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लोग क्या कहेंगे का डर क्यों नहीं निकलता जीवन से? (Stop Caring What Others Think)

Others Think
लोग क्या कहेंगे का डर क्यों नहीं निकलता जीवन से? (Stop Caring What Others Think)

–    अरे, ये क्या पहना है? लोग देखेंगे, तो क्या कहेंगे…?

–    रीना, तुम लड़की होकर इतनी ज़ोर-ज़ोर से हंसती हो, तमीज़ नहीं है क्या, लोग क्या कहेंगे?

–    शांतनु, तुम दिनभर क्लासिकल डांस की प्रैक्टिस में लगे रहते हो, लोग क्या कहेंगे कि शर्माजी का बेटा लड़कियोंवाले काम करता है…

–    गुप्ताजी के दोनों बच्चे डॉक्टरी कर रहे हैं, तुम दोनों को भी इसी फील्ड में जाना होगा, जमकर पढ़ाई करो…

…इस तरह की बातें हम अक्सर सुनते और ख़ुद भी कहते आए हैं, क्योंकि हम समाज में रहते हैं और ऐसे समाज में रहते हैं, जहां दूसरे क्या सोचेंगे, यह बात ज़्यादा मायने रखती है, बजाय इसके कि हम ख़ुद क्या चाहते हैं. हम ‘लोग क्या कहेंगे’ की चिंता में इतने डूबे रहते हैं कि अपने अस्तित्व को ही भूल जाते हैं. कपड़ों से लेकर खान-पान, करियर व शादी-ब्याह जैसे निर्णय भी दूसरे ही हमारे लिए अधिक लेते हैं.

दूसरे इतने अपने क्यों?

–    “रिंकू, तुम्हारी अधिकतर सहेलियों की शादी हो गई है, तुम कब तक कुंआरी रहोगी? अक्सर सोशल गैदरिंग में सब पूछते रहते हैं कि बेटी की शादी कब करोगे… हम क्या जवाब दें उन्हें?”

“मॉम, आप तो जानती हैं कि मैं अभी अपने करियर पर फोकस करना चाहती हूं, शादी के बारे में सोचा भी नहीं… दूसरों का क्या है, वो तो कुछ भी पूछते रहते हैं…” रिंकू ने मम्मी को समझाने की कोशिश की.

–    “मिसेज़ वर्मा बता रही थीं कि उनकी बेटी ने इतनी डिग्रियां ले लीं कि अब उसके लिए उसके स्तर का लड़का ढूंढ़ना मुश्किल हो गया है. सोनल, तू भी पीएचडी शादी के बाद ही करना, क्योंकि ज़्यादा पढ़-लिख  जाओगी,  तो  लड़के  मिलने  मुश्किल हो जाएंगे…”

“लेकिन मम्मी, पढ़ाई करना ग़लत बात थोड़ी है, स़िर्फ शादी को ध्यान में रखते हुए तो हम ज़िंदगी के निर्णय नहीं ले सकते. वैसे भी मैं तो शादी ही नहीं करना चाहती. इसमें दूसरों को क्यों एतराज़ है? ये मेरी ज़िंदगी है, जैसे चाहे, वैसे जीऊंगी…” सोनल ने भी अपनी मम्मी को समझाने की कोशिश की…

शर्माजी के बेटे ने भी घरवालों को समझाने की कोशिश की कि क्लासिकल डांस स़िर्फ लड़कियां ही नहीं, लड़के भी कर सकते हैं और वो इसी क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहता है, लेकिन उसके पैरेंट्स यह समझने को तैयार ही नहीं थे. उन्हें अपने बेटे के सपने पूरे करने में उसका साथ देने की जगह लोक-लाज की फ़िक़्र थी कि लोग क्या कहेंगे… दूसरे उनका मज़ाक उड़ाएंगे… आदि… लेकिन इन सभी पैरेंट्स को इस बात की अधिक चिंता थी कि लोग क्या कहेंगे… बच्चों ने उन्हें समाज से नज़रें मिलाने के काबिल नहीं छोड़ा… दरअसल, हम समाज की और दूसरों की इतनी ज़्यादा परवाह करते हैं कि हमारी ज़िंदगी में हस्तक्षेप करना वो अपना अधिकार समझने लगते हैं. अक्सर हमारे निर्णय दूसरों की सोच को ध्यान में रखते हुए ही होते हैं.

हमारी पहली सोच यह होती है कि रिश्तेदार और आस-पड़ोसवाले इन बातों पर कैसे रिएक्ट करेंगे…

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Office Gossip

इतना डर क्यों लोगों का?

