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Kids Story: अमरूद किसका? (Amrood Kiska?)

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Kids Story: अमरूद किसका? (Amrood Kiska?)

कुछ बच्चे पार्क में खेल रहे थे. उनमें से दो दोस्त भी थे. खेलते-खेलते उन्हें दूर एक अमरूद का पेड़ नज़र आया. दोनों उस पेड़ के पास गए, तो देखा एक अमरूद लगा हुआ है. दोनों ने सोचा क्यों न इसको तोड़कर खाया जाए. पर दोनों के मन में एक सवाल था कि ये अमरूद कौन खाएगा. ख़ैर दोनों ने मिलकर अमरूद तोड़ लिया.

अब उनमें झगड़ा होने लगा, एक ने कहा कि मैंने यह पेड़ पहले देखा, तो यह अमरूद मेरा, दूसरे का कहना था कि इस अमरूद को मैंने पहले देखा, तो यह मेरा.

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दोनों का झगड़ा इतना बढ़ गया कि बाकी के बच्चे भी वहां आ गए. सबने पूछा कि क्यों लड़ रहे हो, तो उन्होंने बताया. उन बच्चों में से एक लड़के ने कह कि मैं तुम्हारे झगड़े का निपटारा कर सकता हूं. यह अमरूद मुझे दिखाओ.

 

उन दोनों ने उसे अमरूद दे दिया. वो लड़के मज़े से अमरूद खाने लगा और देखते ही देखते पूरा अमरूद खा गया. बाद में बोला, वाह अमरूद सच में बहुत ही मीठा था और हंसते हुए वहां से चला गया.

Bacho Ki Kahaniya

दोनों दोस्त देखते रह गए और फिर सोचने लगे कि काश, झगड़ा करने की बजाय यह अमरूद दोनों ने आधा-आधा बांट लिया होता, तो आज कोई और इसे नहीं हथिया सकता था.

सीख: इस कहानी से यही सीख मिलती है कि कभी भी छोटी-छोटी बात पर आपस में झगड़ा नहीं करना चाहिए, वरना दूसरे इसका फ़ायदा उठा लेते हैं. जो भी हो आपस में मिल-बांटकर ही फैसला करना चाहिए.

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Kids Story: कंजूस भेड़िया और शिकारी (The Hunter And The Miser Wolf)

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Kids Story: कंजूस भेड़िया और शिकारी (The Hunter And The Miser Wolf)

एक जंगल में एक बेहद ही कंजूस भेड़िया रहता था. वो इतना ज़्यादा कंजूस था कि अपने खाने में भी कंजूसी करता था. वो जो भी शिकार करता, उसका मांस कई दिनों तक बचाकर रखता, ताकि बाद में खा सके, जैसे- एक बार उसने हिरण का शिकार किया, तो पहले दिन स़िर्फ उसके कान खाए, अगले दिन कोई दूसरा अंग…

इस तरह वो हमेशा ही कंजूसी करता. इसकी वजह से वो बहुत ही कमज़ोर हो गया था. उसकी मरियल हालत देखकर जंगल के अन्य पशु भी उसका मज़ाक बनाते, पर उस पर कोई असर न होता.

कई बार तो उसके शिकार का मांस कई दिन तक पड़े रहने के कारण सड़ जाता, जिससे वो उसे खा ही नहीं पाता था. पर फिर भी कंजूसी की आदत वो छोड़ नहीं रहा था.

एक बार जंगल में एक शिकारी आया. उसने एक जंगली सुअर का शिकार करने के लिए तीर मारा, जैसे ही तीर सुअर को लगा, क्रोधित सुअर ने तेज़ी से दौड़ते हुए अपने नुकीले दांत शिकारी के पेट में गड़ा दिए, जिससे सुअर व शिकारी दोनों की ही मौत हो गई. कंजूस भेड़िया यह सब देख रहा था. उसे बड़ी ख़ुशी हुई कि उसके कई दिनों के खाने का बंदोबस्त हो गया. उसने सोचा इस मांस को तो मैं कम से कम दो महीने तक चलाऊंगा.

इसी बीच उसकी नज़र पास पड़े धनुष पर गई. उसने देखा कि धनुष के कोनों पर चमड़े की पट्टी लगी है. उसने सोचा कि क्यों न आज इस पट्टी को खाकर ही काम चला लूं, ताकि मांस बच जाए. कंजूस भेड़िए ने पट्टी को एक तरफ़ से काटा, उसके काटते ही धनुष सीधा हो गया और सीधे उसकी गर्दन को चीरता हुआ बाहर हुआ. वो भेड़िया वहीं मर गया.

सीख: ज़रूरत से ज़्यादा कंजूसी और लालच हमेशा नुकसान ही देती है. किफायती होना अलग होता है, पर कंजूसी होना फ़ायदेमंद नहीं.

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Kids Story: राजा और लेखक (Kids Story: Raja Aur Lekhak)

Raja Aur Lekhak

Raja Aur Lekhak

Kids Story: राजा और लेखक (Kids Story: Raja Aur Lekhak)

एक नगर में एक राजा था. एक दिन वो यूं ही टहलने निकला. घूमते-घूमते उसे किताबों का एक बड़ा-सा संग्रहालय नज़र आया. राजा उसमें गया, तो वहां ढेर सारी किताबें देखकर ख़ुश हो गया. राजा को लगा एक ही जगह पर इतनी सारी ज्ञानवर्द्धक किताबें तो बेहद फ़ायदेमंद है. राजा को उन किताबों में से एक किताब बहुत पसंद आई. वो उस किताब को लेकर घर चला आया. किताब पढ़कर राजा उस लेखक से बहुत प्रभावित हुआ, क्योंकि उसमें लेखक ने लिखा था कि किस तरह से उसने अपना सारा जीवन अकेले ही बिता दिया. उस लेखक ने अपने बीवी-बच्चों पर ज़रा भी ध्यान नहीं दिया और संपूर्ण जीवन समाज में भ्रमण करके बिता दिया.

राजा ने सोचा वो भी अपना पूरा जीवन समाज में भ्रमण करके ही बिताएगा. राजा ने सोचा कि पहले मैं उस लेखक से भी मिल लेता हूं, जिसने ये किताब लिखी है. राजा उस लेखक के गांव जाकर उसके घर गया. वहां जाकर राजा ने देखा कि वो लेखक तो मज़े से अपने बीवी-बच्चों के साथ रह राह है. राजा को बहुत दुख भी हुआ और गुस्सा भी आया कि इसकी किताब पढ़कर मैं समाज भ्रमण के लिए निकल रहा था, पर ये तो मज़े से यहां रह रहा है और किताब में गलत बात लिखी है.

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राजा ने उस किताब को दिखाते हुए लेखक से गुस्से में पूछा कि उसने यह झूठ क्यों लिखा? लेखक ने राजा से कहा कि यह किताब उसने समाज में भटके हुए लोगों को सही राह दिखाने के इरादे से लिखी है. लेखक ने कहा कि मेरा काम है समाज के लोगों का मार्गदर्शन करना, ताकि लोग अपना जीवन सुधार सकें. लेखक ने राजा से अपने साथ बाहर चलने को कहा. वो राजा को एक भाला बनाने वाले के पास ले गया और उसे एक अच्छा सा भाला दिखाने को कहा.

भाला लेकर लेखक ने राजा से कहा कि यह देखिए इस भाले को. राजा ने कहा मैं क्या करूं इसका. लेखक ने कहा कि यह भाला यह दुकान वाला बनाता है, फिर उसने दुकान वाले से कहा कि तुम भाला इतना अच्छा बनाते हो, तो क्या तुम युद्ध में नहीं जा सकते?

भाला बनाने वाले ने हंसते हुए कहा कि यह मेरा काम नहीं है. युद्ध में तो बड़े-बड़े वीर योद्धा जाते हैं, तो मैं कैसे जा सकता हूं, क्योंकि मेरा काम उनके लिए अच्छे से अच्छा भाला बनाने का है, युद्ध लड़ना उनका काम है. उसकी बात सुनकर लेखक ने राजा से कहा कि इसी तरह मेरा काम दूसरों को अपने लेखन के ज़रिए जीने की कला सिखाना है, इसका यह मतलब नहीं कि वह जीवन या वह कला मैं ख़ुद जानता हूं.

