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कहानी- रिश्तों का दर्द (Short Story- Rishto Ka Dard)

“मैं होती तो शायद यह नहीं करती जो आपने किया.”

“नहीं रति, कभी-कभी अपनों को ही सुखी देखने के लिए अनचाहे, कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं. वह मां ही क्या जो बच्चों के लिए त्याग न कर सके. सम्बन्धों को समाप्त करने या बिगाड़ने से अच्छा है उन्हें बहानों की आड़ में एक सुन्दर मोड़ दे दिया जाए.”

Short Story in Hindi

“अरे, आप इन्दू दी हैं ना. यहां! इस इण्टरव्यू में!! इतने दिनों बाद!” प्रधानाचार्या रति शर्मा कक्ष के दरवाज़े को खोलकर अन्दर प्रवेश करती हुई महिला को देखकर चौंकते हुए बोली. आश्‍चर्य से उनकी आंखें फैल गयी थीं. कॉलेज में वर्षों से रिक्त पड़े पदों को सेवानिवृत्त शिक्षकों से भरने के लिए उन्होंने जो विज्ञापन दिया था, उसी का आज इंटरव्यू चल रहा था. “हां, मैं इन्दू कुलश्रेष्ठ ही हूं.” मुस्कुराते हुए धीमी आवाज़ में उस महिला ने कहा, “आइये… आइये इधर बैठिए.” कहते-कहते रति शर्मा अपनी कुर्सी से लगभग खड़ी हो गई. कॉलेज के मैनेजर डॉ. वर्मा तथा साक्षात्कार समिति के अन्य सदस्यों ने प्रश्‍नसूचक दृष्टि से पहले रति शर्मा, फिर उस नवागंतुका को देखा. सबकी जिज्ञासा के प्रत्युत्तर में रति शर्मा ने कुर्सी पर बैठते हुए उस महिला की ओर संकेत करते हुए कहा, “ये हैं मिसेज इन्दू कुलश्रेष्ठ, इस कॉलेज की भूतपूर्व प्रवक्ता, जो वर्ष 1995 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर यहां से चली गयी थीं. इन्हें स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति देने के लिए न पिछले मैनेजर साहब तैयार थे, न ही भूतपूर्व प्रधानाचार्य डॉ. अस्मित निगम, क्योंकि यह इस कॉलेज की बहुत ही योग्य एवं बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न शिक्षक-शिक्षिका थीं. छात्राएं ही नहीं, हम सब शिक्षिकाएं भी इनका सम्मान करते थे और इनके कॉलेज से जाने के नाम पर ही व्यथित थे. लेकिन यह हम सबको रुलाकर यहां से चली ही गयीं. और आज इतने दिनों बाद फिर इन्हें यहां इस तरह देखकर मैं सचमुच हैरान हूं. सारे कॉलेज का आग्रह व रुदन जिसे न रोक सका, वही आज पुनः इसी कॉलेज में…”

“हां, मैं फिर यहां वापस आ गयी.” छोटा-सा उत्तर दिया उस महिला ने जिसका गला भर आया था और जो आंखों की नमी को छिपाने की पूरी कोशिश कर रही थी. रति शर्मा एकटक उस महिला को कुछ पल देखती रही. फिर डॉ. वर्मा की ओर मुड़कर बोली, “भई मैनेजर साहब, अंग्रेज़ी प्रवक्ता के लिये इन्दू, मेरा मतलब है मिसेज इन्दू कुलश्रेष्ठ से बेहतर अन्य कोई शिक्षिका नहीं हो सकतीं. मेरे विचार से सर्व सहमति से इन्हें ही इस पद के लिये चुन लिया जाए.”

“हां-हां क्यों नहीं, जब यह इस विद्यालय की अध्यापिका रह चुकी हैं तो फिर और कुछ देखने-जानने की ज़रूरत ही क्या है?” डॉ. वर्मा ने अपने अन्य सदस्यों की ओर देखा, जिन्होंने उनकी सहमति में सिर हिला दिये थे. “लेकिन…” अभी वह महिला अपनी बात कह ही नहीं पायी थी कि रति शर्मा बीच में बोल पड़ी- “लेकिन-वेकिन कुछ नहीं, हम आप पर कोई एहसान नहीं कर रहे हैं. आपने जो यश अपनी योग्यता से अर्जित किया है, हम उसका केवल सूद ही आपको दे रहे हैं. इन्दू दी, उन दिनों मैं प्रधानाचार्य नहीं, बल्कि आपसे कनिष्ठ शिक्षिका थी. लेकिन छात्राओं की तरह ही मैं भी आप की ज़बरदस्त फैन थी. आपने इस कॉलेज को जो दिया, उसे मैं भूली नहीं हूं.”

कृतज्ञता की झलक इन्दू की आंखों में तैर रही थी. वह जाने के लिए उठी ही थी कि रति शर्मा ने आग्रह पूर्वक कहा, “हां, एक बात और आज शाम को आप मेरे घर खाने पर आ रही हैं.”

कॉलेज से घर आकर रति शर्मा के मन में इन्दू कुलश्रेष्ठ को लेकर तरह-तरह के विचार उठ रहे थे. इन्दू का पूरा अतीत उसकी आंखों में सजीव हो उठा. इन्दू ने अपने बहनोई राजेश से विवाह किया तो सारा कॉलेज चकित था कि इतनी सुंदर, योग्य, आर्थिक रूप से पूर्णत: आत्मनिर्भर लड़की ने एक विधुर से, जिसका कि एक बेटा भी था, उससे विवाह क्यों किया. लेकिन उसके निकट रहनेवाले जानते थे कि इन्दू को अपनी बहन के बच्चे स्मित से बहुत ही स्नेह था और वह नहीं चाहती थी कि कोई सौतेली मां उसके स्मित से दुर्व्यवहार करे, इसलिए राजेश के माता-पिता की ओर से राजेश की दूसरी शादी इन्दू से किए जाने का प्रस्ताव आते ही अपनी मां की कठोर अनिच्छा के बावजूद उसने हां कर दी थी. विदाई के समय आंसुओं से भीगा मां का चेहरा चूमकर उसने कहा था, “मां, तुम स्मित को छूकर कहो कि मैंने ग़लत किया. तुम मेरे लिए दुखी मत हो, राजेश मेरा ख़याल रखेंगे.” लेकिन शादी के कुछ ही महीने बाद ट्रेन दुर्घटना में राजेश की मृत्यु हो गयी. इन्दू का वैधत्व सारे कॉलेज को रुला गया. दूसरी शादी के कितने ही प्रस्ताव उसके घरवालों के पास आते, लेकिन उसका एक ही उत्तर था कि शादी के बाद कोई भी सौतेला पिता मेरे स्मित को हृदय से अपना नहीं पायेगा.

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इसके बाद इन्दू का जीवन-चक्र स्मित के इर्द-गिर्द ही घूमने लगा. कॉलेज में भी कभी-कभी वह उसे ले आती. सभी उसे प्यार करते और पूछते कि तेरी मम्मा कौन है तो वह मुस्कुराता हुआ अपनी छोटी-छोटी उंगलियां इन्दू की ओर उठा देता. सब हंस पड़ते और इन्दू का चेहरा मातृत्व की गरिमा से खिल उठता.

धीरे-धीरे दिन महीनों में, महीने वर्षों में बदलते गये. स्मित की शिशु सुलभ क्रियाएं बालावस्था की क्रीड़ाओं का रूप लेने लगीं. नर्सरी व के.जी. कक्षाओं को पार करते हुए स्मित विश्‍वविद्यालय के द्वार तक पहुंच गया. इन्दू को बस एक ही धुन थी कि वह स्मित को अच्छी से अच्छी शिक्षा दे, जिससे वह बहुत बड़ा आदमी बन सके. समाज में धन के साथ ज्ञान भी अर्जित करे. इसके लिए उसने अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी थी.

रति शर्मा को याद आ रहा था कि बीए पास करने के बाद स्मित जब आईएएस की तैयारी कर रहा था तो इन्दू ने कॉलेज से छुट्टी ले ली थी. प्रिंसिपल ने उसके अवकाश प्रार्थना पत्र को देखकर हंस के पूछा था, “अरे भाई, आईएएस में बेटा बैठ रहा है. तुम तो नहीं ना, फिर ये छुट्टी किसलिए?”

“मेरे घर पर रहने से उसकी पढ़ाई और अच्छी तरह से हो सकेगी. उसे अपनी पढ़ाई के आगे खाने-पीने तक की सुध नहीं रहती मैडम.” इन्दू ने प्रत्युत्तर दिया था.

स्मित की परीक्षाएं समाप्त हो गयीं, तो सभी को स्मित के परीक्षा फल का बेसब्री से इंतज़ार था. इन्दू की नज़र तो अख़बारों में ही अटकी रहती. उसकी मनोदशा देखकर स्टाफ रूम में शिक्षिकाएं खुसर-फुसर करतीं. अधिकांश तो स्नेह से कहतीं, लेकिन कुछ ईर्ष्यावश भी कहतीं कि आख़िर इन्दू की तपस्या और स्मित की मेहनत रंग लाई. फिर आईएएस का परीक्षा फल निकला. सूची में स्मित दूसरे नम्बर पर था. उस दिन कॉलेज में इन्दू व स्मित की ही चर्चा सबके मुख पर थी. लोग इन्दू को बधाई दे रहे थे और इन्दू थी कि रोये ही जा रही थी. मारे ख़ुशी के उसके आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे.

इसके बाद इन्दू के मुख पर अचानक प्रौढ़ता झलकने लगी. स्मित के ट्रेनिंग पर चले जाने के बाद वह सबसे कहने लगी “अब नौकरी करने का मन नहीं चाहता… बहुत थकान लगती है. सोचती हूं, स्मित के नौकरी ज्वाइन करने के बाद मैं स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले लूं.”

“अरे, ऐसी भी क्या जल्दी है?” सभी इन्दू का विरोध करते. सब जानते थे कि इन्दू कॉलेज की सभी क्रियाओं व कार्यक्रमों की धुरी थी. उसके जाने पर उसकी कमी को भर पाना आसान नहीं था. लेकिन स्मित की ज्वाइनिंग के बाद इन्दू ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ही ली. प्रधानाचार्य अस्मिता निगम ने उसे बहुत समझाया था कि सर्विस पूरी किए बिना बीच में सेवा निवृत्ति लेने से उसका आर्थिक रूप से नुक़सान ही है. लेकिन इन्दू को एक ही धुन थी, “अब मुझे पैसों की क्या चिन्ता? फिर स्मित भी तो नहीं चाहता कि मैं नौकरी करूं. वह मुझे बहुत अच्छी तरह खिला-पहना सकता है. बेटे की बात मैं कैसे टाल दूं?”

आख़िर इन्दू कुलश्रेष्ठ ने विद्यालय छोड़ दिया और बेटे के साथ दिल्ली चली गयी. जाने से पहले कॉलेज आयी थी, सभी को बहुत शानदार पार्टी दी थी. रति शर्मा इन्दू से मिलकर बहुत रोयी थी. कुछ महीनों तक इन्दू से पत्र-व्यवहार भी चलता रहा, लेकिन धीरे-धीरे यह सिलसिला भी समाप्त हो गया था. और आज अचानक उसी इन्दू कुलश्रेष्ठ को देखकर रति शर्मा अचंभित थी. मन में उठ रहे हज़ार प्रश्‍न उसे विस्मित कर रहे थे. नौकरी बीच में छोड़ कर जानेवाली इन्दू दी फिर वापस क्यों चली आयी.

अचानक कॉलबेल बज उठी. उसने स्वत: दौड़कर दरवाज़ा खोला तो देखा इन्दू खड़ी थी. रति शर्मा इन्दू से लिपट गयी. कॉलेज में सबके सामने जो संकोच था, वह नौकर-चाकरों के सामने स्थिर न रह सका. मैं बहुत बेचैनी से आपकी प्रतीक्षा कर रही थी. आपसे बहुत-सी बातें पूछने का मन हो रहा था जो सबके सामने न पूछ सकी, इसलिए रात के भोजन के नाम पर आपको बुला लिया. यहां कैसे आयीं? घर कहां है? स्मित का यहां स्थानान्तरण हो गया है क्या…?” आदि तमाम प्रश्‍न रति शर्मा ने एक साथ इन्दू से कर डाले.

“अरे भाई, बैठने भी दोगी या यहीं से सब प्रश्‍न पूछ लोगी.” इन्दू ने एक फीकी मुस्कान के साथ कहा. “हां-हां, आइए, आराम से ड्रॉइंगरूम में बैठकर बातें करते हैं.” कह कर रति इन्दू को अन्दर ले गयी और कॉफी के लिए पास खड़े नौकर से कह दिया. उसके जाते ही रति ने बेचैन होकर कहा, “आख़िर कौन-सी मजबूरी आपको फिर यहां ले आयी दीदी? मैं यही जानने के लिए सबसे ज़्यादा बेचैन हूं.”

“नियति… मेरी नियति मुझे फिर यहां ले आई. मनुष्य की जीवन-डोरी का सूत्रधार तो वह ऊपरवाला ही है न…” इन्दू की आंखों में एक खालीपन था. “देखिये, पहेलियां न बुझाइए, अगर बताने योग्य हो तो खुलकर कहिए, मैं बहुत अधीर हो रही हूं.” रति ने कहा था.

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“तुमसे क्या छिपाना रति… और छिपाने जैसा कुछ है भी नहीं.” इन्दू ने कहना आरम्भ किया, “कॉलेज को तिलांजलि देकर मैं तुम सबको छोड़कर चली गयी. स्मित को लेकर ही मैंने जीवन का ताना-बाना बुना था. तुम तो जानती हो वही मेरा अतीत था, वही वर्तमान और वही मेरा भविष्य भी था. दिल्ली में स्मित के ज्वाइन कर लेने पर उसके लिए रिश्तों की जैसे बाढ़-सी आ गयी थी. एक से एक उच्च अधिकारियों की सुन्दर से सुन्दर लड़कियों के प्रस्ताव आ रहे थे. स्मित के पास तो सबके लिए एक ही जवाब था, “जो मां की पसन्द, वही मेरी पसन्द.” लेकिन स्मित के इस उत्तर ने मेरे ऊपर सुसंस्कृत व सुशील लड़की ढूंढ़कर लाने का दायित्व और बढ़ा दिया था. बहुत सोचने-समझने के बाद एक सुसंस्कृत, शिक्षित परिवार की कन्या से मैंने स्मित का विवाह कर दिया. स्मित की पसन्द मैं जानती थी. उसके लिए रूप से अधिक गुण का महत्व था. बहुत आधुनिक, नाज़-नखरेवाली लड़कियों से वह दूर ही रहता था. मेरा श्रम-साध्य जीवन उसके लिए आदर्श था. वह प्रशासनिक सेवा में था, इसलिए उसकी नौकरी मेरी नौकरी की प्रकृति से बिल्कुल भिन्न थी. फिर भी वह प्राय: कठिन प्रसंगों में मुझसे राय ले लेता.

“स्मित की बहू शुचि के आ जाने पर मैं बहुत हल्कापन महसूस करने लगी थी. घर से लेकर बाज़ार तक के सारे कार्यों में शुचि का मेरे साथ होना मुझे बहुत सुखद लगता. सारा जीवन अकेले ही सब करते-करते मैं थक गयी थी. स्मित भी शुचि को पाकर प्रसन्न था. उसे लगता कि वह उसके विचारों के अनुरूप ही होगी और वह मुझे वैसा ही मान-सम्मान देगी जैसा कि वह स्वयं देता है. वह प्राय: मेरे अतीत की चर्चा शुचि से करता और अपने आईएएस अधिकारी बनने का पूरा श्रेय अपनी लगन व परिश्रम को न देकर मुझे ही देता, जिसे सुनकर मुझे ऐसा लगता जैसे मैं धरती पर नहीं, आकाश पर पांव रखकर चल रही हूं. किन्तु उसका ऐसा मानना और ऐसी सोच ही उसके दाम्पत्य जीवन के सुख का कांटा बन गयी. एक दिन मैं बाहर लॉन में टहल रही थी कि अचानक स्मित के कमरे से ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ आने लगी. मैं पास से गयी तो शुचि स्मित पर नाराज़ हो रही थी, “तुम्हें मां के सिवाय भी कुछ दिखता है? हर बात में मां ही मां रहती हैं. तुम्हारी मां ने त्याग किया तो कौन-सी बड़ी बात है? सभी की मां ऐसा ही करती हैं. लेकिन सब तुम्हारी तरह मां की माला नहीं जपते.” “अच्छा धीमे बोलो, मां सुनेंगी तो उन्हें दुख होगा.” स्मित ने शुचि को डांटते हुए कहा.

“मेरी बला से, सुन ले तो अच्छा ही है.” शुचि का स्वर और ऊंचा हो गया. “कम से कम पीछा तो छोड़ दें.” शुचि के मुंह पर शायद स्मित ने हाथ रख दिया था, इसलिए दबी आवाज़ के सिवाय मुझे कुछ नहीं सुनाई दिया.” इन्दू का चेहरा म्लान हो गया था. मैं फिर कुछ देर के लिए रुककर उन्होंने बातों का क्रम आगे बढ़ाया. “उस दिन के बाद रोज़ किसी न किसी बात पर शुचि स्मित से झगड़ने लगी.

स्मित जितना ही उसे ख़ुश रखने व समझाने की कोशिश करता, वह उतना ही उस पर हावी होने का प्रयास करती. उन दोनों के झगड़े से अनजान बनकर मैंने धीरे-धीरे अपने को समेटना आरम्भ कर दिया. बीमारी का बहाना बनाकर मैं उनके साथ घूमने से बचने लगी. रसोई की सब्ज़ियों से लेकर कपड़ों की ख़रीदारी तक में मैं शुचि की पसन्द को ही महत्व देने लगी. लेकिन इस पर भी वह सामान्य नहीं रहती थी. स्मित सब समझता था. वह मुझे अलग हटते देखकर मन ही मन दुखी था. प्रात: मेरे पास बैठता. सोने से पहले मेरा हाल लेता, दवा आदि देता. कहता तो कुछ नहीं था, लेकिन अन्दर से वह सुखी भी नहीं था, मां और पत्नी को लेकर उसका जीवन उलझ रहा था…”

“आपने शुचि को उसके दुर्व्यवहार के लिए कुछ कहा क्यों नहीं? अध्यापिका होने पर भी क्या आपके पास शब्दों की कमी थी?” रति शर्मा ने बीच में इन्दू से पूछा.

“नहीं, शब्दों की कमी तो मेरे पास कभी नहीं रही, लेकिन जीवन के कुछ ऐसे मार्मिक प्रसंग होते हैं, जहां शब्दों की नहीं भावनाओं की और समझ की आवश्यकता होती है. ईर्ष्या और दुराग्रह का निदान शब्दों से नहीं किया जा सकता. मैंने शुचि को प्यार व स्नेह देने में कोई कसर नहीं रखी थी, फिर उसका मुझसे चिढ़ना, यह ईर्ष्या के अतिरिक्त कुछ नहीं था. वह स्मित के जीवन से मुझे निकाल फेंकना चाहती थी. अतीत को तो वह बदल नहीं सकती थी, लेकिन भविष्य को वह अवश्य बदलना चाहती थी, जिसमें मेरा कोई चिह्न न हो. मैंने जीवन के बहुत उतार-चढ़ाव देखे हैं, जाने कितने लोगों से मिली हूं, इसलिए किसी के व्यवहार से उसका मन समझ लेना मेरे लिए कोई मुश्किल काम नहीं है. मैं झगड़कर अपना हक़ लेने में विश्‍वास नहीं करती. जानती हूं, इससे सम्बन्धों की खाइयां गहरी ही होती जाती हैं.”

“तो क्या शुचि ने आपको घर से निकाल दिया?” अभी रति की बात पूरी भी नहीं हो पायी थी कि इन्दू ने बीच में ही उसे रोक दिया, “नहीं-नहीं, मैं ऐसी कमज़ोर भी नहीं कि कोई मुझे निकालता और न ही स्मित ऐसा होने देता. लेकिन मुझे ऐसा लगने लगा कि मेरी निरन्तर उपस्थिति स्मित के जीवन को संकटमय अवश्य बना देगी. सम्बन्धों में कटुता न आने देने के लिए मुझे ही मोह त्याग करना पड़ेगा, इसीलिए मैंने अध्यापन से पुन: जुड़ने का प्रस्ताव स्मित के सामने रखा. यह जानकर उसे बहुत दुख हुआ. कहने लगा कि सारा जीवन नौकरी से तुम्हारा मन नहीं भरा मां, जो इस उम्र में मेहनत-मज़दूरी करोगी. लेकिन मैंने यह कहकर अपना तर्क रखा कि मेहनत-मजदूरी नहीं, अध्यापन तो मेरे खालीपन का उपचार है. मेरा जीवन इसी को समर्पित रहा है… यही मेरे सारे दुख-दर्द का मरहम है. स्मित चुपचाप मेरा मुंह देखता रहा. शायद मेरे अन्दर की पीड़ा को वह समझ रहा था.

फिर दूसरे दिन जब रोज़गार कार्यालय के दैनिक पत्र में मैंने इस कॉलेज का विज्ञापन देखा. सेवानिवृत्त शिक्षिकाओं को नियुक्ति देना कुछ अविश्‍वसनीय अवश्य लगा, फिर भी मैंने प्रार्थना पत्र दे दिया और जब इंटरव्यू के लिए पत्र मिला, तो मुझे स्मित से हटकर रहने का ख़ूबसूरत बहाना मिल गया. उसने मुझे बहुत रोका, लेकिन मैं बराबर उससे मिलते रहने का आश्‍वासन देकर चली आई.” इन्दू की आंखों के आंसू थम नहीं रहे थे. रति शर्मा ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “मैं होती तो शायद यह नहीं करती जो आपने किया.”

“नहीं रति, कभी-कभी अपनों को ही सुखी देखने के लिए अनचाहे, कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं. वह मां ही क्या जो बच्चों के लिए त्याग न कर सके. सम्बन्धों को समाप्त करने या बिगाड़ने से अच्छा है उन्हें बहानों की आड़ में एक सुन्दर मोड़ दे दिया जाए.”

इन्दू की दबी हुई रुलाई फूट पड़ी थी और रति शर्मा मूक होकर तपस्विनी मां को दर्द से मोम की तरह पिघलते हुए देख रही थी.

– प्रेमा राय

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कहानी- सम्मोहन (Short Story- Sammohan)

मेरे सवाल को उन्होंने टालने की बहुत कोशिश की, पर फिर हथियार डाल दिए. मुझसे वायदा लिया कि मैं कभी किसी से इस राज़ का खुलासा नहीं करूंगी.
वह मुझे बताने लगीं.
“हम औरतें सहनशील होती हैं. रिश्तों के खोखलेपन और खालीपन को पी जाती हैं. किसी को कुछ नहीं बतातीं, पर मुझसे इनकी पीड़ा देखी नहीं जाती थी. एक सीमा जब पार होती दिखी, तो मैंने अपने भीतर छिपाए एक राज़ का पर्दाफाश कर दिया.”
“राज़?” मैंने सवाल किया.
“हां राज़.”

Hindi Short Story

यज्ञदत्त शर्मा ‘नवीन’- अब तक वे केवल यज्ञदत्त शर्मा थे. 70 साल की उम्र में ‘नवीन’ उपनाम लगाने की क्या सूझी उन्हें, यह सवाल मेरे मन में उमड़ी उत्सुकता की सारी हदें पार कर गया. यज्ञदत्तजी से सीधा सवाल करना मुझे ठीक नहीं लगा, सो मैंने तारीफ़ का तीर फेंका-
“अरे वाह यज्ञदत्तजी, यह नवीन उपनाम तो बहुत ‘सूट’ करता है आप पर. हमें भी तो हमराज़ बनाइए न? बुढ़ापे में हमारे भी काम आएगा.”
सवाल का असर हुआ. 70 साल का कमान-सा शरीर तीर-सा तन गया. मोटे चश्मे के पीछे मुरझाई-सी दो बूढ़ी आंखों में चमक आ गई, जैसी बच्चों की आंखों में होती है. यज्ञदत्तजी बोले, “मेरा जीवन बदल गया है. मेरे जीवन में नवीनता आ गई है. जब से मैंने बांसुरी बजानी शुरू की है, तब से मेरे परिवार के लोग मेरे पास आकर बैठने लगे हैं. मेरी बांसुरी की आवाज़ से सम्मोहित होने लगे हैं. मेरे बेटे, मेरी बहुएं, मेरे पोते-पोतियां सब मुझे चाहने लगे हैं. इसलिए मैंने अपने नाम के आगे ‘नवीन’ उपनाम लगा दिया है. सच पूछो तो अपनी जवानी के दिनों में यह मेरी दिली इच्छा थी, पर मौक़ा ही नहीं मिला, सोचने की फुर्सत ही नहीं मिली. जवानी की चाहत बुढ़ापे में पूरी कर ली.”
यज्ञदत्तजी को मैं पिछले 12 सालों से जानती हूं. ह़फ़्ते में दो बार मेरे द़फ़्तर आना उनका नियम-सा बन गया था. द़फ़्तर में आते तो सबसे दो मीठे बोल बोलते, सबसे हाथ मिलाते, हालचाल पूछते, फिर आकर मुझे अपनी राम कहानी सुनाते. पहली बार जब मिले थे तो नौकरी से हाल ही में रिटायर हुए थे. चुस्ती-तंदुरुस्ती बरकरार थी. तब एक शौक़ उनके जीवन का पर्याय बना हुआ था, पेड़ों में आकृतियां तलाशते फिरते थे. पेड़ की शाखों, तनों और जड़ों में आकृतियां ढूंढ़ने का यह शौक़ उनके जीवन की एकमात्र उपलब्धि था.
उनका शयनगार किसी और को पहली नज़र में कबाड़खाना नज़र आ सकता था. पर यज्ञदत्तजी की नज़र में वह उनके जीवन की अमूल्य धरोहर था.
उनकी इस धरोहर में शामिल थी गिरगिट के आकार की एक जड़, शेर की मुखाकृति से मेल खाता एक तना, सांप-सी लहराती एक शाखा, बुढ़ापे के उजाड़ को चिह्नित करता एक झुरमुट, जो किसी पेड़ की जड़ थी, बारहसिंघा का मुंह और ऐसी लगभग 20 आकृतियां.
यज्ञदत्तजी अपनी इस धरोहर को संवारते और तराशते भी रहते थे. आकार और आकृति के अनुरूप अपनी कल्पना से कभी कुछ जोड़ देते, तो कभी कहीं से थोड़ा कुछ काट देते. कई दिनों की अथक मेहनत के बाद तैयार होती थी एक धरोहर. जैसे ही कोई आकृति तैयार होती, सीधे मेरे द़फ़्तर आते, अनुग्रह और आग्रह करने. धरोहर की फ़ोटो खिंचवाते. एक लेख लिखवाते, पत्र-पत्रिका में भेज देते.

