Tag Archives: hindistory

कहानी- खाली कमरे के मेहमान (Short Story- Khali Kamare Ke Mehman)

Hindi Kahani

“पागलोंवाली बात है तो पागलोंवाली ही सही. जानते हैं पापाजी, जब मैंने यूएस की अपनी अच्छी-ख़ासी नौकरी छोड़ अपने माता-पिता के साथ रहने के लिए भारत आने का निर्णय लिया, तो वहां भी सबने मुझे यही कहा कि मैं पागलोंवाली बात कर रहा हूं, मगर मैं जानता था कि मैं जो कर रहा हूं, सही कर रहा हूं.”

पुणे शहर के कोलाहल और प्रदूषण को पीछे छोड़ कार तेज़ी से आगे बढ़ रही थी. जैसे ही सुधाकर को छोटी-छोटी पहाड़ियों और हरियाली के दर्शन शुरू हुए, उन्होंने विंडो ग्लास नीचे कर गहरी सांस इस तरह से खींची जैसे एक ही सांस में पूरे वायुमंडल को अपने फेफड़ों में भर लेना चाहते हों.

“बेटा, एसी बंद कर दो. अब उसकी ज़रूरत नहीं. देखो तो बारिश की हल्की फुहार से आबोहवा में कैसी सोंधी महक घुल गई है. वाह! तबीयत हरी-भरी हो गई.” उन्हें यूं प्रसन्न देख पत्नी सुमन भी मुस्कुराईं.

“तुम्हारे रेडियो में विविध भारती नहीं है क्या?” मौसम सुहावना होता देख उन्होंने एफएम सुन रहे रवि से चैनल बदलने की फ़रमाइश कर डाली. गाना ट्यून हुआ ‘मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया…’,

“वाह! सोने पे सुहागा. मैं ज़िंदगी का साथ…” वे सुमन को देखते हुए गाने के साथ गुनगुनाने लगे. दोनों एक-दूसरे की आंखों में झांककर मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे. आंखों में बेटे द्वारा दिए जानेवाले सरप्राइज़ गिफ्ट का कौतूहल था. कुछ समझ नहीं आ रहा था कि कहां ले जाए जा रहे हैं, फिर भी वे दोनों आनंदित थे.

एक सरकारी महकमे से रिटायर्ड क्लर्क सुधाकर बड़े आदर्शवादी थे. भले ही कितने  अभाव रहे हों, उन्होंने कभी ऊपर की कमाई स्वीकार नहीं की. ऐसे धन को हाथ लगाना भी उनके लिए पाप था. अपनी तीनों संतानों- बड़े बेटे निपुण, बेटी सारिका और छोटे बेटे प्रणव की सीमित संसाधनों में बड़ी मितव्ययिता से परवरिश की थी उन्होंने. जब उनके सहकर्मी रिश्‍वत की कमाई से अपने घर बना रहे थे, तो वे दो कमरों के छोटे से किराए के घर में ही संतुष्ट थे.

सुधाकर के सहकर्मी अक्सर उन्हें उलाहना देते, “ऊपर का तू लेता नहीं और जो तेरी गाढ़ी कमाई है, वह हैसियत से बढ़कर बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर ख़र्च कर रहा है, तो तेरे बुढ़ापे के लिए क्या बचेगा?”

वे बड़ी उम्मीद और आत्मविश्‍वास से सिर उठाकर कहते, “मेरे बच्चे पढ़-लिख गए, तो वे ही मेरे लिए घर बना देंगे. मुझे पाप की कमाई से बना घर नहीं चाहिए.” उनकी आदर्शवादी बातों का ऑफिस में जमकर मखौल उड़ाया जाता, मगर वे ज़रा भी विचलित नहीं होते. उनकी पत्नी सुमन ने भी घर और बच्चों को कुछ इस तरह से संभाला था कि भले ही कुछ जोड़ नहीं पाए, मगर समय के साथ सब ज़िम्मेदारियां सहजता से पूरी होती चली गई थीं.

आज की तारीख़ में निपुण और उसकी पत्नी ईला, दोनों अमेरिका में सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे. उसके दो किशोरवय बच्चे थे. सारिका नागपुर के एक कॉलेज में बॉटनी की लेक्चरर थी. वह भी अपने पति और बेटे के साथ सुखी जीवन व्यतीत कर रही थी. छोटे बेटे प्रणव की मुंबई में रिक्रूटमेंट कंसल्टेंसी फर्म थी, जिसमें उसकी पत्नी रागिनी भी उसका सहयोग करती थी. तीनों बच्चों के डाली-पत्ते लगने के बाद पुणे में दोनों पति-पत्नी अकेले रह गए थे. निपुण और प्रणव ने न जाने कितनी बार उन्हें अपने साथ शिफ्ट हो जाने को कहा, मगर अपने पुराने शहर का मोह क्या छूटता है कभी. सो दोनों पुणे छोड़ कहीं और जाने को तैयार न थे. साल में एक बार सभी बच्चे मिलने आ जाते. फोन पर तो बात होती ही रहती. बस, वे दोनों इसी से संतुष्ट थे.

सुधाकर और सुमन, दोनों मानकर बैठे थे कि अब वे ही एक-दूसरे के बुढ़ापे का सहारा हैं. मगर छह महीने पहले निपुण ने एक अप्रत्याशित निर्णय सुनाया कि वह सालभर के अंदर-अंदर पुणे शिफ्ट हो जाएगा और उन लोगों के साथ ही रहेगा. पहली बार में उनको बेटे की बात पर विश्‍वास नहीं हुआ. सोचा, वह भला अपनी इतनी अच्छी नौकरी और लक्ज़री लाइफ छोड़ वापस भारत क्यों आने लगा? और बात स़िर्फ अकेले उसकी नहीं थी, उनके दोनों बच्चे अमेरिका में पढ़ रहे थे. ईला भी जॉब करती थी. ऊपर से ईला की तो इकलौती बहन भी उसी के शहर में रहती थी, फिर वह क्यों आने लगी सब छोड़-छाड़कर?

