उस हाथी ने पेड़ को गिराने के लिए ज़ोर-ज़ोर से हिलाया, लेकिन वह पेड़ बहुत मजबूत था इसलिए हाथी पेड़ को नहीं तोड़ पाया और थककर वहां से चला गया. लेकिन उसके पेड़ को ज़ोर-ज़ोर से हिलाने से गौरैया का घोंसला टूटकर नीचे आ गिरा और उसके सारे अंडे फूट गए.

Panchtantra Ki Kahani: The Sparrow And The Elephant

गौरैया यह देख बेहद आहत हुई और वो ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी. थोड़ी देर बाद उसका पति भी वापस आ गया. उसे सारा किस्सा पता चला, तो वो भी बहुत दुखी हुआ. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और हाथी से बदला लेने व उसे सबक सिखाने की बात सोची.
उनका एक मित्र था, जो कठफोड़वा था. वे उसके पास पहुंचे और उसे सारी बात बताई. वे हाथी से बदला लेने के लिए कठफोड़वा की मदद चाहते थे. कठफोड़वा के दो अन्य दोस्त भी थे- एक मधुमक्खी और एक मेंढक. वो सब तैयार हो गए और उन्होंने मिलकर हाथी से बदला लेने की योजना बनाई.

Panchtantra Ki Kahani: The Sparrow And The Elephant

तय योजना के तहत सबसे पहले मधुमक्खी ने अपना काम शुरू किया. उसने हाथी के कान में गुनगुनाना शुरू किया. हाथी को उसका संगीत भा गया, उसे उसके संगीत में मज़ा आने लगा और वो पूरी तरह उसके संगीत में तल्लीन हो गया. इसी बीच कठफोड़वा ने अपना काम शुरू कर दिया. उसने हाथी की दोनों आंखों पर वार किया. हाथी दर्द से कराहने लगा.

उसके बाद मेंढक अपनी पलटन के साथ एक दलदल के पास गया और सब मिलकर टर्राने लगे. मेंढकों का टर्राना सुनकर हाथी को लगा कि पास में ही कोई तालाब है. वह उस आवाज़ की दिशा में गया और दलदल में फंस गया. इस तरह से हाथी धीरे-धीरे दलदल में फंसता चला गया.

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Panchtantra Ki Kahani: The Sparrow And The Elephant

सीख: एकता में बहुत ताक़त है, यदि कमज़ोर से कमज़ोर लोग भी एकजुट होकर काम करें, तो बड़े से बड़े कार्य को अंजाम दे सकते हैं और ताक़तवर शत्रु को भी पराजित कर सकते हैं. दूसरी ओर यह भी सीख मिलती है कि अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है, हाथी को अपनी ताक़त पर घमंड था और उसका गुस्सा उसकी कमज़ोरी बन गया, जिसका परिणाम उसे भोगना ही पड़ा.

 

हिंदी कहानी- गोरबन्द (Hindi Short Story- Gorband)

Hindi Short Story

Short Story, Gorband

“नारायण, वो ऊंटों के गले में पहनी जानेवाली ज्वेलरी को क्या कहते हैं?” नारायण ने अचकचाकर नैन्सी को देखा और तल्ख़ी से कह बैठा, “ओह नैन्सी! मैं ऊंटों के शहर में पैदा हुआ हूं, ऊंटों के कुनबे में नहीं.” पूरी चाय पार्टी हंसी के ठहाकों से गूंज उठी.

रुणक-झुणक… रुणक-झुणक… की दूर से आती आवाज़ ने नारायण को नींद से जगा दिया. नारायण उचककर बिस्तर पर बैठ गया और उसने अपने बिस्तर के दाएं हाथवाली खिड़की के लकड़ी के नक्काशीदार पल्लों पर टिकी सांकल को खोल दिया. चूं…चप्प… चूं… की आवाज़ के साथ लकड़ी के पल्ले खुले, तो सुबह की फागुनी बयार का एक टुकड़ा भर उसके चेहरे को छूने के लिए काफ़ी था. परदादाजी की बनाई ख़ूबसूरत हवेली के वास्तु शिल्प के लिए धन्यवाद देता कि इससे पहले ही रुणक-झुणक की आवाज़ और नज़दीक आ चुकी थी. ऊंटों का काफ़िला था. सजे-धजे ऊंट, उनकी पीठ पर नक्काशी, कहीं फूल, तो कहीं पत्ती… कहीं नाम लिखे-लाल, नीले, गुलाबी मखमली कपड़े पर कांच और गोटे का काम की हुई दुशाला ओढ़े हुए… गले में गोरबन्द… उसमें जड़ी घंटियां और पैरों में बंधे घुंघरुओं की रुणक-झुणक नारायण को आज कितना बेचैन कर रही थी. नारायण उस छोटे से झरोखे से तब तक देखता रहा, जब तक काफ़िला भादाणियों की पिरोल से गोगा गेट की तरफ़ कूच नहीं कर गया. शायद लक्ष्मीनाथजी की घाटी की तरफ़ जा रहा हो… शायद फाल्गुन का कोई कार्यक्रम हो या किसी का ब्याह हो… आज नारायण ऊंटों के बारे में इतना क्यों सोच रहा था? पिछले 25 साल से बीकानेर में पला-बढ़ा हुआ नारायण इसी हवेली के ऊपर-नीचे तलों में भागता-दौड़ता… शहर की तंग गलियों में गुल्ली-डंडा खेलता, तो कभी कंचे… ऊंटों की आवा-जाही उसके खेल में बाधा ही बनी. सतौलियों की मीनार पर निशाना लगाने के ऐन वक़्त पर ऊंटों का गली में आना… बच्चों का एक साथ कहना, “रामजी भली कीजै” और ऊंट के अगले पैर सतौलिये की मीनार को छुए भी ना, पर पिछले पैर का सतौलिये की सातों ठीकरियों को गिरा देना… नारायण का गेंद हाथ में लिए रह जाना और बच्चों का हो.. हो.. करके नाचना… नारायण को बचपन में भले ही अच्छा ना लगा हो, पर आज वो सब याद करके उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई थी.
उसे वह भी याद आ रहा था, जब जस्सुसर गेट के बाहर अपने विद्यालय जाते हुए ऊंट गाड़ा मिल जाता, तो पहले वो गाड़े के पीछे लकड़ी के खूंटे पर अपना बैग टांगते, फिर स्कूल के तीन-चार बच्चों के साथ चलते हुए गाड़े पर ही चढ़ने की कोशिश करते. ऊंट गाड़ेवाला देखता तो ग़ुस्सा करता. उन्हें चढ़ने से तो रोकता ही, साथ ही खूंटे पर टंगे बैग भी उतरवा देता. लेकिन कभी गाड़ा चालक सहृदय होता, तो वो बच्चों को अपना हाथ आगे दे देता. बच्चे कभी अपना हाथ, कभी कलाई, तो कभी बांह देकर गाड़े पर चढ़ जाते और हो.. हो.. का हल्ला, ऊंट गाड़े को तेज़ चलाने का एक ख़ूबसूरत उपक्रम बन जाता.
नारायण को आज यह भी याद आ रहा था कि उसकी मां कितनी ख़ूबसूरती से सुरीली आवाज़ में गोरबन्द गीत सुनाती थी- ‘लड़ली लूमा झूमा ए… म्हारो गोरबन्द नखरालो…आलीजा म्हारो गोरबन्द नखरालो…’ आज तक उसने कभी गीत पर ध्यान ही नहीं दिया था. आज क्यों इस गीत को और गहरे में जानने की उत्कंठा हुई थी. नेट सर्फिंग पर जाए या सीधा मां से ही पूछ ले… वो ख़ुद ही मुस्कुरा दिया था अपनी इस मुहिम पर.
नारायण बिस्तर छोड़कर उठा. पांच फुट के हवेली के दरवाज़े से उसे हमेशा झुककर निकलना पड़ता है. शुक्र है सालभर में वो भूला नहीं, वरना आज सिर टकराता. आंगन में कबूतरों को दाना बिखेरती मां के पीछे से गलबहियां डालते नारायण कहता है, “मां, गोरबन्द सुनाओ ना…”
“क्यों? क्या होय्यो?” मां की सुरीली आवाज़ उभरती है.
नारायण उत्तर देने की बजाय कहता है, “मां, अर्थ भी बताओ ना…”
मां नारायण के सिर पर हाथ फेरते हुए बताने लगती है कि गोरबन्द लूम-झूम और लड़ियों से बना कैसे नखरीला बन जाता है. कैसे देवरानी और जेठानी मिलकर इसे गूंथती हैं. ननद सच्चे मोती पिरोती है. कैसे घर की स्त्रियां गाय चराते हुए इसे गूंथती हैं और भैंस चराते हुए सच्चे मोती पिरोती हैं. अपनी बात ख़त्म करते हुए मां नारायण के सिर पर चपत लगाते हुए पूछती है, “आज तनै कईंया याद आयो मारो आ गोरबन्द नखरालो?” नारायण हंसकर भाग जाता है. वो कैसे बताए कि इस बार वो अपनी सभ्यता और संस्कृति की सारी पड़ताल करके जानेवाला है.
पिछले साल से कुछ सॉफ्टवेयर पर नारायण हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में रिसर्च कर रहा है. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, इतनी दूर, सात समंदर पार यानी अमेरिका… मूंदड़ों के ट्रस्टी स्कूल में पढ़ा नारायण यूं अमेरिका पहुंच जाएगा पढ़ने, उसने कभी सोचा भी न था. बीकानेर शहर छोड़कर जाने से पहले उसे कितनी आशंकाएं थीं. यूरोपीय देशों की खुली संस्कृति, खानपान, भाषा-पहनावा सब कुछ इतर… उस पर घर, शहर, मां-बाबा, भाई-बहन, यार-भायले सबसे दूरी… एक अनजाना डर पैदा कर रही थी.
अमेरिका के कैम्ब्रिज शहर में आकर आशंकाओं का भंवर धीरे-धीरे कम होने लगा. भय का औरा भी उस नई संस्कृति के आभा-मंडल के साथ एक सार होता दिखाई दे रहा था.
पहले ही दिन क्लास में प्रोफेसर ने विद्यार्थियों का अनोखा परिचय लिया था. हर विद्यार्थी को दीवार पर टंगे बड़े से विश्‍व के नक्शे पर बोर्ड पिन मार्क करनी थी, जहां से वो आया है. दुनियाभर से 35 बच्चे थे. चीन से 10, अफ्रीका से 5, ब्राजील से 2, नाइजीरिया से 3 और भी ना जाने कितने छोटे-छोटे से देशों से एक-एक विद्यार्थी थे. जब नारायण ने भारत के नक्शे के पश्‍चिमी तरफ़ थोड़ा उत्तर की तरफ़ पिन को लगाने से पहले अपने बीकानेर के बिंदु को ध्यानपूर्वक देखा और बड़े आत्मविश्‍वास के साथ बोला, “आई एम फ्रॉम इंडिया.” क्लास में तालियां बजीं, तो दक्षिणी अमेरिका की नैन्सी बोली, “ओह! डेज़र्ट पार्ट ऑफ इंडिया.” नारायण ने उसे चौंककर देखा.
नारायण ने तो केवल इंडियन होने का परिचय ही दिया था. वो कैसे जान गई कि वो भारत के रेगिस्तानी हिस्से से आया है, जबकि वो ख़ुद बहुत कम जानता है अपने देश के बारे में.
नई क्लास के नए विद्यार्थियों के बीच परिचय के दौर कतरा-कतरा बढ़ते रहे. नैन्सी हर दौर में नारायण को मुस्कुराकर देखती और कोई ना कोई जुमला उछाल देती, “ओह! यू आर फ्रॉम कलरफुल इंडिया?” तो कभी कहती, “यू आर फ्रॉम प्लेस ऑफ कैमल?” तो कभी कहती, “आइ लाइक कैमल?”


नारायण भी इस वैश्‍विक संस्कृति के वातावरण में घुलता जा रहा था. वो कई बार आश्‍चर्यचकित हो जाता था कि अन्य देशों के 20-22 साल के बच्चे अपनी सभ्यता और संस्कृति में तो रचे-बसे हैं ही, पर दूसरे देशों की संस्कृति को जानने को भी आतुर रहते हैं. वो अपनी संस्कृति का तो सम्मान करते हैं, साथ ही उतना ही दूसरे देशों की सभ्यता व संस्कृति का भी सम्मान करते हैं.
पर नैन्सी में कुछ अलग ही बात थी. क्लास में वो हमेशा चहकती दिखाई देती थी. हमेशा नए प्रयोगों के लिए तैयार… नए विचारों को स्वीकार करने…नई संकल्पनाओं को अपने जीवन में लागू करने को आतुर नैन्सी का व्यक्तित्व रोमांच भरा लगता.
“नारायण, तुम्हारे शहर में कितने ऊंट होंगे?” एक दिन नैन्सी के इस अटपटे सवाल से वो हक्का-बक्का रह गया था. भला उसने कभी ऊंट गिने थे?  “मैं कोई ऊंटों की रिसर्च करके नहीं आया.” नारायण अपना जुमला उछाल देता.
“अच्छा, ये बताओ उसके पैरों में सचमुच डनलप जैसा एहसास होता है?” नैन्सी प्रश्‍न करती, तो पूरी क्लास हंस देती. नारायण भी सोचता केवल मज़ाकभर है नैन्सी के ये अटपटे सवाल.
वो सोचता कि दूसरे देशों की सभ्यता व संस्कृति को जानने की जुगत में वो इतने प्रश्‍न कर जाती है. कभी-कभी नारायण उसे कहता, “एनफ नैन्सी! बस मुझे और नहीं मालूम.”
क्लास की साप्ताहिक चाय पार्टी में नैन्सी का हमेशा एक सवाल ऊंटों पर अवश्य होता. उस दिन दिसंबर की कड़कती ठंड में नैन्सी का सवाल था, “नारायण, वो ऊंटों के गले में पहनी जानेवाली ज्वेलरी को क्या कहते हैं?” नारायण ने अचकचाकर नैन्सी को देखा और तल्ख़ी से कह बैठा, “ओह नैन्सी! मैं ऊंटों के शहर में पैदा हुआ हूं. ऊंटों के कुनबे में नहीं.” पूरी चाय पार्टी हंसी के ठहाकों से गूंज उठी. नैन्सी उसके क़रीब आकर बोली, “उसे गोरबन्द कहते हैं… नारायण!”
नारायण की आंखें आश्‍चर्य से फैल गईं. गोरबन्द तो उसकी मां गीत में गाती है. उसने कभी इतनी गहराई से सोचा ही नहीं कि वो ऊंटों के गले में पहननेवाली ज्वेलरी है. ऊंटों के गले की ज्वेलरी… नारायण अपने कमरे में आकर बुदबुदाया और ख़ुद ही दबी हंसी हंस दिया था.
उस दिन नए साल पर क्लास की पार्टी थी. कैम्ब्रिज की सड़कों पर ब़र्फ जमी थी. नैन्सी नहीं पहुंची पार्टी में तो क्लास के सहपाठियों ने नैन्सी को लाने की योजना बनाई. नारायण और जोसेफ प्रोफेसर की कार लेकर निकले. सेंट्रल स्क्वायर पर स्थित नैन्सी के अपार्टमेंट में नारायण नैन्सी के कमरे तक पहुंचा, तो आश्‍चर्यचकित रह गया.
नैन्सी की स्टडी टेबल से लेकर शेल्फों और दीवारों तक ऊंटों की उपस्थिति थी. एक तस्वीर में तो ऊंट के गले में सुंदर-सा गोरबन्द भी लटका था. “नैन्सी, ये क्या पागलपन है? इतने ऊंट तुम्हारे कमरे में क्या कर रहे हैं?”
नैन्सी बोली, “नारायण, मुझे लगता है कि मैं पिछले जन्म में ऊंटों के प्रदेश में थी. चलो अभी सब इंतज़ार कर रहे हैं क्लास में, बाद में बात करेंगे.” नैन्सी ने अपना ओवरकोट लादा और मफलर लपेटते हुए कहा. जोसेफ बाहर कार में इंतज़ार कर रहा था. कार में एक ख़ामोशी के बीच नारायण के अंदर एक तूफ़ान ने जन्म ले लिया था.
फरवरी माह की ख़ुशनुमा शाम थी. नैन्सी और नारायण अपनी लैब से लाइब्रेरी की तरफ़ जा रहे थे. प्रोजेक्ट पर काम करने की बात करते-करते नैन्सी नारायण से बोली, “नारायण, तुम एक ऐसा ऐप नहीं बना सकते, जिसमें कोई व्यक्ति किसी भी देश की वेशभूषा पहनकर अपनी शक्ल देख सके.”
“क्या मतलब?” नैन्सी की यह बात नारायण के सिर के ऊपर से गुज़र गई. भले ही वो पिछले एक साल से ना जाने कितने छोटे-बड़े सॉफ्टवेयर के लिए कोड लिख चुका है, पर इस तरह का प्रस्ताव…
“ओह नारायण! जैसे तुम्हारे राजस्थान की कुर्ती-कांचली पहनकर, माथे पर बोरला लगाकर, नथ पहनकर, गले में ठुस्सी और हाथों में चूड़ला पहनकर मैं कैसी दिखूंगी… बस, उस ऐप में देख लूं.” नारायण की सांस धौंकनी-सी तेज़ हुई और थमने लगी थी. उसके अगले क़दम लाइब्रेरी की पतली पगडंडी पर पड़े बसंत की लाल-पीले मैपल की पत्तियों पर पड़े, तो चर्र-चर्र की आवाज़ जैसे पूरी सृष्टि ने सुन ली.
क्या नैन्सी सचमुच राजस्थान में थी पिछले जन्म में या नेट सर्फिंग के ज़रिए मेरी सभ्यता व संस्कृति में दख़ल दे रही थी… नारायण सोचने को मजबूर था. नैन्सी, क्या बेहतरीन आइडिया है… नारायण चाहकर भी नहीं बोल पाया था. लाइब्रेरी का ख़ामोश क्षेत्र जो आ गया था.
दो हफ़्ते बाद नैन्सी का जन्मदिन था. क्लास की साप्ताहिक चर्चा के साथ नैन्सी के लिए क्लास का तोहफ़ा भी था. नारायण भी एक बॉक्स हाथ में दबाए खड़ा था. नारायण ने उसे अपने बेलनाकार कार्ड बॉक्स में से कार्ड निकालकर दिया, तो उसने झटपट उस कार्ड को खोला. नारायण ने बहुत शिद्दत के साथ एक स्केच तैयार किया था…पहले दृश्य में उसे ऊंटों के पैर दिखे, फिर पीठ पर लटकते दुशाले, गर्दन में झूलता गोरबन्द… ऊंट पर नैन्सी. नैन्सी के तन पर कांचली कुर्ती, माथे पर बोरला, नाक में नथ, गले में ठुस्सी, हाथ में चूड़ला और नैन्सी के हाथ में ऊंट की डोर… “वॉव!” के साथ उसकी आंखें फैल गईं, “नारायण… ये तो मरवण है, पर वो ढोला? वो
कहां है?… ”
नारायण की ख़ामोशी हैरत की सुरंगों से गुज़र रही थी. नैन्सी के मुख से ढोला.. मरवण… का उच्चारण सुनकर नारायण कल्पना के सागर में डूब गया था. पूरे सालभर बाद होली पर बीकानेर आया था नारायण. इस बार वो बीकानेर प्रोजेक्ट लेकर आया था- ऊंटों की रिसर्च का. मां से गोरबन्द सुनकर अर्थ जान रहा है. ऊंटों की क़दम ताल देख रहा है. ऊंटों की गतिविधियां जानने उष्ट्र अनुसंधान केंद्र गया है.
कोट गेट पर लाभूजी कटला से राजस्थानी कुर्ती-कांचली का कपड़ा ख़रीद रहा है. “बोरला के लिए काला डोरा दीज्यो.” नारायण का बस यह अंतिम सोपान था ख़रीददारी का. “वठै मिलसी.” दुकानदार ने कोट गेट पर बैठी उन छाबड़ीवाली महिलाओं की तरफ़ इशारा कर दिया.
नारायण मुस्कुराता हुआ चल दिया. उसे सजाना ही है मरवण को उस ऐप से बाहर निकलकर… बैठाना ही है ऊंट पर… अगली बार लाना ही है नैन्सी को बीकानेर…

