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इन क़ानूनी शब्दों को कितना समझते हैं आप? (Legal Terms Everyone Must Know About Indian Law)

क्या आप भी बाक़ी लोगों की तरह यही समझते हैं कि उम्रकैद 14 सालों के लिए होती है? अगर हां, तो आपको बता दें कि यह आपकी ग़लतफ़हमी है. ठीक इसी तरह ऐसे कई क़ानूनी शब्द हैं, जिनके बारे में लोगों को सही जानकारी नहीं है. यहां हम कुछ ऐसे ही ज़रूरी क़ानूनी शब्दों का सही मतलब बताने और कुछ क़ानूनी ग़लतफ़हमियां दूर करने की कोशिश करेंगे, ताकि क़ानूनी जागरूकता में आप पिछड़ न जाएं.

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उम्रकैद/आजीवन कारावास

–     बहुत-से लोगों को लगता है कि उम्रकैद और आजीवन कारावास दो अलग चीज़ें हैं, जबकि यह स़िर्फ भाषा का फ़र्क़ है, जहां उम्रकैद उर्दू का शब्द है, वहीं आजीवन कारावास हिंदी का शब्द है. दोनों का अर्थ भी एक ही है- बची हुई बाक़ी की पूरी ज़िंदगी जेल में बिताने की सज़ा.

–     ज़्यादातर लोगों को यही लगता है कि उम्रकैद 14 साल की सज़ा होती है, जबकि ऐसा है नहीं. उम्रकैद यानी आजीवन कारावास अपराधी के बचे हुए शेष जीवन के लिए होता है.

–     अब सवाल यह उठता है कि यह 14 साल की गुगली कहां से आई? दरअसल, क़ानून में यह प्रावधान है कि सरकार अगर चाहे, तो उम्रकैद के किसी कैदी की सज़ा को माफ़ करके उसे कम कर सकती है, पर इसके लिए भी शर्त यह है कि सरकार को ऐसा 14 साल की अवधि पूरा होने से पहले करना होगा यानी सज़ा के 14 साल पूरे होने से पहले अगर सरकार चाहे, तो आजीवन कारावास की सज़ा को माफ़ या कम कर सकती है.

–     आपको बता दें कि आईपीसी और सीआरपीसी में ऐसे प्रावधान हैं, जो राज्य सरकार या केंद्र सरकार को यह अधिकार देते हैं कि वो चाहें, तो अच्छे व्यवहार के लिए कैदियों की सज़ा माफ़ या कम कर सकती है.

–     यहां आपको एक और ज़रूरी बात बता दें कि अगर किसी अपराध के लिए मृत्युदंड और आजीवन कारावास दोनों का प्रावधान हो, पर जज ने कैदी को मृत्युदंड न देकर आजीवन कारावास की सज़ा दी हो, तो उस व्यक्ति को 14 साल पूरे होने के बाद ही माफ़ किया जा सकता है.

–     तो अब आप समझ गए किस तरह इस बात को घुमाया गया है. सज़ा माफ़ करने से पहले सरकार अपराधी के व्यवहार और आचरण का पूरा रिकॉर्ड देखती है.

–     यहां पर यह भी ध्यान दीजिएगा कि सरकार पेशेवर अपराधियों, एक से ज़्यादा हत्या के दोषी और महिलाओं के ख़िलाफ़ किए गए अपराध की सज़ा काट रहे अपराधियों को माफ़ी नहीं देती.

24 घंटे यानी दो नहीं, केवल एक दिन

बहुत-से लोगों को यह भ्रम है कि जेल में 12 घंटे को एक दिन और 24 घंटे को दो दिन गिना जाता है, जबकि ऐसा है नहीं. जेल में भी 24 घंटे का मतलब एक दिन और सात दिन का मतलब एक हफ़्ता होता है. जेल में दिन और रात को अलग-अलग जोड़ा नहीं जाता.

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ज़मानत और पैरोल

ज़मानत उस व्यक्ति को मिलती है, जिसका केस कोर्ट में चल रहा हो और जिसे सज़ा न सुनाई गई हो, जबकि पैरोल उस व्यक्ति को मिलती है, जिसे सज़ा सुनाई जा चुकी हो और वो जेल में अपनी सज़ा भुगत रहा हो.

–     पैरोल दो तरह की होती है- एक कस्टडी पैरोल और दूसरी रेग्युलर पैरोल.

–     आपने अक्षय कुमार की फिल्म द स्टेट वर्सेस जॉली एलएलबी 2 में देखा होगा कि किस तरह एक कैदी अपनी शादी के लिए पैरोल पर बाहर आता है और इस दौरान पुलिस उसके साथ रहती है, ताकि वो फरार न हो जाए. आपको बता दें कि अगर किसी कैदी के किसी क़रीबी रिश्तेदार की मौत हो जाए, किसी क़रीबी की शादी हो, पत्नी की डिलीवरी हो, तो उसे अधिकतम छह घंटे की कस्टडी पैरोल मिल सकती है.

–     बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त जब जेल में थे, तब उनकी पैरोल की ख़बरें भी मीडिया की सुर्ख़ियों में रहती थीं. आपको बता दें कि संजय दत्त रेग्युलर पैरोल के ज़रिए जेल से बाहर आते थे, जो साल में एक महीने के लिए दी जा सकती है.

–     इसके प्रावधान कमोबेश कस्टडी पैरोलवाले ही हैं, जैसे- किसी रिश्तेदार की शादी या मृत्यु, पत्नी की डिलीवरी, बीमार पत्नी की देखभाल, घर की मरम्मत आदि के लिए आप रेग्युलर पैरोल के लिए आवेदन कर सकते हैं.

–     इसके लिए ज़रूरी है कि कैदी ने जेल में एक साल की सज़ा पूरी की हो, पहले कभी पैरोल पर रिहा होने पर कोई अपराध न किया हो और जेल में उसका आचरण संतोषजनक हो, तो उसे पूरे साल में एक महीने की पैरोल मिल सकती है.

फर्स्ट इंफॉर्मेशन रिपोर्ट (एफआईआर)

हम सभी जानते हैं कि अगर हमारे साथ किसी तरह का अपराध हो, तो हमें तुरंत पुलिस में उसकी एफआईआर दर्ज करानी चाहिए. लेकिन क्या आप ये जानते हैं कि पुलिस केवल कॉग्निज़ेबल यानी संज्ञेय अपराधों के लिए ही एफआईआर दर्ज कर सकती है. इसके लिए आपको कॉग्निज़ेबल और नॉन कॉग्निज़ेबल अपराधों को समझना होगा.

संज्ञेय अपराध (कॉग्निज़ेबल ऑफेंस)

ऐसे अपराध जिनके लिए आरोपी को गिरफ़्तार करने के लिए पुलिस को वॉरंट की ज़रूरत नहीं पड़ती. ये अपराध हत्या, बलात्कार, दहेज के लिए हत्या, अपहरण, चोरी आदि हैं.