दोनों ने इसे क्षणिक भावावेश मानकर बात आई-गई कर दी. मगर आज सुबह सुमन के 68वें जन्मदिन के अवसर पर निपुण का पुनः फोन आया, “पापा-मम्मी, शाम चार बजे तैयार रहना. मेरा दोस्त रवि आएगा आपको लेने के लिए, आपको उसके साथ कहीं जाना है. कहां जाना है यह सरप्राइज़ है. दरअसल, आपका सरप्राइज़ गिफ्ट है.” अब बेटे ने जो करने को कहा, वह उन्होंने किया. रवि आया और उन्हें कार में बैठाकर ले गया. वह सफ़र अभी भी जारी था.

यह भी पढ़ेबेहतर रिश्तों के लिए करें इन हार्मोंस को कंट्रोल (Balance Your Hormones For Healthy Relationship)

“बेटा, अब तो बता दो कहां ले जा रहे हो, बड़ी देर हो गई है चले हुए?” व्याकुल सुधाकर ने पुनः पूछा.

“बस, अंकलजी आ गया.” कहते हुए रवि ने एक बड़े-से घर के सामने कार रोक दी. “आंटीजी, ये घर देख रही हैं ना आप, यही है आपका बर्थडे गिफ्ट. ये आलीशान डुप्लेक्स घर, आपके बेटे की तरफ़ से.” रवि ने जब उस घर की ओर इशारा करते हुए कहा, तो दोनों को विश्‍वास ही नहीं हुआ. ‘ज़रूर इसे समझने में कोई ग़लती हुई है, इतना बड़ा घर… कोई मज़ाक है क्या…’ दोनों विस्मित से एक-दूसरे की ओर देखने लगे.

“रुको बेटा, मैं निपुण को फोन लगाता हूं. तुम्हें ज़रूर कुछ ग़लतफ़हमी हुई है.” वे कह ही रहे थे कि ख़ुद निपुण का फोन आ गया.

“कहिए पापा, कैसा लगा सरप्राइज़ गिफ्ट? अंदर से देखा क्या? रवि के पास चाबी है, वह आपको दिखा देगा.” निपुण की बात सुन सुधाकर स्तब्ध रह गए. सुमन को आंखों ही आंखों में कहा, रवि सही कह रहा है.

“मगर बेटा ये…”

“अगर-मगर कुछ नहीं पापा, ये घर मैंने ख़रीदा है. इंडिया शिफ्ट होने के बाद हम सब यहीं रहेंगे. आप उस घर के मालिक हो, मालिक की तरह अंदर जाना. चलिए पापा, कुछ ज़रूरी काम है, बाद में फोन करता हूं. घर देखकर बताइएगा कैसा लगा.” कहकर निपुण ने फोन रख दिया.

‘मालिक की तरह.’ सुधाकर अभिभूत हो उठे. कानों में बरसों पुराने साथियों की फ़ब्तियां गूंजने लगीं, ‘देखा, मैं ना कहता था, मेरा घर मेरे बच्चे बना देंगे.’ वे पुनः बुदबुदाए. कितना सुखद क्षण था वह उनके जीवन का. पूरी उम्र की तपस्या का जैसे आज फल मिला था. उस फल को चखने दोनों सधे क़दमों से घर के अंदर दाखिल हुए.

“अंकलजी, इस घर के इंटीरियर का काम निपुण ने मुझे ही सौंपा है. यह काम मुझे चार महीनों में पूरा करना है, वह चाहता है आपकी शादी की सालगिरह पर गृहप्रवेश हो जाए. तब तक वह भी यहां शिफ्ट हो जाएगा.”

“मगर बेटा यहां आकर करेगा क्या, हमें तो कुछ नहीं बताया, तुम्हें कुछ पता है क्या?”

“ज़्यादा कुछ तो नहीं, मगर कह रहा था यहां आकर अपनी एक कंपनी खोलना चाहता है. दोनों पति-पत्नी एक ही फील्ड में हैं, मिलकर चला लेंगे. बच्चे तो वैसे भी अगले साल से अमेरिका के एक हॉस्टल में रहेंगे.”

“अच्छा, ऐसी बात है.” सुधाकर घर का निरीक्षण करते हुए बोले.

“अंकलजी, यहां नीचेवाले फ्लोर पर तीन कमरे हैं. तीन कमरे ऊपर हैं. ऊपरवाला हिस्सा निपुण का है. एक-एक कमरा दोनों बच्चों का और एक उनका है. नीचे का यह कमरा आपका है.”

“इतना बड़ा कमरा!” सुमन की आंखें चौंधिया गईं. इतनी बड़ी जगह में तो अब तक उसने पूरे परिवार को पाला था.

“और बाकी दो कमरे?” सुधाकर ने पूछा.

“इनमें एक गेस्टरूम है, बाकी दूसरा आपके कमरे जितना ही बड़ा है, इसे भी निपुण ने आपके कमरे जैसा ही तैयार करने को कहा है, पर यह किसका है, मुझे नहीं पता.” रवि ने कहा.

नीचे के कमरों के बाहर बरामदा और उससे आगे बड़े-से लॉन के लिए भी जगह थी.

“आंटीजी, लॉन की एक साइड में आपके लिए मंदिर बनेगा. उसे मैं आपसे डिज़ाइन अप्रूव कराकर ही बनवाऊंगा.” सुनकर सुमन के चेहरे पर बच्चों जैसी ख़ुशी दौड़ पड़ी. वह मन ही मन अपने लायक बेटे की बलाइयां ले रही थीं, जिसने उनका इतना ध्यान रखा था.

