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कहानी- परिवर्तन (Short Story- Parivartan)

“बच्चों को हमेशा बड़ों की तरह टोकोगी, तो वो तुमसे दूर होते जाएंगे. ये उम्र तो उन्हें अपना दोस्त बनाने की है, तभी वे अपनी बातें और समस्याएं तुमसे शेयर करेंगे, वरना बात-बात पर टोके जाने के डर से वे तुम्हें कुछ नहीं बताएंगे. बच्चों का उचित मार्गदर्शन करो, पर इतनी दख़लअंदाज़ी भी मत करो कि वे तुम्हें अपना सबसे बड़ा आलोचक मानकर दूर हो जाएं. परिपक्व होते बच्चों की सोच और तौर-तरीक़ों में परिवर्तन तो आएगा ही और ये अनवरत् चलता भी रहेगा.”

Hindi Short Story

“मम्मी, आख़िर आपको हो क्या गया है? ज़रा-ज़रा-सी बात का बतंगड़ बना देती हो.” अविका भुनभुनाती हुई अपने कमरे में चली गई और ज्ञान गहरी सांस लेकर अख़बार बगल में रखकर टहलने चले गए. विशाल अपनी गर्दन यूं हिलाते चला गया, मानो कह रहा हो कि मम्मी आपसे तो बात करना ही बेकार है. तृप्ति अकेली बैठी सोचती रही कि आख़िर छोटी-सी बात को इतना तूल उसने दिया ही क्यों? अच्छे-ख़ासे बैठे सब हंस-बोल रहे थे.

अविका और विशाल अपने कॉलेज के दोस्तों के अजीबो-ग़रीब क़िस्से सुनाने लगे कि कैसे अविका की सहेली ने अपने बॉयफ्रेंड को बेवकूफ़ बनाकर उससे सभी को पार्टी दिलवाई और ख़र्चा करवाया. तृप्ति अच्छी-ख़ासी बैठी क़िस्सा सुन रही थी कि अचानक आज की पीढ़ी पर कटाक्ष और उनके तौर-तरीक़ों पर अपनी आपत्ति ज़ाहिर करने लगी. मज़ाक-मज़ाक में बात बढ़ गई और तृप्ति अपनी नैतिकता भरी बातों का बोझ उन पर डालने लगी.

तृप्ति देर तक बैठी सोचती रही कि आख़िर क्यों वो रोज़ अपने बच्चों से यूं उलझ पड़ती है? पर क्या करे वह भी, बड़े होते बच्चों की ग़लत बातों का समर्थन तो नहीं कर सकती? पहले बच्चे अपनी हर बात उसे बताते थे और वो भी कितने प्यार से उन्हें समझा देती थी, पर अब पता नहीं उसका धैर्य कहां चला गया है? हर समय अविका और विशाल की चिंता होती है. उम्र भी ऐसी है, कहीं कोई ऊंच-नीच हो गई तो कौन ज़िम्मेदार होगा?

शाम को डिनर टेबल पर भी सब चुपचाप खाना खा रहे थे. सबकी चुप्पी उसे अखर रही थी. तभी फ़ोन की घनघनाहट ने शांति भंग कर दी. अविका फ़ोन पर चहक रही थी. “अरे, वाह नानी! बड़ा मज़ा आएगा, मेरे जन्मदिन पर आप आ रही हैं. अभी सबको बताती हूं. मम्मी-पापा नानी आ रही हैं परसों.” तृप्ति ने अविका से रिसीवर ले लिया और अपनी मां से बतियाने लगी.

माहौल बदल चुका था. अविका तथा विशाल नानी के आने की तैयारी में लग चुके थे. “नानी मेरे कमरे में सोएगी.”

“नहीं-नहीं मेरे.”

“अच्छा! चल तू अपना बिस्तर नीचे लगा लेना.” अविका विशाल से कह रही थी. तृप्ति की आंखों में नींद नहीं थी. कितना अच्छा लगेगा! मां के आने की ख़बर से वह एक अजीब से सुकून से घिर गई. दूसरे दिन भोर में ही आंखें स्वतः खुल गईं. शरीर में स्फूर्ति थी, वरना और दिन होता, तो शारीरिक शिथिलता उसके चेहरे पर बनी रहती. विश्‍वास नहीं होता कि जब बच्चे छोटे थे, तो वो कैसे उनकी अलग-अलग फ़रमाइश पर थिरकती रहती थी. दोनों की अलग-अलग पसंद के टिफिन, ज्ञान का हमेशा सादा नाश्ता, तीन फ़रमाइशों पर रसोई में काम होता था. बड़े होते बच्चों के साथ, धीरे-धीरे थकान कब सिर उठाने लगी, उसे पता ही न चला.

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अविका कभी-कभी मदद करने की कोशिश भी करती, तो उसके काम करने का रवैया तृप्ति को पसंद नहीं आता. उसकी टोका-टोकी से आहत अविका रसोई से बाहर आ जाती और तृप्ति झुंझलाती हुई किसी तरह काम निपटाती, लेकिन आज मां के आने की ख़बर ने मानो शरीर में ऊर्जा का संचार कर दिया हो. घर की नए सिरे से चाक-चौबंद व्यवस्था हो चुकी थी. मां को क्या-क्या पसंद है, इसकी सूची मन-ही-मन बन चुकी थी. मम्मी का मूड अच्छा देख अविका पूछ बैठी, “मम्मी, इस बार मैं अपना बर्थडे बाहर सेलिब्रेट कर लूं.”

“नहीं अविका, हम घर में ही करेंगे. प्लीज़, अपनी ज़रा ढंग की सहेलियों को बुलाना. इस बार नानी भी होंगी, तो थोड़ा ध्यान रखना.”

“मम्मी, मेरी सभी सहेलियां ढंग की ही हैं. आपको ही पता नहीं क्यों उनसे प्रॉब्लम होती है?” कहती हुई अविका वहां से चली गई. दूसरे दिन का नज़ारा रोज़ से अलग था. नानी के घर आने से घर में रौनक थी. दोनों बच्चे उन्हें घेरे बैठे थे.

“नानी, ये देखो हम लोग पिकनिक पर गए थे. ये मेरी सहेली नताशा कितनी स्मार्ट है न!”

“अरे, मुझे तो सबसे ज़ोरदार मेरी पोती लग रही है, पर ये बता तू यह पहन के क्या गई है पिकनिक पर, सलवार-सूट? तुझ पर तो जींस जंचती है.” सुनकर अविका ने कटाक्ष भरे नज़रों से अपनी मम्मी को देखा. उसे याद आया उस दिन उसने जींस के ऊपर कसा हुआ टॉप पहना, तो तृप्ति ने उसके ड्रेस सेंस को लेकर कितना भाषण दिया था. आहत अविका ने ग़ुस्से में सलवार-कुर्ता पहना और पिकनिक पर चली गई.

तभी तृप्ति ने पूछा, “मां, आज डिनर में क्या बनाऊं?” अविका और विशाल तुरंत बोल पड़े, “नूडल्स.” तो तृप्ति ने आंखें तरेर दीं.

“ठीक तो है तृप्ति, आज दोपहर का खाना इतनी देर से खाया है. ज़्यादा भूख भी नहीं. ऐसा कर नूडल्स बना ले. थोड़ी-थोड़ी सब खा लेंगे और गप्पे मारेंगे.”

“नानी, नूडल्स?” बच्चे आश्‍चर्य से बोल उठे, तो शारदाजी हंस पड़ीं. “तुम्हारे नाना को बहुत पसंद है. ह़फ़्ते में एक दिन तो ज़रूर बनाती हूं मैं.”

“क्या मां, आप भी…!”

“और क्या, नूडल्स के विज्ञापन में पता नहीं क्यों स़िर्फ बच्चे दिखाते हैं.” अविका व विशाल हंस पड़े. उन्हें ख़ूब मज़ा आया शारदाजी की बातों में.

“अविका, किसे-किसे बुला रही है अपने जन्मदिन पर?” अविका कुछ कहती इससे पहले तृप्ति मां से पूछ बैठी,“क्या-क्या बनाऊं उस दिन?”

“तृप्ति घर में इतना झंझट क्यों कर रही हो. होटल वगैरह में कर लो. व्यर्थ की भागदौड़ से बच जाओगी.” सुनते ही अविका उछल पड़ी. शारदाजी ने जन्मदिन की ज़िम्मेदारी विशाल और अविका को एक निश्‍चित बजट के साथ सौंप दी, जिसे दोनों ने बख़ूबी निभाया.

शाम को तृप्ति ने मां की दी हुई नीली साड़ी बड़े मनोयोग से पहनी, तो सभी ने दिल खोलकर तारीफ़ की. सभी ख़ुश थे. अविका का जन्मदिन ख़ुशी-ख़ुशी निपट गया. शारदाजी उसके सभी दोस्तों से गर्मजोशी से मिलीं. आज तृप्ति को भी कहीं कोई कमी नज़र नहीं आई. कितनी प्यारी तो हैं इसकी सहेलियां. वो सोचने लगी. इसी तरह हंसी-ख़ुशी एक ह़फ़्ता कैसे बीत गया कुछ पता ही नहीं चला. शारदाजी के वापस जाने को दो दिन ही शेष रह गए थे. मां के जाने की कसक तृप्ति के चेहरे पर झलकने लगी थी. इन दिनों बेटी के भीतर पलती कशमकश को शारदाजी की अनुभवी आंखों ने पढ़ लिया था. ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दबी बेटी की शंका-आशंकाओं को वह भांप गई थीं.

आख़िर इन बेचैनी भरे दिनों से वो भी तो दो-चार हुई थीं. जब तृप्ति तेज़ी से बढ़ रही थी और बेटा तरुण अपने करियर के जद्दोज़ेहद में लगा था, उस समय शारदाजी भी तो शारीरिक व मानसिक परिवर्तन की प्रक्रिया से गुज़र रही थीं. उम्र का यह दौर कितना मुश्किल होता है. आज तृप्ति उसी उम्र के दौर में है. उसकी शारीरिक थकान और मानसिक उद्वेलन का आकलन वो मां होने के नाते भली-भांति कर सकती हैं.

दूसरे दिन शारदाजी ने अविका के हाथों का बना खाना खाने की इच्छा ज़ाहिर की. अविका उत्साहित थी, लेकिन तृप्ति परेशान-सी नज़र आने लगी, तो मां ने प्यार से उसका हाथ पकड़कर अपने पास बिठा लिया. “क्यों चिंता करती है? वो कर लेगी सब.” “मम्मी, सच में मैं सब अच्छे से करूंगी और आपकी रसोई भी साफ़ रखूंगी. आप बस मेरा काम होने तक आना मत.”

“तृप्ति, उस पर भरोसा करो. आज ये जो भी और जैसा भी बनाएगी, हम सब खाएंगे और तारीफ़ भी करेंगे. क्यों अविका?” दुविधा में पड़ी तृप्ति मां के पास बैठ गई. तभी शारदाजी के स्नेहभरे स्पर्श ने उसे अंदर तक भिगो दिया. “मेरी बिटिया, कुछ परेशान और थकी-थकी-सी लगती है.” मां की बात पर तृप्ति हंसते हुए बोली, “तुम्हारी बेटी अब बड़ी हो गई है.” धीरे-धीरे तृप्ति अंतर्मन की गहराइयों में दबी अपनी आशंकाओं को मां के साथ साझा करने लगी. बातों बातों में तृप्ति ने अपने मन की बात बताई. “मां, अविका और विशाल की चिंता लगी रहती है. ज़माना कितना बदल गया है. उनकी सोच हमेशा सकारात्मक दिशा में बढ़े, बस, इतना ही चाहती हूं.”

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“देख तृप्ति, हर पुरानी पीढ़ी आनेवाले नए युग के तेज़ ऱफ़्तार से आशंकित रहती है और नई पीढ़ी के क़दम उस ऱफ़्तार के साथ तालमेल बिठा ही लेते हैं. इसमें कुछ नया नहीं है. उम्र के इस दौर से सब गुज़रते हैं. तेरा बात-बात पर बेवजह चिंता करना, झुंझलाना अपनी समझ पर बच्चों का यूं अतिक्रमण करना, तुझे कितना परेशान कर देता होगा, ये समझती हूं मैं, पर देख अब बच्चे छोटे नहीं रह गए. बड़े हो रहे हैं. उनका अपना अनुभव और समझ उनमें पनपने दे.

जहां तक मैंने देखा है, दोनों समझदार हैं. अब उन पर ज़बरदस्ती अपनी मर्ज़ी थोपना ठीक नहीं है. बच्चों को हमेशा बड़ों की तरह टोकोगी, तो वो तुमसे दूर होते जाएंगे. ये उम्र तो उन्हें अपना दोस्त बनाने की है, तभी वे अपनी बातें और समस्याएं तुमसे शेयर करेंगे, वरना बात-बात पर टोके जाने के डर से वे तुम्हें कुछ नहीं बताएंगे. बच्चों का उचित मार्गदर्शन करो, पर इतनी दख़लअंदाज़ी भी मत करो कि वे तुम्हें अपना सबसे बड़ा आलोचक मानकर दूर हो जाएं. परिपक्व होते बच्चों की सोच और तौर-तरीक़ों में परिवर्तन तो आएगा ही और ये अनवरत् चलता भी रहेगा.

तुम्हीं सोचो उम्र के साथ-साथ तुम्हारी सोच में भी कितना परिवर्तन आ चुका है. अपने और बच्चों के बीच अविश्‍वास की दीवार तोड़ो. उनकी बात शांतिपूर्वक सुनो और अपना फैसला तुरंत मत सुनाओ. तुम्हारे बच्चे उम्र की उस दहलीज़ पर हैं, जिसमें वे अपने लिए कुछ आज़ादी चाहते हैं. उन्हें अभिव्यक्ति का अवसर दो. अपने ऊपर चढ़ा बड़प्पन का लबादा उतारकर उनके साथ कभी-कभी ठहाके भी लगाओ. तुम्हारा बचपना जब बाहर आएगा, तो वे दोस्तों की तरह तुम्हारे क़रीब आएंगे.” वातावरण गंभीर हो गया था कि तभी मां विषय को बदलने के अंदाज़ में पूछ बैठीं, “अब ज़रा ये बताओ कि अपने शरीर का क्या हाल कर डाला है. कितना वज़न बढ़ गया है मालूम भी है तुम्हें.” झेंपती हुई तृप्ति बोली, “मां, उम्र के साथ थोड़ा परिवर्तन तो आएगा ही.”

“देखो बिटिया, स्त्री का शरीर तो बना ही परिवर्तन के लिए है, पर जितना अपने मन और तन को नियमों से बांधोगी, उतनी ही आसानी से इस बदलाव को स्वीकार कर पाओगी. मैं और तुम्हारे पापा अभी भी कुछ दूर तक सैर को ज़रूर जाते हैं, तो तुम भी प्राणायाम और कुछ नियमित व्यायाम ज़रूर करो. अगर दिनभर का कुछ समय अपने लिए नहीं निकाला, तो क्या फ़ायदा. रचनात्मक कार्यों में स्वयं को व्यस्त रखो. बच्चों को सिखाने की चिंता के साथ ख़ुद भी कुछ नया करने का ज़ज़्बा पैदा करो, तब देखो तुम्हारा नज़रिया कैसे बदलता है. परिस्थितियों को विषम हम बना देते हैं, जबकि वो इतनी जटिल नहीं होती हैं. जिस दिन तुम्हारे सोचने-विचारने का नज़रिया बदला, समझो आधी कठिनाइयां टल गईं. इस समय ज्ञान को भी उसके हिस्से का समय दो.” मां की बातें उसके मन की गांठों को एक-एक कर सुलझाती गईं. अपनी ओर कृतज्ञता से देखती तृप्ति को मां ने गले लगा लिया. तभी अविका ने ऐलान कर दिया कि खाना तैयार है.

तृप्ति तेज़ क़दमों से रसोई की ओर चल दी, वहां पहुंचकर आश्‍चर्यचकित रह गई. कितना कुछ बनाया था अविका ने. ज्ञान और विशाल पहले से ही वहां मौजूद थे. साफ़-सुथरी रसोई देखकर लगा ही नहीं कि यहां अविका ने खाना बनाया है. संशय में पड़ी तृप्ति ने ज्यों ही कौर मुंह में डाला, तो उसकी नज़र अविका पर पड़ी, जो उत्सुक निगाहों से मां के चेहरे के हाव-भाव पढ़ रही थी. तृप्ति ने इशारे से उसे बुलाया, फिर प्यार से अपनी बांहों में भरकर ढेर सारी अनकही प्रशंसा उसे पारितोषिक के रूप में दे दी.

शारदाजी तो पहले ही अपनी नातिन के प्रति आश्‍वस्त थीं. इधर ज्ञान और विशाल तारीफ़ों के पुल बांध रहे थे. तृप्ति के चेहरे की ख़ुशी प्रशंसा, भरोसा और विस्मय के मिले-जुले भाव अविका को उल्लास से भर गए. तृप्ति आह्लादित थी. आज उसे अविका का एक अलग रूप दिखा या शायद उसके स्वयं के बदले नज़रिए से बहुत कुछ परिवर्तित हो गया था.

Minu tripathi

      मीनू त्रिपाठी

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कहानी- अनकही (Short Story- Ankahi)

नलिन की मृत्यु के दौरान जो हर रोज़ उसके घर जाने का क्रम चला, तो मैंने उसे आगे भी बरक़रार रखा. उस घर में नलिन की उपस्थिति महसूस करती थी मैं. कभी वासवी की बातों में, तो कभी उसकी बेटी कनुप्रिया की आंखों में. कनु ने बहुत कुछ पाया था अपने पापा से.

Hindi Short Story

नए शहर के कॉलेज में जाकर पढ़ने और हॉस्टल में रहने की सोचकर ही घबराहट हो रही थी. मेरे पास कोई विकल्प भी तो नहीं था. पापा की तबादलेवाली नौकरी थी और जिस छोटे-से शहर में तब हम रहते थे, वहां आधुनिक जीवनशैली के सभी संभव साधन, मसलन- क्लब, सिनेमाघर, अस्पताल आदि होते हुए भी ढंग का कोई कॉलेज नहीं था. एक था भी तो गुजराती मीडियम का. अत: मुझे जयपुर के कॉलेज में प्रवेश दिला दिया गया. “चिंता किस बात की, अपना नलिन भी तो वहीं पढ़ रहा है.” पापा ने समझाया.

नलिन के और मेरे पापा कॉलेज के दिनों के मित्र थे. बाद में भी हम दोनों परिवार मिलते रहे. हम शिमला गए, तो उन्हीं के घर रुके. वो मुंबई घूमने आए, तो हमारे घर. नलिन की बहन मुझसे वर्षभर छोटी थी. यूं ही पारिवारिक मित्रता हो गई थी. मम्मी-पापा को तो तसल्ली हो गई कि मेरा सहारा भी निश्‍चय ही तिनके से कहीं अधिक था.

शांत स्वभाव और कर्त्तव्यनिष्ठ, मेरे अनुसार तो यही नलिन का परिचय होना चाहिए. हर रविवार को वह मेरी खोज-ख़बर लेने आता. हमारे घर में सदैव उसके गुणों के चर्चे होते रहते थे, परंतु अब जो भाव मेरे मन में जन्म ले रहे थे, वह पूर्णत: भिन्न थे. दिल कुछ और भी चाहने लगा था. मन करता वह स़िर्फ काम की ही बात न करे और भी कुछ कहे. मन करता कि वह जाने की जल्दी न करे, कुछ देर और रुका रहे. मतलब यह कि अच्छा तो वह मुझे पहले भी लगता था, लेकिन यौवन की दहलीज़ पर पहुंचकर उसके प्रति जो आकर्षण जगा था, वह पहले से बहुत अलग था. पहल करने की हिम्मत नहीं पड़ी. विश्‍वास था कि एक दिन वह भी तो पहचानेगा मेरे अनुराग को.

हॉस्टल लाइफ ने मुझे एक और अनमोल तोहफ़ा दिया था- मेरे कमरे की साथिन वासवी के रूप में. हमारे विषय अलग थे, परंतु कॉलेज के बाद का पूरा समय हम साथ ही बिताते. पढ़ाई पूरी करके मौज-मस्ती करते, घूमने और पिक्चर जाते. प्राय: नलिन को भी बुला लेती थी मैं. वासवी बहुत अच्छा गाती थी और जब कभी कॉलेज के फंक्शन में उसका गायन होता, तब तो नलिन को आमंत्रित करने का बहाना मिल जाता.

तीन वर्ष कैसे निकल गए, पता ही नहीं चला. नए शहर में अकेले रहने की घबराहटवाली बात अब पुरानी हो चुकी थी. यह जीवन छूटनेवाला है. अब तो यही मलाल था. नलिन का कोर्स तो हमसे भी दो महीने पहले ख़त्म हो गया था और उसके लौटने का दिन भी नज़दीक आ गया था.

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कैसे भूल सकती हूं वह शाम. हमेशा की तरह उसने हमारे हॉस्टल पहुंचकर मुझे रिसेप्शन पर बुलवा भेजा. इधर-उधर की बातें करने के बाद उसने एक बड़े से लिफ़ा़फे में से हल्के गुलाबी रंग का एक ग्रीटिंग कार्ड निकाला, गुलाब के रंग-बिरंगे फूलों से चित्रित. मेरा दिल ज़ोर से धड़कने लगा. जिस पल का मुझे इंतज़ार था, वह पल आ गया था. कानों के साथ-साथ पूरा तन उसकी बात सुनने को प्रतीक्षारत था. जब उसने कहा, “तुम इतनी अच्छी शेर-ओ-शायरी जानती हो, कविताएं पढ़ती हो, इस कार्ड पर कुछ ऐसी पंक्तियां लिख दो न कि वासवी पढ़ते ही मुग्ध हो जाए. तुम्हें हमारी इतनी पुरानी दोस्ती का वास्ता…” वह बोले ही चला जा रहा था. मनुहार कर रहा था शायद. किंतु उसके शब्द मेरे भीतर नहीं घुस पा रहे थे, पर मन के सोचने का तरीक़ा अलग होता है और बुद्धि का अलग. मेरे मस्तिष्क ने फौरन मेरे मन को वश में किया और मैंने उससे ग्रीटिंग कार्ड लेते हुए कहा, “ठीक है, मैं अच्छी तरह सोचकर कल तक लिख दूंगी.” और लौट आई अपने कमरे में. मोहब्बत मांगी या छीनी नहीं जा सकती, उस पर हक़ नहीं जताया जा सकता, यह जानती थी मैं.

मैंने उस कार्ड पर जो लिखकर दिया, वह मेरे ही दिल से निकली आवाज़ थी. जब भी नलिन का ख़्याल आता, यही पंक्तियां आतीं मन में. जब वह ही मेरा नहीं रहा, तो उन पंक्तियों का क्या करती मैं. अत: वही उस कार्ड पर लिख दीं, बस नाम बदल गए थे ‘नलिन की ओर से- वासवी को.’

कार्ड पाकर बहुत ख़ुश हुई थी वासवी. कितनी बार तो वह कार्ड उसने मुझे दिखाया, कितनी ही बार वह पंक्तियां पढ़कर सुनाई. मैं उसकी ख़ुशी में ख़ुश दिखने को मजबूर थी. अच्छी बात यह थी कि अपने उत्साह में उसे मेरी उदासी दिखी ही नहीं.

पढ़ाई पूरी हुई. हॉस्टल छूटा और संगी-साथी भी. मां तो मेरे विवाह के लिए उतावली थीं, “पढ़ाई तो पूरी हो गई है. पापा की अवकाश प्राप्ति से पहले विवाह हो जाए, तो अच्छा है.”  मैं चुप रही. मना क्यों करती? किसका इंतज़ार करना था मुझे? न कोई उमंग थी, न कोई सपने. लड़कियों के लिए नौकरी का प्रचलन तब नहीं था. भारत में तो वैसे भी लड़की के जीवन की राह उसके बड़े ही चुनते हैं, जिस पर आंख मूंदकर बस चलना होता है उसे. फ़र्क़ यह था कि मैंने भी नादानी में कुछ सपने बुन लिए थे.

परिस्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि नलिन और वासवी के विवाह से पहले ही मेरा विवाह हो गया. ख़ैर, मैं उनके विवाह में गई थी. अधिक समय वासवी के संग ही बिताया और नलिन के लिए ख़ुशियों की ढेर सारी दुआएं मांगीं सच्चे मन से, पर उससे मिलने की हिम्मत नहीं जुटा पाई. समय आगे बढ़ता रहा. मेरा बेटा हुआ और उसे पालने में पूरी तरह से व्यस्त हो गई मैं. पारिवारिक मित्रता होने के कारण शादी-ब्याह में या फिर अन्य अवसरों पर नलिन-वासवी से भेंट हो जाती, पर भीड़भाड़ में नलिन से दूरी बनाए रखना आसान नहीं होता. एक ही शहर में रहने के कारण एकदम कटकर रहना तो संभव नहीं था, परंतु उनके घर कम ही जाती मैं. इस बीच उनकी एक बेटी हुई, नाम रखा- कनुप्रिया.

