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भारत में डोमेस्टिक वॉयलेंस से 40% अधिक मौतें… (Domestic Violence In India)

Domestic Violence
भारत में डोमेस्टिक वॉयलेंस से 40% अधिक मौतें… (Domestic Violence In India)

बेटी होना कोई गुनाह नहीं है, लेकिन हमारी सामाजिक सोच ने इसे भी किसी अपराध से कम नहीं बना रखा है… बेटियों को हर बात पर हिदायतें दी जाती हैं, हर पल उसे एहसास करवाया जाता है कि ये जो भी तुम पहन रही हो, खा रही हो, हंस रही हो, बोल रही हो… सब मेहरबानी है हमारी… घरों में इसी सोच के साथ उसका पालन-पोषण होता है कि एक दिन शादी हो जाएगी और ज़िम्मेदारी ख़त्म… ससुराल में यही जताया जाता है कि इज़्ज़त तभी मिलेगी, जब पैसा लाओगी या हमारे इशारों पर नाचोगी… इन सबके बीच एक औरत पिसती है, घुटती है और दम भी तोड़ देती है… भारत के घरेलू हिंसा व उससे जुड़े मृत्यु के आंकड़े इसी ओर इशारा करते हैं…

वो कहते हैं तुम आज़ाद हो… तुम्हें बोलने की, मुस्कुराने की थोड़ी छूट दे दी है हमने… वो कहते हैं अब तो तुम ख़ुश हो न… तुम्हें आज सखियों के संग बाहर जाने की इजाज़त दे दी है… वो कहते हैं अपनी आज़ादी का नाजायज़ फ़ायदा मत उठाओ… कॉलेज से सीधे घर आ जाओ… वो कहते हैं शर्म औरत का गहना है, ज़ोर से मत हंसो… नज़रें झुकाकर चलो… वो कहते हैं तुमको पराये घर जाना है… जब चली जाओगी, तब वहां कर लेना अपनी मनमानी… ये कहते हैं, मां-बाप ने कुछ सिखाया नहीं, बस मुफ़्त में पल्ले बांध दिया… ये कहते हैं, इतना अनमोल लड़का था और एक दमड़ी इसके बाप ने नहीं दी… ये कहते हैं, यहां रहना है, तो सब कुछ सहना होगा, वरना अपने घर जा… वो कहते हैं, सब कुछ सहकर वहीं रहना होगा, वापस मत आ… ये कहते हैं पैसे ला या फिर मार खा… वो कहते हैं, अपना घर बसा, समाज में नाक मत कटा… और फिर एक दिन… मैं मौन हो गई… सबकी इज़्ज़त बच गई…!

 

घरेलू हिंसा और भारत…
  • भारत में डोमेस्टिक वॉयलेंस व प्रताड़ना के बाद महिलाओं की मृत्यु की लगभग 40% अधिक आशंका रहती है, बजाय अमेरिका जैसे विकसित देश के… यह ख़तरनाक आंकड़ा एक सर्वे का है.
  • वॉशिंगटन में हुए इस सर्वे का ट्रॉमा डाटा बताता है कि भारत में महिलाओं को चोट लगने के तीन प्रमुख कारण हैं- गिरना, ट्रैफिक एक्सिडेंट्स और डोमेस्टिक वॉयलेंस.
  • 60% भारतीय पुरुष यह मानते हैं कि वो अपनी पत्नियों को प्रताड़ित करते हैं.
  • हाल ही में हुए एक सर्वे के अनुसार महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित देशों में भारत अब पहले स्थान पर पहुंच चुका है. हालांकि इस सर्वे और इसका सैंपल साइज़ विवादों के घेरे में है और अधिकांश भारतीय यह मानते हैं कि यह सही नहीं है…
  • 2011 में भी एक सर्वे हुआ था, जिसमें यूनाइटेड नेशन्स के सदस्य देशों को शामिल किया गया था, उसमें पहले स्थान पर अफगानिस्तान, दूसरे पर कांगो, तीसरे पर पाकिस्तान था और भारत चौथे स्थान पर था.
  • भारतीय सरकारी आंकड़े भी बताते हैं कि 2007 से लेकर 2016 के बीच महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराधों में 83% इज़ाफ़ा हुआ है.
  • हालांकि हम यहां बात घरेलू हिंसा की कर रहे हैं, लेकिन ये तमाम आंकड़े समाज की सोच और माइंड सेट को दर्शाते हैं.
  • नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक़, प्रोटेक्शन ऑफ वुमन फ्रॉम डोमेस्टिक वॉयलेंस एक्ट के पास होने के बाद से (2005) अब तक लगभग दस लाख से अधिक केसेस फाइल किए गए, जिनमें पति की क्रूरता और दहेज मुख्य कारण हैं.
मानसिकता है मुख्य वजह
  • हमारे समाज में पति को परमेश्‍वर मानने की सीख आज भी अधिकांश परिवारों में दी जाती है.
  • पति और उसकी लंबी उम्र से जुड़े तमाम व्रत-उपवास को इतनी गंभीरता से लिया जाता है कि यदि किसी घर में पत्नी इसे न करे, तो यही समझा जाता है कि उसे अपने पति की फ़िक़्र नहीं.
  • इतनी तकलीफ़ सहकर वो घर और दफ़्तर का रोज़मर्रा का काम भी करती हैं और घर आकर पति के आने का इंतज़ार भी करती हैं. उसकी पूजा करने के बाद ही पानी पीती हैं.
  • यहां कहीं भी यह नहीं सिखाया जाता कि शादी से पहले भी और शादी के बाद भी स्त्री-पुरुष का बराबरी का दर्जा है. दोनों का सम्मान ज़रूरी है.
  • किसी भी पुरुष को शायद ही आज तक घरों में यह सीख व शिक्षा दी जाती हो कि आपको हर महिला का सम्मान करना है और शादी से पहले कभी किसी भी दूल्हे को यह नहीं कहा जाता कि अपनी पत्नी का सम्मान करना.
  • ऐसा इसलिए होता है कि दोनों को समान नहीं समझा जाता. ख़ुद महिलाएं भी ऐसा ही सोचती हैं.
  • व्रत-उपवासवाले दिन वो दिनभर भूखी-प्यासी रहकर ख़ुद को गौरवान्वित महसूस करती हैं कि अब उनके पति की उम्र लंबी हो जाएगी.
  • इसे हमारी परंपरा से जोड़कर देखा जाता है, जबकि यह लिंग भेद का बहुत ही क्रूर स्वरूप है.