“पूरे घर को अच्छे से देख-परख दोनों मंत्रमुग्ध से घर की ओर लौट पड़े. नया आलीशान घर, घर के पीछे दिखती पहाड़ियां और हरियाली… और सबसे बड़ी बात, उस घर में उनके बेटे-बहू उनके साथ रहनेवाले थे. उनके बुढ़ापे का सहारा बननेवाले थे. आज उनके पैर ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे. वे स्वयं को दुनिया के सबसे ख़ुशनसीब माता-पिता मान रहे थे.

यह भी पढ़ेलघु उद्योग- चॉकलेट मेकिंग- छोटा इन्वेस्टमेंट बड़ा फायदा (Small Scale Industry- Chocolate Making- Small Investment Big Returns)

घर पहुंचकर सुमन चाय ले आई, मगर सुधाकर अभी भी जैसे उसी घर में चक्कर लगा रहे थे. “अकेले बैठे क्या सोच मुस्कुरा रहे हैं मकानमालिक साहब.” पत्नी के मुंह से यह नया संबोधन सुनकर सुधाकर गर्वित हो उठे.

“सच सुमन, सब कुछ एक सपने जैसा लग रहा है. निपुण का यहां आना, हमारे साथ रहने के लिए नया घर लेना, मुझे मालिक कहना, बड़ा अजीब लग रहा है. अभी तक तो हमेशा किराएदार ही बनकर रहा हूं.”

“तो अब मालिक बनने की आदत डाल लीजिए. मैं तो पहले ही कहती थी, हमारे बच्चे लाखों में एक हैं, नए ज़माने की हवा उन्हें नहीं लगी. आपने हमेशा उनका कितना ख़्याल रखा, अब उनकी बारी है. वैसे मानना पड़ेगा, हमारी बहू ईला भी लाखों में एक है, वरना आज के ज़माने में अपनी जमी-जमाई गृहस्थी छोड़ सास-ससुर के साथ रहने कौन बहू आती है. उसने हमें हमेशा ही अपने माता-पिता जैसा आदर दिया है.”

“वो तो है. अच्छा एक बात बताओ, वो हमारे साथवाला कमरा किसके लिए रख छोड़ा है निपुण ने? रवि ने भी कुछ नहीं बताया.”

“और किसके लिए होगा, प्रणव के लिए ही होगा, बहुत प्यार करता है वह अपने छोटे भाई से. सोचा होगा, जब भी वह मुंबई से आएगा, अपने कमरे में ही रुकेगा.”

सुमन पूरे आत्मविश्‍वास से बोली.

“पता नहीं क्यों मुझे लगता है वह कमरा सारिका के लिए है. याद है ना पिछले रक्षाबंधन पर जब दोनों मिले थे, निपुण ने उसे कहा था, अगली बार तुझे ऐसा गिफ्ट दूंगा, हमेशा याद रखेगी.” सुधाकर कुछ सोचते हुए बोले.

“हां, कहा तो था, पर फिर भी मुझे लगता है प्रणव का ही होगा. बेटियां तो

दो-चार दिन के लिए मायके आती हैं और फिर उसके लिए गेस्टरूम तो है ही. हो सकता है निपुण की योजना हो कि यहां आकर वह प्रणव को भी मुंबई से यहां अपने पास बुला लेगा और दोनों भाई साथ मिलकर कुछ काम कर लेंगे. इस तरह से पूरा परिवार एक साथ रह सकेगा.”

“हां, तुम्हारी बात में दम तो है. हो सकता है ऐसा ही हो.” सुधाकर बोले.

“हो सकता है नहीं, बल्कि सौ प्रतिशत ऐसा ही है, तुम देख लेना.” सुधा ने भविष्यवाणी कर दी थी.

देखते-देखते पांच महीने गुज़र गए. नए घर का इंटीरियर पूरा हो गया था. आज गृहप्रवेश की पूजा थी, अतः उसे फूलों और झालरों से ख़ूब सजाया गया था. निपुण, प्रणव, सारिका तीनों सपरिवार आ चुके थे. सारिका के सास-ससुर, बहू ईला, रागिनी के माता-पिता, और बाकी सभी मेहमान भी आ चुके थे. पूजा के बाद प्रीतिभोज का आयोजन था. गृहप्रवेश की पूजा संपन्न हुई. सुमन ने बहू ईला और रागिनी के साथ घर में विधिवत् प्रवेश किया. पूरा घर खुला था सिवाय उस एक बंद कमरे के जिसका कौन मेहमान है, यह अभी भी मिस्ट्री थी. उस कमरे के दरवाज़े पर लाल रिबन लगा हुआ था. सभी निपुण से पूछ रहे थे, ‘अभी तो बता दो कि यह सुंदर कमरा किसके लिए सजा है.’ मगर वह चुप था. सुधाकर धीरे से सुमन के कान में फुसफुसाए, “हमें पता है इसका सरप्राइज़, इस रिबन को यह अपने छोटे भाई के हाथ से ही कटवाएगा.” और मुस्कुरा उठे. सुमन भी दोनों बेटों के साथ रहने की कल्पना से आह्लादित थी.

तभी निपुण ने सबको इकट्ठाकर एक उद्घोषणा शुरू की. “आज सुबह से सभी मुझसे एक ही सवाल पूछ रहे हैं, यह लाल रिबन लगा कमरा किसका है? आप सभी को यह जानने की बड़ी उत्सुकता है कि आख़िर इस खाली कमरे का मेहमान कौन है, माफ़ कीजिए मेहमान नहीं, बल्कि मालिक कहना चाहिए. कौन है जो इसमें हमारे साथ रहेगा, तो अब मैं इस रहस्य से पर्दा उठाता हूं, वे हैं मेरे दूसरे मम्मी-पापा यानी मेरे आदरणीय सास-ससुर. यह कमरा उन्हीं के लिए बना है और आज मैं उन्हीं को समर्पित करता हूं. मैं उनसे विनती करता हूं कि वे आएं और इस रिबन को काटकर इस कमरे में गृहप्रवेश करें.”

