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कहानी- तोहफ़ा (Short Story- Tohfa)

Short Story, Tohfa

Short Story, Tohfa

“… मुझे यही सही लगा कि आपके जन्मदिन के अवसर पर आपको अपना परिवार तोहफे के रूप में लौटाऊं. मैं भइया-भाभी को साथ ले आई. अब यही हमारे माता-पिता हैं. घर के बड़े हैं. इनके आशीर्वाद के बिना हमारा परिवार और हमारा प्यार अधूरा है. आगे आप जैसा ठीक समझें.”

“नम्रता, सच में तुम मेरी सच्ची जीवनसंगिनी हो. मुझे इससे अनमोल तोहफ़ा मिल ही नहीं सकता था. मैं स़िर्फ तुमसे प्यार ही नहीं करता अब, बल्कि बेहद सम्मान भी करता हूं.”

दिल्ली की ओर उड़ान भर रहा विमान शीघ्र ही आकाश की ऊंचाइयों में समाने लगा. नम्रता उस उड़ान की विमान परिचारिका थी. विमान में दो यात्री ऐसे भी थे, जिनके बारे में ख़ास हिदायतें नम्रता को दी गई थीं. ये थे चार साल की गुड्डी और सात साल का दीपू. ये दोनों मुंबई के एक स्कूल में पढ़ते थे और उसी स्कूल के छात्रावास में रहते थे. वहां की वार्डन ने ख़ासतौर पर बच्चों को संभालने के लिए कहा था.

नम्रता अन्य यात्रियों की सुख-सुविधाएं पूछने के बाद बच्चों के पास ही आकर बैठ जाती और उनसे बातें करने लगती. वह सोच रही थी कि इतने छोटे बच्चों को माता-पिता छात्रावास में कैसे डाल देते हैं? जब उससे रहा नहीं गया, तो उसने पूछ ही लिया, “दीपू, तुम्हारे माता-पिता दिल्ली में हैं?”

दीपू ने अपनी बड़ी-बड़ी मासूम आंखों से नम्रता की ओर देखकर कहा, “ हां, मेरे पिताजी दिल्ली में हैं और वे कहते हैं कि मां चंदामामा के पास गई हैं. जब हम पढ़कर बड़े हो जाएंगे, तो मां बड़ी ख़ुश होंगी और वापस आ जाएंगी.”

नम्रता को बच्चों की मासूमियत पर प्यार आ गया. दिल्ली पहुंचने पर नम्रता दीपू और गुड्डी के साथ उनके पिता का इंतज़ार कर रही थी. शाम ढल रही थी, तो नम्रता ने कहा, “दीपू, तुम्हें घर का पता मालूम है?”

दीपू ने जेब से झट से कार्ड निकालकर नम्रता को दे दिया. पता पढ़कर नम्रता बोली, “मेरा घर भी उसी रास्ते पर है, मैं तुम्हें घर छोड़कर आगे चली जाऊंगी.”

नम्रता की टैक्सी एक विशाल कोठी के आगे जाकर खड़ी हो गई. नौकर ने दौड़कर गेट खोला और नम्रता से बोला, “साहब बच्चों को लेने ही गए हैं, वो अभी आते ही होंगे.”

नम्रता ने जब बैठक में क़दम रखा, तो भव्य साज-सज्जा को देखकर वह खो सी गई. तभी बच्चों की आवाज़ ने उसे चौंका दिया, “पापा आ गए… पापा आ गए…” नम्रता उठकर खड़ी हो गई. तभी 28-29 साल के आकर्षक व्यक्ति ने बैठक में प्रवेश किया. नम्रता ने मुस्कुराकर हाथ जोड़ दिए.

उस व्यक्ति ने धीमे स्वर में कहा, “मुझे अशोक कहते हैं. दरअसल, रास्ते में जुलूस जा रहा था, इसलिए मुझे आने में देर हो गई. आपको कष्ट तो हुआ होगा.”

“नहीं-नहीं…” नम्रता ने सकुचाकर  कहा और उसके गोरे कपोल गुलाबी हो गए. अशोक उसकी सुंदरता पर मुग्ध होकर निहारता रहा.

चंद क्षणों के बाद नम्रता ने कहा, “मेरी टैक्सी बाहर खड़ी है, मैं अब जाती हूं.”

बच्चों ने नम्रता का हाथ पकड़कर कहा, “फिर आओगी न दीदी?” नम्रता ने हंसकर कहा, “हां, ज़रूर आऊंगी.”

रास्ते में नम्रता अशोक के आकर्षक व्यक्तित्व के बारे में ही सोच रही थी. उधर अशोक बच्चों को पाकर बहुत ख़ुश थे. एक दिन अशोक एक दुकान से निकल रहे थे, तो अचानक उनकी नम्रता से भेंट हो गई. बच्चों ने तो दीदी-दीदी कहकर उसे घेर लिया. अशोक के बहुत आग्रह करने पर उसने दोपहर का भोजन उनके साथ ही किया.

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अब अक्सर अशोक और नम्रता की बात होने लगी थी. अशोक ने नम्रता को गुड्डी के जन्मदिन पर बुलाया. नम्रता सुबह से ही जन्मदिन की तैयारी कर रही थी. एक बात उसे हैरान कर रही थी कि पूरे घर में उसे कहीं भी अशोक की पत्नी की कोई तस्वीर नहीं दिखी.

धीरे-धीरे नम्रता और अशोक की मुलाकातें बढ़ने लगीं. दोनों को जीवन में मुहब्बत का एहसास होने लगा. अशोक के कोरे मन पर एक हसीन तस्वीर बन गई थी और आंखों में सपने पलने लगे थे. एक अजीब बात नम्रता ने यह महसूस की कि अशोक उससे कुछ कहना चाहते थे, पर कह नहीं पाते.

नम्रता ने सोचा क्यों न वो ख़ुद ही अशोक से उनकी उलझन के बारे में पूछ ले, “अशोक, मुझे अधिकार तो नहीं, पर कोई तो बात है, जो आपको परेशान किए रहती है. आपने अपने बारे में तो कुछ नहीं बताया… यानी अपनी पत्नी के बारे में?”

“आपने पूछा नहीं, तो मैंने बताया नहीं. लेकिन समय आने पर ज़रूर बताऊंगा नम्रता. अभी तो यही कह पाऊंगा कि इन बिन मां के बच्चों का सब कुछ मैं ही हूं.”

इस बीच अशोक यह महसूस कर रहे थे कि अब नम्रता के बिना जीना उनके लिए मुश्किल था. उन्होंने नम्रता से अपने मन की बात कहने की ठान ली, “नम्रता क्या तुम मुझे अपना जीवनसाथी बनाना पसंद करोगी? वैसे तो मैं तुम्हारे योग्य नहीं हूं, क्योंकि मेरे दो बच्चे हैं. बहुत-सी लड़कियां आई थीं शादी का प्रस्ताव लेकर… मगर बच्चे देखकर लौट गईं. पर बच्चे तुम्हें बहुत प्यार करते हैं.  इसलिए पूछने का साहस कर सका. वैसे कोई ज़बर्दस्ती नहीं है.”

“नहीं… नहीं.. अशोक. यह बात नहीं है. ये दोनों तो बहुत प्यारे बच्चे हैं, पर फिर भी मुझे अपने परिवारवालों से पूछना ही पड़ेगा.”

“हां नम्रता, मैं तुम्हें सोचने का पूरा मौक़ा दूंगा. ऐसी कोई जल्दी भी नहीं है. वैसे भी इस बीच मुझे काम के सिलसिले में आगरा जाना है. वहां दो-चार दिन लग जाएंगे. क्या तुम तब तक बच्चों का ख़्याल रखोगी प्लीज़?”

“हां, क्यों नहीं.” कहकर नम्रता विदा लेकर चली गई. नम्रता अशोक के घर रोज़ आती और घंटों बच्चों के साथ रहती. अशोक को आगरा गए आठ दिन हो गए थे. नम्रता अशोक को फोन करने के बारे में सोच ही रही थी कि तभी अशोक की गाड़ी आ गई. आवाज़ सुनकर नम्रता संभलकर बैठ गई.

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“पापा आ गए…” कहते हुए दीपू और गुड्डी बाहर भाग गए. अशोक ने कमरे में प्रवेश किया, तो नम्रता को देखकर बहुत ख़ुश हुआ. नम्रता की आंखें शर्म से झुक गई और चेहरा सुर्ख़ हो गया. अशोक ने मुस्कुराते हुए पूछा, “इसका मतलब मैं ‘हां’ में लूं या ‘ना’ में?”

नम्रता ने दोनों हाथों से अपना चेहरा छिपा लिया और ‘हां’ में गर्दन हिला दी.

“यह हुई न बात.” कहकर अशोक ने दीपू और गुड्डी को दोनों हाथों से उठा लिया. उसी व़क्त रामू मिठाई की प्लेट लेकर आ गया.

कुछ दिनों बाद ही अशोक की कोठी दुल्हन की तरह सजी हुई थी. नम्रता शादी के जोड़े में बहुत हसीन लग रही थी. शादी भी धूमधाम से हो गई.

अशोक अपने कमरे में गए, जहां नम्रता  सजी हुई सेज पर बैठी हुई थी. दोनों बच्चे उसके पास बैठे थे. वह प्यार से उन्हें समझा रही थी, “बेटे, अब मुझे मम्मी कहना.”

अशोक ने बच्चों को प्यार करते हुए कहा, “बेटे, मम्मी ठीक कह रही हैं.”

नम्रता अशोक को देखकर शरमा गई. थोड़ी देर बाद अशोक बोला, “बच्चों रात बहुत हो गई. अब आप लोग जाकर सो जाओ.” बच्चे उन दोनों को प्यार करके चले गए.

रात के क़रीब तीन बजे अशोक के कमरे की खिड़की पर कोई ठक-ठक कर रहा था. वह झटके से उठ बैठा. नम्रता गहरी नींद में सो रही थी. अशोक ने खिड़की के पास एक साया देखा और धीरे-से दरवाज़ा खोला. फिर वह उस साये के पीछे-पीछे चल पड़ा. साया भागकर अंधेरे में बगीचे के पास खड़ा हो गया. अशोक ने भागकर उसे पकड़ लिया और ग़ुस्से में बोला, “तुम यहां क्यों आए हो?”

“अशोक, मैं 20 तारी़ख़ को जेल से छूटा हूं.”

“कौन-सा बड़ा काम करके आए हो.”

“ऐसा मत कहो, अशोक. मुझे माफ़ कर दो… मुझे मेरे बच्चों से मिला दो.”

“नहीं, मैं तुम्हें बच्चों से नहीं मिलने दूंगा. क्या बच्चों की भी ज़िंदगी बर्बाद करना चाहते हो?”

“अशोक, मेरे भाई… एक बार उनसे मिला दो. मैं तुम्हारे पैर पड़ता हूं.”

“तुम चले जाओ यहां से. इसी में सबकी भलाई है. तुम मेरे माता-पिता के हत्यारे हो. मैं तुम्हारी शक्ल तक नहीं देखना चाहता.”

“अशोक, क्या मां-पिताजी चल बसे? यह क्या अनर्थ हो गया.” कहकर वह साया फूट-फूटकर रोने लगा.

अशोक को उस पर दया आ गई, तो वह उसे उठाकर बोला, “भैया, मेरी आज ही शादी हुई है. भलाई इसी में है कि आप यहां से चले जाएं. वह क्या सोचेगी, उसे तो कुछ मालूम नहीं है.”

उसी समय कुछ आहट हुई, तो आलोक भाग गया. अशोक का नौकर रामू भागता हुआ वहां पहुंचा. “कौन था साहब, मुझे कुछ आहट-सी सुनाई पड़ी थी.”

अशोक ने उसे कड़ी हिदायत दी. “सतर्क रहना, कोई चोर था शायद.”

जब अशोक कमरे में पहुंचा, तो नम्रता बहुत डरी हुई थी. “मुझे अकेला छोड़कर आप कहां चले गए थे? और बाहर कोई था न? मैंने खिड़की से देखा था. आप अकेले बाहर क्यों गए? अगर कुछ हो जाता तो…” नम्रता की आंखों से आंसू बहने लगे.

अशोक ने उसे धैर्य बंधाते हुए कहा, “अरे, मैं तो यहीं था. कोई चोर था शायद.”

“अशोक, आप मुझसे कुछ छिपा रहे हो? मैंने आपको किसी से बातें करते हुए देखा है. अगर वह सचमुच चोर होता, तो आप इस तरह से बातें नहीं करते. मैंने सात फेरे लिए हैं आपके साथ. क्या अब भी मुझे अपना हमराज़ नहीं बनाएंगे आप?”

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“नहीं नम्रता, अब मैं तुमसे कुछ नहीं छिपाऊंगा. तुमने बिना किसी स्वार्थ के मुझसे प्यार किया और अब तुम मेरी जीवनसंगिनी हो. नम्रता, बाहर जिस व्यक्ति से मैं बात कर रहा था, वो मेरा बड़ा भाई आलोक है. दरअसल, वो बुरी संगत में पड़कर नशे के आदी हो चुके थे. मां-पिताजी ने यह सोचकर उनकी शादी करवाई कि शायद उनमें सुधार आ जाए, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ. ये दोनों बच्चे मेरे भाई आलोक के ही हैं. मेरी भाभी रजनी भी इनकी आदतों की वजह से मानसिक रूप से बीमार हो गई थीं. मैं उन्हीं से मिलने आगरा जाता था. आलोक भइया को ड्रग्स की तस्करी के इल्ज़ाम में सज़ा हो गई थी और इसी सदमे में मां-पिताजी भी गुज़र गए. बस, यही है मेरी सच्चाई. मुझे लगा न जाने तुम क्या सोचोगी मेरे परिवार के बारे में. एक ड्रग एडिक्ट और ड्रग डीलर का भाई, एक अपराधी का भाई हूं मैं. मुझे डर लगा रहता था कि कहीं मेरे परिवार की सच्चाई जानकर तुम मुझसे दूर न हो जाओ, इसलिए एक झिझक थी. आलोक भइया जेल से छूट गए हैं, लेकिन मैं तुमसे वादा करता हूं कि उनका साया तुम पर और अपने बच्चों पर नहीं पड़ने दूंगा.”

“अशोक, आप अकेले ही इतना सब सहते रहे. मुझे इस क़ाबिल भी नहीं समझा कि आपके दर्द को बांट सकूं? क्या मैं इतनी नासमझ हूं, जो आपके भाई के किए की सज़ा अपने प्यार को देती? ख़ैर, जो हो गया, उसे भूल जाइए. आपकी भाभी अब कैसी हैं?” नम्रता ने पूछा.

“वो अब पहले से बेहतर हैं.”

“अशोक, रात बहुत हो गई, अब सो जाइए. हम कल बात करेंगे. वैसे भी कल आपका जन्मदिन है. मैं आपको ख़ास तोहफ़ा देना चाहती हूं. जल्दी उठकर मंदिर जाऊंगी और अपने परिवार की सलामती की दुआ मांगूंगी. कोई बुरा साया हमारे बच्चों पर नहीं पड़ेगा.” यह कहकर नम्रता और अशोक सो गए.

सुबह होते ही अशोक ने देखा कि नम्रता  और बच्चे घर पर नहीं हैं. उसे याद आया कि वो मंदिर जानेवाली थी. शायद बच्चों को भी ले गई होगी. लेकिन दोपहर हो गई और फिर शाम होने लगी, तो अशोक का मन आशंकित हो उठा. कई तरह के विचार उसके मन में आने लगे. नम्रता का फोन भी नहीं लग रहा था. वो घबरा गया कि कहीं आलोक भइया ने तो कोई चाल नहीं चली.

शाम के 7 बज चुके थे. अशोक का मोबाइल बजा… अंजान नंबर से उसे एक फोन आया… ‘अगर अपने परिवार की सलामती चाहते हो, तो ठीक 8 बजे होटल सिटी पैलेस पहुंच जाना.’

अशोक ने बिना देर किए, गाड़ी निकाली और निकल पड़ा. होटल पहुंचते ही उसे वेटर ने एक चिट दी, जिस पर आगे बढ़ने के निर्देश लिखे थे. निर्देशों के अनुसार अशोक एक बड़े-से हॉल में पहुंचे, तो वहां अंधेरा था. जैसे ही अशोक ने नम्रता, गुड्डी, दीपू पुकारा तो मद्धिम रोशनी के साथ फूलों की बरसात होने लगी और ‘हैप्पी बर्थडे’ की आवाज़ से हॉल गूंज उठा. अशोक ने देखा, तो हैरान था. सामने उनके भइया-भाभी, गुड्डी, दीपू और नम्रता थी. इससे पहले कि अशोक कुछ पूछते, नम्रता ने ख़ुद ही कहना शुरू कर दिया, “अशोक, मुझे माफ़ करना कि आपसे बिना पूछे ही मैंने अकेले यह निर्णय ले लिया. लेकिन मैं रजनी भाभी से मिली और वहीं मुझे आलोक भइया भी मिले. भइया की आंखों में पछतावा साफ़ झलक रहा था. वो हालात के हाथों उस दलदल में फंस गए थे. अपनी पत्नी और बच्चों के लिए तड़प रहे थे. अपने भाई और अपने माता-पिता के प्यार को मिस कर रहे थे. अपने माता-पिता की मौत के लिए ख़ुद को ज़िम्मेदार मानकर फूट-फूटकर रो रहे थे. मुझे यही सही लगा कि आपके जन्मदिन के अवसर पर आपको अपना परिवार तोहफे के रूप में लौटाऊं. मैं भइया-भाभी को साथ ले आई. अब यही हमारे माता-पिता हैं. घर के बड़े हैं. इनके आशीर्वाद के बिना हमारा परिवार और हमारा प्यार अधूरा है. आगे आप जैसा ठीक समझें.”

“नम्रता, सच में तुम मेरी सच्ची जीवनसंगिनी हो. मुझे इससे अनमोल तोहफ़ा मिल ही नहीं सकता था. मैं स़िर्फ तुमसे प्यार ही नहीं करता अब, बल्कि बेहद सम्मान भी करता हूं.”

इसी बीच हंसी-ख़ुशी में आलोक और रजनी भी अपने प्यार को आंखों ही आंखों में फिर से तलाश रहे थे और दोनों बच्चे सबके बीच बेहद ख़ुश थे.

 

उषा किरन तलवार

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कहानी- बहू-बेटी (Short Story- Bahu-Beti)

 

Short Story- Bahu-Beti

”हमें अपनी लड़ाई स्वयं ही लड़नी है और इसके लिए पुरुषों के विरुद्ध झण्डा उठाने की भी ज़रूरत नहीं. हमें ही एक-दूसरे का सहारा बनना है, एक-दूसरे का दर्द पहचानना है. सौभाग्यवश आज की सास शिक्षित है. उसकी सोच संकुचित नहीं रह गई. अब वह घर बैठ हर समय बहू की नुक्ताचीनी करने में अपना समय नहीं गंवाती.”

जया स्वयं को उतना उत्साहित नहीं पा रही थी, जितना कि छह माह पश्‍चात् घर लौटने पर उसे होना चाहिए था. स्पष्ट कुछ भी नहीं था. बस लौटना था, इसलिए लौट रही है. अमेरिका का उसका छह माह का वीज़ा समाप्त होने पर था. यह समय वह अपनी बेटी, दामाद और दो नटखट नातिओं के संग बिता कर अब अपने घर आ रही थी. यहां भी भरा-पूरा परिवार है. एक ही घर के ऊपर-नीचे की मंज़िल में दोनों बेटे सपरिवार रहते हैं. मकान तो उसके पति का ही बनवाया हुआ है और यहां उसका

निरादर होता हो, ऐसा भी नहीं है. तो फिर मन क्यों उचाट है? पिता की मृत्यु के बाद बेटी ने बुलवा भेजा था, ताकि मन बहल जाए कुछ दिन, पर रहना तो आख़िर यहीं है. अपने वतन और अपने लोगों के बीच और यही उसे पसन्द भी है.

हवाई जहाज के उड़ान भरते ही उसने अपनी दृष्टि पासवाली छोटी-सी बन्द खिड़की के पास ग़ड़ा दी. हवाई टिकट बुक कराते समय वह सदैव ही खिड़की वाली सीट के लिए भी आवेदन कर देती है. केबिन के खिड़की से बाहर देखना उसे बहुत अच्छा लगता है. एकदम अलौकिक दृश्य- दूर तक फैला अनन्त. दूर- बहुत दूर एक होते पृथ्वी और आकाश- बस और कुछ नहीं. कहां दिखता है ये सब महानगरों की बहुमंज़िली इमारतों के बीच. बादलों के आ जाने पर हवाई जहाज उनके भी ऊपर चला जाता है. स़फेद रूई के फाहों जैसे बादलों के ऊपर यह दृश्य एकदम अलग होता है.

पहले तो ये नज़ारे सदैव ही उसके मन में पुलक जगा जाते थे, पर आज ये भी उसे अधिक समय तक नहीं बांध सके. वह आंखें मूंद अपने अतीत के गलियारों में घूमने लगी. कितना बदल गया है समय. जब उसका विवाह हुआ था तो सास अर्थात् बिना ताज की एकछत्र साम्राज्ञी. तिस पर उसकी सास तो कठोर और निर्मम भी थी. पति भी तो ऐसे नहीं थे कि कभी दबी ज़ुबान से ही पत्नी के पक्ष में बोल देते. घोर अन्याय तक की बात में भी ख़ामोश ही रहते. पुरुष जो ठहरे.

पर जया को अपने बड़े बेटे समीर का बहुत सहारा है. जाने किस मिट्टी का बना है वह. कभी किसी का दिल नहीं दुखाया होगा उसने. मां की पूरी देखभाल करता है और पत्नी वसुधा भी प्रसन्न है. और क्यों न हो? अपनी इच्छा से ही तो विवाह किया है दोनों ने. बैंगलौर में दोनों ने एक संग मैनेजमेन्ट का कोर्स किया है. दोस्ती हुई और विवाह का फ़ैसला कर लिया. कितना परेशान हो गए थे वे दोनों. ‘वसुधा को एक शब्द भी हिन्दी बोलनी नहीं आती’ बताया था समीर ने.

“अब हमें क्या अपने घर में अंग्रेज़ी बोलनी पड़ेगी? या फिर तमिल ही सीखनी पड़ेगी?” झुंझलाकर कहते उसके पिता.

पर ऐसा कुछ भी नहीं करना पड़ा था. सादे-से विवाह समारोह के पश्‍चात् बेटे-बहू ने प्रयत्न करके उसी शहर में नौकरी ढूंढ़ी और एक संग रहने का फैसला भी किया. वसुधा ने एक दिन भी महसूस नहीं होने दिया कि उन्हें अंग्रेज़ी सीखनी पड़ेगी, बल्कि सालभर के भीतर हिन्दी बोलने-समझने तो लगी ही थी, साथ में कुछ शब्द पंजाबी के भी सीख लिए थे. बहुत आदर-सम्मान करती थी सब का. उसके नौकरी करने से सास पर ही काम का सब बोझ न आन पड़े, इसलिए दिनभर के लिए आया की भी व्यवस्था कर दी थी और जल्द ही घर नन्हीं किलकारियों से भी गूंज उठा.

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इतना कुछ पाकर भी एक अरमान रह गया था जया के मन में. दूसरी बहू तो वह अपने कुल-गोत्र की ही लाएगी. अपने सब अरमान पूरे करेगी वह अपने बेटे रंजन के ज़रिए. पूरे रस्मो-रिवाज़ के साथ व्याह रचाएगी. बहुत-सी लड़कियों से मिलवाने के बाद ही रंजन ने माधवी को पसन्द किया था. पूरे विधि-विधान से विवाह सम्पन्न हुआ. जया ने बहू माधवी का बहुत खुलेदिल से स्वागत किया और अपनत्व देने का प्रयत्न किया. पर वह सबसे खिंची-खिंची अलग-थलग ही रहती. अपने कमरे में चुपचाप कुछ पढ़ती रहती अथवा रेडियो चला कर आंखें मूंदे लेटी रहती.

जया उससे बात करने का प्रयत्न भी करती लेकिन वह या तो चुप ही रहती अथवा रूखा, संक्षिप्त-सा उत्तर देकर चली जाती.

जया को अपने प्रति किया व्यवहार न अखरता, यदि रंजन-माधवी आपस में ही हंसी-ख़ुशी रह लेते, पर दोनों का ही मुंह अलग-अलग दिशा में रहता. वह यह भी नहीं कह सकती कि पूरा दोष माधवी का ही था. उसका बेटा भी तो कम आत्मकेन्द्रित नहीं. साथ ही पूरी तरह से पुरुष सत्तात्मक सोच भी थी उसकी. कहां ग़लती हो गई

उसके लालन-पालन में? संस्कार तो उसने अपने दोनों पुत्रों में एक-से ही डाले थे. वह इस आशा में थी कि मेरी परवाह भले ही न करे, लेकिन कम-से-कम अपनी पत्नी को तो प्यार करेगा. वह किसी तरह आपस

में ही सामंजस्य बिठा ले, यही सोचकर उसने ऊपर वाला हिस्सा उन्हें अलग रहने के लिए दे दिया.

प्रायः ऐसा होता है कि बहू सास से प्रताड़ना पाती है और अपना समय आने पर ब्याज सहित अपनी बहू से वसूलती है. पर जया ने इसके विपरीत यह तय किया कि जो कुछ उसने सहा-सुना, वह उसकी बहुओं के साथ न हो. वह उन्हें बेटियों-सा ही स्नेह देती. बड़ी से तो ख़ैर उसे कोई शिकायत नहीं थी. पर माधवी…? और जब उसे मालूम था कि वसुधा अपनी बीमार मां को देखने गई हुई है, तब भी क्यों उसे घर पहुंचने का उत्साह नहीं हो रहा? समीर उसे हवाई अड्डे लेने आया. रास्ते में उसने बताया कि रंजन और माधवी में तनातनी कुछ बढ़ी ही है, कम नहीं हुई और उनके बीच होते तकरार प्राय: ही नीचे सुनाई देते रहते हैं.

