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कहानी- शादी का लड्डू (Short Story- Shadi Ka Laddu)

“अम्मा, आपको याद है… जब विहान छोटा था, तो मुझे चाय पीते देख गर्म कप को पकड़ने की ज़िद करता था. एक बार झुंझलाकर मैंने उसकी नरम हथेली पर चाय का गर्म कप छुआ दिया. उसके बाद वो चाय के कप से दूर ही रहता था. ज़िम्मेदारी के बोझ को समेटे शादी का लड्डू थामना इनके बस का नहीं था, ये मैं जानती थी…”

Kahaniya

”जलपा… ए जलपा कहां हो तुम…?” मायादेवी की आवाज़ सुनकर जलपा झटपट रसोई से बाहर आ गई. पांव छूने झुकी, तो जलपा को आशीर्वाद देने की जगह वह उस पर बरस पड़ी. “ऐसे तो तुम लोग बड़े मॉडर्न बने फिरते हो… अब क्या हो गया, सारी अक्ल ताक पर रखकर बित्ते भर के लड़के की शादी करने चले हो.”

“आप को शादीवाली बात किसने बताई? अभी तो मैंने किसी को बताया ही नहीं है. और मां, बित्ते भर का नहीं रह गया है आपका पोता, मुझसे दो हाथ लंबा हो गया है.” जलपा ने अपनी सास की बात का शांतिपूर्वक जवाब दिया, तो वे अपना सिर पकड़कर बैठ गईं.

“हे भगवान… विहान नहीं बताता, तो क्या तुम लोग शादीवाले दिन बताते कि घर में गुड्डे-गुड़ियों का खेल हो रहा है.”

“मां, आप धूप में चलकर आ रही हो, पहले एक ग्लास ठंडा पानी पी लो.”

“मेरा दिमाग़ इतना गर्म है कि ठंडा होनेवाला नहीं है. कहां है मेरा विहान?…”

“पढ़ रहा है, बाद में मिल लेना.”

“रहने दे, पढ़ाई की इतनी चिंता होती, तो शादी का लड्डू ना थमाती इस उम्र में. क्या हो गया रे जलपा तेरी बुद्धि को…? सत्रह साल के लड़के की शादी… क्यों गड्ढे में ढकेल रही है?”

“मां, तुम भी तो पंद्रह साल की उम्र में ब्याहकर आई थी और बाबूजी भी अट्ठारह के थे. अपना विहान भी अपनी शादी तक अट्ठारह का हो जाएगा.”

“अरे, कुछ अच्छी बातें लेता हमारी पीढ़ी से…

पंद्रह-अट्ठारह की उम्र में शादी करके क्या सुख देखा, क्या दुनिया… कभी सोचा है.”

मायादेवीजी की आवाज़ दर्द में डूब गई थी, मानो अतीत की ओढ़ी ज़िम्मेदारियों का बोझ सहसा कंधों पर महसूस किया हो. “हमारे मां-बाप तो पुराने ज़माने के थे, पर तू ऐसी ज़्यादती कैसे कर सकती है?”

“ज़्यादती कहां अम्मा… उसकी मर्ज़ी से कर रही हूं. अब इतनी भी पुराने विचारों की नहीं हूं. प्यार करता है अपना विहान तनीशा से… शादी हो जाएगी, तो खुलकर एक-दूसरे के साथ घूमेंगे-फिरेंगे और मौज-मस्ती करेंगे. अब ऐसे में थोड़ी ज़िम्मेदारियां बढ़ेंगी, तो उसे निभाना सीखेंगे. अच्छा है जल्दी गृहस्थी बसा लें.” “प्यार…!”

मायादेवी कुछ पल के लिए जड़ खड़ी रहीं, फिर सहसा बोलीं, “हे भगवान! तू कैसी मां है? उसकी कोई उम्र है गृहस्थी और प्यार समझने की. तेरी बुद्धि को क्या हो गया है. अरे, समझा देती उसे प्यार से.

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ऊंच-नीच के बारे में बताती. अब ये क्या… कि उसकी ग़लती पर तूने शादी का दहला मार दिया. अब तू मेरा दिमाग़ गरम मत कर… मैं पहले अपने विहान से मिलना चाहती हूं.” मायादेवी विहान के कमरे की ओर लपकीं, तो अबकी बार जलपा ने रास्ता नहीं रोका. भीतर गईं, तो विहान क़िताबों में मुंह गड़ाए बैठा था. चेहरा ऐसा पीला, मानो हल्दी मल दी गई हो. हाव-भाव बता रहे थे कि मां और दादी की बातें उसके कानों में पड़ चुकी थीं.

दादी ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरा, तो वह फफक पड़ा. मायादेवी का कलेजा निचुड़-सा गया था. “हंसता-बोलता मस्त बच्चा ये शादी के पचड़े में कैसे फंस गया?” दादी की बात सुनकर विहान की सिसकियां और बढ़ गई थीं. उसकी हालत देखकर मायादेवी ने उसे गले से लगा लिया.

टूटते-फूटते शब्दों में उसके मुंह से निकला, “दादी, मैं ये शादी नहीं करना चाहता हूं. मैं अभी पढ़ना चाहता हूं… मम्मी मेरा फ्यूचर ख़राब कर देंगी.”

“ना… ना… विहान अब देख मैं तेरे साथ कैसे खड़ी होती हूं. तेरी मम्मी की ज़िद की ऐसी की तैसी…” दुलारती दादी सहसा ठिठकीं, “अच्छा, ये तो बता मम्मी की बेव़कूफ़ी में और कौन-कौन साथ दे रहा है?”

“अमिता आंटी. वो अपनी बेटी की शादी मुझसे कराना चाहती हैं.”

“तेरी अमिता आंटी की बेटी करती क्या है?” “वो पढ़ाई कर रही है, मेरी क्लास में ही है.” “पर वो बेव़कूफ़ कैसे तैयार हो गई?”

“दादी, अब तो वो भी तैयार नहीं है. सच तो ये है कि हम दोनों ही इस जंजाल में नहीं पड़ना चाहते हैं.”

“अब नहीं तैयार हैं का क्या मतलब…? क्या पहले तैयार थे. कहीं प्यारवाली बात…”

“अरे, वही तो एक ग़लती हुई है.” नज़रें चुराते विहान ने धीरे से कहा, तो दादी ने पूरी बात बताने को उकसाया… “दादी, तनीशा  मुझे अच्छी लगती थी. हम दोनों को एक-दूसरे का साथ पसंद था. इस बात को लेकर पहले मम्मी चिढ़ती भी थीं… लेकिन बाद में पता नहीं क्या हुआ, वो अचानक हमारी शादी करने को तैयार हो गईं. आप कुछ करो दादी, इस शादी से बचा लो. अभी तो मम्मी ने किसी को नहीं बताया है, पर कुछ दिनों में जब सबको पता चलेगा तो सोचो… मेरे दोस्त मुझे कितना चिढ़ाएंगे..!” विहान टकटकी लगाए अपनी दादी को देख रहा था, लेकिन मायादेवी तो किसी अंधेरे में छिपे पक्ष को देखने का प्रयास कर रही थीं.

“अरे, अम्मा बड़े मौ़के से आई हो, देखो तो  आपकी होनेवाली बहू आई है…” जलपा की तेज़ आवाज़ से मायादेवी चौंकीं, वहीं विहान का चेहरा और बुझ गया.

“विहान, ओ विहान… कहां हो बेटा, देख तेरे लिए क्या लाई हूं.” अमिता की आवाज़ सुनकर विहान ने अपने कानों में उंगली डाल ली थी. और इधर जलपा ‘मेरी बहू’ कहती हुई बैठक की ओर दौड़ी. अचानक तनीशा की तेज़ आवाज़ आई, “आंटी प्लीज़, अब ये बहू-बहू का नाटक बंद करिए.” अमिता ने तुरंत तनीशा को डांटा, “ये क्या तरीक़ा है अपनी होनेवाली सास से बात करने का…”

“ममा प्लीज़, अब आप लोग एक बात कान खोलकर सुन लीजिए, मैं कोई शादी-वादी नहीं करने जा रही हूं और यही बात बताने मैं आपके साथ आई हूं.”

“तो क्या आप लोगों ने सात जनम तक साथ निभाने की झूठी क़सम खाई थी?”

“भाड़ में गई क़सम… हम दोनों ग़लत थे, तो आप लोगों ने हमारी ग़लती सुधारने की बजाय एक नया हंगामा शुरू कर दिया.”

“बेटा, हम तो तुम्हारे सच्चे प्यार से द्रवित हो गए थे.” जलपा ने भीगे शब्दों में कहा, तो तनीशा और भड़क गई. “आंटी, आप ये फिल्मी डायलॉग मत बोलिए. अट्ठारह का विहान और लगभग उतने साल की मैं… इस उम्र में आप सच्चे प्यार की उम्मीद करती हैं. अरे, कुछ दिन हमने एक-दूसरे की कंपनी को एंजॉय किया था, बस… बच्चे ग़लत हो सकते हैं, ऐसे में आपका फ़र्ज़ था हमें सही-ग़लत समझाना, पर यहां तो आप लोग ख़ुद ही बचपना करने पर उतारू हैं. हमारी शादी… उ़फ्! सोचकर ही अजीब लग रहा है… हमारी पढ़ाई-लिखाई, सपने, करियर, पूरी ज़िंदगी इस प्यार के चक्कर में… मुझे तो प्यार शब्द सुनने से घुटन हो रही है. कोई प्यार-व्यार नहीं है हमें. अच्छी-ख़ासी पढ़ाई-लिखाई छोड़कर शादी कर लूं मैं… वो भी विहान से?”

“ओ मैडम..! ग़लती आपसे नहीं मुझसे भी हुई है… जिस उम्र में करियर पर फोकस करना था, तुम्हारी वजह से कहीं और चला गया.” दोनों के झगड़े को जहां अमिता और जलपा मुंह बाए देख रही थीं, वहीं मायादेवी ने उन्हें रोका, “बस, चुप हो जाओ तुम लोग,

तुम्हारी इस हालत का ज़िम्मेदार और कोई नहीं तुम ख़ुद हो. फोकस ध्यान से, एकाग्रता, संयम और अनुशासन से आती है, जिसे तुम लोगों ने तोड़ा…” दादी की बात से छाई चुप्पी को विहान ने तोड़ा, “दादी, इससे पहले कि मम्मी और आंटी हमारी जगहंसाई कराएं, इस क़िस्से को यहीं ख़त्म कर दो.”

“इसका मतलब है तुम दोनों दुनियावालों की वजह से अलग होना चाहते हो.”

“नहीं दादी, हम अपने अच्छे फ्यूचर के लिए अलग होना चाहते हैं. अब तो बस आप लोग हमें एग्ज़ाम की तैयारी करने दीजिए. इस चक्कर में वैसे ही बहुत समय बर्बाद हो गया है.” विहान की बात से सहमत तनीशा तुरंत बोली, “अब दस साल तक मुझे मेरे करियर को शेप देने के लिए छोड़ दो. मुझे मेडिकल के लिए तैयारी करनी होगी. सच, बड़ा ख़राब चक्कर है ये प्यार-व्यार…” तनीशा चुप हुई, तो अमिता कुछ सोचते हुए बोली, “जलपा, अगर बच्चों की यही मर्ज़ी है, तो हम कुछ दिन और…” “ओह! नो…! अब आप लोग कोई दूसरा कमिटमेंट मत कर लेना. जीवन के ऐसे डिसीज़न यूं जल्दबाज़ी में नहीं लिए जाते. इनका भी अपना एक समय और समझ होती है, जो उम्र के साथ आती है.” कहती हुई तनीशा अमिता को लगभग खींचती हुई साथ ले गई.

वो घर से क्या गई, विहान के तो ख़ुशी के मारे पंख ही निकल आए. “मैं भगवान के सामने दीया लगाती हूं.” कहती हुई मायादेवी पूजा के कमरे में चली गईं. जलपा आंखें मूंदें सोफे पर धम्म से बैठ गई. सहसा उसके होंठों से एक रहस्यमई, पर स्मित हंसी झलकी… उसके जेहन में तनीशा की बात… ‘जीवन के ऐसे डिसीज़न यूं…’ गूंज रही थी. यही बात तो उसने भी कही थी, पर उस व़क्त तो लगा था जीवन का सार उनके कानों तक पहुंचा ही नहीं था. चार-पांच महीने पहले की ही तो बात है, जब उसने विहान और तनीशा को एक साथ मोटरसाइकिल पर बैठे देखा था. साथ बैठना अजीब नहीं था, अजीब था तनीशा का उससे हद तक चिपककर बैठना. जलपा का मन निचुड़-सा गया था, पर एक दिन बड़े संकोच से अमिता ने कहा कि विहान और तनीशा के बीच कुछ चल रहा है. तनीशा ने विहान को लेकर मुझसे झूठ भी बोलना शुरू कर दिया है. अमिता की बात सुनकर जलपा के पांव तले ज़मीन खिसक गई थी. दबे शब्दों में उसने विहान को समझाया, तो वह भड़क गया. इधर अमिता के प्रति तनीशा के बागी तेवर मुखर हो गए थे. जब दोनों ने मिलकर उनको समझाने की कोशिश की, तो दोनों ने मिलकर घरवालों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया था. पढ़ाई-लिखाई ताक पर रखकर एक-दूसरे का साथ निभाने की घोषणा कर दी. उनका जोश दूध के उफान की तरह अपनी उठान पर था कि तभी जलपा ने अचानक दोनों की शादी की पेशकश की, जिसे अमिता ने मंज़ूरी दे दी. विहान और तनीशा के बागी तेवर सहसा मंद पड़ने लगे. यकायक उलझन में पड़े… कुम्हलाने लगे… अब ना तो फोन पर लंबी बातें होतीं, ना ही आपस में मैसेज का आदान-प्रदान होता.

मिलना-जुलना भी लगभग बंद था. दोनों अपने कमरों में क़िताबों में मुंह घुसाए नज़र आते. अब वे एक-दूसरे का नाम सुनकर चिढ़ने लगे थे. अमिता कहती भी थी कि विहान के साथ घूम आओ, तो तनीशा चिढ़ जाती. कमोबेश यही स्थिति विहान की भी थी और आज विस्फोट ही हो गया. एक-दूसरे से रिश्ता तोड़कर वो एक-दूसरे को देखना भी गंवारा नहीं कर रहे थे. विचारों में खोई जलपा की तंद्रा विहान ने भंग की, “मम्मी, मैं आर. के. सर के पास मैथ्स पढ़ने जा रहा हूं. आज से एक्स्ट्रा कोचिंग लूंगा.” कहता हुआ वह तेज़ी से बाहर चला गया. दरवाज़ा बंदकर वो पलटी ही थी कि मायादेवी चाय की ट्रे पकड़े खड़ी थीं. “अच्छा, अब चाय पी ले… इस दिन के लिए बड़ी मेहनत की है तुमने…” वे धीमे से मुस्काईं, तो जलपा ठठाकर हंस पड़ी, “अम्मा, आप ने जान लिया था कि हम…?”

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“अरे, ये बाल धूप की स़फेदी नहीं लिए हैं. सच बताऊं, जब विहान ने शादीवाली बात बताई, तो तू मुझे सिरफिरी लगी. सुशांत से बात की, तो वो भी तेरा समर्थन कर रहा था. तब तो मैंने अपना माथा ठोंक लिया. विहान के दादा एक हफ़्ते के लिए गांव गए थे. मुझसे तो उनके आने तक सब्र भी नहीं हुआ. सो अकेली ही चली आई. यहां जब शादी का कारण पता चला, तो माथा ठनका. विहान से बात करते ही तेरी योजना का अंदाज़ा हुआ. फिर सोचा जैसा चल रहा है, चलने देती हूं.”

“क्या करती अम्मा, विहान इस उम्र में प्यार के चक्कर में पड़ गया. हमारे समझाने, डराने-धमकाने का उलटा असर हुआ. दोनों असुरक्षित महसूस करते हुए एक-दूसरे के और क़रीब आ गए थे. ऐसे में योजना के तहत दोनों को एक-दूसरे के पास ढकेला, तो उनका सारा एडवेंचर धरा का धरा रह गया.”

“बड़ी बदमाश है रे जलपा.” अम्मा लाड़ से बोलीं. हंसते हुए जलपा बोल रही थी, “ये उम्र इंफेचुएशन को प्यार समझने की भूल करती ही है. पर विहान और तनीशा के मामले में प्यार की तीव्रता अधिक थी, सो डर गए.”

“मैं अक्सर सोचती थी कि आज की पीढ़ी क़िताबों पर ज़्यादा निर्भर है, पर मनोवैज्ञानिक तरी़के से हल हुआ मामला क़ाबिले-तारीफ़ है.” मायादेवी की बात सुन जलपा को मानो कुछ याद आया, “अम्मा, आपको याद है… जब विहान छोटा था, तो मुझे चाय पीते देख गर्म कप को पकड़ने की ज़िद करता था. एक बार झुंझलाकर मैंने उसकी नरम हथेली पर चाय का गर्म कप छुआ दिया. उसके बाद वो चाय के कप से दूर ही रहता था. ज़िम्मेदारी के बोझ को समेटे शादी का लड्डू थामना इनके बस का नहीं था ये मैं जानती थी, पर इस योजना में भी ख़तरा कम नहीं था. डर लगा रहता था कि दोनों विवाह के लिए राज़ी ना हो जाएं.”

“ऐसा मुमकिन नहीं. गर्लफ्रेंड को मोटरसाइकिल पर बैठाने से शान बढ़ती है, पर इस उम्र में बीवी को बैठाकर घुमाने की बात, ना… ना… आख़िर विहान को दोस्त-बिरादरी में मुंह दिखाना है या नहीं.”

मायादेवी के कहने के ढंग से जलपा हंस पड़ी थी. सुशांत घर आए, तो आज का सारा क़िस्सा पता चला. वे भी योजना के सफल अंत पर अपनी टिप्पणी दे रहे थे कि आग से खेलने की ज़िद करते बच्चों को आग के पास ले जाना ज़रूरी होता है, ताकि आंच का अंदाज़ा लगाकर आनेवाले ख़तरे को समझें. “जो हुआ सो हुआ… अब इस घर में विहान की पढ़ाई के अलावा और कोई बात नहीं होगी.”

मायादेवी एक हफ़्ता रुककर विहान के पढ़ाई के प्रति समर्पण और एकाग्रता को देख उसे ढेरों शुभकामनाएं देकर वापस चली गई थीं. इसी बीच अलका ने फोन पर बताया कि तनीशा ने विहान के नाम से तौबा कर ली है, वो पूरी तरह से अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित कर रही है. जो बच्चे कल तक अपने वर्तमान और भविष्य के साथ खेल रहे थे, वो अपने आज और उज्ज्वल कल के प्रति पूरी तरह समर्पित थे और उनका साथ देने के लिए हर पल प्रहरी की तरह खड़े उनके माता-पिता एक बार फिर उन्हें सधे क़दमों से चलते देख सुकून से भरे थे.

Meenu Tripathi

         मीनू त्रिपाठी

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कहानी- एक ख़ूबसूरत मोड़ (Short Story- Ek Khoobsurat Mod)

उससे संपर्क करने के बाद ही मैंने जाना कि पुरुष का वासनापूर्ण रूप ही होता है, यह हमारी पूरी पुरुष जाति के लिए अवधारणा है, तो ग़लत है. वापस लौटते समय सुनील का शरीर मुझसे दूर हो गया, साथ आया तो स़िर्फ एक एहसास मानो उसका शरीर नश्‍वर है और एहसास रूपी आत्मा अमर है, जो हर समय मेरे साथ रहेगा. यह एहसास कि कोई मुझे शिद्दत से चाहता है और मुझे ख़ुश देखना चाहता है, काफ़ी है जीने के लिए.

Short Story

जादू-सा असर किया मोबाइल के स्क्रीन पर लिखे सुनील के गाने की एक लाइन ने. उसने बिना कुछ कहे ही सब कुछ कह दिया. वह कुछ भी तो भूला नहीं था. हमारी 15 दिनों की मुलाक़ात में वह गाना ही तो था, जो गुनगुनाते हुए वह अपने सारे ज़ज़्बात व्यक्त कर देता था और मैंने भी उस गाने के अर्थ में स्वयं को तलाशते हुए, शब्दहीन, अपने हाव-भाव से उसका मौन निमंत्रण स्वीकार कर लिया था.

तीस साल बाद अचानक सोशल मीडिया पर उसका नाम और औपचारिकतापूर्ण संदेश- ‘हैलो पूजा! कैसी हो?’ ने तो मेरे मन में पहले ही तूफ़ान पैदा कर दिया था. परिस्थितियों और समय की मोटी चादर के तले दबकर उसका अस्तित्व ही मेरे लिए समाप्त हो चुका था. कहते हैं न कि रख-रखाव न किया जाए, तो महल भी खंडहर बन जाता है, फिर वह अल्हड़ उम्र ही ऐसी थी, जिसमें न कोई भविष्य के सपने होते हैं, न कोई वादे होते हैं. बस, किसी की मूक प्रशंसाभरी आंखों से

साक्षात्कार होने मात्र से इतना ख़ूबसूरत एहसास होता है कि मन रंगीन सपने सजाने लगता है. समय बहुत बलवान है, जो अच्छी-बुरी सभी यादों को भुलाने के लिए मरहम का काम करता है. लेकिन इस नए टेक्नोलॉजी ने तो मेरे अतीत को साक्षात् सामने लाकर खड़ा कर दिया था. शांत समंदर में झंझावात पैदा कर दिया था.

यह मेरे लिए अभिशाप है या वरदान, सोच में पड़ गई थी. वर्तमान परिस्थितियों के कारण इसका अब कोई औचित्य ही दिखाई नहीं दे रहा था. यह मन को उद्वेलित करके बेचैन ही करेगा.

आरंभ में औपचारिकतापूर्ण बातचीत से पता चला कि वह भोपाल में और मैं मुंबई में अपने-अपने परिवार के साथ जीवन बिता रहे हैं. फिर अचानक एक दिन मोबाइल के स्क्रीन पर उस गाने की लाइन पढ़कर मेरे मन की स्थिति बिल्कुल वैसी ही हो गई थी. जैसी उसकी आंखों में पहली बार मूक प्रेम निवेदन देखकर हुई थी. तो क्या वह कुछ भी नहीं भूला अब तक? उसके गाने की लाइन के प्रतिक्रियास्वरूप मैं तीस साल पहले की अव्यक्त भावनाओं में अपने को बहने से रोक नहीं पाई और उनको व्यक्त करने के लिए जवाब देने के लिए मजबूर हो गई.

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मैंने लिखा- ‘तो क्या तुम्हें सब कुछ याद है… परिस्थितियां अनुकूल नहीं हैं, लेकिन हम दोस्त बनकर बातें तो कर सकते हैं. हम दोनों ही अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हैं, इसलिए हमारे रिश्ते के इस नए मोड़ से हमारे अपने परिवारों के प्रति हमारे कर्त्तव्यों का हनन तो होगा नहीं, बल्कि उम्र के इस पड़ाव में जो खालीपन आ गया है, वह भर जाएगा. वैसे भी तुम्हारी भरपाई कभी हो नहीं पाई, वह दिल का कोना सूना ही है…’ मैसेज भेजते ही मुझे अजीब-सी ग्लानि होने लगी. यह मैंने क्या कर डाला! उसने तो स़िर्फ एक गाने की लाइन लिखी थी. उसके पीछे उसका अभिप्राय क्या था, यह जाने बिना ही मैंने क्या कुछ लिख डाला…

इतने वर्षों में उसके व्यक्तित्व में क्या बदलाव आया होगा? कैसी उसकी सोच होगी? क्या सोचेगा वह पढ़कर? एक शादीशुदा महिला भी शादी के बाद परपुरुष से संबंध रखना चाहती है. हां, परपुरुष ही तो था, केवल 15 दिनों की औपचारिक मुलाक़ात और उसके बाद इतने वर्षों का अंतराल किसी आत्मीय रिश्ते की ओर तो इंगित करता नहीं है. वैसे भी पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं की इतनी बेबाक़ी को निर्लज्जता का दर्जा ही दिया जाता है, ख़ासकर उस ज़माने में, जब हम मिले थे. हमारे संस्कार तो यही कहते थे.

काश! कोई ऐसा बटन भी होता, जिसे प्रेस करने से भेजा हुआ संदेश भी डिलीट हो जाता. अपने स्क्रीन पर तो घबराकर तुरंत डिलीट कर ही दिया था. उसका जवाब आने के बाद मेरी आत्मग्लानि और बढ़ गई. उसका जवाब था- ‘मैं आपसे स़िर्फ दोस्ती चाहता हूं, इतना इमोशनल होना ठीक नहीं है…’ मैंने प्रत्युत्तर में लिखा- ‘मुझे थोड़ा समय चाहिए…’

मन बड़ा खिन्न हो गया था. मैं सब कुछ भूल चुकी थी. अपने नीरस वैवाहिक जीवन के साथ समझौता कर चुकी थी. फिर यह सब क्यों? और उम्र के उस पड़ाव पर थी, जब शारीरिक शक्ति क्षीण हो जाती है. बस, स्वस्थ रहने के लिए मानसिक ख़ुशी मिलने के लिए मनुष्य भटकता है और जहां कहीं थोड़ा प्यार मिलता है, वहीं जाना चाहता है अर्थात् अल्हड़ उम्र की और इस उम्र की ज़िम्मेदारी मुक्त मानसिक स्थिति और आवश्यकताओं में विशेष अंतर नहीं होता.

