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मुझे याद आई बद्रीनाथ की यात्रा. जब जोशीमठ पहुंचे थे, तो लगा था जैसे बर्फीले पहाड़ का एक टुकड़ा मुंह उचका कर हमें देख रहा हो. उसे देखकर मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा था।. मैंने जीवन में पहली बार बर्फीले पहाड़ को इतनी नज़दीक से देखा था.

इस सर्दियों में गंगटोक जाने का मौक़ा मिला. बहुत दिनों से ख़्वाहिश थी सिक्किम देखने की. वहां की बर्फीली वादियां और फ़िज़ाएं और वह ख़ूबसूरत पहाड़ जिन्हें बहुत दिनों से नहीं देखा था.
मेरा बचपन उत्तराखंड में बीता, इसीलिए पहाड़ों से बहुत लगाव है. जैसे लगता है वह मेरे पहले प्यार हैं. ख़ैर जब एक पहाड़ जाने का मौक़ा मिला, तो मैं बहुत ख़ुश थी. जब हमारी टैक्सी सिलीगुड़ी से गंगटोक की ओर रवाना हुई, तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना न था. कैमरा तैयार था, लेकिन यह क्या? शहर से निकलते-निकलते ही हमको 3 घंटे लग गए. कई किलोमीटर ट्रैफिक जाम से निकलते हुए आधी से ज़्यादा ऊर्जा तो वही ख़र्च हो गई टेंशन से मन भर गया. ख़ैर, आगे बढ़े तो पेड़ दिखाई देने शुरू हुए तो अच्छा लगा.


लेकिन हर कुछ दूर पर यह लग रहा था जैसे हम अपने किसी मेट्रो सिटी में ही चल रहे हैं, क्योंकि हर कुछ दूर पर ट्रैफिक जाम लग जाता था. मुझे याद आने लगी उत्तराखंड की यात्राएं. तब रोड़ इतनी चौड़ी नहीं होती थीं, मगर अच्छी थीं. बगल में घाटी दिखती थी उसके पार पेड़ों से पूरी तरह ढके हुए पहाड़. वह ख़ूबसूरती सचमुच सम्मोहित कर लेनेवाली होती थी, लेकिन अब कैमरा जैसे ही स्टार्ट करो पहाड़ों की जगह बिल्डिंग्स आ जाती थीं. दूसरी तरफ़ भी बिल्डिंग. इतनी बिल्डिंग्स जिसने पहाड़ों के सौंदर्य को तो पूरी तरह ख़त्म कर ही दिया था, उनके बीच चलने पर किसी भी तरह के एडवेंचर का भी एहसास नहीं हो रहा था.
मुझे याद आई बद्रीनाथ की यात्रा. जब जोशीमठ पहुंचे थे, तो लगा था जैसे बर्फीले पहाड़ का एक टुकड़ा मुंह उचका कर हमें देख रहा हो. उसे देखकर मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा था।. मैंने जीवन में पहली बार बर्फीले पहाड़ को इतनी नज़दीक से देखा था.
जब हम एक साधारण से कमरे में ठहरे, तो बेसाख़्ता मेरी बड़ी बहन के मुंह से निकल गया, “यहां शायद कोई अच्छे होटल्स नहीं है.” तो पापा ने तुरंत कहा था, “अच्छे होटल्स नहीं है, इसलिए यह शहर है. पहाड़ों पर अच्छे होटल, अच्छे कहलाए जानेवाले होटल्स तो कभी बनने ही नहीं चाहिए, क्योंकि यहां की धरती उनका भार सह नहीं पाएगी.”
फिर हम लोग बद्रीनाथ पहुंचे थे और धर्मशाला में रुके थे. धर्मशाला में बड़े-बड़े हॉल्स थे और जी भर के चाहे जितने आप चाहो रजाई और गद्दे ले सकते हो और ज़मीन पर ही उन्हें बिछाकर सो सकते थे. हम भाई-बहन मुंह बनाने लगे, तो पापा ने वही बात समझाई थी.
“जब तक यहां होटल्स नहीं हैं, तभी तक यहां की सुंदरता, यहां का वैभव है, जो देखने हम यहां आए हैं.”
वहां तब एक भी होटल नहीं था और इसीलिए उसका वजूद सुरक्षित था.
ख़ैर! हम लोग गंगटोक में बहुत ही सुंदर होटल में ठहरे. ऐसा लगता था जैसे मेट्रो सिटी का कोई लग्जरी होटल हो. लेकिन जाने क्यों मुझे अच्छा नहीं लग रहा था, क्योंकि ऐसे होटल और रिसॉर्ट्स बनाने के लिए पहाड़ों की बेदर्दी से कटिंग की जाती है. हमें यह चीज़ तुरंत भले ही अच्छी लगती हो, लेकिन हम सब जानते हैं कि पहाड़ यह सब सह नहीं पाएंगे. फिर भी हम ना सिर्फ़ यह सब कुछ होने दे रहे हैं, बल्कि इन सब चीज़ों को एंजॉय करके ख़ुश भी हो रहे हैं. गंगटोक में शॉपिंग मॉल्स, हर अच्छे ब्रांड्स की दुकानें और वह सब कुछ था, जो मेट्रो सिटी में होता है. नहीं दिखी, तो बस वह शांति जिसे पाने के लिए लोग पहाड़ों पर जाया करते थे.


गंगटोक घूमते समय वहां का असंतुलित विकास देखकर जो दर्द हुआ, वही दर्द वापस लौट कर जोशीमठ की ख़बर सुनकर और गहरा गया. जो कहानी आज जोशीमठ की है क्या वही हमारी बाकी पहाड़ों की भी कल को बन जाएगी या फिर हम समय रहते संभल जाएंगे. आप ख़ुद भी विचार कीजिए.

भावना प्रकाश

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“बस इतनी सी बात? ऐसा करो, मेरे पास तुम्हारी समस्या का समाधान है. तुम मेरी जो कुटिया है उसमें कल सुबह आना.”
राजा ने पूछा, “कल सुबह क्यों?”
साधु ने कहा, “मेरे पास एक ऐसी जड़ी-बूटी है, जिसे खाकर तुम्हारी नींद ना आने की समस्या ख़त्म हो सकती है…”

बहुत पुरानी बात है एक राजा था. वह अपनी प्रजा से बहुत प्यार करता था. उसके जीवन में सारी ख़ुशियां थी, बस एक ही दुख था कि उसे नींद नहीं आती थी. वह सुबह उठकर दरबार जाता लोगों की समस्याएं बड़े ही ध्यान से सुनता-समझता और उनका समाधान बताता. उसके दरबार के दरवाज़े सबके लिए खुले थे. गरीब हो या अमीर छोटा हो या बड़ा हर व्यक्ति उससे समस्या का समाधान मांगने किसी भी समय आ सकता था. इसीलिए राजा यह सोचता था कि वह बहुत अच्छा है.