यह सुनते ही सबके मुंह खुले के खुले रह गए. निपुण की इस योजना की ख़बर तो ईला को भी नहीं थी, वह भी इस उद्घोषणा से स्तब्ध रह गई… और सुधाकर एवं सुमन.., उन्होंने तो यह कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि निपुण ऐसा कुछ भी कर सकता है. ‘बेटी के माता-पिता कब उसकी ससुराल आकर रहते हैं, चलो कुछ दिनों के लिए आ भी गए, मगर मेहमान बनकर ही आते हैं और मेहमानों की तरह चले जाते हैं. मालिक की तरह हक़ से तो कभी नहीं रहते. और क्या ये अच्छा लगता है? लोग क्या कहेंगे? ये सब अमेरिका में चलता होगा यहां नहीं, दुनिया क्या कहेगी?’ सुमन के भीतर स्वसंवादों की लहर दौड़ रही थी. ‘इसे अकेले में ले जाकर समझाना पड़ेगा…’ वह सोच ही रही थी कि ईला के माता-पिता स्वयं निपुण का विरोध करने लगे.

“ये क्या कह रहे हो बेटा, हम यहां कैसे रह सकते हैं. ये हमारी बेटी का ससुराल है.”

“क्यों नहीं रह सकते पापाजी? एक तरफ़ तो आप मुझे बेटा बोल रहे हैं और दूसरी तरफ़, कैसे रह सकते हैं, सोच रहे हैं. इस घर में जैसे मेरे माता-पिता रहेंगे, वैसे ही आप दोनों रहेंगे. जिस हक़ से वे रहेंगे, उसी हक़ से आप भी रहेंगे. ये खाली मेरा ही नहीं, आपकी बेटी का भी घर है.”

“ये तो तुम बिल्कुल पागलोंवाली बातें कर रहे हो, ऐसा भी कभी होता है क्या, ईला तुम ही समझाओ अपने पति को.” सुमन को लगा जैसे उनके समधी ने उसके मुंह की बात छीन ली. वह मन ही मन ख़ुश हुई.

“पागलोंवाली बात है तो पागलोंवाली ही सही. जानते हैं पापाजी, जब मैंने यूएस की अपनी अच्छी-ख़ासी नौकरी छोड़ अपने माता-पिता के साथ रहने के लिए भारत आने का निर्णय लिया, तो वहां भी सबने मुझे यही कहा कि मैं पागलोंवाली बात कर रहा हूं, मगर मैं जानता था कि मैं जो कर रहा हूं, सही कर रहा हूं. मैंने अपने पापा से और आपसे भी कितनी बार कहा हमारे पास आ जाओ, मगर आप नहीं माने. अब आप लोगों की उम्र हो चली है. आए दिन कुछ-न-कुछ बीमारी लगी रहती है. मैं और ईला वहां बैठे-बैठे कुछ नहीं कर सकते. मेरे पैरेंट्स की देखरेख करने के लिए तो फिर भी यहां प्रणव और सारिका हैं, मगर आपकी तो दोनों ही बेटियां बाहर हैं. आपको तो यहां देखनेवाला कोई नहीं, इसलिए मैंने सोचा, क्यों न आप भी हमारे साथ ही रहें. इस तरह से मैं और ईला अपने दोनों पैरेंट्स का ख़्याल रख पाएंगे.”

यह भी पढ़ेमन की बात लिखने से दूर होता है तनाव (Writing About Your Emotions Can Help Reduce Stress)

“लेकिन बेटा, दुनिया क्या कहेगी? हमें उलाहना देगी कि कैसे मां-बाप हैं, बेटी की ससुराल आकर पड़ गए?”

“दुनिया तो तब भी कुछ न कुछ कहेगी, जब आपके यहां न आने की स्थिति में मैं ईला को आपके पास छोड़ दूंगा. फिर वही दुनिया कहेगी कि शादी के इतने सालों बाद बेटी मायके आकर पड़ गई. अब निर्णय आपके हाथों में है. यह तो तय है कि इस उम्र में मैं अपने दोनों पैरेंट्स को अकेले रहने के लिए नहीं छोड़ूंगा. या तो आप यहां आएंगे या हम दोनों में से कोई एक आपके साथ रहेगा, निर्णय आपके हाथों में है. आप अपने बेटी-दामाद को अलग रखना चाहते हैं या उनके साथ रहना चाहते हैं.” निपुण ने ऐसा इमोशनल ब्लैकमेल किया कि उसके सास-ससुर निरुत्तर हो गए.

यह सुनकर ईला की आंखें भर आईं. आंखों से छलके आंसू जैसे निपुण के निर्णय के प्रति कृतज्ञता ज़ाहिर कर रहे थे. उसकी सराहना कर रहे थे. सच, अमेरिका में वह अपने पैरेंट्स के गिरते स्वास्थ्य को लेकर कितनी चिंतित रहती थी. हर पल लगता था, उन्हें कहीं कुछ हो न जाए. अपनी गृहस्थी और नौकरी छोड़ बार-बार भारत भी नहीं आ सकती थी, मगर आज निपुण ने यह अप्रत्याशित क़दम उठाकर उसकी सारी चिंताएं ही दूर कर दी थीं.

ईला अपने पैरेंट्स के पास जाकर बोली, “आपने मेरे लिए हमेशा किया ही है. मुझे बेटों की तरह पाला, मेरे नाज़ उठाए, मुझे आत्मनिर्भर बनाया, मेरा हमेशा ध्यान रखा. अब मेरी बारी है आपका ध्यान रखने की. चलिए ज़िद मत कीजिए, मान जाइए, आपको मेरी क़सम.” ईला के प्यारभरे अनुरोध के आगे उसके माता-पिता झुक गए.

