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प्रतिबंधित दवाओं पर प्रतिबंध क्यों नहीं? (Banned Drugs Available In India)

Banned Drugs In India
प्रतिबंधित दवाओं पर प्रतिबंध क्यों नहीं…? (Banned Drugs Available In India)

मर्यादा, नियम-क़ायदा, क़ानून, अनुशासन या रूल्स… ये तमाम शब्द काफ़ी सख़्त लगते हैं, लेकिन अक्सर जब इन्हें कार्यान्वित या यूं कहें कि लागू करने की बारी आती है, तो ये बेबस और लाचार लगने लगते हैं… वजह! लालच, मुनाफ़ा, कालाबाज़ारी, भ्रष्टाचार… हर किसी को कम समय में अधिक से अधिक पैसे कमाने हैं, पर वो पैसे किस क़ीमत पर कमाए जा रहे हैं इस पर शायद ही ध्यान जाता है. अगर हम बात करें दवाओं के बिज़नेस की, तो भारत में एफडीसी दवाओं का बिज़नेस लगभग 3000 करोड़ रुपए का है, इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यदि इन दवाओं पर प्रतिबंध लगता है, तो इससे मुनाफ़ा कमानेवालों को कितना नुक़सान हो सकता है. यही कारण है कि दवा कंपनियां नहीं चाहतीं कि नुक़सान करनेवाली ये दवाएं प्रतिबंधित हों और इनका बेहतर विकल्प उन्हें तलाशने में पैसा व समय ख़र्च करना पड़े.

इसके अलावा कुछ ऐसी भी दवाएं हैं, जो अपने गंभीर साइड इफेक्ट्स के चलते अन्य देशों में तो प्रतिबंधित हैं, पर भारत में नहीं. क्या हैं वजहें, क्या होती हैं एफडीसी दवाएं और सरकार का क्या रवैया है, इसका जायज़ा लेते हैं.

वर्ष 2018 में केंद्र सरकार ने 300 से अधिक दवाओं पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया था, जिनमें से अधिकतर एफडीसी दवाएं हैं.

क्या होती हैं एफडीसी दवाएं?

इसका अर्थ है फिक्स्ड डोज़ कॉम्बिनेशन यानी वे दवाएं, जो दो या अधिक दवाओं के कॉम्बिनेशन से बनी हों. भारत में बिना क्लीनिकल ट्रायल के ये दवाएं बिकती हैं, लेकिन इनका शरीर पर काफ़ी दुष्प्रभाव होता है. अन्य देशों के मुक़ाबले भारत में ही सबसे अधिक ये दवाएं बिकती हैं.

डॉक्टर्स कहते हैं कि बैन इन दवाओं पर नहीं, इनके कॉम्बिनेशन पर लगा है यानी यही दवाएं अलग-अलग सॉल्ट में बाज़ार में अभी भी उपलब्ध हैं, पर वो सिंगल सॉल्ट हैं. अमेरिका व अन्य विकसित देशों में एफडीसी दवाएं काफ़ी कम व सीमित मात्रा में ही बिकती हैं, जबकि भारत में ये सबसे अधिक बिकती हैं. अन्य देशों में सख़्त नियम व क़ानून तथा प्रशासन की जागरूकता इसकी बड़ी वजह है. भारत में इन चीज़ों के अभाव के चलते अब तक सब कुछ चल रहा था. हालांकि वर्ष 2016 में भी सरकार ने इन दवाओं को प्रतिबंधित करने का प्रयास किया था, लेकिन दवा कंपनियां इस ़फैसले के ख़िलाफ़ कोर्ट में चली गई थीं.

सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2017 में आदेश दिया, जहां  दवा तकनीकी सलाहकार बोर्ड ने मामले की समीक्षा की और अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी. सरकार ने कमेटियां बनाईं और दवा कंपनियों से जवाब मांगा कि एफडीसी दवाओं की ज़रूरत क्यों है, क्योंकि इनमें ऐसी दवाओं का मिश्रण होता है, जो कई देशों में प्रतिबंधित हैं. दवा कंपनियां इस पर संतोषजनक जवाब नहीं दे पाईं. भारत में अब केंद्र सरकार द्वारा 328 दवाओं को बैन कर दिया गया है.

क्यों बनाती हैं कंपनियां ऐसी दवाएं?

दवा कंपनियों को इन दवाओं से भारी मुनाफ़ा होता है, क्योंकि इन्हें बनाना सस्ता व आसान होता है. ये पहले से टेस्ट किए गए सॉल्ट पर बनती हैं, ऐसे में नया सॉल्ट ढूंढ़ने की मश़क्क़त व ज़रूरत नहीं पड़ती. साथ ही ये बिकती भी अधिक हैं, क्योंकि ओवर द काउंटर इन्हें ख़रीदा जाता है, जहां डॉक्टरी प्रिस्क्रिप्शन की ज़रूरत नहीं.

सख़्त नियमों की कमी भी है एक वजह

नियमों की बात की जाए, तो क्लीनिकल टेस्ट व ड्रग कंट्रोलर की मंज़ूरी के बाद ही इन दवाओं को बाज़ार में उतारा जाना चाहिए. परंतु केंद्र से मंज़ूरी न मिलने के डर से ये कंपनियां राज्य सरकार के ड्रग कंट्रोलर से मंज़ूरी ले लेती हैं, क्योंकि हर राज्य के नियम अलग-अलग हैं, जिससे इन्हें परमिशन आसानी से मिल जाती है. हालांकि केंद्र की मंज़ूरी के बिना इनका बाज़ार में खुलेआम बिकना ग़ैरक़ानूनी ही है.

बेहद नुक़सानदेह होती है एफडीसी दवाएं

आपको अपनी समस्या के लिए एक ही दवा की ज़रूरत है, लेकिन यदि आप एफडीसी दवा लेते हैं, तो बेवजह दूसरे सॉल्ट यानी दवाएं भी आपके शरीर में जा रही हैं. एक दवा से किडनी या लिवर पर यदि प्रभाव पड़ता है, तो अन्य दवाओं के साथ में शरीर में जाने से यह नुक़सान बढ़ जाता है.

इसी तरह से यदि आपको दवा से एलर्जी हो रही है, तो यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि कॉम्बिनेशन में इस्तेमाल कौन-सी दवा के कारण ऐसा हो रहा है.

एक दवा के साइड इफेक्ट हमें पता होते हैं, इसी तरह से दूसरी दवा के भी साइड इफेक्ट्स की जानकारी होती है, लेकिन इनके मिश्रण से होनेवाले प्रभाव व साइड इफेक्ट्स का डाटा उपलब्ध नहीं होता, जिससे पता नहीं लगाया जा सकता कि इनके क्या साइड इफेक्ट्स हैं. लेकिन स्टडीज़ बताती हैं कि एफडीसी दवाओं को लेने से शरीर को नुक़सान की आशंका लगभग 40 फ़ीसदी बढ़ जाती है.

मरीज़ अपने डॉक्टर से पूछें ये सवाल…

  • आपको जो भी दवाएं लिखी जाती हैं, आपका हक़ है कि अपने डॉक्टर से उसकी पूरी जानकारी लें.
  • उनसे पूछ लें कि ये किस तरह की दवाएं हैं?
  • क्या इनमें से कोई एफडीसी भी हैं? यदि हां, तो इन्हें लेना कितना ज़रूरी है?
  • उनके विकल्प के बारे में पूछें.
  • दवाओं के साइड इफेक्ट्स की जानकारी लें.
  • आपको किन चीज़ों से एलर्जी है, यह भी डॉक्टर को बता दें.
  • यदि दवा से कोई समस्या महसूस हो रही हो, तो फ़ौरन डॉक्टर को बताएं.
  • यदि आप किसी अन्य बीमारी के लिए पहले से कोई दवा ले रहे हैं, तो उसके बारे में भी डॉक्टर को बताएं और उससे पूछें कि उस दवा के साथ आप इन दवाओं का सेवन कर सकते हैं या नहीं.

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Banned Drugs

विदेशों में प्रतिबंधित, पर भारत में नहीं…

कुछ दवाएं हैं, जो प्रतिबंध होने के बाद भी बिक रही हैं और कुछ ऐसी भी हैं, जिन पर अन्य देशों में तो प्रतिबंध है, लेकिन भारत में वो काफ़ी पॉप्युलर हैं. उनकी जानकारी भी ज़रूरी है…

निमेस्यूलाइड: यह प्रतिबंधित दवा है, इसके बावजूद बिक रही है. यह दर्द, शोथ व बुख़ार के लिए दी जाती है. पैरासिटामॉल जहां 4-6 घंटे तक ही असर दिखाती है, वहीं निमेस्यूलाइड 12-18 घंटे तक असरकारक होती है, लेकिन लिवर पर इसके दुष्प्रभाव को देखते हुए यूनियन हेल्थ मिनिस्ट्री ने वर्ष 2011 में इस पर रोक लगाई थी, पर यह अब भी आसानी से उपलब्ध है.