       संगीता सेठी

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हिंदी कहानी- बेजान न जान  (Hindi Short Story- Bejaan Na Jaan)

Short Story

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बनवारीलाल का मन कसक उठा. बेटी के पराये होने और बेटे के पराये होने में कितना अंतर है! बेटी पराई होकर भी माता-पिता का ध्यान रखती है और बेटा पराया होता है, तो माता-पिता बीच मंझधार में डोलती बिना पतवार की कश्ती हो जाते हैं.

धूप बहुत तेज़ थी. स्कूटर से उतर रंजन पोस्ट ऑफिस के बरामदे में आया. तभी वहां बेंच पर बैठे एक वृद्ध सज्जन ने उसे आवाज़ दी, “बेटे, ज़रा सुनना. प्लीज़ मेरा एक काम कर दोगे?”‘….?’ रंजन ने प्रश्‍नवाचक दृष्टि से उनकी ओर निहारा.वृद्ध ने कंपकंपाते हाथ से एक अंतर्देशीय पत्र उसकी ओर बढ़ा दिया, “ज़रा एक छोटी-सी चिट्ठी लिख दोगे? प्लीज़!”‘….?’ रंजन ने आश्‍चर्य से उन्हें निहारा. पढ़े-लिखे लगते हैं, फिर भी? तभी उसकी नज़र उनकी दो उंगलियों पर पड़ी. उन पर पट्टी बंधी हुई थी. ओह! तो इसके कारण…“उंगलियों में चोट लगी है न बेटे, लिखने में…”“कोई बात नहीं!” आत्मीयता से उनके पास बैठ रंजन ने अंतर्देशीय पत्र हाथ में लिया, “क्या लिखना है?”वृद्ध ख़ुश हो गए. गद्गद् स्वर में अपना पेन भी उसे पकड़ाया, “पहले पता लिख देना…”नाम के साथ ‘श्री’ लगा पानेवाले का ‘पोस्ट’ लिखवाया ‘जनरल मैनेजर!’लिखते हुए रंजन ने सोचा, ‘शायद ये सज्जन वहां सर्विस में रहे होंगे. आज किसी काम से…’पूरा पता लिखवाकर, उन्होंने पत्र लिखवाना शुरू किया, “आयुष्मान पुत्र विनित पाल…”ओह! तो ये ‘जनरल मैनेजर’ इनके सुपुत्र हैं! फिर भी नाम के साथ श्री? ख़ैर! मुझे क्या?उसकी कुशलता की कामना लिखवा गला खंखार वृद्ध ने मजमून लिखवाना आरंभ किया, “तुम्हारी मां की तबीयत कुछ माह से ठीक नहीं रहती, अभी दवाइयों का ख़र्चा भी बढ़ गया है. कुछ रुपए भिजवा देते, तो अच्छा रहता…” लिखते हुए रंजन की उंगलियां कांप उठीं. एक पिता की पैसों के लिए अपने ही बेटे से ऐसी गुज़ारिश…? अचानक उसके मन में कोई कील-सी चुभी. जब मेरे दिल को इतना धक्का लग रहा है, तो इस बूढ़े इंसान को? वृद्ध पिता को कैसा लग रहा होगा?उसने महसूस किया, ऐसा लिखवाते हुए उन सज्जन की आवाज़ थर्रा गई थी! गला रुंध गया था. एक पिता के लिए इससे पीड़ादायक स्थिति और क्या होगी कि जिस बेटे पर, उसको लायक बनाने के लिए अपना धन उसकी हर ज़रूरत पर बिना मांगे ख़र्च किया, आज उसी के सामने अपने ख़र्च के लिए हाथ फैला गुज़ारिश करनी पड़ रही है? ‘दाता’ से ‘याचक’ बनने की कैसी पीड़ादायी दुखद स्थिति थी ये?कुछ पलों की तनावभरी शांति छा गई. दो पंक्तियां लिखवा वे चुप हो गए. रंजन आगे के लिए इंतज़ार करने लगा. कुछ क्षण बाद उसने नज़रें उठा उनकी ओर देखा, “आगे?”‘….!’ एक लंबी सांस ले उन्होंने होंठ भींच लिए, “बस बेटे, इतना ही!” और पत्र ख़त्म करने का संकेत किया, “तुम्हारा पिता बनवारीलाल!” रंजन आश्‍चर्य से उन्हें देखने लगा, “जब दो पंक्तियां ही लिखवानी थीं और पैसों की इतनी ही तंगी है, तो ‘अंतर्देशीय’ क्यों लिखवाया? ‘पोस्टकार्ड’ लिखवा देते?” “पोस्टकार्ड वहां अच्छा नहीं लगता बेटे! इतना बड़ा ऑफिसर है वो! और फिर… रिसिट सेक्शनवाला बाबू पढ़ भी लेता.”“तो घर के पते पर भेज देते? वहां तो कोई द़िक्क़त…”“वो मेरी बहू है न, मेरी चिट्ठियां फाड़कर फेंक देती है. बेटे तक पहुंचने ही नहीं देती, इसलिए…” भावना के अतिरेक में बनवारीलाल के मन का दर्द छलक उठा. गला रुंध गया. किसी मासूम माता-पिता से बिछड़े बच्चे की तरह बदहवासी उनके चेहरे पर छा गई! यह सुनकर रंजन का कलेजा मुंह को आ गया. एक पिता, जिसने अपनी पूरी जवानी, अपनी दौलत अपने बेटे को पालने, बढ़ाने और इतने ऊंचे ओहदे के लायक बनाने में ख़र्च कर दी, आज उसी बेटे से अपने मन की पी़ड़ा अभिव्यक्त कर पाने में कितना असमर्थ है? वो भी स़िर्फ अपनी बहू के कारण…? जिसका उनके बेटे को पालने लायक बनाने में कोई योगदान नहीं है? उसे तो ‘ऑलरेडी सेटल्ड’ पूर्ण लायक एक इंसान पति के रूप में मिला था! और उस पर पूर्ण अधिकार जमा उसकी पूरी कमाई पर कुंडली मार वह सास-ससुर को ठेंगा दिखा रही थी, जिनके त्याग के कारण ही पति इस कमाई के लायक बना था?कुछ क्षणों तक पीड़ादायी स्तब्धता छाई रही. फिर बनवारीलाल ने होंठों-होंठों में ‘थैंक्स’ बुदबुदा उसके हाथ से पत्र लिया, सामने खिड़की पर रखे गोंद से चिपकाया और डाक के डिब्बे में डाल थके-हारे क़दमों से गेट की ओर धीमी गति से बढ़ गए. रंजन की ओर उन्होंने गर्दन उठाकर देखा तक नहीं.रंजन उनकी विक्षत मनोस्थिति समझ रहा था. यदि एक बार भी रंजन से उनकी निगाह मिल जाती, निश्‍चित था उनकी आंखों से आंसू ढुलक पड़ते. बनवारीलाल के जाने के बाद भी रंजन कुछ देर तक वहीं जड़वत बैठा रहा. आधे घंटे बाद अपने काम निपटा रंजन घर की ओर रवाना हुआ. चौराहे पर रेड सिग्नल होने पर ज्यों ही वह रुका, बाईं ओर बनवारीलाल जाते दिखे. पसीने से लथपथ, छड़ी टेकते, कांपते क़दमों से!रंजन स्तब्ध रह गया. बनवारीलाल ने अपने पते में ‘गणेश कॉलोनी’ लिखवाया था. गणेश कॉलोनी यहां से अभी एक किलोमीटर और दूर थी, तो इतनी दूर इतनी गर्मी में? पैसों की तंगी के कारण, पैसे बचाने की ख़ातिर, बेचारे टेंपो भी नहीं कर रहे थे.कोई रिश्ता न होते हुए भी रंजन ने स्कूटर उनकी ओर मोड़ दिया. उनके पास पहुंच उसने बैठने का इशारा किया, “आइए बाबा, आपको छोड़ दूं.”“बेटा, तुम काहे नाहक तकलीफ़…” “तकलीफ़ कैसी? मैं गणेश कॉलोनी के आगे जा रहा हूं. वहां मेरी साइट है. आपको उतार दूंगा.” बनवारीलाल का हृदय गद्गद् हो गया. इतनी धूप में अजनबी होते हुए भी? आशीर्वाद में उसकी पीठ थपथपा वे उसके पीछे बैठ गए.जब घर आया, उन्होंने आग्रह से उसका हाथ पकड़ लिया, “दो मिनट घर तो चलो बेटे!” रंजन समझ गया. वे उसे कुछ नाश्ता करवाना चाह रहे होंगे, मगर उनकी आर्थिक अवस्था भांप ‘जल्दी’ का बहाना बना जाने लगा, तो उन्होंने कसकर हाथ पकड़ लिया, “‘देखो तो, मेरे हाथ के लगाए  नींबू-आंवला हैं. इनका शरबत गर्मी में बहुत राहत देगा.” इन्हें अतिरिक्त ख़र्चा नहीं करना पड़ेगा, आश्‍वस्त हो रंजन अंदर आया.

घर दो मंज़िला था. तीस साल पूर्व जब इधर सुनसान था, नई कॉलोनीज़ बनना शुरू हुई थीं,  बनवारीलाल ने सस्ते में 40 व 50 के दो प्लॉट ख़रीद लिए थे. एक में बैंक लोन ले घर बनवा लिया, दूसरे में बगीचा लगा लिया.शरबत से रंजन को वाक़ई बहुत तरावट मिली. जाने लगा, तो बनवारीलाल की पत्नी जमुनादेवी प्लास्टिक थैली में 25-30 नींबू ले आईं. रंजन को संकोच हुआ. अभी गर्मी में नींबू, वो भी इतने बड़े-बड़े, दो रुपये में एक बिक रहे थे. बनवारीलाल बेचते तो…बनवारीलाल ताड़ गए. आत्मीयता से उसका हाथ पकड़ा, “तीन पेड़ हैं, फूलों के भी हैं. आस-पड़ोस में सबको बांट देता हूं…” सही तो है. पड़ोसियों से आत्मीयता भी बनी रहती है, वरना बेटा तो सैकड़ों किलोमीटर दूर! वो भी निर्मोही!धन्यवाद दे रंजन चला आया.बनवारीलाल का मन बेहद अशांत था. वे बेचैनी से घर में इधर-उधर चकरघिन्नी से घूम रहे थे. मस्तिष्क में विचारों का झंझावात मच रहा था. कुछ निर्णय नहीं कर पा रहे थे, क्या करें? उस दिन के बाद इन पंद्रह दिनों में रंजन तीन बार उनके घर आया था. दो बार पत्नी को भी साथ लाया. एक आत्मीयता बन गई थी उनके बीच. उसकी पत्नी कुंतल के कारण पहली बार उन्हें ‘बहू का सुख’ मिल रहा था. भले ही वो पराई थी, पर सास-ससुर के समान सम्मान दे रही थी उन्हें.मगर आज जब रंजन आया, तो उन्हें विचारों के भंवर में डूबता-उतराता छोड़ गया. वे कुछ तय नहीं कर पा रहे थे कि रंजन के प्रस्ताव का क्या जवाब दें?ऐसे व़क्त में उन्हें अपनी बिटिया सेवंती की बहुत याद आई. काश! यहां होती तो उससे सलाह-मशविरा कर लेते. तभी बाहर रिक्शा रुकने की आवाज़ आई. खिड़की से झांककर देखा, तो सेवंती, निखिल संग उतर रही थी. बेटी-दामाद को देखते ही उनकी बूढ़ी रगों में जान आ गई. दौड़कर दरवाज़ा खोला. तब तक सेवंती-निखिल बरामदे में आ गए थे. बेटी को गले लगा वे भावुक हो गए. “बिटिया, तुझे ही याद कर रहा था.”“और मैं आ गई!” ख़ुशी से किलक सेवंती ने उनके चरण स्पर्श किए. उन्हें लिवा बनवारीलाल अंदर आए. कुशल-क्षेम पूछने के बाद बनवारीलाल के मुंह से निकल गया, “एक उलझन में हूं बेटे…”“इसीलिए तो हम आए हैं बाबूजी!” सेवंती ने पूरी बात सुने बिना कहा, “आपको रंजनजी का प्रस्ताव मान लेना चाहिए!”‘….?’