उनके हाथों से उनके नए आशियाने का रिबन कट रहा था. उस खाली कमरे में गृहप्रवेश की रस्म निभाई गई. सभी निपुण के इस कृत्य की मुक्तकंठ से प्रशंसा कर रहे थे, कुछ लोग थे जिन्हें यह बात हज़म नहीं हो रही थी, वे कोने में खड़े खुसुर-फुसुर कर रहे थे. सुधाकर और सुमन मूकदर्शक बने खड़े थे. जाहिर है, उनको समझने और संभलने में थोड़ा व़क्त लगेगा. मगर जब समझेंगे, तो सबसे ज़्यादा वे ही अपने बेटे-बहू पर गर्व करेंगे.

       दीप्ति मित्तल

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORI

कहानी- ऑर्डरवाली बहू (Short Story- Orderwali Bahu)

Hindi Short Story

मॉडर्न टेक्नोलॉजी का फ़ायदा उठाकर आजकल की ये कामकाजी बच्चियां घर-बाहर सब मैनेज कर तो लेती हैं, फिर क्यों पुरानी लीक पर अड़ी सासें ख़ुद को नहीं बदलतीं? घर के कामकाज का रोना रोकर क्यों कलह मचाए रखती हैं? इन बच्चियों को ज़रा-सा प्यार, सम्मान मिल जाए, तो कैसी खिली-सी रहती हैं और यह भी तो कम बड़ी बात नहीं कि स्वधा को ऑफिस के काम करते हुए भी घर के हर सदस्य की ज़रूरत का ध्यान रहता है.

फोन रखकर मैं सिर पकड़कर बैठ गई थी. ऑफिस के लिए बिल्कुल तैयार स्वधा मेरे माथे पर बल देखकर ठिठक गई. पूछा, “क्या हुआ मां? किसका फोन था?”

“रमाबाई नहीं आएगी.”

“ओह! यह भी ऐन मौ़के पर धोखा देती है.” वह फिर वापस मुड़ गई. बोली, “मां, मैं लेट हो रही हूं, निकलती हूं, आप बिल्कुल परेशान न हों.”

“परेशान कैसे न होऊं? कितने दिनों बाद मैंने अपनी सहेलियों को लंच पर बुलाया है. अब कहां मैं किचन में खड़े होकर ज़्यादा देर तक खाना बना सकती हूं? ओह! अब क्या करूं?”

“डोंट वरी मां, आप किचन में मत जाना, मैं सब मैनेज कर दूंगी, बाय मां.” कहते-कहते वह घर से निकल गई. मैं सिर पर हाथ रख बैठी रह गई. स्पाइन की कुछ समस्या के कारण कमरदर्द रहने से मेरा किचन में ज़्यादा काम करना छूट गया है. रमाबाई ही खाना बनाती है. मेरे पति अनिल और बेटा अंकित तो टूर पर गए हैं. हम सास-बहू ही आजकल घर पर हैं, तो मैंने अपनी फ्रेंड्स को आज घर पर बुला लिया था. अब? हम पांचों फ्रेंड्स अंकित और स्वधा के विवाह के बाद आज ही मिल रहे हैं. अंकित के विवाह को चार महीने ही हुए हैं. यहीं मुंबई में ही दोनों जॉब करते हैं. मुझे स्वधा अच्छी लगती है. मुझे ऐसी ही तो बहू चाहिए थी, हंसमुख, हमें प्यार करनेवाली. बस, स्वधा का किचन में जाने का मूड नहीं होता. हफ़्तेभर तो ऑफिस के काम रहते हैं, वीकेंड में वह आराम के मूड में रहती है, स्वाभाविक है. मुझे इससे कोई शिकायत नहीं. मैं पारंपरिक सास की तरह अपने बेटे-बहू पर कोई बंदिश लगाना ही नहीं चाहती. बच्चे हैं, उनकी भी लाइफ है. उन्हें अपनी मर्ज़ी से जीने का पूरा हक़ है. मैं तो कई बार यह सोचती हूं कि अगर कामकाजी बहू किचन में घुसना न चाहे, तो बुरा क्या है. सास बहू का करियर, उसकी डिग्रियों का महत्व क्यों नहीं समझती? बेटे ने डिग्रियां ली हैं, तो बहू ने भी मेहनत से अपना करियर संवारा है. बेटा छुट्टीवाले दिन पूरा आराम चाहता है, तो कामकाजी बहू को भी तो आराम की ज़रूरत है. घर के कामों का विकल्प हो, तो बहू को ही क्यों किचन में जाने के लिए बाध्य किया जाए.

ख़ैर, अब तो यह सोचना है कि क्या करूं. स्वधा को देर हो रही थी, वह निकल गई है. मैं किचन में कुछ बना भी लूंगी, तो खड़े होने से मेरी तकलीफ़ बढ़ जाएगी. दर्द शुरू हो जाएगा, तो अपनी फ्रेंड्स के साथ बैठने का आनंद कैसे लूंगी? इतने में ही मेरे व्हॉट्सएप पर स्वधा का मैसेज आया- आप चिंता न करना मां, मैंने आप सबके लिए खाना ऑर्डर कर दिया है, सब पहुंच जाएगा. और साथ में ढेर सारी किसेज़ की इमोजी देखकर मुझे हंसी आ गई. मैंने भी ‘थैंक्यू वेरी मच’ लिखते हुए किसेज़ की ख़ूब सारी इमोजी डालकर जवाब दिया. यह हम सास-बहू का पूरा दिन चलता है. मुझे हंसी आ रही थी. यह लड़की भी न! ऑर्डर करने में बहुत होशियार है, मुंह से कुछ निकलते ही झट से ऑनलाइन ऑर्डर कर देती है. इतने में डोरबेल बजी. मेड शीतल आई थी. मैंने उससे कहा, “शीतल, आज ज़रा अच्छी तरह से सफ़ाई करना.”