लेखक के तर्क से राजा समझ गए कि दरअसल उस किताब में लिखी बातों का क्या अर्थ है. राजा ख़ुश हुआ, लेखक और भाला बनाने वाले को ईनाम देकर वह वापस अपने महल लौट आया, ताकि एक शासक की तरह अपनी जनता का ख़्याल रख सके.

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कहानी- मोनालिसा (Short Story- Monalisa)

अचानक मुझे मम्मी के चेहरे में मोनालिसा के चेहरे का प्रतिबिंब दिखाई दिया. जैसे उनके चेहरे पर भी एक उदास-सी मुस्कुराहट थी और मन में जाने कितने दुख भरे राज़. यह क्या? मैंने मोनालिसा को देखा, तो उसमें मुझे अपनी मम्मी का चेहरा नज़र आया. मुझे मोनालिसा की उदास व रहस्यमयी मुस्कुराहट में अपनी मम्मी की मुस्कुराहट दिखाई दी. मेरी हथेलियां पसीने से भीग उठी थीं. यह आज मम्मी के चेहरे पर कौन-से भाव हैं, जो मेरे दिल तक सीधे पहुंच रहे हैं.

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पेरिस का लूव्र म्यूज़ियम देखने की बड़ी चाह थी मेरे मन में. अब से पहले कई बार मैं रजत से पूछ चुकी थी. “रजत, अंदर से क्यों नहीं देखा तुमने म्यूज़ियम अब तक? पेरिस में दो साल से रहकर भी नहीं गए?”

“दीदी, मुझे पेंटिंग्स का इतना शौक नहीं है न.”

मैंने उसे छेड़ा, “बस, तुम बाहर से ही लूव्र के साथ फोटो खिंचवाकर अपनी डीपी रखना.” रजत हंस पड़ा था. मम्मी, पापा और मैं यूरोप घूमने आए हुए हैं. रजत पेरिस में एमआयएम कर रहा है. आज हम लूव्र जा रहे हैं. विश्‍व के सबसे प्रसिद्ध  संग्रहालयों में से एक है लूव्र. लूव्र का पिरामिड पेरिस का सबसे मशहूर दर्शनीय स्थल है, जहां 35 हज़ार से ज़्यादा पेंटिंग्स और मूर्तियां हैं. यहां विन्ची की मोनालिसा शायद विश्‍व की सबसे मशहूर पेंटिंग है, माइकल एंजेलो का बनाया 2.15 मीटर ऊंचा स्टैचू उनकी महान कृतियों में से एक है. लूव्र पेरिस का सेंट्रल लैंडमार्क है. पेरिस आकर लूव्र तो जाना ही था.

पापा को पेंटिंग्स, मूर्तियां देखने का कभी ज़्यादा शौक तो नहीं रहा, पर यहां की कला देखकर कौन तारीफ़ किए बिना रह सकता है. पापा भी मुझे मंत्रमुग्ध से दिखे. पेंटिंग्स की ख़ूब फोटो ले रहे थे. उनकी नज़रों में प्रशंसा का भाव देख मुझे अच्छा लगा.

रजत… आज तो वह भी बोरियत के एक्सप्रेशंस नहीं दे पाया. इन पेंटिंग्स को देखकर वह भी हैरान था. कहने लगा, “मुझे तो लगा मैं आज बोर हो जाऊंगा, पर ये सब तो एक से एक मास्टरपीस हैं.”

और मुझे तो ये सब देखने में जो अतुलनीय आनंद आ रहा था… शब्दों में वर्णन नहीं कर सकती. मैंने एक नज़र मम्मी पर डाली. वे हम तीनों से काफ़ी पीछे थीं जैसे किसी जादू के घेरे में हर पेंटिंग के आगे खड़ी होतीं और अपलक पेंटिंग को निहारतीं. मैंने पापा को इशारा करके यह सीन दिखाया. पापा ने मम्मी को छेड़ा, “शुभा, हम भी हैं साथ में. हमें भूल गई क्या?”

मम्मी की नज़रें मुझसे मिलीं, तो मैंने नोट किया कि उनकी आंखों में नमी-सी है, जिसे वह बड़ी महारथ से सबसे छुपाने की नाकाम कोशिश कर रही हैं. नाकाम ही कहूंगी, क्योंकि मैंने तो देख ही लिया था न. बेटी हूं उनकी. जैसे वे मेरी बात मेरे बिना कहे जान जाती हैं, तो उनकी आंखों की यह नमी मुझसे भला कैसे छुप पाती. मैं प्रत्यक्षतः तो चुप रही, पर अब मेरा ध्यान मम्मी की भावभंगिमाओं पर ही लगा था. रजत ने इतने में मेरे कान में कहा, “दीदी, भूख लगी है. यह तो बहुत बड़ा म्यूज़ियम है. खाना खा लें?” एक बज रहा था. मम्मी के खाने का भी टाइम है यह. उन्हें भी भूख लगी होगी.

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मैंने मम्मी से कहा, “मम्मी, लंच कर लें? फिर यहीं आ जाएंगे.”

कुछ गीले-नरम से शब्द मेरे कानों में पड़े, “धैर्या, एक बात मानोगी?”

“बोलो, मम्मी.”

“तुम तीनों जाकर खा लो, मैं बाद में खा लूंगी, यहां से हटने का मन ही नहीं है.”

पापा भी कहने लगे, “नहीं शुभा, लगातार खड़े रहने और चलने से तुम्हारा बैकपेन बढ़ सकता है. तुम्हारा थोड़ा बैठना ज़रूरी है.”

“… पर एक बार इस विंग से एग्ज़िट कर दिया, तो शायद आ नहीं पाएंगे और अभी तो बहुत सारी पेंटिंग्स बची हैं, कहीं देखने से रह न जाएं.”

रजत ने कहा, “इतनी पेंटिंग्स हैं मम्मी, थोड़ी-बहुत रह भी गई, तो कोई बात नहीं.”

मम्मी परेशान-सी दिखीं. “ना… ना… बेटा, कुछ रह न जाए. धैर्या, प्लीज़ तुम तीनों जाओ, खा लो. मैं बाद में खा लूंगी बेटा.”

मैंने कहा, “ठीक है मम्मी, बाद में चलते हैं. बस थोड़ा जल्दी कर लो आप, अभी यह विंग काफ़ी बचा है.”

यह सुनकर मम्मी ने बहुत उत्साह से आगे क़दम बढ़ा दिए. बेहद ख़ूबसूरत कलाकृतियों के बीच कुछ समय और बीत गया. हमेशा समय पर खाने-पीनेवाली मम्मी को आज भूख-प्यास का होश ही नहीं था. लंच करते हुए भी उनके प्रफुल्लित चेहरे पर ज़रा भी थकान नहीं थी. नहीं तो अब तक हम यूरोप में जहां-जहां घूमे थे, मम्मी कभी थककर बैठ जातीं, तो कभी जल्दी से देखकर निपटा देतीं, पर लूव्र में तो यह मेरी कोई और ही मां थी, उनके चेहरे में कुछ तो ऐसा था, जो मैंने लंबे समय से नहीं देखा था. उसके बाद हम उस विंग में गए, जहां विन्ची की विश्‍व प्रसिद्ध मोनालिसा का चित्र बाहर ही लगा हुआ था. उस हॉल में भीड़ सबसे ज़्यादा थी. एक दीवार पर मोनालिसा थी और उसके सामने की दीवार पर द लास्ट सपर. पेंटिंग्स पर नज़र डालकर मैंने मम्मी को देखा. भीड़ में पेंटिंग के आगे जाकर खड़ी मम्मी पेंटिंग को एकटक देखती हुई. उनकी आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बहे चली जा रही थी. मेरे क़दम वहीं जड़ हो गए. मम्मी कभी मोनालिसा को देखतीं, तो कभी मुड़कर द लास्ट सपर को. जैसे उन्हें समझ ही न आ रहा हो कि पहले और ज़्यादा किसे देखें. रजत और पापा अपने-अपने फोन से तस्वीरें लेने में व्यस्त हो गए थे. मम्मी मोनालिसा को कई दिशाओं से देख रही थीं और मैं अपनी मां को… कभी इधर से, कभी उधर से चेहरे पर बच्चों जैसा भोलापन लिए जैसे किसी बच्चे को अचानक कई चीज़ें देखकर समझ नहीं आता न कि पहले कौन-सी चीज़ हाथ में ले. बच्चा कभी कुछ उठाता है, कभी कुछ. ऐसी ही स्थिति मम्मी की थी. इतनी भीड़ में कभी किसी पेंटिंग के सामने खड़ी होतीं, कभी किसी के. आंसू उनके गाल पर बहे चले जा रहे थे. अब मुझसे रुका नहीं गया. मम्मी के कंधे पर हाथ रखकर पूछा, “यह क्या मम्मी? रो क्यों रही हो? देखो कोई और रो रहा है यहां? तबीयत तो ठीक है न?”

