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आख़िर क्यों होती है पेट की परेशानी? (Irritable Bowel Syndrome – Symptoms, Causes And Treatment)

चाट-पकौड़े, बासी खाना, पास्ता….कुछ ऐसे खाद्य पदार्थ होते हैं, जिन्हें खाने पर पेट का गड़बड़ (Stomach Disorder) होना स्वाभाविक है. यदि आप उन बदनसीब लोगों में से हैं जिन्हें कुछ भी खाने के बाद पेट की परेशानी हो जाती है तो आप इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (Irritable Bowel Syndrome) के शिकार हैं. जानिए, इस बीमारी के बारे में विस्तार से.

Bowel Syndrome

क्या है यह बीमारी?
आईबीएस यानी इरिटेबल बाउल सिंड्रोम पेट से जुड़ा हुआ एक ऐसा विकार है, जो पाचन तंत्र की कार्यप्रणाली में लंबे समय से या बार-बार उत्पन्न हो रहे परिवर्तनों के कारण होता है. आईबीएस का तनाव और चिंता से गहरा संबंध है, क्योंकि ये एक-दूसरे को ट्रिगर करते हैं.
लक्षणः अक्सर पेट दर्द, पेट में ऐंठन, आंतों में सूजन, गैस, कब्ज़ और दस्त इत्यादि आईबीएस के प्रमुख लक्षण हैं.
कारणः आईबीएस क्यों और कैसे होता है, फ़िलहाल इसका कारण स्पष्ट नहीं हो पाया है, लेकिन कई ऐसे कारक हैं जो इसमें अपनी अहम् भूमिका निभाते हैं. आंतों की सतह पर मांसपेशियों की परतें होती हैं. ये एक लय में सिकुड़ती और फैलती हैं और यही भोजन को पेट से आंत की नली के ज़रिए मलाशय में ले जाती हैं. इरिटेबल बाउल सिंड्रोम से ग्रसित लोगों केपेट की आंतों में सिकुड़न सामान्य से ज़्यादा और अधिक समय के लिए होता है, जिसके कारण गैस, सूजन और दस्त की शिक़ायत होती है. इसके अलावा आंतों पर मौजूद बैक्टीरिया में असंतुलन के कारण भी यह समस्या होती है. जानते हैं 8 ऐसे कारक जो आंतों में संकुचन या सिकुड़न के लिए ज़िम्मेदार हो सकते हैं.
ग्लूटेन का सेवन
कई लोगों का मानना है कि ग्लूटेन का सेवन करने पर उनके पेट की तकलीफ़ बढ़ जाती है. ग्लूटेन एक प्रकार का ख़मीर होता है, जो आईबीएस के मरीज़ों के लिए अक्सर परेशानी का सबब बन जाता है. जिन लोगों को ग्लूटेन पचाने में दिक्कत होती है, उनके कोलोन में सूजन आ जाती है और उन्हें दस्त व गैस की समस्या होती है.
सुझाव- कई अध्ययनों से यह पता चला है कि आईबीएस से ग्रसित कुछ लोगों ने जब ग्लूटेन (गेहूं, जौ और राई) का सेवन बंद कर दिया, तब उनके दस्त के लक्षणों में सुधार देखने को मिला. अगर आपको भी ग्लूटेन को पचाने में दिक्कत होती है तो इसका सेवन बंद कर दें.

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 शराब पीने की आदत
अलग-अलग तरह के शराब में मौजूद शर्करा भी भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है, जो पेट में मौजूद जीवाणुओं के लिए भोजन का काम करती है. इस प्रक्रिया से पेट में गैस और सूजन होती है. शराब पीने की आदत आंतों के अच्छे बैक्टीरिया को नष्ट करती है, जिससे आपके पेट की तकलीफ़ ज़्यादा बढ़ जाती है.
सुझाव- पेट के अच्छे बैक्टीरिया को नुक़सान न पहुंचे, इसके लिए शराब का सेवन कम करने में ही भलाई है और इससे आपके आंतों को भी तकलीफ़ नहीं होगी.