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शुरू-शुरू में तो मुझे मज़ा आता था, पर फिर मैं उनसे कतराने लगी. टालने-टरकाने का बहाना ढूंढ़ने लगी. उन्हें टालने-टरकाने का यह पल और उस पल से उपजा हुआ एहसास, कभी-कभी मुझे आत्मग्लानि से भर देता था. मेरे इस व्यवहार से उन्हें पीड़ा भी होती थी, पर अपने जीवन में अपनों से मिली पीड़ा के वह इतने आदी हो चुके थे कि सब कुछ हंसकर झेल जाते थे. मेरा टरकाना उनके अपने घरवालों की दुत्कार से बहुत कम पीड़ादायक था. उन्होंने कई बार अपनों से मिली इस दुत्कार की रामकहानी मुझे सुनाई थी. पकी हुई उम्र के थे, इसलिए रामकहानी सुनाते व़क़्त मन के भीतर उमड़ी आंसुओं की बाढ़ को आंखों के बांध से बांधे रखते थे. क्या मजाल, जो एक बूंद भी छलक जाए. मुझे भी अपनी आंखों के गीलेपन को पीना पड़ता था.
रिटायरमेंट (सेवानिवृत्ति) पर मिला सारा पैसा अपनी पत्नी को देना वे अपने जीवन की पहली और सबसे बड़ी भूल मानते थे. उनकी पत्नी बेटे-बहुओं के मोहपाश में बंधी हुई थी. रिटायरमेंट पर मिला रुपया बेटों को देती रही. बेटों ने दो कमरोंवाले पुराने मकान को चार कमरोंवाले आधुनिक मकान बनाने में सारे रुपए ख़र्च कर दिए. यज्ञदत्तजी के अनुसार उनकी पत्नी सब कुछ लुटा बैठी थीं. वे कई बार इस बात को दोहराते थे. इस वाक्य को कभी-कभी ‘हादसे’ का नाम भी देते थे. अपने दर्द को छुपाने के लिए ज़ोर से हंस भी देते थे.
मकान बन गया, तो सब कुछ बदल गया. मकान का आंगन तो गया ही, अपने भी पराए हो गए. यज्ञदत्त शर्मा के तीन बेटों ने एक-एक कमरा अपने कब्ज़े में ले लिया और चौथे कमरे को ड्रॉइंगरूम बना दिया.
आदमी अपनी हैसियत को छुपाने के लिए अक्सर इस ड्रॉइंगरूम का सहारा लेता है. ख़ूब सजा-धजा के रखा जाता है इसे. ड्रॉईंगरूम में सभी बूढ़ों का प्रवेश वर्जित रहता है. कोई तख़्ती तो नहीं टांगता, पर होता यही है. नए ज़माने की नई सोच.
यज्ञदत्त शर्मा का घर भी नए ज़माने की इस रीति-नीति से कैसे बच सकता था भला? परोक्ष-अपरोक्ष रूप से उनकी बहुओं ने उन्हें जता दिया था कि ड्रॉइंगरूम में उनका प्रवेश वर्जित है. मेहमानों के सामने आने की भी सख़्त मनाही थी.
उनकी जीवनभर की जमा-पूंजी से बने उनके अपने घर में उन्हें मकान का वो हिस्सा दिया गया, जिसे पुराने ज़माने का चौक या वराण्डा कहते थे. अब उसका नामकरण ‘लॉबी’ कर दिया गया है.
चार कमरों के बीच की खुली जगह के दो कोने यज्ञदत्त शर्मा और उनकी बीवी को मिले. एक कोने में यज्ञदत्तजी का पुराना पलंग और कबाड़ जमा था, दूसरे कोने में पत्नी की खाट लगा दी गई. चौक में एक लंबा-सा पर्दा भी था. मेहमानों के आने पर इस पर्दे को खींच दिया जाता था, ताकि ड्रॉइंगरूम का रौब कम न हो जाए.
“यह तो गनीमत है कि सरकार ने एक नियम बना दिया है. पेंशन एकाउण्ट (खाता) ज्वाइंट एकाउण्ट (संयुक्त खाता) नहीं हो सकता, वरना शायद ये दो कोने और दो व़क़्त का खाना भी नसीब न होता.” यज्ञदत्त जी के ये शब्द मेरे कानों में अक्सर गूंजते रहते थे.
उन्होंने एक समझौता किया था. इस समझौते के तहत पेंशन के तीन चौथाई हिस्से के बदले उन्हें रहने-खाने की सुविधाएं मिल रही थीं. बेटों का सुख भी मिल रहा था. इसे ‘नामसुख’ कहते हैं. बाप का नाम बेटे के नाम के साथ जुड़ा रहे तो वह ‘नामसुख’ कहलाता है. कई लोग तड़पते हैं इस ‘नामसुख’ के लिए.
यज्ञदत्तजी ने जब अपने तीनों बेटों का स्कूल में दाखिला करवाया था, तो बहुत गर्व से नाम लिखा था- राजेश यज्ञदत्त शर्मा, विमल यज्ञदत्त शर्मा, कमल यज्ञदत्त शर्मा. उनके रिटायरमेंट तक यही नाम चले. घर में भी और घर के बाहर लगी नेमप्लेट पर भी. नया मकान बना, तो पुरानी नेमप्लेट फेंक दी गई और एक नई तख़्ती टांग दी गई. इस तख़्ती पर लिखा था ‘कमल वाई. शर्मा, विमल वाई. शर्मा तथा राजेश वाई. शर्मा’ मन और एहसासों के साथ नाम भी छोटे हो गए थे.
यूं तो यज्ञदत्तजी का नाम हर तरह से गायब हो गया था, पर उससे क्या फ़र्क़ पड़ता है. यज्ञदत्त का ‘वाई.’ तो बचा है अभी. इसी वाई को ज़िंदा रखने के लिए दुआएं मांगी जाती हैं, मन्नतें मांगी जाती हैं, एक अदद बेटे की. यज्ञदत्तजी तो ख़ुशनसीब थे, तीन-तीन ‘वाई’ टंगे थे उनके घर के आगे.
ऐसे यज्ञदत्तजी ने अपना शौक़ बदल लिया और अब वे ख़ुश हैं, यह देखकर मुझे आत्मसंतोष मिल रहा था.
यज्ञदत्त शर्मा ‘नवीन’ अपने इस नए शौक़ के सम्मोहन में पूरी तरह बंध गए थे. बेटे-बहुएं, पोते-पोतियां यूं एकदम बदल जाएंगे, उनके अपने जो पराए हो गए थे, फिर अपने हो जाएंगे, मेरे लिए यह बात सच्चाई कम और अजूबा अधिक थी. जीवन के आख़िरी मोड़ पर आकर अचानक ज़िंदगी यूं करवट ले सकती है, इस बात को देखते-समझते हुए भी मुझे इस पर विश्‍वास नहीं हो सका.
इस सम्मोहन की टोह लेना मुझे सबसे ज़रूरी लगने लगा. यज्ञदत्तजी से पूछना बेकार था. वह अपने आपमें इतने मंत्रमुग्ध थे कि उन्हें अब दुनिया के किसी और सुख से कोई सरोकार न था. वह एक बात बार-बार बताते और गद्गद् होते रहते थे. वह कहते- “न जाने क्या जादू हो गया. जब भी बांसुरी बजाता हूं पोता-पोती, बेटे-बहुएं पास आ बैठती हैं. बांसुरी सुनते हैं सभी ध्यान से. सब मुझसे प्यार से बातें भी करने लगे हैं.”
फिर धीरे से बोले, “अब तो ड्रॉइंगरूम में जाने की मनाही भी नहीं.”
मुझे लगा कि यज्ञदत्तजी को टटोलना, उनके सम्मोहन का कारण जानना मकड़ी के जाल के सिरे को तलाशने जैसा है.
मैंने तय कर लिया कि मैं यज्ञदत्त शर्मा ‘नवीन’ की पत्नी से मिलूंगी.
एक दिन मौक़ा तलाश कर मैं उनके घर गई. मेरा सौभाग्य कि मैं उनके घर ऐसे व़क़्त पहुंची, जब घर पर उनकी पत्नी अकेली थीं. उनकी पत्नी से मेरा मिलना तो कम होता था, पर वे जानती थीं कि मैं यज्ञदत्तजी की एकमात्र सच्ची हमदर्द हूं. उनकी पत्नी से थोड़ी देर तक मैंने इधर-उधर की बात की, फिर सीधा सवाल किया.
मेरे सवाल को उन्होंने टालने की बहुत कोशिश की, पर फिर हथियार डाल दिए. मुझसे वायदा लिया कि मैं कभी किसी से इस राज़ का खुलासा नहीं करूंगी.
वह मुझे बताने लगीं.

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“हम औरतें सहनशील होती हैं. रिश्तों के खोखलेपन और खालीपन को पी जाती हैं. किसी को कुछ नहीं बतातीं, पर मुझसे इनकी पीड़ा देखी नहीं जाती थी. एक सीमा जब पार होती दिखी, तो मैंने अपने भीतर छिपाए एक राज़ का पर्दाफाश कर दिया.”
“राज़?” मैंने सवाल किया.
“हां राज़. जब मैं इस परिवार में आई, तब से मैंने मन ही मन कुछ निर्णय कर लिया था. यह बहुत दरियादिल थे. दिल भी खुला रखते थे, जेब भी. हर महीने पूरी तनख़्वाह मेरे हाथ में रखते थे. फिर जब जितनी ज़रूरत होती, लेते रहते.
हर महीने मैं इनकी तनख़्वाह में से कुछ रुपए बचा लेती थी. ये सारे रुपए आड़े समय में काम आएंगे, यह सोचकर मैं ऐसा करती थी. इसके लिए साल में बारह झूठ बोलने पड़ते थे मुझे.”
“बारह झूठ?” मैंने चौंककर कहा.
“हां बारह झूठ. हर महीने तनख़्वाह में से जो पैसे बचाती थी, उसके बारे में हर महीने एक झूठ बोलना पड़ता था कि सब पैसे ख़त्म हो गए. फिर इनका रिटायरमेंट हुआ. इन्होंने हमेशा की तरह सारी रकम मेरे हाथ में रख दी. हमने मकान बनवाया. मकान का ख़र्चा मैं देती रही. एक हद के बाद मैंने कह दिया कि रकम ख़त्म हो गई.
यूं करते-करते मेरे पास पांच लाख रुपए जमा हो गए. शुरू में ही मैंने पोस्ट ऑफ़िस में खाता खुलवा रखा था. ये सारे पैसे उसमें जमा करवाती रही. ब्याज मिलता रहा. बूंद-बूंद करके घड़ा भर गया.
वह थोड़ी देर चुप हो गईं. गहरी पीड़ा की रेखाएं उनके चेहरे पर उभर आईं.
“फिर?” मैंने सवाल किया.
“फिर क्या? मैं जानती थी बेटे-बहुएं रकम ख़त्म होते ही मुंह फेर लेंगे, पर इतने संगदिल हो जाएंगे, मुझे विश्‍वास न था. जिन बच्चों पर हमने कभी हाथ नहीं उठाया, वे बच्चे अपने पिता पर हाथ उठा लें, यह कड़वा सच मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ. मैंने अपनी पासबुक अपने बेटे-बहुओं के सामने रख दी. एक समझौता किया अपनों के साथ, मैं उन्हें रकम दूंगी, वे लोग मुझे और मेरे पति को माता-पिता का सम्मान देंगे. सम्मान का यही समझौता रिश्तों का सम्मोहन है.
कोई सवाल बाकी न बचा था. मैं उठी और चली आई. घर के बाहर लगी तख़्ती भी बदल गई थी. अब उसमें ‘वाई’ की जगह ‘यज्ञदत्त’ चिपक गया था.

– पूनम रतनानी

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कहानी- आस्था का फल (Short Story- Aastha Ka Phal)

Short Story- Aastha Ka Phal

“ये विज्ञान का दुरुपयोग है, अगर हम इसका इसी प्रकार उपयोग करते रहे तो ये अभिशाप बन कर कहर बन सकता है.” अनु उत्तेजित हो उठी.

क्षितिज बिना कुछ कहे कमरे से बाहर चले गए.

उस दिन के बाद से अनु ने सभी के मिज़ाज में परिवर्तन देखा, ऐसी स्थिति में वह ज़्यादा तनाव में नहीं रहना चाहती थी. अत: उसने कुछ दिनों के लिए मां के यहां जाने का फैसला कर लिया.

मां-पिताजी उसे देख कर बेहद ख़ुश हुए, परन्तु ज्यों-ज्यों उन्हें भी वास्तविकता का पता चला, उन्हें भी ससुराल पक्ष की बात अधिक सही लगी.

अनुभा अपनी पूर्व योजना के अनुसार जब दूसरी बार गर्भवती हुई, तो बहुत प्रसन्न थी. उसकी पुत्री अब तीन वर्ष की हो चुकी थी. अनुभा ने महसूस किया कि अब वह दूसरे बच्चे को जन्म देकर, उसे भी पूरी ज़िम्मेदारी से पाल सकती है और इसके साथ ही उसके इस कर्त्तव्य की इति भी हो जायेगी.

इस शुभ सूचना से घर में सभी के चेहरों पर ख़ुशी की लहर दौड़ गई. पर सभी के दिल में चाह थी कि इस बार बेटा ही होना चाहिए. सास-ससुर दोनों ने ही बातों-बातों में कह भी दिया कि इस बार तो सारे घर को रौशन करने वाला चिराग़ ही आना चाहिए, फिर वंश बेल भी तो बढ़नी है.

सब कुछ सुनकर अनुभा चुप थी. पहले प्रसव के समय की सब बातें अभी तक उसे याद थीं, बेटी पैदा होने की किसी को ज़्यादा ख़ुशी नहीं हुई थी. बेमन से ही सबने सब रीति-रिवाज़ निबाहे थे.

परन्तु पति क्षितिज के उदार व्यवहार ने इस स्थिति से उबरने में उसकी बड़ी मदद की. प्रत्यक्ष रूप से तो उन्होंने बेटी के जन्म को भी एक सुअवसर के रूप में ही स्वीकार किया.

अनुभा को बेटे व बेटी में कोई अन्तर न लगता था. वह स्वयं इंजीनियर थी. उसके विवाह की बुनियाद शायद उसकी ये डिग्री ही थी. समाज में ऊंची प्रतिष्ठा रखने वाले उसके ससुराल पक्ष के लोग मुंह खोल कर दहेज की मांग तो नहीं कर सके थे, पर इस बात से आश्‍वस्त ज़रूर थे कि इंजीनियर बहू ऊंची नौकरी करेगी तो ख़ुद ही पैसा बरसेगा.

परन्तु यहां भी अनुभा अपने आदर्शों पर अडिग रही. वह वैवाहिक जीवन के साथ-साथ मातृत्व का भी पूरा सुख उठाना चाहती थी, जबकि पहले दिन से ही पति सहित सास-ससुर सभी यही चाहते थे कि जल्दी ही अनुभा अच्छी-सी नौकरी कर ले. कई अच्छी फर्मों से उसके लिए ऑफ़र भी आए, पर उसने नौकरी करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. एक दिन अन्तिम प्रयास करते हुए क्षितिज ने बात छेड़ी.

“अनु, तुम इतनी पढ़ी-लिखी होकर भी इस दिशा में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही हो.”

“हां क्षिति, मैं वैवाहिक जीवन का पूरा आनंद उठाना चाहती हूं. नौकरी करने में अभी मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है.”

क्षितिज हंस पड़ा, “अरे, नौकरी करते-करते आनंद नहीं उठाया जा सकता क्या? ये तुमने बड़ी अजीब-सी बात सोच रखी है.”

“बात अजीब नहीं, सत्य है क्षिति, यदि शुरू से ही हम दोनों अपनी-अपनी नौकरियों में उलझ जायेंगे तो एक-दूसरे को जानने-समझने का अवसर कब मिलेगा. तब हम एक-दूसरे के प्रति ज़िम्मेदारियां समझने के बजाए अपनी-अपनी नौकरियों के प्रति अधिक ज़िम्मेदार रहेंगे. तब प्रेम के बदले हमारे बीच दरारें पड़ सकती हैं, हमारा दांपत्य जीवन प्रभावित हो सकता है.”

“अब तुम्हें कौन समझाए? चलो छोड़ो, मुझे तो तुम्हारे पैसों की ज़रूरत भी नहीं है अनु, बस मैं तो तुम्हारी योग्यता को व्यर्थ में यूं दम तोड़ते नहीं देखना चाहता था.”

“योग्यताएं कभी दम नहीं तोड़ती हैं क्षिति, यदि सही समय और सही उद्देश्य के लिए उनका प्रयोग किया जाए तो लाभप्रद सिद्ध होती हैं.”

“ठीक है बाबा, मैं तो तुम्हें ख़ुश देखना चाहता हूं बस.” क्षितिज कुछ चिढ़ कर बोले.

“बस क्षितिज, मैं आपके मुंह से यही सुनना चाहती थी. जब ज़रूरत होगी, मैं अपनी योग्यता का उपयोग अवश्य करूंगी. पहले नारी जीवन के कर्त्तव्य तो पूरे कर लूं.” अनुभा क्षितिज के गले में बांहें डाल, उसके गले लग गयी. क्षितिज ने भी जबरन मुस्कुराने का प्रयत्न किया.

ये उसके ज़िद्दी निर्णय का पहला झटका उसके सास-ससुर को लगा. उन्हें भी उसने यही कहकर समझाया कि पहले मैं बच्चों को पाल-पोसकर स्वावलम्बी बना दूं, तब अपने बारे में सोचूंगी. अपने स्वार्थ के कारण मैं बच्चों से उनका बचपन नहीं छीनना चाहती हूं, उन्हें अपनी स्नेह छाया में अपने हाथों से पालना चाहती हूं, ताकि माता-पिता के प्रति वे भी अपने कर्त्तव्यों से अनभिज्ञ न रह जाएं.

अनुभा अच्छी तरह जानती थी कि इस बार सबके मन में काफ़ी हलचल चल रही होगी. इस बार बेटी का जन्म सब पर गाज बन कर गिरेगा, पर वह चुपचाप आने वाले पलों का इन्तज़ार कर रही थी.

मौक़ा देख एक दिन उसकी सास ने कहा, “बेटा अनु, तुम ख़ुद ही काफ़ी समझदार हो, यदि बुरा न मानो तो जांच करवा कर पता करवा लो कि इस बार बेटा है या बेटी.”

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अनु ने पहले तो बड़ी तीव्र दृष्टि से उन्हें देखा, लेकिन जल्दी ही स्वर को नम्र बना कर बोली, “मांजी, क्या होगा जांच कराने से, अब तो जो होना है वही होगा. जांच से बदला तो नहीं जा सकता.”

“बदला क्यों नहीं जा सकता बेटा? यदि फिर बेटी हुई तो उसे गिराया भी जा…”

“बस मांजी बस, कुछ समझ भी रही हैं कि आप क्या कह रही हैं, अपने गर्भ में पल रहे जीव की हत्या करा दूं मैं?”

“तुम बेटा मुझे ग़लत मत समझो, मेरा मतलब ये नहीं है.” सास कुछ मीठा बनते हुए बोली.

“आपका मतलब चाहे जो हो मांजी, पर इतना तो आप जानती ही होंगी कि जांच कराना व गर्भ गिराना दोनों ही क़ानूनन अपराध है. क्या आप चाहती हैं कि मैं कोई अपराध करूं?”

मांजी कुछ और बोलतीं, इससे पहले ही वह उठकर अपने कमरे में चली गयी. अनमने मन से वह चादर ओढ़ कर लेट गयी. घरवालों के मन में उपजी इस नयी बात ने उसे परेशान कर दिया था.

तभी क्षितिज ने कमरे में प्रवेश किया. अनु उठकर बैठ गयी और बोली, “क्षिति, तुम मुझे एक बात साफ़-साफ़ बताओ कि तुम भी चाहते हो कि इस बार बेटा ही हो.”

“तुम भी से तुम्हारा क्या मतलब है? अनु, क्या इस बार तुम्हारी यही इच्छा नहीं है?” वह मुस्कुराकर बोला.

“मेरी नहीं, घर में सभी और ख़ासकर मांजी यही चाहती हैं.”

“कुछ बुरा तो नहीं चाहतीं वे. एक लड़की है तो दूसरा लड़का हो जाए, ऐसा चाहने में क्या बुराई है.”

“चाहने में कुछ बुराई नहीं है क्षितिज, लेकिन वे चाहती हैं कि मैं स्कैनिंग द्वारा पता लगा लूं, यदि इस बार भी लड़की हो तो उसे…” कहते-कहते अनु चुप हो गयी.

क्षितिज भी कुछ गंभीर हो उठा, वह टाई की नॉट खोलते हुए बोला, “अनु शायद इसमें भी कोई बुराई नहीं है.”

“ये तुम कह रहे हो क्षिति, कम से कम मुझे तुमसे ये उम्मीद न थी.” अनु आहत-सी हो उठी.

“इसमें उम्मीद की क्या बात है अनु? अब जहां दो के बाद तीसरे बच्चे की गुंजाइश नहीं है, वहां तो ये क़दम उठा ही सकते हैं.”

“पर ये सब क़ानून की दृष्टि में अपराध है, इतना तो आप भी जानते ही होंगे.”

“हां होगा, पर ज़रूरी है कि सब कुछ ढोल बजा कर ही किया जाए, कुछ काम चोरी-छुपे भी होते हैं. हमारे इतने डॉक्टर मित्र हैं, सब कुछ आसानी से हो जाएगा.”

“अच्छा, तो अपराध के ऊपर अपराध, तुमसे मुझे समझदारी की उम्मीद थी क्षितिज, पर तुम सब तो एक ही स्वर में बोल रहे हो.”

“मैं समझदारी की ही बात कर रहा हूं अनु, वंश बेल को बढ़ाने के लिए बेटे की इच्छा करना क्या मूर्खता है? यदि विज्ञान की प्रगति ने हमें ये सुविधा प्रदान की है तो इसका उपयोग करने में क्या हर्ज़ है.” वह कुछ तेज़ स्वर में बोले.

“ये विज्ञान का दुरुपयोग है, अगर हम इसका इसी प्रकार उपयोग करते रहे तो ये अभिशाप बन कर कहर बन सकता है.” अनु उत्तेजित हो उठी.

क्षितिज बिना कुछ कहे कमरे से बाहर चले गए.

उस दिन के बाद से अनु ने सभी के मिज़ाज में परिवर्तन देखा, ऐसी स्थिति में वह ज़्यादा तनाव में नहीं रहना चाहती थी. अत: उसने कुछ दिनों के लिए मां के यहां जाने का फैसला कर लिया.

मां-पिताजी उसे देख कर बेहद ख़ुश हुए, परन्तु ज्यों-ज्यों उन्हें भी वास्तविकता का पता चला, उन्हें भी ससुराल पक्ष की बात अधिक सही लगी, क्योंकि वे स्वयं भी पुत्र रत्न से वंचित थे और यही मानते थे कि लड़की अपनी योग्यता से चाहे आकाश छू ले, पर होती तो पराया धन ही है, बुढ़ापे की लाठी तो बेटा ही होता है.

अनु ने तर्क देते हुए कहा, “मां, बेटा हो तो मुझे भी अपार ख़ुशी होगी, पर बेटी को मार कर पुत्र प्राप्ति का ग़लत तरी़के से यत्न करना कतई ठीक नहीं है.”

मां ने कहा, “अच्छा अनु, तुम्हारी सभी बातें सही हैं, पर पता करने में क्या हर्ज़ है, यदि बेटा हुआ तो कम से कम तुम्हारे ससुराल वाले अभी से ख़ुश हो जायेंगे.”

“मुझे इस विषय में किसी की ख़ुशी या नाराज़गी की परवाह नहीं है मां. इसे तो ईश्‍वर का उपहार समझ स्वीकार करना चाहिए.”

अनुभा ने देखा मां भी गंभीर हो गयी है. उसे लगा जिस परिस्थिति से बच कर वह यहां तनावमुक्त होने आयी थी, उसकी छाया यहां भी विराजमान है.

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अनुभा ने मन ही मन सोचा क्यों न सबका दिल रखने के लिए जांच करवा ही लूं. यदि लड़का हुआ तो सब झंझट ही समाप्त हो जायेगा और यदि लड़की हुई तो कम-से-कम सब अभी से मानसिक रूप से तैयार हो जाएंगे. उस व़क़्त उन लोगों को ज़्यादा मानसिक आघात नहीं लगेगा और मैं भी बाक़ी का समय सुख-चैन से काट सकूंगी.