Short Story, Bejaan Na Jaan

बनवारीलाल अवाक् उसे देखते रह गए. ये रंजन को कैसे जानती है? और उसका प्रस्ताव? इसकी भी उसे जानकारी?“अरे बाबूजी!” सेवंती ने लाड़ से उनका असमंजस दूर किया, “पिछले हफ़्ते रंजनजी के मोबाइल से ही तो आपने हमसे बात की थी…” “हां… हां…” बनवारीलाल को याद आ गया. मगर वो प्रस्ताव? इसकी जानकारी इन दोनों को?“बाबूजी!” निखिल उनके पास खिसक धीर-गंभीर स्वर में समझाने लगा, “रंजनजी ने जो सुझाव दिया है, हमें बहुत उचित लगा. इसीलिए कल उनका फोन आने पर हम आए हैं, आपको समझाने.” बनवारीलाल आश्‍चर्य से उन्हें देखते रह गए. तो ये खिचड़ी इनके बीच पहले ही पक चुकी थी?बनवारीलाल गहरी सोच में डूब गए. बेटी-दामाद के अनुमोदन के बाद तो उनका दिल ही किसी गहरे अंधे गह्वर में धंसता चला गया. उन्हें इस सुझाव पर विचार करना ही बेहद मर्मांतक लग रहा था कि वे अपना ये ‘घर’ बेच दें.घर! वो मनोरम स्थल, जहां इंसान सुरक्षा से रह भविष्य के सपने बुनता है. अपनी गृहस्थी चलाता है. कोई एक याद जुड़ी होती है इसके संग? हर पल की सैकड़ों-हज़ारों यादें! उन सबको एक झटके में तिरोहित कर कैसे बेच दें इसे?उनका कलेजा मुंह को आ गया. निखिल का हाथ पकड़ वे कातर आंखों से उसे निहारने लगे, “बेटे, दामाद की बात आज तक टाली नहीं, लेकिन ज़रा मेरे मन की हालत सोचो! सेवंती से ही पूछ लो. पांच-छह साल की थी ये. शायद कुछ याद हो. कितने चाव से, कितनी हसरतों से मैंने ये घर बनवाया था. मां से पूछो, एक-एक ईंट मैंने अपने सामने लगवाई है…”“मैं मानता हूं बाबूजी.” निखिल ने उनके हाथों को अपनी मुट्ठी में भींच लिया, “लेकिन ऐसा कठोर निर्णय लेने के लिए हम आपके भले के वास्ते ही कह रहे हैं…”“अरे, काहे का भला?” बनवारीलाल का गला अवश विवशता से भर आया, “उस घर को बेचने के लिए बोल रहे हो, जिसे मैंने बड़े चाव से बनवाया था…” “चाव से तो बाबूजी आपने भैया को भी पढ़ाया था!” दख़ल देती सेवंती की आवाज़ थोड़ी तिक्तता के साथ दर्द में डूब गई. “क्या मिला आपको?” सैकड़ों टन पत्थरों के नीचे दब गया बनवारीलाल का मन. बिपिनपाल के लिए कितने सपने बुने थे उन्होंने! उसके उच्च अध्ययन के लिए इसी घर पर बैंक लोन लिया था उन्होंने. उसे चुकाने की ज़ेहमत तक नहीं उठाई बिपिनपाल ने. सारा कर्ज़ बनवारीलाल ने चुकाया. ब्याज समेत. स्तब्ध! मूर्तिवत्! जड़वत् रह गए बनवारीलाल. सेवंती की शादी में पैसा भी तो नहीं लगाने दिया था बिपिनपाल को उस कुंडली मारकर बैठी बहू ने. सारी ज़िम्मेदारियां बनवारीलाल ने उठाई थीं. जब रिटायर हुए… एडवांस में आधा खाली हो चुका पीएफ का पैसा पिछली देनदारियां चुकाने में पूरा हो गया! बस, अकेली पेंशन का सहारा है.ज़िंदगी के दांव में सब कुछ हार चुके जुआरी की तरह निस्तेज निढाल बेटी-दामाद को कातर नज़रों से देखते रहे.“बाबूजी!” पिता को गले लगा सेवंती की आंख भर आई, “उम्र के साथ बीमारी के ख़र्चे भी तो बढ़ रहे हैं! कहां से पूरे करोगे? हमसे लेते नहीं, भैया भेजता नहीं!”“… कहने को लाखों की मिल्कियत… मगर इलाज को… दवा, डॉक्टर को?… एक रुपया ख़र्चने में कंजूसी?… ये देखो… देखो ज़रा..” सेवंती उनकी कलाई थाम उनकी उंगलियां सहलाने लगी, “ चोट लग गई थी, कट गई थी… मगर डॉक्टर के पास नहीं गए… तो नहीं गए… घर पर पुराना कपड़ा फाड़… उसी की पट्टी बांध ली!”बनवारीलाल ने होंठ भींच लिए. अब वे ठंडे मन व शांत चित्त से सोचने लगे. सेवंती-निखिल वाकई सही सलाह दे रहे हैं. लाखों की संपत्ति होते हुए भी वे अभावों में जी रहे हैं. इलाज तक नहीं करवाते. पूरी ज़िंदगी यूं ही तकलीफ़ों में निकल जाएगी. मर जाएंगे. उसके बाद…? उसके बाद वो ख़ुदगर्ज़ बेटा बिपिनपाल आएगा… सब ले जाएगा- जो आज झांकता तक नहीं. फिर क्यों तरस-तड़प कर रहें?भारी… हताश… निरुपाय मन… उन्होंने घर बेचने का निर्णय ले लिया.सारी रात नींद नहीं आई. सुबह उठे भी तो बुझे-से. मौन चुप रह नित्यकर्म निपटाते रहे. ग्यारह बजे के लगभग रजिस्ट्री करने के लिए निकले. घर के बाहर आ उदास-बुझी आंखों से अपने घर को देखने लगे. अभी ये ‘मेरा’ है… ‘मेरा अपना घर!… जब लौटेंगे… किसी और का ‘पराया’ हो जाएगा… हमेशा… हमेशा के लिए…हठात् पास खड़ी सेवंती को निहारने लगे. उसकी शादी का ‘विदाईवाला’ दृश्य याद आ गया. ये भी उस दिन ‘पराई’ हो गई थी. लेकिन इसके पराए होने और घर के पराए होने में कितना अंतर है? बेटी के पराया होने में रत्तीभर दुख नहीं था. मालूम था, पराए घर की होकर भी मायके से जुड़ी रहेगी. लेकिन यहां तो?उनका ‘प्रेमकुंज’ सदा सर्वदा के लिए पराया हो जाएगा. एक ठंडी सांस ले उन्होंने होंठ भींच लिए.  पास खड़े निखिल ने संरक्षक भाव से उनके कंधे थपथपा रंजन की भेजी कार में बैठाया. वस्तुत: ये घर रंजन ही ख़रीद रहा था. उसका प्रॉपर्टी का बिज़नेस था. ज़मीन-पुराने मकान ख़रीदना, मल्टीस्टोरी बनाना और फ्लैट्स बेचना. बनवारीलाल के उस ‘दो पंक्ति’ के पत्र ने उसे बुरी तरह हिला दिया था. कोई रिश्ता, जान-पहचान न होते हुए भी वह उनकी सज्जनता से द्रवीभूत हो उनका जीवन संवारने को तड़प उठा. निखिल को फोन कर सारी योजनाएं समझाईर्ं. रजिस्ट्री के बाद वे सब रंजन के घर गए. दोपहर व रात का भोजन रंजन के घर ही था.देर रात वे लौटे. ‘प्रेमकुंज’ में प्रवेश करते समय बनवारीलाल के क़दम हठात् ठिठक गए. सुबह गए थे, तब बेटी का ख़्याल मन में आया था, अभी लौटे तो बेटे का आ गया.कितनी उम्मीदों से पाला था उसे! कर्ज़ा लेकर उच्च अध्ययन के लिए भेजा, शादी में पत्नी के गहने भी बहू को चढ़ा दिए, लेकिन बेटा सुंदर पत्नी के मोहपाश में ऐसा बंधा कि माता-पिता के मोह के बंधन को भूल गया. भूले-बिसरे याद भी नहीं करता? पराया हो गया! इस घर की तरह!बनवारीलाल का मन कसक उठा. बेटी के पराये होने और बेटे के पराये होने में कितना अंतर है! बेटी पराई होकर भी माता-पिता का ध्यान रखती है और बेटा पराया होता है, तो माता-पिता बीच मंझधार में डोलती बिना पतवार की कश्ती हो जाते हैं.ठंडी सांस ले बनवारीलाल अंदर दाख़िल हुए. सारी रात बनवारीलाल को नींद नहीं आई. बार-बार उठ पागलों की तरह पूरे घर के चक्कर लगाते. कभी दरवाज़ों से लिपटते, कभी दीवारों से. फ़र्श पर निढाल हो, शून्य आंखों से छत को टकटकी लगाए घूरते. खून-पसीने की कमाई से बनाए अपने घर को बेच देने की टीस से उनके मन का संताप निरंतर बढ़ता जा रहा था. जब व्यग्रता का लावा मन में उबलने लगा, तो एक खंभे से लिपट फूट-फूटकर रो पड़े, “आज तुमने भी मेरा साथ छोड़ दिया. उस पर अपनी कमाई लुटाई, तुम पर भी… उसने तो कब का किनारा कर लिया… आज तुम भी धोखा दे गए…”“ऐसा मत कहो बाबूजी!” हठात् बनवारीलाल को लगा वो खंभा झूठे इल्ज़ाम की पीड़ा से तड़प उठा है. “हमने आपको कोई धोखा नहीं दिया… हमने तो आपका जीवन संवार दिया है.”“हां बाबूजी!”बनवारीलाल को लगा खंभे के साथ अब घर की दीवारें, खिड़की, दरवाज़े सब रो-रोकर गुहार लगा रहे हैं, “ज़रा गहराई से सोचो!… अब आपको किसी भी तरह की चिंता नहीं करनी पड़ेगी…”बनवारीलाल विस्फारित नज़र सोचने लगे. चालीस लाख में रंजन ने उनका घर ख़रीदा. पंद्रह लाख में उसकी एक मल्टीस्टोरी बिल्डिंग में फ्लैट दिलवा दिया. पंद्रह लाख की बैंक में एफडी, दस लाख में उसकी नई बन रही मल्टी में एक फ्लैट बुक कर दिया कि सालभर में मल्टी बनने पर भाव बढ़ने पर उसे बेच फिर दूसरी नई बिल्डिंग में बुक कर देंगे…!“अब सोचो बाबूजी… आपको ख़र्च की रत्ती भर भी चिंता रहेगी?” हतप्रभ् बनवारीलाल की बूढ़ी हड्डियों में जान आई. बेटे ने तो ‘बेजान जान’ यादों के कूड़ेदान में फेंक दिया था, लेकिन इस ‘बेजान’ घर ने उनमें जान डाल दी. बनवारीलाल अब आह्लाद से उन बेजान दीवारों-खंभों-खिड़कियों और दरवाज़ों को दीवानों की तरह चूमने लगे. “नहीं-नहीं, मेरे ‘प्रेमकुंज’, तुम बेजान नहीं, तुम तो अपने बाबूजी में जान डालनेवाले सच्चे सपूत हो!

  प्रकाश माहेश्‍वरी

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हिंदी कहानी- शुभकामना (Hindi Short Story- Shubhkamna)

Short Story, Shubhkamna

Short Story, Shubhkamna

आज मनीषा को अपने जन्मदिन को लेकर कोई उत्साह नहीं है, लेकिन यह बच्ची कितने उत्साह से शुभकामना देने चली आई है. तमाम धिक्कार, तिरस्कार, अवरोध, प्रतिबंध को भूलकर. सम्प्रेषण की छोटी-सी कोशिश, इतना आराम और सुख दे देती है मनीषा को नहीं मालूम था.

बगीचे में आकर मनीषा को लगता है उसने ख़ुद को खोज निकाला है और इस संसार में उसका होना, होने की तरह दर्ज हो रहा है. वह क्यारियों को दुरुस्त करती है, लॉन में चहलक़दमी करती है. कभी लॉन के कोने में लगे झूले में बैठती है. ऊपर स्वच्छ आकाश है और फेंस के पार मकानों की छत पर लोग हैं, मैदान में खेलते बच्चे हैं. बच्चे, मनीषा को निरुत्साह करते हुए
अनायास याद दिला देते हैं कि वह संतानहीन है. वह यातना से गुज़रती है. एक शिशु… एक शिशु उसकी ज़िंदगी को फलदायी बना सकता है, पर… एक बच्चे के बिना सब कुछ अस्वाभाविक लगता है. बच्चे कितने हैं जैसा स्वाभाविक प्रश्‍न भी. प्रहार करते इस प्रश्‍न पर उसका चेहरा खिंचकर सख़्त होने लगता है.
“नहीं हैं.”
“नहीं हैं… राम-राम…”
यह दया भाव बताता है कि वह दूसरी स्त्रियों से भिन्न है.
“राम-राम करने जैसी क्या बात है?”
“वकील साहब दिनभर दफ़्तर में रहते हैं, बच्चे नहीं हैं. मैडम, आप घर में अकेली कैसे रह लेती हैं?”
हर वक्ता स्त्री को सख़्ती से देखती है, “उत्पात करते बच्चों को देखती हूं, तो बच्चे न होने का कोई अफ़सोस नहीं होता. मेरे बगीचे से बच्चे कभी अमरूद चुराते हैं, कभी गुलाब.”
किसी दिन मनीषा ने दस-बारह साल के लड़के को फूल चुराते हुए पकड़ा था. लड़के को रोते… मिन्नते करते… माफ़ी मांगते देख उसे क्रूर क़िस्म का सुख मिल रहा था.
मानो बच्चेवाली स्त्रियों से बदला ले रही हो. साथ के लड़के ने शायद पकड़े गए लड़के के घर में सूचित कर दिया था. बदहवास मां आकर खेद प्रगट करने लगी, “मैडम, कोई माता-पिता बच्चे को चोरी-डकैती नहीं सिखाते, पर ये पता नहीं कहां से सीख लेते हैं. हमसे तो बेऔलाद अच्छे…”
बेऔलाद! यह शब्द उसके भीतर प्रक्षेपास्त्र की तरह फूटा.
यदि वह सही समय और सही आयु में मां बनती, तो आज उसका बच्चा, इस अमरूद चोर लड़के की उम्र का होता. लेकिन तब उसे बच्चे से अधिक अपने अध्यापन में रुचि थी. उसने भार्गव से स्पष्ट कह दिया था, “अभी बच्चे नहीं होने चाहिए. मैं कॉलेज और बच्चे साथ-साथ मैनेज करने की स्थिति में नहीं हूं.” असावधानीवश गर्भवती हो गई, तो भार्गव के विरोध और चिकित्सक की सलाह पर बिल्कुल ध्यान न दे गर्भपात करा लिया. और तीस की आयु पार कर जब ललक उठी घर में किलकारी गूंजनी चाहिए, तब चिकित्सक की चेतावनी का सत्यापन होता जान पड़ा- पहला गर्भपात अक्सर गर्भधारण को कठिन बना देता है. तमाम जटिलताएं आती हैं. वह गर्भधारण नहीं कर पा रही थी. किया तो मिस कैरिज हो गया. फिर चार वर्ष बाद बच्ची ने गर्भकाल पूर्ण किया, लेकिन गर्भ में ही सड़ चुकी थी. फिर संभावना न बनी. मनीषा निरुपाय हुई और सफल अधिवक्ता भार्गव क़ानून की किताबों में बच्चा गोद लेने के अधिनियम देखने लगे. संबंधित अनुच्छेदों को पढ़ते-समझते भार्गव मनीषा को बहुत दीन लगते. भार्गव पिता बन सकते थे, उसकी ज़िद ने उनसे यह सुख
छीन लिया.
“भार्गव, तुम क्या बच्चा गोद लेने का विचार बना रहे हो?”
“विकल्प ही क्या है?”
“मेरी ज़िद बुरी थी, लेकिन मेडिकल साइंस कहता है कि अब किसी स्त्री की गोद सूनी नहीं रहेगी. तमाम विधियां हैं. पैसा लगेगा, लेकिन हमें कोशिश करनी चाहिए.”
“वह सब मुझे कृत्रिम, अप्राकृतिक लगता है. तकलीफ़देह भी. तुम चालीस पूरा कर रही हो. कमज़ोर हो गई हो. तुम्हारा स्वास्थ्य देखना ज़रूरी है.”
“थोड़ा रुको न. भगवान शायद हमारी सुन लें.”
“दरअसल, तुम भावुक हो रही हो. एक दिन मैंने एक पॉलिटिकल मैगज़ीन में कुछ दंपतियों के विचार पढ़े. ख़ासकर स्त्रियां अपने करियर को इतनी प्रमुखता दे रही हैं कि वे सेटल होने के बाद बड़ी उम्र में विवाह करती हैं. बच्चे करियर में बाधक होते हैं, इसलिए गर्भधारण न कर बाद में ज़रूरत मुताबिक़ बच्चा गोद ले लेना चाहती हैं. और ये दंपति ख़ुश हैं कि वे जनसंख्या विस्फोट का कारण नहीं बनेंगे.”
मनीषा ने बहुत निरीह होकर भार्गव को निहारा. क्या यह सायास है कि भार्गव मेरी भूल को इन दंपतियों के माध्यम से मुझे बताना चाहते हैं?
“मैं कितनी परेशान हूं भार्गव.”
“इसीलिए फैसले पर आना चाहता हूं. इन लोगों की मान्यता से मैं प्रेरित हुआ हूं. मनीषा, हमें बच्चा गोद ले लेना चाहिए. बच्चा रिश्तेदारी से आएगा या अनाथ आश्रम से, यह तुम डिसाइड करोगी.”
लेकिन मनीषा की आस नहीं टूटती.
“मैं गर्भवती हुई न? फिर हो सकती हूं. उम्र नहीं बीत गई. ऐसा न हो हम जल्दबाज़ी में बच्चा गोद ले लें, फिर अपना हो जाए, तो दत्तक के साथ ईमानदार न रहें या वह हमारे बच्चों के लिए संकट बने.”
“हां, पर…”
मनीषा कुछ न बोलती.
वह चुप रहने लगी है. बातें नहीं सूझतीं. कॉलेज से आकर घर में ़कैद हो जाती है. धूप ढलने की प्रतीक्षा करती है. ढलते ही बगीचे में आ जाती है. बगीचे में आई, तो देखा आउटर गेट पर एक मोटी स्त्री और छह-सात साल की बच्ची खड़ी है. मनीषा ने आते-जाते इस बच्ची को सड़क पर खेलते देखा है.
“कहिए?” मनीषा गेट पर आई.
“वह घर देखती हो, जहां छत पर कपड़े फैले हैं, हम वहां रहते हैं. यह नीली है, मैं इसकी दादी. गांव के बड़े घर में रहती हूं, तो मुझसे यहां दो कमरे में नहीं रहा जाता. जी घबरा रहा था, सो नीली को लेकर निकल पड़ी कि देखूं यह इतना सुंदर बगीचा किसका है.” वृद्धा इस तरह परिसंवाद करने लगी मानो पूर्व परिचित है. जबकि मनीषा किसी से परिचय नहीं बढ़ाती. लोग प्रश्‍न बहुत पूछते हैं.
“अंदर आ जाऊं?” मनीषा चुप थी, लेकिन
दादी-पोती गेट खोल दाख़िल हो गईं.
“इतने सारे फूल? झूला भी है? नीली झूलेगी?”
दादी ने कहा तो नीली झिझक गई.
मनीषा ने देखा गोल भरे चेहरेवाली मासूम बच्ची उसे उत्सुकता से ताक रही है.
दादी कहती रही, “नीली की मां बताती है तुम कॉलेज में पढ़ाती हो.”
“हां.”
“बताओ, इतना बड़ा घर-द्वार, बाग-बगीचा. भगवान बाल-बच्चा दे देता, तो बगीचा चमन हो जाता.”
वृद्धा ने अपनी समझ से मनीषा को सांत्वना देने जैसी बात की, लेकिन मनीषा के द्वैत और द्वंद्व ख़त्म नहीं होते.
“मैं आराम से हूं.”
वृद्धा को अब भी बुद्धि न आई.
“नीली संझाबेरी तुम्हारे पास आ जाया करेगी. तुम्हारा मन बहलेगा.”
मनीषा का दिलो-दिमाग़ झनझना गया. नीली उसके मन बहलाव का साधन बने उसे स्वीकार नहीं. सदाशयता, सहानुभूति, सहयोग नहीं चाहिए.
लेकिन नीली नहीं समझती थी यहां आकर वह मनीषा को नाराज़ करने जैसी कोशिश करेगी. झूला उसके लिए आकर्षण था और वह शाम को आने लगी.
“स्कूल से लौटकर यूनीफॉर्म बदली और आपके पास भाग आई. मां बोली कुछ खा लो, मैंने कहा पहले आंटी के पास हो आऊं.”
नीली ने कहा उत्साह से, पर देखा मनीषा उसकी बात सुनकर प्रसन्न नहीं है, बल्कि उसे अप्रिय भाव से देख रही है. इस घर में बच्चे होते, तो उनके बहाने यहां आना आसान हो जाता. नीली अपने स्तर पर मानो उपाय
करने लगी.
“आंटी, आपके घर में बच्चे नहीं हैं?”
मनीषा का चेहरा सख़्त हो गया, तो यह भी
मुझे कठघरे में खीचेंगी? घर में सुनती होगी मैं नि:संतान हूं, लेकिन लोग चिंतित क्यों हैं? कठोर था स्वर, “यहां बच्चे नहीं हैं. मत आया करो.”
“मैं आपके पास आती हूं.”

