iron

आयरन की कमी से होनेवाला एनीमिया दुनियाभर में ख़तरनाक रूप से चिंता का विषय बनता जा रहा है. आमतौर पर ज्यादातर बीमारियों की जड़ें भोजन की मात्रा या उनमें आवश्यक पोषक तत्वों की कमी से जुड़ी होती हैं. विकासशील दुनिया में खानपान में अनियमितता काफ़ी देखने को मिलती है. इस संबंध में भारत में 52 फीसदी गर्भवती महिलाएं आयरन की कमी से पीड़ित हैं. यह संख्या भारत जैसे देश के लिए बहुत ज्यादा है.

आयरन की कमी और एनीमिया पर कई गायनाकोलॉजिस्‍ट, ऑब्‍सटेट्रिशियन, इंफर्टिलिटी स्पेशलिस्ट डॉक्टरों ने महत्वपूर्ण जानकारियां दीं.
डॉ. शिल्पी सूद का कहना है कि जितनी बड़ी संख्या में आयरन की कमी से जूझ रही गर्भवती महिलाएं मेरे पास इलाज के लिए आती हैं, यह वाकई अफ़सोसजनक है. लेकिन इससे भी ज़्यादा चिंताजनक बात यह है कि इस संख्या में पिछले दो दशकों से कोई भी सुधार नहीं हुआ है. अब समय आ गया है, जब बड़े पैमाने पर फैलते जा रहे इस मुद्दे के समाधान के लिए एक निर्णायक जन स्वास्थ्य नीति बनाई जाए. कई दशकों से सरकारें इस संबंध में जागरूकता उत्पन्न करने के लिए कई अभियान चलाने और इस समस्या पर शुरुआत से ही लगाम लगाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन अभी तक इस दिशा में पर्याप्त सफलता नहीं मिल पाई है. जब हम आयरन की कमी से निपटने के नज़रिए की जांच करें, तो इस कार्यक्रम के मुख्य केंद्रबिंदुओं में से एक लक्षणों की जल्दी पहचान होना चाहिए. आयरन की कमी के लक्षणों को पहचानना अक्सर काफ़ी मुश्किल होता है, क्योंकि यह दूसरी बीमारियों के भेष में छिपकर सामने आ सकता है. आयरन की कमी से होनेवाली बीमारी सामान्य रोग के लक्षणों में मिल सकती है.

थकान और भूख ना लगना…
डॉ. राजुल त्यागी का भी मानना है कि शरीर में लौह तत्व की कमी आमतौर पर सबसे अधिक देखे जानेवाला लक्षण बहुत ज़्यादा थकान होना और कमज़ोरी है. मरीज़ों को अक्सर यह शिकायत रहती है कि लंबे समय से रहनेवाली थकान की वजह से उन्हें नियमित दिनचर्या का पालन करने में भी परेशानी होती है. हालांकि लोग इसे सहज रूप से गर्भावस्था से जोड़ देते हैं. इसे अक्सर एनीमिया का लक्षण माना जाता है.
थकान के अलावा एनीमिया से पीड़ित गर्भवती महिलाओं की त्वचा का रंग पीला हो जाता है.
वह अक्सर सीने में दर्द या सांस लेने में तकलीफ़ होने की शिकायत करती हैं.
इसके अलावा पुराना सिरदर्द, चक्कर आना और बेहोशी आना है.
मरीज़ को महसूस हो सकता है कि उसके सिर में पर्याप्त रक्त का प्रवाह नहीं हो रहा है.
जब ये सभी लक्षण एक समूह में पाए जाते हैं, तो सबसे पहला कदम मरीज़ का हीमोग्लोबिन लेवल चेक करने के लिए हीमोग्लोबिन (एचबी) टेस्ट करना होता है. जब एनीमिया के अन्य बीमारियों के लक्षणों से मिलने की पुष्टि होती है, तो एनीमिया की जांच अलग से की जा सकती है. हमने यह भी पाया है कि सूजन, जीभ में दर्द और नाजुक होकर नाख़ूनों का टूटना भी आयरन की कमी से होनेवाले एनीमिया रोग के लक्षण है.
थकान के साथ एनीमिया का दूसरा लक्षण, जो आमतौर पर सभी मरीज़ों में पाया जाता है, वह है उनकी भूख में कमी.

