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हर महिला को पता होना चाहिए रिप्रोडक्टिव राइट्स (मातृत्व अधिकार)(Every Woman Must Know These Reproductive Rights)

मेरी कोख मेरी नहीं, मेरा अस्तित्व मेरा नहीं, मेरे जज़्बात की कदर है क्या किसी को? मेरी उम्मीदों को क्या समझा है किसी ने? मेरे शरीर पर है किसी और का अधिकार, बरसों से झेल रही हूं मैं ये अत्याचार, कभी कोख में मार देते हैं, तो कभी जन्म के बाद, तड़प उठता है मेरा मन करके चित्कार. पर इतनी मजबूर क्यों हूं मैं आज? क्या मैं स़िर्फ मां ही हूं? क्या मेरी कोख ही सबकुछ है सबके लिए? नहीं, इससे कहीं ऊपर है मेरा अपना वजूद… मेरा अपना मान-सम्मान… 

Reproductive Rights

हमारे समाज में मातृत्व को बहुत सराहा जाता है. यही कारण है कि जो महिलाएं मां नहीं बन पातीं, समाज उन्हें वो सम्मान नहीं देता, जो संतानवाली महिलाओं को मिलता है. पर संतान चाहिए या नहीं चाहिए, कितने चाहिए, कितने सालों बाद चाहिए, दो बच्चों के बीच कितना अंतर चाहिए जैसे अहम् ़फैसले भी उसके लिए कोई और लेता है. बरसों से जो ग़लती दूसरी महिलाएं करती आ रही हैं, उसे आप न दोहराएं. जागरूक बनें और अपने अधिकारों को समझें.

क्यों ज़रूरी हैं रिप्रोडक्टिव राइट्स?

आज भी हमारे समाज में पुरुषों का दबदबा है और यही कारण है कि महिलाओं को दोयम दर्जा मिला है. उन्हें हमेशा कमज़ोर और दया का पात्र समझा जाता है. उन्हें कोमल और कमज़ोर समझकर कोई उनसे जबरन बच्चे पैदा न करवाए या फिर ज़बर्दस्ती गर्भपात न करवाए, इसलिए रिप्रोडक्टिव राइट्स हर महिला की सेहत और अधिकारों की रक्षा के लिए बहुत ज़रूरी हैं.

क्या हैं आपके रिप्रोडक्टिव राइट्स?

1994 में कैरो में हुए इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन पॉप्यूलेशन एंड डेवलपमेंट में महिलाओं के रिप्रोडक्टिव राइट्स के बारे में काफ़ी कुछ डिस्कस हुआ था. हमारे देश में ये सारे अधिकार लागू हैं. आप भी जानें, क्या हैं ये अधिकार.

– हर कपल को यह पूरा अधिकार है कि वो बिना किसी दबाव के अपनी मर्ज़ी से यह निर्णय ले सके कि वो कितने बच्चे चाहते हैं, 1, 2, 4 या फिर 1 भी नहीं.

– शादी के कितने सालों बाद बच्चे पैदा करने हैं.

– दो बच्चों के बीच कितने सालों का अंतर रखना है.

– आपको फैमिली शुरू करने के लिए ज़रूरी जानकारी मिलने का पूरा अधिकार है.

– उच्च स्तर के रिप्रोडक्टिव हेल्थ केयर की सुविधा मिलना आपका अधिकार है.

– बिना किसी भेदभाव, हिंसा और दबाव के आपको पूरी आज़ादी है कि आप बच्चों के बारे में प्लान कर सकें.

– हर महिला को उच्च स्तर की सेक्सुअल और रिप्रोडक्टिव हेल्थ केयर की सुविधा मिलनी चाहिए.

– यह आपका निर्णय होगा कि आप फैमिली प्लानिंग ऑपरेशन कब कराना चाहती हैं. उसके लिए आप पर किसी तरह का कोई दबाव नहीं बना सकता.

– आपको सेफ और वाजिब दाम पर फैमिली प्लानिंग के मेथड उपलब्ध कराए जाएं.

– आपको पूरा हक़ है कि आप जिस उम्र में चाहें, उस उम्र में शादी करें और फैमिली की शुरुआत करें.

– क्योंकि सेक्सुअल हेल्थ आपके रिप्रोडक्टिव हेल्थ से जुड़ी है, इसलिए किसी भी तरह के सेक्सुअल एब्यूज़ का आप विरोध करें. उसके ख़िलाफ़ उचित कार्रवाई करें. जानें इन सरकारी सुविधाओं के बारे में

– सरकार ने सभी सरकारी अस्पतालों में ये सभी सुविधाएं मुहैया कराई हैं, जहां महिलाएं अपने रिप्रोडक्टिव राइट्स का इस्तेमाल कर सकती हैं.

– समय-समय पर महिलाओं के लिए सरकार की तरफ़ से कई योजनाएं भी बनाई जाती हैं, ताकि मातृत्व को एक सुखद अनुभव बनाया जा सके.

– जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम के तहत सभी गर्भवती महिलाओं को सरकारी अस्पतालों में प्रेग्नेंसी से लेकर डिलीवरी, दवा, ट्रांसपोर्ट आदि सेवाएं मुफ़्त हैं.
सिज़ेरियन डिलीवरी के लिए भी कोई पैसा नहीं लिया जाएगा.

– प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत गर्भवती महिलाओं को सरकारी अस्पतालों में चेकअप आदि की सारी सुविधाएं मुफ़्त हैं.

– सभी सरकारी अस्पतालों में फैमिली प्लानिंग के सभी मेथड की जानकारी महिलाओं को दी जाती है, ताकि वो अपनी सुविधानुसार किसी एक मेथड का इस्तेमाल कर सकें.

– किलकारी मैसेजेस, एक ऑडियो मैसेज सुविधा है, जो सरकारी अस्पतालों की ओर से प्रेग्नेंट महिलाओं को भेजे जाते हैं. इसमें उनके खानपान, सेहत और गर्भ की सुरक्षा के लिए कई टिप्स बताए जाते हैं.

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 Reproductive Rights
घट रही है मैटर्नल मोर्टालिटी रेट

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक आज प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान महिलाओं की मृत्युदर में कमी आई है, पर अभी भी हर घंटे डिलीवरी के दौरान 5 महिलाओं की मृत्यु हो जाती है.

– वर्ल्ड बैंक द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, 2015 में भारत में हर 1 लाख चाइल्ड बर्थ में 174 महिलाओं की मौत हो जाती थी, जो 2010 में 215 था.

– एक अनुमान के अनुसार, हर साल चाइल्ड बर्थ के दौरान लगभग 45 हज़ार मांओं की मृत्यु हो जाती है.

– मैटर्नल और नियोनैटल मोर्टालिटी को कम करने के इरादे से सरकार प्रधानमंत्री मातृ वंदना  योजना लेकर आ रही है, ताकि उनकी मृत्यु दर को कम किया जा सके.

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट, 1971

गर्भपात का निर्णय हमारे रिप्रोडक्टिव राइट्स से जुड़ा है, इसलिए हर महिला को इसके बारे में पता होना चाहिए.

– हमारे देश में 1971 से ही एबॉर्शन लीगल है, पर आज भी बहुत-सी महिलाएं इस बात को नहीं जानतीं.

– एक अनुमान के मुताबिक क़रीब 8% मैटर्नल डेथ अनसेफ कंडीशन्स में एबॉर्शन कराने के दौरान हो जाती है.

– हर महिला को पता होना चाहिए कि कुछ विशेष हालात में आप क़ानूनन अपना गर्भपात करवा सकती हैं, जैसे-

  • भ्रूण का सही तरी़के से विकास नहीं
    हो रहा.
  • भू्रण में किसी तरह की ख़राबी आ गई.
  • बलात्कार के कारण गर्भ ठहर गया हो.
  • गर्भनिरोधक फेल हो गया.
  • भ्रूण के कारण गर्भवती मां को ख़तरा हो.
  • भ्रूण में किसी तरह की मानसिक और शारीरिक एब्नॉर्मिलिटी हो.-
  • गर्भपात किसी रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर से ही करवाएं.