ग़ैर-संज्ञेय अपराध (नॉन-कॉग्निज़ेबल ऑफेंस)

ये ऐसे अपराध हैं, जिनके लिए पुलिस को बिना वॉरंट गिरफ़्तार करने का अधिकार नहीं है, इसलिए पुलिस स़िर्फ अपने स्टेशन डायरी में इसे नोट करके रख लेती है और मजिस्ट्रेट से आदेश मिलने के बाद ही कोई कार्रवाई करती है. ये अपराध कम गंभीर होते हैं, जैसे- जालसाज़ी, धोखाधड़ी, मानहानि, हमला करना आदि.

–     अगर आपकी कोई चीज़ खो जाती है, तो पुलिस उसके लिए एनसीआर रिपोर्ट लिखती है यानी पुलिस ने स़िर्फ डॉक्यूमेंट बनाया कि आपकी कोई चीज़ खो गई है, पर उसकी जांच करने की बाध्यता उन्हें नहीं है.

–     अब आप समझ गए कि एफआईआर किन मामलों में दर्ज करानी है और किन मामलों के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना है. यहां आपको एक बात और बता दें कि अगर कॉग्निज़ेबल ऑफेंस के मामले में भी पुलिस ऑफिसर एफआईआर दर्ज नहीं करता, तो आप सुप्रीटेंडेंट या फिर मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के पास जाकर उसके लिए आदेश ला सकते हैं.

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ज़मानती और ग़ैर-ज़मानती अपराध (बेलेबल-नॉनबेलेबल ऑफेंस)

कुछ ऐसे अपराध होते हैं, जिनमें ज़मानत मिल जाती है, पर कुछ अपराध इतनेे गंभीर होते हैं, जिनमें ज़मानत नहीं मिलती. आम जनता को बलात्कार, हत्या और देशद्रोह ही ग़ैर-ज़मानती लगते हैं, जबकि इसकी सूची काफ़ी लंबी है.

ज़मानती अपराध

हमारे देश में कई ऐसे छोटे-मोटे अपराध हैं, जिनके लिए आपको आसानी से ज़मानत मिल जाती है. ये अपराध बहुत गंभीर नहीं होते, इसलिए क़ानून यहां ज़मानत की छूट देता है. वैसे तो लिस्ट काफ़ी लंबी है, पर यहां हम कुछ के बारे में बता रहे हैं- किसी ग़ैरक़ानूनी जनसमूह का सदस्य होना, उपद्रव करना, सरकारी अधिकारी के आदेश की अवहेलना करना, धोखाधड़ी के लिए सरकारी कर्मचारी की यूनीफॉर्म का ग़लत इस्तेमाल, सरकारी काम में अड़चन डालना, कोर्ट की कार्यवाही को बाधित करना, मिलावट करना, धार्मिक पूजा में शामिल जनसमूह में अशांति फैलाना आदि.

गैर-ज़मानती अपराध

ये बहुत ही गंभीर अपराध होते हैं, इसलिए क़ानून ऐसे मामलों को ग़ैर-ज़मानती रखता है. इसके कुछ उदाहरण हैं- हत्या, दहेज के लिए हत्या, हत्या का प्रयास, जानबूझकर किसी को गंभीर चोट पहुंचाना, अपहरण, बलात्कार, देशद्रोह, राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के ज़रिए राष्ट्र के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ना आदि.

भगवतगीता से शपथ लेना

अगर आप किसी आपराधिक मामले में गवाही देने कोर्ट जानेवाले हैं और भगवतगीता पर हाथ रखकर कसम खाने को लेकर काफ़ी उत्साहित हैं, तो आपको बता दें कि असली कोर्ट में ऐसा कुछ नहीं होता. ये स़िर्फ बॉलीवुड फिल्मों की करामात है. कोर्ट में द इंडियन ओथ्स एक्ट, 1873 का पालन किया जाता है. वैसे ये फिल्मी प्रथा कोरी काल्पनिक भी नहीं है, क्योंकि मुग़ल काल में इस प्रथा का इस्तेमाल किया जाता था, जहां हिंदुओं को भगवतगीता और मुसलमानों को कुरान पर हाथ रखकर सच्चाई की शपथ लेनी होती थी. यहां तक कि बॉम्बे हाई कोर्ट में भी साल 1957 तक यह प्रथा बदस्तूर जारी थी.

– अनीता सिंह

क्या इंफर्टिलिटी बन सकती है तलाक़ का कारण? (Is Infertility A Ground For Divorce?)

तलाक़ (Divorce) एक संवेदनशील मुद्दा है. क़ानून में तलाक़ लेने के लिए कई कारणों को विस्तारपूर्वक दिया गया है, पर आज भी बहुत से लोगों में इंफर्टिलिटी (Infertility) और इंपोटेंसी (Impotence) को लेकर ग़लतफ़हमी है. वो इन्हें एक ही प्रॉब्लम (Problem) समझने की भूल करते हैं और बेवजह रिश्तों को तोड़ने की कोशिश की जाती है. पर ये दोनों ही दो अलग चीज़ें हैं. आइए देखें, क्या है इंफर्टिलिटी और इंपोटेंसी में फ़र्क़ और इस आधार पर तलाक़ के बारे में क्या कहता है हमारे देश का क़ानून?

Infertility Problems

रिया और रजत की शादी को 10 साल हो गए थे. रिया की ओवरीज़ में सिस्ट था, जिसके कारण वो मां नहीं बन सकती थी. रजत बच्चा गोद नहीं लेना चाहता था, जिसके कारण हर रोज़ उनके घर में प्रॉब्लम्स होने लगीं. इनसे छुटकारा पाने के लिए दोनों ने तलाक़ ले लिया. तलाक़ के बाद रजत ने दूसरी शादी की और अब उसके 2 बच्चे हैं. रजत के लिए ये सब इतना आसान नहीं होता, अगर रिया ने उसे तलाक़ नहीं दिया होता. रिया ने रोज़ की परेशानियों से छुटकारा पाने के लिए ऐसा किया, लेकिन अगर वो चाहती, तो रजत को तलाक़ न देती और कोर्ट भी उसे तलाक़ नहीं दिला पाता, क्योंकि हमारे देश में इंफर्टिलिटी को तलाक़ का आधार बनाया ही नहीं जा सकता.