डॉ. माधुरी पटेल के अनुसार, आयरन की कमी से जूझ रहे मरीज़ों में यह देखा गया है कि उनकी भूख काफ़ी कम हो जाती है. यह काफ़ी ख़तरनाक संकेत है. इस स्थिति से निपटने के लिए हमें तुरंत कदम उठाने चाहिए. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन मरीज़ों में आयरन की कमी हो जाती है, उनका हीमोग्लोबिन लेवल बढ़ाने में हम मदद करते हैं. इसके लिए ज़रूरी है कि वह पौष्टिक भोजन करें, क्योंकि उन्हें कुछ निश्चित मात्रा में ही सप्लिमेंट्स दिए जा सकते हैं. लेकिन यहां यह बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है कि जब गर्भवती महिलाओं को भूख कम लगती है, तो वे पर्याप्त मात्रा में आवश्यकतानुसार पौष्टिक भोजन नहीं कर पातीं, जो आयरन की कमी को दूर करने के लिए ज़रूरी है. तब यह और गंभीर चिंता का विषय बन जाता है कि गर्भवती महिलाओं में आयरन की कमी का उनके भ्रूण में पल रहे शिशु पर हानिकारक प्रभाव हो सकता है. सबसे ख़राब स्थिति यह भी हो सकती है कि नवजात शिशु भी एनीमिया से पीड़ित हो.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्‍लूएचओ) ने हीमोग्‍लोबिन के स्‍वस्‍थ स्‍तर के लिए बेंचमार्क के तौर पर 12 ग्राम रहने की अनुशंसा की है.

एहतियात व उपाय…
डॉ. मीना सामंत का मानना है कि जब आयरन की कमी से निपटने की बात आती है, तो भारत को एक साथ कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. हालांकि इस संबंध में नीति निर्धारित करने के लिए पहला कदम यह होगा कि लोगों में हरी पत्तेदार सब्ज़ियों, चुकंदर और गाजर जैसे शरीर में ख़ून बनानेवाली लाल सब्ज़ियों से भरपूर संतुलित भोजन करने की ज़रूरत के संबंध में जागरूकता फैलाई जाए. यहां यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि भारत में उन मुद्दों से भी निपटना पड़ता है, जो ख़ासतौर पर यहीं पाए जाते हैं. इसका एक प्रमुख उदाहरण यह है कि हमें गर्भवती महिलाओं की आंतों को कीड़ों के संक्रमण से बचाने के लिए भी सक्रिय रहने की ज़रूरत है. यह भारत में आयरन की कमी का सामान्य कारण है. बड़े पैमाने पर पर्याप्त एहतियात व उपाय अपनाना ही आयरन की कमी को दूर करने का एकमात्र रास्ता है. जब कभी किसी को अपने शरीर में आयरन की कमी से जुड़ा कोई सामान्य लक्षण महसूस हो, तो ऐसी स्थिति में तुरंत डॉक्टर की सलाह लें, क्योंकि जल्दी जांच से हमेशा बेहतर इलाज का रास्ता खुलता है.

हालांकि यह स्थिति डरानेवाली प्रतीत होती है, लेकिन एनीमिया पर जीत हासिल करना संभव है. हमें मज़बूती से इस चुनौती का मुक़ाबला करना चाहिए. एनीमियामुक्त भारत बनाने की दिशा में महिलाओं को इस दिशा में पहला कदम उठाना याद रखना चाहिए. उन्हें अपना हीमोग्लोबिन टेस्ट कराना चाहिए और अपना हीमोग्लोबिन लेवल 12 ग्राम से ज़्यादा बरक़रार रखना चाहिए.