मम्मी के आंसू और वेग से बहने लगे. उत्साह के आवेग से रुंधे कंठ से निकला, “धैर्या, ये मोनालिसा… मैंने इसकी पढ़ाई की है और ये लास्ट सपर… मुझे आज तक याद था कि इसमें ऊपर तीन चिड़िया हैं और यह कुत्ता…देखो इसके कलर्स देखो. मैंने सब पढ़ा है ये. कभी सोचा ही नहीं था कि इन पेंटिंग्स को जीवन में अपनी आंखों से देखूंगी. देखो धैर्या, कितनी सुंदर कलर स्कीम. तुम्हें पता है, हमने पढ़ा है यह सब… ये बेहतरीन कलाकार और मोनालिसा को देखो जैसे अभी कुछ कहेगी. इसे बनाने की हम बहुत कोशिश करते थे और फिर कितना हंसते थे. इसके तो आसपास भी नहीं फटक सके हम. दिनभर इसके स्केच बनाने की कोशिश करते थे हम. मेरी एक स्केच बुक तो इसी की प्रैक्टिस से भरी थी, पर ऐसी कहां बनती.” अचानक भीड़ से मम्मी संभलीं. माहौल का आभास हुआ, तो चुप हो गईं. ‘थोड़ा और देख लूं’ कहकर भीड़ में और आगे जाकर देखने की कोशिश करने लगीं.

मैं तो पाषाणवत् खड़ी की खड़ी रह गई. रजत और पापा इधर-उधर हो गए थे. मैं एक कोने में जाकर मम्मी को ही देखते खड़ी हो गई. मेरी आंखें भी भर आई थीं, यह आभास मुझे अभी हुआ था.

यह क्या हो गया हमसे. ड्रॉइंग एंड पेंटिंग में एमए किया था मम्मी ने. मम्मी कितनी पेंटिंग्स बनाती थीं. हमें पढ़ाते हुए बैठे-बैठे हमारी किसी भी नोटबुक के आख़िरी पेज पर स्केच बनाती रहती थीं. स्कूल में बच्चे भी पूछते थे, किसने बनाया. हम गर्व से बताते थे मम्मी ने. मम्मी ने ही तो हमेशा हमारे ड्रॉइंग के होमवर्क किए थे और हमने क्या किया? उनका यह शौक घर और हमारी ज़िम्मेदारियों के बीच कब पीछे छूटता चला गया, हममें से किसी ने परवाह भी नहीं की. पूछा भी नहीं किसी ने कि मम्मी अब क्यों नहीं कुछ बनातीं? क्या अब उनका मन नहीं होता? वे घर के ही काम निपटाती रहीं. उनका एक ही तो शौक था. वह भी खो गया. हम सब कैसे भूल गए कि वे भी एक कलाकार हैं. अपनी कला को गुम होते देख कैसे उनका मन चैन पाता रहा होगा? आज मुझे याद आ रहा है कि कैसे तबीयत ख़राब होने पर भी वे मेरा ड्रॉइंग का होमवर्क करने बैठ गई थीं. कहा था, “अरे, मैं कभी कुछ ड्रॉ करने से थक सकती हूं क्या? जल्दी बताओ क्या बनाना है. बहुत दिन से कुछ नहीं बनाया.”

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जो हमारा ड्रॉइंग का काम करने के लिए बीमारी में भी आतुर हो उठती थीं, उन्हें और कुछ बनाने का मौक़ा क्यों नहीं मिला? उनके अंदर का कलाकार बस हमारा होमवर्क करने में ही संतोष पाता रह गया. बड़ी भूल हुई हमसे. अचानक मुझे मम्मी के चेहरे में मोनालिसा के चेहरे का प्रतिबिंब दिखाई दिया. जैसे उनके चेहरे पर भी एक उदास-सी मुस्कुराहट थी और मन में जाने कितने दुख भरे राज़. यह क्या? मैंने मोनालिसा को देखा, तो उसमें मुझे अपनी मम्मी का चेहरा नज़र आया. मुझे मोनालिसा की उदास व रहस्यमयी मुस्कुराहट में अपनी मम्मी की मुस्कुराहट दिखाई दी. मेरी हथेलियां पसीने से भीग उठी थीं. यह आज मम्मी के चेहरे पर कौन-से भाव हैं, जो मेरे दिल तक सीधे पहुंच रहे हैं. अचानक एक धुंधली-सी याद आई, जब मैं एक दिन स्कूल से लौटी थी, तो मम्मी अपना पेंटिंग का सामान रोते हुए स्टोर रूम में रख रही थीं. नहीं, बात कुछ और थी. यह घर की व्यस्तता नहीं थी, जिसने मम्मी को उनकी कला से दूर किया था. यह कुछ और था. हां, याद आ रहा है. मैंने मम्मी से तब पूछा था कि यह सामान यहां क्यों रख रही हो. मम्मी ऐसे ही मुस्कुराई थीं. हां, ऐसी ही हंसी थी… मोनालिसा जैसी. कहा था, “अब कहां टाइम मिलता है.” उस दिन मुझे खाना खिलाते हुए भी मम्मी अपने आंसू पोंछ रही थीं. क्यों रोई थीं मम्मी उस दिन? क्यों नहीं उसके बाद कभी कुछ बनाया उन्होंने? मैं जानकर रहूंगी कि उस दिन हमारे स्कूल जाने के बाद क्या हुआ था घर में? हमें यह ग़लती सुधारनी होगी. मैं मन ही मन बहुत कुछ सोच चुकी थी. हम चारों इकट्ठा हुए. दूसरे हॉल में जाना था, जहां एक से एक लैंडस्केप्स थे. मम्मी फिर ख़ुशी से झूम उठीं. यहां इस समय ज़्यादा भीड़ नहीं थी. मैंने बात छेड़ी. “मम्मी, इन सबमें कौन-सी बेस्ट है?” मम्मी ने हर तरफ़ देखकर बताया, “यह वाली.”

“मम्मी, ड्रॉइंगरूम के लिए ऐसी बनाओगी?” मम्मी ने एक ठंडी सांस ली, “पता नहीं, क्या कहूं?”

“कहना क्या है. जाते ही ऐसी बनाना. घर के हर रूम में आपकी पेंटिंग होनी चाहिए. हमारे घर में भी एक कलाकार है और हम यहां दूसरे की वाहवाही कर रहे हैं.” मेरे कहने के ढंग पर मम्मी हंस पड़ीं. बोलीं, “देखेंगे.”

मैंने पापा और रजत को जल्दी से इशारा कर दिया था. पहले दोनों कुछ समझे नहीं, फिर मैंने उन्हें आंखों ही आंखों में बहुत कुछ कहा, जिसे दोनों ने सुन लिया. दोनों ने कहा, “हां, ज़रूर बनाना.”

रजत ने कहा, “हमें आपके जितना इंटरेस्ट नहीं है तो क्या हुआ. मैं जब अगली बार इंडिया आऊं, तो आपकी पेंटिंग ड्रॉइंगरूम में होनी चाहिए.” मम्मी ने पापा को देखा. वे भी फ़ौरन बोले, “हां, शुभा, बहुत सालों से तुमने कुछ नहीं बनाया. अब एक मास्टरपीस हो ही जाए.” मम्मी ने इस बात पर जैसे पापा को देखा, मुझे फिर मोनालिसा की मुस्कुराहट याद आई. कुछ था मम्मी की मुस्कुराहट में. क्या था, मुझे जानना था.