विविध धर्मों के विविध क़ानून

हमारा देश विविध धर्मों और संस्कृतियों का देश है. हर धर्म में तलाक़ के लिए अपने क़ानून हैं. जहां हिंदुओं, जैन, बौद्ध और सिख के लिए द हिंदू मैरिज एक्ट 1955 है, वहीं मुसलमानों के लिए द डिज़ोल्यूशन ऑफ मुस्लिम मैरिज एक्ट 1939, ईसाइयों के लिए द इंडियन डिवोर्स एक्ट 1869 और पारसियों के लिए द पारसी मैरिज और डिवोर्स एक्ट है, तो सिविल मैरिजेस के लिए स्पेशल मैरिज एक्ट है. सभी के अपने-अपने नियम हैं, पर इंफर्टिलिटी और इंपोटेंसी (नपुंसकता) पर सभी के अलग-अलग क़ानून हैं.

क्या हैं तलाक़ के आधार?

यहां हम द हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 के बारे में जानने की कोशिश करेंगे. इस एक्ट के सेक्शन 13 में तलाक़ के कारणों के बारे में विस्तारपूर्वक दिया गया है, जो इस प्रकार हैं-

–     व्यभिचार, धर्मांतरण, मानसिक विकार, कुष्ठ रोग, नपुंसकता, सांसारिक कर्त्तव्यों को त्याग देना, 7 सालों से लापता, जुडीशियल सेपरेशन (कोर्ट द्वारा अलग रहने की इजाज़त), किसी भी तरह के शारीरिक संबंध नहीं और क्रूरता या निष्ठुरता. क़ानून में कहीं भी इंफर्टिलिटी को तलाक़ का कारण नहीं बताया गया है.

क्या है लोगों की सोच?

आज भी ज़्यादातर लोगों को लगता है कि इंफर्टिलिटी और इंपोटेंसी एक ही चीज़ है. नपुंसकता को बांझपन से जोड़ देते हैं, जबकि ऐसा है नहीं. अगर किसी व्यक्ति के बच्चे नहीं हो रहे, तो लोग उसे नपुंसक यानी इंपोटेंट समझने लगते हैं, जबकि बच्चे न होने का कारण इंफर्टिलिटी भी हो सकती है.

इंफर्टिलिटी और इंपोटेंसी में अंतर?

इंफर्टिलिटी यानी बांझपन, जबकि इंपोटेंसी का अर्थ नपुंसकता है. यहां आपको बता दें कि पुरुषों में भी बांझपन हो सकता है और महिलाएं भी इंपोटेंट हो सकती हैं. इंपोटेंट व्यक्ति अपने पार्टनर को सेक्सुअल संतुष्टि नहीं दे पाता, जबकि बांझपन में ऐसा नहीं है. बांझ व्यक्ति की सेक्सुअल लाइफ संतुष्टिपूर्ण हो सकती है, उन्हें समस्या स़िर्फ बच्चे पैदा करने में हो सकती है.

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Infertility Problems
इंफर्टिलिटी नहीं बन सकती तलाक़ का कारण

कोर्ट के सामने ऐसे कई मामले आते हैं, जहां कपल्स बच्चा पैदा न होने को क्रुएल्टी बताकर तलाक़ की मांग करते हैं, जबकि हमारे देश का क़ानून कहता है कि अगर पति-पत्नी के बीच सेक्सुअल रिलेशनशिप है और दोनों ही एक-दूसरे को संतुष्ट करने में समर्थ हैं, तो विवाद का कोई मुद्दा ही नहीं, क्योंकि क़ानूनन शादी का अर्थ एक-दूसरे को सेक्सुअल संतुष्टि देना है. अगर पति-पत्नी में शारीरिक संबंध बने, तो इसका अर्थ है शादी संपूर्ण हुई. लेकिन अगर उसमें कोई कमी रह जाती है, तो आप तलाक़ ले सकते हैं. वहीं बच्चे न होना किसी का दुर्भाग्य हो सकता है, लेकिन इसके लिए किसी को दोषी ठहराकर उसे उसके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता.

न छुपाएं तथ्यों को

लीगल एक्सपर्ट्स के मुताबिक़ इंफर्टिलिटी तलाक़ का कारण नहीं बन सकती, लेकिन अगर कोई पति कोर्ट में यह साबित कर दे कि उसकी पत्नी शादी से पहले ही मां नहीं बन सकती थी और यह बात उससे छुपाई गई, तो तथ्यों को छुपाने के लिए पति को पत्नी से तलाक़ मिल सकता है.

बदलती लाइफस्टाइल में बदलते शादी के मायने

बहुत से लोग इंफर्टिलिटी को लेकर यह तर्क देते हैं कि उनका पार्टनर उन्हें उनका वारिस या अंश नहीं दे सकता, ऐसे में शादी को बनाए रखने का क्या फ़ायदा? यहां हम एक सवाल पूछना चाहते हैं कि क्या शादी का अर्थ केवल बच्चे पैदा करना है. अगर ऐसा होता, तो आज बहुत से बेऔलाद लोग एक साथ न होते. माना कि पुराने ज़माने में शादी का एकमात्र उद्देश्य परिवार व वंश को आगे बढ़ाना हुआ करता था, पर अब ऐसा नहीं है. बदलती लाइफस्टाइल में ऐसे बहुत से शादीशुदा जोड़े हैं, जो बच्चा नहीं चाहते. डबल इन्कम नो किड्स (डिंक्स) समय के साथ लोगों की ज़रूरतें भी बदली हैं.

मुस्लिम पर्सनल लॉ और इंफर्टिलिटी

भले ही हिंदू मैरिज एक्ट में इंफर्टिलिटी को तलाक़ लेने की वजह नहीं बनाया जा सकता, लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ इससे परे है. यहां इंफर्टिलिटी तलाक़ का एक बड़ा कारण बन सकती है, बशर्ते पति उस आधार पर तलाक़ लेना चाहे तो. साथ ही यह पति की दूसरी शादी के लिए भी एक बड़ा कारण बन सकता है. हालांकि दूसरी शादी के लिए उसे पहली पत्नी की इजाज़त लेनी पड़ती है, जो महज़ एक औपचारिकता होती है. लीगल एक्सपर्ट की मानें, तो मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत पति कभी भी किसी भी कारण को वजह बनाकर अपनी पत्नी से तलाक़ ले सकता है और ट्रिपल तलाक़ इसका एक जीता जागता नमूना है. हालांकि कुछ मुस्लिम महिलाओं ने ट्रिपल तलाक़ के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला है, पर जब तक सभी महिलाएं अपने हक़ के लिए आवाज़ नहीं उठाएंगी, तब तक उनके अधिकारों का यूं ही उल्लंघन होता रहेगा.