मां के साथ वह उनकी पारिवारिक डॉक्टर सुधा सेन के पास जांच के लिए गई.

जांच की रिपोर्ट जब उन्होंने फ़ोन पर मां को दी, तो वह उदास-सी हो गयी. उसके चेहरे की रंगत देख अनुभा सब समझ गयी, कुछ न पूछा.

मां फ़ोन रखकर रसोई में चली गयी, वह उसके पीछे गयी और उसके गले में बांहें डाल कर बोली, “अब उदास क्यों हो रही हो मां, सरप्राइज़ में ही आनंद था न.”

“डॉक्टर ने मुझे एक बात और भी बताई है, यदि तुम सहमत हो तो.” मां उसकी बातों पर ध्यान दिए बिना बोली.

“अब और क्या चमत्कार करवाना चाहती हो मां?” वह हंसकर बोली.

“चमत्कार ही जैसी बात है बेटी, डॉ. सुधा ने कहा है कि यदि इस मुसीबत से तुम छुटकारा पाना चाहो तो वह गुप्त रूप से तुम्हारी मदद कर सकती हैं- और इसके बाद जब तुम पुन: गर्भधारण करो तब वह तुम्हें एक ऐसी अचूक दवा देंगी, जिससे सौ फ़ीसदी लड़का ही होता है.”

अनुभा ज़ोर से हंस पड़ी, “मां, यदि ऐसा संभव होता, तो ये समस्या कब की हमारे समाज से ख़त्म हो चुकी होती. मां आख़िर ये दकियानूसी बातें तुम्हें सूझ कैसे रही हैं?”

“बस केवल इसलिए कि ससुराल में तुम्हें सम्मान मिले.” मां ने समझाते हुए कहा.

“मां, मेरे सम्मान की फ़िक्र न करो, बेटा यदि आज सम्मान दिलायेगा तो ज़रूरी नहीं कि वह बुढ़ापे का सहारा भी बने ही.

आज हमारे समाज में वृद्धों की समस्या इन चहेते पुत्रों के कारण ही जिधर देखो मुंह बाए खड़ी है. क्या निहाल कर रहे हैं- वे अपने बूढ़े मां-बाप को.”

अनु के ज़िद्दी स्वभाव को मां जानती थी. अत: वह चुप हो गयी.

अनु ने निश्‍चय किया कि इस बार डिलीवरी के लिए वह मां के पास ही रहेगी. समय बीता और प्रसव का समय भी आ पहुंचा. घर में किसी को कोई ज़्यादा उत्साह नहीं था. मां को केवल एक ही चिन्ता थी कि अनु की डिलीवरी का सब काम राज़ी-ख़ुशी निपट जाए और वह अपने घर जाए.

समय आने पर अनुभा प्रसन्न मन से अस्पताल गई और उसने सबको एक बहुत बड़ा सरप्राइज़ दिया. जब डॉक्टर ने बाहर आकर, मुंह लटकाए बैठे परिवार जनों को बताया कि अनुभा ने एक सुन्दर व स्वस्थ बेटे को जन्म दिया है तो सभी लोग हतप्रभ हो गए. मां तो सोच रही थी कि यदि हम डॉक्टर की सलाह मान लेते तो… और वह सिहर उठी.

थोड़ी देर बाद सभी अनु को देखने कमरे में पहुंचे. वह पहले की ही तरह शान्त चित्त थी. मां से नज़रें मिलीं तो वह मुस्कारा उठी.

”कुदरत के नियमों का उल्लंघन करना इंसान के लिए हितकर नहीं है मां. इंसान से ग़लतियां होती हैं, पर कुदरत सबकी ज़रूरतें पूरी करती है.”

मां की आंखों में ख़ुशी के आंसू भर आए, उन्होंने अनु के सिर पर ममता का हाथ फेर कर अपनी सहमति दी.

“ये तुम्हारी आस्था का ही फल है बेटा, तुमने तो भगवान की इच्छा को ही हृदय से स्वीकार कर लिया था, इसलिए शायद उसने तुम्हारी ज़रूरत को पूरा किया.” पिता ने पुत्री पर गर्व करते हुए कहा.

डॉ. सुधा भी पीछे कोने में खड़ी सोच रही थी कि आख़िर उससे कहां ग़लती हो गई, पर शुक्र है भगवान का कि अनु के दृढ़ निश्‍चय के कारण वह यह पाप करने से बच गई.

पूरा कमरा हंसी के ठहाकों और बधाइयों से गूंज रहा था. अनुभा की ख़ुशी में भी उदासी की झलक थी कि अब तो नारी किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं है, फिर उसके जन्म पर ऐसी ख़ुशियां क्यों नहीं मनाई जातीं. शायद जनक को ही पहल करनी होगी तभी ये भेद मिट सकेगा. उसने सबकी ओर से मुंह फेर कर आंखें बंद कर लीं.

– मधु भटनागर

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कहानी- गांव (Short Story- Gaon)

शुक्र है, इतने बदलावों के बीच भी कुछ चीज़ें नहीं बदल रहीं. हमारी वो परंपरा, जो हमारी पहचान है, उन पर अब भी इस भौतिकता का प्रभाव नहीं पड़ा है. ये छोटे-छोटे बच्चे भी बड़ों के आशीर्वाद का महत्व जानते हैं, फिर क्या फ़र्क़ पड़ता है कि मकान कच्चे हैं या पक्के, ये बच्चे बड़ों का सम्मान करते हैं, फिर क्या फ़र्क़ पड़ता है कि खाना चूल्हे पर पका है या गैस पर…

Short Story- Gaon

न जाने वो ख़ुशबू कहां खो गई थी, वो कच्चे मकानों की ख़ुशबू… वो मिट्टी की ख़ूशबू… वो अपनेपन की ख़ुशबू… अब यहां घरों के बीच, छतों के बीच, दहलीज़ों के बाहर भी दीवारें खिंची हुई थीं… कहने को तो ये ईंट-पत्थर की दीवारें थीं, पर यूं लग रहा था जैसे ये दीवारें घरों के बीच नहीं, दिलों के बीच भी खिंच चुकी हैं.

न अब यहां पंछी चहकते हैं, न मोर नाचते हैं… न गाय की वो पहली रोटी बनती है, न वो कचोरी-समोसे बिकते हैं… इतना बदलाव भला कहां लेकर जा रहा है हमें?

हर गली-नुक्कड़ पर शहरीपन की छाप… अपनी आंखों से देख रही हूं मैं, मेरा ये प्यारा गांव सिकुड़ रहा है, सिमट रहा है… यहां एक शहर पसर रहा है…

मन ही मन कई सवाल उठ खड़े हुए कि वैसे शहरीकरण में बुराई ही क्या है? मुझे तो शहर पसंद है, वहां की वो बिज़ी लाइफस्टाइल, वर्क प्रेशर, बड़े-बड़े मॉल्स… और लेट नाइट पार्टीज़… लेकिन कभी-कभी इन सबसे भी तो ऊब होने लगती है, तब हम भागते हैं अपनी जड़ों की ओर. वो हमें लुभाती हैं, खींचती हैं अपनी तरफ़. अपने तनावों से निपटने के लिए, अपनों से मिलने के लिए, अपनी असली ज़िंदगी को जीने के लिए हम गांव का रुख़ करते हैं. वहां की ताज़गी, वहां का अपनापन हमें आकर्षित करता है और हम अपनी इस बनावटी-दिखावटी दुनिया के सारे नकाब फेंककर वहां खुलकर जीने के लिए चल पड़ते हैं.

भले ही वहां शहरों जैसी भौतिक सुख-सुविधा न हो, लेकिन एक चीज़ है वहां- समय. अपनों के बीच रहकर सुख-दुख बांटने का समय वहां सबके पास है, जो किसी भी सुख-सुविधा से कहीं ज़्यादा है.

लेकिन आज ऐसा क्यों महसूस हो रहा है कि मेरा गांव मुझसे छिन गया है. यह कोई अंजान-सी अजनबी जगह है. पहलेवाली कोई बात नहीं. लोग इसे तऱक्क़ी कहते हैं, पर क्या वाक़ई यह तऱक्क़ी है?

ज़मीनों पर खेत नहीं लहलहाते अब, वहां तो कोई मल्टीनेशनल कंपनी बननेवाली है… वो नुक्कड़ के चाचा की छोटी-सी दुकान पर पान के स्वादवाली खट्टी-मीठी गोलियां भी नहीं बिकतीं अब. चाचा के जाने के बाद उनके बेटे ने कपड़ों का शोरूम जो खोल लिया है… पास की गली की ब़र्फ फैक्टरी बंद हो चुकी है, वहां गिफ्ट शॉप आ गई है. पिछली गली में जो मार्केट थी, वहां बड़ा-सा मॉल बन चुका है… मैं तो यहां ख़ुद को खोजने आई थी. कहां है मेरा अस्तित्व? कहां हैं वो गलियां, जहां मेरा बचपन गुज़रा था…? कहां हैं वो मैदान, जहां मैं खेलने जाती थी…? वो कुआं कहां है, जो दादाजी ने बनवाया था? वो आंगन कहां है, जहां लोगों का

आना-जाना लगा रहता था? वो रसोई, वो चूल्हा कहां है, जहां सबके लिए चाय-नाश्ता-खाना-पीना बना करता था?

ये मेरा गांव नहीं है… इसकी सूरत ही नहीं, सीरत भी बदल गई है… अब न कोई छतों पर आकर आपस में बात करता है, न किसी के दुख-सुख के बारे में कोई पूछता है… सबने तऱक्क़ी जो कर ली है, सबके पास पहले से अधिक पैसा जो आ गया है… सुख-सुविधाएं जो बढ़ गई हैं… फिर भला समय कहां रह गया किसी के पास.

कच्ची सड़कें पक्की हो गईं. साइकल रिक्शा की जगह ई-रिक्शा ने ले ली. बैल गाड़ी, ऊंट गाड़ी तो जैसे क़िस्से-कहानियों में ही नज़र आएंगे अब, टैक्सी की सुविधाएं हो गई हैं, बसों और ट्रेनों का अच्छा-ख़ासा नेटवर्क हो गया है. और हां, सबसे बड़ी बात मोबाइल फोन्स ने तो सबकी ज़िंदगी ही बदलकर रख दी है. इंटरनेट अब घर-घर की ज़रूरत हो गया है… सोचती हूं कि लौट जाऊं अब. क्या रह गया है यहां…

“अरे, कहां खोई हुई है वर्षा? तुझे आए तीन दिन हो गए, लेकिन पता नहीं किन ख़्यालों में खोई रहती है? क्या बात है?” चाची की बात से मेरी तंद्रा भंग हुई.

“कुछ नहीं चाची, बस यही सोच रही हूं कि कितना कुछ बदल गया है 5-6 सालों में ही. पिछली बार जब गांव आई थी, तो सब कुछ अलग था.”

“देख, तेरे लिए ही हमने मकान भी ठीक करवा लिया है. अब तो कच्चे मकान भी नहीं हैं, पक्के हो गए. टाइल्स लगवा ली, एसी लग गया, फ्रिज, गैस सब कुछ है, तेरे चाचा ने सब तेरे लिए किया, ताकि तुझे असुविधा न हो. तुझे तो पता ही है, तेरे चाचा कितना प्यार करते हैं तुझसे.”

“हां चाची, लेकिन वो कच्चे मकान भी तो अच्छे ही थे. हम आंगन में या फिर छत पर खुली हवा में सोते थे. सुबह-सुबह मोर, तो शाम को बंदर भी आते थे. अब तो कुछ भी नहीं नज़र आता.”

“चल छोड़ तू यह सब, बता आज खाने में क्या बनाएं?” चाची ने पूछा.

मैं कुछ बोल पाती, इससे पहले ही घर के बच्चे बोल पड़े, “बुआजी, आज मम्मी को बोलो बे्रड पिज़्ज़ा बनाकर खिलाएंगी.”

“बेटा, ब्रेड पिज़्ज़ा तो कभी भी खा सकते हैं. गांव के चूल्हे की रोटी खाने में जो मज़ा है, वो ब्रेड में कहां?”

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“चूल्हा अब कहां है?” बच्चों ने कहा.

“क्यों, ऊपर छत पर था न पहले तो?” मैंने आश्‍चर्य से पूछा.

“पहले था, पर अब कोई भी चूल्हे पर रोटियां नहीं सेंकता. घर-घर में गैस आ चुकी है, तो कौन धुएं में अपनी आंखें फोड़ेगा.” चाची ने कहा.

“पर चाची, आप ही तो कहती थीं कि चूल्हे की रोटियां ही सेहत के लिए सबसे अच्छी होती हैं. गैस में पका खाना तो शरीर को नुक़सान ही पहुंचाता है.”

“हां बेटा, कहती तो अब भी हूं, लेकिन अब व़क्त के साथ बदलना पड़ता है. चूल्हा-चौका भी बदल गया है. तेरी भाभी भी चूल्हे पर खाना नहीं बनाती. पर मैं तेरे लिए आज बाटी बनाऊंगी, तुझे पसंद है न.” चाची ने लाड़ से कहा.

अगली सुबह मैं अपना सामान पैक कर रही थी कि चाची ने पूछा, “क्या बात है वर्षा, कहां जा रही है?”

“चाची, मैं वापस जा रही हूं, ऑफिस जल्दी जॉइन करना है.”

“ये क्या बात हुई, तू तो 15 दिन की छुट्टी लेकर आई थी. फोन पर तो कहा था तूने कि इस बार पूरे 15 दिन आप लोगों के साथ बिताऊंगी. इतने सालों बाद तो आती है और अब जाने की बात कह रही है.”

चाची नाराज़ हो रही थीं, लेकिन मैं भी क्या करती. मन ही नहीं लग रहा

था. “चाची, सच कहूं तो मेरा मन ही नहीं लग रहा इस बार. सब अपने-अपने घरों में कैद हैं, न समय है, न फुर्सत. टीवी, कंप्यूटर और मोबाइल में ही सिमट गई हैं यहां भी लोगों की ज़िंदगियां. अब आंगन में आकर कोई नहीं बैठता, न छतों पर आकर आपस में बातचीत होती है. छतें भी अब कहां रह गईं, हर जगह स़िर्फ दीवारें ही दीवारें नज़र आती हैं. शहर में दम घुटने लगता था, तो हम अपने गांव आ जाते थे सुकून के कुछ पल गुज़ारने, लेकिन गांव में भी अगर दम घुटने लगेगा, तो कहां जाएंगे? ये सुख-सुविधा तो बाद की बात है, पहले कच्चे मकानों में चूल्हे की रोटियां खाकर जो सुकून मिलता था, वो अब एसी कमरों में बैठकर गैस पर बने ब्रेड पिज़्ज़ा में नहीं मिलता…”

भावनाओं में बहकर न जाने मैं क्या-क्या और कब तक बोलती रही… “बुआजी, राम-राम! आशीर्वाद दीजिए, आज से मेरी परीक्षाएं शुरू हो रही हैं. स्कूल जा रहा हूं.” मेरे 5 साल के भतीजे ने मेरे पांव छूकर जैसे ही यह कहा, तो एक अलग ही अनुभव हुआ. नकारात्मक भावनाओं का बहाव अचानक रुक गया… मैंने उसे आशीर्वाद दिया, तो थोड़ी देर बाद ही मेरी 8 साल की भतीजी भी तैयार होकर आ गई. उसने भी राम-राम कहा और सबसे आशीर्वाद लेने लगी.

मेरे मन में एक बात अचानक आई और रोज़ सुबह का वो मंज़र घूम गया, जब ये बच्चे 6 बजे उठकर स्कूल के लिए तैयार होकर सबको राम-राम कहते हैं और पांव छूकर आशीर्वाद लेते हैं. मैं सोई हुई होती हूं, तब भी मेरे पैरों को हाथ लगाकर स्कूल के लिए चल पड़ते हैं और दोपहर में भी स्कूल से लौटकर सभी के चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लेते हैं. मैंने अपनी पैकिंग वहीं रोक दी और बच्चों से कहा, “चलो, मैं तुम लोगों को स्कूल छोड़कर आती हूं आज.”

बच्चे तो ख़ुशी से उछल पड़े. वापस घर आई, तो मैं काफ़ी हल्का महसूस कर रही थी. दरसअल, मैं यह समझ ही नहीं पाई कि भले ही भौतिक चीज़ें बदल रही हैं, गांव में भी सुख-सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन हमारे संस्कार अब भी ज़िंदा हैं. हमारे ये छोटे-छोटे बच्चे आज भी सुबह उठकर सबको राम-राम कहना और सबके पांव छूना नहीं भूले. बड़ों का आशीर्वाद इन्हें परीक्षाओं में हौसला देगा, यह बात इतनी-सी उम्र में भी ये जानते हैं… यही तो है हमारे गांव, हमारे संस्कार, हमारी पहचान. हम अपना अस्तित्व क्यों उन गली, मोहल्लों, नुक्कड़ों या छतों में छिपी यादों में ढूंढ़ते फिरते हैं, जबकि हमारा अस्तित्व तो हमारे संस्कारों में है. इन बच्चों में है, जो आनेवाली पीढ़ी हैं, जो हमारा भविष्य हैं. मैं भी कितनी मूर्ख हूं, जो इन मूल संस्कारों को छोड़कर बाहरी चीज़ों में सुकून ढूंढ़ती रही.

शुक्र है, इतने बदलावों के बीच भी कुछ चीज़ें नहीं बदल रहीं. हमारी वो परंपरा, जो हमारी पहचान है, उन पर अब भी इस भौतिकता का प्रभाव नहीं पड़ा है. ये छोटे-छोटे बच्चे भी बड़ों के आशीर्वाद का महत्व जानते हैं, फिर क्या फ़र्क़ पड़ता है कि मकान कच्चे हैं या पक्के, ये बच्चे बड़ों का सम्मान करते हैं, फिर क्या फ़र्क़ पड़ता है कि खाना चूल्हे पर पका है या गैस पर… ये बच्चे अपने संस्कारों से बेहद प्यार करते हैं, फिर क्या फ़़र्क  पड़ता है कि ये बाटी खा रहे हैं या पिज़्ज़ा…

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दरअसल, हम वेशभूषा, खान-पान और रहन-सहन को ही अपनी संस्कृति और अपनी पहचान मान लेते हैं, जबकि इन बाहरी आवरणों से भी कहीं ज़्यादा ज़रूरी है कि हम अपनी पहचान से, अपने अस्तित्व से और अपने संस्कारों से दिल से कितना प्यार करते हैं. उसका कितना सम्मान करते हैं.

अगर मुझे कोई देहाती कहे, तो मुझे चिढ़ होती है, लेकिन अपने देहात में तो मैं उसी देहातीपन को ढूंढ़ती हूं… अगर मुझे कोई गंवार कहे, तो ख़ुद को सॉफिस्टिकेटेड दिखाने की तमाम कोशिशों में जुट जाती हूं, लेकिन गांव में आकर तो दिल उस गंवारपन में ही घुलना-मिलना चाहता है… जिस दिन यह दोहरा मापदंड हम अपने भीतर से निकाल देंगे, तब हमें अपने गांव को गांव में आकर यूं खोजना नहीं पड़ेगा… क्योंकि वो हमारा अस्तित्व बनकर हमारे मन में, हमारे संस्कारों में हमेशा हमारे साथ बना रहेगा.

“चाची, आज खाने में क्या बना रही हो?”

“मैंने छाछ और आलू के परांठे बनाए हैं. देशी घी भी है घर का बना हुआ. तेरे लिए कल से चूल्हे पर रोटियां भी सेंक देंगे. कह दिया है तेरी भाभी को. लेकिन तू तो जाने को कह रही थी, अब क्या हुआ…?”

“चाची, मेरे वापस जाने में कई दिन हैं, अभी तो मुझे नई सब्ज़ी मंडी, नई मार्केट, सिनेमाघर और मॉल भी देखने हैं… और हां, चूल्हे में बना खाना भी तो खाना है… और भाभी के हाथों का ब्रेड पिज़्ज़ा भी…”

Geeta sharma

    गीता शर्मा

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कहानी- मैंने तो पहले ही कहा था… (Short Story- Main To Pahle Hi Kaha Tha…)

मंगला को समझ में नहीं आया कि ये अचानक शांता को क्या हो गया? मंगला ने रमेशजी से शांता के पत्र की चर्चा की. रमेशजी ने वही पुराना वाक्य दुहरा दिया, “मैंने तो तुमसे पहले ही कहा था कि इस झमेले में मत पड़ो. अब भुगतो अपनी भलाई का परिणाम.”

रमेशजी के पास समस्या का हल न पाकर मंगला भागी-भागी हर्ष के घर पहुंची. उसने हर्ष की मां से इस बारे में चर्चा की.

Short Story- Main To Pahle Hi Kaha Tha

“चलो, अंत भला तो सब भला! अब तो तुम्हारी जान में जान आई होगी.” रमेशजी ने मंगला से कहा.

‘हूं!’ मंगला के मुंह से इससे अधिक और कुछ नहीं निकला. उसे बस रुलाई फूट रही थी. उसे लगा कि आज ये कितने आराम से कह रहे हैं कि अब तो तुम्हारी जान में जान आई होगी, कल तक तो ये भी मुझे ही ताना दे रहे थे.

“अरे-अरे, तुम रोने क्यों लगी? अब तो सब कुछ ठीक हो गया. अब रोने का क्या कारण?” रमेशजी ने चकित होते हुए मंगला से पूछा.

“कल तक तो आप भी मुझे ही दोष दे रहे थे.” मंगला के मन का क्षोभ आख़िर शब्दों के रूप में सामने आ ही गया.

“ओह, तो ये बात है. ठीक है-ठीक है, कल तक मैं ग़लत था और तुम सही थीं. लो, मान ली मैंने अपनी ग़लती. चलो, अब आंसू पोंछो.” रमेशजी ने मुस्कुराते हुए कहा. फिर वे मंगला के पास बैठते हुए बोले, “सचमुच, तुमने बहुत समझदारी से सब कुछ संभाल लिया, वरना मैं तो समझता था कि इस मामले में अब कुछ नहीं हो सकता.”

ये प्रशंसा थी या सांत्वना, मंगला तय नहीं कर पाई, लेकिन उसने भी बात को आगे खींचना उचित नहीं समझा. दूसरों के कारण पिछले एक माह से घर में जो तनाव चल रहा था, आज उसके समाप्त हो जाने पर उसकी चर्चा दोहराने से क्या लाभ.

“आप बैठिए, मैं आपके लिए चाय बना कर लाती हूं.” मंगला रसोई की ओर जाने के लिए उठ खड़ी हुई.

“नहीं, तुम बैठो. चाय बनाकर मैं लाता हूं.” रमेशजी ने मंगला का हाथ पकड़ कर उसे वापस सो़फे पर बिठाते हुए कहा और वे स्वयं उठ खड़े हुए. मंगला ने प्रतिवाद नहीं किया. वह चुपचाप सो़फे पर बैठ गई.

रमेशजी के जाते ही मंगला के मानस पर विगत एक माह का घटनाक्रम चलचित्र की भांति घूमने लगा. उफ़! कितनी निर्लज्जता के साथ शांता ने दोषारोपण किया था मंगला पर.

“अपनी बेटियों को तो अच्छे-अच्छे घरों में ब्याह दिया और हमारी बेटी के लिए ऐसा नरक चुना. शरम नहीं आई तुम्हें ऐसा करते हुए.” फिर कोसने की मुद्रा में उंगलियां चटकाती हुई बोली थी, “तुम्हारी बेटियां भी सुख से नहीं रह सकेंगी, मंगला! ये मेरा श्राप है, श्राप!”

शांता की बात सुन कर मंगला फूट-फूटकर रो पड़ी थी. उसके लिए कोई कुछ भी बुरा-भला कहे, वह हंसकर सुन सकती है, लेकिन बेटियों के लिए वह बुराई का एक भी शब्द सहन नहीं कर सकती. रो-रोकर उसके सीने में दर्द होने लगा था. मगर शांता को न चुप होना था और न वह चुप हुई. जी भर कर अनाप-शनाप बकती रही. शाम को जब रमेशजी द़फ़्तर से घर आए, तो वे भी शांता का रौद्र रूप देखकर सकते में आ गए. मंगला ने अलग ले जाकर उन्हें सारी बात बताई. मंगला की बात सुनते ही वे बोले, “और करो भलाई के काम. इसी को कहते हैं होम करते हाथ जलना. मैंने तो तुमसे पहले ही कहा था कि तुम इस झमेले में मत पड़ो, लेकिन तुम्हें तो उस समय शांता की बेटी का घर बसाने की धुन थी. अब तुम्हीं सुनो उसकी सत्रह बातें.”

कहां तो मंगला को आशा थी कि रमेशजी उसकी मदद करेंगे. उसे कोई रास्ता सुझाएंगे, लेकिन रमेशजी ने तो पल्ला ही झाड़ दिया. ऊपर से उसी को दोषी ठहराया. जबकि देखा जाए तो मंगला का इसमें कोई दोष था ही नहीं. किसी का घर बसाना क्या कोई अपराध है?

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मंगला इस झमेले में पड़ती भी नहीं अगर शांता ने उसे रो-रोकर अपना दुखड़ा न सुनाया होता. शांता रिश्ते में मंगला की फुफेरी बहन लगती थी. यह रिश्ता बहुत निकट का तो नहीं था, लेकिन सहृदया मंगला की आदत है कि वह दूसरों के दुख से जल्दी द्रवित हो उठती है. शांता ने उसे बताया कि उसकी बेटी कुशा के लिए योग्य वर नहीं मिल पा रहा है. वह एमए कर चुकी है. अपना स्वयं का ब्यूटीपार्लर चला रही है. फिर भी दहेज की लम्बी-चौड़ी मांगें कुशा के ब्याह के रास्ते में रोड़ा बनी हुई हैं.