यह भी पढ़ेलघु उद्योग- कैंडल मेकिंग: रौशन करें करियर (Small Scale Industries- Can You Make A Career In Candle-Making?)

“क्या हुआ मैडम?”

“लंच पर मेरी फ्रेंड्स आ रही हैं.” शीतल हमारी दस साल पुरानी मेड है, इतनी पुरानी मेड तो घर के सदस्य की ही तरह हो जाती है. बोली, “वाह, खाना बन गया?”

“नहीं, रमाबाई ने छुट्टी कर दी.”

“ओह! मैं कुछ काम कर दूं?” वह जानती है मेरे स्वास्थ्य के बारे में. मैंने कहा, “नहीं स्वधा ने सब ऑर्डर कर दिया है.” शीतल ने जैसी नज़रों से मुझे देखा, हम दोनों हंस पड़ीं. शीतल ने हंसते-हंसते कहा, “बाप रे! छोटी मैडम कितना ऑर्डर करती हैं.” मैं मुस्कुराते हुए सामान समेटने लगी, शीतल अपना काम करने लगी.

अचानक मैं पिछले चार महीनों पर नज़र डालने लगी. स्वधा जबसे आई है, हर समस्या का समाधान चुटकियों में खोज देती है. विवाह की भागदौड़ के बाद मेरी कमर का दर्द बढ़ गया, तो एक दिन उसने ऑफिस से ही ऑर्डर करके सरप्राइज़ में कुछ भेजा. मैंने डिलीवरी लेकर बॉक्स खोला, उसमें दर्द में सिंकाई के लिए एक इलेक्ट्रिक बॉटल थी, जो घंटों गर्म रह सकती थी. अभी तक मैं पुरानी तरह की ही बॉटल में पानी गर्म करके सेंकती थी. कभी-कभी आलस भी आ जाता था. मैं उसका यह सरप्राइज़ देखकर बहुत ख़ुश हुई थी. मैंने स्वधा को थैंक्स कहने के लिए उसी समय फोन किया था, तो हंसी थी. “मां, अच्छा लगा न सरप्राइज़?”

मैंने कहा था, “यह तो बहुत अच्छी चीज़ है, तुम्हें कैसे ख़्याल आया?”

“अरे, सब मिलता है मां, यह तो अंकित को पहले ही ऑर्डर कर देनी चाहिए थी.”

बहुत काम की चीज़ निकली थी यह. मुझे काफ़ी आराम हुआ था. अनिल को कई दिन से हाई ब्लड प्रेशर की शिकायत हो रही थी. वे बार-बार चेक करवाने के लिए डॉक्टर के पास जाते. एक दिन शाम को अचानक एक पार्सल आया. उसमें ब्लड प्रेशर चेक करने की मशीन थी. स्वधा ने ही ऑर्डर की थी. अनिल हंस पड़े थे, “यह तो बहुत अच्छा है हमारे घर में ऑर्डरवाली बहू आई है. ऑफिस से ही हमारी ज़रूरतों की चीज़ें ऑर्डर करती रहती है.”

वीकेंड में अगर रमाबाई न आए, तो स्वधा पूछती है, “मां कुछ ऑर्डर कर लें?” मैं कभी मना नहीं करती. सोचती हूं, रोज़ सब घर का बना ही तो खाते हैं. सब टिफिन लेकर जाते हैं. आज स्वधा को टिफिन नहीं चाहिए था, उसके ऑफिस में पार्टी थी. हां, तो फिर स्वधा सबकी पसंद का ध्यान रखते हुए ऑर्डर करने का काम संभाल लेती है.

शीतल काम करके चली गई, तो मैं भी नहा-धोकर तैयार हो गई. कामिनी, नीरा, आरती और मंजू तय समय पर आ गईं. स्वधा के आने के बाद हम आज पहली बार मिल रहे थे. हालचाल के बाद नीरा ने पूछा, “रश्मि, कैसा लग रहा है सास बनकर?”

“बहुत अच्छा! बेटी की कमी पूरी कर दी स्वधा ने. बहुत प्यारी बच्ची है. मुझे ऐसी ही बहू चाहिए थी.” इतने में डोरबेल बजी. हमारा खाना आ गया था. आरती ने पूछा, “कौन है?”

मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “हमारा लंच.”

“अरे, रमाबाई नहीं आई क्या?”

“नहीं.”

“ओह! फिर तो तुम्हें तकलीफ़ हो गई.”

“तकलीफ़ कैसी? घर में ऑर्डरवाली बहू आई है. ऑटो में बैठते ही लंच का ऑर्डर कर दिया था उसने.”

“सच?” फिर तो उन्हें स्वधा की ऑनलाइन मंगवाई चीज़ें बताने लगी. सब हैरान थीं. ख़ुश भी. अब तक हम पांचों में बस आरती को ही ऑनलाइन ऑर्डर से चिढ़ होती थी. जब तक वह दुकान-दुकान न भटक ले, उसकी शॉपिंग पूरी नहीं होती थी. उसकी फैमिली इस बात से ख़ूब परेशान रहती है. सब्ज़ी भी दस ठेलों पर देखकर ही ख़रीदती है.

आरती ने आदतानुसार कहा, “पता नहीं कैसा स्वाद होगा, कब का बना भेज दिया होगा और चीज़ें भी पता नहीं कैसी निकलेंगी?”

यह भी पढ़ेज्योतिष टिप्स: यदि आपका विवाह नहीं हो रहा है तो करें ये 20 उपाय (Astrology Tips: 20 Things That Will Make Your Marriage Possible Soon)

नीरा ने कहा, “अच्छी ही रहती हैं. कुछ वापस भी करना हो, तो आराम से वापस होता है. दुकान-दुकान भटकने की एनर्जी अब हममें भी तो नहीं बची.”

