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पेट का मानसिक स्वास्थ्य से कनेक्शन (Is there a connection between the stomach and mental disorders?)

आमतौर पर देखा गया है कि अधिकांश लोग जब मानसिक तौर पर परेशान होते हैं तो उसका प्रभाव उनके पेट पर पड़ता है. जैसे- कई लोगों को अचानक उल्टी जैसा महसूस होता है, कइयों को भूख नहीं लगती और कुछ लोग बार-बार टॉयलेट के चक्कर काटने लगते हैं. लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि आपके मानसिक टेंशन की वजह से आपका पेट क्यों अपसेट होता है या फिर जब आपका पेट अपसेट होता है तो फिर आप मानसिक तौर पर सुस्त और तनावग्रस्त क्यों नज़र आते हैं? ऐसे में यह सवाल उठना लाज़मी है कि पेट और मानसिक स्वास्थ्य के बीच आख़िर क्या कनेक्शन है? इसलिए इसके बारे में विस्तार से जानकारी दे रही हैं, मुंबई के एस.एल. रहेजा हॉस्पिटल व बांद्रा के डॉ. रॉय हेल्थ सॉल्युशन मल्टीस्पेशलिटी क्लिनिक की गैस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट हेपेटोलॉजिस्ट और लिवर ट्रांसप्लांट फिज़िशियन डॉक्टर प्रियंका उदावत.

stomach and mental disorders

पेट और दिमाग़ के बीच कनेक्शन
पेट के गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सिस्टम और दिमाग़ के बीच काफ़ी गहरा कनेक्शन है. जिस तरह से दिमाग़ में एक सेंट्रल नर्वस सिस्टम होता है, ठीक उसी तरह से पेट में भी एक नर्वस सिस्टम होता है. दिमाग़ के सेंट्रल नर्वस सिस्टम और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सिस्टम के बीच माइक्रोबायोटा के ज़रिए संपर्क होता है. माइक्रोबायोटा पेट में मौजूद बैक्टीरिया और यीस्ट (किण्व) का एक समुदाय है, जबकि करोड़ों-अरबों की संख्या में पेट में पाए जाने वाले बैक्टीरिया और यीस्ट को माइक्रोबायोम कहते हैं. ये हमारे गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सिस्टम में मौजूद केमिकल्स व हानिकारक टॉक्सिन्स को शरीर से बाहर निकालने में मदद करते हैं और पाचन क्रिया को दुरुस्त बनाते हैं. इस प्रक्रिया से ऐसे न्यूरोट्रांसमीटर्स निकलते हैं, जो सुचारु रूप से कार्य करने में मस्तिष्क की मदद करते हैं. उधर, पेट में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया, जिन्हें प्रोबायोटिक्स कहते हैं, वे पेट को स्वस्थ बनाए रखने में सहायता करते हैं. आपको यह जानकर आश्‍चर्य होगा कि व्यक्ति की रोग-प्रतिरोधक क्षमता का क़रीब 70 फ़ीसदी हिस्सा पेट के गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सिस्टम में ही पाया जाता है.

पेट कैसे जुड़ा है मस्तिष्क से?
व्यक्ति का पेट एंडोक्राइन पाथवे, न्यूरो पाथवे और इम्यून पाथवे के ज़रिए मस्तिष्क से जुड़ा होता है. ये सभी नर्वस सिस्टम और ब्लड सर्कुलेशन के माध्यम से पेट और मस्तिष्क के बीच संदेश पहुंचाने का काम करते हैं. इन सब में वेगस नर्वस सिस्टम सीधे तौर पर मस्तिष्क से पेट के गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सिस्टम से जुड़ा होता है, जो दिमाग़ और पेट से जुड़ी तमाम जानकारियां एक-दूसरे तक पहुंचाने का काम करता है. ऐसे में अगर कोई व्यक्ति मानसिक तौर पर अस्वस्थ महसूस करता है, तो इसका असर सीधा उसके पेट पर दिखाई देता है. इससे व्यक्ति का मूड़ ख़राब होता है और वो अवसाद, चिंता व तनाव जैसी मानसिक बीमारियों का शिकार हो जाता है.

