Hindu Dharma

मंत्रों का असर मंदिरों में और अधिक बढ़ जाता है…

मंत्रों को यदि मंदिरों में जपा व सुना जाए, तो उनका प्रभाव काफ़ी अधिक होता है, क्योंकि मंदिर गुंबदाकार से शब्द जब टकराकर वापस आते हैं, तो मन-मस्तिष्क में नई ऊर्जा भर देते हैं. मंदिर का गुंबदाकार उनके प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है. यही वजह है कि मंदिरों के आकर को भी वैज्ञानिक तरीक़े से गढ़ा जाता है.

जितना हंसेंगे, उतना हेल्दी रहेंगे…

Hindu Traditions

रिसर्च बताते हैं कि जो लोग ज़्यादा हंसते हैं, वो शारीरिक व मानसिक तकलीफ़ों को बेहतर तरी़के से टैकल व टॉलरेट कर सकते हैं. हंसने से सकारात्मकता बढ़ती है, ऊर्जा बढ़ती है और फेफड़े मज़बूत बनते हैं. शुद्ध हवा बेहतर तरीक़े से शरीर में जाती है और मस्तिष्क भी बेहतर तरीक़े से काम करता है.

गेंदे के फूलों को क्यों माना जाता है शुभ?

पूजा-अर्चना में गेंदे के फूलों का उपयोग होता है. घर के बाहर बंदनवार में भी इनका प्रयोग होता है, क्योंकि ये वातावरण को शुद्ध करते हैं. नकारात्मक ऊर्जा, बैक्टिरिया आदि को दूर करके सकारात्मक ऊर्जा फैलाते हैं.

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बांझपन दूर करता है गायत्री मंत्र

गायत्री मंत्र का नियमित जाप करके बांझपन को दूर किया जा सकता है. गर्भवती महिलाएं मंत्र का जाप करके सुंदर और तंदुरुस्त बच्चा पा सकती हैं. गायत्री मंत्र के जाप से पैदा होने वाला बच्चा असाधारण प्रतिभा का धनी होता है. किसी दंपत्ति को संतान प्राप्त करने में कठिनाई आ रही हो या संतान से दुखी हो अथवा संतान रोगग्रस्त हो, तो प्रात: पति-पत्नी एक साथ सफ़ेद वस्त्र धारण कर गायत्री मंत्र का जप करें. इससे बांझपन दूर होता है और संतान सुख मिलता है. गायत्री मंत्र के जो अक्षर व शब्द हैं, वो शरीर के विभिन्न हिस्सों को प्रभावित करते हैं. मंत्र जाप के समय हर अक्षर शरीर के विभिन्न भागों व ग्लांड को उत्तेजित करता है, हमारे शरीर में 7 चक्र होते हैं, जिनमें 72 हज़ार नाड़ियों होती हैं. ये नाड़ियां सुप्त अवस्था में रहती हैं, गायत्री मंत्र में शब्दों का संयोजन इस तरह से है कि ये उन सुप्त नाड़ियों को उत्तेजित कर देता है, जिससे संतान प्राप्ति ही नहीं और भी कई रोगों में लाभ मिलता है.

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महामृत्युंजय जाप का विज्ञान

इसमें अक्षरों का संयोजन इस प्रकार से है कि इसके नियमित जाप से सूर्य व चंद्र नाड़ियों में कंपन होता है और शरीर केसातों चक्रों में ऊर्जा का संचार होता है, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है और शरीर निरोगी रहता है. 

स्फटिक माला का स्वास्थ्य लाभ

इसकी प्रकृति ठंडी होती है, इसलिए यह बुखार में बेहद लाभदायक है, क्योंकि यह शरीर की गर्मी यानी बढ़े हुए तापमानको नीचे लाने में कारगर है. यदि किसी को बुखार है, तो स्फटिक की माला को धोकर व्यक्ति के नाभि स्थान पर रख दें. इससे काफ़ी लाभ मिलेगा. इसी तरह से यदि कोई यह माला धारण करता है, तो उसे सिरदर्द की समस्या नहीं होता वउसका मन शांत रहता है. 