Short Story, Shubhkamna
मनीषा नहीं समझ पा रही है कि नीली के साथ किस तरह प्रस्तुत हो. नीली के प्रति निर्लिप्त रहती है, लेकिन कठोर होकर उसे आने से रोक नहीं पाती है. अनायास होता है, हम जिन नामालूम-सी बातों को अपनी दिनचर्या में सम्मिलित नहीं करना चाहते, वे सम्मिलित हो जाती हैं. नीली को देखकर मनीषा अनायास ईश्‍वर से प्रार्थना करने लगती है कि ऐसी ही सलोनी बच्ची मुझे चाहिए, लेकिन नीली की उपस्थिति त्रास भी देती है. यहां तक कि जब नीली ने आकर बताया उसका जन्मदिन आनेवाला है, तब भी मनीषा ने उत्साह से नहीं पूछा, कब?
नीली उसकी स्थिति-मनःस्थिति नहीं समझती. ख़ुद ही बता दिया.
“14 अक्टूबर. बस, एक हफ़्ता है. आंटी, आपका जन्मदिन कब है?”
“20 फरवरी.”
“मैं नोट बुक में नोट कर लूंगी. मैंने मां, पापा, भाई, फ्रेंड्स सबके बर्थडे नोट कर रखे हैं. सबको विश करती हूं.”
14 अक्टूबर की शाम नीली ऐसे आह्लाद और विश्‍वास के साथ आई मानो मनीषा को यह तारीख़ याद होगी. मनीषा को याद नहीं. नीली झूला न झूलकर उसके आस-पास मंडराने लगी, “आज मैंने क्लास में चॉकलेट बांटें.”
“क्यों?”
“भूल गईं? मेरा बर्थडे?”
अदा मासूम थी. मनीषा को कहना पड़ा.
“जन्मदिन शुभ हो नीली!”
साथ ही मनीषा ने पीला गुलाब तोड़ा और नीली को दिया.
नीली उन फूलों को बहुत ललचाकर देखती रही. वह गुलाब उसकी उपलब्धि थी.
“ब्यूटीफुल. मैं इस गुलाब को अपने भाई को दिखाऊंगी.”
यह पहली बार था जब मनीषा नीली के प्रति सजग हुई. बच्चे वस्तुत: मासूम, निश्छल और चंचल होते हैं. अपनी उपस्थिति से वातावरण को सहज बना देते हैं.
मान-अभिमान से मुक्त. तभी तो नीली ने स्मरण कराया उसका जन्मदिन है. कितनी क्रिया-प्रतिक्रिया. ईश्‍वर ऐसा ही बच्चा मेरा हो. अपने क्रियाकलापों से मुझे विभोर कर दे.
मेरा बच्चा.
और प्रार्थना के स्वर बिखर गए. नीली भ्रम है. स़िर्फ एक भ्रम. यह सुख और संतुष्टि नहीं दे सकती. मुझे इससे सुख नहीं चाहिए. एक क्षण ऐसा आया, जब लगा मनीषा ज़ोर से चीखेगी- ‘नीली तुम मेरी भावनाओं को उकसाने के लिए क्यों चली आती हो? तुम मुझे यातना देती हो. कल से मत आना.’
पर नीली कैसे समझेगी न आने देने का यह कैसा कारण है? वह तो मनीषा के भाव-अभिप्राय से निर्लिप्त रहकर उस पर विश्‍वास करने लगी है. शाम को एक फॉर्म लेकर आई, “आंटी, आज के अख़बार के साथ यह फॉर्म मिला है. आदित्य कंप्यूटर सेंटर का है. इसमें दिए टेन क्वेश्‍चन, जो बच्चा सॉल्व कर लेगा, उसे फ्री में कंप्यूटर सिखाया जाएगा. पापा स़िर्फ दो अन्सर बता पाए. आपसे सब बन जाएंगे. फिर मैं फ्री में कंप्यूटर सीख लूंगी. है न अच्छी बात?”
नीली ने पर्चा और पेन मनीषा को थमा दिया.
मनीषा कुल तीन प्रश्‍न हल कर पाई.
“बस तीन? आप भी पापा की तरह बुद्धू हैं. मैं कंप्यूटर नहीं सीख पाऊंगी.”
“मत सीख. मुझे बुद्धू कहती है. मैनर्स नहीं जानती.”
मनीषा ने कटु होकर पर्चा नीली की ओर फेंक दिया.
“सॉरी आंटी.” नीली पर्चा उठाकर चली गई.
पखवाड़ा गुज़रा. नीली नहीं आई. मनीषा चाहती है कि नीली न आए, लेकिन लग रहा है नीली जब तक रहती है, समय अच्छा गुज़रता है. क्या नीली के एहसास की आदत होती जा रही है? इससे लगाव विकसित करना ख़ुद को धोखा देना है. अब न आए तो ठीक. बेकार की घुसपैठ. नीली अठारहवें दिन आई. मनीषा को झूले पर बैठे देख इस तरह करतल ध्वनि में बोली मानो किसी बड़े को झूले पर बैठे देखना रोमांचक घटना हो, “आंटी, मैं आपको झुलाऊं?”
जवाब में मनीषा ने प्रश्‍न किया, “इतने दिन कहां थी?”
नीली उत्साहित हो गई, “हाफ ईयरली एग्ज़ाम थे. पापा बोले पढ़ो. आप मेरा इंतज़ार करती थीं?”
“हां… नहीं…”
यह नहीं है, तो लगता है इसे आना चाहिए, पर न आए तो अच्छा है. यह बच्ची विभ्रम है, छलावा. इससे भावनाएं जोड़कर कुछ हासिल नहीं होना है.
मनीषा नीली को टालने लगी. मैं नोट्स बना रही हूं, डिस्टर्ब मत करो… मेरी तबीयत ठीक नहीं है… बाहर जा रही हूं… सालाना इम्तिहान नज़दीक है, तुम पढ़ती क्यों नहीं?… नीली आती और उदास होकर लौट जाती. फिर उसने आना छोड़ दिया. दूर बच्चों के साथ खेलती दिख जाती.
दिनों बाद अचानक चली आई.
“तुम?” मनीषा के स्वर में अचरज था या आरोप वह स्वयं नहीं जानती.
“अभी चली जाऊंगी.” नीली तेज़ चाल से उसकी ओर बढ़ी आ रही थी.
धृष्ट लड़की रुक नहीं रही है. गंवार बच्चों को मुंह लगाओ, तो लिहाज़ भूल जाते हैं.
लिहाज़ भूल नीली ने स़फेद गुलाब तोड़ लिया.
“नीली, बेव़कूफ़…”
जब तक मनीषा नीली की ओर झपटती, नीली ने जींस की जेब से छोटा ग्रीटिंग कार्ड निकालकर उसके ऊपर गुलाब को रख लिया, “हैप्पी बर्थडे आंटी. मैंने कहा था न मैं आपका बर्थडे याद रखूंगी. मैं बड़ा कार्ड लेना चाहती थी. मां ने कहा महंगा है, छोटा लो. और मैं फूल भी अपने घर से लाती, पर मेरे घर में गेंदा है, गुलाब नहीं. लीजिए.”
दो छोटे हाथ मनीषा को बहुत कुछ सौंप रहे थे- छोटी-सी उम्मीद… नन्हा-सा विश्‍वास… एक कोमल सपना… ओह! यह मासूम मुद्रा. यह भोला भाव. मनीषा को नीली का जन्मदिन याद नहीं था और नीली ने याद दिलाया था. आज मनीषा को अपने जन्मदिन को लेकर कोई उत्साह नहीं है, लेकिन यह बच्ची कितने उत्साह से शुभकामना देने चली आई है. तमाम धिक्कार, तिरस्कार, अवरोध, प्रतिबंध को भूलकर. सम्प्रेषण की
छोटी-सी कोशिश, इतना आराम और सुख दे देती है मनीषा को नहीं मालूम था. वह पिघलकर एकदम नरम पड़ गई. इच्छा हुई नीली के हाथों को थाम ले. उसके स्पर्श को अपने भीतर जज़्ब होने दे. उसके वजूद को महसूस करे.
“नीली, तुम आई, मुझे अच्छा लगा.” मनीषा ने कार्ड व फूल लेते हुए नीली के हाथ थाम लिए.
मासूम मुलायम छुअन. यह स्पर्श कैसा अलौकिक है अब तक नहीं जाना. बच्चों को कभी अपने पास नहीं आने दिया. बच्चों का आस-पास होना तनाव और दबाव को किस तरह दूर कर देता है, कभी जानना नहीं चाहा और घुटती रही अपने बनाए अंधेरों में.
“मैं जाऊंगी.” नीली ने असहजता में हाथ छुड़ा लिए.
“रुको ना. कुछ खिलाती हूं.”
“नहीं. मां ने कहा है तुरंत वापस आना. मां काम करती है, तब मुझे भाई को संभालना पड़ता है. वह छोटा है न.”
मनीषा की इच्छा हुई कहे- ‘नीली रुको. मैं फुर्सत में हूं. मुझे नोट्स नहीं बनाने, कहीं नहीं जाना, तबीयत बिल्कुल ठीक है. रुको. रोज़ आया करो.’ नहीं कह सकी. नीली समझ लेगी बहाने से उसे भगाया जाता था.
मनीषा जाती हुई नीली को देखती रही. उसकी शुभकामना ने मनीषा को सकारात्मक ऊर्जा से भर दिया. भार्गव कचहरी से लौटे, तो कहेगी हमें अनाथ आश्रम से बच्चा गोद ले लेना चाहिए.

        सुषमा मुनींद्र

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हिंदी कहानी- रिश्तों की बगिया (Hindi Short Story- Rishto ki Bagiya)

Short Story- Rishto ki Bagiya
Short Story- Rishto ki Bagiya

वो जल्द से जल्द घर पहुंचकर अपनी भूल सुधारना चाहती थी. अपनी रिश्तों की बगिया को आनेवाले तूफ़ान में बिखरने से रोकना चाहती थी. उसे एहसास हो गया था कि रिश्ते प्रेम, समर्पण व त्याग से मधुर बनते हैं. अपनापन ही रिश्तों को गूंथकर रखता है.