–    हमारी सामाजिक संरचना शुरू से ही ऐसी रही है और इसी संरचना में हम भी

पले-बढ़े हैं, जिससे अंजाने में ही यह डर हमारी सोच का हिस्सा बन जाता है.

–    हर बात को हम अपनी इज़्ज़त और खानदान से जोड़कर देखते हैं, यही वजह है कि अधिकतर निर्णय हम सच जानते हुए भी नहीं ले पाते, क्योंकि हममें इतनी हिम्मत ही नहीं होती.

–    बेटी की सगाई तो कर दी, पर शादी की तैयारियों के बीच यह पता लगा कि जहां शादी होनेवाली है, वो लोग लालची हैं. ऐसे में पैरेंट्स उनकी डिमांड पूरी करने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देते हैं और यहां तक कि लड़कियां भी सब कुछ जानते हुए निर्णय लेने से कतराती हैं, क्यों? …क्योंकि सगाई टूट गई, तो लोग क्या कहेंगे? समाज में बदनामी हो जाएगी, बेटी को कोई दूसरा लड़का नहीं मिलेगा… आदि… इत्यादि…!

–    इसी डर की वजह से लड़कियां असफल शादियों को भी निभाती हैं, क्योंकि हमारा समाज आज भी तलाक़शुदा महिलाओं को अच्छी नज़र से नहीं देखता.

–    हम पर सोशल प्रेशर इतना ज़्यादा हावी रहता है कि हम उसे ही पैमाना मानते हैं और फिर ज़िंदगी से जुड़े अत्यधिक निजी ़फैसले भी उसी के अनुसार लेते हैं.

–    हमें यह सब सामान्य लगता है, क्योंकि हम शुरू से यही करते व देखते आए हैं. पर दरअसल, यह बेहद ख़तरनाक है.

–    समाज की मानसिकता भी इस डर को और बढ़ाती है. देश में खाप पंचायतों के कई निर्णयों ने भी यह दिखा दिया है कि किस तरह से पुलिस-प्रशासन भी बेबस नज़र आता है सामाजिक दबाव के चलते.

–    इस तरह की घटनाएं आम लोगों के मन में और भी दबाव व डर को बढ़ाती हैं, जिससे उन्हें भी यही लगता है कि हर छोटे-बड़े निर्णयों में समाज की सोच का भी ख़्याल रखना ज़रूरी है.

–    कॉलेजेज़ से लेकर कई नेताओं तक ने लड़कियों के जींस पहनने व मोबाइल फोन रखने को उनके बलात्कार का कारण मानकर इन पर रोक लगाने की बात कई बार कही है.

–    लड़कियों के पहनावे पर कई तरह की बातें अभी भी होती हैं, जबकि हम ख़ुद को एडवांस सोसायटी मानने लगे हैं.

–    ये बातें हमारे मन में भी इतनी हावी हो जाती हैं कि हमें भी लगता है कि बच्चियों को सुरक्षित रखने का बेहतर तरीक़ा यही है कि जो समाज सोचे, वही हम भी करें.

inquisitive

कैसे निकलेगा यह डर?

–    सीधी-सरल बात है कि अपनी सोच बदलिए, समाज की सोच भी बदलती जाएगी.

–    जहां जवाब देना सही लगे, वहां बोलने से हिचकिचाएं नहीं.

–    समाज की सोच के विपरीत बोलना मुश्किल ज़रूर होता है, पर यह नामुमकिन नहीं है.

–    बात जहां सही-ग़लत की हो, तो लोग भले ही कुछ भी सोचें, हमेशा सही रास्ता ही सही होता है.

–    समाज आपकी ज़िंदगी की मुश्किलों को आसान करने कभी नहीं आएगा. वो मात्र दबाव बना सकता है, हमें उनके अनुसार निर्णय लेने के लिए बाध्य करने की कोशिश कर सकता है, हम पर हंस सकता है, हमारी निंदा कर सकता है. लेकिन इन बातों से इतना प्रभावित नहीं होना चाहिए कि अपनी ज़िंदगी से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय भी हम उन्हीं के अनुसार लें.

–    लोग क्या कहेंगे, यह सोचकर हम अपनी या अपने बच्चों की ख़ुशियां, उनके सपनों को छोड़ नहीं सकते, वरना यह डर हमारे बाद हमारे बच्चों के दिलों में भी घर कर जाएगा और यह सिलसिला चलता ही रहेगा.

–    बेहतर होगा अपनी सोच व अपने निर्णयों पर दूसरों को हम इतना हावी न होने दें कि हमारा ख़ुद का अस्तित्व ही न रहे.