मेरा मानना था कि प्यार कभी दोस्ती में परिवर्तित नहीं हो सकता. दोस्ती और प्यार के बीच सीमा रेखा खींचना असंभव है. मैंने मन ही मन तय कर लिया कि अपनी भावनाओं पर पूरी तरह कंट्रोल रखूंगी और उसके सामने उजागर नहीं होने दूंगी, लेकिन औपचारिक चैटिंग करते हुए मन होता कि थोड़ा तो वह रोमांटिक बात लिखे. उसके हर वाक्य में अपने मनोकूल अर्थ ढूंढ़ती रहती. और कभी-कभी असफल होने पर अतृप्त मन उदास हो जाता और असुरक्षा की भावना से घिर जाती कि पहले की तरह यह रिश्ता अस्थाई तो नहीं है. और यदि निभेगा भी, तो प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण कैसे निभेगा?

मैं चैटिंग से ही संतुष्ट रहना चाहती थी, लेकिन मेरी आवाज़ सुनने के उसके प्रस्ताव के सम्मोहन से ख़ुद को वंचित नहीं रख सकी. फोन करते ही मेरा पहला वाक्य था, “क्या अब तक याद हू मैं तुम्हें?”

“याद उसे किया जाता है, जिसे भुला दिया गया हो. मैं तो तुम्हें कभी भूला ही नहीं. तुम्हारी यादों के साथ जीना सीख लिया था. लगा ही नहीं तुम कभी मुझसे दूर हो…” इस तरह हमारी मूक यादों को उसने और मैंने शब्दों का जामा पहनाया.

समय ने हमारी भावनाओं को रत्तीभर भी नहीं बदला था, लेकिन परिस्थितियों ने हमारी ज़ुबान को संयमित शब्दों का चयन करने की ही अनुमति दी थी, इसलिए शब्दों को संभालकर बोल रही थी, जिससे दोस्ती की परिधि में ही रहूं. कितना मुश्किल था तब, जब उम्र ही ऐसी थी कि अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए शब्दों का ज्ञान अधूरा था और अब अपार ज्ञान होते हुए भी अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं है.

बात समाप्त करने के बाद भी एक अधूरी प्यास से मन व्याकुल रहता था. लेकिन मैं उसे खोना नहीं चाहती थी और मन ही मन भगवान पर निर्णय की ज़िम्मेदारी छोड़ दी थी. उससे मिलने में मेरा तो कोई प्रयास था नहीं, यह सब तो ईश्‍वर की ही योजना थी. कहते हैं, जीवन में किसी के मिलने के पीछे भी कोई उद्देश्य होता है, शायद मेरे प्यार के लिए भटकते, वैरागी, निश्छल मन को सहारा देने के लिए ही भगवान ने उसे मुझसे मिलवाया था.

इतना तो मैं विगत 15 दिनों की मुलाक़ात में जान गई थी कि वह हमारे मूक प्रेम के लिए बहुत गंभीर है. लेकिन हमारा सामाजिक रिश्ता ऐसा है, जिसके कारण इसका कोई भविष्य नहीं था. उससे बात करके यह भी पता चल गया कि मेरे लिखे एक पत्र के उनके बड़े भाई के हस्तगत होते ही हमारे पत्र-व्यवहार पर पूर्ण विराम लगा दिया गया था और मैं भी उसके पत्र के न आने के कारण को जाने बिना ही अपनी शादी के पहले उन पत्रों को भूमिगत कर आई और हमेशा के लिए इस रिश्ते को धराशाई कर दिया था. लेकिन बादलों में जिस प्रकार बिजली चमककर अपने अस्तित्व की याद दिलाती है, उसी प्रकार वह भी अपनी धूमिल-सी उपस्थिति मेरे मानस पटल पर कभी-कभी दिखा देता था, फिर बादल छंटने के साथ सब एकसार हो जाता था.

हर दूसरे दिन बातें होने लगीं. उसके लिए समय निश्‍चित किया गया. फोन आने के पहले तो अजीब-सी बेचैनी रहती ही थी, फोन करते समय अजब-सा रोमांच का अनुभव होता था. ऐसी जगह जाकर बात करती थी, जहां कोई नहीं देखे. एक अपराध भावना घेरे रहती. सोचती ऐसा कौन-सा पाप कर रही हूं, जो पति से छिपाकर करना पड़ रहा है. बात ही तो कर रही हूं… यह कैसा रिश्ता है, जो इतना पवित्र होते हुए भी, विवाह के बाद अनैतिक माना जाता है.

हम कृष्ण के राधा के साथ अलौकिक प्रेम की गाथा गाते-गाते नहीं थकते. सारा वृंदावन नगरी राधा के नाम से गूंजता रहता है और लौकिक प्रेम को व्यभिचार मानते हैं. यह कैसी दोहरी मानसिकता है? क्या विवाह के समय लिए गए सात वचन मनुष्य को सब ख़ुशी दे देते हैं, जो इस अनाम रिश्ते से मिलती है? क्या विवाह एक बेड़ी नहीं है? क्या जीने के लिए आर्थिक और शारीरिक सुरक्षा के

साथ-साथ भावनात्मक सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है? जो अधिकतर वैवाहिक जीवन में अस्तित्वहीन है.

पति हमारी भावना न समझे, बावजूद उसके साथ हम घुट-घुटकर जीने पर मजबूर हो जाते हैं. क्या जीवन सांसें पूरी करने का नाम है? यह समाज द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा मानसिक शोषण ही तो है. यह आक्रोश ‘सिलसिला’ मूवी में अमिताभ बच्चन द्वारा बोले गए शब्दों में साफ़ उजागर होता है- ‘दिल कहता है, दुनिया की हर एक रस्म उठा दें, दीवार जो हम दोनों में  है, आज गिरा  दें… क्यों दिल में सुलगते रहें, दुनिया को बता दें… हां, हमको मुहब्बत है…’ यह कैसा रिश्ता है, जो जीवनदायिनी होकर भी असामाजिक कहलाता है.

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जब भी फोन से उससे बात होती थी, मैं तो उसकी बातों के बयार में बहती रहती थी. वही याद दिलाता था कि आज की मुलाक़ात, बस इतनी ही. एक बार उसका फोन निश्‍चित समय पर नहीं आया. मन अजीब आशंकाओं से भर गया कि कहीं उसकी पत्नी ने हमारी बात सुनकर हमारी बातचीत पर पूर्ण विराम तो नहीं लगा दिया? बाद में बात करने से पता लगा कि वह व्यस्त था. इसकी कई बार पुनरावृत्ति होने लगी. मन असुरक्षित रिश्ते के संदेह से घिरने लगा.

फिर धीरे-धीरे बात करने का अंतराल बढ़ने लगा, तो इसका कारण पूछने पर उसने मुझे समझाया. “हमारे रिश्ते में यही ठीक है. बातें तो अंतहीन हैं. मैं चाहता हूं कि हमारी भावनाएं इतनी नॉर्मल हो जाएं कि रिश्ते में बेचैनी ही न रहे.” पहले तो मुझे उसकी बात अटपटी लगी, लेकिन धीरे-धीरे उसके फोन आने का इंतज़ार ही कम होने लगा और जीवन व्यवस्थित-सा हो गया. यह स्थिति ठीक वैसी ही थी, जब प्यार या शादी के आरंभिक दिनों की रूमानियत धीरे-धीरे समाप्त होकर जीवन सामान्य हो जाता है. रिश्ते की तपिश धीरे-धीरे भीषण ग्रीष्म ऋतु में पहली बरसात की सोंधी ख़ुशबू के साथ ठंडक प्रदान करती है. ये बहुत ही सुखद एहसास था, जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता.

हम दोनों ही जीवन के इस पड़ाव में एक-दूसरे में आए बदलाव को एक बार मिलकर देखना चाहते थे. ‘जहां चाह वहां राह’ वाली कहावत चरितार्थ हुई और एक पारिवारिक समारोह में उसके शहर में अपने पति के साथ जाकर उससे मिलने का मौक़ा मिला. उसके परिवारवाले हमारे इस रिश्ते के बारे में जानते थे, फिर भी उसने मुझे अपने घर आने का निमंत्रण देकर हमारे इस बेनाम रिश्ते पर मुहर लगा दी, तो मुझे सुखद आश्‍चर्य हुआ और यह सोचकर गर्व हुआ कि मैं उसके लिए आज भी विशेष स्थान रखती हूं.

उसने रास्ते में रखे दीये को मंदिर में रखे दीये का स्थान दे दिया था. उसके घर में मुश्किल से एक घंटे की सामूहिक मुलाक़ात में हम तटस्थ रहने का नाटक तो कर रहे थे, लेकिन मूक भाषा का दिल ही दिल में आदान-प्रदान भी चल रहा था. उसकी सुखी गृहस्थी को देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई. इस रिश्ते के इतना सुंदर और सुलझे हुए स्वरूप का पूरा श्रेय उसे जाता है. मैं तो एक समंदर के समान थी, जिसका बांध अचानक खोल देने पर वह निर्बाध गति से बहने के लिए व्याकुल हो गया था. उसके बहाव को कंट्रोल उसी ने किया, क्योंकि अति का परिणाम तबाही ही होता है. उससे संपर्क करने के बाद ही मैंने जाना कि पुरुष का वासनापूर्ण रूप ही होता है, यह हमारी पूरी पुरुष जाति के लिए अवधारणा है, तो ग़लत है.

वापस लौटते समय सुनील का शरीर मुझसे दूर हो गया, साथ आया तो स़िर्फ एक एहसास मानो उसका शरीर नश्‍वर है और एहसास रूपी आत्मा अमर है, जो हर समय मेरे साथ रहेगा. यह एहसास कि कोई मुझे शिद्दत से चाहता है और मुझे ख़ुश देखना चाहता है, काफ़ी है जीने के लिए. शायर साहिर लुधियानवी ने ऐसे रिश्ते को बेहद ख़ूबसूरती से परिभाषित किया है- ‘वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा…’ आज के विकसित टेक्नोलॉजी के संदर्भ में जब संपर्क के इतने साधन हैं, तो स्त्री-पुरुष के रिश्ते में ज़माने की सोच में आए बदलाव के कारण इसकी परिभाषा को परिवर्तित किया जा सकता है. छोड़ना के स्थान पर यदि हम जोड़ना लिखें तो यह रिश्ता सार्थक होगा.

Sudha Kasera

       सुधा कसेरा

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कहानी- रेशमी गांठ (Short Story- Reshmi Ganth)

“ओ मां! अपने घर के कामों को, ज़िम्मेदारियों को खटना नहीं कहते और अगर तुम अपनी बेटी के लिए ऐसी सोच रखती हो, तो फिर एक बार ये भी सोचो कि भाभी भी इस घर के लिए तुम्हारे हिसाब से ‘खट’ ही रही हैं. तुम्हारे मन में भाभी के लिए कभी हमदर्दी क्यों नहीं जागती?”

Kahaniya

 

इस बार मायके आई हुई ईरा बहुत ख़ुश और उत्साह से भरी हुई थी. राखी पर तो वह लगभग हर साल मायके आती है और भाई दूज पर अपनी ननदों को अपने घर बुलाती है. इस तरह वो भी ख़ुश, उसके पति और ननदें भी ख़ुश.

राखी का त्योहार उसे बचपन से ही विशेष प्रिय रहा है. छोटी-सी थी जब पिताजी की गोद में चढ़कर राखी ख़रीदने बाज़ार जाती थी और ढेर सारी दुकानें ढूंढ़कर एक बहुत बड़ी-सी रंग-बिरंगी फूल-पत्तियोंवाली राखी ख़रीदती थी. अपना सारा प्यार वह राखी के आकार के साथ भइया की कलाई पर बांध देना चाहती थी. तब यही लगता था कि जितनी बड़ी राखी होगी, भइया को लगेगा कि ईरा उनसे उतना ही अधिक प्यार करती है. गोया राखी न हो, बहन के प्यार का नाप हो. तभी ईरा बाज़ार से सबसे बड़ी राखी छांटकर लाती थी और भइया था कि ‘इत्ती बड़ी राखी’ को देखकर मुंह बिचकाता, “ये क्या उठा लाई है? मेरे सारे दोस्त फिर शाम को मुझ पर हंसते हैं. कोई छोटी राखी नहीं मिली इसे?”

तब मां बहुत समझा-बुझाकर उसे शांत करतीं, “अरे, अभी छोटी है इसलिए. थोड़ी समझदार हो जाएगी, तब थोड़े ही इतनी बड़ी राखी बांधेगी.”

ईरा को अब भी याद है स्पंज के फूलों की परतों पर रंग-बिरंगी पन्नियों और चमकीले सितारे लगे वो पांच रुपयेवाली राखियां. कितना नेह भरा होता था उनमें. दूसरे दिन ईरा भइया के नहाने से पहले वो राखी उनकी कलाई से उतरवा लेती थी और फिर वह राखी उसके निजी ख़ज़ाने में जमा हो जाती थी. सालभर तक वह उसे संभालकर रखती. कभी अपनी कलाई पर बांधकर ख़ुश होती, तो कभी माथे पर रखकर अपने रूप पर ख़ुद ही रीझ जाती, मानो कहीं की महारानी हो.

प्यार के रेशमी धागों में बंधता-लिपटता बचपन फिर सयानेपन की ओर बढ़ चला. भइया उसकी राखी पूरे साल अपने हाथ पर बांधे रखता, तो अब राखी की सुंदरता की जगह उसकी मज़बूती प्रमुख हो गई. लेकिन रिश्ते वैसे ही सुंदर बने रहे, जैसे वो बचपन की राखी सुंदर हुआ करती थी. भाभी के आने के बाद उस राखी में मज़बूती का एक धागा और सुंदरता का एक नग और जुड़ गया.

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और इस बार तो लता बुआ भी आ रही हैं राखी पर, तो सोने पे सुहागा. कितने बरस हो गए बुआ से मिले. बचपन में कितना खेली है वो बुआ की गोद में. मां की तरह ही बुआ ने उसे संभाला था. वो 10 बरस की थी जब बुआ की शादी हो गई थी. कितना रोई थी तब ईरा, तबीयत ख़राब कर ली थी उसने अपनी. बुआ मायके कम ही आती थीं. एक तो वैसे भी मायका मां से होता है और दादी तो ईरा के जन्म के कुछ वर्ष बाद चल बसी थीं.

दादाजी तो और भी पहले चले गए थे. विवाह होते ही मां पर एक मानसिक दबाव हमेशा ही बना रहा था कि बुआ के विवाह की ज़िम्मेदारी एक अनचाहे बोझ की तरह उन्हें ही उठानी है. जैसे-तैसे उन्हें पढ़ा-लिखाकर उनका विवाह करके मानो मां ने चैन की सांस ली और पल्ला झटक लिया. कभी राखी, भाई दूज पर उन्हें बुलाने की बात भी नहीं उठाने देतीं घर में. भइया के विवाह पर बुआ आई थीं कुछ दिनों के लिए बस. लेकिन ईरा को हर छुट्टियों में बुआ बहुत आग्रह से अपने घर

बुलवातीं और उतने ही प्यार से रखतीं. उनके स्वयं के बच्चे हो जाने के बाद भी ईरा के प्रति उनके प्यार में किंचित मात्र फ़र्क़ नहीं आया था.

ईरा जब समझदार हुई, तब से उसे मां का व्यवहार कचोटने लगा. बुआ का क्या कभी मन नहीं करता होगा मायके, अपने जन्म स्थान आने का? अपने बच्चों को मामा के घर भेजने का? ससुराल में जब सब उनसे मायके जाने के बारे में पूछते होंगे, तब कैसा लगता होगा बुआ को. इसलिए उसने इस बार पिताजी पर बहुत दबाव बनाया और ख़ुद भी मां से बहुत आग्रहपूर्वक बुआ को राखी पर बुलाने को राज़ी किया. मां को पता नहीं क्यों हर बार इस बात का डर लगा रहता कि बुआ को बुलाया, तो उन्हें लेना-देना पड़ेगा. पहले ही उनके ब्याह का ख़र्च मां को ही करना पड़ा है और अब तीज-त्योहार पर फिर ख़र्चा. ईरा को मां की छोटी सोच और मानसिकता पर दुख होता, लेकिन कुछ बोल नहीं पाती. मां कैसे रिश्तों को पैसों में तोल पाती हैं, वो भी एक बेटी के उसके मायके के साथ रिश्ते को…

बुआ के आने में अभी एक दिन बाकी था. ईरा ने भाभी को रसोईघर में खाना और मिठाइयां बनवाने में पूरी मदद की, ताकि भाभी पर काम का अतिरिक्त बोझ न पड़े और उनके साथ ईरा समय भी व्यतीत कर ले. दोनों हंसी-मज़ाक और बातें कर रही थीं. मां हर थोड़ी देर बाद किसी-न-किसी बहाने से उसे आवाज़ देकर बुला रही थीं. ईरा समझ गई कि मां नहीं चाहती हैं कि वह रसोई में भाभी की मदद करे. ईरा को कोफ़्त हो आई मां की सोच पर. मां की मंशा समझकर भाभी का भी मुंह उतर गया. पर ईरा ने मां की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया और वो भाभी के साथ काम करवाती रही.

दोपहर में खाने वगैरह से फुर्सत पाकर ईरा फिर आराम से मां के पास बैठी.

“तुझे क्या ज़रूरत है खटने की. दो दिन के लिए ही तो आई है. ईशिता कर लेती काम.” मां ने छूटते ही डांट लगाई.

“तो क्या हुआ मां दोनों ने मिलकर किया, तो काम भी जल्दी निबट गया. थोड़ा आराम भाभी भी कर लेंगी. इसी बहाने ननद-भाभी थोड़ी गपशप भी कर लेती हैं.” ईरा बोली.

“अरे, तुझे घर में तो खटना ही पड़ता है और यहां भी…” मां आगे कुछ बोलतीं, इससे पहले ही ईरा बोल पड़ी-

“ओ मां! अपने घर के कामों को, ज़िम्मेदारियों को खटना नहीं कहते और अगर तुम अपनी बेटी के लिए ऐसी सोच रखती हो, तो फिर एक बार ये भी सोचो कि भाभी भी इस घर के लिए तुम्हारे हिसाब से ‘खट’ ही रही हैं. तुम्हारे मन में भाभी के लिए कभी हमदर्दी क्यों नहीं जागती? तुम्हें कभी उनके लिए यह क्यों नहीं लगता कि वह बेचारी भी ‘खट’ रही है इस घर में. बेटियां काम करें, तो मांओं को लगता है कि बेचारी खट रही है, लेकिन बहू कितना भी काम करे, तो सास को वह हमेशा ़फुर्सत में ही बैठी लगती है. कहेंगी- यह तो उसका काम ही है. औरतों में बैठी इस सास और मां के अलग-अलग होने के कारण ही रिश्ते तनावपूर्ण हो जाते हैं. जिस दिन औरत निष्पक्ष रूप से स़िर्फ ‘स्त्री’ होकर ‘स्त्री’ को देखेगी, उस दिन दुनिया की सारी बहुएं, बेटियां, भाभियां और ननदें सुखी हो जाएंगी.”

मां अवाक् होकर सुनती रह गईं. उन्हें ईरा से ऐेसे प्रत्युत्तर की कतई आशा नहीं थी. उस समय उन्होंने चुप रहना ही उचित समझा.

शाम को भी घर के काम निबटाने में ईरा ने भाभी की मदद की और फिर उन्हें साथ लेकर बाज़ार चली गई और सबके लिए ढेर सारे उपहार ख़रीद लाई. मां, बुआ, भाभी के लिए साड़ियां, पापा और भइया के लिए कुर्ता-पायजामा,

रिंकी-ऋषि के लिए कपड़े, खिलौने, मिठाइयां. पिताजी और भाई-भाभी पास ही थे, इसलिए मां उस समय तो कुछ नहीं बोलीं, लेकिन ईरा मां के चेहरे के भाव देखकर समझ गई कि उनको बुआ के लिए भी समान क़ीमत की साड़ी लाना अच्छा नहीं लगा है. लेकिन ईरा इस बार कुछ ठानकर ही मायके आई थी. तीन साल हो गए उसकी शादी को, वह हक़ से अपने मायके आती है, तो बुआ क्यों नहीं?

ईरा आई थी, तो पिताजी बाहर तख़्त पर सो जाते थे और ईरा कमरे में मां के साथ. रात के खाने-पीने से निबटकर थोड़ी देर सबने बैठकर बातें की, फिर सब सोने चले गए. मां और ईरा भी अपने कमरे में आ गईं. आते ही मां ने अंदर से कुंडी लगा दी. फिर उन्होंने अपना लॉकर खोला और एक बड़ी-सी थैली निकालकर पलंग पर बैठ गईं. थैली खोलकर मां ने उसमें से कई छोटे-बड़े डिब्बे-डिब्बियां निकालीं. ईरा को पता था कि इसमें मां का सारा सोने-चांदी का सामान रखा था. मां ने दो जड़ाऊ कंगन बाहर निकाले. ईरा पहचान गई, यह उसकी दादी के कंगन थे. दोनों कंगन मिलाकर कम-से-कम 15 तोले के होंगे.

“मैं चाहती हूं कि अब ये कंगन तू रख ले.” मां ने ईरा के हाथों में कंगन थमाते हुए कहा, “इससे पहले की कोई और इन्हें झपट ले…”

“मगर क्यों मां? ये कंगन तो दादी के हैं न?” ईरा चौंककर बोली.

मगर तब तक मां थैली में दूसरी चीज़ें ढूंढ़ने लगीं और साथ ही मां का बड़बड़ाना भी शुरू हो गया.

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“ब्याह करने के बाद भी चैन नहीं है. उम्रभर इनके तीज-त्योहारों पर भी घर भरते रहो. ब्याह कर दिया भाई ने तब भी पिंड नहीं छूटा. अब भी मुक्ति नहीं है हमें. मां-बाबूजी ख़ुद तो चले गए, लेकिन हमें बांध दिया इस जंजाल में. घर पर बुलाकर इनकी ख़ातिरदारी भी करो और विदा करते समय इनकी ख़ातिर लुट भी जाओ. ये बहनें भी भाई के गले टंगी रहती हैं उम्रभर.”

ईरा को याद आया जब बुआ के यहां जाती थी, तो कितने प्यार से, चाव से कितना कुछ ख़रीदकर देती थीं वो उसे- कपड़े, खिलौने,  लेकिन उनके बेटों के लिए मां ने कभी कुछ नहीं भेजा. न कभी घर बुलाया छुट्टियों में. उन्हें पता ही नहीं कि मामा का घर कैसा होता है? चांदी की मामूली चीज़ देने का भी मां का मन नहीं हुआ, तो आलमारी में उपहार में आई हुईं साड़ियां छांटने लगीं मां बुआ को देने के लिए, लेकिन ईरा का चेहरा अचानक ही मुरझा-सा गया. वह अनायास ही बुआ के साथ अपनी तुलना करने लगी. दोनों ही तो इस घर की बेटियां हैं. आज मां बुआ को लेने-देने पर इतना मन ख़राब कर रही हैं, कल को भाभी भी ईरा के लिए… साड़ियां छांटती मां की नज़र अचानक ईरा पर पड़ी, “अरे, तुझे क्या हुआ? ऐसा मुंह क्यों उतर आया अचानक?”

मां तुम मेरे ही सामने बुआ के प्रति कैसी सोच और कैसी बातें कर रही हो? एक बार भी नहीं सोचा कि जैसे मैं इस घर की बेटी हूं, वो भी इस घर की बेटी हैं. अगर बुआ के प्रति तुम्हारी सोच ऐसी है, तो कल को भइया-भाभी भी मेरे साथ ऐसा ही करेंगे, तो उनकी कोई ग़लती नहीं होगी न? क्योंकि यदि तुम बुआ को कोसती हो, तो भाभी को भी तो पूरा हक़ है मेरे आने को कोसने का, मायके नहीं बुलाने का.” ईरा का गला भर आया, आंखें डबडबा आईं.

“अब तो मुझे भी यहां आने के लिए सोचना पड़ेगा.”

मां हाथ में साड़ी थामे सन्न-सी बैठी रह गईं. ये तो उन्होंने सोचा ही नहीं कि उनकी अपनी बेटी यह बात ख़ुद पर लेकर दुखी हो जाएगी.

“तुम शुरू से ही बुआ के प्रति जैसा व्यवहार कर रही हो, भविष्य में भाभी के मन में भी मेरे प्रति वैसा ही व्यवहार करने का बीज बो रही हो. क्योंकि वो देख रही हैं कि इस घर में ननद का सम्मान और प्रेम कितना और कैसा होता है.” ईरा हाथ के कंगनों की तरफ़ देखते हुए बोली, “ये दादी के पुश्तैनी कंगन हैं, वो चाहतीं तो तुम्हारी तरह ही चुपचाप बुआ को दे सकती थीं, लेकिन उन्होंने घर की बहू पर भरोसा किया और तुम्हारा मान रखा.”

“भाई-बहन का रिश्ता तो वैसे भी रेशम की तरह नाज़ुक होता है और मां बांधने के लिए उसमें पहले ही गांठ लगानी पड़ती है, तो जिस रिश्ते में पहले ही गांठ लगी हो, तो उसमें और खिंचाव क्यों पैदा करना. ये कंगन भाभी ने तुम्हारे पास देखे हुए हैं. कल को उन्होंने इसके बारे में पूछा, तो क्या जवाब दोगी. मायका मां से होता है और उसके बाद भाई-भाभी से. अपने व्यवहार की वजह से मेरा मायका मत छुड़ाओ मां. मैं इस घर का इतिहास दोहराना नहीं चाहती. बुआ को सम्मान दो, तभी तुम्हारी बहू मुझे सम्मान देना सीखेगी. जब बुआ के बच्चों को प्रेम से अपने घर रहने के लिए बुलाओगी, तभी भविष्य में इस घर में मेरे बच्चे भी अधिकार से आकर रह पाएंगे. भगवान के लिए एक ही घर की दो बेटियों के लिए अलग-अलग व्यवहार मत करो.” ईरा ने कंगन वापस मां के हाथों में थमा दिए.