दूसरे दिन इतवार था. दोपहर के भोजन के पश्‍चात वह लेटी ही थी कि बाहर आहट हुई. बाहर के दरवाज़े की सांकल भी खुली. नीचे के हिस्से में उस व़क़्त कौन जा रहा है? यह देखने कमरे से बाहर आई तो पाया माधवी खड़ी है. द्वार के पास एक अटैचीकेस भी रखा है.

“कहां जा रही हो इस तपती दोपहरी में?” उसने पूछा.

“अभी सोचा नहीं.”

“मतलब?”

“आपके बेटे ने कहा है कि यह घर उसका है और मैं यहां से चली जाऊं.”

जया उसका हाथ थाम अपने कमरे में ले आई. उसे स्नेहपूर्वक अपने पास बिठाया और कहा.

“हां, अब बताओ.”

पर वह तो मुंह खोलने को ही तैयार नहीं थी.

“माधवी, तुम इस घर में व्याह कर आई हो. अतः अब यह घर उतना ही तुम्हारा है, जितना रंजन का.”

“घर तो आप लोगों का है, रंजन का है. मेरा कैसे हो सकता है?”

“फिर तो यह घर मेरा भी न हुआ. मैं भी तो तुम्हारी तरह बाहर से आई हूं… अच्छा, फिर यह बताओ मेरा और तुम्हारा घर कौन-सा है?”

माधवी चुप ही बैठी रही.

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“मां के घर सुनते रहे कि बेटी पराया धन है और ससुराल का घर तो पति का होता है, भले ही यह घर स्त्री ही तिनका-तिनका जोड़कर बनाती है. उस घर की दिन-रात देखभाल करती है. अपने से पहले पति और बच्चों की ज़रूरत पूरी करती है. फिर भी घर उसका नहीं. अच्छा, फिर यह बताओ उसका घर कौन-सा है?”

“क्या पता?” माधवी ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया.

“हमने कभी संग बैठ बातें नहीं की. दुख-सुख नहीं बांटा. चलो आज ही शुरुआत करते हैं…”

माधवी की तरफ़ से कुछ हरकत न पा जया ने ही आगे जोड़ा.

“मायके में जब भी तुम्हें कोई समस्या होती थी तो तुम मां से अथवा घर के किसी अन्य सदस्य से बात कर मन का बोझ

हल्का कर लेती थी न? वैसे ही आज भी कर लो… चलो पहले मैं ही तुम्हें आपबीती सुनाती हूं. तब तुम्हें शायद मन की बात कहने का हौसला मिल जाए.

मेरा विवाह हुआ तो मेरे साथ क्या होता था, जानती हो? शाम को बेटे के घर में घुसते ही दिनभर की शिकायतों का पुलिन्दा खोल कर बैठ जाती थीं अम्मा. कूप मण्डूक-सा ही जीवन जीया था उन्होंने और मैं सह शिक्षा में पढ़ी हुई थी. अत: अम्मा को तो मेरी हर बात नागवार गुज़रती. मेरी हर बात पर नुक्ताचीनी करतीं वह. पति के मित्रों के साथ हंसकर बात कर लेना उन्हें अक्षम्य अपराध लगता. पति भी तो ऐसे नहीं थे कि मां से कहते- ‘मां अब सिर ढंककर रहने का ज़माना नहीं रहा.’ अपनी पत्नी की हर बात, हर ज़रूरत को नज़रअंदाज़ कर अपने माता-पिता की ही हर बात सुनना- यही तो उस ज़माने में आदर्श बेटा होने का प्रमाण था.

यूं पूरा दोष अम्मा का भी नहीं था. पढ़ी-लिखी वह थीं नहीं. उस समय स्त्रियों की बातचीत का मुद्दा प्राय: इधर-उधर की शिकायतें, मीन-मेख निकालने का ही होता था. फिर उन्होंने स्वयं बहुत प्रताड़ना सही थी. युवावस्था में ही पति की मृत्यु हो गई.

पहले की महिला आर्थिक, सामाजिक रूप से पूर्णत: पति पर निर्भर थी तो ससुराल की सब धौंस चुपचाप सहती थी. पर अब शिक्षित होने पर वह उतनी निर्भर नहीं है. उसमें आत्मविश्‍वास भी आ चुका है तो वह ये सब क्यों सहे? पर सास की छवि आज भी वही है और इसका एक दुष्परिणाम यह हुआ है कि संयुक्त परिवार टूटने लगे हैं. जबकि दरअसल उनकी ज़रूरत बढ़ी है, कम नहीं हुई. मिल-जुलकर रहने से दोनों का ही लाभ है. मां के नौकरी करने पर छोटे बच्चे दादा-दादी की स्नेह की छत्रछाया में पलते हैं और वृद्धावस्था में बच्चे मां-बाप का सहारा बन जाते हैं.

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लड़की कितनी भी पढ़ी-लिखी हो, आधुनिक हो- परिचित माहौल को छोड़कर नई जगह में बसने का भय, एक झिझक तो होती ही है. उस पर यदि घर की प्रमुख स्त्री यानी सास विद्रोही खेमे में ही खड़ी हो तो समस्या और भी बढ़ जाती है. तुम्हारे मन में भी शायद मेरी यही छवि बनी हुई है.

सदियों से चली आ रही परम्परा को तोड़ना इतना आसान न भी हो, पर इतना तो हम कर ही सकते हैं कि नई नवेली दुल्हन का विशाल हृदय से स्वागत करें. यह तो संभव है कि हम आपस में मां-बेटी-सा रिश्ता कायम कर लें, दोस्ताना व्यवहार करें. एक-दूसरे के दुख-दर्द को समझें.

हमें अपनी लड़ाई स्वयं ही लड़नी है और इसके लिए पुरुषों के विरुद्ध झण्डा उठाने की भी ज़रूरत नहीं. हमें ही एक-दूसरे का सहारा बनना है, एक-दूसरे का दर्द पहचानना है. सौभाग्यवश आज की सास शिक्षित है. उसकी सोच संकुचित नहीं रह गई. अब वह घर बैठ हर समय बहू की नुक्ताचीनी करने में अपना समय नहीं गंवाती. उसकी अपनी रुचियां हैं, सामाजिक दायरा है.

अब आई बात रंजन और तुम्हारी. ज़िन्दगी की प्रत्येक समस्या का हल न हो तो भी अनेक का होता ही है, बशर्ते हम उसे शान्तिपूर्वक बैठ कर सुलझाने का प्रयत्न करें. यदि रंजन कुछ ग़लत करता है और सोचता है कि पुरुष होने के नाते अथवा इस घर का सदस्य होने के नाते उसकी मनमानी चल जाएगी तो वह ग़लत सोच रहा है. यदि वह तुम पर अन्यायपूर्ण बात थोपता है तो मैं तुम्हारे साथ हूं और उसकी मां होने के नाते सही राह दिखाना मेरा फ़र्ज़ है और यदि तुम  कोई ग़लती करोगी तो मैं तुम्हें भी डांट सकती हूं, क्योंकि तुम भी अब इसी घर की बेटी हो.”

जया खिसक कर माधवी के क़रीब आ गई और स्नेहपूर्वक उसे आलिंगनबद्ध कर लिया. माधवी एक पल के लिए रुकी रही. पर उसके चेहरे से लग रहा था कि ब़र्फ पिघल रही है. उसने पहले झिझकते हुए, फिर कस के जया का आलिंगन किया और अपना सिर उसके कंधे पर टिका कर आंखें मूंद लीं. फिर आंसुओं को पीते हुए बोली, “मां, मैंने तो हमेशा ही इस घर को और आप सभी को अपना समझा, पर इनका रूखा व्यवहार मुझे निराश करता चला गया. लेकिन धीरे-धीरे मैं बहुत-कुछ समझने और जानने लगी हूं. बस, एक परायेपन की फांस थी, जो आपने बहुत कुछ कह कर और प्रेम, अपनेपन से दूर कर दी है. सच, मैं ख़ुद को बेहद भाग्यशाली मानती हूं कि हमारा रिश्ता सास-बहू का नहीं, बल्कि मां-बेटी का है.”

जया प्यार से माधवी के सिर पर हाथ फेरने लगी.

Usha Drava

       उषा वधवा

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कहानी- सबक (Short Story- Sabak)

Short Story- Sabak

मुझे तो अभी-अभी जीवन का एक सबक मिला था कि चाहे रिश्ता जो भी हो, कभी एक तरफ़ की बात सुनकर किसी के बारे में कोई राय नहीं बना लेनी चाहिए, पता नहीं सच क्या हो.

सोसायटी के गार्डन में अपनी सहेलियों- तनु और रश्मि के साथ शाम की सैर करती हुई मैंने कोने में स्थित एक बेंच पर गुमसुम बैठी माया आंटी पर उड़ती हुई नज़र डाली. वे किसी सोच में गुम कुछ गंभीर व उदास लगीं. आंटी अक्सर यहीं मिलती हैं, ख़ूब बातें करती हैं. अंकल की पांच साल पहले मृत्यु हो गई थी. वे अपनी बेटी सोनल के साथ रहती हैं. सोनल की बेटी दसवीं क्लास में है और बेटा आठवीं में.

सोनल के पति अनिल की दस साल पहले एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी, तब से आंटी और सोनल से तीन साल छोटा उनका बेटा अनुज सोनल के साथ ही रहते हैं. गार्डन का हर चक्कर पूरा करने पर मेरा ध्यान आंटी की तरफ़ जा रहा था. वे आज कुछ ज़्यादा ही गंभीर थीं, नहीं तो हमें आवाज़ देकर बुला लिया होता. तनु और रश्मि तो सैर करके घर चली गईं, पर मेरा मन नहीं माना.

“हेलो आंटी!” कहते हुए मैं उनके पास ही बैठ गई. आंटी फीकी-सी हंसी हंसते हुए बोलीं, “आओ शुभा, कैसी हो?”

“मैं ठीक हूं आंटी. आज आप अकेली क्यों बैठी हैं? बाकी आंटी कहां हैं? आपकी सहेलियां?”

“वे सब सैर करके घर चली गईं.”

“आप नहीं गईं?”

“घर जाने का मन नहीं हुआ.”

“ओह! सोनल नहीं है घर पर?”

“नहीं, मूवी गई है बच्चों के साथ.”

“आप नहीं गईं?”

“मुझे कौन ले जाता है?” इससे ज़्यादा किसी के जीवन में हस्तक्षेप करना मुझे ठीक नहीं लगा, मैं चुप रही. पर आंटी ने ख़ुद ही अपने मन का गुबार निकालना शुरू कर दिया. जैसे-जैसे आंटी अपने मन की पीड़ा बांट रही थीं, मेरा दिल उनके प्रति असीम सहानुभूति से भरता जा रहा था.

आंटी कह रही थीं, “इस सोनल को सहारा देने के लिए सालों से इसके साथ रह रही हूं. आज जब इसके बच्चे बड़े हो गए, इसे मेरी ज़रूरत ही नहीं रही. कभी भी दोनों बच्चों को लेकर बाहर चली जाती है. कभी मूवी, कभी डिनर. मैं अनुज को नौकरी मिलते ही उसके साथ चली जाऊंगी. बेसहारा-सी पड़ी हूं, कोई और ठिकाना नहीं है न! नहीं तो इसके इतने नखरे क्यों उठाती. अभी तक उसके बच्चे छोटे थे. उसे हमारी ज़रूरत थी. उसका पति इतना पैसा छोड़कर गया है, तब भी उसे मुझ पर और अनुज पर ख़र्च करने में तकलीफ़ होती है.” मैं हैरान, दुखी-सी आंटी की बातें सुन रही थी.

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सोनल ऐसी है! मुझे तो जब भी मिली, सभ्य, कोमल स्वभाव की लगी. घर में अपनी मां के साथ उसका व्यवहार ऐसा है? मुझे मन-ही-मन उस पर ग़ुस्सा आया. अंधेरा होने लगा, तो आंटी को ज़बर्दस्ती वहां से उठाकर घर भेजकर मैं भी अपने घर लौट आई. फिर किसी काम में मन ही नहीं लगा. यही सोच रही थी कि वृद्धावस्था तो बहुत परेशानी की चीज़ है. अपनी बेटी पर आश्रित रहकर दिन-रात अपमान सहन करना आसान तो नहीं है, पर कोई बेटी अपनी मां के साथ दुर्व्यवहार कैसे कर पाती है! रह-रहकर आंटी का उदास चेहरा मेरी आंखों के आगे आ रहा था.

मुझे क्या करना चाहिए? सोनल से बात कर उसे समझाना ठीक रहेगा क्या? पर आजकल किसी के जीवन में हस्तक्षेप करना समझदारी तो नहीं है न! दो-चार दिन और निकल गए. आंटी उसके बाद भी मुझे गार्डन में दिखीं, पर बैठकर बातें करने का मौक़ा नहीं मिला. एक दिन आंटी नहीं थीं गार्डन में, अचानक सोनल दिखी. मैं हैरान हुई, वह भी मुस्कुराई. मैंने कहा, “तुम आज काफ़ी दिन बाद दिखी. आज आंटी नहीं आईं.”

“मां की किटी पार्टी है आज!”

“अच्छा?”

“हां, आज बच्चे भी बर्थडे पार्टी में गए हैं. मैंने सोचा मैं भी सैर पर निकल जाऊं.”

“अच्छा किया.” मैंने कहा तो उसने भी मेरे साथ क़दम बढ़ा दिए. वह मेरे बच्चों की पढ़ाई के बारे में पूछती रही. उसका सभ्य स्वभाव मुझे हमेशा अच्छा तो लगा था, पर आंटी की बातों के बाद मैं काफ़ी दुविधा में थी और उससे आंटी के बारे में बात करना चाहती थी. सैर के बाद मैंने कहा, “सोनल, पांच मिनट बेंच पर बैठें?”

“हां, क्यों नहीं!” हम दोनों बैठ गए. कैसे बात शुरू करूं, मैं सोच रही थी. आख़िर मैंने पूछ ही लिया, “अनुज को कहीं जॉब मिला?” सोनल के चेहरे पर दुख का एक साया-सा लहराता साफ़-साफ़ देखा मैंने. ठंडी सांस लेकर बोली, “मिलेगा उसे न जो ढ़ूंढ़ना चाहता हो! क्या बताऊं शुभा, घर-घर की कहानी है. छोड़ो, आज इतने दिनों बाद तुमसे मिली हूं. क्या अपना रोना लेकर बैठूं.”

“अरे नहीं, तुम मुझे अपने दिल की बात बता सकती हो, कुछ परेशानी है?”

“तुम्हें तो पता ही है, मेरे पति मेरा साथ बहुत जल्दी छोड़ गए, तब बच्चे कितने छोटे थे! मां अनुज और पिताजी के साथ मेरे पास रहने आ गई थीं कि मुझे सहारा रहेगा. पर मैं आज भी उस दिन को कोसती हूं, जब मां मेरे साथ रहने आई थीं.” मैं बुरी तरह चौंकी, “सच? क्या हुआ?”

“हमारा एक फ्लैट और दो दुकाने हैं. वहां से जो किराया आता है, उससे और मेरे पति की जो बीमा रक़म मिली, उससे मैंने घर-गृहस्थी और बच्चों की पढ़ाई संभाली हुई है. किसी तरह मैनेज कर ही लेती हूं.

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एक-दो बार मैंने कहीं जॉब भी किया, पर मुझे एक महीने में ही छोड़ना पड़ गया, क्योंकि अनुज और मां ने बच्चों को संभालने के लिए

साफ़-साफ़ मना कर दिया था. पिताजी नहीं रहे, तो मैं ही अपनी परेशानियां एक तरफ़ रख मां को संभालती रही. तुम्हें पता है शुभा, मां के तीन फ्लैट्स हैं, तीनों किराए पर दिए हैं. किराए का और पिताजी का काफ़ी पैसा मां के पास आता है, पर मां एक रुपया भी कभी मुझ पर या मेरे बच्चों पर ख़र्च नहीं करतीं. उनका सब कुछ अनुज के लिए है और अनुज! वह इतना कामचोर और निकम्मा है कि दिनभर बस टीवी या कंप्यूटर पर लगा रहता है. बच्चों को पढ़ना होता है, तो यही कहती रहती हूं कि टीवी की आवाज़ धीमी कर लो. फिर मां को यह इतना बुरा लगता है कि पूछो मत. खाने में मां और अनुज के इतने नखरे हैं कि बता नहीं सकती. मेड से भी दोनों बहुत किटकिट करते हैं. अपने ही घर में दम घुटता है मेरा, तो निकल जाती हूं कभी बच्चों को लेकर.

तीन-तीन किटी पार्टी है मां की. अपने और अनुज के लिए, सब तरह के मनोरंजन के लिए पर्याप्त धनराशि है मां के पास, पर कभी उनका हमारे ऊपर कुछ ख़र्च हो जाए, तो दिनभर सुनाती हैं. काश, सहारा देने के नाम पर मां हमारे पास न आतीं. मैं ज़्यादा चैन से जी लेती. वे कभी अपने फ्लैट में रहने के बारे में सोचती भी नहीं, क्योंकि वहां उनके ख़र्चे होंगे.

शुभा, आज सुबह मां ने बहुत सुनाया था, दिल भरा हुआ था. आज तुमसे सब कह दिया. पर प्लीज़, किसी को कहना मत. अपनी परेशानियां आज तक किसी को नहीं कही, कोई जल्दी यक़ीन भी तो नहीं कर पाएगा. जो सामने दिखता है, वही सच नहीं होता, बहुत कुछ अनदेखा रह जाता है. चलें?” आंखें पोंछते हुए सोनल ने कहा, तो मुझे भी अपनी आंखों की नमी का एहसास हुआ. हम दोनों अपनी-अपनी बिल्डिंग के रास्ते की तरफ़ बढ़ गए. मैंने उसे मुड़कर देखा. उसके थके सुस्त क़दमों से उसके दिल की उदासी महसूस हो रही थी मुझे. और मैं? मुझे तो अभी-अभी जीवन का एक सबक मिला था कि चाहे रिश्ता जो भी हो, कभी एक तरफ़ की बात सुनकर किसी के बारे में कोई राय नहीं बना लेनी चाहिए. पता नहीं सच क्या हो. दूसरा अपने अंदर पता नहीं कितने दुख समेटकर जी रहा हो. बुज़ुर्ग माता-पिता भी तो कर देते हैं न ग़लतियां! स़िर्फ बड़े होने से ही तो उनकी हर बात सही, सच नहीं हो जाती न!

Poonam ahmed

    पूनम अहमद

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कहानी- ऐेसे ना करो रुसवा (Short Story- Aise Na Karo Ruswa)

Short Story- Aise Na Karo Ruswa

“आश्‍चर्य है?… तुम इतना अच्छा अभिनय कर लेते हो? वह भी तब जब तुम्हारे और संध्या के बारे में पूरे कॉलेज में चर्चा है.” अपने मुंह से निकले व्यंग्य को वह रोक न सकी.

“लोगों की मुझे परवाह नहीं, पर तुम तो मुझे ऐेसे रुसवा मत करो. मैंने संध्या का साथ दिया था, क्योंकि वह मुसीबत में थी. बाकी के सारे आरोप, जो लोग मुझ पर लगा रहे हैं, ग़लत हैं.”

शाम के छह बजनेवाले थे. तेज़ गति से भागती ट्रेन पल-पल अपने लक्ष्य की तरफ़ बढ़ रही थी. साथ ही पीछे छूटता जा रहा था अचला का वर्तमान और मन समाहित होता जा रहा था अतीत के गलियारों में. मन के किसी कोने में दबी स्मृतियों की यंत्रणा असहनीय हो उठी. वह घबराकर पत्रिका में मन लगाने की कोशिश करने लगी. लेकिन यादें थीं, जो मन को अवश किए हुए थीं. उसने उचटती नज़रों से डिब्बे का अवलोकन किया.

लगभग 17-18 वर्ष की तीन लड़कियां सामने की बर्थ पर बैठी बातों में मशगूल थीं. उनकी बेफ़िक़्री और छोटी-छोटी बातों पर भी खुलकर हंसने का अंदाज़ बता रहा था कि वे सभी स्टूडेंट्स हैं.

अचानक उसके हाथों से पत्रिका फिसलकर एक लड़की के पैरों के पास जा गिरी. बड़ी शालीनता से उस लड़की ने पत्रिका उठाकर अचला को पकड़ा दी. “क्या नाम है तुम्हारा?” अचला ने स्नेह से पूछा.

“मेरा नाम अर्चना है और ये मेरी सहेलियां सुप्रिया और सोनाली हैं. हम तीनों दिल्ली के एक कॉलेज में फ़र्स्ट ईयर की स्टूडेंट्स हैं. छुट्टियों में पटना अपने-अपने घर जा रही हैं. आप भी…?”

“हां, मैं भी पटना जा रही हूं, लेकिन उसके बाद मुज़फ्फरपुर तक जाना है.”

वह देर तक लड़कियों से गपशप करती रही. खाना खाते ही थकी-हारी लड़कियां सो गईं, पर अचला की आंखों में नींद का नामोनिशान न था. एक बार फिर वह अतीत के गलियारों में भटकने लगी. औरत चाहे कितनी ही पाषाण हृदय क्यों न हो, पर अपने पहले प्यार को भुला नहीं पाती. शायद यही कारण था कि न चाहते हुए भी अनमोल की यादें बार-बार उसे तड़पा रही थीं.

जिस शक के कारण वह आवेश में आकर अपने प्यार को ठोकर मार आई थी, आज पंद्रह साल गुज़र जाने के बाद भी क्या उसे अपने जीवन, अपनी सोच से ठोकर मारकर निकाल पाई थी? शायद नहीं.

उस पल को अचला कभी भूल न सकी, जब उसके द्वारा लगाए गए आरोपों को सुनकर अनमोल का चेहरा ज़र्द पड़ गया था,  पर उसके चेहरे पर किसी को छलने का भाव न था. बस, था तो स़िर्फ एक आश्‍चर्यमिश्रित क्रोध और अपमानित होने का भाव. शायद उसे विश्‍वास ही नहीं हो रहा था कि उस पर भी ऐसे गंभीर आरोप लगाए जा सकते हैं, वह भी अचला द्वारा. उसने बहुत कोशिश की थी अचला को समझाने की, लेकिन अचला के सामने उसकी एक न चली.

पूरे पंद्रह वर्ष गुज़र गए. इन बरसों में अचला ने क्या कुछ नहीं पाया. अच्छी नौकरी के साथ-साथ सभी सुख-सुविधाएं. नहीं मिला तो जीवन की शांति और जीवन जीने का मक़सद. उसके शादी न करने के फैसले को बदलने के लिए मम्मी-पापा ने उसे बहुत समझाया. लेकिन अंततः दोनों  को ही उसकी ज़िद के आगे झुकना पड़ा. एक-एक कर तीनों भाइयों की शादियां हो गईं और जल्द ही वे सभी अपनी-अपनी दुनिया में रम गए.

उसके शादी न करने का दर्द लिए पहले मम्मी गई, फिर पापा भी ज़्यादा दिनों तक जीवित न रह सके. अचला की ज़िंदगी पूरी तरह वीरान हो गई. परिवारविहीन एकाकी और निर्लिप्त जीवन से कभी-कभी उसका मन बुरी तरह घबरा जाता. दिमाग़ चाहे जो तर्क दे, पर उसका दिल कहता उसने अपने पैरों पर ख़ुद ही कुल्हाड़ी मारी थी.

अचला को आज भी याद है, जब उसकी पहली मुलाक़ात अपने से दो वर्ष सीनियर अनमोल से हुई थी. कॉलेज में होनेवाले डिबेट में वह उसका प्रतिद्वंद्वी था. लंबी क़द-काठी का अनमोल जितना देखने में सुदर्शन था, उतना ही मेधावी भी था. अपनी पढ़ाई-लिखाई के साथ, सौम्य, शांत और मिलनसार स्वभाव के कारण वह पूरे कॉलेज में काफ़ी लोकप्रिय था.

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डिबेट वाले दिन वह निश्‍चित समय पर बड़े ही आत्मविश्‍वास के साथ अनमोल के सामने जा खड़ी हुई थी. डिबेट शुरू होते ही दोनों अपना-अपना पक्ष एक-दूसरे के सामने रखने लगे थे. दोनों के ही तर्क-वितर्क बता रहे थे कि दिए गए विषय के वे सशक्त वक्ता हैं. फिर भी थोड़ी देर में ही अचला का पलड़ा भारी पड़ने लगा था. उसके एक-एक शब्द अपने पक्ष को कथानक की भांति जीवंतता से प्रस्तुत कर रहे थे, जो श्रोताओं को ही नहीं, उसके प्रतिद्वंद्वी को भी किंकर्त्तव्यविमूढ़ करता जा रहा था. उस दिन अचला की तो जीत हुई, पर अनमोल अपना दिल हार बैठा.

उस दिन के बाद से अचला सबकी नज़र में प्रशंसा का पात्र बन गई. धीरे-धीरे बढ़ती मुलाक़ातों के साथ अचला-अनमोल एक-दूसरे के बेहद क़रीब आ गए.

उन्हीं दिनों हॉस्टल में बी.ए. द्वितीय वर्ष की एक छात्रा संध्या अचला की रूम पार्टनर बनकर आई. शबनम में नहाई गुलाब की पंखुड़ियों की तरह ताज़गी भरा उसका सौंदर्य अद्वितीय था. संध्या जितनी सुंदर थी, उतनी ही सौम्य और सीधी-सादी भी थी. हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार. बिना भेदभाव के वह अचला के भी कई छोटे-मोटे काम संभालने लगी. कुछ ही दिनों में दोनों के बीच सगी बहनों-सा प्यार हो गया. अचला को लगता कि ईश्‍वर ने उसके जीवन में छोटी बहन की कमी पूरी कर दी है. जब भी अनमोल की चर्चा होती, वह अक्सर किलक पड़ती, “हाय राम! कितने हैंडसम हैं आपके अनमोलजी. काश! आपसे पहले मेरी नज़र पड़ गई होती, तो ज़रूर उड़ा ले जाती.”

अचला प्यार से उसे डांट देती.