एनाल्जिन: यह पेनकिलर है और विश्‍वभर में प्रतिबंधित है, पर भारत में नहीं. बोन मैरो पर इसका बुरा प्रभाव देखते हुए इस पर रोक लगी हुई है, पर भारत में इस पर रोक नहीं है.

फिनाइलप्रोपनॉलअमाइन (ब्रांड – डिकोल्ड/ विक्स):  वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन द्वारा विक्स वेपोरब को टॉक्सिक घोषित किया गया है. इससे अस्थमा व टीबी जैसे रोग तक होने की आशंका रहती है. यही वजह है कि नॉर्थ अमेरिका व यूरोप के कई देशों में इस पर प्रतिबंध लगया हुआ है. इसी तरह से डिकोल्ड व विक्स एक्शन 500 भारत में छोड़कर कई जगहों पर बैन्ड है, क्योंकि इनसे ब्रेन हैमरेज का ख़तरा रहता है.

डिस्प्रिन: ब्रेन व लिवर में सूजन की एक वजह बन सकती है यह दवा, इसीलिए अमेरिकी सरकार ने वर्ष 2002 में इस पर प्रतिबंध लगाया था. इसकी वजह से नींद की ख़ुमारी, मतली, उल्टी जैसे लक्षण भी उभर सकते हैं. लेकिन यह भारत में सबसे फेवरेट पेनकिलर है.

नाइट्रोफ्यूराज़ोन: यह एंटीबैक्टीरियल मेडिसिन है, लेकिन इससे कैंसर का ख़तरा हो सकता है.

ड्रॉपेरिडॉल: एंटीडिप्रेसेंट मेडिसिन है यह, जिससे अनियमित हार्ट बीट की समस्या हो सकती है और यही इसके प्रतिबंध का कारण है.

इसी तरह से और भी कुछ दवाएं हैं, जो ग्लोबली बैन्ड हैं, पर भारत में उपलब्ध हैं.

भारत में प्रतिबंधित कुछ कॉमन दवाएं

सैरिडॉन: यह प्रॉपीफैनाज़ॉन, पैरासिटामॉल और कैफीन के कॉम्बिनेशन से बनती है. यह एकमात्र पेनकिलर है, जो तीन एक्टिव केमिकल के मिश्रण से बनी है, जिसमें कैफीन भी एक है. प्रॉपीफैनाज़ॉन ब्लड सेल्स को कम कर सकता है. बोन मैरो पर बुरा असर डाल सकती है यह दवा.

डोलामाइड: यह जॉइंट पेन के लिए यूज़ होती है, जिसमें प्रतिबंधित निमेस्यूलाइड भी है.

रिलीफ/एलकोल्ड: किडनी व लिवर पर बुरा प्रभाव, साथ ही सिरदर्द व कब्ज़ जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं.

एज़िथ्रोमाइसिन के 6 कॉम्बिनेशन्स को भी बैन किया गया है. इसी तरह से कैल्शियम ग्लूकोनेट और कैफीन के भी कुछ कॉम्बिनेशन्स हैं. निमेस्यूलाइड और पैरासिटामॉल के बहुत सारे कॉम्बिनेशन्स पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. लिस्ट बहुत लंबी है और सभी प्रतिबंधित दवाओं की जानकारी आप सीडीएससीओ यानी सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइज़ेशन की साइट पर जाकर चेक कर सकते हैं.

Banned Drugs

आप क्या कर सकते हैं?

  • प्रतिबंधित दवाओं की जानकारी हासिल करें.
  • मामूली सिरदर्द व बुख़ार के लिए सिंगल सॉल्टवाली दवा लें. बेतहरीन विकल्प है- पैरासिटामॉल.
  • बिना डॉक्टरी सलाह के एंटीबायोटिक्स न लें.
  • डॉक्टर द्वारा बताई दवा का पूरा कोर्स करें.
  • दवा लेते समय एक्सपायरी डेट चेक करें.
  • दवाओं को स्टोर करने के नियमों का भी सही पालन करें.
  • ओवर द काउंटर यानी अपनी मर्ज़ी से बिना डॉक्टरी सलाह के दवा लेना बंद कर दें.

ओवर द काउंटर सस्ता व आसान विकल्प लगता है…

केमिस्ट शॉप ओनर विकी सिंह का कहना है कि एक फार्मासिस्ट को सभी बैन्ड ड्रग्स के बारे में पता होता है, लेकिन छोटे केमिस्ट बैन्ड ड्रग्स को भी बेचने से हिचकिचाते नहीं और वो भी मनचाहे दाम पर.

भारत में दूसरी ओर लोगों की प्रवृत्ति कुछ ऐसी है कि वो ओवर द काउंटर मेडिसिन्स पर ही अधिक निर्भर रहते हैं, क्योंकि उन्हें यह आसान और सस्ता विकल्प लगता है.

  • अधिकांश ग़रीब व सामान्य वर्ग के लोग सीधे केमिस्ट से दवाएं लेते हैं, क्योंकि बड़े डॉक्टर के पास जाना उन्हें महंगा लगता है और उनकी सोच यही होती है कि जितना गली-नुक्कड़ के क्लीनिक में बैठे डॉक्टर को जानकारी है, उतनी तो केमिस्ट को भी होती है, ऐसे में डॉक्टर की फीस व भीड़ आदि से बचने के लिए वो सीधे मेडिकल से दवा लेना पसंद करते हैं.
  • ऐसे लोगों को दवाओं के साइड इफेक्ट्स के बारे में पता नहीं होता और न ही वो जानने के इच्छुक होते हैं, उनमें उतनी जागरूकता ही नहीं होती. इसी का फ़ायदा केमिस्ट उठाते हैं. वो भी उन्हें बैन्ड ड्रग्स व दवाओं के साइड इफेक्ट्स के बारे में कुछ नहीं बताते. अपनी बातों से घुमा देते हैं और कहते हैं कि ये दवाएं काफ़ी असरकारी हैं.
  • अधिकांश लोगों की यह भी प्रवृत्ति होती है कि उन्हें यदि पता भी हो कि दवा का कुछ साइड इफेक्ट है, तब भी वो जल्दी आराम पाने के लिए उन दवाओं के सेवन से हिचकिचाते नहीं. उनका मक़सद तुरंत आराम पाना होता है.
  • जहां तक क़ानून की बात है, तो वो काफ़ी सख़्त है. बैन्ड ड्रग्स को बेचने पर फार्मासिस्ट का लाइसेंस तक रद्द हो सकता है, लेकिन ज़्यादा कमाने की भूख के चलते क़ानून को भी नज़रअंदाज़ करके केमिस्ट ग़लत काम करते हैं.
  • कुल मिलाकर सभी चीज़ों के तार मुना़फे से जुड़े हैं. आपको अंदाज़ा भी नहीं कि नशीली दवाओं यानी नार्कोटिक ड्रग्स की बिक्री भी ख़ूब चलती है, जैसे- कोडिन, ट्रामाडोल, लोराज़ेपाम, स्पास्मो प्रॉक्सिवॉन, जो आसानी से मिल जाते हैं और जिनका इस्तेमाल बहुत-से युवा नशे के लिए करते हैं. जो बैन्ड भी हैं, पर उनका व्यापार भी ख़ूब ज़ोरों पर चलता है.
  • कुछ ख़ास तरह की बीमारियों में कुछ ड्रग्स ज़रूरी होते हैं, जिसके चलते डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन पर वो मिल जाते हैं.
  • इसके अलावा जिस तरह अन्य चीज़ों की ब्लैक मार्केटिंग होती है, उसी तरह बैन्ड मेडिसिन्स की भी होती है, जिससे वो आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं.

– गीता शर्मा

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यौन शोषण: लड़के भी हैं उतने ही अनसेफ… (Child Abuse: Myths And Facts About Sexual Abuse Of Boys)

Child Abuse

यौन शोषण: लड़के भी हैं उतने ही अनसेफ… (Child Abuse: Myths And Facts About Sexual Abuse Of Boys)

एक सर्वे के मुताबिक़ लगभग 71% पुरुषों ने यह स्वीकारा है कि बचपन में वे यौन शोषण के शिकार हो चुके हैं.

71%, जी हां, आप सही पढ़ रहे हैं… यह आंकड़ा ज़ेहन को हिला देनेवाला है. अविश्‍वसनीय लग रहा है न, लेकिन यह सच है.

लड़कों (Boys) का बलात्कार (Rape) नहीं हो सकता… हमारे देश में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में कुछ ऐसी ही सोच थी कुछ समय पहले तक… दरअसल, यह एक माइंडसेट है, जो समय के साथ भी अब तक बदला नहीं है. हमें लगता है यौन शोषण (Sexual Abuse) स़िर्फ लड़कियों (Girls) का ही होता है, क्योंकि हम यह मानने को तैयार ही नहीं कि लड़के भी होते हैं शोषण के शिकार.

