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ह्यूमैनिटी कंज़र्वेशन: क्या इंसानियत को सहेजने का व़क्त आ गया है? (Humanity Conservation: Why Do We Need To Learn Humanities?)

Why Do We Need To Learn Humanities

Why Do We Need To Learn Humanities

हम ख़ुद को अन्य जीवों से बेहतर मानते हैं और कहा भी जाता है कि मनुष्य योनि में जन्म बड़ी ही मुश्किल से मिलता है. मनुष्य सभी जीवों में सबसे शक्तिशाली माना जाता है, क्योंकि वो सोचने-समझने की क्षमता सबसे अधिक रखता है, वो बोल सकता है, वो नए-नए आविष्कार कर सकता है, वो दुख-दर्द महसूस कर सकता है, वो अपनी भावनाएं व्यक्त कर सकता है, क्योंकि वो एक सामाजिक प्राणी है और उसमें मानवी भावनाएं हैं. लेकिन क्या सचमुच ऐसा ही है, जैसा हम सोचते हैं? हम ख़ुद को सर्वश्रेष्ठ तो मानते हैं, लेकिन कहीं न कहीं समय के साथ-साथ हमारी इंसानियत खोती जा रही है. अगर ऐसा न होता, तो कई तरह के अमानवीय पहलू हमें देखने को न मिलते.

  • बच्चे अपने बूढ़े माता-पिता से पीछा छुड़ाने के लिए उन्हें वृद्धाश्रमों में न छोड़ देते.
  • स़िर्फ पैसों व ज़रूरतों के लिए एक-दूसरे को हम इस्तेमाल न करते.
  • कहीं 7 महीने की बच्ची से बलात्कार, तो कहीं अपने ही पिता से शोषण का शिकार बेटी… कहीं अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति का ही क़त्ल, तो कहीं माता-पिता से पैसे ऐंठने के लिए ख़ुद के अपहरण की कहानी… इस तरह की ख़बरों से आजकल हमारे दिन की शुरुआत होती है. ज़ाहिर है, कहीं न कहीं कुछ तो ग़लत हो रहा है, जो हम इंसानियत भूलकर इस हद तक चले जाते हैं.
  • जब भी कोई इंसान ग़लत व्यवहार या अपराध करता है, तो हम उसकी तुलना जानवर से करते हैं, लेकिन जानवर तो कभी भी अपनी हदें पार नहीं करते. ये हम ही हैं, जो सीमाएं लांघते हैं और अपने इंसानी दंभ में सब कुछ भूलकर जघन्य अपराध तक कर डालते हैं.
  • ऐसे में यह सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या अब ज़रूरी हो गया है कि इंसानियत को बचाया जाए, सहेजा जाए?
  • हम वॉटर कंज़र्वेशन, एनर्जी कंज़र्वेशन, फ्यूअल कंज़र्वेशन, फॉरेस्ट और एनिमल कंज़र्वेशन आदि की बातें करते हैं, लेकिन शायद ही कभी ह्यूमैनिटी कंज़र्वेशन की तरफ़ हमारा ध्यान जाता हो.
  • दिन-ब-दिन बढ़ते अपराध, गिरते मानवी मूल्य और बढ़ते लालच के चलते बेहद ज़रूरी हो गया है कि सबसे ज़्यादा और सबसे पहले ह्यूमैनिटी कंज़र्वेशन की तरफ़ ध्यान दिया जाए.

कैसे किया जाए ह्यूमैनिटी कंज़र्वेशन?