इंफर्टिलिटी के लिए ताने देना है क्रूरता

साल 2013 में मुंबई के फैमिली कोर्ट ने 52 वर्षीया महिला की तलाक़ की अर्जी पर विचार करते हुए उसे उसके पति से तलाक़ दिलाया, जहां पति पत्नी को बांझ होने के ताने देता था. इस मामले में पति-पत्नी दोनों ही बच्चे न होने के लिए एक-दूसरे को दोषी मानते थे. पति पत्नी को एक छोटे से स्टोर रूम में रखता था और उसके साथ बहुत बुरा व्यवहार भी किया जाता था. वह अपनी पत्नी को बच्चों के फोटोज़ दिखाकर ताने देता था, जो किसी भी महिला के लिए बहुत बड़ा मेंटल हरासमेंट है. कोर्ट ने कहा कि इस तरह किसी महिला को उसकी इंफर्टिलिटी के लिए ताने देना क्रुएल्टी (क्रूरता) है और इसके लिए उसे माफ़ नहीं किया जा सकता. इस मामले में सबसे चौंकानेवाला तथ्य जो सामने आया, वो यह कि जब दोनों का फर्टिलिटी टेस्ट कराया गया, तो डॉक्टर ने सर्टिफाई किया कि दोनों ही पैरेंट्स बन सकते हैं. इसके बाद कोर्ट ने पत्नी की अर्जी को मंज़ूर करते हुए उसे तलाक़ दे दिया.

इंफर्टिलिटी को समझें एक मेडिकल कंडीशन

बच्चे पैदा न कर पाना एक मेडिकल कंडीशन है, जिसके लिए किसी के मान-सम्मान को चोट पहुंचाना ग़लत है. जैसे हर व्यक्ति की बॉडी टाइप अलग-अलग होती है, ठीक वैसे ही बच्चे पैदा करने की क्षमता भी अलग-अलग होती है. महिलाओं को समझना चाहिए कि यह एक मेडिकल कंडीशन है, जिसके लिए ख़ुद को कोसना या अपने कर्मों को दोष देना ग़लत है. एक औरत के लिए मां बनना बड़े गर्व की बात है, लेकिन उस गर्व को अपने आत्मसम्मान को चोटिल न करने दें. अपने अस्तित्व को बच्चे के वजूद से जोड़कर देखना छोड़ दें.

– अनीता सिंह

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सेक्सुअल हैरेसमेंट से बचने के लिए अपनाएं ये सेफ्टी गाइडलाइन्स (Safety Guidelines For Sexual Harassment)

पूरे देश में सेक्सुअल हैरेसमेंट (Sexual Harassment) के ख़िलाफ़ मुहिम चल पड़ी है. ऐसे में यह जानना बेहद ज़रूरी है कि घर, बाहर या फिर वर्कप्लेस पर अपनी सेफ्टी को लेकर महिलाएं कितनी सतर्क और जागरूक हैं? क्या उन्हें क़ानून की सही जानकारी है? अपने साथ-साथ बच्चों की सेफ्टी के प्रति भी कितनी जागरूक हैं वो? इन्हीं विषयों पर महिलाओं को जागरूक करने के लिए हम लेकर आए हैं सेक्सुअल हैरेसमेंट से बचाव के बेस्ट सेफ्टी टिप्स (Best Safety Tips) और गाइडलाइन्स.

Sexual Harassment

क्या है सेक्सुअल हैरेसमेंट?

किसी भी तरह के ग़लत इशारे करना, ग़लत व्यवहार या टिप्पणी करना, ज़बर्दस्ती शारीरिक संबंध बनाना या बनाने के लिए कहना, शारीरिक बनावट या कपड़ों पर टिप्पणी करना, कामुक साहित्य दिखाना आदि सेक्सुअल हैरेसमेंट का हिस्सा हैं.

हर महिला को पता हो यह क़ानून

साल 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने वर्कप्लेस पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए विशाखा गाइडलाइन्स के नाम से 13 गाइडलाइन्स जारी की थीं, जिन्हें साल 2013 में क़ानून का रूप दे दिया गया. अब ये गाइडलाइन्स सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ वुमेन एट वर्कप्लेस एक्ट, 2013 का रूप ले चुकी हैं. इस एक्ट में सेक्सुअल हैरेसमेंट को परिभाषित किया गया है, साथ ही उससे बचाव और उत्पीड़न की स्थिति में होनेवाली कार्रवाई का उल्लेख किया गया है.

– सबसे ज़रूरी बात, जो हर महिला को पता होनी चाहिए, वो यह कि जिस भी संस्थान में 10 या 10 से ज़्यादा कर्मचारी काम करते हैं, वहां एम्प्लॉयर को इंटरनल कंप्लेंट्स कमिटी (आईसीसी) बनाना अनिवार्य है, जिसमें 50% महिलाएं शामिल हों.

–     इसके अलावा हर ज़िले में लोकल कंप्लेंट्स कमिटी हो, ताकि जिन कर्मचारियों के संस्थान में आईसीसी नहीं है, वो यहां शिकायत दर्ज कर सकें.

वर्कप्लेस पर सेफ्टी के लिए क्या करें महिलाएं?

आजकल शायद ही ऐसा कोई घर हो, जहां कोई महिला कामकाजी न हो. घर से बाहर निकलकर काम करने के लिए उपयुक्त माहौल मिले, इसके लिए उन्हें ही सतर्क और जागरूक रहना होगा.

–     अगर आपको लगता है कि आपके वर्कप्लेस पर कुछ पुरुषों के कारण या किसी एक व्यक्ति के कारण आप असहज महसूस कर रही हैं, तो सबसे पहले उसे ख़ुद आगाह करें.

–     अगर वो फिर भी अपनी हरकतों से बाज़ न आए, तो ऑफिस की इंटरनल कंप्लेंट्स कमिटी (आईसीसी) में शिकायत करने से न हिचकिचाएं.

–     अगर ऑफिस में आईसीसी नहीं है, तो मैनेजमेंट में उसकी शिकायत करें या फिर आप लोकल कंप्लेंट्स कमिटी में भी शिकायत कर सकती हैं.

–     अगर मैनेजमेंट उसी की तरफ़दारी करे, तो ऐसी जगह काम करने से बेहतर होगा कि आप कंपनी छोड़ दें.

–     अगर कोई आपको ग़लत मैसेज भेजता है, तो उसका स्क्रीनशॉट लेकर रख लें, ताकि शिकायत करते व़क्त सबूत के तौर पर दे सकें.

–    फोन कॉल्स की रिकॉर्डिंग करके भी आप उस व्यक्ति के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सकती हैं.

–     अपने ऑफिस रूटीन के बारे में पैरेंट्स या पार्टनर को हमेशा बताकर रखें, ताकि कभी देर-सबेर होने पर वो पूछताछ कर सकें.

–     अपने ऑफिस और सहकर्मियों के मोबाइल नंबर पैरेंट्स या पार्टनर के पास भी सेव करके रखें, ताकि ज़रूरत पड़ने पर संपर्क किया जा सके.

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घर से बाहर सेफ्टी का यूं रखें ख़्याल

–     अजनबी लोगों पर किसी भी तरह का भरोसा न करें. ऐसे लोगों के साथ ट्रैवल भी न करें.