भारत में अब भी है चुप्पी!

–  हमारे देश में वैसे भी सेक्स, बलात्कार, शोषण आदि विषयों पर बात नहीं होती, तो लड़कों के यौन शोषण पर विचार करने तक की बात यहां कोई कैसे सोच सकता है?

–   लेकिन चूंकि अब इस विषय पर भी बात होने लगी है, तो भारत में भी कुछ वर्ग इस पर बात करने से हिचकिचाते नहीं हैं और यह ज़रूरी भी है.

–   भारत सरकार द्वारा जो रिसर्च किया गया था, उसमें भी चौंकानेवाला आंकड़ा ही सामने आया था कि 53.2% बच्चों ने सेक्सुअल एब्यूज़ की बात बताई थी, जिनमें से 52.9% लड़के थे.

–   चाइल्ड एब्यूज़ दरसअल जेंडर न्यूट्रल है. यह बात मेनका गांधी (महिला-बाल कल्याण मंत्री) ने कही थी और यह सच भी है.

–   दरअसल, चाइल्ड एब्यूज़ के शिकार लड़कों पर कभी कोई स्टडी हुई ही नहीं, क्योंकि न तो इस तरफ़ किसी का ध्यान गया और न ही किसी ने इसकी ज़रूरत समझी.

–   जो 71% पुरुष यौन शोषण के शिकार हुए थे, उनमें से 84.9% ने इस बारे में कभी भी किसी को कुछ नहीं बताया. क्योंकि इसकी मुख्य वजह थी- शर्म. इसके अलावा डर, कंफ्यूज़न और अपराधबोध की भावना भी उनके मन में थी.

–   दरअसल, हमारे समाज में यह मान्यता है कि लड़कों का रेप नहीं हो सकता. यही वजह है कि लड़के अपने यौन शोषण के बारे में कभी बात ही नहीं करते, क्योंकि उनका भरोसा कौन करेगा?

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व्यक्तित्व पर असर डालता है यह शोषण!

–   बचपन में इस तरह के शारीरिक शोषण का असर पूरे मन-मस्तिष्क पर पड़ता है.

–   सबसे पहले तो बच्चा यही सोचता है कि इससे उसे अकेले ही जूझना है.

–  चूंकि वो पुरुष है, तो उसे स्ट्रॉन्ग बनना है, इसलिए उसे अपने शोषण को स्वीकारना होगा.

–   इसका असर उनके इमोशनल व्यवहार पर भी पड़ता है.

–   वो जल्दी से किसी पर भरोसा नहीं करते. एक डर की भावना मन में बैठ जाती है. कॉन्फिडेंस पर असर पड़ता है.

–   उनमें एक तरह का अपराधबोध भी घर कर जाता है कि उन्होंने कुछ ग़लत किया है, ख़ासतौर से तब जब वो शोषण के दौरान इजैक्यूलेट करते हैं.

–   उन्हें यह भी लगता है कि लोग उनकी बातों पर भरोसा नहीं करेंगे यदि उन्होंने किसी से शेयर किया भी तो.

–   वो दोस्तों से कतराने लगते हैं. अकेलापन उन्हें बेहतर लगता है.

–   उन जगहों पर जाने से डरते हैं, जहां शोषण की यादें जुड़ी हों.

पैरेंट्स को रहना होगा अलर्ट

–   बच्चे के व्यवहार में कुछ अलग-सा नज़र आने लगे, तो उससे बात करें.

–   यदि बच्चा न बताए, तो दूसरे तरीक़ों से जानने की कोशिश करें, क्योंकि हो सकता है आपका बच्चा उन तकलीफ़ों से जूझ रहा हो, जिसकी आप कल्पना तक नहीं कर सकते.

–   कई स्कूलों में लड़कों के यौन शोषण की घटनाएं बीते सालों में प्रकाश में आ चुकी हैं. ऐसे में पैरेंट्स को सतर्क रहना चाहिए.

–   बेटी के साथ-साथ बेटे की पूरी सुरक्षा की ओर भी ध्यान देना होगा.

–   उन्हें सेक्स एजुकेशन दें और उनमें यह कॉन्फिडेंस जगाएं कि वो खुलकर आपसे हर बात शेयर कर सकें.

–   उन्हें सही-ग़लत, सेफ-अनसेफ टच के बारे में बताएं.

–   लड़का है, इसलिए उसकी कुछ बातों को इग्नोर न करें.

–  उनके छोटे-छोटे इशारों को समझने का प्रयास करें. हो सकता है उनके पीछे कोई बड़ी बात हो.

कैसे हैंडल करें शोषण के शिकार बच्चों को?

–   बेहतर होगा उनसे बहुत ज़्यादा डिटेल्स न पूछें कि कब, कहां, कैसे हुआ…

–   उन्हें डांटें नहीं कि तुमने पहले क्यों नहीं बताया, बता देते तो तुम्हें बचा लेते… ऐसी बातों से उनके मन में गिल्ट आएगा.

–   उन्हें सपोर्ट करें, लेकिन ओवर पॉज़िटिव वाक्य न बोलें, जैसे- समय के साथ-साथ बेहतर हो जाएगा सब कुछ और ऐसा होता है ज़िंदगी में… या फिर इसके बारे में तुम्हें बुरा महसूस करने या अपराधी महसूस करने की कोई ज़रूरत नहीं है, क्योंकि इस तरह के वाक्य उन्हें यह महसूस करवाएंगे कि उनके साथ बहुत ज़्यादा बुरा हुआ है.

–  बेहतर होगा आप सिंपल तरी़के से कहें कि हमें तुम पर पूरा भरोसा है और हम हैं तुम्हारे साथ हमेशा… यह उन्हें कॉन्फिडेंस देगा.

–   काउंसलर की मदद भी ज़रूर लें और उन्हें एक सामान्य माहौल देने की कोशिश करें.

– कोशिश हमारी यही होनी चाहिए कि शुरुआत में ही हमें पता चल जाए या फिर बच्चों को यह सब झेलना ही न पड़े, इसके लिए बच्चों को ही ट्रेनिंग देनी होगी, जो हर स्कूल में अनिवार्य होनी चाहिए.

– साथ ही बच्चों पर भरोसा करना होगा कि वो अगर कुछ कह रहे हैं, तो उसके पीछे कोई वजह ज़रूर होगी. बेहतर होगा उनकी बातों को भी गंभीरता से लिया जाए और लड़कों को यौन शोषण का डर नहीं, यह सोचकर उनकी अनदेखी या उनकी ओर से लापरवाह रहना छोड़ना होगा.

– गीता शर्मा

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Movie Review: वाय चीट इंडिया (Movie Review of Why Cheat India)

. स्टार कास्ट: इमरान हाशमी , श्रेया धनंवतरी

– निर्देशक: सौमिक सेन

. रेटिंगः 3 स्टार

Why Cheat India

 

इमरान हाशमी स्टारर इस फिल्म में भारतीय एजुकेशन सिस्टम से जुड़ी परेशानियों और परीक्षा के दौरान होने वाले वाली चीटिंग को दर्शाया गया है जिसे चीटिंग माफिया अंजाम देते हैं.

Why Cheat India

कहानीः राकेश सिंह उर्फ रॉकी(इमरान हाशमी) अपने परिवार और सपनों को पूरा करने के लिए चीटिंग की दुनिया में निकल पड़ता है. राकेश वह माफिया है जो शिक्षा व्यवस्था की खामियों का जमकर फायदा उठाता है. राकेश गरीब और अच्छे पढ़ने वाले स्टूडेंट्स को इस्तेमाल करता है. वो उन गरीब बच्चों से अमीर बच्चों की जगह एंट्रेंस एग्जाम्स दिलवाता है और बदले में उन्हें पैसे देता है. उसे लगता है कि अमीर बच्चों से पैसे लेकर गरीब बच्चों को उनकी जगह एग्जाम दिलाकर और उन्हें पैसे देकर वो कोई अपराध नहीं कर रहा है. लेकिन फिर तभी उसका एक गेम गलत हो जाता है और वो पुलिस के हत्ते चढ़ जाता है.

एक्टिंगः परफॉर्मेंस की बात करें तो इमरान हाशमी ने हमेशा की तरह बेहतरीन परफॉर्म किया है .इमरान ने जिस तरह खुद को राकेश के किरदार में ढाला है, वो काबिलेतारीफ हैं. फिल्म में श्रेया धनवंतरी ने भी अच्छा परफॉर्म किया है, जिनकी यह पहली फिल्म है. सहयोगी कास्ट परफेक्ट हैं.

संगीतः फिल्म में कई संगीतकारों की मौजूदगी में ‘दिल में हो तुम’, ‘कामयाब’, ‘फिर मुलाकात’ जैसे गाने अच्छे बन पड़े हैं.