  • बच्चे हमारे देश के भविष्य हैं. यही हमारे भविष्य के समाज के निर्माण में मुख्य भूमिका निभानेवाले हैं. ऐसे में ज़रूरी है कि बच्चों की नींव मज़बूत बने.
  • हमारे बच्चे हमसे ही सीखते हैं. हम झूठ और फरेब करेंगे, तो यह अपेक्षा न रखें कि बच्चे सब कुछ देखकर भी सच्चाई की राह पर चलेंगे. बेहतर होगा कि हम पहले ख़ुद को बदलें.
  • जितना संभव हो सके, सच्चाई और ईमानदारी से काम करें.
  • अपने बच्चों को भी यही सीख दें. स्वार्थ और झूठ की राह शुरुआत में तो बड़ी आसान लगती है, लेकिन इसके नतीज़े उतने ही घातक होते हैं.
  • स़िर्फ अपने बारे में सोचना ही काफ़ी नहीं है, अपने परिवार के अलावा, समाज व देश की बेहतरी के लिए प्रयास करने भी ज़रूरी हैं.
  • जैसा कि कहा जाता है- क्या हम अपने बच्चों के लिए बेहतर प्लानेट (धरती) छोड़कर जाएंगे…? इसी तरह से कुछ लोग यह भी कहते हैं कि क्या हम अपने प्लानेट के लिए बेहतर बच्चे छोड़कर जाएंगे? तो दोनों ही तरह से सोचना ज़रूरी है.
  • यदि अब हमने ह्यूमैनिटी कंज़र्वेशन पर ध्यान नहीं दिया, तो ज़ाहिर है बहुत कुछ हाथ से निकल जाएगा.

क्यों खोती जा रही है इंसानियत?

  • स्वार्थ और लालच के चलते हम सभी सबसे आगे रहने की ख़्वाहिश रखते हैं.
  • हम सबसे ज़्यादा पैसा कमाएं, हम सबसे ज़्यादा पॉप्युलर हो जाएं, अपने दोस्तों व रिश्तेदारों में हम सबसे अधिक कामयाब रहें… इस तरह की चाहत आम है.
  • कामयाब होना ग़लत नहीं, लेकिन ग़लत तरह से कामयाब होना या किसी और की कामयाबी को देखकर उससे ईर्ष्या रखना ग़लत है.
  • किसी के पास कार है, तो हमारे पास उससे भी बड़ी कार होनी चाहिए, पड़ोसी की टीवी से हमारी टीवी बड़ी होनी चाहिए, वो थाईलैंड के ट्रिप पर गए, तो हमें यूरोप ट्रिप पर जाना है… कुल मिलाकर दिखावे की ज़िंदगी आजकल हम पर हावी रहती है.
  • हमें ख़ुद को दिखाना है कि हम कामयाब हैं, ख़ुश हैं और सबसे ज़्यादा हम ‘कूल’ हैं.

सोशल मीडिया ने भी बदले हैं बहुत-से समीकरण

  • यह सच है कि सोशल मीडिया ने हमें क़रीब किया है, अपने पुराने दोस्तों से, रिश्तेदारों से व ढेर सारे नए अंजान चेहरों से भी.
  • लेकिन हम शायद इसे पचा नहीं पा रहे या इसका ओवरडोज़ इतना हो चुका है कि हम भटक रहे हैं.
  • हम दोहरी ज़िंदगी जीने लगे हैं. अपनी लाइफ को कूल दिखाने की कोशिश में लगे हैं, क्योंकि सोशल मीडिया के वो अंजान चेहरे, जो दोस्त बन चुके हैं, हमारे लिए इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं कि उन्हें इंप्रेस करने के लिए हम नकली ज़िंदगी जीने या दिखावा करने से भी परहेज़ नहीं करते.
  • इन सबके चलते हम अपने निजी रिश्तों को अपेक्षाकृत कम महत्व देने लगे हैं, हम उनसे दूर हो रहे हैं. ऐसे में भावनाएं, अपनापन, प्यार, मेलजोल, संस्कार आदि बैकवर्ड बातें हो गई हैं और प्रैक्टिकल बनना ही मॉडर्न और कामयाबी की निशानी मानी जाने लगी है.
  • पैरेंट्स भी सोशल मीडिया में बिज़ी हैं और बच्चे भी, ऐसे में कब, कहां और कैसे मूल संस्कार दिए जाएंगे? न व़क्त है और न ही हमें इसकी ज़रूरत महसूस होती है.