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हालांकि उसे अपनी अच्छाई का कोई घमंड नहीं था मतलब वह दूसरों के साथ बुरा बर्ताव या उन्हें नीचा दिखाने जैसा बर्ताव कभी नहीं करता था. लेकिन अक्सर वह खीझ जाया करता, क्योंकि पूरी रात सो न पाने के कारण अक्सर उसकी बुद्धि ठीक से काम नहीं करती थी. वह परेशान रहा करता था. एक बार उसके राज्य के पासवाले जंगल में एक साधु रहने आए. उन दिनों यह परंपरा थी कि राजा अपने पासवाले जंगल में रहने आए साधु से आशीर्वाद लेने और उन्हें अपने यहां आने का न्योता देने जाया करते थे.
साधु ने कहा कि वह जंगल में ही रहना चाहते हैं वह किसी राजा का न्योता स्वीकार नहीं करते, मगर हां राजा को कुछ परेशान देखकर वे बोले, “तुम अपनी समस्या मुझे बता सकते हो.”
राजा ने अपनी नींद ना आने की समस्या उन्हें बता दी.
“बस इतनी सी बात? ऐसा करो, मेरे पास तुम्हारी समस्या का समाधान है. तुम मेरी जो कुटिया है उसमें कल सुबह आना.”
राजा ने पूछा, “कल सुबह क्यों?”
साधु ने कहा, “मेरे पास एक ऐसी जड़ी-बूटी है, जिसे खाकर तुम्हारी नींद ना आने की समस्या ख़त्म हो सकती है. लेकिन एक समस्या है, वह जड़ी-बूटी तभी असर करती है जब सुबह खाली पेट कोई इंसान ख़ुद उस जड़ी-बूटी को तोड़े और खरल में पीस लें और खाए. और जैसा कि तुम देख ही रहे हो मैंने जो कुटिया बनाई है उसके आसपास काफ़ी बड़े घेरे में बाड़ बनवा कर एक गेट लगाया है. उसके अंदर रथ का प्रवेश वर्जित है. उसके अंदर रथ लेकर नहीं आ सकते, मैंने नियम बनाया हुआ है. ऐसा करो कि तुम कल सुबह आना.”
दूसरे दिन सुबह साधु के कहने के अनुसार राजा उनकी कुटिया के गेट पर पहुंच गया. वहां रथ छोड़कर उसने शिष्यों से पूछा कि जड़ी-बूटी तक जाने का रास्ता कौन-सा है. काफ़ी लंबे रास्ते से चलकर राजा बूटी तक पहुंचा. बूटी तोड़ी और शिष्यों से खरल का पता पूछा.
फिर घर ढूंढ़ने के लिए भी उसे बहुत चलना पड़ा. फिर उसने वह बूटी पीसी और खाई. रात में उसे बिस्तर पर लेटते ही नींद आ गई. सुबह उसने सोचा उसे साधु का धन्यवाद कहना चाहिए. वह साधु का धन्यवाद करने पहुंच गया. उसने यह भी पूछा कि मुझे बताइए कि यह कौन-सी बूटी है, ताकि मैं अपने वैद्य को बूटी के बारे में बता सकूं. ताकि वह ऐसे सभी रोगियों, जिन्हें नींद नहीं आती है यह जड़ी-बूटी दे सकें.
इस पर साधु हंसने लगे, कहने लगे, “यह तो एक साधारण सा साग है. तुमने बहुत बार खाया होगा. यह कोई जड़ी-बूटी नहीं है. तुम्हारी समस्या इसलिए थी, क्योंकि तुम शारीरिक श्रम नहीं करते थे. व्यायाम नहीं करते थे और बिना व्यायाम के नींद नहीं आती है. मैंने इस जड़ी-बूटी को खिलाने के बहाने तुमसे श्रम करवाया और इसीलिए तुम्हें नींद आने लगी.”


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राजा को बात समझ में आ गई. साधु उसे समझाना चाहते थे कि अच्छा होना दुनिया के लिए सही हो सकता है. लेकिन अपनी सेहत का ध्यान रखने के लिए ऐसा भी करना पड़ता है, जो शायद हमें लगे कि हम सिर्फ़ हमारे लिए कर रहे हैं, पर वह भी ज़रूरी होता है.

– भावना प्रकाश

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एक दिन बादशाह अकबर के दरबार की कार्यवाही चल रही थी कि अचानक बादशाह को न जाने क्या सूझी और वो बीरबल के मज़े लेने की सोचने लगे. उन्होंने बीरबल से मसखरी में एक टेढ़ा सवाल पूछा कि बीरबल, बताओ ज़रा कि हथेली पर बाल क्यों नहीं उगते?

सवाल सुनते ही बीरबल की समझ में आ गया कि बादशाह मजाक करना चाहते हैं और उनके मज़े लेना चाहते हैं.

बीरबल फ़ौरन जवाब न देकर सोच में डूबे हुए थे कि बादशाह ने उनको टोका- आज क्या बात है बीरबल, वैसे तो तुम हर सवाल का जवाब तपाक से दे देते हो. आज क्या हो गया?

बीरबल ने शांत मन से कहा- कुछ नहीं हुआ जहांपनाह! मैं तो ये सोच रहा था कि किसकी हथेली पर?

अकबर अपनी हथेली दिखाते हुए बोले कि हमारी हथेली पर बीरबल.

Akbar Aur Birbal Ki Kahani
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बीरबल समझाते हुए बोले- हुज़ूर! आपकी हथेली पर बाल कैसे उगेंगे? आप दिन भर अपने हाथों से उपहार वितरित करते रहते हैं. लगातार घर्षण की वजह से आपकी हथेली पर बाल उगना मुमकिन नहीं.

ठीक है बीरबल, चलो मान लेते हैं, मगर तुम्हारी हथेली पर भी बाल नहीं है. उसका क्या कारण है? अकबर ने सोचा आज बीरबल को पूरी तरह चकरा ही देंगे और उसके खूब मज़े लेंगे.

अकबर के सवाल सुनकर दरबारियों के भी कान खड़े हो गए और उनको भी लगने लगा कि बीरबल आज बुरे फंसे और वो अब अकबर के सवाल का जवाब नहीं दे पाएंगे.

इतने में ही बीरबल ने कहा कि जहांपनाह मेरी हथेली पर बाल इसलिए नहीं क्योंकि मैं हमेशा आपसे इनाम लेता रहता हूं, तो भला मेरी हथेली पर बाल कैसे रहेंगे?

बादशाह यहीं नहीं रुके, तपाक से तीसरा सवाल कर बैठे- हमारी और तुम्हारी बात को जाने दो. हम इनाम देते हैं और तुम लेते रहते हो इसलिए हमारी हथेलियों पर बाल नहीं, लेकिन इन दरबारियों का क्या? ये तो हमसे हमेशा ईनाम नहीं लेते. ऐसे में इनकी हथेलियों पर बाल क्यों नहीं हैं?

सभी दरबारियों को लगा कि इस सवाल पर अब बीरबल फंस गए, आज उनकी हार निश्चित है, वो मन ही मन खुश हो रहे थे कि बीरबल का जवाब हाज़िर था- हुज़ूर! आप ईनाम देते रहते हैं और मैं ईनाम लेता रहता हूं और इसे देख ये सभी दरबारी ईर्ष्या में हाथ मलते रह जाते हैं, इसलिए इनकी हथेली पर भी बाल नहीं है.

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बीरबल वैसे भी अपनी तेज़ बुद्धि, हाज़िरजवाबी और वाक्पटुता के लिए प्रसिद्ध थे. हर बार की तरह इस बार भी बीरबल ने यह साबित कर दिखाया और बीरबल के जवाब से अकबर ख़ुशी से ठहाका लगा उठे, वहीं बाक़ी दरबारी फिर हाथ मलते रह गए.

सीख: ऐसा कोई सवाल नहीं और ऐसी कोई समस्या नहीं, जिसका हल नहीं हो. बस अपनी बुद्धि को हमेशा तेज़ और मन को साफ़ रखें. हाज़िरजवाबी के लिए दिमागी रूप से सतर्क होना बेहद ज़रूरी है. कभी भी कठिन से कठिन प्रश्न देख बिना कोशिश किए हथियार न डालें!