“चुप कर पगली… यह क्या हाय-हाय लगा रखी है. देखना, एक दिन तुझे अनमोल से ज़्यादा हैंडसम पति मिलेगा.”

“मेरे ऐसे भाग्य कहां? अभी तक तो ज़िंदगी ने हर मोड़ पर मुझे छला ही है.” एक उसास उसके गले से निकल पड़ती.

देखते-देखते समय पंख लगाकर उड़ गया. परीक्षाएं नज़दीक आ गईं. अचला सारी मौज़-मस्ती भूल परीक्षा की तैयारियों में व्यस्त हो गई. अब उसका ध्यान संध्या की तरफ़ कम ही रहता.

समय पर परीक्षाएं शुरू हो गईं. एक दिन अचला परीक्षा देकर लौटी तो संध्या से बोली, “चल संध्या, कहीं मौज़-मस्ती करते हैं. कुछ खाते-पीते हैं, अभी अगला पेपर पूरे एक ह़फ़्ते बाद है.”

“नहीं दी… आज नहीं, मेरी तबियत थोड़ी ठीक नहीं है.”

उसकी फीकी हंसी, उदास चेहरा और धीमी आवाज़ ने अचला को चौंका दिया, “क्या बात है संध्या? तुम इतनी बीमार-सी क्यों लग रही हो?”

अचला की सहानुभूति पाकर संध्या की आंखें भर आईं, जिसे देखकर अचला का कलेजा एक अनजानी आशंका से धड़क उठा. तभी अपने आंसुओं को पोंछकर, हंसकर संध्या बोली, “ऐसी कोई गंभीर बात नहीं है, जिसके लिए मैं आपको परेशान करूं. जिस दिन आपकी परीक्षा समाप्त हो जाएगी, दिल में दो महीने से जमा बातों का पुलिंदा आपके सामने ही तो बांचूंगी.”

संध्या के आश्‍वासन से आश्‍वस्त वह फिर से अपनी परीक्षा की तैयारी में जुट गई. जिस दिन अचला अंतिम पेपर देकर लौटी, तो उसे पता चला कि संध्या के मम्मी-पापा आकर उसे ले गए. यूं अचानक उससे मिले बिना संध्या का चले जाना उसे व्यथित कर गया.

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दूसरे दिन सुबह तैयार होकर वह चाय बनाने जा ही रही थी कि उसके बगल के कमरे में रहनेवाली सुनंदा आ गई. चुपचाप बैठी सुनंदा के चेहरे पर आते-जाते रंग अचला की उत्सुकता बढ़ा रहे थे, “क्या बात है सुनंदा? क्या तुम मुझसे कुछ कहना चाहती हो?”

“हां, तुमने ठीक समझा है. मैं पिछले कई दिनों से तुम्हें संध्या के विषय में कुछ बताना चाह रही थी, लेकिन तुम्हारी परीक्षा चल रही थी, इसलिए चुप रही. वैसे भी तुम संध्या को इतना प्यार करती हो कि उसके विषय में कुछ बताना मेरे लिए मुश्किल हो रहा था. जाने कैसे रिएक्ट करोगी?”

फिर थोड़ा रुककर बोली,  “शायद तुम्हें पता नहीं था कि संध्या मां बननेवाली थी. वह डॉक्टर के पास गई थी एबॉर्शन के लिए, वो भी अनमोल को साथ लेकर. डॉक्टर अनुराधा मेरी कज़िन है, जहां मैंने इन दोनों को देखा था. अनुराधा से ही मुझे सारी जानकारियां मिल गई थीं. इन दिनों अनमोल के साथ चिपकी जाने कहां-कहां घूमती रही थी. पूरे कॉलेज में लोग जाने कैसी-कैसी बातें कर रहे हैं.”

सुनंदा की बातों से आश्‍चर्य, शर्म और गहरी आत्मवेदना से छटपटा उठी थी अचला. सुनंदा के जाते ही धम्म् से अपने बिस्तर पर आ गिरी थी. उसका सारा शरीर जैसे सुन्न पड़ गया था. अब तक अनमोल पर रहा विश्‍वास तिनका-तिनका कर बिखरने लगा था. फिर भी हिम्मत जुटा अनमोल से मिलने चल दी थी. रास्ते में ही अनमोल उसे मिल गया था. मिलते ही बोला, “अच्छा हुआ जो तुम मुझे मिल गई, मैं तुमसे ही मिलने आ रहा था. मुझे तुमसे एक बहुत ही ज़रूरी बात करनी है, साथ ही संध्या का मैसेज भी देना है.”

“आश्‍चर्य है… तुम इतना अच्छा अभिनय कैसे कर लेते हो? वह भी तब जब तुम्हारे और संध्या के बारे में पूरे कॉलेज में चर्चा है.” अपने मुंह से निकले व्यंग्य को अचला रोक न सकी.

“लोगों की मुझे परवाह नहीं, पर तुम तो मुझे ऐसे रुसवा मत करो. मैंने संध्या का साथ दिया था, क्योंकि वह मुसीबत में थी. बाकी के सारे आरोप, जो लोग मुझ पर लगा रहे हैं, ग़लत हैं.”

ग़ुस्से से सुलगती अचला अनमोल पर बरस पड़ी, “मैं सोच भी नहीं सकती थी कि तुम्हारे व्यक्तित्व का एक पहलू इतना गिरा हुआ है. संध्या मेरी छोटी बहन जैसी थी. कैसे किया तुमने इतना बड़ा छल हम दोनों के साथ?”

“अचला… तुम मुझे ग़लत समझ रही हो. पहले मेरी पूरी बात सुन लो, फिर तुम्हारे दिल में जो आए, फैसला करना.” पर अनमोल की बातें सुनने के लिए अचला रुकी ही कहां थी.

अनमोल उसे पुकारता रहा, फिर भी अचला ने उसकी तरफ़ पलटकर भी नहीं देखा. मन में अनमोल को त्याग देने का कठोर ़फैसला कर अचला दूसरे ही दिन मुज़फ्फरपुर आ गई. उसके बाद से ही उसने अनमोल से अपने सारे संपर्क तोड़ डाले. न उसका कोई फ़ोन कॉल रिसीव किया, न ही उसे कोई कॉल किया. वैसा ही उसने संध्या के साथ भी किया.

जल्द ही अचला अपनी नई ज़िंदगी शुरू करने दिल्ली आ गई. धीरे-धीरे वह अपनी सारी पीड़ा, वेदना और कृतियों को नई दिशा देने में जुट गई. कुछ दिनों की कड़ी मेहनत के बाद वह इनकम टैक्स ऑफ़िसर का पद प्राप्त करने में सफल हो गई, जिसके साथ ही उसके जीवन में आमूल परिवर्तन आ गया. काम की व्यस्तता ने अतीत में हुए धोखे को भुलाना आसान कर दिया.

अचला के बड़े भैया अमित आजकल मुज़फ्फरपुर के एक कॉलेज में कार्यरत थे. भैया-भाभी के बार-बार अनुरोध करने पर वह एक लंबे अरसे के बाद मुज़फ्फरपुर जा रही थी. दोनों को सरप्राइज़ देने के चक्कर में उसने अपने आने की सूचना भी नहीं दी थी.

तभी एक हिचकोले के साथ ट्रेन रुक गई. पता चला, आगे कोई ट्रेन पटरी से उतर गई है. धीरे-धीरे सरकती ट्रेन के रात नौ बजे से पहले पटना पहुंचने के आसार नज़र नहीं आ रहे थे.

जाने कैसे उसके मन की बात और घबराहट को पढ़ अर्चना बोली, “आंटी, आप चिंता न करें. आज रात पटना में आप मेरे घर रुक जाइएगा और सुबह मुज़फ्फरपुर के लिए बस पकड़ लीजिएगा.”

वह असमंजस की स्थिति में थी. स्टेशन पर अर्चना के पापा उसे लेने आए थे. अर्चना से अचला के विषय में जानकारी मिलते ही बड़े सम्मान के साथ उन्होंने अचला से अपने घर रुकने का आग्रह किया, तो वह टाल न सकी.

जब फ्रेश होकर वह खाने के टेबल पर पहुंची, तो घर के लोग उसका ही इंतज़ार कर रहे थे. उसके साथ ही इंतज़ार कर रहा था एक ऐसा सरप्राइज़, जिसे देखते ही उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई. आगे बढ़कर डायनिंग टेबल का कोना न थामा होता, तो शायद गिर ही जाती. सामने की कुर्सी पर अनमोल बैठा था. अपने को संभालकर बैठी, तो अर्चना घर के सभी सदस्यों से परिचय कराते हुए अनमोल की तरफ़ मुड़ी. “यह मेरे सबसे छोटे चाचाजी अनमोल हैं. यहां के एक कॉर्पोरेशन में एम.डी. हैं.”

दोनों की आंखों में एक आश्‍चर्यमिश्रित झलक देख अर्चना बोली, “क्या आप दोनों एक-दूसरे को पहले से जानते हैं?”

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“ऑफ़कोर्स जानते हैं. यह मेरी क्लास मेट अचला है. मैं तुम्हारा शुक्रगुज़ार हूं कि तुमने मुझे अचला से मिलवा दिया.”

अचला चुपचाप खाने की कोशिश करने लगी, पर एक भी निवाला उसके गले के नीचे उतर नहीं रहा था. किसी तरह कुछ खा-पीकर अर्चना के बताए कमरे में सोने आई, तो पीछे-पीछे अनमोल भी आ गया. पास ही रखी कुर्सी खींचकर बैठते हुए बोला, “इतने साल बीत जाने के बाद अब मैं न तुम्हें कोई सफ़ाई देना चाहता हूं, न ही इसकी कोई ज़रूरत रही. बस, तुम्हारे नाम संध्या का एक पत्र आज तक मेरे पास पड़ा है, जिसे मैं तुम्हें सौंपना चाहता था. लेकिन तुम्हारे मन में अपने लिए उमड़ती घृणा के कारण मैंने कभी कोशिश ही नहीं की तुमसे मिलने की. संयोग से आज तुम मिल ही गई हो, तो तुम्हें वह पत्र दे रहा हूं.”

अपनी बातें समाप्त कर अनमोल ने जेब से एक पत्र निकालकर अचला को पकड़ा दिया. संध्या का पत्र देखकर अचला का सर्वांग सिहर उठा. हिम्मत करके कांपते हाथों से उसने पत्र खोला-

दीदी नमस्कार,

मैं नहीं जानती कि मैंने कौन-सा ऐसा पुण्य किया था, जो आप जैसी प्यार करनेवाली बहन मुझे मिली. उसी के साथ जाने कौन-सा ऐसा पाप भी कर आई थी, जो राघव जैसे लड़के से प्यार कर बैठी. जब मैं मां बननेवाली थी, उसी समय उसे अमेरिका जाने का मौक़ा मिला. मैं उसके सामने बहुत रोई, गिड़गिड़ाई कि वह मुझसे शादी करने के बाद अमेरिका चला जाए, लेकिन वह नहीं माना और चला गया.

मैं घोर संकट में थी. आपकी परीक्षा चल रही थी. दूसरा कोई मदद करनेवाला था नहीं, इसलिए मैंने सारा दर्द अनमोलजी के साथ बांटा. वे जी-जान से मेरी मदद में जुट गए. हम दोनों ने कई डॉक्टरों के चक्कर लगाए. एबॉर्शन करवाती, उसके पहले ही जाने कैसे वॉर्डन ने मेरी तबियत ख़राब होने की सूचना मेरे घर भिजवा दी. ज़बर्दस्ती मेरे मम्मी-पापा आकर मुझे घर ले जा रहे हैं. जब आपकी परीक्षा समाप्त हो जाएगी, अनमोलजी यह पत्र आपको दे देंगे. आप कैसे भी करके यहां आकर मुझे ले जाइएगा, वरना मेरी सौतेली मां मेरी क्या दुर्दशा करेगी, यह मुझे ख़ुद भी नहीं मालूम. प्लीज़ दीदी, इस संकट से मुझे उबार लीजिए. आपके इंतज़ार में…

आपकी छोटी बहन,

संध्या

पत्र पढ़कर स्तब्ध अचला स़िर्फ इतना ही बोल पाई, “अब कहां है संध्या?”

“तुम्हारे हॉस्टल छोड़ने के पंद्रह दिन बाद उसने आत्महत्या कर ली. इसके साथ ही तुमसे और तुम्हारे प्यार से मेरा मोहभंग हो गया. संध्या मेरी छोटी बहन जैसी थी, उसे बचाने के लिए मैंने काफ़ी बदनामियां भी झेलीं, फिर भी उसे बचा नहीं पाया. काश! तुमने मुझ पर थोड़ा-सा भी भरोसा किया होता. संध्या के जाने के बाद मुझे तुमसे इतनी नफ़रत हो गई कि मैंने सारी ज़िंदगी शादी न करने का फैसला कर लिया.”

अनमोल की बातें समाप्त होते-होते, अचला का मन हाहाकार कर उठा.  बरसों से मन में दबी पीड़ा आंसुओं का सैलाब बन आंखों से उमड़ पड़ी. वह फूट-फूटकर रोती रही. थोड़ी संभली तो बोली, “कितनी तड़पी होगी संध्या मेरे इंतज़ार में. कितनी मजबूरी और निराशा में उसने इस दुनिया का मोह छोड़, मौत को गले लगाया होगा. मैं मरकर भी उसके प्यार का कर्ज़ नहीं चुका सकती. हे भगवान! मैं क्या करूं? मेरी ग़लती माफ़ी के लायक ही नहीं है.”

पश्‍चाताप की आग में झुलसती अचला का बुरा हाल देख अनमोल से चुप नहीं रहा गया.

“ख़ुद को संभालो अचला. मैं शायद तुम्हें कभी माफ़ न करता, लेकिन अपनी ग़लती के पश्‍चाताप में तुम्हें टूटकर बिखरते देख मुझे लगने लगा है कि यदि आज मैंने तुम्हें माफ़ नहीं किया, तो शायद इतिहास ख़ुद को दोहरा देगा.”

अचला के सब्र का बांध भी टूट चुका था. वह अचानक उठकर अनमोल की बांहों में समा गई. अनमोल भी अपने आंसुओं को रोक न सका.

Rita kumari

       रीता कुमारी

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कहानी- अंधकार की किरण (Short Story- Andhkar Ki Kiran)

Short Story- Andhkar Ki Kiran

भविष्य की तो कौन जानता है, पर किशोरवय की चंचलता के कारण उन्हें कई बार मां की ही नहीं, पिता की भी डांट खानी पड़ती. मां-पिता भविष्य देखते थे और वे किशोरियां वर्तमान, जिसमें भरे होते सपने-ही-सपने. असत्य तो उन सपनों के बीच समाता ही न था. हर लड़का राजा, हर लड़की रानी. काश कि बचपन वहीं ठहर जाता.

जैसे ही तांगा गली के मोड़ पर मुड़ा, सत्या का दिल बैठने लगा था. ऐसा नहीं था कि वह इस शहर में पहली बार आई हो. यहां तो उसके बचपन से लेकर किशोरवय तक के किलकते-हंसते दिन बीते थे. जीवन के सबसे सुखद सपने उसने और मीरा ने यहीं देखे थे. वह तो ऐसी उम्र थी जब वह सत्य और कल्पना में भेद नहीं कर पाती थी. सारी कल्पनाएं उसे सुनहरी और सत्य लगती थीं. मीरा और वह घंटों बतियाती रहतीं, पर उनमें कभी कहीं कोई निराशा की गंध नहीं होती थी. भविष्य की तो कौन जानता है, पर किशोरवय की चंचलता के कारण उन्हें कई बार मां की ही नहीं, पिता की भी डांट खानी पड़ती. मां-पिता भविष्य देखते थे और वे किशोरियां वर्तमान, जिसमें भरे होते सपने-ही-सपने. असत्य तो उन सपनों के बीच समाता ही न था. हर लड़का राजा, हर लड़की रानी. काश कि बचपन वहीं ठहर जाता.

बचपन कब रू-ब-रू नहीं हो पाया है ज़िंदगी की धुंधली राहों से. ज़िंदगी के हर मोड़ पर वह खड़ा हो जाता है.

उनके घर कितने छोटे थे और सपने कितने बड़े. छोटे घरों में बड़े सपने देखना कोई गुनाह तो नहीं था.

तांगे वाले ने फिर पूछा, “कहां तक जाना है बहनजी?”

“आगे तो चलो अभी.”

सर्दी का सूरज साढ़े चार बजते-बजते धुंधला गया था. छोटा शहर, भीड़-भाड़ से दूर, इस कॉलोनी की गली में इक्का-दुक्का लोग ही चलते नज़र आ रहे थे. तांगे के घोड़े की टाप सुन कुछ लोग घर के बाहर निकल-निकलकर देखने भी लगे थे. सत्या की आंखें मकानों के नम्बरों पर टिकी थीं और मन बिजली की गति से दौड़ रहा था.

“मीरा सुना है, पिताजी का ट्रांसफर होनेवाला है.”

“ये….! नहीं यह नहीं हो सकता.” मीरा एकदम तिलमिला उठी थी. सत्या के पिता का ट्रांसफर होने का अर्थ है सहेली सत्या का भी चले जाना. वह यहां पर इसीलिए तो है कि उसके पिता यहां बैंक अधिकारी हैं. पिछले सात वर्षों से वे यहीं टिके हैं. मीरा के पिता का तो व्यवसाय ही यहां है. दोनों सखियों के घर नज़दीक थे. वे आसानी से एक-दूसरे के घर किसी भी समय आ-जा सकती थीं. एक ही स्कूल में पढ़ने के कारण उनकी मित्रता और भी गहरी हो गई थी. मीरा और सत्या की दोस्ती में कोई दुराव-छिपाव नहीं था. छोटी-से-छोटी चीज़ भी वे एक-दूसरे को दिखाने दौड़ पड़तीं. पहनने-ओढ़ने, किताब-कॉपी, एक जैसे बस्ते, एक जैसे कपड़े, एक जैसी किताबें और एक जैसा खाना, एक जैसी पसंद, एक जैसा फैशन.

समय नदी की धार बन बहता रहा. उस धारा में बह गये थे बड़े-बड़े समय के पत्थर. पिता की बदली के संग बिछुड़ गई थीं दोनों सखियां-सत्या और मीरा. दोनों की पढ़ाई पूरी हुई. फिर शादियां हुईं. एक-दूसरे के घर शादी के निमंत्रण आये थे. कोई जा तो नहीं सका था. केवल शुभकामनाओं के पत्र भेज दिए गए थे.

मीरा अपनी शादी के आठ दिन बाद ही सत्या की शादी का बहुत ही सादा-सा निमंत्रण पत्र देख हैरान रह गई थी. सत्या की शादी साहिल से? साहिल सत्या के साथ पढ़ने वाला लड़का था. निरंतर रहनेवाले पत्र-व्यवहार में दोनों सहेलियों को एक-दूसरे की पूरी जानकारी रहती थी. साहिल का ज़िक्र तो सत्या ने कई पत्रों में किया था, पर बात यहां तक बढ़ जाएगी, यह अंदाज़ा उसे नहीं था. मीरा को इस बात पर कुछ क्रोध भी आया-सत्या की बच्ची इतनी बड़ी बात मुझसे छुपा गई.

मीरा ने जब अपनी सहेली को क्रोध और उलाहने से भरा पत्र लिखा तो उसका छोटा-सा उत्तर क्षमा प्रार्थना के साथ आया था-

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सत्या, साहिल के साथ शादी की बात छिपा लेने का कारण यह था कि हम दोनों के परिवार तो इस शादी के लिए राज़ी थे, पर दोनों की बिरादरी इस रिश्ते को नहीं स्वीकार पाई. शादी के दूसरे ही दिन लोगों की भीड़ ने हमारे घर पर हमला बोल दिया. मां-पिता ने हमें पिछले रास्ते से भगा दिया. हम भागकर ट्रेन में चढ़े और एक अन्य दोस्त के यहां महीने भर छिपे रहे. फिर दूसरे रिश्तेदार के यहां रहे. इस बीच हमारे लंदन जाने का इंतज़ाम हो गया. आगे की कहानी तुम्हें मेरे पिता ने बताई ही होगी.

साहिल की ओर मेरा आकर्षण तो था, किन्तु पिता ने वचन लिया था कि जब तक मैं तुम्हारी शादी न कर दूं तब तक तुम अपनी मां से भी यह बात नहीं कहोगी. और मां को तब बतलाया गया, जब हम दोनों कोर्ट में शादी करके घर लौटे. पिता के साहस, उदारता और प्यार के आगे मैं नतमस्तक हूं मीरा. उन्हें भी बिरादरी के बंदों का डर था, वही हुआ. भड़के लोगों ने घर ही नहीं तोड़ा पिता के हाथ-पैर भी तोड़ दिए थे. वे छ: माह बिस्तर पर पड़े रहे. वो तो कुछ भले मानसों ने उन्हें बचा लिया.

हम लंदन के लिए रवाना हों, उसके पहले ही मेरे पेट में दर्द होने लगा. इतना भारी दर्द मैं सह नहीं सकी. प्रथम मातृत्व का दर्द सातवें मास में ही उठा और बेटे का जन्म हो गया. इतने कमज़ोर, समय से पूर्व जन्मे बच्चे को बीस दिन अस्पताल में ही रखा गया. फिर आठ दिन मां के दूध पर पला. हमें लंदन जाना था. इतने छोटे कमज़ोर बच्चे को सम्भालना भी कठिन था. अभी तक हम समाज की नज़रों से छिपकर रह रहे थे. पिता या ससुर के घर मैं जा नहीं सकती थी. दोनों घरों में बार-बार धमकी भरे पत्र मिल रहे थे कि अब जब भी लड़का या लड़की हमें घर में दिखाई देंगे, हम उन्हें ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे. धर्म के ठेकेदारों का यह जुनून दो प्रेमियों के साथ-साथ दो परिवारों को भी नष्ट कर रहा था.

समझदार परिवारों ने दोनों बच्चों को बचाने के लिए पहले तो देश में ही आठ माह छिपाकर रखा, फिर विदेश भेजने की व्यवस्था कर दी. उन्होंने सोचा कुछ साल यहां से दूर चले जायेंगे, तब तक लोगों का क्रोध शांत हो जाएगा. किन्तु अब तीन सप्ताह के बच्चे की समस्या थी. इतने छोटे कमज़ोर बच्चे को प्लेन में ले जाने की अनुमति भी नहीं मिली. कुछ मित्रों ने सुझाया, बच्चे को किसी बालगृह में दे दो. इस बात पर मैं और साहिल दोनों ही राज़ी नहीं हुए. मेरा तो रोते-रोते बुरा हाल था.

“पापा, मैं छिपकर भागना नहीं चाहती. मैं उनका सामना करूंगी, जो हमें बरबाद करने पर तुले हैं.”

“बेटी, मैं तु्झे कैसे समझाऊं. भीड़ और क्रोध की बुद्धि नहीं होती. विवेक नहीं होता.”

“पापा उनका सामना करने के लिए हमें एक मौक़ा तो दो.”

“बेटी अपनी टांगें सदा के लिए खोकर मैं ऐसी चुनौती कैसे ले सकता हूं. अपनी आंखों की ज्योति को मैं आग में नहीं झोंक सकता.”

साहिल और सत्या के पिता भी लोगों की नज़रें बचाकर मिलते थे. अपने बच्चों को बचाये रखने की योजना वे दिन-रात बनाते रहे. भारी विडम्बना यह थी कि जिन्हें लड़ना चाहिए था, वे तो गले मिल रहे थे और लड़ रहे थे वे, जिन्हें इनसे कोई लेना-देना नहीं था.

घर और बाहर जलती आग के बीच उस छोटे बच्चे को मीरा के घर रातोंरात पहुंचाया गया था. आधी रात को चलने वाली गाड़ी से सत्या के मां-पिता बच्चे को लेकर जब मीरा के घर मुंह अंधेरे पहुंचे तो उन्हें देख वह हैरान रह गई.

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अपनी प्राणप्रिय सहेली के माता-पिता को इस संकट से उबारने के लिए उसने बच्चे को स्वीकार कर लिया. उस समय उसकी अपनी दो साल की एक बेटी थी. बच्चे को उसने अपने दूध से  ही नहीं, प्राणों से सींचा, उसकी किलकारियों में तो वह भूल भी गई कि बच्चे को जन्म देनेवाली मां वह नहीं है. और एक दिन तो ऐसा आया, जब उसे मां-पिता का नाम भी देना पड़ा. बड़ा होता जलज अपने मां-पिता इन्हीं को समझता रहा. स्कूल के कॉलेज के रजिस्टरों में पिता मीरा के पति थे. सारी स्थिति-परिस्थिति को समझकर मीरा के पति ने बहुत समझदारी से काम लिया. उन्हें सत्या का परिचय अपनी पत्नी मीरा से ही मिला था. मीरा के लिए सत्या का परिचय देना केवल एक सहेली का परिचय नहीं था. वह परिचय उसके जान-प्राण का परिचय था. मीरा के परिचय वर्णन से ही वे सत्या की तस्वीर मन में बनाकर उसका सम्मान करने लगे थे. अपनी पत्नी का भी वे सम्पूर्ण हृदय से प्यार और आदर करते थे. उसकी किसी बात को वे कभी थोथी या निरर्थक नहीं समझते थे. यही कारण था कि उन्होंने पत्नी की सहेली के मात्र बीस दिन के बेटे को अपने पास रखना स्वीकार कर लिया. एक वर्ष तक चला तूफान शांत हो गया और जीवन सहज सुचारू रूप से चलने लगा. अब मीरा अपने पितृ नगर में रहने आ गई थी.