मैंने उन्हें कब ऐसा देखा था, याद नहीं. मेरे दिल में जैसे कुछ उमड़ा जा रहा था. कैसी होती हैं मांएं. घर-बच्चों में अपने ही दिल को क्या अच्छा लगता है भूल जाती हैं. कभी ज़िक्र भी नहीं करतीं. कभी जतलाती भी नहीं कि उनका क्या कब छूटता चला गया, पर हमें उन्हें अब याद दिलाना था. मैंने बहुत कुछ सोच लिया था. जाते ही उनके लिए कलर्स, कैनवास. सब सामान आना था यह तय था. पर मुझे उससे पहले बहुत कुछ जानना था. डिनर करते हुए जब हम चारों साथ बैठे, तो टॉपिक लूव्र ही था. हम चारों को ही लूव्र बहुत अच्छा लगा था. मैंने बात छेड़ ही दी, “मम्मी, आपने पेंटिंग बनाना क्यों छोड़ा था?” मम्मी के हाथ का निवाला हाथ में ही रह गया. उन्होंने पापा को देखा. मुझे पलभर में ही मम्मी की आंखों में बहुत कुछ दिखा… दुख, निराशा, नमी. मेरी और रजत की आंखें भी पापा पर टिक गईं.

रजत ने कहा, “हां मम्मी, बताओ न.” मम्मी की आंखों में पापा को जो भी कुछ नज़र आया होगा, पापा ने गंभीर स्वर में शर्मिंदगी के साथ कहा, “मैं बताता हूं. यह सब मेरी ग़लती है. तुम्हारे दादा-दादी शुभा के पेंटिंग के इस शौक से नफ़रत करते थे. अम्मा को लगता था यह बेकार में पैसे उड़ानेवाला शौक है. उन्हें पता नहीं क्यों, शुभा पर ग़ुस्सा आता रहता था. बहुत बाद में मैंने महसूस किया अम्मा शुभा के गुणों से जलती थीं. शुभा में जो गुण हैं, वे अम्मा में नहीं थे. इतना धैर्य, त्याग उनमें कहां था. मैं उनकी इकलौती संतान था. वे शुभा की पेंटिंग, उसके हुनर को मेरे सामने इतने बुरे रूप में रखतीं कि एक दिन मैं उन पर अंधविश्‍वास कर शुभा की इस कला का अपमान कर बैठा. अम्मा ने मेरे सामने इसकी अधूरी पेंटिंग फाड़कर फेंक दी. मैं चुपचाप देखता रहा. अम्मा को कुछ नहीं कहा. उस दिन शुभा ने जिन नज़रों से मुझे देखा था, मैं अंदर तक शर्मिंदा हो गया था, पर अपने माता-पिता की ग़लत बातों के ख़िलाफ़ बोलने की हिम्मत कभी नहीं कर पाया.

शुभा ने उसी दिन अपना सामान उठाकर स्टोर रूम में रख दिया, फिर कभी कुछ नहीं बनाया. जो बच्चे शुभा से पेंटिंग्स सीखने आते थे, उन सबको शुभा ने अगले दिन ही सिखाने से भी मना कर दिया. मैं शुभा का जीवनसाथी हूं, उसका पति हूं, मैं अपने पति होने का फर्ज़ ठीक से नहीं निभा पाया. मैंने अपनी पत्नी के गुणों की कदर नहीं की. उसका दिल दुखाया है. सालों यह मन ही मन कितना जली होगी. एक कलाकार को अपनी भावनाएं व्यक्त करने से रोका मैंने. कैसे जी होगी यह. फिर भी कभी कोई शिकायत नहीं की. अम्मा-बाबूजी नहीं रहे, पर शुभा ने फिर कभी ब्रश नहीं उठाया. मैंने भी नहीं कहा, पर आज बच्चों के सामने तुमसे माफ़ी मांगता हूं शुभा.” पापा ने कहते-कहते मम्मी का हाथ पकड़ लिया.

“शुभा, जितना समय निकल गया, उसके लिए मुझे माफ़ कर दो. अब घर जाकर अपनी इस कला को नई ऊंचाइयों पर ले जाओ. क्लासेस लो, पेंटिंग्स बनाओ, सब कुछ करो, जो तुम्हें करना था. हम सब तुम्हारे साथ हैं. आज इतना अच्छा दिन था… लूव्र का दिन!  आज के दिन मुझे माफ़ कर दो.” मम्मी इस आख़िरी बात पर मुस्कुराईं, तो मुझे लगा मेरी मम्मी, मेरी मोनालिसा की इस मुस्कुराहट के आगे सारी दुनिया की मुस्कुराहट फीकी है. इस मुस्कुराहट में बहुत कुछ था, जो मेरे मन को पुलकित कर गया था.

Poonam ahmed

पूनम अहमद

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Kids Story: जलपरी और दो चोर (Kids Story: Jalpari And Two Thieves)

 

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Kids Story: जलपरी और दो चोर (Kids Story: Jalpari And Two Thieves)

दूर किसी जगह पर एक नीली झील थी, जहां एक जलपरी रहती थी. उस जलपरी का नियम था कि वो रोज़ शाम को कुछ समय के लिए बाहरी दुनिया में आती थी. कुछ समय बिताती और फिर नियमित समय पर लौट जाती. एक बार वहां से दो चोर जा रहे थे और उन्होंने जलपरी को देख लिया. उसे देखकर दोनों ने एक योजना बनाई कि क्यों न इसे पकड़कर हम शहर में बेच आएं, जिससे हमें अच्छे ख़ासे पैसे मिलेंगे.

दोनों ने मछली पकड़नेवाला जाल ख़रीदा और अगले दिन झील के किनारे इंतज़ार करने लगे. तभी उनकी नज़र एक लड़के पर पड़ी. वो भी वहां मछलियां पकड़ने आया था. दोनों चोरों ने उस लड़के से कहा कि यहां से भाग जाए, क्योंकि यह उनका इलाका है. उस लड़के ने कहा कि इस झील का किनारा काफ़ी दूर तक फैला है और यह बहुत बड़ी झील है, तो आप लोग यहां मछलियां पकड़ो, मैं थोड़ी दूर पर जाकर मछलियां पकड़ता हूं.

 

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उसकी बात सुनकर दोनों चोरों को बहुत ग़ुस्सा आया. उन्होंने उस लड़के से कहा कि वो यहां से तुरंत चला जाए, वरना उसकी पिटाई होगी. वो लड़का उन दोनों के इरादों से अंजान था, उसे हैरानी हुई, इसलिए वो थोड़ी दूर जाकर पेड़ के पीछे छिप गया.

Mermaid

थोड़ी देर बाद वो जलपरी बाहर आई, उसे देखकर लड़का भी हैरान हो गया. वो जलपरी बेहद ख़ूबसूरत थी. दोनों चोरों ने जलपरी पर जाल फेंक दिया. यह देखकर वो लड़का वहां आ गया. एक चोर ने अपने साथी से कहा कि तुम जलपरी को देखो, मैं इस लड़के को ठिकाने लगाता हूं. लड़के के पास एक बड़ा सा डंडा था, जिससे उसने चोर की ख़ूब पिटाई की. अपने साथी को पिटता देख, दूसरा चोर भी मदद के लिए आ गया. मौक़ा देखकर जलपरी जाल से छूट गई और झील में चली गई.

दोनों चोर मिलकर उस लड़के को पीटने लगे कि तभी वहां एक बड़ा-सा मगरमच्छा आ गया और दोनों चोरों पर हमला कर दिया. किसी तरह मगर से बचकर दोनों चोर भाग खड़े हुए.

दरअसल, उस मगर को जलपरी ने ही लड़के की मदद के लिए भेजा था. इस तरह वो लड़का रोज़ वहां आने लगा और जलपरी भी रोज़ उससे मिलने लगी. दोनों में बहुत ही गहरी दोस्ती हो गई.

सीख: हमेशा दूसरों की मदद के लिए आगे आना चाहिए. किसी को मुसीबत में देखकर भागना नहीं चाहिए, बल्कि ग़लत लोगों के इरादे भांपकर सही निर्णय लेना चाहिए.

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Akbar Birbal Ki Kahani

अकबर-बीरबल की कहानी: तेली और कसाई (Akbar-Birbal Tale: The Oil Man And The Butcher)

बादशाह अकबर (Akbar) का दरबार लगा हुआ था. तभी दरबान ने सूचना दी कि दो व्यक्ति अपने झगड़े का निपटारा करवाने के लिए आना चाहते हैं. बादशाह ने दोनों को बुलवा लिया. दोनों दरबार में आ गए और बादशाह के सामने सिर झुकाकर खड़े हो गए.