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श्रावण में शिवलिंग पर दूध चढ़ाने का वैज्ञानिक कारण…
इस माह दूध व उससे बने पदार्थ विष के समान होते हैं, क्योंकि ऋतु परिवर्तन से ये सब वात को बढ़ाते हैं.  शिवजी विषों को पीकर हमारी रक्षा करते हैं, यही वजह है कि आयुर्वेद में भी श्रावण में शिवजी को दूध चढ़ाने का प्रावधान है, क्योंकि वह दूध हेल्दी नहीं होता. इस दौरान गाय-भैंस भी जो चारा खाती हैं, उसके ज़रिए कुछ कीटाणु शरीर में चले जाते हैं, जिससे उनका दूध दूषित हो जाता है. 

शास्त्रों में ग़ुस्से से दूर रहने पर इतना ज़ोर क्यों दिया जाता है? दरअसल, ग़ुस्सा मानव का नेचुरल इमोशन है और ग़ुस्साआना बुरी बात नहीं है, लेकिन उसका बेक़ाबू हो जाना ज़रूर बुरा है. अधिक ग़ुस्सा करने से हमारे नर्वस सिस्टम पर बुराअसर पड़ता है, जिससे हार्ट डिसीज़, ब्लड प्रेशर जैसी कई समस्याएं हो सकती हैं, इसलिए अगर तंदुरुस्त रहना है तो ग़ुस्सेपर अंकुश लगाना होगा.

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क्या आप जानते नवरात्रि में उपवास क्यों रखे जाते हैं? 
इसका वैज्ञानिक पहलू यह है कि उस दौरान मौसम बदलता है औरइस वजह से हल्का-पाचक भोजन करने पर ज़ोर दिया जाता है, ताकि पाचन क्रिया ठीक से रहे और शरीर ऊर्जावान बनारहे. यही वजह है कि वर्ष में दो बार मौसम परिवर्तन के दौरान ही नवरात्रि आती है. 

बच्चों के स्वास्थ्य में भी लाभदायक है ॐ का उच्चारण!

ॐ को सबसे शक्तिशाली मंत्र माना गया है. इसकी सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि आपका बच्चा भी इसका आसानी सेजाप कर सकता है. ॐ का जाप बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए बेहद लाभदायक है और यह उसे सकारात्मक ऊर्जा सेभर देगा. 

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गाय के गोबर को क्यों पवित्र माना जाता है?

पूजा व यज्ञ में गोबर व उसके उपलों का बेहद महत्व है, क्योंकि गोबर में हैजे य टीबी के कीटाणुओं को ख़त्म करने कीक्षमता है. यही वजह है कि गोबर में लक्ष्मी का वास भी माना जाता है. 

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महाकुंभ दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक मेला माना जाता है और गुरूवार से इसकी औपचारिक शुरुआत भी हो चुकी है लेकिन कहीं न कहीं कोरोना की मार ने इस पर भी असर डाला है. इस बार जोश भले ही कम ना हो पर होश में रहना ज़रूरी है, शायद यही वजह है कि श्रद्धालुओं की संख्या पर असर दिखाई पड़ रहा है और वैसे भी एहतियातन सरकार और स्थानीय प्रशासन भी काफ़ी सख़्ती से दिशानिर्देशों का पालन करवाने में लगा हुआ है. स्थानीय लोग और पुरोहित कह रहे हैं कि कोरोना के चलते इस साल संख्या कम नज़र आ रही है और शायद लोग कम ही आएं सुरक्षा के मद्देनज़र ये ज़रूरी भी है कि पहले जान व स्वास्थ्य का ध्यान रखा जाए. लेकिन अगर आप इस महाकुंभ का हिस्सा बनना चाहते हैं तो क्या हैं वो ज़रूरी नियम जिनका पालन आपको करना होगा-

– कोरोना नेगेटिव रिपोर्ट की बिना आपको एंट्री नहीं मिल सकेगी और आपको वापस लौटना पड़ेगा. जी हां, श्रद्धालुओं को 72 घंटे पहले की कोविड नेगेटिव रिपोर्ट दिखानी पड़ेगी.
– यहां तक कि वहां के होटेल और धर्मशालाओं में भी एंट्री के लिए ये रिपोर्ट ज़रूरी है.

– कोरोना से सबसे अधिक जो 12 राज्य प्रभावित हैं वहां से आनेवालों पर कड़ी निगाह रखी जाएगी.