दूसरे दिन सुबह-सवेरे ही बुआ आ गईं. सालों बाद अपना घर देखने की ख़ुशी उनके चेहरे पर सहज दिख रही थी. कितना कुछ लेकर आई थीं सबके लिए. एक-से-एक महंगी वस्तुएं और उन सबसे ऊपर सबके लिए अनमोल व अपार स्नेह. पिताजी भी कितने ख़ुश लग रहे थे.

नहा-धोकर पिताजी और भइया राखी बंधवाने बैठे. राखी बंधवाने के बाद भइया ने ईरा के सर पर स्नेह से हाथ फेरकर उपहार दिया. पिताजी सकुचाए से खड़े रहे. तभी मां ने एक क़ीमती साड़ी पिताजी को दी बुआ को देने के लिए. फिर मां ने दादी के जड़ाऊ कंगन में से एक-एक कंगन बुआ और भाभी को दिए.

“ये मांजी के कंगन हैं. इन पर अब तुम दोनों का हक़ है. ये मांजी के आशीर्वाद स्वरूप उनके बेटे और बेटी दोनों के वंश में रहेंगे.” बुआ की आंखें इस स्नेह से भीग गईं. मां ने उन्हें गले लगा लिया.

ईरा ने ईश्‍वर को प्रणाम किया. ये रेशमी रिश्ते अब प्यार की गांठ में बंधकर हमेशा मज़बूत रहेंगे.

Dr. Vinita Rahurikar

डॉ. विनीता राहुरीकर

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कहानी- जहां न पहुंचे रवि… (Short Story- Jahan N Pahunache Ravi…)

मैं स्तब्ध खड़ी रह गई थी. मेरा बुद्धिजीवी तार्किक मस्तिष्क संज्ञाशून्य हो गया था. तकनीक और विज्ञान हमें चांद-सूरज पर पहुंचा सकता है, पर किसी के दिल तक पहुंचने के लिए तो एक संवेदनशील दिल ही चाहिए.

Hindi Kahani

बेटे पिंटू को फिज़ियोथेरेपी के लिए ले जाते हुए यह मेरा छठा दिन था. खेलते व़क्त गिर जाने के कारण उसके घुटने की सर्जरी हुई थी और अब फिर से अपने पैरों पर खड़े होने के लिए उसे लगभग दो महीने की फिज़ियोथेरेपी की आवश्यकता थी. फिज़ियोथेरेपी सेंटर लगभग पूरे दिन ही खुला रहता था, इसलिए मैं अपनी सुविधानुसार सुबह, दोपहर, शाम- कभी भी उसे लेकर वहां पहुंच जाती थी. कभी नए चेहरे नज़र आते, तो कभी रोज़वाले ही परिचित चेहरे. कुछ स्वयं चलकर आने वाले होते, कुछ को छोड़ने और लेने आनेवाले होते थे, तो कुछ मेरे जैसे भी थे, जो आरंभ से अंत तक पेशेंट के साथ ही बने रहते थे. मैं और पिंटू जल्द ही वहां के माहौल में अभ्यस्त होने लगे थे.

लगभग हर उम्र, धर्म और आर्थिक स्तर के स्त्री-पुरुष वहां आते थे. मैंने गौर किया अधिकांश पुरुष और कुछ महिलाएं तो आते ही अपने-अपने मोबाइल पर व्यस्त हो जाते. वाट्सऐप, फेसबुक, वीडियो गेम या फिर गाने सुनने में थेरेपी के उनके डेढ़-दो घंटे ऐसे ही निकल जाते. मैंने सोच लिया, अब से मैं भी सारे मैसेजेस वहीं देखा और भेजा करूंगी.

उस दिन यही सोचकर मैंने पर्स से मोबाइल निकालने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि पास के बेड पर लेटे एक बुज़ुर्ग सज्जन के सवाल ने मुझे चौंका दिया.

“एक्सीडेंट हुआ था क्या?”

“ज…जी. खेलते व़क्त घुटने का लिगामेंट रप्चर हो गया था. सर्जरी हुई है.” न चाहते हुए भी मेरे चेहरे पर 9 वर्षीय पिंटू के लिए चिंता की लकीरें उभर आई थीं.

“अरे, चिंता मत करो. जिस तरह अच्छा व़क्त जल्दी गुज़र जाता है, उसी तरह बुरा व़क्त भी ज़्यादा दिन नहीं ठहरता. जल्दी ठीक हो जाएगा. इस उम्र में रिकवरी जल्दी होती है. समस्या तो हम जैसों के साथ है.”

“आपको क्या प्रॉब्लम है?”

“फ्रोज़न शोल्डर्स! वैसे तो बुढ़ापा अपने आप में ही एक बीमारी है और उसमें भी कुछ समस्या हो जाए, तो लंबा खिंच जाता है. यहां आ जाता हूं, फिज़ियोथेरेपिस्ट की निगरानी में कुछ व्यायाम कर लेता हूं, मशीन से थोड़ी सिंकाई करवा लेता हूं, तो आराम मिल जाता है.”

“सही है. लोगों से मिलकर, बात करके थोड़ा मन भी बहल जाता होगा.” मैंने उनके समर्थन में सुर मिलाया.

“हां, पर आजकल लोगों के पास मिलने-बतियाने का व़क्त कहां है? देखो, सब के सब अपने-अपने मोबाइल पर व्यस्त हैं. मीलों दूर बैठे व्यक्ति को मैसेज पर मैसेज, फोटोज़ भेजते रहेंगे, पर मजाल है बगल में दर्द से कराहते व्यक्ति की ज़रा-सी सुध ले लें.”

इस बार मैं उनकी हां में हां नहीं मिला सकी. मेरे बुद्धिजीवी मस्तिष्क ने अपना तर्क रख ही दिया. “दर्द से ध्यान हटाने के लिए ही तो हर कोई अपने को मोबाइल में व्यस्त किए हुए है.”

“मतलब?”

“अब देखिए न अंकल, थेरेपी में थोड़ा-बहुत दर्द तो होता ही है. ध्यान गानों में, संदेश भेजने-पढ़ने में, फोटोज़ देखने में लगा रहेगा तो दर्द की अनुभूति कम होगी. मैंने इसीलिए तो पिंटू को हेडफोन लगा दिया है. ख़ुद मैं भी अपना मोबाइल ही चेक करने जा रही थी…”

“कि मैंने तुम्हें बातों में लगाकर तुम्हारा टाइम ख़राब कर दिया.” अंकल ने मेरी बात झटके से समाप्त करते हुए दूसरी ओर मुंह फेर लिया. शायद मैंने उन्हें नाराज़ कर दिया था.

“आह!” उनके मुंह से कराह निकली.

“देखिए, आपका ध्यान दर्द पर गया और दर्द महसूस होने लगा. इतनी देर मुझसे बातें करते हुए आपको दर्द का एहसास ही नहीं हो रहा था. बात स़िर्फ ख़ुद को व्यस्त रखकर दर्द से ध्यान बंटाने की है. देखिए, आपसे बातों-बातों में पिंटू की एक्सरसाइज़ पूरी भी हो गई. न उसे कुछ पता चला, न मुझे, वरना वो यदि दर्द से परेशान होता रहता, तो उसे तड़पता देख मैं दुखी होती रहती.”

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केयरटेकर ने आकर अंकल की मशीन हटाई, तो उनके मुंह से निकल गया, “अरे, हो भी गई. आज तो पता ही नहीं चला.”

केयरटेकर सहित मेरे चेहरे पर भी मुस्कान दौड़ गई. अंकल झेंप गए.

“टेक्नोलॉजी इतनी बुरी भी नहीं है अंकल! हां, अति सर्वत्र वर्जयेत्.”

प्रत्युत्तर में अंकल मुस्कुरा दिए, तो मैं फूलकर कुप्पा हो गई. घर लौटकर मैंने यह बात अपने पति को बताई, तो वे भी मुस्कुराए बिना न रह सके.

“मतलब, वहां भी तुमने अपनी समझदारी का सिक्का जमाना आरंभ कर दिया है. सॉरी नीतू, घर के कामों के साथ-साथ पिंटू को लाने-ले जाने की ज़िम्मेदारी भी तुम्हें संभालनी पड़ रही है. क्या करूं? आजकल ऑफिस में वर्कलोड ज़्यादा होने से लगभग रोज़ ही लौटने में देरी हो जाती है. देखो, शायद अगले महीने थोड़ा फ्री हो जाऊं, तो फिर पिंटू को लाने-ले जाने की ज़िम्मेदारी मैं संभाल लूंगा.”

“अरे नहीं, मुझे कोई परेशानी नहीं है, बल्कि कुछ नया देखने-समझने को मिल रहा है.” मैंने उन्हें अपराधबोध से उबारना चाहा.

“ओहो! तो लेखिका महोदया को यहां भी कहानी का कोई प्लॉट मिल गया लगता है.”

पति ने चुटकी ली, तो मैं मन ही मन इनकी समझ की दाद दिए बिना न रह सकी. वाकई इस एंगल से तो मैंने सोचा ही नहीं था. सेंटर में तो इतने तरह के कैरेक्टर्स मौजूद हैं कि कहानी क्या, पूरा उपन्यास लिखा जा सकता है. मैं अब और भी जोश के साथ पिंटू को सेंटर ले जाने लगी. पर उन अंकल से फिर बातचीत नहीं हो सकी. एक-दो बार आते-जाते आमना-सामना ज़रूर हो गया था, पर हम मुस्कुराकर आगे बढ़ गए थे. उन्हें जाने की जल्दी थी, तो मुझे आने की. इस बीच मेरा जन्मदिन आया, तो पति ने मुझे उपहारस्वरूप किंडल लाकर दिया.

“इसमें तुम कोई भी क़िताब सॉफ्ट कॉपी के रूप में स्टोर कर कहीं भी पढ़ सकती हो. हैंडल करने में बेहद सुविधाजनक.”

स्मार्टफोन, चश्मे के अलावा अब किंडल भी मेरे हैंडबैग की एक आवश्यक एक्सेसरी हो गई थी. सेंटर में मेरा व़क्त और भी आराम से गुज़रने लगा था. पिंटू के घुटने में भी काफ़ी सुधार था. मुझे किंडल पर व्यस्त देख वह मज़ाक करता.

“ममा, आप अपना लैपटॉप भी साथ ले आया करो. यहीं स्टोरी टाइप कर लिया करो.”

“नहीं, इतना भी नहीं.” मैं मुस्कुरा देती. पर्स में किंडल आ जाने के बाद से मेरी आंखें उन अंकल को और भी बेचैनी से तलाशने लगी थीं. शायद मैं उन्हें उन्नत टेक्नोलॉजी का एक और अजूबा दिखाने के लिए बेक़रार हो रही थी. उनसे उस दिन की मुलाक़ात न जाने क्यों मेरे दिल में बस-सी गई थी, आख़िर मेरी मुराद पूरी हो ही गई. उस दिन पिंटू को फिज़ियोथेरेपिस्ट के हवाले कर मैंने किंडल पर अपना अधूरा नॉवल पढ़ना शुरू ही किया था कि एक परिचित स्वर ने मुझे चौंका दिया. देखा तो अंकल थे.

“अंकल, आप कैसे हैं? कितने दिनों बाद फिर से मुलाक़ात हुई है?”

“हां, बीच में कुछ दिन तो मैं आया ही नहीं था. विदेश से बेटी-दामाद आए हुए थे. उनके और नाती-नातिन के संग दिन कब गुज़र जाता था पता ही नहीं चलता था. भगवान का शुक्र है उस समय कंधों में कोई दर्द नहीं हुआ.”

मैं मुस्कुरा दी. “अंकल दर्द तो हुआ होगा, पर आप बेटी और उसके बच्चों में इतने मगन थे कि आपको दर्द का एहसास ही नहीं हुआ.” अंकल हंसने लगे थे. “तुमसे मैं तर्क में नहीं जीत सकता बेटी. अपनी बेटी को भी मैंने तुम्हारे बारे में बताया था. कहने लगी ठीक ही तो कह रही हैं वे. कब से आपसे कह रही हूं कि इस बटनवाले मोबाइल को छोड़कर स्मार्टफोन ले लीजिए. आपका मन लगा रहेगा और हमें भी तसल्ली रहेगी. वह तो ख़ुद लाने पर उतारू थी, पर मैंने ही मना कर दिया. मेरे भला कौन-से ऐसे यार-दोस्त हैं, जिनसे वाट्सएप पर बातें करूंगा. जो दो-चार हैं, वे मेरे जैसे ही हैं, जो या तो ऐसे ही मिल लेते हैं या फोन पर बातें कर लेते हैं. अपना पुराना लैपटॉप वह पिछले साल आई थी, तब यहीं छोड़ गई थी. उस पर स्काइप पर बात कर लेती है. बाकी सुबह-शाम टीवी देख लेता हूं. मोबाइल में जितने ज़्यादा फंक्शन होंगे, मेरे लिए उसे हैंडल करना उतना ही मुश्किल होगा. शरीर संभल जाए वही बहुत है. और पिंटू बेटा कैसा है? ठीक है? यह तुम्हारे हाथ में क्या है?”

“यह किंडल है अंकल!” मैं उत्साहित हो उठी थी. “मेरे हसबैंड ने मुझे बर्थडे पर गिफ्ट किया है. मुझे पढ़ने-लिखने का बहुत शौक़ है न, तो इसलिए.” मैं उत्साह से उन्हें दिखाने लगी, तो आसपास के कुछ और लोग भी उत्सुकतावश जुट आए.

“यह देखिए. यह मैंने इसमें कुछ क़िताबें मंगवाई हैं. अब ये इसमें सॉफ्ट कॉपी के रूप में उपलब्ध हो गई हैं. मेरा जब जहां मन चाहे खोलकर पढ़ने लग जाती हूं मोबाइल की तरह. यह भी बैटरी से चार्ज होता है. मेरी अपनी लिखी क़िताब भी सॉफ्ट कॉपी के रूप में इसमें उपलब्ध है. आप कभी पढ़ना चाहें तो!”

“वाह, क्या टेक्नोलॉजी है!” आसपास के लोग सराहना करते धीरे-धीरे छितरने लगे, तो मेरा ध्यान अंकल की ओर गया. अंकल किसी गहरी सोच में डूबे हुए थे.

“क्या हुआ अंकल?”

“अं… कुछ नहीं. मैंने तुम्हें बताया था न कि बेटी ने स्मार्टफोन दिलवाने की बात कही थी और मैंने इंकार कर दिया था. तब वह यही, जो तुम्हारे हाथ में है- किंडल, यह भेजने की ज़िद करने लगी. दरअसल, उसने मुझे उसकी मां की डायरी पढ़ते देख लिया था.”

“आपकी पत्नी डायरी लिखती हैं?” मैंने बीच में ही बात काटते हुए प्रश्‍न कर डाला था.“लिखती है नहीं, लिखती थी? दो वर्ष पूर्व वह गुज़र गई.”

“ओह, आई एम सॉरी!”

अंकल, शायद किसी और ही दुनिया में चले गए थे, क्योंकि मेरी प्रतिक्रिया पर भी वे निर्लिप्त बने रहे और पत्नी की स्मृतियों में खोए रहे.

“उसके जीते जी तो कभी उसकी डायरी पढ़ने की आवश्यकता महसूस ही नहीं हुई. बहुत जीवंत व्यक्तित्व की स्वामिनी थी तुम्हारी आंटी. बेहद हंसमुख, बेहद मिलनसार, बेहद धार्मिक… हर किसी को अपना बना लेने का जादू आता था उसे. मैं ज़रा अंतर्मुखी हूं, लेकिन वो हर व़क्त बोलती रहती थी. पर कैंसर के आगे उसकी भी बोलती बंद हो गई.”

“क्या? कैंसर था उन्हें?”

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“ख़ूब लंबा इलाज चला. अपनी जिजीविषा के सहारे वो लंबे समय तक उस भयावह बीमारी से संघर्ष करती रही, पर अंत में थक-हारकर उसने घुटने टेक दिए. उसके दिन-प्रतिदिन टूटने का सफ़र याद करता हूं, तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं. तुम उस दिन फिज़ियोथेरेपी के दर्द के व़क्त ध्यान दूसरी ओर लगाने की बात कर रही थी न? तुम्हारी आंटी के कीमोथेरेपी के दर्द के सम्मुख यह दर्द कुछ भी नहीं है. मैं तो उस व़क्त आंखें बंद कर बस उसका ध्यान कर लेता हूं. उसका हंसता-मुस्कुराता जीवंत चेहरा मेरी स्मृति में तैर जाता है और मैं सब भूलकर किसी और ही दुनिया में पहुंच जाता हूं.”

अंकल को भावुक होते देख मैंने उनका ध्यान बंटाना चाहा. “आप उनकी डायरी के बारे में बता रहे थे.”

“हां, उसके जाने के बाद मैंने एक दिन वैसे ही उसकी डायरी खोलकर पढ़ना शुरू किया, तो हैरत से मेरी आंखें चौड़ी हो गई थीं. भावनाओं को इतनी ख़ूबसूरती से शब्दों में पिरोया गया था कि मैं उसकी सशक्त लेखनी की दाद दिए बिना नहीं रह सका. किसी कवयित्री की कविता से कम नहीं है उसकी डायरी. एक-एक शब्द जितनी शिद्दत से काग़ज़ पर उकेरा गया था, पढ़ते व़क्त उतनी ही गहराई से दिल में उतरता चला जाता है. जाने कितनी बार पढ़ चुका हूं, पर मन ही नहीं भरता. दिन में एक बार उसके पन्ने न पलट लूं, तब तक मन को शांति नहीं मिलती. बेटी परिवार सहित आई हुई थी, फिर भी मैं आंख बचाकर, मौक़ा निकालकर एक बार तो डायरी के पन्ने पलट ही लेता था और रवाना होने से एक दिन पहले बस बेटी ने यही देख लिया. मां की डायरी देख, पढ़कर पहले तो वह भी ख़ूब रोई. फिर बोली, “ठीक है पापा, मान लिया स्मार्टफोन आपके काम का नहीं. अब मैं आपके लिए किंडल भेजूंगी. उसमें आप न केवल मम्मी की डायरी, वरन और भी बहुत सारी क़िताबें पढ़ सकेंगे. देखिए, मम्मी की डायरी की क्या हालत हो गई है. एक-एक पन्ना छितरा पड़ा है.”

“वो तो बेटी मैं रोज़ देखता हूं न तो इसलिए…” मैंने सफ़ाई दी थी.

“पर किंडल में यह समस्या नहीं होगी, चाहे आप दिन में 20 बार पढ़ें.”

“हां, बिल्कुल. यह देखिए न आप.” मैंने अपना किंडल उनके हाथ में पकड़ा दिया. वे कुछ देर उसे देखते-परखते रहे. फिर लौटा दिया.

“लेकिन बेटी इसमें वो डायरीवाली बात कहां? उस डायरी के पन्नों के बीच तो मेरे द्वारा तुम्हारी आंटी को दिए सूखे गुलाब हैं. जगह-जगह हल्दी-तेल के निशान हैं. आंसुओं से धुंधलाए अक्षर हैं. उसके पन्नों पर हाथ फेरता हूं, तो लगता है तुम्हारी आंटी को ही स्पर्श कर रहा हूं.”

मैं स्तब्ध खड़ी रह गई थी. मेरा बुद्धिजीवी तार्किक मस्तिष्क संज्ञाशून्य हो गया था. तकनीक और विज्ञान हमें चांद-सूरज पर पहुंचा सकता है, पर किसी के दिल तक पहुंचने के लिए तो एक संवेदनशील दिल ही चाहिए. तभी तो कहा गया है ‘जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि’. शायद इसीलिए अंकल से रू-ब-रू वार्तालाप से मुझे जितना सुकून मिलता है, उतना वाट्सऐप पर पिंटू के लिए मिले गेट वेल सून मैसेजेस से नहीं.

Sangeeta Mathur

    संगीता माथुर

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कहानी- कशमकश (Short Story- Kashmakash)

मैं इधर-उधर बिखरे काग़ज़ात को समेटने लगी. मम्मी के बनाए उन नक्शों में मुझे उनके टूटे हुए ख़्वाबों की किर्चें नज़र आ रही थीं. अधूरे ख़्वाबों को ज़िंदगीभर ढोना सहज नहीं होता. सारी ज़िंदगी मैंने मम्मी के होंठों पर मुस्कान देखी थी, पर आज मुझे उस मुस्कान के पीछे छिपी कसक भी नज़र आ रही थी. आज यदि इतिहास स्वयं को दोहराता है, तो संभव है कल को मेरे मन में भी ऐसी ही वेदना छिपी होगी. मम्मी ने मेरी कशमकश को दूर कर दिया था.

Hindi Kahani

की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्‍चात् काउंसलिंग और अंत में इंटरव्यू सभी में मैंने अभूतपूर्व सफलता अर्जित की और मेरा चयन आईआईएम कॉलेज (अहमदाबाद) में हो गया. मम्मी-पापा बहुत ख़ुश थे. घर में उत्साह का माहौल था. उस दिन सुबह बैंक जाने के लिए मैं घर से निकलने लगी, तो मम्मी बोली, “प्रिया, तुम्हारे अहमदाबाद जाने में 15 दिन बचे हैं, अब अपनी जॉब से रिज़ाइन करके तुम्हें जाने की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए.” मम्मी की बात का जवाब दिए बगैर मैं चुपचाप बाहर निकल गई.

मम्मी को कैसे बताऊं मन में चल रही कशमकश के बारे में. मन में विचारों का तूफ़ान उठ रहा था. ज़िंदगी ऐसे दोराहे पर आ खड़ी हुई थी कि कौन-सी राह चुनूं समझ नहीं आ रहा था. कुछ दिन पूर्व तक मेरे जीवन का एक ही उद्देश्य था. आईआईएम कॉलेज से एमबीए करके जीवन में ऊंचा मुक़ाम हासिल करना, पर अब हालात बदल गए थे. अब करियर के साथ-साथ संजय को पाने की चाह भी दिल में घर बना चुकी थी.

संजय की याद आते ही पलकों के रास्ते मन के आंगन में कुछ माह पूर्व की स्मृतियां खिली धूप-सी उतर आईं. कैट की परीक्षा देने के पश्‍चात् मैं घर में खाली बैठी बोर हो रही थी, इसलिए मैंने एक प्राइवेट बैंक में जॉब ढूंढ़ ली. कुछ दिनों बाद वहां मेरी मुलाक़ात संजय से हुई. संजय चार्टेड अकाउंटेंट था. वह बैंक का ऑडिट करने आया करता था. एक शाम उसी सिलसिले में वो बैंक में था. उसकी मदद के लिए मैं और मेरा एक कलीग रुके हुए थे. काम पूरा होने के पश्‍चात् जब मैं बैंक से निकली, शाम के सात बज रहे थे. अंधेरा घिर आया था. मैं सड़क पर ऑटो की प्रतीक्षा में खड़ी थी, तभी संजय की कार समीप आकर रुकी. उसने कार का दरवाज़ा खोलते हुए कहा, “बैठिए, मैं आपको घर छोड़ देता हूं.”

“नहीं नहीं, मैं स्वयं चली जाऊंगी.” मैंने इनकार किया. संजय बोला, “आज आप मेरी वजह से लेट हुई हैं, इसलिए आपको हिफाज़त से घर पहुंचाने की ज़िम्मेदारी भी मेरी है. प्लीज़ बैठिए.” उसके आग्रह को मैं टाल न सकी. रास्ते में वह इधर-उधर की बातें करता रहा. उसने बताया कि उसके पिताजी का पिछले वर्ष स्वर्गवास हो चुका था. घर में बस उसकी मां थी, जो जल्द-से-जल्द उसकी शादी कर देना चाहती थी. लेकिन शादी जैसे गंभीर फैसले पर वह जल्दबाज़ी नहीं करना चाहता था. घर आ चुका था. मैं उसे अंदर लेकर आई.

मम्मी-पापा संजय से मिलकर प्रसन्न हुए.

गरम-गरम कॉफी के दौरान पापा की कई फाइनेंस संबंधी समस्याएं उसने मिनटों में सुलझा दीं.

संजय का ऑफिस बैंक के समीप था, इसलिए अक्सर उसका बैंक में आना-जाना लगा रहता था. धीरे-धीरे हम दोनों के बीच मित्रता होने लगी. हम अक्सर बाहर मिलने लगे. धीरे-धीरे मुझे एहसास होने लगा कि संजय मुझे चाहने लगा है. एक दिन कॉफी पीते हुए उसने कहा, “प्रिया, हम दोनों की बहुत-सी बातें एक-दूसरे से मिलती हैं. हम दोनों की पसंद-नापसंद, जीवन के प्रति हमारा नज़रिया सभी कुछ मिलता है. सच पूछो तो मुझे ऐसी ही लड़की की तलाश थी, जो व्यावहारिक, ख़ूबसूरत व समझदार हो. क्या तुम ज़िंदगीभर साथ निभाने के लिए मेरा हाथ थामना पसंद करोगी?” संजय मुझे पसंद था. उसकी इंटेलिजेंसी, लगन, ज़िंदगी में ऊंचाइयां छूने की चाहत, सेंस ऑफ ह्यूमर सभी कुछ मुझे भाता था. मैंने उसे अपनी स्वीकृति दे दी.