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कूल बनना है बहुत ज़रूरी…

  • जी हां, आपके पास महंगे गैजेट्स और ब्रान्डेड कपड़े-जूते हों, यही आपकी बेसिक ज़रूरतें या प्राथमिकता बन चुकी है.
  • दूसरी प्राथमिकता है कि आप सोशल मीडिया पर बहुत ही एक्टिव हों, वरना आप आउटडेटेड कहे जाएंगे.
  • ऐसे में यदि बच्चों को या युवाओं को समझाने बैठेंगे कि ये करो, ये मत करो, तो उन्हें लेक्चर से ज़्यादा कुछ नहीं लगेगा. बेहतर होगा कि आप ख़ुद एक उदाहरण के तौर पर अपने व्यवहार को आदर्श बनाएं, इससे वो बेहतर तरी़के से सीख पाएंगे.
  • ज़रूरी नहीं कि बच्चों की हर डिमांड को पूरा ही किया जाए, उन्हें अनुशासन का महत्व सिखाना भी बेहद ज़रूरी है.
  • अनुशासित युवा ही बेहतर इंसान भी बन सकेगा और सही-ग़लत के बीच के फ़र्क़ को भी समझेगा.
  • बच्चों को बचपन से ही यह एहसास कराना ज़रूरी है कि उनका संबंध स़िर्फ अपने परिवार से ही नहीं है, बल्कि देश व समाज के प्रति भी उनका कर्त्तव्य है. वो एक बेहतर नागरिक बनें, नियमों का पालन करें, समाज के लिए बेहतर इंसान बनें, सबको सम्मान दें.
  • बच्चों को यह समझाना भी महत्वपूर्ण है कि कूल बनने का सही अर्थ क्या होता है. एक अनुशासनहीन युवा कभी भी कूल नहीं होता, वो एंटीसोशल एलीमेंट होता है, जबकि सच के लिए खड़े रहनेवाला ही कूल होता है, जिसमें गट्स होता है, जो दूसरों के लिए भी आवाज़ उठाता है.
  • क्योंकि एकाएक अचानक यदि हम यह चाहें कि समाज बदल जाए, तो यह संभव ही नहीं, बदलाव के लिए समय व प्रयास दोनों ही ज़रूरी हैं और यह बदलाव हमें ही लाना होगा, तभी बेहतर समाज का निर्माण होगा और इंसानियत की जीत भी.

देश और समाज के प्रति भी हमारी ही ज़िम्मेदारी है…

  • हम बेहतर नागरिक बनें, बेहतर इंसान बनें यह हमारे व हमारे परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए सकारात्मक बात होगी.
  • ज़ाहिर-सी बात है, जब सामाजिक मूल्य ऊंचे होंगे, तो अपराध कम होंगे.
  • हम समाज के प्रति अधिक ज़िम्मेदार बनेंगे, ग़लत राह पर न ख़ुद चलेंगे और न ही दूसरों को चलने देंगे.
  • यह जज़्बा हरेक में होना चाहिए. न स़िर्फ अपने देश व समाज में बल्कि आज के दौर में विश्‍वभर में इंसानियत को सहेजने की बेहद आवश्यकता है.
  • यदि इंसानियत होती, तो आतंकी हमले न होते, यदि इंसानियत होती, तो दुनिया बारूद के ढेर पर न बैठी होती, यदि इंसानियत होती, तो सरहदों पर हथियार और बंदूकें नहीं होतीं… लेकिन यह इंसानियत सबमें नहीं है. आत्मरक्षा के लिए भी बहुत कुछ करना मजबूरी है. ऐसे में यदि हम शुरुआत अपने परिवार व समाज से करें, तो धीरे-धीरे ही सही, सफलता मिलेगी. लेकिन इसके लिए सतत प्रयास करने होंगे, वरना इंसानियत मरती जाएगी और यह शब्द स़िर्फ क़िस्से-कहानियों में ही सीमित होकर रह जाएगा.