जलज बड़ा होता गया. पढ़ने के साथ-साथ वह खेल-कूद में भी हमेशा आगे रहा. समय की गति बहुत तेज़ रही. सत्या और उसके पति आठ वर्ष तक विदेशों में जगह-जगह घूमते हुए अपने पैर जमाने का प्रयत्न करते रहे. इधर मीरा के पति दूर अरूणाचल स्थानांतरित हो गये. बेटा जलज तो आगे बढ़ता रहा, किन्तु दोनों मां-बाप के बीच सम्पर्क टूट गया. एक-दूसरे का कुशलक्षेम जानने के लिए दोनों सखियां बेचैन रहतीं, किन्तु बरसों एक-दूसरे के पते नहीं जान पाईं. उधर सत्या के मां-पिता भी जीवित नहीं रहे. इधर मीरा के माता-पिता भी दुनिया छोड़ गये. युग बदल गये. माता-पिता का इतिहास अब बेटे-बेटी दुहराने लगे थे. बेटी ने जिसे पसंद किया, मीरा ने बिना किसी विवाद के ख़ुशी से उसकी शादी कर दी.

एक दिन जब बेटा भी अपनी पसंद की लड़की के साथ इन पालनहार माता-पिता के सामने खड़ा हो गया, तब मीरा कुछ उलझन में पड़ गई. वह सत्या को खोजकर उसे इस शुभ सूचना से अवगत कराना चाहती थी. बेटे की बेचैनी बढ़ रही थी. मां जल्दी उसकी पसंद स्वीकार नहीं कर रही थी.

“मां आख़िर नैनी में बुराई क्या है?”

“बुराई कुछ नहीं बेटा. कुछ दिन सोच लेने में क्या बुराई है?”

“और कितने दिन सोचोगी मम्मी?”

“बेटा अपने घर जिसे लाना है, उसके लिए धैर्य से सोच-विचार करना होगा.”

“मम्मी बताओ न तुम्हें कितना समय चाहिए?”

“बहुत बेचैन हो रहा है!” हंसते हुए मीरा ने कहा.

मीरा का सुखी-संतुष्ट मन कई परतों के नीचे एक भारी अकुलाहट अनुभव कर रहा था. वैसे यह अकुलाहट नई उत्पत्ति नहीं थी. पिछले बाईस सालों से मन के किसी कोने में पड़ी आग आज जैसे भभककर ऊपर आना चाहती थी. अब वह हर क्षण यही सोचती थी कि किस तरह जलज को सत्य बताऊं? बताऊं भी या नहीं. सत्या मिल पाती तो उससे सलाह करती. अब जब कभी वह अपने बेटे को देखकर ले जाना चाहेगी तब क्या होगा? मैं कैसे सहूंगी? और जलज जाएगा? आसानी से वह मानेगा क्या?

एक मकान के गेट पर नामपट्ट देखकर तांगा रुका. “यही नम्बर है न बहनजी?” तांगे वाले ने कहा तो सत्या एकदम चौंकी, “हां-हां यही.” उसका दिल तीव्र गति से धड़क रहा था. धीमे क़दमों से चलकर वह गेट तक पहुंची. काफ़ी बदल दिया है मकान को मीरा ने. इस सुन्दर सुहाने मकान में वह तो पिता के समय का पुरानापन ढूंढ़ रही थी. वह ईंटों की दीवार को छूता हरसिंगार, वह पीछे आंगन से झांकता आम, आंगन के साथ-साथ चलती कच्ची नाली और बरामदे में पड़ी चिकें. मीरा ने घर और युग दोनों ही बदल दिए हैं. उसने गेट पर लगी बेल बजाई. किसी युवक ने आकर दरवाज़ा खोला. क्षण मात्र को वह सत्या के पैरों पर झुका और झट सामान उठाकर अन्दर चला गया. सत्या उसके पूरे रूप को आंखों में भी नहीं भर पाई. वह तांगे वाले को पैसे चुकाकर मुड़ी तो मीरा सामने खड़ी थी. घर के बरामदे में ही भरत-मिलाप-सा दृश्य उपस्थित हो गया. दोनों के आंसुओं से धरती भीगने लगी. बेटा जलज खिड़की से यह दृश्य देखकर चकित था कि दोनों सहेलियां ‘हैलो हाय’ के साथ मिलने के बजाय रोकर गले मिल रही हैं. हां मां ने बताया था, शायद मिलने का पुराना ढंग यही था. पर आंटी तो बरसों विदेश में रही हैं? कुछ लोग होते हैं जो अपना पुराना ढंग नहीं छोड़ते. क्या किया जाए. पर मम्मी को रोते देखना उसे अच्छा नहीं लग रहा. हां- वो भी होस्टल से आकर जब मम्मी के गले लगता तो मम्मी की आंखें भर आती थीं. महिलाएं भावुक होती ही हैं.

वे दोनों ड्राईंगरूम में आकर बैठ गई थीं और जलज क्रिकेट मैच देखने में व्यस्त था. सत्या की आंखें ड्राईंगरूम में लगे युवा के चित्रों पर अटक-अटक जा रही थीं. इसकी आंखें कितनी मिल रही हैं उनसे. जब दोनों सहेलियों की आंखें टकराईं तो मौन बहुत कुछ कह गया. चाय पीते-पीते सत्या की आंखें उन चित्रों पर बार-बार टिक रही थीं और मीरा की आंखें डबडबा रही थीं.

“बेटा जलज आओ. मौसी के साथ चाय पीयो.”

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अपने लिए ‘मौसी’ शब्द सुन एकबारगी सत्या कांप उठी. फिर अपने को संयत कर बातें करने का प्रयत्न करने लगी. पर सामने बैठे जलज को देख-देख उसका ज़िंदगीभर का रुका ममत्व फूट पड़ने को आतुर हो उठा. मीरा ने नाज़ुक स्थिति को समझा और जलज को किसी बहाने बाहर भेज दिया. दो स्त्रियों के इस भावनात्मक संघर्ष को समझने में जलज असमर्थ था. फिर भी वह इतना बच्चा नहीं था. कुछ गम्भीर बात है, यह उसे समझमें आ रहा था. सत्या चाहकर भी जलज से बात नहीं कर पा रही थी.

कितनी बातों के ग्रंथ भरे थे मन में, फिर भी दोनों सहेलियां ऊपरी बातों में अपना समय काट रही थीं. रात का खाना तीनों ने साथ खाया. थकी होने के कारण सत्या जल्दी सोने चली गई. मन में उठती ऊंची लहरें उसे नींद में जाने से रोक रही थींं. वह चाह रही थी कि जलज के पास ही बैठे और उसे ही निहारती रहे. अंतर्मन ने पूछा, ‘क्या जलज मेरे साथ जाने को राज़ी होगा? जब उसे सत्य पता चलेगा तब भी क्या वह अपनी इस जन्मदात्री मां का आदर करेगा?’ सत्या का सिर फटने को हुआ. एक नींद की गोली निगल वह सो गई.

उधर मीरा बेटे के पास आ बैठी थी.

“ममा… आज तुम कुछ परेशान लग रही हो?”

“नहीं तो बेटे. बस कुछ थकी हूं.”

“नहीं ममा कुछ बात है. डैडी की याद आ रही है?”

मीरा मुस्करा दी, “वो कौन-से बहुत दूर गए हैं, कल या परसों आ जाएंगे.”

“फिर क्या बात है मम्मी?”

“सोचती हूं अगर तुझे लंदन पढ़ने भेज दूं, तो मैं कैसे रहूंगी अकेली.”

“मां मैं कहीं नहीं जाऊंगा.” कहते हुए जलज मां के गले में झूल गया.

मां ने बेटे का माथा चूमा. “अच्छा बेटे, अब सो जा. मैं भी सोऊंगी.”

सत्या चार दिन मीरा के पास रही. दोनों सहेलियां उठते-बैठते, घूमते-फिरते, खाते-पीते तनाव में बनी रहीं. दोनों में से किसी का साहस नहीं हुआ कि बेटे को सच से अवगत करा दें. हालांकि पहले दोनों में यह तय हो चुका था कि जब हम दोनों सामने होंगी, बेटा भी सामने होगा, तब उसे सत्य से परिचित करा देंगे.

मीरा और जलज का लाड-दुलार भरा सम्बन्ध देखकर सत्या का मन सत्य को चोट करने को नहीं हुआ. यदि उस समय बीस दिन के बालक को मीरा स्वीकार न करती तो…?

सत्या ने दूसरे दिन जाने की तैयारी कर ली. मीरा ने देखा तो सत्या के पास आ खड़ी हुई. सत्या ने मीरा के कंधे पर सिर टिका दिया और रो पड़ी.

मीरा की आंखें भी बरस पड़ीं.

“मीरा, मैं तुम्हारी कोख सूनी करने का साहस नहीं कर सकती.”

“यह क्या कह रही हो सत्या? कोख तुम्हारी सूनी हुई है.”

“कोख मेरी थी, पर उसकी रौनक तुम्हारे घर में समाई है. अब उसे सूनापन देना अन्याय होगा. तुम्हारे तप की मैं तुम्हें सज़ा नहीं दे सकती.”

मीरा का मन हुआ, सहेली के पैर पकड़ ले.

पूर्व में प्रभात की किरणें फूट रही थीं और बेटा जलज ‘मौसी मां’ को छोड़ने स्टेशन जा रहा था. दो दिन से वह अपनी मम्मी के कहने पर

सत्या को इसी सम्बोधन से बुला रहा था.

– उर्मि कृष्ण

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कहानी- शुद्धिकरण (Short Story- Shudhikaran)

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अनुज को आश्‍चर्य में छोड़ मनीषा सोच रही थी, ‘तन से और नियम से तो वो सवा महीने बाद शुद्ध होगी, लेकिन उसकी आत्मा का ‘शुद्धिकरण’ आज ही हो गया है.’

रसोई से आ रही आवाज़ से नींद टूटी. अभी 6 ही बजे थे. ‘पता नहीं मौसी को भी इतनी सुबह रसोई में क्या काम रहता है?’ मनीषा अभी उठने के मूड में नहीं थी, लेकिन वो जानती थी कि अभी मौसी आवाज़ें देने लगेंगी, इसलिए खीझते हुए उसे उठना ही पड़ा.

मनीषा और अनुज की शादी को तीन साल हो गए थे. मनीषा मां बननेवाली थी. उसे सातवां महीना चल रहा था, इसलिए उसकी देखभाल के लिए अनुज ने मौसी को विशेष आग्रह से अपने यहां बुलाया था. मनीषा की मां लंदन में छोटे बेटे के पास रह रही थी और उसके परिवार में ऐसा कोई नहीं था, जो ऐसे समय में उसकी देखभाल करता.

अनुज की मां का देहांत 10 साल की उम्र में हो गया था. पिता ने दूसरी शादी नहीं की, लेकिन स्वयं को काम में उलझा लिया था. अनुज को तकलीफ़ न हो, इसलिए उसे अपनी साली अलका के पास भेज दिया. मौसी व मौसा के स्नेह और उनके बच्चे सुधा व वैभव के साथ खेलते हुए अनुज अपने सारे दुख भूल चुका था.

पढ़ाई पूरी कर अपनी योग्यता के बल पर उच्च पद पर आसीन भी हो गया और पिता के पास लौट आया. दोनों पिता-पुत्र बेहद ख़ुश थे, लेकिन छह माह के भीतर उसके पिता का भी देहांत हो गया.

मनीषा से अनुज ने मौसी की सहमति से ही प्रेम-विवाह किया था. मनीषा एक सुलझे विचारों की लड़की थी. उसका स्वभाव भी अच्छा था.

अनुज अपने आनेवाली संतान को लेकर चिंतित था, इसीलिए वह हर पल मौसी को अपने पास रखना चाहता था. वैभव जोधपुर में था और सुधा कानपुर में ब्याही थी. सभी दायित्वों से मुक्त हो अब वे अपने इस बेटे को सहयोग देने के लिए आ पहुंची थीं.

मनीषा आजकल बहुत परेशान रहती थी. कुछ दिनों से दोपहर के समय जब वो सोती तो रसोई से देशी घी और मेवे की ख़ुशबू आती, लेकिन शाम को रसोई में किसी भी चीज़ का नामोनिशान न रहता. वह संकोचवश मौसी से कुछ पूछ भी नहीं पाती थी.

कभी-कभी दोपहर को मौसी बाज़ार जातीं. वे क्या लातीं? कहां रखतीं? न आज तक उन्होंने बताया, न मनीषा ने पूछा.

लेकिन वो जानती थी कि कुछ गड़ब़ड़ ज़रूर चल रहा है. एक दिन अनुज के सामने ही वो मौसी से तपाक से पूछ बैठी, “आज दोपहर में आपने क्या ख़रीदारी की?” मौसी ने जवाब दिया, “सुधा के बच्चे के लिए कुछ सामान लेना था. वही लेने गई थी.” और इस तरह उन्होंने बात को टाल दिया. उसी दिन से मनीषा उनसे चिढ़ने लगी थी.

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एक दिन डॉक्टर के पास से लौटी, तो देखा मौसी स्टोर रूम में थीं. कामवाली ने बताया कोई आदमी आया था, लकड़ी की बात हो रही थी. मनीषा ग़ुस्से से भर उठी. अब घर के सामानों की भी ख़रीद-फ़रोख़्त शुरू कर दी गई है.

‘हे भगवान, मैं क्या करूं?’ इन सब बातों से मनीषा का स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा था. लेकिन शक का कीड़ा उस पर पूरी तरह से हावी हो चुका था. वह किसी भी तरह मौसी को गांव वापस भेजना चाहती थी.

सबसे पहले उसने एक आया की व्यवस्था की. अब वो मौ़के की तलाश में थी. संजोग से सुधा का फ़ोन आया, जिसे मनीषा ने ही उठाया था. सुधा ने बताया राजीव बाहर गए हैं और उसकी तबियत भी ठीक नहीं है. अगर मां 10-15 दिन के लिए आ सकें तो..?

बस, मनीषा ने इस मुद्दे को इतना बढ़ा दिया कि हम अपने स्वार्थ के लिए मौसी को नहीं रख सकते. सुधा को उनकी ज़रूरत है. इस तरह की कई बातें उसने कह डालीं. एक तीर से दो शिकार हो गए. वो महान भी बन गयी और उसकी समस्या भी सुलझ गयी.

मौसी के जाने के बाद ही आया को देख अनुज कुछ-कुछ समझ गया था, लेकिन बोला कुछ नहीं.

नियत समय पर मनीषा ने एक सुंदर बेटी को जन्म दिया. चार-पांच दिनों में वह घर भी आ गयी. अब आया को रात में भी रुकना था, इसलिए उसे मौसीवाला कमरा साफ़ करने को कहा. वह पास वाले कमरे में आ गयी. अभी उसे और बच्ची को सवा महीने इसी कमरे में रहना था. उसके पश्‍चात् दोनों की शुद्धि-पूजा तथा बेटी का नामकरण होना था. ये सारे नियम मौसी समझाकर गयी थी, इसलिए अनुज ने वैसी ही व्यवस्था की थी.

मनीषा लेटने जा ही रही थी कि अनुज ने उसे एक लिफ़ाफ़ा दिया और कहा, “मौसी ने दिया था. कहा था जिस दिन तुम घर आ जाओ, उसी दिन तुम्हें दूं.”

इतना कहकर अनुज बाहर चला गया. मनीषा ने लिफ़ाफ़ा खोलकर पत्र पढ़ना शुरू किया.

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प्रिय बेटी मनीषा,

आज तुम मां बन गयी हो, बधाई! मुझे पोता हुआ है या पोती, जो भी है, उसे ढेरों आशीष.

बेटी, मुझे माफ़ करना, मैं तुम्हारे साथ नहीं रह पायी. मैं तो शुद्धि-पूजा के बाद ही जाना चाहती थी, लेकिन सुधा के लिए पहले ही जाना पड़ रहा है.

मेरे कमरे में तुम्हें वो सारी चीज़ें मिल जाएंगी, जिसकी तुम्हें ज़रूरत है. बेटा, ये सारी चीज़ें तुमसे छुपाकर रखनी पड़ी. कहते हैं, जन्म से पहले कुछ ख़रीदारी नहीं करनी चाहिए, इसलिए मैंने सुधा के बच्चे के नाम से ही ये सारी चीज़ें जुटा ली थीं.

तुम्हारे लिए लड्डू बनाकर रखे हैं. डॉक्टर ने गरिष्ठ खाने से मना किया था, इसीलिए चखा भी नहीं पायी. हां, पूजावाले दिन के लिए बच्चे का पालना उसके दादाजी की आरामकुर्सी की लकड़ी से बनवा कर रख दिया है. उसे उसी पालने में डालना, दादाजी का आशीर्वाद भी तो ज़रूरी है! मैंने अनुज को सब बता दिया है. अपना ख़याल रखना. जाना ज़रूरी है, इसलिए जा रही हूं.

तुम्हारी मौसी,

अलका

पत्र समाप्त हो चुका था. आया सिर के पास सारा सामान लेकर खड़ी थी. जनवरी के इस ठंड में भी मनीषा पसीने से लथपथ हो गयी. उफ़! कितने छोटे मन की थी मैं! जो मौसी रात-दिन मेरे और मेरी संतान के लिए सोचती रहीं, उन्हें ही घर से भगाने के लिए मैं हरदम परेशान रही.

तभी अनुज मोबाइल लिए अंदर आए. मौसी का फ़ोन था. औपचारिक बातें हुईं. मनीषा के मुंह से आवाज़ नहीं निकल रही थी. अंत में उसने इतना ही कहा, “जब तक आप नहीं आएंगी, आपकी पोती का नाम नहीं रखा जाएगा. आपको मेरी क़सम, जो मना किया.” मौसी ने हंसकर कहा, “अरे! मैं तो ऐसे ही आ जाती, इसमें क़सम देने की क्या ज़रूरत है?”

अनुज को आश्‍चर्य में छोड़ मनीषा सोच रही थी, ‘तन से और नियम से तो वो सवा महीने बाद शुद्ध होगी, लेकिन उसकी आत्मा का ‘शुद्धिकरण’ आज ही हो गया है.’

आया के हाथ से मौसी की बनाई रजाई लेकर उसने बिटिया को ओढ़ा दी.

रूपाली भट्टाचार्या

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कहानी- कच्ची धूप (Short Story- Kachchi Dhoop)

Short Story- Kachchi Dhoop

“अरे… देखो, देखो कोई…! जल्दी आओ! ये लड़की तो पागल हो गयी है!”

अर्पिता ख़ुशी को थामे हुए, बौखलाई हुई-सी चीख रही थी. ख़ुशी की कलाई से बूंद-बूंद खून चू रहा था. लड़की रो नहीं रही थी. बड़े यत्न से उसने आंसुओं को अपनी बड़ी-बड़ी आंखों के कटोरे में रोक रखा था. सभी टीचर्स की आंखों में सवाल थे. कुछ ही पलों में छात्राओं की भीड़ भी प्रश्‍नवाचक नज़रों के साथ इकट्ठी हो गयी थी. सभी टीचर्स ने ख़ुशी को स्टाफ़ रूम में लाकर दरवाज़ा बन्द कर दिया था.

“ ये अपनी कलाई पर ब्लेड से राजीव का नाम लिख रही थी.” अर्पिता ने दयनीय मुद्रा में कहा था.

“क्या…?” कई सारी टीचरों का समवेत स्वर गूंजा था.

काफ़ी देर से अर्पिता स्टाफ़ रूम में बैठी अपनी सह-शिक्षिका और सहेली श्रुति का इन्तज़ार कर रही थी. घंटी बजते ही श्रुति क्लास से बाहर निकली तो दूर से ही उसे स्टाफ़ रूम में बैठी अर्पिता दिख गयी.

श्रुति जानती थी, पिछले कई दिनों से अर्पिता परेशान थी. एक अजीब-सा केस उसके लिये परेशानी का कारण बना हुआ था.

“श्रुति! अभी फ्री हो ना? तो फिर बैठो… ज़रा मेरी समस्या का हल बताओ.

जानती हो, अब तो ख़ुशी क्लास में बेहद खोई-खोई-सी रहती है. उसकी सूनी आंखें जैसे हमेशा दरवाजे की ओर लगी राजीव को ढूंढ़ती रहती हैं. पिछले कई दिनों से राजीव स्कूल भी तो नहीं आ रहे हैं. मुझे समझ में नहीं आता… ऐसा कितने दिन चलेगा?  ख़ुशी जैसी अच्छी लड़की का भविष्य ही कहीं दांव पर ना लग जाये.”

“अर्पिता… अब तो तुम्हें ख़ुशी के माता-पिता से मिल ही लेना चाहिए. वैसे

मुझे लगता है, इस प्रॉब्लम का सोल्युशन हमें मिल सकता है.” श्रुति ने कुछ सोचकर कहा था.

“पता नहीं, तुम्हें क्या सोल्युशन दिख रहा है. मैं तो हार गयी हूं इस लड़की से. जितना भी समझाती हूं, उतना ही वो नासमझ होती जा रही है. अब तू ही बता… मैं क्या करूं?” अर्पिता ने श्रुति का हाथ थामकर कहा.

“मैं… तुम्हें इस परेशानी का हल कल बताती हूं. अभी मुझे एक बार मिसेस जोशी से कुछ बातें करनी हैं.”

देर रात तक श्रुति की आंखों से नींद गायब थी. वो पिछले कई दिनों के घटनाक्रम को याद कर रही थी, ताकि अर्पिता की परेशानी का कोई हल ढूंढ़ सके. पिछले पांच वर्षों से श्रुति और अर्पिता इस स्कूल की शिक्षिकाएं थीं. दोनों ने एक साथ इस स्कूल में काम करना शुरू किया था. दोनों का पाला तरह-तरह की छात्राओं से पड़ा था और छात्राओं के विषय में दोनों ही अक्सर डिसकस करती रहती थीं.

कुछ दिनों पहले ही अर्पिता ने नौंवी कक्षा की एक छात्रा ख़ुशी के विषय में जो कुछ भी बताया था, वो वाकई परेशानी का विषय था. इस उम्र में किशोरियों को जो ख़्याल आते हैं, उनसे श्रुति व अर्पिता अनजान नहीं थीं,

पर ख़ुशी की समस्या कुछ गम्भीर रूप ले रही थी.

ख़ुशी अपने क्लास की होनहार छात्राओं में से थी. उसी स्कूल में राजीव भी पढ़ाते थे. एक आकर्षक और संवेदनशील टीचर. ख़ुशी की कक्षा में वो फ़िज़िक्स के टीचर थे. उनके पढ़ाने का ढंग भी आकर्षक था. ख़ुशी होनहार थी, इसलिये दूसरे टीचरों की तरह राजीव भी उस पर ज़्यादा ध्यान देते थे. शायद… ख़ुशी इसी से प्रभावित हो गयी थी. टी.वी. या किताबों में कहीं उसने पढ़ा था और उनसे प्रभावित ख़ुशी ने एक बार अपनी फ़िज़िक्स की कॉपी में राजीव सर के लिये एक छोटा-सा प्रेम-पत्र लिखकर रख दिया था. राजीव तो चौंक ही गये थे. उसने ख़ुशी की क्लास टीचर अर्पिता को बताया था. अर्पिता को अपनी प्रिय छात्रा ख़ुशी से ऐसी आशा नहीं थी. गुस्से व खीझ में बिना कुछ सोचे-समझे उसने ख़ुशी को सज़ा दे दी थी. श्रुति ने जब ख़ुशी को कड़ी धूप में, मैदान में खड़े देखा था तो उसे सब पता चल गया था.

“अपू… ये क्या? तुम क्या समझती नहीं हो कि ख़ुशी उम्र के किस दौर से गुज़र रही है? उसे समझाना तो दूर… तुमने उसे ऐसी सज़ा दी!” श्रुति ने अर्पिता को डांटा था.

ख़ुशी के लाल हुए चेहरे पर अपमान के आंसू और गर्मी से आया पसीना देखकर अर्पिता को भी बुरा लगा था. अकेले में श्रुति और अर्पिता ने उसे काफ़ी समझाया था.

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“इस उम्र में हम सपनों की दुनिया में जीते हैं. पहले तो शारीरिक आकर्षण से हम प्रभावित होते हैं. फिर कोई मीठा बोल दे या प्रशंसा ही कर दे तो… वो शख़्स हमें अपना लगने लगता है. हम उससे ही अपने जीवन की डोर बांधने के सपने सजाने लगते हैं. पर हम जो सामने देखते हैं, वही सच नहीं होता. हर आदमी के दो पहलू होते हैं. दूसरा पहलू हमें ढूंढ़ना होता है. तुम समझ रही हो ना… ख़ुशी! ये प्यार नहीं होता है. ये तो महज़ आकर्षण है. इस घटना को भूल कर तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो.

“श्रुति ने ख़ुशी को समझाया था. उस व़क़्त तो ख़ुशी की आंखों से बहते आंसुओं और नीची निगाहों को देखकर सभी ने ये समझा था कि लड़की अपनी ग़लती पर शर्मिंदा है. इसलिये उसके अभिभावक को नहीं बुलाया गया था.

पर ये अन्त नहीं था. ख़ुशी रोई थी, क्योंकि उसे दु:ख हुआ था कि उसकी प्रिय शिक्षिकाएं भी उसे समझ नहीं सकी थीं. इस बात का खुलासा भी बाद में ही हो सका था. श्रुति और अर्पिता ख़ुशी को साथ लेकर स्टाफ़ रूम से बाहर निकली थीं कि राजीव सर सामने आ गये थे. ख़ुशी ने जिस तरह से उन्हें देखा था, वो सभी को अखर गया था. राजीव ने उसे देख कर भी अनदेखा करते हुए, अपना क्लास लेना ज़ारी रखा था. ख़ुशी अब ख़ामोश-सी हो गयी थी. खाली समय में भी वो अपनी सहेलियों के साथ नहीं रहती थी, बल्कि अब वो अपनी पढ़ाई के प्रति ज़्यादा ही ज़िम्मेदार हो गयी थी. राजीव सर अब पहले की तरह खुलकर उससे पेश नहीं आ पाते थे, बल्कि वे तो खुलकर पढ़ा भी नहीं पा रहे थे, क्योंकि उनके कक्षा में प्रवेश करते ही छात्राएं कानाफूसी शुरू कर देतीं या दबी-दबी-सी हंसी गूंजती रहती.

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समझने लगती हैं. उनके चेहरे पर प्रेम के नाम पर एक सलज्ज मुस्कान खेलने लगती है. उनकी फुसफुसाहटें पूरे स्कूल में गूंजती हैं. उसी दिन पूरा स्टाफ़ रूम अर्पिता की चीख से चौंक गया था.