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Reproductive Rights

सोच बदलने की ज़रूरत है

जस्टिस काटजू ने एक बार कहा था कि महिला सशक्तिकरण में क़ानून का रोल महज़ 20% होता है, जबकि 80% की महत्वपूर्ण भूमिका एजुकेशन सिस्टम की है, जहां लोगों की सोच को बदलकर ही इस मुकाम को हासिल किया जा सकता है.

– पुरुषों की सोच को बदलने में तो बहुत समय लगेगा, पर महिलाएं तो पहल करें. सालों से चले आ रहे दमन का नतीजा है कि उनकी सोच ही उनकी दुश्मन बन
गई है.

– उन्होंने मान लिया है कि उनके शरीर पर उनके पति का अधिकार है और जो वो कहेंगे वही होगा. जो अपने शरीर को ही अपनी प्रॉपर्टी नहीं मानती, वो भला अधिकारों के लिए संघर्ष क्या करेगी.

– महिलाओं को अपनी सोच बदलनी होगी.
आपका शरीर आपकी अपनी प्रॉपर्टी है, आपकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कोई और उसके बारे में निर्णय नहीं ले सकता.

– अनीता सिंह

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महिलाओं के लिए बेस्ट स्कूटर: क्या आप जानते हैं कैसे बने स्कूटर? (Best Scooter For Indian Women)

क्या आप जानते हैं कैसे बने स्कूटर? नहीं ना, चलिए हम आपको बताते हैं कि हमारी ज़िंदगी को आसान बनाने वाले स्कूटर कैसे बने. आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि स्कूटर का निर्माण ख़ासतौर पर लेडीज़ यानी महिलाओं के लिए किया गया था. वैसे तो स्कूटर के आविष्कार के बारे में अनेक कहानियां हैं, लेकिन स्कूटर के निर्माण से जुड़ी एक कहानी के अनुसार, स्कूटर का आविष्कार विश्व युद्ध के दौरान हुआ. विश्व युद्ध के समय पुरुष मोटर साइकिल का इस्तेमाल धड़ल्ले से कर रहे थे. युद्ध में बहुत से पुरुषों को जान से हाथ धोना पड़ा. धीरे-धीरे पुरुषों की संख्या घटने लगी. परिणामस्वरूप मजबूरी में महिलाओं को युद्ध के मैदान में उतरना पड़ा. ज़ाहिर है, उन्हें आने-जाने के लिए सवारी की ज़रूरत महसूस हुई, लेकिन महिलाओं को मोटर साइकिल चलाने में काफ़ी दिक़्क़त आ रही थी, क्योंकि मोटर साइकिल चलाने के लिए उन्हें दोनों पैरों को फैलाना पड़ता था. महिलाओं की असुविधा को ध्यान में रखकर स्कूटर का निर्माण किया गया, ताकि वे आसानी से युद्ध में भाग ले सकें.

Scooter For Woman

 

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महिलाओं के लिए बेस्ट स्कूटर
एक रिपोर्ट के अनुसार भारत की 14 प्रतिशत महिलाएं टू व्हीलर चलाना जानती हैं और पिछले 10 सालों में टू व्हीलर चलाने वाली महिलाओं में 50 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है. इसकी सबसे बड़ी वजह है भारत में अब कामकाजी महिलाओं की संख्या का तेज़ी से बढ़ना. आज की कामकाजी महिलाएं ऑफिस जाने से लेकर बच्चों को स्कूल लाने-ले जाने, मार्केट से समान लाने आदि काम के लिए पति की बाइक या कार का इंतज़ार किए बिना ख़ुद स्कूटी चलाना पसंद कर रही हैं. महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और उनके काम समय पर पूरा करने में उनकी स्कूटी का बहुत बड़ा योगदान है. स्कूटी के लिए महिलाओं का क्रेज़ देखते हुए अब बाइक कंपनियां महिलाओं की पसंद और सहूलियत को देखते हुए स्कूटी तैयार कर रही हैं.

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इस समय मार्केट में ख़ास महिलाओं को ध्यान में रखते हुए जो बाइक डिज़ाइन की गई हैं, उनमें से महिलाओं की पसंदीदा बाइक हॉन्डा एविएटर, होंडा एक्टिवा 125, होंडा डियो, महिंद्रा गस्टो, सुज़ुकी एक्सेस 125, टीवीएस ज्यूपिटर, टीवीएस स्कूटी जेस्ट 110, हीरो प्लेज़र, स्कूटी पेप प्लस आदि हैं.

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हर वर्किंग वुमन को पता होना चाहिए ये क़ानूनी अधिकार (Every Working Woman Must Know These Right)

 

Working Woman Rights

 

आज शायद ही ऐसी कोई कंपनी, कारखाना, दफ़्तर या फिर दुकान हो, जहां महिलाएं काम न करती हों. आर्थिक मजबूरी कहें या आर्थिक आत्मनिर्भरता- महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं, पर फिर भी सेक्सुअल हरासमेंट, कम सैलरी, मैटर्निटी लीव न देना या फिर देर रात तक काम करवाने जैसी कई द़िक्क़तों से महिलाओं को दो-चार होना पड़ता है. आपके साथ ऐसा न हो, इसलिए आपको भी पता होने चाहिए वर्किंग वुमन्स के ये अधिकार.

मैटर्निटी बेनीफिट एक्ट में मिले अधिकार

मैटर्निटी एक्ट के बावजूद आज भी बहुत-सी महिलाएं डिलीवरी के बाद नौकरी पर वापस नहीं लौट पातीं. कारण डिलीवरी के बाद बच्चे की देखभाल के लिए क्रेच की सुविधा न होना है, जबकि द मैटर्निटी बेनीफिट अमेंडमेंट एक्ट 2017 में क्रेच की सुविधा पर ख़ास ज़ोर दिया गया है, ताकि महिलाएं नौकरी छोड़ने पर मजबूर न हों.

पेशे से अध्यापिका विभिता अभिलाष ने अपना अनुभव बताते हुए कहा कि जब वो पहली बार मां बननेवाली थीं, तब डिलीवरी के मात्र एक महीने पहले उन्हें अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी, क्योंकि उनके स्कूल ने उनके बच्चे के लिए क्रेच की कोई सुविधा मुहैया नहीं कराई थी. विभिता की ही तरह बहुत-सी महिलाएं डिलीवरी से पहले ही नौकरी छोड़ देती हैं, ताकि बच्चे की देखभाल अच्छी तरह कर सकें. अगर ऐसा ही होता रहा, तो देश की आधी आबादी को आर्थिक आत्मनिर्भरता देने का सपना अधूरा ही रह जाएगा. वर्किंग वुमन होने के नाते आपको अपने मैटर्निटी बेनीफिट्स के बारे में पता होना चाहिए.

–     आपको यह जानकर हैरानी होगी कि पूरी दुनिया में स्वीडन एक ऐसा देश है, जहां सबसे ज़्यादा मैटर्निटी लीव मिलती है. यह लीव 56 हफ़्ते की है यानी 12 महीने 3 हफ़्ते और 5 दिन. हमारे देश में भी महिलाओं को 26 हफ़्तों की मैटर्निटी लीव मिलती है. आइए जानें, इस लीव से जुड़े सभी नियम-क़ायदे.

–     हर उस कंपनी, फैक्टरी, प्लांटेशन, संस्थान या दुकान में जहां 10 या 10 से ज़्यादा लोग काम करते हैं, वहां की महिलाओं को मैटर्निटी बेनीफिट एक्ट का फ़ायदा मिलेगा.