“तुम अपने आसपास का कोई लड़का देखो ना. तुम लोगों का तो अच्छा रुतबा है, शायद यहां बात बन जाए. हम तो अपने शहर में क्या, अपने प्रदेश में भी लड़का ढूंढ़ चुके, लेकिन बात नहीं बन रही है. लड़की की बढ़ती उम्र देख-देख कर रात को नींद नहीं आती.” शांता ने चिरौरी करते हुए कहा था.

“ठीक है, मैं देखूंगी, मगर एक बात है….”

“क्या बात?” शांता ने चिंतित होकर पूछा था.

“कुशा बड़े शहर में पली-बढ़ी है और ये शहर कस्बाई है. यहां और वहां के रहन-सहन में बहुत अंतर है. कुशा को कहीं परेशानी न हो यहां रहने में.” मंगला ने कहा था.

“अरे नहीं, तुम इस बारे में ज़रा भी चिंता मत करो. हमारी कुशा बड़ी व्यवहारकुशल है. वह हर माहौल में तालमेल बिठा लेती है. तुम तो बस, उसकी नैय्या पार लगा दो.” शांता ने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा था.

उस दिन के बाद से मंगला ने कुशा के विवाह कराने का मानो बीड़ा उठा लिया. रमेशजी ने उसे टोका भी था, “मेरे विचार से तो तुम इस झमेले में मत पड़ो. शांता का स्वभाव यूं भी तीखा है, अगर कल को कुछ ऊंच-नीच हो गई तो तुम्हें दोष देगी.”

रमेशजी ने मानो भविष्यवाणी कर दी थी, किन्तु उस समय मंगला को क्या पता था कि उसे क्या-क्या भुगतना पड़ेगा. मंगला ने रमेशजी के साढू के एक दूर के रिश्तेदार के लड़के को कुशा के लिए ढूंढ़ ही निकाला. लड़के का नाम था हर्ष. उसने व्यावसायिक शिक्षा में उपाधि ले रखी थी, किन्तु फ़िलहाल उसके पास कोई अच्छी नौकरी नहीं थी. वह एक निजी मिल में फिटर का काम करता था. हर्ष के भाई-बहनों का विवाह हो चुका था. उस पर अपने माता-पिता के अतिरिक्त और कोई ज़िम्मेदारी नहीं थी. वे लोग लालची भी नहीं थे. उन्होंने दहेज लेने से साफ़ मना कर दिया था. मंगला को लगा कि हर्ष की पत्नी बनकर कुशा बहुत ख़ुश रहेगी. मंगला ने जब इस रिश्ते की बात रमेशजी को बताई, तो उन्होंने एक बार फिर मंगला को समझाया.

“ठीक है कि तुमने कुशा के लिए लड़का ढूंढ़ लिया है, लेकिन अंतिम निर्णय शांता को ही लेने दो. तुम तो बस, बिना कुछ छिपाए सब कुछ साफ़-साफ़ बता दो. आगे उनकी मर्ज़ी.”

“हां-हां, मैं सब कुछ बता दूंगी, भला मुझे किसी से कुछ छिपाकर क्या करना है? लेकिन देख लेना, शांता को यह रिश्ता पहली नज़र में ही पसंद आ जाएगा.” उत्साह से भरी हुई मंगला बोल उठी थी.

हुआ भी वही. शांता को रिश्ता पसंद आ गया. कुशा और हर्ष ने भी एक-दूसरे को पसंद कर लिया. शीघ्र ही मुहूर्त निकल आया और कुशा और हर्ष विवाह बंधन में बंध गए. रमेशजी ने भी अपने सारे संदेहों को किनारे करके विवाह के अवसर पर बढ़-चढ़ कर हाथ बंटाया.

सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था. पिछले माह मंगला को पता चला था कि कुशा के पांव भारी हैं और वह अपने मायके गई है. कुशा के सुखी जीवन के बारे में जान कर मंगला को अजीब-सा सुकून मिलता. उसे लगता कि उसने अपनी बेटियों की भांति एक और लड़की का जीवन संवारा है. किन्तु एक दिन शांता का पत्र पाकर मंगला अवाक रह गई. शांता ने मंगला पर आरोप लगाते हुए लिखा था कि उसने हर्ष के साथ ब्याह कराकर कुशा का जीवन बर्बाद कर दिया. वह अगर कुशा को सुखी नहीं देखना चाहती थी तो उसने कुशा को ज़हर क्यों नहीं दे दिया, ऐसे जीवनभर का नरक क्यों गले मढ़ दिया? इत्यादि-इत्यादि.

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मंगला को समझ में नहीं आया कि ये अचानक शांता को क्या हो गया? मंगला ने रमेशजी से शांता के पत्र की चर्चा की. रमेशजी ने वही पुराना वाक्य दुहरा दिया, “मैंने तो तुमसे पहले ही कहा था कि इस झमेले में मत पड़ो. अब भुगतो अपनी भलाई का परिणाम.”

रमेशजी के पास समस्या का हल न पाकर मंगला भागी-भागी हर्ष के घर पहुंची. उसने हर्ष की मां से इस बारे में चर्चा की.

“अब हम तुम्हें क्या दोष दें मंगला बहन! तुमने तो भले का ही विचार किया होगा, लेकिन इतना तो कहना ही पड़ेगा कि तुमने लड़की के बारे में हमें ठीक-ठीक नहीं बताया.” हर्ष की मां ने कोमल शब्दों में ही सही, लेकिन दोषी मंगला को ही ठहराया.

“लेकिन हुआ क्या?” मंगला ने चिंतित होते हुए पूछा.

“वह लड़की यहां तालमेल नहीं बिठा पा रही है. हम ठहरे मध्यमवर्गीय, उसके जैसी फारवर्ड लड़की को हम भी कहां तक सहन करें.” हर्ष की मां ने अपनी बेचारगी प्रकट करते हुए कहा.

“यह तो मैंने पहले ही बताया था कि कुशा बड़े शहर में पली-बढ़ी है. हो सकता है कि उसे यहां के तौर-तरी़के अपनाने में थोड़ा समय लगे.” मंगला ने याद दिलाया.

“हां, कहा तो था, लेकिन अब तो वह यहां आना ही नहीं चाहती है. हर्ष गया था उसे और अपनी बेटी को लेने, मगर उसने आने से मना कर दिया.” हर्ष की मां ने बताया.

“क्या? कुशा को बेटी हुई है! अरे वाह!” मंगला ने अपनी प्रसन्नता व्यक्त की.

“इसमें अच्छा क्या है? उसे तो अब यहां आना ही नहीं है.” हर्ष की मां ने ठंडे स्वर में कहा.

मंगला को हर्ष की मां का यह भाव रुचिकर नहीं लगा.

सप्ताह भर बाद शांता का एक और पत्र आ गया. उसमें भी उसने मंगला को उल्टा-सीधा लिखा था और कुशा का जीवन बर्बाद करने का दोषारोपण किया था. इस प्रकार दोनों पक्षों की ओर से बार-बार दोषारोपण किए जाने से मंगला का हृदय आहत होने लगा. उसने तो ऐसा स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि कुशा अथवा हर्ष को अपने जीवन में कोई दुख झेलना पड़े.

अभी तीन दिन पहले शांता और कुशा अपनी नन्हीं बेटी सहित आ धमकी थी.

“तुमने ही ये आग लगाई है, अब तुम्हीं इसे बुझाओ. मेरी कुशा एक पल के लिए भी उस घर में नहीं रहेगी. ये हैं तलाक़ के काग़ज़ात, इन पर तुम हर्ष के हस्ताक्षर करा कर लाओ.” शांता ने मंगला पर मानसिक दबाव डालते हुए कहा.

शांता की बात सुनकर मंगला घबरा गई. उसने एक बार फिर रमेशजी से इस बारे में चर्चा की.

“मामला तो सचमुच गंभीर हो चला है. ठीक है, देखता हूं मैं.” रमेशजी ने मंगला को धीरज बंधाते हुए कहा. किन्तु उसी दिन उन्हें दौरे पर तीन दिन के लिए बाहर जाना पड़ गया.

“जैसे भी हो, ये तीन दिन टाल-मटोल करती रहना. फिर मैं लौटकर देखूंगा कि क्या हो सकता है… वैसे मैंने तो पहले ही कहा था…” रमेशजी ने जाते-जाते मंगला को समझाया भी था और उलाहना भी दे डाला था.

रमेशजी के उलाहने सुनकर मंगला को ताव आ गया कि अब चाहे जो भी हो, इस मामले को वह ख़ुद ही हल करेगी. यह निश्चय करने के बाद उसने पूरे मामले पर एक बार फिर दृष्टिपात किया. उसे लगा कि उसने अभी तक कुशा की मां और हर्ष की मां की बातें सुनी हैं, उसने कुशा या हर्ष से तो बात ही नहीं की. आख़िर वे लोग क्या चाहते हैं?

मंगला ने शाम के समय शांता, उसके पति और कुशा से बात करने का निश्चय किया. उसी समय उसने हर्ष और उसके माता-पिता को भी बुला लिया. सभी लोगों के इकट्ठा होने पर पहले तो विवाद की स्थिति निर्मित होने लगी, लेकिन तब मंगला ने कठोरता से काम लिया.

“आप लोग बहुत बोल चुके हैं, कृपया, अब आप लोग बीच में न बोलें.” मंगला ने कठोर स्वर में शांता और हर्ष की मां को डांटते हुए कहा.

“कुशा, क्या तुम अपनी ससुराल में दुखी हो?” मंगला ने कुशा से पूछा.

“नहीं तो.” कुशा ने उत्तर दिया.

“लेकिन तुम्हारी मां का तो कहना है कि तुम ससुराल में ख़ुश नहीं हो.” मंगला ने फिर कहा.

“नहीं, ऐसा कुछ नहीं है….बात दरअसल ये है कि मां मुझसे पूछती रहती हैं कि हर्ष मुझे घुमाने ले जाते हैं कि नहीं या हर्ष कितने बजे घर लौटते हैं… मैंने मां को बताया कि इनकी ड्यूटी का समय बदलता रहता है, इसलिए रोज़ घूमने नहीं जा पाते हैं. कई बार ये देर से घर लौटते हैं और तब हम साथ में खाना खाते हैं. शायद इसी से मां को लगा होगा कि मैं ख़ुश नहीं हूं.” कुशा ने कहा.

“तो फिर तुम तलाक़ क्यों लेना चाहती हो?” मंगला ने पूछा.

“मैं कहां लेना चाहती हूं…ये तो हर्ष चाहते हैं, मुझसे अलग होना.” कुशा के स्वर में पीड़ा का भाव उभर आया.

“क्या बात है हर्ष? क्या तुम्हें कुशा अच्छी नहीं लगती? या तुम्हें इसके व्यवहार से कष्ट पहुंचता है?” मंगला ने अब हर्ष से पूछा.

“नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है. मुझे कुशा से कोई शिकायत नहीं है.” हर्ष ने दृढ़तापूर्वक कहा. वह आगे बोला, “मैंने तो कुशा से तलाक़ लेने के बारे में कभी सोचा भी नहीं, बल्कि मैं तो ये सोचकर चकित था कि कुशा मेरे साथ क्यों नहीं रहना चाहती? लेकिन अब तो मुझे कुछ और ही मामला समझ में आ रहा है.”

“हां, मुझे भी. तो कुशा और हर्ष तुम दोनों तलाक़ लेना चाहते हो या साथ-साथ रहना चाहते हो?” मंगला ने पूछा.

“हम साथ-साथ रहना चाहते हैं.” दोनों एक स्वर में बोल उठे.

कुशा के मुंह से यह स्वीकारोक्ति सुनकर शांता का चेहरा उतर गया. उधर हर्ष की मां भी नज़रें चुराने लगी.

“देखा, कभी-कभी घर के बड़ों के अहम् के कारण किस तरह बच्चों का जीवन बर्बाद होने लगता है.” मंगला ने कहा. फिर उसने शांता से पूछा, “तुमने ऐसा क्यों किया शांता?”

“मैंने सोचा कि कुशा ख़ुश नहीं है, लेकिन अगर कुशा ख़ुश है तो… तो मैं अपने व्यवहार के लिए माफ़ी मांगती हूं.”

“हां, मैं भी! मैंने भी नाहक तुम्हें दोष दिया, मंगला बहन!” हर्ष की मां बोल उठी.

“चलो इसी बात पर दोनों समधिनें एक-दूसरे को गले लगा लो!” मंगला ने कहा. फिर उसने आगे कहा, “कई बार हम समझ लेते हैं कि हमारे बच्चे नई परिस्थिति में तालमेल नहीं बैठा पाएंगे और इसी भ्रम में पड़कर हम ग़लत निर्णय कर डालते हैं. और नई बहू के साथ-साथ सास को भी तो तालमेल बैठाना चाहिए. क्यों हर्ष की मां, मैंने ग़लत कहा क्या?”

“नहीं मंगला बहन, तुम ठीक कहती हो.” हर्ष की मां ने झेंपते हुए कहा.

इस प्रकार पटाक्षेप हुआ मंगला के जीवन के इस अप्रिय प्रसंग का. रमेशजी जब दौरे से वापस आए तो मंगला ने उन्हें पूरी घटना कह सुनाई.

“चलो अच्छा हुआ कि सब कुछ ठीक हो गया और एक घर उजड़ने से बच गया.” रमेशजी बोल उठे. आज सुबह शांता अपने पति के साथ वापस घर चली गई. हर्ष, कुशा और अपनी बेटी को अपने साथ ले गया.

“चाय तैयार है, मैडम!… और साथ में गरमा-गरम पकौड़े भी.” रमेशजी ने प्रफुल्लित होते हुए कहा.

“अरे, पकौड़े मैं बना देती आपने क्यों कष्ट किया?” मंगला हड़बड़ाकर बोली. वह अब बीते घटनाक्रम से बाहर निकल आई थी.

“तो क्या हुआ जो मैंने बना लिए. मैंने तो पहले ही कहा था…”

“क्या…?” मंगला ने चौंककर पूछा.

“यही कि मैं पकौड़े बहुत अच्छे बनाता हूं!” कहते हुए रमेशजी ठहाका मारकर हंस दिए, मंगला भी अपनी हंसी रोक नहीं पाई. आख़िर महीना भर बाद वह खुलकर हंसी थी.

– डॉ. सुश्री शरद सिंह

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कहानी- राम-लखन का…? (Short Story- Ram Lakhan Ka…?)

ईश्‍वर से प्रार्थना करती हूं, संसार में सभी भाई-बहन के पावन रिश्ते को समझ सकें. जब कभी अपनी ‘दी’ के प्रति किसी ‘मानो’ की अटूट स्नेहपगी श्रद्धा निरखूंगी, स्वयं से ही प्रश्‍न करूंगी, ‘राम-लखन का…?’ और मेरे अंतस् के एक निर्मल कोने में स्थापित तुम्हारी स्मृति निस्सन्देह जीवन्त हो बोल पड़ेगी, “जो ऽऽऽ ड़ा ऽऽऽ!!!” …पर मैं नहीं रोऊंगी. सच, तुम्हारी सौगन्ध, कभी नहीं रोऊंगी.

Short Story- Ram Lakhan Ka

बालकनी में एकाकी बैठी लता वेदना की महोदधि में आपादमस्तक डूबती जा रही थी. जब नियति का कुठाराघात आत्मा को खंडित करके अनिर्वचनीय पीड़ा का सृजन करता है, तब इंसान एकाकी, मौन, स्तब्ध-सा होकर कुछ ही पलों में भूतकाल को पुनः जी उठता है. ऐसी ही अवस्था आज लता की हो रही थी.

हृदय से जुड़ा, बालपन की कोमल भावनाओं के मृदुल एहसास से भीगा, रक्त बंधन में बंधा वो नैसर्गिक रिश्ता, जो मन-प्राण में उष्मा का संचार करता रहा हो, सहसा सामने से विलुप्त हो अनंत में मिल जाए, तो हृदयविदारक अनुभूति तो होगी ही.

लता की आंखें आंसुओं से लबालब थीं. ‘उ़फ्! तू इस तरह चला जाएगा, कभी सोचा न था.’ वह बेचैन हो उठी.

“मां! कहां हैं आप?” बेटी ने पुकारा. पर वो मौन रहीं.

“लता! अकेली क्यों बैठी हो? चलो, भाभी बुला रही हैं.” पति प्रभाकर ने पीछे से सम्बोधित किया तो आर्द्र स्वर में बोल पड़ी, “प्लीज़! मुझे थोड़ी देर अकेला छोड़ दीजिए न. मैं कुछ देर में आ जाऊंगी.”

“लेकिन…”

“प्लीज़…”

“ठीक है. पर वादा करो, अब रोओगी नहीं.” प्रभाकर ने कहा तो लता ने कोई उत्तर नहीं दिया. आंसुओं पर कभी किसी का वश रहा है भला?

प्रियपात्र की मृत्यु के कारण उपजी पीड़ा अगर आंसू बनकर न झरे, तो इंसान जीवित रह सकेगा? सम्पूर्ण हृदय की यात्रा कर नयन-मार्ग से व्यक्त हुई वेदना का अक्षरशः अनुवाद होते हैं आंसू और भावनात्मक धरातल पर स्वस्थ संबंधों का मौन संवाद भी. आंसू ही तो भावनाओं के पावन अनुबंधों को एक विराटता प्रदान करते हैं.

भीगी पलकें मूंदकर लता ने आरामकुर्सी की पुश्त से सर टिका दिया. अधर मौन थे, पर मन में शब्दों की आंधी-सी चल रही थी.  मन भूतकाल का पुनर्द्रष्टा होकर मुखर हो उठा था. बचपन के अनमोल क्षण पुनः वर्तमान का रूप धर अठखेलियां कर उठे थे. लग रहा था, जैसे ‘लता दी’ अपने ‘मानो’ के समक्ष बैठी मीठे शैशव की मृदु-स्निग्ध यादें बांट रही हो, उससे बातें कर रही हो…

मेरा और तुम्हारा रिश्ता बचपन से ही न जाने कौन-से तंतुओं में बंधा था, मानो! मात्र चार वर्ष ही तो बड़ी थी मैं तुमसे, फिर भी वो स्नेह, वो आदर… अभिभूत हो उठती थी मैं. ‘दी’ के बिना एक कौर मुंह में नहीं डालते थे तुम. हम साथ स्कूल जाते, खेलते-खाते, पर लड़ते-झगड़ते नहीं थे. स्मरण है, दादी मां ने एक बार हमारी नज़र उतारते हुए कहा था, “नज़र न लगे मेरे राम-लखन के जोड़े को.”

“दादी, ये तो बताओ, राम कौन और लखन कौन? मैं तो लड़की हूं न?” मैंने ज़ोर से हंसते हुए पूछा था, तो तुम दादी के कुछ बोलने से पहले ही बोल पड़े थे, “दी! तुम राम, मैं तुम्हारा लखन.” पूरा घर आनंद की ध्वनि से आपूरित हो उठा था और मैं आह्लाद के अतिरेक से भाव-विभोर.

मां पूछतीं, “क्यों रे मनोहर! बड़ा होकर भी लखन बना रहेगा न? या फिर अपनी ‘दी’ को ही भूल जाएगा?”

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तुम ज़ोर से मेरा हाथ पकड़कर कहते, “दी! मैं तुम्हें भूल सकता हूं क्या?”

“नहीं रे!” मैं हंस पड़ती.

तुम्हारी वो भयमिश्रित तोतली वाणी आज भी कानों में गूंजती है.

दादी प्रायः तुझसे पूछा करतीं, “राम लखन का…?”

निश्छल बाल सुलभ हंसी हंसकर तुम ज़ोर से कह उठते, “जो ऽऽऽ ड़ा ऽऽऽ!!” जब कभी तुम किसी बात से नाराज़-परेशान रहते, यही प्रश्‍न क्षणांश में तुम्हारी सम्पूर्ण उदासी को उसी तरह ले भागता, जैसे धूप कोहरे को ले भागती है.

शैशव की मधुर यादें दामन में समेटे हम दोनों भाई-बहन बचपन की दहलीज़ लांघने लगे, तो रक्त संबंध से जुड़ा ये पावन रिश्ता और मज़बूत होता गया. मानो! क्या तुम्हें नहीं लगता, यदि माता-पिता भाई-बहन के प्यारे-पावन रिश्ते को बचपन से ही प्रगाढ़ बनाएं, दोनों को एक-दूसरे का महत्व समझाते चले जाएं, तो एक अटूट परिवार का सृजन होता जाएगा? व्यक्ति कभी एकाकी नहीं रहेगा!

मात्र पंद्रह वर्ष की ही तो थी मैं, जब भीषण ज्वर, जिसे डॉक्टरों ने टायफाइड बताया था, के घेरे में कसती जा रही थी. न दवा असर कर रही थी, न दुआ. ज्वर के भीषण संघात से मैं चेतना शून्य हो जाती थी. कई दिनों से अन्न का दाना मुख में नहीं डाला था. घर में सब का बुरा हाल था. फिर एक दिन सेब के छोटे-छोटे टुकड़े कटोरी में डालकर तुम मेरे सम्मुख बैठ गए थे.

“दी! आज तो तुम्हें खाना ही होगा. जब तक खाओगी नहीं, स्कूल भी नहीं जाऊंगा. और रोज़ पूछती हो न, ‘राम-लखन का…?’ तो जवाब में ‘जोड़ा’ कभी नहीं बोलूंगा. चलो, मुंह खोलो.” तुम ने साधिकार एक टुकड़ा मेरे मुंह में डाल दिया था. न जाने किस शक्ति के वशीभूत हो मैं उस दिन के बाद धीरे-धीरे खाना खाने लगी थी. फिर ज्वर भी उतरने लगा था.

“हे ईश्‍वर! इनका स्नेह बनाए रखना.” मां का आर्द्र स्वर आज भी मन में ध्वनित होता है, मानो.

समय की गति कितनी तीव्र होती है, इसका एहसास इंसान को तब होता है, जब वो किसी के न रहने से उत्पन्न हुए शून्य को अनुभूत कर ठगा-सा खड़ा रह जाता है.

याद है न, मेरे विवाह का दिन? अठारह वर्ष के सुंदर-सौम्य मनोहर के मुखड़े पर आनंदमिश्रित वेदना की स्पष्ट छाया. एक ओर बहन के सुख-सौभाग्य की कामना से उत्पन्न आह्लाद, तो दूसरी तरफ़ बिछोह का दंश. सारे काम ऐसे निबटाए थे तुमने जैसे किसी ने जादू की छड़ी फेर दी हो. विदाई के क्षणों में बार-बार रुलाई रोकने के प्रयास में होंठ काट रहे थे तुम और तुम्हारे सर पर स्नेह से हाथ फेरकर मैंने पूछ ही लिया था, “मानो! राम-लखन का…?”

तुम बिलखकर मेरे चरणों में झुक गए थे. इस प्रश्‍न का उत्तर तुम्हारे मन में जो कौंध गया था. अपने जीजाजी से भी तुमने यही मांगा था, “मुझे आप से केवल ये वादा चाहिए कि अगर आप मुझसे किसी बात पर रुष्ट हो जाएं, तब भी दीदी को मुझसे मिलने से नहीं रोकेंगे. और वो जब भी मुझे पुकारेगी, मैं हाथ बांधे उसके समक्ष खड़ा मिलूंगा.”

तुम इतने बड़े झूठे निकलोगे, कभी सपने में भी नहीं सोचा था. आज पुकारूंगी तो क्या आओगे मानो?

तुमने जीवन का हर कार्य मेरे विमर्श से ही किया. सब का आशीष सर-माथे लिया, तभी तो माधवी जैसी सुघड़ पत्नी और पूजा, पीयूष जैसे प्यारे बच्चे मिले. “दी! जीजाजी के रिटायरमेंट के बाद तुम हमारे शहर में ही बस जाना. यहीं पास में एक अच्छा प्लॉट खाली है. मैंने बात भी पक्की कर ली है. मैं जीवनपर्यंत तुम्हारे आशीष तले रहना चाहता हूं.” मैंने तुम्हारी ये बात भी तो मान ली थी न? आज घर है, मैं हूं… तुम कहां हो मानो?

जब कभी छुट्टियों में मायके आती, तुम छोटे बच्चे-से बन जाते. अल्पभाषी, सौम्य व्यक्तित्व का धनी, विद्वान इतिहासवेत्ता डॉ. मनोहर चौधरी कहीं खो जाता और मेरा वही तोतला नन्हा भाई सामने खड़ा हो जाता, जिससे मैं पूछा करती थी,

“राम-लखन का…?”

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माधवी कहती, “दीदी! आपके कारण ही इनका बचपन आज भी विद्यमान है. अभी कोई देख ले इन्हें, तो धोखा खा जाए. कॉलेज में घुसते हैं तो सबको सांप सूंघ जाता है. पढ़ाते हैं तो छात्र मंत्रमुग्ध-सा सुनते हैं. वक्ता ऐसे कि श्रोता आंखों में कौतूहल और मन में अपार आदर समेटे हतप्रभ रह जाते हैं और व्यक्तित्व ऐसा कि लगता है जैसे नाक पर बैठी मक्खी उड़ाने के लिए भी एक नौकर होगा. और अभी देखिए, पायजामा पिंडलियों तक उठाए, मात्र बनियान डाले आपके साथ रसोई में आलू छील रहे हैं.”