“अरे… देखो, देखो कोई…! जल्दी आओ! ये लड़की तो पागल हो गयी है!”

अर्पिता ख़ुशी को थामे हुए, बौखलाई हुई-सी चीख रही थी. ख़ुशी की कलाई से बूंद-बूंद खून चू रहा था. लड़की रो नहीं रही थी. बड़े यत्न से उसने आंसुओं को अपनी बड़ी-बड़ी आंखों के कटोरे में रोक रखा था. सभी टीचर्स की आंखों में सवाल थे. कुछ ही पलों में छात्राओं की भीड़ भी प्रश्‍नवाचक नज़रों के साथ इकट्ठी हो गयी थी. सभी टीचर्स ने ख़ुशी को स्टाफ़ रूम में लाकर दरवाज़ा बन्द कर दिया था.

“ ये अपनी कलाई पर ब्लेड से राजीव का नाम लिख रही थी.” अर्पिता ने दयनीय मुद्रा में कहा था.

“क्या…?” कई सारी टीचरों का समवेत स्वर गूंजा था.

“ये लड़की पागल हो गयी है.”

मिसेज जोशी ने तो गुस्से में अपना हाथ ही उठा लिया था.

“ये क्या सोचती है, ऐसा करके ये राजीव को पा लेगी? राजीव शादीशुदा है. उसकी अपनी ज़िन्दगी है.” इतिहास पढ़ानेवाली शिखा ने कुछ तल्खी से कहा था.

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ख़ुशी के हाथ पर श्रुति बैण्डेज बांध रही थी. ख़ुशी ने एक बार अपनी गम्भीर नज़रों से जाने क्या कहने की कोशिश में शिखा की ओर देखा था और दूसरे ही पल नज़रें फेर ली थीं.

ख़ुशी को समझाने के लिए प्रधानाध्यापिका मिसेज जोशी ने फिर श्रुति को ही भेजा था.

“टीचर… मैं राजीव सर से… बहुत प्यार करती हूं.” एक लम्बी ख़ामोशी के बाद ख़ुशी ने कहा था.

“पर… क्या तुम नहीं जानतीं कि वो शादीशुदा हैं. क्या तुम सोचती हो कि वो तुमसे शादी करेंगे?” श्रुति ने ख़ुशी की आंखों में झांकते हुए कहा था.

“अगर वो मुझसे शादी नहीं करेंगे, तो मैं मर जाऊंगी. आत्महत्या कर लूंगी.” ख़ुशी की दृढ़ता से श्रुति सहम गयी थी.

श्रुति को समझ में नहीं आ रहा था कि अब वो क्या करे. तभी अनायास ही उसके दिमाग़ में कौंधा था कि क्यों ना राजीव से ही श्रुति की सीधी बात करायी जाये.

राजीव से भी श्रुति की बातचीत कराई गयी, पर वो पागल लड़की अपने सर की गोद में सिर रख कर रोती रही और राजीव इससे इतना घबरा गये कि उनसे कुछ बोलते ही नहीं बना. एक किशोर लड़की को समझना या समझाना राजीव जैसे युवा फ़िज़िक्स के टीचर के बस में नहीं था. राजीव ने बस इतना किया था कि कुछ दिनों के लिये उन्होंने स्कूल से छुट्टी ले ली थी. पर ये समस्या का समाधान तो नहीं हो सकता था.

श्रुति ने रात की ख़ामोशी में इस समस्या का हल ढूंढ़ निकाला था.

“अपू… आज मैं इस समस्या का हल लेकर आयी हूं.” कहकर श्रुति ने अपनी सहेली को कुछ समझाना शुरू किया था.

“ठीक है, हम यही करेंगे. वैसे ख़ुशी के माता-पिता कहते हैं कि अगर कुछ दिनों में कोई राह नहीं दिखती है तो वे लोग उसे मनोचिकित्सक को दिखाएंगे.” अर्पिता ने बेहद दबी-बुझी आवाज़ में दुखी होकर कहा था.

ख़ुशी को लेकर अर्पिता आयी, “ख़ुशी, तुम राजीव सर को प्यार करती हो ना!” श्रुति ने कहा था.

उत्तर में ख़ुशी ने केवल अपनी नज़रें उठाकर श्रुति की ओर देखा था.

“ख़ुशी, हमने राजीव सर से बात कर ली है. उनका कहना है कि वो तुमसे शादी कर लेंगे, पर तुम पहले उनका दूसरा पक्ष भी तो देख-समझ लो. मेरा मतलब है, तुम उनके घर का वातावरण देख लो. उनका घरेलू रूप देख लो. तुम चाहो तो हमारे साथ उनके घर चल सकती हो.”

अर्पिता ने श्रुति की योजना के अनुसार ख़ुशी को समझाना शुरू किया था. कुछ देर विचार करने के बाद ख़ुशी राज़ी हो गयी थी.

योजना के अनुसार राजीव अपने घर में ही थे. बीमार होने का बहाना कर वो बिस्तर पर थे. ख़ुशी की आंखें राजीव को देखकर चमक उठी थीं और वो राजीव के सिरहाने बैठ गयी थी. कुछ ही देर में राजीव ने उससे चाय बनाकर लाने को कहा. ख़ुशी अवाक्-सी राजीव का चेहरा ताकने लगी थी.

“हां, हां.. जाओ ना, उधर बायीं ओर किचन है. वहीं तुम्हें सब मिल जायेगा. और हां, ज़रा कड़क चाय बनाना. सरदर्द हो रहा है ना!” राजीव ने आग्रह किया था. ख़ुशी अनमने मन से किचन की ओर बढ़ गयी थी.

शायद पहले कभी एक-दो बार ख़ुशी ने अपने घर में चाय बनायी थी, इसलिये काफ़ी मुश्किल से वो चाय बना पायी थी. आंखों में आंसू भरकर वो सोच रही थी, ‘घर में तो मम्मी कितनी भी रिक्वेस्ट कर ले, मैं किचन में जाना तक पसन्द नहीं करती और यहां… सर के घर… मुझे चाय बनानी पड़ रही है.

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“ख़ुशी, स्तुति अभी-अभी बाज़ार से लौटी है. तुम एक कप और चाय बना लेना.” बाहर के कमरे से श्रुति की आवाज़ सुनाई पड़ी थी. ख़ुशी तो स्तब्ध ही रह गयी थी.

‘पहले ही चाय नाप कर बनाई थी. अब फिर… पता नहीं और क्या-क्या फ़रमाइशें होंगी इनकी.’ बुदबुदाते हुए ख़ुशी ने फिर से चाय बनानी शुरू की.

ख़ुशी आधे घण्टे में चाय वगैरह लेकर बैठक में आयी तो वहां स्तुति से परिचय हुआ.

“ख़ुशी, अब तो तुम इस घर का हिस्सा बननेवाली हो, इसलिये मैं चाहती हूं कि तुम घर के काम सीख लो. चलो मैं तुम्हें कपड़े धोने का काम भी सिखा देती हूं.” स्तुति ने बड़े प्यार से ख़ुशी का हाथ पकड़कर उठाते हुए कहा, पर ख़ुशी थक चुकी थी. उसके चेहरे की ओर देखते हुए श्रुति और अर्पिता ने एक-दूसरे को इशारा किया.

“ख़ुशी, अब हम चलते हैं. तुम स्तुति से सारा काम समझ लो. अब तुम्हें भी तो एक दिन सारा कुछ सम्भालना ही होगा. वैसे स्तुति अब मां भी बननेवाली है.” श्रुति ने अर्पिता के साथ बाहर जाते हुए कहा.

ख़ुशी अनिश्‍चितता की स्थिति में कुछ न समझते हुए चुपचाप खड़ी थी. आख़िर कहती भी क्या? उसने पहले ही श्रुति से कह दिया था कि उसे कोई ऐतराज़ नहीं होगा एक ही घर में राजीव सर की पत्नी के साथ रहने में. पर वो शादी करेगी तो राजीव सर से ही.

“दी…दी! आपके घर कामवाली बाई नहीं है?”

“वो तो है. पर बाई के भरोसे कहां सारा काम होता है. अब राजीवजी की आमदनी भी तो बंधी-बंधाई है. कुछ काम तो ख़ुद करने ही होंगे ना.” स्तुति ने मन-ही-मन मुस्कुराते हुए ख़ुशी को सच्चाई से परिचित कराने की कोशिश की. ख़ुशी के मन से अब धीरे-धीरे प्यार का भूत उतरता जा रहा था. कहां उसने सोचा था कि राजीव के क़रीब बैठी वो सारा दिन उसे देखते हुए गुज़ार देगी. अपने प्रियतम के गोरे चेहरे, घुंघराले बाल और आकर्षक देहयष्टि में सारी ज़िन्दगी बिता देगी. राजीव सर भी उसके मासूम सवालों का जवाब देते रहेंगे और कहां ये सब!

अचानक ही ख़ुशी के विचारों पर दूसरा प्रहार भी हुआ. उसके राजीव सर, लुंगी-बनियान पहने बाथरूम की ओर गये. ख़ुशी को अपने सर के चेहरे पर हल्की दाढ़ी की छाया भी दिखी.

‘राजीव सर… कोई ख़ास सुन्दर तो हैं नहीं. मैं ही पागल हो रही थी.’ ख़ुशी ने मन ही मन सोचा था.

शाम को जब ख़ुशी घर लौटी, तो बेहद थक चुकी थी. दिनभर स्तुति उसे साथ लिये जाने क्या-क्या करती रही थी. ख़ुशी तो ऊब गयी थी.

‘अगर मैं सारा दिन काम करती रही तो मेरी पढ़ाई कब होगी? सभी कहते हैं कि मैं अच्छी स्टूडेंट हूं. तो…? फिर इतना काम करूंगी, तो राजीव सर के साथ समय कैसे बिता सकूंगी? फिर स्तुति दीदी मां भी बननेवाली हैं. मेरे कहने पर राजीव सर उसे तलाक़ तो देंगे नहीं. फिर दीदी कहती हैं कि राजीव सर की आय इतनी भी नहीं है कि दो-चार नौकरानियां रखी जा सकें. तब क्या होगा…? मैं एकतरफ़ा प्यार करते हुए तो…’ सोचते-सोचते ख़ुशी की आंखों में आंसू आ गये थे.

दूसरे दिन… श्रुति और अर्पिता स्टाफ़ रूम में बैठी बातें कर रही थीं.

दूसरे टीचर्स अपने-अपने क्लास में थे. ख़ुशी मौक़ा देखकर कमरे में आई.

“टीचर…, आई एम सॉरी.” ख़ुशी ने सिर झुकाकर कहा.

“ख़ुशी…? क्या हुआ…?” अर्पिता ने पूछा

“टीचर, मैं अभी केवल अपनी पढ़ाई करना चाहती हूं. मुझे अब ज़िन्दगी के दूसरे पहलू का सच दिख गया है. मैं… अभी शादी नहीं करूंगी.

“क्या…?” श्रुति और अर्पिता ने लगभग ख़ुश होते हुए कहा था.

“हमें ख़ुशी है कि तुम हक़ीक़त को समझ गईं. हम भी नहीं चाहते थे कि तुम्हारे जैसी अच्छी स्टूडेंट अभी पढ़ाई को भूलकर ग़लत निर्णय ले. शादी तो होनी ही है. पर पहले उस उम्र तक तो पहुंचो. फिर मैच्योरिटी आयेगी और तुम सब समझ सकोगी. फिर तुम शादी के झमेलों को भी सह सकोगी. अभी जो दिखता है, वो तस्वीर का एक पहलू ही दिखता है. पांच वर्षों बाद तुम इस वाक्ये को याद करोगी तो तुम्हें ख़ुद ही हंसी आयेगी. तब ये सब बचकाना लगेगा.”

श्रुति ने खुशी को सामने बिठाकर कहा.

“सॉरी टीचर…! अब मैं समझने की कोशिश करूंगी. पर आप लोग मेरी मदद करेंगी न?” ख़ुशी ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा था.

अर्पिता ने आगे बढ़कर ख़ुशी को अपने गले से लगाते हुए कहा, “टीचर्स तो हमेशा स्टूडेन्ट्स की मदद करते हैं, खुशी!”

– सीमा मिश्रा

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कहानी- यादें (Hindi Short Story- Yaaden)

Short Story- Yaaden

हम किसी ग़लत राह पर चल पड़ें, उससे पहले दिशा बदल लेना बहुत ज़रूरी है. ऐसे संबंध अहं को तृप्त कर सकते हैं, कुछ समय के लिए जीने का सबब भी बन सकते हैं, लेकिन कभी न कभी अपराधबोध से ग्रसित करते ही हैं अनुराधा. समाज द्वारा बनाए नियम किसी कारण से बने हैं. हमें लगता है कि वे हमारी इच्छाओं का दमन करते हैं, हमें अपनी मर्ज़ी से नहीं जीने देते, पर वही समाज को उच्छृंखल बनाने से रोके हुए भी हैं.

यादों द्वारा हम अपनी ज़िंदगी के कुछ विशेष लम्हों को जीवित रखते हैं, जीवित भी और नूतन भी. समय के लंबे अंतराल के पश्‍चात् भी यूं लगता है, जैसे कल ही की बात हो. इन यादों से जुड़े व्यक्ति कभी अतीत का हिस्सा नहीं बनते, वे सदैव हमारे संग ही रहते हैं. बरसों बीत गए दिवाकर से मिले, पर आज भी यूं लगता है, जैसे वह मेरे आसपास ही मौजूद है- मेरी ज़िंदगी का एक अटूट हिस्सा बनकर. स्कूल यूनीफॉर्म के छूटते ही अनेक प्रतिबंध पीछे छूट गए थे. कॉलेज का प्रांगण आज जैसा स्वच्छंद न होकर भी स्कूली जीवन से बहुत भिन्न था. संस्कारों की दीवार, मर्यादाओं की लक्ष्मण रेखाएं सब सलामत थीं, पर कुछ था, जो बदल गया था, जो अच्छा लग रहा था. आकाश अधिक विस्तृत, धरती का दामन अधिक विशाल लगने लगा था. कक्षा का बहिष्कार कर फ़िल्म देखने न भी गए हों, लेकिन कभी-कभी ग़ैरज़रूरी-सी लगनेवाली क्लास छोड़ कैंटीन में बैठ कॉफ़ी तो पी ही लेते थे हम.

इसी कैंटीन में मेरा दिवाकर से परिचय हुआ था, जो धीरे-धीरे ज़्यादा बढ़ गया था. मुझसे एक ही वर्ष सीनियर था वह. देखने में साधारण, पर मृदु,  कोमल व भावपूर्ण आंखें. जब वह अपनत्व से देखता, तो नज़रों से छू लेने सा एहसास होता. मज़ाक में कहता, “कैसी मीठी आवाज़ है तुम्हारी, सुबह मिश्री का घोल पीकर आती हो क्या?” और फिर बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए कोई दूसरी बात छेड़ देता. न मुझे स्वीकृति में धन्यवाद देने की ज़रूरत होती और न ही नाराज़गी दिखाने की मोहलत ही मिलती. यौवन की दहलीज़ पर खड़ी, लड़कपन अभी बाकी था मुझमें और प्यार-मोहब्बत जैसे भारी-भरकम शब्दों से दूर ही थी मैं. चाहो तो मैत्री ही कह लो इसे. छात्रावास में रहने के कारण परेशानियां बांटनेवाला घर का कोई नहीं था, सो ज़रूरत पड़ने पर भावनात्मक संबल तलाशने उसी के पास जाती थी मैं. कभी कॉलेज में देर हो जाने पर मुझे हॉस्टल तक छोड़ देता. बस, इससे अधिक कुछ नहीं.

अब सोचती हूं कि कभी उसने अधिकारपूर्वक कुछ कहा होता, जवाब मांगा होता, तो कितनी अलग होती मेरी कहानी!

बीस वर्ष की होते ही माता-पिता ने अपनी इच्छानुसार मेरा विवाह तय कर दिया. आज की पीढ़ी शायद समझ ही न पाए उस माहौल को, जिसमें हम ब़ड़े हुए थे. विवाह तय करते समय लड़की की पसंद-नापसंद की बात तो दूर, यह जानने की कोशिश भी नहीं की जाती थी कि वह अभी विवाह करना चाहती भी है या नहीं.

बहरहाल ख़ुशियों की उम्मीद लिए मैंने अपने नए जीवन में प्रवेश किया और उम्मीद तो सभी करते हैं न ख़ुुशियों की! सभी की उम्मीदें पूरी हो जाती हैं क्या? और हो सकती हैं क्या? लोगों की दृष्टि में यदि पति अपने व्यवसाय को पूरी तरह समर्पित है, तो यह उनके गुणों की श्रेणी में आता है, पर मेरे लिए क्या बच गया था जीवन में? पति ने पहले ही दिन बता दिया था कि घर में शिशु की किलकारियां गूंजने की कोई संभावना नहीं, जबकि मुझे अपनी किशोरावस्था से ही बच्चों से बेहद लगाव था. आस-पड़ोस के बच्चों को उठा लाती और घंटों उनके संग खेला करती. अपने माता-पिता के दबाव में आकर ही विवाह किया था इन्होंने और अब इसकी पूरी ज़िम्मेदारी अपने माता-पिता पर डाल किसी भी प्रकार की आत्मग्लानि से भी पूर्णतः मुक्त थे वे. बहुत बड़ी अपेक्षाएं नहीं थीं मेरी ज़िंदगी से. बस, एक सामान्य इंसान की तरह मैं ज़िंदगी को भरपूर जीना चाहती थी और इन सबसे बढ़कर मैं मां बनना चाहती थी. मुझे किसी चीज़ की कमी नहीं थी. पहनने-ओढ़ने और खाने को भरपूर था घर में, पर न कोई पहना देखनेवाला और न कोई खिलानेवाला. हर दिन के अंत में यही लगता, ‘चलो एक दिन और कट गया’. सब सुविधाओं के बावजूद भावनात्मक कोने सभी खाली थे मेरे मन के.

समय को तो गुज़रना ही होता है, सो वह गुज़र रहा था. हम मनुष्यों के दुख-दर्द से सरोकार रखना वैसे भी समय का स्वभाव कभी रहा ही नहीं है.

पढ़ने का शौक़ तो मुझे पहले से ही था और अब तो पुस्तकें ही मेरी एकमात्र संगिनी बन गई थीं. बाहर न निकलने के कारण दोस्ती भी कम ही लोगों से थी. अतः दिन का अधिकांश समय कुछ न कुछ पढ़ती रहती. शहर में हर वर्ष पुस्तक मेला लगता, सो वहीं से मैं अपनी पसंद की ढेर सारी पुस्तकें ख़रीद लाती. ज़िंदगी का रास्ता ऐसा सपाट नहीं होता, जिसमें दूर तक देखा जा सके. अनेक अंधे मोड़ होते हैं इसमें, कभी भी कहीं भी मुड़ जाती है ज़िंदगी- बिना किसी पूर्व चेतावनी के.

मेरी नीरस उदास ज़िंदगी में भी कोई मोड़ आ सकता है, ऐसा मैंने कब सोचा था?

पुस्तक मेला आरंभ हुआ, तो सदैव की भांति मैं इस वर्ष भी गई. यही एक जगह थी जहां चाहकर भी पति आपत्ति नहीं कर पाते थे. अपनी पसंद की पुस्तकें ख़रीद मैं कुछ नव प्रकाशित काव्य संग्रह देख रही थी कि मैंने महसूस किया कि कोई मेरे समीप आकर खड़ा हुआ है. लेकिन मैंने उधर ध्यान नहीं दिया. सहसा उसने मुझे मेरे नाम से पुकारा ‘अनुराधा’, वह नाम जिसे मैं लगभग भूल ही चुकी थी और जिस नाम के साथ ही मेरी पूरी पहचान, मेरी अस्मिता कहीं बहुत पीछे छूट चुकी थी. अब मैं स़िर्फ श्रीमती जैन थी- राजीव जैन की पत्नी. अतः मुझे कुछ समय लगा यह चेत आने में कि मुझे ही संबोधित किया गया है.

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पूरे पंद्रह वर्ष पश्‍चात् देख रही थी उसे- फिर भी कितना अपना-सा लगा था वह. पूरा एक कालखंड ही बीत चुका था, पर कुछ था जो आज भी वहीं रुका हुआ था इंतज़ार में, बिजली के किसी तार की तरह, जो मौक़ा पाते ही फिर से जुड़कर जीवंत हो उठा था.

हमने पुस्तक मेले का एक और चक्कर लगाया और उसके साथ ही बीत चुके वर्षों का भी. मेले से बाहर निकल हम ढलती दोपहरी में बैठे भुने चने-मूंगफली खाते रहे और बातें करते रहे. बातें थीं, जो ख़त्म ही नहीं हो रही थीं- पुरानी यादों का अंतहीन सिलसिला. कितनी अजीब बात है न कि पंद्रह वर्ष के वैवाहिक जीवन में याद करने लायक, याद करके ख़ुुश होने लायक एक भी बात नहीं थी मेरे पास. जबकि कॉलेज के तीन वर्ष अनेक यादों का भंडार थे, जिनकी चर्चा मात्र से ही मन प्रफुल्लित हो उठा था.

शहर में होनेवाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में दिवाकर अक्सर ही जाया करता. नाटकों का मंचन, कवि सम्मेलन, मुशायरा, कला दीर्घाएं, पुस्तकों का विमोचन- मेरी भी इन सब में रुचि थी, लेकिन पति को ये सब समय की बर्बादी लगते थे और मैं मन मसोसकर रह जाती. पर अब मैंने निश्‍चय किया कि अच्छा कार्यक्रम होने पर अवश्य जाया करूंगी. शुरू में इन्होंने मेरे अकेले बाहर जाने पर आपत्ति की, तो मैं कभी बहन, कभी किसी सहेली को पकड़ ले जाती, पर धीरे-धीरे मेरे भीतर आत्मविश्‍वास आने लगा और मैं अकेली ही जाने लगी. मैंने दिवाकर से सायास मिलने का कार्यक्रम कभी नहीं बनाया, पर इन जगहों पर प्रायः उससे मुलाक़ात हो ही जाती. हम कभी पढ़ी हुई पुस्तक पर चर्चा करते, तो कभी देखे हुए नाटक पर. ऊपरी तौर पर सब कुछ सामान्य था, कुछ भी तो अनुचित नहीं हो रहा था, लेकिन यदि मैं कहूं कि मैं उसकी ओर आकर्षित नहीं हो रही थी, तो यह सत्य नहीं था. वर्षों से उपेक्षा सहता मेरा मन दिवाकर का अपनत्व पाकर पिघलने लगा था. प्यार पाने और प्यार देने की भूख व्यक्ति की नैसर्गिक भूख है, हो सकता है मुझमें कुछ अधिक ही हो. मैंने ख़ुद को रोकने की बहुत कोशिश की, पर पानी के तेज़ प्रवाह में जैसे बेकाबू हो बहता ही चला जा रहा था मेरा मन. मेरे पास अपने वैवाहिक जीवन में प्राप्त ख़ुशियों के वे चंद स्तंभ भी तो नहीं थे, जिन्हें मज़बूती से पकड़ मैं ख़ुद को बहने से रोक पाती. संस्कारों की अदृश्य दीवारें भी बस अदृश्य ही रह गईं.

विधाता ने ग़लती से मेरे भीतर एक की जगह दो मन रख दिए थे क्या? पहला जब तर्क करता कि यह अनुचित है, पागलपन है, तो दूसरा प्रश्‍न करता ‘मुझे ख़ुुशियां पाने के लिए एक और जीवन मिलेगा क्या?’ पहला जब सही-ग़लत की पहचान कराता, दिवाकर से मिलने पर चेतावनी देता, तो दूसरा उसकी बात पूरी तरह से अनसुनी कर अपने ही मन की करता.

जीवन के उस मोड़ पर पहली बार जाना कि क्या होती है प्यार की अनुभूति? कितना सुखद होता है एक ऐसे व्यक्ति का साथ, जो कई स्तरों पर आपसे जुड़ा हो? पहली बार जाना कि प्यार वह शय है जिसे महसूस ही किया जा सकता है, पारिभाषित नहीं.

उस दिन कालीदास जयंती के अवसर पर उनके प्रसिद्ध नाटक ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ का मंचन था. दिवाकर भी आया हुआ था और संयोग से हम साथ-साथ ही बैठे थे. अति कुशल अभिनय ने पात्रों को एकदम सजीव बना दिया था. गंधर्व विवाह का दृश्य देख मैंने कहा, “उस समय की स्त्री को अपना वर स्वयं चुनने का, बिना माता-पिता की अनुमति के विवाह तक कर लेने का अधिकार था. स्त्री की अस्मिता का सम्मान किया जाता था. इतनी छूट तो आज भी बहुत कम युवतियों को है. पिता कण्व ऋषि के लौट आने की प्रतीक्षा तक नहीं की शकुन्तला ने, पर न स़िर्फ इस विवाह को स्वीकारा गया, बल्कि उनकी संतान को भी पूरा सम्मान मिला. भरत राजा बने और उनकी पीढ़ियों ने शासन किया. आज के माता-पिता कितना भी आधुनिक होने का दावा कर लें, उनमें से अधिकांश बेटियों का भविष्य तय करना आज भी अपना ही  अधिकार समझते हैं.”

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वर्षों से दबी मां बनने की मेरी इच्छा एक बार फिर बलवती हो उठी. किसी के प्यार का बीज मेरी कोख में पले, मेरी गोद में खेले बस इतना ही तो चाहा था मैंने और मेरा हाथ पासवाली कुर्सी पर बैठे दिवाकर के हाथ पर जा पड़ा. शायद मैंने उसे हल्के-से दबा भी दिया. सब कुछ पलभर में ही हो गया. सच मानो! सच यह भी है कि वही हमारा एकमात्र स्पर्श था.