सच्चाई बयां करते आंकड़े

  • नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के अनुसार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में सर्वाधिक हत्या व बलात्कार के मामले पाए जाते हैं.
  • यही नहीं, महिलाओं के ख़िलाफ़ भी सबसे अधिक अपराधों में उत्तर प्रदेश को सबसे आगे पाया गया.
  • रेप यानी बलात्कार के मामलों में पिछले वर्षों के मुक़ाबले लगभग 12.4 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी देखी गई.
  • इसके अलावा एक और तथ्य जो आंकड़ों से सामने आया है, वो यह कि 95% बलात्कार की शिकार महिलाएं अपराधी को पहचानती थीं.
  • अब तक बलात्कार को लेकर एक धारणा समाज में बनी हुई थी कि एक ख़ास तरह के लोग ही बलात्कार करते हैं और ख़ास क़िस्म की महिलाएं ही इसका शिकार होती हैं. समाज व परिवार की इसी सोच के चलते आज भी अधिकांश मामले दर्ज ही नहीं किए जाते.
  • आंकड़े बताते हैं कि 95% मामलों में पीड़िता अपराधी को पहचानती है. इसमें से 27% तो पड़ोसी ही होते हैं, 22% वो जो शादी का झूठा दिलासा देकर संबंध बनाते हैं, 9% घर-परिवार व नाते-रिश्तेदार होते हैं. इसी तरह से कहीं-कहीं एंप्लॉयर, को-वर्कर्स, पार्टनर आदि भी अपराधी होते हैं.
  • इंसानियत को शर्मसार करने के लिए ये आंकड़े काफ़ी हैं. इसी से यह अंदाज़ा लग जाता है कि आज की तारीख़ में सबसे अधिक यदि किसी बात की ज़रूरत है, तो वो है इंसानियत को सहेजने की.

– रामेश्‍वर दयाल शर्मा

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ह्यूमन ट्रैफिकिंग…शारीरिक शोषण और देह व्यापार मानव तस्करी का अमानवीय व्यापार…! ( Human Trafficking )

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न सपनों की ये दुनिया है, न ख़्वाबों का आसमान… अंधे हैं तमाम रास्ते यहां, अंधा है ये जहां… रूह को बेचकर हर बात होती है यहां इशारों में, जिस्मों को ख़रीदा जाता है मात्र चंद हज़ारों में. किससे शिकवा करें, किससे करें गिला, कुछ अजीब-से हैं इन गलियों के निशान… रिश्ते ढूंढ़ने पड़ते हैं जहां इश्तेहारों में, इंसान भी बिकते हैं यहां बाज़ारों में…

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ह्यूमन ट्रैफिकिंग (Human Trafficking) यानी मानव तस्कारी कहने को तो ग़ैरक़ानूनी है, लेकिन फिर भी यह हमारे समाज की गंभीर समस्या बनी हुई है. शारीरिक शोषण और देह व्यापार से लेकर बंधुआ मज़दूरी तक के लिए ह्यूमन ट्रैफिकिंग की जाती है.

–  ड्रग्स और हथियारों के बाद ह्यूमन ट्रैफिकिंग दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऑर्गनाइज़्ड क्राइम है.

– 80% मानव तस्करी जिस्मफ़रोशी के लिए होती है.

–  एशिया की अगर बात करें, तो भारत इस तरह के अपराध का गढ़ माना जाता है.

–  ऐसे में हमारे लिए यह सोचने का विषय है कि किस तरह से हमें इस समस्या से निपटना है.

–  मानव तस्करी में अधिकांश बच्चे बेहद ग़रीब इलाकों के होते हैं.

–  मानव तस्करी में सबसे ज़्यादा बच्चियां भारत के पूर्वी इलाकों के अंदरूनी गांवों से आती हैं.

– अत्यधिक ग़रीबी, शिक्षा की कमी और सरकारी नीतियों का ठीक से लागू न होना ही बच्चियों को मानव तस्करी का शिकार बनने की सबसे बड़ी वजह बनता है.