हम सब अपनी-अपनी तरह से व्यस्त रहे और बच्चे बड़े होते रहे. मेरा बेटा इंद्रनील 20 का हो गया और कनु 18 की. एक दिन दोपहर को ख़बर मिली कि ‘नलिन का देहांत हो गया है’ विश्‍वास करनेवाली बात नहीं थी और मन विश्‍वास करने को तैयार भी नहीं था, पर बम-विस्फोट पूर्व सूचना देकर होते हैं क्या? नलिन के विवाह से उतना नहीं टूटी थी मैं, जितना कि इस बात से. अभी 45 का भी नहीं हुआ था नलिन. व्यस्तता के बीच नलिन को पता ही नहीं चला कि उसके भीतर कोई रोग पनप रहा है. प्रात: उठा तो उसे ज़ोर का चक्कर आया. वह फिर से बिस्तर पर बैठ गया. वासवी ने पानी लाकर पिलाया, तो थोड़ा बेहतर महसूस किया उसने. वासवी चाय बनाने चली गई, तभी नलिन को लगा कि उसका दम घुट रहा है और वह बाहर लॉन में निकल आया, ताज़ी हवा की तलाश में. पर शायद उसे एक बार फिर चक्कर आ गया और वह वहीं गिर गया. पड़ोसी ने देखा और भागा आया. चेहरे पर पानी के छींटें मारा, वासवी को बाहर बुलाया. फ़ौरन अस्पताल ले गए. डॉक्टरों ने सब प्रकार से प्रयत्न करके देख लिया, परंतु वह नलिन को बचा नहीं सके. उसका दिल ही उसे धोखा दे गया था.

नलिन से चाहे मैंने दूरी बनाए रखी थी, पर वासवी से मैंने दोस्ती कायम रखी. घर नहीं भी जाती, तो टेलीफोन पर बात कर लेती थी. नलिन की मृत्यु के दौरान जो हर रोज़ उसके घर जाने का क्रम चला, तो मैंने उसे आगे भी बरक़रार रखा. उस घर में नलिन की उपस्थिति महसूस करती थी मैं. कभी वासवी की बातों में, तो कभी उसकी बेटी कनुप्रिया की आंखों में. कनु ने बहुत कुछ पाया था अपने पापा से. हंसती तो बिल्कुल वैसे ही थी, चलने का ढंग भी बिल्कुल वैसा था. धीरे-धीरे मेरा उस पर मोह बढ़ रहा था.

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पति से मुझे कोई शिकायत नहीं थी. दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर थे वह. अति गंभीर और ख़ामोश. पीएचडी कर रखी थी और अपने विषय में पूर्ण पारंगत थे. उनके चिंतन का क्षेत्र ब्रह्मांड की उत्पत्ति और ऐसे ही अन्य गूढ़ रहस्य थे, जो मेरी समझ के बाहर थे. उन्हें देखकर लगता था, जैसे विश्‍वभर की समस्याओं का हल उन्हें ही तलाशना है. अत: रोज़मर्रा की घर-गृहस्थी की बातों में न उनकी रुचि थी, न ही इतना समय. घर की व्यवस्था से एकदम निर्लिप्त रहते वह. कुछ भी पूछने पर यही कहते, “तुम्हें जो ठीक लगे, वही कर लो.”

बेटा इंद्रनील दूर शहर में पढ़ रहा था और कोर्स के अंतिम वर्ष में कैंपस सिलेक्शन में अपनी मनपसंद नौकरी भी पा चुका था.

नलिन को गए छह वर्ष बीत गए. इस बीच मैं और वासवी एक बार फिर से बहुत क़रीब आ चुके थे. नलिन के पिता का देहांत पहले ही हो चुका था और मां नलिन के जाने से पूरी तरह से टूट गई थीं. मानसिक और शारीरिक दोनों ही रूप से. वासवी उनकी अच्छी देखभाल कर रही थी. नलिन की पेंशन आती थी. अत: उस तरफ़ से चिंता की कोई बात नहीं थी. देखने में तो सब ठीक ही था. पर जो बात नहीं पता थी वह यह कि एक नन्हीं-सी चिंगारी वासवी के भीतर सुलग रही थी. उसका शरीर खोखला कर रही थी. वासवी कुछ और काम से डॉक्टर के पास गई और चेकअप करने पर पता चला कि लिवर के कैंसर ने उसे पूरी तरह अपनी गिरफ़्त में ले लिया है. ऑपरेशन हुआ और इलाज भी शुरू किया गया, पर डॉक्टरों ने अधिक उम्मीद नहीं दिलाई. विदेश में रहती नलिन की बहन आकर मां को अपने साथ ले गई. वासवी की देखभाल की ज़िम्मेदारी मैंने संभाल ली. कनु तो थी ही. मृत्यु को सामने देख वासवी को अपनी बेटी की बहुत चिंता सता रही थी. कौन देखेगा उसे? बुआ के पास भेजने से पढ़ाई का नुक़सान होगा. कनु मुझे शुरू से ही पसंद थी. मैंने अपने बेटे के मन की बात जानने के लिए उसे टेलीफोन किया. कनु को वह बचपन से ही जानता था. इन दोनों की आपस में बनती भी ख़ूब थी. उसकी रज़ामंदी जान मैंने वासवी से इन दोनों के रिश्ते की बात की. यह भी तय हुआ कि बाकी पढ़ाई वह हमारे ही घर में रहकर पूरी कर सकती है. वासवी को इस बात से बहुत तसल्ली मिली, पर जब उसने बेटी से बात की, तो वह रोने लगी. मां की मृत्यु अवश्यंभावी जान दुख तो होना ही था.

और एक दिन वासवी भी हमें छोड़कर चली गई. सब संस्कार पूरे होने के बाद मैं कनुप्रिया को अपने घर ले आई.

मुझे छोटे बच्चों का साथ प्रारंभ से ही अच्छा लगता रहा है. बेटे इंद्रनील के बड़े होने पर मैने घर में क्रैश खोल लिया था. कामकाजी स्त्रियों के बच्चे दिनभर मेरे पास रहते और ऐसे ख़ुश रहते कि शाम को घर लौटना ही नहीं चाहते थे. कनु भी कॉलेज से आने के बाद बच्चों के साथ लगी रहती. उसका भी मन लग जाता और वह भी मेरी नज़रों के सामने रहती.

मैं कनु को प्रसन्न रखने का बहुत प्रयत्न करती, पर देखती कि वह हमेशा उदास रहती थी. उन दिनों मोबाइल नया-नया ही चलन में आया था और कनु ने अपनी मां की बीमारी के दौरान ही ख़रीदा था, ताकि ज़रूरत पड़ने पर उसे फ़ौरन बुलाया जा सके. अब मैं देखती कि कनु अपने मोबाइल पर हर रोज़ एक नियत समय पर किसी से बहुत धीमे स्वर में लंबी-लंबी बात करती. और जाने क्यों मुझे लगता कि मोबाइल की इस लंबी बातचीत के बाद वह अधिक उदास हो जाती थी, किसी खोल में सिमट जाती जैसे. पिता की कमी और मां को खोने का ग़म तो मैं भी समझती थी, पर कुछ और भी था जो मेरी पकड़ में नहीं आ रहा था.

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उस दिन कनुप्रिया का जन्मदिन था और मैंने पूरा भोजन उसी की पसंद का बनाया था. कनु की छुट्टी थी. अत: शाम को उसे लेकर कहीं घूमने जाने या मूवी देखने की भी योजना थी मेरी. पर शाम होने से पहले ही एक युवक लाल गुलाबों का गुलदस्ता लिए आन खड़ा हुआ. दरवाज़ा मैंने ही खोला था. झिझकते हुए उसने पूछा, “कनु है, कनुप्रिया?” मैं उसे अंदर ले आई. मुझे उसका चेहरा कुछ

जाना-पहचाना-सा लगा. बाद में याद आया कि वासवी के दाह-संस्कारवाले दिन देखा था उसे. उसने कनु को फूल देते हुए जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं और मुझसे कहा, “आंटी, क्या मैं कनु को डिनर पर बाहर ले जा सकता हूं?” कनु के चेहरे पर लालिमा थी, चेहरे पर ख़ुशी. ऐसी ख़ुशी, जो मैंने एक लंबे अरसे के बाद उसके चेहरे पर देखी थी. मैंने उस युवक- अनुराग को कॉफी पीकर जाने का निमंत्रण दिया. जानती थी कि उसका रुकने का मन नहीं है, किंतु मैं बिना तसल्ली किए कनु को उसके साथ कैसे भेज देती? उसकी मां होने की ज़िम्मेदारी भी मुझे निभानी थी. कनु को कॉफी बनाने का इशारा कर मैं अनुराग से बातें करने लगी.

अनुराग सीए पूरा करके नौकरी कर रहा था. इन दोनों का दो वर्ष पुराना परिचय था. निश्‍चय ही परिचय से बढ़कर था. कनु का जन्मदिन याद रखना और साथ में सेलिब्रेट करने की इच्छा रखना कुछ और ही संदेशा दे रहा था. ‘समय पर लौट आना’ कहकर मैंने उन्हें जाने की अनुमति दे दी. यद्यपि कनु ने जाते हुए कहा कि मौसी, यदि थोड़ी देर हो जाए, तो चिंता मत करना. जब तक वह लौटकर नहीं आए, मेरा ध्यान उधर ही लगा रहा. 10 बजे के बाद से तो मैं खिड़की से बाहर झांकती खड़ी रही.

11 से थोड़ा पहले आए वे. कार के रुकने के बाद भी वे देर तक उसके अंदर बैठे रहे. बाहर निकलकर उसने कनु का हल्का-सा आलिंगन लिया और जब तक वह बाहर के गेट से घर के दरवाज़े तक नहीं पहुंच गई, वहीं खड़ा उसे निहारता रहा. रास्ते में पड़ी किसी चीज़ से टकराकर वह थोड़ा डगमगाई, तो भागकर वह कनु के पास पहुंचा.

एक-दो दिन बाद मैंने अनुराग की बात छेड़ी, तो कनु के आंसू टपकने लगे. अपने प्यार को स्वीकार किया उसने. मां को अभी बताया नहीं था. अनुराग की नौकरी लग जाने का इंतज़ार कर रही थी. अब समझ आया कि जब मैंने वासवी के समक्ष कनु को अपनी बहू बनाने का प्रस्ताव रखा, तो वह क्यों रोई थी? स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह इंकार करती, मन की बात कहती. पर मैं उसकी मजबूरी का फ़ायदा नहीं उठाऊंगी, मैंने तय किया. मुझसे बेहतर कौन समझेगा प्यार को खोने का दर्द? प्यार को खोकर ज़िंदगी तो निकल ही जाती है, पर हज़ार नेमतें पा लेने के पश्‍चात् भी एक बेनाम-सा दर्द, कुछ अनकही-सी कमी रह ही जाती है जीवनभर के लिए.

मैंने अनुराग के बारे में जांच-पड़ताल की और पूरी तसल्ली करके उन दोनों का विवाह कर दिया.

मैं कनुप्रिया में तुम्हारा अक्स देखती थी नलिन, इसलिए उसे ही अपने घर लाना चाहती थी शायद. आज लग रहा है, जैसे एक बार फिर से तुम्हें खो दिया है मैंने.

पर फिर भी आज संतुष्ट हूं मैं, बहुत संतुष्ट.

usha vadhava

        उषा वधवा

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कहानी- छलावा (Short Story- Chhalava)

सौम्या के मन में बार-बार यह विचार आ रहा था कि हम भारतीय विदेश के प्रति इतने आकर्षित क्यों हैं? विदेश में यदि आय अच्छी है तो ख़र्चे भी उसी हिसाब से होते हैं. ये किस छलावे में जी रहे हैं हम? जब उसकी सहेलियां उसके भाग्य को सराह रही थीं, तो वह उन्हें समझाना चाहती थी कि मुझ से ज़्यादा ख़ुशनसीब तुम लोग हो, जो अपने देश में, अपनों के बीच रहकर ज़िंदगी जीने का मज़ा लूट रही हो. लेकिन इस भ्रम को तोड़ना आसान नहीं था.

Short Story in Hindi

सौम्या दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरी, तो मौसम बहुत ही ख़ुशगवार था. हल्की-हल्की बूंदाबांदी हो रही थी. उसने एक गहरी सांस लेकर मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू को आत्मसात् किया और व्याकुलता से दर्शक दीर्घा में दृष्टि दौड़ाई.

आज पूरे सात महीने बाद सौम्या भारत लौटी है. विवाह के 15 दिन बाद ही सौम्या और दीपक अमेरिका चले गए थे. सौम्या ने देखा सामने से मां, पिताजी, बहन नेहा और भाई सौरभ आ रहे हैं और वह चहककर उनके गले लग गई. सौरभ और नेहा तो ख़ुशी के मारे पागल हुए जा रहे थे. मां उसे प्यार से ऊपर से नीचे तक निहार रही थी. पिताजी ने अपना हाथ उसके सिर पर रखा, तो उसे उनके चेहरे पर गर्व के भाव स्पष्ट दिखाई दिए कि आज मेरी बेटी विदेश से आई है. आख़िर मैंने अपनी बेटी के लिए एनआरआई दूल्हा ढूंढ़ ही लिया.

रास्तेभर नेहा और सौरभ सौम्या से अमेरिका और अपने जीजाजी के विषय में पूछते रहे. सौम्या भी यादों में खो गई. जब उसने पहली बार अमेरिका की धरती पर क़दम रखा, तब वहां की चमकती सड़कें और गगनचुंबी इमारतें देखकर उसे लगा, उसका जीवन सफल हो गया. उसका बरसों का सपना कितनी आसानी से पूरा हो गया. दीपक भी आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक और सीधे-सादे इंसान हैं. विदेश में रहकर भी बिल्कुल भारतीय.

गाड़ी रुकते ही सौम्या वर्तमान में लौट आई. घर आ गया था. उसका अपना घर, जहां उसने अपना बचपन जिया. वह घूम-घूमकर पूरा घर देख रही थी. सब कुछ वैसा ही था, कुछ भी नहीं बदला था. नेहा और सौरभ उसके लाए उपहार देखकर ख़ुश हो रहे थे, तभी नेहा ने चहककर पूछा, “दीदी, ये सब तुम्हारी पसंद है या जीजू की.” उसने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया, “दोनों की.” अब नेहा को वह कैसे बताती कि इन उपहारों को ख़रीदने के लिए उसने कैसे महीने के बजट में कमी करके पैसे बचाए और कितने ही सेल काउंटर्स पर घूमी है.

फ्रेश होकर जब सौम्या नाश्ते के लिए बैठी तो डायनिंग टेबल पर अपनी पसंद की ढेर सारी डिशेज़ देख, हंसकर मां से बोली, “ये क्या मम्मी, मैं एक दिन के लिए नहीं, एक महीने के लिए आयी हूं. आपने तो आज ही सब कुछ बना दिया.” मां ने लाड़ जताते हुए कहा, “खा ले बेटा, अमेरिका में तुझे ये सब कहां मिलता होगा.” तभी नेहा बोली, “दीदी, मेरी सहेली बता रही थी कि अमेरिका में रोटियां भी पैक्ड मिलती हैं. बस, घर लाओ, गर्म करो और खा लो. वाह! क्या ऐश है.” नेहा के बोलने के अंदाज़ पर सब हंस पड़े.

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सौम्या को अपनी अमेरिका की डायनिंग टेबल याद आ गई. दीपक ने उसे बताया था कि साधारण-सा खाना भी अमेरिका में काफ़ी महंगा पड़ता है. वे कहीं भी जाते या ख़र्च करते, तो दीपक भारतीय मुद्रा (रुपए) में उसका मूल्य निकालकर सौम्या को ज़रूर बताते. शुरू-शुरू में उसे ये सब जानकारी बढ़ानेवाला लगा, पर बाद में उसे को़फ़्त-सी होने लगी. वह कुछ भी अपनी पसंद का ले आती, तो दीपक उसे फिज़ूलख़र्ची पर अच्छा-ख़ासा भाषण दे डालते. वह दीपक को भी ग़लत नहीं कह सकती. अपने पूरे परिवार में दीपक ही एकमात्र विदेश में हैं. उनकी आय का एक बड़ा हिस्सा, तो मुंबई में लिए बंगले का लोन चुकाने में चला जाता है. छोटे भाई की पढ़ाई का ख़र्च, चचेरी-ममेरी बहनों की फ़रमाइशें, सभी को पूरा करना दीपक अपना फ़र्ज़ समझते हैं.

रोज़ किसी न किसी बहाने से सौम्या को सुनने को मिल जाता था कि वह विदेश में घूमने-फिरने, मौज-मस्ती करने नहीं आए हैं. उनके माता-पिता ने उन्हें पढ़ा-लिखाकर विदेश भेजने के लिए बहुत मेहनत की है. अतः अब उनका फ़र्ज़ बनता है कि वे सभी का ख़याल रखें. सौम्या मन ही मन सोचती कि वह और उसके माता-पिता कुछ नहीं? क्या उनके कोई ख़्वाब नहीं हैं?

नाश्ते के बाद सौम्या अपने कमरे में आ गई और पुरानी यादों में खो गई. उसे वह दिन याद आ गया, जब उसने बारहवीं में 92% नंबर प्राप्त किए थे और वह मेडिकल में दाख़िला लेना चाहती थी. पापा ने उसे प्यार से अपने पास बैठाकर समझाया था कि मेडिकल में दाख़िला लेने की ज़िद्द वह छोड़ दे, क्योंकि अपनी ईमानदारी की नौकरी में वह उसके नाम आठ-दस लाख रुपया ही जमा कर पाए हैं. यदि वह उन रुपयों को उसकी पढ़ाई में लगा देंगे, तो उसका विवाह किसी अच्छे घर में धूमधाम से कैसे कर पाएंगे और फिर नेहा और सौरभ भी तो हैं.

पापा बड़े प्यार से बोले थे, “तेरे रूप और गुण पर ही अच्छा परिवार फ़िदा हो जाएगा, इसलिए तू बी.एससी. में दाख़िला ले ले.” सौम्या ने ख़ुशी-ख़ुशी बी.एससी. में दाख़िला ले लिया और अच्छे परिवार की बहू बनने का सपना देखने लगी. फ़ाइनल इयर में आते ही उसका रिश्ता दीपक से तय हो गया. लड़के की विदेश में नौकरी, मुंबई में अपना बड़ा आलीशान बंगला, छोटा परिवार और क्या चाहिए था. सहेलियां उसके भाग्य को सराह रही थीं और वह स्वयं आकाश में उड़ रही थी. पर आज वह सोच रही थी कि क्या उसका निर्णय सही था?

सौम्या के भारत आने से क़रीब एक महीने पहले की बात है. उसने दीपक के आर्थिक बोझ और अपनी दिनभर की बोरियत से बचने के लिए दीपक से कहा कि वह उसके लिए भी कोई नौकरी की तलाश करे तो दीपक पहले तो चौंके फिर हंस पड़े, “बी.एससी. पास को भला कौन नौकरी देगा?”

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फिर दीपक गंभीर होकर बोले, “तुम्हें नौकरी की क्या ज़रूरत है? मैं इतना तो कमा ही लेता हूं कि हमारा गुज़ारा हो जाए. फिर 1-2 साल में बच्चा हो जाएगा, उसकी और घर की देखभाल कौन करेगा?” दीपक ने लगभग ऐलान करते हुए कहा, “मैं अपने बच्चे की परवरिश में कोई कमी नहीं करना चाहता. इसीलिए तो मैंने एक साधारण, घरेलू लड़की से शादी की है. मेरे लिए तो एक से बढ़कर एक प्रो़फेशनल लड़कियों के रिश्ते आए थे. मैंने सोचा था कि न होगा बांस और न बजेगी बांसुरी.” दीपक के शब्द उसके कानों में गर्म सीसे की तरह उतरते चले गए. इसका मतलब दीपक उसके रूप और गुण पर फ़िदा नहीं हुए थे. उन्हें चाहिए थी, बस एक घरेलू लड़की, जो उनके घर और बच्चे की देखभाल कर सके. उस दिन से सौम्या मन ही मन छटपटाती रहती. उसे लगता कि वह ऐसे पिंजरे में कैद हो गई है, जहां से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है.

अपनी सहेलियों की खिलखिलाहट से सौम्या वर्तमान में लौट आयी. सौम्या की सारी सहेलियां उससे मिलने आयी थीं और सौम्या भी उनसे अपने मन की बातें करने को आतुर थी. लेकिन थोड़ी देर बाद ही सौम्या को महसूस हुआ कि उसकी सहेलियां उसके बारे में कम, अमेरिका के बारे में, वहां के रहन-सहन के विषय में जानने को ज़्यादा उत्सुक हैं. सौम्या के मन में बार-बार यह विचार आ रहा था कि हम भारतीय विदेश के प्रति इतने आकर्षित क्यों हैं? विदेश में यदि आय अच्छी है, तो ख़र्चे भी उसी हिसाब से होते हैं. ये किस छलावे में जी रहे हैं हम? जब उसकी सहेलियां उसके भाग्य को सराह रही थीं तो वह उन्हें समझाना चाहती थी कि मुझ से ज़्यादा ख़ुशनसीब तुम लोग हो, जो अपने देश में अपनों के बीच रहकर ज़िंदगी जीने का मज़ा लूट रही हो. लेकिन इस भ्रम को तोड़ना आसान नहीं था, इसलिए वह चुपचाप मुस्कुराती रही.

सहेलियों को विदा करने के बाद जब सौम्या कमरे में आयी, तो देखा मां, पिताजी और नेहा किसी गंभीर विषय पर बातचीत में मग्न हैं. उसे देखते ही पिताजी बोल पड़े, “आ गई मेरी बिटिया, अब तू ही नेहा को समझा. मेरी बात तो इसे समझ ही नहीं आ रही. इंजीनियरिंग में दाख़िला लेने की ज़िद्द कर रही है. यदि इतने पैसे इसकी पढ़ाई में लगा दिए तो इसकी शादी के लिए पैसे कहां से लाऊंगा?” सौम्या कुछ क्षण चुप रही. फिर हिम्मत जुटाकर बोली, “नहीं पिताजी, नेहा से उसके सपने मत छीनिए. पैसा उसकी पढ़ाई में लगाइए. यदि नेहा किसी क़ाबिल बन गई, तो आपको उसकी शादी की चिंता नहीं करनी पड़ेगी, वह अपनी क़ाबीलियत के बल पर अपने लिए वर तलाश कर लेगी. मत काटिए नेहा के पंख. उड़ लेने दीजिए उसे खुले आसमान में.” पिताजी अवाक् से सौम्या का मुंह देख रहे थे, उसके मन की व्यथा को पढ़ने की कोशिश कर रहे थे. नेहा दौड़कर सौम्या के गले लग गई. “मेरी प्यारी दीदी, आप कितनी अच्छी हो.”

सौम्या आज बहुत हल्का महसूस कर रही थी और उसे पूरा विश्‍वास था कि उसके जीवन से प्रेरणा लेकर स़िर्फ एक नेहा को ही नहीं, वरन् अनेक नेहाओं को सही दिशा मिलेगी. वे विदेश के आकर्षण व मोहजाल से निकल सकेंगी, जो एक छलावे से कम नहीं.

Ritu Dadu

      रीतू दादू

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कहानी- फ्रेम-दर-फ्रेम ज़िंदगी (Short Story- Frame-Dar-Frame Zindagi)

जिस महिला ने हमेशा से ख़ुद को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रखा हो, लोगों के कहने के बाद भी जिसने नौकरी करते रहने को वरीयता दी हो. उसके ख़ुद ही नौकरी छोड़ने का निर्णय नितांत निजी है. पर लोग…? वो तो फिर मुझे फ्रेम में बांधने लगे.

Hindi Short Story

डियर डायरी,

हर बात कहती हूं तुमसे, हर रोज़. बावजूद इसके कुछ न कुछ छूट ही जाता है. आज बिल्कुल अकेली हूं घर पर. निशांत 15 दिनों के टूर पर गए हैं. कीर्ति हॉस्टल में है. मां-पापाजी वापस लौट गए हैं, हर वर्ष की तरह तीन महीने हमारे साथ रहने के बाद. और जानती हो, आज एक बड़ी अलग-सी अनुभूति हुई है. वही बांट रही हूं तुमसे. बात शायद लंबी चले आज. देखो ना, हाथ में बैनर लेकर जीवन से इस बात पर मैंने लड़ाई कभी की ही नहीं कि मैं स्त्री हूं या मुझे कुछ कम मिला है, क्योंकि नारी होने के बेजा स्वांग की सच पूछो तो कभी ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई. हां, नारी होने के सुख को हमेशा, हर चीज़ पर भारी पाया है मैंने. जो भी सीखा अपने अनुभवों से सीखा, प्रयास से सीखा. तुमसे साझा कर-करके सीखा और कभी भी, कहीं भी ख़ुद को कमतर नहीं पाया. इस बात से बहुत ख़ुश भी हूं मैं. बस, आज मलाल हो रहा है, तो इस बात का कि यह ख़्याल पहले क्यों नहीं आया? वरना जीवन थोड़ा और आसान, थोड़ा और आज़ाद-सा हो जाता. थोड़ा बोझमुक्त और बहुत सरल हो जाता.