–    हमें क्या करना है, कैसे करना है यह हमें ही तय करना है. हां, दूसरों की सहायता ज़रूर ली जा सकती है. अगर कहीं कोई कंफ्यूज़न है तो… लेकिन अंतत: हमें ही रास्ता निकालना है.

– गीता शर्मा

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गोरी लड़कियां आज भी हैं शादी के बाज़ार की पहली पसंद… (Why Indians Want Fair Skin Bride?)

पश्‍चिमी देशों में हम रंगभेद के ख़िलाफ़ कड़ा रवैया अपनाते हैं, लेकिन हम ख़ुद इस मानसिकता से उबरे नहीं हैं. शादी से लेकर मनोरंजन की दुनिया तक में गोरी लड़कियों की डिमांड रहती है. चाहे मैट्रिमोनियल ऐड्स देख लें या कोई भी टीवी विज्ञापन- हर जगह गोरेपन को ख़ूबसूरती की पहली ज़रूरत के तौर पर दर्शाया जाता है. 

त्वचा का रंग तय करता है जहां सब कुछ

– चांद-सा गोरा बच्चा हो, यह तमन्ना हर मां की होती है. गर्भ में ही उसे गोरा बनाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. नारियल पानी पीना, केसरवाला दूध लेना… आदि प्रक्रियाएं बच्चे को गोरा बनाने के लिए की जाती हैं, इस पर अगर बेटी हो गई, तो उसका गोरा होना और भी ज़रूरी हो जाता है, क्योंकि सांवली लड़की से शादी कौन करेगा?

– उबटन लगाकर, हल्दी लगाकर और न जाने क्या-क्या उपाय किए जाते हैं रंगत निखारने के लिए, क्योंकि बेटी के पैदा होते ही उसकी शादी की चिंता सबको खाए जाती है.

 

– पढ़ाई-लिखाई तो होती रहेगी, करियर भी बन जाएगा, लेकिन सांवली लड़की से शादी कौन करेगा?

– शादी के विज्ञापनों में भी सबसे पहले गोरी कन्या की डिमांड की जाती है.

– विज्ञापनों में भी फेयरनेस को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है.

– ऐसे में हर लड़की चाहती है कि उसकी गोरी रंगत हो. हर मां चाहती है कि उसकी बेटी गोरी हो और हर सास गोरी बहू ही घर में लाना चाहती है.

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समाज की मानसिकता है सबसे बड़ी वजह

– अन्य समाज व देश में फैले रंगभेद के ख़िलाफ़ तो हम काफ़ी कुछ बोलते हैं, लेकिन अपने ख़ुद के समाज में हर स्तर पर फैले भेदभाव को हम तर्क देकर सही साबित करने का प्रयास करते हैं.

– अगर किसी गोरे लड़के की शादी सांवली लड़की से हो जाती है, तो सबसे पहले परिवारवाले उसके साथ भेदभाव का रवैया अपनाते हैं, उसके अलावा दूसरे लोग भी यही कहते पाए जाते हैं कि इतना गोरा लड़का था, क्या देखकर इस लड़की से शादी कर दी?

– लड़की को ख़ास तरह के कपड़े और मेकअप करने पर ही ज़ोर दिया जाता है, ताकि उसकी सांवली रंगत और गहरी न लगे.

– कॉम्प्लेक्शन के आधार पर हर तरह से लड़की व उसके परिवारवालों का शोषण किया जाता है. श्र दहेज अधिक मांगा जाता है, बात-बात पर रंग को लेकर ताने दिए जाते हैं या शादी तोड़ देने का डर दिखाया जाता है.

लड़कियां ही नहीं, लड़के भी हैं शिकार

– एक मैट्रिमोनियल वेबसाइट के सर्वे में यह ख़ुलासा हुआ कि शादी की बात आती है, तो लगभग 70-75% महिलाएं गोरे पुरुषों की चाह रखती हैं.

– शादी के विज्ञापनों में पुरुष भी स्किन कलर का उल्लेख करते हैं, ताकि उनकी बात जल्दी बन जाए.

– आजकल महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों की फेयरनेस क्रीम के विज्ञापनों ने भी ज़ोर पकड़ा हुआ है.

– न स़िर्फ फेयरनेस क्रीम, फेयरनेस फेस वॉश की डिमांड भी बहुत अधिक है, बल्कि सबकी अच्छी-ख़ासी बिक्री भी होती है.

शादी ही नहीं, बाकी जगहों पर भी स्किन कलर से पड़ता है फ़र्क़

– आप किसी दुकान पर जाएं या किसी बैंक के काउंटर पर, आपकी रंगत के आधार पर अटेंशन मिलता है.