बादशाह अकबर एक रोज़ अपने घोड़े पर बैठकर शाही बाग में घूमने गए, उनके साथ बीरबल भी था.
बाग में चारों ओर हरे-भरे वृक्ष और हरी-हरी घास देखकर अकबर को बहुत आनंद आया और उनका मन प्रसन्न हो गया. लेकिन फिर उनके मन में एक ख़याल आया, उन्हें लगा कि ऐसे हरे-भरे बगीचे में सैर करने के लिए तो घोड़ा भी हरे रंग का ही होना चाहिए.

उन्होंने बीरबल से कहा- बीरबल क्या तुम्हें नहीं लगता कि इस हरे-भरे बाग का मज़ा दुगुना हो जाए, तो मुझे लगता है कि इसके लिए मुझे हरे रंग का घोड़ा चाहिए. तुम मुझे सात दिन में हरे रंग का घोड़ा ला दो. अगर तुम हरे रंग का घोड़ा न ला सके तो हमें अपनी शक्ल मत दिखाना.
वैसे बादशाह अकबर और बीरबल दोनों ही यह अच्छी तरह जानते थे कि हरे रंग का घोड़ा तो होता ही नहीं है, लेकिन बादशाह अकबर को तो बीरबल की परीक्षा लेनी थी, इसलिए उन्होंने बीरबल की बुद्धि को परखने के लिए ये शर्त रखी.

बादशाह अकबर ये देखना और परखना चाहते थे कि क्या इस प्रकार के अटपटे सवाल करने पर बीरबल अपनी हार स्वीकार करके यह कहेगा कि जहांपनाह मैं हार गया… लेकिन क्या ऐसा संभव था क्योंकि बीरबल भी अपने जैसे एक ही थे. बीरबल की तेज़ बुद्धि और हाज़िरजवाबी के सामने सभी को मुंह की ही खानी पड़ती थी. तो इस बार भी बीरबल ने चुनौती स्वीकार कर ली.

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बीरबल इस हरे रंग के छोड़ की खोज के बहाने सात दिन तक इधर-उधर घूमते रहे ताकि इस गुथी को सुलझा सकें और फिर आठवें दिन वे दरबार में हाजिर हुए और बादशाह से बोले- ‘जहांपनाह! मुझे हरे रंग का घोड़ा मिल गया है…
बादशाह बड़े हैरान हुए aur उन्होंने उत्सुकता दिखते हुए कहा कि बीरबल ‘जल्दी बताओ, कहां है हरा घोड़ा?

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बीरबल ने कहा, ‘बादशाह अकबर, मैंने बड़ी मुश्किल से हरा घोड़ा खोजा है और वो घोड़ा तो आपको मिल ही जाएगा, लेकिन, उसके मालिक ने दो शर्त रखी हैं, उन्हें पूरा करने के बाद ही वो घोड़ा आपका हो सकेगा.

अकबर ने भी फ़ौरन कहा कि जल्दी बताओ कौन सी शर्तें हैं वो, हम ज़रूर पूरा करेंगे.

बीरबल ने भी फ़ौरन जवाब दिया कि पहली शर्त तो यह है कि घोड़ा लेने के लिए आपको स्वयं जाना होगा जहांपनाह!

बादशाह ने कहा-

इसमें कौन सी बड़ी बात है, यह तो बड़ी आसान शर्त है. हम स्वयं जाएंगे… अब बताओ दूसरी शर्त क्या है?

बीरबल ने मुस्कुराते हुए बताया कि जहांपनाह, ‘घोड़ा खास रंग का है, इसलिए उसे लाने का दिन भी खास ही होगा, इसलिए उसका मालिक कहता है कि सप्ताह के सात दिनों के अलावा किसी भी दिन आकर उसे ले जाओ, घोड़ा तुम्हारा होगा.

बीरबल की ये बात सुन बादशाह अकबर बीरबल का मुंह देखते रह गए… बीरबल ने भी हंसते हुए कहा कि महाराज, अब हरे रंग का घोड़ा लाना हो, तो उसकी शर्तें भी माननी ही पड़ेगी, तभी तो ख़ास रंग का घोड़ा आपका होगा.

बीरबल की चतुराई पर बादशाह अकबर खिलखिला कर हंस पड़े. बीरबल की तेज़ बुद्धि से वह खुश हुए और समझ गए कि बीरबल को मूर्ख बनाना या उससे जीत पाना असंभव है!

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सीख: हर सवाल और हर समस्या का समाधान होता है, बस ज़रूरत है शांत मन से और चतुराई से अपनी बुद्धि का उपयोग कर उपाय खोजने की, जिससे मुश्किल से मुश्किल लग रहे सवाल और समस्या का भी आसानी से हल निकाला जा सकता है!

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एक गांव में एक धोबी अपने गधे के साथ रहता था. वह अपनी रोज़ी-रोटी के लिए रोज सुबह अपने गधे के साथ लोगों के घरों से गंदे कपड़े लाता और उन्हें धोकर वापस दे आता. वो दिनभर इसी काम में लगा रहता और किसी तरह गुज़र-बसर कर रहा था.

वो गधा भी कई सालों से धोबी के साथ काम कर रहा था और उम्र बढ़ने के साथ व समय के साथ-साथ वह बूढ़ा हो गया था. जिसकी वजह से उसका शरीर भी कमजोर हो चला था, जिस वजह से अब वो ज्यादा कपड़ों का वजन भी नहीं उठा पाता था… उसकी उम्र के चलते उसकी कमजोरी बढ़ती चली जा रही थी.

एक दिन दोपहर के वक्त धोबी अपने गधे के साथ कपड़े धोने घाट जा रहा था. गर्मी बहुत ज़्यादा थी और कड़ी धूप की से दोनों ही बेहाल थे. चलते-चलते धूप और कमजोरी की वजह से अचानक गधे का पैर लड़खड़ाया और वह एक गहरे गड्ढे में गिर गया. इस अचानक हुए घटनाक्रम से धोबी घबरा गया. उसका गधा भी सकते में था और धोबी उसे बाहर निकालने की कोशिश में जुट गया. लेकिन गधा और धोबी दोनों नाकामयाब रहे, हालाँकि बूढ़ा और कमजोर होने पर भी गधे ने भी पूरी ताक़त लगा दी थी पर दोनो असफल हो रहे थे और उनके प्रयास नाकाफ़ी साबित हुए.

धोबी और गधे की ऐसी हालत देख को गांव वाले भी उसकी मदद के लिए पहुंच गए, लेकिन कोई भी उसे गड्ढे से बाहर नहीं निकाल पाया. तब सभी को यही लगा कि अब कुछ माहिर हो सकता और गांववालों ने धोबी से कहा कि ये गधा तो अब बूढ़ा हो गया है, इसलिए इसको बाहर निकलने की बजाय समझदारी इसी में है कि इस गड्ढे में मिट्टी डालकर उसे यहीं दफना दिया जाए, क्योंकि सारी कोशिशें बेकार हि होंगी. धोबी ने भी सोचा कि ये सब सही कह रहे हैं और वो भी इस बात के लिए तैयार हो गया.