”दीदी, संजय का रिश्ता पक्का कर दिया है. दो माह बाद विवाह है. आपको एक महीने पहले ही आना पड़ेगा. अजय के विवाह का सारा काम आपने ही संभाला था, अब संजय का भी…”
वृंदा के उत्साह पर रोक दीदी के जवाब से लगी, “वृंदा, ये तो ख़ुशख़बरी है, पर मैं दो-तीन दिन के लिए ही आ सकूंगी.”
“क्या कह रही हो दीदी? मैं तो आपके भरोसे हूं. आप अजय के विवाह में भी तो एक माह पहले ही आ गई थीं, फिर संजय की शादी में पहले से क्यों नहीं आएंगी?”
दीदी हंसते हुए बोलीं, “वृंदा, तब की बात और थी. अब नटखट मोनू जो आ गया है. उसे नहीं छोड़ सकती.”
वृंदा भुनभुनाई, “उसे स्नेहा बहू संभाल लेगी. आपने क्या ठेका ले रखा है उसका.”
दीदी बोली, “कैसी बातें करती है वृंदा? स्नेहा अभी बच्ची है, बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करती है. अर्पित और स्नेहा सुबह आठ बजे घर से निकलते हैं और शाम सात-साढ़े सात बजे तक लौटते हैं. ऐसे में मोनू की देखभाल कौन करेगा?”
वृंदा क्रोधित हो उठी, “तो आजकल आपने ‘आया’ का काम संभाला हुआ है?”
दीदी ने समझाते हुए कहा, “नहीं वृंदा, आया है मोनू को संभालने को, पर उसकी निगरानी के लिए भी तो घर में किसी का होना ज़रूरी है. समझने की कोशिश कर, मैं ज़्यादा दिनों के लिए नहीं आ सकती. अजय के विवाह में मैंने दो डायरियां बनवाई थीं, उस में विवाह से सम्बंधित सभी ज़रूरी बातें नोट की थीं. उसी के आधार पर सारी तैयारियां कर लेना. मैं नहीं हूं तो क्या हुआ, तू अब अकेली नहीं है. निकिता बहू तेरे साथ है ही.”
फ़ोन रखते हुए वृंदा भुनभुना उठी, “जीजाजी के जाने के बाद बेचारी दीदी अपने ही घर में नौकरानी बनकर रह गई हैं. ये भला क्या बात हुई कि पोता हो गया तो वो कहीं आ-जा नहीं सकतीं. बहू अपने बच्चे को ख़ुद संभाले. मुझे भी पोती है, तो क्या मैंने नाते-रिश्तेदारों में आना-जाना बंद कर दिया? मेरी बहू भी नौकरी करती है, पर घर और बच्ची को भी संभालती है. बच्चे पैदा किए हैं, तो संभालने भी ख़ुद पड़ेंगे. हम नौकरी नहीं करते थे तो क्या हुआ, घर और बच्चे ख़ुद ही संभालते थे. हमारी सास नहीं संभालती थीं हमारे बच्चे.”
शाम को ऑफ़िस से आते ही वृंदा के उखड़े मूड को भांपकर पति निखिल बोल पड़े, “क्या बात है वृंदा, उर्मी दीदी से बात नहीं हो पाई क्या?”
वृंदा व्यंग्यात्मक स्वर में बोली, “बात तो हुई, पर दीदी का कहना है कि वो दो-तीन दिनों के लिए ही आएंगी. उनके बिना वहां पोते की देखभाल कौन करेगा?”
निखिल बोले, “उनका कहना उचित ही है. बेटा-बहू दोनों नौकरी पर जाते हैं. ऐसे में छोटे बच्चे को संभालने के लिए उनकी वहां ज़्यादा ज़रूरत है. कोई बात नहीं, बहू तो है ही तुम्हारे साथ. बहू की पसंद से ख़रीददारी होगी, तो छोटी बहू को भी पसंद आएगी. बच्चों और हमारी पसंद में काफ़ी फ़र्क़ है.”
वृंदा ने मुंह बिचकाया, “बहू को नौकरी और बच्ची से फुर्सत मिले तब तो और कुछ कर पाए. संजय के विवाह में सारी ख़रीददारी मेरी पसंद से होगी और वो मैं कर लूंगी. पर मैं उर्मी दीदी को लेकर परेशान हूं. जीजाजी के जाने के बाद उनकी हैसियत अपने ही घर में नौकरों जैसी हो गई है.”
निखिल असहज हो उठे, “कैसी बात करती हो वृंदा? अर्पित ऐसा लड़का नहीं है. उर्मी दीदी भी समझदार हैं, अर्पित की पसंद से ही उसका विवाह किया. ऐसे में बहू स्नेहा उनका अनादर करे, ये संभव नहीं है.”
वृंदा उत्तेजित होकर बोली, “तुम ये क्यों नहीं सोचते कि जीजाजी तो दुनिया में रहे नहीं, ऐसे में अर्पित की पसंद को मानना दीदी की मजबूरी रही होगी.”
निखिल बोले, “नहीं, अर्पित के विवाह में उर्मी दीदी बहुत ख़ुश थीं. कहीं से भी नहीं लगा कि उस रिश्ते से उन्हें कोई ऐतराज़ हो.”
वृंदा ने तर्क दिया, “तुमने देखा नहीं, विवाह के पांच दिन बाद ही बेटा-बहू दीदी को अकेली छोड़ हनीमून पर निकल गए थे.”
निखिल ने टोका, “तुम भूल रही हो वृंदा कि बेटे-बहू की हनीमून ट्रिप दीदी ने ही प्लान की थी और उन्हें सरप्राइज़ ग़िफ़्ट के तौर पर हनीमून टिकट दिए थे. तुम्हारी तरह नहीं, जिसने अपने बेटे-बहू का हनीमून ट्रिप रद्द करवाने की ठान ली थी.”
वृंदा बड़बड़ाई, “मैं बीमार पड़ गई थी, तो इसमें मेरा क्या कसूर? पर तुमने इसे भी मेरी बहानेबाज़ी ही माना. तभी तो बेटे-बहू को कह दिया कि ज़्यादा बीमार नहीं है तुम्हारी मां, तुम लोग जाओ, इसे देखने के लिए मैं हूं.”
वृंदा की बात सुनकर निखिल ठठाकर हंस पड़े और वृंदा झेंप मिटाने के लिए बड़बड़ाने लगी, “औरों के पति होते हैं, जो अपनी पत्नी का साथ देते हैं. तुम तो हमेशा ही बहू की तरफ़दारी करते आए हो.”
“क्या करता? नवविवाहितों को एक-दूसरे को समझने का यही समय तो मिलता है. फिर तो सारी ज़िंदगी घर-गृहस्थी के चक्करों में उलझकर रह जाते हैं.” निखिल बोले.
वृंदा फिर भुनभुनाई, “तो तुम कौन-सा मुझे हनीमून पर ले गए थे? बड़े दार्शनिक बनते रहते हो. अच्छा ये बताओ कि विवाह के लिए हॉल बुक हो गया या नहीं?”
निखिल ने जवाब दिया, “हां, हो गया. बैंडवाले को भी तय कर दिया है.”
समय मानो पंख लगाकर उड़ता रहा. उर्मी दीदी विवाह से ठीक दो दिन पहले आईं. वो भी अकेली ही. ‘अच्छा, तो अब बेटे-बहू पर उनका इतना भी अधिकार नहीं रहा. सगी मौसी के लड़के के विवाह पर आने के लिए भी राज़ी नहीं हुए.’ वृंदा ने सोचा.
उसकी चढ़ी त्यौरियों को देख उर्मी दीदी बोलीं, “मोनू अभी आठ माह का ही है, उसे मेरी ज़रूरत पड़ती है. यहां आने को हम सभी तैयार थे, हवाई जहाज़ की टिकट भी हो गई थी, पर मोनू को तेज़ बुखार हो गया. अर्पित और स्नेहा तो फिर भी आने को तैयार थे, पर शादी के घर में बच्चे की बीमारी संभलती नहीं, सो मैंने ही उन्हें मना कर दिया.”
‘बेचारी दीदी को झूठ पर झूठ बोलना पड़ रहा है.’ वृंदा को उनसे सहानुभूति होने लगी.
निखिल बोले, “इतने मुश्किल हालात में भी आप यहां आईं, ये क्या कम है.” तभी भारी-भरकम बनारसी साड़ी और ज़ेवरात से लदी-फदी निकिता आ गई. उसकी गोद में चुनमुन रो रही थी. वह उर्मी दीदी के पैर छूने को झुकी, तो उसके सिर से साड़ी का पल्लू गिर गया. वृंदा ने घूरती निगाहों से उसे देखा. निकिता घबराकर पल्लू ठीक करने लगी.
ये सब देख उर्मी दीदी के मुख से बेसाख़्ता निकल पड़ा, “इतनी गर्मी में बिटिया ये क्या पहन लिया तूने? ऊपर से बच्ची को गोद में उठाया हुआ है. ला, बच्ची मुझे दे. तू ऐसी साड़ी पहनकर आ, जो संभाल सके.”
निकिता बच्ची उन्हें पकड़ाकर तुरंत साड़ी बदलने चली गई. वृंदा धीरे से दीदी के कान में फुसफुसाई, “दीदी, इसे इतना सिर मत चढ़ाओ. मैंने ही इसे भारी साड़ी और भारी गहने पहनने को कहा था. घर में शादी है, दो-तीन दिन भारी साड़ी पहन लेगी तो कौन-सा पहाड़ टूट पड़ेगा. अपने ज़माने में हमने आठ-आठ किलो की साड़ियां नहीं पहनी थीं क्या? और आपने बच्ची को क्यों उठा लिया? मैं तो इसकी बच्ची नहीं संभालती. अरे पैदा किया है तो ख़ुद सम्भाले.”

Short Story- Rishto ki Bagiya
“इसकी बच्ची! क्या तेरी कुछ नहीं लगती? तेरे बेटे की बेटी है, तेरा अपना ख़ून. वृंदा, तू इतनी निष्ठुर कब से हो गई?”
वृंदा बोली, “दीदी, मैं बहू के चोंचले नहीं सह सकती. अब दूसरी बहू भी आ जाएगी, तो क्या मैं ‘क्रेच’ संभालने का काम करूंगी! मैंने तो अकेले अपने दोनों बेटे पाल-पोसकर बड़े किए. मज़ाल है कि मेरी सास ने कभी रसोई में या बच्चे पालने में मेरी मदद की हो. अब मेरा आराम करने का समय आया है, तो मैं क्यों फिर से मुसीबत मोल लूं.”
दीदी बोलीं, “वृंदा, जो सुख-सुविधाएं किन्हीं कारणों से हमें अपने समय में न मिल सकीं, वो सक्षम होने पर भी हम अपनी बहुओं को न दें, क्या ये अनुचित नहीं? हम दोनों को बेटी नहीं है, क्यों न हम इस कमी को बहुओं से पूरी कर लें. एक बार बहू को बेटी के नज़रिए से देखो, तो रिश्तों के मायने ही बदल जाएंगे, रिश्ते सुवासित हो उठेंगे.”
वृंदा उकताकर बोली, “बस-बस दीदी, बहू को बेटी समझने का ये नुस्ख़ा आपको ही मुबारक़ हो. मेरी बहू को बहू बनकर ही रहने दो. बहू को बेटी बनाने के चक्कर में आपकी क्या हालत हो गई है, क्या मैं नहीं जानती?”
दीदी मुस्कुराकर रह गईं. विवाह में वे हर समय निकिता व चुनमुन का ख़याल रखती रहीं. निकिता भी उनसे काफ़ी घुल-मिल गई. इन तीन दिनों में बार-बार फ़ोन पर बेटे-बहू व पोते का हाल-समाचार भी लेती रहीं. शादी निपटते ही वे चली गईं.
छोटी बहू चंचल अपने नामानुसार ही चंचल निकली. लेकिन जल्द ही वृंदा ने उसे वो सब समझा दिया, जो कभी बड़ी बहू से कहा था. मसलन- कटे-खुले बाल इस घर में नहीं चलेंगे. सिर से कभी पल्ला न हटे. सलवार-सूट पहनने का रिवाज़ हमारे यहां नहीं है. घर में खाना क्या बनेगा, इसकी चिंता करने की ज़रूरत तुम्हें नहीं है. घर में हर चीज़ अपने निर्धारित स्थान पर रखी है, उनमें अपनी मर्ज़ी से अदला-बदली करने की कोशिश न करना.
छोटी बहू चुप रही, पर उसके चेहरे से लगा कि उसे ये बातें पसंद नहीं आईं. वृंदा ने सोचा, ‘बड़ी को देखकर अपने आप ये भी लाइन पर आ जाएगी.’
दोनों बहुओं की गहरी छनने लगी. जब भी घर में होतीं, खुसुर-फुसुर करती रहतीं. पर वृंदा के आते ही उनकी बातों पर विराम लग जाता. इसी बीच एक बार चुनमुन की तबियत ख़राब हो गई और उसे संभालनेवाली आया भी नहीं आ रही थी. निकिता को छुट्टी नहीं मिली, तो छोटी बहू ने अपने ऑफ़िस से एक सप्ताह का अवकाश ले लिया. वृंदा को बड़ा आश्‍चर्य हुआ और उसने सोचा, ‘बड़ा प्यार दिखाया जा रहा है आपस में…’
एक रात खाने में देर होने पर वृंदा दोनों को डपटने के ख़याल से रसोईघर की तरफ़ बढ़ ही रही थी कि फुसफुसाहटें सुनकर बाहर ही रुक गई. छोटी बहू कह रही थी, “दीदी, कल मेरी छुट्टी ख़त्म हो जाएगी. आया तो काम पर आ गई है, पर चुनमुन की देखभाल के लिए घर का एक आदमी होना भी ज़रूरी है. मांजी तो इसकी तरफ़ ध्यान ही नहीं देतीं. ये भी नहीं देखतीं कि आया ने इसे ढंग से कुछ खिलाया-पिलाया भी है या नहीं. बच्ची चाहे भूख से रोती रहे, लेकिन उनकी पसंद का खाना न बने या बनने में ज़रा देर हो जाए, तो आसमान सिर पर उठा लेती हैं.”
मारे क्रोध के वृंदा का सर्वांग जलने लगा. छोटी की ये मज़ाल कि बड़ी को मेरे ख़िलाफ़ भड़काए! तभी बड़ी की फुसफुसाहट सुनाई दी, “तुम चिन्ता मत करो चंचल, तुम्हारे जेठजी भी परेशान हो चुके हैं. मां से तो कुछ कह नहीं पाते, इसलिए हम दोनों का ट्रांसफ़र मुम्बई ब्रांच में करवाने की कोशिश कर रहे हैं. मुम्बई में मुझे चुनमुन की चिन्ता नहीं रहेगी, वहां मेरी मां व छोटी बहन हैं. चुनमुन को देखने के लिए वो तरस गए हैं. वहां आया भी आसानी से मिल जाती है और वहां उर्मी मौसी जी भी हैं. सच, कितना फ़र्क़ है मांजी व उर्मी मौसीजी की सोच में.”
छोटी चहक उठी, “यही अच्छा है. सच, ऐसे माहौल में मैं तो अपने बच्चे को पालने की बात सोच भी नहीं सकती. दम घुटता है यहां. अपनी मर्ज़ी से न कुछ खा सकते हैं, न पहन सकते हैं. कहीं जा नहीं सकते, न किसी से हंस-बोल सकते हैं. ये भी कोई ज़िंदगी है. घर में भी हरदम तनाव रहता है.”
तो हालात यहां तक पहुंच गए. इन बहुओं ने मेरे श्रवण कुमार जैसे बेटों को भी पथभ्रष्ट करने की ठान ली है. इनका इलाज करना ही पड़ेगा. वृंदा इसी सोच में डूबी थी कि उर्मी दीदी की देवरानी का फ़ोन आ गया. अपने बेटे की सगाई का न्यौता दे रही थीं. उन्हीं से पता चला कि तीन ह़फ़्ते पहले सड़क पार करते समय उर्मी दीदी का एक्सीडेन्ट हो गया था.
वृंदा का दिल धक् से रह गया. इस बीच वह उन्हें फ़ोन नहीं कर पाई थी. मन में बुरे-बुरे विचार आने लगे. स्नेहा से अपने बच्चे ही नहीं संभलते तो वो सास को क्या संभालेगी? ये अर्पित कितना निष्ठुर है, मेरी बहन का इतना बड़ा एक्सीडेंट हो गया और मुझे ख़बर तक नहीं दी. शादी के बाद गिरगिट की तरह रंग बदल लिया है उसने. बड़ा कहता था कि तुम मेरी सबसे प्यारी मौसी हो. बेचारी दीदी की क्या गत बन गई होगी.
वृंदा ने तुरंत दीदी का नम्बर मिलाया, पर उधर से किसी महिला की अपरिचित आवाज़ सुनकर चौंकी, “उर्मी दीदी हैं?”
“जी वो सो रही हैं, आप कौन?”
“ये बताइए, आप कौन बोल रही हैं?” वृंदा ने प्रतिप्रश्‍न किया.
“मैं स्नेहा की मां बोल रही हूं.”
वृंदा ने फ़ोन काट दिया. तो बहू ने अपनी मां को बुला रखा है. ख़ुद महारानी नौकरी पर जाती होगी. वह निखिल के पीछे पड़ गई, “तुरंत मेरा मुम्बई का टिकट करवाओ. वहां जाकर स्नेहा की ऐसी ख़बर लूंगी कि उसे समझ में आ जाएगा कि सास क्या होती है. दीदी के सीधेपन को उनकी बेवकूफ़ी समझ लिया है उसने.”
निखिल समझाते हुए बोले, “टिकट तो मैं आज का ही करवा दूंगा, पर जाते ही वहां शुरू मत हो जाना. पहले वस्तुस्थिति का पता कर लेना.”
“तुम मेरा मुंह बंद मत करवाओ, कहे देती हूं. क्या मिला दीदी को बहू को बेटी बनाकर? भला बहू भी कभी बेटी बन सकती है!”
दीदी के घर पहुंचने पर स्नेहा की मां के दर्शन हुए. दीदी स्नेहा के साथ अस्पताल गई थीं. नन्हा मोनू नानी के साथ किलकारियां मारते हुए खेल रहा था. उन्होंने ही बताया कि दीदी के कंधे व सिर में चोट लगी थी. सिर से काफ़ी खून बह गया. डॉक्टर ने बेड रेस्ट बताया था. स्नेहा और अर्पित ने बारी-बारी से एक-एक ह़फ़्ते की छुट्टी ली थी. अब दीदी ठीक हैं. दिन में वो उनके पास आ जाती हैं और शाम को अपने घर चली जाती हैं. एक आया दिनभर बच्चे को देखती है और महरी पूरे दिन का चूल्हा-चौका कर जाती है.
स्नेहा की मां ये सब बता ही रही थीं कि दीदी आ गईं. स्नेहा साथ थी. उसने सलवार-कुर्ता पहना हुआ था. दीदी को देखकर वृंदा भौंचक्की रह गई. वो तो उनके कमज़ोर व बीमार रूप की कल्पना कर रही थी, पर दीदी पहले से ज़्यादा स्वस्थ लग रही थीं. दोनों सास-बहू नहीं, बल्कि मां-बेटी दिख रही थीं.
उसे अचानक आया देख दीदी प्रसन्न हो उठीं. दीदी के गले लगते हुए वृंदा बोली, “मैं इतनी पराई हो गई कि अपने एक्सीडेंट की ख़बर तक मुझे नहीं दी.”
दीदी बोलीं, “अर्पित ने कहा था कि वृंदा मौसी को बुला लें, पर मैंने ही मना कर दिया. बेकार तुझे परेशान करने का दिल नहीं किया. यहां स्नेहा और अर्पित तो हैं ही मेरा ध्यान रखने को. इन्होंने खिला-खिलाकर मुझे कुछ ज़्यादा ही तंदुरुस्त कर दिया है. बहुत ख़याल रखती है स्नेहा मेरा.”
स्नेहा ने कहा, “मां, आप हमारे लिए जितना करती हो, उसका रत्तीभर भी ऋण हम नहीं उतार सकते.”
दीदी अपनी समधन से बोलीं, “देखा कामनाजी, हमारी बेटी कैसी भारी-भरकम बातें करने लगी है!” दोनों ही घनिष्ठ सहेलियों की तरह हंसने लगीं.
दीदी के इतने घनिष्ठ रिश्ते देख वृंदा को उनसे ईर्ष्या हो आई. उसे याद आया, बड़ी बहू की मां चुनमुन के होने पर जब उनके घर आई थीं, तो दो दिन वृंदा ने उनसे ऐसी कलहपूर्ण बातें की थीं कि उसके बाद वो कभी उनके यहां आकर रहने की हिम्मत नहीं जुटा पाईं.
तभी दीदी बोलीं, “वृंदा, मैं तो मोनू को गोद उठाने को भी तरस गई हूं. ये लोग मुझे उठाने नहीं देते कि कहीं मेरा कंधा न दुखने लगे, पर तू सही समय पर आई है, स्नेहा ने मेरे ठीक होने के उपलक्ष्य में आज घर में सत्यनारायणजी की कथा रखी है.”
वृंदा ने देखा कि स्नेहा ने बड़े चाव से पूजा की तैयारियां कीं और पूजा के बाद अपने हाथ से सबसे पहले दीदी को प्रसाद खिलाया. रात को कमरे में स़िर्फ दीदी रह गईं, तो वृंदा ने कहा, “दीदी, आप कुछ दिन मेरे साथ चलो, आराम मिल जाएगा. दो-दो बहुएं हैं मेरी.”
दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा, “वृंदा, मुझे यहां क्या तकलीफ़ है. एक बेटा था ही, भगवान ने बेटी की कमी भी स्नेहा के रूप में पूरी कर दी. सच कहूं तो स्नेहा ने जैसे मेरी देखभाल की, उसी से मुझे समझ में आया कि एक बेटी मां के लिए क्या मायने रखती है. मैं पूरी तरह सुखी व संतुष्ट हूं. तू बता, घर में सब कैसे हैं? तू तो मुझसे ज़्यादा सुखी होगी, बहुओं के रूप में दो बेटियां मिली हैं तुझे.” सुनकर वृंदा फीकी-सी हंसी हंस दी.
दूसरे दिन वृंदा अर्पित के पीछे ही पड़ गई, “बेटा, मेरी आज की ही हवाई जहाज़ की टिकट करवा दे.”
दीदी हैरानी से बोलीं, “इतने दिनों बाद आई है, कुछ दिन रुक जा.” अर्पित और स्नेहा ने भी बहुत कहा, पर वृंदा नहीं मानी. वो जल्द से जल्द घर पहुंचकर अपनी भूल सुधारना चाहती थी. अपनी रिश्तों की बगिया को आनेवाले तूफ़ान में बिखरने से रोकना चाहती थी. उसे एहसास हो गया था कि रिश्ते प्रेम, समर्पण व त्याग से मधुर बनते हैं. अपनापन ही रिश्तों को गूंथकर रखता है.
वृंदा सोच रही थी कि क़िस्मत ने तो उसे बहुओं के रूप में दो बेटियां दे दी हैं, अब वो भी उनकी मां बनने का प्रयत्न करेगी. नन्हीं चुनमुन को कलेजे से लगाने को उसका दिल अचानक ही बड़े ज़ोरों से मचलने लगा था.