महाभारत की एक कथानुसार बालक देवव्रत अपनी तीव्र बाण वर्षा द्वारा गंगा की धारा रोक पाने में सक्षम थे. वही देवव्रत, जो बाद में भीष्म पितामह कहलाए. मेरे उद्वेग, मेरे प्रेम के प्रवाह को दिवाकर ने रोका था- देवव्रत बनकर.

‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ देखे बहुत दिन बीत चुके थे. उस दिन के बाद से दिवाकर से मुलाक़ात नहीं हुई थी. स्वयं पर अभी भी इतना अनुशासन रखा हुआ था कि न तो मैं उसे फ़ोन करती, न ही उससे ऐसी अपेक्षा ही रखती. हालांकि इस बार मैं बहुत व्याकुल हो रही थी उससे बात करने के लिए और अगले किसी कार्यक्रम की प्रतीक्षा में थी, लेकिन उससे पहले दिवाकर का फ़ोन आ गया. कॉफ़ी हाउस में बुलाया था. मेरे मन की मुराद पूरी हो गई, पर थोड़ा भयभीत भी थी, क्योंकि इस तरह पहले कभी नहीं मिले थे हम. जब मैं पहुंची, तो दिवाकर पहले से ही वहां बैठा मेरी प्रतीक्षा कर रहा था. मैं सामने वाली कुर्सी पर जाकर बैठ गई, लेकिन उसने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. काफ़ी देर के पश्‍चात् गहन समाधि से मानो जागकर उसने पूछा, “कैसी हो राधा?”

उसने टटोलती निगाहों से मेरी ओर देखा, तो एक बार फिर निगाहों द्वारा छू लेने का मृदु एहसास महसूस किया मैंने, किंतु उस नज़र में कुछ और भी था- उदासी? पर वह किसलिए?

मैं कुछ कह पाती, इससे पूर्व ही उसने कहा, “तुमसे एक ज़रूरी बात करनी थी अनु… मैंने अपना यहां से तबादला करवा लिया है… मुझे लगता है यही हम दोनों के हित में है…”

मैं बेचैन हो गई उसकी बात सुनकर. उसने मेरी उत्तेजना भांप ली थी. उसने हाथ से मुझे शांत हो जाने का इशारा किया मानो मेरे उद्वेग को हथेली से ही रोक लेगा. बोला, “मैं समझ रहा हूं तुम्हारे मन को और तभी ऐसा किया है. हम केवल मित्र बनकर रह सकते, तो बात अलग थी, पर लगता नहीं कि ऐसा हो पाएगा. हम किसी ग़लत राह पर चल पड़ें, उससे पहले दिशा बदल लेना बहुत ज़रूरी है. ऐसे संबंध अहं को तृप्त कर सकते हैं, कुछ समय के लिए जीने का सबब भी बन सकते हैं, लेकिन कभी न कभी अपराधबोध से ग्रसित करते ही हैं अनुराधा. समाज द्वारा बनाए नियम किसी कारण से बने हैं. हमें लगता है कि वे हमारी इच्छाओं का दमन करते हैं, हमें अपनी मर्ज़ी से नहीं जीने देते, पर वही समाज को उच्छृंखल बनाने से रोके हुए भी हैं.”

लंबा अरसा बीत चुका है उस मुलाक़ात को. अच्छा हुआ मैं अपने मन की बात उस समय स्पष्ट रूप से दिवाकर से कह नहीं पाई. क्या सोचता वह मेरे बारे में? दिवाकर के सुलझे-संयत व्यवहार ने मेरे उन्माद पर रोक लगा दी थी. उस समय तो मैं बहुत हताश हुई थी, पर अब उससे उबर चुकी हूं मैं. उन्मादी लहरें एक बार फिर जाकर सागर में विलीन हो गई हैं.

आजकल मैं बहुत व्यस्त रहती हूं. हरदम बच्चों से घिरी हुई. किसी की मां-सी हूं और किसी की मौसी. अपना पूरा खाली समय एक अनाथाश्रम में बिताती हूं. उन बच्चों के खिले चेहरे मुझे पूर्णतः तृप्त कर देते हैं. आवश्यक तो नहीं कि स़िर्फ अपनी कोख से जन्मे बच्चों पर ही प्यार उड़ेला जाए. जो बच्चे अपने नैसर्गिक प्यार से वंचित रह जाते हैं, बिना किसी क़सूर के, उनमें प्यार बांटकर, उनके उदास चेहरों पर मुस्कुराहट लाकर जीवन परिपूर्ण हो गया है मेरा.

दिवाकर ने कहा था, “अपनी इच्छानुसार जीने को तो किसी को नहीं मिलता अनु. मुझे मिला क्या? पर जीवन वह नहीं है, जैसा जीने की हम कल्पना करते हैं, जैसा हम जीना चाहते हैं. जीवन वह जीना होता है, जैसा हमें मिलता है. उसमें सुंदर रंग भरकर हम कितना संवार पाते हैं, यह हम पर निर्भर करता है. सांस लेने भर को जीना नहीं कहते अनु. जीवनदाता का अपमान है यह. समय काट देनेवाली सोच बहुत घातक सोच है. हर पल का सार्थक उपयोग करके जियो राधा.”

हां! वह कभी मुझे अनु बुुलाता था और कभी राधा.

दिवाकर की यादों का उजास मेरे मन को ठीक उसी तरह आलोकित किए है, जैसे किसी मंदिर के गर्भगृह में निरंतर जलती एक लौ. वर्षों बीत गए उससे मिले, उसे देखे. यह भी नहीं जानती कि वह रहता कहां है? पर उसकी उपस्थिति का एहसास हर पल अपने आसपास महसूस करती हूं मैं. इस रिश्ते को क्या नाम दूं? नहीं जानती.

        उषा वधवा

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कहानी- मंज़िल तक (Short Story- Manzil Tak)

Manzil Tak

“जीवन केवल वह नहीं, जो अपनी इच्छित आकांक्षा को पूर्ण करने में ख़र्च किया जाए, जीवन वह है जो दूसरों को ख़ुश देखने, दूसरों को सहारा देने के लिए जीया गया हो. जीवन-पथ पर बहुत कुछ पीछे छूट जाता है.., कुछ छोड़ देना पड़ता है, जो स्वयं के लिए बोझ साबित हो… आगे बढ़ने के लिए बाधक साबित हो, उसे छोड़कर आगे बढ़ना ही जीवन है. उसी मोड़ पर बैठ जाना तो कर्महीनता है. मंज़िल तो आगे… बहुत आगे बढ़ने पर ही मिलती है. यह तो इंसान को स्वयं तय करना होता है कि उसकी मंज़िल क्या है, उसके जीवन का उद्देश्य क्या है?”

‘दक्षा तिवारी…’

नाम की घोषणा होते ही दक्षा आत्मविश्‍वास से भरी हुई अपनी कुर्सी से उठकर मंच की ओर चल पड़ी. मंच पर अतिथि महोदय से दक्षा ने अपना प्रशस्ति-पत्र और पी.एच.डी. की थिसिस थाम ली व गर्वित मुस्कान से अभिवादन कर मंच से नीचे उतरने लगी.

दो-तीन कैमरामैन नीचे से लगातार कार्यक्रम की फ़ोटो खींचने में व्यस्त थे. मंच से उतरते व़क़्त चेहरे पर पड़ी फ्लैश की चमक से सहसा दक्षा की नज़र कैमरामैन पर पड़ी. वह भी कुछ चकित, कुछ सहमा, कुछ लज्जित-सा नज़र चुराते एक तरफ़ चला गया.

दक्षा ने देखते ही पहचान लिया था उसे. यह वही शख़्स है, जो आज से क़रीब आठ वर्ष पूर्व बीए करने के बाद पहली बार दक्षा को वर के रूप में देखने पहुंचा था.

दक्षा अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गई व पुनः उसकी नज़रें कैमरामैन को खोजने लगीं. कहीं नज़र न आने पर वह मन ही मन बुदबुदाई. “कायर कहीं का…” एक व्यंग्यात्मक मुस्कान इसके चेहरे पर फैल गई.

दक्षा को देखते ही विवाह के लिए मना कर दिया था इसने. कारण था- लड़की का रंग दबा है. सुनकर दक्षा कितनी रोई थी. क्या है इस इंसान में? मामूली-सा कैमरामैन! किसी के यूं ही कह देने भर से क्या कोई योग्य-अयोग्य हो जाता है?

लेकिन उस व़क़्त उन्नीस वर्ष की अल्हड़ दक्षा में कहां थी इतनी समझ? यदि ‘मां’ जैसी मां न होती तो कहां जान पाती दक्षा ज़िंदगी के मायने… कार्यक्रम की गमगमाहट से दूर दक्षा का मन अतीत में विचरने लगा.

बीए करते-करते आम लड़की की तरह दक्षा भी अपने राजकुमार के सपने संजोने लगी थी. मां-पिताजी तो दक्षा की पूर्ण उच्च-शिक्षा के पश्‍चात ही विवाह के पक्ष में थे, पर बिस्तर पर पड़ी दादी दिन-रात पिताजी के कान खाती- “मेरे जीते जी दक्षा को ब्याह दो, वरना दामाद का मुंह नहीं देख पाऊंगी, अब गिनती के दिन शेष हैं मेरे…”

तभी दक्षा के मामाजी ने आकर रिश्ते की बात चलाई. किसी मित्र का भाई है, कैमरामैन है, अपना स्टूडियो है, प्रायवेट वीडियो शूटिंग करता है, ग्रेजुएट है, सुंदर है, गोरा है… और न जाने क्या-क्या.

हालांकि मां-पिताजी इन बातों से प्रभावित न हुए थे, पर दादी की ज़िद पर वर-दिखलाई का कार्यक्रम तय हुआ.

लड़का अपने मां-बाप व भाई के साथ दक्षा को देखने पहुंचा. दूसरे ही दिन ख़बर भिजवा दी कि लड़की नापसंद है, काली है.

दक्षा ने सुना तो रो-रोकर बुरा हाल बना लिया था. लड़के के मना करने का दुख कम, अपनी अवहेलना का ज़्यादा था.

मां पिताजी पर झल्ला पड़ी थी- “मैंने तो पहले ही मना किया था. न लड़की की पढ़ाई पूरी हुई है, न उम्र. बेवजह की तमाशाई हुई… लड़की का दिल दुखा सो अलग.”

पिताजी कम आहत नहीं थे, पर चुप ही रहे और मन-ही-मन तय किया कि जब तक बिटिया की पढ़ाई पूरी नहीं होगी, विवाह की चर्चा नहीं होगी.

समय के मरहम से दक्षा पूर्ववत हो गयी थी व फिर से पढ़ाई-खेल, साथी-सहेलियों की गतिविधियों में व्यस्त हो गई.

उन्हीं दिनों एमए के दौरान दक्षा का वंदन से परिचय हुआ. कॉलेज के सांस्कृतिक कार्यकम में वंदन दक्षा के साथ ही नाटक में काम कर रहा था. तीव्र बुद्धि, हंसमुख स्वभाव, लुभावनी काया-कुल मिलाकर एक चुंबकीय व्यक्तित्व का स्वामी था वंदन.

कुछ उम्र का असर, कुछ अनुकूल परिस्थितियां… दोनों का साथ-साथ हर गतिविधि में सम्मिलित होना धीरे-धीरे दक्षा व वंदन को क़रीब ले आया, इसका दोनों को ही भान न था. दोनों ही एक-दूसरे के आकर्षण में बंधे जा रहे थे.

हालांकि दक्षा का वंदन के प्रति व्यवहार केवल मित्रवत ही होता था, पर मां की पारखी नज़रों ने दक्षा के मन में छिपे चोर को ताड़ लिया था. मां आख़िर मां ही होती है.

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मां स्वभावगत चिंतित हो गई थी. वैसे दक्षा की पसंद उनकी अपनी पसंद थी. वंदन उन्हें भी भाता था. परंतु केवल लड़के-लड़की की आपसी पसंद से क्या होता है? “क्या वंदन के परिवारवाले भी दक्षा को पसंद करेंगे? यदि नहीं, तो क्या वंदन में इतना हौसला है कि घरवालों के विरोध के बावजूद दक्षा का हाथ थाम सके? यदि ऐसा न हुआ तो दक्षा एक बार फिर घायल होगी, टूटेगी, बिखरेगी… कैसे संभालूंगी बेटी को…?” आदि बहुत-सी चिंताएं जो हर मां को बेटी के प्रति होती हैं, दक्षा की मां को भी सताने लगीं.

मां ने दक्षा व वंदन से इस संबंध में बात करने का मन बनाया ही था कि उसके पूर्व ही एक शाम दक्षा कॉलेज से लौटते ही अपने कमरे में जाकर लेट गई. जो कभी न होता हो, उसके होने पर मन में आशंका उठना स्वाभाविक है. रोज़ आते ही कॉलेज की बातें सुनाना दक्षा की दिनचर्या का हिस्सा था.

शंकित मन से मां दक्षा के कमरे में दाख़िल हुई व दक्षा से कारण जानना चाहा, पर तबीयत ख़राब होने का बहाना बनाकर दक्षा ने स्वयं को चादर में छिपा लिया.

जिसकी आशंका थी, आख़िर वही हुआ. दूसरे ही दिन मां को दक्षा की सहेली से पता चला कि वंदन की सगाई तय हो गयी है.

एकबारगी मन हुआ कि बुलाकर भला-बुरा कहे वंदन को… कहे कि प्रेम की पेंगें बढ़ाना जितना आसान है, उतना ही कठिन है हाथ थामना. हिम्मत चाहिए, हौसला चाहिए, आत्मविश्‍वास चाहिए उसके लिए. जिसमें ये सब नहीं, वह दक्षा के काबिल नहीं. पर पराई संतान को भला क्या कहा जा सकता है. अतः वंदन का ख़याल झटके से मन के बाहर कर दिया मां ने.

उन्हें चिंता थी तो केवल दक्षा की… उसके टूटे मन की… उसकी दरकती भावनाओं की.

एक बार पिताजी ने कहा,“हम ख़ुद चलकर वंदन के मां-बाप से बात करते हैं.” पर मां नहीं मानी. जो लड़का अपने अधिकार के लिए ज़ुबान तक नहीं खोल सकता, ऐसे लड़के से ब्याहकर दक्षा को कौन से सुख मिल पाएंगे?

“नहीं…नहीं, बिल्कुल नहीं,” मां ने निर्णयात्मक स्वर में कहा, “वह कायर दक्षा के लायक नहीं है. रही दक्षा की बात तो वह आप मुझ पर छोड़ दीजिए, मैं उसे संभाल लूंगी.” आठ… दस… पंद्रह दिन हो गए… आख़िर महीना हो गया. दक्षा ने कॉलेज जाना बंद कर दिया था. यंत्रवत-सी वह दिनभर के आवश्यक काम निपटाती, खाने के नाम पर दो-चार निवाले मुंह में ठूंसती व उठकर फिर कछुए की तरह अपनी खोल में स्वयं को छिपा लेती.

मां ने दक्षा को कुछ दिन बिल्कुल नहीं टोका. वह जानती थी कि जब कभी हर उपदेश, समझाइश जवाब दे जाते हैं तब केवल ‘समय’ ही वह उपाय रह जाता है जो सब कुछ बदलने का सामर्थ्य रखता है. ऐसी स्थिति में दक्षा को सामान्य होने के लिए उसके हाल पर यथावत् छोड़ देना ही अंतिम उपाय था.

माह-दो माह पश्‍चात भी दक्षा की रुचि किसी कार्य में नहीं जाग रही थी. न टी.वी., न गाना, न सहेली, न फ़िल्म.. दक्षा को देख पिताजी भी स्वयं को बेबस पाते, उसकी हालत देख स्वयं तिल-तिल मर रहे थे.

आख़िर एक दिन मौक़ा देखकर खाने की मेज़ पर मां ने चर्चा छेड़ी. संबोधन पिताजी के लिए था, पर बात दक्षा के लिए उद्येशित थी. “आपने सुना, पड़ोस की निशी की वर्मा साहब ने ज़बरदस्ती शादी तय कर दी. वह भी उसकी इच्छा के विरुद्ध.”

“अच्छा.., लेकिन क्यों?” पिताजी बोले.

“क्यों क्या? उनकी मर्ज़ी! हर पिता तुम्हारी तरह नहीं होता, जो लड़की की भावनाओं का ख़याल कर पल-पल घुटता रहे. लड़की भूखी रहे तो ख़ुद भी भूखे उठ जाएं.” कनखियों से दक्षा पर नज़र डालते हुए मां ने अपनी बात ज़ारी रखी. “निशी को भी तो देखो. मज़ाल है कि विरोध में मुंह से दो शब्द भी निकल जाएं.”

आज दो माह में पहली बार दक्षा का ध्यान पिताजी पर गया. उसे देख-देखकर कितने चिंतित, कितने उदास, कितने दुर्बल लग रहे हैं, शायद पिताजी ने भी इतने दिनों से ठीक से खाना नहीं खाया. सोचते हुए दक्षा अपने कमरे में आ गई व रातभर मां की बातों का विश्‍लेषण करती रही. उसका मन ग्लानि से भर उठा. किसी की सज़ा किसी को क्यों दे? और ख़ासकर उन्हें, जो हर व़क़्त उसके भले की सोचते हैं. मां-पिताजी को अनजाने ही उसने दुःखी कर दिया, इस ख़याल से वह पछता उठी.

सुबह नहा-धोकर दक्षा किचन में आकर मां के काम में हाथ बंटाने लगी, “मां, आज पिताजी की पसंद का खाना मैं बनाऊंगी.”

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दक्षा में आए इस अप्रत्याशित परिवर्तन से मां का हृदय सुखानुभूति से भर गया. यही व़क़्त है दक्षा को कुछ कहने का… सही बात सही समय पर कही जाए तभी उसका सकारात्मक असर होता है… सोचते हुए मां ने दक्षा से कहा, “दक्षा, जीवन केवल वह नहीं, जो अपनी इच्छित आकांक्षा को पूर्ण करने में ख़र्च किया जाए, जीवन वह है जो दूसरों को ख़ुश देखने, दूसरों को सहारा देने के लिए जीया गया हो. जीवन-पथ पर बहुत कुछ पीछे छूट जाता है.., कुछ छोड़ देना पड़ता है, जो स्वयं के लिए बोझ साबित हो… आगे बढ़ने के लिए बाधक साबित हो, उसे छोड़कर आगे बढ़ना ही जीवन है. उसी मोड़ पर बैठ जाना तो कर्महीनता है. मंज़िल तो आगे… बहुत आगे बढ़ने पर ही मिलती है. यह तो इंसान को स्वयं तय करना होता है कि उसकी मंज़िल क्या है, उसके जीवन का उद्देश्य क्या है?”

“तुम तो भाग्यशाली हो जो तुम्हारे पिताजी आम इंसानों से हटकर तुम्हारी ऊंचाइयों के ख़्वाब देखते हैं, आम पिताओं की तरह तुम्हें ब्याहकर बोझ उतारने की भावना उनमें नहीं है. इन सबके बावजूद तुम ही हारकर रुक जाओगी तो क्या पिताजी के प्रति अन्याय नहीं करोगी?”

मां की एक-एक बात यथार्थ के पाठ की तरह दक्षा के मन-मस्तिष्क में बैठ गई. मां सच ही तो कहती है कि जीवन में उन कष्टप्रद यादों व पीड़ादायक बातों को दुःस्वप्न मानकर भूलना आवश्यक है. बीती बातों में उलझकर आने वाले उज्ज्वल ‘कल’ को अंधकारमय बना देना कहां की बुद्धिमानी है? विचारों में आए इस परिवर्तन के साथ ही दक्षा के मन से अवसाद और निराशा धुल गई व भविष्य का मार्ग प्रशस्त हो उठा. अब उसकी नज़र भविष्य-पथ पर स्थिर हो गयी… सीधे मंज़िल तक.

“मैडम, आज यहीं रुकने का इरादा है क्या?” प्रोफेसर शरद की आवाज़ पर दक्षा जैसे नींद से जाग उठी व हड़बड़ाहट में उठकर खड़ी हो गयी.

प्रोफेसर शरद को अपनी ओर मुस्कुराते देख कुछ झेंप-सी गई. कार्यक्रम संपन्न हो चुका था. लोग हॉल से बाहर निकल रहे थे.

“चलिए, मैं आपको रास्ते में ड्रॉप कर दूंगा और वैसे भी आपने आज मेरे प्रस्ताव का जवाब देने का वादा किया है. कहते हुए एक गहरी नज़र शरद ने दक्षा पर डाली.

दोनों आगे बढ़े ही थे कि कैमरामैन सामने आ गया- “एक्सक्यूज़ मी..” कहते हुए दक्षा से बोला “आपने शायद मुझे पहचाना नहीं, मैं…”

दक्षा बात काटते हुए आत्मविश्‍वास से भरे लहज़े में बोली “जी नहीं, मैंने आपको अच्छी तरह से पहचान लिया है. इनसे मिलिए प्रोफेसर शरद… मेरे होनेवाले पति…” कहकर दक्षा ने शर्माते हुए शरद की आंखों में झांका व उनके साथ आगे बढ़ गई.

 

स्निग्धा श्रीवास्तव

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कहानी- धाय (Short Story- Dhay)

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यक़ीनन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें विधाता अपनी पूरी लगन से गढ़ता है और पूर्ण संस्कारित करके ही धरा पर भेजता है. जो न मिला, उसके लिए कभी भगवान को दोष नहीं देते. कभी मुंह खोलकर अपने जीवन की त्रासदियों की शिकायत नहीं करते और मिसाल बन जाते हैं, जीती जागती… जिनका ‘होना’ बरगद की छांव-सा लगता है.

उसके देहावसान की सूचना मिले चार महीने से ऊपर हो गए. तब से एक दिन भी वह मेरी आंखों से ओझल नहीं हुई. खाना बनाते व़क़्त तवे पर सिंकते फुलके से उठनेवाली सौंधी सुगंध के साथ उसकी याद की टीस का क्या मेल हो सकता है, यह मैं समझ नहीं पा रही हूं. कदाचित यह कि बचपन में लकड़ी-उपले के चूल्हे में रोटी सेंकती वो… और उसके सामने बैठी हाथ तापती या खाना खाती मैं… अनजाने में रोटियों की वह सुगंध मेरे नथुनों में भरती चली गयी होगी. अर्थात् उसकी याद के साथ उस विशेष महक का मेल तो था. पहले यह बात समझ में नहीं आई मुझे. मगर, अब जबकि वह नहीं रही तो मैं… ह़ज़ारों कोस दूर बैठी तवे पर सिंकती रोटी से उठती महक के साथ कलेजे से उठती हूक को समझने की कोशिश में लगी हूं.
कितनी यादें… कितनी स्मृतियां- देखी हुई सुनी हुई… आज उनको पृष्ठों पर उतार देने का मन हो रहा है. शायद उस अनूठी हस्ती के प्रति मेरी अशेष श्रद्धा के सुमन अर्पित हो जाएं. मन में उठते भावों को शब्दों में बांधने का कितना भी प्रयास किया जाए… हूबहू करना सम्भव कहां हो पाता है? यदि होता, तो मैं आपको रोटी से उठनेवाली उस महक का स्वाद क्या न बता पाती कि किस तरह इधर कपड़े से फुलायी रोटी की भाप बाहर निकली और उधर उसकी तस्वीर मेरी आंखों के सामने आयी.
लगभग साठ या उससे भी पांच-सात वर्ष पहले की एक तपती दोपहरी में राजस्थान के बीकानेर शहर में ‘देशनोक’ गांव की वह सुतारी (लकड़ी का काम करनेवाले को सुतार कहते हैं) अपने साथ दस वर्षीया बालिका का हाथ थामे शहर के प्रतिष्ठित सेठ की ऊंची लाल पत्थरों की हवेली के विशाल आंगन में खड़ी कह रही थी.
“सेठाणीजी आपरा बाईसा ने रमावण ने कोई छोटी-छापरी चहिज ही सी. ई ने लाई हूं. करम फूटोड़ा हो, जिको पेला ईरा मां-बाप काल में मर गया अबे धणी. म्हें अभागण दिन-रात खेतां में रेंऊ ईरी रखवाली कोनी कर सकूं… आपरे दरबार में पल जायी माईता.” और रोने लगी वह.
विधवा के लिए निर्धारित क्रीम रंग के मोटे कपड़ों में गठरी बनी वह बच्ची, जिसका नख-शिख तक नहीं दिख रहा था, उसकी पुत्रवधू थी. इस कच्ची उम्र में विधवा…
सेठजी के यहां पांच-छ: महीने पहले ही प्रथम पुत्री का जन्म हुआ था. इतनी बड़ी हवेली में बच्ची को रखनेवालों का अभाव नहीं था, किन्तु एक तो सेठ स्वयं ‘देशनोक’ गांव के थे, उस पर ‘सुतार घराने’ के पुराने सेवाभाव के कारण उसे रख लिया गया.
सांवली-सलोनी कृशकाय बालिका का नाम था ‘चांद’. चांद की ही भांति उसके छोटे-से जीवनकाल में ‘विधवा’ का दाग़ लगा था. चुपचाप माथा झुकाए सुबह पांच से रात दस बजे तक सेठानी के पीछे-पीछे उनके बताए छोटे-मोटे काम वह नि:शब्द करती रहती. सेठजी की बेटी कमला को तो वह गोद से नीचे ही नहीं उतारती थी. इशारों में समझने और अद्भुत आज्ञाकारिता के दुर्लभ गुण के कारण उसे उपालम्भ देने का अवसर कभी किसी को नहीं मिला. संपन्न घर में खाने-पहनने की कमी तो थी नहीं. सेठानी ने भी अन्य सेवक-सेविकाओं की संगत में उसे कभी नहीं रखा. इसकी वजह उनका दयावान धर्मभीरू स्वभाव तो था ही, चांद का शांत, कर्मठ, समर्पित व्यवहार भी था. मेवा-मिष्ठान, फल-फूल, कपड़े-गहने, खेल-खिलौनों के अंबार देख कर भी उस अबोध बच्ची की आंखों में लोभ-लालच तो दूर, किसी प्रकार के कौतुहल का भाव तक नहीं आता था.