– ऊषा गुप्ता

यह भी पढ़ें: महिलाओं के स्‍वास्‍थ्‍य और तंदुरुस्ती से जुड़ी ज़रूरी बातें… (Important Information About Women’s Health And Fitness)

Iron Deficiency Anaemia

वॉटर सोल्यूबल विटामिन्स

ये ऐसे विटामिन्स हैं, जो न शरीर में बनते हैं और न ही शरीर में जमा होते हैं, इसलिए इन्हें डायट और सप्लीमेंट के ज़रिए ही लिया जा सकता है.

कौन-से हैं विटामिन्स?

– विटामिन सी और ज़्यादातर विटामिन बी टाइप्स वॉटर सोल्यूबल हैं.

विटामिन बी: बी 1 (थियामिन), बी 2 (राइबोफ्लेविन), बी 3 (नियासिन), बी 5
(पैंटोथेनिक एसिड), विटामिन बी 6, बी 7 (बायोटिन), बी 9 (फॉलिक एसिड) और बी 12 इस गु्रप के विटामिन्स हैं. ये आपके मेटाबॉलिज़्म को बेहतर बनाते हैं, रक्तसंचार को संतुलित रखते हैं और शरीर में ऊर्जा का संचार बनाए रखते हैं.

विटामिन सी: इसे ‘एस्कॉर्बिक एसिड’ भी कहते हैं. विटामिन सी में एंटीऑक्सीडेंट प्रॉपर्टीज़ भी होती हैं. यह हड्डियों के
साथ-साथ कार्टिलेज, दांतों, मसल्स, ब्लड वेसल्स आदि को भी स्ट्रॉन्ग बनाए रखता है. साथ ही यह मसूड़ों और मांसपेशियों की सुरक्षा करता है और घावों को तेज़ी से भरने में मदद करता है.

Vitamins

यह भी पढ़ें: वेट लॉस टिप ऑफ द डे: 7 सीक्रेट्स ऑफ वेट लॉस (Weight Loss Tip Of The Day: 7 Secrets Of Weight Loss)

 

कब और कैसे लें?

– वॉटर सोल्यूबल विटामिन्स खाली पेट शरीर में ज़्यादा अच्छी तरह एब्ज़ॉर्ब होते हैं, इसलिए सुबह-सुबह लेना ज़्यादा फ़ायदेमंद होगा.

– कुछ भी खाने के आधे घंटे पहले इसे लें या फिर खाने के 2 घंटे बाद लें.

– विटामिन सी और बी 12 कभी एक साथ न लें, वरना बी 12 अच्छी तरह एब्ज़ॉर्ब नहीं हो पाएगा. अगर आप दोनों सप्लीमेंट्स ले रहे हैं, तो दोनों के बीच 2 घंटे का गैप रखें.

– विटामिन बी कॉम्पलेक्स के साथ विटामिन डी ले सकते हैं.

फैट सोल्यूबल विटामिन्स

इनकी बहुत कम मात्रा में शरीर को ज़रूरत होती है. ज़रूरत से ज़्यादा होने पर ये टॉक्सिक लेवल पर पहुंच जाते हैं, जो आपके लिए हानिकारक हो सकता है.

कौन-से हैं विटामिन्स?

– विटामिन ए, विटामिन डी, विटामिन ई और विटामिन के फैट सोल्यूबल विटामिन्स हैं. ये हमारे लिवर और फैटी टिश्यूज़ में जमा होते रहते हैं, इसलिए इनकी ज़रूरत उतनी नहीं होती, जितनी वॉटर सोल्यूबल फैट्स की. ज़रूरत से ज़्यादा इनका इस्तेमाल आपके लिए नुक़सानदेह हो सकता है. एक्सपर्ट्स कहते हैं कि अगर आप रोज़ाना पोषण से भरपूर संतुलित भोजन ले रहे हैं, तो आपको सप्लीमेंट्स लेने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन आज हमारी लाइफस्टाइल जिस तरह बदल गई है, ऐसे में ख़ासतौर से शहरी महिलाओं में विटामिन डी की कमी पाई जा रही है, जिसकी पूर्ति उन्हें सप्लीमेंट्स लेकर करनी पड़ रही है.