   नीलिमा टिक्कू

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हिंदी कहानी- हिचकियां (Hindi Short Story- Hichkiya)

Short Story, Hichkiya

Short Story, Hichkiya

‘‘वो याद कर रही होगी!’’ कहते-न-कहते पार्वती के चेहरे पर एक अजीब-सा तनाव उभर आया… सहसा महेन्द्र बाबू को
भी कुछ स्मरण हो आया और वे बजाय सुबह-सुबह पत्नी से उलझने के, एकदम ख़ामोश से हो गए.

‘नहीं, महान प्रेम कथाएं स़िर्फ फ़िल्मों में ही नहीं होतीं, ज़िंदगी में भी होती हैं…’ उगते लाल सूरज के साथ ही टहलकर लौटे महेन्द्र बाबू के दिमाग़ में यह वाक्य न जाने क्यों कौंधा. पार्वती ने बाहर के चबूतरे पर नाश्ते की सारी सामग्री सजाकर हमेशा की तरह तैयार कर दी थी- छोटी मेज़ पर केतली में गरम चाय, दो कप, प्लेट में नमकीन, काजू, किशमिश, कटोरी में पानी में भीगी अंजीरें और मुनक्के, एक तरफ़ तह किया हुआ अख़बार…
चौथी सीढ़ी पर पांव रख जैसे ही उन्होंने फाटक के कुंडे को खोला, पार्वती भीतर से बाहर आ गई. बाहर से आते ही उन्हें बाथरूम जाना पड़ता है. हाथ-मुंह धो तौलिए से पोंछते बाहर आए तब तक पार्वती कुर्सी पर बैठी उनकी प्रतीक्षा करने लगी थी. महेन्द्र बाबू खाली कुर्सी पर बैठे तो अचानक उन्हें हिचकियां शुरू हो गईं. हिचकियां लेते हुए वे मुस्कुरा दिए, ‘‘तुम्हें तो हिचकियां तब आती हैं, जब तुम्हारे बच्चे तुम्हें यहां या दिल्ली में याद करते हैं. पता नहीं क्यों, आज मुझे आ रही है!’’
‘‘वो याद कर रही होगी!’’ कहते-कहते पार्वती के चेहरे पर एक अजीब-सा तनाव उभर आया… सहसा महेन्द्र बाबू को भी कुछ स्मरण हो आया और वे बजाय सुबह-सुबह पत्नी से उलझने के, एकदम ख़ामोश से हो गए.
सुबह की गुनगुनी धूप, गरम चाय की चुस्कियां और न रुकनेवाली हिचकियां… कहीं उन्होंने पढ़ा था, हिचकियों को गंभीरता से लेना चाहिए. ये हृदय रोग की पहचान होती हैं, पर मान्यता तो कुछ और ही है… पत्नी से न उलझना पड़े, इसलिए उन्होंने एक हाथ में अख़बार थाम चश्मे को ठीक किया और मोटे-मोटे शीर्षकों पर नज़र दौड़ाने लगे. उन्हें ख़बरें पढ़ने-देखने का बेहद शौक़ था. उन्हें ख़बरें पढ़ने में मशगूल होते देख, चिढ़कर पार्वती ने कहा, ‘‘ख़बरें पढ़ते-देखते ऊब नहीं जाते?’’ असल में वह कोई न कोई सीरियल या फ़िल्म देखना पसंद करती है, जबकि वे स़िर्फ ख़बरें… शायद सोच और नज़रिए में ही बहुत फ़र्क़ है, इसी कारण उनकी पत्नी से कभी बनी नहीं. हमेशा छत्तीस का आंकड़ा रहा. एक पूरब तो दूसरा पश्‍चिम. जीवनभर न बनने के बावजूद जीवन संग-संग काट लिया! है न हैरत की बात.
आजकल की पीढ़ी इतने मतभेदों के बावजूद साथ काटेगी ज़िंदगी? हरगिज़ नहीं. पहले दिन झगड़ेंगे. दूसरे दिन कोर्ट-कचहरी करने लगेंगे. पर वे पार्वती के साथ पूरे चालीस साल काट ले गए और मतभेदों के बावजूद पार्वती ने भी कभी अलग होने की उन्हें धमकी नहीं दी, न रूठकर मायके जा बैठी, न मां-बाप और रिश्तेदारों से कभी कोई शिकायत की. ऐसा भी नहीं कि वह लड़ी-झगड़ी नहीं. ख़ूब झगड़ा हुआ, फिर भी… अख़बार में उनका मन क़तई नहीं लगा.
‘‘बजाय गरम चाय के पानी पी लेते, तो शायद हिचकियां बंद हो जातीं.’’ पार्वती ने सुझाया, ‘‘कहो तो चीनी के दाने लाऊं? फांक लो, हिचकियां बंद हो जाएंगी. कम्बख़्त यहां भी तुम्हें चैन नहीं लेने देती. सुबह-सुबह ही याद करने बैठ गई, जैसे और कोई काम ही नहीं है उसे सिवा तुम्हें याद करने के!’’
पार्वती जान-बूझकर तीखे वाक्य कह रही थी, जिससे वे उससे उलझ जाएं, पर इधर उन्होंने चुप रहना सीख लिया है. अब शेष बची ज़िंदगी इसी के साथ गुज़ारनी है तो क्यों उलझें इससे? विषय बदलने के लिए पूछा, ‘‘लड़का अभी उठा कि नहीं?’’
‘‘अभी सुबह छः बजे तो प्लांट से आया है. दस-ग्यारह बजे से पहले क्या उठेगा? आख़िर रातभर का जागा हुआ है, कुछ नींद भी ज़रूरी है. बड़ी कठिन नौकरी है. सुसरी कभी रात भर डयूटी, कभी दिनभर, न खाने का कोई निश्‍चित व़़क्त, न सोने-बैठने का. कभी-कभी तो दो-दो पालियों में डयूटी लगा देते हैं ऊपर के अफ़सर. यह भी कोई नौकरी हुई!’’ पार्वती बड़बड़ाकर प्लांट की नौकरी और अफ़सरों को कोसती रही, पर हिचकियां लेते महेन्द्र कुछ और ही सोचते रहे. अच्छा हुआ जो पार्वती का ध्यान उन्होंने किसी और तरफ़ मोड़ दिया, अब वे कुछ और सोच सकते हैं.

हिचकियां तभी आती हैं, जब कोई अपना याद करता है. यह एहसास भर आदमी को किस क़दर ख़ुश कर देता है. इस नरम गुनगुनी धूप की तरह तन-मन को गरम कर देता है. उत्फुल्लता और प्रसन्नता के एहसास से पोर-पोर खिल और खुल उठता है. आज की भागदौड़भरी व्यस्त ज़िंदगी में कहीं कोई है, जो आपको याद कर रहा है. कितना मधुर एहसास है यह! किसी की यादों में आप हैं, आदमी हो या औरत, यह किस क़दर उसे प्रसन्नता और ख़ुशी से भर देता है. पार्वती कभी इसे महसूस कर सकेगी? शायद कभी नहीं. मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक, अगर उसे हिचकियां आएंगी, तो वह सोचेगी कि उसे बेटी याद कर रही है या बेटी के बच्चे या फिर यहां दूर नौकरी कर रहा बेटा और उसकी बहू!
ज़िंदगी में जिसने कभी किसी को प्यार नहीं किया, शायद उसने ज़िंदगी के बहुत बड़े एहसास को जिया ही नहीं! ज़िंदगी को सही मायने में वही समझ पाया, जिसने जीवन में कभी किसी को प्यार किया. जिसके पांव में प्रेम-प्यार की बिवाई कभी नहीं फटी, वह उसकी पीर को क्या जाने?
कहां होगी मरीना इस वक्त…? वे वहां से भाग कर यहां क्यों आए? शायद वे वो सब बर्दाश्त नहीं कर सकते थे. वो सब- मरीना की शादी… मरीना का वहीं हनीमून पर जाना, जहां कभी वह उनके साथ रही… और वहां तो ढंग का स़िर्फ वही होटल है. निश्‍चित ही वह उसी होटल में अपने पति के साथ ठहरेगी. क्या मालूम उसी कमरे में ठहरे और उसी पलंग पर पति की बांहों में रात भर अलसाई पड़ी रहे, जिस तरह उस रात वह उनके साथ, उनकी बांहों में पड़ी रही थी. उस दिन अपनी शादी का कार्ड देने वह ख़ुद आई थी.
आदर से बैठाया था उसे, ‘‘तो आख़िर तुमने उससे शादी का फैसला कर ही लिया?’’
‘‘किसी से तो करनी ही थी.’’ वह उदास हो गई थी, ‘‘लड़की अगर उससे शादी न कर पाए, जिसे वह प्यार करती है, तो फिर उससे शादी करना ठीक रहता है, जो उसे प्यार करता हो… प्रबोध को तो आप जानते है. वह मुझे पागलों की तरह प्यार करता है. एकदम दीवाना है मेरा.’’
न चाहते हुए भी एक खिसियाहट-सी उभर आई उनके चेहरे पर, ‘‘एक प्रबोध ही तुम्हारा दीवाना कहां है मरीना? पता नहीं कितने दीवाने हैं तुम्हारे. मेरा नाम भी उन्हीं में है… हृदय के चार कक्ष होते हैं आदमी में… मैं चाहूंगा कि अगर एक कक्ष में तुम प्रबोध को जगह दो, एक में अपने होनेवाले बच्चों को और एक में अपने माता-पिता, दोस्तों व सास-ससुर को, तो एक कक्ष में कहीं मुझे भी बनाए रखना. बोलो, रख सकोगी मुझे ताज़िंदगी उस एक कक्ष में…? कुछ और नहीं चाहिए मुझे तुमसे. स़िर्फ यह वचन काफ़ी है कि कहीं तुम्हारी ज़िंदगी में मैं भी हूं और रहूंगा.’’
पता नहीं क्या सोचती हुई देर तक चुप बैठी रही मरीना. वे ख़ुद नहीं सोच पाए कि जब सब कुछ ख़त्म हो गया है तो मरीना से अब और कहा भी क्या जाए? किसी तरह सहज होने का ढोंग करते हुए हंसे, ‘‘चाय पिओगी.’’
‘‘कहां हैं वे? यहीं हैं कि कहीं गई हुई हैं?’’ वह घर में भीतर की तरफ़ देखने लगी.
‘‘बेटी के पास दिल्ली गईं हैं.’’ वे बोले.
‘‘तब तो चाय आपको बनानी पड़ेगी. रहने दीजिए. फिर कभी पी लूंगी, उधार रही इस बार की चाय.’’ हंसने लगी वह.
महेन्द्र ख़ामोश अपलक देर तक ताकते बैठे रहे- कितनी खनकती हुई प्यारी हंसी हंसती है मरीना. चमकता, दिप-दिप करता रूपवान चेहरा, चांदनी में धुले स़फेद चमकते दांत. हंसते व़़क्त गालों में पड़ने वाले गड्ढे, काली कजरारी बड़ी-बड़ी आंखें और खुले आवारा क़िस्म के चमकते बाल.. पहले वह दो चोटियां करती थी, कस्बाई शहरों की लड़कियों की तरह… और लंबा कुर्ता व सलवार, सादा चप्पलें. पर अब… जीन्स और टॉप, ऊंची हील के सैंडिल, कटे-छटे संवरे बाल, नामालूम-सी अधरों पर लिपस्टिक, झील-सी गहरी और चमकती आंखों को काली कोरों से ठीक धार देना, पतली कमानी दार भौंहें…
‘‘आश्‍चर्य है, उस महानगर में तुम पर मॉडल बनानेवालों की नज़र क्यों नहीं पड़ी? कोई भी देखता तो तुम्हें कैमरे में कैद कर लेता.’’ वे कह बैठे थे.
‘‘नज़रें तो पड़ीं, पर मैंने ही इनकार कर दिया.’’ वह हंसने लगी,’’
‘‘जब वहां पढ़ाई के दौरान तुम्हारे पांव में चोट लगी और फ्रैक्चर हुआ, उस व़़क्त प्रबोध ने तुम्हारी बहुत मदद की शायद.’’
‘‘आपको कैसे पता चला?’’ वह हंसती हुई सामने ताकती रही.