बादशाह ने पूछा कि कहो क्या समस्या है?

मेरा नाम काशी है, मैं तेल बेचने का काम करता हूं और हुजूर यह कसाई है. इसने मेरी से तेल खरीदा और साथ में मेरी पैसों की भरी थैली भी ले गया. जब मैंने इसे पकड़ा और अपनी थैली मांगी तो यह उसे अपनी बताने लगा, अब आप ही न्याय करें.

बादशाह ने दूसरे व्यक्ति से पूछा कि अब तुम कहो तुम्हें क्या कहना है?

कसाई से कहा- मेरा नाम रमजान है. जब मैंने अपनी दुकान पर आज मांस की बिक्री के पैसे गिनकर थैली जैसे ही उठाई, यह तेली आ गया और मुझसे यह थैली छीन ली. अब उस पर अपना हक जमा रहा है. आप ही न्याय करें.

राजा को समझ में नहीं आ रहा था कि दोनों में से कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ. दोनों की बातें सुनकर बादशाह सोच में पड़ गए और उन्होंने बीरबल से फैसला करने को कहा.

बीरबल ने वो पैसों की थैली ले ली और दोनों को कुछ देर के लिए बाहर भेज दिया. बीरबल ने सेवक से एक कटोरे में पानी मंगवाया और उस थैली में से कुछ सिक्के निकालकर पानी में डाले और पानी को गौर से देखा. फिर बादशाह से कहा- ये सिक्के रमजान कसाई के हैं.

बादशाह ने हैरान होकर पूछा कि भला बीरबल को कैसे पता चला?

बीरबल ने बादशाह को समझाया कि काशी एक तेली है, लेकिन इस पानी में सिक्के डालने से तेल का ज़रा-सा भी अंश पानी में नहीं उभर रहा है. अगर यह सिक्के तेली के होते तो उन पर तेल लगा होता और वह तेल पानी में भी दिखाई देता.

बादशाह ने भी पानी को गौर से देखा और फिर बीरबल की बात से सहमत हो गए.

बीरबल ने उन दोनों को दरबार में बुलाया और कहा- मुझे पता चल गया है कि यह थैली किसकी है. यह थैली रमजान कसाई की है. काशी, तुम झूठ बोल रहे हो.

बीरबल ने सिक्के डले पानी वाला कटोरा उसे दिखाते हुए कहा- यदि यह थैली तुम्हारी है तो इन सिक्कों पर कुछ-न-कुछ तेल अवश्य होना चाहिए, पर तुम भी देख लो तेल तो अंश मात्र भी नज़र नहीं आ रहा है.

काशी चुप हो गया और अपनी ग़लती उसने मान ली.

बीरबल ने रमजान कसाई को उसकी थैली दे दी और काशी को कारागार में डलवा दिया.

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कहानी- आत्मविश्‍वास (Short Story- Atmavishwas)

वहां जाकर उसे पता चला कि वह कुछ लोगों के मुक़ाबले कितनी अच्छी स्थिति में थी. वे औरतें जो जीती-जागती लाशें थीं, निराशा और अवसाद की दलदल में प्रायः डूब ही चुकी थी. तिरस्कृत, बलात्कृत, अवहेलित, बहिष्कृत नारी प्रतिमाएं, संवेदनाहीन, अनुभूति शून्य, उन्हें सहारे की आवश्यकता थी. अकल्पनीय भीषण हादसों का सामना करके पत्थर हो गई थीं वे.

उन्हें देखकर शालिनी जैसे अट्ठाइस बरस की नींद से जाग उठी. उसे महसूस हुआ कि वह यह काम कर सकती है, क्योंकि उनके दुखों की भाषा उसके लिए भी अजनबी नहीं है. ज़ख़्म उनके जैसे गहरे नहीं हैं तो क्या, कांटों की वेदना तो उसने भी अनुभव की है.

Short Story in Hindi

 

“मैं जा रहा हूं. दरवाज़ा बंद कर लेना. अब उठोगी भी कि टुकुर-टुकुर देखती रहोगी.”

शालिनी ने उठकर दरवाज़ा बंद कर लिया. इस तरह के अपमान के घूंट पीने की वह आदी हो गई थी. अब ठीक दस मिनट बाद सामनेवाले घर से शिखाजी निकलेंगी. उन्हें निकलते देखने का मोह वो संवरण नहीं कर पाती. शालिनी ने खिड़की के परदे को ज़रा-सा सरकाया और आंखें सामनेवाले घर पर गड़ा दीं.

क़लफ़वाली कॉटन साड़ी, सौम्य मेकअप, अनुभवी मुखमुद्रा, कंधे पर टंगी पर्स ओझल हो जाती, तो अनायास ही शालिनी कमर में खोंसे पल्लू को मुक्त करके चेहरे का पसीना रगड़-रगड़कर पोंछती.

ये लोग कॉलोनी में नए आए हैं. उस दिन परिचय के लिए घर आए थे. बड़ी असहज हो गई थी शालिनी.

“मैं शिखा गुप्ता.” उस महिला ने शिष्टता से उसे नमस्कार करते हुए पूछा “आपका नाम?” “जी, मैं शालिनी शर्मा.” शालिनी ने अचकचाकर जवाब दिया. बुद्धू, बेवकूफ़, गंवार, मूर्ख, घर में नित्य सुने जाने वाले विभिन्न नामों के कारण अपना असली नाम याद करने में उसे ख़ासी मश़क़्क़त करनी पड़ी.

“शालिनी… शालू मेरी छोटी बहन. हां, अपनी बहन को मैं इसी नाम से बुलाती हूं. तुम्हें मंज़ूर है?”

“जी…” शालिनी बुरी तरह हकला गई. इतने स्नेह से उसे किसी ने कभी बुलाया हो, याद नहीं पड़ता. वह अपलक उसे यूं ताकती रह गई जैसे उस जैसी अयोग्य महिला पर किसी ने आश्‍चर्यजनक रूप से कृपादान किया हो.

शिखाजी हंसमुख और मिलनसार थीं, पर व्यक्तित्व में ज़मीन-आसमान का अंतर शालिनी को उनसे दूर कर देता. फलतः परिचय यहीं तक सीमित रह गया.

शाम को वही उबाऊ क्रम. योगेशजी का ऑफ़िस से आगमन. शालिनी द्वारा चाय-नाश्ता पेश किया जाना, पति का उसमें ढेरों नुक्स निकालना, शालिनी के गंवार पहनावे पर उबलना, शालिनी का गरदन झुका लेना, स्वयं को कोसना, फिर खाना, फिर मीन-मेख और फिर जानलेवा रात.

शालिनी को परे धकेल दिया जाता. जिस तरह डिस्पोज़ेबल कप को इस्तेमाल के बाद तोड़-मरोड़कर फेंका जाता है. शरीर का पोर-पोर टीसने लगता, पर विरोध करना जैसे उसने सीखा ही नहीं था.

जब से ब्याहकर इस घर में आई, अपने लिए यह सुनती रही, “मुंह में ज़ुबान ही नहीं है. बिल्कुल गऊ है.

एक आदर्श बहू के लिए इससे बड़ा कॉम्प्लीमेंट क्या हो सकता है. चार भाई-बहनों में दूसरे क्रमांक की शालिनी को अपने भाई-बहनों से युक्तिपूर्ण और तार्किक संवाद करना तो अच्छी तरह आता था, पर माता-पिता ने बुज़ुर्गों के सामने कम बोलने के संस्कार दिए थे, जिन्हें वह अच्छी तरह निबाह रही थी.

सास की दुलारी बहू पति की आंख की किरकिरी बनी रही. उसकी एक-एक बात उन्हें काट खाने दौड़ती. गुण भी अवगुण नज़र आते.

बढ़ती उम्र की बेटियों ने भी मां को कभी सम्मान नहीं दिया. उनकी और योगेश की ख़ूब घुटती थी. उन तीनों में वह कभी शामिल होने की कोशिश करती तो उसे चावल में कंकर-सा निकाल कर अलग कर दिया जाता.