–     अगर किसी महिला ने पिछले 12 महीनों में उस कंपनी या संस्थान में बतौर कर्मचारी 80 दिनों तक काम किया है, तो उसे मैटर्निटी लीव का फ़ायदा मिलेगा. इसका कैलकुलेशन आपकी डिलीवरी डेट के मुताबिक़ किया जाता है. आपकी डिलीवरी डेट से 12 महीने पहले तक का आपका रिकॉर्ड उस कंपनी में होना चाहिए.

–     प्रेग्नेंसी के दौरान कोई भी कंपनी या संस्थान किसी भी महिला को नौकरी से निकाल नहीं सकता. अगर आपकी प्रेग्नेंसी की वजह से आप पर इस्तीफ़ा देने का दबाव बनाया जा रहा है, तो तुरंत अपने नज़दीकी लेबर ऑफिस से संपर्क करें. लेबर ऑफिसर को मिलकर अपने मेडिकल सर्टिफिकेट और अपॉइंटमेंट लेटर की कॉपी दें.

–     जहां पहले महिलाओं को डिलीवरी के 6 हफ़्ते पहले से छुट्टी मिल सकती थी, वहीं अब वो 8 हफ़्ते पहले मैटर्निटी लीव पर जा सकती हैं.

–    हालांकि तीसरे बच्चे के लिए आपको स़िर्फ 12 हफ़्तों की लीव मिलेगी और प्रीनैटल लीव भी आप 6 हफ़्ते पहले से ही ले सकेंगी.

–     अगर आप 3 साल से छोटे बच्चे को गोद ले रही हैं, तो भी आपको 12 हफ़्तों की मैटर्निटी लीव मिलेगी.

–     26 हफ़्ते की लीव के बाद अगर महिला वर्क फ्रॉम होम करना चाहती है, तो वह अपनी कंपनी से बात करके ऐसा कर सकती है. यहां आपका कॉन्ट्रैक्ट महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.

–     मैटर्निटी बेनीफिट एक्ट में यह भी अनिवार्य किया गया है कि अगर किसी कंपनी या संस्थान में 50 या 50 से अधिक कर्मचारी हैं, तो कंपनी को ऑफिस के नज़दीक ही क्रेच की सुविधा भी देनी होगी, जहां मां को 4 बार बच्चे को देखने जाने की सुविधा मिलेगी.

–     बच्चे के 15 महीने होने तक मां को दूध पिलाने के लिए ऑफिस में 2 ब्रेक भी मिलेगा.

–     अगर दुर्भाग्यवश किसी महिला का गर्भपात हो जाता है, तो उसे 6 हफ़्तों की लीव मिलेगी, जो उसके गर्भपातवाले दिन से शुरू होगी.

–     अगर प्रेग्नेंसी के कारण या डिलीवरी के बाद महिला को कोई हेल्थ प्रॉब्लम हो जाती है या फिर उसकी प्रीमैच्योर डिलीवरी होती है, तो उसे 1 महीने की छुट्टी मिलेगी.

–     सरोगेट मदर्स और कमीशनिंग मदर्स (जो सरोगेसी करवा रही हैं) को भी 12 हफ़्तों की मैटर्निटी लीव का अधिकार मिला है. यह लीव उस दिन से शुरू होगी, जिस दिन उन्हें बच्चा सौंप दिया जाएगा.

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Working Woman Rights

वर्कप्लेस पर सेक्सुअल हरासमेंट से सुरक्षा

इंडियन नेशनल बार एसोसिएशन द्वारा किए गए सर्वे में इस बात का खुलासा हुआ है कि सेक्सुअल हरासमेंट ऑफ वुमन ऐट वर्कप्लेस एक्ट, 2013 के बावजूद आज भी सेक्सुअल हरासमेंट हर इंडस्ट्री, हर सेक्टर में जारी है. सर्वे में यह बात सामने आई कि आज भी 38% महिलाएं इसका शिकार होती हैं, जिसमें सबसे ज़्यादा चौंकानेवाली बात यह है कि उनमें से 89.9% महिलाओं ने कभी इसकी शिकायत ही नहीं की. कहीं डर, कहीं संकोच, तो कहीं आत्मविश्‍वास की कमी के कारण वो अपने अधिकारों के लिए नहीं लड़ीं, लेकिन आप अपने साथ ऐसा न होने दें. अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनें और जानें अपने अधिकार.

–     किसी भी कंपनी/संस्थान में अगर 10 या 10 से ज़्यादा कर्मचारी कार्यरत हैं, तो उनके लिए इंटरनल कंप्लेंट कमिटी (आईसीसी) बनाना अनिवार्य है.

–     चाहे आप पार्ट टाइम, फुल टाइम या बतौर इंटर्न ही क्यों न किसी कंपनी या संस्थान में कार्यरत हैं, आपको सेक्सुअल हरासमेंट ऑफ वुमन ऐट वर्कप्लेस एक्ट, 2013 के तहत सुरक्षित माहौल मिलना आपका अधिकार है.

–    स़िर्फ कंपनी या ऑफिस ही नहीं, बल्कि किसी ग़ैरसरकारी संस्थान, फर्म या घर/आवास में भी काम करनेवाली महिलाओं को इस एक्ट के तहत सुरक्षा का अधिकार मिला है यानी आप कहीं भी काम करती हों, कुछ भी काम करती हों, कोई आपका शारीरिक शोषण नहीं कर सकता.

–     अगर आपको लगता है कि कोई शब्दों के ज़रिए या सांकेतिक भाषा में आपसे सेक्सुअल फेवर की मांग कर रहा है, तो आप उसकी लिखित शिकायत ऑफिस की आईसीसी में तुरंत करें.

–     हालांकि आपको पूरा अधिकार है कि आप घटना के 3 महीने के भीतर कभी भी शिकायत दर्ज कर सकती हैं, पर जितनी जल्दी शिकायत करेंगी, उतना ही अच्छा है.

–     सरकारी नौकरी करनेवाली महिलाएं जांच के दौरान अगर ऑफिस नहीं जाना चाहतीं, तो उन्हें पूरा अधिकार है कि वे तीन महीने की पेड लीव ले सकती हैं. यह छुट्टी उन्हें सालाना मिलनेवाली छुट्टी से अलग होगी.

–     आप अपने एंप्लॉयर से कहकर कंपनी के किसी और ब्रांच में अपना या उस व्यक्ति का ट्रांसफर करा सकती हैं.

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Working Womans

समान वेतन का अधिकार

ऐसा क्यों होता है कि एक ही ऑफिस में एक ही पद पर काम करनेवाले महिला-पुरुष कर्मचारियों को वेतन के मामले में अलग-अलग नज़रिए से देखा जाता है? महिलाओं को ख़ुद को साबित करने के लिए दुगुनी मेहनत करनी पड़ती है, पर बावजूद इसके जब उन्हें प्रमोशन मिलता है, तो वही पुरुष कलीग महिला के चरित्र पर उंगली उठाने से बाज़ नहीं आते. पुरुषों को प्रमोशन मिले, तो उनकी मेहनत और महिलाओं को मिले, तो महिला होने का फ़ायदा, कैसी विचित्र मानसिकता है हमारे समाज की.

–     ऐसा नहीं है कि यह स़िर्फ हमारे देश की समस्या है, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी महिलाएं इसका विरोध कर रही हैं यानी दुनिया के दूसरे देशों में भी वेतन के मामले में लिंग के आधार पर पक्षपात किया जाता है.

–     हाल ही में चीन की एक इंटरनेशनल मीडिया हाउस की एडिटर ने स़िर्फ इसलिए अपनी नौकरी छोड़ दी, क्योंकि उनके ही स्तर के पुरुष कर्मचारी को उनसे अधिक वेतन दिया जा रहा था.