–     जब भी अकेले हों, सावधान रहें. आपकी बॉडी लैंग्वेज और चाल में भी कॉन्फिडेंस होना चाहिए.

     अगर रात को ऑफिस से निकलने में देरी हो जाती है, तो ट्रैवलिंग के लिए हाई हील्स न पहनें. ऐसे जूते या चप्पल पहनें, जिनमें मुसीबत के व़क्त भाग सकें.

–     अगर रात को ऑफिस या अपनी बिल्डिंग में लिफ्ट में जाना सेफ नहीं लगता, तो सीढ़ियों से जाएं.

–     कभी किसी अनजान से लिफ्ट न लें.

–     अकेले ऑटो या टैक्सी लेने की बजाय शेयरिंग में जाएं, पर अगर आपको ज़रा भी गाड़ी का माहौल संदिग्ध लगे, तो उसमें बिल्कुल न जाएं.

–     ट्रैवलिंग के दौरान किसी अजनबी या सहयात्री से अपना फोन नंबर या कोई और डिटेल शेयर न करें.

–     रास्ते में पैदल चलते हुए म्यूज़िक सुनना है, तो धीमी आवाज़ पर सुनें, ताकि अगल-बगल में हो रही एक्टीविटीज़ के बारे में पता चलता रहे.

–     अगर रात को देर से ट्रैवल करती हैं, तो अपने पर्स में हमेशा पेपर स्प्रे रखें. अगर पेपर स्प्रे नहीं हैं, तो इमर्जेंसी में आप डियो का भी इस्तेमाल कर सकती हैं.

–     दिन हो या रात, अगर कोई आपका पीछा कर रहा है, तो अपना रास्ता बदल दें और फोन करके तुरंत अपनों को सूचित करें.

–     अपने मोबाइल फोन की बैटरी हमेशा चार्ज रखें, ताकि इमर्जेंसी में संपर्क साधने में द़िक्क़त न हो.

–     हो सके तो पर्सनल सेफ्टी से जुड़े कुछ गुर सीख लें.

–     घर के अंदर भी अगर किसी रिश्तेदार की हरकतें आपको आपत्तिजनक लगती हैं, तो तुरंत पैरेंट्स या पार्टनर को बताएं.

सेक्सुअल हैरेसमेंट क़ानून में है बदलाव की ज़रूरत

–    सबसे पहले तो यह क़ानून केवल महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाया गया है, जबकि आजकल पुरुषों के उत्पीड़न की ख़बरें समाचार-पत्रों की सुर्ख़ियां बन रही हैं. इसमें पुरुषों की सुरक्षा को भी शामिल करना चाहिए.

–    सेक्सुअल हैरेसमेंट की परिभाषा को विस्तृत करने की ज़रूरत है, क्योंकि बदलती टेक्नोलॉजी के इस दौर में हैरेसमेंट के कई नए-नए रूप देखने को मिल रहे हैं.

–     आज भी बहुत-से संस्थानों में आईसीसी का गठन नहीं किया गया है, लेकिन उसके बारे में पूछनेवाला कोई नहीं है.

–     सोशल मीडिया आज एक प्लेटफॉर्म की तरह काम कर रहा है, ऐसे में ज़रूरी है कि सरकार की आईटी सेल वहां होनेवाली गतिविधियों पर नज़र रखकर मामले को सही डिपार्टमेंट में पहुंचाए, ताकि मामले की सही जांच हो सके.

–     लोकल कंप्लेंट्स कमिटी के बारे में लोगों में जागरूकता फैलाई जाए. उसे मज़बूत बनाने के लिए कड़े प्रावधान बनाए जाएं.

–     इसके तहत महिलाओं को छूट दी गई है कि वो कभी भी अपने ख़िलाफ़ होनेवाले अन्याय के लिए आवाज़ उठा सकती हैं. इसके लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है, लेकिन इन मामलों में देरी के कारण अपराध साबित कर पाना पुलिस के लिए बहुत मुश्किल हो जाता है. इसके लिए भी क़ानून में कोई प्रावधान होना चाहिए.

– अनीता सिंह     

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यौन शोषण पर क्या कहता है भारतीय कानून? (Sexual Abuse Laws In India Every Woman Should Know)

Sexual Abuse Laws

हाल ही में सोशल मीडिया पर आरंभ हुए मीटू कैंपेन के अंतर्गत भारतीय महिलाओं (Indian Women) ने अतीत में अपने साथ शोषण के खिलाफ आवाज़ बुलंद की है. कानून (Law) की कसौटी पर ये आरोप-प्रत्यारोप कितने खरे उतरेंगे, ये तो कोर्ट ही तय करेगा, लेकिन हम यहां पर बता रहे हैं यौन शोषण (Sexual Abuse) से जुड़े कानूनी पहलुओं के बारे में.

क्या होता है यौन शोषण
अधिकतर महिलाओं को इस बात का एहसास तक नहीं होता है कि उनका हैरेसमेंट हो रहा है. कोई व्यक्ति है, जो उनका वर्बली, नॉन वर्बली, फिज़िकली या मेंटली रूप से शोषण कर रहा है. और महिलाएं इसे मज़ाक या व्यंग्य (ताना) समझ कर छोड़ देती है. सेक्सुअल हैरेसमेंट का अर्थ केवल शारीरिक शोषण तो है ही, साथ में अगर किसी महिला के साथ वर्कप्लेस पर किसी भी तरह का भेदभाव, जो किसी पुरूष सहकर्मी द्वारा किया जाए या फिर वह पुरूष सहकर्मी जो आपको वर्बली या नॉन वर्बली तौर पर हानि पहुंचाएं, सिर्फ इसलिए की आप महिला है, तो यह शोषण/उत्पीडन (हैरेसमेंट) कहलाता है.

सेक्शन 354
कुछ वर्षों पहले इंडियन पैनल कोट (आईपीसी सेक्शन- Indian Penal Code) की धारा 354 के तहत यदि शख्स किसी महिला पर यौन शोषण करता था या उस पर शारीरिक संबंध बनाने के लिए दबाव बनाता था, उस पर बुरी नज़र डालता था, अश्‍लील मैसेज भेजता था या फिर उसकी अनुमति के बिना कोई ग़लत काम करता था, तो ऐसी स्थिति में वह महिला उस शख्स के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करा सकती है. आईपीसी की धारा के तहत एक साल से लेकर पांच साल तक सजा का प्रावधान था, साथ ही जुर्माना भी भर पड़ सकता था.
लेकिन निर्भया कांड के बाद इस कानून में नए बदलाव किए गए. इस नए कानून के तहत इंडियन पैनल कोट 354 को चार भागों में बांटा गया है, जिसके अंतर्गत IPC 354-A , IPC 354-B, IPC 354-C, IPC 354-D है

सेक्शन 354 ए
Sexual Abuse Laws For Woman

इस धारा के तहत अगर कोई शख्स किसी महिला के साथ जबर्दस्ती शारीरिक संबंध बनाना, उसकी टच करना अश्‍लील मैसेज भेजना, गंदे कमेंट करना या अश्‍लील वीडियो दिखाना आता है. इसके अंतर्गत उसे 3 साल की सजा हो सकती है, साथ ही जुर्माना भी लग सकता है.