अब ऐसी भी गई- गुज़री नहीं?थी वह. बी.ए. द्वितीय वर्ष पास थी. परंतु इन कृतघ्न लोगों की चाकरी बजाते-बजाते कहीं की नहीं रही. समाचार कान पर पड़ते हैं, सुनती भी है. इतनी अज्ञानी भी नहीं थी कि समझ भी न पाती. बस चर्चा नहीं कर पाती थी. अपने विचारों को प्रकट करना वह भूल ही गई थी. बरसों पहले ज़ुबान बंद हो गई थी तो खुलती कैसे!

उसकी शादी को अभी तीन-चार दिन ही हुए थे. पति के मित्र ने उन दोनों को खाने पर बुलाया. कुछ और दंपति भी आमंत्रित थे. घर के बुज़ुर्गों से दूर हमउम्र लोगों में उसे बड़ा खुला-खुला सा लग रहा था. तरह-तरह के विषयों पर चर्चा चल रही थी. वह अधिकार से भाग ले रही थी. अच्छी तरह स्वयं को प्रस्तुत कर रही थी. हंसी-मज़ाक, बातचीत में खाना कब ख़त्म हुआ पता ही नहीं चला.

“बड़े भाग्यशाली हो यार! बड़ी बुद्धिमती पत्नी मिली है.” एक मित्र ने कहा.

योगेश की पीठ पर धौल जमाते हुए दूसरे मित्र ने मज़ाक किया, “बंदर के गले में मोतियों की माला.” ठहाकों के बीच शालिनी ने देखा कि योगेश के चेहरे की रेखाएं खिंचने लगी हैं. बगैर एक शब्द बोले वे दोनों घर आए.

रात को अकेले में उन्होंने शालिनी को एक थप्पड़ रसीद कर दिया. “बहुत खी-खी कर रही थी वहां. एक से जी नहीं भरता?” लगा, जैसे कानों में किसी ने पिघला सीसा डाल दिया हो.

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उस रात का वह अपमान आज भी वह याद करती है, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं. पति का सारा क्रोध उस पर बिजली बनकर टूट पड़ा था. पति-पत्नी के प्रणय की कोमल संवेदनाएं तार-तार हो गई थीं. एक सुंदर अनुभूति को अभिशाप के रूप में झेलने को वह विवश हो गई. पलंग के कोने में गुड़ीमुड़ी पड़ी शालिनी देर तक सिसकती रही. योगेश कब के सो चुके थे.

ज़ुबान तब से लेकर आज तक ख़ामोश है. संवेदनाओं ने बेहोश पड़े रहने में ही खैर समझी थी. मन के विचारों को दस दिशाओं का आकाश देने के बदले उसने उन्हें नियंत्रण के ताले में बंद कर दिया. आत्मा जड़ हो गई थी.

इतने बोझ तले जी सकता है इन्सान? शायद इसीलिए वह एक चेतनाहीन ज़िंदगी जी रही थी.

अपना अस्तित्व शनैःशनैः इसी रूप में उसने स्वीकार कर लिया. स़िर्फ एक ही क्षण उनके स्थिर जीवन में हलचल मचा देता था. सामने से निकलने वाली शिखाजी का दर्शन. ऊर्जा से भरपूर, आनंद से लबरेज़, कल्पना से परे वह नारी व्यक्तित्व.

आज…आज वह उसी के घर की ओर आ रही थी.

‘नमस्ते’ शिखाजी के अभिवादन के प्रत्युत्तर में वह सकुचाकर बोली, “आप तो बड़ी हैं, अभिवादन करके शर्मिंदा मत कीजिए..”

“अच्छा, मैं तुम्हें शालू ही कहूंगी जैसा हमने उस दिन तय किया था.” वह हंसकर बोली, “क्या तुम कभी घर से बाहर नहीं निकलती?”

“ज़रूरत ही नहीं पड़ती. सामान ये ला देते हैं, घर में काम भी बहुत हो जाता है.”

“काम का तो बहाना होता है हम औरतों का! दरअसल हम घर के बाहर निकलना ही नहीं चाहतीं. देखो, तुम्हारी दोनों बेटियों की शादी हो गई. अब घरेलू ज़िम्मेदारियां ख़त्म हो गईं. लेकिन समाज के प्रति भी हमारी ज़िम्मेदारी है या नहीं?”

शालिनी क्या कहती. उस प्रतिभावान गरिमापूर्ण व्यक्तित्व की धनी महिला से उसकी क्या बराबरी? पति के अनुसार तो वह परले दर्ज़े की बेवकूफ़ है, जिसने घरेलू ज़िम्मेदारी भी अच्छी तरह नहीं निभाई, लेकिन वह करती भी क्या? अपने घर की न सही, अपनी रसोई की भी वह रानी होती तो एक बात थी, पर योगेश वहां भी चले आते.

समाज सेवा कहां से होती. घर को अपना नहीं बना सकी, समाज को कैसे बनाती? शिखाजी के प्रस्ताव पर शालिनी मौन ही रही.

ताज्जुब था! ऐसी महिला उसके जैसी नगण्य निहायत घरेलू किस्म की महिला के साथ एकतरफ़ा संबंध बनाए हुए थी.

उस रात बरसों बाद शालिनी ने कोई सपना देखा. उसने देखा, शिखाजी उसका हाथ पकड़े रूई के फाहे जैसे बादलों में सैर करा रही थीं. वह मुक्त थी. निर्द्वंद्व. सिर पर हमेशा लदा रहने वाला हीनता का बोझ न जाने कहां गायब हो गया था.

अगले दिन सुबह ग़लती से उसने चाय में शक्कर ज़्यादा डाल दी. योगेश ने हमेशा की तरह उसे गाली दी. “ज़ाहिल कहीं की! चाय है या चाशनी.”

आज उनकी गाली को वह निर्लिप्त भाव से स्वीकार नहीं कर पा रही थी. अंतर में चिंगारी उठती हुई उसने साफ़ महसूस की. शिखाजी ने उसमें यह कैसा परिवर्तन ला दिया है? जिस मन को मृत समझकर उस पर टनों मिट्टी डाल चुकी थी, उसमें से न जाने कैसे जीवन की धड़कन सुनाई दे रही थी.

उस दिन योगेश घर लौटे तो बड़े चिंतित दिखाई दे रहे थे.

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“क्या हुआ जी?” उसने चाय का प्याला उन्हें पकड़ाते हुए विनम्रता से पूछा. “मुझे ट्रेनिंग के लिए दिल्ली भेजा जा रहा है. दो महीने की ट्रेनिंग है. अब तुम बिल्कुल अकेली यहां कैसे रहोगी?”

शालिनी ख़ुद भी फिक्रमंद हो गई. कभी भी अकेली नहीं रही वह.

“तुम ठहरी परले दर्ज़े की बेवकूफ़! लापरवाही तुम्हारी नस-नस में भरी हुई है. लौटूंगा तो पता नहीं मुझे घर दिखेगा या खंडहर.”

शालिनी क्या जवाब देती! इसका जवाब तो वह ख़ुद भी नहीं जानती थी.

“और हां, बाहर के कामों के लिए एक-दो दोस्तों को बोल दूंगा. वे लोग कर देंगे. ठेलेवाले से सब्ज़ी लेना, पर हिसाब ठीक तरह करना, वरना पकड़ा दोगी उसे सौ का नोट और वापस लेना भूल जाओगी.”

‘जी… जी’ करती रही शालिनी. भीतर ही भीतर वह भी चिंतित हो गई थी. योगेश के जाने के बाद शिखाजी ने उसे हिम्मत बंधाई, फिर उसे डांटकर बोली, “तुम इतना अपमान क्यों सहन करती हो? पत्नी पति को सम्मान देती है, तो पति का भी फ़र्ज़ है कि अपनी पत्नी को सम्मान दे.”

पत्नी को सम्मान? यह कैसी हैरतअंगेज़ बात थी.

“क्या आपके पति आपसे दबते हैं?” शालिनी अटपटा-सा प्रश्‍न पूछ बैठी.

“पागल हो गई हो? हम पति-पत्नी हैं, एक गृहस्थी के बराबर के साझेदार. एक-दूसरे के ग़ुलाम नहीं.”

पति-पत्नी एक-दूसरे के पूरक, साथी मित्र, सहयोगी? ये कैसे अनोखे शब्द हैं. वह तो स़िर्फ इतना जानती है कि पति स्वामी है, तो पत्नी दासी. पति पालनकर्ता है, तो पत्नी पालित. पति आश्रयदाता है, तो पत्नी आश्रित. पति जीवनरस से भरपूर वृक्ष है, तो पत्नी अमरबेल.