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लगता था जैसे भौतिक वस्तुओं से अघायी कोई देवबाला शापग्रस्त जीवन काटने आ पहुंची थी.
समय का रथ गतिमान था. सेठ का मोतीपुरा आंगन समृद्धि के साथ-साथ एक-एक करके पांच बेटियों की चहचहाहट से गुलज़ार हो गया. बालिका चांद कब ‘धायजी’ के संबोधन की हक़दार बन गयी, पता तक न चला. निःस्वार्थ कर्त्तव्यपरायणता अपना हक़ ख़ुद दिला देती है. जैन धर्मावलम्बी परिवार में अब सेठ-सेठानी बेटियों को घर पर धायजी की देख-रेख में छोड़ साधु-संतों के सेवा-दर्शन पर जाते रहते. घर की पूरी ज़िम्मेदारी धायजी के कंधों पर रहती. चार-पांच नौकर-नौकरानियों की बागडोर भी उसके हाथ में रहती, मगर धाय की कार्यकुशलता ने कभी मात खाना नहीं जाना. बड़ी बेटी कमला दस वर्ष की हुई तो बड़ी धूमधाम से अति संपन्न घर में उसका विवाह हुआ.
उन दिनों की प्रथा व अतिरिक्त प्रेम के कारण बालिका वधू के साथ धाय भी उसके ससुराल साथ जाती. दस वर्ष की कमला और बीस वर्ष की उसकी धाय. ससुराल में होनेवाली बहू की मनुहारें, लाड, प्रेम व अपेक्षाकृत युवा दूल्हे की प्यार भरी छेड़खानी, पत्नी का सामीप्य पाने की चेष्टाएं, धाय की आंखों के सामने घटते रहते… यक़ीनन उसका मन वैरागी ही रहा होगा… कि व़क़्त और वयस की किसी मौसमी हवा ने उसे हिलाया तक नहीं. उसने अपने मन के घोड़े को संयम के किस अदृश्य चाबुक से साधा था, जो कभी भटका नहीं.
इस दौरान सेठ के बेटा हुआ और कालांतर में एक-एक करके सभी बेटियां ससुराल चली गयीं. इतने बड़े घर की पाकशाला का दायित्व धाय के पटु हाथों में था. सेठानी ख़ुद उसके सहयोग को तत्पर रहती. बेटियां जैसे-जैसे बड़ी होती जातीं, वे उन्हें धाय का हाथ बंटाने व काम सीखने उसके पास भेजती रहती. अनजाने में सभी बेटियों ने गृहकार्य की दीक्षा धाय से ली और उसके साथ उन सबका नेह का नाता प्रगाढ़ होता गया.
धाय और सेठानी में एक बात को लेकर अक्सर तकरार होती. धाय जब खाने बैठती तो न जाने किस आले-अलमारी के ओने-कोने से निकालकर ठण्डी-बासी रोटी और बची सब्ज़ी अपनी थाली में रख लेती. सेठानी इस पर बरस पड़ती.
इस लम्बे अंतराल में यह ज़रूर हुआ कि धाय का सेवाभाव तो वही रहा, मगर अब अधिकार भाव भी आ गया. लड़कियां ससुराल से आतीं तो उनके वेश-व्यवहार या फिर बच्चों के रख-रखाव को लेकर सगी मां से पहले ही धाय डपट दिया करती.
लड़कियों के ससुराल उसी शहर में थे. आना-जाना लगा रहता. मारवाड़ी घरों में गहने पहनने का चलन कुछ ज़्यादा है. ससुराल से आतीं, तो वे अपने गहने उतार कर धाय को सौंप देतीं. ऊपर जाकर ताले-चाबी का झंझट कौन करे. शाम को ससुराल जाते व़क़्त वापस पहनना ही होता. धाय के रहते निश्‍चिंतता थी.
सभी लड़कियों की शादियां हो गयीं.. बेटा कलकत्ता पढ़ने चला गया. घर सूना हो गया था. सेठानी ने इस सूनेपन को कम करने के लिए अपनी एक नातिन मंजू को अपने पास रख लिया. मंजू की मां अब कलकत्ता रहने लगी थी. अब नानीमां और धाय की तमाम वर्जनाओं व दुलार का केन्द्र मंजू थी. बेटियों के सभी बच्चों की वह नानी थी और एक-एक की पसंद उसे कंठस्थ रहती थी. बच्चे आते, तो उन सबकी फरमाइशें पूरी करती रहती. अपने लिए रखती वही बासी रोटी और बची सब्ज़ी. कई बार नानीमां के इशारे से मंजू खाने की कोई वस्तु, फल या मिठाई फ्राक में छुपा कर लाती और खाना खाती धाय की थाली में चुपके से रख देती, तो वह बिगड़ उठती. थाली धो कर पीने का सनातन नियम पालने वाली धर्मभीरू धाय को फिर वह वस्तु खानी ही पड़ती. मंजू पर उसकी डांट का कोई असर नहीं होता था. उसे बहुत बुरा लगता कि नानी कोई अच्छी चीज़ क्यों नहीं खाती… और वह ताक में रहती इसी तरह उसकी जूठी थाली में कुछ रख देने के.
छुट्टियों में नानीमां उसे भी अपनी बेटियों की तरह नानी के पास रसोईघर में भेजती काम सीखने के लिए, “जा नानी खने घर का काम सीख, नहीं तो सासरे में गाल्या खासी.” रात के व़क़्त गलियों में कुत्तों का समवेत कर्णकटु आलाप मंजू को डराता. वह जब तक नानी का हाथ कस कर पकड़ कर नहीं सोती, उसे नींद नहीं आती.
सेठजी के बेटे की शादी की बात चलने लगी. लड़कियां देखी जातीं… धाय का पूरा दख़ल रहता. छांट कर रूपसी बहू लाए. बहू पर सगी सास-सा शासन करने व दुलार लुटाने वाली धाय बेटे के बच्चों पर तो जैसे जान छिड़कती थी. बहू ने भी उसका मान सास जैसा ही रखा. न कभी पलट कर जवाब दिया, न मनमानी की. अब धाय को बुढ़ापा आ रहा था. सेठजी का देहावसान हो गया था और यह परिवार कलकत्ता रहने लगा था.
साल में एक बार परिवार बीकानेर आता तो वह अपने गांव ‘देशनोक’ आठ-दस दिन जा आती थी. वहां उसके तीन देवर व उनके परिवार रहते थे. लकड़ी के काम में अच्छी आय थी उनकी और धाय का मान भी बहुत रखते थे. एक बार जब वह देशनोक गयी तो किसी ने उसके दिमाग़ में एक बात जमा दी, “पूरो जमारों तो सेठां रे घर में गाल दियों. पण आगलों जमारो क्या गमावों, अबे थारी ऊमर आयेगी. कदेई सांस निकल जाएगी तो बढ़े बिना पूरों बाल्यां नदी में फेंक देवे, जिके सु गति कोनी हूवें.”
और गांव से वापस आकर धाय ने ऐलान कर दिया वह अब कलकत्ता नहीं जाएगी. सभी को ताज्जुब हुआ. बहुत समझाया, मगर वह नहीं मानी. उसे वहां छोड़ते सभी को दुख हो रहा था, पर वह तो अड़ी गयी, रो रही थी. व्याकुल भी थी. जानती थी जहां कभी रही नहीं, वहां रहना कठिन तो होगा. लेकिन सद्गति व परलोक के भय ने उसे जकड़ रखा था. कलकत्ता में मंजू ने सुना, तो उसे बहुत ठेस लगी. सगी मां जैसे कहीं अकेली रह जाए, तो जैसा मन आकुल-व्याकुल हो उठे, ठीक वैसा ही लगा था उसे.

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जब सभी बीकानेर जाते तो वह गांव से आ जाती थी. इस बीच एक बार मंजू का राजस्थान जाना हुआ, तो वह नानी से मिलने देशनोक गयी. उसे देख कर मंजू की आंखों से ढल-ढल आंसू टपकने लगे.
ख़ुद पर उसका वश नहीं रहा. वह धाय के देवरों से कह बैठी, “थे केवता हा इने खने राखर पूरी सेवा चाकरी करसा. इसी सेवा करो हो कई आ हालत हुगी. इसी तो आ कदेई कोनी ही.”
मंजू की बात सुन कर कोई कुछ नहीं बोला, सब कमरे से बाहर निकल गये तो धाय ने उसे हाथ दबा कर चुप रहने का इशारा किया और बोली, “गेली हुयी है… क्यां रोवे है. ए सगला बापड़ा तो मारे आगे-भारे फिरे हैं. अबे बुढ़ापो है, पीला पान हां… कदेई झर जासा… रो मती तू तो म्हारी साणी बाई है.”
मंजू भी उसके संकोची स्वभाव को जानती थी. संभव है, हमेशा जिनके साथ रही. उनसे दूर रहने के कारण उसकी यह हालत हो गयी है. सब पर पूरे अधिकार से गरजने वाली नानी की सूखी देह और गठरी-सी बनी पांवों में माथा डाले, दीन-हीन-सा बैठा रहना मंजू को कचोट गया और वह आपा खो बैठी थी. उसने फिर नानी को समझाने का पूरा प्रयास किया. पर वह कहां मानने वाली थी.
सोचती हूं, उस जैसे इन्सान को भी अपने अगले जनम के लिए चाह कर पुण्यों को अर्जित करने की आवश्यकता थी क्या? काम, मोह, लोभ, लालच को इसने जितना साधा था, उतना तो कोई संसार त्यागी साधु भी नहीं साध पाता. उसे अपना अगला जनम सुधारने के लिए अन्तिम प्रहर के तप के मूलधन से कहीं ज़्यादा आजीवन नि:स्वार्थ सेवाभाव, अलौकिक ईमानदारी तथा उम्र के कच्चे पड़ावों पर भी अडिग रहने की दृढ़ता का पुण्य क्या कम था?
ऐसे किसी इंसान की गढ़न में मां-बाप के उच्च संस्कार, सुशिक्षा तथा वैसा ही परिवेश का बड़ा हाथ होता है. कब पाये उसने मां-बाप से संस्कार…? कब मिली शिक्षा…? और कहां मिला परिवेश…? यक़ीनन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें विधाता अपनी पूरी लगन से गढ़ता है और पूर्ण संस्कारित करके ही धरा पर भेजता है. जो न मिला, उसके लिए कभी भगवान को दोष नहीं देते. कभी मुंह खोलकर अपने जीवन की त्रासदियों की शिकायत नहीं करते और मिसाल बन जाते हैं, जीती जागती… जिनका ‘होना’ बरगद की छांव-सा लगता है. अदृश्य, मगर सुकून भरा, शीतल-शांत, घनघोर, लेकिन जब चले जाते हैं तो छोड़ जाते हैं एक एहसास… एक सुगंध.

– निर्मला डोसी

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कहानी- प्रत्यावर्तन (Short Story- Pratyavartan)

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मैंने राजू के नन्हे-मुन्ने हाथ देखे. जाड़ों में कुसुमी अक्सर दूध के जूठे भगौने की तली में चिपकी रह गयी मलाई कांछकर उसके हाथ-पैरों में मलती थी. कल से इन छोटी-छोटी उंगलियों में पेचकस, पाना और रिंच होंगे. कलेजे में मरोड़-सी उठी. मैंने उसे सीने से चिपटा लिया. माथा चूमकर भरे गले से बोली, “जब भी कोई ज़रूरत हो, बेहिचक चले आना.”
उदास आंखें लिये राजू ने ‘अच्छा’ के भाव से सिर हिला दिया.
मंगला के पीछे छोटे-छोटे क़दम रखकर जाते हुए राजू को मैं अपनी डबडबाई आंखों से ओझल होने तक देखती रही. कमरे में आकर हिलक-हिलककर रोई अपनी विवशता पर. जीवन में पहली बार ये मुझे बहुत बुरे लगे.

सुखदेई की कार्यकुशलता ने पांच सालों में ही मुझे एकदम निकम्मा बना दिया था. इसलिए जब एक दिन उसने स्थायी रूप से गांव जा बसने का ऐलान करके बोरिया-बिस्तर समेटा तो मेरे तो हाथ-पैर ही फूल गये. घर के इस छोर से लेकर उस छोर तक फैले काम में समझ ही नहीं आता था कि काम की शुरुआत करूं तो कहां से करूं? ऐसे संकट काल में कुसुमी का आगमन मुझे वरदान जैसा लगा.

पड़ोस में रहनेवाले मालवीयजी की नौकरानी मंगला की बहन बीस वर्षीया कुसुमी पति की असामयिक मौत के बाद दो महीने के राजू के साथ भरण-पोषण के अलावा आवास की समस्या से भी जूझ रही थी. कुसुमी की समस्याएं मेरी समस्याओं के निवारण का ज़रिया बन गयीं. हालांकि उसकी आवासीय समस्या हल करने में मुझे ख़ासी मेहनत करनी पड़ी. दरअसल नौकरों के बारे में इनके उसूल निश्‍चित और एकदम स्पष्ट हैं. उनके साथ इन्सानियत के बर्ताव की हिमायत के बावजूद ये एक निश्‍चित दूरी रखना पसन्द करते हैं. इसलिए साथ रखने के पक्ष में नहीं हैं. पिछवाड़े वाली कोठरी में कुसुम को रखने के लिए इन्हें मुश्किल से राज़ी कर पायी.

अपनी असहायता के एहसास ने कुसुमी को इतना अधिक विनम्र बना दिया था कि कई बार उसकी विनम्रता मुझे दीनता-सी लगने लगती. धीरे-धीरे उसने घर के सारे उत्तरदायित्व संभाल लिए. अब अलसुबह किचन में जाकर मुझे बेडटी नहीं बनानी पड़ती थी. बाथरूम धोकर मंजी हुई बाल्टी में पानी भरकर, कपड़े अरगनी पर टांग कर कुसुमी मुझे नहाने के लिए पुकारती. पूजा की अलग व्यवस्था मिल जाती. पूजा निबटते-निबटते वह मैले कपड़े वॉशिंग मशीन के सुपुर्द कर नाश्ते की तैयारी में लग चुकी होती. रसोईघर में कुसुमी की घुसपैठ ने दोनों समय के भोजन बनाने के मेरे दायित्व को काट-छांटकर स़िर्फ सब्ज़ियां छौंकने और खाना परोसने तक समेट दिया था. अपने इसी गुण से कुसुमी मेरे मन में जगह बनाती चली गयी और मैं जान भी नहीं पायी कि नौकरानी बनकर घर में प्रविष्ट हुई कुसुमी कब मेरे लिए परिवार के सदस्य जैसी अपनी और आत्मीय बन गयी.

कुसुमी जिस दिन घर आयी, उसी दिन सुशान्त का सीपीएमटी का परीक्षाफल निकला. परीक्षा के दौरान सुशान्त के बीमार पड़ जाने के कारण हम उसकी सफलता के प्रति आशान्वित नहीं थे, पर वह चयनित हो गया था. अंधविश्‍वासी न होने के बावजूद मेरे मन में एक विश्‍वास घर कर गया

कि कुसुमी के पैर मेरे घर के लिए शुभ हैं. प्रसन्न मन:स्थिति में उपज आयी उदारता में मैंने उसे आश्‍वासन दे डाला, “मैं तेरे राजू को पढ़ाऊंगी.”

सुशान्त का जब एमबीबीएस पूरा हुआ तब मैं राजू को ‘क’ से कबूतर ‘ख’ से खरगोश पढ़ना सिखा रही थी. सुशान्त के छोटे पड़ गये कपड़ों से मैं बर्तन ख़रीदकर उकता चुकी थी. राजू के माध्यम से उनका सदुपयोग कर एक संतोष मिला. वह सुशान्त के स्कूल दिनों वाली ग्रे नीकर और स़फेद कमीज़ पहनकर पढ़ने बैठता तो कई बार मुझे लगता मेरे सामने बीस साल पहले का छोटा-सा सुशान्त आ बैठा है. उसके तेल चुआते बाल, मोटे काजल से आंजी आंखों और कडुए तेल से गंधाती देह से वितृष्ण हुए बिना मैं उसे सीने से चिपटा लेती. एक आध बार इन्होंने देखा, लगा, पसन्द नहीं आया. अकेले में समझाते हुए बोले, “देखो, नौकर-चाकर के प्रति मैं स्नेह-ममता का विरोधी नहीं हूं, पर इन भावों का मन में रहना ही अच्छा है, ऐसा खुला प्रदर्शन उचित नहीं.”

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“क्यों भला?” मैंने किंचित अप्रसन्नता से पूछा.

“इसलिए कि अगर कल यही बराबरी उसकी तरफ़ से हुई, तब तुम्हें ही गवारा नहीं होगा.”

हालांकि इनकी बात अपनी जगह सही थी, पर मुझे अच्छी नहीं लगी. चिढ़कर जवाब दिया, “आप पुरुष हैं, स्त्री होते तो जानते स्त्री की ममता भेदभाव नहीं जानती.”

इन्हें ग़ुस्से से अपनी ओर घूरता पाया तो जैसे और चिढ़ाती-सी बोली, “मैंने तो कहीं पढ़ा है कि जो व्यक्ति संगीत, फूल और बच्चों से प्यार नहीं करता वो…”

“ख़ून कर सकता है, यही ना.” इन्होंने ग़ुस्से से मेरा वाक्य पूरा किया.

“ठीक है, नौकरानी के लड़के को कलेजे से चिपका-चिपकाकर जब आपकी ममता तृप्त हो ले, तो मेरे कमरे में एक कप चाय भिजवा दीजिएगा.”

इसके बाद इस विषय पर इनकी ओर से कोई टिप्पणी नहीं हुई.

सुशान्त को डॉक्टर बने एक वर्ष पूरा होने को आ रहा था. कुलीन घर-परिवार का लड़का अगर काम पर लग जाये और सुदर्शन भी हो तो जाने किन बेतार के तारों पर तैरती हुई उसकी विवाह पात्रता की सूचना अविवाहित कन्याओं के पिताओं तक जा पहुंचती है. प्रस्तावों का तांता लग गया था. ढोलक की थाप पर गूंजते बन्ने की पृष्ठभूमि में  घोड़ी पर सेहरा बांधे सुशान्त की मनमोहक कल्पना करते हुए मैं तो अभी से मगन हुई जा रही थी. लेकिन मेरी ग़लतफ़हमी के नाज़ुक कांच को सुशान्त की वयस्कता के एक ही ऐलान ने फ़र्श पर पटक कर झन्न से चकनाचूर कर दिया, “मम्मी, तुम किसी जगह ‘हां’ मत कर बैठना. मेरी अपनी लाइकिंग है.”

बेटे की इस बेहिचक, बल्कि सच कहूं तो निर्लज्ज उद्घोषणा से हम मियां-बीबी आसमान से ज़मीन पर आ गए. और जब बेटे की ‘लाइकिंग’ को प्रत्यक्षत: देखा तब तो जैसे निष्प्राण ही हो गये. यह उसकी सुरूचि का अध:पतन था या सौंदर्य के नये मापदण्ड, हम समझ नहीं सके.

सुशान्त की पत्नी का तीखे नाक-नक्शों के बावजूद रंग गहरा सांवला था और चेहरे पर नाराज़गीभरी ऐसी शुष्कता व्याप्त थी, जो आमतौर पर पब्लिक डीलिंग का काम करनेवालों के चेहरे की स्थायी पहचान बन जाती है. पुरुषों जैसी ऊंचाई के साथ शरीर इतना दुबला था कि डॉक्टरनी ख़ुद ही रोगिणी होने का भ्रम पैदा करती थी. कहां अपनी अछूती सुन्दरता को घूंघट में ढंके, पलकें झुकाए, सकुचाए क़दमों से चलती आती पुत्रवधू की हमारी कोमल कल्पना और कहां इस छह फुटी विजातीय श्यामा की किसी विख्यात मॉडल जैसी दर्पीले आत्मविश्‍वास भरी एक बार बाएं दूसरी बार दाएं लचकती नि:संकोच चाल का कठोर यथार्थ. मैंने इसे अपनी नियति समझकर स्वीकार कर लिया.

शादी के दौरान मुझे कुसुमी की तबीयत ढीली होने की ख़बर मिली तो थी, पर मैं उसकी गम्भीरता का अनुमान नहीं लगा पायी थी. एक-दो बुखार की गोलियां देकर सोचा था मौसमी बुखार है, उतर जायेगा. मगर शादी निबटते-निबटते जब वह बिस्तर से जा लगी तो मुझे चिंता होने लगी. बुखार उतरने का नाम नहीं ले रहा था. जांचें हुईं, परिणाम देखकर मेरे तो पैरों तले धरती ही खिसक गयी. कुसुमी को रक्त कैंसर था.

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कुसुमी की बीमारी से मैं मानसिक रूप से बहुत परेशान थी. ऐसे में बहू का असहयोग मुझे और भी दुखी कर जाता. वह कुसुमी को सरकारी अस्पताल में भर्ती करवाने का कई बार मशवरा दे चुकी थी. उसकी तार्किक सोच में तनख़्वाह और नौकर का गणित एकदम साफ़ था. वेतन थमाते ही नौकर मिल जाने की सुविधा होते हुए भी नौकरानी की सेवा करना और नौकरानी भी वह, जिसे ठीक ही नहीं होना है, उसके लिए भावनात्मक मूर्खता थी. यह सच था कि कभी कुसुमी की ओर से चाकरी और मेरी तरफ़ से वेतन हमारे सम्बन्ध जोड़ने का पुल बना था. लेकिन आत्मीयता की बाढ़ में वह पुल तो कब का टूटकर बह चुका था. अब तो इस पार से लेकर उस पार तक केवल हार्दिकता का छलछलाता जल था. इसे मेरी बहू कभी समझ नहीं सकी.

इस तरह की छोटी-छोटी घटनाएं भविष्य के एकदम साफ़ संकेत दे रही थीं. लेकिन शायद सच स्वीकारने की हिम्मत न होने से मैं जान-बूझकर अनदेखी कर रही थी. ये मुझसे ़ज़्यादा दुनियादार हैं और कुशाग्र बुद्धि भी, इसलिए आगत को मुझसे कहीं ़ज़्यादा साफ़ देख रहे थे. पर इनका पुरुष अहं इन्हें दुख को स्वीकार नहीं करने दे रहा था. इसलिए ये दोहरी पीड़ा झेल रहे थे. अंदर दुख सहने की, बाहर छिपाने की. मैं तो फिर भी रसोईघर में मसाला भूनते हुए, कपड़े प्रेस करते हुए या मंदिर में रामायण पढ़ते हुए मौक़ा पाकर चोरी से रो लेती थी, पर ये गम्भीर मुद्रा और ख़ामोशी के आवरण तले भीतर का चीत्कार छिपाये रखते.

सुशान्त के विवाह को छह महीने हो चले थे. इन छह महीनों में बहू-बेटे ने हमें हर तरह से जता दिया था कि हमने उनके लिए स़िर्फ समस्याएं खड़ी की हैं. बहू-बेटे के मनोभाव भांप कर हालांकि ये किसी भी तरह की टोका-टाकी कब की छोड़ चुके थे, पर उस दिन पता नहीं कैसे भूल हो गयी. पार्टी से आधी रात गये लौटने पर इनका मामूली सवाल-जवाब दोनों की नाराज़गी का बहुत बड़ा कारण बन गया और उनके निर्मम प्रस्ताव की भूमिका भी. इसमें इन्होंने पुराने मुहल्ले के इस ‘ओल्ड ़फैशन्ड’ पुश्तैनी मकान को बेचकर नयी कालोनी में नये ढंग के मकान बनवाने की इच्छा प्रस्तावित की थी, जिसमें आने-जाने के दो स्वतंत्र रास्ते निश्‍चित रूप से हों, ताकि उनके देर-सबेर आने का अव्वल तो हमें पता ही न लगे और लग जाये तो आपत्ति का कोई आधार न हो.

उस दिन इनका संचित आक्रोश एक साथ फूट पड़ा. इनके शांत स्वभाव का उत्तेजना भरा यह नया रूप देखकर मैं तो सहम गयी.

“न ये मकान बिकेगा, न इसे छोड़कर हम कहीं जाएंगे. हां, तुम अपनी सुख-सुविधा के हिसाब से जहां चाहो जा सकते हो.” नपे-तुले शब्दों में दो टूक जवाब का पत्थर उनके मुंह पर मारकर जैसे ये ख़ुद ही आहत हो आए.

लगा, बहू-बेटे ने शायद इसी हरी झण्डी को पाने के लिए ही सारा उपक्रम रचा था. कुछ ही दिन बीते कि बहू ने खाड़ी देश में बसे अपने भाई का भेजा नियुक्ति पत्र हमारी विस्फारित आंखों के सामने लहरा दिया, जिसमें दोनों के लिए पैसा उगलती नौकरियों के आमंत्रण थे.

‘अपनी सुख-सुविधा के हिसाब से जहां चाहो जा सकते हो’ कथन कहने में जितना आसान था, उसकी वास्तविकता झेलना उतना ही मुश्किल था, लेकिन तीर कमान से निकल चुका था.

आनेवाला हर दिन कुसुमी और मौत का फ़ासला कम करता जा रहा था. सुशान्त की उड़ान को बीस दिन बचे थे, जब कुसुमी ने अन्तिम विदा ली. उसके अन्तर्मन की याचना शब्द विहीन होकर भी शून्य में टिकी उसकी आंखों की कातरता और सूखे होंठों की फड़फड़ाहट में पूरी तरह अर्थपूर्ण थी. मैंने उसकी दुबली हथेलियां थाम लीं. माथे पर स्नेह भरा हाथ फेर कर आश्‍वासन दिया, “मैं हूं न, तेरा राजू मेरी ज़िम्मेदारी है.”

मैंने तो बड़े आत्मविश्‍वास से राजू की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ली थी, पर मुझे क्या पता था कि मुझे परलोकवासी कुसुमी का अपराधी बनना पड़ेगा.

इनका व्यवहार अप्रत्याशित था, जैसे बेटे से मिले आघात का बदला निर्दोष राजू से ले रहे हों- “आख़िर तुम समझने की कोशिश क्यों नहीं करती? इस नासमझ बच्चे को किस हक़ से अपने साथ रखना चाहती हो?”