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Panchatantra Ki Kahani
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बस फिर क्या था, गांववालों ने अब गड्ढे में मिट्टी डालनी शुरू कर दी. गधा इससे पहले कि कुछ समझ पाता गांववाले अपना निर्णय ले चुके थे और जैसे ही गधे को समझ आया कि उसके साथ क्या हो रहा है, तो वहकुछ देर चिल्लाया, बहुत दुखी हुआ और उसकी आंखों से आंसू निकलने लगे, लेकिन कुछ देर बाद उसने चुप्पी साध ली और वो एकदम चुप हो गया!

लेकिन इसी बीच धोबी की नज़र गड्ढे में फ़ंसे अपने गधे की हरकत पर पड़ी, उसने देखा कि गधा कुछ अजीब सी हरकत कर रहा है. जैसे ही गांव वाले उस पर मिट्टी डालते, वो अपने शरीर से मिट्टी को नीचे गड्ढे में गिरा देता और खुद उस मिट्टी के ऊपर चढ़ जाता. वो लगातार ऐसा करत रहा, यही क्रम चलता रहा, जिससे गड्ढे में मिट्टी तो भरती रही लेकिन गधा बड़ी चतुराई से उस मिट्टी को नीचे अपने ऊपर से झटककर नीचे गिरा देता और खुद उस पर चढ़ते हुए ऊपर आता गया. गांववाले भी ये देख हैरान हो गए और अपने गधे की इस चतुराई को देखकर धोबी भी हैरान रह गया और उसकी आंखें नम हो गईं.

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सीख: कहानी से यही सीख मिलती है कि परिस्थितियाँ भले ही कितनी मुश्किल और नाज़ुक क्यों न हों, अगर बुद्धि, समझदारी और धैर्य से काम लिया जाए तो मुश्किल से मुश्किल परिस्थिति को भी पार कर सकते हैं. गड्ढा कितना भी गहरा हो यानी परेशानी कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसे समझदारी से मिट्टी की तरह हटाकर उससे पार पाने का जज़्बा बनाए रखें, सफलता ज़रूर मिलेगी!

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बहुत समय पहले की बात है. जंगल के पास एक पहाड़ की ऊंची चोटी पर एक बाज रहता था. वो बाज अक्सर आसपास के ख़रगोशों का शिकार कर अपना पेट आसानी से भर लेता था.

पहाड़ की तराई में बरगद के पेड़ पर एक कौआ भी अपना घोंसला बनाकर रहता था, लेकिन वो कौवा बड़ा ही चालाक और धूर्त था. वो हमेशा इसी प्रयास में लगा रहता कि बिना मेहनत किए ही उसे आसानी से खाना मिल जाए. पेड़ के आसपास जो खरगोश रहते थे, ऊँसेंट वो अक्सर बाज का शिकार होते देखता था. जब भी खरगोश बाहर आते तो बाज ऊंची उड़ान भरता और एकाध खरगोश को उठाकर ले जाता.

रोज़ ये देखते-देखते एक दिन कौए ने सोचा कि यूं तो ये चालाक खरगोश मेरे हाथ नहीं आनेवाले, लेकिन अगर इनका नर्म और स्वादिष्ट मांस खाना है, तो मुझे भी बाज की तरह करना होगा. उसकी ही नक़ल करके अपना शिकार करना होगा. मैं भी एकाएक झपट्टा मारकर खरगोश को पकड़ लूंगा.

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अगले दिन कौए ने भी एक खरगोश को दबोचने की अपनी सोच और योजना को पूरा करने की बात सोची और ऊंची उड़ान भरने की पूरी कोशिश की. फिर उसने जैसे ही खरगोश को देखा तो बाज कि तरह तेज़ रफतार से झपट्टा मारा, लेकिन कौआ तो आख़िर कौवा ही था, उसका बाज का क्या मुकाबला?

तेज़ खरगोश ने उसे देख लिया और झटपट वहां से भागकर चट्टान के पीछे छिप गया. कौवे ने देखा कि खरगोश तो वहां से हट चुका है, इसलिए उसने बिना सोचे-समझे अपनी रफ़्तार कम करनी चाही, पर तब तक देर हो चुकी थी और कौवा इससे पहले कि कुछ और सोच और समझ पाता वो वहां की बड़ी चट्टान से जा टकराया. नतीजा, उसकी चोंच और गर्दन टूट गईं. वो दर्द से तड़प उठा और गंभीर रूप से घायल हो चुका यह. उसे सबक़ भी मिल चुका था कि यूं ही बिना सोचे-समझे नक़ल करना ग़लत है, इसका नतीजा ग़लत ही निकलता है.

सीख: इस कहानी से यही सीख मिलती है कि नकल करने के लिए भी अकल चाहिए. हम अक्सर दूसरों को देख उनकी तरह बनने की चाह में अंधाधुंध नक़ल करने में जुट जाते हैं बिना अपनी शक्ति, मानसिक बल और क्षमता को समझे. अगर नक़ल करनी है या किसी और की तरह बनना है तो प्रेरित हों और मेहनत से सही योजना बनाकर अंजाम दें, वर्ना लेने के देने ही पड़ेंगे!

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बादशाह अकबर ने अपनी बेगम साहिबा के जन्मदिन पर उन्हें एक बेशकीमती हार दिया. ये हार उन्होंने ख़ास कारीगरों से बनवाया था और वो बेहद खूबसूरत था. बेगम भी ये हार पाकर बेहद खुश थीं. बेगम साहिबा को वह हार अतिप्रिय था. उन्होंने कहा कि इस हार को वो हमेशा अपने पास सम्भालकर रखेंगी, इसलिए उन्होंने उसे एक संदूक में सुरक्षित रख दिया.

एक दिन श्रृंगार करते समय बेगम ने हार निकालने के लिए संदूक खोला, तो वो हार वहां से ग़ायब हो चुका था. बेगम फ़ौरन अकबर के पास गईं और उन्हें अपना बेशकीमती हार खो जाने की जानकारी दी.

बादशाह ने उन्हें पहले हर कक्ष में हार को अच्छी तरह ढूंढने को कहा, लेकिन वह हार नहीं मिला तो उन्हें यकीन हो गया कि उस बेशक़ीमती हार को किसी ने चुराया है.

अकबर ने तुरंत बीरबल को बुलावा भेजा और सारी बात बताकर शाही हार खोजने की ज़िम्मेदारी उसे सौंप दी. बीरबल ने फ़ौरन सभी सेवक-सेविकाओं को दरबार में हाज़िर होने को कहा और कुछ ही देर में दरबार लग गया, सभी वहां मौजूद भी थे, सिवा बीरबल के!

बहुत देर इंतज़ार करने के बाद बीरबल नहीं आया तो बादशाह को क्रोध आने लगा, लेकिन जैसे ही बादशाह ने सोचा अब दरबार में बैठने कि मतलब नहीं तो सबको लौट जाने का फ़रमान देना पड़ेगा तभी बीरबल ने दरबार में प्रवेश किया. उसके साथ एक गधा भी था.

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सबको इंतज़ार कराने की माफ़ी मांग बीरबल ने कहा, जहांपनाह मुझे इस गधे को खोजने में समय लग गया इसलिए माफ़ी चाहता हूं!

लेकिन ये बात सबकी समझ के परे थी कि आख़िर बीरबल अपने साथ वो गधा दरबार में लेकर क्यों आया है? 

बीरबल समझ गया इसलिए सबकी जिज्ञासा शांत करते हुए बोला, मैं ये गधा इसलिए लाया हूं ताकि ये हार के चोर का नाम बता सके, क्योंकि ये कोई साधारण गधा नहीं है. ये एक जादुई गधा है!