शिखाजी हंसकर उसे उलाहना देतीं, “बरसों से घर ही घर में रहकर तुम्हारा दिमाग़ जंग खा गया है. तुम भूल गई हो कि तुम पढ़ी-लिखी हो, सिलाई-बुनाई में माहिर हो, ये गुण कोई कम तो नहीं! कल से तुम मेरे साथ चलोगी.

“कहां?”

“हाफ वे होम, जहां मानसिक रूप से विक्षिप्त महिलाओं को रखा जाता है. ऐसी महिलाएं, जिन्हें उनके परिजन ठीक होने पर भी स्वीकार नहीं करते.”

“लेकिन मैं क्या करूंगी वहां जाकर?’

“तुम उनसे बातें करके उन्हें उनकी अंतर्वेदना से मुक्त करोगी? उन्हें एहसास दिलाओगी कि वे अकेली नहीं हैं. अपना हुनर सिखाओगी. अवसाद के अंधे कुंए

से उन्हें बाहर निकालने की हर संभव कोशिश करोगी.”

“लेकिन मुझे तो यह सब नहीं आता…”

“यह तुम्हारा वहम है, तुमने मुझसे अपनी ज़िंदगी के बारे में विस्तार से बताया तभी तो मुझे पता चला.”

“मुझसे नहीं होगा…”

वह ना-ना करती रही और शिखाजी कब खींचकर उसे ले गईं, उसे स्वयं पता नहीं चला.

वहां जाकर उसे पता चला कि वह कुछ लोगों के मुक़ाबले कितनी अच्छी स्थिति में थी. वे औरतें जो जीती-जागती लाशें थीं, निराशा और अवसाद की दलदल में प्रायः डूब ही चुकी थी. तिरस्कृत, बलात्कृत, अवहेलित, बहिष्कृत नारी प्रतिमाएं, संवेदनाहीन, अनुभूति शून्य, उन्हें सहारे की आवश्यकता थी. अकल्पनीय भीषण हादसों का सामना करके पत्थर हो गई थीं वे.

उन्हें देखकर शालिनी जैसे अट्ठाइस बरस की नींद से जाग उठी. उसे महसूस हुआ कि वह यह काम कर सकती है, क्योंकि उनके दुखों की भाषा उसके लिए भी अजनबी नहीं है. ज़ख़्म उनके जैसे गहरे नहीं हैं तो क्या, कांटों की वेदना तो उसने भी अनुभव की है.

उसके सांत्वना देने के तरी़के से शिखाजी भी अभिभूत हो गईं. अब तो वह रोज़ ही शिखाजी के साथ ‘हाफ वे होम’ जाने लगी.

शिखाजी ने शालिनी का रहन-सहन भी बदल दिया. ज़माने की ऱफ़्तार को समझने का प्रयास करते-करते वह उसी प्रवाह में आगे बढ़ चली थी. चेहरे के आहत, उदास भाव कहीं तिरोहित हो गए थे.

आजकल वह फ़ोन पर योगेश से सधी हुई आवाज़ में बस इतना ही कहती, “व्यर्थ चिंता न करें. अपनी और घर की सुरक्षा ख़ुद करने में वह सक्षम है.”

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घबराई हुई, अचकचाई हुई आवाज़ सुनने के आदी योगेश इस सधी हुई आवाज़ से भौंचक्के रह जाते.

इस दौरान गैस ख़त्म हुई. टेलीफ़ोन, बिजली, पानी का बिल- इस तरह के बीसियों मौ़के आए, जिनके लिए योगेशजी ने अपने ख़ास दोस्तों को कह रखा था. लेकिन ऐसी नौबत ही नहीं आई. शिखाजी के साथ जाकर वह स्वयं ही सारे काम कर आई. उसने देखा व्यर्थ ही वह इन सब कामों को हौआ समझती रही. कुछ भी कठिन नहीं था. शिखाजी कहतीं, “इन मामूली-से लगनेवाले कामों को भी स्वयं करने से आत्मविश्‍वास पैदा होता है. उस दिन ‘हाफ वे होम’ से लौटते हुए शालिनी का मन बेहद उदास था. बार-बार आंखों के सामने उस पंद्रह साल की मासूम बच्ची का चेहरा घूम जाता था. वह अपने नज़दीकी रिश्तेदार की हवस का शिकार हुई थी. अनचाहे गर्भ को ढोती वह लड़की अपने ही माता-पिता द्वारा ठुकराई गई थी. उसका कोई दोष न होते हुए भी उसे सजा दी गई थी. कुसूरवार ने उसके मां-बाप को अपने दृष्कृत्य की मामूली क़ीमत चुका दी थी.

“क्या इन औरतों का समाज में वापस लौटना संभव है? हमारी कोशिशों का सुखद परिणाम निकलेगा या नहीं?” शालिनी चिंतित थी.

“हां शालू, तुम्हें देखकर मैं विश्‍वासपूर्वक कह सकती हूं कि अपने अतीत की ज़्यादतियां भूलकर, वर्तमान की वेदना से उबरकर मुनासिब भविष्य का निर्माण किया जा सकता है.”

शिखाजी कुछ क्षण ख़ामोश रहीं, फिर भावुक होकर गंभीरतापूर्वक बोलीं, “समय कितना भी बदल गया हो, पर आज भी ये औरतें शाप भोग रही हैं. ये अपनों द्वारा छली गई हैं. इनका आत्मसम्मान आहत हो चुका है. इनकी अस्मिता को पैरों तले कुचला गया है. रामचंद्रजी ने अहिल्या को घोर अवसाद से उबारा. हमें भी वही आदर्श अपने सामने रखना है. समाज से बहिष्कृत, जड़ हो चुकी इन औरतों में चेतना जगानी है.”

“शिखाजी! आप सब कुछ कर सकती हैं. आपसे मिलने के पहले मेरी ज़िंदगी में भी कुछ नहीं था. अपने इर्द-गिर्द छाई धुंध को मैं अपनी ज़िंदगी का सच समझ बैठी थी. धुंध के पार का उजाला मेरी दृष्टि से दूर था और आज…”

“आज भी तुम वहीं हो! मैंने स़िर्फ तुमसे तुम्हारा परिचय कराया है. योगेशजी के विशेषणों को ही तुम सच समझ बैठी थी. लेकिन शालू, व्यक्ति जब स्वयं प्रयत्न करता है, तभी अपने अंधेरों से मुक्त हो पाता है. दूसरे उसे सांत्वना दे सकते हैं, लेकिन हिम्मत उसे स्वयं जुटानी पड़ती है. मध्यमवर्गीय परिवारों में कई बार अहंकारी पुरुष अपनी पत्नी के व्यक्तित्व को बौना बनाने में ही अपना पुरुषार्थ समझते हैं? तुम ही सोचो, समाज का आधा हिस्सा ही यदि चेतनाशून्य होगा तो उसके ऊंचा उठने की कल्पना भी कैसे की जा सकती है.”

शिखाजी की बातों में जीवन की सच्चाई थी.

दो महीने बाद योगेश घर लौटे, तो अपनी पत्नी को पहचान नहीं पाए. कहां गए वे लाचारी के भाव? उनके सामने तो एक तेजस्वी नारी खड़ी थी. सलीकेदार पहनावा और चेहरे पर गर्वीली मुस्कुराहट. यह तो उनकी पत्नी नहीं है, “आप जल्दी से नहा-धो लें. खाना तैयार है. एक बजे मुझे किसी काम से बाहर जाना है.”

शालिनी की इस अदा पर योगेश स्तब्ध होकर उसे देखते ही रह गए. उससे कुछ पूछने का भी साहस उनसे न हुआ. ‘पागल, बेवकूफ़, जाहिल, मूर्ख’ आदि उनकी जीभ पर आने के लिए मचलनेवाले शब्द आज पता नहीं कहां चले गए थे.

योगेश को वे खोजने पर भी नहीं मिल रहे थे.

 – स्मिता भूषण

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कहानी- सर्द ज़मीन (Short Story- Sard Zamin)

अकेलापन उसके अंदर इस कदर भर गया था कि दिनभर ऑफ़िस में थकने के बावजूद वह सो नहीं पाती. रात का सन्नाटा उसे तड़पाता. पुरुष की बलिष्ठ बांहों में समा जाने की चाह उसे करवटें बदलते हुए रात बिताने को मजबूर कर देती. क्या उसकी इच्छा अस्वाभाविक थी?