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परिधि लांघकर सदियां बन गए. उस अनजानी ख़ुशी को आंचल में समेटे मैं हवा में तैर रही थी कि तभी कैट की परीक्षा का परिणाम आ गया. मैं सफल रही. उसके पश्‍चात् काउंसलिंग व इंटरव्यू के बाद मुझे आईआईएम कॉलेज में एडमिशन मिल गया. मैंने यह ख़बर संजय को सुनाई. बधाई देते हुए वो गंभीर स्वर में बोला, “प्रिया, अब समय आ गया है कि हम अपने संबंधों पर गंभीरतापूर्वक विचार कर लें. इधर मैं तुम्हारे घरवालों से हमारी शादी की बात करने की सोच रहा हूं और तुम अहमदाबाद जाने की सोच रही हो. नहीं प्रिया, अब मैं तुमसे दूर नहीं रह पाऊंगा.”

“यह क्या कह रहे हो तुम?” मैं आश्‍चर्य से बोली, “ज़िंदगी में यह मुक़ाम हासिल करने की मेरी बचपन से तमन्ना थी. इसके लिए मैंने रात-दिन मेहनत की. अब जबकि मंज़िल मेरे सामने है, तो मैं उससे कैसे मुंह मोड़ लूं. स़िर्फ दो साल की तो बात है.”

“दो साल? इतना समय मैं तुम्हारे बिना कैसे रहूंगा? पहले तुम्हारा जो भी सपना रहा हो, पर अब तुम्हारी प्राथमिकता शादी होनी चाहिए. प्रिया, शादी के बाद भी तुम एमबीए कर सकती हो, आईआईएम कॉलेज से न सही, मुंबई के किसी अच्छे कॉलेज से.”

“लेकिन संजय…”

“प्लीज़ प्रिया, हम दोनों के प्यार की ख़ातिर तुम्हें मेरी बात माननी ही पड़ेगी.” उसी दिन से मेरे मन में कशमकश चल रही थी. मम्मी-पापा से भी मैं बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई थी. लेकिन परिस्थितियों का सामना तो करना ही था. उस शाम घर पहुंचकर मैंने मम्मी से कहा, “मम्मी, मैं अहमदाबाद नहीं जाऊंगी.”

“क्यों?” मम्मी आश्‍चर्य से बोलीं.

“मैं और संजय एक-दूसरे को चाहते हैं और शादी करना चाहते हैं.”

“प्रिया, मैंने तुमसे संजय के साथ मेलजोल रखने पर इसलिए कभी कुछ नहीं कहा, क्योंकि मैं जानती हूं तुम समझदार हो. भावुकता में बहकर जीवन का इतना बड़ा फैसला करना ग़लत है फिर मैं और तुम्हारे पापा अभी तुम्हारी शादी नहीं करना चाहते. अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है. अभी तुम्हें अपना करियर बनाना है. अपने पैरों पर खड़ा होना है. समय के साथ तुम्हारे अंदर परिपक्वता आएगी और तुम अपने जीवन का सही फैसला कर सकोगी.”

“लेकिन मम्मी, मैं संजय को खोना भी नहीं चाहती.” मम्मी ने गौर से मेरा चेहरा देखा और मुझे अपने बेडरूम में ले गईं. अपनी आलमारी खोल उन्होंने कुछ पेपर्स निकाले और बोलीं, “प्रिया, आज मैं तुमसे अपनी कुछ व्यक्तिगत बातें शेयर करना चाहती हूं. इन पेपर्स को देखो. ये मकान के नक्शे हैं, जो कभी मैंने बनाए थे. प्रिया, मैं मुंबई में आर्किटेक्चर का कोर्स कर रही थी. सेकंड ईयर में थी, जब कॉलेज की तरफ़ से दार्जिलिंग घूमने गई थी. वहीं तुम्हारे पापा मुझे पहली बार मिले. वह भी अपने मित्र के साथ वहां घूमने आए थे और हमारे ही होटल में ठहरे थे. दार्जिलिंग में हम लोग छह दिन रहे और इस दौरान तुम्हारे पापा से मेरी अच्छी जान-पहचान हो गई. वह इंजीनियर थे और मुंबई में उनकी अपनी फैक्टरी थी.

मुंबई आकर हम लोग मिलते रहे. छह माह पश्‍चात् उन्होंने मेरे समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा. प्रिया, मैं अपना चार साल का कोर्स पूरा करना चाहती थी, पर तुम्हारे पापा को भी खोना नहीं चाहती थी. तुम्हारे नाना-नानी ने भी सोचा, इतना अच्छा लड़का मिल रहा है, तो शादी कर दी जाए. मेरी शादी हो गई. तुम्हारे पापा ने मुझसे वादा किया था कि शादी के बाद मेरी पढ़ाई जारी रखवाएंगे. लेकिन ऐसा संभव न हो सका. पहले तुम्हारी दादी बीमार प़ड़ गईं, फिर गृहस्थी में ऐसी उलझी कि आर्किटेक्ट बनना ख़्वाब ही रह गया. दो वर्ष की पढ़ाई तो व्यर्थ गई ही, साथ ही कभी आत्मनिर्भर भी न बन सकी. हां, तुम्हारे पापा से मुझे कभी कोई शिकायत नहीं रही. उन्होंने मुझे हर ख़ुशी, हर सुख दिया, लेकिन फिर भी मेरे मन में हमेशा इस बात का मलाल रहा कि मैं आर्किटेक्ट न बन सकी.

प्रिया, जीवन में कभी-कभी परीक्षा की ऐसी घड़ी आती है, पर तब हमें बहुत सोच-विचार कर दिल से नहीं दिमाग़ से काम लेना चाहिए, क्योंकि भावावेश में किए गए फैसले अक्सर ग़लत साबित होते हैं. अपने अथक परिश्रम को व्यर्थ मत जाने दो. इस समय अपने मन पर काबू रख अपना भविष्य संवार लो. संजय वास्तव में तुम्हारे लिए गंभीर होगा, तो दो साल तुम्हारी प्रतीक्षा अवश्य करेगा.” मम्मी कमरे से बाहर चली गईं.

मैं इधर-उधर बिखरे काग़ज़ात को समेटने लगी. मम्मी के बनाए उन नक्शों में मुझे उनके टूटे हुए ख़्वाबों की किर्चें नज़र आ रही थीं. अधूरे ख़्वाबों को ज़िंदगीभर ढोना सहज नहीं होता.

सारी ज़िंदगी मैंने मम्मी के होंठों पर मुस्कान देखी थी, पर आज मुझे उस मुस्कान के पीछे छिपी कसक भी नज़र आ रही थी. आज यदि इतिहास स्वयं को दोहराता है, तो संभव है कल को मेरे मन में भी ऐसी ही वेदना छिपी होगी. मम्मी ने मेरी कशमकश को दूर कर दिया था. अब मैंने फैसला कर लिया कि मैं अहमदाबाद आगे की पढ़ाई के लिए जाऊंगी. अगले दिन मैंने संजय से कहा, “देखो संजय, मुझे ग़लत मत समझना. आज जो मुझे देश के इतने प्रतिष्ठित कॉलेज से एमबीए करने का अवसर मिला है, उसके पीछे स़िर्फ मेरी मेहनत नहीं है, बल्कि मेरे मम्मी-पापा की तपस्या भी शामिल है. उन्होंने भी मेरे साथ कितनी ही रातें जागकर बिताई हैं. अपनी मेहनत के साथ-साथ मैं उनकी तपस्या को व्यर्थ नहीं जाने दूंगी. मैं एमबीए करने अवश्य जाऊंगी. हो सके तो तुम मेरी प्रतीक्षा करना.”

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दस दिन बाद अहमदाबाद जाते हुए एयरपोर्ट पर मम्मी-पापा मुझे छोड़ने आए थे. मेरी आंखों में आंसू थे. अपने घर से दूर जाने का ग़म तो था ही, साथ ही अपने प्यार को खो देने की टीस भी हृदय में उठ रही थी. हफ़्तेभर से संजय की कोई ख़बर नहीं थी. स्पष्ट था कि वह प्रतीक्षा के लिए तैयार नहीं था, तो क्या मैंने संजय को पहचानने में भूल की थी? क्या उसका प्यार सतही था? उसमें गहराई नहीं थी? मन में उठ रहे सवालों के साथ सामान लिए मैं आगे बढ़ रही थी, तभी कानों में संजय की आवाज़ आई. वह मेरा नाम पुकार रहा था. मैंने मुड़कर पीछे देखा. हाथों में गुलाब का बुके लिए संजय तेज़ी से मेरी ओर बढ़ रहा था. क़रीब आकर वह बोला, “सॉरी प्रिया, इतने दिनों से न तो तुमसे मिला और न फोन किया. दरअसल, मेरा एक छोटा-सा एक्सीडेंट हो गया था.” मैंने कुछ कहना चाहा, तो उसने रोक दिया, “कुछ मत कहो प्रिया. बस सुनो. मैं तुम्हारी दो साल तक प्रतीक्षा करूंगा. मैं तुमसे ही शादी करूंगा.” ख़ुशी से मेरी आंखों से आंसू बहने लगे. मैंने कृतज्ञतापूर्ण नज़रों से मम्मी की ओर देखा. उनके सही मार्गदर्शन की वजह से ही मुझे ख़ुशी के ये अनमोल पल प्राप्त हुए थे. दिल में पूर्णता का एहसास लिए मैं अपनी मंज़िल की ओर बढ़ गई.

Renu Mandal

     रेनू मंडल

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कहानी- कतराभर रूमानियत (Short Story- Katrabhar Rumaniyat)

इस तरह से कमरे में अकेले एक अनजान लड़के के साथ. दुर्गा भी बाहर गई हुई थी. वह लड़का लेकिन बड़ी सहजता से उसके हाथ पर दवाई लगा रहा था. उनकी संस्कृति में इसे अजीब नज़रों से नहीं देखा जाता. चित्रा उसके स्पर्श से भीतर कहीं संकोच से भरकर असहज भी हो रही थी और रोमांचित भी. पहली बार ही तो था कि किसी लड़के ने उसका हाथ पकड़ा था, उसे स्पर्श किया था.

Hindi Kahani

घर के सभी कामों से फुर्सत पाकर चित्रा ने अपना मोबाइल उठाया और फेसबुक खोलकर बैठ गई. पहले दोपहरभर समय काटने का साधन उपन्यास, कहानियां हुआ करते थे, फिर टीवी सीरियल आ गए और अब ये मोबाइल. पांच इंच के स्क्रीन पर पूरी दुनिया समाई है. पिछले साल छोटा बेटा अमेरिका से आया था, तो साधारण फोन की जगह ये स्मार्टफोन दिलवा गया था और साथ ही फेसबुक, मेल, व्हाट्सएप भी इंस्टॉल करके गया था दोनों फोन पर उनके और रमेश के. दोनों के फेसबुक और व्हाट्सअप अकाउंट भी बना दिए और उन्हें अपने फ्रेंड लिस्ट में भी जोड़ लिया.

“अब हम रोज़ वीडियो कॉल करके आपको देख सकेंगे और फेसबुक पर एक-दूसरे के फोटो भी देख पाएंगे.” बेटे ने बताया.

तब से दोनों नियम से अपना फेसबुक देखते हैं. देखते-ही-देखते घर-परिवार,

जान-पहचानवाले कितने ही लोग उनसे जुड़ गए. आभासी दुनिया की निकटता ने काफ़ी हद तक वास्तविक दुनिया की दूरियों के दर्द को मिटा दिया था. दोनों बेटों, बहुओं, पोते-पोतियों को रोज़ सामने हंसते-खेलते घर में घूमते हुए देखकर अब तो ये एहसास ही नहीं होता कि वे साथ नहीं हैं. सुबह-शाम खाने में क्या बना है, किसने क्या पहना है. मीनू ने क्या ड्रॉइंग बनाई है या मनु ने आज क्या शरारत की सब हाल पता होते हैं. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में लंदन, न्यूयॉर्क औैर भोपाल सब पांच इंच स्क्रीन पर एक हो जाते, तो लगता जैसे एक ही ड्रॉइंगरूम में सब बैठे हैं, वरना तो जब तक ये फोन नहीं था आंखें तरस जाती थीं बच्चों और पोते-पोतियों को देखने को और दिन काटे नहीं कटता था.

“अरे, देखो तो अनुज ने अपने सिएटल प्रवास के फोटो भी डाल दिए हैं.” चित्रा ने रमेश को बताया, तो वे भी अपना अकाउंट खोलकर अनुज के फोटो देखने लगे. यूं तो वे जब भी साल-दो साल में अनुज के पास अमेरिका जाते हैं अनुज उन्हें आसपास के शहरों में घुमा ही देता है, लेकिन तब भी बहुत सारा अमेरिका, इंग्लैंड तो उन्होंने अनुज-मनुज के डाले फोटो या वीडियो कॉल में ही देख डाला था.

थोड़ी देर बाद रमेश तो दोपहर की झपकी लेने चले गए, लेकिन चित्रा वहीं बैठी रही. किसी की फ्रेंड रिक्वेस्ट थी. देखा कोई अलेक्सांद्रे था. पहचान न हो, तो वे फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट नहीं करती. इसे भी उन्होंने अनदेखा कर दिया. एक-दो संदेश भी थे. एक इंदौरवाली बहन का था और दूसरा अलेक्सांद्रे का. उत्सुकतावश उन्होंने संदेश पढ़ा कि एक अनजान व्यक्ति उन्हें क्यों संदेश भेज रहा है. लिखा था- ‘हेलो चित्रा, कैसी हो? इतने बरसों बाद तुम्हें यहां देखकर अच्छा लगा. उम्मीद है, मैं तुम्हें याद होऊंगा. फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी है, प्लीज़ स्वीकार कर लेना. बहुत-सी बातें करनी हैं तुमसे. संदेश का जवाब ज़रूर देना मैं प्रतीक्षा कर रहा हूं.”

पढ़कर चित्रा सोच में पड़ गई. लिखनेवाले के एक-एक शब्द में अपनापन और आत्मीयता झलक रही थी. जिस तरह से उसने चित्रा का नाम लेकर लिखा था, उससे ज़ाहिर था कि वो उसे अच्छे से पहचानता था, लेकिन वह तो इस नाम के किसी व्यक्ति को जानती नहीं. कौन है यह महानुभाव. उसने उसकी प्रोफाइल खोलकर उसके फोटो देखना शुरू किए. क़रीब उसी की आयु का एक व्यक्ति, जो क़दकाठी और चेहरे से सुखी, संतुष्ट लग रहा था. आयु की एक ओजस्वी और गौरवमयी छाप थी चेहरे पर. उसके घर और परिवार के फोटो भी थे. पत्नी, तीन बच्चे, घर. लेकिन तब भी उसका चेहरा नितांत अपरिचित ही लग रहा था. याद नहीं आ रहा था कभी अनुज-मनुज के यहां इंग्लैंड, अमेरिका के प्रवास के दौरान ऐसे किसी भी व्यक्ति से उसकी कोई जान-पहचान हुई होगी. वह आगे और फोटो देखने लगी. मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी…

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और उसके बाद ही एक 20-22 वर्षीय युवक का श्‍वेत-श्याम चित्र जिस पर नीचे लिखा था- अलेक्से.

चित्रा के दिल पर जैसे किसी ने एक अनजान-सी दस्तक दी. एक अनूठी-सी याद जो ठीक से अभी तक स्मृतियों में उभर भी नहीं पा रही थी, लेकिन कुछ अस्पष्ट-सी छवियां मन में कौंध रही थीं. मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी, विंग-ए, विंग-डी. चारों तरफ़ फैली ब़र्फ की चादर. हाथ में सामान के थैले पकड़े एक तरुणी, ब़र्फ की चादर पर संभलकर पैर रखते हुए अपने विंग की ओर बढ़ती हुई.

चित्रा ने अलेक्सांद्रे का संदेश दोबारा पढ़ा. हां, रशियन में ही तो लिखा है. तब उन्होंने भाषा पर ध्यान ही नहीं दिया था और तब अचानक ही 42-44 साल पुरानी एक स्मृति मानस पटल पर चलचित्र की भांति चलने लगी. तब वो 21-22 साल की थी. उन दिनों रशियन भाषा सीखने का काफ़ी चलन था. भोपाल में भी एक इंस्टीट्यूट था, जिसमें रशियन भाषा पढ़ाई जाती थी. उसे भी रशियन भाषा सीखने का मन हुआ और उसने ज़िद करके इंस्टीट्यूट में प्रवेश ले लिया. कुशाग्र बुद्धि चित्रा बड़ी लगन से सीखने लगी और हर टेस्ट में अव्वल आती. जब चार साल का कोर्स पूरा हो गया, तब इंस्टीट्यूट की तरफ़ से सालभर का डिप्लोमा कोर्स करने के लिए मॉस्को जाने का स्वर्णिम अवसर मिला. मां चाहती थी कि चित्रा अब शादी करके घर बसा ले, उम्र भी बीस पार हो चुकी थी, लेकिन पिताजी ने चित्रा की इच्छा का मान रखते हुए जाने की अनुमति दे दी और चित्रा चली आई थी सैकड़ों मील दूर अनजान देश की यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करने. अब तो यह सब एक सपने जैसा लगता है. भाग्य से उसे रूममेट आंध्र प्रदेश की रहनेवाली एक लड़की दुर्गा ही मिली. दूर पराये देश में कोई स्वदेशी मिलना तब किसी बहुत अपने, आत्मीयजन के मिलने जैसा ही सुखद लगा था दोनों को और जल्दी ही दोनों बहुत पक्की सहेलियां बन गईं.

चित्रा को रूम विंग-ए में मिला था और विंग-डी में कुछ दुकाने थीं, जहां ब्रेड, फल, सब्ज़ी आदि मिल जाया करता था. हर मंज़िल पर दो कॉरिडोर के मध्य एक किचन था, जिसमें गैस चूल्हे और कुछ बर्तन आदि रखे थे. यहां विद्यार्थी अपनी सुविधा से अपना खाना बना लिया करते थे. खाना अर्थात् सब्ज़ी या ऑमलेट और ब्रेड के साथ खा लेना. चित्रा तो अंडा खाती नहीं थी, तो अपने लिए गोभी-मटर कुछ बना लेती. क्लासेस के बाद वह अपनी किताब लेकर रूम की खिड़की के पास बैठ जाती और बाहर होता स्नो फॉल देखती रहती. उसे ब़र्फ गिरते देखना बहुत अच्छा लगता था. दुर्गा ने उसे बता दिया था कि ब़र्फ पर बहुत संभलकर चलना, ज़रा-सा ध्यान चूका और आप फिसलकर गिरे.

चित्रा बहुत ध्यान रखती, संभलकर चलती, तब भी एक दिन… वह डी-विंग से फल-सब्ज़ी के भरे दो बैग थामे अपने विंग की ओर लौट रही थी. समय देखने के लिए क्षण भर को उसने विंग के टॉवर पर लगी घड़ी की तरफ़ देख लिया और…

क्षणभर में ही वह फिसलकर धड़ाम से गिर पड़ी. हाथों से बैग छूट गए और फल-सब्ज़ी सब बिखर गए. थोड़ी देर तो दर्द और शर्म से वह सुन्न-सी पड़ी रही कि अचानक एक कोमल मगर मज़बूत हाथ ने उसे थामकर सहारा देकर उठाया.

“आपको ज़्यादा चोट तो नहीं आई. आप दो मिनट रुकिए मैं अभी आपका सामान समेट लेता हूं.” एक लड़के की आवाज़ थी यह.

वह तो हतप्रभ-सी खड़ी रह गई. उस लड़के ने जल्दी-जल्दी सारा सामान बैग में भरा. फिर चित्रा का हाथ थामकर बोला, “आइए, मैं आपको कमरे तक पहुंचा दूं.”

चित्रा यंत्रवत उसके साथ चलने लगी. उसे तो यह भी नहीं मालूम था कि यह लड़का है कौन.

“अरे, आपको तो चोट लग गई है.” कमरे में उसका सामान टेबल पर रखते हुए उसने चित्रा का हाथ पकड़कर सामने किया. कांच की चूड़ियां टूटकर कलाई में चुभ गई थीं और ख़ून बह रहा था.

“मेरे पास फर्स्ट-एड बॉक्स है, मैं अभी लाकर पट्टी बांध देता हूं.” इससे पहले कि चित्रा कुछ कहती वह चला गया और दो मिनट में ही वापस आकर उसके हाथ की ड्रेसिंग करने लगा. अब तक वह काफ़ी संभल चुकी थी. उसे संकोच हो आया. भारतीय संस्कार, पारिवारिक रूढ़ियां मन को घेेरने लगीं. इस तरह से कमरे में अकेले एक अनजान लड़के के साथ. दुर्गा भी बाहर गई हुई थी. वह लड़का लेकिन बड़ी सहजता से उसके हाथ पर दवाई लगा रहा था. उनकी संस्कृति में इसे अजीब नज़रों से नहीं देखा जाता. चित्रा उसके स्पर्श से भीतर कहीं संकोच से भरकर असहज भी हो रही थी और रोमांचित भी. पहली बार ही तो था कि किसी लड़के ने उसका हाथ पकड़ा था, उसे स्पर्श किया था.

अब चित्रा ने उसे नज़रभर देखा. सुनहरे घुंघराले बाल, गोरा-चिट्टा रंग, लंबा क़द, सुंदर नाक-नक्श, नीली आंखें.

“लो हो गया. कुछ ज़रूरत पड़े, तो मैं पीछेवाले कॉरिडोर में रूम नंबर पांच में रहता हूं. अरे, मैंने अपना नाम तो बताया ही नहीं, न तुम्हारा पूछा. मेरा नाम अलेक्सांद्रे है, सब लोग मुझे अलेक्से कहते हैं. तुम्हारा नाम क्या है?” अलेक्से ने पूछा.

“मेरा नाम चित्रा है.” चित्रा ने बताया.

“तुम भारतीय हो न?” अलेक्से ने उसके माथे पर लगी बिंदी को देखते हुए कहा.

“हां.” चित्रा ने संक्षिप्त उत्तर दिया.

“तुम बैठो मैं तुम्हारे लिए चाय बना लाता हूं.” और इससे पहले कि चित्रा उसे मना करती वह चला गया और थोड़ी देर बाद दो कप चाय और ब्रेड ले आया. चाय पीते हुए उसने थोड़ी-बहुत चित्रा के घर-परिवार के बारे में बात की और एक बार फिर से अपना कमरा नंबर बताकर चला गया. जाते हुए एक गहरी नज़र से उसे देखते हुए बोला, “कोई भी ज़रूरत हो, तो मुझे बता देना.”

चित्रा उसकी नज़र से सिहर गई. उसने हां में सिर हिला दिया. दुर्गा दो दिन के लिए बाहर गई थी. दो दिन अलेक्से ही उसके लिए सुबह की चाय बना लाता, ब्रेड सेंक देता. दोपहर और रात में उसके लिए मक्खन और नमक डालकर फूलगोभी उबाल देता, ताकि वह ब्रेड के साथ खा सके. और ख़ुद भी उसके साथ ही उसके कमरे में ही खा लेता. उसे हाथ पकड़कर क्लास में पहुंचा आता और शाम को वापस कमरे में छोड़ देता. चित्रा सोचती इस देश के लोगों के लिए यह सब कितना सहज है. न कोई उन्हें ग़लत निगाह से देखता है, न टोकता है. यही वे दोनों अगर भारत में होते, तो अब तक तो उन्हें लेकर न जाने कितनी बातें बन गई होतीं, न जाने कितने पहरे लग गए होते दोनों पर.

तमाम पारंपरिक, संस्कारित रूढ़ियों के बंधन में बंधे होने के बाद भी मन में न जाने कब अलेक्से के प्रति एक रूमानियत का बीज पनप गया. चित्रा ने मगर उसे सींचा नहीं, अंकुरित नहीं होने दिया. तटस्थता की रूखी-सूखी ज़मीन पर उसे पटककर रखा. वह अपने घर-समाज की वर्जनाएं जानती थी. और उसमें उन वर्जनाओं के बंधनों को तोड़ने का, अपने पिता के विश्‍वास को तोड़ने का साहस नहीं था. और न ही कभी अलेक्से ने अपनी सीमाओं का उल्लंघन करके ऐसी कोई बात ही कही. किन्तु क्या उसकी आंखों में कभी कुछ दिखाई नहीं दिया चित्रा को? चित्रा के मन की भीतरी परतों में यदि रूमानियत का एक बीज उत्पन्न हो गया था अलेक्से के प्रति, तो अलेक्से की आंखोंं में भी तो कतराभर रूमानियत लहरा जाती थी चित्रा के प्रति. लेकिन शायद वह भी भारतीय समाज से परिचित होगा अथवा उसमें भी अपने परिवार में एक विदेशी लड़की को बसा देने का साहस न होगा. अलेक्से की आंखों में लहराता रूमानियत का कतरा कभी शब्द बनकर होंठों तक नहीं आया.