धारा 354 ए को भी 4 उपभागों में बांटा गया है-

  • धारा 354 ए- उपभाग 1: यदि कोई व्यक्ति किसी महिला को गंदी नियत के साथ छूता है, तो इस स्थिती में IPC 354-A उपभाग 1 लगती है तथा आरोपी व्यक्ति को 3 साल की सजा हो सकती है.
  • धारा 354 ए- उपभाग 2: अगर कोई व्यक्ति किसी महिला को शारीरिक संबंध बनाने के लिए कहता है, तो ऐसी स्थिति में उसके खिलाफ IPC 354-A उपभाग 2 लगती है और 3 साल की सजा का प्रावधान है.
  • धारा 354 ए- उपभाग 3: यदि कोई पुरुष किसी महिला को उसकी इच्छा के बगैर अश्‍लील वीडियो या मैसेज दिखाता है, तो  इस स्थिती में आरोपी व्यक्ति के खिलाफ IPC 354-A उपभाग 4 लगती है तथा 1 साल की सजा का प्रावधान है.
  • धारा 354 ए- उपभाग 4: यदि कोई भी व्यक्ति किसी भी महिला या युवती पर गंदे अश्लील कमेंट करता या उसको अश्लील मैसेज भेजता है तो इस स्थिती में आरोपी व्यक्ति के खिलाफ IPC 354-A उपभाग 4 लगती है तथा 1 साल की सजा का प्रावधान है

सेक्शन 354 बी

Sex Abuse Laws
इस सेक्शन के तहत अगर कोई व्यक्ति किसी महिला को नग्न देखना, जबर्दस्ती उसके कपड़े उतरवाना/उकसाना या उस कपड़े उतारने के लिए दबाव बनाना आता है.  इस धारा के तहत आरोपी व्यक्ति को 5-7 साल की सजा जुर्माना दोनो हो सकते है. यह गैरजमानती धारा है. इसके अंतर्गत अपराधी को जमानत नही मिल सकती |

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सेक्शन 354 सी

Sexual Abuse Laws in India

इसके तहत अगर कोई शक्स किसी महिला का अश्‍लील वीडियो बनाता है या उसके किसी प्राइवेट एक्ट की तस्वीर खीचता है, तो सार्वजनिक तौर पर फैलाता है, तो इस मामले में उसे 3 साल तक की सजा हो सकती है. इस सजा के बाद भी अगर वह व्यक्ति दोबारा इस तरह की हरकत करता है, तो उसे 3-7 साल तक की सजा का प्रावधान है.

सेक्शन 354 डी
अगर कोई व्यक्ति किसी महिला से जर्बदस्ती संपर्क बनाए रखना चाहता है या फिर महिला की जानकारी के बिना उसका पीछा करता है, तो यह भी यौन उत्पीडन की श्रेणी में आता है. इस धारा के दोषी पाए जाने पर व्यक्ति को 3 से 5 साल तक की सजा, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं.

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– पूनम नागेंद्र शर्मा

10 क़ानूनी मिथ्याएं और उनकी हक़ीक़त (10 Common Myths About Indian Laws Busted!)

क़ानून की ऐसी कई छोटी-छोटी बारीक़ियां हैं, जिनके बारे में लोगों को पता ही नहीं होता और औरों से सुनी-सुनाई बातों पर विश्‍वास कर उसी को सच मानने लगते हैं. क़ानून से जुड़ी ऐसी ही कुछ मिथ्याओं के सच उजागर करने की हमने यहां एक कोशिश की.

Myths About Indian Laws

मिथ 1. मुझे कोर्ट में ओरिजनल डॉक्यूमेंट्स जमा करने पड़ेंगे.

सच: ऐसा बिल्कुल नहीं है और आप ऐसा भूलकर भी मत करना, क्योंकि कोर्ट में उनके खोने का डर बना रहता है. सिविल प्रोसीज़र कोड, 1908 के अनुसार, कोर्ट में पेटीशन दाख़िल करते समय आपको उसके साथ एफीडेविट और ओरिजनल डॉक्यूमेंट्स की सर्टीफाइड फोटोकॉपीज़ सबूत के तौर पर जमा करनी होती हैं. हां, सुनवाई के दौरान आपको ओरिजनल डॉक्यूमेंट्स दिखाने पड़ते हैं, पर अगर उस समय भी आप ओरिजनल्स नहीं दिखा सकते, तो सर्टीफाइड फोटोकॉपीज़ भी दिखा सकते हैं. याद रखें, अटेस्टेशन किसी गैजेटेड ऑफिसर से ही करवाएं और अपनी सहूलियत के लिए हमेशा ओरिजनल्स की सर्टीफाइड फोटोकॉपीज़ के दो सेट बनाकर रखें, ताकि ज़रूरत पड़ने पर उनका इस्तेमाल कर सकें. ओरिजनल्स आप कभी किसी को न दें, अगर आप चाहें, तो अपने वकील को भी सर्टीफाइड कॉपीज़ दे सकते हैं. सेफ्टी के तौर पर ओरिजनल्स को हमेशा स्कैन करके कंप्यूटर में सेव करके रखें.

मिथ 2: मैं जब भी चाहूं कोर्ट में केस दाख़िल कर सकता हूं. 

सच: द लिमिटेशन एक्ट, 1963 के तहत सभी सिविल केसेज़ ‘टाइम बार्ड’ होते हैं यानी हर केस की एक तय समय सीमा होती है. किसी भी मामले को उस तय समय के भीतर ही कोर्ट में दाख़िल किया जा सकता है, वरना आप उसके ख़िलाफ़ कार्यवाही का मौक़ा गंवा सकते हैं. मामले के अनुसार यह समय सीमा 3 महीने से लेकर 3 साल तक की हो सकती है. हालांकि कुछ मामलों में सहूलियत मिल जाती है, बशर्ते देरी की वजह कोर्ट को वाजिब लगे, जैसे- अगर कोई 16 साल का है, जिसे पेटीशन दाख़िल करना है और उसका कोई गार्जियन नहीं है, तो उसके केस की समय सीमा उसके 18 साल के होने के बाद से शुरू होगी.

मिथ 3: अगर मैं गारंटर हूं, तो इसका यह मतलब नहीं कि मैं लोन का अमाउंट चुकाऊं. 