क्यों देखेंः अगर आपको एजुकेशन सिस्टम में होने वाली चीटिंग के बारे में जानना है तो आप ये फिल्म देख सकते हैं.

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प्रियंका-निक की संगीत सेरेमनी का फ़र्स्ट लुक… देखें पिक्चर्स (Priyanka-Nick Wedding: First Pics From Sangeet Ceremony Out)

Priyanka Nick Wedding

प्रियंका-निक की संगीत सेरेमनी का फ़र्स्ट लुक… देखें पिक्चर्स (Priyanka-Nick Wedding: First Pics From Sangeet Ceremony Out)

प्रियंका (Priyanka) और निक (Nick) की संगीत सेरेमनी (Sangeet Ceremony) की पहली तस्वीरें (Pictures) ख़ुद प्रियंका ने सोशल मीडिया पर शेयर की हैं, जिसमें दोनों ही मस्ती के मूड में नज़र आ रहे हैं. दोनों ही परिवारों ने इस मौक़े पर काफ़ी मस्ती और डान्स किया. डान्स कॉम्पटिशन का भी मज़ा लिया गया. प्रियंका-निक देसी लुक में लग रहे हैं बेहद प्यारे! 

Priyanka Nick Wedding

Priyanka Nick Wedding

Priyanka Nick Wedding

Priyanka Nick Wedding

Priyanka Nick Wedding

Priyanka Nick Wedding

Priyanka Nick Wedding

Priyanka Wedding

स्टैच्यु ऑफ यूनिटी: दुनिया में सबसे ऊंचे सरदार! (Statue Of Unity: World’s Tallest Statue)

World's Tallest Statue

स्टैच्यु ऑफ यूनिटी: दुनिया में सबसे ऊंचे सरदार! (Statue Of Unity: World’s Tallest Statue)

देश के पहले गृह मंत्री सरदार पटेल (Sardar Vallabhbhai Patel) के सम्मान में बनाई जा रही दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा (World’s Tallest Statue) स्टैच्यु ऑफ यूनिटी (Statue Of Unity) अब तैयार है. उसका अनावरण भी 31 अक्टूबर 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) के द्वारा किया जा चुका है. सरदार पटेल की जन्म तिथि के अवसर पर इस मूर्ति का अनावरण किया गया. यह प्रतिमा गुजरात के नर्मदा ज़िले में सरदार सरोवर बांध के पास एक टापू पर स्थापित की गई है. यह ऊंचाई 597 फीट यानी 182 मीटर ऊंची है. इसे 7 किलोमीटर की दूरी से भी देखा जा सकता है.
इससे पहले चीन में बनी भगवान बुद्ध की दुनिया की सबसे उंची मूर्ति लोगों के आकर्षण का केंद्र थी, लेकिन अब दुनिया में हैं सबसे ऊंचे सरदार!
इस मूर्ति के बनने से जहां पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, वहीं दुनिया में सबसे ऊंची प्रतिमा बनाने का श्रेय व गौरव भी भारत को मिलेगा. इसके आसपास ख़ूबसूरत गार्डन बनाया गया है.
हालांकि कुछ लोगों ने सरदार पटेल की प्रतिमा पर आई लागत की बात कहते हुए इसका विरोध भी किया था, लेकिन वही लोग जब चीन या अमेरिका जाते हैं, तो स्प्रिंग टेंबल ऑफ बुद्धा या स्टैच्यु ऑफ लिबर्टी के सामने फोटो क्लिक करवाकर बड़ी शान से सोशल मीडिया पर डालते हैं.
इन तमाम विवादों के बीच भी यह मूर्ति अब बनकर तैयार है और लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है.

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स्टैच्यु ऑफ यूनिटी से जुड़ी ख़ास बातें…
– सरदार पटेल कॉम्प्लेक्स में सरकार ने तीन सितारा होटल, शॉपिंग सेंटर और रिसर्च सेंटर भी बनाया है.
– हाई स्पीड एलीवेटर्स आपको 400 फीट की ऊंचाई पर लेकर जाएंगे, जहां से आपको आसपास का पैनोरैमिक व्यू मिलेगा.
– सेल्फी के शौक़ीनों का भी ख़ास ध्यान रखा गया है और उनके लिए बनाया गया है ख़ास सेल्फी पॉइंट.
– एक म्यूज़ियम और ऑडियो-विज़ुअल गैलरी भी तैयार की गई है.
– लेज़र लाइट शो का भी प्रबंध है.
– 3 साल तक की उम्र के बच्चों के लिए फ्री एंट्री है.
– उसके बाद 350 रूपए प्रति व्यक्ति टिकट है.
– इसके अलावा सस्ता विकल्प भी मौजूद है.

– गीता शर्मा

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भारत में डोमेस्टिक वॉयलेंस से 40% अधिक मौतें… (Domestic Violence In India)

Domestic Violence
भारत में डोमेस्टिक वॉयलेंस से 40% अधिक मौतें… (Domestic Violence In India)

बेटी होना कोई गुनाह नहीं है, लेकिन हमारी सामाजिक सोच ने इसे भी किसी अपराध से कम नहीं बना रखा है… बेटियों को हर बात पर हिदायतें दी जाती हैं, हर पल उसे एहसास करवाया जाता है कि ये जो भी तुम पहन रही हो, खा रही हो, हंस रही हो, बोल रही हो… सब मेहरबानी है हमारी… घरों में इसी सोच के साथ उसका पालन-पोषण होता है कि एक दिन शादी हो जाएगी और ज़िम्मेदारी ख़त्म… ससुराल में यही जताया जाता है कि इज़्ज़त तभी मिलेगी, जब पैसा लाओगी या हमारे इशारों पर नाचोगी… इन सबके बीच एक औरत पिसती है, घुटती है और दम भी तोड़ देती है… भारत के घरेलू हिंसा व उससे जुड़े मृत्यु के आंकड़े इसी ओर इशारा करते हैं…

वो कहते हैं तुम आज़ाद हो… तुम्हें बोलने की, मुस्कुराने की थोड़ी छूट दे दी है हमने… वो कहते हैं अब तो तुम ख़ुश हो न… तुम्हें आज सखियों के संग बाहर जाने की इजाज़त दे दी है… वो कहते हैं अपनी आज़ादी का नाजायज़ फ़ायदा मत उठाओ… कॉलेज से सीधे घर आ जाओ… वो कहते हैं शर्म औरत का गहना है, ज़ोर से मत हंसो… नज़रें झुकाकर चलो… वो कहते हैं तुमको पराये घर जाना है… जब चली जाओगी, तब वहां कर लेना अपनी मनमानी… ये कहते हैं, मां-बाप ने कुछ सिखाया नहीं, बस मुफ़्त में पल्ले बांध दिया… ये कहते हैं, इतना अनमोल लड़का था और एक दमड़ी इसके बाप ने नहीं दी… ये कहते हैं, यहां रहना है, तो सब कुछ सहना होगा, वरना अपने घर जा… वो कहते हैं, सब कुछ सहकर वहीं रहना होगा, वापस मत आ… ये कहते हैं पैसे ला या फिर मार खा… वो कहते हैं, अपना घर बसा, समाज में नाक मत कटा… और फिर एक दिन… मैं मौन हो गई… सबकी इज़्ज़त बच गई…!

 