विटामिन ए: यह बोन ग्रोथ, रिप्रोडक्शन और इम्यून सिस्टम को मज़बूत बनाए रखने में
महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. यह बैक्टीरिया और जर्म्स से लड़ने की ताक़त देता है और साथ ही  हेल्दी व़िज़न, स्किन, बोन्स और बॉडी टिश्यूज़ को मेंटेन  रखता है.

कब और कैसे लें?

– विटामिन ए कभी भी सुबह-सुबह खाली पेट न लें. इससे आपको अपच या हार्टबर्न की समस्या हो सकती है.

– क्योंकि यह फैट सोल्यूबल विटामिन है, इसलिए इसे हमेशा फैटवाले खाने के
साथ लें.

– इसे आप दूध, दही, लिवर, ऑलिव ऑयल, साल्मन फिश, एवोकैडो आदि के साथ ले सकते हैं.

– विटामिन ए को एब्ज़ॉर्ब करने के लिए अपने डायट में पर्याप्त ज़िंक शामिल करें. इसके लिए आप काजू, बादाम, चिकन, काबुली चना, किडनी बीन्स आदि लें.

– वेट लॉस के लिए अगर कोई सप्लीमेंट ले रहे हैं, तो अवॉइड करें, वरना लो फैट के कारण विटामिन ए का पूरा फ़ायदा आपको नहीं मिलेगा.

विटामिन ई: ग्लोइंग स्किन और शाइनी हेयर के लिए विटामिन ई बेहद ज़रूरी है. यह एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर है. साथ ही फ्री रैडिकल्स से हमारी सुरक्षा भी करता है.

कब और कैसे लें?

– विटामिन ए की तरह इसे भी खाने के साथ लें.

– आप चाहें, तो लंच या डिनर के साथ इसे ले सकते हैं.

– इसे खाली पेट कभी न लें.

यह भी पढ़ें: कोलेस्ट्रॉल लेवल तेज़ी से घटाने के 10+ असरदार व आसान उपाय (10+ Natural Ways To Lower Your Cholesterol Levels)

 

Vitamins

विटामिन डी: यह ‘सनशाइन विटामिन’ भी कहलाता है, क्योंकि यह हमें सूरज की रोशनी से मिलता है. यह हार्ट डिसीज़ जैसी गंभीर बीमारियों से हमें बचाता है. साथ ही हमारे डिप्रेशन को कम करके वेट लॉस में भी मदद करता है.

कब लें?

– एक्सपर्ट्स की मानें, तो विटामिन डी ऐसा सप्लीमेंट है, जिसे आप खाली पेट, खाने के साथ, सुबह, दोपहर या रात- कभी भी ले सकते हैं.

– हालांकि रात के व़क्त विटामिन डी लेने से कुछ लोग नींद की समस्या की शिकायत करते हैं, अगर आपके साथ भी ऐसा हो रहा है, तो आप उसे सुबह के व़क्त लें.

– फैट सोल्यूबल होने के नाते इसे खाने के साथ लेना ज़्यादा फ़ायदेमंद माना जाता है.

– इसे विटामिन के 2 के साथ लेने से हड्डियां मज़बूत बनती हैं.

विटामिन के: हेल्दी हार्ट, हेल्दी बोन्स, बोन डेन्सिटी में, मेंस्ट्रुअल साइकल में ब्लीडिंग को कम करने में और कैंसर से बचाव में यह काफ़ी मदद करता है. यह ब्लड क्लॉटिंग में फ़ायदेमंद है. हालांकि अक्सर इसे अनदेखा किया जाता है, इसलिए इसे ‘फॉरगॉटेन विटामिन’ भी कहा जाता है.