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Domestic Violence

कहीं न कहीं लिंग भेद से ही उपजती हैं ये समस्याएं…
  • महिलाओं के ख़िलाफ़ जितने भी अत्याचार होते हैं, चाहे दहेजप्रथा हो, भ्रूण हत्या हो, बलात्कार हो या घरेलू हिंसा… इनकी जड़ लिंग भेद ही है.
  • बेटा-बेटी समान नहीं हैं, यह सोच हमारे ख़ून में रच-बस चुकी है. इतनी अधिक कि जब पति अपनी पत्नी पर हाथ उठाता है, तो उसको यही कहा जाता है कि पति-पत्नी में इस तरह की अनबन सामान्य बात है.
  • यदि कोई स्त्री पलटवार करती है, तो उसे इतनी जल्दी समर्थन नहीं मिलता. उसे हिदायतें ही दी जाती हैं कि अपनी शादी को ख़तरे में न डाले.
  • शादी को ही एक स्त्री के जीवन का सबसे अंतिम लक्ष्य माना जाता है. शादी टूट गई, तो जैसे ज़िंदगी में कुछ बचेगा ही नहीं.
शादी एक सामान्य सामाजिक प्रक्रिया मात्र है…
  • यह सोच अब तक नहीं पनपी है कि शादी को हम सामान्य तरी़के से ले पाएं.
  • जिस तरह ज़िंदगी के अन्य निर्णयों में हमसे भूल हो सकती है, तो शादी में क्यों नहीं?
  • अगर ग़लत इंसान से शादी हो गई है और आपको यह बात समय रहते पता चल गई है, तो झिझक किस बात की?
  • अपने इस एक ग़लत निर्णय का बोझ उम्रभर ढोने से बेहतर है ग़लती को सुधार लिया जाए.
  • पैरेंट्स को भी चाहिए कि अगर शादी में बेटी घरेलू हिंसा का शिकार हो रही है या दहेज के लिए प्रताड़ित की जा रही है, तो जल्दी ही निर्णय लें, वरना बेटी से ही हाथ धोना पड़ेगा.
  • यही नहीं, यदि शादी के समय भी इस बात का आभास हो रहा हो कि आगे चलकर दहेज के लिए बेटी को परेशान किया जा सकता है, तो बारात लौटाने में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए.
  • ग़लत लोगों में, ग़लत रिश्ते में बंधने से बेहतर है बिना रिश्ते के रहना. इतना साहस हर बेटी कर सके, यह पैरेंट्स को ही उन्हें सिखाना होगा.
सिर्फ प्रशासन व सरकार से ही अपेक्षा क्यों?
  • हमारी सबसे बड़ी समस्या यही है कि हम हर समस्या का समाधान सरकार से ही चाहते हैं.
  • अगर घर के बाहर कचरा है, तो सरकार ज़िम्मेदार, अगर घर में राशन कम है, तो भी सरकार ज़िम्मेदार है…
  • जिन समस्याओं के लिए हमारी परवरिश, हमारी मानसिकता व सामाजिक परिवेश ज़िम्मेदार हैं. उनके लिए हमें ही प्रयास करने होंगे. ऐसे में हर बात को क़ानून, प्रशासन व सरकार की ज़िम्मेदारी बताकर अपनी ज़िम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेना जायज़ नहीं है.
  • हम अपने घरों में किस तरह से बच्चों का पालन-पोषण करते हैं, हम अपने अधिकारों व स्वाभिमान के लिए किस तरह से लड़ते हैं… ये तमाम बातें बच्चे देखते व सीखते हैं.
  • बेटियों को शादी के लिए तैयार करने व घरेलू काम में परफेक्ट करने के अलावा आर्थिक रूप से भी मज़बूत करने पर ज़ोर दें, ताकि वो अपने हित में फैसले ले सकें.
  • अक्सर लड़कियां आर्थिक आत्मनिर्भरता न होने की वजह से ही नाकाम शादियों में बनी रहती हैं. पति की मार व प्रताड़ना सहती रहती हैं. बेहतर होगा कि हम बेटियों को आत्मनिर्भर बनाएं और बेटों को सही बात सिखाएं.
  • पत्नी किसी की प्राइवेट प्रॉपर्टी नहीं है, सास-ससुर को भी यह समझना चाहिए कि अगर बेटा घरेलू हिंसा कर रहा है, तो बहू का साथ दें.
  • पर अक्सर दहेज की चाह में सास-ससुर ख़ुद उस हिंसा में शामिल हो जाते हैं, पर वो भूल जाते हैं कि उनकी बेटी भी दूसरे घर जाए और उसके साथ ऐसा व्यवहार हो, तो क्या वो बर्दाश्त करेंगे?
  • ख़ैर, किताबी बातों से कुछ नहीं होगा, जब तक कि समाज की सोच नहीं बदलेगी और समाज हमसे ही बनता है, तो सबसे पहले हमें अपनी सोच बदलनी होगी.
बेटों को दें शिक्षा…
  • अब वो समय आ चुका है, जब बेटों को हिदायतें और शिक्षा देनी ज़रूरी है.
  • पत्नी का अलग वजूद होता है, वो भी उतनी ही इंसान है, जितनी आप… तो किस हक से उस पर हाथ उठाते हैं?
  • शादी आपको पत्नी को पीटने का लायसेंस नहीं देती.
  • अगर सम्मान कर नहीं सकते, तो सम्मान की चाह क्यों?
  • शादी से पहले हर पैरेंट्स को अपने बेटों को ये बातें सिखानी चाहिए, लेकिन पैरेंट्स तो तभी सिखाएंगे, जब वो ख़ुद इस बात को समझेंगे व इससे सहमत होंगे.
  • पैरेंट्स की सोच ही नहीं बदलेगी, तो बच्चों की सोच किस तरह विकसित होगी?
  • हालांकि कुछ हद तक बदलाव ज़रूर आया, लेकिन आदर्श स्थिति बनने में अभी लंबा समय है, तब तक बेहतर होगा बेटियों को सक्षम बनाएं और बेटों को बेहतर इंसान बनाएं.

– गीता शर्मा

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Proud Moment: विनेश फोगाट ने रचा इतिहास… एशियाड में भारत का महिला कुश्ती वर्ग का पहला गोल्ड (Vinesh Phogat Creates History After Winning Gold At Asian Games)

Vinesh Phogat

Proud Moment: विनेश फोगाट ने रचा इतिहास… एशियाड में भारत का महिला कुश्ती वर्ग का पहला गोल्ड (Vinesh Phogat Creates History After Winning Gold At Asian Games)

एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने पर ढेरों शुभकामनाएं… विदेश (Vinesh Phogat) ने इतिहास रच दिया, एशियाड में भारत का महिला कुश्ती वर्ग का पहला गोल्ड. पूरे देश को आप पर गर्व है! ग़ौरतलब है कि इन दिनों जकार्ता में चल रहे एशियन गेम्स में भारत का ये दूसरा गोल्ड है… रविवार को रेस्लर बजरंग पुनिया ने भी भारत की झोली में गोल्ड डाला था!

गोल्डन गर्ल हिमा दास की कामयाबी ने प्रधानमंत्री मोदी को किया भावुक (Seeing Her Passionately Search For The Tricolour Touched Me Deeply: PM Narendra Modi)

 

Athlete Hima Das

भारतीय ऐथ्लीट हिमा दास ने गुरुवार को आईएएएफ विश्व अंडर २० एथलेटिक्स चैम्पीयन्शिप की ४०० मीटर दौड़ में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया है.

ये चैम्पीयन्शिप फ़िनलैंड के टेम्पेयर शहर में हुई थी. ऐसा करके अब हिमा ट्रैक स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीतनेवाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गई हैं.

प्रधानमंत्री मोदी ने भी उनकी तारीफ़ करते हुए उन्हें बधाई दी… मोदी जी ने कहा…जीत के बाद तिरंगे के लिए जो प्यार हिमा के जज़्बे में दिखा और राष्ट्रगान के समय उनका भावुक होना मेरे मन को भीतर तक छू गया! यह देखने के बाद आख़िर किस भारतीय की आँखें नम ना होंगी!

आप देखें प्रधानमंत्री मोदी ने जो वीडियो ट्विटर पर शेयर किया

असम की रहनेवाली हिमा १८ साल की हैं और ग़रीब किसान की बेटी हैं… हम सबको उनपर गर्व है!

– गीता शर्मा

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प्रधानमंत्री मोदी ने स्वीकार की विराट कोहली की यह चुनौती… कहा- चैलेंज एक्सेप्टेड विराट! (Challenge Accepted Virat: Will B Sharing My Own #FitnessChallenge Video Soon-PM Modi)

FitnessChallenge, PM Modi, virat kohli

FitnessChallenge, PM Modi, virat kohli

प्रधानमंत्री मोदी ने स्वीकार की विराट कोहली की यह चुनौती… कहा- चैलेंज एक्सेप्टेड विराट! (Challenge Accepted Virat: Will B Sharing My Own #FitnessChallenge Video Soon-PM Modi)

खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने पिछले दिनों एक वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड किया था, जिसमें उन्होंने खेल और बॉलीवुड की हस्तियों को टैग किया था और उनसे अपील की थी कि देश में फिटनेस को लेकर जागरूकता अभियान में वे सबको प्रेरित करें.

राठौड़ ने टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली को भी ये चैलेंज दिया था और विराट ने खेल इस चैलेंज को स्वीकार भी किया.

विराट ने वीडियो शेयर करते हुए लिखा… मैंने राज्यवर्धन सर का फिटनेस चैलेंज स्वीकार कर लिया है. अब मैं अपनी पत्नी अनुष्का शर्मा, हमारे पीएम नरेंद्र मोदी जी और धोनी भाई को यह चैलेंज दे रहा हैं.