मैंने पार्सल खोला. गर्म-गर्म पंपकिन सूप भी था. स्वधा जानती है मुझे सूप पीने का बहुत शौक़ है. हम जब भी बाहर जाते हैं, मैं सूप कभी मना नहीं करती. पिछली बार पंपकिन सूप पीया था. मुझे बहुत अच्छा लगा था. स्वधा ने कहा भी था, “मां, जब मन हो, बताना. मैं ऑर्डर कर दूंगी.” अंकित उस समय ज़ोर से हंसा था. कहा था, “मां, स्वधा को बस एक बार कुछ बोलो कि आपको क्या चाहिए. होम डिलीवरी हो जाएगी.”

हम सब इस बात पर उसे ख़ूब छेड़ते हैं, वह भी हंसती रहती है. सूप गर्म था. ठंडा न हो जाए, मैं सबके लिए निकालकर ट्रे में रखने लगी. सबको सूप बहुत पसंद आया, फिर कामिनी ने कहा, “चलो, देखते हैं और क्या ऑर्डर किया है बहूरानी ने. देखा, तो स्टार्टर्स थे- शाही पनीर, मिक्स वेज और नान. सबके मुंह से एक साथ निकला, “अरे, वाह, चलो खाते हैं.” हम सबने खाने का भरपूर लुत्फ़ उठाया. आइस्क्रीम तो एक दिन पहले आ ही गई थी. कुछ देर बातें होती रहीं. उसके बाद सब जाने के लिए उठने लगीं, तो आरती ने कहा, “सुनो.” हम सबने उसे प्रश्‍नवाचक निगाहों से देखा, तो वो मुस्कुराते हुए बोली, “बहू तो कमाल है. हम सबके लिए शानदार लंच मैनेज करवा दिया. मैं भी ऐसी ही बहू लाऊंगी?” नीरा ने उसे चिढ़ाया, “पहले बीस जगह घर-घर जाकर लड़की नहीं देखोगी?” सब हंस पड़े. सब चली गईं, तो मैंने स्वधा को फोन किया, “थैंक्यू बेटा, बहुत अच्छा लंच था. हम सबने बहुत एंजॉय किया.”

“गुड, अब आप रेस्ट करना और हां, शाम को भी रमाबाई नहीं आई, तो किचन में मत घुस जाना.”

“हां, ठीक है. काफ़ी खाना रखा भी है.”

“ठीक है फिर, हम दोनों ही तो हैं.”

मैं सामान समेटकर थोड़ी देर आराम करने के लिए लेट गई. ध्यान स्वधा की तरफ़ ही था. प्यार आ रहा था उस पर मुझे, नई तकनीक का लाभ सबसे ज़्यादा इन बच्चियों को ही हुआ है शायद. घर में कोई किटकिट नहीं, प्यार और शांति ही तो चाहिए होती है. मॉडर्न टेक्नोलॉजी का फ़ायदा उठाकर आजकल की ये कामकाजी बच्चियां घर-बाहर सब मैनेज कर तो लेती हैं, फिर क्यों पुरानी लीक पर अड़ी सासें ख़ुद को नहीं बदलतीं? घर के कामकाज का रोना रोकर क्यों कलह मचाए रखती हैं? इन बच्चियों को ज़रा-सा प्यार, सम्मान मिल जाए, तो कैसी खिली-सी रहती हैं और यह भी तो कम बड़ी बात नहीं कि स्वधा को ऑफिस के काम करते हुए भी घर के हर सदस्य की ज़रूरत का ध्यान रहता है. गर्मी, सर्दी, बरसात, पीरियड के दिनों में महानगरों में आना-जाना, फिर दिनभर ऑफिस में काम करना आसान है क्या? मुझे तो लगता है घरों में ज़्यादातर कलहों का कारण सास की पुरानी सोच ही है. मतलब यह कि बेटे की शादी के बाद बदलने की ज़रूरत बहू को नहीं, सास को ज़्यादा है. स्वधा के ही बारे में सोचते-सोचते मेरी पलकें मुंदने लगी थीं.

Poonam ahmed

पूनम अहमद

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORIES

पंचतंत्र की कहानी: चूहे की शादी (Panchtantra ki kahani: The Wedding Of The Mouse)

Panchtantra ki kahani
Panchtantra ki kahani
पंचतंत्र की कहानी: चूहे की शादी (Panchtantra ki kahani: The Wedding Of The Mouse)

बहुत पुराने समय की बात है. गंगा नदी के तट पर एक सुन्दर सा आश्रम था. उस आश्रम में एक ज्ञानी संन्यासी रहते थे. एक बार गुरूजी नदी में नहा रहे थे. उन्होंने देखा कि एक बाज़ छोटी सी चुहिया को अपने पंजों में जकड कर ले जा रहा था. अचानक वह चुहिया बाज़ के पंजों से गिर कर सीधे गुरु के हाथ में आ गिरी. गुरु ने देखा कि वह बाज़ अभी भी आसमान में इधर-उधर उड़ रहा है, तो नहाने के बाद वे उस चुहिया को अपने साथ ले गए. रास्ते में उनके मन एक विचार आया और उन्होंने उस चुहिया को अपनी शक्ति से एक छोटी लड़की बना दिया और अपने आश्रम में ले गए.

जब गुरु घर पहुंचे, तो उन्होंने अपनी पत्नी से कहा, “हमारी कोई संतान नहीं है, तो इस कन्या को भगवान की कृपा और आशीर्वाद समझ कर हमें स्वीकार कर लेना चाहिए.”गुरुदेव की पत्नी बहुत ही खुश हुई और उसने ख़ुशी-ख़ुशी उस छोटी सी बच्ची को स्वीकार कर लिया.
गुरु के आश्रम में लड़की बड़ी होती गयी और गुरु की देख रेख में काफ़ी शिक्षित होती गयी. गुरु और उसकी पत्नी को अपनी बच्ची पर गर्व था.