– उत्तराखंड सरकार ने सीमा पर भी टेस्टिंग ज़ोन बनाए हैं ताकि बॉर्डर ब बाहर से आनेवालों का टेस्ट किया का सके.

– उत्तराखंड सरकार के पोर्टल पर यात्रा शुरू करने से पहले रजिस्ट्रेशन करवाना होगा.

– फोन पर आरोग्य सेतु एप का होना अनिवार्य है.

– लोकल प्रशासन की सलाह है कि 65 साल से अधिक उम्र के लोग व 10 साल से कम उम्र के बच्चे न आएं.

– इसके अलावा ये भी आग्रह किया है कि हाई बीपी, हार्ट, डायबिटीज, कैंसर, लंग्स और किडनी की बीमारियों से पीड़ित लोग और गर्भवती महिलाएं भी मेले में शिरकत ना करें.

– चौबीसों घंटे पुलिस और पैरामिलिट्री फोर्स भी तैनात की गई है, ताकि नियमों का कड़ाई से पालन कराया जा सके और जो नियम तोड़ता है उस पर भी एक्शन लिया जा सके.

– गाड़ियों की भी स्क्रीनिंग की व्यवस्था है और CCTV से पूरे इलाक़े पर नज़र बनाए रखी जाएगी ताकि सुरक्षा व्यवस्था पुख़्ता हो.

– इसका अलावा मेला क्षेत्र व हरिद्वार के बॉर्डर्स पर मेडिकल टीम्स हैं जो रैंडम सैम्पलिंग करेंगी.
– जो लोग रेजिस्ट्रेशन कराकर और नेगेटिव रिपोर्ट के साथ जायेंगे उनको एंट्री मिलने में दिक़्क़त नहीं होगी.

– जो बिना रेजिस्ट्रेशन के जाएंगे उनकी पहले टेस्टिंग की जाएगी और उसके बाद ही उनको मिल सकेगी एंट्री.

– क्योंकि बिना COVID नेगेटिव रिपोर्ट के कोई भी श्रद्धालु स्नान नहीं कर पाएगा. महाकुंभ में गंगा स्नान के लिए श्रद्धालुओं को कोविड-19 की 72 घंटे पहले तक की आरटीपीसीआर निगेटिव रिपोर्ट लानी होगी. तो बेहतर है आप नियमों को जानें समझें और उनका पालन करते हुए आगे बढ़ें ताकि इस अद्भुत मेले में शामिल हो सकें!

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हमने अपनी नानी-दादी को कहते सुना है कि सिंदूर का गिरना बहुत अशुभ संकेत है इसीलिए वो सिंदूर को बहुत संभालकर रखती थीं. क्या वाकई सिंदूर का गिरना अशुभ होता है? सिंदूर गिरने के शुभ-अशुभ संकेत के बारे में बता रही हैं एस्ट्रो-टैरो-न्यूमरोलॉजी-वास्तु व फेंगशुई एक्सपर्ट मनीषा कौशिक.

Sindoor

सिंदूर का गिरना अशुभ क्यों माना जाता है?
अगर हम सिंदूर गिरने के बारे में जानने की कोशिश करें, तो मान्यताओं के अनुसार, सिंदूर का गिरना एक अशुभ घटना है और यह पति पर आयु संकट जैसी अशुभता का संकेत होता है. इसी डर से महिलाएं सिंदूर को बहुत संभालकर रखती हैं और उसे कभी ज़मीन पर गिरने नहीं देतीं.

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क्या वाकई सिंदूर का गिरना अशुभ होता है?
वैज्ञानिक दृष्टि से देखें, तो सिंदूर के बिखरने से कुछ भी शुभ या अशुभ नहीं होता है, ये महिलाओं का वहम मात्र है. फेरों के समय दुल्हन की मांग में अभिमंत्रित करके ईश्‍वर के आशीर्वाद के रूप में सिंदूर भरा जाता है. ऐसे में शादीशुदा महिलाओं के लिए सिंदूर बहुत ही पवित्र चीज़ हो जाती है और इसके बिखरने से उनका मन दुखी हो जाता है और उनके मन में कई तरह की शंकाएं होने लगती हैं. धार्मिक भावनाओं के कारण महिलाओं का सिंदूर से बहुत जुड़ाव होता है और वो उसे बहुत संभालकर रखती हैं.