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उसका स्पर्श, लेकिन चित्रा के जिस्म पर वर्षों तक छाया रहा. मन में प्रेम का पहला एहसास, तो उसी ने जगाया था. कोर्स पूरा होने पर चित्रा भारत वापस आ गई और आनन-फानन में मां ने उसका विवाह करवा दिया. वह स्कूल में रशियन भाषा की शिक्षिका बन गई. नौकरी, पति, बच्चे, घर-गृहस्थी की व्यस्तता में चित्रा ऐसी उलझी कि नीली आंखों की वह उजासभरी रूमानियत का बीज न जाने किन अंधेरों में गुम हो गया. फिर भी जीवन की कुछ रूखी वास्तविकताओं के बीच एक अनजान कोमल स्पर्श उसे सहला जाता. तब चित्रा को कभी मालूम ही नहीं पड़ा, लेकिन आज वह समझ पाई है. यह वही अलेक्से की आंखों में लहराता कतराभर रूमानियत का भीगा-सा एहसास ही था, जिसने चित्रा का मन जीवन के इस तपते बंजर मरुस्थल में भी भीतर से हमेशा हरा रखा. वरना आम भारतीय पतियों की तरह ही रमेश के लिए भी पति-पत्नी का रिश्ता बंद, अंधेरे कमरे में मात्र देह की संतुष्टि तक ही सीमित था. उसमें किसी सुकुमार, कोमल भावना की जगह ही कहां रही कभी, जिसके लिए वह उम्रभर तरसती रही.

लेकिन चाहे हज़ारों मील दूर ही सही, उसके अनजाने ही सही एक पुरुष के मन में उसके लिए कभी कतराभर रूमानियत रही थी और शायद अब भी है, तभी वह अभी तक भी चित्रा को भूला नहीं है. यह एहसास ही कितना सुखद है, इस उम्र में भी. अब प्रेमी या पति रूप में न सही, मगर इस एहसास को सच्ची दोस्ती के रूप में तो सहेज ही सकती है. निभा भी सकती है. और चित्रा ने मुस्कुराते हुए अलेक्से की फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर ली और उसके संदेश का जवाब देने लगी.

Dr. Vinita Rahurikar

डॉ. विनीता राहुरीकर

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कहानी- मोह माया मायका (Short Story- Moh Maya Mayka)

मूंदी हुई पलकों के पीछे मायके में कुछ दिन पूर्व बिताया समय साकार हो उठा. कैसे उसे देखते ही मम्मी-पापा के चेहरे खिल उठे थे. मां ने उत्साह से बताया था कि हमेशा धीर-गंभीर और चुप-चुप रहनेवाले पापा पिछले एक घंटे से उसके इंतज़ार में गलियारे में चक्कर काट रहे थे. “बातें कुछ नहीं करनी हैं इन्हें. बातें तो तुझसे मैं ही करूंगी. ये तो तुझे देखकर ही तेरे मन का पूरा एक्सरे अपने दिल में उतार लेते हैं. क्यों जी हो गई तसल्ली आपको? ख़ुश है न आपकी लाड़ली?”

Kahaniya

दस-पंद्रह दिन मायके में बिताकर आई नेहा ने आज बड़े ही ख़ुशनुमा मूड में फिर से स्कूल जॉइन किया था. मायके की खट्टी-मीठी स्मृतियों में डूबते-उतराते उसने स्टाफ रूम में प्रवेश किया, तो साथी अध्यापिकाएं उसे इतने दिनों बाद अपने बीच पाकर चहक उठीं.

“ओ हो, साड़ी तो बड़ी ख़ूबसूरत मिली है मायके से! प्योर सिल्क लगती है. क्यों प्राची, ढाई हज़ार से कम की तो क्या होगी?” मधु ने पास बैठी प्राची को कोहनी मारी.

“मेरी नज़रें तो कंगन और पर्स पर ही अटकी हैं. तेरी भाभी की चॉइस अच्छी है.” प्राची ने कहा.

इसके आगे कि कोई और अपनी अपेक्षाओं का पिटारा खोले, नेहा ने बीच में हस्तक्षेप करना ही उचित समझा. “यह साड़ी तो अभी एनीवर्सरी पर तनुज ने दिलवाई थी. और ये कंगन और पर्स मैंने एग्ज़ीबिशन से लिए थे.”

“कुछ भी कहो, आजकल मायके जाना कोई आसान सौदा नहीं रह गया है. जितना मिलता नहीं, उससे ज़्यादा तो देना पड़ जाता है. पिछली बार भतीजे-भतीजी के लिए ब्रांडेड कपड़े ले गई थी. भाभी के लिए इंपोर्टेड कॉस्मेटिक्स, घूमने, बाहर खाने आदि पर भी खुलकर ख़र्च किया और बदले में मिला क्या? एक ठीकठाक-सी साड़ी. अभी तो उसे तैयार करवाने में हज़ार-पांच सौ और ख़र्च हो जाएंगे.” मधु ने आंखें और उंगलियां नचाते हुए बताया, तो नेहा को वितृष्णा-सी होने लगी. अपनी किताबें समेटकर वह स्टाफ रूम से क्लास का बहाना बनाकर निकल ली.

इतने दिनों बाद क्लास लेेकर उसे बहुत अच्छा लगा. अगला पीरियड खाली था, पर उसका स्टाफ रूम में लौटने का मन नहीं हुआ. साथी अध्यापिकाओं की ओछी मानसिकता देखकर उसका मन बुझ-सा गया था. उसके कदम स्वत: ही लाइब्रेरी की ओर उठ गए. वहां के शांत वातावरण में उसके उ़िद्वग्न मन को कुछ राहत मिली. टेबल पर पर्स और हाथ की किताबें रखकर उसने अपना सिर कुर्सी से टिका दिया. मूंदी हुई पलकों के पीछे मायके में कुछ दिन पूर्व बिताया समय साकार हो उठा. कैसे उसे देखते ही मम्मी-पापा के चेहरे खिल उठे थे. मां ने उत्साह से बताया था कि हमेशा धीर-गंभीर और चुप-चुप रहनेवाले पापा पिछले एक घंटे से उसके इंतज़ार में गलियारे में चक्कर काट रहे थे. “बातें कुछ नहीं करनी हैं इन्हें. बातें तो तुझसे मैं ही करूंगी. ये तो तुझे देखकर ही तेरे मन का पूरा एक्सरे अपने दिल में उतार लेते हैं. क्यूं जी, हो गई तसल्ली आपको? ख़ुश है न आपकी लाड़ली?”

तब तक भइया-भाभी, भतीजा-भतीजी को भी उसके आने की भनक लग चुकी थी. सबने उसे चारों ओर से घेर उसकी, तनुज की, यशी की कुशलक्षेम पूछना आरंभ किया, तो वह निहाल हो उठी थी. कुछ रिश्तों की ख़ुशबू ख़ुद में ही चंदन जैसी होती है. ज़रा-सा अपनापन घिसने पर ही रिश्ते दिल से महक जाते हैं. एक-एक को उनके साथ न आ पाने की न केवल सफ़ाई देनी पड़ी थी, वरन यह वादा भी करना पड़ा था कि यशी की परीक्षाएं समाप्त होते ही वे तीनों आएंगे और ज़्यादा दिनों के लिए आएंगे.

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“वैसे हर बार क्या मैं ही आती रहूंगी? दूरी तो उतनी ही है. कभी तुम लोग भी तो प्रोग्राम बना लिया करो. हमें भी इतनी ही ख़ुशी होगी.” नेहा ने झूठ-मूठ नाराज़गी दर्शाई थी. वैसे इतना प्यार और अपनापन पाकर वह मन ही मन आल्हादित थी.

“सही है बुआ! इस बार राखी पर मैं सबको लेेकर आऊंगा. दादा-दादी को भी.” भतीजे ने जोश में वादा किया था.

सबके साथ मम्मी-पापा के भी अपने घर आने की कल्पना मात्र से ही नेहा को गुदगुदी-सी हो आई थी.

“मैं चाय लेकर आती हूं.” भाभी उठकर जाने को हुईं, तो नेहा ने हाथ पकड़कर उन्हें बैठाना चाहा. “मैंने ट्रेन में पी ली थी. ज़रा भी इच्छा नहीं है. आप बैठो.”

“अरे, ऐसे कैसे? मम्मी-पापाजी तो कब से इंतज़ार कर रहे हैं कि नेहा आएगी, तो उसके साथ ही चाय पीएंगे.”

“ओह! मुझे पता नहीं था. ठीक है, मैं सबके साथ आधा कप ले लूंगी.” नेहा अभिभूत थी.

चाय के साथ भइया ने करारी कचौरियों का पैकेट खोला, तो सबकी लार टपक पड़ी. “ऑफिस से आते हुए मंगू हलवाई से लेकर आया हूं ख़ास तेरे लिए. उसे करारी निकालने को कहा, तो पूछने लगा नेहा बिटिया आई हुई है क्या? मेरे हां कहने पर कहने लगा, सवेरे उसकी पसंद की करारी जलेबियां निकालकर रखूंगा. नाश्ते के लिए ले जाना.”

“अच्छा जी, जलेबियां तो मुझे भी पसंद हैं. कभी मेरे लिए तो जल्दी उठकर नहीं लाए?” चाय लेकर आती भाभी ने इठलाते हुए कहा और साथ ही नेहा को चुपके से इशारा भी कर दिया.

“तुम्हारी शुगर बढ़ी हुई है, थोड़ा कंट्रोल करो.” भइया ने भी नहले पर दहला जड़ दिया, तो पापा बहू के पक्ष में बोल उठे थे.

“इस नालायक को कहती ही क्यूं है बेटी? तेरा जब भी खाने का मन हो मुझसे कहना. मैं मॉर्निंग वॉक से लौटता हुआ ले आऊंगा.”

“बुआ, आप मठरी तो ले ही नहीं रही हो. मैंने बेली हैं.” नन्हीं-सी भतीजी ने ठुनकते हुए आग्रह किया, तो नेहा ने एक साथ दो मठरी उठा ली थी. “अरे, हमें तो पता ही नहीं था कि बिन्नी इत्ती बड़ी हो गई है कि मम्मी को काम में हाथ बंटाने लगी है.” नेहा ने भतीजी को गोद में बैठा लिया था.

“मम्मी को नहीं, दादी को. मठरियां मम्मीजी ने बनाई हैं. ख़ास आपके लिए अपने हाथों से.”

“वो तो ठीक है मां, पर नेहा के हाथ में मठरी का पूरा डिब्बा मत दे देना, वरना याद है न डिब्बा और अचार का मर्तबान सब साफ़.” भइया ने याद दिलाया, तो नेहा झेंप गई. मम्मी हंस-हंसकर सबको बताने लगीं कि कैसे बचपन में नेहा उनके सो जाने पर आस-पड़ोस की सब सहेलियों को बुला लाती थी और वे सब मिलकर सारी मठरियां और अचार चट कर जाती थीं.

हंसी-मज़ाक और बातों की फुलझड़ियों ने चाय नाश्ते का मज़ा दुगुना कर दिया था. भाभी ट्रे समेटकर जाने लगीं, तो नेहा ने साथ लाए तरह-तरह के खाखरे और चिक्की के पैकेट्स निकालकर भाभी को पकड़ा दिए. वे बोल उठीं, “अरे, इतने सारे!”

“मिठाई तो आजकल कोई खाता नहीं है. ये सबको पसंद है तो ये ही ले आई.” कहते हुए नेहा ने दोनों बच्चों को उनकी मनपसंद बड़ी-बड़ी चॉकलेट पकड़ाई, तो वे भी ख़ुशी से उछलते-कूदते बाहर खेलने भाग गए.

“पापा, ये आपके लिए स्टिक! सुबह आप वॉक पर जाते हैं, तो मम्मी को चिंता बनी रहती है, कहीं कुत्ते पीछे न पड़ जाएं.” नेहा ने अपने पिटारे में से अगला आइटम कलात्मक छड़ी निकालते हुए कहा.

“अरे वाह, यह तो बड़ी सुंदर है. मूठ तो देखो कैसी चमक रही है!” पापा ने हाथ में छड़ी पकड़कर अदा से घुमाई, तो भावविभोर नेहा खिल उठी.

“और मम्मी, ये वो ओर्थो चप्पल, मैंने आपको फोन पर बताया था न! इन्हें पहनकर चलने से आपकी एड़ियों में दर्द नहीं होगा.”

“काफ़ी महंगी लगती हैं.” चप्पलों को हाथ में लेेकर उलट-पुलटकर देखती मम्मी के हाथ से नेहा ने चप्पलें खींच लीं और ज़मीन पर पटक दी. “ये पांव में पहनने के लिए हैं. पहनकर, चलकर दिखाओ. आरामदायक है या नहीं?”

“टन टन टन…” अगले पीरियड की घंटी बजी, तो नेहा की चेतना लौटी. फ़टाफ़ट अपना पर्स और पुस्तकें संभालती वह अपनी कक्षा की ओर बढ़ चली. हिंदी व्याकरण का क्लास था. इस विषय पर तो उसकी वैसे ही गहरी पकड़ थी. नेहा को याद आया उस दिन वह रसोई में भाभी का हाथ बंटाने गई, तो भाभी ने उसके हाथ कसकर थाम लिए थे.

“नहीं दीदी, ये सब मैं कर लूंगी. आपसे एक दूसरा बहुत ज़रूरी काम है. आपके भतीजे की परीक्षाएं समीप हैं. और सब विषय तो मैं और आपके भइया उसे तैयार करवा देंगे, बस हिंदी, वो भी विशेषकर व्याकरण यदि आप उसे यहां रहते तैयार करवा देंगी, तो हम निश्‍चिंत हो जाएंगे.”

“हां-हां क्यों नहीं! वो भी करवा दूंगी. अभी खाना तो बनवाने दो.” पर भाभी ने एक न सुनी थी. दोनों बच्चों को कमरे में नेहा के सुपुर्द करके ही रसोई में लौटी थीं. नेहा ने भी उन्हें निराश नहीं किया था. दोनों बच्चों की ख़ूब अच्छी तैयारी करवा दी थी.

‘आज घर लौटकर बात करती हूं कैसी हुई दोनों की परीक्षाएं?’ तेज़ी से क्लास की ओर कदम बढ़ाती नेहा के दिमाग़ में विचारों का आदान-प्रदान भी तेज़ी से चल रहा था. शाम को घर लौटते हुए सास-ससुर की दवाइयां भी लेनी हैं. नेहा ने पर्स खोलकर चेक किया. ‘हूं… दोनों की दवा की पर्चियां तो सवेरे याद से रख ली थीं. तनुज तो व्यस्तता के मारे कभी पर्चियां रखना भूल जाते थे, तो कभी लाना. अब तो यह ज़िम्मेदारी उसी ने संभाल ली है, तभी तो उस दिन मायके में भी वह मम्मी-पापा के साथ जाकर उनके सारे रेग्युलर टेस्ट करवा लाई थी. साथ ही महीने भर की दवाइयां भी ले आई थी.

‘भइया तो हर बार करवाते ही हैं. मैं वहीं थी, फ्री थी, तो साथ चली गई.’

इतनी छोटी-सी मदद को भी सारे घरवालों ने सिर-आंखों पर लेेकर उसे आसमां पर बैठा दिया था. याद करते हुए नेहा की आंखें नम हो उठीं, जिन्हें चुपके से पोंछते हुए वह कक्षा में दाख़िल हो गई थी.

शाम को नेहा सास-ससुर की दवाइयां लेकर घर पहुंची, तो पाया दोनों किसी गहन चर्चा में मशगूल थे.

“रितु आ रही है, चुन्नू को लेकर. दामादजी को तो अभी छुट्टी है नहीं.”

“अरे वाह रितु आ रही है! यह तो बहुत ख़ुशी की बात है.” नेहा उत्साहित हो उठी. हमउम्र रितु उसकी ननद कम सहेली ज़्यादा थी.

“उसका जन्मदिन भी है. सोच रहे हैं सबसे बढ़िया महंगे होटल में पार्टी रखें. यहां उसके जो ससुरालवाले हैं, उन्हें बुला लेंगे. कुछ अपने इधर के हो जाएंगे. तुम और तनुज जाकर उसके लिए अच्छी महंगी साड़ी ख़रीद लाओ. दामादजी और चुन्नू के भी बढ़िया कपड़े ले आना. रितु को लेने तो आएंगे ही, तब दे देंगे. तब हमेशा की तरह ससुरालवालों के लिए साथ मिठाई, मेेवे वगैरह भी दे देंगे. सबको पता तो चले उसका मायका कितना समृद्ध है. सुनिएजी, आप तो आज ही बैंक से 20-30 हज़ार निकाल लाइए.” सास की बात समाप्त हुई, तो नेहा के सम्मुख ननद का उदास चेहरा घूम गया. पिछली बार उसने अपने दिल की बात सहेली समान भाभी के सम्मुख खोलकर रख दी थी.

“भाभी, माना मम्मी-पापा आप सब समर्थ हैं. बहुत बड़ा दिल है आप सबका, पर मुझे हर बार आकर आप लोगों का इतना ख़र्चा करवाना अच्छा नहीं लगता. एक संकोच-सा घेरे रहता है हर समय. लगता है, सब पर बोझ बन गई हूं.”

“ऐसा नहीं सोचते पगली. सब तुम्हें बहुत प्यार करते हैं.” नेहा ने उसे प्यार से समझाया था.

लेकिन आज नेहा को वह समझाइश अपर्याप्त लग रही थी. उसे मायके में बिताया अपना ख़ुशगवार समय याद आ रहा था. भइया उस दिन उसे उसकी मनपसंद ड्रेस दिलवाने बुटिक ले गए थे. वापसी में उन्होंने एक लंबा रास्ता पकड़ लिया, तो नेहा टोक बैठी थी, “इधर से क्यों?”

“इधर से तेरा स्कूल आएगा. मुझे लगा तुझे पुरानी यादें ताज़ा करना अच्छा लगेगा.”

सच में स्कूल के सामने पहुंचते ही नेहा की बांछें खिल गई थीं. “अरे यह तो काफ़ी बदल गया है… वो कृष्णा मैम जा रही दिखती हैं. ये अभी तक यहां पढ़ाती हैं?” नेहा उचक-उचककर खिड़की से देखने लगी, तो भइया ने कार रोक दी थी.

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“जा मिल आ मैम से. मैं यहीं गाड़ी में बैठा कुछ फोन कॉल्स निबटा लेता हूं.”

नेहा को तो मानो मुंहमांगी मुराद मिल गई थी. अचानक ही उसके पर निकल आए थे. उड़ते हुए वह अगले ही पल अपनी मैम के सम्मुख थी. वे भी उसे देखकर हैरान रह गईं. बातों का सिलसिला शुरू हुआ, तो स्कूल की घंटी बजने के साथ ही थमा. नेहा ने स्कूल के बाहर खड़े अपने चिर-परिचित दीनू काका से भी दुआ-सलाम करके दो कुल्फियां लीं और भइया की ओर बढ़ आई थी. “देखो न भइया, दीनू काका कुल्फी के पैसे नहीं ले रहे.”

“चिंता न कर, मैं फिर कभी दे दूंगा.”

यही नहीं, लौटते में भइया ने उसे उसकी सहेली के घर ड्रॉप कर दिया था. “फोन कर देना, लेने आ जाऊंगा.”

दो घंटे बाद नेहा घर लौटी थी, तो उसका हंसता-खिलखिलाता चेहरा बता रहा था कि वह अपना बचपन फिर से जी आई है. और यहां नादान साथी अध्यापिकाएं पूछ रही हैं ‘मायके से लौटी है, क्या लाई दिखा?’

अब भाई-भाभी के स्नेह को कोई कैसे दिखा सकता है? मम्मी-पापा के लाड़ को कोई कैसे तौल सकता है? दिनभर बुआ… बुआ करनेवाले बच्चों का प्यार कैसे मापा जा सकता है? प्यार को यदि पैसे से तौलेंगे, तो उसका रंग हल्का नहीं पड़ जाएगा? ज़िंदगी के बैंक में जब प्यार का बैलेंस कम हो जाता है, तो हंसी-ख़ुशी के चेक भी बाउंस होने लगते हैं. हर बेटी की तरह उसकी तो एक ही दुआ है कि स्नेहिल धागों की यह चादर उसके सिर पर हमेशा बनी रहे. यहां आकर वह फिर से अपना बचपन जीए, भूल जाए लंबी ज़िंदगी की थकान और फिर से तरोताज़ा होकर लौटे अपने आशियाने में.प्यारी ननदरानी रितु का जन्मदिन वह अनूठे स्नेहिल अंदाज़ में मनाएगी. सोचते हुए नेहा के चेहरे पर भेद भरी मुस्कान पसर गई थी. मम्मीजी, पापाजी और तनुज से पूछ-पूछकर वह चुपके-चुपके रितु की सहेलियों की सूची तैयार करने लगी. उसे खाने में जो-जो पसंद है, वह मम्मीजी के साथ मिलकर तैयार करेगी. यशी ने उस ख़ास दिन घर को सजाने की ज़िम्मेदारी ख़ुशी-ख़ुशी ओढ़ ली थी. चुन्नू को बहलाने के लिए वह सहेली का डॉगी भी लानेवाली थी.

‘अपनेपन की यह भीनी-भीनी ख़ुशबू रितु को हर अपराधबोध से उबार स्नेहरस में सरोबार कर बार-बार मायके का रुख करने पर मजबूर कर देगी.’ सोचते हुए नेहा सूची को कार्यरूप देने में जुट गई.

shaili mathur

   शैली माथुर

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कहानी- वापसी (Short Story- Wapsi)

परिवार के इस आपसी वार्तालाप से संशय की दीवारें ख़ुद ही ढह गई थीं. उस घर का हर सदस्य सहज था. न कोई शिकायत थी, न कोई मन आहत. आपसी संवाद कायम था. कहीं कोई मौन, शंका-आशंका दीवारें खड़ी नहीं कर रही थीं.

Kahani

“पापा, देखिए तो ज़रा किसका फोन है.” नैना की आवाज़ पर शरद ने बगल में बजते फोन का रिसीवर उठा लिया.

“हेलो.” बोलते ही पहचानी-सी आवाज़ आई, “अंकल प्रणाम, नारायण बोल रहा हूं.” शरद अपने मथुरावाले घर के किराएदार नारायण की आवाज़ पहचान गए. कुछ कहते, उससे पहले ही नारायण एक सांस में बोलता चला गया, “अंकल, मैंने मकान के नीचे के कमरों की साफ़-सफ़ाई करवा दी है. अब आप जब भी आओ परेशानी नहीं होगी. दो-तीन दिन में लॉन की घास भी कट जाएगी, बहुत बड़ी हो गई थी और हां, बरसात में पीछेवाली नाली ब्लॉक हो गई थी, सो पीछेवाले कमरे में पानी अंदर चला गया था. एक बड़ा बक्सा रखा है, उसमें शायद आंटी बिस्तर-रजाई रखती थीं, वो बक्सा नीचे से भीगा लगा, शायद पानी गया हो, अब आप लोग आकर देखिएगा. इतने दिनों बाद आप घर आएंगे, बड़ा अच्छा लगेगा.”

“कौन मैं…” हकलाते हुए शरदजी के मुंह से इतना ही निकला. कुछ समझते, उससे पहले ही नैना ने फोन का रिसीवर उनके हाथ से ले लिया. शरदजी इत्मीनान से बात करती बहू नैना को देखते रहे. वो धीमे शब्दों में फुसफुसाती हुई बोल रही थी, पर कुछ अस्फुट शब्द कानों में पड़ गए. “अब तुम फोन मेरे मोबाइल पर करना, वहां का इंतज़ाम बढ़िया रखना. पापा आ रहे हैं कोई द़िक्क़त नहीं होनी चाहिए.” शरदजी को मानो सांप सूंघ गया.

उनके घर की साफ़-सफ़ाई हो रही है यानी उनका दाना-पानी यहां से उठ गया है. दस महीने पहले वो पत्नी शिखा के देहांत के बाद उस सूने घर को किराएदार नारायण के भरोसे छोड़कर अपने बेटे शौर्य के यहां आगरा आ गए, पर रम नहीं पाए. दस महीने बाद भी पत्नी वियोग से उबरकर एक नई जगह पर स्थापित होना उनके लिए मुश्किल साबित हो रहा था. पर यहां रहना इतना भी मुश्किल नहीं था कि वो पुराने घर में जाने की बात सोचें, जिसमें शिखा की यादों के साथ अकेलेपन की टीस और वीरानी थी. लेकिन उनकी यात्रा का बाक़ायदा इंतज़ाम करवाया जा रहा है और उन्हें ख़बर तक नहीं है, ये जानकर वे बेचैन हो उठे थे.

नैना ने रिसीवर रख दिया, तो शरदजी ने प्रश्‍नवाचक नज़रें उस पर टिका दीं, पर वो बिना कुछ कहे वहां से चली गई. शरदजी सोच में डूब गए कि अब उन्हें अपने पुराने घर में रहना होगा. कैसे रह पाएंगे वो अकेले? कैसा लगेगा बिना पत्नी के उस घर में जीवनयापन करना? यहां कम से कम बेटे-बहू के होते हुए हर प्रकार की चिंता से तो मुक्त थे, पर उन्होंने इसे अपना घर माना भी कब था. इसीलिए शायद बेटे ने उन्हें घर भेजने का इंतज़ाम कर दिया है.

मुखर्जी साहब का कहा सच हो गया, “अगर हम बच्चों से दूरी बनाकर रखें, स्वयं मेहमानों-सा आचरण करें और बच्चों से अपेक्षा करें कि वो हमें घर का सदस्य मानें, तो ये कैसे संभव है. अपनी पत्नी के जाने के बाद मैं बेटे के पास एक मजबूरी समझकर रहता, तो जीना मुश्किल हो जाता. मेरा भी और इन बच्चों का भी. जब रहना ही है, तो मन से जुड़कर रहो.” मुखर्जी साहब के कहे फलस़फे को वो भी सही समय पर जीवन में उतार लेते, तो शायद इस उम्र में अकेले रहने का दंश न सहना पड़ता. पर वो तो पत्नी वियोग में ऐसे डूबे कि अपने ही बच्चों का सुख पराया दिखने लगा था. उनका दुख स़िर्फ उनका है इसी को सत्य मानते आए.