तुम्हें याद है? जब मैं बड़ी हो रही थी, कुछ 12 बरस से बड़ी रही होऊंगी, पर 13 की नहीं हुई थी. पीरियड्स आना शुरू ही हुए थे. तब रमा चाची ने कहा था मां से, “अब टुन्नो बड़ी हो रही है भाभीजी. हम छोटे शहर में रहते हैं, अब आप इसे फ्रॉक-व्रॉक पहनाना बंद कीजिए. अब तो सूट ही पहनना चाहिए इसे.” और मां ने अगले ही हफ़्ते तक ताईजी की बेटी चंदा दीदी के दो-तीन सूट घर पर ही मेरी फिटिंग के कर दिए और मुझसे उन्हें पहनने को कह दिया. मुझे कोई समस्या तो नहीं हुई, ना ही मैंने इसका विरोध किया. मुझे तो यह बड़े होने जैसी फीलिंग दे रहा था, क्योंकि घर की सभी बड़ी लड़कियों को सूट पहनते ही देखा था. यूं देखा जाए, तो मैं ख़ुश ही थी. हां, थोड़ी असुविधा ज़रूर हुई थी, दुपट्टा संभालते हुए साइकल चलाने में. कभी-कभी दुपट्टे साइकल में फंस जाते थे. मेरा तो नहीं फंसा, पर अर्चना का फंस नहीं गया था? जब मैं उसे अपनी साइकल के कैरियर पर बिठाकर स्कूल जा रही थी. ऐसी गिरी वो साइकल से कि माथा और घुटने छिल गए थे बुरी तरह. कमर में चोट आई सो अलग. आज सोचती हूं तो लगता है, रमा चाची ने आख़िर ऐसी सलाह मां को क्यों दी? उनकी तो ख़ुद भी एक लड़की थी और मां ने उनकी सलाह को क्यों माना? और तो और, मैंने ही क्यों माना? फ्रॉक्स बुरी तो नहीं होतीं? यह पहली थी… क़स्बे की लड़कीवाली फ्रेम.

फिर जब मैं कॉलेज में थी. को-एड कॉलेज था. हम लड़के-लड़कियां आपस में हर विषय पर बहस कर लिया करते थे. साथ-साथ आते-जाते भी थे. कभी-कभी जब सहपाठी लड़के बाज़ार में टकरा जाते थे, तो मैंने कभी उनसे बात करने में कोई झिझक महसूस नहीं की. एक बार यूं ही घर का सामान लेने गई थी और रास्ते में मनोज मिल गया. हम दोनों केमिस्ट्री के नोट्स को लेकर बात करते रहे और बातें कॉलेज की कई और बातों को जोड़ती गईं.

क़रीब-क़रीब घंटाभर सड़क के किनारे अपनी-अपनी स्कूटी को रोककर हम बतियाते रहे. फिर सामान लेकर मैं घर लौट आई. देर शाम को मां कमरे में आईं और पूछा कि मैं रास्ते में आज किससे बात कर रही थी? मैंने उन्हें बताया मनोज मिल गया था, पर ये भी पूछा कि आपसे किसने कहा इस बारे में? तो उन्होंने बताया कि पापा के एक कलीग ने मुझे सड़क पर उससे बात करते देखा, तो पापा से आकर कह गए कि आपकी बेटी एक लड़के से भरी सड़क पर गप्प लड़ा रही थी. पापा घर लौटे, तो उन्होंने मां से इसके बारे में पूछा, इसलिए वे पूछ रही हैं. मेरे जवाब से संतुष्ट मां चली तो गईं, लेकिन दूसरे दिन बातों-बातों में ये संदेश ज़रूर दे दिया कि बेटा, इस तरह सरेराह लड़कों से बात न किया करो. मैंने मां से कहा भी कि मां छुप-छुपकर तो नहीं मिले ना? और रास्ते में मिलने पर पढ़ाई की, कॉलेज की बात ही तो कर रहे थे और वो भी सरेआम? इसमें किसी को क्या दिक़्क़त होनी चाहिए? मां की सूरत थोड़ी उतर गई और मैं चाहते, न चाहते हुए भी बहुत कुछ समझ गई. ये दूसरी थी… छोटे शहर की युवतीवाली फ्रेम.

मैं हमेशा से अच्छी तरह जानती थी कि यूं देखा जाए, तो मैं औसत लुक्सवाली युवती थी, पर आत्मविश्‍वास मेरे व्यक्तित्व को हमेशा से ही कइयों से आगे ला खड़ा करता था. फिर भी कई बार जब-जब, किसी के द्वारा किसी अजीब-सी नई फ्रेम में जड़ी जाती थी मैं, पुरज़ोर विरोध नहीं कर पाती थी. एक बात रोकती थी शायद कि लोग… दूसरे लोग मुझे अच्छा नहीं कहेंगे और शायद तब समझ ही नहीं पाती थी कि फ्रेम में जड़ी जा रही हूं, तो कहती कैसे कि मुझे ऐसी फ्रेम में मत जड़ो, जिसमें मैं पूरी तरह समा ही नहीं सकती, क्योंकि मेरे स्वाभाविक व्यक्तित्व के तो कई आयाम हैं. उन्हें, उन सब को भला किस तरह फ्रेम में ़कैद किया जा सकता है? इसके लिए तो तुम्हें अनगिनत फ्रेम्स लानी होंगी, पर फिर भी कई-कई बातों में कई-कई लोगों ने कई-कई फ्रेम्स में जड़ना चाहा मेरे व्यक्तित्व को. यही सारी बातें तीसरी फ्रेम थीं जैसे… एक बड़ीवाली फ्रेम… एक बड़ी अच्छी लड़कीवाली फ्रेम.

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और वो याद है? शादी की बात चली तो निशांत के पिता के कहने पर निशांत ही हम सबसे मिलने आए थे. तब मैंने नौकरी शुरू की ही थी. एक छोटी-सी फर्म में कमर्शियल मैनेजर की. निशांत से बातचीत हुई, तो उनके सादे-से व्यक्तित्व ने मुझे बहुत प्रभावित किया था. उन्होंने कहा था कि वो चाहते हैं कि महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी हों, जब इतना पढ़ा है तो अपनी शिक्षा का उपयोग करें. बस, इसी बात ने तो जैसे मुझे मेरा आकाश दे दिया था. मैंने तो मन बना ही लिया था कि यदि यहां से ‘हां’ हुई, तो मैं ज़रूर अपनी हामी दे दूंगी. जब निशांत के घरवाले मुझे देखने आए थे, तब उनकी मां ने कहा था, “नौकरी तो ठीक है, पर घर को निभाना पहली ज़िम्मेदारी होना चाहिए. घर को इग्नोर करके नौकरी करना तो किसी गृहिणी को शोभा नहीं देता.” तो उनकी बात जैसे सही ही लगी थी. तब तो एहसास नहीं हुआ था, पर आज लगता है ये चौथी फ्रेम थी… अच्छी बहूवाली फ्रेम.

और डायरी, वो भला तुम कैसे भूल सकती हो? मैंने उसे सबसे पहले तो तुमसे ही साझा किया था न? वो हमारी शादी के बाद का मीठा-नमकीन-सा समय? शादी के बाद के प्यार का, पहले प्यार के ख़ुमार का. बड़े से महानगर में हम दोनों का साथ-साथ लगभग भागते हुए ऑफिस के लिए निकलना. शाम घर लौटना. रात के खाने के बाद लंबी-सी वॉक पर जाना और फिर एक-दूसरे की आगोश में सब कुछ भूलकर यूं सो जाना, जैसे दुनिया में हमें इससे ज़्यादा की तो कोई ज़रूरत ही नहीं है. इस बीच भी रिश्तेदारों के घर आने पर उनका हमारे वर्किंग कपल होने की तारीफ़ करने के साथ-साथ यह कहने से भी न चूकना कि यदि तुम काम न कर रही होतीं, तो घर को और ख़ूबसूरत तरी़के से रखा जा सकता था. ये पांचवीं फ्रेम थी… सुघड़ गृहिणीवाली फ्रेम.

फिर जब जॉब के दौरान मैं अपने कलीग्स से बात करती हुई बताती कि मैं अपने घर पर ख़ुद खाना पकाती हूं, कोई मेड नहीं लगा रखी है, तो उनका तपाक से यह कहना कि खाना तो बहुत अच्छा बना है, पर जब तुम दोनों कमा रहे हो, तो मेड क्यों नहीं रख लेते? एक्चुअली, छोटे शहरों में महिलाएं नौकरी के साथ खाना घर पर बना लेती हैं, पर हम तो खाना बनाना ही नहीं जानते और जब इतना कमाते हैं, तो मेड ही क्यों न लगाएं? फिर वीकएंड तो बाहर खाना खाने के लिए ही होते हैं? ये बातें बता रही थीं कि मैं छोटे शहर से आई महिला हूं और बड़े शहर की कामकाजी औरतों में शामिल होने के लिए ये थी छठवीं फ्रेम… शहर की स्मार्ट कामकाजी महिलावाली फ्रेम.

फिर कीर्ति के मेरे जीवन में आने का वो ख़ुशनुमा वक़्त. जब डिलीवरी के लिए ससुराल गई, तो बिल्कुल अनाड़ी थी. पहले बच्चे के दौरान कौन-सी महिला अनाड़ी नहीं होती? पहली बार मां बनती है, पहली बार बच्चा संभालती है और पहली बार उस अनुभव से गुज़रती है, जिसे हमेशा दिव्य करार दिया जाता है. अपने आप में दिव्य है भी मां बनने का अनुभव, पर डायरी, ये भी एक फ्रेम में बांध दिए जाने जैसा अनुभव ही है. अच्छी बातें सब बताते हैं, पर यह कोई नहीं बताता कि बचपन से अब तक जिस तरह ढांप-ओढ़कर मर्यादा में रहना सिखाया जाता है, डिलीवरी के वक़्त डॉक्टर, एनेस्थिसिस्ट और नर्स के आगे आप निपट नंगे हो जाते हो, बिल्कुल नंग-धड़ंग. दर्द में डूबे और असहाय. हां, अपने ही शरीर से निकले एक नन्हे शिशु के लिए यह सब सहना, उसके हमारी गोद में आते ही बहुत कमतर या छोटी-सी घटना जैसा लगता है. पर ये भी एक सच तो है ना? इसके बारे में कुछ न बताकर फिर आपको एक अच्छी मां के फ्रेम में बांध दिया जाता है. बात तो इसके आगे की भी है. डायरी! स्तनपान को यूं तो बड़ा ग्लोरिफाई करके दिखाया जाता है और एक बच्चे के लिए यह आवश्यक भी है. कीर्ति को भी तो मैंने ब्रेस्टफीड कराया ना? वो भी उसके दो साल के होने तक. पर बहुत से हार्मोनल बदलावों से गुज़र रही नई-नई मां को अपने शिशु को स्तनपान कराने के लिए शुरुआत में कितनी गहन पीड़ा से गुज़रना पड़ता है? इसका ज़िक्र कोई नहीं करता, क्यों? और ऐसी अस्त-व्यस्त-सी स्थिति में आपकी साड़ी, दुपट्टा अपनी जगह से हट जाए, तो आने-जानेवाली महिलाएं आपके दर्द को, आपकी रात की पूरी न हुई नींदों को अनदेखा करते हुए यह बताने से नहीं चूकतीं कि भले ही नई मां बनी हो तो क्या, शउर से रहना तो सीखो. ये सातवीं फ्रेम है… चुस्त-दुरुस्त मां वाली फ्रेम.

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जानती हो डायरी, ये फ्रेम्स जैसे ख़त्म ही नहीं होतीं, जिनमें हर महिला को बांध दिया जाता है या बांधने का प्रयास किया जाता है, बड़े हौले-से. और इनके शीशों में उतरने लगता है उसका व्यक्तित्व. कब? उसे भी पता ही नहीं चलता. याद है? जब कीर्ति दो-तीन साल की हुई थी. इन तीन वर्षों तक तो मुझे वर्क फ्रॉम होम दे ही दिया था कंपनी ने. मैं रोज़ाना कीर्ति को नीचे लेकर जाती थी शाम को, दूसरे बच्चों के साथ खिलाने, वहां अमूमन होममेकर्स ही मिलती थीं, अपने बच्चों के साथ. कामकाजी महिलाओं के बच्चे तो उनके दादा-दादी, नाना-नानी या मेड्स के साथ ही नीचे आते थे. एक दिन मैं कुछ बच्चों की मांओं के साथ बात कर रही थी कि अचानक कीर्ति कहीं नज़र नहीं आई. मैं उसे ढूंढ़ने गई, तो पाया कि वो थोड़ी ही दूर पर कुछ दूसरे बच्चों के साथ खेल रही है. वह मेरे साथ आने को तैयार नहीं हुई, तो मैंने वहां खड़ी एक मेड से कीर्ति का ध्यान रखने को कहा और उन महिलाओं का रुख किया, जिनसे मैं बात कर रही थी. वे मुझे आते देख नहीं सकीं और उनकी बातें मुझे सहज सुनाई दे गईं. उनमें से एक महिला दूसरी से पूछ रही थी, “क्या वाकई कीर्ति की मां कुछ काम करती है?” तो दूसरी महिला ने कहा, “कहती तो है, पर सच-झूठ ईश्‍वर जाने.” तीसरी बोली, “जिस तरह अकड़ती है, लगता है काम करती ही होगी.” चौथी ने कहा, “यदि कामकाजी होती, तो हम होममेकर्स के ग्रुप में आकर बात थोड़े ही करती?” मैं उल्टे पांव कीर्ति के पास लौट गई, क्योंकि फिर एक फ्रेम में बांधी जा रही थी… होममेकर/कामकाजीवाली फ्रेम.

फिर जब मैंने कीर्ति को समझा-बुझाकर क्रैश में रहने को राज़ी किया और फुलटाइम काम पर जाने की शुरुआत की, तो मैं, तुम और निशांत ही जानते हैं डायरी कि पहले के 15 दिनों तक वह मेरे लिए क्रैश के अंदर रोती थी और मैं उसके लिए उतनी ही देर क्रैश के बाहर ज़ार-ज़ार रोती थी. उसके चुप होने पर वह भली-सी क्रैश ओनर मुझे बाहर आकर इशारा कर देती थी कि वह चुप हो गई है और मैं मुरझाया-सा मुंह लेकर घर लौट पड़ती थी. कभी-कभी तो क्रैश ओनर कहती थी कि मुझे बहुत गिल्ट होता है. अंदर कीर्ति रोती है और बाहर आप. कीर्ति को मैं संभाल लूंगी, क्योंकि बच्चों को बहलाना आता है मुझे, पर आपका रोना मैं बर्दाश्त नहीं कर पाती. फिर कीर्ति को क्रैश की आदत लगाकर जैसे ही पहले दिन ऑफिस पहुंची, तो सबसे क्लोज़ कलीग ने ही एक और फ्रेम में बांध दिया. उसने कहा, “अरे, तुमने जॉइन कर लिया, इतनी छोटी-सी बच्ची को छोड़कर?” ये बड़ी निर्दयी फ्रेम थी… एक निर्मोही मां वाली फ्रेम.

और तुम तो जानती हो डायरी, मैं और निशांत एक ही बच्चा चाहते थे. आख़िर ये हमारा ़फैसला था. कीर्ति के इस दुनिया में आने से पहले ही निशांत ने मुझसे कह दिया था, “हमारा आनेवाला बच्चा बेटा हो या बेटी, पर होगा इकलौता ही.” मेरे क्यों? पूछने पर उन्होंने कहा था, “मैं इतना निष्ठुर नहीं हो सकता कि तुम्हें दोबारा लेबर पेन से गुज़रने दूं.” उनका जवाब सुनकर मेरी आंखें भर आई थीं. डायरी, और मैं कसकर लिपट गई थी उनसे. फिर हम पर घर-परिवार, रिश्तेदारों और कलीग्स का दबाव-सा आने लगा. जैसे वही हमारे दूसरे बच्चे को पालेंगे. आश्‍चर्य की बात है डायरी, जब घर-परिवार और रिश्तेदारों से मिलो, तो वे इकलौते बच्चे के बिगड़ने के संदेहों से घिरे और जब कलीग्स से मिलो, तो वे डबल इनकम सिंगल किड के तमगे से नवाज़ते हुए फिर बांधने लगे अलग-अलग फ्रेम्स में. पर इस बार की फ्रेम्स में मैं अकेली नहीं थी, निशांत भी थे. मैंने देखा इस बार फ्रेम में जड़े जाने को लेकर मैं हर बार की तरह सोच में डूबी थी, पर निशांत… उन्होंने ऐसी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. शायद इस फ्रेम का कोई दबाव महसूस नहीं किया उन्होंने, क्योंकि शायद वे पुरुष हैं, क्योंकि पुरुषों की कंडीशनिंग अलग तरह की होती है और शायद पहली बार उन्हें कोई किसी तरह की फ्रेम में जड़ने की कोशिश कर रहा था, तो जैसा कि मेरे साथ भी पहली बार हुआ था कि मैंने बिना कुछ महसूस किए सलवार-सूट सहजता से पहन लिया था, वही उनके साथ हुआ. उन्होंने सलवार-सूट पहनने की यानी दूसरा बच्चा करने की हामी तो नहीं भरी, पर सहज बने रहे.

फिर मेरे सामान्य, सहज ढंग से रहने, ज्वेलरी को नापसंद करने, ब्रैंडेड कपड़ों को ख़ास तवज्जो न देने पर मेरे अपने ही क़रीबी रिश्तेदारों का ये कहना कि आप कामकाजी हो, पर कामकाजी लगती तो नहीं हो. एक अलग तरह की फ्रेम थी. और इसी तरह पार्टीज़ में ज़्यादा दिलचस्पी न लेने को देखते हुए कलीग्स ने भी मुझे एक और फ्रेम में जड़ दिया… नीरस महिलावाली फ्रेम. ऐसे ही सास-ससुर के घर आने पर अपनी मर्ज़ी से कुछ महीनों के लिए ऑफिस में सलवार-कमीज़ पहनकर जाने को कलीग्स ने पू बनी पार्वती और आ गईं बहनजीवाली फ्रेम में जड़ दिया.

इस बीच 10 वर्ष तक नौकरी की और अपनी मेहनत से प्रमोशन भी बटोरती गई मैं. लोगों ने इस बीच भी कई फ्रेम्स में जड़ा, जैसे- बुरी बॉस फ्रेम, किस्मतवाली फ्रेम, चाटुकार महिला फ्रेम वगैरह… पर इन्हें इग्नोर करती रही मैं. देखो न डायरी, इन सभी फ्रेम्स को इग्नोर भले ही किया हो, पर मन के किसी कोने में आज भी ये मौजूद हैं, मतलब इनसे अप्रभावित तो नहीं रही न मैं? यही बताना चाहती हूं तुम्हें कि लोगों की अपेक्षाओं पर कान देती, उनके मुताबिक फ्रेम्स में ढलने की कोशिश करती मैं. मैं तो रह ही नहीं पाई, आज लगता है ये.

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तुम कह सकती हो डायरी कि मैं बहुत ज़्यादा संवेदनशील हूं, पर मुझे पता है तुम नहीं कहोगी. तुम तो मेरी अपनी हो ना? तुम मुझे किसी फ्रेम में भला क्यों जड़ोगी? इन सभी बातों से क़तरा-क़तरा मेरा व्यक्तित्व बना है और तुमसे बेहतर कौन जानता है यह? अब आगे की सुनो, तुम्हें याद तो होगा ही कि अभी कीर्ति टीनएज में आने भी न पाई थी कि उसे लेकर मुझे हर ओर से यह सुनाई देने लगा था… लड़की है, बड़ी हो रही है, अकेली बेटी है, बच्चियों को संभालने की उम्र है, एक ही तो बच्ची है, तुम्हें क्या ज़रूरत है इतना कमाने की, नौकरी करने की. इन आरोपों में लापरवाह मां, लालची मां की फ्रेम में जड़ी जा रही थी मैं.

सबसे अच्छी बात यह रही कि निशांत ने कभी मुझे किसी फ्रेम में नहीं जड़ा. बस, यहीं आकर ईश्‍वर की कृतज्ञ रही हूं हमेशा. उम्र बढ़ रही थी, थकान बढ़ रही थी, एक ही जगह काम करते हुए मोनोटोनी बढ़ रही थी और मां हूं, तो कहीं न कहीं इस बात का पूरा इल्म था कि अब कीर्ति बड़ी क्लास में आ रही है. उसे पढ़ने के लिए तो नहीं, पर पढ़ाई के दबाव से जूझने के लिए अपने आसपास मेरी उपस्थिति की दरकार है. अचानक एक दिन मैंने निशांत से कहा, “मैं नौकरी छोड़ना चाहती हूं.” उन्होंने मेरी बातों को सुना, मेरी बातों के वज़न को तौला और कहा, “जैसा तुम चाहो.”

जिस महिला ने हमेशा से ख़ुद को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रखा हो, लोगों के कहने के बाद भी जिसने नौकरी करते रहने को वरीयता दी हो, उसके ख़ुद ही नौकरी छोड़ने का निर्णय नितांत निजी है. पर लोग…? वो तो फिर मुझे फ्रेम में बांधने लगे. अरे, इतने साल नौकरी की है, अब घर कैसे बैठ पाओगी? थोड़े दिन अच्छा लगेगा, इसके बाद पछताओगी. और यहां मुझ पर मढ़ी जा रही थी… ग़लत निर्णय लेनेवाली महिला की फ्रेम.

नौकरी छोड़ने के बाद थोड़ा खालीपन लाज़मी था. इसी खालीपन के बीच ही तो ये सोच नमूदार हो गई. इन सारी बातों को सोचते हुए आज लगा कि मैं इन फ्रेम्स में बंधते-बंधते, फ्रेम-दर-फ्रेम ज़िंदगी जीते-जीते अपने वास्तविक व्यक्तित्व से परे चूं-चूं का मुरब्बा हो चली थी. बहुत-सी फ्रेम्स में बंद चूं-चूं का मुरब्बा. आज सोच लिया है कि अब इन फ्रेम्स से आज़ाद होना है. इस तरह कि अब कभी इनमें कोई भी मुझे जड़ न पाए. और जानती हो डायरी, सबसे मज़ेदार बात क्या है? घर में मौजूद सारे फ्रेम्स को मैंने उठाकर स्टोर में उस जगह रख दिया है, जहां हर माह कबाड़ी को देने के लिए चीज़ें इकट्ठा करती हूं, क्योंकि अब मुझे ये फ्रेम्स कहीं नहीं चाहिए. न दिल में, न दिमाग़ में और ना ही घर में. मैं ख़ुद के और दूसरी महिलाओं के लिए अनंत आकाश चाहती हूं और बस चले तो मैं दुनिया की हर महिला के दिल में बसी ऐसी फ्रेम्स को निकालकर फेंक दूं… आज, अभी और इसी वक़्त. सच! नए आकाश का पंछी तुम्हारी उन्मुक्त-सी शिखा.

 

Shilpa Sharma

शिल्पा शर्मा

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कहानी- आत्मविश्‍वास (Short Story- Atmavishwas)

वहां जाकर उसे पता चला कि वह कुछ लोगों के मुक़ाबले कितनी अच्छी स्थिति में थी. वे औरतें जो जीती-जागती लाशें थीं, निराशा और अवसाद की दलदल में प्रायः डूब ही चुकी थी. तिरस्कृत, बलात्कृत, अवहेलित, बहिष्कृत नारी प्रतिमाएं, संवेदनाहीन, अनुभूति शून्य, उन्हें सहारे की आवश्यकता थी. अकल्पनीय भीषण हादसों का सामना करके पत्थर हो गई थीं वे.

उन्हें देखकर शालिनी जैसे अट्ठाइस बरस की नींद से जाग उठी. उसे महसूस हुआ कि वह यह काम कर सकती है, क्योंकि उनके दुखों की भाषा उसके लिए भी अजनबी नहीं है. ज़ख़्म उनके जैसे गहरे नहीं हैं तो क्या, कांटों की वेदना तो उसने भी अनुभव की है.

Short Story in Hindi

 

“मैं जा रहा हूं. दरवाज़ा बंद कर लेना. अब उठोगी भी कि टुकुर-टुकुर देखती रहोगी.”

शालिनी ने उठकर दरवाज़ा बंद कर लिया. इस तरह के अपमान के घूंट पीने की वह आदी हो गई थी. अब ठीक दस मिनट बाद सामनेवाले घर से शिखाजी निकलेंगी. उन्हें निकलते देखने का मोह वो संवरण नहीं कर पाती. शालिनी ने खिड़की के परदे को ज़रा-सा सरकाया और आंखें सामनेवाले घर पर गड़ा दीं.

क़लफ़वाली कॉटन साड़ी, सौम्य मेकअप, अनुभवी मुखमुद्रा, कंधे पर टंगी पर्स ओझल हो जाती, तो अनायास ही शालिनी कमर में खोंसे पल्लू को मुक्त करके चेहरे का पसीना रगड़-रगड़कर पोंछती.