– इस कड़ी में लोकल एजेंट्स बड़ी भूमिका निभाते हैं.

–  ये एजेंट गांवों के बेहद ग़रीब परिवारों की कम उम्र की बच्चियों पर नज़र रखकर उनके परिवार को शहर में अच्छी नौकरी के नाम पर झांसा देते हैं.

– ये एजेंट इन बच्चियों को घरेलू नौकर उपलब्ध करानेवाली संस्थाओं को बेच देते हैं. आगे चलकर ये संस्थाएं और अधिक दामों में इन बच्चियों को घरों में नौकर के रूप में बेचकर मुनाफ़ा कमाती हैं.

– ग़रीब परिवार व गांव-कस्बों की लड़कियों व उनके परिवारों को बहला-फुसलाकर, बड़े सपने दिखाकर या शहर में अच्छी नौकरी का झांसा देकर बड़े दामों में बेच दिया जाता है या घरेलू नौकर बना दिया जाता है, जहां उनका अन्य तरह से और भी शोषण किया जाता है.

– नई दिल्ली के पश्‍चिमी इलाकों में घरेलू नौकर उपलब्ध करानेवाली लगभग 5000 एजेंसियां मानव तस्करी के भरोसे ही फल-फूल रही हैं. इनके ज़रिए अधिकतर छोटी बच्चियों को ही बेचा जाता है, जहां उन्हें घरों में 16 घंटों तक काम करना पड़ता है.

– साथ ही वहां न स़िर्फ उनके साथ मार-पीट की जाती है, बल्कि अन्य तरह के शारीरिक व मानसिक शोषण का भी वे शिकार होती हैं.

–  न स़िर्फ घरेलू नौकर, बल्कि जिस्मफ़रोशी के जाल में भी ये बच्चियां फंस जाती हैं और हर स्तर व हर तरह से इनका शोषण होने का क्रम जारी रहता है.

एक नज़र आंकड़ों पर…

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के नए आंकड़ों के अनुसार ट्रैफिकिंग में यह दूसरा सबसे बड़ा अपराध है, जो पिछले 10 सालों में 14 गुणा बढ़ा है और वर्ष 2014 में 65% तक बढ़ा है.

– लड़कियां और महिलाएं ट्रैफिकिंग के निशाने पर रहती हैं, जो पिछले दस सालों में देशभर के ह्यूमन ट्रैफिकिंग केसेस का 76% है.

–  ह्यूमन ट्रैफिकिंग के अंतर्गत ही अन्य जो केसेस रजिस्टर होते हैं, उनमें वेश्यावृत्ति के लिए लड़कियों को बेचना, विदेशों से लड़कियों को ख़रीदना और वेश्यावृत्ति के लिए लड़कियों की ख़रीद-फरोख़्त आदि आते हैं.

–  यदि भारत की बात की जाए, तो ह्यूमन ट्रैफिकिंग का जाल लगभग हर राज्य में फैला हुआ है. इसमें तमिलनाडु 9, 701 केसेस के साथ सबसे ऊपर है. उसके बाद 5861 केसेस के साथ आंध्र प्रदेश, 5443 केसेस के साथ कर्नाटक, 4190 केसेस के साथ पश्‍चिम बंगाल और 3628 केसेस के साथ महाराष्ट्र का नंबर आता है.

– ये 5 राज्य ह्यूमन ट्रैफिकिंग के मुख्य स्रोत और गढ़ भी हैं, जहां लड़कियों को रेड लाइट एरिया के लिए ख़रीदा व बेचा जाता है. ह्यूमन ट्रैफिकिंग के रिपोर्टेड केसेस में 70% इन्हीं राज्यों से आते हैं.

–  यूएन की रिपोर्ट के मुताबिक़ तमिलनाडु युवा लड़कियों की तस्करी मुंबई व दिल्ली के रेड लाइट इलाक़ों में करता है.

