Hindu Rituals

हमने अपनी नानी-दादी को कहते सुना है कि सिंदूर का गिरना बहुत अशुभ संकेत है इसीलिए वो सिंदूर को बहुत संभालकर रखती थीं. क्या वाकई सिंदूर का गिरना अशुभ होता है? सिंदूर गिरने के शुभ-अशुभ संकेत के बारे में बता रही हैं एस्ट्रो-टैरो-न्यूमरोलॉजी-वास्तु व फेंगशुई एक्सपर्ट मनीषा कौशिक.

Sindoor

सिंदूर का गिरना अशुभ क्यों माना जाता है?
अगर हम सिंदूर गिरने के बारे में जानने की कोशिश करें, तो मान्यताओं के अनुसार, सिंदूर का गिरना एक अशुभ घटना है और यह पति पर आयु संकट जैसी अशुभता का संकेत होता है. इसी डर से महिलाएं सिंदूर को बहुत संभालकर रखती हैं और उसे कभी ज़मीन पर गिरने नहीं देतीं.

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क्या वाकई सिंदूर का गिरना अशुभ होता है?
वैज्ञानिक दृष्टि से देखें, तो सिंदूर के बिखरने से कुछ भी शुभ या अशुभ नहीं होता है, ये महिलाओं का वहम मात्र है. फेरों के समय दुल्हन की मांग में अभिमंत्रित करके ईश्‍वर के आशीर्वाद के रूप में सिंदूर भरा जाता है. ऐसे में शादीशुदा महिलाओं के लिए सिंदूर बहुत ही पवित्र चीज़ हो जाती है और इसके बिखरने से उनका मन दुखी हो जाता है और उनके मन में कई तरह की शंकाएं होने लगती हैं. धार्मिक भावनाओं के कारण महिलाओं का सिंदूर से बहुत जुड़ाव होता है और वो उसे बहुत संभालकर रखती हैं.

अक्सर हम अपने बड़े-बुज़ुर्गों को कहते सुनते हैं कि घर से बाहर निकलते समय दही-चीनी खाकर निकलो. हमारी मां भी परीक्षा के समय, इंटरव्यू देने या विदेश जाते समय हमें दही-चीनी खिलाकर घर से भेजती थीं. क्या वाकई दही-चीनी खाकर घर से निकलने से शुभता आने लगती है, काम में आनेवाली अड़चनें दूर होती हैं और हमारे कार्य अच्छी तरह संपन्न होते हैं?

Curd And Sugar

शुभ काम के लिए दही-चीनी खाकर घर से निकलने के पीछे ये मान्यता है
दही और शक्कर दोनों ही चीज़ें सफ़ेद हैं और दोनों का संबंध चंद्रमा से है. चंद्रमा हमारे मन को नियंत्रित करता है. दही और शक्कर खाने से हमारे मन को ठंडक मिलती है और इससे हमारा पाचनतंत्र शांत रहता है. इसीलिए दही और शक्कर खाकर घर से निकलने को शुभ माना जाता है.

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Curd And Sugar

शुभ काम के लिए दही-चीनी खाकर घर से निकलने के पीछे ये सच्चाई है

  • दही बहुत सारे विटामिन्स और मिनरल्स से भरपूर है.
  • जब भी हम कोई महत्वपूर्ण काम करने निकलते हैं, तो हमारे दिल-दिमाग़ में बहुत हलचल चल रही होती है, जिसका असर हमारी सेहत और पाचनतंत्र पर भी पड़ता है. इससके कारण हमें एसिडिटी की तकलीफ़ हो सकती है. एसिडिटी होने पर हम असहज महसूस करते हैं, जिससे हमारे काम में रुकावट पैदा हो सकती है. ऐसे में दही एक कूलिंग एजेंट का काम करता है और हम जो भी खाते हैं उसे पचाने में सहायता करता है.
  • इसी तरह चीनी यानी शुगर हमारे शुगर लेवल का बैलेंस बनाए रखती है. जब पाचनतंत्र और शुगर लेवर सही रहता है तो हमारे शरीर में ऊर्जा बनी रहती है और हम अपना काम मन लगाकर कर पाते हैं.
    यही वजह है कि हमारे बड़े-बुज़ुर्ग घर से बाहर निकलने से पहले हमें दही-चीनी खिलाते थे.