विटामिन डी की कमी
विटामिन डी स़िर्फ हडि्डयों के लिए ही नहीं, बल्कि पेट के स्वास्थ्य के लिए भी बहुत ज़रूरी है. यह विटामिन शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए आवश्यक है. क्लिनिकल न्यूट्रिशन के यूरोपीय जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में इस बात का ख़ुलासा किया गया है कि इरिटेबल बाउल सिंड्रोम से पीड़ित व्यक्तियों में से जिन लोगों ने विटामिन डी सप्लीमेंट का सेवन किया, उनके लक्षणों में काफ़ी सुधार देखने को मिला.
सुझाव- अगर आपके शरीर में विटामिन डी की कमी है तो डॉक्टर से परामर्श करें और सप्लीमेंट की मदद से इस कमी को दूर करें.

अनिद्रा
एक अध्ययन में यह पाया गया है कि आईबीएस से पीड़ित महिलाएं दर्द, तनाव, चिंता और थकान से परेशान नज़र आती हैं, जिसके कारण उनकी नींद में खलल पैदा होती है, जो बिल्कुल भी ठीक नहीं है. ख़राब और अस्वस्थ नींद के चलते आईबीएस के लक्षणों में बढ़ोत्तरी हो सकती है.
सुझाव- स्वस्थ नींद की आदत अपनाएं और उसका नियमित रूप से पालन करें. सोने का एक सही समय निर्धारित करें. इससे आईबीएस के लक्षणों में सुधार के साथ-साथ तनाव और चिंता से भी राहत मिलेगी.

Bowel Syndrome

एक्सरसाइज़ की कमी
सप्ताह में कम से कम तीन बार शारीरिक क़सरत या एक्सरसाइज़ करने से आईबीएस से पीड़ित लोगों के पेट में गुड बैक्टीरिया में बढ़ोत्तरी होती है. इसके साथ ही तनाव और चिंता से राहत मिलती है. लेकिन एक्सरसाइज़ न करना या कम करना, कब्ज़ और दस्त जैसी परेशानी को और भी बढ़ा सकता है.
सुझाव- हफ़्ते में कम से कम पांच दिन क़रीब आधे से एक घंटे तक एक्सरसाइज़ करें. साइकिलिंग, योग, ताज़ी हवा में टहलना जैसी गतिविधियां आईबीएस के लक्षणों से राहत दिलाने में काफ़ी हद तक मदद कर सकती है.

आर्टिफिशियल स्वीटनर्स का उपयोग
अगर आप मिठास के लिए आर्टिफिशियल स्वीटनर्स का इस्तेमाल करते हैं तो आपको गैस, आंतों में सूजन और दस्त की शिक़ायत हो सकती है. आर्टिफिशियल स्वीटनर्स अच्छी तरह से अवशोषित नहीं हो पाते हैं, जिससे दूसरों की तुलना में आईबीएस से पीड़ित लोगों को ज़्यादा तकलीफ़ हो सकती है.
सुझाव- इससे बचने के लिए आर्टिफिशियल स्वीटनर्स का इस्तेमाल बंद कर दें और डायट सोडा व शुगर फ्री गम का उपयोग न के बराबर करें.

पीरियड्स
महिलाओं में आईबीएस होने की दोगुनी संभावना होती है. शोधकर्ताओं का मानना है कि इस स्थिति में हार्मोनल बदलाव काफ़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. महिलाओं के दो प्रमुख हार्मोन्स एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट को धीमा कर देते हैं, जिससे पीरियड्स के दौरान या उसके आस पास ये संकेत और लक्षण अधिक बदतर हो जाते हैं.
सुझाव- इससे बचने के लिए पीरियड्स के आस पास गैस पैदा करनेवाले खाद्य पदार्थों का सेवन करने से बचें. डायट और जीवनशैली में बदलाव लाएं, व्यायाम का समय बढ़ाएं.

अत्यधिक तनाव
अधिक तनाव के कारण आईबीएस के संकेत और लक्षण अधिक गंभीर हो जाते हैं, जैसे कि महीने के अंतिम सप्ताह या नई नौकरी का पहला सप्ताह. बता दें कि तनाव गंभीर रुप से लक्षणों को बढ़ा देता है, लेकिन उन्हें उत्पन्न नहीं करता.
सुझाव- आपको अपने मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने की ज़रूरत है. इससे पेट की समस्याओं पर क़ाबू पाने में बड़ी मदद मिलेगी.

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