“हां, हां. उड़ाओ मेरा मज़ाक. पर याद रखो, एक भी आलू की टिकिया चखने नहीं दूंगा.” तुम मुंह बनाकर कहते तो सब हंस पड़ते. मैं सोच में डूब जाती, ठीक ही तो कहती है माधवी. भाई-बहन का सुदृढ़ स्नेह बचपन को हमेशा मुट्ठी में सहेजे रखता है. ये एक ऐसा अलौकिक रिश्ता है, जिसमें कोई लेन-देन नहीं होता. न कोई ऋण चुकाना होता है, न ही कोई समझौता निभाना होता है. आस्था की बुनियाद पर रखा यह पावन रिश्ता कोई शर्त नहीं रखता.

मानो! कहां विलुप्त हो गए वो क्षण? किस जादूगर ने अपनी डिबिया में समेट लिए?

उस दिन तुम्हारे आनंद का पारावार नहीं था, जिस दिन तुम्हारे जीजाजी के रिटायरमेंट के बाद मैं वापस अपने शहर, अपने घर लौट आई थी.

“दी! अब राम-लखन का जोड़ा कभी नहीं बिछुड़ेगा. बस, पांच-छह वर्ष में मैं भी रिटायर हो जाऊंगा. फिर हर क्षण तुम्हारे स्नेहाच्छादित आंचल तले ही बिताऊंगा. ढेरों क़िताबें लिखूंगा. ख़ूब खाऊंगा.

मानो! कहां रखूं इतने स्नेह-मान को? आज जहां हर रिश्ते की नींव में कटुता है, वहां इतना आदर कहां सहेजूं? मैं अपने सौभाग्य पर इतरा उठी थी.

कॉलेज से लौटते हुए प्रतिदिन तुम मेरे घर आना नहीं भूलते थे. नित्य नये व्यंजन खाने की बचपन की तुम्हारी इच्छा अब और अधिक मुखर हो उठी थी.

तुम्हारे जीजाजी अक्सर कहते, “लता! बड़ी भाग्यवान हो तुम, जो तुम्हें मनोहर जैसा सहोदर मिला. अच्छे-बुरे हर व़क़्त में इसने हमारा साथ दिया है. आज के भौतिकवादी युग में तो जीवन का सार लगनेवाले रिश्ते भी भार लगने लगे हैं. ऐसे में तुम्हारा ये भाई विधाता की अनुपम भेंट है तुम्हारी झोली में.”

मैं भावविभोर हो हृदय से तुम्हें आशीष देती. फिर कहां चूक हो गई मानो! तू अपनी ‘दी’ से रूठकर कभी न लौटने के लिए क्यों चला गया?

कभी विस्मृत नहीं कर सकती वो दिन, जब तुम शाम को घर आए थे और तुरंत फ़रमाइश कर डाली थी, “दी! आज तो चाशनीवाला हलवा खाकर ही जाऊंगा.”

“नहीं मानो! तुझे डायबिटीज़ है, मैं अपने हाथ से तुझे इतना मीठा नहीं खिला सकती.”

“खिला दो, खिला दो. अब शायद जीवनभर खिला नहीं पाओगी.” तुम वही चिर-परिचित बालसुलभ हंसी हंसे थे.

मैं कांप गई थी, “मानो! क्या अशुभ बोल रहे हो?”

“दी! मैंने आपसे कभी कुछ छिपाया है, जो ये बात छिपाऊंगा? कुछ दिनों से पेट-कमर में दर्द रहता है, यूरिन में भी कुछ तकलीफ़ थी. डॉक्टर से मिला तो उसने किडनी प्रॉब्लम की ओर संकेत किया है. मैंने माधवी से भी नहीं कहा है. तुम उससे कहो, परसों दिल्ली जाने की तैयारी करे. फिर…”

तुम सहज भाव से बोलते जा रहे थे. मैं संज्ञाशून्य-सी बैठी थी.

फिर…? फिर सब कुछ अनचाहा घटित होता रहा.

दिल्ली आयुर्विज्ञान संस्थान में भी पुष्टि कर दी गई कि तुम्हारी दोनों किडनियां ख़राब हो चुकी हैं. पूरा परिवार इस आघात से उपजी पीड़ा के भंवरजाल में फंसा कसमसा रहा था. माधवी की ज़िद पर तुम उसके साथ बेहतर इलाज के लिए वेलौर जाने लगे, तो जाते-जाते मुझसे पहली बार पूछ गए, “दी! आज मैं पूछता हूं, राम-लखन का…?” मेरा अंतस् विदीर्ण हो उठा, अधर कांप कर रह गए. मैं ‘जोड़ा!’ नहीं कह पाई. तुम एक मायूस मुस्कान लिए मेरी नज़रों से ओझल हो गए. मैं आशीष को अंजुरी में भर ईश्‍वर से प्रार्थना करती रही.

एक शाम द्वार पर दस्तक हुई.

“कौन?”

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“मैं हूं दी! डॉक्टर मनोहर चौधरी, वेलौर रिटर्न.” तुम्हारा वही ज़ोरदार ठहाका बरामदे में गूंज उठा था.

लम्बी-चौड़ी क़द-काठीवाला मानो न जाने कहां विलुप्त हो गया था. हाथ में छड़ी लिये कृशकाय कोई दूसरा ही व्यक्ति सामने खड़ा था.

उ़फ्! कितना निर्दयी होता है काल, जो क्षणांश में सुखों की परिधि को लांघ, दुख के अगाध सागर में हठात् खींच ले जाता है.

कितना रोई थी मैं. “मानो, तुझे कुछ नहीं होगा. मैं तुझे अपनी किडनी दूंगी.” पर बेहद हठी थे तुम. शायद पहली बार मेरी बात नहीं मानी तुमने. आर्द्र कंठ से इतना ही कहा, “दी! मैं तुमसे केवल आशीष लूंगा और कुछ नहीं. वैसे भी जन्म लिया है, तो मृत्यु से भय कैसा? पूरा जीवन आनंद से जिया हूं. जब तक हूं, कोई दुखी नहीं होगा, कोई नहीं रोएगा…”

पर पूरा परिवार पाले से झुलसी कमलिनी-सा मृतप्राय था. दिन सरकते जा रहे थे. जिन हाथों से तुम्हें तरह-तरह के पकवान खिलाती आई थी, उन्हीं हाथों से नाप कर खाना और पानी देने में कलेजा मुंह को आता था मानो!

अंतिम सांस लेते हुए भी तुमने मेरा ही मान रखा था.

“मत रोओ, माधवी! ‘दी’ हैं न. पूजा… पीयूष… पापा नहीं रहेंगे तो क्या… बुआ हैं न? जीवन बहुत सुंदर है बच्चों, जीना सीखो… चलते रहो…”

और हम सब को काष्ठ प्रतिमा में तब्दील कर, हमारी संज्ञा ही मानो अपने पाथेय के रूप में लेकर तुम अनन्त में विलीन हो गए. खंडित हो गया राम-लखन का जोड़ा…

मानो पंडित कर्मकाण्डी कह रहे हैं, तेरहवीं के बाद इस सुंदर संसार से तुम्हारा अस्तित्व समाप्त हो जाएगा, पर मैं ऐसा नहीं मानती. जानती हूं, अपनों के असमय प्रयाण से मिली पीड़ा असह्य ही नहीं, असाध्य भी होती है. भोगे विगत को, यदि वो मधुर रहा हो, विस्मृत करना सरल-सहज नहीं है. जीवनभर पीड़ा की पगडंडी पर गतिमान रहूंगी… फिर भी मेरे अंतर्मन में तुम सदा जीवन्त रहोगे मेरे भाई.

ईश्‍वर से प्रार्थना करती हूं, संसार में सभी भाई-बहन के पावन रिश्ते को समझ सकें. जब कभी अपनी ‘दी’ के प्रति किसी ‘मानो’ की अटूट स्नेहपगी श्रद्धा निरखूंगी, स्वयं से ही प्रश्‍न करूंगी, ‘राम-लखन का…?’ और मेरे अंतस् के एक निर्मल कोने में स्थापित तुम्हारी स्मृति निस्सन्देह जीवन्त हो बोल पड़ेगी, “जो ऽऽऽ ड़ा ऽऽऽ!!!”

पर मैं नहीं रोऊंगी. सच, तुम्हारी सौगन्ध, कभी नहीं रोऊंगी.

Dr. Nirupama Rai

   डॉ. निरुपमा राय

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कहानी- उसकी राह (Short Story- Uski Rah)

“क्या यह वरदान मेरे लिए अभिशाप नहीं बन जाएगा? क्या यह सहारा मेरे लिए बोझ नहीं साबित होगा? इसके साथ क्या मैं सदा के लिए अपूर्ण नहीं रह जाऊंगी? अपने करियर के लिए अपूर्व ने मेरे बच्चे को अजन्मा होने का अभिशाप दिया था. बताइए क्या दोष था उसका? बस इतना कि वह एक महत्वाकांक्षी बाप की औलाद था?” कंगना ने अपनी आंखों से ढलक आये आंसुओं को पोंछा, फिर लक्ष्मीदेवी की आंखों में झांकती हुई बोली, “अपूर्व का क्या होगा, यह अब कोई रहस्य नहीं रह गया है, लेकिन उसके बाद मेरा क्या होगा? यह आपने तो नहीं सोचा, पर क्या मुझे भी अपने करियर के बारे में नहीं सोचना चाहिए? डूबना अवश्यंभावी है, यह जानकर क्या मुझे आंख मूंद कर अपनी कश्ती को लहरों के सहारे छोड़ देना चाहिए?”

Short Story Uski Rah

आईटी कानपुर से बी.टेक., केलीफोर्निया यूनिवर्सिटी से एम. टेक, लंदन स्कूल ऑफ़ इकेनॉमिक्स से एमबीए, तीन साल में 3 कंपनियों का सफ़र, चौथे साल एक मल्टीनेशनल कंपनी के डिप्टी सीईओ के पद का दावेदार…. लक्ष्मीदेवी के 29 वर्षीय इकलौते बेटे अपूर्व की ऊंची उड़ान के आगे सफलता की सीढ़ियां भी छोटी पड़ती जा रही थीं. ऐसा हो भी क्यूं न, सोते-जागते, उठते-बैठते-बस काम ही काम. काम के अलावा अपूर्व को और कुछ सूझता ही नहीं था.

कई धन-कुबेर अपनी कन्याओं के लिए लक्ष्मीदेवी के घर लाइन लगाए रहते, पर अपूर्व कोई लड़की देखने को राज़ी ही नहीं होता. एक दिन उन्होंने उसके सामने कई फ़ोटो रखते हुए कहा, “मैंने ये लड़कियां पसंद की हैं, बता इनमें से सबसे अच्छी कौन है?”

अपूर्व ने तस्वीरों पर एक उचटती हुई दृष्टि डाली, फिर बोला, “ये सभी अच्छी हैं, पर मैं इनमें से किसी से शादी कर उसकी ज़िंदगी बर्बाद नहीं कर सकता.”

“क्या मतलब?”

“मां, मेरा प्यार कहीं और है. अगर मैं इनमें से किसी से शादी करूंगा तो बेचारी की ज़िंदगी बर्बाद हो जाएगी या नहीं?” अपूर्व मुस्कुराया.

“तो बता, तू किससे प्यार करता है, मैं उसी से तेरी शादी कर देती हूं.” लक्ष्मीदेवी हुलस उठीं.

“मेरा पहला प्यार मेरा करियर है. मुझे जल्द-से-जल्द कंपनी का सीईओ बनना है. हां, जिस दिन कोई ऐसी लड़की मिलेगी, जिसे देख दिल कहे कि यह करियर से भी ज़्यादा क़ीमती है, उस दिन फ़ौरन शादी कर लूंगा.” अपूर्व हल्का-सा मुस्कुराया, फिर ऑफ़िस चला गया. लक्ष्मीदेवी काफ़ी देर तक बड़बड़ाती रहीं.

अपूर्व ऑफ़िस पहुंचा ही था कि ब्लू-स्काई एडवर्टाइज़िंग कंपनी के एम.डी. रमन मेहता आ गए.

“मि. मेहता, हमारा काम हुआ कि नहीं.” अपूर्व ने उन्हें बैठने का इशारा करते हुए पूछा.

“सर, आप जैसे इंपोेर्टेन्ट क्लाईंट का काम न होने का प्रश्‍न ही नहीं उठता.” रमन मेहता धीरे से मुस्कुराए, फिर अपने ब्रीफकेस से दो एलबम निकाल अपूर्व की ओर बढ़ाते हुए बोले, “ख़ास आपके लिए दो नयी और बेइंतहा ख़ूबसूरत मॉडल्स का पोर्टफोलियो लाया हूं.”

अपूर्व ने एक एलबम को लेकर पन्ने पलटने शुरू किए.

“ये मिस रेणुका रमानी हैं, मिस इंडिया यूनिवर्स के फ़ाइनल राउंड तक पहुंच चुकी हैं. आख़िरी राउंड में तबियत ख़राब हो जाने के कारण पिछड़ गई थीं, वरना इस बार की मिस इंडिया यही होतीं.”

अपूर्व ने बिना कोई प्रतिक्रिया व्यक्त किए एलबम के पन्ने पलटे, फिर दूसरा एलबम उठा लिया.

“ये हैं मिस नेहा गोविरकर, इस बार अमेरिका में बेस्ट एशियन ब्यूटी का पुरस्कार इन्हें ही मिला है. आपकी ख़ातिर बहुत मुश्किल से ये इंडिया में अपना पहला असाइनमेंट करने के लिए तैयार हुईं.” रमन मेहता ने प्रशंसात्मक स्वर में बताया.

अपूर्व ने इस एलबम के भी पन्ने पलटे, फिर उसे भी मेज़ पर रखते हुए बोला, “हमारी कंपनी एक्सक्लूसिव प्रोडक्ट लॉन्च करने जा रही है, इसके लिए हमें मॉडल चाहिए, बिल्कुल अनछुआ सौंदर्य. ओस की बूंद जैसा पवित्र चेहरा. ऐसी ख़ूबसूरती, जिसमें उन्मुक्त पवन जैसी चंचलता और अनंत आकाश जैसी असीम शांति एक साथ हो.”

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“ऐसा एक चेहरा है मेरे पास.” रमन मेहता ने ब्रीफकेस से एक और एलबम निकाला, “ये हैं मिस कंगना राय, बीएससी फ़ाइनल ईयर की स्टूडेंट. पिछले महीने अपने कॉलेज की नृत्य प्रतियोगिता में पुरस्कार जीता तो उत्साहित हो मेरे स्टूडियो में फ़ोटो खिंचवाने चली आई थीं.”

“मि. मेहता, आप मेरा समय बर्बाद कर रहे हैं. मैंने इस मॉडलिंग असाइनमेंट के लिए आपको मुंहमांगी क़ीमत देने का वादा किया है और आप किसी को भी लाकर मेरे मत्थे मढ़ देना चाहते हैं.” अपूर्व का स्वर तल्ख़ हो गया.

“सर, अनछुआ सौंदर्य बाज़ार में नहीं मिलता. ऐसा सौंदर्य तो बस सीप में बंद मोती के पास ही हो सकता है. अगर किसी पारखी की नज़र पड़ जाए तो उसे अनमोल रत्न बनते देर नहीं लगती.” रमन मेहता भरपूर आत्मविश्‍वास के साथ मुस्कुराए, फिर अपने शब्दों को वज़न देते हुए बोले, “आप एक बार इस एलबम के पन्ने तो पलट कर देखिए, आपकी आंखें चौंधिया न जाएं तो मेरा नाम बदल दीजिएगा.”

अपूर्व ने बहुत बेदिली से एलबम का पहला पन्ना खोला, लेकिन पहली ही तस्वीर सीधे दिल में उतरती चली गयी. ख़ूबसूरत चेहरे से झांक रही झील-सी गहरी आंखें किसी को भी अपने मोहपाश में बांध लेने में सक्षम थीं.

“मैं आज ही इनसे मिलना चाहूंगा.” अपूर्व ने एलबम रखते हुए फैसला सुनाया.

उसी दिन शाम रमन मेहता ने अपूर्व की कंगना राय से मुलाक़ात करवा दी. अपूर्व ने उसे देखा तो देखता ही रह गया. थोड़ी देर की औपचारिक बातचीत के पश्‍चात अपूर्व ने कहा, “मि. मेहता, अगर आप बुरा न मानें तो मैं मिस कंगना से अकेले में कुछ  बात करना चाहता हूं.”

“श्योर सर.” रमन मेहता के चेहरे पर एक व्यवसायिक मुस्कान उभरी और कंगना राय को बोलने का कोई मौक़ा दिए बिना वे वहां से हट गए.

कंगना के चेहरे पर परेशानी के चिह्न उभर आए, जिन्हें पढ़ते हुए अपूर्व ने धीमे स्वर में कहा, “आप अपना मॉडलिंग असाइनमेंट तो पक्का ही समझिए, लेकिन उससे पहले मैं एक शर्त रखना चाहता हूं.”

“आप मुझे काम दें या न दें, पर मैं आपकी कोई शर्त नहीं मानूंगी.” कंगना का  चेहरा अपमान से लाल हो उठा और वह झटके से उठ खड़ी हुई.

“देखिए, शर्त सुने बिना इनकार करना अक्लमंदी न होगी.” अपूर्व ने हड़बड़ाकर वहां से जा रही कंगना की कलाई थाम ली.

“छोड़िए मेरा हाथ, आप ग़लत समझ रहे हैं. मैं वैसी लड़की नहीं हूं.” हाथ छुड़ाते-छुड़ाते कंगना की आंखों से आंसू टपक पड़े.

“आप भी मुझे ग़लत समझ रही हैं. मैं भी वैसा लड़का नहीं हूं, मैं तो आपसे शादी करना चाहता हूं.” कंगना के आंसू देख अपूर्व हड़बड़ा उठा.

“क्या?” कंगना की आंखें आश्‍चर्य से फैल गईं.

“हां मिस कंगना, क्षणभर पहले मेरे मन में हल्की-सी आशंका थी, पर अब मुझे विश्‍वास हो गया है कि मेरा ़फैसला सही है.” अपूर्व क्षणभर के लिए रुका, फिर कंगना की आंखों में देखते हुए बोला, “मेरी शर्त स़िर्फ इतनी है कि या तो आप हमारी कंपनी के लिए मॉडलिंग के प्रस्ताव को स्वीकार कर लें या मेरी शादी के प्रस्ताव को, क्योंकि मॉडलिंग के बाद शादी और शादी के बाद मॉडलिंग मुझे स्वीकार न होगी.”

“मुझे थोड़ा व़क़्त चाहिए.” कंगना ने सहज होने की कोशिश की.

किंतु फैसला लेना आसान न था. एक तरफ़ कैरियर के आरंभ में ही इतना बड़ा ब्रेक था- ग्लैमर, शोहरत, पैसा और तड़क-भड़क भरी ज़िंदगी थी, तो दूसरी तरफ़ अपूर्व जैसा पति था, जिसके पास वह सब कुछ था जिसकी कामना हर लड़की करती है. कंगना की पूरी रात उहापोह में बीती.

अगले दिन जब उसने फैसला सुनाया तो अपूर्व ख़ुशी से उछल पड़ा. लक्ष्मीदेवी ने भी देरी नहीं की. चट मंगनी-पट ब्याह हो गया और अगले ही सप्ताह अपूर्व और कंगना हनीमून पर निकल गए. स्विटज़रलैंड, पेरिस, रोम, सिंगापुर और हांगकांग होते हुए जब वे एक माह बाद लौटे तो बहुत ख़ुश थे.

इस बीच अपूर्व का काम काफ़ी पिछड़ गया था, अतः वापस आते ही वह बुरी तरह व्यस्त हो गया. कंगना बहुत समझदार थी. पति की व्यस्तताओं और मजबूरियों को समझती थी. शिकायतें करने के बजाय वह अपूर्व के काम में हाथ बंटाने लगी.

“बहू, तुम एक अच्छी पत्नी के साथ-साथ एक अच्छी सेक्रेट्री भी बन गई हो. अब जल्दी से अच्छी मां बन कर भी दिखा दो.” एक दिन लक्ष्मीदेवी ने कंगना के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा.

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“यह ख़ुशी भी आपको जल्दी ही मिल जाएगी.” कंगना के चेहरे पर रक्तिम आभा उभर आयी.

यह सुन लक्ष्मीदेवी का चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा और उन्होंने कंगना के चेहरे को अपने हाथों में थामते हुए उलाहना दिया,  “तुमने इतनी बड़ी ख़ुशी मुझसे अब तक छुपा कर क्यूं रखी?”

“मांजी, मुझे भी आज ही इस बात का एहसास हुआ है. अभी तो इनको भी कुछ मालूम नहीं है.” कंगना की पलकें लाज से बोझिल हो उठीं.

“मैं अभी उसे ख़बर करती हूं.” लक्ष्मीदेवी ने मोबाइल उठाया.

“मांजी, प्लीज़ उन्हें सबसे पहले यह ख़बर मुझे देने दीजिए. मैं देखना चाहती हूं कि उनकी आंखों में कैसी ख़ुशी उभरती है.” उस शाम कंगना ने पूरे घर को नये सिरे से सजाया. अपूर्व काफ़ी देर से लौटा था. खाने के बाद दोनों जल्दी ही अपने कमरे में चले गए. थोड़ी देर बाद उनके कमरे से तेज़ बहस की आवाज़ें आने लगीं. फिर अपूर्व का स्वर तो शांत हो गया, पर कंगना की सिसकियां काफ़ी देर  तक सन्नाटे को भंग करती रहीं.

सुबह दोनों काफ़ी देरी से कमरे से बाहर निकले. अपूर्व के चेहरे पर शांति थी, किंतु कंगना के चेहरे पर वीरानी छायी हुई थी.

“तुम लोग कहां जा रहे हो?” उन्हें तैयार देख लक्ष्मीदेवी ने पूछा.

“डॉक्टर के पास.” अपूर्व ने सपाट स्वर में बताया.

अचानक जैसे छठीं इंद्रिय जागृत हो गयी. लक्ष्मीदेवी की अनुभवी आंखों ने पलभर में कंगना के दिल का हाल पढ़ लिया था, किंतु संशय मिटाने के लिए पूछा, “क्यों?”

“जी…. वो… वो…” अपूर्व चाहकर भी अभिव्यक्ति के लिए शब्द नहीं जुटा पाया, किंतु कंगना के आंखों से टपके आंसुओं ने प्रश्‍न का उत्तर दे दिया था.

“देखिए, शादी तो मैंने कर ली, पर अभी बच्चे-वच्चे के झंझट में फंसने का समय मेेरे पास नहीं है.” अपूर्व ने समस्या सामने रखी.

“इसमें तू परेशान क्यूं होता है? बच्चा तुझे नहीं कंगना को पालना है.” समस्या का मूल जान लक्ष्मीदेवी हंस पड़ीं.

“ये क्या पिछड़े ज़माने की बातें कर रही हैं.” अपूर्व पहले तो झल्लाया, फिर समझाते हुए बोला, “अभी तो मेरे कैरियर की शुरुआत है, बहुत लंबा सफ़र तय करना है मुझे. इसके लिए आए दिन पार्टियां देनी होंगी, लोगों से मिलना-जुलना होगा. कॉन्टेक्ट बढ़ाने होंगे. हाई सोसायटी की पार्टियों में लोग पत्नियों के साथ आते हैं. अब मेरे साथ यह नैपकीन में बच्चा लेकर चलेगी तो कैसा लगेगा?”

“तो इतनी-सी बात के लिए तू अपने बच्चे की हत्या कर देगा?” लक्ष्मीदेवी का मुंह खुला रह गया.

अपूर्व ने उनकी बात का कोई उत्तर नहीं दिया, किंतु कंगना की ओर मुड़ते हुए बोला, “मां पुराने ज़माने की हैं, हमारी बात नहीं समझ सकेंगी, लेकिन तुम मेरी शर्त सुन लो. अगर मेरे साथ ज़िंदगी गुज़ारनी है तो मैं गाड़ी निकाल रहा हूं, चुपचाप आकर बैठ जाओ वरना….”

अपना वाक्य अधूरा छोड़ अपूर्व तेज़ी से बाहर चला गया. यह अधूरा वाक्य ज़िंदगी में अधूरापन भर सकता था, अतः न चाहते हुए भी कंगना को पति की अनुगामिनी बनना पड़ा.

ज़िंदगी मिटाकर भी ज़िंदगी चलती रहती है. चंद दिनों बाद कंगना एक बार फिर पति के क़दमों से क़दम मिलाकर चलने लगी, किंतु कहीं कुछ ऐसा था जो दरक गया था. उसके चेहरे को देखकर ऐसा लगता था जैसे किसी पुष्प से उसकी सुगंध छीन ली गयी हो.

समय बीतता रहा, अपूर्व की मेहनत रंग लायी और शादी की दूसरी वर्षगांठ पर कंपनी ने उसे सीईओ  के पद का तोहफ़ा दिया. इस ख़ुशी में उसने बहुत बड़ी पार्टी दी. अपूर्व और कंगना रातभर झूमते-गाते रहे. उनके सारे सपने सच हो गए थे.

अगले दिन ऑफ़िस में अपूर्व के पेट में भयंकर दर्द उठा. पहले भी दो-तीन बार ऐसा हो चुका था, किंतु व्यस्तताओं के चलते अपूर्व ने उसे नज़रअंदाज़ कर दिया था, लेकिन इस बार दर्द असहनीय था. सहकर्मियों ने उसे हॉस्पिटल में भर्ती कर दिया.

जांच के बाद जब रिपोर्ट सामने आयी तो सबके पैरों तले ज़मीन खिसक गयी. अपूर्व की आंत में कैंसर था, वह भी अंतिम चरण में. कंगना ने सुना तो जड़ हो गयी.