–     यह ऐसा एक मामला नहीं है, समय-समय पर आपको ऐसी कई ख़बरें देखने-सुनने को मिलती रहती हैं, जब ‘इक्वल पे फॉर इक्वल वर्क’ बस मज़ाक बनकर रह जाता है.

–     हमारे देश में भी पुरुषों और महिलाओं को समान वेतन के लिए ‘इक्वल पे फॉर इक्वल वर्क’ का अधिकार है, जो इक्वल रेम्यूनरेशन एक्ट, 1976 में दिया गया है.

–     एक्ट के मुताबिक़, अगर महिला और पुरुष एक जैसा काम कर रहे हैं, तो एम्प्लॉयर को उन्हें समान वेतन देना होगा.

–     नौकरी पर रखते समय भी एम्प्लॉयर महिला और पुरुष में लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता.

–     दरअसल, बहुत से एम्प्लॉयर जानबूझकर पुरुषों को नौकरी देते हैं, ताकि उन्हें मैटर्निटी लीव न देनी पड़े.

–     हालांकि इसके लिए कई महिलाओं ने लड़ाई लड़ी और जीती भी हैं. अगर आपको भी लगता है, आपके ऑफिस में आप ही के समान काम करनेवाले पुरुष को आपसे अधिक तनख़्वाह मिल रही है, तो आप भी अपने अधिकार के लिए आवाज़ उठा सकती हैं.

–     पहले ऑफिस में मामला सुलझाने की कोशिश करें, अगर ऐसा न हो, तो कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने से हिचकिचाएं नहीं.

काम की अवधि/समय

–     फैक्टरीज़ एक्ट के मुताबिक़ किसी भी फैक्टरी में रात 7 बजे से सुबह 6 बजे तक महिलाओं का काम करना वर्जित है. लेकिन कमर्शियल संस्थान, जैसे- आईटी कंपनीज़, होटेल्स, मीडिया हाउस आदि के लिए इसमें छूट मिली है, जिसे रात 10 बजे से लेकर सुबह 5 बजे तक के लिए बढ़ा दिया गया है.

–     किसी भी महिला के लिए वर्किंग आवर्स 9 घंटे से ज़्यादा नहीं हो सकते यानी हफ़्ते में 48 घंटे से ज़्यादा आपसे काम नहीं कराया जा सकता. अगर इससे ज़्यादा काम आपको दिया जा रहा है, तो आपको ओवरटाइम के हिसाब से पैसे मिलने चाहिए.

–     किसी भी महिला कर्मचारी से महीने में 15 दिन से ज़्यादा नाइट शिफ्ट नहीं कराई जा सकती.

–     रात 8.30 बजे से सुबह 6 बजे तक महिला कर्मचारी को कंपनी की तरफ़ से ट्रांसपोर्ट आदि की सुविधा मिलनी चाहिए.

–     साप्ताहिक छुट्टी के अलावा कुछ सालाना छुट्टियां भी मिलेंगी, जिन्हें आप अपनी सहूलियत के अनुसार ले सकती हैं.

–     अगर कोई कंपनी रात में देर तक महिला कर्मचारियों से काम करवाना चाहती है, तो उन्हें सिक्योरिटी से लेकर तमाम सुविधाएं देनी पड़ेंगी.

कुछ और अधिकार

–     सभी महिलाओं को वर्कप्लेस पर साफ़-सुथरा माहौल, पीने का साफ़ पानी, सही वेंटिलेशन, लाइटिंग की सुविधा सही तरी़के  से मिलनी चाहिए.

–     अगर कोई महिला ओवरटाइम करती है, तो उसे उतने घंटों की दुगुनी सैलेरी मिलेगी.

–     जॉब जॉइन करने से पहले आपको अपॉइंटमेंट लेटर मिलना चाहिए, जिसमें सभी नियम-शर्ते, सैलेरी शीट सब  साफ़-साफ़ लिखे हों.

–     किसी भी महिला कर्मचारी को ग्रैच्युटी और प्रॉविडेंट फंड की सुविधा से वंचित नहीं किया जा सकता.

–     एम्प्लॉइज स्टेट इंश्योरेंस एक्ट के तहत सभी कर्मचारियों के हेल्थ को कवर किया जाता है. ईएसआई के अलावा कंपनी सभी कर्मचारियों का हेल्थ इंश्योरेंस भी करवाती है, ताकि किसी मेडिकल इमर्जेंसी में उन्हें आर्थिक मदद मिल सके.

– अनीता सिंह

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महिलाओं को क्यों चाहिए मी-टाइम? (Why Women Need Me-Time?)

Women, Time

आज की स्मार्ट और समझदार महिलाएं घर-परिवार-करियर की तमाम ज़िम्मेदारियां निभाते हुए अपने मी टाइम को भी एंजॉय कर रही हैं. जी हां, महिलाएं बदल रही हैं और उनमें आए इस बदलाव को उनका परिवार और समाज भी स्वीकारने लगा है. और सबसे ख़ास बात, इस बदलाव से महिलाओं की ज़िंदगी और भी ख़ूबसूरत हो गई है. महिलाओं के लिए क्यों और कितना ज़रूरी है मी-टाइम? आइए, जानते हैं.

Women, Time

ये बात तो हम सभी जानते हैं कि यदि आप ख़ुद ख़ुश नहीं हैं तो आप दूसरों को कभी ख़ुश नहीं रख सकते, इसलिए सबसे पहले आपका ख़ुश होना ज़रूरी है. आज की स्मार्ट और सुलझी हुई महिलाएं ये बात अच्छी तरह जानती हैं इसलिए वो घर-परिवार, करियर की तमाम ज़िम्मेदारियां निभाते हुए अपने लिए अलग से व़क्त निकालती हैं और अपने मी-टाइम को पूरी तरह एंजॉय करती हैं. ये टाइम स़िर्फ उनका होता है, जिसे वो अपनी फ्रेंड्स के साथ बिताना पसंद करती हैं.

महिलाओं में मी-टाइम कोई नई बात नहीं
साइकोलॉजिस्ट माधवी सेठ कहती हैं, “महिलाओं में मी-टाइम का चलन कोई नई बात नहीं है. बहुत पहले से ही, जब महिलाओं को बहुत एक्सपोज़र नहीं मिला था, तब भी उनके मी टाइम को ध्यान में रखते हुए उन्हें पीरियड्स के दौरान 5 दिनों का और बच्चे के जन्म के बाद 40 दिनों का मी टाइम दिया जाता था. इसी तरह साल में 2-3 बार त्योहार या रीति-रिवाज़ के नाम पर महिलाओं को उनके मायके भेज दिया जाता था, ताकि वो वहां पर अपना मी टाइम एंजॉय कर सकें. मोहल्ले की तमाम महिलाओं का इकट्ठा होकर गप्पे लड़ाना या गॉसिप करना भी उनका मी-टाइम ही होता था. पीरियड्स के दौरान महिलाएं अपने मी टाइम को अपनी इच्छानुसार बीताती थीं. इसी तरह जब महिलाएं अपने मायके जाती थीं, तो मायके वाले इस बात का ख़ास ध्यान रखते थे कि वो अपने इस टाइम को पूरी तरह एंजॉय कर सकें. मायके जाकर महिलाएं अपनी सहेलियों, भाभी, कज़िन्स आदि के साथ क्वालिटी टाइम बिताती थीं और रिफ्रेश होकर ससुराल लौटती थीं.”