ये लोग कॉलोनी में नए आए हैं. उस दिन परिचय के लिए घर आए थे. बड़ी असहज हो गई थी शालिनी.

“मैं शिखा गुप्ता.” उस महिला ने शिष्टता से उसे नमस्कार करते हुए पूछा “आपका नाम?” “जी, मैं शालिनी शर्मा.” शालिनी ने अचकचाकर जवाब दिया. बुद्धू, बेवकूफ़, गंवार, मूर्ख, घर में नित्य सुने जाने वाले विभिन्न नामों के कारण अपना असली नाम याद करने में उसे ख़ासी मश़क़्क़त करनी पड़ी.

“शालिनी… शालू मेरी छोटी बहन. हां, अपनी बहन को मैं इसी नाम से बुलाती हूं. तुम्हें मंज़ूर है?”

“जी…” शालिनी बुरी तरह हकला गई. इतने स्नेह से उसे किसी ने कभी बुलाया हो, याद नहीं पड़ता. वह अपलक उसे यूं ताकती रह गई जैसे उस जैसी अयोग्य महिला पर किसी ने आश्‍चर्यजनक रूप से कृपादान किया हो.

शिखाजी हंसमुख और मिलनसार थीं, पर व्यक्तित्व में ज़मीन-आसमान का अंतर शालिनी को उनसे दूर कर देता. फलतः परिचय यहीं तक सीमित रह गया.

शाम को वही उबाऊ क्रम. योगेशजी का ऑफ़िस से आगमन. शालिनी द्वारा चाय-नाश्ता पेश किया जाना, पति का उसमें ढेरों नुक्स निकालना, शालिनी के गंवार पहनावे पर उबलना, शालिनी का गरदन झुका लेना, स्वयं को कोसना, फिर खाना, फिर मीन-मेख और फिर जानलेवा रात.

शालिनी को परे धकेल दिया जाता. जिस तरह डिस्पोज़ेबल कप को इस्तेमाल के बाद तोड़-मरोड़कर फेंका जाता है. शरीर का पोर-पोर टीसने लगता, पर विरोध करना जैसे उसने सीखा ही नहीं था.

जब से ब्याहकर इस घर में आई, अपने लिए यह सुनती रही, “मुंह में ज़ुबान ही नहीं है. बिल्कुल गऊ है.

एक आदर्श बहू के लिए इससे बड़ा कॉम्प्लीमेंट क्या हो सकता है. चार भाई-बहनों में दूसरे क्रमांक की शालिनी को अपने भाई-बहनों से युक्तिपूर्ण और तार्किक संवाद करना तो अच्छी तरह आता था, पर माता-पिता ने बुज़ुर्गों के सामने कम बोलने के संस्कार दिए थे, जिन्हें वह अच्छी तरह निबाह रही थी.

सास की दुलारी बहू पति की आंख की किरकिरी बनी रही. उसकी एक-एक बात उन्हें काट खाने दौड़ती. गुण भी अवगुण नज़र आते.

बढ़ती उम्र की बेटियों ने भी मां को कभी सम्मान नहीं दिया. उनकी और योगेश की ख़ूब घुटती थी. उन तीनों में वह कभी शामिल होने की कोशिश करती तो उसे चावल में कंकर-सा निकाल कर अलग कर दिया जाता.

अब ऐसी भी गई- गुज़री नहीं?थी वह. बी.ए. द्वितीय वर्ष पास थी. परंतु इन कृतघ्न लोगों की चाकरी बजाते-बजाते कहीं की नहीं रही. समाचार कान पर पड़ते हैं, सुनती भी है. इतनी अज्ञानी भी नहीं थी कि समझ भी न पाती. बस चर्चा नहीं कर पाती थी. अपने विचारों को प्रकट करना वह भूल ही गई थी. बरसों पहले ज़ुबान बंद हो गई थी तो खुलती कैसे!

उसकी शादी को अभी तीन-चार दिन ही हुए थे. पति के मित्र ने उन दोनों को खाने पर बुलाया. कुछ और दंपति भी आमंत्रित थे. घर के बुज़ुर्गों से दूर हमउम्र लोगों में उसे बड़ा खुला-खुला सा लग रहा था. तरह-तरह के विषयों पर चर्चा चल रही थी. वह अधिकार से भाग ले रही थी. अच्छी तरह स्वयं को प्रस्तुत कर रही थी. हंसी-मज़ाक, बातचीत में खाना कब ख़त्म हुआ पता ही नहीं चला.

“बड़े भाग्यशाली हो यार! बड़ी बुद्धिमती पत्नी मिली है.” एक मित्र ने कहा.

योगेश की पीठ पर धौल जमाते हुए दूसरे मित्र ने मज़ाक किया, “बंदर के गले में मोतियों की माला.” ठहाकों के बीच शालिनी ने देखा कि योगेश के चेहरे की रेखाएं खिंचने लगी हैं. बगैर एक शब्द बोले वे दोनों घर आए.

रात को अकेले में उन्होंने शालिनी को एक थप्पड़ रसीद कर दिया. “बहुत खी-खी कर रही थी वहां. एक से जी नहीं भरता?” लगा, जैसे कानों में किसी ने पिघला सीसा डाल दिया हो.

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उस रात का वह अपमान आज भी वह याद करती है, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं. पति का सारा क्रोध उस पर बिजली बनकर टूट पड़ा था. पति-पत्नी के प्रणय की कोमल संवेदनाएं तार-तार हो गई थीं. एक सुंदर अनुभूति को अभिशाप के रूप में झेलने को वह विवश हो गई. पलंग के कोने में गुड़ीमुड़ी पड़ी शालिनी देर तक सिसकती रही. योगेश कब के सो चुके थे.

ज़ुबान तब से लेकर आज तक ख़ामोश है. संवेदनाओं ने बेहोश पड़े रहने में ही खैर समझी थी. मन के विचारों को दस दिशाओं का आकाश देने के बदले उसने उन्हें नियंत्रण के ताले में बंद कर दिया. आत्मा जड़ हो गई थी.

इतने बोझ तले जी सकता है इन्सान? शायद इसीलिए वह एक चेतनाहीन ज़िंदगी जी रही थी.

अपना अस्तित्व शनैःशनैः इसी रूप में उसने स्वीकार कर लिया. स़िर्फ एक ही क्षण उनके स्थिर जीवन में हलचल मचा देता था. सामने से निकलने वाली शिखाजी का दर्शन. ऊर्जा से भरपूर, आनंद से लबरेज़, कल्पना से परे वह नारी व्यक्तित्व.

आज…आज वह उसी के घर की ओर आ रही थी.

‘नमस्ते’ शिखाजी के अभिवादन के प्रत्युत्तर में वह सकुचाकर बोली, “आप तो बड़ी हैं, अभिवादन करके शर्मिंदा मत कीजिए..”

“अच्छा, मैं तुम्हें शालू ही कहूंगी जैसा हमने उस दिन तय किया था.” वह हंसकर बोली, “क्या तुम कभी घर से बाहर नहीं निकलती?”

“ज़रूरत ही नहीं पड़ती. सामान ये ला देते हैं, घर में काम भी बहुत हो जाता है.”

“काम का तो बहाना होता है हम औरतों का! दरअसल हम घर के बाहर निकलना ही नहीं चाहतीं. देखो, तुम्हारी दोनों बेटियों की शादी हो गई. अब घरेलू ज़िम्मेदारियां ख़त्म हो गईं. लेकिन समाज के प्रति भी हमारी ज़िम्मेदारी है या नहीं?”

शालिनी क्या कहती. उस प्रतिभावान गरिमापूर्ण व्यक्तित्व की धनी महिला से उसकी क्या बराबरी? पति के अनुसार तो वह परले दर्ज़े की बेवकूफ़ है, जिसने घरेलू ज़िम्मेदारी भी अच्छी तरह नहीं निभाई, लेकिन वह करती भी क्या? अपने घर की न सही, अपनी रसोई की भी वह रानी होती तो एक बात थी, पर योगेश वहां भी चले आते.

समाज सेवा कहां से होती. घर को अपना नहीं बना सकी, समाज को कैसे बनाती? शिखाजी के प्रस्ताव पर शालिनी मौन ही रही.

ताज्जुब था! ऐसी महिला उसके जैसी नगण्य निहायत घरेलू किस्म की महिला के साथ एकतरफ़ा संबंध बनाए हुए थी.

उस रात बरसों बाद शालिनी ने कोई सपना देखा. उसने देखा, शिखाजी उसका हाथ पकड़े रूई के फाहे जैसे बादलों में सैर करा रही थीं. वह मुक्त थी. निर्द्वंद्व. सिर पर हमेशा लदा रहने वाला हीनता का बोझ न जाने कहां गायब हो गया था.

अगले दिन सुबह ग़लती से उसने चाय में शक्कर ज़्यादा डाल दी. योगेश ने हमेशा की तरह उसे गाली दी. “ज़ाहिल कहीं की! चाय है या चाशनी.”

आज उनकी गाली को वह निर्लिप्त भाव से स्वीकार नहीं कर पा रही थी. अंतर में चिंगारी उठती हुई उसने साफ़ महसूस की. शिखाजी ने उसमें यह कैसा परिवर्तन ला दिया है? जिस मन को मृत समझकर उस पर टनों मिट्टी डाल चुकी थी, उसमें से न जाने कैसे जीवन की धड़कन सुनाई दे रही थी.

उस दिन योगेश घर लौटे तो बड़े चिंतित दिखाई दे रहे थे.

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“क्या हुआ जी?” उसने चाय का प्याला उन्हें पकड़ाते हुए विनम्रता से पूछा. “मुझे ट्रेनिंग के लिए दिल्ली भेजा जा रहा है. दो महीने की ट्रेनिंग है. अब तुम बिल्कुल अकेली यहां कैसे रहोगी?”

शालिनी ख़ुद भी फिक्रमंद हो गई. कभी भी अकेली नहीं रही वह.

“तुम ठहरी परले दर्ज़े की बेवकूफ़! लापरवाही तुम्हारी नस-नस में भरी हुई है. लौटूंगा तो पता नहीं मुझे घर दिखेगा या खंडहर.”

शालिनी क्या जवाब देती! इसका जवाब तो वह ख़ुद भी नहीं जानती थी.

“और हां, बाहर के कामों के लिए एक-दो दोस्तों को बोल दूंगा. वे लोग कर देंगे. ठेलेवाले से सब्ज़ी लेना, पर हिसाब ठीक तरह करना, वरना पकड़ा दोगी उसे सौ का नोट और वापस लेना भूल जाओगी.”

‘जी… जी’ करती रही शालिनी. भीतर ही भीतर वह भी चिंतित हो गई थी. योगेश के जाने के बाद शिखाजी ने उसे हिम्मत बंधाई, फिर उसे डांटकर बोली, “तुम इतना अपमान क्यों सहन करती हो? पत्नी पति को सम्मान देती है, तो पति का भी फ़र्ज़ है कि अपनी पत्नी को सम्मान दे.”

पत्नी को सम्मान? यह कैसी हैरतअंगेज़ बात थी.

“क्या आपके पति आपसे दबते हैं?” शालिनी अटपटा-सा प्रश्‍न पूछ बैठी.

“पागल हो गई हो? हम पति-पत्नी हैं, एक गृहस्थी के बराबर के साझेदार. एक-दूसरे के ग़ुलाम नहीं.”

पति-पत्नी एक-दूसरे के पूरक, साथी मित्र, सहयोगी? ये कैसे अनोखे शब्द हैं. वह तो स़िर्फ इतना जानती है कि पति स्वामी है, तो पत्नी दासी. पति पालनकर्ता है, तो पत्नी पालित. पति आश्रयदाता है, तो पत्नी आश्रित. पति जीवनरस से भरपूर वृक्ष है, तो पत्नी अमरबेल.

शिखाजी हंसकर उसे उलाहना देतीं, “बरसों से घर ही घर में रहकर तुम्हारा दिमाग़ जंग खा गया है. तुम भूल गई हो कि तुम पढ़ी-लिखी हो, सिलाई-बुनाई में माहिर हो, ये गुण कोई कम तो नहीं! कल से तुम मेरे साथ चलोगी.

“कहां?”

“हाफ वे होम, जहां मानसिक रूप से विक्षिप्त महिलाओं को रखा जाता है. ऐसी महिलाएं, जिन्हें उनके परिजन ठीक होने पर भी स्वीकार नहीं करते.”

“लेकिन मैं क्या करूंगी वहां जाकर?’

“तुम उनसे बातें करके उन्हें उनकी अंतर्वेदना से मुक्त करोगी? उन्हें एहसास दिलाओगी कि वे अकेली नहीं हैं. अपना हुनर सिखाओगी. अवसाद के अंधे कुंए

से उन्हें बाहर निकालने की हर संभव कोशिश करोगी.”

“लेकिन मुझे तो यह सब नहीं आता…”

“यह तुम्हारा वहम है, तुमने मुझसे अपनी ज़िंदगी के बारे में विस्तार से बताया तभी तो मुझे पता चला.”

“मुझसे नहीं होगा…”

वह ना-ना करती रही और शिखाजी कब खींचकर उसे ले गईं, उसे स्वयं पता नहीं चला.

वहां जाकर उसे पता चला कि वह कुछ लोगों के मुक़ाबले कितनी अच्छी स्थिति में थी. वे औरतें जो जीती-जागती लाशें थीं, निराशा और अवसाद की दलदल में प्रायः डूब ही चुकी थी. तिरस्कृत, बलात्कृत, अवहेलित, बहिष्कृत नारी प्रतिमाएं, संवेदनाहीन, अनुभूति शून्य, उन्हें सहारे की आवश्यकता थी. अकल्पनीय भीषण हादसों का सामना करके पत्थर हो गई थीं वे.

उन्हें देखकर शालिनी जैसे अट्ठाइस बरस की नींद से जाग उठी. उसे महसूस हुआ कि वह यह काम कर सकती है, क्योंकि उनके दुखों की भाषा उसके लिए भी अजनबी नहीं है. ज़ख़्म उनके जैसे गहरे नहीं हैं तो क्या, कांटों की वेदना तो उसने भी अनुभव की है.

उसके सांत्वना देने के तरी़के से शिखाजी भी अभिभूत हो गईं. अब तो वह रोज़ ही शिखाजी के साथ ‘हाफ वे होम’ जाने लगी.

शिखाजी ने शालिनी का रहन-सहन भी बदल दिया. ज़माने की ऱफ़्तार को समझने का प्रयास करते-करते वह उसी प्रवाह में आगे बढ़ चली थी. चेहरे के आहत, उदास भाव कहीं तिरोहित हो गए थे.

आजकल वह फ़ोन पर योगेश से सधी हुई आवाज़ में बस इतना ही कहती, “व्यर्थ चिंता न करें. अपनी और घर की सुरक्षा ख़ुद करने में वह सक्षम है.”

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घबराई हुई, अचकचाई हुई आवाज़ सुनने के आदी योगेश इस सधी हुई आवाज़ से भौंचक्के रह जाते.

इस दौरान गैस ख़त्म हुई. टेलीफ़ोन, बिजली, पानी का बिल- इस तरह के बीसियों मौ़के आए, जिनके लिए योगेशजी ने अपने ख़ास दोस्तों को कह रखा था. लेकिन ऐसी नौबत ही नहीं आई. शिखाजी के साथ जाकर वह स्वयं ही सारे काम कर आई. उसने देखा व्यर्थ ही वह इन सब कामों को हौआ समझती रही. कुछ भी कठिन नहीं था. शिखाजी कहतीं, “इन मामूली-से लगनेवाले कामों को भी स्वयं करने से आत्मविश्‍वास पैदा होता है. उस दिन ‘हाफ वे होम’ से लौटते हुए शालिनी का मन बेहद उदास था. बार-बार आंखों के सामने उस पंद्रह साल की मासूम बच्ची का चेहरा घूम जाता था. वह अपने नज़दीकी रिश्तेदार की हवस का शिकार हुई थी. अनचाहे गर्भ को ढोती वह लड़की अपने ही माता-पिता द्वारा ठुकराई गई थी. उसका कोई दोष न होते हुए भी उसे सजा दी गई थी. कुसूरवार ने उसके मां-बाप को अपने दृष्कृत्य की मामूली क़ीमत चुका दी थी.

“क्या इन औरतों का समाज में वापस लौटना संभव है? हमारी कोशिशों का सुखद परिणाम निकलेगा या नहीं?” शालिनी चिंतित थी.

“हां शालू, तुम्हें देखकर मैं विश्‍वासपूर्वक कह सकती हूं कि अपने अतीत की ज़्यादतियां भूलकर, वर्तमान की वेदना से उबरकर मुनासिब भविष्य का निर्माण किया जा सकता है.”

शिखाजी कुछ क्षण ख़ामोश रहीं, फिर भावुक होकर गंभीरतापूर्वक बोलीं, “समय कितना भी बदल गया हो, पर आज भी ये औरतें शाप भोग रही हैं. ये अपनों द्वारा छली गई हैं. इनका आत्मसम्मान आहत हो चुका है. इनकी अस्मिता को पैरों तले कुचला गया है. रामचंद्रजी ने अहिल्या को घोर अवसाद से उबारा. हमें भी वही आदर्श अपने सामने रखना है. समाज से बहिष्कृत, जड़ हो चुकी इन औरतों में चेतना जगानी है.”

“शिखाजी! आप सब कुछ कर सकती हैं. आपसे मिलने के पहले मेरी ज़िंदगी में भी कुछ नहीं था. अपने इर्द-गिर्द छाई धुंध को मैं अपनी ज़िंदगी का सच समझ बैठी थी. धुंध के पार का उजाला मेरी दृष्टि से दूर था और आज…”

“आज भी तुम वहीं हो! मैंने स़िर्फ तुमसे तुम्हारा परिचय कराया है. योगेशजी के विशेषणों को ही तुम सच समझ बैठी थी. लेकिन शालू, व्यक्ति जब स्वयं प्रयत्न करता है, तभी अपने अंधेरों से मुक्त हो पाता है. दूसरे उसे सांत्वना दे सकते हैं, लेकिन हिम्मत उसे स्वयं जुटानी पड़ती है. मध्यमवर्गीय परिवारों में कई बार अहंकारी पुरुष अपनी पत्नी के व्यक्तित्व को बौना बनाने में ही अपना पुरुषार्थ समझते हैं? तुम ही सोचो, समाज का आधा हिस्सा ही यदि चेतनाशून्य होगा तो उसके ऊंचा उठने की कल्पना भी कैसे की जा सकती है.”

शिखाजी की बातों में जीवन की सच्चाई थी.

दो महीने बाद योगेश घर लौटे, तो अपनी पत्नी को पहचान नहीं पाए. कहां गए वे लाचारी के भाव? उनके सामने तो एक तेजस्वी नारी खड़ी थी. सलीकेदार पहनावा और चेहरे पर गर्वीली मुस्कुराहट. यह तो उनकी पत्नी नहीं है, “आप जल्दी से नहा-धो लें. खाना तैयार है. एक बजे मुझे किसी काम से बाहर जाना है.”

शालिनी की इस अदा पर योगेश स्तब्ध होकर उसे देखते ही रह गए. उससे कुछ पूछने का भी साहस उनसे न हुआ. ‘पागल, बेवकूफ़, जाहिल, मूर्ख’ आदि उनकी जीभ पर आने के लिए मचलनेवाले शब्द आज पता नहीं कहां चले गए थे.

योगेश को वे खोजने पर भी नहीं मिल रहे थे.

 – स्मिता भूषण

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कहानी- सर्द ज़मीन (Short Story- Sard Zamin)

अकेलापन उसके अंदर इस कदर भर गया था कि दिनभर ऑफ़िस में थकने के बावजूद वह सो नहीं पाती. रात का सन्नाटा उसे तड़पाता. पुरुष की बलिष्ठ बांहों में समा जाने की चाह उसे करवटें बदलते हुए रात बिताने को मजबूर कर देती. क्या उसकी इच्छा अस्वाभाविक थी?

Hindi Kahani

वह बैग उठाए घर की दहलीज़ के बाहर क़दम रख देती है. इसके साथ ही कहानी ख़त्म हो जाती है… लतिका कहानी के समापन को एक अवास्तविक मोड़ मान उसका विश्‍लेषण करने लगती है. कहानी का हर पहलू, हर घटना उसे लगातार उलझन में डालती जाती है. उसे लगता है कि हंसा जैसी महिलाओं का समाज में होना सच है, पर उसके फैसले को कभी भी समाज की स्वीकारोक्ति नहीं मिल सकती है.

पिछले दो ह़फ़्तों से वह लगातार प्रेम कहानियों पर आधारित टीवी पर आनेवाले सीरियल की इस कहानी को देख रही थी. कहानी ‘हंसा’ नाम की एक महिला की थी, जिसके जीवन में अनायास ही एक पुरुष का प्रवेश होता है. पति के ज़्यादातर बाहर रहने व उसे समय न दे पाने के कारण अपनी तन्हा व उदास ज़िंदगी में रंग भरने की इच्छा उस पुरुष से मिलते ही हंसा के मन में पलने लगती है. बार-बार होती मुलाक़ातें नजदीकी बढ़ाती हैं, यहां तक कि उसका 8 वर्षीय बेटा भी उसमें अपने पिता की छवि व प्यार पाने की उम्मीद से उससे जुड़ता चला जाता है. पर पिता के आते ही अंकल की उपस्थिति उसके लिए गौण हो जाती है. उथल-पुथल से घिरी हंसा उस पुरुष के प्यार व सान्निध्य से जान पाती है कि पुरुष का स्पर्श कितना सुखद होता है. उसका साथ कितना विश्‍वास देनेवाला होता है. वह घर छोड़कर उसके साथ जाने का फैसला करती है. लेकिन अपनी बसी-बसायी गृहस्थी व बेटे को छोड़कर चले जाना उसके लिए सहज नहीं था. पर स्वयं के लिए जीने की ख़्वाहिश या पति के साथ बीते नौ वर्षों की पीड़ा शायद उसे स्वार्थी बनने को मजबूर कर देती है.

उसका जाना लतिका को ऐसा लग रहा था मानो किसी असंभव को जान-बूझकर लेखक ने संभव बनाने की कोशिश की है. समाज के नियमों व मर्यादाओं को दरकिनार कर इस तरह का क़दम उठाने की हिम्मत हंसा के अंदर हो ही नहीं सकती थी. उसे तो ज़बरदस्ती उसके अंदर ठूंसा गया था, ताकि नारी शक्ति को प्रस्तुत किया जा सके. फेमिऩिज़्म की परिभाषा को गढ़ने का यह प्रयास लतिका को परेशान किए जा रहा था.

आख़िर क्यों?

कहीं लतिका भी हंसा तो नहीं बनना चाह रही है?

लतिका हंसा नहीं है और हो भी नहीं सकती, लेकिन एक बार उसने भी तो हंसा बनने की कोशिश की थी.

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हर नारी के अंदर कहीं-न-कहीं एक हंसा छिपी होती है. कुछ उसे बाहर निकाल दबी-घुटी ज़िंदगी से छुटकारा पा लेती हैं तो कुछ जीवनभर दर्द के अंधेरे में स्वयं को गुम कर उस गुनाह की सज़ा भुगतती हैं, जो उन्होंने किया तो नहीं, पर उसके बारे में किसी कोने में बैठकर सोचा ज़रूर था. वही सोच उसे जीवनभर एक अपराधबोध, पीड़ा और ग़ुस्से के मिले-जुले भावों से जूझने के लिए मजबूर कर देगी, इसकी तो कल्पना उसने नहीं की थी. वही क्या, कोई भी इस तरह की कल्पना नहीं कर सकता.

लतिका ने भी सोचने की हिम्मत की थी. बहुत बार उसका मन भी किया कि वह इस नीरस और बेमानी ज़िंदगी के खोल से स्वयं को मुक्त कर ले. उसके और राजीव के  बीच शादी के शुरुआती दिनों से ही तालमेल नहीं बैठ पाया था. इसके कारण अनेक थे, जो शारीरिक व भावनात्मक रूप से जुड़े थे. हो सकता है कि उसने ही राजीव को समझने में भूल की हो. लेकिन सच तो यह था कि एक महिला को पुरुष के जिस साथ की अपेक्षा होती है, वह उसे राजीव से नहीं मिला. न ही शारीरिक रूप से और न ही मानसिक रूप से. न तो वह लतिका की ज़रूरतों को समझ पाया, न ही उसके अंदर किसी तरह की अनुभूति जागृत कर पाया. वह हमेशा ‘ठंडी औरत’ होने का ताना सहती रही. राजीव हर बात में उसका मज़ाक उड़ाता. उसकी बेइ़ज़्ज़ती करता. सीधी-सी बात थी कि वह उससे हर तरह से बेहतर जो थी. रंग-रूप, नौकरी व बुद्धि- हर मायने में वह राजीव से बढ़कर थी. ऐसे में राजीव को अपनी हीनभावना से उबरने के बजाय लतिका के अंदर ग़लतियां ढूंढ़ना ज़्यादा आसान लगता.