अक्सर हम अपने बड़े-बुज़ुर्गों को कहते सुनते हैं कि घर से बाहर निकलते समय दही-चीनी खाकर निकलो. हमारी मां भी परीक्षा के समय, इंटरव्यू देने या विदेश जाते समय हमें दही-चीनी खिलाकर घर से भेजती थीं. क्या वाकई दही-चीनी खाकर घर से निकलने से शुभता आने लगती है, काम में आनेवाली अड़चनें दूर होती हैं और हमारे कार्य अच्छी तरह संपन्न होते हैं?

Curd And Sugar

शुभ काम के लिए दही-चीनी खाकर घर से निकलने के पीछे ये मान्यता है
दही और शक्कर दोनों ही चीज़ें सफ़ेद हैं और दोनों का संबंध चंद्रमा से है. चंद्रमा हमारे मन को नियंत्रित करता है. दही और शक्कर खाने से हमारे मन को ठंडक मिलती है और इससे हमारा पाचनतंत्र शांत रहता है. इसीलिए दही और शक्कर खाकर घर से निकलने को शुभ माना जाता है.

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Curd And Sugar

शुभ काम के लिए दही-चीनी खाकर घर से निकलने के पीछे ये सच्चाई है

  • दही बहुत सारे विटामिन्स और मिनरल्स से भरपूर है.
  • जब भी हम कोई महत्वपूर्ण काम करने निकलते हैं, तो हमारे दिल-दिमाग़ में बहुत हलचल चल रही होती है, जिसका असर हमारी सेहत और पाचनतंत्र पर भी पड़ता है. इससके कारण हमें एसिडिटी की तकलीफ़ हो सकती है. एसिडिटी होने पर हम असहज महसूस करते हैं, जिससे हमारे काम में रुकावट पैदा हो सकती है. ऐसे में दही एक कूलिंग एजेंट का काम करता है और हम जो भी खाते हैं उसे पचाने में सहायता करता है.
  • इसी तरह चीनी यानी शुगर हमारे शुगर लेवल का बैलेंस बनाए रखती है. जब पाचनतंत्र और शुगर लेवर सही रहता है तो हमारे शरीर में ऊर्जा बनी रहती है और हम अपना काम मन लगाकर कर पाते हैं.
    यही वजह है कि हमारे बड़े-बुज़ुर्ग घर से बाहर निकलने से पहले हमें दही-चीनी खिलाते थे.

Know the reason why Dhanteras, Saraswati and Lakshmi are worshiped on Deepawali?

भारत त्योहारों का देश कहलाता है और ध्यान रहे इन त्योहारों के भीतर भारतीय दर्शन का मर्म छिपा हुआ है. दीपों का त्योहार दीपावली हिन्दुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है और वह एक दिन का न होकर पांच दिन का त्योहार होता है.
मान्यता है कि भगवान धन्वंतरि समुद्र मंथन के समय अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे. धनतेरस इन्हीं आरोग्य के देवता और वैद्य धन्वंतरि के जन्मदिन पर मनाया जाता है, जो कि दीपावली से दो दिन पूर्व आता है.
सही भी है हमारा असली धन, तो हमारा शारीरिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास ही है.
भारत सरकार ने भी धनतेरस को ‘राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया है.
एक बात जो दिमाग़ में आती है वह यह कि यह त्योहार ‘वाग बरस’ नहीं बल्कि ‘वक बारस’ है.
शब्दकोश वाक्य भाषण और भाषा का अर्थ देता है. पीड़ा के कुछ हिस्से को भाषण के रूप में जाना जाता है. सरस्वती वाणी या भाषा की देवी है. यही वजह है कि सरस्वती को वाग्देवी के नाम से भी जाना जाता है. हमारी वाणी और भाषा को अच्छा रखने और बुद्धि को दूषित किए बिना हमारे आचरण को अच्छा रखने की दृष्टि से दीपावली के दिन मां सरस्वती की पूजा की जाती है.
वाक्य को विकृत करके लोगों ने बाघ को मार डाला और पूरे त्योहार को बाघ बरस के रूप में जाना जाने लगा, लेकिन हमारी हिन्दू संस्कृति और दर्शन का कहना है कि लक्ष्मी की पूजा करने से पहले सरस्वती की पूजा की जानी चाहिए. इसलिए हमारे पूर्वज धनतेरस के अगले दिन लक्ष्मी की पूजा से पहले ‘वास बार’ के दिन मां सरस्वती की पूजा करते हैं.
इस त्योहार का बाघों से कोई लेना देना नहीं है. उस दिन केवल मां सरस्वती की पूजा की जानी चाहिए और उनके चरणों में प्रणाम कर प्रार्थना करनी चाहिए- “हे मां आप हमारे घर लक्ष्मी के रूप में आएं, हमें पवित्रता प्रदान करें और हमारी वाणी में रहें. हमारे दिल साफ़ हैं और हमारे घर साफ़-सुथरे हैं. जहां पहले सरस्वती है, लक्ष्मी भी कल वहीं रहेगी…”