वैसे तो बीरबल की बात अब भी किसी के पल्ले नहीं पड़ रही थी, पर बीरबल ने आगे कहा- मैं इस जादुई गधे को यहां एक कक्ष में ले जाकर खड़ा कर रहा हूं और उसके बाद एक-एक कर सभी सेवक-सेविकाओं को उस कक्ष में जाकर इस गधे की पूंछ पकड़कर जोर से चिल्लाना होगा, ‘मैंने चोरी नहीं की है.’ ध्यान रहे आप सबकी आवाज़ बाहर तक सुनाई पड़नी चाहिए. उसके बाद ये गधा बताएगा कि आख़िर चोर है कौन!

जैसा बीरबल ने कहा वैसा ही होने लगा. गधे को एक कक्ष में खड़ा किया और कतार बनाकर सभी सेवक-सेविका उस कक्ष में जाने लगे. सबके कक्ष में जाने के बाद बाहर ज़ोर से आवाज़ आती- मैंने चोरी नहीं की है. सभी सेवक-सेविकाओं ने ऐसा कर लिया, तो बीरबल सभी सेवकों के पास जाकर उनसे दोनों हाथ आगे करने को कहता और फिर उसे सूंघता. बादशाह अकबर और बेगम सहित सभी हैरान थे कि आखिर बीरबल ये कर क्या रहा है. इतने में ही बीरबल एक सेवक का हाथ पकड़कर ज़ोर से बोला, महाराज! ये है उस बेशक़ीमती हार का चोर.

बादशाह हैरानी से पूछते हैं कि तुम इतने यकीन से ऐसा कैसे कह सकते हो बीरबल? क्या इस जादुई गधे ने तुम्हें सच में इस चोर का नाम बताया है?

बीरबल ने कहा- नहीं महाराज! हक़ीक़त ये है कि ये कोई जादुई गधा नहीं है. ये एक साधारण गधा है. मैंने तो इसकी पूंछ पर एक खास किस्म का इत्र लगा दिया था. जब सारे काम करनेवालों ने इसकी पूंछ पकड़ी, तो उनके हाथ में उस इत्र की ख़ुशबू आ गई, लेकिन ये जो चोर है इसने डर के कारण उस गधे की पूंछ पकड़ी ही नहीं. वो बस कक्ष में जाकर जोर से चिल्लाकर बाहर आ गया, इसलिए इसके हाथ में उस इत्र की ख़ुशबू नहीं है!

बस फिर क्या था उस चोर से वो बेशक़ीमती हार बरामद कर लिया गया और उसे कठोर सजा सुनाई गई. बीरबल की अक्लमंदी की सभी के साथ साथ बेगम साहिबा ने भी काफ़ी सराहना की और उन्होंने बादशाह से बीरबल को कई उपहार भी दिलवाए!

सीख: बुरे काम और चोरी करनेवाला खुद को कितना ही समझदार और चालाक समझे लेकिन उसकी चोरी एक न एक दिन पकड़ी ही जाती है, इसलिए चोरी कभी नहीं करनी चाहिए और न ही दूसरों की धन-दौलत को लूटने की मंशा रखनी चाहिए क्योंकि इसका अंजाम बुरा ही होता है!

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एक जंगल में एक चालाक लोमड़ी रहती थी. वो इतनी चालाक थी कि अपने शिकार और भोजन के लिए पहले तो वो जानवरों से दोस्ती करती और फिर मौक़ा पाते ही उन्हें मारकर दावत उड़ाती. उस लोमड़ी की इसी आदत की वजह से उससे सभी दूर रहते और कतराते थे. एक दिन उसे कहीं भोजन नहीं मिला तो वो दूर तक शिकार की तलाश में निकल पड़ी, उसकी नज़र एक तंदुरुस्त मुर्गे पर पड़ी. वह मुर्गा पेड़ पर चढ़ा हुआ था. वह लोमड़ी मुर्गे को देखकर सोचने लगी कि कितना बड़ा और तंदुरुस्त मुर्गा है, यह मेरे हाथ लग जाए, तो कितना स्वादिष्ट भोजन मिल जाएगा मुझे. अब लोमड़ी का लालच बढ़ चुका था, वो रोज़ उस मुर्गे को देखती लेकिन वो मुर्गा पेड़ पर हि चढ़ा रहता और लोमड़ी के हाथ नहीं आता.

बहुत सोचने के बाद लोमड़ी को लगा ये ऐसे हाथ न आएगा, इसलिए उसने छल और चालाकी करने की सोची. वो मुर्गे के पास गई और कहने लगी आर मेरे मुर्गे भाई! क्या तुम्हें यह बात पता चली कि एक खुशखबरी मिली है सबको जंगल में? मुर्गे ने कहा कैसी खुशख़बरी? लोमड़ी बोली कि आकाशवाणी हुई है और खुद भगवान ने कहा ह अब से इस जंगल के सारे लड़ाई-झगड़े खत्म होंगे, आज से कोई जानवर किसी दूसरे जानवर को नुकसान नहीं पहुंचाएगा और ना ही मारकर खाएगा. सब मिलजुलकर हंसी-ख़ुशी से रहेंगे, एक दूसरे की सहायता करेंगे. कोई किसी पर हमला नहीं करेगा.

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मुर्गे को समझ में आ गया कि हो न हो ये लोमड़ी झूठ बोल रही है, इसलिए मुर्गे ने उसकी बातों पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया और कहा कि अच्छी बात है. लोमड़ी मुर्गे की ऐसी ठंडी प्रतिक्रिया देख फिर बोली- तो मेरे भाई, इसी बात पर आओ, नीचे तो आओ, हम गले लगकर एक दूसरे को बधाई दें और साथ में ख़ुशियां बांटे.

मुर्गा अब लोमड़ी की चालाकी समझ चुका था इसलिए वो मुस्कुराते हुए बोला कि ठीक है लेकिन मेरी लोमड़ी बहना तुम पहले अपने उन दोस्तों से तो गले मिलकर बधाई ले लो जो इसी तरफ़ ख़ुशी से दौड़े चले आ रहे हैं. मुझे पेड़ से दिख रहे हैं वो.

लोमड़ी ने हैरान हो कर पूछा- मुर्गे भाई मेरे कौन से दोस्त? मुर्गे ने कहा- अरे बहन वो शिकारी कुत्ते, वो भी अब हमारे दोस्त हैं न, वो भी शायद तुम्हें बधाई देने के लिए ही इस ओर आ रहे हैं. शिकारी कुत्तों का नाम सुनते ही लोमड़ी थर-थर कांपने लगी. वो बुरी तरह डर गई क्योंकि उसे लगा कि अब अगर वो थोड़ी देर भी यहां रुकी तो ये मुर्गा भले ही उसका शिकार बने न बने लेकिन वो खुद इन शिकारी कुत्तों का शिकार ज़रूर बन जाएगी, इसलिए उसने अपनी जान बचाना ही मुनासिब समझा और आव देखा न ताव बस उल्टी दिशा में भाग खड़ी हुई.

भागती हुई लोमड़ी को मुर्गे ने हंसते हुए कहा- अरे- बहन, कहां भाग रही हो, अब तो हम सब दोस्त हैं तो डर किस बात का, थोड़ी देर रुको. लोमड़ी बोली कि भाई दोस्त तो हैं लेकिन शायद शिकारी कुत्तों को अब तक यह खबर नहीं मिली और बस यह कहते हुए लोमड़ी वहां से ग़ायब हो गई!