अपूर्व को एक नामी कैंसर इंस्टिट्यूट में भर्ती करा दिया गया. कंगना ने देश के बड़े-बड़े डॉक्टरों को बुलाया. अपूर्व की सेवा में दिन-रात एक कर दिया, पर उसकी स्थिति में सुधार नहीं हो रहा था. डॉक्टरों की सलाह पर अपूर्व का अमेरिका में ऑपरेशन करवाने का निश्‍चय किया गया. चार दिन बाद की हवाई जहाज की टिकटें भी मिल गईं.

अगले दिन कंगना कुछ ज़रूरी काग़ज़ात    लेने घर गयी. अचानक उसे उल्टी होने लगी. लक्ष्मीदेवी की अनुभवी आंखों ने कारण समझ लिया. कंगना को बिस्तर पर लिटाते हुये उन्होंने सांस भरी, “लगता है, ऊपर वाले ने हमारी सुन ली है.”

“कुछ नहीं सुनी है ऊपर वाले ने. अगर उसे सुनना ही होता तो… तो….” कंगना के शब्द हिचकियों में बदल गए.

“रो मत बेटा.” लक्ष्मीदेवी ने कंगना के सिर पर हाथ फेरा, फिर मोबाइल उसकी ओर बढ़ाते हुए बोलीं, “अब तो तुम्हें जीने का सहारा मिल गया है, चलो यह ख़ुश-ख़बरी अपूर्व को सुना दो.”

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“नहीं मांजी, अपूर्व को यह ख़बर न तो मैं दूंगी और न ही आप.” कंगना का स्वर कड़ा हो गया और वह झटके से उठ खड़ी हुई.

“क्यों?”

“क्योंकि यह बच्चा दुनिया में नहीं आएगा और इसके वजूद की ख़बर देकर मैं अपूर्व के कष्ट को और नहीं बढ़ाना चाहती.” कंगना ने दो टूक फैसला सुनाया.

“यह क्या पागलपन है. जो ग़लती अपूर्व ने की थी, वही ग़लती तू करने जा रही है?” लक्ष्मीदेवी तड़प उठीं.

“मांजी, ग़लती न तो अपूर्व ने की थी और न मैं कर रही हूं. मैं बहुत सोच-समझकर फैसला कर रही हूं.” कंगना ने एक-एक शब्द पर ज़ोर देते हुए कहा.

लक्ष्मीदेवी ने कंगना को अविश्‍वसनीय नज़रों से देखा, फिर बोलीं, “बेटा, बच्चा तो स्त्री को प्रकृति का दिया सबसे बड़ा वरदान है, उसके जीने का सहारा है. बच्चे के बिना स्त्री सदैव अपूर्ण होती है और तू….”

कंगना ने लक्ष्मीदेवी की बात बीच में ही काट दी, “क्या यह वरदान मेरे लिए अभिशाप नहीं बन जाएगा? क्या यह सहारा मेरे लिए बोझ नहीं साबित होगा? इसके साथ क्या मैं सदा के लिए अपूर्ण नहीं रह जाऊंगी? अपने करियर के लिए अपूर्व ने मेरे बच्चे को अजन्मा होने का अभिशाप दिया था. बताइए क्या दोष था उसका? बस इतना कि वह एक महत्वाकांक्षी बाप की औलाद था?” कंगना ने अपनी आंखों से ढलक आये आंसुओं को पोंछा, फिर लक्ष्मीदेवी की आंखों में झांकती हुई बोली, “अपूर्व का क्या होगा, यह अब कोई रहस्य नहीं रह गया है, लेकिन उसके बाद मेरा क्या होगा? यह आपने तो नहीं सोचा, पर क्या मुझे भी अपने करियर के बारे में नहीं सोचना चाहिए? डूबना अवश्यंभावी है, यह जानकर क्या मुझे आंख मूंद कर अपनी कश्ती को लहरों के सहारे छोड़ देना चाहिए?”

कंगना के मुंह से निकला प्रत्येक वाक्य लक्ष्मीदेवी का जीवन के यथार्थ से कटु साक्षात्कार करवा रहा था, फिर भी उन्होंने तिनके का सहारा लेने की कोशिश की, “बेटा, बच्चे के सहारे तेरा जीवन कट जाएगा और जाते-जाते अपूर्व को भी थोड़ी-सी ख़ुशी मिल जाएगी.”

“जीवन कट जाएगा? लेकिन कैसे कटेगा यह आप भी जानती हैं और मैं भी.” कंगना के चेहरे पर दर्द की रेखाएं तैर आईं और वह लक्ष्मीदेवी का हाथ थामते हुए बोली, “यक़ीन मानिए मांजी, अगर इस बात की ज़रा-सी भी संभावना होती कि अपूर्व नौ माह बाद बच्चे का मुंह देखने के लिए मौजूद रहेंगे तो मैं यह धर्म अवश्य निभाती.”

“तूने उसके साथ सात फेरे लिए हैं. पति के वंश को आगे बढ़ाना भी पत्नी का धर्म होता है.” लक्ष्मीदेवी ने अंतिम शस्त्र चलाया.

“मैं पत्नी के धर्म को निभाऊंगी, दिन-रात उनकी सेवा करूंगी. जितने भी पल उनके पास बचे हैं, उन्हें अधिक-से-अधिक सुख देने की कोशिश करूंगी.” कंगना ने सांत्वना दी.

“पर…”

“अब कोई ‘पर’ नहीं मांजी. हमेशा आपके बेटे ने शर्त सामने रखी है. आज आपकी बहू शर्त रखती है.” कंगना ने अपने अंदर उमड़ रहे आंसुओं को नियंत्रित किया और एक-एक शब्द पर ज़ोर देते हुए बोली, “मैं अस्पताल जा रही हूं, आप चाहें तो साथ चल कर मुझे इस लायक बना सकती हैं कि मैं अंतिम समय तक आपके बेटे की सेवा कर सकूं. लेकिन यदि आप चाहें तो मुझे रोक कर इस लायक भी बना सकती हैं कि मैं अपने बढ़े हुए पेट को लेकर ख़ुद अपनी सेवा करवाऊं और मेरा पति अंतिम समय में जीवनसाथी के साथ को तरसता रहे.”

इतना कहकर कंगना सधे क़दमों से दरवाज़े की ओर चल दी. लक्ष्मीदेवी के अंदर इतना साहस शेष नहीं बचा था कि उठकर दरवाज़े को बंद कर सकें. वह फटी आंखों से उसे बाहर जाते देखती रहीं. वह तय नहीं कर पा रही थीं कि उसकी राह सही है या ग़लत….?

Sanjeev Jaiswal

संजीव जायसवाल ‘संजय’  

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कहानी- माफ़ करना शिखा! (Short Story- Maaf Karna Shikha!)

‘तुम नहीं जानती शिखा, तुम्हें खोने के एहसास ने मुझे किस क़दर झकझोर कर रख दिया था. अगर तुम्हें कुछ हो जाता, तो शायद मैं ख़ुद को कभी माफ़ न कर पाता. माफी के क़ाबिल तो मैं अब भी नहीं हूं, लेकिन तुम साथ हो, तो कम से कम अपने पापों का पश्‍चाताप तो कर सकूंगा.’

Short Story- Maaf Karna Shikha

शिखा जब से हॉस्पिटल से लौटी है, उसे घर में सब कुछ बदला-बदला सा नज़र आ रहा था. उसने एक नज़र पूरे घर पर दौड़ाई और फिर पास खड़े शिखर की तरफ़ देखा. शिखर ने प्यार से उसका माथा चूमा और उसे बांहों में भरते हुए कहा, ”शिखा, अब तुम्हें घर का नहीं, अपनी सेहत का ख़्याल रखना है. घर की चिंता तुम मुझ पर छोड़ दो, मैं सब संभाल लूंगा.” फिर शिखर उसे सहारा देते हुए बेडरूम में आराम करने के लिए ले गए.
शिखा ने सोचा था, जब वो घर पहुंचेगी, तो पूरा घर अस्त-व्यस्त पड़ा होगा. इस हालत में कैसे समेटेगी वो पूरे घर को, लेकिन यहां तो नज़ारा ही कुछ और था. इस परिवर्तन की वजह उसे समझ नहीं नहीं आ रही थी. उसकी हैरानी तब और बढ़ गई, जब उसने अपने बेड पर सुर्ख़ लाल गुलाब का गुलदस्ता और एक पत्र देखा. उसने फिर शिखर की तरफ देखा, शिखर जानते थे कि शिखा को लाल गुलाब बहुत पसंद हैं. इस बार शिखर ने कहा तो कुछ नहीं कहा, लेकिन उनकी आंखें नम हो आईं. वो कुछ कहती इससे पहले शिखर ने उसके होंठों पर अपना हाथ रख दिया और उसे बेड पर लिटाकर किचन की तरफ़ चले गए.
शिखर का ये बदला हुआ रूप उसे अजीब ज़रूर लग रहा था, लेकिन इस बात की ख़ुशी भी थी कि एक्सीडेंट के बहाने ही सही शिखर ने उसका ख़्याल तो रखा, वरना शिखर की बेरुख़ी उसे अंदर ही अंदर खोखला किए जा रही थी.
बेड पर लेटी शिखा देर तक पास रखे गुलदस्ते को निहारती रही जैसे उन सुर्ख़ गुलाबों से कुछ कहना चाहती हो. फिर उसे याद आया, ये पत्र भी तो उसी के लिए है. पत्र में शिखर की चिर-परिचित हैंड राइटिंग देख एक पल को उसे लगा जैसे गुज़रा ज़माना लौट आया है. शादी से पहले हर ख़ास मौ़के पर शिखर उसे पत्र लिखा करते थे. जो बात ज़ुबान से न कह पाते, उसे पत्र के माध्यम से उस तक पहुंचा देते. शिखर का पत्र लिखना शिखा को बहुत पसंद था. शिखर के लिखे सारे पत्र उसने आज तक सहेजकर रखे हैं.
इस बार क्या लिखा है शिखर ने, इसी उत्साह के साथ शिखा पत्र पढ़ने लगी.

प्यारी शिखा,
आज फिर मन में कई ऐसी बातें हैं, जिन्हें मैं तुमसे कहना चाहता हूं, लेकिन कह नहीं पा रहा इसलिए हमेशा की तरह पत्र का सहारा ले रहा हूं. मैं तुमसे माफ़ी मांगना चाहता हूं शिखा, लेकिन जानता हूं, मेरा गुनाह माफ़ करने लायक नहीं है. आज तुम्हारी इस हालत के लिए स़िर्फ और स़िर्फ मैं ज़िम्मेदार हूं. वो कार एक्सीडेंट तुम्हारी लापरवाही का नहीं, मेरी बेरुख़ी का नतीजा है. न मैं तुमसे सुबह-सुबह लड़ता और न तुम रोकर घर से निकलती. तुम नहीं जानती शिखा, तुम्हें खोने के एहसास ने मुझे किस क़दर झकझोर कर रख दिया था. अगर तुम्हें कुछ हो जाता, तो शायद मैं ख़ुद को कभी माफ़ न कर पाता. माफी के क़ाबिल तो मैं अब भी नहीं हूं, लेकिन तुम साथ हो, तो कम से कम अपने पापों का पश्‍चाताप तो कर सकूंगा.
मैं जानता हूं, मेरे साथ अपने रिश्ते और इस घर को बनाए, बसाए रखने के लिए तुमने क्या कुछ नहीं किया है. तुम मेरी तमाम ज़्यादतियों इस आस में बर्दाश्त करती रही कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा, लेकिन मैंने ऐसा कभी नहीं होने दिया. तुम मुझे समझाती रही और मैं तुम्हारी बातों को हवा में उड़ाता रहा.
जिस दिन से तुमसे मेरा रिश्ता तय हुआ, उसी दिन से तुमने मेरी ज़िम्मेदारियों का बोझ उठा लिया था और ये सिलसिला आज भी जारी है. मैं इस शहर में अकेला रहता था, इसलिए मुझसे रिश्ता जुड़ते ही तुम मेरा परिवार बन गई. तुम नौकरी कर रही थी और मैं नौकरी के साथ-साथ एमबीए भी कर रहा था. ऐसे में जब भी हम घर से बाहर मिलते, तो होटल का बिल, फिल्म का टिकट, यहां तक कि मेरी शॉपिंग का बिल भी तुम ही चुकाती. मैं मना करता, तो तुम कहती, ”मैं क्या आपसे अलग हूं? अभी आप पर घर का किराया, खाने-पीने की व्यवस्था, कॉलेज की फीस… बहुत सारी ज़िम्मेदारियां हैं, इसलिए मुझे ख़र्च करने दो.” फिर तुम अपनी प्यारी-सी मुस्कान बिखेरते हुए अपने मज़ाकिया अंदाज़ में कहती, ”जब आपका करियर सैटल हो जाएगा, तब मैं आपसे बड़ी-बड़ी फरमाइशें करूंगी. तब ना कैसे करोगे जनाब?”

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तुम्हारा ये अपनापन मुझे भीतर तक भिगो देता और मैं तुम्हें अपनी बांहों में भर लेता.
सच, कितने हसीन सपने बुने थे तुमने हमारे भविष्य के लिए. मेरे प्रति तुम्हारा समर्पण पहले दिन से शत-प्रतिशत था, मैं ही तुम्हारी बराबरी नहीं कर सका. ऐसा नहीं था कि मैं तुम्हारे प्यार और त्याग को नहीं समझता था, बल्कि मैं तो तुम्हारी झोली ख़ुशियों से भर देना चाहता था, दुनिया की हर ख़ुशी तुम्हारे क़दमों में लाकर रख देना चाहता था, लेकिन मैं उतना काबिल कभी न बन सका जैसा तुम चाहती थी, शायद इसके लिए मैंने कोशिश भी नहीं की. दरअसल, तुम मुझे ऐसे कंफर्ट ज़ोन में ले आई थी, जहां मैं ख़ुद को बेहद सुरक्षित महसूस कर रहा था. तुमने मुझे कभी किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं होने दी, इसलिए मैं आरामपरस्त हो गया. स़िर्फ अपने सुख, अपने ऐशो-आराम तक सीमित रह गया.
तुम हर जगह मुझे पैसों की मदद करती रही, ताकि मैं कभी अभाव महसूस न करूं और पूरा ध्यान अपने करियर व पढ़ाई पर लगा सकूं. शादी के बाद भी तुम मेरी पढ़ाई का ख़र्च उठाती रही, ताकि मुझे प्रमोशन मिले और हमारी गृहस्थी अच्छी तरह चल सके, लेकिन मुझे अब तुम्हारे पैसों की आदत पड़ गई थी. मेरे मुंह में जैसे खून लग गया था. अब मुझे हर समस्या का समाधान तुममे नज़र आने लगा था. जाने-अनजाने मैंने ख़ुद को लालची और आलसी बना दिया था. मेरी ख़ुशी के लिए तुम घर-बाहर की तमाम ज़िम्मेदारियां ख़ुशी-ख़ुशी उठाती रही.
हां, प्रत्युषा के जन्म के बाद तुमने पहली बार कहा था, ”शिखर, अब मैं नौकरी नहीं करना चाहती, अपनी बेटी के साथ रहना चाहती हूं, उसकी अच्छी परवरिश करना चाहती हूं.”
उस दिन पहली बार मेरा लालची मन बेचैन हुआ था. अंदर तक कांप गया था मैं तुम्हारी बातें सुनकर, लेकिन मैंने तुम पर कुछ भी जाहिर नहीं होने दिया. उस समय तो मैंने तुम्हारी हां में हां मिला दी, लेकिन अगले पल से ही मेरा लालची मन इस जुगाड़ में जुट गया कि कैसे तुम्हें फिर से नौकरी पर भेजा जाए, ताकि मैं घर की जिम्मेदारियों से मुक्त हो सकूं.
तुम कोई फैसला लेती, इससे पहले ही मैंने मां को कानपुर फोन किया और उनसे अनुरोध किया कि कुछ समय के लिए मेरी गृहस्थी संभालने आ जाएं. छोटी बहन की बीएससी फाइनल ईयर की परीक्षा होनेवाली थी, इसलिए मां ने आने में असमर्थता जताई, तो मैं फोन पर ही रो पड़ा. मैंने मां से कहा, ”मां, शिखा जॉब छोड़ना चाहती है. तुम तो जानती हो, मेरे सिर पर बैंक का कितना लोन है, मेरी पास सरकारी नौकरी भी नहीं है, जिसके भरोसे मैं निश्‍चिंत हो सकूं. प्राइवेट नौकरी का क्या है? एक ग़लती हुई नहीं कि नौकरी हाथ से जा सकती है. यदि शिखा ने नौकरी छोड़ दी, तो मुझ पर बहुत प्रेशर आ जाएगा. मुंबई जैसे शहर में एक आदमी की कमाई से घर कहां चलता है?”
मेरी स्थिति पर मां पसीज गईं और छोटी बहन को मंझधार में छोड़ कुछ समय के लिए मेरी गृहस्थी संभालने मेरे पास आ गईं. मैंने मां को समझा दिया कि वो शिखा को न बताएं कि मैंने उन्हें यहां बुलाया है. साथ ही शिखा से ये कहने को भी कहा कि वो नौकरी न छोड़े, मां प्रत्युषा की देखभाल कर लेंगी.
लेकिन तुम मेरा षडयंत्र शायद भांप गई थी. तुमने मुझसे कुछ कहा नहीं, लेकिन तुम्हारा मौन चीख-चीखकर अपना दर्द बयां कर रहा था. अंतरंग पलों में भी तुम मेरे पास, मेरी बांहों में तो होती, लेकिन मात्र एक शरीर के रूप में. मेरी शिखा ने शायद उसी दिन दम तोड़ दिया था, जिस दिन मैंने उसे उसकी बच्ची से अलग किया और उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ उस पर अपनी ज़िम्मेदारियों का बोझ डाला. जिस शिखर को तुमने ऊंचाइयों के शिखर पर देखना चाहा, वो तुम्हारी कमाई और तुम्हारे शरीर का भोगी बनकर रह गया था शिखा. उसने तुम में अपना कंफर्ट ज़ोन ढूंढ़ लिया था. मेरे संघर्ष के दिनों में तुम मेरा सहारा क्या बनी, मैं तुम पर आश्रित होकर जैसे निश्‍चिंत हो गया. जैसे मैंने तय कर लिया कि आगे का जीवन तुम्हारे भरोसे ही काटना है. घर-परिवार, बैंक, पैसा, पड़ोसी, नाते-रिश्तेदार… एक-एक कर मैं सारी ज़िम्मेदारियां तुम पर थोपता चला गया.
प्रत्युषा के स्कूल में पैरेंट्स-टीचर मीटिंग होती, तो मैं जान-बूझकर ऑफिस की मीटिंग का बहाना बनाकर घर से जल्दी निकल जाता. घर में मां या करीबी रिश्तेदार कुछ दिन रहने आते, तो मैं जान-बूझकर ऑफिस से लेट आता, ताकि तुम सब संभाल लो, मुझ तक कोई बात न आए. मैं इस क़दर स्वार्थी हो गया था कि बेटी के बीमार होने पर भी छुट्टी लेने से साफ़ मना कर देता था. तुम्हें अकेले खटते देखकर भी मेरा कठोर मन कभी न पसीजता.
तुम हर साल कहती, ”इस बार गर्मी में लंबी छुट्टी लूंगी, हम कहीं घूमने चलेंगे. ऐसा न कर सके, तो मैं घर पर प्रत्युषा के साथ रहूंगी. शाम को जब आप घर आओगे, तो साथ बैठकर चाय पीएंगे और ख़ूब सारी बातें करेंगे, जैसे शादी से पहले किया करते थे…” तुम कितने अरमान से अपनी भावनाएं व्यक्त करती थी, लेकिन मेरा लालची मन तुरंत केलक्युलेट करने लग जाता कि तुम्हारी छुट्टियों से मेरा कितना नुक़सान हो जाएगा.

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मुझे माफ़ करना शिखा, तुम मुझे हमेशा सपोर्ट करती रही, लेकिन मैं उसका इतना आदी हो गया कि तुम्हारी भावनाओं को समझना ही भूल गया. मुझे स़िर्फ अपना सुख, अपना आराम, अपनी सुरक्षा से मतलब था, तुम और प्रत्युषा भी मेरी ही ज़िम्मेदारी हो, इस बात को मैं जानकर भी नज़रअंदाज़ करता रहा.
लेकिन अब नहीं, तुम्हें खोने के एहसास ने मुझे तुम्हारी अहमियत समझा दी है. तुम्हारे बिना मैं एक क़दम भी नहीं चल सकता शिखा. अब मैं तुम्हें वो हर ख़ुशी दूंगा जिसकी तुम हक़दार हो. तुम्हें ऊंचाइयों के उस शिखर तक पहुंचकर दिखाउंगा जहां तुम मुझे देखना चाहती हो. हमारी बच्ची को ऐसी परवरिश दूंगा कि उसे कभी किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं होगी. शिखा, अब मैं वैसा बनना चाहता हूं जैसा तुम चाहती हो. यदि मैं ऐसा कर सका, तो यही मेरा प्रायश्‍चित होगा.
मैं माफ़ी के क़ाबिल तो नहीं शिखा, फिर भी हो सके तो मुझे माफ़ कर देना.
तुम्हारा,
शिखर

पत्र पढ़ते-पढ़ते शिखा की आंखें भी छलक पड़ीं. वर्षों का गुबार आज आंसुओं के रास्ते बह चला था. शिखर नाश्ता लिए कब से उसके पास बैठे थे. उन्होंने शिखा को रोका नहीं, क्योंकि वो जानते थे कि आंसुओं का ये सैलाब अपने साथ तमाम कड़ुवे अनुभव बहा ले जाएगा और फिर उनके जीवन में एक नया सवेरा होगा, जो बहुत सुहाना होगा.

Kamala Badoni

कमला बडोनी

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कहानी- सॉरी आंटी (Short Story- Sorry Aunty)

आंटी की आवाज़ में जो कुछ भी था, वह रिया के संवेदनशील, भावुक मन को अंदर तक छू गया. एक स्त्री होकर भी वह कभी अंदाज़ा क्यों नहीं लगा पाई कि इन अकेली जी रही आंटियों के जीवन में कितना अकेलापन होगा. कितनी तन्हा हैं सब, अकेले रहकर ख़ुश रहने की कोशिश में लगी रहती हैं. सबके साथ जो थोड़ा-बहुत हंस-बोल लेती हैं, यह देखकर वह क्यों कभी ख़ुश नहीं हुई.

Short Story- Sorry Aunty

अपनी किटी पार्टी का पूरा ग्रुप रिया को बहुत पसंद था. अपनी घर-गृहस्थी को थोड़ी देर भूलकर महीने में एक बार पंद्रह महिलाएं इकट्ठा होकर एंजॉय करती थीं. रिया को इस दिन का इंतज़ार रहता था. दो बच्चों की मां, चालीस वर्षीया रिया स्वभाव से ख़ुशमिज़ाज, मिलनसार महिला थी. अपने गु्रप में वह अच्छी-ख़ासी लोकप्रिय थी. इस गु्रप में तीस साल से लेकर साठ साल की मीरा, पैंसठ साल की सुमन और सत्तर साल की रेखा आंटी भी थीं. तीनों आंटी को सब बहुत पसंद करते थे. सुमन आंटी अकेली रहती थीं. कुछ साल पहले उनके पति का देहांत हो गया था. एक ही बेटी थी, जो ऑस्ट्रेलिया में अपने पति और बच्चों के साथ रहती थी. सुमन आंटी की जीवनशैली किटी के बाकी सदस्यों के लिए प्रेरणा का स्रोत थी. अकेले कैसे जिया जाता है, इसका जीवंत उदाहरण थीं सुमन आंटी. रेखा आंटी के पति का भी स्वर्गवास हो चुका था. वे अपने बेटे के साथ रहती थीं. मीरा आंटी के भी पति नहीं रहे थे. दो विवाहित बेटियां थीं और वे अपनी छोटी बेटी के साथ रहती थीं.

पर पता नहीं क्यों रिया की ऐसी सोच थी कि वह अपने ग्रुप की तीनों बुज़ुर्ग सदस्याओं से सहज नहीं थी. रिया ने नोट किया था कि बाकी सब तो तीनों को बहुत प्यार करती थीं, लेकिन रिया उनसे दूरी बनाए रखती थी. तीनों अच्छी तरह से पहन-ओढ़कर रहतीं. कभी तीनों मिलकर बाहर भी खाने-पीने जातीं, मूवी भी देख आतीं. रिया भी सोचती कि क्या बुराई है अगर ये तीनों अच्छी तरह से लाइफ एंजॉय कर रही है? फिर वह इन्हें नापसंद क्यों करती है? वह अपनी सोच पर हैरान हो जाती. वह कहीं ईर्ष्यालु प्रवृत्ति की महिला तो नहीं बनती जा रही है, जो उन अकेली स्त्रियों को ख़ुश देखकर ख़ुश नहीं हो पाती. फिर सोचती, नहीं-नहीं वह क्यों जलेगी. वह तो अपने जीवन से संतुष्ट है.