राजू को अपने साथ रखने में किसी हक़ की भी ज़रूरत पड़ सकती है, ये तो मैंने कभी सोचा ही नहीं था. कोई जवाब नहीं सूझा. सिटपिटाकर बोली, “जैसा कुसुमी को रखा था, वैसे ही राजू को भी रख लूंगी.”

“पागल हुई हो?” ये मेरे गैर दुनियादार रवैये पर झल्लाकर बोले, “नाबालिग बच्चा है. दस तरह के झंझट खड़े हो सकते हैं. कल किसी ने बच्चे को नौकरी पर रखने की झूठी रिपोर्ट दर्ज करा दी, तो जेल जाने की नौबत आ सकती है. रखा रह जायेगा सारा परोपकार.”

“फिर कहां रहेगा ये बेचारा?” पूछती हुई मैं अपनी लाचारी पर रो पड़ी.

“क्यों, मंगला… इसकी मौसी नहीं है? वहीं रहेगा.” ये कठोरता से बोले.

“आपके हाथ जोड़ती हूं, इसे मेरे साथ रहने दीजिए.” अनुनय में मैंने सचमुच ही हाथ जोड़ दिये.

“देखो, मैं कोई क़ानूनी झमेला नहीं चाहता.” कहते ही ये एक क्षण को रुके. इनका स्वर एकदम उतार पर आ गया, “एक धक्का खाकर अभी जी भरा नहीं, जो फिर नया नाता जोड़ने चली हो.” इनकी ओढ़ी हुई कठोरता की वजह मेरी समझ में आ रही थी.

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मंगला के चेहरे पर अनचाहा बोझ आ पड़ने का असंतोष साफ़ ज़ाहिर था. एक कोने में मासूम राजू सहमा खड़ा सब देख रहा था. मैं सामान के साथ मंगला को राजू का बस्ता भी थमाने लगी तो वह किंचित उकताकर बस्ता वापस करती हुई बोली, “बहूजी, ये पोथी-पत्तर तो आप ही रखो. हमारे घर में इसका कोई काम नहीं है.”

मेरा अनबूझा सवाल भांपकर ही शायद उसने जवाब दिया, “कल से अपने बड़े भाइयों के साथ गैराज के काम पर ये भी जाएगा.” अपने कहे को जायज़-सा ठहराती वह बोली, “क्या करें बहूजी, हम गरीबों के यहां तो जितने पेट हैं, उतने ही जोड़ी हाथ काम करें, तभी दाल-रोटी का जुगाड़ हो पाता है.”

मैंने राजू के नन्हे-मुन्ने हाथ देखे. जाड़ों में कुसुमी अक्सर दूध के जूठे भगौने की तली में चिपकी रह गयी मलाई कांछकर उसके हाथ-पैरों में मलती थी. कल से इन छोटी-छोटी उंगलियों में पेचकस, पाना और रिंच होंगे. कलेजे में मरोड़-सी उठी. मैंने उसे सीने से चिपटा लिया. माथा चूमकर भरे गले से बोली, “जब भी कोई ज़रूरत हो, बेहिचक चले आना.”

उदास आंखें लिये राजू ने ‘अच्छा’ के भाव से सिर हिला दिया.

मंगला के पीछे छोटे-छोटे क़दम रखकर जाते हुए राजू को मैं अपनी डबडबाई आंखों से ओझल होने तक देखती रही. कमरे में आकर हिलक-हिलककर रोई अपनी विवशता पर. जीवन में पहली बार ये मुझे बहुत बुरे लगे. कुछ दिनों के लिए हम दोनों में संवादहीनता की स्थिति उत्पन्न हो गयी, लेकिन जिस दिन बेटा-बहू रवाना हुए, इनकी हालत देखकर मैं सारा आक्रोश भूल गयी. संधि प्रस्ताव लेकर ख़ुद ही आगे बढ़ आयी. किसी अनहोनी के घटने का डर हो आया था मुझे. बहू-बेटे की पीठ फिरते ही इनके संयम का बांध भरभरा कर ढह गया था. इतना विचलित मैंने इन्हें कभी नहीं देखा था. भीतर से उमड़ता रुलाई का वेग रोकने की कोशिश में इनके होंठ कांप रहे थे. समूची देह हवा से झकझोर डाली गयी टहनी-सी हिल रही थी. सहारा देकर मैं इन्हें बिस्तर तक लायी और रोने का अवकाश देने के लिए झूठ बोलती पलट गयी, “हाय राम, आग लगे मेरी याद को, गैस पर दूध चढ़ा ही छोड़ आयी हूं.”

दूध का ग्लास और दवा की गोली लेकर जब मैं लौटी तो ये बाहर जा चुके थे. मालवीयजी के यहां ही गये होंगे, मैंने सोचा. उन्हीं के यहां इनका सुबह-शाम का उठना-बैठना था. तसल्ली हुई- चलो, कह-सुनकर मन हल्का कर आयेंगे. ये दोपहर के खाने तक नहीं लौटे, तो मैंने मालवीयजी के यहां फ़ोन किया. ये वहां गये ही नहीं थे. फिर कहां जा सकते हैं? सोचते-सोचते मुझे चिंता होने लगी. एक-एक करके सभी परिचितों के यहां फ़ोन मिला डाले. इनका कुछ पता नहीं चला. इंतज़ार करते-करते घड़ी की सुई चार को पार कर चली थी. अब मेरे हाथ-पैर ठण्डे पड़ने लगे. अर्द्धमूर्च्छित-सी मैं भगवान के सामने ढह पड़ी, “हे प्रभु, अनजाने में किये मेरे पापों का दण्ड उन्हें मत देना.”

तभी डोरबेल बजी, यही थे. क्रोध और रुलाई के आवेग में इतना ही कह पायी, “बता कर तो जाते.”

“फिर ये सरप्राइज़ कैसे देता?” कहने के साथ इन्होंने बोगनबेलिया की आड़ में छिपे राजू को खींचकर सामने कर दिया.

“क्या?” आनन्द और आश्‍चर्य के अतिरेक में मैं और कुछ बोल ही नहीं पायी.

“लो सम्हालो अपना राजू…” मेरे एक हाथ में राजू का हाथ पकड़ा कर, “और ये रहा तुम्हारा अधिकार पत्र.” कहते हुए इन्होंने मेरे दूसरे हाथ में एक लिफ़ाफ़ा थमा दिया. खोलकर देखा तो गोद लेने की क़ानूनी कार्यवाही के काग़ज़ थे. मैंने आभार और आनन्दभरी नज़रों से इनकी ओर देखा. इनकी आंखों में नटखट शरारत थी और होंठों पर सुशान्त की शादी के बाद पहली बार आयी मुस्कान. कुछ वैसी ही मीठी-सी, जैसी नवजात सुशान्त के माथे पर पहला चुम्बन रखते हुए आयी थी.

– निशा गहलोत

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कहानी- जीवन संध्या (Short Story- Jeevan Sandhya)

Short Story, Jeevan Sandhya, kahani

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“आप लोग आज की पीढ़ी के हैं. आपकी सभ्यता में प्रेम विवाह भी ख़ूूब हो रहे हैं. मेरे बेटे सुहास के कुछ दोस्त यहां आते हैं- अपने लिव इन पार्टनर्स के साथ. उनको तो कोई कुछ नहीं कहता, क्योंकि वे आपकी पीढ़ी हैं ना! लेकिन यहां सुधाजी और मैं जीवन संध्या के कगार पर खड़े हैं और आप लोगों के पास हमारे लिए आज कोई समय नहीं है. हमने अगर दोस्ती कर ली, तो आप क्यों परेशान हैं?”05

पार्क के एक कोने में बेंच पर विशालजी चुपचाप बैठे थे. चारों तरफ़ फूल खिले हुए थे, बच्चे खेलने में मग्न थे. शाम के साये लंबे होने लगे थे. एक ठंडी सांस खींचकर उन्होंने उठने की कोशिश की, पर फिर बैठ गए. विचारों के भंवर में एक बार फिर गोते लगाने लगे.

यह रिटायरमेंट उन पर भारी पड़ रहा था. पहले सुबह तैयार होकर ऑफिस चले जाते थे. सारा दिन कैसे कट जाता था, पता ही नहीं चलता था. टेलिफोन, मीटिंग, फाइलें, पार्टियां, क्लब- क्या नहीं था उनकी ज़िंदगी में. ठाठ ही ठाठ थे. समय कैसे भाग रहा था कुछ पता ही नहीं चलता था, लेकिन एक दिन अचानक जब पत्नी राधिका को दिल का दौरा पड़ा, तब यूं लगा मानो ज़िंदगी रुक-सी गई है. राधिका के जाने के बाद जीवन में खालीपन-सा आ गया. घर में बेटा सुहास व बहू लक्ष्मी, पोता रोहन और पोती रोहिणी सभी उनका बहुत ख़्याल रखते थे, परंतु रिटायरमेंट के बाद समय काटे नहीं कट रहा था.

बच्चे अपने स्कूल और सुहास व लक्ष्मी अपने-अपने ऑफिस चले जाते थे. उनके लिए तो बस ‘हाय पापा-बाय पापा’ से आगे बातों के लिए समय ही कहां था?

हां! उन्हें याद आया कि कॉलेज के दिनों में उनके प्रोफेसर रामदयाल अक्सर कहा करते थे, “बेटे, पढ़ाई तो ठीक है, बढ़िया नौकरी भी लग जाएगी, पर कुछ और भी सीखो, जैसे- संगीत, नाटक, पेंटिंग आदि, ताकि अपने खाली समय को भर सको.” ‘खाली समय’ विशालजी हंसते थे. खाली समय था किसके पास? वे तो चाहते थे कि दिन में कुछ और घंटे होते, तो एक आध काम और कर डालते.

फिर राधिका भी शायद ऐसा ही कुछ कहती थी, “आप परिवार में भी कुछ रुचि लिया करें. बच्चों के साथ रिश्ते बढ़ाएं. उनके साथ उठे-बैठें.” पर विशालजी को ये सब बातें खोखली लगती थीं. पर आज…

अब तक पेड़ों में पक्षियों की चहचहाहट बढ़ने लगी थी, शायद सभी रात के लिए ठिकाना ढूंढ़ रहे थे. उनके भी ख़्यालों की लड़ियां टूट गईं और वे भारी क़दमों से घर की ओर चल पड़े.

रोहन और रोहिणी पढ़ रहे थे. बीच-बीच में रोहिणी रोहन से कुछ पूछ भी लेती थी. रोहन कभी-कभी खीझ भी उठता था. विशालजी रोहिणी के पास गए और बोले, “मैं तुम्हारे होमवर्क में सहायता कर देता हूं.” वह हैरानी से उन्हें देखने लगी और फिर बोली, “नहीं दादाजी, मैं कर लूंगी या फिर भैया से पूछ लूंगी.”

विशालजी ने कहा, “मैं कराता हूं ना…”

वह फिर बोली, “नहीं, मां डांटेंगी. वे कहती हैं कि आपको हम तंग न

करें और आपके घर आने के बाद हमें बिल्कुल चुपचाप रहना चाहिए,

नहीं तो आप नाराज़ हो जाएंगे.”

विशालजी सकपका गए और वापस सोफे पर आकर बैठ गए. वे सुबह का बासी अख़बार देखने लगे. मन नहीं लगा, तो उन्होंने टीवी चलाया, लेकिन कोई भी प्रोग्राम पसंद नहीं आया और उन्होंने टीवी बंद कर दी. बच्चे होमवर्क कर अपने कमरे में जाकर टीवी देख रहे थे. उनके हंसी-मज़ाक में वे भी शामिल होना चाहते थे, पर ऐसा हो न सका.

नौकर ने आकर खाना लगाने के लिए पूछा, तो उन्होंने पूछा, “बच्चे भी खाएंगे?” नौकर ने बताया कि वे तो खा चुके हैं. उन्होंने सुहास और लक्ष्मी के बारे में पूछा, तो पता चला कि वे दोनों बाहर से खाकर आएंगे. उन्होंने खाना लगाने के लिए कह तो दिया, पर चाहकर भी वे खा न सके और दो ही कौर खाकर उठ गए. उन्हें राधिका की बहुत कमी महसूस हो रही थी. वे अपने कमरे में चले गए और कपड़े बदलकर लेट गए. लेटने पर भी नींद आंखों से कोसों दूर थी, बिस्तर पर करवटें बदलते रहे और फिर जाने कब उन्हें नींद आ गई.

सुबह जागने पर भी उठने का मन नहीं किया. उनके सामने सारा दिन पहाड़-सा खड़ा था. नौकर चाय रख गया. नहाकर निकले, तो बच्चे स्कूल जा चुके थे. सुहास और लक्ष्मी अभी नाश्ते के लिए आए नहीं थे. वे जाकर टेबल पर बैठ गए. पहले सुहास आया, बोला, “हाय पापा कैसे हैं?” जवाब के लिए रुके बिना अख़बार देखते हुए दूसरे हाथ में चाय का कप उठा लिया और चाय पीते हुए बोला, “आज बहुत काम है और कुछ ज़्यादा ही बिज़ी रहूंगा.” चाय ख़त्म करके बोला, “अच्छा मैं चलूं, बाय पापा…” सुहास के जाने के कुछ देर बाद लक्ष्मी आई. पांव छूते हुए बोली, “कैसे हैं पापा?” साथ ही नौकर को आवाज़ देते हुए बोली, “रामू, बड़े साहब से पूछकर खाना बना लेना. शाम को बच्चों की पसंद का भी कुछ ज़रूर बनाना. मुझे शायद लौटने में देर हो जाएगी. अच्छा पापा, मैं चलूं.” और वह भी चली गई.

अकेले रह गए विशालजी. सोचने लगे कि अब क्या करें? किसी से मिलने या फोन करने का मन भी नहीं कर रहा था. थक-हारकर पार्क की ओर ही निकल गए. पार्क में अधिकांश बूढ़े लोग ही थे, जिन्हें उनकी तरह ही कुछ करने को न था. वे आपस में बैठे बतिया रहे थे या टहलते हुए घूम रहे थे. एक बेंच पर एक भद्र महिला अधलेटी-सी बैठी थीं. विशालजी को लगा उनकी तबीयत शायद ठीक नहीं है. वे उनके पास चले गए. उनके पुकारने पर महिला ने आंखें खोलीं. उनकी आंखें लाल थीं. विशालजी को लगा कि उन्हें तेज़ बुख़ार है. पूछने पर ज़रा-सा सिर हिलाकर उन्होंने हामी भरी. विशालजी ने उनका हाथ छूकर देखा, तो तेज़ बुख़ार लगा.

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पूछने पर पता लगा कि इस समय उनके घर पर कोई नहीं है, लेकिन बुख़ार के कारण उनका मन घबरा रहा था, इसलिए वे पार्क में आ गई थीं. किसी तरह सहारा देकर विशालजी उन्हें घर ले गए.

उनका नाम सुधा था. घर का ताला खोलकर वे अंदर गए. विशालजी ने सुधाजी को सोफे पर लेटा दिया. उन्होंने पूछा, “घर में कोई बुख़ार की दवा है?” सुधाजी ने कहा, “रसोई की आलमारी में है.” वे रसोई में गए. आलमारी से दवा निकाली. पानी का ग्लास भर रहे थे, तो सोचा कि चाय बना ली जाए, तो ज़्यादा अच्छा रहेगा.

चाय के लिए नापकर दो कप पानी पतीले में डाला, पर गैस उन्होंने आज तक नहीं जलाई थी. उन्हें याद आया कि राधिका अक्सर कहा करती थी कि कम से कम गुज़ारे लायक चाय, खिचड़ी इत्यादि ही बनाना सीख लो. कौन जाने कब काम आएगी, पर तब वे हंस देते थे.

हारकर पानी और दवा लेकर वे बैठक में आ गए. उन्होंने सहारा देकर सुधाजी को उठाया और दवा देते हुए बोले, “सॉरी, चाय नहीं बना पाया, कभी बनाई ही नहीं है. राधिका कहा करती थी… पर ख़ैर! छोड़ो. दवा खा लो.”

सुधाजी ने पानी के साथ दवा ले ली. थोड़ी देर बाद उन्हें जब कुछ राहत महसूस हुई, तो उन्हें ख़्याल आया कि मेहमान को चाय तो पिलानी चाहिए. विशालजी के लाख मना करने पर भी वे चाय बनाने के लिए उठ ही गईं. थोड़ी देर में वे दो कप चाय और कुछ मठरियां लेकर आ गईं. विशालजी को शर्मिंदगी महसूस तो हुई, पर उन्होंने चाय और मठरी ले ली.

चाय पीकर सुधाजी की तबीयत कुछ और संभली, तो दोनों बातें करने लगे. विशालजी ने उन्हें अपने परिवार के बारे में बताया. फिर सुधाजी ने बताया कि वह अपनी बेटी-दामाद और दो नातिनों के साथ रह रही हैं. उनके पति का बरसों पहले देहांत हो गया था. बेटी-दामाद काम पर जाते हैं और नातिन कॉलेज. सब अपनी ज़िंदगी में मस्त हैं. किसे ़फुर्सत है उनके लिए? वह घर चलाती हैं, गृहिणी की तरह या फिर नौकर की तरह, वे नहीं जानतीं? सब उन पर निभर्र्र रहते हैं. पहले तो उनको अच्छा लगता था, पर अब वे थक गई हैं. सब अधिकार से बोलते हैं. प्यार या इ़ज़्ज़त जैसी कोई भावना अब कहीं नज़र नहीं आती है. किसी के पास छुट्टी के दिन भी उनके लिए कोई समय नहीं होता है.

लेकिन अचानक सुधाजी को लगा कि एक अजनबी के साथ इस तरह बातें करना उचित नहीं है, वे रुक गईं और माफ़ी मांगने लगीं. इस पर विशालजी बोले, “सुधाजी, माफ़ी न मांगें. शायद मेरे भी दिल में कुछ ऐसे ही फफोले हैं. हम दोनों के हालात एक जैसे ही हैं, फिर शरमाना कैसा? चलो बात करके आपका मन कुछ तो हल्का हुआ.”

सुधाजी ने उन्हें खाने के लिए रोकना चाहा, पर वे रुके नहीं और लौट आए.

दूसरे दिन पार्क में विशाल बैठे थे, तो दूर से देखा कि सुधाजी आ रही थीं. वे सीधी उनके पास ही चली आईं और पिछले दिन के लिए धन्यवाद देने लगीं. फिर वे दोनों बैठकर बातें करने लगे.

फिर तो यह सिलसिला सुबह-शाम चलने लगा और धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे का इंतज़ार भी करने लगे. कभी-कभी पास के रेस्टॉरेंट में वे दोनों चाय भी पीने चले जाते थे. एक दिन सुधाजी ने उन्हें अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया. वे मान गए. सुधाजी ने उनकी पसंद के आलू के परांठे बनाए थे. खाते हुए उन्हें पत्नी राधिका की याद आ गई.

कुछ दिन विशालजी पार्क नहीं गए, क्योंकि उन्हें कुछ हरारत-सी महसूस हो रही थी. तब दो-तीन दिन बाद सुधाजी उनका हाल पूछने उनके घर चली आईं. विशालजी ने नौकर से कहकर चाय बनवाई और बाद में सुधाजी को खाने के लिए भी रोक लिया.

समय इसी तरह बीत रहा था. एक शाम जब वे पार्क में घूम रहे थे, तभी रोहन दादाजी को ढूंढ़ता हुआ वहां आया और बोला, “दादाजी, रोहिणी की नाक से ख़ून बह रहा है. जल्दी घर चलो.”

वे बदहवास-से घर की ओर चले, तो सुधाजी भी उनके साथ हो लीं. सुधाजी ने रोहिणी की नाक धुलाई, उसका सिर गीला किया और सिर पीछे करके उसे कुर्सी पर बैठा दिया. थोड़ी देर में ख़ून बहना बंद हो गया, तो विशालजी ने चैन की सांस ली. बच्चों ने सुधाजी के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा, “ये सुधा आंटी हैं. मेरी मित्र हैं. यहीं पास में रहती हैं.” चाय पीकर और कुछ देर बच्चों से खेलकर सुधाजी चली गईं.

जब कुछ दिनों बाद बच्चे सुधाजी से दुबारा मिले, तो विशालजी ने बच्चों से कहा, “बेटा, आंटीजी को नमस्ते करो.” तो रोहन ने तो नमस्ते कर दिया, पर रोहिणी ने कहा, “नमस्ते दादी.”

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विशालजी को लगा कि सुधाजी को शायद बुरा लगा है, इसलिए उन्होंने रोहिणी से ऐसा कहने का कारण पूछा तो वह बोली, “मां ने कहा था कि ये सुधा आंटी नहीं, सुधा दादी हैं.” सुधाजी चुपचाप वहां से चली गईं.

शाम को लक्ष्मी के घर लौटने पर विशालजी ने उसे सारी बात बताई और इसका कारण पूछा. उसने यह भी बताया कि सुधाजी को बुरा लगा था, पर लक्ष्मी ने कुछ नहीं कहा. रात को विशालजी ने सुहास को बताया, तो वह भी चुपचाप ही रहा.

अगले दिन सुधाजी पार्क में नहीं आईं. उसके अगले दिन भी जब वे नहीं आईं, तो विशालजी उनके घर गए. वे उन्हें देखकर परेशान-सी हो गईं. बहुत पूछने पर वे रो ही पड़ीं और बोलीं, “मेरी नातिनें भी आपके बारे में ‘नानी का बूढ़ा बॉयफ्रेंड’ कहकर मज़ाक करती हैं. मुझे बुरा लगता है और मैं उन्हें डांट देती हूं. पर रोहिणी की बातों…”

विशालजी को भी ये बातें चुभ रही थीं. उन्होंने सुधाजी को विश्‍वास दिलाया कि वे इस समस्या का कुछ न कुछ समाधान निकालेंगे. उन्होंने कुछ दिन का समय मांगा. दो-तीन दिन सोचने के बाद वह सुधाजी के घर गए. उन्होंने सुधाजी को आनेवाले शनिवार को परिवारसहित शाम को पांच बजे चाय के लिए आमंत्रित किया. सुधाजी तो बिल्कुल मान नहीं रही थीं, पर फिर यह समझाने पर कि ‘वे दोनों कब तक घरवालों के ताने सुनते रहेंगे,’ वे मान गईं.

लक्ष्मी और सुहास को भी विशालजी ने शनिवार शाम को घर पर ही रहने को कहा और बताया कि कुछ ख़ास मेहमान चाय पर आ रहे हैं.

शनिवार की शाम को दरवाज़े की घंटी बजी और सुधाजी का परिवार अंदर आया, तो लक्ष्मी की व्यंग्यपूर्ण मुस्कान विशालजी से छिपी न रह सकी. परिवार के लोगों का आपस में परिचय करवाकर जब बैठाया गया, तब वातावरण बहुत बोझिल-सा था. ख़ैर, चाय-नाश्ता आ जाने पर माहौल कुछ हल्का-फुल्का नज़र आने लगा.

चाय समाप्त होने पर विशालजी ने रोहिणी वाला क़िस्सा सुनाया. फिर से कमरे में चुप्पी छा गई. उसके बाद सुधाजी ने अपनी नातिनों का कहा दोहराया, तो उनके परिवार में बहुत अकुलाहट-सी दिखने लगी. वातावरण फिर से बोझिल हो गया.

तब विशालजी ने कहा, “आप लोग आज की पीढ़ी के हैं. आपकी सभ्यता में प्रेम विवाह भी ख़ूूब हो रहे हैं. मेरे बेटे सुहास के कुछ दोस्त यहां आते हैं- अपने लिव इन पार्टनर्स के साथ. उनको तो कोई कुछ नहीं कहता, क्योंकि वे आपकी पीढ़ी हैं ना! लेकिन यहां सुधाजी और मैं जीवन संध्या के कगार पर खड़े हैं और आप लोगों के पास हमारे लिए आज कोई समय नहीं है. हमने अगर दोस्ती कर ली, तो आप क्यों परेशान हैं? हम दो-चार बातें करके आपस में हंस-बोल लेते हैं, तो आपको ऐतराज़ होता है. आप हमारे रिश्ते को शायद अश्‍लील समझते हैं और आप हमसे इस रिश्ते का नाम जानना चाहते हैं, तो आज मैं आप सभी को बताता हूं कि हम दोस्त हैं. लेकिन आपकी नज़र में हम गुनाह कर रहे हैं, क्योंकि मैं एक पुरुष हूं और सुधाजी एक स्त्री हैं. मैं जानता हूं कि आपके मित्रों और सहयोगियों में स्त्री और पुरुष दोनों ही हैं. आप उनके साथ हंसते और बोलते भी हैं, तो मैं आपसे पूछता हूं कि आपका रिश्ता उनसे क्या केवल दोस्ताना ही है या उससे कुछ ज़्यादा?”

कमरे में फिर एक अजीब-सा तनाव छा गया. सभी के सिर झुके हुए थे. अपने चारों ओर निगाहें घुमाकर देखने के बाद विशालजी ने फिर कहना शुरू किया, “सच तो यह है कि हम इस घुटी-बंधी ज़िंदगी से तंग आ गए हैं. आपको ऐतराज़ हमारी दोस्ती से है, तो आज और अभी मैं इस घर को, जिसे मैंने बनाया था, छोड़कर जाने के लिए तैयार हूं. सुधाजी अगर चाहेंगी, तो वे भी मेरे साथ आ सकती हैं, क्योंकि हम भी जीना चाहते हैं. हमें भी जीने का हक़ है.”

कुछ रुककर वे आगे बोले, “मैं आप पर फैसला छोड़ रहा हूं, पर यह फैसला मैं आज और अभी सुनना चाहता हूं.”

कमरे की चुप्पी को तोड़ती हुई कई आवाज़ें एक साथ आईं “पापा…” “मां…” “नानी…” फिर कमरा गूंज उठा, “हमें माफ़ कर दीजिए. हमने आप दोनों को बहुत दुख दिया है, पर आप हमें छोड़कर जाने की बात न करें.”

– राजेश्‍वरी सिंह

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