सीख: चतुराई, सतर्कता और सूझबूझ से आप सामने संकट आने पर भी बिना डगमगाए आसानी से उससे बच सकते हो. कभी भी किसी के ऊपर या उसकी चिकनी छुपड़ी बातों पर आंख बंद करके आसानी से विश्वास नहीं करना चाहिए, धूर्त अत और चालाक लोगों से हमेशा सतर्क व सावधान रहना चाहिए क्योंकि ऐसे लोग ना किसी के दोस्त होते हैं और ना हाई भरोसे लायक वो सिर्फ़ अपने लिए सोचते हैं और सवार्थपूर्ति के लिए किसी की भी जान के सकते हैं.

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दो चूहे बहुत अच्छे दोस्त थे, लेकिन एक चूहा शहर में रहता था और दूसरा गांव में. दोस्त की याद आने पर एक दिन शहर के चूहे को दोस्त से मिलने का मन किया, तो वो चल पड़ा गांव की ओर. गांव पहुंचकर शहरी चूहा सोच रहा था कि ये कैसी जगह है, ना आलीशान इमारतें और ना सुख-सुविधा और साधन.

शहरी चूहा जैसे ही अपने दोस्त के यहां पहुंचा तो गांव के चूहे ने अपने दोस्त का स्वागत बहुत खुशी से किया. दोनों ने खूब सारी बातें की. उसके बाद गांव के चूहे ने कहा कि तुम हाथ-मुंह धोकर आराम करो मैं तुम्हारे लिए खाने का इंतज़ाम करता हूं. गांव का चूहा पास के बगीचे से ताज़ा फल और सब्ज़ियाँ लाया और उसने अपने दोस्त को बड़े प्यार से खाना परोसा. शहरी चूहे ने कहा कि ये कैसा खाना है, इसमें इतना स्वाद नहीं, देहाती चूहे ने कहा कि ये तो एकदम ताज़ा है, तुम्हें पसंद नहीं आया इसके लिए माफ़ी चाहता हूं.

ख़ैर खाने के बाद दोनों गांव की सैर पर निकल पड़े, शहरी चूहे ने गांव के खूबसूरत नजारे और हरियाली का आनंद लिया. शहरी चूहे ने दोस्त से विदा लेते वक्त अपने दोस्त को शहर आने का निमंत्रण दिया और कहा कि तुम वहां आकर देखना वहां का स्वादिष्ट खान-पान और सुख-सुविधा वाला रहन-सहन.

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एक दिन देहाती चूहे ने सोचा चलो शहर जाकर अपने दोस्त से मिल आता हूं और वहां का रहन-सहन देखकर मैं भी मज़े ले लेता हूं. देहाती चूहा शहर पहुंचा तो आलीशान, ऊंची-ऊंची इमारतें देख हैरान हो गया, उसने सोचा कि अब मैं भी यहीं रहूंगा. शहरी चूहा यहां एक बड़े से घर के बिल में रहता था. उतना बड़ा घर देख गांव का चूहा आश्चर्यचकित रह गया. शहरी चूहे ने दोस्त को कहा कि चलो खाना खाते हैं. उसने देखा टेबल पर कई तरह के व्यंजन और पकवान थे. दोनों चूहे खाने के लिए बैठ गए और गांव के चूहे ने पनीर का टुकड़ा चखा, उसे बड़ा स्वादिष्ट लगा, लेकिन अभी दोनों खाना खा ही रहे थे कि घर का नौकर आ गया और उनको वहां देख लकड़ी से उनको भगा दिया. शहर के चूहे ने गांव के चूहे को तुरंत बिल में छुपने को कहा. गांव का चूहा काफी डर गया था.

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शहर के चूहे ने गांव के चूहे को हिम्मत देते हुए कहा कि ये सब तो यहां के जीवन का हिस्सा है, सामान्य बात है. इसके बाद दोनों घूमने गए तो एक फ़ूड स्टोर में ढेर सारा खाना देख उनके मुंह में पानी आ गया. देहाती चूहा काफ़ी खुश हुआ तो शहरी चूहे ने शान दिखाते हुए कहा कि ये देखो इसको कहते हैं खाना, तुम्हारी गांव जैसा नहीं है यहां तो पनीर, बटर, टोस्ट, चीज़ aur ना जाने क्या-क्या है. लेकिन तभी सामने से एक बड़ी सी बिल्ली आती दिखी और चूहों को देख वो उनकी तरफ़ लपकी. शहरी चूहे ने कहा दोस्त जल्दी भागो, दोनों छुप गए और किसी तरह बच गए. देहाती चूहे ने तभी वहां एक पिंजरा देखा और उसके बारे में पूछा क्योंकि उसमें खाना था. शहरी चूहे ने कहा इस खाने के लालच में मत आना, इसमें जाओगे तो पकड़े जाओगे.

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इसके बाद दोनों घर लौट आए लेकिन तभी घर के मालिक का बेटा अपने डॉगी को लेकर आ गया. शहरी चूहे ने फिर अपने दोस्त को जल्दी से बिल में छुपने को कहा और दिलासा दिए कि थोड़ी देर में ये कुत्ता चला जाएगा. कुत्ते के जाने के बाद दोनों चूहे बिल से बाहर आए. इस बार गांव का चूहा पहले से भी ज्यादा डरा हुआ था, क्योंकि लगातार इतने डरावने हादसों से उसकी जान पे बन आई थी. गांव के चूहे ने अपने दोस्त से जाने के लिए इजाजत मांगी और कहा तुमने मेरा ख़याल रखा और स्वादिष्ट खाना भी खिलाया इसके लिए तुम्हारा बहुत-बहुत शुक्रिया, लेकिन भले ही यहां कितनी भी सुविधाएं हैं पर ये भी सच है कि यहां सुकून और शांति नहीं, क्योंकि यहां हर पल जान का जोखिम है और मैं हर दिन अपनी जान को जोखिम में डालकर नहीं रह सकता दोस्त. स्वादिष्ट भोजन और सुख-सुविधाएं अपनी जगह है लेकिन मानसिक सुकून और जान की क़ीमत से बड़ा तो कुछ भी नहीं.
उसके बाद देहाती चूहा गांव के लिए निकल गया और गांव पहुंचकर ही उसने चैन की सांस ली, क्योंकि गांव का सुकून, मानसिक शांति और ताज़ा हवा में जो बात है वो शहरी जीवन में नहीं.

सीख: जान के जोखिम और इतने खतरों से भरी आराम की जिंदगी में सुकून कहां? सुरक्षित जीवन ही सुखी जीवन है, क्योंकि सुख-सुविधाओं और तरह-तरह के टेस्टी भोजन से कहीं ज़्यादा ज़रूरी मन का संतोष और मानसिक शांति व सुकून है!

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एक बार बादशाह अकबर अपने शहजादे के साथ दरबार में पहुंचे. उनका शहज़ादा उनकी गोद में खेल रहा था जिसे देख दरबार में मौजूद हर कोई कह रहा था कि शहजादा दुनिया का सबसे खूबसूरत बच्चा है. सभी की बात सुनकर बादशाह अकबर ने भी कहा कि उनका शहजादा दुनिया का सबसे सुंदर बच्चा है. अकबर की इस बात पर सभी हामी भरते हैं, सिवा बीरबल के, तभी अकबर बीरबल से पूछते हैं कि तुम्हारा इस बारे में क्या कहना है, तुम चुप क्यों हो?

बीरबल: जहांपनाह शहजादा सुंदर है, लेकिन मेरे ख्याल से वो पूरी दुनिया का सबसे सुंदर बच्चा नहीं है.