घरेलू हिंसा और भारत…
  • भारत में डोमेस्टिक वॉयलेंस व प्रताड़ना के बाद महिलाओं की मृत्यु की लगभग 40% अधिक आशंका रहती है, बजाय अमेरिका जैसे विकसित देश के… यह ख़तरनाक आंकड़ा एक सर्वे का है.
  • वॉशिंगटन में हुए इस सर्वे का ट्रॉमा डाटा बताता है कि भारत में महिलाओं को चोट लगने के तीन प्रमुख कारण हैं- गिरना, ट्रैफिक एक्सिडेंट्स और डोमेस्टिक वॉयलेंस.
  • 60% भारतीय पुरुष यह मानते हैं कि वो अपनी पत्नियों को प्रताड़ित करते हैं.
  • हाल ही में हुए एक सर्वे के अनुसार महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित देशों में भारत अब पहले स्थान पर पहुंच चुका है. हालांकि इस सर्वे और इसका सैंपल साइज़ विवादों के घेरे में है और अधिकांश भारतीय यह मानते हैं कि यह सही नहीं है…
  • 2011 में भी एक सर्वे हुआ था, जिसमें यूनाइटेड नेशन्स के सदस्य देशों को शामिल किया गया था, उसमें पहले स्थान पर अफगानिस्तान, दूसरे पर कांगो, तीसरे पर पाकिस्तान था और भारत चौथे स्थान पर था.
  • भारतीय सरकारी आंकड़े भी बताते हैं कि 2007 से लेकर 2016 के बीच महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराधों में 83% इज़ाफ़ा हुआ है.
  • हालांकि हम यहां बात घरेलू हिंसा की कर रहे हैं, लेकिन ये तमाम आंकड़े समाज की सोच और माइंड सेट को दर्शाते हैं.
  • नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक़, प्रोटेक्शन ऑफ वुमन फ्रॉम डोमेस्टिक वॉयलेंस एक्ट के पास होने के बाद से (2005) अब तक लगभग दस लाख से अधिक केसेस फाइल किए गए, जिनमें पति की क्रूरता और दहेज मुख्य कारण हैं.
मानसिकता है मुख्य वजह
  • हमारे समाज में पति को परमेश्‍वर मानने की सीख आज भी अधिकांश परिवारों में दी जाती है.
  • पति और उसकी लंबी उम्र से जुड़े तमाम व्रत-उपवास को इतनी गंभीरता से लिया जाता है कि यदि किसी घर में पत्नी इसे न करे, तो यही समझा जाता है कि उसे अपने पति की फ़िक़्र नहीं.
  • इतनी तकलीफ़ सहकर वो घर और दफ़्तर का रोज़मर्रा का काम भी करती हैं और घर आकर पति के आने का इंतज़ार भी करती हैं. उसकी पूजा करने के बाद ही पानी पीती हैं.
  • यहां कहीं भी यह नहीं सिखाया जाता कि शादी से पहले भी और शादी के बाद भी स्त्री-पुरुष का बराबरी का दर्जा है. दोनों का सम्मान ज़रूरी है.
  • किसी भी पुरुष को शायद ही आज तक घरों में यह सीख व शिक्षा दी जाती हो कि आपको हर महिला का सम्मान करना है और शादी से पहले कभी किसी भी दूल्हे को यह नहीं कहा जाता कि अपनी पत्नी का सम्मान करना.
  • ऐसा इसलिए होता है कि दोनों को समान नहीं समझा जाता. ख़ुद महिलाएं भी ऐसा ही सोचती हैं.
  • व्रत-उपवासवाले दिन वो दिनभर भूखी-प्यासी रहकर ख़ुद को गौरवान्वित महसूस करती हैं कि अब उनके पति की उम्र लंबी हो जाएगी.
  • इसे हमारी परंपरा से जोड़कर देखा जाता है, जबकि यह लिंग भेद का बहुत ही क्रूर स्वरूप है.

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Domestic Violence

कहीं न कहीं लिंग भेद से ही उपजती हैं ये समस्याएं…
  • महिलाओं के ख़िलाफ़ जितने भी अत्याचार होते हैं, चाहे दहेजप्रथा हो, भ्रूण हत्या हो, बलात्कार हो या घरेलू हिंसा… इनकी जड़ लिंग भेद ही है.
  • बेटा-बेटी समान नहीं हैं, यह सोच हमारे ख़ून में रच-बस चुकी है. इतनी अधिक कि जब पति अपनी पत्नी पर हाथ उठाता है, तो उसको यही कहा जाता है कि पति-पत्नी में इस तरह की अनबन सामान्य बात है.
  • यदि कोई स्त्री पलटवार करती है, तो उसे इतनी जल्दी समर्थन नहीं मिलता. उसे हिदायतें ही दी जाती हैं कि अपनी शादी को ख़तरे में न डाले.
  • शादी को ही एक स्त्री के जीवन का सबसे अंतिम लक्ष्य माना जाता है. शादी टूट गई, तो जैसे ज़िंदगी में कुछ बचेगा ही नहीं.
शादी एक सामान्य सामाजिक प्रक्रिया मात्र है…
  • यह सोच अब तक नहीं पनपी है कि शादी को हम सामान्य तरी़के से ले पाएं.
  • जिस तरह ज़िंदगी के अन्य निर्णयों में हमसे भूल हो सकती है, तो शादी में क्यों नहीं?
  • अगर ग़लत इंसान से शादी हो गई है और आपको यह बात समय रहते पता चल गई है, तो झिझक किस बात की?
  • अपने इस एक ग़लत निर्णय का बोझ उम्रभर ढोने से बेहतर है ग़लती को सुधार लिया जाए.
  • पैरेंट्स को भी चाहिए कि अगर शादी में बेटी घरेलू हिंसा का शिकार हो रही है या दहेज के लिए प्रताड़ित की जा रही है, तो जल्दी ही निर्णय लें, वरना बेटी से ही हाथ धोना पड़ेगा.
  • यही नहीं, यदि शादी के समय भी इस बात का आभास हो रहा हो कि आगे चलकर दहेज के लिए बेटी को परेशान किया जा सकता है, तो बारात लौटाने में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए.
  • ग़लत लोगों में, ग़लत रिश्ते में बंधने से बेहतर है बिना रिश्ते के रहना. इतना साहस हर बेटी कर सके, यह पैरेंट्स को ही उन्हें सिखाना होगा.
सिर्फ प्रशासन व सरकार से ही अपेक्षा क्यों?
  • हमारी सबसे बड़ी समस्या यही है कि हम हर समस्या का समाधान सरकार से ही चाहते हैं.
  • अगर घर के बाहर कचरा है, तो सरकार ज़िम्मेदार, अगर घर में राशन कम है, तो भी सरकार ज़िम्मेदार है…
  • जिन समस्याओं के लिए हमारी परवरिश, हमारी मानसिकता व सामाजिक परिवेश ज़िम्मेदार हैं. उनके लिए हमें ही प्रयास करने होंगे. ऐसे में हर बात को क़ानून, प्रशासन व सरकार की ज़िम्मेदारी बताकर अपनी ज़िम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेना जायज़ नहीं है.
  • हम अपने घरों में किस तरह से बच्चों का पालन-पोषण करते हैं, हम अपने अधिकारों व स्वाभिमान के लिए किस तरह से लड़ते हैं… ये तमाम बातें बच्चे देखते व सीखते हैं.
  • बेटियों को शादी के लिए तैयार करने व घरेलू काम में परफेक्ट करने के अलावा आर्थिक रूप से भी मज़बूत करने पर ज़ोर दें, ताकि वो अपने हित में फैसले ले सकें.
  • अक्सर लड़कियां आर्थिक आत्मनिर्भरता न होने की वजह से ही नाकाम शादियों में बनी रहती हैं. पति की मार व प्रताड़ना सहती रहती हैं. बेहतर होगा कि हम बेटियों को आत्मनिर्भर बनाएं और बेटों को सही बात सिखाएं.
  • पत्नी किसी की प्राइवेट प्रॉपर्टी नहीं है, सास-ससुर को भी यह समझना चाहिए कि अगर बेटा घरेलू हिंसा कर रहा है, तो बहू का साथ दें.
  • पर अक्सर दहेज की चाह में सास-ससुर ख़ुद उस हिंसा में शामिल हो जाते हैं, पर वो भूल जाते हैं कि उनकी बेटी भी दूसरे घर जाए और उसके साथ ऐसा व्यवहार हो, तो क्या वो बर्दाश्त करेंगे?
  • ख़ैर, किताबी बातों से कुछ नहीं होगा, जब तक कि समाज की सोच नहीं बदलेगी और समाज हमसे ही बनता है, तो सबसे पहले हमें अपनी सोच बदलनी होगी.
बेटों को दें शिक्षा…
  • अब वो समय आ चुका है, जब बेटों को हिदायतें और शिक्षा देनी ज़रूरी है.
  • पत्नी का अलग वजूद होता है, वो भी उतनी ही इंसान है, जितनी आप… तो किस हक से उस पर हाथ उठाते हैं?
  • शादी आपको पत्नी को पीटने का लायसेंस नहीं देती.
  • अगर सम्मान कर नहीं सकते, तो सम्मान की चाह क्यों?
  • शादी से पहले हर पैरेंट्स को अपने बेटों को ये बातें सिखानी चाहिए, लेकिन पैरेंट्स तो तभी सिखाएंगे, जब वो ख़ुद इस बात को समझेंगे व इससे सहमत होंगे.
  • पैरेंट्स की सोच ही नहीं बदलेगी, तो बच्चों की सोच किस तरह विकसित होगी?
  • हालांकि कुछ हद तक बदलाव ज़रूर आया, लेकिन आदर्श स्थिति बनने में अभी लंबा समय है, तब तक बेहतर होगा बेटियों को सक्षम बनाएं और बेटों को बेहतर इंसान बनाएं.

– गीता शर्मा

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Proud Moment: विनेश फोगाट ने रचा इतिहास… एशियाड में भारत का महिला कुश्ती वर्ग का पहला गोल्ड (Vinesh Phogat Creates History After Winning Gold At Asian Games)

Vinesh Phogat

Proud Moment: विनेश फोगाट ने रचा इतिहास… एशियाड में भारत का महिला कुश्ती वर्ग का पहला गोल्ड (Vinesh Phogat Creates History After Winning Gold At Asian Games)

एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने पर ढेरों शुभकामनाएं… विदेश (Vinesh Phogat) ने इतिहास रच दिया, एशियाड में भारत का महिला कुश्ती वर्ग का पहला गोल्ड. पूरे देश को आप पर गर्व है! ग़ौरतलब है कि इन दिनों जकार्ता में चल रहे एशियन गेम्स में भारत का ये दूसरा गोल्ड है… रविवार को रेस्लर बजरंग पुनिया ने भी भारत की झोली में गोल्ड डाला था!