करियर वुमन के लिए ज़्यादा ज़रूरी है मी-टाइम
जब तक महिलाओं की दुनिया घर की चारदीवारी तक सिमटी थी, तब तक तो उन्हें अपनी ननद, भाभी, पड़ोसन आदि के साथ मी टाइम बिताने का मौक़ा मिल जाता था, दिक्कत तब शुरू हुई जब महिलाओं ने घर से बाहर क़दम रखा और घर-बाहर दोनों जगहों की ज़िमेदारियां संभालनी शुरू की. धीरेधीरे महिलाओं को करियर बनाने की आज़ादी तो मिलने लगी, लेकिन उनकी घर की ज़िममेदारियों का बोझ कम नहीं हुआ. परिवार के लोगों को लगने लगा कि बहू को नौकरी पर भेजकर उन्होंने उस पर एहसान किया है इसलिए उसे करियर के साथ-साथ घर की ज़िममेदारियां भी पूरी तरह निभानी चाहिए. इसका नतीजा ये हुआ कि करियर वुमन की आर्थिक स्थिति तो सुधरने लगी, लेकिन उसका मी-टाइम छिन गया. करियर वुमन की ज़िंदगी घड़ी की सूइयों की नोक पर घूमने लगी. कॉलेज प्रोफेसर सुमन सिंह कहती हैं, “मुझे तो लगता है करियर वुमन होना किसी अभिषाप से कम नहीं. हमारी अपनी कोई ज़िंदगी ही नहीं होती. महिलाओं ने नौकरी करनी क्या शुरू की परिवार के लोगों ने उन्हें सुपर वुमन बना दिया. घर के सारे काम के अलावा बच्चों की पढ़ाई, घर के सारे बिल, बैंक के काम… धीरे-धीरे मर्दों ने अपने सारे काम महिलाओं की ओर सरका दिए. कभी-कभी तो लगता है कि हमसे सुखी वो महिलाएं थीं, जिन्हें घर के चूल्हे-चौके के अलावा और किसी काम से कोई मतलब नहीं था. महिलाओं के काम करते ही पुरुष जैसे रिलैक्स हो गए, अब उन्हें लगता है कि उनकी बीवी सबकुछ संभाल लेगी, लेकिन बीवी को कौन संभालेगा, इसकी किसी को परवाह नहीं रहती.”

…क्योंकि बदलाव ज़रूरी था
साइकोलॉजिस्ट माधवी सेठ के अनुसार, “महिलाओं ने यदि मी-टाइम की डिमांड करनी शुरू की, तो इसमें कुछ ग़लत नहीं है. अति किसी भी चीज़ की अच्छी नहीं होती. महिलाएं जब घर और करियर दोनों जगहों पर अपनी क्षमता से ज़्यादा काम करती हैं, तो इससे उनकी मेंटल और फिज़िकल हेल्थ बिगड़ने लगती है, जो न उनके लिए सही है और न ही उनके परिवार के लिए. लंबे समय तक घर-बाहर की दोहरी ज़िममेदारियां निभाते हुए महिलाओं को ये महसूस होने लगा कि उनके साथ ज़्यादती हो रही है, इसीलिए उन्होंने मी-टाइम की डिमांड करनी शुरू कर दी. आप इसे महिलाओं का मी-टाइम और शी-टाइम भी कह सकते हैं, क्योंकि अपने इस टाइम को वो परिवार के साथ नहीं, बल्कि अपनी फ्रेंड्स के साथ बिताना पसंद करती हैं. जहां न उन्हें कोई रोकने-टोकने वाला हो और न ही उन पर किसी तरह की कोई ज़िम्मेदारी हो.”

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इसलिए ज़रूरी है मी टाइम-शी टाइम
दिन-रात मेहनत करते हुए जब कुछ समय बेफिक्रे होकर अपने फ्रेंड्स के साथ बिताने का मौक़ा मिलता है, तो आप एक बार फिर से चार्जअप हो जाते हैं. इससे आपको नई ऊर्जा मिलती है और आप अपना काम और तमाम ज़िम्मेदारियां ख़ुशी-ख़ुशी पूरी कर लेते हैं. महिलाएं जब फ्रेंड्स के साथ शॉपिंग, डिनर या हॉलिडेज़ पर जाती हैं, तो उस समय उन पर किसी तरह का बोझ नहीं होता, लेकिन जब वो परिवार के साथ घूमने जाती हैं, तो उनका पूरा समय परिवार के सभी सदस्यों की सेवा-टहल में ही गुज़र जाता है और वो अपने हॉलिडेज़ को एंजॉय नहीं कर पातीं. हॉलिडेज़ पर भी परिवार के सदस्य यही उम्मीद करते हैं कि घर की महिलाएं वहां भी उनकी ज़रूरत की हर चीज़ उनके हाथ में दे. लेकिन महिलाएं जब अपनी फ्रेंड्स के साथ घूमने जाती हैं, तो वो पूरी तरह आज़ाद होती हैं और अपने हॉलिडेज़ को ज़्यादा एंजॉय कर पाती हैं.

मिल रहा है परिवार का सपोर्ट
कुछ समय पहले तक जब महिलाएं स़िर्फ घर और करियर के बीच ही उलझी रहती थीं, तो उनके काम के बोझ का असर उनकी सेहत और व्यवहार पर भी पड़ने लगा, जिससे कपल्स के बीच झगड़े होना, परिवार में वाद-विवाद की स्थिति बढ़ने लगी. ऐसे में सुलझे हुए परिवार के लोगों को भी ये समझ आने लगा कि उनके घर की महिलाएं ख़ुश नहीं हैं और ऐसा होना परिवार के लिए ठीक नहीं है. ऐसे में घर की महिलाओं ने जब मी-टाइम की डिमांड करनी शुरू की, तो परिवार के लोगों को भी उनकी मांग सही लगी और उन्होंने ख़ुशी-ख़ुशी महिलाओं को अपने इस स्पेशल टाइम को एंजॉय करने की इजाज़त देनी शुरू कर दी. बस, यहीं से एक बार फिर शुरुआत हुई महिलाओं के मी-टाइम की. अब तो महिलाएं बकायदा वीकेंड पर या महीने में एक बार अपनी फ्रेंड्स के साथ मी टाइम ज़रूर बीताती हैं. साथ ही अब महिलाएं एक साथ हॉलिडेज़ पर जाने लगी हैं और उनके परिवार भी उन्हें ख़ुशी-ख़ुशी घूमने जाने देते हैं. महिलाओं में आया ये बदलाव उनकी फिज़िकल-मेंटल हेल्थ के लिए बहुत अच्छा है. रिटायर्ड बैंक ऑफिसर माधवी शर्मा ने बताया, “हमारे ज़माने में इतना ही काफ़ी था कि ससुराल वाले हमें नौकरी करने की इजाज़त दे रहे हैं. मी-टाइम के बारे में सोचने की तो कभी हिम्मत ही नहीं हुई. किसी भी महिला के लिए घर और करियर दोनों एक साथ संभलना आसान नहीं होता. सबकी इच्छाएं पूरी करते-करते महिलाएं अपने बारे में सोचना ही भूल जाती हैं. मैंने झेला है इस तकलीफ़ को इसलिए मैं अपनी बहू के साथ ऐसा नहीं होने देना चाहती. वो दिन-रात हम सबके लिए इतनी मेहनत करती है, मेरे बेटे के जितना ही कमाती भी है, तो क्या ये हमारी ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि हम भी उसकी ख़ुशी के बारे में सोचें.”