अकबर: तो तुम्हारे कहने का क्या मतलब है कि शहजादा सुंदर नहीं है?

बीरबल: महाराज, मेरा कहने का मतलब ये नहीं कि शहज़ादा सुंदर नहीं, लेकिन दुनिया में और भी सुंदर बच्चे होंगे.

अकबर: बीरबल अगर ऐसी बात है तो तुम उसे हमारे समक्ष लेकर आओ, जो दुनिया में सबसे सुंदर बच्चा है.

बादशाह की बात सुनकर बीरबल कुछ दिन तक बच्चे की खोज करके दरबार में आते हैं. बीरबल को दरबार में अकेले देख अकबर खुश होकर कहते हैं, तुम अकेले क्यों आए हो, क्या इसका ये मतलब है कि तुम्हें शहजादे से ज़्यादा खूबसूरत बच्चा नहीं मिला? यही सच है ना?

बीरबल: जहांपनाह, मैंने सबसे सुंदर बच्चा खोज लिया है.

अकबर: अगर बच्चा मिल गया है, तो तुम उसे दरबार में क्यों नहीं लाए?

बीरबल: महाराज, मैं उसे दरबार में लेकर नहीं आ सकता, पर मैं आपको उस तक लेकर जा सकता हूं. लेकिन हमें वेष बदलना होगा.

Akbar Birbal Story

अकबर: ठीक है, जब तुम इतने आश्वस्त हो तो हम कल सुबह वेष बदलकर उस बच्चे को देखने जाएंगे.

अगले दिन सुबह बीरबल बादशाह अकबर को एक झोपड़ी के पास लेकर जाता है, जहां एक छोटा-सा बच्चा मिट्टी में खेल रहा होता है.

बीरबल: जहांपनाह वो रहा सबसे सुंदर बच्चा.

अकबर: बीरबल, तुम्हारी यह हिम्मत कि तुमने एक बदसूरत और झोपड़ी में रहने वाले बच्चे को संसार का सबसे सुंदर बच्चा बता दिया. इस बदसूरत बच्चे का हमारे शहज़ादे से क्या मुक़ाबला?

बादशाह की बातें सुनकर बच्चा जोर-जोर से रोने लगता है, जिसे सुनकर उसकी मां झोपड़ी से आती है और गुस्से में कहती है, तुम लोगों की इतनी हिम्मत? मेरे बच्चे को बदसूरत कैसे कह दिया? मेरा बच्चा दुनिया का सबसे सुंदर बच्चा है. अगर दोबारा मेरे बच्चे को बदसूरत कहा, तो मैं तुम दोनों की हड्डी-पसली एक कर दूंगी.

उसके बाद वो मां अपने बच्चे को चुप कराकर खिलाने लगती है और कहती है, मेरा राजा बेटा… मेरा बच्चा दुनिया का सबसे सुंदर बच्चा है. मेरा बेटा सबसे प्यारा और सुंदर है.

बीरबल: महाराज अब आपको सब समझ में आ गया होगा कि मैं क्या कहना चाहता था.

अकबर: बीरबल मैं अच्छे से समझ गया हूं कि तुम्हारा क्या मतलब था.

Akbar-Birbal Story

बीरबल: महाराज, हर बच्चा उनके माता-पिता के लिए दुनिया का का सबसे सुंदर बच्चा ही होता है. जहांपनाह, मैं बस इतना चाहता हूं कि आप शहजादे को अच्छी तालीम दें और उन्हें चापलूसों से दूर रखें.

अकबर: बीरबल, तुम वाक़ई मेरे सच्चे मित्र और हितैषी हो, तुमने बेबाक़ होकर बिना डरे सच कहा और मेरी आंखें खोल दीं. तुमने फिर साबित कर दिया कि तुम वफ़ादार हो और हमारा व राज्य का भला चाहते हो.

सीख: चापलूसों से बचकर रहना चाहिए और सच बोलने वाले पर भरोसा करना चाहिए. इतनी समझ रखो कि कौन चापलूस है और कौन हितैषी. इसके अलावा, कभी अपने औहदे या किसी चीज का घमंड नहीं करना चाहिए.

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एक गांव में मन्थरक नाम का जुलाहा यानी बुनकर रहता था. वो मेहनत से अपना काम करता था पर वो बेहद गरीब था. एक बार जुलाहे के उपकरण, जो कपड़ा बुनने के काम आते थे, टूट गए. जुलाहा चाहता था जल्द से जल्द उपकरण बनजाएं ताकि उसका परिवार भूखा ना रहे, लेकिन उपकरणों को फिर बनाने के लिये लकड़ी की जरुरत थी. जुलाहा लकड़ीकाटने की कुल्हाड़ी लेकर समुद्र के पास वाले जंगल की ओर चल पड़ा. बहुत ढूंढ़ने पर भी उसे अच्छी लकड़ी नहीं मिली तबउसने समुद्र के किनारे पहुंचकर एक वृक्ष देखा, उसकी लकड़ी उत्तम थी तो उसने सोचा कि इसकी लकड़ी से उसके सबउपकरण बन जाएंगे. लेकिन जैसे ही उसने वृक्ष के तने में कुल्हाडी़ मारने के लिए हाथ उठाया, उसमें से एक देव प्रकट हएऔर उसे कहा, मैं इस वृक्ष में वास करता हूं और यहां बड़े ही आनन्द से रहता हूं और यह पेड़ भी काफ़ी हराभरा है तो तुम्हेंइस वृक्ष को नहीं काटना चाहिए. 

जुलाहे ने कहा, मैं बेहद गरीब हूं और इसलिए लाचार हूं, क्योंकि इसकी लकड़ी के बिना मेरे उपकरण नहीं बनेंगे, जिससे मैंकपड़ा नहीं बुन पाऊंगा और मेरा परिवार भूखा मर जाएगा. आप किसी और वृक्ष का आश्रय ले लो. 

देव ने कहा, मन्थरक, मैं तुम्हारे जवाब से प्रसन्न हूं, इसलिए अगर तुम इस पेड़ को ना काटो तो मैं तुम्हें एक वरदान दूंगा, तुममांगो जो भी तुमको चाहिए. 

मन्थरक सोच में पड़ गया और बोला, मैं अभी घर जाकर अपनी पत्‍नी और मित्र से सलाह करता हूं कि मुझे क्या वर मांगना चाहिए. 

देव ने कहा, तुम जाओ मैं तब तक तुम्हारी प्रतीक्षा करता हूं. 

गांव में पहुंचने पर मन्थरक की भेंट अपने एक मित्र नाई से हो गई. उसने दोस्त को सारा क़िस्सा सुनाया और पूछा, मित्र, मैं तुमसे सलाह लेने ही आया हूं कि मुझे क्या वरदान मांगना चाहिए.

नाई ने कहा, क्यों ना तुम देव से एक पूरा राज्य मांग को, तुम वहां के राजा बन जाना और मैं तुम्हारा मन्त्री बन जाऊंगा. जीवन में सुख ही सुख होगा.

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मन्थरक को मित्र की सलाह अच्छी लगी लेकिन उसने नाई से कहा कि मैं अपनी पत्‍नी से सलाह लेने के बाद ही वरदान का निश्चय करुंगा. मंथरक को नाई ने कहा कि मित्र तुम्हारी पत्नी लोभी और स्वार्थी है, वो सिर्फ़ अपना भला और फायदा ही सोचेगी. 