गोल्डन गर्ल हिमा दास की कामयाबी ने प्रधानमंत्री मोदी को किया भावुक (Seeing Her Passionately Search For The Tricolour Touched Me Deeply: PM Narendra Modi)

 

Athlete Hima Das

भारतीय ऐथ्लीट हिमा दास ने गुरुवार को आईएएएफ विश्व अंडर २० एथलेटिक्स चैम्पीयन्शिप की ४०० मीटर दौड़ में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया है.

ये चैम्पीयन्शिप फ़िनलैंड के टेम्पेयर शहर में हुई थी. ऐसा करके अब हिमा ट्रैक स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीतनेवाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गई हैं.

प्रधानमंत्री मोदी ने भी उनकी तारीफ़ करते हुए उन्हें बधाई दी… मोदी जी ने कहा…जीत के बाद तिरंगे के लिए जो प्यार हिमा के जज़्बे में दिखा और राष्ट्रगान के समय उनका भावुक होना मेरे मन को भीतर तक छू गया! यह देखने के बाद आख़िर किस भारतीय की आँखें नम ना होंगी!

आप देखें प्रधानमंत्री मोदी ने जो वीडियो ट्विटर पर शेयर किया

असम की रहनेवाली हिमा १८ साल की हैं और ग़रीब किसान की बेटी हैं… हम सबको उनपर गर्व है!

– गीता शर्मा

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प्रधानमंत्री मोदी ने स्वीकार की विराट कोहली की यह चुनौती… कहा- चैलेंज एक्सेप्टेड विराट! (Challenge Accepted Virat: Will B Sharing My Own #FitnessChallenge Video Soon-PM Modi)

FitnessChallenge, PM Modi, virat kohli

FitnessChallenge, PM Modi, virat kohli

प्रधानमंत्री मोदी ने स्वीकार की विराट कोहली की यह चुनौती… कहा- चैलेंज एक्सेप्टेड विराट! (Challenge Accepted Virat: Will B Sharing My Own #FitnessChallenge Video Soon-PM Modi)

खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने पिछले दिनों एक वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड किया था, जिसमें उन्होंने खेल और बॉलीवुड की हस्तियों को टैग किया था और उनसे अपील की थी कि देश में फिटनेस को लेकर जागरूकता अभियान में वे सबको प्रेरित करें.

राठौड़ ने टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली को भी ये चैलेंज दिया था और विराट ने खेल इस चैलेंज को स्वीकार भी किया.

विराट ने वीडियो शेयर करते हुए लिखा… मैंने राज्यवर्धन सर का फिटनेस चैलेंज स्वीकार कर लिया है. अब मैं अपनी पत्नी अनुष्का शर्मा, हमारे पीएम नरेंद्र मोदी जी और धोनी भाई को यह चैलेंज दे रहा हैं.

दिलचस्प बात यह है कि विराट के इस चैलेंज को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वीकार कर लिया है. उन्होंने ट्वीट किया- चैलेंज स्वीकार है विराट. जल्द ही अपना फिटनेस चैलेंज वीडियो शेयर करूंगा.

ग़ौरतलब है कि राठौड़ ने हम फिट तो इंडिया फिट हैशटैग से ट्विटर पर यह फिटनेस चैलेंज शुरू किया है. ट्विटर पर अपलोड वीडियो में राठौड़ ख़ुद अपने दफ्तर में ही व्यायाम करते नज़र आ रहे हैं. सोशल मीडिया पर लोग राठौड़ की इस मुहिम की काफ़ी प्रशंसा कर रहे हैं और इसे अच्छा-ख़ासा रेस्पॉन्स भी दे रहे हैं.

आप भी पढ़ें इन सभी के ट्टीट्स

 

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आज भी होते हैं लड़कियों के वर्जिनिटी टेस्ट्स…! (‘Stop the V-Ritual’: The Fight To End Virginity Test)

  • कोई इस तथ्य को माने या न माने, लेकिन सच यही है कि आज भी भारतीय समाज में शादी से पहले लड़की का वर्जिन (Virgin) होना एक अनिवार्य शर्त होती है.
  • लड़का वर्जिन है या नहीं, इससे किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, लेकिन लड़की पर सबकी नज़र रहती है.
  • दरअसल, वर्जिनिटी (Virginity) को घर की व लड़की की इज़्ज़त से जोड़कर देखा जाता है. आज भी यह सोच कायम है.
  • शादी से पहले सेक्स की बात तो दूर, प्रेम-संबंध तक भी हमारे समाज के बहुत बड़े तबके में स्वीकार्य नहीं है.
  • लड़की की वर्जिनिटी को उसके चरित्र के साथ जोड़ा जाता है, लड़कों के लिए तो यह मात्र उनकी उम्र का दोष होता है.
वर्जिनिटी का क्या अर्थ है?

लड़की के कुंआरेपन को वर्जिनिटी कहा जाता है यानी जिस लड़की ने पहले कभी सेक्स न किया हो, वो वर्जिन है. इसे जांचने-परखने के कई तरी़के भी हमारे समाज में इजाद किए गए हैं, जिनमें सबसे हास्यास्पद है- शादी की पहली रात को स़फेद चादर बिछाकर यह देखना कि सेक्स के बाद चादर पर ख़ून के धब्बे हैं या नहीं. दरअसल, वर्जिनिटी को लेकर इतनी ग़लतफ़हमियां हैं कि पढ़े-लिखे लोग भी इसे समझना नहीं चाहते.

वर्जिनिटी से जुड़े मिथ्स
  • पहली बार संबंध बनाने पर ख़ून निकलता है: यह सबसे बड़ा मिथ है. 90% मामलों में पहली बार सेक्स (Sex) करने पर भी ख़ून नहीं निकलता. यह हम नहीं, रिसर्च बताते हैं.
  • हाइमन पहली बार सेक्स से ही टूटता है: सबसे बड़ा तथ्य यह है कि कई लड़कियों में तो जन्म से ही हाइमन नहीं होता. वैसे भी आजकल शादी करने की उम्र बढ़ गई है. लड़कियां फिज़िकली भी एक्टिव हो गई हैं, जिसमें कभी खेल-कूद के दौरान, कभी साइकिलिंग, स्विमिंग, तो कभी अन्य एक्टिविटी के चलते लड़कियों की योनि की झिल्ली फट जाती है.
  • पहली बार सेक्स करने पर वर्जिन लड़कियों को दर्द होता है: यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है और शरीर से ज़्यादा यह मस्तिष्क से जुड़ा होता है. यदि लड़का-लड़की मानसिक रूप से सेक्स के लिए तैयार हैं, तो काफ़ी हद तक संभावना है कि दर्द नहीं होगा. दूसरी बात, यदि फोरप्ले बेहतर ढंग से किया गया हो, तब भी दर्द की संभावनाएं कम हो जाती हैं.
  • टु फिंगर टेस्ट: बहुत-से लोगों का मानना है कि यह सबसे सटीक तरीक़ा है लड़कियों की वर्जिनिटी का पता लगाने का, जबकि ऐसा कोई भी टेस्ट नहीं है, जिससे यह पता लगाया जा सके कि लड़की ने पहले सेक्स किया है या नहीं.
  • वर्जिन लड़की का वेजाइना छोटे आकार का होता है: सभी लड़कियों के वेजाइना का आकार उसके बॉडी शेप पर निर्भर करता है. वेजाइना का छोटा-बड़ा, टाइट या लूज़ होना वर्जिनिटी से संबंध नहीं रखता. इन सबके कई अन्य कारण भी हो सकते हैं.
  • बेहतर होगा अपने पार्टनर पर भरोसा रखा जाए और अपनी लव लाइफ को एक ख़ून के धब्बे के भरोसे न रखकर उसे एंजॉय किया जाए.
यहां आज भी पंचायत निर्धारित करती है लड़की की वर्जिनिटी

हम 21वीं सदी में हैं और हम में से अधिकांश लोग यही सोचते होंगे कि इस ज़माने में वर्जिनिटी टेस्ट की बातें बेकार हैं. आजकल लोग सुलझे हुए हैं. लेकिन ऐसा है नहीं. मात्र चंद लोग ही हैं, जिनके लिए लड़कियों की वर्जिनिटी के कोई मायने नहीं.