राह चलते यदि बिल्ली रास्ता काट ले, तो कई लोग रास्ता बदल लेते हैं या वहीं रुककर उस रास्ते से किसी और के निकलने का इंतज़ार करते हैं. उनके मन में ये डर रहता है कि बिल्ली के रास्ता काटने से उनका काम बिगड़ सकता है. साथ ही बिल्लियों से जुड़े कई अंधविश्वास भी हैं, जिन पर लोग आज भी विश्वास करते हैं. बिल्ली का रास्ता काटना अशुभ क्यों माना जाता है, इसके बारे में बता रही हैं एस्ट्रो-टैरो-न्यूमरोलॉजी-वास्तु व फेंगशुई एक्सपर्ट मनीषा कौशिक.

Cat Crossing Road

ये है बिल्ली के रास्ता काटने से जुडी मान्यता
कई लोगों की ये धारणा है कि राह चलते यदि बिल्ली रास्ता काट ले, तो उस काम में रुकावट आ जाती है या कोई दुर्घटना हो सकती है. यह भी मान्यता है कि बिल्ली की ज्ञानेंद्रियां बहुत तेज़ होती हैं. कुछ भी अशुभ होने से पहले उसे इसका आभास हो जाता है. इसीलिए माना जाता है कि बिल्ली यदि रोये तो मृत्यु तुल्य दुख होता है, बिल्ली सिर चाटे वाद-विवाद या मुकदमे के शिकार होते हैं.

ये है बिल्ली के रास्ता काटने से जुडी सच्चाई
पुराने समय में ज़्यादातर घर खुले होते थे. ऐसे में बिल्ली घर में आकर दूध पी जाती थी, दही, मक्खन आदि जूठा कर देती थी. बिल्ली द्वारा किए जाने वाले नुकसान के कारण लोग उसे घर के आसपास नहीं आने देते थे. घर के लोगों को बिल्ली से दूर रखने के लिए लोग उसे अशुभ कहते थे.

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Cat Superstitions

ये हैं बिल्लियों से जुड़े 12 अंधविश्वास

1) ऐसी मान्यता है कि कुत्ते की तरह बिल्ली की भी छठी इन्द्री काफी विकसित होती है, जिसके कारण वो भविष्य में होनेवाली घटनाओं को पहले जान लेती है.
2) यदि आप सोये हुए हैं और बिल्ली आकर सिर चाटने लगे, तो आप सरकारी मामले में फंस सकते हैं.
3) बिल्ली यदि आपके पैर चाटे, तो इसे निकट भविष्य में बीमार होने का संकेत माना जाता है.
4) बिल्ली यदि आपके ऊपर से कूद कर चली जाए, तो आपको तकलीफ सहनी पड़ सकती है.
5) ज्योतिषशास्त्र में बिल्ली को राहु की सवारी कहा गया है, इसलिए जिनकी कुण्डली में राहु शुभ नहीं है, उन्हें राहु के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए बिल्ली पालना चाहिए.
6) बिल्ली की जेर को लाल कपड़े में लपेटकर बाजू पर बांधने से कालसर्प दोष से बचाव होत है.
7) नज़र दोष, प्रेत बाधा आदि में बिल्ली की जेर बांधने से लाभ होता है.
8) बिल्ली अगर घर में आकर रोने लगे, तो कोई अनहोनी घटना हो सकती है.
9) बिल्लियों का आपस में लड़ना धन हानि तथा किसी से लड़ाई का संकेत होता है.
10) दीपावली की रात घर में बिल्ली का आना शुभ माना जाता है, इससे लक्ष्मीजी घर आती हैं और घर में कभी भी किसी चीज़ की कमी नहीं रहती.
11) बिल्ली यदि घर में बच्चे को जन्म देती है तो इसे भी शुभ माना गया है.
12) यदि आप किसी शुभ कार्य से कहीं जा रहे हैं और बिल्ली मुंह में मांस का टुकड़ा लिए हुए दिखाई दे, तो काम सफल होता है.