– उषा वधवा

Dhanteras, Saraswati And Lakshmi

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हम सब के साथ कभी न कभी ऐसा अवश्य हुआ है कि हम पूजा करने के लिए ज्योत जगाते हैं और किसी कारणवश दीया बुझ जाता है. ऐसा होते ही हम या हमारे आसपास खड़े लोगों के मन में शंका व वहम घर कर जाता है कि न जाने अब क्या अशुभ होगा. क्या सही में ज्योत का बुझ जाना अशुभ संकेत है? शुभ-अशुभ मान्यताओं की सच्चाई बता रही हैं एस्ट्रो-टैरो-न्यूमरोलॉजी-वास्तु व फेंगशुई एक्सपर्ट मनीषा कौशिक.

Lamp

पूजा करते समय दीया बुझ जाने को अशुभ क्यों माना जाता है?
किसी पूजा-अनुष्ठान में या घर में पूजा करते हुए यदि दीया बुझ जाता है, तो सभी लोग परेशान हो जाते हैं. दीया बुझने को ज़्यादातर लोग अशुभ संकेत मानते हैं. कई लोग ये भी मानते हैं कि भगवान ने पूजा स्वीकार नहीं की. हमारे घर के बड़े दीया बुझने को अशुभ मानते हैं इसलिए हम भी दीया बुझ जाने से घबरा जाते हैं.

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Diwali Lamp

पूजा करते समय दीया बुझ जाए, तो करें ये…
अगर हम ज्योत जलाने की प्रक्रिया को शुरू से देखें, तो वो इस प्रकार होगी- सबसे पहले हम मंदिर में ज्योत के दीये को धोकर साफ़ करते हैं, फिर रूई या कलावा की बत्ती बनाते हैं. कुछ लोग इस बत्ती को बनाने के लिए दो बूंद पानी का इस्तेमाल भी करते हैं. उसके बाद दीये के बीच उस ज्योत को स्टैंड में लगा उसमें घी या तेल डालते हैं. इस प्रक्रिया में दीये को धोते समय ठीक से सुखाया न जाए या दीये के स्टैंड को ठीक से दाफ़ न किया जाए या फिर बत्ती बनाते समय उसमें ज़्यादा पानी लग जाए, तो ज्योत ठीक से नहीं जलेगी. ऐसी स्थिति में दीया बुझ भी सकता है. दीया बुझ जाने को अशुभ मानने की कोई ज़रूरत नहीं है. ईश्‍वर से क्षमा मांगकर आप फिर से दीया जला लें.

मां दुर्गा के विभिन्न रूपों और स्वरूपों के दर्शन करें और आशीर्वाद लें! आप सभी को नवरात्रि की शुभकामनाएँ!


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नवरात्रि में मां दुर्गा जैसे साक्षात आशीर्वाद देने घर घर चली आती हैं, उनका हर रूप वंदनीय है, पूजनीय है… जानें माता रानी के 9 रूपों को और जी भरकर करें दर्शन और लें उनका आशीष, देखें यह वीडियो!