मन्थरक ने कहा, मित्र जो भी है आख़िर मेरी पत्नी है वो तो उसकी सलाह भी ज़रूरी है. घर पहुंचकर वह पत्‍नी से बोला, जंगल में आज मुझे एक देव मिले है और वो मुझसे खुश होकर एक वरदान देना चाहते हैं, बदले में मुझे उस पेड़ को नहीं काटना है. नाई की सलाह है कि मैं राज्य मांग लूं और राजा बनकर सुखी जीवन व्यतीत करूं, तुम्हारी क्या सलाह है?

पत्‍नी ने उत्तर दिया, राज्य-शासन का काम इतना आसान नहीं है, राजा की अनेकों जिम्मेदारियाँ होती हैं, पूरे राज्य और जनता की सोचनी पड़ती है. इसमें सुख कम और कष्ट ज़्यादा हैं. 

मन्थरक को पत्नी की बात जम गई और वो बोला, बात तो बिलकुल सही है. राजा राम को भी राज्य-प्राप्ति के बाद कोई सुख नहीं मिला था, हमें भी कैसे मिल सकता है ? किन्तु राज्य की जगह वरदान में क्या मांगा जाए?

मन्थरक की पत्‍नी ने कहा, तुम सोचो कि तुम अकेले दो हाथों से जितना कपड़ा बुनते हो, उससे गुज़र बसर हो जाता है, पर यदि तुम्हारे एक सिर की जगह दो सिर हों और दो हाथ की जगह चार हाथ हों, तो तुम दुगना कपड़ा बुन पाओगे वो भी तेज़ीसे, इससे ज़्यादा काम कर पाओगे और ज़्यादा कमा भी पाओगे, जिससे पैसे ज़्यादा आएंगे और हमारी ग़रीबी दूर होजाएगी. 

मन्थरक को पत्‍नी की बात इतनी सही लगी कि वो वृक्ष के पास वह देव से बोला, मैंने सोच लिया है, आप मुझे यह वर दो कि मेरे दो सिर और चार हाथ हो जाएं. 

मन्थरक की बात सुन देव ने उसे उसका मनचाहा वरदान दे दिया और उसके अब दो सिर और चार हाथ हो गए. वो खुशहोकर गांव की तरफ़ चल पड़ा, लेकिन इस बदली हुई हालत में जब वह गांव  में आया, तो लोग उसे देखकर डर गए और लोगों ने उसे राक्षस समझ लिया. सभी लोग राक्षस-राक्षस कहकर सब उसे मारने दौड़ पड़े और लोगों ने उसको पत्थरों सेइतना मारा कि वह वहीं मर गया

सीख: यदि मित्र समझदार हो और उसकी सलाह सही लगे, तो उसे मानो. अपनी बुद्धि से काम लो और सोच-समझकर ही कोई निर्णय लो. बेवक़ूफ़ की सलाह और उसपे अमल आपको हानि ही पहुंचाएगी. 

एक गांव में युधिष्ठिर नाम का कुम्हार रहता था. एक दिन वह शराब के नशे में घर आया तो अपने घर पर एक टूटे हुए घड़े से टकराकर गिर पड़ा और उस घड़े के जो टुकड़े जमीन पर बिखरे हुए थे, उनमें से एक नुकीला टुकड़ा कुम्हार के माथे में घुस गया, जिससे उस स्थान पर गहरा घाव हो गया. वो घाव इतना गहरा था कि उसको भरने में काफ़ी लंबा समय लगा. घाव भर तो गया था लेकिन कुम्हार के माथे पर हमेशा के लिए निशान बन गया था.

कुछ दिनों बाद कुम्हार के गांव में अकाल पड़ गया था, जिसके चलते कुम्हार गांव छोड़ दूसरे राज्य में चला गया. वहां जाकर वह राजा के दरबार में काम मांगने गया तो राजा की नज़र उसके माथे के निशान पर पड़ी. इतना बड़ा निशान देख राजा ने सोचा कि अवश्य की यह कोई शूरवीर योद्धा है. किसी युद्ध के दौरान ही इसके माथे पर यह चोट लगी है.

राजा ने कुम्हार को अपनी सेना में उच्च पद दे दिया. यह देख राजा के मंत्री और सिपाही कुम्हार से ईर्ष्या करने लगे. लेकिन वो राजा का विरोध नहीं कर सकते थे, इसलिए चुप रहे. कुम्हार ने भी भी बड़े पद के लालच में राजा को सच नहीं बताया और उसने सोचा अभी तो चुप रहने में ही भलाई है!

समय बीतता गया और एक दिन अचानक पड़ोसी राज्य ने आक्रमण कर दिया. राजा ने भी युद्ध की तैयारियां शुरू कर दी. राजा ने युधिष्ठिर से भी कहा युद्ध में भाग लेने को कहा और युद्ध में जाने से पहले उससे पूछना चाहा कि उसके माथे पर निशान किस युद्ध के दौरान बना, राजा ने कहा- हे वीर योद्धा! तुम्हारे माथे पर तुम्हारी बहादुरी का जो प्रतीक है, वह किस युद्ध में किस शत्रु ने दिया था?

Panchatantra Ki Kahani
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तब तक कुम्हार राजा का विश्वास जीत चुका था तो उसने सोचा कि अब राजा को सच बता भी दिया तो वो उसका पद उससे नहीं छीनेंगे क्योंकि वो और राजा काफ़ी क़रीब आ चुके थे. उसने राजा को सच्चाई बता दी कि महाराज, यह निशान मुझे युद्ध में नहीं मिला है, मैं तो एक मामूली गरीब कुम्हार हूं. एक दिन शराब पीकर जब मैं घर आया, तो टूटे हुए घड़े से टकराकर गिर पड़ा. उसी घड़े का एक नुकीले टुकड़ा मेरे माथे में गहराई तक घुस गया था जिससे घाव गहरा हो गया था और यह निशान बन गया.

राजा सच जानकर आग-बबूला हो गया. उसने कुम्हार को पद से हटा दिया और उसे राज्य से भी निकल जाने का आदेश दिया. कुम्हार मिन्नतें करता रहा कि वह युद्ध लड़ेगा और पूरी वीरता दिखाएगा, अपनी जान तक वो राज्य की रक्षा के लिए न्योछावर कर देगा, लेकिन राजा ने उसकी बात नहीं सुनी और कहा कि तुमने छल किया और कपट से यह पद पाया. तुम भले ही कितने की पराक्रमी और बहादुर हो, लेकिन तुम क्षत्रियों के कुल के नहीं हो. तुम एक कुम्हार हो . तुम्हारी हालत उस गीदड़ की तरह है जो शेरों के बीच रहकर खुद को शेर समझने लगता है लेकिन वो हाथियों से लड़ नहीं सकता! इसलिए जान की परवाह करो और शांति से चले जाओ वर्ना लोगों को तुम्हारा सच पता चलेगा तो जान से मारे जाओगे. मैंने तुम्हारी जान बख्श दी इतना ही काफ़ी है!

कुम्हार चुपचाप निराश होकर वहां से चला गया.

सीख: सच्चाई ज़्यादा दिनों तक छिप नहीं सकती इसलिए हमेशा सच बोलकर सत्य की राह पर ही चलना चाहिए. झूठ से कुछ समय के लिए फ़ायदा भले ही हो लेकिन आगे चलकर नुक़सान ही होता है. इतना ही नहीं कभी भी घमंड में और अपने फ़ायदे के लिए सुविधा देखकर सच बोलना भारी पड़ता है!

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