कभी वह सोचती हमारे गु्रप में बुज़ुर्ग सदस्याओं की क्या ज़रूरत है, इन्हें तो भजन-कीर्तन मंडली में होना चाहिए. ये हमारी किटी में आकर क्यों एंजॉय करती हैं. तीनों हर गेम को उत्साह से खेलतीं और  इनाम मिलने पर बच्चों-सी ख़ुश हो जातीं. सब एक ही सोसायटी में रहती थीं. कई बार ऐसा भी हुआ था, जब रिया के पति अनिल या उसकी कुछ ख़ास सहेलियों ने उसके गु्रप का मज़ाक उड़ाया था यह कहकर कि, ‘तुम्हारा तो उम्रदराज़ आंटी लोगों का गु्रप है.’ यह सुनकर रिया को और ग़ुस्सा आता था. रिया स्वभाव से काफ़ी भावुक महिला थी, पर पता नहीं क्यों इन उम्रदराज़ स्त्रियों की उपस्थिति उसे नागवार गुज़रती. वह कई बार अपनी ख़ास सहेली टीना को कह चुकी थी, “अब किसी आंटी को अपने गु्रप में नहीं लेना है, धीरे-धीरे यह किटी नानी-दादी की किटी होती जा रही है.” टीना ने उसे समझाया, “थोड़ी देर हम लोगों के साथ बैठकर, खा-पीकर ख़ुश हो लेती हैं. अच्छा ही तो है, इसमें बुरा क्या है.” यही तो रिया समझ नहीं पा रही थी कि वह क्यों मन ही मन चिढ़ती रहती है. टीना ने यह भी कहा था, “रिया, कल हम भी तो उस उम्र में पहुंचेंगी, तो क्या तब हमारा मन नहीं होगा सबके साथ गु्रप में हंसने-बोलने का या तुम किसी मंदिर में बैठकर भजन ही करनेवाली हो तब?” रिया कुछ बोली नहीं थी. धीरे-धीरे इस किटी पार्टी को शुरू हुए पांच साल बीत गए थे, सब लोग अब तक घर की सदस्याएं-सी हो गई थीं, पर रिया की मनोस्थिति आज भी वही थी.

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वह किटी में भरपूर आनंद उठाकर जब लौटती, तो कभी उसके पति या आस-पड़ोस के युवा बच्चे या कोई परिचित स्त्री कह देती, “क्या मज़ा आता है तुम्हें इस गु्रप में, उम्र देखी है सबकी? कैसे एंजॉय करती हो.” रिया को ग़ुस्सा तो बहुत आता, पर चुप रह जाती. वो कर भी क्या सकती थी?

इसी बीच रिया को पास की ही बिल्डिंग में अपने बेटे की ट्यूशन टीचर से मिलने जाना था. बारिश का मौसम था, लेकिन आसमान साफ़ था, तो वह बिना छतरी के ही घर से निकल गई. टीचर के घर की डोरबेल बजाकर कुछ देर इंतज़ार किया. जब किसी ने दरवाज़ा नहीं खोला, तो उसे लगा कि शायद घर पर कोई नहीं है. इसी बीच अचानक तेज़ बारिश शुरू हो गई. वह सोच में पड़ गई कि अब क्या करे? घर तक जाने में तो पूरी भीग जाएगी. टीचर के सामनेवाला फ्लैट सुमन आंटी का ही था. रिया ने सोचा, सुमन आंटी से छतरी मांग लेनी चाहिए, पर उनसे मिलने का उसका मन नहीं था. इतने में सुमन आंटी ने अपने फ्लैट का दरवाज़ा खोल दिया. बहुत प्यार से बोलीं, “रिया, मैंने तुम्हें खिड़की से बिल्डिंग के अंदर आते देखा, तो अंदाज़ा लगाया कि शायद तुम सामने टीचर से मिलने आई होगी. वे तो बाहर गई हैं, आओ न, अंदर आ जाओ.”

“नहीं आंटी, मैं चलती हूं, पर छतरी नहीं है मेरे पास, आपके पास एक्स्ट्रा छतरी है क्या?”

“हां है, पर पहले तुम्हें अंदर आकर एक कप चाय पीनी पड़ेगी मेरे साथ.” सुमन आंटी हंसते हुए बोलीं और रिया का हाथ स्नेहपूर्वक पकड़कर अंदर ले गईं.

साफ़-सुथरे घर के कोने-कोने से गृहस्वामिनी का कलाप्रेम दिखाई दे रहा था. सोफे पर बहुत बड़ा-सा टेडी बेयर रखा हुआ था. रिया ने पूछा, “आंटी, यह किसका है?”

“मेरा ही है.”

रिया चौंकी, “आपका?”

“हां, इसे यहां रख दिया मैंने, इसे देखकर मुझे लगता है कि सोफे पर कोई बैठा है, घर में है कोई.” आंटी के चेहरे पर भले ही मुस्कुराहट थी, पर उनकी आवाज़ की उदासी ने रिया के मन में हलचल-सी मचा दी थी. उनकी उदास आंखों की तरफ़ देखती हुई वह कुछ बोल नहीं पाई. आंटी ने स्नेहभरे स्वर में कहा, “आज पहली बार अकेली आई हो न! हमेशा किटी में ही आती हो, बैठो, मैं चाय लाती हूं.” जब तक आंटी चाय लाईं, रिया ड्रॉइंगरूम में रखी कलाकृतियां, सुंदर साफ़ शीशे से चमकते शोपीस, उनके स्वर्गीय पति की फोटो, बेटी और उसके परिवार की फोटो देखती रही, पर घर में जो सन्नाटा पसरा था, वह दिल को अजीब लग रहा था. एकदम शांत, पर उदास-सा घर.

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सुमन आंटी चाय ले आईं और रिया के साथ ही चाय पीते हुए उसके परिवार और बच्चों के बारे में पूछती रहीं. अपनी बेटी के बारे में भी बहुत-सी बातें बताते हुए कहने लगीं, “सुबह तो मैं फ्लैट का दरवाज़ा खोलकर कभी-कभी अख़बार पढ़ते हुए बाहर खड़ी हो जाती हूं और बीच-बीच में स्कूल जाते हुए बच्चों को देखती रहती हूं. लगता है चलो, सुबह कोई तो दिखा वरना अंदाज़ा लगा ही सकती हो कैसा लगता होगा अकेले.” आंटी की आवाज़ में जो कुछ भी था, वह रिया के संवेदनशील, भावुक मन को अंदर तक छू गया. एक स्त्री होकर भी वह कभी अंदाज़ा क्यों नहीं लगा पाई कि इन अकेली जी रही आंटियों के जीवन में कितना अकेलापन होगा. कितनी तन्हा हैं सब, अकेले रहकर ख़ुश रहने की कोशिश में लगी रहती हैं. सबके साथ जो थोड़ा-बहुत हंस-बोल लेती हैं, यह देखकर वह क्यों कभी ख़ुश नहीं हुई. यहां थोड़ी देर में ही घर में फैली उदासी उसे व्यथित कर रही है और ये अकेलापन, उदास रात-दिन उनके जीवन का हिस्सा बन चुके हैं. इसके बावजूद ये लोग कभी अपने जीवन में आई कमियों का रोना नहीं रोतीं. अपने सुख-दुख अकेले ही सहेजती हुई कैसे जी रही हैं सब और वह कितनी अविवेकी, असंवेदनशील है. ये सब थोड़ी देर सबके साथ बैठकर अपना अकेलापन कुछ पल के लिए भूल जाती हैं, तो उसे इस पर आपत्ति है. छि:, क्या कभी वह नहीं पहुंचेगी उम्र के इस पड़ाव पर! और सोचती रहती थी कि छोड़ देगी इस गु्रप को, कोई हम उम्र सदस्याओं वाला गु्रप जॉइन करेगी. आज सुमन आंटी की बातों में उनकी उम्र की उदासी, अकेलापन साफ़-साफ़ दिखा रिया को, वह अचानक कह उठी, “आंटी, आप जब भी चाहें, मेरे पास आ जाया करें, घर और बच्चों के काम के कारण मेरा जल्दी निकलना नहीं होता है. आप आती रहा करें. मुझे अपनी बेटी जैसी ही समझें, आंटी.”

“हां, और क्या, मैं अपनी बेटी से भी यही कहती हूं कि मेरे ग्रुप में मेरी कई बेटियां हैं, जिनके साथ बैठकर मैं सब कुछ भूल जाती हूं. कितनी अच्छी हो तुम सब, तुम लोगों के साथ बैठकर तो जी उठती हैं हम तीनों. ढेरों शुभकामनाएं निकलती हैं तुम लोगों के लिए. कितना प्यार, सम्मान देती हो तुम सब.” रिया मन ही मन आत्मग्लानि लिए बस हल्की मुस्कुराहट के साथ आंटी की बातें सुन रही थी और फिर बस ‘बाय’, बोलकर चल पड़ी, पर उसका रोम-रोम अपने पिछले सालों के रूखे व्यवहार पर बस दो शब्द बोल रहा था, ‘सॉरी आंटी.’

Poonam Ahmed

      पूनम अहमद

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कहानी- सास रोग (Short Story- Saas Rog)

“बस-बस. मैं तेरी मंशा समझ गई. वो ज़माना और था. कुछ लोगों की सोच संकुचित होती है, लेकिन हम भी वैसा ही नज़रिया रखें, तो उनमें और हममें फ़र्क़ ही क्या रह जाएगा. तेरी सास ने तुझसे काम करवाया, इसलिए तू भी अपनी बहू से बदला लेगी. यह ओछी प्रवृत्ति छोड़ दे. मैं तुझसे चार साल बड़ी हूं, लेकिन मेरा शरीर एकदम स्वस्थ है, क्योंकि मैं घर का काम करती रहती हूं. बहू को मदद भी हो जाती है और गृहस्थी संचालन में मेरी सशक्त भूमिका भी बरक़रार है. लेकिन तुम्हारे जैसी सास काम में मदद तो करेंगी नहीं, हां पलंग पर बैठे-बैठे गृहस्थी पर अपना आधिपत्य जताकर व्यर्थ विवाद और खीझ को बढ़ावा देंगी. सच है ‘खाली दिमाग़ शैतान का घर’ काम तो कुछ है नहीं, तो बहू को परेशान करने की व्यर्थ ख़ुराफ़ातें दिमाग़ में पैदा होती रहती हैं.”

Short Story- Saas Rog

”आह!” पलंग से नीचे पैर रखते ही वसुधा घुटनों पर हाथ रखकर कराह उठी. “अब तो लगता है, जल्दी ही काठी का मोहताज होना पड़ेगा. घुटने तो बिल्कुल ही काम से गए.

अच्छी-भली चलती-फिरती थी, पता नहीं क्या हो गया है?”

“अरे, पिछली बार आई थी, तब तो तुझे घुटने की कोई परेशानी नहीं थी. डेढ़ साल में अचानक क्या हो गया? आदित्य की शादी में तो तूने कितनी भागदौड़ की थी.” जया ने वसुधा की हालत देखकर दुख और अफ़सोस से कहा.

“हां, उम्रभर तो अच्छी रही, पर बस पिछले डेढ़ साल में ही पता नहीं क्या हो गया है. आदित्य की शादी के बाद से ही घुटनों में दर्द रहने लगा और अब तो पलंग से उठकर बाथरूम तक जाना भी मुश्किल हो गया है. दर्द के मारे जान निकल जाती है. इस डर से तो मैंने पानी पीना भी बहुत कम कर दिया है.” वसुधा जैसे-तैसे बाथरूम तक जाकर आई और फिर से पलंग पर बैठ गई. तब तक जया लहसुन डाला हुआ गरम तेल लेकर आई और वसुधा के घुटनों की मालिश करने लगी.

“अरे, जीजी ये क्या कर रही हो? तुम तो बड़ी हो, सेवा तो मुझे तुम्हारी करनी चाहिए.” वसुधा संकोच से भरकर बोली.

“तो क्या हुआ. जब मेरे घुटनों में दर्द होगा तो तुम तेल लगा देना. तकलीफ़ में क्या छोटा और क्या बड़ा.” कहकर जया ने वसुधा के घुटनों की मालिश कर दी.

वसुधा के बेटे आदित्य की शादी में दोनों बहनें मिली थीं, तब से डेढ़ साल हो गया. अब वसुधा ने बड़े आग्रह से जया को 4-5 दिन के लिए अपने घर रहने बुलाया था. जया कल रात में ही आई थी. दोनों बहनें देर रात तक बातें करती रही थीं.

सुबह के सात-साढ़े सात बजे थे. जया चाय बनाने किचन में जाने लगी, तो वसुधा ने उसे रोका कि बहू उठकर बना देगी, लेकिन जया आनन-फानन में अपनी, वसुधा की और वसुधा के पति सुरेश की चाय बना लाई.

“साढ़े सात हो गया है, लेकिन बहू के उठने का पता नहीं है. यह नहीं कि तुम आई हो, तो जल्दी उठकर चाय बना दे. रोज़ सुबह की चाय के लिए सात-साढ़े सात बजे तक राह देखते रहो.” वसुधा ने उलाहने के साथ कहा.

“आज आदित्य की छुट्टी है.

दस-बीस मिनट देर से भी उठ गए, तो क्या हुआ. और भई सुबह मुझे जल्दी चाय पीने की आदत है, तो मैं तो किसी के भरोसे नहीं रहती. अपनी और उनकी चाय ख़ुद बना लेती हूं और पेपर पढ़ते हुए या बगीचे का काम करते हुए गरम-गरम चाय का मज़ा लेती हूं.” जया ने कहा. “हमें अगर सुबह पांच बजे या और किसी ऐसे समय चाय पीने की आदत हो, जो आदत दूसरे के लिए सुविधाजनक ना हो, तो फिर हमें ये काम ख़ुद कर लेना चाहिए, बजाय दूसरे के बनाने का इंतज़ार करने और उस पर चिढ़ने के.” जया ने गंभीर स्वर में कहा.

पंद्रह मिनट बाद ही बहू यानी अनु रसोईघर में आई, तो चाय के बर्तन देखकर झेंप-सी गई.

“कोई बात नहीं अनु, चाय पी चुके तो क्या, तुम्हारे हाथ की बनी हुई फिर से पी लेंगे. अब बताओ सब्ज़ी क्या बनानी है.” जया ने कहा और अनु के मना करने पर भी फटाफट सब्ज़ियां निकालकर धोकर काटने लगी. तभी आदित्य भी किचन में आ गया. सुरेश भी वहां आ गए. अनु वसुधा को कमरे में ही चाय दे आई. बाकी सबने किचन में बैठकर साथ में चाय पी. जया नाश्ता और खाना बनाने में समान रूप से अनु की मदद कर रही थी, साथ ही पुरानी बातों का दौर और हंसी-मज़ाक भी चल रहा था. अनु भी खुलकर हंस रही थी. वसुधा के कमरे तक सबके हंसने-बोलने की आवाज़ें जा रही थीं. अनु की आवाज़ सुनकर वसुधा को आश्‍चर्य हो रहा था. अनु वसुधा से तो कभी इतनी बातचीत नहीं करती. महीनों से तो उसने उसे हंसते-मुस्कुराते भी नहीं देखा था.

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जब सबके खाने का समय हुआ, तब वसुधा ने नहाने जाने की बात की. अनु ने सबका खाना परोसकर वसुधा के लिए नहाने का पानी रखा. कपड़े बाथरूम में रख दिए. नहाने के बाद वसुधा पूजा करने बैठी. अनु सबको खाना भी परोसती जा रही थी और वसुधा के लिए पूजा की तैयारी भी करती जा रही थी. कभी पानी देना, फूल लाकर देना, चंदन घिस देना,  भगवान का चरणामृत, तुलसी चौरे में डालकर आना. पूजा के बाद भगवानजी का तौलिया धोकर सूखने डालना. फिर वसुधा को खाना खिलाकर तब अनु ने खाना खाया. खाने के बरतन आदि

समेटते हुए अनु को ढाई-तीन बज गए.

शाम को जया ने अनु और आदित्य को बाहर घूमने भेज दिया. दोनों का चेहरा खिल गया. महीनों के बाद वे घूमने जा पाए थे. हमेशा तो खाना बनाने, सुरेश और वसुधा को परोसने तक में ही इतनी देर हो जाती कि अनु मायूस होकर जाने से ही मना कर देती. अब भला रात में नौ बजे घूमने का समय ही कहां रह जाता. आज जया ने कहा, रात में वह कुछ भी बना लेगी और वसुधा तथा सुरेश को खिला देगी. जया ने देखा वसुधा को अनु का जाना अच्छा नहीं लगा.

“घर में मेहमान आए हैं और बहू यूं घूमने निकल गई.” वसुधा के स्वर में नाराज़गी थी.

“मैंने ही उन्हें भेजा है. वह तो जाने को तैयार भी नहीं थी और मैं कोई मेहमान थोड़े ही हूं.” जया ने कहा.

दूसरे दिन जया ने वसुधा को जल्दी नहाने और पूजा करने को कहा, ताकि वह भी सबके साथ बैठकर खाना खा सके. बड़ी अनिच्छा से वसुधा नहाने गई. उस दिन अनु काम से डेढ़ बजे ही फ्री हो गई, तो जया ने उन दोनों को पिक्चर देखने भेज दिया. दोपहर में आराम करने वसुधा और जया पलंग पर लेट गईं. वसुधा फिर घुटनों पर हाथ फेरते हुए कराहने लगी.

“पता नहीं, क्या जानलेवा बीमारी हो गई है. मैं तो अपनी ज़िंदगी से तंग आ गई हूं. न चल पाती हूं, न ही कहीं आ-जा पाती हूं. बस, इस कमरे में कैद होकर रह गई हूं.” वसुधा फिर अपने घुटनों का रोना लेकर बैठ गई.

“तुझे ‘सास’ नामक बीमारी हो गई है वसुधा. और कुछ नहीं.” अचानक जया बोल उठी.

“क्या?” वसुधा चौंक गई.

“हां, और यह बड़ी भयानक बीमारी है. एक बार यह रोग लग जाए, तो उम्रभर पीछा नहीं छोड़ती.” जया के स्वर में हल्का-सा व्यंग्य था.

“क्या कह रही हो दीदी? तुम भी न.” वसुधा चिढ़कर बोली.

“मैं ठीक कह रही हूं. तुझे कुछ नहीं हुआ है. मध्यमवर्गीय भारतीय घरों की सासों के साथ यही होता है. उम्रभर वे घर का सारा काम करती हैं, लेकिन जैसे ही बहू घर में आती है, सारा काम उसे सौंपकर पलंग पर बैठ जाती हैं और बीमारियों को न्योता देती हैं. अरे, मेनोपा़ॅज के समय हार्मोनल चेंजेस होते हैं, इस समय तो शरीर को व्यायाम की ज़्यादा ज़रूरत होती है, ताकि वह स्वस्थ रहे, लेकिन तुमने तो पलंग पकड़कर बीमारियों को न्योता दे दिया. उम्रभर घर का काम करने के बाद अचानक शरीर एकदम निठल्ला होकर बैठ जाए, तो क्या होगा. मशीन को भी बंद करके रख दो, तो उसमें भी ज़ंग लग जाती है, फिर यह तो शरीर है. पिछले डेढ़ साल में अपने शरीर की हालत देखी है, वज़न कम से कम पच्चीस किलो बढ़ गया है. अब घुटनों पर यह अतिरिक्त भार पड़ेगा, तो दर्द तो होगा ही. मोटापे से घुटने ख़राब और आगे मधुमेह को आमंत्रण और फिर कोसती हैं बेचारी बहू को कि इसके आने से ये सब हुआ.” जया ने खरी बात आख़िर बोल ही दी.

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“सारी उम्र तो काम में पिस गई. अब इस उम्र में थोड़ा आराम कर लिया तो…?”

“अरे, अपनी गृहस्थी, अपने ही पति-बच्चों के लिए काम किया ना? सब करते हैं और तुमने कोई एहसान नहीं किया है. किसी दूसरे के घर का काम तो नहीं किया ना.” जया ने उसे डांट लगाई.

“हमारी सास भी तो बैठी रहती थी. हम भी तो अकेले ही सारा काम करते थे तो…” वसुधा कुछ और कहना चाहती थी, मगर जया ने बीच ही में उसे रोककर कहा.

“बस-बस. मैं तेरी मंशा समझ गई. वो ज़माना और था. कुछ लोगों की सोच संकुचित होती है, लेकिन हम भी वैसा ही नज़रिया रखें, तो उनमें और हममें फ़र्क़ ही क्या रह जाएगा. तेरी सास ने तुझसे काम करवाया, इसलिए तू भी अपनी बहू से बदला लेगी. यह ओछी प्रवृत्ति छोड़ दे. मैं तुझसे चार साल बड़ी हूं, लेकिन मेरा शरीर एकदम स्वस्थ है, क्योंकि मैं घर का काम करती रहती हूं. बहू को मदद भी हो जाती है और गृहस्थी संचालन में मेरी सशक्त भूमिका भी बरक़रार है. लेकिन तुम्हारे जैसी सास काम में मदद तो करेंगी नहीं, हां पलंग पर बैठे-बैठे गृहस्थी पर अपना आधिपत्य जताकर व्यर्थ विवाद और खीझ को बढ़ावा देंगी. सच है ‘खाली दिमाग़ शैतान का घर’ काम तो कुछ है नहीं, तो बहू को परेशान करने की व्यर्थ ख़ुराफ़ातें दिमाग़ में पैदा होती रहती हैं.”

“पर मैंने बहू को क्या परेशान किया?” वसुधा हैरानी से बोली.

“ये जो देर से नहाना है, देर से खाना खाने बैठना है, इसके पीछे की चालाकी मैं सब समझ रही हूं.” जया ने कहा तो वसुधा ने सकपकाकर सिर झुका लिया.

“देख, बहू के भी अपने सपने हैं. खाली बैठकर तेरा दिमाग़ उल्टी दिशा में चलने लगा है. तू जान-बूझकर उसे काम में उलझाए रखती है, ताकि वह आदित्य के साथ बाहर न जा पाए. तू अपने दिनों की कुंठा अब उस पर निकाल रही है. यह ठीक नहीं है. किसी दिन अगर वो दोनों अलग हो जाएं, तो फिर ये घुटनों का दर्द लेकर भी सारी गृहस्थी तुझे अकेले ही खींचनी पड़ेगी, तब उसे मत कोसना. शरीर तो काम करने के लिए ही होता है. रवींद्रनाथ टैगोर ने भी सत्तर वर्ष की उम्र में जाकर चित्रकारी सीखी और चित्र बनाना प्रारंभ किया. वे अगर उम्र की सोचते तो इतना नाम नहीं कमाते.” अंतिम बात करने तक जया का स्वर काफ़ी हद तक संयत हो चुका था.

वसुधा सोच में पड़ गई. जया दूसरी ओर मुंह करके सो गई. थोड़ी देर बाद वसुधा पानी लेने किचन में गई. जया ने चुपचाप देखा वसुधा बड़े आराम से चल रही थी. वह मुस्कुरा दी.

जया को सुबह सैर करने की आदत थी. दूसरे दिन वह सुबह उठी, तो देखा वसुधा उससे पहले ही उठकर बाहर जाने को तैयार थी. यह देखकर जया सुखद आश्‍चर्य से भर गई.

थोड़ी दूर ही सही, पर वसुधा जया के साथ पैदल घूमने गई. इतने दिनों से उसके पैर बैठे-बैठे अकड़ गए थे. अब जोड़ खुलने में थोड़ा व़क्त तो लगेगा. लेकिन जया को तसल्ली थी कि कम से कम वसुधा की बुद्धि पलटी तो.

घर जाकर चाय भी वसुधा ने ही बनाई. बर्तनों की खटपट सुनकर अनु दौड़ी-दौड़ी किचन में आई, तो वसुधा को काम करते देख आश्‍चर्यचकित रह गई. वह चाय बनाने जा ही रही थी कि जया ने इशारे से उसे मना कर दिया. आदित्य और सुरेश भी किचन में चले आए.

वसुधा ने सबकी चाय टेबल पर रखी. आज पूरा परिवार एक साथ बैठा था.

“लो अनु, तुम्हारी सास अब एकदम स्वस्थ हो गई है. अब वह सब काम कर सकती है. बस, अब तुम उस पर एक नई ज़िम्मेदारी डालने के लिए फटाफट उसे दादी बनाने की तैयारी शुरू कर दो.” जया ने कहा तो अनु शरमा गई और सब खिलखिलाकर हंस दिए.

 

Dr. Vineeta Rahurikar

डॉ. विनीता राहुरीकर

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कहानी- शिखर पर (Short Story- Shikhar Par)

उस पल मुझे लगा कि गुत्थियों के जंगल से निकल मैं एक शिखर पर खड़ी हुई हूं, जहां सम्मान के साथ मुझे एक अच्छी पत्नी आदर्श मां होने का दर्जा दिया जा रहा है.