–  हालांकि पिछले कुछ समय से तमिलनाडु में इस तरह के मामलों की कमी देखी गई है, जबकि पश्‍चिम बंगाल में ये बढ़ रहे हैं.

–  वर्ष 2009 से लेकर 2014 के बीच ह्यूमन ट्रैफिकिंग के मामलों में 92% बढ़ोत्तरी हुई है.

–  इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि यह बहुत अधिक मुना़फे का धंधा है, ज़्यादा-से-ज़्यादा पैसा कमाने का लालच इस तरह के अपराधों के फलने-फूलने की बड़ी वजह बन रहा है.

– वर्ष 2014 में देशभर में ह्यूमन ट्रैफिकिंग के रजिस्टर्ड केसेस में 39% की बढ़ोत्तरी देखी गई. जैसा कि पहले भी हमने बताया है कि पिछले 6 वर्षों में 92% की बढ़ोत्तरी देखी गई है, जबकि वर्ष 2005 से लेकर 2009 के बीच इस तरह के मामलों में 55% तक की गिरावट देखी गई थी.

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क़ानूनी प्रावधान

इम्मॉरल ट्रैफिकिंग प्रिवेंशन एक्ट (आईटीपीए) के अनुसार अगर व्यापार के इरादे से ह्यूमन ट्रैफिकिंग होती है, तो 7 साल से लेकर उम्र कैद तक की सज़ा हो सकती है. इसी तरह से बंधुआ मंज़दूरी से लेकर चाइल्ड लेबर तक के लिए विभिन्न क़ानून व सज़ा का प्रावधान है. लेकिन सबसे बड़ी समस्या क़ानून को क्रियान्वित करने की ही है.

–  बात अगर सज़ा की की जाए, तो पिछले 5 सालों में ह्यूमन ट्रैफिकिंग के फाइल्ड केसेस में 23% में दोष सिद्ध हुआ.
–  इस मामले में लगभग 45,375 लोगों की गिरफ़्तारी हुई और 10,134 लोगों को दोषी क़रार दिया गया, जिसमें जुर्माने से लेकर जेल तक की सज़ा दी गई.

– पिछले 5 सालों में आंध्र प्रदेश में सर्वाधिक गिरफ़्तारियां हुईं, लगभग 7, 450 के क़रीब. महाराष्ट्र दूसरे नंबर पर आता है, उसके बाद कर्नाटक, तमिलनाडु और पश्‍चिम बंगाल हैं.

–  इन बढ़ते मामलों की एक वजह यह भी हो सकती है कि अब मामले अधिक दर्ज होने लगे हैं.

प्रशासनिक प्रयास

–  केंद्र सरकार विभिन्न राज्यों को फंड्स प्रदान करती है और वेब पोर्टल भी लॉन्च किया गया है, ताकि मानव तस्करी का यह अमानवीय व्यापार रुक सके या कम हो सके.

–  इसके अलावा महिला व बाल विकास विभाग ने भी पीड़ितों के बचाव व पुनर्वसन के लिए अपने प्रयास तेज़ किए हैं.

एनजीओ की भूमिका

कैथरिन क्लार्क, फाउंडर और सीईओ, ए सेलिब्रेशन ऑफ वुमेन: यह संस्था महिलाओं की विभिन्न समस्याओं पर काम करती है. कैथरिन क्लार्क कनाडा में रहती हैं, लेकिन संस्था के विभिन्न सदस्य विभिन्न देशों में काम करते हैं. कैथरिन के अनुसार ह्यूमन ट्रैफिकिंग न स़िर्फ विकासशील, बल्कि विकसित देशों की भी बड़ी समस्या है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस समस्या से हम किस तरह से जूझते हैं और पुनर्वसन के लिए किस तरह की योजनाएं हैं हमारे पास, क्योंकि भले ही हम लड़कियों को या बच्चों को इस कड़ी से बाहर निकाल लें, लेकिन सही तरी़के से पुनर्वसन के अभाव में वे फिर से इस कड़ी का हिस्सा बन जाते हैं. हमारी संस्था इस तरह के लोगों के लिए सेलिब्रेशन हाउसेस बनाती है और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने की दिशा में काम करती है. बच्चों को भी मानसिक रूप से क्लीन किया जाता है, उनकी काउंसलिंग होती है, ताकि उनके मन से वो ख़ौफ़ व बुरी यादें निकल सकें. इसी तरह के काम कई देशों में किए जाते हैं, जिन्हें काफ़ी सफलता भी मिली है.