‘कहा जाता है कि जोड़ियां स्वर्ग में बनती हैं, लेकिन ग़लती तो किसी से भी हो सकती है, इसीलिए अक्सर दो विपरीत दिशाओं में सोचनेवालों की ईश्‍वर जोड़ी बना देता है. वह भी क्या करे, उसके पास काम का दबाव भी तो बहुत रहता है.’ राजीव अक्सर अपने दार्शनिक अंदाज़ में यह बात कहता था, लेकिन वह भी अपने बेमेल विवाह को संभाल नहीं पा रहा था.

दिन-रात के झगड़े और राजीव का जब-तब घर से गायब रहना लतिका को अक्सर सालता रहता. वह जानना भी चाहती कि वह कहां जाता है और क्या करता है तो दो टूक-सा जवाब मिलता, “मैं तुम्हें बताना ज़रूरी नहीं समझता.” वह सामंजस्य बिठाने की बहुत कोशिश करती. राजीव के साथ ही ख़ुशियां ढूंढ़ने की चाह में एक क़दम उसकी ओर बढ़ाती तो वह दो क़दम पीछे हट जाता. शराब की आदत ने उसमें और भी बुराइयां ला दीं. दूसरी महिलाओं का साथ उसे प्रिय लगता था.

जब राजीव और उसके बीच कोई रिश्ता ही नहीं था तो बच्चा होने का तो सवाल ही नहीं उठता था. अकेलापन उसके अंदर इस कदर भर गया था कि दिनभर ऑफ़िस में थकने के बावजूद वह सो नहीं पाती. रात का सन्नाटा उसे तड़पाता. पुरुष की बलिष्ठ बांहों में समा जाने की चाह उसे करवटें बदलते हुए रात बिताने को मजबूर कर देती. क्या उसकी इच्छा अस्वाभाविक थी? राजीव और वह अलग-अलग कमरों में सोते थे. शराब पीकर होश खोकर सोना कितना आसान होता है. किसी क़िस्म का ख़याल या भूख तब परेशान नहीं करती.

जीने का हक़ हर किसी को है, एक चिड़िया भी तमाम जिजीविषाओं को पूरा करने के लिए निरंतर प्रयास करती रहती है. उसके अंदर तो दिल, दिमाग़, भावनाएं सभी थीं. एक बार ऑफ़िस के टूर से दो दिन के लिए मुंबई गई थी. वहां उसका स्वागत आलोक ने ही किया था. वहां की ब्रांच का हेड था वह. दो दिन तक साए की तरह उसके साथ रहा. जान-पहचान, समान स्वभाव और मानसिक रूप से तालमेल बैठने से उनके बीच ऐसी दोस्ती हुई कि वापस आकर भी ऑफ़िस के काम के अतिरिक्त संवाद कायम रहा. फ़ोन, ईमेल और चैटिंग… बड़े ही ख़ुशनुमा पल हुआ करते थे वे.

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लतिका की बंधी-बंधाई ज़िंदगी में कुछ परिवर्तन आया. जैसे शांत सागर की लहरों में उफान आने लगा हो. दोनों ही अपने स्थिर जीवन से उकता चुके थे, शायद इसीलिए निकटता का सेतु बहुत जल्दी कायम हो गया. आलोक को अपना तन-मन समर्पित करने की तीव्र इच्छा लतिका को बार-बार उकसाने लगी. आलोक भी अपनी पत्नी से रिश्ता तोड़ उसके साथ जीवन बिताने को तत्पर था. तभी एक दिन लतिका के अंदर भी राजीव को छोड़ने की सोच उपजी. बेमानी रिश्ते को ढोने से फ़ायदा भी क्या था?

लेकिन इसी बीच पता चला कि राजीव का लिवर ख़राब हो गया है. शराब नहीं छोड़ी तो गुर्दे भी ख़राब हो सकते हैं. अस्पताल में भर्ती करा वह जी-जान से उसकी सेवा में जुट गई. पत्नी का फ़र्ज़ बाकी इच्छाओं पर भारी पड़ा. वैसे भी उस जैसे कमज़ोर इंसान को वह इस व़क़्त कोई झटका नहीं दे सकती थी. आलोक उसे समझेगा, यह भरोसा था उसे. पर आलोक का अस्पताल में आना राजीव को खल गया. बिस्तर पर लेटे-लेटे ही उसने उससे बिना कुछ कहे, बिना पूछे अपने मन में अनगिनत जाल बुन डाले. अविश्‍वास की झलक उसकी आंखों में देख लतिका ने उसे समझाना चाहा, पर उसकी हीनता ने तब तक उस पर गालियों के चाबुक बरसा डाले थे.

वह चुप हो गई. क्या फ़ायदा था ऐसे आदमी को किसी तरह का जस्टिफ़िकेशन देने का? वैसे भी सच को सुनने की समझ उसमें थी ही नहीं. आलोक लौट गया. कमज़ोरी और बेबसी से आतंकित राजीव को भला किस तरह की चुनौती दे? आलोक लतिका को अपने पास आने को कहता.

आलोक से उसकी मुला़क़ात फिर कभी नहीं हुई. न ही किसी और तरह से उन्होंने एक-दूसरे से संपर्क स्थापित करने की कोशिश की. मानो बिना कहे ही वे यह समझौता करने को तैयार हो गए थे. राजीव की हालत कुछ सुधरी तो वह उसे घर ले आई. उसकी सेवा और देखभाल ने उसे उठने के क़ाबिल बना दिया. पर राजीव का व्यवहार और सोच कुछ अधिक संकुचित होता चला गया था. उसकी नज़रों में लतिका ‘ठंडी औरत’ से ‘गिरी हुई औरत’ हो गई थी.

लतिका अपनी उस सोच को कोसती, जिसने उसे ख़्वाब देखने के लिए उकसाया था. कभी लगता कि उसे राजीव को बीमारी की हालत में ही छोड़कर चले जाना चाहिए था. वह हर ओर से रिक्त हो गई थी. देखे गए सपने उसे और तंग करते. बिस्तर पर दम तोड़ती इच्छाएं उसे अब जड़ बनाने लगी थीं. ‘ठंडी औरत’ ही बनेगी अब वह. दिन-रात के ज़ुल्म और प्रताड़ना सहने के बावजूद वह

राजीव को छोड़ने की हिम्मत नहीं कर पाई. वह कमज़ोर थी शायद. तभी तो राजीव उसे छोड़कर चला गया. साथ में महानता का लबादा भी ओढ़ लिया.

‘तुम आलोक के साथ ख़ुश रह सको, इसलिए जा रहा हूं. तुम आज से मुक्त हो.’ पत्र में लिखी इन पंक्तियों को पढ़ उसे लगा कि वह बेदर्दी से छली गई है.

राजीव जब साथ था, वह उसकी हीनता का बोझ ढोती रही और अब उसके जाने के बाद उसकी महानता का बोझ ढोने पर मजबूर है. अपनी ख़ुशियों को बंटोर कर अंजुरी में भरने की उसे इतनी बड़ी सज़ा मिलेगी, उसने सोचा न था. राजीव को क्या पता कि उसकी अंजुरी में से ख़ुशियां और तमाम इच्छाएं तो कब की फिसल कर सर्द और गीली ज़मीन पर बिछ चुकी हैं.

Suman Bajpai

   सुमन बाजपेयी

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कहानी- जीवनधारा (Short Story- Jeevandhara)

Hindi Kahani

बहुत ख़ुश थी मैं. मुझे जब पहली तनख़्वाह मिली, तो मम्मी-पापा और सास-ससुर के लिए उपहार ख़रीदा. मेरे लिए वो दो घंटे बेहद ख़ुशनुमा होते थे, जब मैं गुड्डू की बहू से अपराजिता बनती, पर समय हमेशा एक-सा नहीं होता न. जब कर्नल दुरानी ने गेस्ट हाउस की लीज़ ख़त्म होने की ख़बर मुझे सुनाई, तो मैं सन्न रह गई. लगा, अब मैं ज़िंदगीभर गुड्डू की बहू बनकर ही रह जाऊंगी.

आज मुझे ‘बेस्ट कॉर्पोरेट एक्ज़ीक्यूटिव’ का पुरस्कार मिला है. हाथ में इस ट्रॉफी को थामे अपनी कार में बैठकर मैं ख़ुद को दुनिया की महारानी महसूस कर रही हूं.

आज से 25 साल पुरानी बात यूं लगती है जैसे कल की ही बात हो. इंजीनियरिंग के आख़िरी साल में एक दिन जब मेरे हॉस्टल की सभी लड़कियां अपने करियर के बारे में बातें कर रही थीं, तभी मम्मी की चिट्ठी आई. चिट्ठी पढ़ी, तो अवाक् रह गई. लिखा था कि तुम्हारी शादी गुड्डू से तय हो गई है.

गुड्डू मेरी बुआ की जेठानी का लड़का था. बचपन में देखा था, पर कभी उस नज़र से नहीं. इतने सालों बाद आज भी नहीं बता सकती कि मैं शादी की ख़बर पर ख़ुश हुई थी या दुखी. ख़ैर, परीक्षा ख़त्म करके घर पहुंची. चार दिन में फटाफट शादी निपट गई और मैं अपराजिता से गुड्डू की बहू बनकर दिल्ली आ गई. हां, मैं इस बात से बेहद ख़ुश थी कि मैं दिल्ली आ गई. हर छोटे शहर की लड़की की तरह मेरा भी सपना था कि मैं मेट्रो सिटी में जाकर नौकरी करूं.

ससुराल में सभी मेरे रंग-रूप, समझदारी, शिष्टता और फर्राटेदार इंग्लिश के कायल थे. साधारण शक्ल-सूरत और कम बोलने वाले प्रवीण मेरे आगे ख़ुद को दबा हुआ महसूस करते थे. ये मैंने तब जाना, जब उन्होंने मुझे किसी से भी बात करने पर टोकना शुरू कर दिया. मेरी हर बात में कमी निकालना, लोगों से मिलने-जुलने पर रोक लगाना, चटकीले कपड़े पहनने से रोकना, ये सब रूटीन बातें हो गईं.

इसी दौरान जब मैंने प्रवीण से अपनी नौकरी की बात की, तो वे बिफर गए. कहने लगे, “क्या तुम्हें अपने पति पर इतना भी भरोसा नहीं कि वो तुम्हें कमाकर खिला सके?” रोती-सिसकती मैं सोचती रही कि क्या मेरे प्रो़फेसर पापा ने मुझे इंजीनियरिंग पढ़ाकर ग़लती की? ख़ैर, इसी बीच पता चला कि अनाम्या मेरे गर्भ में है. इस ख़ुशी में मैं सब भूल गई. बहुत-सी तकलीफ़ों के बाद जब पहली बार उसे अपने हाथों में थामा तो ख़ुद से एक वादा किया कि कभी भी इसकी ज़िंदगी अपनी जैसी नहीं होने दूंगी. यह अपनी मर्ज़ी की ज़िंदगी जीएगी.

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अनाम्या स्कूल जाने लगी. फिर से मेरी ज़िंदगी में वही खालीपन आ गया. दूसरे बच्चे के बारे में भी नहीं सोच सकती थी, क्योंकि डॉक्टर ने पहले बच्चे के समय ही चेतावनी दे दी थी कि दूसरा बच्चा प्लान करने पर जान को ख़तरा हो सकता है. इसी बीच प्रवीण अपने काम के लिए घर पर कंप्यूटर ले आए. मुझे तो जैसे खिलौना मिल गया था. बस, रात-दिन यही धुन रहती कि किसी भी तरह मैं कंप्यूटर का हर एप्लीकेशन सीख जाऊं.

धीरे-धीरे मैं कंप्यूटर में इतनी माहिर हो गई कि प्रवीण के कंप्यूटर के सारे काम मैं ही करने लगी. वे भी बेहद ख़ुश थे. एक तो मुफ़्त की कंप्यूटर ऑपरेटर मिल गई थी और मेरे हुनर को बरबाद करने की ग्लानि भी जाती रही. बाद में हमने घर पर ही साइबर कैफे खोल लिया और वहीं पर मैं लोगों को कंप्यूटर सिखाने लगी. अब ज़िंदगी पहले से बेहतर लगने लगी थी.

लोग नए मिलेनियम के लिए तैयार थे और मेरी ज़िंदगी में भी नया अध्याय शुरू होनेवाला था. रिटायर्ड कर्नल दुरानी मेरे साइबर कैफे कम कंप्यूटर इंस्टिट्यूट के सबसे होशियार स्टूडेंट थे. हमारी ख़ूब जमती थी. वो हमेशा कहते थे कि अपराजिता, तुम अपना टैलेंट बरबाद कर रही हो. रिटायर होने के बाद कर्नल दुरानी एक मल्टीनेशनल कंपनी के लिए गेस्ट हाउस चलाते थे. उनका गेस्ट हाउस हमारे घर से सौ गज की दूरी पर था. उन्होंने उसी गेस्ट हाउस में मैनेजर की नौकरी मुझे ऑफ़र की.

दिल में फिर से एक उम्मीद जागी. स़िर्फ दो घंटे के लिए जाना था और गेस्ट हाउस भी घर के इतने पास था कि प्रवीण को मनाना मुश्किल न था.

बहुत ख़ुश थी मैं. मुझे जब पहली तनख़्वाह मिली, तो मम्मी-पापा और सास-ससुर के लिए उपहार ख़रीदा. मेरे लिए वो दो घंटे बेहद ख़ुशनुमा होते थे, जब मैं गुड्डू की बहू से अपराजिता बनती, पर समय हमेशा एक-सा नहीं होता न. जब कर्नल दुरानी ने गेस्ट हाउस की लीज़ खत्म होने की ख़बर मुझे सुनाई, तो मैं सन्न रह गई. लगा, अब मैं ज़िंदगीभर गुड्डू की बहू बनकर ही रह जाऊंगी. साइबर कैफे का ट्रेंड भी तब तक ख़त्म हो चुका था. मुझे घर की चारदीवारी के अलावा कोई रास्ता नहीं दिख रहा था.

चार महीने से घर पर रहते हुए मैं अवसादग्रस्त हो गई. प्रवीण से लड़ती, अनाम्या को डांटती और कुढ़ती रहती. किसी से मिलना-जुलना, यहां तक कि फ़ोन पर बात करना भी बंद कर दिया था. लगता था कि सब मुझ पर हंस रहे हैं. जैसे कह रहे हों, “बड़ा इस उम्र में नौकरी करने चली थी. लौट के बुद्धू घर को आए…” पूरी तो नहीं, पर आधी पागल तो मैं हो ही गई थी.

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कर्नल दुरानी ने जब मेरे बारे में सुना, तो मिलने के लिए मेरे घर चले आए. बातों ही बातों में उन्होंने बताया कि उनके एक मित्र किसी मल्टीनेशनल कंपनी की शाखा भारत में खोलना चाहते हैं. उन्हें ऑफ़िस असिस्टेंट की ज़रूरत है, फिर कुछ सोचते हुए उन्होंने कहा, “अपराजिता, तुम उस पद के लिए आवेदन क्यों नहीं भरती?”

मैं भौंचक्की रह गई. इस उम्र में बिना किसी अनुभव के, वो भी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी! उन्होंने बहुत ज़ोर दिया, तो बिना किसी उम्मीद के मैं इंटरव्यू के लिए तैयार हो गई. धड़कते दिल से जब पांच सितारा होटल में इंटरव्यू के लिए पहुंची तो मिस्टर कुलकर्णी को देखकर मेरे हाथ-पांव फूल गए. 6 फ़ीट के मिस्टर कुलकर्णी मुझे बेहद रोबीले लगे, पर जब उनसे बात की तो काफ़ी सरल लगे.

इंटरव्यू भी अजीब था. जितने सवाल उन्होंने मुझसे किए, उससे कहीं ज़्यादा मैंने उनसे. “क्या इस उम्र में बिना किसी अनुभव के मैं यह काम कर पाऊंगी?” पूछने पर उन्होंने मुझे समझाया, “अपराजिता, तुम इंजीनियर हो, इतनी अच्छी अंग्रेज़ी बोलती हो, कंप्यूटर एक्सपर्ट हो और सबसे बड़ी बात है कि तुम काम करना चाहती हो. मैंने फैसला किया है कि इस पद के लिए तुम ही उपयुक्त उम्मीदवार हो.”

मैं तो सातवें नहीं, आठवें आसमान पर थी. पर कोई और भी था, जो मुझसे भी ज़्यादा ख़ुश था. वो थी मेरी टीनएजर बेटी. जब उसने मुझसे कहा, “ममा, मुझे आप पर गर्व है”, तो ऐसा लगा जैसे दुनिया की सारी ख़ुशियां मुझे मिल गई हों. मां-बेटी की जुगलबंदी के आगे प्रवीण भी हार गए और मुझे 38 साल की उम्र में अपना करियर शुरू करने का मौक़ा मिल ही गया.

संघर्ष यहीं ख़त्म नहीं हुआ. जिस ‘अपराजिता’ नाम की पहचान के लिए मैं इतनी परेशान थी, वह पहचान बनाने के लिए मुझे अब भी संघर्ष करना पड़ रहा था. जब मुझसे आधी उम्र की लड़कियां मेरा नाम लेकर बुलातीं, तो बेहद अजीब लगता. हर दिन एक नई चुनौती थी. पर मन में बस यही ठाना था कि कुछ भी हो, मुझे चारदीवारी में वापस कैद नहीं होना.

समय बीतता गया. मैं अपनी मेहनत और लगन से काम सीखती चली गई और यहां इस मुक़ाम तक पहुंच गई कि मुझे ‘बेस्ट कॉर्पोरेट एक्ज़ीक्यूटिव’ के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. मेरी कहानी शायद बहुत ख़ास नहीं है, पर फिर भी

चाहती हूं कि अपनी इस कहानी को हर उस औरत के साथ बांटूं, जो शादी, बच्चे-परिवार में गुम होकर अपने करियर को भूल-सी गई है. कोई बात नहीं, अगर आप आज कुछ नहीं कर पा रहीं, तो बस अपने आप को अपडेट रखें. करियर तो कभी भी शुरू किया जा सकता है.

बहुत साल पहले मेरी एक सहकर्मी थी अंकिता. उसे लिखने का बहुत शौक़ था.

वह अक्सर कहती थी, “अपराजिता, तुम्हारी कहानी सबको पता चलनी चाहिए, मैं एक दिन ज़रूर लिखूंगी.”

चलो, उसको फ़ोन करती हूं. दिल कर रहा है उससे बहुत कुछ कहने-सुनने का. अपनी जीवनधारा के अनकहे पन्नों को ख़ुद में समेट मैंने घर में प्रवेश किया, तो मेरी नातिन मचलती हुई मेरी तरफ़ भागी, इस ट्रॉफी को लेने के लिए.

Ankita Kashyap

 अंकिता कश्यप

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कहानी- सच्चा समपर्ण (Short Story- Sachcha Samarparn)

वैसे भी अरेंज मैरिज में होता भी तो यही है, दो अजनबियों को मां-बाप एक ही छत के नीचे ताउम्र रहने को बांध देते हैं. एक घर, एक ही छत शेयर करने तक तो ठीक है, फिर तुरंत ही एक ही बिस्तर शेयर करना… और फिर तुरंत ही बच्चा…?

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हद हो गई…! कल तक जो लोग शर्मोहया को लड़की का गहना… और न जाने क्या-क्या कहते थे, वो ही आज लड़की को बेशरमी का पाठ पढ़ा रहे हैं! क्या है इस दोगलेपन की वजह? क्यों पैदा होते ही लड़की को मार नहीं देते थे लोग…? मेरे ये आक्रोश भरे शब्द क़लम से नहीं भीतर कहीं हृदय से निकल रहे हैं, जहां ज्वालामुखी सुलग रहा है. उसी का लावा शब्द बनकर फूट रहा है. अभी हाथों की मेहंदी को छूटे महीनाभर ही हुआ था कि ख़ुशख़बरी की फ़रमाइशें होने लगीं, “भाभी, हमारे घर नन्हा-मुन्ना कब आएगा?”

“अब देर नहीं, भले ही दूसरा बच्चा पांच साल बाद कर लेना.” मांजी उम्मीद भरी आवाज़ में कहतीं. मैं सकुचा कर पैर के अंगूठे से ज़मीन कुरेदती रह जाती. इतनी जल्दी…? अभी तो साहिल को ठीक तरह से जान भी नहीं पाई हूं मैं. वैसे भी अरेंज मैरिज में होता भी तो यही है, दो अजनबियों को मां-बाप एक ही छत के नीचे ताउम्र रहने को बांध देते हैं. एक घर, एक ही छत शेयर करने तक तो ठीक है, फिर तुरंत ही एक ही बिस्तर शेयर करना… और फिर तुरंत ही बच्चा…?

मेरी कड़वाहट का एहसास घर भर में स़िर्फ साहिल को है. सगाई और शादी के बीच मात्र पन्द्रह दिनों का अन्तराल, उसमें स़िर्फ दो बार फ़ोन पर हुई औपचारिक बातचीत क्या किसी को इतना क़रीब ला सकते हैं? इतना क़रीब, जहां से सृजन की कल्पना की जा सके?

यूं भी मैं विवाह पूर्व इसी रिश्ते से भयभीत रहती थी, क्योंकि बेहद संकोची स्वभाव, किसी के इस तरह अंतरंग होने की कल्पना भर से ही सिहर उठता था, किंतु मेरी क़िस्मत अच्छी निकली.

विवाह की पहली रात ही अपनी समझदारी का परिचय देते हुए कहा था साहिल ने, “मैं तुम्हारे डर से वाकिफ़ हूं. पहले तुमसे दोस्ती करना चाहता हूं, क्योंकि मैं जानता हूं तुम बचपन से ही लड़कों से दूर रही हो, इसलिए सामाजिक मान्यताओं पर मत जाना. मेरी ओर से तुम पर कभी कोई प्रतिबंध नहीं होगा. तुमसे गहरा भावनात्मक संबंध कायम करना चाहता हूं. जब ख़ुद को तुम्हारे भरोसे के क़ाबिल महसूस करने लगूंगा, तभी तुम्हें हाथ लगाऊंगा. अपने अधिकारों का इस्तेमाल करके एक हृदयविहीन तन को जीतना न प्रेम होता है, न ही पौरुष! तुम्हें जितना व़क़्त लगे मैं प्रतीक्षा करने को तैयार हूं, मगर प्लीज़, कभी भी बेमन से या डर से समर्पण मत करना आभा. मैं तुम्हारे सच्चे प्रेम का इच्छुक हूं. मन की दहलीज़ पार किए बिना मैं कोई दूसरा रिश्ता कायम नहीं करना चाहता.”

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मैं आश्‍चर्यचकित हो गई. भाभी, दीदी और सहेलियों ने जो पति के बारे में समझाया था, उससे सर्वथा अलग और मेरे मन के व्यक्ति से मेल खाता पति पाकर मैं धन्य हो गई.

और फिर दो ही दिन बाद मैं मायके आ गई. यहां भी ससुराल से संबंधित प्रश्‍नों में पहला प्रश्‍न यही होता, “पति कैसे हैं?” मैं आशय समझकर जान-बूझकर रहस्यमयी मुस्कान फेंक देती. जानती थी कि ये फलसफ़ा किसी के गले नहीं उतरेगा कि हृदयविहीन तन के नहीं, हृदययुक्त, बल्कि प्रेमयुक्त समपर्ण के इच्छुक हैं पतिदेव.

दो-चार दिन बीते ही थे कि पापा के मुंह से निकल पड़ा, “अब तो मुझे भी नानाजी पुकारनेवाला कोई जल्दी ही आए भगवान!” मैं सोचती रह जाती, लड़की को कुंवारेपन में सात तालों में बंद रखने वाले माता-पिता शादी होते ही ये कैसी मानसिकता ओढ़ लेते हैं. जहां पहले किसी लड़के से बात तक करना नागवार गुज़रता था, वहीं अब किसी लड़के के साथ इतनी घनिष्ठता की कामना करना… स़िर्फ इसलिए कि उस लड़के ने सात फेरे लिए हैं उस लड़की से?

क्या सात फेरे ही किसी शर्मीली लड़की की शर्मोहया के सातों द्वार खोलने के लिए काफ़ी होते हैं?… और किसी अनजान ‘पति’ नामक व्यक्ति को अपनाने की शक्ति प्रदान करते हैं? मैं जब-तब अपनी भड़ास डायरी में निकालती रहती. चाहे पूरी दुनिया मुझे अजीब समझे, मगर साहिल की नज़रों में मैं सही थी और वह मुझे तथा मेरी भावनाओं को पूरा सम्मान देते थे. मुझे मेरे खोल से बाहर निकालने के लिए साहिल बहुत प्रयास कर रहे थे. धीरे-धीरे मुझे बहुत अच्छा महसूस होने लगा. उनके सानिध्य में ख़ुद को निश्‍चिंत और सुरक्षित महसूस करती थी.