दिलचस्प बात यह है कि विराट के इस चैलेंज को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वीकार कर लिया है. उन्होंने ट्वीट किया- चैलेंज स्वीकार है विराट. जल्द ही अपना फिटनेस चैलेंज वीडियो शेयर करूंगा.

ग़ौरतलब है कि राठौड़ ने हम फिट तो इंडिया फिट हैशटैग से ट्विटर पर यह फिटनेस चैलेंज शुरू किया है. ट्विटर पर अपलोड वीडियो में राठौड़ ख़ुद अपने दफ्तर में ही व्यायाम करते नज़र आ रहे हैं. सोशल मीडिया पर लोग राठौड़ की इस मुहिम की काफ़ी प्रशंसा कर रहे हैं और इसे अच्छा-ख़ासा रेस्पॉन्स भी दे रहे हैं.

आप भी पढ़ें इन सभी के ट्टीट्स

 

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आज भी होते हैं लड़कियों के वर्जिनिटी टेस्ट्स…! (‘Stop the V-Ritual’: The Fight To End Virginity Test)

  • कोई इस तथ्य को माने या न माने, लेकिन सच यही है कि आज भी भारतीय समाज में शादी से पहले लड़की का वर्जिन (Virgin) होना एक अनिवार्य शर्त होती है.
  • लड़का वर्जिन है या नहीं, इससे किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, लेकिन लड़की पर सबकी नज़र रहती है.
  • दरअसल, वर्जिनिटी (Virginity) को घर की व लड़की की इज़्ज़त से जोड़कर देखा जाता है. आज भी यह सोच कायम है.
  • शादी से पहले सेक्स की बात तो दूर, प्रेम-संबंध तक भी हमारे समाज के बहुत बड़े तबके में स्वीकार्य नहीं है.
  • लड़की की वर्जिनिटी को उसके चरित्र के साथ जोड़ा जाता है, लड़कों के लिए तो यह मात्र उनकी उम्र का दोष होता है.
वर्जिनिटी का क्या अर्थ है?

लड़की के कुंआरेपन को वर्जिनिटी कहा जाता है यानी जिस लड़की ने पहले कभी सेक्स न किया हो, वो वर्जिन है. इसे जांचने-परखने के कई तरी़के भी हमारे समाज में इजाद किए गए हैं, जिनमें सबसे हास्यास्पद है- शादी की पहली रात को स़फेद चादर बिछाकर यह देखना कि सेक्स के बाद चादर पर ख़ून के धब्बे हैं या नहीं. दरअसल, वर्जिनिटी को लेकर इतनी ग़लतफ़हमियां हैं कि पढ़े-लिखे लोग भी इसे समझना नहीं चाहते.

वर्जिनिटी से जुड़े मिथ्स
  • पहली बार संबंध बनाने पर ख़ून निकलता है: यह सबसे बड़ा मिथ है. 90% मामलों में पहली बार सेक्स (Sex) करने पर भी ख़ून नहीं निकलता. यह हम नहीं, रिसर्च बताते हैं.
  • हाइमन पहली बार सेक्स से ही टूटता है: सबसे बड़ा तथ्य यह है कि कई लड़कियों में तो जन्म से ही हाइमन नहीं होता. वैसे भी आजकल शादी करने की उम्र बढ़ गई है. लड़कियां फिज़िकली भी एक्टिव हो गई हैं, जिसमें कभी खेल-कूद के दौरान, कभी साइकिलिंग, स्विमिंग, तो कभी अन्य एक्टिविटी के चलते लड़कियों की योनि की झिल्ली फट जाती है.
  • पहली बार सेक्स करने पर वर्जिन लड़कियों को दर्द होता है: यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है और शरीर से ज़्यादा यह मस्तिष्क से जुड़ा होता है. यदि लड़का-लड़की मानसिक रूप से सेक्स के लिए तैयार हैं, तो काफ़ी हद तक संभावना है कि दर्द नहीं होगा. दूसरी बात, यदि फोरप्ले बेहतर ढंग से किया गया हो, तब भी दर्द की संभावनाएं कम हो जाती हैं.
  • टु फिंगर टेस्ट: बहुत-से लोगों का मानना है कि यह सबसे सटीक तरीक़ा है लड़कियों की वर्जिनिटी का पता लगाने का, जबकि ऐसा कोई भी टेस्ट नहीं है, जिससे यह पता लगाया जा सके कि लड़की ने पहले सेक्स किया है या नहीं.
  • वर्जिन लड़की का वेजाइना छोटे आकार का होता है: सभी लड़कियों के वेजाइना का आकार उसके बॉडी शेप पर निर्भर करता है. वेजाइना का छोटा-बड़ा, टाइट या लूज़ होना वर्जिनिटी से संबंध नहीं रखता. इन सबके कई अन्य कारण भी हो सकते हैं.
  • बेहतर होगा अपने पार्टनर पर भरोसा रखा जाए और अपनी लव लाइफ को एक ख़ून के धब्बे के भरोसे न रखकर उसे एंजॉय किया जाए.
यहां आज भी पंचायत निर्धारित करती है लड़की की वर्जिनिटी

हम 21वीं सदी में हैं और हम में से अधिकांश लोग यही सोचते होंगे कि इस ज़माने में वर्जिनिटी टेस्ट की बातें बेकार हैं. आजकल लोग सुलझे हुए हैं. लेकिन ऐसा है नहीं. मात्र चंद लोग ही हैं, जिनके लिए लड़कियों की वर्जिनिटी के कोई मायने नहीं.

महाराष्ट्र के पुणे के इलाके में ही कंजरभाट एक ऐसा समुदाय है, जहां पंचायत की देखरेख में शादी की पहली रात को वर्जिनिटी टेस्ट करवाया जाता है. स़फेद चादर बिछाकर यह देखा जाता है कि लड़की वर्जिन है या नहीं. शादी की रात दुल्हन के सारे गहने और चुभनेवाली तमाम चीज़ें निकलवा दी जाती हैं, ताकि उससे घायल होकर कहीं ख़ून के धब्बे न लग जाएं. इस टेस्ट में फेल होने पर दुल्हन को कई तरह की यातनाएं दी जाती हैं. पंचायत उसे सज़ा सुनाती है और यहां तक कि पहले इस तरह की घटनाएं भी हुई हैं, जहां शादी को रद्द तक कर दिया जाता था.

लेकिन अब इसी समुदाय के एक युवा विवेक तमाइचिकर ने आगे आकर इस कुप्रथा को रोकने के लिए मोर्चा खोल दिया है. स्टॉप द वी रिचुअल नाम से विवेक और उनकी कज़िन प्रियंका तमाइचिकर ने व्हाट्सऐप ग्रुप बनाया है. उनकी ही तरह अन्य युवा भी इस ग्रुप का हिस्सा हैं. हालांकि इन युवाओं की राह इतनी आसान नहीं है, क्योंकि पंचायत का विरोध करने पर इन्हें मारा जाता है. ये पुलिस की मदद भी ले रहे हैं, लेकिन इस कुप्रथा को जड़ से मिटाना इतना आसान भी नहीं.

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…मेरे लिए वर्जिनिटी एक अंधविश्‍वास है!

जी हां, यह कहना है विवेक का, जिन्होंने स्टॉप द वी रिचुअल की शुरुआत की. इसी संदर्भ में हमने ख़ुद विवेक से ख़ास बातचीत की.

विवेक तमाइचिकर पत्नी ऐश्‍वर्या के साथ

मैं 5वीं क्लास में था, जब मैंने घर पर एक तरह से हिंसा देखी. मैं अपनी कज़िन की शादी में गया था, अगले दिन उसी के साथ मारपीट हो रही थी. मेरे लिए असमंजस की स्थिति थी, क्योंकि उस उम्र में यह सब समझना बेहद मुश्किल था. मैं टयूशन गया, तो टीचर ने भी पूछा कैसी रही शादी? मैंने कह दिया कि लड़की ख़राब निकली… तो यह होता है, जब आप उसी चीज़ को देखकर पले-बढ़े होते हों. फिर टीनएज आते-आते मुझे समझ में आने लगा कि नहीं, कुछ तो ग़लत है. और उम्र बढ़ी, कॉलेज गया, तो और बातें समझ में आने लगीं और महसूस हुआ कि यह इंसानियत के ख़िलाफ़ है.