ए सेलिब्रेशन ऑफ वुमेन से जुड़ी मितिका श्रीवास्तव भारत में एडवायज़र टू एशिया के तौर पर काम करती हैं. ह्यूमन ट्रैफिकिंग के संदर्भ में उन्होंने काफ़ी जानकारी दी है-

– दरअसल, ह्यूमन ट्रैफिकिंग को अक्सर सेक्स ट्रैफिकिंग ही समझ लिया जाता है, जबकि ह्यूमन ट्रैफिकिंग काफ़ी विस्तृत है और सेक्स ट्रैफिकिंग ह्यूमन ट्रैफिकिंग का ही हिस्सा है.

– सस्ते लेबर के चक्कर में काफ़ी बड़े पैमाने पर मानव तस्करी की जाती है.

– बच्चे इसका शिकार जल्दी होते हैं, क्योंकि उनका शोषण करना आसान होता है.

– सेक्स ट्रैफिकिंग भी बहुत बड़े पैमाने पर की जाती है, जिसमें कम उम्र के बच्चों और ख़ासतौर से लड़कियों को निशाना बनाया जाता है.

– भारत में भी कई संस्थाएं हैं, जो सेक्स ट्रैफिकिंग से पीड़ित लोगों के लिए काम करती हैं, इसमें प्रमुख है- डॉ. सुनीता कृष्णन की प्रज्वला नाम की एनजीओ. डॉ. सुनीता ख़ुद एक रेप विक्टिम रह चुकी हैं और उनकी यह संस्था तस्करी की शिकार महिलाओं और बच्चियों के पुनर्वसन का काम करती है. यह संस्था पीड़ितों की शिक्षा व उनमें से जो एचआईवी से संक्रमित होते हैं, उन बच्चों की भी सहायता करती है.  प्रज्वला जिस्मफ़रोशी में लिप्त महिलाओं के बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए भी काम करती है, ताकि वे एक बेहतर जीवन जी सकें. सुनीता कहती हैं कि चकला घरों से महिलाओं को बचाकर लाना बेहद मुश्किल काम होता है. इस दौरान अक्सर उन पर अटैक भी किया गया. इस वजह से वो अपने दाहिने कान से सुनने की क्षमता तक खो बैठीं, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और न हारेंगी.

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केस स्टडी….

आंध्र प्रदेश के चित्तूर ज़िले के छोटे-से गांव के ग़रीब परिवार में जन्मी भवानी अपने पैरेंट्स के साथ ही मज़दूरी का काम करती थी. भवानी के परिवार में कुल 11 सदस्य थे, जिनमें 6 लड़कियां और 3 लड़के थे. भवानी की मां के किसी रिश्तेदार के कहने पर 12 वर्षीया भवानी की शादी दिल्ली में रहनेवाले अमर नाम के एक व्यक्ति से करवा दी गई. भवानी के अनुसार, “हालांकि मैं उस व़क्त बहुत छोटी थी, लेकिन फिर भी मैं इस बात से बेहद ख़ुश थी, क्योंकि शादी का पूरा ख़र्च भी उन्हीं लोगों ने उठाया था और मेरे माता-पिता को काफ़ी पैसा
भी दिया था.”शादी के बाद भवानी, उसका रिश्तेदार और अमर दिल्ली के लिए रवाना हुए, जहां पहुंचकर अमर ने भवानी को कुछ समय तक उसके रिश्तेदार के साथ रहने को कहा, ताकि वो उनके रहने का बंदोबस्त कर सके. भवानी के रिश्तेदार का घर दरअसल दिल्ली के रेड लाइट एरिया- जीबी रोड पर स्थित एक वेश्यालय था और भवानी की परीक्षा अगले ही दिन से शुरू हो गई थी, जहां उसे ग्राहकों की देखभाल करने को कहा गया. उस व़क्त उसे एहसास हुआ कि दरअसल उसे 45,000 में बेचा गया था. वहां मौजूद अन्य लड़कियों से बातचीत करने पर पता चला कि उसके पति अमर ने उस एक साल में 12 शादियां की थीं.