Short Story- Shikhar Par

“आप ज़हर खाकर मर क्यों नहीं जातीं.” नीरव की बात सुन मैंने हंसते हुए उससे पूछा, “तुम लोग रह लोगे मेरे बिना?”
“हां रह लूंगा.” वह तमतमाते हुए बोला.
अब तक मैं समझ रही थी कि वह किसी कार्टून के पात्र को अपने में उतारकर उसकी भूमिका अदा कर रहा है, पर उसके चेहरे पर छाई तटस्थता और एक मौन स्वीकृति के भाव ने मुझे एहसास कराया कि वह गंभीर है.
अपने 14 वर्षीय बेटे के मुंह से यह बात सुन मैं हैरान रह गई. मुझे अपनी मां होने की क्षमताओं पर संदेह होने लगा.
“आप और बच्चों की मम्मी जैसी क्यों नहीं हैं? आप घर पर भी नहीं रहतीं. बस, पापा अच्छे हैं. हर समय मेरा ख़याल रखते हैं. स्कूल से आता हूं तो पापा ही घर पर मिलते हैं, आप नहीं.”
“बेटा, मेरा जॉब ही ऐेसा है, जिसमें मुझे ज़्यादा व़क़्त घर से बाहर रहना पड़ता है. तुम्हारे पापा का काम ऐसा है कि वे लंच के लिए घर आ सकते हैं. फिर घर के पास ही है उनका ऑफ़िस. पापा ख़ुद ही बॉस हैं, इसलिए जब चाहे घर आ-जा सकते हैं.” मैंने उसे समझाने की कोशिश की.
हालांकि इस उम्र में उसे समझाना बेमानी लगता था. वह काफ़ी समझदार हो चुका था. यह भी समझता था कि मम्मी की नौकरी की वजह से ही सुख-सुविधाओं के अंबार जुटते थे… फिर भी मन को समझाया, आख़िर है तो बच्चा ही.
“आप अच्छी मम्मी नहीं हैं. आप मम्मी जैसी मम्मी नहीं हैं.” मुझे लगा कि जैसे नीरव ने मेरे मुंह पर करारा तमाचा जड़ दिया है. ‘मम्मी जैसी मम्मी नहीं.’ आख़िर उसकी नज़र में मम्मी की क्या परिभाषा है? शायद वही ठीक है. मैं एक आदर्श मां की श्रेणी में नहीं आती हूं. आती तो मैं एक आदर्श पत्नी की श्रेणी में भी नहीं हूं… अपेक्षाओं को ठीक से समझकर पूरा करना दूसरों को ख़ुश रखने के लिए आवश्यक होता है. तभी दूसरे चाहे वह पति हो या बच्चा या कोई और. आपसे ख़ुश रह सकते हैं और अपनी ख़ुशी… अपनी अपेक्षाएं… क्या उनके बारे में सोचना स्वार्थी होने की निशानी होती है?
सिलसिला उस दिन ही रुका नहीं, क्योंकि नीरव की वह प्रतिक्रिया मात्र क्षणिक नहीं थी, दबे हुए ज्वालामुखी के फूटते लावे जैसी थी. वह भूला नहीं कि उसने क्या कहा था, वरना ग़ुस्से में तो वह न जाने क्या-क्या कह जाता था. उस दिन ऑफ़िस से आकर बैठी ही थी कि बोला, “ज़रा मार्केट जाना है, एक क़िताब ख़रीदनी है. आप चलो.”
“बेटा, अभी तो आई हूं, थोड़ी देर में पापा आ जाएंगे, तब उनके साथ चले जाना.”
बस तुनक गया वह. “आप मेरी मम्मी नहीं हैं.” अपने कमरे में जाकर उसने चीज़ों को इधर-उधर फेेंकना शुरू कर दिया. मन तो हुआ उसे झिंझोड़ डालूं, पर ठहर गई. थकावट और दर्द के सैलाब को स़िर्फ आंखों में समेट लिया. उम्र के कारण शरीर में हो रहे बदलावों की वजह से वह इस तरह रिएक्ट करने लगा था या सचमुच में वही उसकी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पा रही थी.
नौकरी को मजबूरी कहकर नौकरी करना स्वयं को जस्टिफाई करने जैसा होता है. उसकी मजबूरी तो नहीं थी, हां शा़ैक था. वह घर बैठ ही नहीं सकती थी और फिर अच्छा जॉब मिलना भी क्या आसान होता है. क्षितिज का बिज़नेस ठीक-ठाक चल रहा था. ऊपर-नीचे तो बिज़नेस में होता ही रहता है, लेकिन अगर वह नौकरी न भी करे तो भी अच्छी ज़िंदगी जी जा सकती थी. अच्छी ज़िंदगी यानी अच्छा खाना, अच्छे कपड़े. ज़रूरतें पूरी हो सकती थीं, पर लिविंग स्टैंडर्ड मेंटेन उसकी नौकरी के चलते ही हो पाता था.
“ज़रूरत क्या है तुम्हें धक्के खाने की, घर में रहो और नीरव पर ध्यान दो.” क्षितिज कई बार उससे कह चुका था. आज भी उसके आते ही वही बहस शुरू हो गई थी. “एक दिन उसकी बात मान उसके साथ चली जातीं तो क्या हो जाता? कितनी बार कहा है कि नौकरी छोड़ दो, पर तुम तो बस अपने बारे में सोचती हो.”
“सही समझे, आख़िर नौकरी तो मैं अपने लिए कर रही हूं. बढ़ती महंगाई और रिसेशन के इस समय में तुम्हें क्यों नहीं यह बात समझ आती कि नौकरी आजकल कोई मौज-मस्ती करने की चीज़ नहीं है, एक ज़रूरत है. उन लोगों से जाकर पूछो, जिनके यहां कमानेवाला एक ही है. कितनी परेशानियां झेलनी पड़ती हैं उन्हें और तुम चाहते हो कि मैं सारे दिन किचन में घुसी रहकर अपने टैलेंट और हर महीने मिलने वाले वेतन को नज़रअंदाज़ कर दूं.”
“मैं ये सब नहीं जानता बस…” क्षितिज को मानो कहने के लिए शब्द नहीं मिल रहे थे.

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“मैं भी नीरव के साथ क्वालिटी टाइम गुज़ारती हूं, पर उसने अपने मन में मुझे लेकर न जाने कैसी धारणाएं बना ली हैं. उसे समझाने से पहले तुम्हें मुझे समझना होगा. मैं इस तरह की ज़िंदगी नहीं जी सकती. मुझे लोगों से मिलना-जुलना अच्छा लगता है. इतने बरसों से नौकरी करते-करते इसकी आदत हो गई है. अब छोड़ दी तो फिर नहीं मिलेगी. बी प्रैक्टिकल क्षितिज. फिर आगे नीरव की पढ़ाई का ख़र्च दिन-ब-दिन बढ़ेगा ही.”
“तुम तो अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए घर से बाहर रहना चाहती हो. न जाने कौन-सी उपलब्धि की चाह तुम्हें घर के बाहर रहने के लिए उकसाती है. और फिर मैं कौन-सा तुम्हें घर में ़कैद होने के लिए कह रहा हूं. तुम्हें घूमने-फिरने की मनाही तो नहीं है. नीरव जिस दौर से गुज़र रहा है, ऐसे में बिगड़ने की संभावना ज़्यादा रहती है. तुम घर पर रहोगी तो कम से कम यह तो देख सकोगी कि वह टीवी पर क्या देख रहा है, नेट स़िर्फंग के कितने भयानक परिणाम देख-सुन चुके हैं हम.”
“पर तुम तो घर पर काफ़ी व़क़्त बिताते हो. तुम उस पर नज़र रख सकते हो. नीरव हम दोनों की ही ज़िम्मेदारी है. जैसी जिसकी सुविधा हो क्या, मैनेज नहीं करना चाहिए? ” इस बार उसकी आवाज़ में न तो तल्खी थी, न ही रोष. क्षितिज की ओर से कोई जवाब न पाकर मैंने फिर कहा, “क्या कोई और रास्ता नहीं निकल सकता?” मैं अपनी तरफ़ से किसी भी तरह की कोशिश करने में कोताही नहीं करना चाहती थी.
“जब रास्ता साफ़ दिख रहा है तो बेवजह दिमाग़ ख़राब करने से क्या फ़ायदा?” क्षितिज ने चिढ़कर कहा.
“यानी हर स्तर पर समझौता मुझे ही करना होगा?”
“तुम औरत हो और एक औरत को ही समझौता करना होता है. वैसे भी एक मां होने का दायित्व तो तुम्हें ही निभाना होगा. अपनी हद में रहना सीखो.” क्षितिज की बात सुन मेरा मन जल उठा.
मैं घायल शेरनी की तरह वार करने को तैयार हो गई, “अच्छा आज यह भी बता दो कि मेरी हद क्या है?”
“हद से मेरा मतलब है कि घर संभालो, नीरव को संभालो. खाओ-पीओ, मौज करो.” क्षितिज के स्वर में बेशक पहले जैसी कठोरता नहीं थी. आवाज़ में कंपन था, लेकिन उसकी सामंतवादी मानसिकता के बीज प्रस्फुटित होते अवश्य महसूस हुए. एक सभ्य समाज का प्रतिनिधित्व करनेवाला पुरुष लाख शिक्षित हो, पर बचपन में उसके अंदर औरत को दबाकर रखने के रोपे गए बीजों को झाड़-झंखाड़ बनने से कोई नहीं रोक सकता.
क्षितिज की बात सुन मैं हैरान रह गई. क्षितिज जैसे पढ़े-लिखे इंसान की मानसिकता ऐसी हो सकती है? क्या पत्नी से उसकी अपेक्षाएं बस इतनी ही हैं? मेरी इच्छाओं का मान रखना, मेरे व्यक्तित्व को तराशने तक का ख़याल नहीं आता उसे? मैं कब अपने मां होने की ज़िम्मेदारियों से पीछे हटना चाहती हूं, पर क्षितिज का साथ भी तो नीरव को सही सोच देने के लिए
ज़रूरी है.

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अपने आंसुओं को पीते हुए इस बार बिना कोई जवाब दिए मैं अंदर कमरे में चली गई. समझाया तो उसे जाता है, जो समझने को तैयार हो, जिसके मन की खिड़कियां खुली हों. क्या नीरव की चिंता उसे नहीं है? वह तो बस उससे थोड़ा-सा सहयोग चाहती है.
नीरव उन दोनों को लड़ते देख अपने कमरे में चला गया था. उसे अपने ख़ुद पर भी ग्लानि हो रही थी. वह इतना छोटा तो नहीं कि ख़ुद मार्केट न जा सके. अब वह नौवीं में है और हर काम ख़ुद कर सकता है… वैसे भी पढ़ने और ट्यूशन में काफ़ी समय निकल जाता है. फिर क्यों वह हर समय… पर पल भर के लिए मन में आए ये विचार उसके अंदर जड़ जमाई सोच के आगे पानी के बुलबुले की मानिंद ही साबित हुए.
‘नो, मम्मी इज़ रॉन्ग’, वह बुदबुदाया.
इधर क्षितिज को समझ नहीं आ रहा था कि वह किस तरह से इस ‘हद’ को परिभाषित करे. उसने तो वही कहा था, जो आज तक वह देखता आया था. उसकी दादी, मां, बुआ, चाची, यहां तक कि बहनें और भाभी भी इसी परंपरा का निर्वाह कर संतुष्ट जीवन जी रही थीं.
‘क्या वाकई में वे संतुष्ट हैं?’ उसकी अंतरात्मा ने उसे झकझोरा. अपनी मां को पिता की तानाशाही के आगे कितनी ही बार उसने बिखरते देखा था. पिताजी के लिए तो मां की राय का न कोई महत्व था, न ही उनका वजूद था. मां जब भी कुछ कहतीं, पिताजी चिल्लाकर उन्हें चुप करा देते थे. सारी ज़िंदगी मां चूल्हे-चौके में खपती रहीं. केवल जीना है, इसीलिए जीती रहीं. अंत तक उनके चेहरे पर सुकून और संतुष्टि का कोई भाव नहीं था. मां का दुख हमेशा ही उसे दर्द देता था, फिर आज क्यों वह…
उसकी बहनों को भी पिताजी ने कभी सिर उठाकर जीने का मौक़ा नहीं दिया. न मन का पहना, न खुलकर वे हंसीं. जहां क्षितिज की हर इच्छा को वह सिर माथे लेते थे, वहीं उसकी बहनों की हर छोटी से छोटी बात में कांट-छांट कर देते थे. वे हमेशा ही डर-डर कर जीं और आज ब्याह के बाद भी उनकी दुनिया घर की देहरी के अंदर तक ही सिमट कर रह गई है. उससे छोटी हैं, पर समय से पहले ही कुम्हला गई हैं. एक वीरानी-सी छाई रहती है उनके चेहरे पर. ख़ुशी की कोई किरण तक उन तक पहुंचती होगी, ऐसा लगता नहीं.
“पापा, बुक लेने चलेंगे? इस पास वाली मार्केट में नहीं, आगे वाली में मिलेगी, वरना मैं ख़ुद ले आता.” नीरव ने उसकी तंद्रा भंग की तो वह सोच के ताने-बाने से बाहर आया.
“हां, क्यों नहीं.” क्षितिज ने उसका कंधा थपथपाया.
“यू आर ग्रेट पापा, लेकिन मम्मी तो बस… उनके पास मेरे लिए समय ही नहीं है. मैं उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं करता…” नीरव की बातें मेरे कान में पिघले हुए सीसे की भांति घुल रही थीं. एक बच्चा अपनी मां के बारे में ऐसा सोचे, इससे ज़्यादा आहत करने वाली बात और क्या हो सकती है? मेरा बेटा मुझसे दूर हो जाए, इससे तो बेहतर है कि मैं नौकरी छोड़ दूं. तभी शायद मैं उसकी उम्मीदों की मां बन सकूं.
नीरव शायद अपनी रौ में बहता ही जाता मानो मन की सारी भड़ास वह आज ही निकाल लेना चाहता हो. क्षितिज ने उसे कभी रोका भी तो नहीं, बल्कि उसके सामने मुझमें ही ग़लतियां निकालते रहते हैं. पर आशा के विपरीत क्षितिज की आवाज़ गूंजी.
“चुप रहो! अपनी मां के बारे में इस तरह बात करते तुम्हें शर्म नहीं आती? उनकी रिस्पेक्ट करना सीखो. वे तुम्हारी ख़ुशियों और इच्छाओं को पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत करती हैं. उनको जितना भी समय मिलता है, वह तुम्हारे साथ बिताती हैं और तुम हो कि…
वह दुनिया की सबसे अच्छी मां ही नहीं, पत्नी भी हैं.”
मेरी आंखों में नमी तैर गई. मैंने क्षितिज की ओर देखा. उसकी आंखों में आज पहली बार वह भाव दिखा जो जता रहा था कि वह मेरी भावनाओं की कद्र करता है. उसने मेरे हाथ को अपने हाथ में लिया तो मुझे आशवस्ति का एहसास हुआ. अपनों का विश्‍वास ही तो कठिन से कठिन परिस्थितियों से उबारने में मदद करता है.
नीरव को सिर नीचा किए खड़े देख मैंने उसके बालों को सहलाया तो वह मुझसे लिपट गया, “आई एम सॉरी मम्मी, अब मैं कभी आपसे ग़लत ढंग से बात नहीं करूंगा. आई लव
यू मम्मी.”
उस पल मुझे लगा कि गुत्थियों के जंगल से निकल मैं एक शिखर पर आ खड़ी हुई हूं , जहां सम्मान के साथ मुझे एक अच्छी पत्नी व आदर्श मां होने का दर्जा दिया जा रहा है.

Suman Bajpai

   सुमन बाजपेयी

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कहानी- प्रकृति के विरुद्ध (Short Story- Prakriti Ke Virudh)

Short Story- Prakriti Ke Virudh

 

 

“बच्चे की देखभाल का काम अब मम्मी-पापा या आया के बस का नहीं है संदीप. मां की जगह तो कोई नहीं ले सकता है. भला बच्चे के रहते मैं घर और ऑफिस दोनों में सामंजस्य कैसे बैठा पाऊंगी? मैं दोनों के साथ न्याय नहीं कर पाऊंगी.” श्रुति ने अपनी मजबूरी जताई.

 

डिंग-डांग, डिंग-डांग… डोरबेल बजती ही जा रही थी. श्रुति नींद में से उठकर झल्लाती हुई बाहर आई. दरवाज़ा खोला, तो पोस्टमैन सामने खड़ा था. अनमनी-सी उसने डाक ली और

खोलकर देखने लगी. डाक देखते ही उसके मुंह से ‘वाह!’ निकला. कंपनी के मैनेजर के जिस जॉब के लिए उसने इंटरव्यू दिया था, उसके लिए वो सिलेक्ट हो गई थी.

श्रुति ने ख़ुशी-ख़ुशी संदीप को फोन मिलाया और सिलेक्शन के बारे में बताया. उसने मम्मी-पापा, सास-ससुर, भाई-बहन, सहेलियों- सभी को सूचना दे दी और शाम को घर पर पार्टी का प्रोग्राम बन गया. सभी उससे दावत जो चाह रहे थे.

पहले इंटरव्यू में ही श्रुति ने इतनी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी पा ली थी. यह बड़े गर्व की बात थी. शादी को चार-पांच महीने ही हुए थे. श्रुति की इच्छा काम करने की थी, सो उसने संदीप को पहले ही बता दिया था. संदीप भी चाहता था कि बीवी काम करे. अपने घर में इकलौता था संदीप और श्रुति जैसी ख़ूबसूरत और बुद्धिमान पत्नी पाकर बहुत खुश था. घर के साज-संभाल से लेकर मम्मी-पापा की देखभाल, लज़ीज़ खाना बनाने तक सब कुछ श्रुति ने अच्छी तरह से संभाल रखा था.

मां तो श्रुति की अक्सर तारीफ़ ही करती रहती. आज के ज़माने में इकलौते बेटे के लिए अच्छी बहू मिल जाए, तो पैरेंट्स मानो घर बैठे गंगा नहा लेते हैं. संदीप के माता-पिता बहुत ख़ुश थे. बस, अब उन्हें इंतज़ार था दादा-दादी बनने का, लेकिन श्रुति अभी इसके लिए तैयार नहीं थी.

संदीप भी नई-नई शादी के इस मोह को ज़िम्मेदारियों से लादना नहीं चाहता था.

दोनों की गृहस्थी अच्छी चल रही थी. श्रुति को नया काम पसंद आ रहा था. ऑफिस में सभी उसकी योग्यता के कायल हो गए थे. अपने मृदु स्वभाव और व्यवहारकुशलता से श्रुति ने सभी का दिल जीत लिया था. संदीप श्रुति के साथ बहुत ख़ुश था.

दोनों सुबह ऑफिस साथ जाते थे. शाम को साथ ही आते भी थे. कुछ ही महीनों में श्रुति ने अपनी कार ख़रीद ली. अब मम्मी-पापा को कहीं ले जाना होता, तो वही ले जाती थी.

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घर के काम में तो श्रुति परफेक्ट थी ही, अब वो बाहर के काम भी करने लगी थी. वीकेंड पर दोनों अक्सर शहर से दूर किसी रिसॉर्ट पर घूम आते थे. संदीप ने पहली एनीवर्सरी पर बच्चा प्लान करने की ज़िद श्रुति से की, तो उसने ‘बहुत जल्दी है’ कहकर टाल दिया. मम्मी-पापा जब भी श्रुति के मां बनने की इच्छा जताते, तो वो हंसकर टाल देती. श्रुति कोई ऐसी बात ही नहीं करती थी कि किसी को शिकायत हो, लिहाज़ा मम्मी-पापा ज़्यादा बोल नहीं पाते.

संदीप-श्रुति की शादी को अब पांच बरस होने को आए थे. दोनों अभी भी ‘जस्ट मैरिड’ कपल ही लगते थे. बस, लोग इनके विवाह की अवधि और संतान न हो पाने को सवालिया नज़रों से देखने लगे थे अब. एक-दो दोस्तों ने तो संदीप से पूछ भी लिया कि बाप बनने की पार्टी कब देगा. कब तक मैरिज एनीवर्सरी पर ही बुलाता रहेगा.

संदीप थोड़ा चिंतित हो उठा. उसने उसी रात श्रुति से बात करने की सोची. “श्रुति आज पार्टी में सभी दोस्त पूछ रहे थे कि बाप बनने की पार्टी कब दे रहा है. सच, अब तो मेरा भी मन करता है कि कोई मुझे डैडी कहे,  अपनी छोटी-छोटी उंगलियों से मेरा हाथ पकड़े.” संदीप ने श्रुति को प्यार से निहारते हुए कहा.

“मन तो मेरा भी बहुत करता है.” श्रुति ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया. “पर सोचती हूं कि एक प्रमोशन और ले लूं. काम थोड़ा कम हो जाए, फिर बच्चे की देखभाल अच्छे से कर पाऊंगी.”

“पर दोनों साथ-साथ भी तो चल सकते हैं. घर पर मम्मी-पापा तो हैं ना, वो देख लेंगे बच्चे को. फिर हम आया भी रख सकते हैं. कहीं कोई कमी तो है नहीं.” संदीप ने समझाते हुए कहा.

“बच्चे की देखभाल का काम अब मम्मी-पापा या आया के बस का नहीं है संदीप. मां की जगह तो कोई नहीं ले सकता है. बच्चे के रहते मैं घर और ऑफिस दोनों में सामंजस्य कैसे बैठा पाऊंगी?” श्रुति ने अपनी मजबूरी जताई.

“श्रुति, सभी वर्किंग कपल्स के बच्चे होते हैं. सब कुछ मैनेज हो जाता है. अब तो मम्मी-पापा ने टोकना भी बंद कर दिया है.” संदीप नाराज़गी भरे स्वर में बोला.

श्रुति ने संदीप के गले में बांहें डाल दीं और इस बातचीत को विराम देते हुए सोने का आग्रह किया. अगले दिन सुबह ऑफिस के लिए तैयार होते हुए संदीप ने श्रुति की आंखों में झांकते हुए पूछा, “हमारे प्रपोज़ल का क्या हुआ भई?”

“अरे, अभी भी वहीं अटके हो!” श्रुति हैरान थी. दोनों हंस पड़े और अपने-अपने ऑफिस को निकल गए. श्रुति अच्छी पोस्ट मिलते ही थोड़ी महत्वाकांक्षी हो गई थी. नौकरी के कारण ही उच्च प्रतिष्ठित वर्ग में उठना-बैठना, कंपनी की तरफ़ से देश-विदेश जाना, हाई प्रोफाइल लोगों से मेल-मिलाप आदि बातें हो रही थीं. ऐसे में मां बनने पर उसे छुट्टी लेनी पड़ती और कंपनी यक़ीनन उसके काम को किसी अन्य को सौंप देती, इसलिए मां बनने के अपने निर्णय को टालती ही जा रही थी.

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उस दिन मम्मी को हार्ट अटैक आ गया. तुरंत हॉस्पिटल में एडमिट किया गया और समय पर इलाज भी हो गया, लेकिन संदीप-श्रुति घबरा से गए थे. पापा भी गुमसुम ही थे. हॉस्पिटल में बीमारी के समय मम्मी ने यह कहते हुए कि ‘मरने से पहले पोते-पोती का मुंह देख लूं, बस यही इच्छा रह गई है’ कहकर श्रुति को मां बनने के लिए बाध्य कर दिया.

संदीप-श्रुति ने बच्चा कंसीव करने की प्लानिंग कर ली. इसके लिए वे गायनाकोलॉजिस्ट के पास गए. लेडी डॉक्टर ने श्रुति का पूरी तरह से चेकअप करने के बाद कुछ और जांच करवाने के लिए कहा. तीन दिन बाद दोनों डॉक्टर के पास रिपोर्ट के साथ थे. रिपोर्ट देखने के बाद डॉक्टर ने गंभीरता से कहना शुरू किया, “सॉरी संदीपजी, आप दोनों के कुछ प्रॉब्लम्स डिटेक्ट हुए हैं. दरअसल, बढ़ती उम्र में कंसीव करने की संभावनाएं कम होती जाती हैं. कॉम्प्लीकेशन्स का भी डर लगा रहता है. शादी के इतने साल गुज़र जाने के बाद भी आप दोनों ने कोई चांस नहीं लिया, इसलिए इंफर्टिलिटी की समस्या हो गई है.” डॉक्टर कहती जा रही थी और श्रुति स्तब्ध-सी बैठी रही.

“आजकल के वर्किंग कपल्स आज़ादी में खलल, बच्चे को संभालनेवाला कोई न होना, करियर में ऊंचाई अचीव करना या ख़र्चों आदि से बचने का सहज उपाय लेट प्रेग्नेंसी को मानते हैं, जो मेडिकली ग़लत है. पैरेंट्स बनने की सही उम्र इक्कीस से चौबीस-पच्चीस है और तीस के बाद तो कई कॉम्प्लीकेशन्स हो जाते हैं. प्रकृति के भी कुछ नियम हैं. मेडिकल साइंस चाहे कितनी भी तऱक्क़ी कर ले, यदि हम प्रकृति के विरुद्ध काम करेंगे, तो नुक़सान ही उठाएंगे.” इतनी-सी  भूल की इतनी बड़ी सज़ा! संदीप भी परेशान था. डॉक्टर की आवाज़ भी उसे अब सुनाई नहीं दे रही थी.

श्रुति डॉक्टर के चेंबर में ही फफक-फफककर रोने लगी. श्रुति सोचने लगी कि आख़िर इतनी बड़ी ग़लती उससे कैसे हो गई? मां बनने की नैसर्गिक उम्र को उसने भी तो टाला था, पर अब क्या हो सकता था. उसे अपराधबोध हो रहा था कि वो कितनी स्वार्थी हो गई थी. स़िर्फ अपने बारे में सोचती रही. मम्मी-पापा और संदीप किसी की भी भावना की उसने परवाह नहीं की, यहां तक कि अपने मम्मी-पापा की भी उसने कहां सुनी थी?

श्रुति को अपनी वो सारी सहेलियां याद आ रही थीं, जिन्होंने जॉब करते हुए संतानों को जन्म दिया और उनकी परवरिश की. उनमें कहीं भी संस्कारों की कमी न थी, न ही जॉब में उन सहेलियों ने कुछ गंवाया था. श्रुति को अब लगने लगा था कि नौकरी करते हुए भी बच्चे की अच्छी परवरिश की जा सकती है. बस, ज़रूरत है घरवालों के सहयोग की, टाइम मैनेजमेंट की और क्वालिटी टाइम बच्चों के साथ बिताने की, पर अब पछताने से क्या होनेवाला था.

अगली सुबह फोन की घंटी बजी. श्रुति ने फोन उठाया. फोन पर उसकी गायनाकोलॉजिस्ट थी. “आपका इलाज संभव है. मैंने दोबारा से रिपोर्ट्स देखी हैं.” श्रुति में मानो नवजीवन का संचार हुआ. वो जल्दी से डॉक्टर के पास जाने के लिए तैयार होने लगी. उसने ठान लिया था कि इस बार वो प्रकृति के विरुद्ध नहीं जाएगी.

Poonam Mehta

       पूनम मेहता

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