ट्रैवल कंपनियां देती हैं स्पेशल पैकेज
महिलाओं में बढ़ते मी-टाइम और शी-टाइम को देखते हुए अब ट्रैवल कंपनियां भी लेडीज़ स्पेशल ट्रैवल पैकेज देने लगी हैं, जिसमें महिलाओं की सेफ्टी और कंफर्ट का ख़ास ध्यान रखा जाता है. महिलाएं अपनी फ्रेंड्स के साथ इन ट्रैवल पैकेज का जमकर लुत्फ़ उठा रही हैं और अपने मी-टाइम को और भी ख़ास बना रही हैं. आरती अपनी चार सहेलियों के साथ हर साल एक हफ्ते के लिए घूमने का प्लान बनाती हैं और फ्रेंडस के साथ ख़ूब एंजॉय करती हैं. आरती ने बताया, “हम पांचों सहेलियां वर्किंग हैं और दिन-रात अपने काम में बहुत बिज़ी रहती हैं, लेकिन हम सब महीने में एक दिन ज़रूर मिलते हैं और उस दिन हम स़िर्फ अपने मन की करते हैं. वो एक दिन हम सबके लिए स्ट्रेस बस्टर का काम करता है और महीनेभर मेहनत करने की ऊर्जा देता है. हम सब साल में एक बार हफ्तेभर के लिए हॉलिडेज़ पर भी जाते हैं और ये हमारा गोल्डन टाइम होता है. परिवार-ऑफिस की सभी झंझटों से दूर इस एक हफ्ते को हम जी भर के जी लेते हैं. मुझे लगता है महिलाओं का मी टाइम उनकी ख़ुशी से ज़्यादा उनके मेंटल और फिज़िकल हेल्थ के लिए ज़रूरी है.

गर्लफ्रेंड के साथ घूमना इसलिए है फ़ायदेमंद
साइकोलॉजिस्ट माधवी सेठ कहती हैं, “जब एक लड़का और लड़की साथ घूमने जाते हैं, तो वो घूमना एंजॉय करने के बजाय एक-दूसरे को इंप्रेस करने में लगे रहते हैं, जिससे वो खुलकर नहीं रह पाते, लेकिन जब स़िर्फ लड़कियों या स़िर्फ लड़कों का ग्रुप कहीं घूमने जाता है, तो उनके बीच कोई फॉर्मेलिटीज़ नहीं होतीं, जिससे वो अपनी ट्रीप को पूरी तरह एंजॉय कर पाते हैं. यही वजह है कि मैरिड कपल भी एक-दूसरे के बजाय अपने फ्रेंड्स ग्रुप के साथ घूमने जाना ज़्यादा पसंद करते हैं और इसमें कुछ ग़लत नहीं है.”

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ये हैं महिलाओं में बढ़ते मी टाइम की ख़ास वजहें
* अपनी आज़ादी को महसूस करने और ख़ुशी के पल जुटाने की चाह.
* कुछ समय के लिए घर-परिवार, करियर की तमाम ज़िम्मेदारियों से ख़ुद को अलग करने की चाह.
* अपना मेंटल स्ट्रेस कम करने के लिए महिलाएं चाहती हैं मी टाइम.
* वर्किंग वुमन को कई बार काम के कमिटमेंट के कारण बच्चों की छुट्टियों में भी मायके जाने का मौक़ा नहीं मिलता इसलिए वो फ्री टाइम में फ्रेंड्स के साथ घूमना पसंद करती हैं.
* वो अपनी आर्थिक आज़ादी को महसूस करना चाहती है और ऐसा वो अपने मी टाइम में ही कर पाती है.

– कमला बडोनी

CWG 2018: वुमन पावर- एयर पिस्टल में मनु ने जीता गोल्ड, हीना को सिल्वर (CWG 2018: Women Power- Manu Bhaker Shoots Gold, Heena Sidhu Silver)

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क्यों एनीमिक होती हैं भारतीय महिलाएं? (Anemia: A Common Problem Among Indian Women)

Anemia, Common Problem, Indian Women

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यूं तो हमारे देश में आर्थिक से लेकर सामाजिक सुधार हो रहे हैं, लेकिन ऐसे में जब इस तरह की ख़बरें सामने आती हैं, तो रुककर सोचने की ज़रूरत पड़ जाती है. यूं तो हमारे देश में आर्थिक से लेकर सामाजिक सुधार हो रहे हैं, लेकिन ऐसे में जब इस तरह की ख़बरें सामने आती हैं, तो रुककर सोचने की ज़रूरत पड़ जाती है. हाल ही में एक रिपोर्ट सामने आई है कि भारत में सबसे अधिक एनीमिक महिलाएं हैं. द ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट के इस सर्वे के मुताबिक़ 15 से लेकर 49 साल तक की 51% भारतीय महिलाएं एनीमिक हैं. वे आयरन डेफिशियंसी झेल रही हैं, वे पोषक आहार नहीं ले रहीं… कुल मिलाकर वे स्वस्थ नहीं हैं. यह 2017 की रिपोर्ट है, जबकि वर्ष 2016 तक 48% महिलाएं एनीमिक थीं यानी यह आंकड़ा अब बढ़ गया है. सबसे चिंताजनक बात यह है कि 15-49 साल की उम्र यानी युवावस्था, रिप्रोडक्शन की एज में इस तरह का कुपोषण, जिसका सीधा असर आनेवाली पीढ़ी पर पड़ता नज़र आएगा. यदि मां स्वस्थ नहीं, तो बच्चा भी स्वस्थ नहीं होगा.

क्या वजह है?

एक्सपर्ट्स की मानें, तो मात्र कुपोषण ही सबसे बड़ी या एकमात्र वजह नहीं है, बल्कि स्वच्छता की कमी भी एक बड़ा कारण है, क्योंकि पूअर हाइजीन पोषण को शरीर में एब्ज़ॉर्ब नहीं होने देती. इसके अलावा जागरूकता की कमी, अशिक्षा और परिवार के सामने ख़ुद को कम महत्व देना यानी पहले परिवार की ख़ुशी, उनका खाना-पीना, ख़ुद के स्वास्थ्य को महत्व नहीं देना भी प्रमुख कारण हैं.

सामाजिक व पारिवारिक ढांचा

  •  हमारा समाज आज भी इसी सोच को महत्व देता है कि महिलाओं का परम धर्म है पति, बच्चे व परिवार का ख़्याल रखना.
  •  इस पूरी सोच में, इस पूरे ढांचे में कहीं भी इस बात या इस ख़्याल तक की जगह नहीं रहती कि महिलाओं को अपने बारे में भी सोचना है
  •  उनका स्वास्थ्य भी ज़रूरी है, यह उन्हें सिखाया ही नहीं जाता.
  • यदि वे अपने बारे में सोचें भी तो इसे स्वार्थ से जोड़ दिया जाता है. पति व बच्चों से पहले खाना खा लेनेवाली महिलाओं को ग़ैरज़िम्मेदार व स्वार्थी करार दिया जाता है.
  • बचपन से ही उन्हें यह सीख दी जाती है कि तुम्हारा फ़र्ज़ है परिवार की देख-रेख करना. इस सीख में अपनी देख-रेख या अपना ख़्याल रखने को कहीं भी तवज्जो नहीं दी जाती.
  • यही वजह है कि उनकी अपनी सोच भी इसी तरह की हो जाती है. अगर वे ग़लती से भी अपने बारे में सोच लें, तो उन्हें अपराधबोध होने लगता है.
  • शादी के बाद पति को भी वे बच्चे की तरह ही पालती हैं. उसकी छोटी-छोटी ज़रूरतों का ख़्याल रखने से लेकर हर बात मानना उसका पत्नी धर्म बन जाता है. लेकिन इस बीच वो जाने-अनजाने ख़ुद के स्वास्थ्य को सबसे अधिक नज़रअंदाज़ करती है.
  • वो पुरुष है, तो उसके स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी पत्नी की होती है. उसे पोषक आहार, मनपसंद खाना, उसकी नींद पूरी होना… इस तरह की बातों का ख़्याल रखना ही पत्नी का पहला धर्म है.
  • ऐसे में यदि पत्नी बीमार भी हो जाए, तो उसे इस बात की फ़िक्र नहीं रहती कि वो अस्वस्थ है, बल्कि उसे यह लगता है कि पूरा परिवार उसकी बीमारी के कारण परेशान हो रहा है. न कोई ढंग से खा-पी रहा है, न कोई घर का काम ठीक से हो रहा है.
  • पत्नी यदि अपने विषय में कुछ कहे भी और अगर वो हाउसवाइफ है तब तो उसे अक्सर यह सुनने को मिलता है कि आख़िर सारा दिन घर में पड़ी रहती हो, तुम्हारे पास काम ही क्या है?
  • कुल मिलाकर स्त्री के स्वास्थ्य के महत्व को हमारे यहां सबसे कम महत्व दिया जाता है या फिर कहें कि महत्व दिया ही नहीं जाता.