शुरुआती विरोध का नतीजा यह हुआ कि भवानी को काफ़ी पीटा गया व भूखा रखा गया. 7 दिनों तक संघर्ष के बाद भवानी ने हथियार डाल दिए. 5 एबॉर्शन्स और ढेर सारे सेक्सुअली ट्रान्समीटेड इंफेक्शन्स के बाद 17 साल की आयु में भवानी को रेस्न्यू किया गया और तब वो एचआईवी पॉज़िटिव थी.

कभी काम दिलाने के नाम पर, कभी फिल्मों या मॉडलिंग में काम दिलाने के लालच में, तो कभी शादी के नाम पर लाखों लड़कियों को
जिस्मफ़रोशी के धंधे में धोखे से व जबरन धकेल दिया जाता है.

प्रज्वला की स्थापना का उद्देश्य था उन महिलाओं और बच्चों की मदद करना, जो तस्करी का शिकार होते हैं. ऐसे में यह संस्था तस्करी विरोधी यानी एंटी ट्रैफिकिंग के रूप में उभरी है, जो महिलाओं और बच्चों को वेश्यावृत्ति में जाने से रोकने में विश्‍वास करती है, क्योंकि यह सेक्सुअल स्लेवरी का सबसे भयावह रूप होता है.

 

 

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पुनर्वसन

ट्रैफिकिंग का अर्थ होता है बहुत-से मानवाधिकारों का उल्लंघन, ऐसे में उनका पुनर्वसन बहुत ही संवदेनशील मुद्दा होता है. चूंकि पीड़ित न स़िर्फ शारीरिक, बल्कि बहुत-से मानसिक शोषण और प्रताड़ना से गुज़रते हैं, इसके अलावा उन्हें ढेरों यौन संक्रमण भी हो जाते हैं. सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि परिवार भी इन्हें अपनाने से कतराते हैं, क्योंकि इसे वो समाज में बदनामी से जोड़कर देखते हैं, वहीं दूसरी ओर एक संभावना यह भी होती है कि परिवार ख़ुद ही इस धंधे में लिप्त होता है. ऐसे में सबसे ज़्यादा ज़रूरत इस बात की होती है कि पीड़ित को सुरक्षा मिले. मानसिक रूप से भी उसे सामान्य किया जाए, उसे बेहतर भविष्य की ओर आशान्वित किया जाए, तब कहीं जाकर पूरी तरह से कामयाबी मिल पाएगी.

पुनर्वसन में एक और बड़ी समस्या यह भी होती है कि पीड़ित हर स्तर पर इतना अधिक शोषण का शिकार हो चुका होता है कि उसका विश्‍वास सभी पर से उठ जाता है, उसे रेस्न्यू की प्रक्रिया पर भी अधिक भरोसा नहीं रहता और न ही वो अधिक पॉज़िटिव होता है अपने भविष्य के प्रति. उसमें फिर से आशा जगाना बेहद चुनौतीभरा काम है. यही वजह है कि जहां पहले प्रज्वला जैसी संस्थाएं रेस्न्यू का काम करती थीं, वहीं वे अब पुलिस की अधिक मदद लेती हैं और अधिक ध्यान पुनर्वसन की प्रक्रिया पर देती हैं, ताकि पीड़ितों को पूरी तरह से इससे बाहर निकाला जा सके.

– गीता शर्मा