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अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) के पीछे बहुत सारी मान्यताएं और बहुत सारी कहानियां भी जुड़ी हैं. इसे भगवान परशुराम जन्मदिन यानी परशुराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है. भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम के अलावा विष्णु के अवतार नर व नारायण के अवतरित होने की मान्यता भी इसी दिन से जुड़ी है. यह भी मान्यता है कि त्रेता युग का आरंभ इसी तिथि से हुआ था. मान्यता के अनुसार इस तिथि को उपवास रखने, दान करने से अनंत फल की प्राप्ति होती है यानी इस दिन व्रत रखने वाले को कभी भी किसी चीज़ का अभाव नहीं होता, उसके भंडार हमेशा भरे रहते हैं. चूंकि इस व्रत का फल कभी कम न होने वाला, कभी न घटने वाला, कभी नष्ट न होने वाला होता है, इसलिए इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है. अक्षय तृतीया 2020 का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और मान्यताओं से जुड़ी सभी जानकारी दे रहे हैं पंडित राजेंद्रजी.

Akshaya Tritiya 2020

अक्षय तृतीया 26 अप्रैल 2020: जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और मान्यताएं

अक्षय तृतीया पूजा मुहूर्त – 05:48 से 12:19
सोना खरीदने का शुभ समय – 05:48 से 13:22
तृतीया तिथि प्रारंभ – 11:51 (25 अप्रैल 2020)
तृतीया तिथि समाप्ति – 13:22 (26 अप्रैल 2020)

अक्षय तृतीया से जुड़ी मान्यताएं

  • माना जाता है कि जो लोग इस दिन अपने सौभाग्य को दूसरों के साथ बांटते हैं, उन्हें ईश्वर की असीम अनुकंपा प्राप्त होती है. इस दिन दिए गए दान से अक्षय फल की प्राप्ति होती है. सुख-समृद्धि और सौभाग्य की कामना से इस दिन शिव-पार्वती और नर-नारायण की पूजा का विधान है.
  • अक्षय तृतीया के दिन दान को श्रेष्ठ माना गया है. चूंकि वैशाख मास में सूर्य की तेज धूप और गर्मी चारों ओर रहती है और यह आकुलता को बढ़ाती है, तो इस तिथि पर शीतल जल, कलश, चावल, चना, दूध, दही आदि खाद्य पदार्थों सहित वस्त्राभूषणों का दान अक्षय व अमिट पुण्यकारी होता है.

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Akshaya Tritiya 2020

अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर जानें मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के आसान उपाय

1) लग्न राशि के ‘स्वामी ग्रह’ को करें प्रसन्न
प्रत्येक जातक की एक चन्द्र राशि होती है और इसी तरह कुंडली में जन्म के समय से संबंधित एक लग्न राशि भी होती है. जातक के गुण व व्यवहार को लग्न राशि काफी हद तक प्रभावित करती है. यदि किसी के कार्य नहीं बन पा रहे हैं या आर्थिक रूप से तकलीफ में हैं, तो अपनी लग्न राशि के ‘स्वामी ग्रह’ के अनुकूल रंग की कोई वस्तु अपने साथ जरूर रखें या स्वामी ग्रह के रंग से संबंधित कोई एक छोटा कपड़ा अपने साथ जरूर रखें.

2) अलमारी रखें उचित स्थान पर
धन की अलमारी उत्तर दिशा के कमरे में दक्षिण की दीवार पर अगर लगी हो, तो यह धनवृद्धि में लाभदायक साबित हो सकती है.

3) मुख्य द्वार पर दीपक लगाएं
प्रात: सुबह लक्ष्मीजी का पूजन घर में प्रतिदिन किया जाना चाहिए और सायंकाल घर के मुख्य द्वार पर दाईं ओर एक घी का दीया जरूर जलाना चाहिए. इन दोनों कार्यों से धन की देवी लक्ष्मीजी प्रसन्न होकर व्यक्ति के पास ही रहती हैं.

4) घर के मुख्य द्वार पर गणेशजी का स्वरूप
गणेश भगवान के स्वरूप को घर के मुख्य द्वार पर लगाने से घर में धन संबंधित सभी समस्याओं का अंत होता है और घर में नकारात्मक शक्तियों का भी उदय नहीं हो पाता है.

5) घर में तुलसीजी का पौधा लगाएं
तुलसीजी की सेवा करने से धन-धान्य की कोई कमी नहीं होती है. तुलसी के पौधे पर नियमित रूप से दीपक लगाने और पूजन से मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है.