जागरूकता की कमी और अशिक्षा

  • जागरूकता की कमी की सबसे बड़ी वजह यही है कि बचपन से ही उनका पालन-पोषण इसी तरह से किया जाता है कि महिलाएं ख़ुद भी अपने स्वास्थ्य को महत्व नहीं देतीं.
  • उन्हें यही लगता है कि परिवार व पति की सेवा ही सबसे ज़रूरी है और हां, यदि वे स्वयं गर्भवती हों, तो उन्हें अपने स्वास्थ्य का ख़्याल रखना है, क्योंकि यह आनेवाले बच्चे की सेहत से जुड़ा है.
  • लेकिन यदि वे पहले से ही अस्वस्थ हैं, तो ज़ाहिर है मात्र गर्भावस्था के दौरान अपना ख़्याल रखने से भी सब कुछ ठीक नहीं होगा.
  • गर्भावस्था के दौरान भी आयरन टैबलेट्स या बैलेंस्ड डायट वो नहीं लेतीं.
  • अधिकांश महिलाओं को पोषक आहार के संबंध में जानकारी ही नहीं है और न ही वे इसे महत्व देती हैं.
  • हमेशा से पति व बच्चों की लंबी उम्र व सलामती के लिए उन्हें व्रत-उपवास के बहाने भूखा रहने की सीख दी जाती है.
  • जो महिलाएं शाकाहारी हैं, उन्हें किस तरह से अपने डायट को बैलेंस करना है, इसकी जानकारी भी नहीं होती.
  • बहुत ज़रूरी है कि महिलाओं को जागरूक किया जाए, अपने प्रति संवेदनशील बनाया जाए.
  • इसी तरह से अशिक्षा भी बहुत बड़ी वजह है, क्योंकि कम पढ़ी-लिखी महिलाएं तो जागरूकता से लेकर हाइजीन तक के महत्व को नहीं समझ पातीं.
  • साफ़-सफ़ाई की कमी किस तरह से लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, यह समझना बेहद ज़रूरी है. लोग कई गंभीर रोगों के शिकार हो सकते हैं, जिससे उनके शरीर में पोषक तत्व ग्रहण व शोषित करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है.
  • भोजन को किस तरह से संतुलित व पोषक बनाया जाए, इसकी जानकारी भी अधिकांश लोगों को नहीं होती.

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ग़रीबी भी है एक बड़ी वजह

  • आयरन की कमी के चलते होनेवाले एनीमिया की सबसे बड़ी वजह ग़रीबी व कुपोषण है.
  • ग़रीबी के चलते लोग ठीक से खाने का जुगाड़ ही नहीं कर पाते, तो पोषक आहार दूर की बात है.
  • वहीं उन्हें इन तमाम चीज़ों की जानकारी व महत्व के विषय में भी अंदाज़ा नहीं होता.क्या किया जा सकता है?
  • सरकार की ओर से प्रयास ज़रूर किए जा रहे हैं, लेकिन वो नाकाफ़ी हैं.
  • द ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट में इस ओर भी इशारा किया गया है कि बेहतर होगा भारत ग़रीब व आर्थिक रूप से कमज़ोर यानी लो इनकम देशों से सीखे, क्योंकि वे हमसे बेहतर तरी़के से इस समस्या को सुलझा पाए हैं.
  • ब्राज़ील ने ज़ीरो हंगर स्ट्रैटिजी अपनाई है, जिसमें भोजन का प्रबंधन, छोटे किसानों को मज़बूती प्रदान करना और आय के साधनों को उत्पन्न करने जैसे प्रावधानों पर ज़ोर दिया गया है.
  • ब्राज़ील के अलावा पेरू, घाना, वियतनाम जैसे देशों ने भी कुपोषण को तेज़ी से कम करने में सफलता पाई है.

नेशनल न्यूट्रिशनल एनीमिया प्रोफिलैक्सिस प्रोग्राम (एनएनएपीपी) का रोल?

  • जहां तक भारत की बात है, तो कई ग़रीब देश भी एनीमिया व कुपोषण की समस्या से हमसे बेहतर तरी़के से लड़ने में कारगर सिद्ध हुए हैं, तो हमें उनसे सीखना होगा.
  • भारत में एनीमिया से लड़ने के लिए नेशनल न्यूट्रिशनल एनीमिया प्रोफिलैक्सिस प्रोग्राम (एनएनएपीपी) 1970 से चल रहा है. कुछ वर्ष पहले इस प्रोग्राम के तहत किशोर बच्चों व गर्भवती महिलाओं में आयरन और फोलेट टैबलेट्स बांटने का साप्ताहिक कार्यक्रम शुरू हुआ, लेकिन हेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि मात्र दवाएं उन्हें सौंप देना ही कोई विकल्प नहीं है.
  • यह देखना भी ज़रूरी है कि क्या वो ये दवाएं ले रही हैं? एक अन्य सर्वे से पता चला कि बहुत कम महिलाएं ये टैबलेट्स नियमित रूप से लेती हैं.
  • इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि आयरन टैबलेट्स के काफ़ी साइड इफेक्ट्स होते हैं, जैसे- उल्टियां व दस्त और ये गर्भावस्था को और मुश्किल बना देते हैं. यही वजह है कि अधिकतर महिलाएं इन्हें लेना छोड़ देती हैं.
  • जबकि होना यह चाहिए कि उन्हें इन साइड इफेक्ट्स से जूझने का बेहतर तरीक़ा या विकल्प बताना चाहिए.

भारत में गर्भवती स्त्रियां गंभीर रूप से कुपोषण की शिकार हैं- सर्वे

  • न स़िर्फ गर्भावस्था में, बल्कि भारतीय स्त्रियां हर वर्ग में कम स्वस्थ पाई गईं. उनका व उनके बच्चों का स्वास्थ्य व वज़न अन्य ग़रीब देशों की स्त्रियों व बच्चों के मुक़ाबले कम पाया गया. भारत में किशोरावस्था में लड़कियों के एनीमिक होने के पीछे प्रमुख वजह यहां की यह संस्कृति बताई गई, जिसमें लिंग के आधार पर हर स्तर पर भेदभाव किया जाता है.
  • बेटे को पोषक आहार देना और बेटी के स्वास्थ्य को नज़रअंदाज़ करना हमारे परिवारों में देखा जाता है. स़िर्फ ग़रीब तबके में ही नहीं, पढ़े-लिखे व खाते-पीते घरों में भी इस तरह का लिंग भेद काफ़ी पाया जाता है.
  • पोषण की कमी के कारण होनेवाला एनीमिया यानी आयरन और फॉलिक एसिड की कमी से जो एनीमिया होता है, वह परोक्ष या अपरोक्ष रूप से गर्भावस्था के दौरान लगभग 20% मृत्यु के लिए ज़िम्मेदार होता है.
  • दवाओं के साथ-साथ पोषक आहार किस तरह से इस समस्या को कम कर सकता है, कौन-कौन से आहार के ज़रिए पोषण पाया जा सकता है, इस तरह की जानकारी भी महिलाओं व उनके परिजनों को भी देनी आवश्यक है.

 – गीता शर्मा

 

महिला सुरक्षा पर रिपोर्ट: कौन-से राज्य सबसे सुरक्षित, कौन सबसे असुरक्षित? (Women Safety Report: Goa Safest, Delhi, Bihar Vulnerbale)

Women Safety Report india
क्या आप जानते हैं कि महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज़ से देश का कौन-सा राज्य कितना सुरक्षित और कौन सबसे असुरक्षित है? नहीं, तो हम आपको बताते हैं, ये रिपोर्ट. 1 नवंबर, 2017 को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने प्लान इंडिया की वह रिपोर्ट सार्वजनिक की, जो उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा पर सर्वे के आधार पर बनाई है, जिसमें महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज़ से गोवा देश में अव्वल है और दिल्ली, बिहार सबसे बदतर. 