महाराष्ट्र के पुणे के इलाके में ही कंजरभाट एक ऐसा समुदाय है, जहां पंचायत की देखरेख में शादी की पहली रात को वर्जिनिटी टेस्ट करवाया जाता है. स़फेद चादर बिछाकर यह देखा जाता है कि लड़की वर्जिन है या नहीं. शादी की रात दुल्हन के सारे गहने और चुभनेवाली तमाम चीज़ें निकलवा दी जाती हैं, ताकि उससे घायल होकर कहीं ख़ून के धब्बे न लग जाएं. इस टेस्ट में फेल होने पर दुल्हन को कई तरह की यातनाएं दी जाती हैं. पंचायत उसे सज़ा सुनाती है और यहां तक कि पहले इस तरह की घटनाएं भी हुई हैं, जहां शादी को रद्द तक कर दिया जाता था.

लेकिन अब इसी समुदाय के एक युवा विवेक तमाइचिकर ने आगे आकर इस कुप्रथा को रोकने के लिए मोर्चा खोल दिया है. स्टॉप द वी रिचुअल नाम से विवेक और उनकी कज़िन प्रियंका तमाइचिकर ने व्हाट्सऐप ग्रुप बनाया है. उनकी ही तरह अन्य युवा भी इस ग्रुप का हिस्सा हैं. हालांकि इन युवाओं की राह इतनी आसान नहीं है, क्योंकि पंचायत का विरोध करने पर इन्हें मारा जाता है. ये पुलिस की मदद भी ले रहे हैं, लेकिन इस कुप्रथा को जड़ से मिटाना इतना आसान भी नहीं.

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…मेरे लिए वर्जिनिटी एक अंधविश्‍वास है!

जी हां, यह कहना है विवेक का, जिन्होंने स्टॉप द वी रिचुअल की शुरुआत की. इसी संदर्भ में हमने ख़ुद विवेक से ख़ास बातचीत की.

विवेक तमाइचिकर पत्नी ऐश्‍वर्या के साथ

मैं 5वीं क्लास में था, जब मैंने घर पर एक तरह से हिंसा देखी. मैं अपनी कज़िन की शादी में गया था, अगले दिन उसी के साथ मारपीट हो रही थी. मेरे लिए असमंजस की स्थिति थी, क्योंकि उस उम्र में यह सब समझना बेहद मुश्किल था. मैं टयूशन गया, तो टीचर ने भी पूछा कैसी रही शादी? मैंने कह दिया कि लड़की ख़राब निकली… तो यह होता है, जब आप उसी चीज़ को देखकर पले-बढ़े होते हों. फिर टीनएज आते-आते मुझे समझ में आने लगा कि नहीं, कुछ तो ग़लत है. और उम्र बढ़ी, कॉलेज गया, तो और बातें समझ में आने लगीं और महसूस हुआ कि यह इंसानियत के ख़िलाफ़ है.

फिर मेरी सगाई ऐश्‍वर्या से हुई, तो उसके सामने मैंने अपने विचार रखे और मैंने उससे पूछा, तो उसने भी मेरा साथ देना ठीक समझा. हालांकि हमें एक बेहद कंज़र्वेटिव कम्यूनिटी और समाज से लोहा लेना था, लेकिन यह ज़रूरी था, क्योंकि मेरे लिए वर्जिनिटी एक अंधविश्‍वास है.

मेरी कज़िन प्रियंका भी बहुत ही डेडिकेटेड थी इस कैंपेन को लेकर. हमने व्हाट्सऐप ग्रुप बनाया, युवा हमारे साथ जुड़ने लगे. फेसबुक पर लिखना शुरू किया, तो और असर हुआ. कई लोगों का साथ मिला. अगस्त में राइट टु प्राइवेसी एक्ट और ट्रिपल तलाक़ नियमों के बाद मैंने फेसबुक पर अपने कैंपेन को थोड़ा एग्रेसिवली आगे बढ़ाया, जिससे बहुत-से युवाओं का मुझे अच्छा रेस्पॉन्स मिला. यह देखकर अच्छा लगा कि लोगों का माइंडसेट बदल रहा है.

प्रियंका तमाइचिकर

फैमिली का क्या रेस्पॉन्स था?

परिवारवाले चूंकि उसी कंज़र्वेटिव समाज का हिस्सा थे, तो उनके मन में डर भी था और कंफ्यूज़न भी. उन्होंने विरोध ही किया मेरा. उनके मन में पंचायत का डर था. समाज से निकाले जाने का डर था, तो यह उनका माइंडसेट था, पर मुझे जो करना था, वो करना ही था.

मैं ख़ासतौर से अपनी पत्नी ऐश्‍वर्या भट्ट और  बहन प्रियंका को सैल्यूट करना चाहूंगा कि दोनों ने मुझे बहुत सपोर्ट किया. दोनों लड़कियां हैं और उनसे बेहतर इस विषय की संवेदनशीलता को कौन समझ सकता है भला. उनका डेडिकेशन काबिले तारीफ़ है. इस कैंपेन में प्रियंका ने भी बहुत बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और मेरा साथ दिया.

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कभी डर नहीं लगा?

नहीं, कभी भी नहीं, क्योंकि मेरे लिए कोई दूसरा रास्ता था ही नहीं. मुझे इसी रास्ते पर चलना था. यह अमानवीय कृत्य मेरी बर्दाश्त के बाहर था. कंजरभाट समाज में मेरा कोई स्थान नहीं है, लेकिन मेरी जीत इसी में है कि मुझे फोन पर कहा जाता है कि समाज के लोग ग़ुस्सा हैं, ये सब बंद क्यों नहीं कर देते, तो मैं यही कहता हूं कि समाज के लोग बदल क्यों नहीं जाते? मेरे कैंपेन का असर हो रहा है, इसीलिए तो मुझसे आप बात कर रहे हो? उन्हें लगता है कि मैंने वर्जिनिटी जैसे टैबू टॉपिक को खुलेआम चर्चा का विषय बना दिया. सोशल मीडिया व मीडिया में भी इस पर हम बात करते हैं, तो ज़ाहिर है लोगों का माइंडसेट ज़रूर बदलेगा. यहां तक कि समाज के भी कुछ लोग यह जानते और मानते हैं कि मैं सही हूं, पर उनमें समाज के विरुद्ध खड़े होने की हिम्मत नहीं. मुझमें है, मैं करूंगा.

आप लोगों पर हमले भी होते रहते हैं?

जी हां, सीधेतौर पर तो नहीं, पर परोक्ष रूप से कभी व्हाट्सऐप के ग्रुप बनाकर, तो कभी गुंडों से पिटवाकर हमें धमकाया जाता है. सामाजिक रूप से बहिष्कार करके भी हमारे जज़्बे को तोड़ने की कोशिशें होती हैं, लेकिन इससे हमारे हौसले कम नहीं होनेवाले.

कहीं कोई बदलाव नज़र आ रहा है?

जी हां, मैं आपको कुछ रोज़ पहले की ही घटना बताता हूं. हमें एक शादी में बुलाया गया. वो परिवार काफ़ी रसूख़दार था. उस शादी में पंचायत को वो अधिकार नहीं दिए गए, जो पारंपरिक रूप से दिए जाते रहे हैं अब तक. इसके अलावा हमें वहां ख़ासतौर से बुलाया गया, सम्मान दिया गया. जो शगुन की बातें होती हैं, जिनसे लिंग भेद न हो व समाज को नुक़सान न हो, उसका हमने भी विरोध नहीं किया, लेकिन वहां उस परंपरा को पूरी तरह से तोड़ दिया गया, जिसके लिए कंजरभाट समाज जाना जाता है. हमें बेहद ख़ुशी हुई. हालांकि जब हम बाहर आए, तो हमारी गाड़ी का कांच टूटा हुआ था, जो पंचायत के लोगों ने ही ग़ुस्से में किया था. पर यही तो हमारी जीत थी.

पंचायत किस तरह से करती है वर्जिनिटी टेस्ट?

यह इतना अमानवीय है कि आपको यक़ीन नहीं होगा कि इस युग में भी ये सब होता है. शादी के व़क्त पूरी पंचायत मौजूद रहती है. उनका सत्कार-सम्मान होता है. शादी के बाद दूल्हा-दुल्हन को बोला जाता है कि अब आपको वर्जिनिटी टेस्ट के लिए भेजा जा रहा है. परिवार के साथ मैरिड कपल को लॉज में भेजा जाता है. वहां दुल्हन को महिला सदस्य पूरी तरह नग्न करती है, ताकि शरीर पर ऐसा कुछ भी न रहे, जिससे चोट वगैरह लगकर ख़ून निकले. स़फेद चादर बिछाई जाती है और आधे घंटे का समय कपल को दिया जाता है परफॉर्म करके रिज़ल्ट देने का. यदि दूल्हा परफॉर्म नहीं कर पा रहा हो, तो कपल को ब्लू फिल्म दिखाई जाती है या दूल्हे को शराब की आदत हो, तो शराब पिलाई जाती है या उन्हें कोई और परफॉर्म करके दिखाता है. उसके बाद वो स़फेद चादर लड़केवाले अपने कब्ज़े में ले लेते हैं.