फिर मेरी सगाई ऐश्‍वर्या से हुई, तो उसके सामने मैंने अपने विचार रखे और मैंने उससे पूछा, तो उसने भी मेरा साथ देना ठीक समझा. हालांकि हमें एक बेहद कंज़र्वेटिव कम्यूनिटी और समाज से लोहा लेना था, लेकिन यह ज़रूरी था, क्योंकि मेरे लिए वर्जिनिटी एक अंधविश्‍वास है.

मेरी कज़िन प्रियंका भी बहुत ही डेडिकेटेड थी इस कैंपेन को लेकर. हमने व्हाट्सऐप ग्रुप बनाया, युवा हमारे साथ जुड़ने लगे. फेसबुक पर लिखना शुरू किया, तो और असर हुआ. कई लोगों का साथ मिला. अगस्त में राइट टु प्राइवेसी एक्ट और ट्रिपल तलाक़ नियमों के बाद मैंने फेसबुक पर अपने कैंपेन को थोड़ा एग्रेसिवली आगे बढ़ाया, जिससे बहुत-से युवाओं का मुझे अच्छा रेस्पॉन्स मिला. यह देखकर अच्छा लगा कि लोगों का माइंडसेट बदल रहा है.

प्रियंका तमाइचिकर

फैमिली का क्या रेस्पॉन्स था?

परिवारवाले चूंकि उसी कंज़र्वेटिव समाज का हिस्सा थे, तो उनके मन में डर भी था और कंफ्यूज़न भी. उन्होंने विरोध ही किया मेरा. उनके मन में पंचायत का डर था. समाज से निकाले जाने का डर था, तो यह उनका माइंडसेट था, पर मुझे जो करना था, वो करना ही था.

मैं ख़ासतौर से अपनी पत्नी ऐश्‍वर्या भट्ट और  बहन प्रियंका को सैल्यूट करना चाहूंगा कि दोनों ने मुझे बहुत सपोर्ट किया. दोनों लड़कियां हैं और उनसे बेहतर इस विषय की संवेदनशीलता को कौन समझ सकता है भला. उनका डेडिकेशन काबिले तारीफ़ है. इस कैंपेन में प्रियंका ने भी बहुत बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और मेरा साथ दिया.

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कभी डर नहीं लगा?

नहीं, कभी भी नहीं, क्योंकि मेरे लिए कोई दूसरा रास्ता था ही नहीं. मुझे इसी रास्ते पर चलना था. यह अमानवीय कृत्य मेरी बर्दाश्त के बाहर था. कंजरभाट समाज में मेरा कोई स्थान नहीं है, लेकिन मेरी जीत इसी में है कि मुझे फोन पर कहा जाता है कि समाज के लोग ग़ुस्सा हैं, ये सब बंद क्यों नहीं कर देते, तो मैं यही कहता हूं कि समाज के लोग बदल क्यों नहीं जाते? मेरे कैंपेन का असर हो रहा है, इसीलिए तो मुझसे आप बात कर रहे हो? उन्हें लगता है कि मैंने वर्जिनिटी जैसे टैबू टॉपिक को खुलेआम चर्चा का विषय बना दिया. सोशल मीडिया व मीडिया में भी इस पर हम बात करते हैं, तो ज़ाहिर है लोगों का माइंडसेट ज़रूर बदलेगा. यहां तक कि समाज के भी कुछ लोग यह जानते और मानते हैं कि मैं सही हूं, पर उनमें समाज के विरुद्ध खड़े होने की हिम्मत नहीं. मुझमें है, मैं करूंगा.

आप लोगों पर हमले भी होते रहते हैं?

जी हां, सीधेतौर पर तो नहीं, पर परोक्ष रूप से कभी व्हाट्सऐप के ग्रुप बनाकर, तो कभी गुंडों से पिटवाकर हमें धमकाया जाता है. सामाजिक रूप से बहिष्कार करके भी हमारे जज़्बे को तोड़ने की कोशिशें होती हैं, लेकिन इससे हमारे हौसले कम नहीं होनेवाले.

कहीं कोई बदलाव नज़र आ रहा है?

जी हां, मैं आपको कुछ रोज़ पहले की ही घटना बताता हूं. हमें एक शादी में बुलाया गया. वो परिवार काफ़ी रसूख़दार था. उस शादी में पंचायत को वो अधिकार नहीं दिए गए, जो पारंपरिक रूप से दिए जाते रहे हैं अब तक. इसके अलावा हमें वहां ख़ासतौर से बुलाया गया, सम्मान दिया गया. जो शगुन की बातें होती हैं, जिनसे लिंग भेद न हो व समाज को नुक़सान न हो, उसका हमने भी विरोध नहीं किया, लेकिन वहां उस परंपरा को पूरी तरह से तोड़ दिया गया, जिसके लिए कंजरभाट समाज जाना जाता है. हमें बेहद ख़ुशी हुई. हालांकि जब हम बाहर आए, तो हमारी गाड़ी का कांच टूटा हुआ था, जो पंचायत के लोगों ने ही ग़ुस्से में किया था. पर यही तो हमारी जीत थी.

पंचायत किस तरह से करती है वर्जिनिटी टेस्ट?

यह इतना अमानवीय है कि आपको यक़ीन नहीं होगा कि इस युग में भी ये सब होता है. शादी के व़क्त पूरी पंचायत मौजूद रहती है. उनका सत्कार-सम्मान होता है. शादी के बाद दूल्हा-दुल्हन को बोला जाता है कि अब आपको वर्जिनिटी टेस्ट के लिए भेजा जा रहा है. परिवार के साथ मैरिड कपल को लॉज में भेजा जाता है. वहां दुल्हन को महिला सदस्य पूरी तरह नग्न करती है, ताकि शरीर पर ऐसा कुछ भी न रहे, जिससे चोट वगैरह लगकर ख़ून निकले. स़फेद चादर बिछाई जाती है और आधे घंटे का समय कपल को दिया जाता है परफॉर्म करके रिज़ल्ट देने का. यदि दूल्हा परफॉर्म नहीं कर पा रहा हो, तो कपल को ब्लू फिल्म दिखाई जाती है या दूल्हे को शराब की आदत हो, तो शराब पिलाई जाती है या उन्हें कोई और परफॉर्म करके दिखाता है. उसके बाद वो स़फेद चादर लड़केवाले अपने कब्ज़े में ले लेते हैं.

अगले दिन सुबह पंचायत फाइनल सर्टिफिकेट देने के लिए बैठती है. कुल 100-200 लोग होते हैं. दूल्हे से पूछा जाता है- ‘तेरा माल कैसा था?’ दूल्हे को तीन बार बोलना पड़ता है- ‘मेरा माल अच्छा था या मेरा माल ख़राब था.’ तो आप सोचिए ये लिंग भेद का सबसे ख़तरनाक रूप कितना अमानवीय है. यदि लड़की इस टेस्ट में फेल हो जाती है, तो उस मारा-पीटा जाता है, कहा जाता है कि किस-किस के साथ तू क्या-क्या करके आई है… वगैरह.

प्रशासन का रवैया कैसा रहा अब तक?

मेरे ही गु्रप के एक लड़के ने एक शादी का वीडियो शूट करके पुलिस में कंप्लेन की थी. उस शादी में पंचायत बैठी थी और वहां पैसों का काफ़ी लेन-देन व कई ऐसी चीज़ें हो रही थीं, जो क़ानून के भी ख़िलाफ़ थीं. पर पुलिस ने एफआईआर तक नहीं लिखी. हमारे ही गु्रप की एक लड़की को भी समाज ने बायकॉट किया, हम पर भी अटैक्स होते हैं, पर समाज का दबाव इतना ज़्यादा है कि सीधेतौर पर कोई कार्रवाई इतनी जल्दी नहीं होती.

आज भी अधिकांश लड़के शादी के लिए ‘वर्जिन’ लड़की ही ढूंढ़ते हैं. क्या लगता है कि उनकी सोच बदलेगी?