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अपनी पत्नी की मृत्यु के दस महीने बाद भी बेटे-बहू को कुछ सहज पलों को जीते देख वो असहज होते. शिखा के जाने का असर स़िर्फ उन पर पड़ा है, उनके मन में ये बात घर कर गई थी. पत्नी की मृत्यु के छह महीने बाद तीन साल के पोते का जन्मदिन आया. बेटे-बहू दोनों उम्मीद लगाए बैठे थे कि पापा बर्थडे को लेकर कोई पहल करें, पर वो निर्विकार बने बैठे रहे. शाम तक उनकी ओर से कोई पहल न होती देख, बहू ने बाहर डिनर का प्रोग्राम बना लिया. शरदजी को चलने के लिए कहा गया, तो बड़ी मुश्किल से जाने को तैयार तो हुए, पर वहां मौन साधे रहे. ऐसे माहौल में नैना और शौर्य के चेहरे अपराधबोध से भर गए थे.

शरद को याद आया कि लगभग उस दिन के बाद से ही उन्होंने नैना के स्वभाव में बदलाव महसूस किया. अब नैना उनको छोटे-छोटे काम बताने लगी थी, मसलन- दूध ले आना, गमलों में पानी डाल देना. सनी को स्कूल बस स्टॉप तक छोड़ आने को कहना. शौर्य उसे टोकता, तो कहती “पापा कब तक अपने कमरे में यूं बैठे रहेंगे, कुछ करेंगे तो मन लगेगा.” शरदजी को नैना की ये बातें नागवार लगती थीं. काश! वो पहले ही ख़ुद को थोड़ा बदलते, तो आज ये स्थिति नहीं आती.

आज उन्हें अपने पड़ोसी मुखर्जी साहब के घर देखा वो परिदृश्य भी याद आ रहा था, जहां सुबह-सुबह की भागदौड़ बिल्कुल उनके घर जैसी थी. उनके बहू-बेटे भी नैना और शौर्य की तरह सुबह की व्यस्तता में डूबे थे. उस दिन अख़बार की अदला-बदली होने के कारण शरदजी मुखर्जी साहब के घर गए, तो उन्होंने चाय पीने के लिए उनको बैठा लिया.

मुखर्जी साहब ख़ुद चाय बनाने लगे. आश्‍चर्य से ताकते शरदजी को उन्होंने बताया कि वे सुबह-सुबह घर के कामों में व्यस्त बहू के दैनिक कार्यों को बाधित नहीं करते हैं. और तो और, उस दिन ऑफिस जाते अपने बेटे से अपने टूटे चश्मे को बनवाने के लिए कहा, तो उनके बेटे के जवाब को सुनकर भी शरदजी को हैरानी हुई थी, “पापा, आज तो ऑडिट है, बिल्कुल समय नहीं है. आज नहीं करवा पाऊंगा.” अपने बेटे के इंकार पर मुखर्जी साहब बिना शिकन कुछ चिंता में डूबे-से बोले, “अरे, फिर बिजली का बिल कैसे जमा होगा? उसकी तो आज आख़िरी तारीख़ है. आज मैं ही निकलता हूं जमा करवा आऊंगा.” इस बात पर उनकी बहू बोली, “ना ना पापा, आप कहां जाएंगे. मौसम का भी कोई भरोसा नहीं, कब बरसात हो जाए. मैं किसी से बात करती हूं. बिल जमा हो जाएगा और हां आज मार्केट जाऊंगी, तब आपका चश्मा ठीक करवा लाऊंगी.” परिवार के इस आपसी वार्तालाप से संशय की दीवारें ख़ुद ही ढह गई थीं. उस घर का हर सदस्य सहज था. न कोई शिकायत थी, न कोई मन आहत. आपसी संवाद कायम था. कहीं कोई मौन, शंका-आशंका दीवारें खड़ी नहीं कर रही थीं. शरदजी मन ही मन कल्पना कर रहे थे कि यदि शौर्य उनके किसी काम को करने से मना करता, तो क्या होता? क्या वे मन ही मन आहत होकर मौन धारण कर लेते या फिर अपनी लाचारी पर कुढ़ते. मुखर्जी साहब के व्यवहार से उन्होंने सीख तो ली, पर उस सीख को जीवन में उतार पाने में देर कर दी. तभी तो उनको मथुरा वापस भेजने की तैयारी हो रही है.

आदत के अनुसार शरदजी ने आज भी मौन धारण कर लिया था. एक हफ़्ते बाद शौर्य और नैना को कुछ तैयारी में व्यस्त देख जान गए थे कि उनकी विदाई का समय आ गया है. बेटे-बहू उनको भेजने से पहले बताना भी ज़रूरी नहीं समझते, ये टीस लिए वो शौर्य से बात करने के लिए उनके कमरे तक पहुंचे, पर बहू की आवाज़ सुनकर क़दम ठिठक गए.

“पापा की उदासी घर में कैसी बोझिलता भर देती है ना.” जवाब में बेटे ने कहा, “मम्मी का चले जाना, फिर पापा का मथुरा से आगरा आना, जीवन में अचानक हुए इन परिवर्तनों को पापा अभी तक स्वीकार नहीं कर पाए हैं. सोच रहा हूं मथुरा जानेवाली बात पापा को बता दूं.”

“ना-ना कोई ज़रूरत नहीं है. वैसे लगता है कि उन्हें कुछ-कुछ अंदेशा है. उस दिन नारायण का फोन उन्होंने ही उठाया था.” बेटे-बहू के आपसी वार्तालाप को सुन वो बिना कुछ कहे वापस लौट आए. मन में शून्यता लिए वो आनेवाली संभावनाओं में डूब गए. दुख का सैलाब मन डुबोने लगा. देर रात तक वे अपनी दिवंगत पत्नी से बातें करते रहे. ऐसा प्रतीत हुआ मानो पत्नी शिखा तस्वीर से निकलकर सम्मुख आ खड़ी हुई हो. शरदजी सिसकी लेकर बोले, “तुम क्यों चली गई, ऐसे तो दो दिन के लिए भी कहीं जाना होता, तो दस इंतज़ाम करके जाती थी. हमेशा के लिए जाते समय मेरा ख़्याल नहीं आया?” लगा शिखाजी उनके हाथ को सहलाकर बोल रही हैं, “सुनो, तुम शौर्य के साथ ही रहना. सुन रहे हो ना…” शरदजी पत्नी से कुछ कहना चाहते थे, पर आवाज़ फंस गई, वे बोल रहे थे, पर शब्द मुंह से नहीं निकले.

“क्या हुआ पापा? कोई बुरा सपना देखा क्या?” शौर्य उनको हिलाते हुए कह रहा था. “जल्दी तैयार हो जाइए कहीं चलना है.”

“कहां?” शरदजी ने पूछा, तो पलभर मौन रहकर शौर्य बोला, “आज मथुरा जा रहे हैं.”

“क्यों? अचानक…” शरदजी के स्वर कुछ कातर से लगे, तो शौर्य सधे शब्दों में बोला, “आपका मन यहां नहीं लगता है. जिस हालात में आप यहां आए थे, उसमें ऐसा होना कोई आश्‍चर्य नहीं है. मथुरा में आपको शांति मिलेगी.” आशंका से घिरे शरदजी बहू-बेटे और पोते के साथ अपने घर मथुरा पहुंचे, तो विस्मय हुआ. जिस वीरान घर को वो रोते छोड़कर आए थे, उसमें फूलों और आम के पत्तों के बंदनवार लगे हुए थे.

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पंडितजी को देख वो चौंके. स्वागत करने आए उत्साहित नारायण से पूछा, “आज कुछ है क्या?” तो शौर्य ने झट से उनके चरण स्पर्श करते हुए कहा, “हां पापा, आज आपका जन्मदिन है और ये हमारी तरफ़ से आपको दिया उपहार है.” अकेलेपन का… फीकी मुस्कान के साथ शरदजी के मुंह से ये शब्द निकलते, उससे पहले ही शिखा की मुस्कुराती तस्वीर ने अपनी ओर ध्यान खींच लिया. नैना उत्साहपूर्वक बोली, “पापा, मम्मीजी आपके जन्मदिन पर पूजा रखवाती थीं. आपने एक दिन बताया था कि उनकी इच्छा भागवत पाठ करवाने की थी, पर बीमारी के चलते नहीं करवा पाईं. आज आपके जन्मदिन से भागवत पाठ का शुभारंभ होगा. अभी मंदिर के लिए निकलना है.” फीकी मुस्कान के साथ शरदजी बोले, “एक हफ़्ते क्या तुम लोग रुकोगे?”

“हां पापा, भागवत क्या आप अकेले संभाल पाएंगे. मंदिर में पूजा में रोज़ ही तीन-चार घंटे लगेंगे. रहना तो पड़ेगा. फिर हमारे रहने से आपका मन भी लगा रहेगा.” शौर्य की बात पर शरदजी कुछ नहीं बोले. पूजा विधि-विधान से आरंभ हो गई थी. भागवत कथा के दौरान शरदजी थक जाते, तो नैना उनको घर भेजकर ख़ुद रुक जाती. लौटकर आती, तो आश्‍चर्य होता. शरदजी उनके लिए चाय की व्यवस्था करके रखते. पानी समय से आता था, तो वे भरकर रख देते और तो और, सुबह टहलते हुए जाते और दूध-सब्ज़ी लिए आते. आख़िर ये सब बाद में भी तो देखना है. सोचकर वो घर के काम में हाथ बंटाते. पूजा की तैयारी बड़े मन से करते, लेकिन भागवत समाप्त हुई, तो शरदजी भावुक हो गए. आंखों में आंसू आने से रोक नहीं पाए, तो शौर्य उनके कंधे पर हाथ रखकर बोला, “पापा, आपका अकेलापन हमसे किसी भी तरह से छिपा नहीं है, पर अब आपको ख़ुद को संभालना होगा.” वापसी की तैयारी होने लगी थी. ‘जेहि विधि राखे राम तेहि विधि रहिए…’ बुदबुदाते शरदजी से शौर्य पूछ रहा था. “पापा, अब चलने की तैयारी करें.”

“हां बेटा, अब कब तक रुक पाओगे तुम लोग? चलना तो है ही.” शरदजी बोले, तो नैना ने कहा, “पापा, हम लोग कोशिश करेंगे कि दो-तीन महीने में कुछ दिन आगरा से मथुरा आ जाएं. हमारे लिए भी चेंज हो जाएगा. ठीेक है ना पापा.” “जैसा तुम लोग ठीक समझो. ख़ैर अपना ख़्याल रखना.” शरदजी डूबते मन से बोले, तो नैना और शौर्य चौंके. शौर्य ने विस्मय से पूछा, “ख़्याल रखना मतलब…? कहीं आप यहीं रुकने का मन तो नहीं बना रहे हैं.” शौर्य की बात सुनकर नैना कहने लगी, “कैसी बात कर रहे हैं आप. पापा यहां क्यों रहेंगे? फिर हमने वादा किया तो है कि यहां महीने-दो महीने में आते रहेंगे.”

“तो-तो क्या मैं भी चल रहा हूं?” शरदजी की आवाज़ ख़ुशी से कांपी, तो नैना अपने सिर पर हाथ रखती हुई बोली, “पापा, डाउट क्या है इसमें?” सब मौन एक-दूसरे के मन में हुई ग़लतफ़हमी को पढ़ रहे थे. तभी नैना संजीदगी से बोली, “पापा, जब तक मम्मी आपके साथ थीं, हमें तसल्ली थी कि एक-दूसरे का ख़्याल रखने के लिए आप दोनों साथ हैं. लेकिन अब आपके अकेले रहने की बात तो हम कभी सोच भी नहीं सकते हैं. मम्मी के जाने का दुख स़िर्फ आपको ही नहीं, हमें भी है. लेकिन हमें अब आपकी चिंता है. यूं दुखी रहने से आप डिप्रेशन में चले जाएंगे. हमने मम्मी को तो खो दिया, पर आपको नहीं खोना चाहते हैं. पापा, प्लीज़ मम्मी की ख़ुशनुमा यादों के सहारे ख़ुश रहने की कोशिश करिए. उन्हें ख़ुशी-ख़ुशी यादकर हमारे बीच उनको ज़िंदा रखिए.”

“एक बात समझ में नहीं आ रही है. ये बात आपके दिमाग़ में कैसे आई कि हम आपको यहां छोड़ जाएंगे.” शौर्य अब भी उलझन में था. उसके प्रश्‍न पर शरदजी कुछ संकोच से बोले, “अब क्या कहूं बेटे, शायद मैं ख़ुद को तुम लोगों के संग जोड़ नहीं पाया. मैं अपने ‘मैं’ के संग जीता रहा.”

“चलो छोड़ो ये सब. जो हुआ सो हुआ. हम आपके जन्मदिन को ख़ास तरी़के से मनाना चाहते थे, जिसके लिए शायद आप राज़ी ना होते, इसलिए आपसे साफ़ बात नहीं कर पाए.” नैना के कहते ही शरद पोते के हाथों को स्नेह से थामकर बोले, “चलो-चलो, अब निकलना भी है. देर करना ठीक नहीं. और नैना बेटी, खाने के चक्कर में मत पड़ना. सब कुछ बाहर मिलता है. बाहर ही खा लेंगे.” कहते हुए शरद चलने की तैयारी में जुट गए.

घर से बाहर जाते समय बैठक में लगी पत्नी की तस्वीर को शरदजी ने निहारा, तो नैना ने झट से तस्वीर उठा ली, फिर अपने ससुर को थमाते हुए बोली, “पापा, मम्मी को साथ लिए चलिए. जब हम, मतलब हम सब यहां आएंगे, तो मम्मीजी को साथ लेते आएंगे.” उसकी बात पर जिस तरह से शरदजी के चेहरे पर सुर्खी आई, उसे देख नैना और शौर्य दोनों हंस पड़े. शरदजी ने गाड़ी में बैठकर तस्वीर की ओर देखा, तो लगा शिखा मुस्कुराती हुई कह रही है, “आज इतने दिनों बाद तुम्हें देखकर अच्छा लग रहा है. मेरे बच्चों का ध्यान रखना. ये मेरी ही तो निशानियां हैं.” पत्नी की बात शरदजी के दिल में उतर गई. धीमे से सबकी नज़र बचाकर उन्होंने पत्नी की तस्वीर सीने से लगा ली. और मुस्कुरा पड़े. ‘मैं’ के संकीर्ण दायरे के बाहर की विस्तृत दुनिया देख आज वो ख़ुद को हल्का और प्रसन्न महसूस कर रहे थे.

Meenu Tripathi

      मीनू त्रिपाठी   

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कहानी- कुछ बात है उसमें (Short Story- Kuch Baat Hai Usme)

उसने ख़ुद नोट किया है कि वह सबको बहुत प्यार करती है. बहुत ध्यान रखती है हर बात का. वह कहां इन बातों में तनु की बराबरी कर सकता है. प्यार और चिंता वह भी करता है, पर जिस तरह तनु ख़ुद तकलीफ़ उठाकर, अतिरिक्त मेहनत करके घर में सबके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहती है, वह नहीं कर पाता है.

Kahani

राहुल अपनी पढ़ाई में व्यस्त था. उसकी परीक्षाएं चल रही थीं. डोरबेल बजी, तो मन मारकर उठा. वह घर पर अकेला था, तो उठकर देखना ही था. कुरियर था. उसने साइन करके कुरियर लिया. बाहर से देखने पर ही समझ आ रहा था कि कोई पत्रिका है. उसने लिफ़ा़फे को खोलकर पत्रिका निकाली, उल्टा-पल्टा, कहानियों में लेखकों के नाम देखे, अपनी मम्मी वसुधा शर्मा का नाम दिखा, तो होंठों पर एक भली-सी मुस्कुराहट आई. वह बेड पर लेटकर कहानी पर नज़र डालने लगा.

पढ़ते-पढ़ते उसकी मुखाकृति बदलती चली गई. चेहरा तन गया. यह क्या बात हुई, मम्मी की हर कहानी में पात्रों का बेटी के प्रति इतना स्नेह क्यों उमड़ता है? बेटियों की इतनी तारीफ़ क्यों करती हैं मम्मी हर कहानी में? बाहरी व्यक्ति समझे या न समझे, पर हम तीनों तो अक्सर समझ ही जाते हैं न कि कहानी किस पर लिखी है. और यह तनु! अभी कॉलेज से आएगी, आते ही कहानी पढ़ेगी और फिर मुझे चिढ़ाएगी, “अरे, मम्मी ने फिर इस कहानी में एक बेटी की तारीफ़ कर दी.” हर कहानी में मम्मी तनु की किसी बात की तारीफ़ करती हैं. राहुल को इतना ग़ुस्सा आया कि उसने पूरी कहानी पढ़ी ही नहीं. वसुधा इस समय किटी पार्टी में गई हुई थी, तनु कॉलेज और कपिल ऑफिस में थे. तीन बज रहे थे, राहुल का मूड बुरी तरह ख़राब हो गया था.

वसुधा सात-आठ वर्षों से लेखन में सक्रिय है. अक्सर राहुल मां की प्रकाशित कहानियां नहीं पढ़ता है, पर कभी-कभी मूड होता है, तो उठा लेता है. कई बार उससे दो वर्ष बड़ी बहन तनु ही ज़बर्दस्ती उसके हाथ में पत्रिका पकड़ाकर कहती है, “लो राहुल, पढ़ लो. बढ़िया कहानी लिखी है मम्मी ने.” और जब वह पढ़ता है, तो सिर पकड़ लेता है और चिढ़कर कहता है, “मां, आप कभी मेरी तारीफ़ नहीं लिख सकतीं क्या, बस इसके ही क़िस्से लिखती रहती हैं. ऐसा क्या है तनु में?” वसुधा हंसकर उसके बाल सहलाते हुए कहती है, “ओह बेटा, बुरा क्यों मानते हो? कहानी ही तो है, इतना सीरियसली क्यों ले रहे हो?”

“बाहरवाले समझेंगे कहानी ही है, पर हमें तो पढ़कर ही समझ आ जाता है न कि तनु की किस बात की तारीफ़ आपने कर दी है.” वसुधा के लिए राहुल को समझाना हर बार मुश्किल ही होता है. चार बजे तक तनु भी घर आ गई. राहुल का फूला मुंह देखकर पूछा, “क्या हुआ? भूख लगी है क्या?” राहुल ने ‘ना’ में गर्दन हिलाई. तनु फ्रेश होकर फिर पूछने लगी, “क्या हुआ? तैयारी नहीं हुई क्या पेपर की?”

“नहीं, पढ़ रहा हूं. थोड़ी बाकी है.” कहकर वह पढ़ने बैठ गया. तनु भी पास रखी पत्रिका उठाकर उत्साहित-सी मां की नई प्रकाशित कहानी पढ़ने लगी, तभी राहुल के मोबाइल पर वसुधा का फोन आया, “राहुल, हमारी एक फ्रेंड बीमार है. हम सब उसे देखने जा रहे हैं. थोड़ी देर हो जाएगी आने में.”

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“ओके मम्मी.” कहकर राहुल ने फोन रखा, पास में लेटी आराम कर रही तनु को मां के देर से आने के बारे में बताया, तनु ने पलभर सोचा, फिर कहा, “अच्छा, मम्मी देर से आएंगी.” फिर झटके से उठकर बैठ गई, “राहुल, आज डिनर मैं तैयार करके मम्मी को सरप्राइज़ दूं, वे थकी हुई आएंगी, तो उन्हें कुछ आराम मिल जाएगा.”

खाने-पीने के शौक़ीन राहुल की आंखें चमक उठीं, “तनु, बाहर से ऑर्डर कर लें?”

“नहीं, पापा भी आनेवाले हैं, उन्हें घर का ही पसंद है न!”

“फिर क्या बनाएगी?”

“बता क्या बनाऊं, पर कुछ आसान बताना, पुलाव और रायता बना लूं?”

“पुलाव खाने का तो मूड नहीं है, पूरी-सब्ज़ी बनाएगी?”

“ठीक है, कोशिश करती हूं.” तनु झटपट उठकर किचन में गई, आलू उबालने रखे और काम शुरू किया. मां को सरप्राइज़ देने के लिए वह उत्साहित थी, कपिल भी ऑफिस से आ गए. वसुधा के कुछ देर से आने की जानकारी उन्हें भी थी. तनु ने उत्साहित स्वर में बताया, “पापा, आज डिनर मैं तैयार कर रही हूं.”

“वाह! गुड. वसुधा तो ख़ुश हो जाएगी. आज उसे किचन से ब्रेक मिल ही गया.” पिता-पुत्री की स्नेहभरी बातचीत चलती रही. राहुल का ध्यान फिर कहानी की तरफ़ चला गया था, उसका मूड फिर ख़राब हो गया.

वसुधा आई, तो आम बातचीत के बाद फ्रेश होकर बोली, “चलो, अब तुम लोगों के लिए कुछ बनाया जाए.” वसुधा का हाथ पकड़कर तनु ने कहा, “मम्मी, आओ न किचन में.”

“चलो.” कहते हुए किचन में गई, तो सब्ज़ी बन चुकी थी, एक थाली में टेढ़ी मेढ़ी पूरियां बेलकर रखी हुई थीं. वसुधा ने हैरान होते हुए तनु को बांहों में भरकर कहा, “ओह बेटा, तुमने तो बहुत कुछ कर लिया.” पास खड़े राहुल के गंभीर चेहरे पर नज़र डालते हुए वसुधा ने पूछा, “क्या हुआ बेटा?”

“कुछ नहीं.”

तनु ने कहा, “मम्मी, आज इसका मूड ख़राब है, बता नहीं रहा है.”

वसुधा ने फिर पूछा, “क्या हुआ बेटा?”

“बाद में बताऊंगा.” कहकर राहुल अपने रूम में चला गया. काफ़ी काम तो तनु कर ही चुकी थी. तीनों को बिठाकर वसुधा ने खाना खिलाया, उसका खाना तो किटी में ही हो गया था. डाइनिंग टेबल पर भी राहुल का उखड़ा मूड सबने महसूस किया था. सोने से पहले तनु और कपिल दोनों ड्रॉइंगरूम में बैठे अपने फोन में व्यस्त दिखे, तो वसुधा चुपचाप राहुल के कमरे में गई. उसके सिर पर जैसे ही हाथ रखा, राहुल उसका हाथ हटाते हुए तुनका, “रहने दो मम्मी.”

“अरे, क्या हुआ? बताओ तो.”

राहुल जैसे तैयार ही बैठा था, “आज ही नहीं, हर बार सोचता हूं आपसे पूछूंगा, पर ख़ुद ही टाल जाता हूं. आज फिर आपकी कहानी छपी है. कहानी भले ही किसी और परिवार की है, पर उसमें भी एक बेटी के बारे में पढ़ते हुए यही लगा कि वह तनु पर है. आपकी हर कहानी में तनु क्यों आ जाती है, मैं क्यों नहीं? आज तो मुझे बहुत ग़ुस्सा आया आप पर. उस कहानी में मैं साफ़ समझ गया कि तनु की किस बात की तारीफ़ हो रही है, ऐसा क्या है तनु में!” बेहद गंभीर, शांत स्वर में वसुधा ने कहा, “बस इतनी-सी बात है? राहुल, मैं कुछ नहीं कहूंगी, मन शांत हो जाए, दिमाग़ ठंडा हो जाए, तो थोड़ा समय निकालकर ख़ुद ही सोचना कि ऐसा क्या है तनु में.” कहते-कहते वसुधा की आंखें भीग उठीं और गला रुंध-सा गया, तो राहुल चौंक गया, शर्मिंदगी-सी हो आई थी अचानक. राहुल का कंधा थपथपाकर वसुधा चुपचाप उठकर अपने बेडरूम में चली गई, कपिल भी सोने आ गए थे.

तनु भी सो चुकी थी, पर आज राहुल की आंखों में नींद नहीं थी. वह मां की कही बात पर ग़ौर करने लगा, ऐसा क्या है तनु में, जो उसमें नहीं है. यह उसे ही सोचना है. वह शांत, ठंडे मन से अपनी और तनु की तुलना करने लगा और एक-एक करके न जाने तनु की कितनी बातें उसे याद आती गईं, जो उसके मन पर छाई धुंध को साफ़ करती चली गईं. हां, वह नहीं है तनु की तरह, उसमें वो सब ख़ूबियां कहां हैं, जो तनु में हैं.