अगले दिन सुबह पंचायत फाइनल सर्टिफिकेट देने के लिए बैठती है. कुल 100-200 लोग होते हैं. दूल्हे से पूछा जाता है- ‘तेरा माल कैसा था?’ दूल्हे को तीन बार बोलना पड़ता है- ‘मेरा माल अच्छा था या मेरा माल ख़राब था.’ तो आप सोचिए ये लिंग भेद का सबसे ख़तरनाक रूप कितना अमानवीय है. यदि लड़की इस टेस्ट में फेल हो जाती है, तो उस मारा-पीटा जाता है, कहा जाता है कि किस-किस के साथ तू क्या-क्या करके आई है… वगैरह.

प्रशासन का रवैया कैसा रहा अब तक?

मेरे ही गु्रप के एक लड़के ने एक शादी का वीडियो शूट करके पुलिस में कंप्लेन की थी. उस शादी में पंचायत बैठी थी और वहां पैसों का काफ़ी लेन-देन व कई ऐसी चीज़ें हो रही थीं, जो क़ानून के भी ख़िलाफ़ थीं. पर पुलिस ने एफआईआर तक नहीं लिखी. हमारे ही गु्रप की एक लड़की को भी समाज ने बायकॉट किया, हम पर भी अटैक्स होते हैं, पर समाज का दबाव इतना ज़्यादा है कि सीधेतौर पर कोई कार्रवाई इतनी जल्दी नहीं होती.

आज भी अधिकांश लड़के शादी के लिए ‘वर्जिन’ लड़की ही ढूंढ़ते हैं. क्या लगता है कि उनकी सोच बदलेगी?

यही तो चैलेंज है. दरअसल, हम जिस माहौल, समाज व परिवार में पलते-बढ़ते हैं, वो ही हमारी सोच को गढ़ती है. पारंपरिक तौर पर हम उसी का हिस्सा बन जाते हैं, तो ये एक माइंडसेट है, जिसे बदलना अपने आपमें चुनौती तो है, लेकिन हमें इस चुनौती को स्वीकारना होगा और जीत भी हासिल करनी होगी.

हाइमन रिकंस्ट्रक्शन सर्जरी का बढ़ता ट्रेंड

लड़के कितनी ही मॉडर्न सोच रखने का दावा क्यों न करते हों, पर उनका ध्यान भी लड़की की वर्जिनिटी पर ही रहता है. यही वजह है कि आजकल लड़कियां हाइमन रिकंस्ट्रक्शन सर्जरी करवाने में ही अपनी भलाई समझने लगी हैं. इसे हाइमनोप्लास्टी, हाइमन रिपेयर या

री-वर्जिनेशन कहा जाता है. यह सर्जरी महंगी होती है, लेकिन आजकल सरकारी अस्पतालों में भी यह होने लगी है. यह कॉस्मेटिक सर्जरी होती है और सरकारी अस्पताल के आंकड़े बताते हैं कि

दिन-ब-दिन इसमें बढ़ोत्तरी हो रही है. हर महीने कम से कम दो-तीन केसेस हाइमन रिपेयर के होते ही हैं. इन लड़कियों पर सामाजिक और पारिवारिक दबाव होता है. साथ ही यह डर भी कि कहीं उनका पार्टनर उन्हें छोड़ न दे. यहां तक कि कुछ मामलों में तो पैरेंट्स ही यह सर्जरी करवाने की सलाह देते हैं, जहां लड़कियों की दोबारा शादी करानी हो या इसी तरह के मामले हों, तो परिवार के दबाव में लड़की सर्जरी करवाती है.

भारत में भी सेक्सुअल एक्टिवनेस बढ़ गई है, लेकिन इसके बावजूद अधिकांश सर्वे इस बात को पुख़्ता करते हैं कि लड़के आज भी शादी के लिए वर्जिन लड़की ही ढूंढ़ते हैं.

– गीता शर्मा

 

Shaheed Diwas: शहीदों की शहादत को नमन (Shaeed Diwas Special)

Shaheed Diwas, शहीदों की शहादत को नमन, Shaeed Diwas Special

Shaheed Diwas, शहीदों की शहादत को नमन, Shaeed Diwas Special

23 मार्च 1931 का वो दिन आज एक बार फिर से ताज़ा हो गया. यही वो दिन था जब हंसते-हंसते देश के हीरो ने धरती मां के लिए ख़ुद को कुर्बान कर दिया था. उनकी शहादत का वो दिन हर हिंदुस्तानी को गर्व से भर देता है. मन में एक अजीब सा साहस भर जाता है. उन हीरोज़ के लिए मस्तक अपने आप झुक जाता है. भारतीय इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में 23 मार्च लिखा गया है. इस तारीख़ से हिंदुस्तान को अपना बीता हुआ कल और आज की झलक मिलती है.

  • क्रांतिकारी भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को आज ही के दिन 1931 में फांसी दे दी गई थी. भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को हुआ था.
  • भगत सिंह, शिवराम हरिनारायण राजगुरु और सुखदेव थापर में वतन परस्ती कूट-कूट कर भरी थी.
  • अंग्रेज़ों की नाक में दम करनेवाले इन हीरोज़ ने उऩकी चलती संसद में बम फेंककर हिंदुस्तान की आज़ादी की नींव को पुख़्ता किया था. इसके जुर्म में अंग्रेज़ों ने 3 हीरोज़ को सूली पर चढ़ाने का फैसला किया.
  • अंग्रेज़ों को लगा था कि ये छोटी उम्र के लड़के फांसी से डर जाएंगे और उनके क़दमों में सिर झुका देंगे, लेकिन वतन पर कुर्बान होनेवाले इन हीरोज़ ने वो कर दिखाया, जिसे करने के लिए बड़े-बड़े लोग कांप जाते हैं.
  • फांसी के तख्ते पर डरते हुए नहीं, बल्कि गाते हुए पहुंचे और फांसी के फंदे को चूमकर भारत माता की जय कहकर ख़ुद को माता की स्वतंत्रता के लिए कुर्बान कर दिया.
  • फांसी के फंदे को चूमकर उनके जीवन का तो अंत हो गया, लेकिन देश को एक नई सुबह मिल गई. एक ऐसी सुबह, जिसकी स्वतंत्र आबोहवा में आज हर हिंदुस्तानी खुलकर सांस ले रहा है.
  • शहीद दिवस के मौ़के पर शहीदों को मेरी सहेली (Meri Saheli) की ओर से शत-शत नमन!

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बर्थ एनिवर्सरी- बचपन से ही आसमान की सैर करना चाहती थीं कल्पना चावला (Birth Anniversary: Remembering Kalpana Chawla)

Birth Anniversary, Remembering Kalpana Chawla

Birth Anniversary, Remembering Kalpana Chawla

अंतरिक्ष में जानेवाली भारतीय मूल की पहली महिला बनने का गौरव हासिल करनेवाली कल्पना चावला का जीवन भले ही बहुत छोटा था, मगर इस छोटी सी ज़िंदगी में उन्होंने वो कर दिखाया जो लाखों लड़कियों के लिए प्रेरणास्रोत बन गया. कल्पना चावला की बर्थ एनिवर्सरी के मौ़के पर आइए, आपको बताते हैं उनसे जुड़ी कुछ ख़ास बातें.

* कल्पना चावला का जन्म 17 मार्च 1962 में करनाल में हुआ था.

* करनाल के टैगोर स्कूल से शुरुआती पढ़ाई के बाद कल्पना ने 1982 में चंडीगढ़ इंजीनियरिंग कॉलेज से एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की डिग्री और 1984 से टेक्सास यूनिवर्सिटी से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की डिग्री ली.

* कल्पना जेआरडी टाटा (जो पायलट होने के साथ ही नामी बिज़नेसमेन भी थे) से बहुत प्रभावित और प्रेरित थीं.

* 1988 में उन्होंने नासा के लिए काम करना शुरू किया और यही उनकी ज़िंदगी का टर्निंग पॉइंट था.

* अंतरिक्ष की सैर का उनका सपना पूरा हुआ 1997 में, जब कल्पना चावला ने स्पेस शटल कोलम्बिया से पहली अंतरिक्ष यात्रा की.

* अंतरिक्ष की पहली यात्रा के दौरान उन्होंने अंतरिक्ष मे 372 घंटे बिताए और पृथ्वी की 252 परिक्रमाएं पूरी की.

* कल्पना ने स्पेस के लिए दूसरी उड़ान 2003 में कोलंबिया शटल से भरी और ये उनकी ज़िंदगी की आख़िरी उड़ान साबित हुई. 01 फरवरी 2003 को  कोलम्बिया स्पेस शटल लैंडिंग से पहले ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया और कल्पना के साथ बाकी सभी 6 अंतरिक्ष यात्रियों की मृत्यु हो गई.

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