6) गोमाता को चारा खिलाएं
नित्य सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर गोमाता को हरा चारा या आटे का भोग लगाने से भी लक्ष्मीजी प्रसन्न होती हैं.

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Akshaya Tritiya 2020

अक्षय तृतीया पर करें 14 तरह के दान, देखें जीवन में चमत्कार

चूंकि तृतीया मां गौरी की तिथि है, इसलिए इस दिन गृहस्थ जीवन में सुख-शांति की कामना से की गई प्रार्थना तुरंत स्वीकार होती है. गृहस्थ जीवन को खुशहाल रखने के लिए इस दिन उनकी पूजा की जानी चाहिए.

अक्षय तृतीया के दिन ये 14 दान हैं महत्वपूर्ण
1) गौ,
2) भूमि
3) तिल
4) स्वर्ण
5) घी
6) वस्त्र
7) धान्य
8) गुड़
9) चांदी
10) नमक
11) शहद
12) मटकी
13) खरबूजा
14) कन्या

अधिकतर लोग छोटे बच्चों को बुरी नज़र से बचाने के लिए उनके माथे पर, कान के पीछे, हथेली या तलवो पर कला टीका लगाते हैं. क्या वाकई बुरी नज़र लगती है? क्या वाकई बुरी नज़र होती है? कुछ समय पहले सारा अली खान अपने भाई इब्राहिम अली खान के साथ एक प्रमुख पत्रिका के लिए शूट कर रही थी. शूटिंग के समय सारा अली खान और उनके भाई इब्राहिम अली खान के साथ उनकी मां अमृता सिंह भी मौजूद थीं. सारा अली खान और उनके भाई इब्राहिम अली खान ने शूटिंग के लिए सफ़ेद रंग के बहुत ही खूबसूरत कपड़े पहने थे. सारा अली खान सफ़ेद कपड़ों में बहुत खूबसूरत लग रही थी, ऐसे में मां अमृता सिंह ने अपनी बेटी सारा अली खान को बुरी नज़र से बचाने के लिए काला टीका लगाया था. सारा अली खान, इब्राहिम अली खान और उनकी मां अमृता सिंह की ये फोटो सोशल मीडिया पर बहुत वायरल हुई थी. ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या वाकई बुरी नज़र लगती है? बच्चों को बुरी नज़र से बचाने के लिए काला टीका क्यों लगाते हैं? बुरी नज़र से बचने के लिए काला टीका लगाने की मान्यता और सच्चाई के बारे में विस्तार से बता रही हैं एस्ट्रो-टैरो एक्सपर्ट व न्यूमरोलॉजिस्ट मनीषा कौशिक.

Amrita Singh Sara Ali Khan Ibrahim Ali Khan

बच्चों को बुरी नज़र से बचाने के लिए काला टीका लगाने के पीछे ये मान्यता है
आपने अक्सर ये महसूस किया होगा कि जब हम किसी व्यक्ति से मिलते हैं, तो उससे मिलते या बात करते समय हम या तो अच्छा महसूस करते है या कुछ भी महसूस नहीं कर पाते या फिर बहुत बुरा महसूस करने लगते हैं. जिन लोगों से मिलकर हमारा मन खिन्न हो जाता है या हम भारीपन महसूस करने लगते हैं, जिन लोगों को हमारी सफलता से ईर्ष्या होती है, ऐसे लोगों से मिलकर होने वाली खिन्नता और भारीपन को हमारे बुज़ुर्गों ने नज़र लगना कहा है. काला रंग नकारात्मक ऊर्जा को अपने अंदर समा लेता है, जिससे हम नकारात्मकता से बचे रहते हैं. नकारात्मक ऊर्जा को हमसे दूर रखने के लिए ही हमारे बड़े-बुज़ुर्ग हमें काला टीका या काला धागा बांधने की सलाह देते हैं.