लेकिन अब समय आ गया गया था, जब गुरु की पत्नी ने गुरु से लड़की के विवाह के विषय में बात की. पत्नी ने कहा,”हमारी बेटी काफ़ी गुणी और विशेष है, हमें उसके लिए विशेष पति ढूंढना चाहिए.”

इसी बीच उनकी बेटी ने भी कहा कि मैं अगर किसी से शादी करुँगी तो वो दुनिया का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति होना चाहिए. बेटी की इस बात से गुरु भी सहमत हुए और अपनी बेटी के वर ढूंढने में निकल पड़े.

उन्होंने सोचा कि इस संसार में सूर्य से शक्तिशाली भला कौन हो सकता है. अगले दिन सुबह गुरु ने सूर्य से कहा, कृपा कर के मेरी बेटी से विवाह कर लीजिये? तो सूर्यदेव ने जवाब दिया,”मैं तो विवाह के लिए तैयार हूं, पर अपने बेटी से पूछ कर देखें. जब गुरु ने अपनी बेटी से पुछा तो उसने विवाह के लिए मना कर दिया और कहा,”पिताजी, सूर्य तो पूरी दुनिया को रौशनी देते हैं, पर वह तो बहुत गर्म हैं जो भी उनके पास जायेगा भस्म हो जाता है.”

यह भी पढ़ें: पंचतंत्र की कहानी: कौवा और कोबरा

Panchtantra ki kahani

यह सुनते ही सूर्य ने सलाह दी और कहा, गुरूजी आप बादलों के के पास जाइये वह मुझसे भी ताकतवर हैं वो मेरी रौशनी को भी रोक सकते हैं. यह सुनने के बाद गुरु ने बादलों को बुलाया और कहा,”बादलों के राजा मेरी पुत्री को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करें? बादलों के राजा ने जवाब दिया, मैं तो तैयार हूं, परन्तु अपनी पुत्री से पूछ लें. बेटी ने दोबारा विवाह के लिया मना कर दिया और कहा,”बादलों का राजा अंधकार है,गीला और ठंडा भी है, मेरे लिए पिताजी कोई अच्छा सही पति चुनिए.”गुरु जी सोच में पड़ गए कि उनकी बेटी के लिए सही वर कौन होगा? तभी बादलों के राजा ने सलाह दिया तूफ़ान के राजा के पास जाईये वो मुझसे भी ताकतवर है क्योंकि वो जहाँ चाहे मुझे उड़ा कर ले जा सकता है.

यह सुनते ही गुरु जी नें अपने शक्ति से तूफ़ान के राजा को बुलाया और तूफ़ान के राजा प्रकट हुए. गुरूजी उनसे बोले क्या आप मेरी बेटी से विवाह करेंगे? यह सुनने पर तूफ़ान के राजा ने भी जवाब में कहा मैं तो तैयार हूँ क्या आपकी बेटी मुझसे विवाह करेगी. बेटी ने मना कर दिया और कहा तूफ़ान के राजा तो बहुत तेज़ हैं और जीवन में कभी भी एक जगह स्थिर नहीं रहते और अपनी दिशा भी बदलते रहते हैं. यह सुनते ही तूफ़ान के राजा ने कहा क्यों ना आप पर्वतों के राजा के पास जाएँ वो मुझे भी रोकने की शक्ति रखते हैं.

यह सुनते ही गुरु नें अपनी शक्ति से पर्वत को बुलाया. जब वे प्रकट हुए तो गुरु नें दोबारा वाही प्रश्न किया जो सबसे उन्होंने पुछा था , क्या अप मेरी बेटी से विवाह करेंगे? पर्वत राजा ने कहा,”मैं तो राज़ी हूँ आपकी बेटी से विवाह करने के लिए. एक बार अपनी बेटी से भी पूछ लीजिये”

बेटी ने पर्वत राजा से भी विवाह करने से मना कर दिया और कहा, “मैं पर्वत राजा से विवाह करना नहीं चाहती क्योंकि ये बहुत ही कठोर हैं और स्थाई भी.”

गुरु चिंतित होकर सोचने लगे पर्वत राजा से भी अच्छा वर उनकी बेटी के लिए कौन हो सकता है? सोच में पड़ते देख पर्वत राजा में सलाह दिया क्यों ना आप चूहों के राजा से पूछें वो तो मुझसे भी ज्यादा बेहतर हैं क्योंकि इतना मज़बूत होने पर भी वो मेरे शरीर पर छेद कर सकते है.

यह भी पढ़ें: पंचतंत्र की कहानी- झगड़ालू मे़ंढक

यह सुनने पर गुरु ने जल्द से अपने शक्ति से चूहों के राजा को बुलाया. जब चूहों का राजा आया तो गुरु के सवाल करने पर उसने भी विवाह के लिए हाँ किया और कहा मैं तो तैयार हूँ आप अपनी बेटी से एक बार पूछ लें. जब गुरु नें अपनी बेटी को चूहों के राजा से मिलाया तो वो उन्हें पसंद आया और उसने शरमाते हुए विवाह के लिए हाँ कर दिया. यह जान कर गुरु बहुत खुश हुआ और उसने अपनी बेटी को अपनी शक्ति से चुहिया के रूप में बदल दिया और दोनों का विवाह करा दिया.

सीख: हम अपने अस्तित्व और किस्मत से जुड़ी चीज़ों को खुद से कभी भी अलग नहीं कर सकते, क्योंकि वो हमारे जन्म से हैं और हमारे खून में है.