उससे दो साल बड़ी तनु कितनी समझदार है. घर में सबका कितना ध्यान रखती है. मां की हर ख़ुशी में उसकी ख़ुशी छुपी होती है. उसने आज की ही बात से सोचना शुरू किया, वह भी तो कॉलेज से आई थी. मां को आराम मिल जाए, यह सोचकर फ़ौरन किचन में जाकर जो कर सकती थी, करने लगी थी. बेचारी पुलाव-रायता सोच रही थी, जो आसानी से बन भी जाता, पर वह पुलाव ज़्यादा पसंद नहीं करता. उसने कहां इस बात की चिंता की कि पूरी-सब्ज़ी बनाना तनु के लिए कितना मुश्किल होगा. उसने तो बस फ़रमाइश कर दी. यह जानते हुए भी कि मां भी तलने का काम तनु से नहीं करवातीं. और तनु, उसके चेहरे पर शिकन तक नहीं आई. मां को अक्सर कमरदर्द रहता है. तनु हर काम में इस बात का ध्यान रखती है कि मां के ऊपर अतिरिक्त काम का बोझ न पड़े और वह, किसी भी स्थिति में अपना खाना भी ख़ुद लेकर नहीं खाता, यह कहकर कि उसे ख़ुद लेना पसंद नहीं है. वह तो साफ़-साफ़ कह देता है कि उसे घर का कोई काम करना पसंद नहीं है और अगर कोई उसे बाहर का काम बताता है, तो भी वह टाल जाता है. उसे किसी काम में रुचि नहीं रहती. वह स़िर्फ अपने बारे में सोचता है. अपने दोस्त, कॉलेज, फुटबॉल, फोन, टीवी… बस, वह प्यार तो घर में सबको करता है, पर कोई भी काम करने से वह पीछे हटता है.

किसी का बर्थडे हो, मम्मी-पापा की मैरिज एनिवर्सरी हो, मदर्स डे हो या फादर्स डे- तनु कितने दिन पहले से ही उससे सलाह-मशवरा करके गिफ्ट्स के बारे में सोचती है, अपनी पॉकेटमनी का सारा पैसा ख़र्च कर देती है. और वह ख़ुद? ‘हां-हूं’ के अलावा कोई रुचि नहीं दिखाता, तनु भी दुखी होकर कह ही देती है, “मैं तुझसे कौन-सा पैसा मांग रही हूं, इंट्रेस्ट तो दिखा ही सकता है न राहुल?” उसने ख़ुद नोट किया है कि वह सबको बहुत प्यार करती है. बहुत ध्यान रखती है हर बात का. वह कहां इन बातों में तनु की बराबरी कर सकता है. प्यार और चिंता वह भी करता है, पर जिस तरह तनु ख़ुद तकलीफ़ उठाकर, अतिरिक्त मेहनत करके घर में सबके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहती है, वह नहीं कर पाता है. किसी भी अवसर पर किसी के लिए कोई गिफ्ट लाने के लिए वह घंटों बाज़ार में भटकती है, पर उसके कहने पर भी वह कभी साथ नहीं जाता. अस्वस्थता के चलते मां जो कुछ खाना प्लेट में लगाकर तनु को देती है, वह बिना शिकायत के ख़ुशी-ख़ुशी खा लेती है और वह? किसी चीज़ से कोई समझौता नहीं. जो नहीं पसंद, वह नहीं खाना, चाहे कुछ भी हो जाए, चाहे उसके लिए भयंकर कमरदर्द से पीड़ित मां को दोबारा खड़े होकर कुछ अलग से बनाना पड़े. आत्ममंथन के साथ-साथ राहुल की आत्मग्लानि बढ़ती जा रही थी. पता नहीं, तनु की कितनी बातें याद आती जा रही थीं. बराबर के बेड पर गहरी नींद में सोई बहन के निश्छल चेहरे पर नज़र पड़ते ही राहुल के होंठों पर मीठी-सी मुस्कान आ गई. हां, कुछ बात है उसमें, सोचकर वह मन ही मन मुस्कुरा उठा. अचानक किचन में उसे कोई आवाज़ सुनाई दी. जाकर देखा वसुधा पानी पीने उठी थी. राहुल ने कहा, “क्या हुआ मां, सोई नहीं?”

“नहीं, नींद नहीं आ रही, तुम नहीं सोए?”

“नहीं.”

“क्यों?”

“बस, कुछ सोच रहा था.”

“क्या?”

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राहुल मुस्कुराते हुए बोला, “यही कि कुछ बात है उसमें.” वसुधा ने भी मुस्कुराते हुए उसका गाल थपथपा दिया, “तुम में भी तो है कुछ बात, जो इतनी रात तक बहन के बारे में सोच रहे हो. मेरा प्यारा बच्चा.” कहकर वसुधा ने अपने से ऊंचे होते बेटे के कंधे पर सिर रख दिया. राहुल की बातों से मन में एक मायूसी-सी आ गई थी, अब उसकी जगह निश्‍चिंतता ने ले ली थी.

“क्या सोच रही हो मां?”

“यही कि एक कहानी तो तुम पर लिखनी ही पड़ेगी.” ज़ोर से हंस पड़ा था राहुल.

Poonam Ahmed

पूनम अहमद

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कहानी- समझौता नहीं समर्पण (Short Story- Samjhota Nahi Samarpan)

“रिश्ते बैंक की तरह होते हैं. बैंक में स़िर्फ डिमांड करने से काम नहीं चलता, पहले वहां उतना ही डिपॉज़िट करना पड़ता है. इसी तरह रिश्तों में अगर प्यार और सम्मान चाहिए, तो प्यार और सम्मान देना सीखो. स़िर्फ डिमांड पर डिमांड करने से बहुत जल्दी अकाउंट खाली हो जाता है.”

 Hindi Kahani

”रिश्ते बनते तो प्यार से हैं, लेकिन निभाए समझौते से ही जाते हैं, जो जितना ज़्यादा समझौता करेगा, उसका जीवन और रिश्ता उतना ही सुखी दिखेगा लोगों को.” मनस्वी ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा.

बाहर घना कोहरा छाया हुआ था. बूंदें बरस रही थीं, दिलों की उदासी मौसम पर छाई थी और मौसम की उदासी दिलों पर. बादलों से पानी की नहीं, दर्द की बूंदें बरस रही थीं. अन्वी ने शॉल को अपने कंधों पर कसकर लपेट लिया.

“तो क्या दीदी, रिश्तों में प्यार कभी बचता ही नहीं है?”

“होता है, शुरू में रिश्ते प्यार के मलमल में ही लिपटे होते हैं, लेकिन बहुत जल्द ही प्यार का मलमल फट जाता है और रिश्तों को ढंकने के लिए समझौते का पैबंद लगाना पड़ता है. प्यार की बजाय समझौते का पैबंद ही मज़बूत होता है और ज़िंदगीभर रिश्तों को बांधे रखता है.” मनस्वी ने एक गहरी सांस ली. उसकी गर्म सांसों की धुंध खिड़की के शीशे पर जमा होकर उसे धुंधला कर रही थी.

“तो क्या रिश्ते कभी भी स़िर्फ और स़िर्फ प्यार के ही सहारे नहीं चल सकते?” अन्वी ने कंपकंपाती आवाज़ में पूछा, पता नहीं उसकी आवाज़ में कंपन ठंड के कारण थी या अपने सवाल के कारण.

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“रिश्ते खड़े तो प्यार के पैरों पर होते हैं, लेकिन उम्र का सफ़र समझौते की बैसाखी के सहारे तय करते हैं.” मनस्वी के स्वर में घना सर्द कोहरा छाया था.

अन्वी के पैर कंपकंपा गए. अब की उसने अपने पैरों को शॉल से ढंक लिया, फिर भी ऐसा लग रहा था, जैसे कमज़ोर से हो गए हैं. पता नहीं उठकर चल पाएगी या नहीं. बाहर छाया कोहरा दोनों के सीने में जम गया था. लाइब्रेरी की क़िताबें भी अपने-अपने पन्नों को समेटकर आलमारियों में दुबकी पड़ी थीं. मन में छाया अंधेरा अब डूबती शाम का घनेरा बनकर कमरे में उतर गया.

“तुम दोनों यहां अंधेरे में बैठी क्या कर रही हो? मैं कब से तुम दोनों को सब ओर ढूंढ़ रही हूं और बैठी ही हो, तो कम से कम बत्ती तो जला लेतीं. शाम की चाय का भी होश नहीं रहा आज?” अम्मा ने आकर लाइब्रेरी की बत्ती जलाकर थोड़े रोष भरे स्वर में कहा, फिर मनस्वी की ओर संदेह भरी दृष्टि से देखा. मनस्वी उनकी दृष्टि में छिपे अर्थ को समझकर मन ही मन चिढ़ गई.

अचानक अम्मा के आने से अन्वी शर्मिंदा होकर हड़बड़ा गई. बातों में शाम कब इतनी गहरा गई पता ही नहीं चला.

“माफ़ करना अम्मा, दीदी से बातें करते हुए समय का ख़्याल ही नहीं रहा. मैं अभी चाय का इंतज़ाम देखती हूं.” अन्वी उठकर बाहर जाने लगी.

“चाय हो चुकी है, तुम दोनों के लिए बाहर टेबल पर रखी है, चलकर पी लो.” अम्मा का स्वर काफ़ी कुछ ठंडा हो चला था. मगर उनकी आंखों का रोष अब भी मनस्वी के चेहरे पर जमा हुआ था. आजकल वे देख रही थीं, अन्वी कुछ परेशान और उदास-सी लगती है. आकाश से भी कुछ खिंची-खिंची-सी रहती है. नई-नई शादी है, एक-दूसरे को समझने में, सामंजस्य बिठाने में थोड़ा समय तो लगता है, यही सोचकर उन्होंने अन्वी से कभी कुछ पूछा नहीं. यूं भी किसी के निजी जीवन में दख़ल देना उनके स्वभाव में नहीं था, लेकिन अब देख रही है, मनस्वी जब से आई है अन्वी के चेहरे की उदासी दिनोंदिन गहराती जा रही है. जब भी मनस्वी आती है, अन्वी के चेहरे पर उदासी की चादर खिंच जाती है.

छह महीने ही तो हुए हैं, अन्वी को आकाश की बहू बनाकर घर लाई हैं और आकाश की शादी के सालभर पहले बेटी मनस्वी की शादी हुई है. जितना होनहार और समझदार दामाद मिला है, उतनी ही प्यारी बहू भी मिली है. अन्वी घर की परंपराओं का पूरे मनोयोग से पालन करती है. घर के प्रति सारे कर्त्तव्य निभाती है, लेकिन दो-तीन महीनों से वे देख रही थीं, अन्वी बुझी-बुझी-सी रहती है और जब भी मनस्वी आती है, तब दोनों में पता नहीं क्या बातें होती हैं कि अन्वी और उदास हो जाती है. मनस्वी स्वयं भी तो वैसी ख़ुश नहीं दिखती, जैसी अभय जैसा पति मिलने के बाद उसे दिखना चाहिए.

क्या करें? मनस्वी बहुत डिमांडिंग है. रिश्तों से हर बात में बहुत ज़्यादा उम्मीदें रखती है. हर रिश्ते में उसे लगता है कि सामनेवाला उसे हथेली पर लेकर घूमता रहे, उस पर भी छोटी-छोटी बातों में उसके अहम् को ठेस लगती है और मुंह फूल जाता है. हर्ट होकर वह अपने आपको और दूसरों को दुखी करती रहती है. बचपन से ही उसे समझाने का बहुत प्रयत्न किया उन्होंने, लेकिन वह नहीं सुधरी. वो तो भला हो अभय जैसे समझदार पति का, जो तब भी हर बार स्थिति को संभाल लेता है, वरना भगवान जाने मनस्वी का ससुराल में क्या होता. फिर भी अभय के आगे उन्हें कभी-कभी अपराधबोध होने लगता है. मनस्वी की नादानियों को वो कितनी समझदारी से संभाल लेता है.

रात के खाने के टेबल पर अभय, आकाश और बाबूजी ने मिलकर मज़ेदार बातों से माहौल को काफ़ी हल्का-फुल्का कर दिया था. यूं भी घर की तीनों औरतों के मन पर छाये अपनी-अपनी चिंताओं के बादलों की उन्हें कोई ख़बर नहीं थी. वे तीनों तो अपनी रौ में मस्त थे. डिनर के बाद अभय मनस्वी को लेकर घर चला गया. अम्मा ने राहत की सांस ली. अगर मनस्वी यहां रहती, तो अन्वी और उसमें फिर पति-पत्नी के संबंधों को लेकर बात होती और अपने डिमांडिंग नेचर के कारण वह अन्वी को ग़लत राय ही देती.

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उस रात देर तक अन्वी को नींद नहीं आई, रिश्ते समझौते के पैबंद, समझौते की बैसाखियां, बस यही सब उसके मन-मस्तिष्क में घूमता रहा. क्या सच में ही कुछ ही दिनों में रिश्तों में प्यार ख़त्म हो जाता है और स़िर्फ समझौता ही करना पड़ता है. आकाश के साथ क्या हर बात में स़िर्फ एडजस्ट ही करना होगा? सुबह की चाय से लेकर रात में बिस्तर तक हर बात सिर झुकाकर माननी पड़ेगी. तभी लोगों के सामने यह भ्रम बना रहेगा कि वे दोनों बहुत सुखी हैं. ऐसे तो साथ सुख न होकर बोझ बन जाएगा.

दो दिन पहले की ही बात है. एक जगह शादी में जाना था. अन्वी ने अपनी मनपसंद साड़ी और गहने निकालकर रखे थे दोपहर से ही, लेकिन ऑफिस से आते ही आकाश ने उसकी पसंद की बजाय अपनी पसंद की साड़ी दी उसे पहनने को.

अब कपड़े भी दूसरे की मर्ज़ी से पहनने पड़ेंगे क्या? फिर आकाश ने भी पूछा था कि मैं क्या पहनूं? लेकिन अन्वी ने उस पर अपनी पसंद नहीं थोपी. कहा जो मन हो पहन लीजिए.

एक दिन उसका मनोहर डेयरी में खाना खाने का मन था, लेकिन आकाश उसे विंड एंड वेव्स ले गया. ऐसी कितनी ही बातें हैं, जो रोज़ होती हैं और अन्वी को ही आख़िर समझौता करना पड़ता है, लेकिन ये सारी बातें कहे किससे, कौन समझेगा? बस, एक मनस्वी दीदी हैं, जिनसे बातें करके थोड़ा मन हल्का हो जाता है, वे ही समझाती हैं अन्वी को.

सात-आठ दिन बाद मनस्वी फिर आई, एक ही शहर में ब्याही थी, तो आना-जाना लगा रहता था. दिन में दोनों शॉपिंग करने गईं और फिर चार बजे तक घर आ गईं. अन्वी ने सबके लिए चाय बनाई, अम्मा-बाबूजी को उनके कमरे में चाय देकर अन्वी अपनी और मनस्वी की चाय लेकर बेडरूम में आ गई. दोनों बातें करने लगीं. अन्वी ने मनस्वी के साथ साड़ी और मनोहर डेयरीवाली बातें शेयर कीं. मनस्वी ने उसके दुख को समझा, समझौता करना पड़ा उस पर सहानुभूति जताई. दोनों अपने में ऐसी खोई हुई थीं कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कब से अम्मा दरवाज़े की आड़ में खड़ी होकर उनकी बातें सुन रही थीं.

जब अम्मा से रहा नहीं गया, तो वे कमरे में अंदर चली आईं. उन्हें देखकर दोनों हड़बड़ा गईं.

“शाबाश बेटा! रिश्तों का क्या ख़ूब विश्‍लेषण किया है तुम लोगों ने. प्यार को एकबारगी सिरे से ख़ारिज करके समझौते की बैसाखियां ही लाद दीं. लेकिन एक बार भी सोचा नहीं कि प्यार के पैर पोलियो की बीमारी से तुमने ही तो ख़राब किए हैं.” अम्मा दोनों की ओर देखकर बोलीं.

“जी मांजी, हम तो बस…” अन्वी अम्मा के सामने अपनी कही हुई बातें याद करके शर्मिंदा-सी हो गई.

“पहले तो मैं तुम्हारी ही समस्या का समाधान कर दूं अन्वी. शनिवार-रविवार को मनोहर डेयरी में इतनी भीड़ होती है कि वहां पैर रखने की भी जगह नहीं मिलती और शोरगुल अलग होता है. हो सकता है, आकाश तुम्हें आराम और सुकून के पल देना चाहता हो, इसलिए तुम्हें बड़े और खुले रेस्टोरेंट में ले गया. इसे तुम सकारात्मक ढंग से भी ले सकती थी, लेकिन उसके प्यार को तुमने समझौते का बोझ बनाकर अपने मन पर ओढ़ लिया और शादी में तुम लाइट पीच कलर की साड़ी पहन रही थी, जबकि तुम्हारा रंग गोरा है, तो आकाश ने इसीलिए डार्क कलर की साड़ी पहनने को कहा था, क्योंकि रात में वह रंग तुम पर ख़ूब खिल रहा था. पति अगर यह चाहे कि उसकी पत्नी सुंदर दिखे, तो यह उसका प्यार होता है न कि किसी तरह का समझौता करने का दबाव.” अम्मा ने एक अफ़सोसभरी निगाह अन्वी पर डाली.

अन्वी सिर नीचे किए चुपचाप सुनती रही. उसकी आंखों से बस आंसू बरसने ही वाले थे.

“किसी अपने की ख़ुशी के लिए उसकी कोई बात मान लेना समझौता नहीं, सहज समर्पण होता है, मगर तुम लोग समझौते और समर्पण के बीच के अंतर को समझ ही नहीं पाते हो. समर्पण में आपसी सामंजस्य होता है. उससे रिश्तों में प्रेम बना रहता है, लेकिन अगर रिश्ते में समझौते की बैसाखी थाम लोगी, तो दोष तुम्हारा है, रिश्ते का नहीं.” अम्मा मनस्वी की ओर देखकर कठोर स्वर में बोलीं.

“रिश्ते बैंक की तरह होते हैं. बैंक में स़िर्फ डिमांड करने से काम नहीं चलता, पहले वहां उतना ही डिपॉज़िट करना पड़ता है. इसी तरह रिश्तों में अगर प्यार और सम्मान चाहिए, तो प्यार और सम्मान देना सीखो. स़िर्फ डिमांड पर डिमांड करने से बहुत जल्दी अकाउंट खाली हो जाता है.” अम्मा ने एक बार फिर मनस्वी पर कटाक्ष किया.

मनस्वी गर्दन झुकाए चुपचाप सुन रही थी और अन्वी की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे.

“हलवे में अगर मिठास चाहिए, तो उसमें चीनी मिलानी पड़ती है. करेले का रस मिलाकर मिठास की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. इतना ज़्यादा डिमांडिंग बनोगी मनस्वी, तो रिश्तों और जीवन में हमेशा कड़वाहट व दूरियां ही हासिल होंगी, क्योंकि तुम देना नहीं जानती स़िर्फ लेने की इच्छा रखती हो.” अम्मा एक गहरी सांस भरकर बोलीं. “समझौते का ज़हर अपने दिमाग़ से निकालकर समर्पण के रेशमी धागों में बंधकर प्रेम को सहेजना सीखोगी, तो दांपत्य का सफ़र

उम्रभर प्यार से चलता रहेगा.” कहकर अम्मा कमरे से बाहर चली गईं.

मनस्वी और अन्वी अपराधबोध से सिर झुकाए खड़ी थीं, लेकिन घने कोहरे को चीरकर सुनहरी धूप के समान दोनों के मन में अम्मा समर्पण के रेशमी धागे बुनने में सफल हो चुकी थी.

–  अभिलाषा राहुरीकर

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कहानी- पिघलती सिल्लियां (Short Story- Pighalti Silliyaan)

काश सुजीत, तुम कहकर जाते, यूं ही बिना कुछ कहे अचानक चले गए. बेटे के आने का इंतज़ार तो कर लेते… उसे सच तो बता देते… कम-से-कम यह तो कह देते कि मां का ख़्याल रखना, वह स़िर्फ तेरे लिए ही जीती-मरती है. जैसे ज़िंदगीभर पलायन करते रहे, ज़िम्मेदारियों से वैसे ही आख़िरी क्षणों में भी चुपचाप चले गए. वरना जिसे कभी दिल की बीमारी न हो, उसका दिल अचानक काम करना कैसे बंद कर सकता है.

 Kahaniya

उसके और मेरे बीच ब़र्फ की टनों सिल्लियां जम चुकी हैं. मज़े की बात है कि कभी क्षणांश एकाध सिल्ली थोड़ी-सी कहीं, किसी कोने से पिघलती भी है और दो-चार बूंदों की नमी दिखने भी लगती है, तो तुरंत अविश्‍वास और नफ़रत की सर्द हवाएं चलने लगती हैं. मन में जमी सोच की फफूंद नमी को ढंक देती है. फिर से सिल्लियां ठोस और पथरीली हो जाती हैं.

ब़र्फ की ये चौकोर सिल्लियां आकार व अनुपात में समान व नुकीली न होने के बावजूद, किसी टूटे कांच के टुकड़े की मानिंद उसके दिल में जा चुभती हैं. उससे उठनेवाली पीड़ा इतनी पैनी होती है कि उसका पूरा अस्तित्व हिल जाता है. कितना तो रो चुकी है वह, अपने भाग्य को भी कोस चुकी है. ईश्‍वर के सामने कितनी प्रार्थनाएं कर चुकी है. पंडितों की बातों पर विश्‍वास कर जिसने जो उपाय करने को कहा, उसने वे भी किए… आस सब कुछ करवाती है, शायद इस तरह से ही सिल्लियां पिघल जाएं, पर सब व्यर्थ गया.

गुज़रते समय के साथ सिल्लियां इतनी सख़्त होती गईं कि पत्थर की तरह ही लगने लगीं. छुओ तो भी चोट पहुंचाएंगी और यूं ही सामने रहें, तो भी मन को चुभती रहेंगी. पीड़ा शरीर की हो या मन की… दर्द हर हालत में होता है. और उसे तो वर्षों हो गए हैं इस चुभन को सहते हुए. बच्चा अगर मां से मुंह मोड़ ले, तो शायद उससे बड़ी पीड़ा और कोई नहीं होती. मां के लिए उसका बच्चा ही सब कुछ होता है… उसके लिए वह दुनिया से लड़ने को तत्पर रहती है, ताकि दुख की आंच उस तक न पहुंच पाए, पर विडंबना तो यह है कि उसे अपने आंचल में सुरक्षित रखने के बावजूद वह उससे दूर हो गया. उसे लगता है कि उसकी मां ही उसकी सबसे बड़ी दुश्मन है, जो उसकी ख़ुशियों पर ग्रहण लगाना चाहती है.

उसे पता ही नहीं चला कि वह कैसे उससे दूर होता गया. वजह तो वह आज तक नहीं जान पाई है. उसे यही समझ आता है कि नौकरी और घर के काम में व्यस्तता की वजह से वह उसे उतना टाइम नहीं दे पाई, जो सुजीत उसे देते थे. उनका ख़ुद का बिज़नेस था और वैसे भी किसी चीज़ की कभी परवाह ही नहीं की थी, इसलिए उनका मस्त रहना शिवम को बहुत भाता था. घर-बाहर की सारी ज़िम्मेदारियों से चूर वह अक्सर झुंझला जाती थी और सुजीत पर आनेवाली खीझ और ग़ुस्सा शिवम पर निकाल देती थी.

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“पापा को देखो वह कितना कूल रहते हैं और एक आप हैं कि हमेशा चिढ़ती रहती हैं.” शिवम अक्सर उसे कहता और वह फट पड़ती, “पापा, जैसी मस्त लाइफ नहीं है मेरी. दोपहर बाद घर से जाते हैं, न काम की टेंशन है न घर की. थकती मैं हूं, वह नहीं, तो कूल तो रहेंगे ही.”

सुजीत तब उसका पक्ष लेने की बजाय शिवम की हां में हां मिलाते हुए कहते,  “पता नहीं क्यों थकती हो इतना. सारी दुनिया की महिलाएं काम करती हैं. तुम्हें तो बस हमेशा लड़ने का बहाना चाहिए. आदत है यह तुम्हारी.” सुजीत के

साथ-साथ धीरे-धीरे शिवम भी उसी टोन में बोलने लगा और अनजाने ही उनके बीच एक खाई बनती चली गई. सुजीत ने उन दोनों के बीच मीडिएटर की भूमिका निभानी शुरू कर दी और मां-बेटे के बीच मौन पसरता गया. ऐसी कठोर सिल्लियां शिवम के मन में जम गईं कि वह उन्हें पिघला ही न पाई. विदेश में पढ़ाई करने के लिए जाने के बाद से उनके बीच की शब्दों की टूटी-फूटी कड़ियां भी टूट गईं. वह तरसती ही रही अपने बेटे से बात करने के लिए. सुजीत ही थोड़ा-बहुत जब मन होता, तो उसके बारे में बता देते. दूरियां ख़त्म करने की बजाय न जाने क्यों सुजीत उन्हें और लंबी करते गए.

ऐसा कैसे हो सकता है कि एक बेटा अपनी मां से नफ़रत करे..? यही सवाल उसे मथता रहता. शिवानी इस बात को हज़ारों बार दिन में नकारती. “अरे ब़र्फ और मंगानी पड़ेगी, अभी तो पांच घंटे और हैं शिवम के आने में.” जेठानी के स्वर से वह अपने मन के भीतर छिपी अनगिनत वेदनाओं की गठरियों की गांठों को फिर से लगा, उनकी ओर देखने लगी.

“शिवानी, यहां आसपास कोई मार्केट होगी न, जहां से ब़र्फ मिल सके.” जेठानी ने उससे पूछा.

वह आज ही सुबह इंदौर से दिल्ली आई थीं. यहां के न तो उन्हें रास्ते पता थे और न ही बाज़ारों के बारे में कोई जानकारी थी. धीरे-धीरे बाकी रिश्तेदार भी जुट रहे थे, पर चूंकि परिवार में और कोई नहीं था, इसलिए शिवानी को ही सारे काम करने पड़ रहे थे. घर में कौन-सा सामान कहां रखा है, यह उसे ही बताना पड़ रहा था. चादरें कमरे में बिछा दी गई थीं… कभी पूजा की कोई सामग्री चाहिए… कभी रसोई में से कोई पुकार लेता…

हालांकि उसकी मौसी उसे बार-बार हिदायत दे रही थीं कि ऐसे में उठते नहीं है. “तू बैठी रह. रिश्तेदार, तेरे पड़ोसी, जानकार सब आ रहे हैं, तेरा उठना ठीक नहीं है.” पर क्या करे शिवानी…

भाई-बहनों ने अंतिम यात्रा की सारी तैयारियां कर दी थीं, पर उन्हें भी तो बताना ही था कि कहां क्या रखा है?