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हम सब के साथ कभी न कभी ऐसा अवश्य हुआ है कि हम पूजा करने के लिए ज्योत जगाते हैं और किसी कारणवश दीया बुझ जाता है. ऐसा होते ही हम या हमारे आसपास खड़े लोगों के मन में शंका व वहम घर कर जाता है कि न जाने अब क्या अशुभ होगा. क्या सही में ज्योत का बुझ जाना अशुभ संकेत है? शुभ-अशुभ मान्यताओं की सच्चाई बता रही हैं एस्ट्रो-टैरो-न्यूमरोलॉजी-वास्तु व फेंगशुई एक्सपर्ट मनीषा कौशिक.

Lamp

पूजा करते समय दीया बुझ जाने को अशुभ क्यों माना जाता है?
किसी पूजा-अनुष्ठान में या घर में पूजा करते हुए यदि दीया बुझ जाता है, तो सभी लोग परेशान हो जाते हैं. दीया बुझने को ज़्यादातर लोग अशुभ संकेत मानते हैं. कई लोग ये भी मानते हैं कि भगवान ने पूजा स्वीकार नहीं की. हमारे घर के बड़े दीया बुझने को अशुभ मानते हैं इसलिए हम भी दीया बुझ जाने से घबरा जाते हैं.

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Diwali Lamp

पूजा करते समय दीया बुझ जाए, तो करें ये…
अगर हम ज्योत जलाने की प्रक्रिया को शुरू से देखें, तो वो इस प्रकार होगी- सबसे पहले हम मंदिर में ज्योत के दीये को धोकर साफ़ करते हैं, फिर रूई या कलावा की बत्ती बनाते हैं. कुछ लोग इस बत्ती को बनाने के लिए दो बूंद पानी का इस्तेमाल भी करते हैं. उसके बाद दीये के बीच उस ज्योत को स्टैंड में लगा उसमें घी या तेल डालते हैं. इस प्रक्रिया में दीये को धोते समय ठीक से सुखाया न जाए या दीये के स्टैंड को ठीक से दाफ़ न किया जाए या फिर बत्ती बनाते समय उसमें ज़्यादा पानी लग जाए, तो ज्योत ठीक से नहीं जलेगी. ऐसी स्थिति में दीया बुझ भी सकता है. दीया बुझ जाने को अशुभ मानने की कोई ज़रूरत नहीं है. ईश्‍वर से क्षमा मांगकर आप फिर से दीया जला लें.

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भारत में पितृपक्ष का बड़ा महत्व है. हमारे देश में पूर्णिमा से अमावस्या तक 15 तिथियां पितरों के निमित श्राद्ध कर्म के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती हैं. इस दौरान सभी लोग अपने पितरों का स्मरण करते हुए श्राध्द कर्म करते हैं. जो पूर्वज हमें छोड़कर चले गए हैं, उनका आभार प्रकट करने के लिए और उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए पितृपक्ष के दौरान उन्हें तर्पण दिया जाता है. ऐसी मान्यता है कि पितृपक्ष में यमराज इन्हें कुछ समय के लिए मुक्त कर देते हैं, ताकि ये धरती पर जाकर अपने वंशजों से तर्पण ग्रहण कर सकें. पितृपक्ष शुरू हो गया है इसलिए पितृपक्ष से जुड़ी कुछ ज़रूरी बातें हम सभी को मालूम होनी चाहिए.