उनमें मेरे प्रति किसी प्रकार के उतावलेपन को न पाकर मैं इतनी प्रसन्न हो जाती कि बरबस लिख बैठती. ‘अभी भी दुनिया में ऐसे लोग बाकी हैं, जो रिश्तों को ढोते या निभाते नहीं, बल्कि जीते हैं, अपनी शर्तों पर और अपने तरी़के से…’ मैं अब साहिल के साथ बहुत ख़ुश रहने लगी थी. अभी मैं वहां रमने ही लगी थी कि मां का मनुहार भरा आमंत्रण आ गया. “तीन महीने हो चुके हैं विवाह हुए. एक बार आकर मिल जा बेटी, तुझे देखे बिना मन बेचैन हो रहा है.” मां के आग्रह और प्रेम ने मेरे मन में भी जाने की इच्छा पैदा कर दी, मगर साहिल का उदास चेहरा भी बार-बार घूम रहा था आंखों के आगे. अब भावनात्मक लगाव की नींव पड़ चुकी थी दोनों के हृदय धरा पर.

उससे दूर जाने का मन नहीं हो रहा था और मेरे जाने के नाम पर उसकी उदास आंखें जैसे कह रही हों, कैसे गुज़रेगा तुम्हें देखे बिना एक ह़फ़्ता….?  शारीरिक प्रेम से पहले जिस प्रेम की कामना मैंने सच्चे हृदय से की थी, वो हमारे बीच कायम हो चुका था और मन के तारों का जुड़ाव मैं साफ़ महसूस कर रही थी. ‘तो यूं कोई अच्छा लगते-लगते इस क़दर भा जाता है कि उससे बेइंतहा प्यार हो जाता है और उसका साथ अनिवार्य लगने लगता है…’ अब मेरी डायरी में इन सब बातों का समावेश होने लगा.

ख़ैर, ह़फ़्ताभर की इज़ाज़त ले मां से मिलने आ पहुंची. शाम को चाय और पकौड़ों के बीच मां पूछ बैठी, “बेटा तीन महीने हो गए विवाह को, कोई नई ख़बर…..?” मेरा मन ज़रा खिन्न हो गया. “क्यों मां, शादी होते ही यही पहली उम्मीद लगाकर बैठना उचित है? क्या ये सब नहीं पूछोगी… हम दोनों कैसे हैं? आपस में मेल- जोल कैसा है? वगैरह-वगैरह..?” इस पर मां हंस पड़ी, “तुझे देखते ही

समझ में आ गया कि तू सुखी है वहां पर, फिर और क्या पूछूं और शादी-ब्याह का मतलब ही क्या है, वंशबेल आगे बढ़ाने के लिए ही तो माता-पिता बेटे का विवाह करते हैं, ये अरमान तेरे सास-ससुर के मन में भी तो होगा.

वैसे तेरे मन में क्या चल रहा है? अगर फैमिली प्लानिंग का भूत हो तो एक के बाद ही अपनाना वो सब चोंचले.”

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मां के इस वाक्य पर मैं चिढ़ गई, “बस करो मां… अभी हमने कुछ भी प्लान नहीं किया है. अभी तो हमारे रिश्ते की शुरुआत है…” कहते-कहते मैं रुक गई तो मां की सशंकित नज़रों को भांप कर भाभी मुझे ठेलते हुए कमरे में ले गई और कोने में ले जाकर पूछा, “सच बताना दीदी, अभी तक?”

मेरे इन्कार में सिर हिलाने पर वो लगभग बदहवास होकर कहने लगी, “क्या? मगर क्यों, क्या ये शादी उनकी मर्ज़ी से नहीं हुई? क्या आप उन्हें पसंद नहीं?”

मैं अवाक रह गई, “ये सब आप क्या समझ रही हैं भाभी… हम दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल अजनबी थे. क्या क़रीब आने के लिए थोड़ा व़क़्त नहीं लेना चाहिए.”

“थोड़ा व़क़्त, तीन महीने थोड़ा व़क़्त होता है दीदी?” ओह, इसका मतलब भाभी भी इसी मानसिकता की हैं, सोचते-सोचते मैं कह उठी.

“ये मुझ अकेले का नहीं, साहिल का भी निर्णय है.” फिर मेरे शर्मीलेपन को देखते हुए साहिल ने पहली बार मुझसे जो कुछ कहा उसे अक्षरश: दोहरा दिया.

पर इस बात से तो जैसे वहां कोहराम ही मच गया. मेरे शर्मीलेपन को कोसते-कोसते बात साहिल के पुरुष न होने तक पहुंच गई.

मां कह रही थी, “अजीब लड़का है, अरे इसने कहा और उसने मान लिया.”

“अरे कमी है उसमें तभी तो मान गया, वरना ऐसा हो सकता है क्या कभी? पुरुष होकर उसकी इस कायरता के पीछे जाने कौन-सी सच्चाई छिपी है…” ये दीदी के शब्द थे, “कहीं और किसी से तो उसके संबंध…?” मैं हतप्रभ-हैरान मुंह फाड़े कभी इसकी, तो कभी उसकी बातें सुनती जा रही थी. साहिल की शराफ़त को उसकी कायरता, बीमारी चरित्रहीनता-जाने क्या-क्या कहा जा रहा था और मैं अंदर-ही-अंदर उबल रही थी. तभी दीदी ने एक और विस्फोट किया, “तुमने कभी पहल करने की कोशिश नहीं की आभा?” तो मेरे सब्र का बांध टूट गया और मैं चीख पड़ी, “बंद करो आप सब लोग ये बकवास… क्या दोहरी मानसिकता है, शादी से पहले जिस लड़की को सदैव लड़कों से दूर रहना सिखाया जाता है, उसी लड़की को शादी होते ही कौन-से बेशरमी के पंख लग जाते हैं कि उसे ऐसा करना चाहिए?”

मैं बुरी तरह थक गई थी. उस बहस को मैंने दो वाक्यों में समाप्त किया. “ये हमारा नितान्त निजी मामला है और इसमें बोलने का हक़ मैं किसी को नहीं देती.” मेरे तीखे तेवर और शब्दों को सुनकर सभी चुप हो गए.

मेरे जीवन की ये सबसे कड़वी याद है, जिसे मैं ज़ेहन से जितना निकालना चाहती हूं, उतनी ही ये मेरे मस्तिष्क में चिपक-सी जाती है.

आज विवाह के पच्चीस साल बाद डायरी में मैंने इस बात का ज़िक्र किया है, क्योंकि आज यही सवाल मेरी बेटी मुझसे कर रही है.

“ममा, नीलेश और मैं एक-दूसरे से बिलकुल अन्जान हैं, मगर मैं जानती हूं कि आपने उसे मेरे लिए चुना है, तो ज़रूर कुछ सोचकर ही चुना होगा. मुझे आपके निर्णय पर कोई ऐतराज़ नहीं, मगर मुझे शादी से थोड़ा-सा डर लगता है.” कहते-कहते उसकी पलकें झुक गईं. मैं समझ गई कि मेरी बेटी भी वहीं पर खड़ी है, जहां पच्चीस साल पहले मैं खड़ी थी. पढ़ाई-लिखाई में अव्वल रहनेवाली मेरी बेटी प्यार-मुहब्बत और लड़कों से सदा दूरी रखनेवाली मेरी ही तरह संकोची है. लेकिन नीलेश भी कम समझदार नहीं, उसकी समझदारी की वजह से ही मैंने और साहिल ने उसे अपनी बेटी के लिए पसंद किया है.

उसके डर को भांपकर ही मैंने ये डायरी जान-बूझकर उसके कमरे में छोड़ी है, जो उसके डर से बाहर निकालने में उसकी मदद कर सके. और एक बार साहिल को भी खुलकर नीलेश से बात करनी होगी. बाकी कोई कुछ भी कहे… मेरी बेटी को भी सच्चे प्यार का सुख मिले, थोथी और खोखली मान्यताओं का बोझ नहीं… ये सब सोचते हुए मैं उसके कमरे से बाहर निकल आई.

– वर्षा सोनी

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कहानी- मेला (Short Story- Mela)

छोटे-छोटे बच्चों का हाथ पकड़े परिवार के परिवार घूम रहे थे और जीवन के हर रंग का आनंद उठा रहे थे. वे जब पांच रुपए का गुब्बारा या सात रुपए की पिपिहरी भी ख़रीदते, तो रुपए-दो रुपए का मोलभाव कर लेते. इसके बाद छोटे-छोटे खिलौनों को बच्चों को सौंपते हुए अजीब-सी तृप्ति की अनुभूति होती उन्हें. बच्चे भी खिलौने पाकर ऐसे ख़ुश होते, जैसे उन्हें मुंहमांगी मुराद मिल गई हो.

कितना फ़र्क़ है इस मेले और शॉपिंग मॉल की भीड़ में, जहां 50% डिस्काउंट के बाद भी सामान ख़रीदने का कोई सुख नहीं है.

Hindi Kahani

अपने कंप्यूटर के पिक्चर-फोल्डर में कैद तस्वीरों को वो ध्यान से देखने लगा. शिमला टूर के ब़र्फ से भरे पहाड़ थे, तो जैसलमेर के रेत भरे छोटे-छोटे टीले. इस फोल्डर में एक तरफ़ मनाली की ख़ूबसूरत वादियां कैद थीं, तो दूसरी तरफ़ गोवा के समुद्र तट पर अठखेलियां करती ज़िंदगी की रंगीनियां. एक-एक तस्वीर कहीं न कहीं संपन्न जीवनशैली की गवाह थी. फिर भी जब उन तस्वीरों को ध्यान से देखते, तो लगता सब कुछ होने के बाद भी इनमें सूनापन है.

आदमी की भूख को ख़ूबसूरत नज़ारों, फाइव स्टार होटल के टेबल पर सजे खाने या जीवन की रंगीनियों से नहीं मिटाया जा सकता. सच तो यह है कि आदमी क्या चाहता है, यह वह भी नहीं जानता.

उसने कंप्यूटर बंद कर दिया. उसे एहसास हुआ कि यह खिलौना अब उसे ख़ुशी देने में नाकाम है. बारह घंटे की ड्यूटी में कम से कम सात-आठ घंटे तो वह इस कंप्यूटर से चिपका रहता है. अचानक उसने सोचा, क्या हमारा जीवन आज इतना एकाकी हो गया है कि हमें बातचीत करने के लिए भी अजनबियों की ज़रूरत पड़े?

उसने बैठे-बैठे ही रिवॉल्विंग चेयर पर अंगड़ाई ली और चेंबर के बाहर झांका, तो देखा रामदीन सिर झुकाए खड़ा था.

ओह, तो क्या सात बज गए और घर चलने का समय हो गया? रामदीन का नियम था कि वह सात बजे गाड़ी लगाकर साहब के केबिन के सामने बैठ जाता. कहता कुछ नहीं और शिखर समझ जाता कि काम ख़त्म होने से रहा, अब चलना चाहिए. हां, ज़्यादा ही ज़रूरी होता, तो वह रामदीन को कह देता कि आप घर निकल जाइए, आज मैं ख़ुद ही ड्राइव कर लूंगा, लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं कि रामदीन ने शिखर को अकेला छोड़ा हो. वह कहता, “साहब मुझे भी जल्दी घर जाकर क्या करना है?” और उसका यह जवाब सुन शिखर मुस्कुरा देता.

शिखर रामदीन से इतने दिनों में काफ़ी घुल-मिल गया था. अचानक शिखर ने रामदीन को इशारा किया, नियम के अनुसार रामदीन ने शीशे का दरवाज़ा खोला, ब्रीफकेस में लंच बॉक्स रखा और एक हाथ में पानी की बोतल और दूसरे हाथ में ब्रीफकेस उठाकर चल पड़ा. इससे पहले कि रामदीन बाहर निकलता, शिखर ने कहा, “रामदीन क्या आज तुम मुझे कोई नई जगह घुमा सकते हो?” रामदीन सोच में पड़ गया, “साहब, इस शहर का कोई भी होटल, शॉपिंग मॉल या क्लब आपसे छूटा नहीं है.”

“तभी तो तुमसे कह रहा हूं कि क्या कोई नई जगह दिखा सकते हो? ऐसी जगह जहां ज़िंदगी सांस लेती हो, क्योंकि होटल हो या शॉपिंग माल, ये सारी जगहें बेजान मशीन की तरह हो गई हैं. इनमें एक-सा स्वाद है. रहे क्लब्स, तो वो भी बस दिखावट के अड्डे भर रह गए हैं. रामदीन तुम उम्र में मुझसे बड़े हो, क्या तुम्हारी ज़िंदगी में भी इतनी कम उम्र में सूनापन आ गया था?”

रामदीन ने शिखर की आंखों में छुपे दर्द को पढ़ लिया था. बोला, “साहब बड़ी बातें मेरी समझ में नहीं आतीं. हां, आप कुछ अलग देखना चाहें, तो एक जगह है, पर वह आपके स्टैंडर्ड की नहीं है. वहां हम जैसे लोग ही जाते हैं.”

शिखर सोच में पड़ गया. फिर बोला, “कोई बात नहीं, तुम बताओ तो सही. यह छोटा-बड़ा कुछ नहीं होता.”

रामदीन का साहस थोड़ा बढ़ा. बोला, “साहब शहर के बाहर रामलीला ग्राउंड में मेला लगा है. आप कहें तो घुमा लाऊं, लेकिन अकेले नहीं. आप मेमसाब को भी लेंगे, तभी घूमने का मज़ा आएगा.”

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शिखर मेले के नाम से ही जैसे खो-सा गया. मेले में चर्खीवाला झूला, टोपी से फूल निकालनेवाला जादूगर, गुड़ की मिठाइयां… हा हा… वह ज़ोर से हंसा. कितने मेले तो देखे हैं उसने बचपन में. उसके घर के बगल में ही तो था मेला ग्राउंड और गर्मी की छुट्टियों में शाम होते ही जैसे कोई ताक़त उसे मैदान की तरफ़ खींचना शुरू कर देती और जब टिकट के पैसे न होते, तो वह मेले के बाहर ही खड़ा होकर भीतर के नज़ारों को महसूस करता.

शिखर को चुप देखकर रामदीन बोला, “साहब घर चलिए. वो तो मैंने ऐसे ही कह दिया था. मेला भी कोई घूमने की चीज़ है आज के ज़माने में.”

शिखर गंभीर होते हुए बोला, “रामदीन सचमुच मेला इस ज़माने में भी देखने की चीज़ है. रुको, मैं फ़ोन कर देता हूं घर पर और आज मेला देखने ही चलते हैं.”

“हैलो, हैलो… सुनो, तैयार हो जाओ, आधे घंटे में पहुंच रहा हूं. आज हम लोग अनोखी जगह घूमने जा रहे हैं और हां, सिंपल कपड़े ही पहनना. क्रेडिट कार्ड और पर्स की ज़रूरत नहीं है. बस, थोड़े पैसे रख लेना, काम चल जाएगा.”

“पहेलियां मत बुझाओ शिखर, ये बताओ हम जा कहां रहे हैं?” उधर से श्रुति की आवाज़ सुनाई दी. शिखर ने मुस्कुराते हुए कहा, “आज मैं तुम्हें मेला दिखाने ले जा रहा हूं.”

“तुम भी कमाल करते हो शिखर. अब इस उम्र में मुझे मेला दिखाने ले जाओगे.”

“कहते हैं ज़िंदगी ही एक मेला है, तो इस उम्र में मेला देखने में हर्ज़ क्या है?”

शिखर जब घर के दरवाज़े पर पहुंचा, तो गाड़ी का हॉर्न सुन श्रुति को बाहर निकलते देख चौंक गया. वह एक साधारण-सी सूती साड़ी में अत्यंत सौम्य लग रही थी.

उसका यह रूप देख शिखर मुस्कुराए बिना न रह सका.

“क्या भाई, आज मेरी चाय भी मारी गई इस मेले के चक्कर में…?” कहते हुए शिखर ने कार का दरवाज़ा खोल दिया और भीतर एक हल्की हंसी गूंज उठी.

अब तक रामदीन को जोश आ चुका था. “साहब आज चाय मैं पिलाऊंगा मुखिया ढाबे की. आप और मेमसाब बस बैठे रहना, मैं गाड़ी में ही ले आऊंगा.” नोक-झोंक में पता ही न चला कि कब हाई वे छोड़ कस्बे का टर्न आ गया और जब कस्बे के मोड़ पर गाड़ी रुकी तो रामदीन चाय लेने चला गया.

“साहब कहते हैं जिसने मुखिया के ढाबे की चाय नहीं पी, समझो उसने कुछ नहीं पिया.”

शिखर ने चाय ले ली और एक कुल्हड़ श्रुति की ओर बढ़ाते हुए जैसे ही पैसे के लिए पर्स निकाला, रामदीन बोला, “साहब यह चाय हमारी तरफ़ से. आप हमारे मेहमान हैं.”

शिखर की लाख कोशिशों के बाद भी रामदीन ने चाय के पैसे नहीं लिये. चाय वाकई लाजवाब थी और मिट्टी के बर्तन में होने के कारण एक सोंधी ख़ुश्बू उसमें से उठ रही थी, जो भीतर तक शिखर को तरोताज़ा कर गई. रामदीन ने गाड़ी आगे बढ़ाई और दस मिनट में कस्बे के रामलीला ग्राउंड के सामने लाकर रोक दी.

देखकर ही पता चल रहा था कि यह आम आदमी की जगह है. लोगों की अच्छी-ख़ासी तादाद थी, लेकिन उम्मीद के विपरीत धक्का-मुक्की और अव्यवस्था कहीं नहीं थी.

छोटे-छोटे बच्चों का हाथ पकड़े परिवार के परिवार घूम रहे थे और जीवन के हर रंग का आनंद उठा रहे थे. वे जब पांच रुपए का गुब्बारा या सात रुपए की पिपिहरी भी ख़रीदते, तो रुपए-दो रुपए का मोलभाव कर लेते. इसके बाद छोटे-छोटे खिलौनों को बच्चों को सौंपते हुए अजीब-सी तृप्ति की अनुभूति होती उन्हें. बच्चे भी खिलौने पाकर ऐसे ख़ुश होते, जैसे उन्हें मुंहमांगी मुराद मिल गई हो.

कितना फ़र्क़ है इस मेले और शॉपिंग मॉल की भीड़ में, जहां 50% डिस्काउंट के बाद भी सामान ख़रीदने का कोई सुख नहीं है.

अचानक शिखर ने श्रुति का हाथ पकड़ा, तो वह तंद्रा से जागी, “छोड़ो भी, कोई देख लेगा तो क्या कहेगा?” श्रुति ने हाथ छुड़ाते हुए कहा.

शिखर हंसने लगा. “यहां हमें जाननेवाला कौन है? चलो झूला झूलते हैं.”

ज़ोर से हंसी श्रुति, “और तुम्हें चक्कर आ गया तो?” “ओह! मैं तो भूल ही गया था कि मुझे झूले में चक्कर आता है. अरे यहां क्या है?” वो श्रुति का हाथ पकड़ एक रिंग की स्टॉल की ओर बढ़ते हुए बोला, “सुनो भैया, एक तरफ़ इनका और दूसरी तरफ़ मेरा नाम लिख दो.”

दुकानदार ने पूछा, “जी क्या नाम लिखूं?”

तभी एक आवाज़ सुनाई पड़ी, “क्यों रे कलुआ, तू हमारी मेमसाब को नहीं जानता? लिख श्रुति मेमसाब और बड़े साहब.”

अपना नाम सुनकर श्रुति चौंकी. पीछे देखा तो उसकी कामवाली खड़ी थी. “अरे तेरी तो तबियत ख़राब थी और तू यहां मेले में घूम रही है?” श्रुति ने उसे डांटते हुए कहा.

“सारी मेमसाब. हमें क्या पता था कि आप मेले में मिल जाएंगी. अब से ऐसी ग़लती नहीं होगी.”

श्रुति ने हंसते हुए पर्स से पचास रुपए निकाले और देते हुए बोली, “ले रख इसे और जाकर मेला घूम.”

उधर देखा, तो शिखर अपने और श्रुति के नामवाली रिंग बनवा बेहद ख़ुश था. देखते-देखते श्रुति ने भी मेले से ढेर सारी चीज़ें ख़रीद डालीं. रोज़मर्रा के सस्ते बर्तन, चूड़ी-बिंदी और न जाने क्या-क्या?

शिखर भी मेले के रंग में पूरी तरह डूब चुका था. वो कभी एयर गन से निशाना लगाता, तो कभी बॉल से ग्लास गिराने की कोशिश करता. भरपूर ख़रीददारी के बाद भी देखा, तो ख़र्च स़िर्फ सात या आठ सौ रुपए हुए थे,  जितने में शायद एक ब्रांडेड शर्ट ही आती.

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एक-दो घंटा घूमकर जब वे दोनों मेले से बाहर निकले, तो रोज़मर्रा के तनाव से बहुत दूर जा चुके थे. क्या नहीं देखा था उन्होंने मेले में… बोलनेवाले सांप से लेकर ताश के जादू तक. भीतर जाने पर सांप के पिंजरे पर लिखा था, “यह अपनी ज़ुबान में बोलता है, आप उसकी ज़ुबान जानते हैं, तो समझ सकते हैं.” वहीं जादूगर कहता, “साहब, सब नज़र का फेर है. पकड़नेवाले को पांच सौ का नगद इनाम और फिर बातों में ऐसे उलझाता कि हाथ की सफ़ाई कोई पकड़ ही नहीं पाता.

जब वे गाड़ी में बैठे, तो सोचने लगे कि हम अपनी सरल ज़िंदगी को दिखावे के चक्कर में कितना भारी बना लेते हैं. पूरी गाड़ी छोटे-छोटे सामानों से भर गई और रामदीन दोनों की ख़ुशी देखकर गदगद हुए जा रहा था. अगली सुबह संडे था और जब शिखर बरामदे में आया, तो देख कर हैरान रह गया कि श्रुति कल के लाए सामानों को आसपास छोटा-मोटा काम करनेवालों में बांट रही थी. किसी को खिलौना देती, तो किसी को चूड़ी-बिंदी. वह एक-एक चेहरे की ख़ुशी देखती और निहाल हो जाती. सच है, जो सुख बांटने में है, वह संग्रह करने में नहीं और जब उसने पीला कुर्ता रामदीन की ओर बढ़ाया, तो उसकी आंखें छलक आईं.

“जुग-जुग जीयो बेटी, भगवान तुम्हें लंबी उमर दे.” भर्राये गले से रामदीन बोला. उसे पहली बार एहसास हुआ कि वह केवल ड्राइवर भर नहीं, इस घर के किसी सदस्य की तरह है.

और फिर बोला, “बेटा, तुमने आज मेले के सही अर्थ को समझा है, यदि बाहरी मेले से हम हृदय में उमंग और ख़ुशी के असली मेले को जगा सकें, तो समझो घूमना-फिरना सफल हो गया, वरना पहाड़ पर घूम आओ या शॉपिंग माल में, सब निरर्थक है.” और अब शिखर रामदीन की सरल भाषा में कही हुई बात का ज़िंदगी के मेले के संदर्भ में गूढ़ अर्थ ढूंढ़ने लगा था.

Murli Manohar Shrivastav

 मुरली मनोहर श्रीवास्तव

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कहानी- फ्लैश फॉरवर्ड (Short Story- Flash Forward)

Hindi Story

”हां, तो मैं बता रही थी कि फिर एक दौर ऐसा आया कि हम दोनों ही अकेले हो गए. उसकी पत्नी की मृत्यु हो गई और मेरा पति…”

“क्या?” मैं ज़ोर से चिल्ला उठी.

“घबराओ मत. ये सब मैंने फ्लैश फॉरवर्ड में देखा था. फिर मैंने अपना पुश्तैनी मकान बेचा और समुद्र किनारे एक फ्लैट में रहने आ गई. वहां एक दिन शाम को पार्क में सैर करते व़क़्त मुझे रितु मिल गई…”

“क्या वह भी विधवा?”

“अरे, नहीं ममा. उसका पति जीवित था.

रिया बेहद अच्छे मूड में आकर मेरे पास बैठ गई और अपनी दोनों बांहें मेरे गले में डाल दीं. मैं समझ गई कि वह कुछ बात बताने के लिए उत्सुक है.

“ममा, मालूम है मैंने विवेक से शादी के लिए हां क्यों की?”

“तुम्हारी सहेली का भाई है और तुझे पसंद आ गया होगा?”

“वो भाई तो रितु का बचपन से ही है, तब से देखती आ रही हूं, पर मैंने उसे कभी इस एंगल से नहीं देखा था. जबकि रितु तो बात-बात में मुझे कहती रहती थी, ‘तुझे इस होटल का रवा डोसा पसंद है? अरे भैया को भी बहुत पसंद है…’ ‘क्या तुझे ‘रॉकस्टार’ फिल्म अच्छी लगी? अरे, भैया को भी बहुत अच्छी लगी…’ मैं तो उसकी बातों से बुरी तरह खीझ जाती थी. तब वह रोने-जैसा मुंह बनाकर बोलती थी. ‘तुझे लगता है मैं बातें बनाती हूं, लेकिन रिया सच, तुम्हारी क़सम! तुम्हारी और भैया की पसंद वाकई बिल्कुल एक जैसी है. तुम दोनों का स्वभाव भी काफ़ी मिलता है.”