यही तो चैलेंज है. दरअसल, हम जिस माहौल, समाज व परिवार में पलते-बढ़ते हैं, वो ही हमारी सोच को गढ़ती है. पारंपरिक तौर पर हम उसी का हिस्सा बन जाते हैं, तो ये एक माइंडसेट है, जिसे बदलना अपने आपमें चुनौती तो है, लेकिन हमें इस चुनौती को स्वीकारना होगा और जीत भी हासिल करनी होगी.

हाइमन रिकंस्ट्रक्शन सर्जरी का बढ़ता ट्रेंड

लड़के कितनी ही मॉडर्न सोच रखने का दावा क्यों न करते हों, पर उनका ध्यान भी लड़की की वर्जिनिटी पर ही रहता है. यही वजह है कि आजकल लड़कियां हाइमन रिकंस्ट्रक्शन सर्जरी करवाने में ही अपनी भलाई समझने लगी हैं. इसे हाइमनोप्लास्टी, हाइमन रिपेयर या

री-वर्जिनेशन कहा जाता है. यह सर्जरी महंगी होती है, लेकिन आजकल सरकारी अस्पतालों में भी यह होने लगी है. यह कॉस्मेटिक सर्जरी होती है और सरकारी अस्पताल के आंकड़े बताते हैं कि

दिन-ब-दिन इसमें बढ़ोत्तरी हो रही है. हर महीने कम से कम दो-तीन केसेस हाइमन रिपेयर के होते ही हैं. इन लड़कियों पर सामाजिक और पारिवारिक दबाव होता है. साथ ही यह डर भी कि कहीं उनका पार्टनर उन्हें छोड़ न दे. यहां तक कि कुछ मामलों में तो पैरेंट्स ही यह सर्जरी करवाने की सलाह देते हैं, जहां लड़कियों की दोबारा शादी करानी हो या इसी तरह के मामले हों, तो परिवार के दबाव में लड़की सर्जरी करवाती है.

भारत में भी सेक्सुअल एक्टिवनेस बढ़ गई है, लेकिन इसके बावजूद अधिकांश सर्वे इस बात को पुख़्ता करते हैं कि लड़के आज भी शादी के लिए वर्जिन लड़की ही ढूंढ़ते हैं.

– गीता शर्मा

 

Shaheed Diwas: शहीदों की शहादत को नमन (Shaeed Diwas Special)

Shaheed Diwas, शहीदों की शहादत को नमन, Shaeed Diwas Special

Shaheed Diwas, शहीदों की शहादत को नमन, Shaeed Diwas Special

23 मार्च 1931 का वो दिन आज एक बार फिर से ताज़ा हो गया. यही वो दिन था जब हंसते-हंसते देश के हीरो ने धरती मां के लिए ख़ुद को कुर्बान कर दिया था. उनकी शहादत का वो दिन हर हिंदुस्तानी को गर्व से भर देता है. मन में एक अजीब सा साहस भर जाता है. उन हीरोज़ के लिए मस्तक अपने आप झुक जाता है. भारतीय इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में 23 मार्च लिखा गया है. इस तारीख़ से हिंदुस्तान को अपना बीता हुआ कल और आज की झलक मिलती है.

  • क्रांतिकारी भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को आज ही के दिन 1931 में फांसी दे दी गई थी. भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को हुआ था.
  • भगत सिंह, शिवराम हरिनारायण राजगुरु और सुखदेव थापर में वतन परस्ती कूट-कूट कर भरी थी.
  • अंग्रेज़ों की नाक में दम करनेवाले इन हीरोज़ ने उऩकी चलती संसद में बम फेंककर हिंदुस्तान की आज़ादी की नींव को पुख़्ता किया था. इसके जुर्म में अंग्रेज़ों ने 3 हीरोज़ को सूली पर चढ़ाने का फैसला किया.
  • अंग्रेज़ों को लगा था कि ये छोटी उम्र के लड़के फांसी से डर जाएंगे और उनके क़दमों में सिर झुका देंगे, लेकिन वतन पर कुर्बान होनेवाले इन हीरोज़ ने वो कर दिखाया, जिसे करने के लिए बड़े-बड़े लोग कांप जाते हैं.
  • फांसी के तख्ते पर डरते हुए नहीं, बल्कि गाते हुए पहुंचे और फांसी के फंदे को चूमकर भारत माता की जय कहकर ख़ुद को माता की स्वतंत्रता के लिए कुर्बान कर दिया.
  • फांसी के फंदे को चूमकर उनके जीवन का तो अंत हो गया, लेकिन देश को एक नई सुबह मिल गई. एक ऐसी सुबह, जिसकी स्वतंत्र आबोहवा में आज हर हिंदुस्तानी खुलकर सांस ले रहा है.
  • शहीद दिवस के मौ़के पर शहीदों को मेरी सहेली (Meri Saheli) की ओर से शत-शत नमन!

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बर्थ एनिवर्सरी- बचपन से ही आसमान की सैर करना चाहती थीं कल्पना चावला (Birth Anniversary: Remembering Kalpana Chawla)

Birth Anniversary, Remembering Kalpana Chawla

Birth Anniversary, Remembering Kalpana Chawla

अंतरिक्ष में जानेवाली भारतीय मूल की पहली महिला बनने का गौरव हासिल करनेवाली कल्पना चावला का जीवन भले ही बहुत छोटा था, मगर इस छोटी सी ज़िंदगी में उन्होंने वो कर दिखाया जो लाखों लड़कियों के लिए प्रेरणास्रोत बन गया. कल्पना चावला की बर्थ एनिवर्सरी के मौ़के पर आइए, आपको बताते हैं उनसे जुड़ी कुछ ख़ास बातें.

* कल्पना चावला का जन्म 17 मार्च 1962 में करनाल में हुआ था.

* करनाल के टैगोर स्कूल से शुरुआती पढ़ाई के बाद कल्पना ने 1982 में चंडीगढ़ इंजीनियरिंग कॉलेज से एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की डिग्री और 1984 से टेक्सास यूनिवर्सिटी से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की डिग्री ली.

* कल्पना जेआरडी टाटा (जो पायलट होने के साथ ही नामी बिज़नेसमेन भी थे) से बहुत प्रभावित और प्रेरित थीं.

* 1988 में उन्होंने नासा के लिए काम करना शुरू किया और यही उनकी ज़िंदगी का टर्निंग पॉइंट था.

* अंतरिक्ष की सैर का उनका सपना पूरा हुआ 1997 में, जब कल्पना चावला ने स्पेस शटल कोलम्बिया से पहली अंतरिक्ष यात्रा की.

* अंतरिक्ष की पहली यात्रा के दौरान उन्होंने अंतरिक्ष मे 372 घंटे बिताए और पृथ्वी की 252 परिक्रमाएं पूरी की.

* कल्पना ने स्पेस के लिए दूसरी उड़ान 2003 में कोलंबिया शटल से भरी और ये उनकी ज़िंदगी की आख़िरी उड़ान साबित हुई. 01 फरवरी 2003 को  कोलम्बिया स्पेस शटल लैंडिंग से पहले ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया और कल्पना के साथ बाकी सभी 6 अंतरिक्ष यात्रियों की मृत्यु हो गई.

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Landmark Judgement: ‘इच्छा मृत्यु’ को सुप्रीम कोर्ट ने दी हरी झंडी (Landmark Judgement: Passive Euthanasia ‘Permissible’ in India)

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‘हर किसी को सम्मान से मरने का हक़ है’ सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक जजमेंट में यह फैसला दिया. ‘लिविंग विल’ (वसीयत) के ज़रिए किसी व्यक्ति को यह अधिकार दिया गया है कि वो अपनी वसीयत में लिख सके कि अगर वह किसी लाइलाज बीमारी का शिकार हो जाता है, तो उसे जबरन लाइफ सपोर्ट सिस्टम के ज़रिए ज़िंदा न रखा जाए. उसे सुकून और शांति से मरने का पूरा हक़ दिया जाए.