Women Safety Report india

गोवा सबसे सुरक्षित राज्य

रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज़ से गोवा देश में अव्वल है. इस बात का पता लगाने के लिए जेंडर वल्नरेबिलिटी इंडेक्स यानी जीवीआई का इस्तेमाल किया गया है. राज्यों को 0 से 1 के बीच में नंबर दिए गए यानी जो राज्य 1 नंबर के क़रीब है, वो सबसे सुरक्षित और जो 0 के क़रीब वो सबसे असुरक्षित. इस रिपोर्ट में गोवा का जीवीआई 0.656 है, जो देश के औसत जीवीआई 0.5314 से ज़्यादा है. लोगों की सुरक्षा के मामले में भी गोवा देश का नंबर 1 राज्य है. सुरक्षा के अलावा इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, जीविका कमाने और गरीबी के भी आंकड़े जारी किए गए. गोवा शिक्षा के मामले में पांचवे, स्वास्थ्य में छठे, जीविका कमाने में छठे और गरीबी के मामले में पांचवे नंबर पर है.

केरल दूसरे नंबर पर

महिलाओं की सुरक्षा के मामले में केरल दूसरे नंबर पर है. इसका जीवीआई 0.634 है. रिपोर्ट में इस बात पर भी ज़ोर दिया गया है कि केरल ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में काफ़ी सुधार करके नई ऊंचाइयां छुई हैं. इसके बाद मिज़ोरम, सिक्किम और मणिपुर का नंबर आता है. यानी ग़ौर करें, तो पूर्वोत्तर भारत के ये राज्य राजधानी दिल्ली और मेट्रो शहरों के मुकाबले महिलाओं के लिए काफ़ी सुरक्षित हैं.

राजधानी दिल्ली महिलाओं के लिए असुरक्षित

देश की राजधानी दिल्ली महिलाओं के लिए बेहद असुरक्षित है. 30 राज्यों की इस रिपोर्ट में दिल्ली 28वें नंबर पर है यानी बिहार से स़िर्फ दो पायदान ऊपर. दिल्ली का जीवीआई स्कोर 0.436 है.

बिहार सबसे नीचे

बिहार का नंबर इस लिस्ट में सबसे नीचे है यानी बिहार देश में महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित राज्य है. इसका जीवीआई स्कोर 0.410 है. सुरक्षा के अलावा लड़कियों की शिक्षा व स्वास्थ्य के मामले में भी सबसे पीछे हैं. बिहार को सबसे नीचे रखने का कारण कम उम्र में लड़कियों की शादी और उनका मां बनना है. राज्य के आंकड़ों पर नज़र डालें, तो बिहार में 39 फ़ीसदी लड़कियों की शादी 18 साल से कम उम्र में कर दी जाती है, जिससे वो जल्द ही मां बन जाती हैं और मां और बच्चे दोनों का ही स्वास्थ्य बहुत कमज़ोर होता है. 15-19 साल की उम्र की 12.2 लड़कियां गर्भवती थीं या मां बन चुकी थीं.

इस लिस्ट में जहां झारखंड 27वें नंबर पर है, वहीं उत्तर प्रदेश 29वें नंबर पर. यानी देखा जाए, तो देश के किसी अन्य राज्यों के मुकाबले, बिहार, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और झारखंड सबसे असुरक्षित हैं.

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सार्थक पहल- महिलाओं के लिए हेल्थ कार्ड (Worthy Initiative- Health Card For Women)

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स्त्री घर-बाहर दोनों ही ज़िम्मेदारियों को बख़ूबी निभाती रही है, पर इन सबके चलते वह ख़ुद पर ख़ासकर अपनी सेहत पर अधिक ध्यान नहीं दे पाती. साथ ही इन दिनों ब्रेस्ट कैंसर, सर्वाइकल कैंसर, एनीमिया जैसी बीमारियों की संख्या भी बढ़ती जा रही है. इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए अब सरकार महिलाओं के लिए हेल्थ कार्ड मुहैया करवाएगी.

* इस योजना के तहत देश की सभी महिलाओं को हेल्थ कार्ड दिया जाएगा.

* चूंकि यह कार्ड आधार से लिंक्ड रहेगा, इसलिए इसे हासिल करने के लिए महिलाओं का आधार कार्ड होना भी ज़रूरी होगा.

* इस कार्ड के ज़रिए महिलाओं का साल में एक बार फ्री चेकअप होगा.

* महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी महिलाओं में बढ़ रहे ब्रेस्ट कैंसर, सर्वाइकल कैंसर, गर्भाशय कैंसर आदि से चिंतित थीं. उनके अनुसार, कैंसर से बचाव के लिए महिलाओं को जागरूक किया जाना बहुत ज़रूरी है. इसी कारण उन्होंने महिलाओं के लिए हेल्थ कार्ड का प्रस्ताव रखा, जिसे स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा सर्व सम्मति से मंज़ूर कर लिया गया.

* यह कार्ड बच्चों के टीकाकरण कार्ड की तरह होगा. इसके ज़रिए समय-समय पर महिलाओं के हेल्थ चेकअप सुनिश्‍चित किए जाएंगे.

* इस कार्ड को हर स्त्री तक पहुंचाने के लिए मंत्रालय गांव-कस्बे, दूर-दराज़ इलाके, राज्यों आदि से सहयोग लेगी, ताकि हर नारी को यह सुविधा मिल सके.

* हेल्थ कार्ड धारक स्त्रियों को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से लेकर सभी सरकारी अस्पतालों में चेकअप की सुविधा दी जाएगी.
सरकार गर्भवती महिला, मां की सेहत को लेकर हमेशा से ही फ्रिकमंद रही है, तभी तो कुछ समय पहले गर्भवती महिलाओं के लिए हर महीने की 9 तारीख़ को फ्री हेल्थ चेकअप की सुविधा मुहैया करवाई गई. इसके अलावा प्रेग्नेंट वुमन के लिए कैशलेस मेडिकल सर्विस का प्रावधान भी दिया गया है.

– ऊषा गुप्ता

मल्टीटैलेंटेड गुल पनाग, फॉमूर्ला रेस कार चलाने वाली पहली भारतीय महिला बनीं (Gul Panag Became First Indian Women To Drive Formula Racing Car in Barcelona)

गुल पनाग

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मल्टीटैलेंटेड गुल पनाग कमर्शियल पायलट का लाइसेंस हासिल करने के बाद अब बन गई हैं कार रेसर. जी हां, वह पहली भारतीय महिला हैं, जिन्होंने फॉर्म्यूला ई रेसिंग कार ड्राइव की है. बार्सिलोना में उन्होंने रेसिंग ट्रैक पर M4Electro Mahindra रेसिंग फॉर्म्यूला ई कार को ड्राइव किया. बाइक और कार चलाने की शौकीन गुल अब रेसिग ट्रैक पर भी उतर आई हैं. उन्होंने ट्रैक पर उतरने से पहले महिंद्रा रेसिंग जॉइन की, जिसकी जानकारी ख़ुद महिंद्रा रेसिंग ने सोशल मीडिया पर दी. गुल को यूरोपियन एफ3 चैंपियन, 2x Macau Grand Prix और F3 Masters के विजेता फेलिक्स रोजेनक्विस्ट ने ड्राइविंग सीखाने में मदद की. गुल ने अपनी पिक्चर्स सोशल मीडिया पर शेयर की हैं. आप भी देखें गुल की ये पिक्चर्स.

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