कब लें?

– फैटयुक्त भोजन के साथ लें.

– इसे विटामिन डी, कैल्शियम, विटामिन सी के साथ लेना ़ज़्यादा फ़ायदेमंद होता है.

– प्रेग्नेंट या ब्रेस्टफीडिंग करानेवाली महिलाएं बिना डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन के इसे न लें.

प्रीनैटल विटामिन्स

महिलाओं के लिए प्रीनैटल विटामिन्स काफ़ी फ़ायदेमंद साबित होते हैं, इसलिए इनके सेवन, इफेक्ट्स और साइड इफेक्ट्स के बारे में सभी को पता होना चाहिए. कहने को इन्हें विटामिन्स कहते हैं, पर इनमें मिनरल्स भी शामिल हैं.

डॉक्टर्स के मुताबिक़, जो महिलाएं कंसीव करना चाहती हैं, उन्हें प्रेग्नेंसी के एक साल पहले से ही फॉलिक एसिड लेते रहना चाहिए. प्रेग्नेंसी के दौरान भी रोज़ाना उन्हें प्रीनैटल विटामिन्स लेते रहना चाहिए. कभी भी प्रीनैटल विटामिन्स की डबल डोज़ न लें. वैसे तो प्रेग्नेंसी के दौरान डॉक्टर्स ख़ुद ही बताते हैं कि कौन-सा विटामिन कब लें, फिर भी प्रेग्नेंसी के दौरान विटामिन्स लेने से पहले डॉक्टर को इन बातों के बारे में बताएं-

– मॉर्निंग सिकनेस है या नहीं.

– उल्टी स़िर्फ सुबह हो रही है या पूरे दिन.

– दिनभर चक्कर आता है या स़िर्फ किसी एक समय पर आदि.

यह भी पढ़ें: Personal Problems: पीरियड्स देरी से आने के क्या कारण हो सकते हैं? (What Could Be The Reasons For Delayed Periods?)

Correct Vitamins
कौन-से हैं विटामिन्स?

फॉलिक एसिड (विटामिन बी 9), आयरन और कैल्शियम.

फॉलिक एसिड: इसे ‘विटामिन बी 9’ या ‘फोलेट’ भी कहते हैं. जहां यह महिलाओं को बर्थ डिफेक्ट से बचाता है, वहीं गर्भावस्था के दौरान गर्भ के ब्रेन डेवलपमेंट, सेल्स डेवलपमेंट और टिश्यू ग्रोथ में भी मदद करता है. यह रेड सेल्स को बढ़ाने में मदद करता है और साथ ही अल्ज़ाइमर, कैंसर, डायबिटीज़, हार्ट प्रॉब्लम्स जैसी गंभीर बीमारियों से बचाव में मदद करता है.

कब और कैसे लें?

– सारे प्रीनैटल विटामिन्स खाली पेट लेने चाहिए यानी खाना खाने के 1 घंटा पहले या फिर खाना खाने के 2 घंटे बाद.

– कोशिश करें कि फॉलिक एसिड रोज़ाना निर्धारित एक ही समय पर लें. इसके लिए चाहें तो रिमाइंडर लगा लें.

– कोशिश करें कि फॉलिक एसिड लेने के 2 घंटे पहले और 2 घंटे बाद तक कोई एंटासिड्स या एंटीबायोटिक्स न लें.

आयरन: यह रेड ब्लड सेल्स के निर्माण में मदद करता है, जिससे आप एनीमिया की समस्या से बच जाते हैं. यह आपके इम्यून सिस्टम को मज़बूत बनाता है, जिससे आप जल्दी बीमार नहीं पड़ते. आयरन कई गंभीर बीमारियों से भी आपकी रक्षा करता है. ख़ासतौर से महिलाओं के लिए आयरन बहुत ज़रूरी है, क्योंकि पीरियड्स और प्रेग्नेंसी के दौरान उन्हें ज़्यादा ब्लड की ज़रूरत होती है, इसलिए उनकी डायट आयरन से भरपूर होनी चाहिए.