“फिर?”

“मुझे उसकी बातों में रस आने लगा था. वह बात ही इतने मज़ेदार तरी़के से कह रही थी. फिर मैंने फ्लैश फॉरवर्ड में देखा कि हम दोनों की शादी हो गई. एक दूजे से नहीं, अलग-अलग जगह. हम अपनी-अपनी गृहस्थी में ख़ुश थे. बच्चे हो गए. उनकी भी शादियां हो गईं…”

मैं मुंह बाए सुन रही थी, पर मुझसे रहा नहीं जा रहा था.

“यह फ्लैश फॉरवर्ड क्या बला है?”

“अरे, बहुत सिंपल चीज़ है ममा. जैसे आप टीवी पर, सिनेमा में फ्लैशबैक देखती हैं. उसमें अतीत में घटी घटना आंखों के सामने साकार होने लगती है. ऐसा ही कुछ फ्लैश फॉरवर्ड में होता है, जिसमें हम अपने अनुमान के आधार पर भविष्य में कुछ घटित होता देखते हैं और वो सब कुछ एक चलचित्र की तरह हमारी आंखों के सामने चलता रहता है. हां, तो मैं बता रही थी कि फिर एक दौर ऐसा आया कि हम दोनों ही अकेले हो गए. उसकी पत्नी की मृत्यु हो गई और मेरा पति…”

“क्या?” मैं ज़ोर से चिल्ला उठी.

“घबराओ मत. ये सब मैंने फ्लैश फॉरवर्ड में देखा था. फिर मैंने अपना पुश्तैनी मकान बेचा और समुद्र किनारे एक फ्लैट में रहने आ गई. वहां एक दिन शाम को पार्क में सैर करते व़क़्त मुझे रितु मिल गई…”

“क्या वह भी विधवा?”

“अरे, नहीं ममा. उसका पति जीवित था. वह अपनी पोती को पार्क में घुमाने लाई थी. कुछ देर सुख-दुख की बातें चलती रहीं. मेरी बात ख़त्म होते ही वह बोल पड़ी. भैया भी बिल्कुल अकेले हो गए हैं. भाभी चल बसी और बच्चे विदेश में सेटल हो गए. वे भी आजकल इसी अपार्टमेंट में रहते हैं. लो, वे आ भी गए. मैंने बताया था न तुझे कि वे भी तेरी तरह शाम की सैर किए बगैर नहीं रह सकते. अब तुम दोनों बातें करो. मैं चलती हूं गुड़िया के दूध का वक़्त हो गया है. मैं विवेक को गौर से देखने लगी. अभी भी काफ़ी तंदुरुस्त और स्मार्ट लग रहे थे. हम रोज़ मिलने लगे और फिर हमने शादी का फैसला कर लिया. रितु ने ख़ुशी-ख़ुशी हम दोनों की शादी करवाई, तो मैंने सोचा, जो काम 40 साल बाद करना है, वह आज ही कर लिया जाए.”

यह भी पढ़ेलघु उद्योग- जानें सोप मेकिंग बिज़नेस की एबीसी… (Small Scale Industry- Learn The Basics Of Soap Making)

मैंने अपना सिर पकड़ लिया. “उ़फ्! यह आज की जनरेशन. क्या सोचती है, क्या बोलती है, क्या करती है, इन्हें कुछ होश नहीं रहता और ऊपर से तुर्रा ये कि हम स्पष्टवादी हैं. साफ़ बोलना पसंद करते हैं. लेकिन हम यदि दो बातें स्पष्ट सुना दें, तो इनका पारा चढ़ जाएगा. सोचकर मैंने मुंह सिल लेना ही बेहतर समझा. बड़ी मुश्किल से तो शादी के लिए राज़ी हुई है.

धूमधाम से विवाह संपन्न हुआ और देखते ही देखते नाज़ों पली बिटिया पराई हो गई. नाम के अनुरूप ही विवेक बहुत समझदार लड़का साबित हुआ. रिया प्रोफेशनली बहुत साउंड थी, लेकिन घर-गृहस्थी के मामले में थोड़ी कच्ची थी, पर विवेक के प्यार और विश्‍वास ने कभी गृहस्थी की गाड़ी डगमगाने नहीं दी. रिया जिस तरह मुझसे फोन पर खुलकर लंबी-लंबी बातें करती थी, उससे साफ़ ज़ाहिर होता था कि दोनों के बीच अच्छी अंडरस्टैंडिंग थी. स़िर्फ एक बात मुझे खटकती थी. दोनों जब भी दो-चार दिन की छुट्टियां लेकर आते, विवेक अपने शहर अपने घर चल देता और रिया मेरे पास रुक जाती. रितु की शादी के बाद वे लोग अपने पैतृक शहर जाकर बस गए थे.

“तुम कभी अपनी सास के पास छुट्टियां बिताने नहीं जाती रिया? विवेक या उसके माता-पिता कभी कुछ कहते नहीं? और न विवेक ही कभी यहां रुकता है?”

“यह हम दोनों ने आपस में तय कर रखा है ममा. अब क्या है बड़ी मुश्किल से कितने ही महीनों में दो-चार दिन की छुट्टी मिलती है, तो वह अपने ममा-पापा के पास रहना चाहता है और मैं आपके पास. फिर विवेक की ममा आपकी तरह हाउसवाइफ़ थोड़े ही हैं, वे वर्किंग वुमन हैं. मैं जाऊंगी, तो उन्हें असुविधा होगी. रितु भी अपने ससुराल में है. मेरे न जाने पर मां-बेटे पहले की तरह आराम से अपना व़क़्त गुज़ारते हैं. घूमते हैं, मिलकर पकाते-खाते हैं और गप्पे लड़ाते हैं. मैं दाल-भात में मूसलचंद नहीं बनना चाहती. दूसरे, चार दिन की छुट्टी में भी मैं वहां चली गई, तो फिर आपके पास कब रहूंगी?”

“पर बेटी?”

“हम सभी एक-दूसरे की मजबूरी को समझते हैं और इसलिए कोई इसे अन्यथा नहीं लेता. आप भी इन छोटी-छोटी बातों को लेकर परेशान न हों ममा.” रिया के समझाने पर मैंने सहमति में गर्दन तो हिला दी थी, पर दिल आशंकित ही रहा.

आम कामकाजी महिला की तरह रिया की ज़िंदगी की गाड़ी भी घर और ऑफिस के बीच हिचकोले खाती चलने लगी. कभी बाई नहीं आई, कभी कुक ने छुट्टियां ले लीं, कभी हाथ में चोट लग गई, कभी विवेक से खटपट… इन सब पर ऑफिस में भी बढ़ती ज़िम्मेदारी और तनाव. मैं अपनी ओर से भरसक उसकी समस्या सुलझाने का प्रयास करती, मुश्किलों से जूझने का हौसला भी देती, पर ख़ुद अंदर से टूट जाती. नन्हीं मासूम-सी जान कितने-कितने मोर्चे एक साथ संभालेगी? दिल की बेहद साफ़ और भोली रिया अक्सर ऑफिस में चल रही पॉलिटिक्स से परेशान हो उठती थी. “समझ ही नहीं आता ममा किस पर भरोसा करूं और किस पर नहीं? किसको काम के लिए हां कहूं और किसे साफ़ इंकार कर दूं? लगता है, हर कोई मुझ पर ही हावी हो रहा है.” मैं उसे समझाने का प्रयास करती, “बेटी, ऐसा तो हर ऑफिस में चलता रहता है.”

“आपको क्या पता? आप कब ऑफिस गईं?” वह तुनक उठती.

“नहीं गई. पर तुम्हारे पापा से और दूसरे लोगों से सुनती तो रहती हूं न? सब जगह ये ही ढाक के तीन पात हैं, पर जिनमें प्रतिभा है, जो परिश्रमी हैं, वे हर परिस्थिति से निबट लेते हैं और अधिक निखरकर सामने आते हैं.”

“आप ठीक कहती हैं ममा.” रिया का आत्मविश्‍वास लौट आता, तो मेरा मन भी प्रसन्न हो उठता.

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सप्ताहांत में दो छुट्टियों का संयोग देखकर रिया और विवेक ने घर आने का कार्यक्रम बना लिया. सुनकर मेरा मन मयूर नाच उठा और मैं बड़े उत्साह से उनके आने की तैयारियां करने लगी. लेकिन अपनी तैयारियों पर मुझे जल्द ही विराम लगाना पड़ा. रिया को पता चला, तो वह भी उदास हो उठी.

“क्या ममा! मेरी और विवेक की तो छुट्टी भी मंज़ूर हो गई है.”

“तो ऐसा कर इस बार तू भी उसके साथ अपने ससुराल हो आ. बहुत समय से तेरा वहां जाना नहीं हुआ. अब क्या करूं बेटा, तेरी मौसी का ऑपरेशन नहीं होता और वो नहीं बुलाती तो हम इस दौरान कहीं नहीं जाते. अब ऐसे अवसर पर ना भी नहीं कह सकते. ज़रूरत पड़ने पर घरवाले काम नहीं आएंगे, तो और कौन काम आएगा?”

“नहीं, नहीं. आप निश्‍चिंत होकर जाइए. मैं विवेक के संग मेरठ ही हो आती हूं.” रिया का निर्णय सुन मुझे कुछ तसल्ली मिली.

छोटी बहन का ऑपरेशन निबटाकर मैं घर लौटी, तब तक रिया की छुट्टियां समाप्त हो चुकी थीं और वे लोग भी अपने शहर लौट गए थे. मुकुल को ऑफिस रवाना कर मैं सूटकेस, बैग आदि खाली करने लगी. तभी रिया का फोन आ गया. वह ऑफिस जा रही थी. चहकते हुए उसने बताया कि उसका ससुराल का कार्यक्रम बहुत मज़ेदार रहा. “मम्मीजी और पापाजी तो इतने ख़ुश थे ममा कि मैं आपको बता नहीं सकती. उन्होंने भी अपने-अपने ऑफिस से दो-दो दिन की छुट्टी ले ली थी. हम पूरा मेरठ घूमे. मम्मीजी कह रही थीं कि वे तो हमेशा से चाहती थीं कि मैं भी विवेक के साथ छुट्टियों में उनके पास जाऊं. पर मेरी इच्छा न जानकर संकोच के मारे चुप रह जाती थीं. बता रही थीं कि इस बार विवेक भी ख़ूब खिला-खिला लग रहा है, वरना हमेशा तो आकर बस सोया रहता है. कहीं चलने को कहते हैं, तो कहता है सब देखा हुआ तो है. मैं तो यहां थकान उतारने आया हूं. पर इस बार तो उसका घूमने और खाने की फरमाइशों का दौर ही ख़त्म नहीं हो रहा है. यूं लग रहा है, जैसे दो ही दिनों में तुझे सब कुछ दिखा और खिला देना चाहता है. घर में कितनी रौनक़ हो गई है…” रिया की आवाज़ की चहचहाहट बता रही थी कि वह कितनी ख़ुश है. मैं आनंद के सागर में गोते लगाने लगी. उसकी बातें थीं कि ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थीं.

“और पता है ममा, उन्होंने मेरी ऑफिस संबंधी सारी समस्याएं चुटकियों में सुलझा दीं, जिन्हें आप भी नहीं सुलझा सकती थीं, क्योंकि आप वर्किंग नहीं हैं और विवेक भी नहीं सुलझा पाया था, क्योंकि वह वुमन नहीं है.” मैं अनायास ही मुस्कुरा उठी थी.

“उन्होंने मुझे घर और ऑफिस में तालमेल के इतने कारगर टिप्स बताए हैं कि मुझे सब कुछ बेहद आसान लगने लगा है. मम्मीजी तो वर्किंग वुमन होते हुुए भी घर को इतना सुव्यवस्थित और साफ़ रखती हैं कि मैं तो दंग रह जाती हूं. नौकर तो वहां भी हैं, पर उनसे काम लेने का भी एक तरीक़ा होता है, ये मुझे अब समझ आया. मैं उनसे विवेक की पसंद की कुछ डिशेज़ भी सीखकर आई हूं. और हां, उन्होंने मुझे एक बेहद ख़ूबसूरत घाघरा-चोली ड्रेस दिलवाई है, वो मैं नवरात्रि में पहनूंगी. मैंने और विवेक ने अब निश्‍चय किया है कि हम दोनों अब अपनी छुट्टियां ख़ुद को बांटकर नहीं, बल्कि छुट्टियों को बांटकर बिताएंगे. अगली छुट्टियों में विवेक भी मेरे साथ आपके पास रहेगा और लौटते समय हम दोनों दो दिन मेरठ रुकेंगे. क्यों ठीक है न ममा? आप तो हमेशा से यही चाहती थीं.”

“पर तू मानती कहां थी? तभी तो हमें जबरन मौसी के यहां जाना पड़ा.”

“जबरन? तो क्या मौसी का ऑपरेशन नहीं था?”

“अरे था. कैटरेक्ट (मोतियाबिंद) का छोटा-सा ऑपरेशन था. दो घंटे में करवाकर घर आ गए थे. उनकी बेटी लीना और दामादजी भी आए हुए थे. इसलिए ज़्यादा कुछ काम था ही नहीं. हम तो ऐसे ही अपनी तसल्ली के लिए चले गए थे.”

“ओह! तो मुझे सबक सिखाने के लिए यह योजना बनाई गई थी.”

“फिर क्या करती? मैंने फ्लैश फॉरवर्ड में देखा कि तेरे बार-बार अकेले आने से और विवेक के अकेले घर जाने से कोई भी ख़ुश नहीं था. पर तुम दोनों पति-पत्नी के निर्णय के बीच बोलकर कोई बुरा भी नहीं बनना चाहता था. बेटी, विवाह दो इंसानों का नहीं, दो परिवारों का मिलन होता है. दो इंसान निस्संदेह एक-दूसरे के साथ बेहद ख़ुश रह सकते हैं, लेकिन परस्पर जुड़ाव के लिए उसे दूसरे पक्ष से जुड़ी सभी चीज़ों से जुड़ना होता है. जैसे मुझे तुम अत्यंत प्रिय हो, तो तुमसे जुड़ा विवेक, उसके माता-पिता, भाई-बहन आदि स्वतः ही प्रिय लगने लगे. उनसे जुड़ाव तुम्हारे प्रति जुड़ाव बढ़ाएगा, घटाएगा नहीं. क्या तुम्हें नहीं लगता कि ससुराल से लौटने के बाद विवेक तुम्हें और भी ज़्यादा प्यार करने लग गया है?”

“हां ममा, बिल्कुल ऐसा ही है. मैं ख़ुद इस बदलाव पर हैरान हूं, पर तुम्हें कैसे पता चला?”

“अपनी फ्लैश फॉरवर्डवाली रील में मुझे सब कुछ साफ़-साफ़ नज़र आ रहा है.”

“ओह ममा, आपने तो मेरा तीर मुझ ही पर चलाकर मेरी ज़ुबान पर ताला लगा दिया है.” अपनी पराजय स्वीकारते हुए भी रिया की ख़ुशी छुपाए नहीं छुप रही थी.

shaili mathur

    शैली माथुर

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कहानी- डोर का धागा (Short Story- Dor Ka Dhaga)

Hindi Story

उसे अपने शरीर में एक लिजलिजाहट-सी महसूस हुई. अलग होने पर दुखी होने की बजाय ये सब भद्देपन का प्रदर्शन कर रही हैं. क्या अभय से तलाक़ लेकर वह भी ऐसी बन जाएगी. नहीं, वह तो कतई ऐसी नहीं बनना चाहती… घर-परिवार, बच्चे… सब उसे चाहिए. पुरुष के अपने जीवन में होने के सच को वह सुखद मानती है, कोई नफ़रत थोड़े ही है उसे अभय से या पुरुष सत्ता से…

अग्नि के समक्ष सात फेरे लेने से ही स्त्री-पुरुष क्या जन्म-जन्म के बंधन में बंध जाते हैं और फिर सात जन्मों तक उनका साथ हो जाता है… नहीं मानती मैं इन बातों को. सब बकवास है कि मन का मेल होने के लिए सात फेरे लेने ज़रूरी हैं और अब तो व़क्त इतना बदल गया है कि तन का मेल होने के लिए भी सात फेरे लेने की ज़रूरत ख़त्म हो गई है… जानती हूं कि मेरी सोच और बातें समाज विरोधी हैं और न जाने कितने धर्म के ठेकेदार यह सुनते ही मुझे समाज से बहिष्कृत करने को आतुर हो उठेंगे, पर यही सच है. तुम चाहो तो किसी का भी मन टटोलकर देख लेना.”

मनस्वी की बातें सुन हैरान सुधा के मुंह से केवल इतना ही निकला, “क्यों ऐसी बातें कर रही है. जो नियम है उसका पालन तो हमें करना ही होगा, चाहे इच्छा से, चाहे अनिच्छा से.” पर उसकी बात को अनसुना कर मनस्वी अपनी ही रौ में बोलती जा रही थी.

“देख न सुधा, कैसी विडंबना है यह भी कि भारतीय विवाह की परंपराओं में सात फेरों का चलन है. हिंदू धर्म के अनुसार सात फेरों के बाद ही शादी की रस्में पूरी होती हैं. सात फेरों में दूल्हा व दुल्हन दोनों से सात वचन लिए जाते हैं. ये सात फेरे ही पति-पत्नी के रिश्ते को सात जन्मों तक बांधते हैं. हर फेरे का एक वचन होता है, जिसमें पति-पत्नी जीवनभर साथ निभाने का वादा करते हैं. इसका मतलब तो यह हुआ कि विदेशों की शादियां सात जन्मों के लिए नहीं होती हैं. वहां तो वे फेरे लेते ही नहीं हैं. अच्छा ही है एक जन्म में ही पीछा छूट जाता है.” मनस्वी के स्वर में कड़वाहट थी.

“अरे वहां तो जब चाहे पीछा छूट जाता है, फिर शादी हुए दो दिन या दो महीने ही क्यों न हुए हों. वहां न समझौता करने की ज़रूरत है, न निभाने की मजबूरी. झट से डिवोर्स लिया और हो गए अलग.” सुधा ने माहौल को थोड़ा हल्का करने के ख़्याल से मज़ाकिया अंदाज़ में कहा.

“वही तो मैं कह रही हूं कि वहां जब सात फेरे और सात वचन लिए ही नहीं जाते, तो क्या जो लोग अलग नहीं होते, वे क्या एक-दूसरे का ख़्याल नहीं रखते! वे भी तो प्यार करते ही हैं एक-दूसरे को, फिर क्यों परंपरा निभाने के नाम पर हमारे यहां रिश्तों की ज़ंजीरों में बंधे रहने को बाध्य किया जाता है. क्या ज़िंदगीभर समझौता करते रहना जीने का सही तरीक़ा है?”

“देख मनस्वी, समझौता करने में कोई बुराई तो नहीं है, क्योंकि अलग होकर ज़िंदगी जीना भी आसान नहीं है. मैं यह नहीं कह रही कि तू सक्षम नहीं है और अकेले जीवन नहीं काट सकती, पर मुझे लगता है कि डिवोर्स लेने जैसा क़दम तभी उठाना चाहिए, जब तुम किसी और के साथ बंधने को तैयार हो. क्या तूने और कोई साथी ढूंढ़ लिया है, जो अभय से अलग होने का ़फैसला ले रही है? जो भी करना, बहुत सोच-समझकर करना. बात न फेरे लेने की है, न सात वचनों या सात जन्मों की, बात तो कमिटमेंट, विश्‍वास और समर्पण की है.”

सुधा की बात सुन मनस्वी सोच में पड़ गई. वह बेशक अभय के साथ नहीं रहना चाहती, पर किसी और की अपने जीवन में कल्पना तक नहीं कर सकती है. उसके मन में ऐसा ख़्याल तक कभी नहीं आया. अभय के सिवाय कोई और… नहीं, नहीं… मनस्वी सिहर उठी. वह बेशक एक मॉडर्न, एजुकेटेड और वर्किंग वुमन है, पर कहीं न कहीं भीतर परिवार और संग-साथ की इच्छा रखती ही है. अभय में बहुत सारी बुराइयां हैं, पर यह सच है कि जब भी उसके साथ होती है, वह सुरक्षित महसूस करती है. बस, यही शिकायत है कि अभय उसे समझने की कोशिश नहीं करता. उसकी काम की परेशानियों को उसके देर से आने का बहाना कह मज़ाक उड़ाता है और उसका दूसरे पुरुषों से बात करना उसके अंदर शक पैदा करता है. आख़िर क्यों नहीं वह उसे एक स्पेस देना चाहता.

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उसने कहीं पढ़ा था कि औरत भी पतंग की तरह होती है, जब तक उसकी डोर किसी के हाथ में होती है, वह इठलाती, इतराती आसमान में उड़ती रहती है. जब वह आसमान में लहरा रही होती है, तो सबकी नज़रें और सिर उसकी ओर होते हैं. सम्मान भाव होता है सबके मन में. हर कोई उसे संभालने के प्रयास में लगा रहता है. पूरा परिवार उसे संभालने के लिए एकजुट हो खड़ा रहता है, जैसे वह मानो उनकी ख़ुशियों का आधार हो, लेकिन जैसे ही वह पतंग कटती है, सबके चेहरे लटक जाते हैं और फिर वह या तो कट-फटकर इधर-उधर गिर जाती है या किसी के पैरों के नीचे आ जाती है. जाने-आनजाने हर कोई उसे रौंदता आगे बढ़ जाता है.

औरत भी जब तक एक डोर से बंधी रहती है, तो उसका मान-सम्मान बना रहता है, लेकिन डोर के टूटते ही उसके भटकाव की कोई सीमा नहीं रहती है.

“क्या सोचने लगी मनस्वी, बता न जो तू अभय से तलाक़ लेने की ज़िद कर रही है, क्या तू फिर से दूसरी शादी करेगी?”

“दूसरी शादी करने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता सुधा.” मनस्वी धीरे-से बोली. वह अंदर ही अंदर स्वयं को मथ रही थी जैसे.

“फिर क्या सारी ज़िंदगी अकेले काटने का इरादा है. माना तुझे फाइनेंशियली कोई प्रॉब्लम नहीं है, पर अकेलेपन को भरने कौन आएगा तेरे पास. तेरे भाई-बहन तो तुझे उकसा रहे हैं कि अभय से अलग हो जा, तो क्या वे तेरा साथ देंगे. याद रख, उनका अपना घर-संसार है. कुछ दिन तो वे तेरा साथ देंगे, पर फिर अपनी दुनिया में मस्त हो जाएंगे. ऐसा ही होता है. बेशक वे तुझसे प्यार करते हैं, पर उनकी अपनी भी ज़िम्मेदारियां हैं. इस कठोर सत्य को जितनी जल्दी तू स्वीकार लेगी, उतना अच्छा होगा. अभी पैंतीस साल की है तू. पूरी ज़िंदगी पड़ी है.”

“तो तू ही बता मैं क्या करूं? अगर मैं मां नहीं बन सकती, तो इसमें मेरा क़सूर है. अगर मैं अभय से ज़्यादा कमाती हूं, तो क्या इसमें मेरा कसूर है… अगर मैं उससे ज़्यादा कामयाब हूं, तो मेरा कसूर है… क्यों नहीं वह चीज़ों को सहजता से लेता, बस हमेशा मानसिक रूप से प्रताड़ित करता रहता है. हम साथ ख़ुश रह सकते हैं, पर वह तो जैसे ख़ुश रहने को कोई बड़ा क्राइम मानता है.” मनस्वी के आंसू बह निकले थे.

सुधा उसकी पीठ सहलाती हुई बोली, “चल मान लिया कि अभय में लाख बुराइयां हैं और तू कहती है कि वह तुझे नहीं समझना चाहता, पर क्या तूने कभी उसे समझने की कोशिश की है. शायद उसके मन में भी दुविधाओं के अनगिनत जाले हों.”

“सुधा, उसकी तरफ़दारी मत करो. सारे जाले उसने ख़ुद बुने हैं. मैंने उसे कभी ऐसा करने को मजबूर नहीं किया. उसके छोटे शहर की मानसिकता उसे यह सब करने के लिए उकसाती रहती है. शहर आना तो अच्छा लगता है, पर शहर के तौर-तरी़के और शहर की बीवी न जाने क्यों कुछ समय बाद आंख की किरकिरी बन जाती है.”

“तेरे सारे तर्क क़बूल… पर ज़रा सोच तो, उसके साथ बंधी तो हुई है, अभय नाम की डोर जिस दिन कट गई तो क्या होगा.”

“तो उसकी ज़्यादतियां सहन करती रहूं?”

