Hindi Poem

तुम्हारे शहर की अजब कहानी है… काग़ज़ों की कश्ती है, बारिशों का पानी है…
मिलते तो हैं लोग मुस्कुराकर यहां, पर ये भी दिखावे की ही एक निशानी है…
चाशनी में लिपटे रिश्ते हैं, पर इनको अपना समझ बैठना महज़ एक नादानी है…
चेहरे पे चेहरा है, राज़ ये गहरा है… अपनों को ही ठगने की यहां रीत पुरानी है…
किसे अपना कहें, किसे पराया… यही तो सबसे बड़ी परेशानी है…
ज़ुबां है जुदा, आंखें हैं ख़फ़ा… ख़ाक हो गए ख़्वाब, सुनो ये दास्तान मेरी ही ज़ुबानी है…
बेलौस मुहब्बत हुआ करती थी कभी यहां भी… लेकिन अब खो सी गई उसकी जवानी है…
भीतर से बदरंग है सबकी काया… झूठा है बाहरी दिखावा, पर ये कहते हैं हमारा चेहरा नूरानी है…
कहने को रौनक़ें हैं, रातें भी गुलाबी हैं… पर वो इक शाम कहीं नज़र नहीं आती, जो तुम संग मुझे बितानी है…

  • गीता शर्मा

वो बूढ़ी मां अब काम की नहीं लगती जो तुमको गरम-गरम रोटियन घी भर-भर के खिलाती थी… अब वो बोझ लगती हैक्योंकि उसके इलाज में पैसे खर्च होते हैं तुम्हारे… 

तुम्हारे बच्चों को वो अब दादी या नानी नहीं लगती, वो उसे बुढ़िया या बुड्ढी कहने लगे हैं क्योंकि उसकी याददाश्त अबउ सका साथ नहीं देती.. वो अब इरिटेटिंग लगती है… जो कभी उनको बड़े प्यार से कहानियां सुनाया करती थी… 

वो बूढ़ी मां अब ग़ुस्सा दिलाती है तुम्हें, जो घंटों दरवाज़े पर बैठ तुम्हारे लौटंने का इंतज़ार करती थी, जिसको यही चिंता सताती थी कि मेरे बेटे ने, मेरी बेटी ने कुछ खाया है या नहीं… जो तुम्हें खाना खिलाने के बाद ही हलक से निवाला निगल पाती थी… अब वो तुम्हारे बच्चों की पढ़ाई में एक डिस्टर्बिंग एलीमेंट हो गई है… 

उस बूढ़ी मां के लिए अब तुम्हारे लिए वक़्त नहीं, जो तुम्हारी हल्की सी छींक और खांसी पर तुम्हें गोद में लेकर डॉक्टर केपास दौड़ पड़ती थी, जो तुम्हारा बुख़ार न उतरने पर न जाने कौन-कौन से मंदिरों कौन-कौन सी मज़ारों के चक्कर लगाकर मन्नतें मांगा करती थी 

उसके लिए तुम्हारे बड़े से महलनुमा घर में एक छोटा-सा कमरा तक नहीं है ख़ाली, जो कभी तुम्हें एक छोटे-से कमरे में हीमहलों का एहसास कराती थी… 

वो बूढ़ी मां अब तुमको मां ही नहीं लगती है, जिसका आंचल पकड़कर तुम ख़ुद को हमेशा महफ़ूज़ समझते थे, जिसकीगोद तुमको जन्नत का एहसास कराती थी, अब उसका शरीर कमज़ोर पड़ चुका है, अब तुमको उसके बुढ़ापे की लाठी बननेकी ज़रूरत है लेकिन तुम अब बस हर पल उसके मरने का ही इंतज़ार करते हो… क्योंकि अब उसके पास तुम्हारे नाम करनेको कोई प्रॉपर्टी नहीं… 

और जब तुम देखते हो कि उसे मौत भी नहीं आ रही, वो अब बीमारी से है घिरती जा रही, तब तुम उसको ओल्ड एज होम मेंले जाकर छोड़ देते हो और उसकी आंखें बस तुम्हारा इंतज़ार करते-करते वहीं बंद हो जाती है… 

  • गीता शर्मा 

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सर्द मौसम में सुबह की गुनगुनी धूप जैसी तुम… 