Pitru Paksha 2019

* पितृपक्ष के दौरान सभी लोग अपने पितरों के लिए पिंडदान, तर्पण, हवन और अन्नदान करते हैं. यदि आपको अपने पितरों के श्राध्द की तिथि मालूम नहीं है, तो अपने ब्राह्मण से इसकी जानकारी ले लें. यदि आपको अपने पितरों की मृत्यु के दिन की सही जानकारी नहीं है तो आप सर्वपितृ अमावस्या के दिन उनका श्राध्द कर सकते हैं.

* पितरों को तर्पण देने के लिए दाएं कंधे पर जनेऊ रखकर काले तिल मिश्रित जल से दक्षिण की तरफ मुंह करके तर्पण किया जाता है. ब्राह्मण के निर्देशानुसार तर्पण की सभी क्रियाएं की जाती हैं. फिर ब्राह्मण को फल-मिष्ठान खिलाकर दक्षिणा दी जाती है.

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* श्राध्द के भोजन में दूध, चावल, घी आदि से बनी तरह-तरह की चीज़ें बनाई जाती हैं. श्राध्द के भोजन में लहसुन, प्याज़, बैगन, उड़द, मसूर, चना आदि का प्रयोग नहीं किया जाता है. इस भोजन को कौवे, गाय, कुत्ते को खिलाया जाता है. फिर सभी परिजन साथ मिलकर ये भोजन ग्रहण करते हैं.

* श्राध्द के दिन शराब-धूम्रपान आदि से दूर रहना चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए. पूरी श्रद्धा से अपने पूर्वजों का स्मरण करना चाहिए.

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मंदिर में या फिर घर पर जब भी कोई पूजा होती है, तो चरणामृत (Charanamrit) या पंचामृत (Panchamrit) दिया है. मगर कई लोग इसकी महिमा और इसके बनने की प्रक्रिया को नहीं जानते. आइए, हम आपको इन दोनों के बारे में विस्तार से बताते हैं.

Charanamrit And Panchamrit

चरणामृत क्या है?
चरणामृत का अर्थ होता है भगवान के चरणों का अमृत और पंचामृत का अर्थ पांच अमृत यानि पांच पवित्र वस्तुओं से बना हुआ. दोनों का ही अपना महत्व है और दोनों को ही पूजा में विशेष महत्व दिया जाता है. चरणामृत को तांबे के बर्तन में रखा जाता है. तांबे के बर्तन में चरणामृत रूपी जल रखने से उसमें तांबे के औषधीय गुण आ जाते हैं. चरणामृत में तुलसी का पत्ता, तिल और दूसरे औषधीय तत्व मिले होते हैं. आयुर्वेद के अनुसार तांबे में अनेक रोगों को नष्ट करने की क्षमता होती है और तुलसी के रस से कई रोग दूर हो जाते हैं.

Charanamrit

पंचामृत क्या है?
पंचामृत यानी ‘पांच अमृत’. पंचामृत दूध, दही, घी, शहद और शक्कर को मिलाकर बनाया जाता है. इसी से ईश्वर का अभिषेक किया जाता है. पांचों प्रकार के मिश्रण से बनने वाला पंचामृत कई रोगों में लाभ दायक और मन को शांति प्रदान करता है. पंचामृत का सेवन करने से शरीर पुष्ट और रोगमुक्तरहता है. पंचामृत से जिस तरह हम भगवान को स्नान कराते हैं, ऐसा ही खुद स्नान करने से शरीर की कांति बढ़ती है. पंचामृत उसी मात्रा में सेवन करना चाहिए, जिस मात्रा में किया जाता है, उससे ज़्यादा नहीं.