पेट से जुड़ी बीमारियां
अगर किसी व्यक्ति को बचपन में पेट से जुड़ी समस्या रही है तो बड़े होने के बाद भविष्य में उसका मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है. इस विषय पर कई यूनिवर्सिटीज़ में रिसर्च भी हो रही है और ज़्यादातर मामलों में यही पाया गया है कि गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सिस्टम लोगों में गंभीर डिप्रेशन और एंज़ायटी का कारण बनता है. गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सिस्टम को शरीर का दूसरा मस्तिष्क भी कहा जाता है, इसलिए जब गुड और बैड बैक्टीरिया के बीच संतुलन बिगड़ जाता है तो इसका पाचन क्रिया पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. ऐसे में शरीर में मौजूद हानिकारक टॉक्सिन्स टॉयलेट या यूरिन के ज़रिए बाहर नहीं निकल पाते हैं और ये टॉक्सिन्स धीरे-धीरे शरीर के दूसरे अंगों के साथ-साथ दिमाग़ को प्रभावित करते हैं, जिससे व्यक्ति में डिप्रेशन, एंज़ायटी जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं.
1- एसिडिटीः हम जो भी खाते हैं, उसे पचाने के लिए पेट में एसिड की आवश्यकता होती है, लेकिन जब उसी एसिड की मात्रा अधिक हो जाती है तो यह एसिडिटी का कारण बन जाती है. एसिडिटी होने पर पेट में जलन, खट्टी डकार, अनिद्रा, भूख न लगना, चिड़चिड़ापन जैसी समस्याएं होने लगती हैं.
2- कब्ज़ः अगर किसी व्यक्ति को टॉयलेट करने में दिक्कत होती है या फिर उसका मल काफ़ी टाइट होता है और वो एक या दो दिन के अंतराल पर टॉयलेट जा रहा है तो इसका अर्थ यह है कि वो कब्ज़ से पीड़ित है. कब्ज़ होने पर गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सिस्टम की सफ़ाई सही तरी़के से नहीं हो पाती है और पेट में मौजूद विषाक्त पदार्थ बाहर नहीं निकल पाते हैं. कई अध्ययनों में यह पाया गया है कि कब्ज़ की वजह से एंज़ायटी, डिप्रेशन, मूड में बदलाव, पैनिक डिसऑर्डर और शरीर में दर्द जैसी स्वास्थ्य समस्याओं के होने की संभावना अधिक होती है.
3- अपचः खाना खाने के बाद पेट में भारीपन, उल्टी जैसा महसूस होना, पेट में दर्द, सीने में जलन और गैस बनाना इत्यादि अपच या ख़राब पाचन के आम लक्षण हैं. कई अध्ययनों में इस बात का ख़ुलासा हो चुका है कि अपच या ख़राब पाचन मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है.
4- ग्लूटेन के प्रति अतिसंवेदनशीलताः  कई लोग ग्लूटेन यानी व्हीट प्रोटीन के प्रति अतिसंवेदनशील होते हैं. इसका सेवन करने पर उनके पेट में ग्लूटेन के प्रति एंटीबॉडीज़ का निर्माण होता है, जो पाचन क्रिया को प्रभावित करते हैं. ऐसे में ज़रूरी पोषक तत्व शरीर में अवशोषित नहीं हो पाते हैं और व्यक्ति को एनीमिया की शिक़ायत हो सकती है. इससे पीड़ित बच्चे कुपोषण का शिकार हो सकते हैं और उनका शारीरिक विकास प्रभावित हो सकता है. दरअसल, ग्लूटेन पेट के हेल्दी बैक्टीरिया को प्रभावित कर सकता है, इसलिए इसके प्रति अतिसंवेदनशील व्यक्तियों को ग्लूटेन युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन बंद कर देना चाहिए.
5- इरिटेबल बाउल सिंड्रोमः पेट से जुड़ी इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति का नर्वस सिस्टम अतिसंवेदनशील हो जाता है. इरिटेबल बाउल सिंड्रोम से पीड़ित व्यक्ति जब भी कुछ खाता है तो उसे बार-बार टॉयलेट के चक्कर लगाने पड़ते हैं. ऐेसे लोगों को खाने के बाद पेट में मरोड़, पेट फूलना, कब्ज़, डायरिया, सीने में जलन, लिवर का स्लो होना जैसी समस्याएं हो सकती हैं, जिससे उन्हें एंज़ायटी और डिप्रेशन जैसी मानसिक परेशानियां भी हो सकती हैं. इसके विपरीत अगर कोई व्यक्ति एंज़ायटी का शिकार है तो उसे भी पेट से जुड़ी यह बीमारी हो सकती है.