तपते रेगिस्तान में पानी की बूंद जैसी तुम…

सुबह-सुबह नर्म गुलाब पर बिखरी ओस जैसी तुम…

हर शाम आंगन में महकती रातरानी सी तुम…

मैं अगर गुल हूं तो गुलमोहर जैसी तुम… 

मैं मुसाफ़िर, मेरी मंज़िल सी तुम…

ज़माने की दुशवारियों के बीच मेरे दर्द को पनाह देती तुम…

मेरी नींदों में हसीन ख़्वाबों सी तुम… 

मेरी जागती आंखों में ज़िंदगी की उम्मीदों सी तुम… 

मैं ज़र्रा, मुझे तराशती सी तुम… 

मैं भटकता राही, मुझे तलाशती सी तुम… 

मैं इश्क़, मुझमें सिमटती सी तुम… 

मैं टूटा-बिखरा अधूरा सा, मुझे मुकम्मल करती सी तुम… 

मैं अब मैं कहां, मुझमें भी हो तुम… बस तुम… सिर्फ़ तुम!

गीता शर्मा

आज फिर याद आने लगे हैं फ़ुर्सत के वो लम्हे, जिन्हें बड़ी मसरूफ़ियत से जिया था हमने… 

चंद दोस्त थे और बीच में एक टेबल, एक ही ग्लास से जाम पिया था हमने… 

न पीनेवालों ने कटिंग चाय और बन से काम चलाया था, यारों की महफ़िल ने खूब रंग जमाया था… 

हंसते-खिलखिलाते चेहरों ने कई ज़ख्मों को प्यार से सहलाया था… 

जेब ख़ाली हुआ करती थी तब, पर दिल बड़े थे… शरारतें और मस्तियां तब ज़्यादा हुआ करती थीं, जब नियम कड़े थे… 

आज पत्थर हो चले हैं दिल सबके, झूठी है लबों पर मुस्कान भी…  चंद पैसों के लिए अपनी नियत बेचते देखा है हमने उनको भी, जिनकी अंगूठियों में हीरे जड़े थे… 

माना कि लौटकर नहीं आते हैं वो पुराने दिन, पर सच कहें तो ये ज़िंदगी कोई ज़िंदगी नहीं दोस्तों तुम्हारे बिन… 

Poetry

जेब में पैसा है पर ज़िंदगी में प्यार नहीं है… कहने को हमसफ़र तो है पर तुम्हारे जैसा यार नहीं…

वक़्त आगे बढ़ गया पर ज़िंदगी पीछे छूट गई, लगता है मानो सारी ख़ुशियां जैसे रूठ गई…

कामयाबी की झूठी शान और नक़ली मुस्कान होंठों पर लिए फिरते हैं अब हम… अपनी फटिचरी के उन अमीर दिनों को नम आंखों से खूब याद किया करते हैं हम… 

  • गीता शर्मा

काश कि
कभी तुमने
अपने स्कूल के बस्ते को
घर लौटते वक़्त
मेरे कंधे पर रक्खा होता

काश कि मैंने
तुम्हारे साथ लूडो, सांप-सीढ़ी
इक्खट-दुक्खट और घर-घर खेला होता

काश कि मुझे मौक़ा मिला होता
रेत को अपने और तुम्हारे
हाथों से थपथपाकर
घरौंदे बनाने का

काश कि उस घरौंदे में
दरवाज़ा बनाते हुए
एक तरफ़ से आ रहे तुम्हारे
हाथ को दूसरी तरफ़ से चल रहे मेरे हाथ ने
बालू के भीतर ही छुआ होता

काश कि मेरे भीतर
तुम्हारे हाथों के छू जाने की
सिहरन का एहसास बसा होता

काश कि मुझे
मौक़ा मिला होता
तुम्हारी टूटी हुई चूड़ियां
अपने ख़ज़ाने में छुपाकर
रखने का

काश कि
तुम्हारी भोली सूरत
और कोमल हाथों से
तुम्हारे लंच के कुछ निवाले
मुझे मिले होते

काश कि तुमने मेरे
लंच के डिब्बे को सुंदर और उसके
पराठे को स्वादिष्ट कहा होता
आह!