कब और कैसे लें?

– आयरन सुबह ब्रेकफास्ट के साथ लेना ज़्यादा फ़ायदेमंद होता है, पर किसी और की बजाय इसे विटामिन सी के साथ लेने से यह पूरी तरह एब्ज़ॉर्ब हो जाता है, इसलिए इसे आप ऑरेंज जूस के साथ लें.

– आयरन-कैल्शियम कभी भी एक साथ न लें, वरना कैल्शियम आयरन को एब्ज़ॉर्ब नहीं होने देगा.

– इसे लेने के दो घंटे पहले और दो घंटे बाद तक कोई डेयरी प्रोडक्ट न लें.

कैल्शियम: हर कोई जानता है कि हड्डियों की मज़बूती के लिए कैल्शियम कितना ज़रूरी है, पर यह स़िर्फ यही काम नहीं करता. कैल्शियम आपके हार्ट, मसल्स और नर्व्स की सही फंक्शनिंग में भी मदद करता है. कुछ स्टडीज़ के मुताबिक कैल्शियम और विटामिन डी साथ में लेने से  कैंसर, डायबिटीज़ और हाई ब्लड प्रेशर की संभावना कम हो जाती है. महिलाओं को पीएमएस की तकलीफ़ों में राहत दिलाने के साथ-साथ ये उन्हें स्लिम-ट्रिम बनाए रखता है.

कब और कैसे लें?

– कैल्शियम मार्केट में दो तरह से मिलता है- कैल्शियम सिट्रेट और कैल्शियम कार्बोनेट. कैल्शियम कार्बोनेट सबसे सस्ता होता है, जिसे खाने के साथ लेना चाहिए.

– कैल्शियम सिट्रेट महंगा आता है, जिसे खाली पेट या खाने के साथ भी ले सकते हैं.

– आमतौर पर कैल्शियम से कब्ज़ की शिकायत नहीं होती, लेकिन अगर आपको हो रही है, तो कैल्शियम सिट्रेट आपके लिए बेहतर विकल्प होगा.

– एक दिन में 500 एमजी कैल्शियम किसी के लिए भी उपयुक्त है, पर अगर डॉक्टर ने 1000 एमजी प्रिस्क्राइब किया है, तो उसे दो बार में सुबह-शाम लें.

– अगर आयरन-कैल्शियम दोनों एक साथ ले रहे हैं, तो आयरन ब्रेकफास्ट में और कैल्शियम लंच या डिनर के साथ लें.

– कैफीन लेने के 3 घंटे बाद ही कैल्शियम लें.

– अनीता सिंह

यह भी पढ़ें: सेक्स के दौरान हो दर्द तो करें ये 5 आसान घरेलू उपाय (5 Home Remedies For Vaginal Pain And Dryness)

मैं 21 वर्षीया छात्रा हूं. मुझे हमेशा कमज़ोरी महसूस होती है. ब्लड टेस्ट में हीमोग्लोबिन कम आया है और गायनाकोलॉजिस्ट ने हैवी ब्लीडिंग को इसका कारण बताया, साथ ही पीरियड्स के 5वें दिन से 3 हफ़्तों के लिए हार्मोनल पिल्स लेने की सलाह दी है. क्या यह ज़रूरी है? कृपया, मार्गदर्शन करें.

– रेखा खोसला, नोएडा.

मैं समझ सकती हूं कि इस उम्र में हार्मोनल कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स लेने की सलाह को लेकर आप परेशान हैं. दरअसल, हार्मोनल पिल्स के ज़रिए एक आर्टिफिशियल साइकल तैयार होता है, जिससे आपको ब्लीडिंग कम होती है. पीरियड्स के 5वें दिन से पिल्स लेने के कारण शुरुआत से ही आपके हार्मोंस दब जाते हैं. क्योंकि आपका हीमोग्लोबिन भी कम है, इसलिए दवाओं के साथ-साथ यह ध्यान देना भी ज़रूरी है कि आपको बेवजह हैवी ब्लीडिंग तो नहीं हो रही.