हमारे देश में अब तक पैसिव इथनेशिया या इच्छा मृत्यु की इज़ाज़त नहीं थी, पर 9 मार्च, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने लैंडमार्क जजमेंट में इसे क़ानूनी कर दिया, हालांकि उसके लिए कई गाइडलाइन्स भी जारी की गई हैं, ताकि कोई उसका ग़लत फ़ायदा न उठा सके.

कैसी बनेगी लिविंग विल?
कोई भी व्यक्ति एडवांस में यह विल बनवाकर रख सकता है, ताकि जब वह अपनी रज़ामंदी देने की स्थिति में न हो, तो तब इस लिविंग विल का इस्तेमाल किया जा सके. लिविंग विल बनने की प्रक्रिया कोर्ट की निगरानी में होगी. कोई व्यक्ति डिस्ट्रिक्ट जज की तरफ़ से नियुक्त जुडिशनल मजिस्ट्रेट के सामने लिविंग विल कर सकता है, जिसे दो गवाहों की मौजूदगी में बनाया जाएगा. लिविंग विल का पूरा रिकॉर्ड डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में रखा जाएगा.

लिविंग विल न होने की स्थिति में
अगर किसी व्यक्ति ने लिविंग विल नहीं बनाई है और वह लाइलाज बीमारी से जूझ रहा है, तो परिवार वाले या रिश्तेदार उसके लिए हाई कोर्ट जा सकते हैं. हाई कोर्ट में मेडिकल बोर्ड इस बात का ़फैसला लेगा कि व्यक्ति का लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाना है या नहीं.

मेडिकल ट्रीटमेंट को कह सकते हैं ‘ना’
यहां इस बात पर सुप्रीम कोर्ट ने सहमति जताई कि लाइलाज बीमारी से जूझ रहे किसी व्यक्ति का जबरन इलाज न किया जाए. ऐसे में वह मेडिकल ट्रीटमेंट को मना कर सकता है. उसके रिश्तेदार इसमें उसकी मदद कर सकते हैं. इससे पहले ऐसा करना ग़ैरक़ानूनी था.

क्या है पैसिव इथनेशिया?
पैसिव इथनेसिया का मतलब है लाइलाज बीमारी का इलाज करा रहे किसी व्यक्ति के लाइफ सपोर्ट सिस्टम को हटाना है. ऐसा करने से व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है. आपको बता दें कि एक्टिव इथेनेशिया यानी जहरीला इंजेक्शन आदि लगाकर व्यक्ति को इच्छा मृत्यु देना है, पर अभी भी हमारे देश में यह ग़ैरक़ानूनी है. जिन देशों में एक्टिव इथनेशिया क़ानूनी है, वहां यदि कोई व्यक्ति बीमारी के असहनीय दर्द को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा, डॉक्टर की मदद से उसे इच्छा मृत्यु दी जाती है.

बेंच के जजेज़ ने यह भी कहा कि जब तक इस पर कोई क़ानून नहीं बन जाता, यह ़फैसला और गाइडलाइन्स ही क़ानून की तरह काम करेंगी. आपको बता दें कि साल 2005 में कॉमन कॉज़ नामक एनजीओ ने जनहित याचिका दाखिल की थी, जिस पर यह ऐतिहासिक ़फैसला आया है. हालांकि इससे पहले अरुणा शामबाग केस में सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में पैसिव इथनेशिया की उन्हें इजाज़त दी थी, पर उस गाइडलाइन में भी कई कमियां थीं, जिसे बाद में सुधारा गया.

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होली पर विशेष: क्या है होलिकादहन की पूरी कहानी? (Holi Special: Why Do We Celebrate Holi?)

Holi Special: Why Do We Celebrate Holi

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होली (Holi) से संबंधित सबसे पॉप्युलर कथा है हिरण्यकश्यप की बहन होलिका व प्रह्लाद की. क्या है यह कथा और क्यों मनाते हैं हम होली, आइए, जानें-

प्राचीन काल में एक बहुत ही अत्याचारी राक्षसराज था- हिरण्यकश्यप, जिसने तपस्या करके ब्रह्मा से वरदान पा लिया कि संसार का कोई भी जीव, देवी-देवता, राक्षस या मनुष्य उसे नहीं मार सकते. न ही वह रात में मरेगा, न दिन में, न पृथ्वी पर, न आकाश में, न घर में, न बाहर और यहां तक कि कोई शस्त्र भी उसे नहीं मार पाएगा.

ऐसा वरदान पाकर वह और भी ज़्यादा अत्याचारी व निरंकुश हो गया था. लेकिन इसी हिरण्यकश्यप के यहां प्रह्लाद जैसा पवित्र आत्मा व ईश्‍वर में अटूट विश्‍वास करनेवाला पुत्र पैदा हुआ. प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था.

हिरण्यकश्यप को यह बिल्कुल पसंद नहीं था कि उसका पुत्र किसी और को पूजे. उसने प्रह्लाद को आदेश दिया कि वह उसके अतिरिक्त किसी अन्य की स्तुति न करे. प्रह्लाद के न मानने पर हिरण्यकश्यप उसे जान से मारने पर उतारू हो गया और उसने प्रह्लाद को मारने के कई प्रयास किए, लेकिन वो हर बार प्रभु-कृपा से बचता रहा.

ऐसे में हिरण्यकश्यप की बहन होलिका ने एक सुझाव दिया, होलिका को अग्नि से बचने का वरदान था. यानी उसे एक ऐसा आवरण मिला था, जिससे आग उसे जला नहीं सकती थी. हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका की सहायता से प्रह्लाद को आग में जलाकर मारने की योजना बनाई.

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होलिका बालक प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई. लेकिन भगवान की कृपा से होलिका का वह आवरण भक्त प्रह्लाद को मिल गया और उसको कुछ नहीं हुआ. वहीं होलिका जलकर भस्म हो गई.

इसके बाद हिरण्यकश्यप को मारने के लिए भगवान विष्णु नरसिंह अवतार में खंभे से निकल कर गोधूली बेला यानी सुबह व शाम के समय का संधिकाल, में दरवाज़े की चौखट पर बैठकर हिरण्यकश्यप को अपने नुकीले नाख़ूनों से उसका पेट फाड़कर उसे मार डालते हैं.
नरसिंह न मनुष्य थे, न जानवर, न वो सुबह का समय था, न शाम का, हिरण्यकश्यप को मारते समय न वो अंदर थे, न बाहर और उनके नाख़ून न अस्त्र थे, न शस्त्र.

उसी समय से होली का त्योहार मनाया जाने लगा यानी एक तरह से यह अच्छाई की बुराई पर जीत का संदेश है. व्यक्ति चाहे कितना ही बलशाली क्यों न हो, यदि वो अत्याचार की सीमाएं पार कर जाता है, तो कितने भी वरदान हों, उसे बचा नहीं सकते. बुराई का अंत निश्‍चित है. इसी तरह हमें भी बुरी शक्तियां ही नहीं, अपने मन में पनप रही सारी नकारात्मक भावनाओं को भी होली की अग्नि में दहन कर देना चाहिए और नेकी के मार्ग पर आगे चलना चाहिए.

क्यों एनीमिक होती हैं भारतीय महिलाएं? (Anemia: A Common Problem Among Indian Women)

Anemia, Common Problem, Indian Women

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यूं तो हमारे देश में आर्थिक से लेकर सामाजिक सुधार हो रहे हैं, लेकिन ऐसे में जब इस तरह की ख़बरें सामने आती हैं, तो रुककर सोचने की ज़रूरत पड़ जाती है. यूं तो हमारे देश में आर्थिक से लेकर सामाजिक सुधार हो रहे हैं, लेकिन ऐसे में जब इस तरह की ख़बरें सामने आती हैं, तो रुककर सोचने की ज़रूरत पड़ जाती है. हाल ही में एक रिपोर्ट सामने आई है कि भारत में सबसे अधिक एनीमिक महिलाएं हैं. द ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट के इस सर्वे के मुताबिक़ 15 से लेकर 49 साल तक की 51% भारतीय महिलाएं एनीमिक हैं. वे आयरन डेफिशियंसी झेल रही हैं, वे पोषक आहार नहीं ले रहीं… कुल मिलाकर वे स्वस्थ नहीं हैं. यह 2017 की रिपोर्ट है, जबकि वर्ष 2016 तक 48% महिलाएं एनीमिक थीं यानी यह आंकड़ा अब बढ़ गया है. सबसे चिंताजनक बात यह है कि 15-49 साल की उम्र यानी युवावस्था, रिप्रोडक्शन की एज में इस तरह का कुपोषण, जिसका सीधा असर आनेवाली पीढ़ी पर पड़ता नज़र आएगा. यदि मां स्वस्थ नहीं, तो बच्चा भी स्वस्थ नहीं होगा.