काश कि
मैं तुम्हारे साथ
बरसात में भीगा होता
और तुम्हें भीगने से
बचाने के लिए मैंने
अपने बस्ते से
तुम्हारा सिर
ढका होता

काश कि
तुम्हारे नोट्स
मांगने के बहाने
मैं तुम्हारे घर आया होता

काश कि
मेरे दिल में क़ैद होती
वो भोली
आंखें और मुस्कान
जो किसी को दरवाजे तक
छोड़ते हुए आती हैं

काश कि
तुम्हारा बड़ा होना,
मेरे साथ हुआ होता
मैंने घंटों निहारी होती
तुम्हारी राह वो एक झलक
पाने को

काश कि
तुमसे बात करने की हिम्मत में
अनेक बार मेरी ज़ुबान
लड़खड़ाई होती

काश कि
कि तुमने भोलेपन
से पूछा होता
हां बोलो ना
और मैं
लाख बातें दिल में होते हुए
हड़बड़ाहट में कुछ बोल न पाता
और कहता
नहीं कुछ नहीं
वो एक दोस्त का इंतज़ार कर रहा था
इतना बड़ा झूठ बोलता ठीक तुम्हारी
गली में तुम्हारे अहाते के सामने खड़े होकर

काश कि
मैं अपने हाथों में गुलाब का फूल
लेकर खड़ा होता
तुम्हारे काॅलेज
जाने के रास्ते में
और महीनों की
हिम्मत के बाद भी
तुम्हें वह गुलाब दे न पाता

काश कि उसे छुपाकर
चुपके से किसी किताब में
रखा होता
हल्की पेंसिल से
आई लव यू लिखकर

काश कि
मैंने हैप्पी बर्थडे का
ग्रीटिंग कार्ड खरीदा
होता और उसे औरों की गिफ्ट के मुक़ाबले
छोटा समझ दे न पाता
उसे छुपाकर रखा होता
फिर किसी दिन
देने के लिए

काश कि
तुम्हारे रिश्ते की बात चलती और
और मैं
मना करता यह कहकर कि
अभी शादी की जल्दी क्या है
थोड़ा इंतज़ार कर लो

काश कि
तुम मेडिकल की तैयारी करती और मैं
तुम्हें देख-देखकर फेल हुआ होता
तुम डाॅक्टर बनती और मैं उस ख़ुशी में
अपने फेल होने का दुख भूल जाता

काश कि मैंने
तुम पर कमेन्ट करनेवाले लड़कों से
लड़ाई की होती

काश की मैं अपनी मां से कह पाता कि
तुम अच्छी लड़की हो

काश कि
तुम्हें जाते हुए देख
मेरी आंखें
आंसुओं से नम होतीं

काश.. काश.. काश..

मैं जानता हूं
वक़्त मुझे यह इजाज़त नहीं देता
उम्र मुझे
यह पाने की
स्वतंत्रता नहीं देती
पर ये दिल है कि
बार-बार सोचता है
काश
और इस सोच में जो उभरती है
तस्वीर वह मुझे
रोमांच से भिगो जाती है
हर काश हकीक़त नहीं होता
पर हर एहसास
छुवन को छोड़कर
ज़िंदगी की हकीक़त के सिवा
कुछ भी नहीं है.. कुछ भी नहीं है..

न जाने कितने स्पर्श के एहसास
वक़्त के साथ खो गए
लेकिन यह जो काश के स्पर्श का एहसास है
वह हर पल हृदय में
सांस की तरह चलता है
क्योंकि
वह जो चलती है तुम्हारी सांस
उसमें मैं अपनी ज़िंदगी देखता हूं

और रोज़ सुबह उठकर
दुआ मांगता हूं
उन सांसों के चलते रहने की
अपनी ज़िंदगी के लिए

वह जो उठती है उमंग की लहर
तुम्हारे सीने में
मुझे अनजाने ही भिगो जाती है
असीम आनंद के सागर में
और इसलिए प्रार्थना करता हूं
प्रभु से
कि हुलसता रहे तुम्हारा हृदय
जिससे आनंदित होता रहूं मैं
न जाने कब और कैसे
मैं अपने अस्तित्व के लक्षण
तुम्हारी संपूर्णता में
देखने लगा हूं
और इसीलिए काश के साथ जीते हुए भी
मैं तुम्हारे एहसास के साथ हूं…

– शिखर प्रयाग

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