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“मैं नहीं कहती कि तू ज़्यादतियां सहे, पर हो सकता है, जो तुझे उसकी ज़्यादतियां लग रही हों, वह उसका स्वभाव हो. ठोस ज़मीन पर पैर रखकर एक बार सोच मनस्वी. ये ज़्यादतियां तेरी उस ज़िंदगी से अच्छी होंगी, जो तुझे तलाक़ लेने के बाद झेलनी पड़ेंगी. आसान नहीं होता अकेले रहना… सुनने और पढ़ने में बेशक अच्छा लगे कि पति के ज़ुल्मों को सहने से इंकार करके, फलां ने विद्रोह किया और उसे कोर्ट में घसीटकर सबक सिखाया… औरत होने के हक़ की लड़ाई की… पर वास्तव में सच्चाई इसके विपरीत होती है. क्या किसी ने कभी यह ख़बर छापी है कि उस फलां औरत ने तलाक़ के बाद किस तरह ज़िंदगी काटी… यह औरतों की मर्दों के ख़िलाफ़ लड़ाई… कुछ तथाकथित फेमिनिस्टों की साज़िश है और तू इसका शिकार बन रही है.”

सही कह रही थी क्या सुधा… मनस्वी की आंखों के आगे अपनी ऑफिस की कुछ कलीग्स के चेहरे घूम गए. स्वयं को गर्व से फेमिनिस्ट कहनेवाली रीमा, तो अक्सर ही उसे तलाक़ लेने के लिए उकसाती आ रही है, वरना मनस्वी के दिमाग़ में इससे पहले कभी अभय से अलग हो जाने की बात आई ही नहीं थी.

अगले दिन जब वह ऑफिस गई, तो रीमा उसे देखते ही बोली, “क्या सोचा तूने. तलाक़ ले रही है न… मैं तो कहती हूं जूते की नोक पर रखना चाहिए इन मर्दों को. अरे, तू क्या किसी से कम है. मुझे देख, शादी के एक साल बाद ही अलग हो गई थी और अब अपनी मर्ज़ी से जीती हूं. कोई रोक-टोक नहीं है. मस्त लाइफ है अब यार.”

पूजा जो तीन साल से अलग रह रही थी, बोली, “मैंने तो बच्चा भी उसके पास ही छोड़ दिया. कस्टडी के लिए हल्ला कर रहा था, तो मैंने सोचा चलो ज़िम्मेदारी से छुट्टी मिल गई. हफ़्ते में एक दिन मिलने चली जाती हूं बेटी से.”

“मेरा एक्स हस्बैंड तो आज भी मेरे पीछे घूमता है, पर मैं घास नहीं डालती.” नैना ने आंखें मटकाते हुए कहा था.

“तुम भी हमारे फेमिनिस्ट क्लब का हिस्सा बन जाओ मनस्वी.” बेशर्मों की तरह हंसी थी रीमा उसे आंख मारते हुए.

उसे अपने शरीर में एक लिजलिजाहट-सी महसूस हुई. अलग होने पर दुखी होने की बजाय ये सब भद्देपन का प्रदर्शन कर रही हैं. क्या अभय से तलाक़ लेकर वह भी ऐसी बन जाएगी. नहीं वह तो कतई ऐसी नहीं बनना चाहती…

घर-परिवार, बच्चे… सब उसे चाहिए. पुरुष के अपने जीवन में होने के सच को वह सुखद मानती है, कोई नफ़रत थोड़े ही है उसे अभय से या पुरुष सत्ता से… अभय, समझो तो मुझे एक बार… नहीं कटने देना चाहती वह डोर को. थाम लेगी अब की बार वह डोर के धागे को…

देर ही हो गई थी उसे ऑफिस से निकलने में. फाइनेंशियल ईयर एंडिंग था… सारे डेटा दुरुस्त करने थे. वह टैक्सी लेने के लिए चलते-चलते ऑफिस के पास ही बने होटल तक आ गई थी. उसका एक कप कॉफी पीने का मन हो रहा था. वैसे भी सवारियों को छोड़ने आने के कारण टैक्सी यहां से तुरंत ही मिल जाती थी. वह होटल के अंदर घुसने ही वाली थी कि तभी एक जाना-पहचाना स्वर उसके कानों से टकराया.

“ओह, करण, तुम नहीं जानते कि मुझे तुम्हारी कितनी ज़रूरत है. अपने पति से अलग हो जाने के बाद खालीपन भर गया है ज़िंदगी में. मुझे अपनी ज़िंदगी में किसी पुरुष की ज़रूरत है. मैं जानती हूं कि तुम शादीशुदा हो, पर प्लीज़ मुझसे अलग मत हो…” नशे में धुत रीमा, एक पुरुष के कंधे का सहारा लेकर लड़खड़ाती हुई टैक्सी में बैठ रही थी.

Suman Bajpai

   सुमन बाजपेयी

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कहानी- स्वध्यान (Short Story- Swadhyan)

Hindi Kahani

सबके हंसते-खिलखिलाते चेहरों के बीच वो भी हंसती-खिलखिलाती काम किए जा रही थी. हर काम के लिए उसे पुकारा जाना, हर सलाह-मशवरे में उसकी राय लेना, इतना ही काफ़ी था उसका ये विश्‍वास कायम रखने के लिए कि सब उसे चाहते हैं, उसकी कद्र करते हैं. मगर तीन-चार दिनों से उसका ये विश्‍वास एक छलावा सिद्ध हो रहा है. उसे लग रहा है कि यह एक सोच-समझकर बुना गया भ्रमजाल है, जो उसके इर्द-गिर्द फैलाया गया है, ताकि कहीं किसी विद्रोही स्वर की गुंजाइश न बचे.

मानसी ने घड़ी पर नज़र डाली, 6 बज चुके हैं. उफ्! इतनी ज़ल्दी सुबह क्यों हो जाती है? उसके मानस पटल पर अगले तीन  घंटे चलनेवाला दैनिक घटनाक्रम घूमने लगा. बच्चों को उठाना, नहलाकर तैयार करना, पापाजी का बादाम दूध और स्प्राउट… मम्मीजी का चरणामृत… उफ्! उसे इतने काम सोचकर ही चक्कर आने लगे. झटके से चादर हटाकर उठना चाहती थी, मगर कमर जवाब दे गई थी. हफ़्ते भर से पीछे पड़ा बुखार कल विदा हो गया, मगर कमज़ोरी अभी भी साथ छोड़ने को तैयार नहीं थी. ऊपर से इस कमरदर्द ने आ जकड़ा था.

मानसी ने ख़ुद को इतना असहाय कभी महसूस नहीं किया होगा, जितना आज कर रही है. घर की बैकबोन, अकेली कर्ता-धर्ता गृहिणी के बिस्तर पर पड़े रहने से घर की सारी व्यवस्था ही चरमरा गई थी, कोई काम ठीक से और समय पर नहीं हो पा रहा था. जिधर देखो बिखरा सामान, बच्चों की क़िताबें, धुले-बेधुले कपड़े. मानसी को ऐसी अव्यवस्था की तनिक भी आदत नहीं है. बीमारी से ़ज़्यादा बदहाल घर ने उसे फ्रस्ट्रेट कर रखा है. कल ख़ुद से वादा करके सोई थी कि सुबह उठेगी और घर की गाड़ी वापस पटरी पर ले आएगी, मगर आज उसकी कमर धोखा दे गई.

अब चाहे जो भी हाल हो, काम तो करने ही हैं. उसने एक स्ट्रॉन्ग पेनकिलर निगला, ख़ुद को संयत किया और उठ खड़ी हुई. “शुभम, शैली उठो, स्कूल को देर हो जाएगी.” बच्चों को उठाकर बाहर आई. पतिदेव नितिन हॉल में अख़बार पढ़ रहे थे, चाय शायद ख़ुद बना ली है. मांजी नहाने जा चुकी हैं. बाथरूम से ही मंत्रों की आवाज़ें आ रही हैं. उनका पूजा-पाठ नहाने के साथ ही शुरू हो जाता है. रसोई में आई, तो देखा कुछ भी काम शुरू नहीं हुआ. लाचारी मिश्रित ग़ुस्सा उबलने को तैयार है. मन किया फट पड़े सभी पर. घर में किसी का भी दुख-दर्द हो, हारी-बीमारी हो, बढ़-चढ़कर सेवा की है और ये लोग उसे हफ़्ता भर भी न निबाह पाए. माना नितिन को ऑफ़िस जाना है, तो क्या थोड़ा जल्दी उठकर अख़बार पढ़ने की बजाय बच्चों को तैयार नहीं कर सकते? मम्मीजी उठकर सीधे नहाने और पूजा-पाठ करने की बजाय बच्चों के टिफ़िन तैयार नहीं कर सकतीं? पापाजी 5 बजते ही सैर और योगा के लिए क्लब चले जाते हैं और फिर नाश्ते तक का समय अख़बारों के ढेर में घिरे बिताते हैं, क्या वो बच्चों को बस स्टॉप तक छोड़ने की ज़िम्मेदारी भी नहीं उठा सकते?

आज तक उसने ऐसा कुछ नहीं सोचा था, जो आज सोच रही है. अब तक ज़रूरत ही नहीं पड़ी कभी. हफ़्ते भर पहले तक सब सामान्य था. पिछले 12 सालों से सभी की पसंद-नापसंद और ज़रूरतों का ख़्याल रखते हुए घर के सभी काम नियत समय पर आगे से भाग-भागकर किए जा रही थी, वो भी स्वेच्छा और ख़ुशी के साथ. अजीब-सी संतुष्टि मिलती थी उसे ऐसा करके. सास- ससुर तारीफ़ करते नहीं थकते थे. बड़ी क़ाबिल है हमारी बहू. घर के साथ-साथ बाहर के सभी कामों को भी बख़ूबी करती है. कार ड्राइव करती है, तो बच्चों को क्लासेस में लाना-ले जाना, ख़रीददारी, बैंक के काम सभी वही निपटा लेती है. ‘मानसी तुम न होती तो ये घर कैसे चलता, इस घर के लिए तुम्हारा जो कॉन्ट्रीब्यूशन है उसका कोई मूल्य नहीं है.’ नितिन भी अक्सर प्रशंसा करते. ऐसी तारीफ़ ही उसे थकान के बावजूद निरंतर कार्यरत रहने की ऊर्जा प्रदान करती थी. ख़ुद को लकी समझती थी वो. उसके जैसी कितनी ऐसी गृहिणियां हैं, जो गृहकार्यों की अनवरत् चलनेवाली चक्की में पिसती जाती हैं, मगर कहीं किसी प्रशंसा के दो बोल भी सुनने को नहीं मिलते. उनके हर काम को टेक इट फॉर ग्रांटेड लिया जाता है, मगर उसे कितनी सराहना मिलती है. ख़ासकर उसके बनाए हुए खाने को लेकर. पापाजी तो मम्मीजी को कह भी देते हैं, ‘तुम तो अब किचन में हाथ मत ही लगाओ तो अच्छा है, बहू जैसी पाक कला तुममें कहां?’ और चाहे-अनचाहे मम्मीजी ने इस तथ्य को स्वीकारते हुए अपना कार्यक्षेत्र सीमित कर लिया. सबके हंसते-खिलखिलाते चेहरों के बीच वो भी हंसती-खिलखिलाती काम किए जा रही थी. हर काम के लिए उसे पुकारा जाना, हर सलाह-मशवरे में उसकी राय लेना, इतना ही काफ़ी था उसका ये विश्‍वास कायम रखने के लिए कि सब उसे चाहते हैं, उसकी कद्र करते हैं. मगर तीन-चार दिनों से उसका ये विश्‍वास एक छलावा सिद्ध हो रहा है. उसे लग रहा है कि यह एक सोच-समझकर बुना गया भ्रमजाल है, जो उसके इर्द-गिर्द फैलाया गया है, ताकि कहीं किसी विद्रोही स्वर की गुंजाइश न बचे.

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इससे पहले जब कभी बुखार आया, पेनकिलर खाकर किसी भी तरह खड़ी हो जाती थी. धीरे-धीरे ही सही सब निपटा देती थी, मगर इस बार शरीर साथ नहीं दे रहा है. नितिन ने कह दिया कि मेरे नाश्ते-टिफ़िन की चिंता मत करो, ऑफ़िस में खा लूंगा. मम्मीजी भी अपना और पापाजी का टोस्ट व दाल-रोटी से काम चला रही हैं, मगर उसका क्या?  और बच्चे, नित नए व्यंजन खानेवाले बच्चे कब तक टोस्ट व दाल-रोटी खा पाएंगे? उनके कपड़े, यूनिफ़ॉर्म, होमवर्क, प्रोजेक्ट वर्क – वो सब कौन देखेगा? इतने सालों में पहली बार स्कूल से शिकायत आई है. शैली का प्रोजेक्ट समय पर नहीं बना, कोई साथ बैठकर कराता तभी तो. पापाजी चाहते, तो बनवा सकते थे, ग्लोबल वॉर्मिंग पर ही तो था. सबने अपना-अपना खाना-पीना संभाल लिया, पर इससे आगे कुछ करने की किसी ने ज़रूरत नहीं समझी. क्या इसी को कहते हैं सहयोग देना और ख़्याल करना?

मम्मीजी ने भी दो दिन तो हालचाल पूछा, तीसरे दिन स्वर से चिंता और झल्लाहट टपकने लगी. “अभी भी बुखार उतरा नहीं क्या? खड़ी नहीं हो पा रही हो क्या? दवाई बदल कर देख लो.” चेहरे के भाव स्पष्ट थे- बहुत आराम हुआ, अब खड़े होकर घर संभालो. नितिन भी एक-दो दिन सपोर्ट दिखाकर तीसरे दिन से रूटीन लाइफ़ में व्यस्त हो गए. सबसे ज़्यादा बच्चों पर बन आई है. अब न कोई उन्हें टीवी से हटकर पढ़ाई करने को कहता है, न ही कोई रात को ज़बरदस्ती ब्रश कराता है. किसी-किसी दिन तो बगैर नहाए ही स्कूल चले गए हैं. छठे दिन बुखार उतरा, तो मम्मीजी ने राहत की सांस ली और पहले की तरह अपने रूटीन पूजा-पाठ में लग गईं. ये पूछना भी ज़रूरी नहीं समझा कि मेरी सुबह उठकर काम करने की हालत है भी या नहीं… मानसी के विचारों की अनवरत धारा बहे जा रही थी. सोचते-सोचते बच्चों का नाश्ता, टिफ़िन कब तैयार हो गए, उसे पता ही नहीं चला. मानसी दोहरे अवसाद में है. पहला यह कि उसे घरवालों का रवैया ग़ैरज़िम्मेदाराना लग रहा है और दूसरा यह कि अब उसका शरीर उसकी ज़िम्मेदारियों से लय नहीं मिला पा रहा है.

“नितिन आज बच्चों को स्कूल बस में बैठा कर ऑफ़िस जाना.” स्वर आदेशात्मक था और गंभीर भी, नितिन कोई ना-नुकुर नहीं कर पाए.

मम्मीजी पूजा से निपटकर रसोई में आ गई हैं. “बहू पापाजी के लिए कुछ तैयार किया क्या?” मानसी ने प्रत्युत्तर नहीं दिया. इतनी ऊर्जा भी शेष नहीं बची है कि किसी से उलझ सके. बच्चों का काम ख़त्म कर चुपचाप कमरे में आकर लेट गई. उसके विचित्र व्यवहार से मांजी हतप्रभ थीं. नितिन भी कुछ घबरा गए.

“तबियत अभी भी ठीक नहीं है क्या? मेरी चिंता मत करना, मैं ऑफ़िस में कुछ खा लूंगा.”

“तुम्हारी चिंता नहीं, अपनी चिंता है मुझे.” स्वर तीखा हो चला.

“डॉक्टर को कंसल्ट…”

“थैंक्स, मैं अपना ख़ुद देख लूंगी.” मानसी ने बात बीच में ही काट दी. नितिन ने चुपचाप कमरे के बाहर जाना ही बेहतर समझा.

पेनकिलर अपना असर दिखा चुकी थी, मानसी हिम्मत बटोरकर अपनी फैमिली डॉक्टर से कंसल्ट करने चली गई. सभी रिपोर्ट साथ ले ली थी. उसने पिछली बार न जाने क्या-क्या टेस्ट और एक्स-रे बताए थे. सभी रिपोर्ट देखकर डॉक्टर कुछ देर मौन रही.

“सब ठीक तो है न डॉक्टर?”

“हूं… मेरी नज़र से तो कुछ भी ठीक नहीं है. हां, मगर तुम्हारे जैसी औरतों के लिए ये कुछ ख़ास बात नहीं है. तुम्हारे लिए तो ख़ास बात उस दिन होती है, जब तुम बिल्कुल ही बिस्तर पकड़ लेती हो.”

“क्या मतलब? मैं समझी नहीं.”

“मतलब ये मानसी कि तुम्हारी सभी रिपोर्ट मुझसे तुम्हारी ये शिकायत कर रही हैं कि घर में सबका बख़ूबी ख़्याल रखनेवाली मानसी ने अपना ज़रा भी ख़्याल नहीं रखा. तुम में कैल्शियम, विटामिन ‘बी-12’ की ज़बरदस्त कमी है. हीमोग्लोबिन भी बहुत कम है और तुम्हारी स्पाइन का एक्स-रे बता रहा है कि अगर तुमने तुरंत फ़िज़ियोथेरेपी और प्रॉपर एक्सरसाइज़ शुरू नहीं की, तो कभी भी स्लिप डिस्क हो सकती है.”

“डॉक्टर, आप तो जानती हैं मेरे घर का हाल, मरने तक की फुर्सत नहीं निकाल पाती हूं.”

“हां, मैं अच्छे से जानती हूं और ये वाला जुमला तो मैं रोज़ अपने न जाने कितने पेशेंट से सुनती हूं, जिन्हें लगता है कि दुनिया उनके दम पर ही चल रही है. अगर उन्होंने अपनी व्यस्त दिनचर्या के कुछ लम्हे ख़ुद को दे दिए, तो संसार में बड़ी भारी उथल-पुथल मच जाएगी. अच्छा, ज़रा सोचकर बताओ तुम्हारी हफ़्ते भर की बीमारी ने घर को हिलाकर रख दिया, तो अगर अगली बार ये अवधि ज़्यादा बढ़ गई, तो फिर उनका क्या होगा? तब क्या तुम्हारे बच्चे परेशान नहीं होंगे और अगर तुम्हें स्पाइन की कोई बड़ी प्रॉबल्म हो गई, तो संभव है महीनों बिस्तर पर रहना पड़े, तब क्या करोगी?”

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डॉक्टर की बातों ने मानसी को हिला दिया. पिछले एक हफ़्ते में जो उसके बच्चों पर गुज़री थी, उसके दोहराव की बात सोचकर ही वो कांप उठी. बच्चों के साथ वो किसी बात पर समझौता नहीं कर सकती थी. उनके खान-पान, पढ़ाई, स्वास्थ्य आदि को लेकर वो बेहद सजग थी. डॉक्टर ने अपना काम कर दिया था. कुछ फूड सप्लिमेंट्स, कुछ दवाइयां, लगातार 15 दिनों की फ़िज़ियोथेरेपी और प्रॉपर रेस्ट प्रिस्क्राइब कर दिया. इससे ज़्यादा वो कुछ नहीं कर सकती थी. इससे आगे जो कुछ करना था, मानसी को ही करना था. उसे पता था, इस बिज़ी शेड्यूल से दो-तीन घंटे अपने लिए निकालना टेढ़ी खीर है. घर में सब को जी हुज़ूरी की आदत जो लगी हुई है, मगर वो जानती थी कि इसके लिए वो स्वयं ही ज़िम्मेदार है. शैली 10 और शुभम 8 साल का है. मगर अभी तक वही उनके सारे काम कर रही है. चाहे कपड़े निकालकर देना हो, बाथरूम में तौलिया पकड़ाना हो, जूते-चप्पलें व्यवस्थित रखना हो, बैग लगाना हो या फिर बाल बनाना हो. हर काम के लिए वे उसी पर निर्भर हैं. हों भी क्यों न, उसने कभी कोशिश ही नहीं की, उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की. ममता में अंधी होकर उसने कभी ये भी नहीं सोचा कि ऐसी आदतें आगे बच्चों को दुख देंगी और उसे भी. तभी उसकी हफ़्तेभर की बीमारी ने बच्चों पर इतना बुरा असर डाला. अगर वो अपने काम ख़ुद करना जानते, तो इस समय न उसे परेशानी होती, न ही उन्हें. ख़ैर जो हो गया, उसके बारे में सोचकर कुढ़ने से क्या फ़ायदा? अब आगे कैसे स्थिति सुधारी जाए, इस पर ध्यान देना है. सबका अच्छे से ध्यान रखने के लिए उसे अपना ध्यान रखना ही होगा. धीरे-धीरे ही सही, सब ठीक हो जाएगा. मन में सकारात्मक पहल लिए मानसी घर की ओर चल पड़ी.

“आ गई बहू, क्या बोली डॉक्टर? सब ठीक है न?” मांजी चिंतित थीं.

“हां, अभी तक तो सब ठीक, मगर…”

“चलो शुक्र है भगवान का.” मांजी मानसी की बात बीच में ही काटते हुए ईश्‍वर को धन्यवाद देने लगीं. इतना भर सुनकर ही उनकी समस्त चिंताएं दूर हो गई थीं. इससे आगे कुछ डिटेल जानने की न उन्हें ज़रूरत थी, न ही चाहत. “लंच के लिए काफ़ी देर हो गई है. ऐसा करो कुछ हल्का-फुल्का ही बना लो. तुम्हारे पापाजी भी आते होंगे.” मांजी ने फटाफट आदेश दिया.

“मेरी तो अभी हिम्मत नहीं है. आपने पीछे कुछ नहीं बनाया है, तो फिर कुछ बाहर से ही ऑर्डर कर दीजिए.” मानसी ने स्पष्ट लाचारी व्यक्त की. जवाब सुन मांजी के चेहरे पर भले ही तनाव की रेखा खिंच गई थी, मगर मानसी ने ख़ुद को बेहद हल्का महसूस किया. उसे लगा जैसे इतना कहने भर से ही उसके ऊपर लदा भारी लबादा एकाएक उतर गया. शायद एक निश्‍चित निर्णय पर पहुंचकर असंभव-सी दिखनेवाली चीज़ें भी आसान हो जाती हैं.

“तेरे पापाजी को तो बाहर का खाना बिल्कुल भी पसंद नहीं. बेकार में उनका मूड बिगड़ जाएगा.”

“तो फिर आप देखिए, कैसे मैनेज करना है. वैसे स़िर्फ आज ही की बात है, कल से एक नौकर आ रहा है. मैंने बात कर ली है, वो घर के ऊपर के काम के साथ-साथ खाना भी बना लिया करेगा.”

“मगर तेरे पापाजी को तो नौकरों के हाथ का बिल्कुल नहीं चलता.” स्वर के साथ-साथ चेहरे पर भी कड़वाहट छितरने लगी.

“तो फिर पापाजी के लिए आप देख लेना, बाकी सबका वो बना दिया करेगा.”

“फिर तुम क्या करोगी?” लगभग चीखती-सी मांजी पहली बार अपना आपा खो बैठीं.

“मुझे अब ख़ुद को भी समय देना है.” संक्षिप्त-सा उत्तर देकर मानसी अपने कमरे की तरफ़ बढ़ चली. वो विस्मित थी. कितनी बड़ी बात हो गई आज घर में, जीवन में पहली बार उसके और सासू मां के बीच इस तरह की बात हुई, मगर उसे न कोई ग्लानि है, न ही कोई चिड़चिड़ाहट, बल्कि वो ख़ुद को बेहद शांत और सहज महसूस कर रही है.

बच्चे स्कूल से आ चुके थे. मानसी उनका खाना-पीना अच्छे-से निपटाकर ऊपर अपने कमरे में ले गई. मांजी घंटे भर से अपने कमरे में अकेले बैठी बड़बड़ा रही थीं, जब बात बर्दाश्त से बाहर हो चली, तो रहा न गया. सोचा बहू की ऐसी बेअदबी बिल्कुल नहीं सहेगी. जो भी हो, वो अभी भी घर की बड़ी हैं. माना बहू को थोड़ी ढील दे रखी थी, मगर ज़रूरत पड़ने पर लगाम कसना उन्हें आता है. अगर वो चाहती है कि घर के कामकाज से कटकर बस अपने बच्चों का करे, तो इस घर में ऐसा नहीं चलेगा. उसके बिगड़े तेवर ठीक करने ही पड़ेंगे. रौद्र रूप धारण किए मांजी मानसी के कमरे की ओर बढ़ चलीं, मगर अंदर से आती आवाज़ों ने उनके क़दम रोक दिए. मानसी बच्चों को अपनी बिगड़ती सेहत और उनकी ज़िम्मेदारियों के बारे में समझा रही थी और बच्चे उससे वादा कर रहे थे कि वो न स़िर्फ अपने काम अच्छे से करेंगे, बल्कि अपनी प्यारी मम्मी की सेहत का भी ध्यान रखेंगे. मांजी सब चुपचाप सुन रही थीं. उन्होंने महसूस किया कि उनके पैर कमरे में दाख़िल होने को तैयार नहीं हैं और वो बोझिल क़दमों से अपने कमरे में वापस लौट गईं.

 

Deepali Agarwal

दीपाली अग्रवाल

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