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‘‘तुम्हारी शायद ही कोई बात हो, जो मुझे पता न चल जाती हो. असल में मेरा दिल, मेरा दिमाग़, मेरी भावनाएं, मेरा मन, मेरा मस्तिष्क सब कुछ सदा तुम्हारे आसपास बना रहता है.’’ वे एकाएक भावुक हो उठे थे, हालांकि अब इस तरह की भावुकता शायद मरीना को पसंद भी न रही हो. पहले वह ऐसी भावुकता भरी बातों से लजाती और ख़ुश होती रहती थी. उनके कहे का अब उस पर जैसे कोई असर ही नहीं हुआ.
‘‘आप मुझे याद यहां करते हैं और हिचकियां मुझे वहां आती हैं. सच, जब आपका नाम लेती हूं, तभी बंद होती हैं. क्यों करते हैं आप इस तरह हैरान मुझे?’’
‘‘मेरे याद करने से भी अब तुम्हें तकलीफ़ होने लगी मरीना?’’ कहते हुए महेन्द्र गंभीर हो गए, ‘‘हैरान और परेशान तो मैं होता हूं तुम्हारे कारण. तुम्हें चोट वहां लगी और मेरे पांव में यहां दर्द होता रहा. समझ सकोगी कभी यह?’’
सिर झुकाए मुस्कुराती बैठी रही वह देर तक चुप, फिर बोली, ”प्रबोध को मैं उस तरह नहीं चाहती, जैसे कभी आपको चाहा, पर प्रबोध बहुत पीछे पड़ गया और घरवाले भी चाहते हैं कि मैं शादी कर लूं. आप हिम्मत नहीं जुटा पाए. पत्नी का क्या करें, बच्चे क्या कहेंगे. आपके सामने अपने ये संकट बने रहे. मैं भी एक औरत हूं और औरत के दुख को समझ सकती हूं. आपकी पत्नी आपसे अलग होकर कैसे रहतीं, क्या करतीं, बच्चे उन्हें अपने साथ रखते या दुत्कार देते. इस उम्र में वे कहां जातीं? ये सब ठीक नहीं था. अपने सुख के लिए, अपनी ख़ुशी के लिए किसी को उजाड़ना… नहीं, मेरे जैसी लड़की ये सब बर्दाश्त नहीं कर पाती. आप से ज़्यादा मुझे कौन जानता है भला? बताइए, मैं बर्दाश्त कर पाती आपकी पत्नी का उजड़ना…? यही सब सोचकर अपने आप को अलग कर लिया मैंने. बहुत दिनों तक मन में द्वंद्व चला, उचित-अनुचित पर विचार करती रही, कई-कई रातें जागी. प्रबोध भी चकराया करता था. हंसता रहता था कि क्या सोचती रहती हो तुम छत की तरफ़ ताकती हुई हर व़़क्त. अब उसे क्या बताती कि मैं कहां-कहां भटकती रहती हूं.’’
कुछ देर को चुप रही वह. वे भी अपलक उसकी तरफ़ ताकते रहे, उसे कहने का अवसर देते हुए. अपने मन को तो वे जानते हैं, दूसरे के मन को भी तो जानें. जब वह कुछ न बोली तो पूछ बैठे, ‘‘झूठ कह रही हो या मुझे धोखा दे रही हो?’’
‘‘आपको लगता है कि मैं आपसे कोई बात झूठ कह सकती हूं? आपको धोखा देने की बात मैं सोच सकती हूं कभी?’’ वह गंभीर हो गई.
‘‘ख़ैर, हनीमून के लिए कहां जाओगी?’’
‘‘उसी जगह के लिए प्रबोध ज़िद कर रहा है.. और वहां मैं जाना नहीं चाहती. एक ही होटल है वहां, जिसमें ठहरना होगा और वहां मैं आपके साथ रही थी. वह सब कुछ याद आता रहेगा और मैं प्रबोध के साथ सहज नहीं हो पाऊंगी.’’
‘‘झूठ बोलना ख़ूब आ गया है तुम्हें मरीना, बहुत चालाक हो गई हो. महानगर की चमक-दमक में रहकर. ठीक है भई, बना लो मुझे बेवकूफ़.’’
सहसा वह उठ गई कुर्सी से, ‘‘रहने दीजिए, आप इस तरह अविश्‍वास कर मेरी सच्ची भावनाओं की नाकद्री कर रहे हैं, मेरे प्यार का मज़ाक उड़ा रहे हैं आप.’’ उसके साथ वे भी उठ खड़े हुए, उसे बाहर तक छोड़ने जाने के लिए.
सो कर उठने पर लड़का चाय का कप हाथ में लिए उनके कमरे में आया, ‘‘पापा, आप मम्मी के साथ हरिद्वार और ॠषिकेश घूम आइए. मैंने ड्राइवर का इंतज़ाम कर दिया है, वह आप लोगों को लिवा जाएगा. आप दो-चार दिन या एक सप्ताह जितने दिन मन हो, वहां रह आइए.’’
‘‘एक सप्ताह तक वहां ड्राइवर संग बना रहेगा क्या?’’ पार्वती ने पूछा. ‘‘अगर आप लोग वहां किसी अच्छे आश्रम में ठहर जाएं, तो ड्राइवर आप लोगों को छोड़कर आ जाएगा यहां. फिर आप जब फ़ोन करेंगे, उसे लेने भेज देंगे.’’
‘‘ठीक रहेगा.’’ पार्वती ने ही कहा, ‘‘हमें वहां गाड़ी की ज़रूरत भी नहीं होगी. आश्रम से गंगा तक घूमना और फिर वापस आश्रम में पहुंच जाना.’’
सहसा उन्हें लगा जैसे सब कुछ उन पर थोपा जा रहा है. उनके हाथ में जैसे अब कुछ न रह गया हो. वैसे ही, जैसे मरीना का पढ़ने उस महानगर में चले जाना. फिर वहां प्रबोध के संपर्क में आ जाना, फिर उसका उससे शादी के लिए तैयार हो जाना, फिर उन्हें शादी का कार्ड देने आना… और अब बेटे का उन्हें जबरन हरिद्वार और ॠषिकेश जैसे तीर्थ पर भेज देना और पत्नी पार्वती द्वारा उसे स्वीकार कर लेना… क्या आदमी सचमुच किसी अदृश्य शक्ति के वशीभूत होता है? वही उससे सब कुछ कराती है? क्या उसके हाथ में कुछ नहीं होता?
वे चुप बैठे सोचते रहे देर तक… अगर जाना ही है, तो वहीं क्यों न जाएं, जहां मरीना प्रबोध के साथ इस व़़क्त हनीमून पर गई हुई है? लेकिन वहां जाना क्या उचित होगा? नहीं, ठीक नहीं होगा. अनुचित होगा यह.
‘‘क्यों…? कहां खो गए…?’’ पार्वती ने ख़ुशी से पूछा, ‘‘अरसा हो गया, हम लोग किसी तीर्थ पर गए भी नहीं… हां कहे देते हैं हम.’’
हम? यानी इस हम में उसने उन्हें अपने आप ही शामिल कर लिया है. लेकिन वे उसके साथ शामिल तो हमेशा रहे, चाहे-अनचाहे…

– दिनेश पालीवाल

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हिंदी कहानी- और वो चला गया (Hindi Short Story- Aur Woh Chala Gaya)

hort Story, Aur Woh Chala Gaya

 

short Story, Aur Woh Chala Gaya

स्वप्निल अब उसके लिए इस तरह हो गया था, जिस पर न कोई अधिकार है, न उलाहना. प्रेम अब भी उसे ही करती है, पर इस तरह नहीं जैसे एक औरत मर्द को प्रेम करती है, बल्कि इस तरह जैसे कोई इंसान ईश्‍वर से प्रेम करता है.

यह कहानी है एक औरत की, जिसमें वही चेतना बसती थी, जो आम औरतों में होती है. बस, उसकी क़िस्म अलग थी… उसका नाम था ‘तितिक्षा’. उसने प्रहर सचदेवा के साथ घर बसाया था, लेकिन एक अबूझ कसक हमेशा उसके मन में बनी रहती. कैसा विचित्र जुड़ाव था वो? काया का संपूर्ण समर्पण भाव था, पर मन फिर रह-रहकर इस कदर उचाट क्यों हो जाता था? पति के सारे काम करना, लोगों से बातें करना, पति के मित्रों से मिलना- ये सारे काम आराम से करती थी. पर ये सब करते हुए भी एक बेचैनी-सी पूरे अस्तित्व पर छाई ही रहती थी.
तितिक्षा अति संवेदनशील थी- ख़ुद के प्रति भी और दूसरों के प्रति भी. उसका मानना था कि भावनाओं की अभिव्यक्ति एक कला है, जो जीवन से धीरे-धीरे सीखी जा सकती है.
अक्सर वह एक सपना देखती है कि वो दौड़ रही है, उसके पीछे लोग दौड़ रहे हैं और अंत में सामने समंदर है, लोग हंस रहे हैं और पूछते हैं, “अब कहां जाओगी?” घबराकर वह पानी पर पैर रखती है, तो देखती है कि पानी तो नर्म बिछौने जैसा है और वो बड़ी सहजता से पानी पर चलती जा रही है. उस पार कोई है, जो बांहें फैलाए उसकी प्रतीक्षा में खड़ा है, लेकिन उसका चेहरा साफ़-साफ़ नज़र नहीं आ रहा है.
शुरू-शुरू में वह इस सपने से चौंक पड़ती थी, फिर धीरे-धीरे उसे लगने लगा था कि उसके शरीर में एक नहीं, दो स्त्रियां हैं. एक- जिसका नाम तितिक्षा था, जो किसी की बेटी थी, श्री प्रहर सचदेवा की पत्नी थी, जिसकी जाति हिंदू थी, देश भारत था और जिस पर कई नियम-क़ानून लागू होते थे. और दूसरी- जिसका नाम औरत के सिवा और कुछ न था, जो धरती की बेटी थी और आकाश का वर ढूंढ़ रही थी, जिसका धर्म प्रेम था और देश-दुनिया थी और जिस पर एक ‘तलाश’ को छोड़ कोई नियम-क़ानून लागू नहीं होता था. फिर धीरे-धीरे उसे इस स्वप्न में आनंद आने लगा.

फिर एक दिन अचानक एक घटना घटी. वह किसी के घर गई थी. वहीं एक व्यक्ति से मुलाक़ात हुई. शक्ल-सूरत, क़द-काठी सामान्य थी, मगर उसकी आंखें बिल्कुल उसके सपनोंवाले बुत की तरह थीं- गहरी और बोलती हुई. वह कितनी देर उसे देखती रही थी. फिर पता चला कि उसका नाम स्वप्निल था. तितिक्षा ने चिकोटी काटी ख़ुद को कि कहीं यह सपना तो नहीं था. मेरा मन शायद वर्षों से कुछ मांग रहा था. सूखे पड़े जीवन के लिए मांग रहा था- थोड़ा पानी और अचानक बिन मांगे ही सुख की मूसलाधार बारिश मिल गई.
अब उसमें बदलाव आने लगा था. जब एक तितिक्षा अपने पति के पास बैठी होती, दूसरी स्वप्निल के पास बैठी होती. एक तितिक्षा के पास शरीर का अस्तित्व था, दूसरी तितिक्षा के पास कल्पनाओं की अपनी दुनिया थी.
अब वह कल्पना की जगह सचमुच स्वप्निल से बातें करना चाहती थी, उससे मिलना चाहती थी. फिर एक दिन उसने दोस्तों के साथ स्वप्निल को भी चाय पर बुलाया. सभी गपशप कर रहे थे, तभी एक मित्र ने कहा, “मेज़बान की तारीफ़ में सभी लोग एक-एक वाक्य काग़ज़ पर लिखकर दें. देखें, कौन कितना अच्छा लिखता है?” सभी ने लिखकर दिया, जब स्वप्निल की बारी आई, तो उसने हाथ में ली हुई क़लम से खेलते हुए तितिक्षा की तरफ़ देखा और धीरे से तितिक्षा के कान के पास आकर बोला, “मुझे लिखना नहीं आता, क्योंकि किसी के दिल की कोई भाषा नहीं होती. मुझे तो बस आंखों की भाषा पढ़नी आती है.” और तितिक्षा ने पहली बार जाना कि आंखें मौन रहकर भी कितनी स्पष्ट बातें कर जाती हैं और वह कांप गई थी. मगर उसने महसूस किया कि बचपन से जिस उदासी ने उसके अंदर डेरा जमा रखा था, वो आज दूर चली गई थी. एक उत्साह, एक उमंग-सी भर गई थी उसके रोम-रोम में.
सबके चले जाने के बाद तितिक्षा ने स्वप्निल के जूठे प्याले में बची हुई ठंडी चाय का घूंट लेकर सोचा कि क्या मैं दीवानी हो गई हूं? जैसे उसने एक ऐसी वस्तु का आस्वादन कर लिया था, जो पहले कभी नहीं पी थी. फिर ख़ामोशी से कितने ही दिन बीत गए.
एक शाम वो घर में अकेली थी कि दरवाज़े पर दस्तक हुई, दरवाज़ा खोला तो सामने स्वप्निल खड़ा था. उसकी जो दृष्टि तितिक्षा की ओर उठी थी, वह असावधान नहीं थी, वह मूक भी नहीं थी. आंखों में ज़ुबान उग आई थी. वह एक पुरुष की मुग्ध दृष्टि थी, जो नारी के सौंदर्य के भाव से दीप्त थी. दृष्टि तितिक्षा की आंखों पर टिकी थी. उसकी आंखें झुक गईं, पर वह इस तथ्य के प्रति पूरी सचेत थी कि स्वप्निल की दृष्टि ने अब संकोच छोड़ दिया है. वह ढीठ हो गई है. उसकी दृष्टि जैसे देखती नहीं थी, छूती थी. वह जहां से होकर बढ़ती थी जैसे रोम-रोम को सहला जाती थी. तितिक्षा का शरीर थर-थर कांप रहा था. उसकी समझ में बिल्कुल नहीं आ रहा था कि उसका मन इतना घबरा क्यों रहा है? वह पहली बार किसी पुरुष से नहीं मिली थी, न ही पहली बार किसी पुरुष के सान्निध्य में आई थी. उसने पुरुष दृष्टि का न जाने कितनी बार सामना किया था, मगर ये दृष्टि उसे व्याकुल कर रही थी. स्वप्निल की दृष्टि में प्रशंसा थी और वह प्रशंसा तितिक्षा के शरीर को जितना पिघला रही थी, उसका मन उतना ही घबरा रहा था.
“आप बहुत सुंदर हैं, तन और मन दोनों से.” स्वप्निल ने धीरे-से मुस्कुराते हुए कहा. अपने रूप की प्रशंसा सबको अच्छी लगती है. युवक उसके रूप की प्रशंसा कर रहा था और वह ऐसे भयभीत थी, जैसे कोई संकट आ गया हो. वह सम्मोहित-सी देखती रही. पर उसका विवेक लगातार हाथ में चाबुक लिए उसे पीट रहा था, ‘यह ठीक नहीं है तितिक्षा! ये ठीक नहीं है! संभल जा.’
तभी स्वप्निल ने कहा, “उस दिन ग़लती से आपकी क़लम मेरे पास रह गई थी.” उसने कलम निकालकर तितिक्षा की ओर बढ़ा दी. मुहब्बत में सारी शक्तियां होती हैं, एक बस बोलने की शक्ति नहीं होती! तितिक्षा ने इतना ही कहा, “यह जहां है, इसे वहीं रहने दीजिए ना!”
“तभी इतने दिनों तक लौटाने नहीं आया था.” उसने शरारतभरी निगाहों से कहा. थोड़ा आगे झुककर उसे ध्यान से देखा और बोला, “आप अपना महत्व नहीं जानतीं, कैसे जानेंगी? आपके पास अपनी नज़र है मेरी नहीं. मेरी नज़रों से देखेंगी तो जानेंगी कि आप क्या हैं? पता है, आपको देखा तो मुझे यह समझ में आया कि मां की आवश्यकता पुरुष को तभी तक होती है, जब तक वो अबोध होता है. बोध होने पर उसे मां नहीं, प्रियतमा की आवश्यकता होती है, जिससे वो अपने वयस्क प्रेम की प्रतिध्वनि पा सके.” और हाथ की सिगरेट बुझाकर उसने तितिक्षा की ओर इतनी उदास नज़रों से देखा कि तितिक्षा को लगा था- वह एक औरत नहीं थी, एक सिगरेट थी, जिसको स्वप्निल ने एक ही नज़र से सुलगा दिया था और वह चला गया.
उस दिन के बाद से तितिक्षा तितिक्षा नहीं रही, एक सुलगती सिगरेट बन गई थी, जिसे स्वप्निल ने सुलगा दिया था, पर पीने का अधिकार नहीं लिया था. वह कला में निपुण नर्तकी की तरह अपने यथार्थ और कल्पना दोनों के साथ खेल रही थी और फिर एक दिन उसे पता चला कि स्वप्निल को कोई दूसरी नौकरी मिल गई है और वो मुंबई जा रहा है. वो स्वप्निल से मिलने गई और पूछा, “तुम्हें इसी तरह चले जाना था? मुझे बता नहीं सकते थे?” जाने उसकी आवाज़ किन गहराइयों से निकल रही थी कि उसे ख़ुद भी सुनाई न दी थी.
“मैं रात को आया था आपके घर, कमरे की लाइट ऑफ थी. मैंने सोचा, आप लोग सो रहे होंगे, सो मैं बाहर से ही लौट आया.”
“काश! आप मिले ही न होते.” तितिक्षा के मुंह से अनायास ही निकल गया. वो देखता रह गया और फिर बोला, “इसीलिए तो जा रहा हूं, क्योंकि यहां रहना अब मेरे लिए बहुत मुश्किल है.” और वो विदा लेकर घर लौट आई.
उस रात तितिक्षा अपने पति के साथ बस लेटी हुई थी. उसके शरीर को अपने शरीर से सटाकर ये पलंग पर लेटा हुआ कौन-सा आदमी था? यह वही रात थी, उसे अच्छी तरह याद है कि जब एक मासूम उसकी कोख में आया. उसकी चेतना में स्वप्निल ही था. इसके बाद उसने डायरी लिखनी शुरू की और फिर ये डायरी उसकी ऐसी आवश्यकता बन गई थी जैसे दर्पण, जिसमें वह ख़ुद को देख सकती थी. एक दिन अचानक ये ख़याल आया कि अगर ये डायरी किसी ने पढ़ ली तो…?
उसने निश्‍चय किया कि वो डायरी को पराए हाथों से बचाने के लिए जला देगी. मगर जब वो डायरी को तीली लगाने लगी, तो उसके हाथ बिलख उठे- अगर कभी एक बार इस डायरी को स्वप्निल पढ़ लेता- मैं भले ही मर जाऊं, तब भी कभी उसे ध्यान आता और सोचता… एक थी तितिक्षा.
फिर एक दिन वो भी आया, जब तितिक्षा ने एक सुंदर बच्चे को जन्म दिया. और एक अजीब इत्तेफ़ाक हुआ कि स्वप्निल का कल्पित मुख और बच्चे का यथार्थ मुख मिलकर एक हो गया था. बच्चे की शक्ल हूबहू स्वप्निल से मिलती थी. उसके अंदर की प्रेमिका और मां मिलकर एक हो रही थीं. एक संतुष्टि थी, जिससे अंदर की दरार मिटती जा रही थी. वह सोचने लगी थी कि अब वो पति के साथ न्याय कर सकेगी. आख़िर वो एक नेक आदमी था और वो उसके बच्चे का बाप था. भले ही वो और उसका पति कभी उलझे नहीं थे. दोनों एक-दूसरे की बातों में सहमति देते थे. और दिखने में दोनों का जीवन शांत पानी-सा दिखता था, पर अंदर ही अंदर दोनों को पता था कि ये शांत ठहरा पानी गंदलाने पर आ गया है. इस पानी पर ख़ामोशी की काई जमने लगी थी, क्योंकि पति को अभिव्यक्ति की कला आती ही नहीं थी.
विभोर- यही नाम रखा था उसने अपने बच्चे का! विभोर जब स्कूल जाने लगा तो तितिक्षा की विकलता बढ़ गई. धीरे-धीरे वो ख़ुद से बातें करने लगी थी. एक दिन अचानक स्वप्निल उसके दरवाज़े पर खड़ा था. उसे महसूस हुआ जैसे उसके पैरों के नीचे ज़मीन नहीं है.
“कब आए?” कुछ देर बाद तितिक्षा ने कहा.
“कल आया.”