सच: इस मिथ की हक़ीक़त को आप जितनी जल्दी समझ लें, आपके लिए उतना ही अच्छा होगा. जब आप किसी के लिए लोन के गारंटर बनते हैं, तो अगर किसी कारणवश वह लोन नहीं चुका पाता या उसकी मृत्यु हो जाती है, जिसके बाद बैंक के पास अपना पैसा वसूलने के लिए गारंटर एकमात्र ज़रिया बचता है, तो बैंक को पूरा अधिकार है कि वह बचे हुए लोन का पूरा अमाउंट आपसे वसूल कर सकता है. इतना ही नहीं, यह भविष्य में आपके लोन लेने की योग्यता को भी प्रभावित कर सकता है. इसलिए अगली बार लोन के लिए किसी के गारंटर बनने से पहले पूरी तरह से आश्‍वस्त  हो जाएं कि वह पूरा लोन चुका पाएगा, तभी उसके गारंटर बनें.

मिथ 4: बिना किसी वकील के मैं कंज़्यूमर कोर्ट में केस नहीं कर सकता.   

सच: कंज़्यूमर कोर्ट में केस करने के लिए आपको वकील की ज़रूरत नहीं है, अगर आप अपने केस को ख़ुद पेश कर सकते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार आप ऐसा कर सकते हैं. दरअसल, वकील की लंबी-चा़ैडी फीस के बारे में सोचकर ही बहुत-से लोग कंज़्यूमर कोर्ट में जाने से कतराते हैं, क्योंकि कंज़्यूमर कोर्ट के छोटे-मोटे मामलों में मुआवज़ा बहुत ज़्यादा नहीं मिलता. ऐसे में वकील की फीस देना हर किसी को भारी पड़ता है. इसलिए अगर आपको भी किसी कंपनी ने कोई धोखा दिया है या आपको उनसेकोई शिकायत है, तो आप भी उसके ख़िलाफ़ कंज़्यूमर कोर्ट जा सकते हैं और आपको किसी वकील की भी ज़रूरत नहीं.

मिथ 5: मैं अपनी ख़ानदानी प्रॉपर्टी जिसे चाहूं, जैसे चाहूं, गिफ्ट कर सकता हूं.

सच: ख़ानदानी प्रॉपर्टी पूरे परिवार की होती है, इसलिए किसी एक को कोई हक़ नहीं होता कि वह उसे अपनी मर्ज़ी से गिफ्ट कर सके. जब तक कि परिवार का एकलौता या आख़िरी सदस्य न हो, तब तक प्रॅापर्टी स़िर्फ बांटी जा सकती है, गिफ्ट नहीं की जा सकती. हां, अगर आपके अलावा आपके ख़ानदान में प्रॉपर्टी क्लेम करनेवाला दूसरा कोई नहीं है, तो आप प्रॉपर्टी को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक बेच या गिफ्ट कर सकते हैं. यह नियम हिंदू संयुक्त परिवार में रहनेवाले जॉइंट प्रॉपर्टीवालों के लिए है.

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Myths About Indian Laws
मिथ 6: लेटर ऑफ अथॉरिटी के ज़रिए मैं किसी को भी कोई भी ज़िम्मेदारी दे सकता हूं.

सच: प्रतिनिधित्व के लिए दो डॉक्यूमेंट्स इस्तेमाल में लाए जाते हैं. एक लेटर ऑफ अथॉरिटी और दूसरा पावर ऑफ अटॉर्नी. लेटर ऑफ अथॉरिटी के ज़रिए बैंक से चेक बुक लेना, डॉक्यूमेंट्स जमा करना या लेना जैसे छोटे व आसान काम दिए जा सकते हैं, जबकि कॉम्प्लेक्स फाइनेंशियल मैटर्स, जैसे- प्रॉपर्टी बेचना, डॉक्यूमेंट्स व चेक साइन करने आदि बड़े व महत्वपूर्ण ट्रांज़ैक्शन्स के लिए पावर ऑफ अटॉर्नी का इस्तेमाल किया जाता है.

मिथ 7: कोर्ट के बाहर किए गए समझौते को मैं कोर्ट में चैलेंज नहीं कर सकता.

सच: यह सच नहीं है. ज़्यादातर लोग कोर्ट की लंबी कार्यवाही से बचने के लिए आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट यानी कोर्ट के बाहर ही मामले को निपटाना, को तवज्जो देते हैं. पर अगर आपको लगता है कि इस सेटलमेंट में आपके साथ धोखाधड़ी हुई है या आपके ऊपर दबाव डालकर ज़बर्दस्ती सेटलमेंट करवाया गया है, तो आप उसके ख़िलाफ़ कोर्ट में जा सकते हैं. कोर्ट एग्रीमेंट के नियम व शर्तों को देखकर अपना ़फैसला सुनाते हैं. इसके अलावा आर्बिट्रेशन (किसी और की मध्यस्थता) के ज़रिए सुलझाए गए मामले को भी लेकर आप कोर्ट जा सकते हैं. इसलिए इस ग़लतफ़हमी में बिल्कुल न रहें कि अगर कोर्ट के बाहर समझौता कर लिया है, तो उसके ख़िलाफ़ कोर्ट में नहीं जा सकते.

मिथ 8: सेकंड हैंड गाड़ी ख़रीदने पर इंश्योरेंस कंपनी को सूचित करने की कोई ज़रूरत नहीं.

सच: जब भी आप सेकंड हैंड गाड़ी ख़रीदते हैं, तो स़िर्फ गाड़ी की कंडीशन पर ही नहीं, बल्कि पेपरवर्क पर भी पूरा ध्यान दें. वेहिकल रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट, रोड टैक्स रसीद के साथ-साथ वेहिकल इश्योरेंस भी अपने नाम पर ट्रांसफर करवा लें. अगर इंश्योरेंस पेपर पर आप नाम ट्रांसफर नहीं करवाते और गाड़ी का एक्सीडेंट हो जाता है या गाड़ी चोरी हो जाती है, तो इंश्योरेंस कंपनी आपका क्लेम पास नहीं करेगी, क्योंकि पेपर्स पर आपका नाम नहीं है. इसलिए नियमानुसार गाड़ी ख़रीदने के 14 दिनों के भीतर ही इश्योरेंस पेपर्स पर अपना नाम ट्रांसफर करवा लेने में ही आपका फ़ायदा है.

मिथ 9: मेरे वारिस को मेरे सारे शेयर्स अपने आप मिल जाएंगे.

सच: यह ख़ासतौर पर उनके लिए है, जो शेयर्स आदि में इंवेस्ट करते रहते हैं. अगर आपने वसीयत में लिख दिया है कि मेरे बाद मेरा सब कुछ मेरी पत्नी या बच्चों को मिलेगा, लेकिन शेयर्स के लिए किसी और को नामांकित (नॉमिनी) किया है, तो नियमानुसार आपके बाद आपके शेयर्स नॉमिनी को मिलेंगे ना कि क़ानूनी वारिस को. द कंपनीज़ एक्ट के सेक्शन 109ए के अनुसार, अकाउंट होल्डर के बाद उसके शेयर्स क़ानूनी तौर पर नॉमिनी को मिलेंगे.एक्सपर्ट्स के अनुसार भविष्य में किसी भी तरह की परेशानी से बचने के लिए नॉमिनी का ही नाम वसीयत में भी शेयर्स के लिए लिखें.