– किसी जॉब इंटरव्यू के लिए भी आप जा रहे हों, तो अपनी काबिलीयत के साथ-साथ स्किन कलर पर भी एक नज़र दौड़ा लेना और ख़ुद तय करना कि फ़र्क़ पड़ता है या नहीं.

– कहीं किसी पार्टी या समारोह में भी व्हाइट स्किन ज़्यादा अटेंशन बटोरती नज़र आएगी.

– दरअसल, भारतीय स्किन कलर को लेकर बहुत अधिक कॉन्शियस हैं, लेकिन वो सीधे तौर पर इसे दर्शाते नहीं.

– यहां तक कि सांवली रंगतवाले भी ख़ुद गोरे रंग के प्रति आकर्षित होते हैं. वो ख़ुद की रंगत तो निखारना चाहते ही हैं, साथ ही पार्टनर भी गोरी रंगतवाला ही चाहते हैं.

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Indians Want Fair Skin Bride

रंग के साथ जुड़े हैं कॉम्प्लेक्सेस!

– गोरे रंग को अच्छाई के प्रतीक के रूप में भी देखते हैं. लोगों की यह धारणा होती है कि गोरे रंग का इंसान अच्छा इंसान होता है.

– गोरेपन को सकारात्मकता के तौर पर देखा जाता है.

– उच्च जाति से जोड़कर देखा जाता है.

– गोरी रंगत को हाइजीन से भी जोड़कर देखते हैं लोग. अक्सर ऐसा मान लिया जाता है कि गोरा-चिट्टा इंसान साफ़-सुथरा भी होगा.

– ख़ूबसूरती की पहली शर्त गोरी रंगत ही मानी जाती है. सांवली रंगतवालों के नयन-नक्श भले ही कितने भी आकर्षक क्यों न हों, गोरे रंग के सामने उन्हें कमतर ही आंका जाता है.

– लोग ख़ुद-ब-ख़ुद यह मान लेते हैं कि गोरा रंग है, तो अच्छे घर से होगा/होगी, संस्कारी होगा/होगी, नकारात्मकता नहीं होगी, गुण अधिक होंगे, अधिक पढ़ा-लिखा होगा… आदि.

स़िर्फ दूसरे ही नहीं, अपने भी करते हैं भेदभाव

– एक परिवार में यदि कोई बच्चा डार्क स्किन का होता है, तो भले ही मज़ाक में कहा जाए, लेकिन उसे यह एहसास कराया जाता है कि उसके बाकी भाई-बहन या रिश्तेदार तो गोरे-चिट्टे हैं, वो परिवार से अलग है.

– उसके रंग को लेकर उसे चिढ़ाया जाता है.

– उसका मज़ाक उड़ाया जाता है.

– कभी-कभी तो यह भी कह दिया जाता है कि वो तो इस परिवार का सदस्य ही नहीं है. उसे कचरे से उठाकर लाए हैं या वो अस्पताल में बदल दिया गया होगा… आदि.

– ये तमाम धारणाएं गोरे रंग के साथ जुड़ी हुई हैं और जाने-अंजाने हम सब इसी धारणा को पैमाना बनाकर लोगों को जांचते-परखते हैं और यदि जांच-परख शादी के लिए हो और वो भी लड़की की, तब तो यह सबसे ज़रूरी सर्टिफिकेट माना जाता है.

बदलाव हो रहा है…

– यह सच है कि पहले के समय में भेदभाव और अधिक था, अब लोगों की सोच बदल रही है, लेकिन बात जब शादी-ब्याह की आती है, तो यह बदलाव बहुत अधिक नहीं नज़र आता.

– कुछ पैरेंट्स भी ऐसे हैं, जिन्हें यह फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उनका गोरी रंगत का बेटा किसी सांवली लड़की से शादी कर रहा है… लेकिन यह तादाद बेहद कम है.

– यंग जनरेशन इस भेदभाव से उबर रही है, तो उम्मीद है कि भविष्य बेहतर होगा और रंगभेद समाज से मिट जाएगा.

– हम विदेशियों की मानसिकता को ग़लत ठहराते हैं कि वो हमें ब्लैक कहकर हमसे घृणा करते हैं या हमें निम्न तबके का इंसान समझते हैं. हम उनकी रंगभेद नीति को कोसते हैं कि वो इंसानियत नहीं दिखा रहे, लेकिन यही सब हम भी करते हैं अपने घरों में, अपने परिवारों में, अपने समाज में और तब हमें यह सब जायज़ लगता है? इस दोहरी मानसिकता और दोहरे मापदंड से हमें भी उबरना होगा, तभी बदलाव संभव होगा.

– गीता शर्मा

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