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पेट से जुड़ी मानसिक बीमारियां
ब्ज़, एसिडिटी, अपच और आईबीएस जैसी पेट से जुड़ी परेशानियां व्यक्ति को एंज़ायटी, डिप्रेशन, डिप्रेसिव डिसऑर्डर, सिरदर्द जैसी मानसिक बीमारियां दे सकती हैं. इन बीमारियों के अलावा बच्चों में ऑटिज्म और एडीएचडी यानी अटेंशन डेफिशिएंसी हाइपरकाइनेटिक डिसऑर्डर के ख़तरे को बढ़ा सकती हैं.
1- डिप्रेशनः आज के इस दौर में अधिकांश लोग डिप्रेशन के शिकार हैं. नींद न आना, अपने पसंदीदा कामों में अरुचि, भूख न लगना या ज़्यादा खाना, निराशा-हताशा, लोगों से अलग-थलग रहना इत्यादि डिप्रेशन के लक्षण हैं. 2- ऑटिज्मइससे पीड़ित बच्चे अकेले रहना पसंद करते हैं, लोगों से बात करना या मेलजोल बढ़ाना उन्हें अच्छा नहीं लगता. वो अकेले ही अपनी दुनिया मंें खोए रहते हैं. उनका आईक्यू लेवल कमज़ोर होता है और उनमें सीखने व व्यावहारिकता की भी कमी देखी जाती है.
3- एडीएचडीएडीएचडीः अटेंशन डेफिशिएंसी हाइपरकाइनेटिक डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चा एक जगह पर बैठ नहीं सकता. वो इधर से उधर भागता ही रहता है. ऐसे बच्चों का किसी भी काम में मन नहीं लगता. दरअसल, ख़राब पाचन के चलते बच्चों में इसका ख़तरा ज़्यादा होता है. ऐसे में एडीएचडी से पीड़ित बच्चों को इलाज के लिए बिहेवियरल थेरेपिस्ट के पास भेजा जा सकता है.
4- स्किज़ोफ्रेनियाः इस रोग से पीड़ित व्यक्ति वास्तविकता से परे भ्रम की अपनी एक अलग दुनिया ही बना लेता है. उनका व्यवहार, सोच और उनकी बातें वास्तविकता से बिल्कुल परे होती हैं. उन्हें ऐसी आवाज़े सुनाई देती हैं, ऐसी चीज़ें दिखाई देती हैं, जो वास्तव में होती ही नहीं हैं. हालांकि यह एक असामान्य रोग है, लेकिन इसका संबंध भी पेट से पाया गया है. इससे पीड़ित मरीज़ों का अगर पेट ख़राब होता है तो इस रोग का असर उन पर ज़्यादा दिखाई देता है.
5- ओसीडीबहुतः ज़्यादा साफ़-सफ़ाई, बार-बार दरवाज़े के लॉक को चेक करना जैसी किसी ख़ास चीज़ को बार-बार करने की आदत ऑब्सेसिव कंप्लसीव डिसऑर्डर यानी ओसीडी के लक्षण हैं. इस बीमारी का भी पेट से कनेक्शन पाया गया है. अगर आपका हाज़मा ख़राब है या पेट से संबंधित कोई और समस्या है तो इस रोग के लक्षण ज़्यादा दिखाई दे सकते हैं.
6- अन्य मानसिक बीमारियां प आत्महत्या जैसा ख़्याल आना, पैनिक अटैक (एकदम से सांसों और धड़कनों का तेज़ हो जाना, हाथ-पैर कंपकंपाना इत्यादि) जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं में पेट का बहुत बड़ा रोल होता है. खान-पान में गड़बड़ी और एसिडिटी के कारण भी पैनिक अटैक बार-बार आ सकता है. प पोस्ट ट्रॉमैटिक डिसऑर्डर का भी पेट से कनेक्शन देखा गया है. अगर किसी व्यक्ति के जीवन में कोई दुखद घटना घटी है तो उस मेंटल ट्रॉमा की वजह से वो व्यक्ति गंभीर तनाव में जा सकता है, जिससे उसे एसिडिटी या पेट की समस्या हो सकती है.

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कैसे होता है इलाज?
अगर आपको पेट से जुड़ी समस्याओं के कारण मानसिक परेशानियों का सामना भी करना पड़ रहा है तो समय रहते स्पेशलिस्ट गैस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट से संपर्क करें, ताकि वो आपकी बीमारी के मूल कारण का पता लगाकर सही उपचार शुरू कर सकें. दरअसल, पेट से जुड़ी विभिन्न बीमारियों में अलग-अलग बैक्टीरिया के प्रभाव भी अलग-अलग दिखाई देते हैं. ऐसी स्थिति में आपके शरीर और आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए गैस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट आपको प्रोबायोटिक्स लेने की सलाह दे सकते हैं. प्रोबायोटिक्स विशेषज्ञ के सुझाव के अनुसार ही लेना चाहिए, ताकि उसका पूरा स्वास्थ्य लाभ आपको मिल सके.
वैसे पेट से जुड़ी तमाम बीमारियों के अलग-अलग तरी़के से इलाज किए जाते हैं. इसलिए मरीज़ की बीमारी के मूल कारण का पता लगाने के लिए डॉ प्रियंका उदावत एंडोस्कोपी के ज़रिए आंतों की जांच करती हैं. जांच के बाद वो दवाइयों के साथ-साथ हॉलीस्टिक तरी़के से मरीज़ का इलाज करती हैं. डायट काउंसलर और साइकोलॉजिस्ट की अपनी विशेष टीम के साथ मिलकर वे मरीज़ के डायट प्लान, लाइफस्टाइल में बदलाव के साथ-साथ मेडिटेशन, रिलैक्सेशन और ब्रीथ टेक्नीक के ज़रिए उनका इलाज करती हैं. उनका मानना है कि पेट की बीमारियों को कंट्रोल करने पर मरीज़ के मानसिक स्वास्थ्य में ख़ुद-ब-ख़ुद सुधार आने लगता है, लेकिन अगर मरीज़ को इससे फ़ायदा नहीं पहुंचता है तो इस स्थिति में उसे एक अनुभवी साइकलॉजिस्ट के पास जाने का सुझाव दिया जा सकता है, जहां वो काउंसलिंग के साथ बिहेवियरल थेरेपी और रिलैक्सेशन थेरेपी के ज़रिए मरीज़ का इलाज करते हैं. बावजूद इसके अगर मरीज़ को फ़ायदा नहीं होता है तो आख़िर में उसे एक साइकियाट्रिस्ट की मदद लेनी चाहिए.

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