मिथ 10: मेरे बाद मेरी प्रॉपर्टी का बंटवारा करने के लिए ऑनलाइन वसीयत काफ़ी है.

सच: डिजिटली साइन किए हुए ऑनलाइन वसीयत को हमारे देश में मान्यता नहीं मिलती. ऑनलाइन वसीयत का प्रिंटआउट लेकर आपको दो गवाहों की मौजूदगी में उसे साइन करना होता है. उसके बाद उन दोनों गवाहों को भी उस वसीयत को अटेस्ट करना पड़ता है, जिसके बिना वह वसीयत मान्य नहीं होती. हालांकि ज़रूरी नहीं फिर भी अगर आप चाहें, तो वसीयत को रजिस्टर करा सकते हैं. आजकल ऑनलाइन बहुत-सी वेबसाइट्स हैं,  जैसे- ुुु.ट-थळश्रश्र और ुुु.ङशसरलूुीळींशी.लेा जिनकी मदद से कुछ अमाउंट देकर आप अपनी वसीयत बनवा सकते हैं, पर यह काफ़ी नहीं. उस वसीयत का प्रिंटआउट लेकर, साइन और अटेस्ट कराना बहुत ज़रूरी है.  बॉक्स अगर ओरिजनल पेपर्स खो जाएं, तो डुप्लीकेट के लिए क्या करें?यहां हम जनरल प्रोसेस के बारे में बता रहे हैं, जो ज़्यादतर मामलों मेंे इस्तेमाल किया जाता है. – पुलिस में एफआईआर दर्ज कराएं.- एक इंग्लिश और स्थानीय भाषा के न्यूज़पेपर में पब्लिक नोटिस जारी करें.- ओरिजनल इश्यूअर को डुप्लीकेट बनाने के लिए अप्लाई करें.- एफआईआर और प्रेस क्लिपिंग की कॉपी सबूत के तौर पर रखें.

वसीयत के लिए कुछ ख़ास टिप्स

आप जिन लोगों को अपनी प्रॉपर्टी देना चाहते हैं, उनके नाम साफ़-साफ़ लिखें. उनके निकनेम या आधे-अधूरे नाम न लिखें.- अगर आप किसी को कुछ ऐसा देना चाहते हैं, जिसकी रक़म लिखी जा सकती है, तो वह रक़म ज़रूर लिखें.- जिन चीज़ों के लिए रक़म लिखना मुमकिन नहीं, उनके लिए प्रॉपर्टी का सही-सही डिस्क्रिप्शन लिखें.- जो दो लोग वसीयत को अटेस्ट करेंगे, उनको या उनकी पत्नी को इस वसीयत से कोई फ़ायदा नहीं मिलना चाहिए यानी वसीयत ऐसे लोगों से अटेस्ट कराएं, जिन्हें उस वसीयत से कोई लाभ नहीं मिलनेवाला. – अपनी वसीयत के लिए एक एक्ज़ीक्यूटर अपॉइंट करें, जिसकी यह ज़िम्मेदारी होगी कि वह इस बात को सुनिश्‍चित करे कि सभी बातों का वैसा ही पालन किया गया, जैसा कि वसीयत में लिखा गया था.

– अनीता सिंह

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कॉर्नेलिया सोराबजी- भारत की पहली महिला एडवोकेट… (Cornelia Sorabji: Know India’s First Woman Advocate…)

Cornelia Sorabji, India's First Woman Advocate

 

15 नवंबर, 1866 में महाराष्ट्र के नासिक में जन्मीं कॉर्नेलिया (Cornelia Sorabji) न केवल भारत की पहली महिला वकील हैं, बल्कि देश में व लंदन में लॉ की प्रैक्टिस करनेवाली पहली बैरिस्टर भी हैं. उन्हें देश व समाज सेवा की प्रेरणा उनकी मां से विरासत में मिली. उनकी मां फ्रांसिना फोर्ड नारी शिक्षा की प्रबल पक्षधर थीं. उन्होंने पुणे में लड़कियों की पढ़ाई के लिए कई स्कूल भी खोले. कॉर्नेलिया छह भाइयों में इकलौती बहन थीं.

* वे लेखिका व सोशल वर्कर भी थीं.
* वे बॉम्बे यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट होने के साथ-साथ ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के समरविले कॉलेज से लॉ की पढ़ाई करनेवाली पहली भारतीय महिला भी थीं.
* सन् 1892 में वे लॉ की पढ़ाई के लिए विदेश गईं.
* उस ज़माने में महिलाओं को लेकर बहुत सारी पाबंदियां थीं. भारतीय महिला वकील को कोर्ट में प्रैक्टिस की अनुमति नहीं थी. ऐसे में उन्हें इसके लिए काफ़ी संघर्ष करना पड़ा.
* आख़िरकार लंबे संघर्ष के बाद 1904 में बंगाल कोर्ट में लेडी असिस्टेंट के रूप में जुड़ीं.

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* 1907 में उन्हें असम, बिहार, उड़ीसा के कोर्ट में सहायक महिला एडवोकेट के पोस्ट पर काम करने को मिला.
* साल 1924 में उन्होंने कोलकाता व ब्रिटेन में भी प्रैक्टिस शुरू की.
* उन्होंने लंबी क़ानूनी लड़ाई लड़ते हुए अंततः महिलाओं को वकालत से रोकनेवाले क़ानून को कमज़ोर कर उनके लिए लॉ की प्रैक्टिस करने के रास्ते बनाएं.
* उन्होंने देश की क़रीब छह सौ महिलाओं को उनके अधिकार दिलाने में सहायता की.
* अंत में 1929 में हाई कोर्ट के सीनियर एडवोकेट के रूप में रिटायरमेंट लिया.

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* उन्होंने लॉ के अलावा सोशल वर्क व कई लेख, शॉर्ट स्टोरीज़, बुक्स आदि भी लिखीं, जिनमें से उनकी ऑटोबायोग्राफी ‘इंडिया कॉलिंग’ सुर्ख़ियों में रही.
* आज उनके 151 जन्मदिवस पर गूगल ने उन्हें डूडल कर सम्मानित किया.
* 6 जुलाई, 1954 में लंदन में 88 की उम्र में उनका देहांत हुआ.
* देश में ही नहीं, बल्कि इंग्लैंड में भी कॉर्नेलिया सोराबजी को सम्मान के साथ याद किया जाता है.

– ऊषा गुप्ता

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