व्यस्तता कई बार आंसुओं को आंखों में ही कैद कर देती है. कहां है उसके पास शोक मनाने का समय… अभी तो यक़ीन तक नहीं आया है कि सुजीत चले गए हैं. सब कुछ कितना अचानक हुआ. रात को ही तो अस्पताल ले गई थी, डॉक्टर ने कहा, “हार्ट अटैक आया है…”

“पर कैसे? कब? बिल्कुल ठीक थे यह तो. कोई हार्ट प्रॉब्लम भी नहीं थी.”

“शुगर पेशेंट के साथ ऐसा हो जाता है. आपने बताया था न कि शुगर काफ़ी घट-बढ़ रही थी.”

उस पल ऐसा लगा था कि कोई पंछी फुर्र से उड़ गया हो.

काश सुजीत, तुम कहकर जाते, यूं ही बिना कुछ कहे अचानक चले गए. बेटे के आने का इंतज़ार तो कर लेते… उसे सच तो बता देते… कम-से-कम यह तो कह देते कि मां का ख़्याल रखना, वह स़िर्फ तेरे लिए ही जीती-मरती है. जैसे ज़िंदगीभर पलायन करते रहे, ज़िम्मेदारियों से वैसे ही आख़िरी क्षणों में भी चुपचाप चले गए. वरना जिसे कभी दिल की बीमारी न हो, उसका दिल अचानक काम करना कैसे बंद कर सकता है. शुगर ज़रूर उस रात भी बहुत घट-बढ़ रही थी. इंसुलिन भी नहीं लगाया था यह सोचकर कि शायद इस तरह कंट्रोल में आ जाए. कहां रहा कंट्रोल में कुछ… अचानक शुगर पचास हो गई. जल्दी से उसने कुछ मीठे बिस्किट खिला दिए. चेक की, तो इस बार 500 पहुंच गई थी. अस्पताल लेकर भागी, पर ईसीजी करते ही डॉक्टर ने बता दिया था कि हार्ट केवल पच्चीस प्रतिशत ही काम कर रहा है. सबको बुला लीजिए, कोई चांस नहीं है बचने का. हम इन्हें वेंटीलेटर पर डाल देते हैं.

वेंटीलेटर पर डालने की बात सुन उसकी रूह कांप गई थी. सुजीत का निस्तेज चेहरा देख मन भीग गया था उसका. बरसों की नाराज़गी, ग़ुस्सा और उसका उसे हमेशा अपमानित करना सब भूल गई थी वह. प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए जब उसने सुजीत को दलिया खिलाने की कोशिश की, तो उसकी आंखों के कोर भीग गए थे. शायद पश्‍चाताप हो रहा हो.

“बिल्कुल चिंता मत करो. तुम ठीक हो जाओगे. थोड़ी हिम्मत रखो और दवाइयों को रिस्पॉन्ड करो. डॉक्टर कह रहे हैं कि तुम मशीनें देखकर घबरा रहे हो. दवाइयां काम ही नहीं कर रही हैं.” उसने सांत्वना देने की कोशिश की थी. सुजीत एकदम ख़ामोश थे… कुछ नहीं कहा, न कुछ पूछा. शिवानी की तरह उन्होंने भी कहां सोचा होगा कि उनका अंतिम व़क्त आ गया है. जब तक कुछ घटे नहीं, कौन इस बात को मानना चाहता है.

“मौसी, शिवम आ गया.” मेरे भांजे ने कहा, तो सब उसकी ओर लपके. सबसे लिपटकर वह रो रहा था, पर उसके पास नहीं आया. शिवानी कब से केवल भीतर ही भीतर रो रही थी, पर शिवम को देखते ही उसका बांध सारे किनारों को तोड़ता हुआ वेग से बह निकला था. जब से आया था, पापा के सिरहाने ही बैठा हुआ था. उनके माथे पर बार-बार हाथ फेर रहा था, मानो कहीं किसी कोने में आशा हो कि शायद पापा उसके स्पर्श को महसूस कर, उसे एक बार आंख खोलकर देख लेंगे और कहेंगे, “आ गया मेरे बर्रे…” बचपन से ही शिवम को वे दोनों न जाने प्यार से कितने नामों से पुकारते आए थे. बिना अर्थोंवाले नाम… सुजीत कहते, “सारा दिन चिपका रहता है यह मुझसे जैसे बर्रा हो, जो चिपक जाए, तो पीछा छुड़ाना मुश्किल हो जाता है.”

जब उसका मुंडन हुआ था, तो वह इतना प्यारा लगता था कि उसके सिर पर बार-बार हाथ फेरते हुए वह उसे ‘टकली’ कहती. कोई उसे शिवानी का ‘शिव’ कहता, दोस्त अक्सर उसे ‘शि’ कहकर पुकारते… शॉर्ट फॉर्म के ट्रेंड की वजह से. बचपन से ही वह इतना प्यारा था कि जो भी उसे देखता, उस पर स्नेह लुटाने लगता. पड़ोसी और सोसाइटी के लोग प्यार से ‘शिबु’ कहते थे.

शिवानी का मन कर रहा था कि शिवम को अपने सीने से चिपटाकर इतना रोए कि बरसों से जमे आंसू सारी ब़र्फ की सिल्लियों को पिघला दें, पर आने के बाद भी उसने न तो उसकी ओर देखा था और न ही कोई बात की थी. अपने अंदर न जाने कितने तूफ़ान समेटे रहता है. हमेशा उसे यही लगता रहा है कि पापा बीमार हैं, तो मां ज़िम्मेदार है, पापा मां के साथ बुरा सुलूक करते हैं, तो भी मां ही दोषी है… कहीं वह आज भी पापा की मौत का ज़िम्मेदार उसे तो नहीं ठहरा रहा… कांप गई थी शिवानी.

सुजीत को ब़र्फ की सिल्लियों से उठाकर अर्थी पर रख दिया गया था. स़फेद दुशालों से उसे ढंका जा रहा था. फूलमालाओं को पूरे शरीर पर बिछा दिया गया था. अब ले जाने की तैयारी थी. चार कंधों पर जाता है मनुष्य… कैसी विडंबना है यह भी… दुनिया से प्रस्थान करने के लिए भी हमें कंधे चाहिए होते हैं, सारी ज़िंदगी तो हम कंधे ढूंढ़ते ही रहते हैं. ले जाने की तैयारी पूरी हो चुकी थी, बस उससे कहा जा रहा था कि सुजीत के तीन चक्कर काट ले और कहे कि उसने उसे क्षमा कर दिया. उसकी चूड़ियां उतारकर सुजीत के साथ लपेट दी गईं. बिंदी पोंछ दी गई. उसे लग रहा था सैलाब उमड़ रहा है उसके भीतर चाहे जैसा था, था तो उसका पति… चाहे कितने दुख दिए, पर इस तरह जाना बर्दाश्त नहीं हो रहा था. प्यार के कण तो उनके बीच फिर भी व्याप्त ही रहे, बेशक विषमताओं की वजह से वे दिखे नहीं. फूट-फूटकर रो पड़ी वह. लिपट गई सुजीत से… आख़िरी बार महसूस करना चाहती थी उसे.

रुदन का हाहाकार मानो फैल गया था, तभी शिवम ने उसे उठाया. पलभर को दोनों की नज़रें मिलीं. उसका पूरा शरीर कांप रहा था, आंसू गालों को भिगो रहे थे. शिवानी ने कुछ कहना चाहा कि तभी शिवम ने उसे गले से लगा लिया.

“मत रोओ मम्मी, शायद ऐसा ही होना था. संभालो अपने आपको… मैं हूं न. आप रोओगे तो पापा को दुख होगा. उनकी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी. जाने दो उन्हें चैन से.”

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उसका और शिवम का रुदन कमरे में भर गया था. नीचे शवदाह की गाड़ी खड़ी थी. वह नीचे जाने के लिए सीढ़ियां उतरने लगी.

ब़र्फ की सिल्लियां पिघल रही हैं. “कमरे में पानी फैल रहा है, इन्हें उठाकर बाहर फेंक दो.” बुआ ने कहा. उसे लगा सारी सिल्लियां पिघल गई हैं.

Suman Bajpai

सुमन बाजपेयी

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कहानी- लहर (Short Story- Lehar)

“वैसे भी अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है? कभी फिर से घर बसाने का ख़्याल नहीं आता?” “कोई उचित पात्र मिला तो वह भी कर लूंगी. नहीं तो अपना कमा-खा रही हूं, कहां दिक़्क़त है? परिवर्तन की लहर धीरे-धीरे ही उठती है. यह कल्पना करना कि एक दिन कोई आंधी-तूफ़ान आएगा और पलक झपकते सब बदल जाएगा, बेव़कूफ़ी है.”

Hindi Kahaniya

बाहर धूप में मां और किरण आंटी को गप्पे मारते देख मैंने अनुजा को उनके पास ही छोड़ दिया और ख़ुद आवश्यक क़िताबें और नोट्स लेने अंदर आ गई. रसोई से आती भीनी-भीनी मीठी ख़ुशबू से मेरे क़दम स्वतः ही रसोई की ओर उठ गए. मेरी पसंद का गाजर का हलवा बन रहा था. मैं अपना लोभ संवरण नहीं कर पाई. रसोई में क़दम रखने ही वाली थी कि तभी बरामदे में ही आसन जमाए बैठी दादी का कठोर स्वर गूंज उठा, “तुझे इन दिनों रसोई में घुसने की मनाही है न?”

साड़ी के आंचल से हलवा उतारती चाची के हाथ कांप गए. उन्होंने मुझे कमरे में ही हलवा पहुंचाने का इशारा किया. उखड़े मूड से मैं कमरे में आकर क़िताबें निकालने लगी. अपने मिलनसार स्वभाव के अनुरूप मेरे बाहर आने तक अनुजा मां और आंटी से दोस्ताना गांठ चुकी थी. तीनों को मज़े से गपशप करते देख मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट तैर उठी. उसे क़िताबें और नोट्स थमाकर रवाना करके मैं अंदर आ गई. पीछे-पीछे मां और आंटी भी अंदर आ चुकी थीं.

“नई आई है तेरे कॉलेज में?” मां ने बातचीत का सूत्र पकड़ते हुए कहा.

“हां! मेरे ही विषय में है. अब मेरे काम का बोझ थोड़ा हल्का हो जाएगा.”

“व्यवहार की अच्छी है. सुंदर, सुशील, मिलनसार और ऊपर से अच्छी पढ़ी-लिखी, नौकरीवाली. उम्र भी ज़्यादा नहीं लगती.” आंटी ने कहा तो मैं उनकी वैवाहिक विज्ञापन जैसी भाषा सुनकर चौंक उठी. मां ने बात स्पष्ट की.

“तेरी सहेली आंटी की जाति की ही है. अपने वकील भतीजे के लिए वह उन्हें सर्वथा उपयुक्त लग रही है.” आंटी शायद मां के बात छेड़ने का ही इंतज़ार कर रही थीं, क्योंकि इसके बाद उन्होंेने अपने भतीजे के गुणों और खानदान की तारीफ़ में जो लंबे-चौड़े कसीदे काढ़ने शुरू किए, तो मेरे रोकने पर ही रुकीं.

“मैं आपको कल ही अनुजा से बात करके बताती हूं.” कहकर मैंने बमुश्किल एकतरफ़ा वार्ता को विराम लगाया.

अगले दिन ही कॉलेज में एकांत में मैंने उसके सम्मुख किरण आंटी का प्रस्ताव रख दिया था. वह ठठाकर हंस पड़ी थी. मुझे उसकी हंसी चुभ गई.

“तुम्हें नापसंद है, तो इंकार कर दो. इसमें हंसीवाली क्या बात है?”

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“अपनी आंटी को बता देना कि मैं विधवा हूं. फिर देखते हैं कि उनकी क्या प्रतिक्रिया होती है?”

मैं अब सचमुच नाराज़ हो गई थी.

“अनुजा, मुझे ऐसे बेहूदे मज़ाक पसंद नहीं हैं. तुम्हें रिश्ता नहीं पसंद तो ऐसे ही इंकार कर दो.”

अनुजा भी अब गंभीर हो गई थी, “मैं मज़ाक नहीं कर रही, सच्चाई बता रही हूं.”

मैं हैरानी से आंखें फाड़े उसे देखती रह गई थी. आत्मविश्‍वास से लबरेज़ उस संयमित व्यक्तित्व की बात पर यदि अविश्‍वास करने की कोई वजह नहीं थी, तो विश्‍वास करने को भी दिल गवाही नहीं दे रहा था.

“मेरी क्लास का वक़्त हो गया है. इस विषय पर फिर कभी बात करेंगे.” घड़ी देखते हुए वह उठ गई थी. मैं देर तक उसे जाते देखती रही. चुस्त सलवार-कमीज़ पर ढीला-सा जूड़ा, आंखों पर महंगे फ्रेम का चश्मा, मीडियम हीलवाले सैंडल और एक हाथ में अदा से पकड़े नोट्स… उसके गरिमामय व्यक्तित्व में आधुनिकता और शालीनता का अद्भुत सामंजस्य था, जिसे देखकर विवाहित-अविवाहित का भेद करना ही मुश्किल था, उसके लिए विधवा होने की बात कैसे सोची जा सकती थी? जब से कुछ समझदार हुई हूं विधवा के नाम से मेरे सम्मुख चाची का चेहरा ही उभरता है.

मुड़ी-तुड़ी रंग उड़ी साड़ियों में घर के कामों में जुटी चाची. कभी कपड़े धोती, कभी खाना बनाती, कभी गेहूं साफ़ करती. इस पर भी घरवालों का नज़रिया ऐसा मानो दो वक़्त का खाना देकर उन पर एहसान कर रहे हों. मां ही कभी-कभार चुपके से उन्हें मिठाई, पकवान आदि पकड़ा देतीं. अभी दिवाली पर भी मां के आग्रह पर ही पापा सब घरवालों के नए कपड़ों के साथ चाची के लिए भी एक नई साड़ी ले आए थे, जिसे चाची ने बेहद सकुचाते हुए कृतार्थ भाव से ग्रहण कर लिया था. चाची कभी भी अधिकार भाव सेे कुछ क्यूं नहीं लेती या मांगती?… अपने मन में उठे सवाल पर मैं ख़ुद ही चौंक उठी थी, क्योंकि आज से पहले मेरे मन में इस तरह के कभी कोई सवाल नहीं आए थे.

लंच टाइम में अनुजा हमेशा की तरह हंसते-मुस्कुराते मिली, लेकिन मुझे असहज पाकर बोल उठी, “लगता है तू अभी तक सुबहवाले झटके से उभरी नहीं है?”

“और क्या! तुमने कभी बताया ही नहीं? किसी को मालूम ही नहीं!”

“तो तुम क्या अपेक्षा रखती हो कि मैं सिर पर विधवा की तख़्ती लगाकर घूमूं?” मैं उसके तीखे वार से एकदम सकपका गई.

“आई एम सॉरी! मेरा वो मतलब नहीं था. दरअसल, हमेशा से ही घर में ऐसा वातावरण देखा, तो मेरी सोच भी वैसी ही हो गई थी.

मुझे ख़ुद आश्‍चर्य हो रहा है कि इससे पहले मैंने कभी अपने पूर्वाग्रहों के खोल से बाहर आने का प्रयास क्यों नहीं किया? सुबह से अब तक मैं इस बारे में कितना कुछ सोच चुकी हूं, जो आज से पहले कभी दिमाग़ में आया ही नहीं.” मैंने उसे अपने घर के वातावरण के बारे में सब कुछ खोलकर बता दिया था. सुनकर वह गंभीर हो गई थी.

“मुझे तुम्हारी दादी पर तरस और चाची पर ग़ुस्सा आ रहा है.”

“तुम ग़लती से उल्टा बोल गई हो.” मैंने उसे तुरंत टोका था.

“नहीं, मैं सही बोल रही हूं. अपनी हालत के लिए दूसरे लोगों से ज़्यादा इंसान ख़ुद ज़िम्मेदार होता है. तुम्हारी चाची ने ख़ुद को पूरी तरह से क़िस्मत और दूसरों के रहमोकरम पर छोड़ रखा है. क्या वे नहीं जानतीं कि क़िस्मत के भरोसे काग़ज़ उड़ता है, पतंग तो अपनी क़ाबिलीयत से ही उड़ती है? क़िस्मत साथ दे न दे, क़ाबिलीयत ज़रूर साथ देती है. मयंक की दुर्घटना में मौत के बाद कुछ समय तक मैं भी काग़ज़ की तरह इधर-उधर उड़ती रही थी. जिधर हवा का झोंका बहा ले जाता, बह जाती. कभी मायकेवालों के भरोसे, तो कभी ससुरालवालों के भरोसे.

लेकिन जल्दी ही इस बेग़ैरत ज़िंदगी से मैं ऊब गई. आगे बढ़ने के लिए अपनों को सीढ़ी बनाकर सहारा लेना तो उचित है, पर उन्हें हमेशा के लिए बैसाखी बनाकर चिपके रहना सर्वथा ठीक नहीं. मैंने नौकरी के लिए हाथ-पांव मारने आरंभ किए. घर की चारदीवारी से निकली, ताज़ी हवा में सांस ली, चार लोगों से मिली तो ख़ुद को बना-संवारकर रखने की आवश्यकता महसूस हुई. फिर जब नौकरी पर जाने लगी, हाथ में चार पैसे आने लगे, तो अपनी तरह से जीने की इच्छा जाग उठी.”

“वैसे भी अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है? कभी फिर से घर बसाने का ख़्याल नहीं आता?”

“कोई उचित पात्र मिला तो वह भी कर लूंगी. नहीं तो अपना कमा-खा रही हूं, कहां दिक़्क़त है? परिवर्तन की लहर धीरे-धीरे ही उठती है. यह कल्पना करना कि एक दिन कोई आंधी-तूफ़ान आएगा और पलक झपकते सब बदल जाएगा, बेव़कूफ़ी है.”

“हूं” मेरी गर्दन सहमति में हिलने लगी थी. “पर दादी पर तरस क्यों आता है? वे तो इतनी निरंकुश हैं!”

“दरअसल, जितनी वे निरंकुश हैं, अंदर से ख़ुद को उतना ही असुरक्षित महसूस करती हैं. दिन-प्रतिदिन बढ़ती शारीरिक अक्षमता इंसान की मानसिक असुरक्षा का दायरा बढ़ा देती है. उन्हें हर पल यह भय सताता रहता है कि घरवालों की नज़र में उनकी अहमियत कम से कमतर होती जा रही है. किसी भी तरह ख़ुद से बांधे रखने की चेष्टा में वे हर समय सबका ध्यान आकर्षित करने का प्रयास करती रहती हैं. कभी अपनी बीमारी का हवाला देकर, कभी अपना असंतोष ज़ाहिर कर वे तिल का ताड़ बनाने का प्रयास करती हैं. उनका दिमाग़ हर वक़्त यही रणनीति बनाने में व्यस्त रहता है कि किसका ध्यान कैसे आकर्षित करना है, किसको कैसे अपने चंगुल में रखना है. अब ऐसे इंसान पर तरस नहीं आएगा, तो और क्या होगा? मन में वे भी जानती हैं कि वे तुम लोगों का कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं. वे यह भी जानती हैं कि उनके प्रति तुम्हारा सम्मान मात्र दिखावा है, प्यार नहीं. पर वे बेचारी इसी से ख़ुद को भरमाने का प्रयास कर रही हैं.”

“सार यह है कि हैं तो दोनों ही असंतुष्ट और अवांछनीय.” मैंने कटु सच्चाई उगल दी थी.

“और ऐसा बनने के लिए औरों से ज़्यादा वे ख़ुद ज़िम्मेदार हैं. एक तो कुदरत ने पति नामक संबल छीनकर उन पर वैसे ही घोर अत्याचार किया है. ऐसे विपरीत परिस्थितियों में उनके अंदर से इस तरह की अतिशय प्रतिक्रियाएं निकलकर आना स्वाभाविक है. मेरा अनुभव कहता है कि मुश्किल भरे दौर में भी इंसान जितना सहज और सरल बना रहे, मुश्किलों का सामना करना उतना ही आसान हो जाता है. ज़िंदगी चाहे थोड़ी बची हो, चाहे ज़्यादा उसे जीभर कर जी लेने में ही समझदारी है.”

मेरी सोच की दिशा अचानक ही बदलने लगी थी. चाची इतनी निरीह क्यों बनी रहती हैं? स़िर्फ इसलिए कि वे विधवा हैं? पर विधवा होना कोई अपराध तो नहीं? विधवा तो दादी भी हैं. पर उनका कैसे घर में एकछत्र साम्राज्य चलता है? घर में सब उनसे कैसे डरे-डरे रहते हैं! बरामदे में तख़्त पर बैठे-बैठे वे सब घरवालों को निर्देश देती रहती हैं. तो क्या उनका सम्मान उनकी उम्र की वजह से है? जब चाची उम्रदराज़ हो जाएंगी, तो क्या वे भी ऐसे ही तख़्त पर बैठकर हुक्म चलाएंगी? बात मेरे गले के नीचे नहीं उतर रही थी. मुझे ख़ुद पर भी आश्‍चर्य हो रहा था, मैं अब तक इतने तार्किक ढंग से क्यूं नहीं सोच पाई? बरसों से घर में जो देखते-सुनते बड़ी हुई, उसे ही सच और सही मानने लगी. कभी अपने नज़रिए से किसी बात को जानने-समझने का प्रयास ही नहीं किया. उम्र में अनुजा मुझसे 4-5 वर्ष बड़ी, तो चाची से लगभग इतनी ही छोटी होगी. लेकिन दोनों के वैधव्य में मुझे कोई साम्य नज़र नहीं आ रहा था.

अगले दिन मैंने मां को अनुजा की सच्चाई बताई, तो मेरी तरह वे भी बौखला उठीं, “क्या ज़माना आ गया है? विधवाएं भी ऐसे बन-ठनकर रहने लगी हैं.” मेरी नज़रें कमरे में झाड़ू लगाती चाची पर अटक गईं. एक ज़माने में कितने आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी थीं वे? और आज कितनी दीन-हीन लग रही थीं. मैं तुरंत मां को टोक बैठी थी, “इसमें बुराई क्या है मां? सुदर्शन व्यक्तित्व न केवल दूसरों को सुहाता है, वरन् ख़ुद को भी संतुष्टि देता है. औरों के लिए न सही, इंसान को ख़ुद के लिए सलीके से बन-संवरकर रहना चाहिए.”

मैं कह रही थी, तब देखा चाची के झाड़ू लगाते हाथ थम-से गए हैं. तीर निशाने पर लगता देख मैंने आगे बात बढ़ाई, “और फिर आत्मनिर्भरता, स्वाभिमान ये तो ऐसे गहने हैं, जो इंसान के व्यक्तित्व में वैसे ही चार चांद लगा देते हैं.”

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चाची को सोच में डूबा देख मैं समझ गई कि काम हो गया है. मैं नहाकर निकली, तो दादी ने आवाज़ लगाई.

“अपनी मां से क्या बहस कर रही थी? समाज के जो तौर-तरी़के होंगे, उसी हिसाब से तो हर इंसान को रहना होगा न! पूर्वजों ने कुछ सोच-समझकर ही सब नियम-कायदे बनाए हैं. हम भी तो सब मान रहे हैं. तू क्या अनूठी है?”

“नियम-कायदे अप्रासंगिक हो जाएं, तो उन्हें बदल देने में ही समझदारी है.” मैंने हिम्मत करके कड़ा प्रतिवाद किया.

“तू अपने साथ पूरे परिवार को पाप का भागी बनाएगी. ले यह भगवान के पाठ की क़िताब पकड़, आज से रोज़ नहा-धोकर भगवान का पाठ किया कर. तभी तुझे सद्बुद्धि आएगी.”

“मुझे कॉलेज के लिए देर हो रही है. वैसे भी इन पुस्तकों में मेरी रुचि नहीं है. मैं तो कभी आपको मेरी पुस्तकें पढ़ने के लिए नहीं कहती? रही बात नियम-कायदे मानने की, तो यह अपनी-अपनी समझ की बात है. यह ज़रूरी नहीं कि एक स्थिति विशेष में सभी इंसान समान प्रतिक्रिया दें. गरम पानी में उबालने पर अंडा सख्त हो जाता है, जबकि आलू नरम. आपदा आने पर इंसान टूटकर बिखर भी सकता है, तो निखरकर उभर भी सकता है. परिस्थिति से ज़्यादा इंसान की अपनी क्षमता उसे शक्तिशाली या कमज़ोर बनाती है. मेरी नज़र में शक्तिशाली वह है जिसकी बात लोग दिल से मानें न कि डर से.” दादी मेरा इशारा समझ भौंचक्की-सी मुझे देख रही थीं.

घर के लोग एक-एक कर आसपास जुटने लगे थे. उनकी चिंतनशील मुद्राएं बता रही थीं कि घर में परिवर्तन की लहर उठ चुकी है.

Sangeeta Mathur

      संगीता माथुर

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