“अब तो शादी कर ली होगी?” अचानक सोफे पर बैठते हुए तितिक्षा ने पूछा.
“जिसके साथ शादी करना चाहता था, उसने मुझसे पहले ही किसी के साथ शादी कर ली है… फिर मैं किससे शादी करूं?” तितिक्षा ने संभलकर उसकी तरफ़ देखा. न जाने क्यूं उसकी आंखों का सामना न कर सकी और सिर झुका लिया. दोनों के बीच गहरी ख़ामोशी छाई रही. तितिक्षा को पता ही नहीं चला कि स्वप्निल कब उसके पीछे आकर खड़ा हो गया था और उसकी सांसें उसकी गर्दन को छू रही थीं. उसने कोशिश की, मगर उससे कुछ बोला न गया. तितिक्षा के होंठों पर स्वप्निल के होंठ झुके हुए थे और तितिक्षा, उसे तो जैसे याद ही नहीं कि उसके शरीर में किसी और के प्यार की स्मृति है भी या नहीं!
“यह तुमने मेरे साथ क्या किया?” तितिक्षा की आवाज़ कांप रही थी. स्वप्निल ने उसे उठाकर पलंग पर बैठा दिया था और ख़ुद पलंग के एक कोने पर बैठ गया. “तुमने मुझसे कभी भी बात नहीं की. मैं इतने सालों तक ख़ुद से बातें करती रही हूं.” तितिक्षा ने धीरे-से कहा.
“मैं सोचता था तुम्हारी शादी हो चुकी है… एक बसे हुए घर को उजाड़ना नहीं चाहता था.”
“पर जब कोई किसी की कल्पना में आ जाए और जीवन में न आए, तो मेरे ख़याल से वो एक बसता हुआ घर नहीं रह जाता. आंखें बंदकर जब कोई औरत किसी और को याद करती है, पर आंखें खोलकर किसी दूसरे का चेहरा देखती है तो इससे बड़ा झूठ और क्या हो सकता है?” तितिक्षा ने नज़रें स्वप्निल के चेहरे पर गड़ा दीं. “मैं क़ानून नहीं समझती, धर्म नहीं समझती, समझती हूं तो स़िर्फ इंसान को और इंसान के सरल स्वभाव को.”
“मैंने ये सोचा ही नहीं था कि तुम भी मुझसे प्यार कर सकती हो, क्योंकि समाज के इस ढांचे को तोड़ना सरल नहीं होता. मैंने कई वर्ष सोचने में ही बिता दिए. मैं अंदर और बाहर से एक होकर जीना चाहता हूं, पर आज मेरा सब्र टूट गया है.” स्वप्निल बोलते-बोलते मेरे सामने घुटनों के बल बैठ गया. उसके हाथ तितिक्षा के घुटनों पर थे और आंखें जैसे तरल होकर उसकी आंखों में समाई जा रही थीं. उसे हैरानी हो रही थी- विश्‍वास नहीं हो रहा था कि यह उसके जीवन से जुड़ा कोई दृश्य है. उसे अच्छा लग रहा था. ऐसा पल उसकी कल्पना में ही था. कहीं कोई पुरुष अहं नहीं! प्रेम आदमी को और ज़्यादा इंसान बनाता है.
स्वप्निल के निर्मल प्रेम ने उसे ये एहसास कराया था.
वो एक रूढ़िवादी परिवार की लड़की थी और उससे भी ज़्यादा रूढ़िवादी परिवार की बहू! वो ख़ुद यह नहीं समझ पा रही है कि उसके लिए यह कैसे संभव है कि घर में सक्षम-संपन्न पति के रहने के बावजूद वो ग़ैर मर्द के स्पर्श को उत्सुक हो रही है? कहां गए वर्षों पुराने संस्कार, जिन्हें खून में संचारित करते हुए इतने वर्षों में किसी पुरुष के प्रति कोई आकर्षण तक न जागा था? आंखें मूंदकर उसने अनुभव किया कि ये कोई अपरिचित पुरुष नहीं है, बल्कि उसका स्वप्न पुरुष है.


तितिक्षा ने पाया कि एक हाथ सिरहाने रखकर दूसरे हाथ से स्वप्निल ने उसे आलिंगन में लेना चाहा, “नहीं स्वप्निल, नहीं.” तितिक्षा ने हाथ पकड़कर उसे रोक दिया.
“क्यों…?” स्वप्निल की आवाज़ अटक गई. मगर उसने कोई उत्तर नहीं दिया. उसकी विचारशक्ति स्तब्ध थी. वह धीरे-से उठा और खिड़की के पास खड़ा हो गया, उसकी तप्त श्‍वासों को शीतल वायु की ज़रूरत थी. फिर वहीं खड़े-खड़े बोला, “चलो तितिक्षा, मुझे दरवाज़े तक छोड़ आओ.” उसने देखा स्वप्निल का रंग स़फेद पड़ गया था. उसकी आवाज़ आज्ञा की तरह थी. तितिक्षा उसके साथ बाहर तक आ गई और वो चला गया. अंदर आकर वो सोफे पर गिर पड़ी. उसे लगा मिनटों में ये क्या से क्या हो गया? क्या यह किसी का अपराध है? मेरा या स्वप्निल का? या फिर यह मेरी विवेकहीनता थी? या फिर अचानक होनेवाली कोई भूल? कोई दुर्घटना…? क्या कहेंगे इसे? यह मैंने क्या कर दिया? जिन हाथों की इतने वर्षों तक प्रतीक्षा करती रही, आज खाली लौटा दिया? देह के भीतर अच्छा लगने की इतनी तीव्र अनुभूति क्यों? अब क्या करूं इस शरीर का? इसे पवित्र रखकर मैंने क्या संवार लिया? क्या पवित्रता यही होती है? यह शरीर उसको अर्पित न हुआ, जिसके लिए बना था. स्त्रियों के चरित्र और चरित्रहीनता का मामला स़िर्फ शारीरिक घटनाओं से क्यूं तय किया जाता है? कितना विचित्र नियम है? सोचते-सोचते उसकी आंख लग गई, जैसे उसमें हिलने की भी शक्ति नहीं रही थी.

अचानक विभोर की आवाज़ से वो हड़बड़ाकर उठी और उसे गले लगा लिया और सोचा कि इसे लेकर उसके पास जाऊंगी और कहूंगी कि देखो, बिल्कुल तुम्हारी अपनी सूरत है विभोर में. मगर दूसरे ही क्षण उसे लगा कि भला वह किस तरह मेरी बात मानेगा? आज से पहले तो मैंने कभी उसका हाथ भी नहीं छुआ था, कौन-सा विज्ञान ये मानेगा भला? और आज भी कौन-सा छुआ है? मैंने उसके स्वाभिमान को बहुत चोट पहुंचाई है. सालों से उसने जब्त किया था. ये प्रेम में कुछ पाना नहीं था, बल्कि ख़ुद को समर्पित करना था. वो ये क्यूं नहीं समझ सका कि औरत के इंकार में उसके संस्कार भी तो होते हैं. औरत जब किसी से प्यार करती है तो पूरा प्रेम करती है. फिर वह अपने पास कुछ नहीं रखती. आगे के कुछ दिन याद नहीं कैसे बीते थे. दिल की बात किसी से कह नहीं सकती थी. और एक दिन पता चला कि स्वप्निल शहर छोड़कर कहीं और चला गया. उस रात अधिकांशतः नींद तितिक्षा के सिरहाने ही बैठी रही.
तितिक्षा को अपनी पराजय को स्वीकार करने का एक अजीब साहस हुआ. उसने सोचा कि कम से कम मैं अपने पति से सच तो बोल सकती हूं.
एक रात तितिक्षा ये साहस अपने होंठों पर ले आई, “मैं यहां नहीं रहना चाहती.”
“क्यों?” उसके पति ने आश्‍चर्य से पूछा.
“मैं सदा आपका आदर करती हूं, पर सोचती हूं कि किसी का आदर करना ही काफ़ी नहीं होता.” प्रहर पथराई आंखों से उसे देख रहा था.
“तुम्हें क्या तकलीफ़ है तितिक्षा?”
“आपकी दी हुई कोई तकलीफ़ नहीं है.”
“फिर…? ये सब क्या है?”
“बस, इतना कि मुझे यहां सब कुछ निर्जीव-सा लगता है.” और फिर अपनी ही बात पर मुस्कुराकर तितिक्षा बोली, “यहां मुझे ऐसा लगता है कि मैं जीये बिना ही मर जाऊंगी. मुझे मरने से डर नहीं लगता, पर मैं मरने से पहले कुछ दिन जीकर देखना चाहती हूं. भले ही वो थोड़े-से दिन हों.” तितिक्षा ने थके हुए स्वर में कहा.
प्रहर को किसी प्रश्‍न या उत्तर से डर नहीं लगा था, लेकिन आज तितिक्षा से प्रश्‍न करने में उसे डर लग रहा था. उसने डरते-डरते पूछा, “तुम्हारे जीवन में कोई और है?”
“है भी और नहीं भी.” तितिक्षा ने जवाब दिया. “क्योंकि वह आदमी मेरे जीवन में उतना नहीं है, जितना मेरी कल्पना में है.”
“मैं स़िर्फ इतना जानना चाहता हूं कि वो कौन है?”
“स्वप्निल…” तितिक्षा जैसे नींद में बोल रही थी.
“उसे तो शहर से गये कई वर्ष हो गए हैं..”
“हां..”
“इन सालों में कभी वो यहां आया है?”
“एक बार. मुझे नहीं पता वो कितने दिन रहा, बस मैं उससे 2 घंटे के लिए मिली थी.”
“क्या वो तुम्हें पत्र लिखता है?”
“कभी नहीं..” प्रहर को ये बड़ा अजीब लगा. उसने ये भी पूछ लिया जो उसने सोचा भी न था.
“तुम और स्वप्निल कभी…?”
“जिन अर्थों में आप पूछना चाह रहे हैं, उन अर्थों में कभी नहीं.”

प्रहर को क्रोध की बजाय निराशा ने घेर लिया. तितिक्षा को लगा, यदि प्रहर सख़्ती से पेश आते तो अच्छा होता, क्योंकि जो आदमी सख़्ती करे, उससे घृणा की जा सकती है और जिससे घृणा हो जाए, उससे टूटने में देर नहीं लगती.
घर में एक ख़ामोशी ने घर कर लिया था और इस माहौल में तितिक्षा को घुटन होती थी. अपनी घुटन से निकलने के लिए एक दिन वो अपनी सहेली के घर गई, जहां उसे पता चला कि यहां से जाने के बाद स्वप्निल का नर्वस ब्रेक डाउन हो गया था और वह अभी तक बीमार है, सुनकर तितिक्षा कांप गई थी. उसे लगा उसकी इस हालत की ज़िम्मेदार वही है. वह घर आकर अपनी बेबसी पर बहुत रोई. रोते-रोते उसका ध्यान विभोर की तरफ़ गया, जो उसके आंसू पोंछने की कोशिश कर रहा था. उसे लगा वो एक बच्चे का मुंह नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली और जवान मर्द का मुंह है. एक सच्चे दोस्त का मुंह, जो इस समय एक मां को ढाढ़स नहीं बंधा रहा था, एक औरत की मजबूरी से बातें कर रहा था. बच्चे को मां के दुख का ज्ञान नहीं था. उससे केवल मां के आंसू न देखे गए और वह एक शाश्‍वत मर्द बनकर एक शाश्‍वत औरत के आंसू पोंछ देना चाहता था. तितिक्षा ने तड़पकर विभोर को आलिंगन में कस लिया.
समाज में हर स्त्री को घुट-घुटकर मर जाना तो आता है, पर सांस लेने के लिए किसी भी खिड़की या दरवाज़े को तोड़ देना नहीं आता है.
उसने अपनी डायरी में लिखा, ‘अगर कहीं मुझे स्वप्निल न मिलता, तो मैं कल्पना की दुनिया में जीती और मर जाती. स्वप्निल! अपने जीवन की राह पर चलते-चलते उस स्थान पर आ गई हूं, जहां से कई राहें अलग-अलग दिशाओं में जाती हैं. मैं नहीं समझ पा रही कि मैं किधर जाऊं? मुझे लगता है, सभी राहें तुम्हारी तरफ़ जाती हैं. आज किसी एक राह में खड़ा कोई मुझे पुकार रहा है और किसी राह से कोई आवाज़ नहीं आती, इसीलिए मैं उस एक राह की ओर मुड़ रही हूं…!’
उसकी ज़िंदगी ने एक और नया मोड़ ले लिया था. अब उसकी शेष आयु स़िर्फ पानी का बहाव बन गई थी. इस बहाव में कुछ पल सांस लेने के लिए दो किनारे थे… एक विभोर और दूसरी दुनियाभर की क़िताबें, जो उसके हाथ में आकर छूटने का नाम नहीं लेती थीं. स्वप्निल अब उसके लिए इस तरह हो गया था, जिस पर न कोई अधिकार है, न उलाहना. प्रेम अब भी उसे ही करती है, पर इस तरह नहीं जैसे एक औरत मर्द को प्रेम करती है, बल्कि इस तरह जैसे कोई इंसान ईश्‍वर से प्रेम करता है. वह अब प्रेम से प्रेम करने लगी थी. उसका प्रेम वहां पहुंच चुका था, जहां वो ख़ुद ईश्‍वर बन जाता है.

      ज्योत्सना ‘प्रवाह’

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