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बच्चों को बुरी नज़र से बचाने के लिए काला टीका लगाने के पीछे ये सच्चाई है
संसार में हर वस्तु व हर व्यक्ति के इर्दगिर्द एक ऊर्जा होती है और जितनी तेज़ी से नकारात्मक ऊर्जा फैलती है, उससे कम तेज़ी से सकारात्मक ऊर्जा फैलती है. जब भी हम किसी व्यक्ति के संपर्क में आते हैं, तो उसकी ऊर्जा हमें प्रभावित करने लगती है. अगर व्यक्ति से नकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगता है, तो वह ऊर्जा हमारे ऊपर भी भारी मात्रा में हावी होने लगती है. ऐसे लोग हमारी ऊर्जा को नकारात्मकता से प्रभावित कर हमारी ऊर्जा को तो नष्ट करते ही हैं, साथ ही हमारे प्रति बुरे विचार भी रखते हैं. ऐसे ही लोगों की बुरी नज़र हमें लगती है. इसी तरह जब हमें किसी से मिलकर अच्छा लगता है, तो ज़ाहिर-सी बात है कि वो व्यक्ति मन में हमारे लिए अच्छे विचार रखता है. ऐसे लोगों से मिलनेवाली तरंगें हमें अच्छा व मज़बूत बनाती हैं.

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श्रद्धा और सजगता, दोनों एक दूसरे के विरोधाभासी लगते हैं। जब तुम पूर्णतः जागरूक होते हो तो अक्सर श्रद्धा नहीं रहती और तुम व्याकुल एवं असुरक्षित महसूस करते हो। जब तुम किसी पर पूर्ण विश्वास कर के चलते हो अर्थात श्रद्धा से चलते हो, तब मन पूर्ण रूप से शांत एवं सुरक्षित महसूस करता है और विश्राम में रहता है। पर, तब तुम जागरूक नहीं रहते!

Gurudev Sri Sri Ravi Shankar

श्रद्धा तीन प्रकार की होती है

1) तामसिक श्रद्धा 
तामसिक श्रद्धा आलस्य से उत्त्पन्न होती है। जैसे, जब तुम कोई जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते हो, या आलस्यवश कोई काम नहीं करना चाहते, तब तुम कहते हो कि, ‘कोई बात नहीं, भगवान सब ठीक कर देंगे।’ (सब हंसते हैं।)

2) राजसिक श्रद्धा
जब तुम इच्छा और तृष्णा के तीव्र वेग के कारण श्रद्धा का सहारा लेते हो, तब इच्छापूर्ति की तीव्र पिपासा ही तुम्हारी श्रद्धा को जीवित रखती है। ये राजसिक श्रद्धा है।

3) सात्विक श्रद्धा
ऐसा विश्वास, ऐसी श्रद्धा जो निष्कपट हो, भोलापन लिए हो और जो हमारी चेतना की पूर्णता से उत्पन्न हुई हो, वह सात्विक श्रद्धा है।

 

श्रद्धा से यदि इच्छा पूरी न हो तो क्या करें? जानने के लिए देखें गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर का ये वीडियो:

 

श्रद्धा एवं जागरूकता मनुष्य को ज्ञानी बनाते हैं
श्रद्धा एवं जागरूकता भले ही एक दूसरे के विरोधाभासी लगते हों, परन्तु वे एक दूसरे के पूरक है| श्रद्धा के बिना तुम्हारा आंतरिक विकास संभव नहीं है। और, बिना सजगता के तुम कुछ भी भली-भांति समझ नहीं पाओगे। श्रद्धा तुम्हे आनंद के मार्ग पर ले जाती है और सजगता तुम्हें व्याकुल रखती है।

जहां विश्वास ( श्रद्धा) नहीं है वहां भय रहता है, और जब जागरूकता कि कमी हो तो न तो तुम कुछ ठीक से समझ पाओगे और न ही उसे ठीक से व्यक्त कर पाओगे। अतः दोनों का मिश्रण अत्यंत आवश्यक है।

ज्ञान में स्थित होकर सजग रहने से तनाव विहीनता आती है, श्रद्धा आती है और आनंद आता है। शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है श्रद्धा से उत्पन्न मूर्खता (राजसिक श्रद्धा) के तत्वों अर्थात आलस्य को मिटाना एवं जागरूकता से उत्पन्न भय और व्याकुलता को भी मिटाना। यह एक अनोखा एवं अतुल्य मिश्रण है। अगर तुम्हारे अन्दर श्रद्धा एवं जागरूकता एक साथ दोनों ही हैं तो तुम सही मायनों में एक ज्ञानी बन जाओगे।

 

श्रद्धा एवं जागरूकता को सही मायने में समझने के लिए देखें गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर का ये वीडियो:

 

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