क्या वजह है?

एक्सपर्ट्स की मानें, तो मात्र कुपोषण ही सबसे बड़ी या एकमात्र वजह नहीं है, बल्कि स्वच्छता की कमी भी एक बड़ा कारण है, क्योंकि पूअर हाइजीन पोषण को शरीर में एब्ज़ॉर्ब नहीं होने देती. इसके अलावा जागरूकता की कमी, अशिक्षा और परिवार के सामने ख़ुद को कम महत्व देना यानी पहले परिवार की ख़ुशी, उनका खाना-पीना, ख़ुद के स्वास्थ्य को महत्व नहीं देना भी प्रमुख कारण हैं.

सामाजिक व पारिवारिक ढांचा

  •  हमारा समाज आज भी इसी सोच को महत्व देता है कि महिलाओं का परम धर्म है पति, बच्चे व परिवार का ख़्याल रखना.
  •  इस पूरी सोच में, इस पूरे ढांचे में कहीं भी इस बात या इस ख़्याल तक की जगह नहीं रहती कि महिलाओं को अपने बारे में भी सोचना है
  •  उनका स्वास्थ्य भी ज़रूरी है, यह उन्हें सिखाया ही नहीं जाता.
  • यदि वे अपने बारे में सोचें भी तो इसे स्वार्थ से जोड़ दिया जाता है. पति व बच्चों से पहले खाना खा लेनेवाली महिलाओं को ग़ैरज़िम्मेदार व स्वार्थी करार दिया जाता है.
  • बचपन से ही उन्हें यह सीख दी जाती है कि तुम्हारा फ़र्ज़ है परिवार की देख-रेख करना. इस सीख में अपनी देख-रेख या अपना ख़्याल रखने को कहीं भी तवज्जो नहीं दी जाती.
  • यही वजह है कि उनकी अपनी सोच भी इसी तरह की हो जाती है. अगर वे ग़लती से भी अपने बारे में सोच लें, तो उन्हें अपराधबोध होने लगता है.
  • शादी के बाद पति को भी वे बच्चे की तरह ही पालती हैं. उसकी छोटी-छोटी ज़रूरतों का ख़्याल रखने से लेकर हर बात मानना उसका पत्नी धर्म बन जाता है. लेकिन इस बीच वो जाने-अनजाने ख़ुद के स्वास्थ्य को सबसे अधिक नज़रअंदाज़ करती है.
  • वो पुरुष है, तो उसके स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी पत्नी की होती है. उसे पोषक आहार, मनपसंद खाना, उसकी नींद पूरी होना… इस तरह की बातों का ख़्याल रखना ही पत्नी का पहला धर्म है.
  • ऐसे में यदि पत्नी बीमार भी हो जाए, तो उसे इस बात की फ़िक्र नहीं रहती कि वो अस्वस्थ है, बल्कि उसे यह लगता है कि पूरा परिवार उसकी बीमारी के कारण परेशान हो रहा है. न कोई ढंग से खा-पी रहा है, न कोई घर का काम ठीक से हो रहा है.
  • पत्नी यदि अपने विषय में कुछ कहे भी और अगर वो हाउसवाइफ है तब तो उसे अक्सर यह सुनने को मिलता है कि आख़िर सारा दिन घर में पड़ी रहती हो, तुम्हारे पास काम ही क्या है?
  • कुल मिलाकर स्त्री के स्वास्थ्य के महत्व को हमारे यहां सबसे कम महत्व दिया जाता है या फिर कहें कि महत्व दिया ही नहीं जाता.

जागरूकता की कमी और अशिक्षा

  • जागरूकता की कमी की सबसे बड़ी वजह यही है कि बचपन से ही उनका पालन-पोषण इसी तरह से किया जाता है कि महिलाएं ख़ुद भी अपने स्वास्थ्य को महत्व नहीं देतीं.
  • उन्हें यही लगता है कि परिवार व पति की सेवा ही सबसे ज़रूरी है और हां, यदि वे स्वयं गर्भवती हों, तो उन्हें अपने स्वास्थ्य का ख़्याल रखना है, क्योंकि यह आनेवाले बच्चे की सेहत से जुड़ा है.
  • लेकिन यदि वे पहले से ही अस्वस्थ हैं, तो ज़ाहिर है मात्र गर्भावस्था के दौरान अपना ख़्याल रखने से भी सब कुछ ठीक नहीं होगा.
  • गर्भावस्था के दौरान भी आयरन टैबलेट्स या बैलेंस्ड डायट वो नहीं लेतीं.
  • अधिकांश महिलाओं को पोषक आहार के संबंध में जानकारी ही नहीं है और न ही वे इसे महत्व देती हैं.
  • हमेशा से पति व बच्चों की लंबी उम्र व सलामती के लिए उन्हें व्रत-उपवास के बहाने भूखा रहने की सीख दी जाती है.
  • जो महिलाएं शाकाहारी हैं, उन्हें किस तरह से अपने डायट को बैलेंस करना है, इसकी जानकारी भी नहीं होती.
  • बहुत ज़रूरी है कि महिलाओं को जागरूक किया जाए, अपने प्रति संवेदनशील बनाया जाए.
  • इसी तरह से अशिक्षा भी बहुत बड़ी वजह है, क्योंकि कम पढ़ी-लिखी महिलाएं तो जागरूकता से लेकर हाइजीन तक के महत्व को नहीं समझ पातीं.
  • साफ़-सफ़ाई की कमी किस तरह से लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, यह समझना बेहद ज़रूरी है. लोग कई गंभीर रोगों के शिकार हो सकते हैं, जिससे उनके शरीर में पोषक तत्व ग्रहण व शोषित करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है.
  • भोजन को किस तरह से संतुलित व पोषक बनाया जाए, इसकी जानकारी भी अधिकांश लोगों को नहीं होती.

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ग़रीबी भी है एक बड़ी वजह

  • आयरन की कमी के चलते होनेवाले एनीमिया की सबसे बड़ी वजह ग़रीबी व कुपोषण है.
  • ग़रीबी के चलते लोग ठीक से खाने का जुगाड़ ही नहीं कर पाते, तो पोषक आहार दूर की बात है.
  • वहीं उन्हें इन तमाम चीज़ों की जानकारी व महत्व के विषय में भी अंदाज़ा नहीं होता.क्या किया जा सकता है?
  • सरकार की ओर से प्रयास ज़रूर किए जा रहे हैं, लेकिन वो नाकाफ़ी हैं.
  • द ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट में इस ओर भी इशारा किया गया है कि बेहतर होगा भारत ग़रीब व आर्थिक रूप से कमज़ोर यानी लो इनकम देशों से सीखे, क्योंकि वे हमसे बेहतर तरी़के से इस समस्या को सुलझा पाए हैं.
  • ब्राज़ील ने ज़ीरो हंगर स्ट्रैटिजी अपनाई है, जिसमें भोजन का प्रबंधन, छोटे किसानों को मज़बूती प्रदान करना और आय के साधनों को उत्पन्न करने जैसे प्रावधानों पर ज़ोर दिया गया है.
  • ब्राज़ील के अलावा पेरू, घाना, वियतनाम जैसे देशों ने भी कुपोषण को तेज़ी से कम करने में सफलता पाई है.

नेशनल न्यूट्रिशनल एनीमिया प्रोफिलैक्सिस प्रोग्राम (एनएनएपीपी) का रोल?