यह भी पढ़ें: कॉन्ट्रासेप्टिव पिल्स से सर्वाइकल कैंसर हो सकता है?

7e12d3436c2daf8b98d99a5afc5b79a2

पिछली डिलीवरी में मेरे बच्चे का वज़न स़िर्फ 2 किलो था, पर डॉक्टर ने इसका कारण नहीं बताया. अब मैं दोबारा प्रेग्नेंट हूं और मुझे डर लग रहा है कि कहीं इस बार भी मेरे बच्चे का वज़न कम न हो. पिछली बार मैं स़िर्फ 3 बार चेकअप के लिए गई थी. इस बार क्या करूं?

– आरोही हांडे, नासिक.

जन्म के बाद जिन बच्चों का वज़न ढाई किलो से कम होता है, उन्हें लो वेट बर्थ कहते हैं. इसका एक अहम् कारण प्री मैच्योर डिलीवरी हो सकती है. इसके अलावा प्रेग्नेंसी में मां का ग़लत खानपान, बार-बार इंफेक्शन, धूम्रपान और अल्कोहल भी इसके कारण हो सकते हैं. जैसा कि आपने बताया कि पिछली बार आप स़िर्फ 3 बार चेकअप के लिए गई थीं, इससे साफ़ पता चलता है कि पिछली प्रेग्नेंसी के दौरान आपने कितनी लापरवाही बरती. इस दौरान सही खानपान और नियमित रूप से डॉक्टर से चेकअप बहुत ज़रूरी होता है. नियमित चेकअप से डॉक्टर समय-समय पर आपके और बच्चे की सही स्थिति के बारे में जानकारी देते रहते हैं. वैसे भी गर्भावस्था के दौरान खानपान, परहेज़, ज़रूरी सावधानियों के अलावा नियमित चेकअप करवाना बेहद ज़रूरी है.

यह भी पढ़ें: क्या ब्रेस्टफीडिंग से बच्चे को एचआईवी ट्रांसफर हो सकता है?

नेचुरल तरीकों से बूस्ट करें हीमोग्लोबिन लेवल 

  • अपने भोजन में आयरन से भरपूर ओट्स, बार्ली जैसे साबूत अनाज की मात्रा बढ़ा दें.
  • हीमोग्लोबिन लेवल बढ़ाने में विटामिन सी काफ़ी मददगार साबित होता है. संतरा, मोसंबी, लीची, अमरूद और नींबू को अपने डायट में शामिल करें.
  • खजूर, मुनक्का और एप्रीकोट्स में भी भरपूर मात्रा में आयरन होता है. यह आपके हीमोग्लोबिन लेवल को बूस्ट करने में मदद करेगा.
  • स्ट्रॉबेरीज़ काफ़ी फ़ायदेमंद मानी जाती है. इसे जूस, स्मूदी या किसी रेसिपी में जैसे चाहें, वैसे अपने डायट में शामिल करें.
  • बीटरूट, आलू, ब्रोकोली, पालक का भरपूर सेवन करें.

 

rajeshree-kumar-167x250 
डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]

 

हेल्थ से जुड़ी और जानकारी के लिए हमारा एेप इंस्टॉल करें: Ayurvedic Home Remedies

महिलाओं की ऐसी ही अन्य पर्सनल प्रॉब्लम्स पढ़ें

मेरे गायनाकोलॉजिस्ट ने मुझे प्रेग्नेंसी के तीसरे महीने से लेकर डिलीवरी के छह हफ़्ते बाद तक आयरन (Iron) टैबलेट्स लेने की सलाह दी है, पर क्या डिलीवरी के बाद भी इसकी ज़रूरत होती है? कृपया, उचित सलाह दें. 
– सुखदा गिल, पटना.