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Panchamrit

आरती के बाद चरणामृत क्यों दिया जाता है?
क्या आप जानते हैं कि आरती के बाद चरणामृत क्यों दिया जाता है? पूजा में चरणामृत का विशेष महत्व है. हम सब आरती के बाद चरणामृत ग्रहण करते हैं, लेकिन ऐसा क्यों किया जाता है, इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को ही होती है. आरती के बाद चरणामृत क्यों दिया जाता है? आइए, हम आपको बताते हैं.

चरणामृत की धार्मिक मान्यता
पूजन आदि के बाद तांबे के पात्र में रखा तुलसीदल से युक्त चरणामृत दिया जाता है. चरणामृत भक्तों के सभी प्रकार के दुख और रोगों का नाश करता है तथा इससे संपूर्ण पापों का शमन होता है.

चरणामृत का वैज्ञानिक महत्व
आयुर्वेद में यह माना गया है कि तांबे में अनेक रोगों को नष्ट करने की शक्ति होती है. इसका जल मेधा, बुद्धि व स्मरणशक्ति को बढ़ाता है. इसमें तुलसीदल डालने के पीछे मान्यता यह है कि तुलसी का पत्ता महौषधि है. इसमें न केवल रोगनाशक गुण होते हैं, बल्कि कीटाणुनाशक शक्ति भी होती है. चरणामृत में तुलसी-पत्र, केसर तथा स्वर्णकण-संघटित शालग्राम का जल धार्मिक दृष्टि से तो उपयोगी है ही, इसका जल बलवृद्धि टॉनिक भी है, जिसके प्रतिदिन सेवन से किसी भी रोग के कीटाणु शरीर में नहीं पनपते.

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जब भी हमारे घर में पूजा-पाठ, हवन, उत्सव या शादी-विवाह जैसे शुभ कार्य होते हैं, तो घर में शंख ज़रूर बजाया जाता है. क्या आप जानते हैं ऐसा क्यों किया जाता है? धार्मिक कार्यों में शंख बजाने की परंपरा क्यों है और इसका वैज्ञानिक महत्व क्या है? चलिए, हम आपको बताते हैं.

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धार्मिक मान्यता
सभी धर्मों में शंखनाद को पवित्र माना गया है इसीलिए पूजा-पाठ, उत्सव, हवन, विवाह आदि शुभ कार्यों में शंख बजाना शुभ व अनिवार्य माना जाता है. मंदिरों में भी सुबह-शाम आरती के समय शंख बजाया जाता है.

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वैज्ञानिक महत्व
वैज्ञानिक मानते हैं कि शंख फूंकने से उसकी ध्वनि जहां तक जाती है, वहां तक के अनेक बीमारियों के कीटाणु ध्वनि-स्पंदन से मूर्छित हो जाते हैं या नष्ट हो जाते हैं. यदि रोज़ शंख बजाया जाए, तो वातावरण कीटाणुओं से मुक्त हो सकता है. बर्लिन विश्‍वविद्यालय ने शंखध्वनि पर अनुसंधान कर यह पाया कि इसकी तरंगें बैक्टीरिया तथा अन्य रोगाणुओं को नष्ट करने के लिए उत्तम व सस्ती औषधि हैं. इसके अलावा शंख बजाने से फेफड़े मज़बूत होते हैं, जिससे श्‍वास संबंधी रोगों से बचाव होता है.

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शंख में जल भरकर पूजा स्थान में रखा जाता है और पूजा-पाठ, अनुष्ठान होने के बाद श्रद्धालुओं पर उस जल को छिड़का जाता है. इस जल को छिड़कने के पीछे मान्यता यह है कि इसमें कीटाणुनाशक शक्ति होती है, क्योंकि शंख में जो गंधक, फास्फोरस और कैल्शियम की मात्रा होती है, उसके अंश भी जल में आ जाते हैं. इसलिए शंख के जल को छिड़कने और पीने से स्वास्थ्य सुधरता है. यही वजह है कि बंगाल में महिलाएं शंख की चूड़ियां पहनती हैं.

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