  • जहां तक भारत की बात है, तो कई ग़रीब देश भी एनीमिया व कुपोषण की समस्या से हमसे बेहतर तरी़के से लड़ने में कारगर सिद्ध हुए हैं, तो हमें उनसे सीखना होगा.
  • भारत में एनीमिया से लड़ने के लिए नेशनल न्यूट्रिशनल एनीमिया प्रोफिलैक्सिस प्रोग्राम (एनएनएपीपी) 1970 से चल रहा है. कुछ वर्ष पहले इस प्रोग्राम के तहत किशोर बच्चों व गर्भवती महिलाओं में आयरन और फोलेट टैबलेट्स बांटने का साप्ताहिक कार्यक्रम शुरू हुआ, लेकिन हेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि मात्र दवाएं उन्हें सौंप देना ही कोई विकल्प नहीं है.
  • यह देखना भी ज़रूरी है कि क्या वो ये दवाएं ले रही हैं? एक अन्य सर्वे से पता चला कि बहुत कम महिलाएं ये टैबलेट्स नियमित रूप से लेती हैं.
  • इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि आयरन टैबलेट्स के काफ़ी साइड इफेक्ट्स होते हैं, जैसे- उल्टियां व दस्त और ये गर्भावस्था को और मुश्किल बना देते हैं. यही वजह है कि अधिकतर महिलाएं इन्हें लेना छोड़ देती हैं.
  • जबकि होना यह चाहिए कि उन्हें इन साइड इफेक्ट्स से जूझने का बेहतर तरीक़ा या विकल्प बताना चाहिए.

भारत में गर्भवती स्त्रियां गंभीर रूप से कुपोषण की शिकार हैं- सर्वे

  • न स़िर्फ गर्भावस्था में, बल्कि भारतीय स्त्रियां हर वर्ग में कम स्वस्थ पाई गईं. उनका व उनके बच्चों का स्वास्थ्य व वज़न अन्य ग़रीब देशों की स्त्रियों व बच्चों के मुक़ाबले कम पाया गया. भारत में किशोरावस्था में लड़कियों के एनीमिक होने के पीछे प्रमुख वजह यहां की यह संस्कृति बताई गई, जिसमें लिंग के आधार पर हर स्तर पर भेदभाव किया जाता है.
  • बेटे को पोषक आहार देना और बेटी के स्वास्थ्य को नज़रअंदाज़ करना हमारे परिवारों में देखा जाता है. स़िर्फ ग़रीब तबके में ही नहीं, पढ़े-लिखे व खाते-पीते घरों में भी इस तरह का लिंग भेद काफ़ी पाया जाता है.
  • पोषण की कमी के कारण होनेवाला एनीमिया यानी आयरन और फॉलिक एसिड की कमी से जो एनीमिया होता है, वह परोक्ष या अपरोक्ष रूप से गर्भावस्था के दौरान लगभग 20% मृत्यु के लिए ज़िम्मेदार होता है.
  • दवाओं के साथ-साथ पोषक आहार किस तरह से इस समस्या को कम कर सकता है, कौन-कौन से आहार के ज़रिए पोषण पाया जा सकता है, इस तरह की जानकारी भी महिलाओं व उनके परिजनों को भी देनी आवश्यक है.

 – गीता शर्मा

 

बर्थडे स्पेशल: कोमल मन और अटल इरादे… जानें अटलजी की ये दिलचस्प बातें… (Birthday Special: Happy Birthday Atal Bihari Vajpayee)

Happy Birthday, Atal Bihari Vajpayee

 Happy Birthday, Atal Bihari Vajpayee

 

बर्थडे स्पेशल: कोमल मन और अटल इरादे… जानें अटलजी  की ये दिलचस्प बातें… (Birthday Special: Happy Birthday Atal Bihari Vajpayee)
मन से कवि और कर्म से राजनेता, जी हां, यही पहचान है अटल बिहारी वाजपेयी की. अटलजी उन चंद राजनेताओं में से एक हैं, जिन्हें अपनी पार्टी के साथ-साथ विपक्षी दल भी उतना ही प्यार करते रहे हैं. उनका क़द इतना बड़ा है कि हर कोई उन्हें अदब और सम्मान की नज़र से देखता है.
– अटलजी का जन्म 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर में हुआ था.
– उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक कवि और स्कूल मास्टर के तौर पर की थी.
– आगे चलकर वो पत्रकारिता से जुड़े और फिर राजनीति में इस सितारे का आगमन हुआ.
– 1939 में वो स्वयंसेवक की तरह आरएसएस में शामिल हुए.
– वो भारत के प्रधानमंत्री भी बने और अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने काफ़ी सराहनीय काम किए.
– अटलजी और उनके पिताजी ने एक साथ लॉ की पढ़ाई की, यहां तक कि उन्होंने होस्टल का रूम भी शेयर किया.
– 1957 में उन्होंने अपना पहला लोकसभा इलेक्शन यूपी की दो सीटों से लड़ा, जहां मथुरा में उन्हें हार मिली और बलरामपुर से जीत.
– उनकी वाकशक्ति यानी बोलने की कला व तर्कशक्ति से जवाहरलाल नेहरू भी इतने प्रभावित थे कि उन्होंने बहुत पहले ही यह भविष्यवाणी कर दी थी कि एक दिन अटलजी देश के प्रधानमंत्री बनेंगे.
– 1977 में वो मोरारजी देसाई मिनिस्ट्री में एक्सटर्नल अफेयर्स मिनिस्टर बने थे और जब वो ऑफिस पहुंचे, तो देखा उनके कैबिन से पंडित नेहरू की तस्वीर गायब थी. इस पर उन्होंने कहा कि उनकी तस्वीर उन्हें वापस चाहिए.
– हिंदी भाषा को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान व पहचान दिलाने का श्रेय अटलजी को ही जाता है, UN में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया और वो यूनाइटेड नेशन में हिंदी में भाषण देनेवाले पहले शख़्स बने.
– वो तीन बार भारत के प्रधामंत्री बने- पहली बार 16 मई 1996 को 13 दिनों के लिए, दूसरी बार 19 मार्च 1998 को 13 महीनों के लिए और फिर तीसरी बार 13 अक्टूबर 1999 को पूरे 5 साल के लिए.
– मेरी सहेली की ओर से अटलजी को जन्मदिन की शुभकामनाएं.
Happy Birthday, Atal Bihari Vajpayee
– अटलजी की कविता, जो अक्सर वो गुनगुनाते हैं…
1 गीत नहीं गाता हूँ
बेनकाब चेहरे हैं,
दाग बड़े गहरे हैं,
टूटता तिलस्म, आज सच से भय खाता हूँ ।
गीत नही गाता हूँ ।
लगी कुछ ऐसी नज़र,
बिखरा शीशे सा शहर,
अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूँ ।
गीत नहीं गाता हूँ ।
पीठ मे छुरी सा चाँद,
राहु गया रेखा फाँद,
मुक्ति के क्षणों में बार-बार बँध जाता हूँ ।
गीत नहीं गाता हूँ

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2 मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना,
ग़ैरों को गले न लगा सकूं,
इतनी रुखाई कभी मत देना.

तैमूर चल पड़े हैं पटौदी अपना फर्स्ट बर्थडे सेलिब्रेट करने… (Papa Saif & Mommy Kareena Leave With Taimur For First Birthday At Pataudi Palace)

Taimur, First Birthday, Pataudi Palace

Taimur, First Birthday, Pataudi Palace
छोटे नवाब का बर्थडे बस आने ही वाला है, ऐसे में सभी एक्साइटेड हैं, क्योंकि छोटे नवाब हैं सबके फेवरेट. यही वजह है कि मीडिया क्यूट तैमूर का एक भी पिक्चर मिस नहीं करना चाहता, तो यहां हम लाए हैं तैमूर की लेटेस्ट पिक, जहां वो मॉमी करीना और पापा सैफ के साथ एयरपार्ट पर क्लिक हुए. ये सभी पटौदी जा रहे हैं, क्योंकि तैमूर का फर्स्ट बर्थडे होगा बेहद ख़ास…

Taimur, First Birthday, Pataudi Palace

Taimur, First Birthday, Pataudi Palace

Taimur, First Birthday, Pataudi Palace

Taimur, First Birthday, Pataudi Palace

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