हमारे देश में बहुत-सी महिलाएं आयरन (Iron) की कमी से होनेवाली बीमारी एनीमिया से पीड़ित रहती हैं. दरअसल, प्रेग्नेंसी के दौरान शरीर में बहुत-से बदलाव होते हैं और डिलीवरी के बाद भी महिलाओं को एक्स्ट्रा कैलोरीज़ की ज़रूरत पड़ती है. ऐसे में आयरन बच्चों में वज़न कम होने की समस्या को दूर करता है और मां को एनीमिया से भी बचाता है. यही वजह है कि आपके गायनाकोलॉजिस्ट ने डिलीवरी के बाद भी आयरन टैबलेट्स लेने की सलाह दी है. डिलीवरी के बाद भी टैबलेट्स के अलावा पोषणयुक्त बैलेंस डायट लें.

यह भी पढ़ें: क्या गर्भनिरोधक गोलियों के लिए 6 महीने का गैप ज़रूरी है?

 iron deficiency
हमारी शादी को 6 साल हो गए हैं, पर पति को अज़ूस्पर्मिया (स्पर्म्स न होना) होने के कारण अभी तक हमारा कोई बच्चा नहीं है. डॉक्टर ने हमें स्पर्म डोनर के ज़रिए प्रेग्नेंसी की सलाह दी है. पर यह हमें थोड़ा अजीब लग रहा है. कृपया, गाइड करें.
– माला नेगी, दुर्ग.

हर कपल की ज़रूरतें अलग-अलग होती हैं, इसलिए आपका निर्णय आपको ख़ुद लेना होगा. अगर आप बच्चा चाहती हैं, तो स्पर्म डोनेशन आपके लिए एक अच्छा ऑप्शन है. आप अकेले नहीं हैं, कई लोग इस समस्या से जूझ रहे हैं. आमतौर पर इंफर्टिलिटी क्लीनिक्स में स्पर्म बैंक होते हैं, जहां पर इंफर्टिलिटी स्पेशलिस्ट से आप मदद ले सकते हैं. फिर भी अगर आप कंफर्टेबल नहीं हैं, तो बच्चा गोद भी ले सकती हैं. अंतिम निर्णय तो आपको ही लेना होगा.

यह भी पढ़ें: मुझे हमेशा कमज़ोरी क्यों महसूस होती है?

डिलीवरी के बाद क्या खाएं, क्या नहीं?

– डिलीवरी के बाद कम से कम एक-डेढ़ महीने तक महिलाओं को गैस पैदा करनेवाली और पचने में हैवी चीज़ें, जैसे- चना, कच्चा केला, मीट, आलू, फूलगोभी, पत्तागोभी, मूंगफली और बेकरी प्रोडक्ट्स अवॉइड करने चाहिए.

– खाने में लाल मिर्च और गरम मसाले खाने से बचें. इनकी बजाय चुटकीभर कालीमिर्च पाउडर का इस्तेमाल करें.

– बहुत ज़्यादा खट्टी चीज़ें, जैसे नींबू और कच्चे आम न खाएं.

– खाने में हर पत्तेदार सब्ज़ियां, जैसे- पालक, मेथी, कमल ककड़ी और ब्रोकोली, टिंडा, परवल जैसी सब्ज़ियां लें.

– दाल में मूंग और मसूर की दालें खाएं.

– गोंद, सोंठ और मेथी के लड्डू बनाकर खाएं.

– खाने में अजवायन और काले तिल भी शामिल करें.

यह भी पढ़ें: शादी से पहले गर्भनिरोधक की जानकारी कितनी ज़रूरी है?
rajeshree-kumar-167x250
डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]  

 

 महिलाओं की ऐसी ही अन्य पर्सनल प्रॉब्लम्स पढ़ें

 

हेल्थ से जुड़ी और जानकारी के लिए हमारा एेप इंस्टॉल करें: Ayurvedic Home Remedies