Hindi Kahani

वह बैग उठाए घर की दहलीज़ के बाहर क़दम रख देती है. इसके साथ ही कहानी ख़त्म हो जाती है… लतिका कहानी के समापन को एक अवास्तविक मोड़ मान उसका विश्‍लेषण करने लगती है. कहानी का हर पहलू, हर घटना उसे लगातार उलझन में डालती जाती है. उसे लगता है कि हंसा जैसी महिलाओं का समाज में होना सच है, पर उसके फैसले को कभी भी समाज की स्वीकारोक्ति नहीं मिल सकती है.

पिछले दो ह़फ़्तों से वह लगातार प्रेम कहानियों पर आधारित टीवी पर आनेवाले सीरियल की इस कहानी को देख रही थी. कहानी ‘हंसा’ नाम की एक महिला की थी, जिसके जीवन में अनायास ही एक पुरुष का प्रवेश होता है. पति के ज़्यादातर बाहर रहने व उसे समय न दे पाने के कारण अपनी तन्हा व उदास ज़िंदगी में रंग भरने की इच्छा उस पुरुष से मिलते ही हंसा के मन में पलने लगती है. बार-बार होती मुलाक़ातें नजदीकी बढ़ाती हैं, यहां तक कि उसका 8 वर्षीय बेटा भी उसमें अपने पिता की छवि व प्यार पाने की उम्मीद से उससे जुड़ता चला जाता है. पर पिता के आते ही अंकल की उपस्थिति उसके लिए गौण हो जाती है. उथल-पुथल से घिरी हंसा उस पुरुष के प्यार व सान्निध्य से जान पाती है कि पुरुष का स्पर्श कितना सुखद होता है. उसका साथ कितना विश्‍वास देनेवाला होता है. वह घर छोड़कर उसके साथ जाने का फैसला करती है. लेकिन अपनी बसी-बसायी गृहस्थी व बेटे को छोड़कर चले जाना उसके लिए सहज नहीं था. पर स्वयं के लिए जीने की ख़्वाहिश या पति के साथ बीते नौ वर्षों की पीड़ा शायद उसे स्वार्थी बनने को मजबूर कर देती है.

उसका जाना लतिका को ऐसा लग रहा था मानो किसी असंभव को जान-बूझकर लेखक ने संभव बनाने की कोशिश की है. समाज के नियमों व मर्यादाओं को दरकिनार कर इस तरह का क़दम उठाने की हिम्मत हंसा के अंदर हो ही नहीं सकती थी. उसे तो ज़बरदस्ती उसके अंदर ठूंसा गया था, ताकि नारी शक्ति को प्रस्तुत किया जा सके. फेमिऩिज़्म की परिभाषा को गढ़ने का यह प्रयास लतिका को परेशान किए जा रहा था.

आख़िर क्यों?

कहीं लतिका भी हंसा तो नहीं बनना चाह रही है?

लतिका हंसा नहीं है और हो भी नहीं सकती, लेकिन एक बार उसने भी तो हंसा बनने की कोशिश की थी.

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हर नारी के अंदर कहीं-न-कहीं एक हंसा छिपी होती है. कुछ उसे बाहर निकाल दबी-घुटी ज़िंदगी से छुटकारा पा लेती हैं तो कुछ जीवनभर दर्द के अंधेरे में स्वयं को गुम कर उस गुनाह की सज़ा भुगतती हैं, जो उन्होंने किया तो नहीं, पर उसके बारे में किसी कोने में बैठकर सोचा ज़रूर था. वही सोच उसे जीवनभर एक अपराधबोध, पीड़ा और ग़ुस्से के मिले-जुले भावों से जूझने के लिए मजबूर कर देगी, इसकी तो कल्पना उसने नहीं की थी. वही क्या, कोई भी इस तरह की कल्पना नहीं कर सकता.

लतिका ने भी सोचने की हिम्मत की थी. बहुत बार उसका मन भी किया कि वह इस नीरस और बेमानी ज़िंदगी के खोल से स्वयं को मुक्त कर ले. उसके और राजीव के  बीच शादी के शुरुआती दिनों से ही तालमेल नहीं बैठ पाया था. इसके कारण अनेक थे, जो शारीरिक व भावनात्मक रूप से जुड़े थे. हो सकता है कि उसने ही राजीव को समझने में भूल की हो. लेकिन सच तो यह था कि एक महिला को पुरुष के जिस साथ की अपेक्षा होती है, वह उसे राजीव से नहीं मिला. न ही शारीरिक रूप से और न ही मानसिक रूप से. न तो वह लतिका की ज़रूरतों को समझ पाया, न ही उसके अंदर किसी तरह की अनुभूति जागृत कर पाया. वह हमेशा ‘ठंडी औरत’ होने का ताना सहती रही. राजीव हर बात में उसका मज़ाक उड़ाता. उसकी बेइ़ज़्ज़ती करता. सीधी-सी बात थी कि वह उससे हर तरह से बेहतर जो थी. रंग-रूप, नौकरी व बुद्धि- हर मायने में वह राजीव से बढ़कर थी. ऐसे में राजीव को अपनी हीनभावना से उबरने के बजाय लतिका के अंदर ग़लतियां ढूंढ़ना ज़्यादा आसान लगता.

‘कहा जाता है कि जोड़ियां स्वर्ग में बनती हैं, लेकिन ग़लती तो किसी से भी हो सकती है, इसीलिए अक्सर दो विपरीत दिशाओं में सोचनेवालों की ईश्‍वर जोड़ी बना देता है. वह भी क्या करे, उसके पास काम का दबाव भी तो बहुत रहता है.’ राजीव अक्सर अपने दार्शनिक अंदाज़ में यह बात कहता था, लेकिन वह भी अपने बेमेल विवाह को संभाल नहीं पा रहा था.

दिन-रात के झगड़े और राजीव का जब-तब घर से गायब रहना लतिका को अक्सर सालता रहता. वह जानना भी चाहती कि वह कहां जाता है और क्या करता है तो दो टूक-सा जवाब मिलता, “मैं तुम्हें बताना ज़रूरी नहीं समझता.” वह सामंजस्य बिठाने की बहुत कोशिश करती. राजीव के साथ ही ख़ुशियां ढूंढ़ने की चाह में एक क़दम उसकी ओर बढ़ाती तो वह दो क़दम पीछे हट जाता. शराब की आदत ने उसमें और भी बुराइयां ला दीं. दूसरी महिलाओं का साथ उसे प्रिय लगता था.

जब राजीव और उसके बीच कोई रिश्ता ही नहीं था तो बच्चा होने का तो सवाल ही नहीं उठता था. अकेलापन उसके अंदर इस कदर भर गया था कि दिनभर ऑफ़िस में थकने के बावजूद वह सो नहीं पाती. रात का सन्नाटा उसे तड़पाता. पुरुष की बलिष्ठ बांहों में समा जाने की चाह उसे करवटें बदलते हुए रात बिताने को मजबूर कर देती. क्या उसकी इच्छा अस्वाभाविक थी? राजीव और वह अलग-अलग कमरों में सोते थे. शराब पीकर होश खोकर सोना कितना आसान होता है. किसी क़िस्म का ख़याल या भूख तब परेशान नहीं करती.

जीने का हक़ हर किसी को है, एक चिड़िया भी तमाम जिजीविषाओं को पूरा करने के लिए निरंतर प्रयास करती रहती है. उसके अंदर तो दिल, दिमाग़, भावनाएं सभी थीं. एक बार ऑफ़िस के टूर से दो दिन के लिए मुंबई गई थी. वहां उसका स्वागत आलोक ने ही किया था. वहां की ब्रांच का हेड था वह. दो दिन तक साए की तरह उसके साथ रहा. जान-पहचान, समान स्वभाव और मानसिक रूप से तालमेल बैठने से उनके बीच ऐसी दोस्ती हुई कि वापस आकर भी ऑफ़िस के काम के अतिरिक्त संवाद कायम रहा. फ़ोन, ईमेल और चैटिंग… बड़े ही ख़ुशनुमा पल हुआ करते थे वे.

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लतिका की बंधी-बंधाई ज़िंदगी में कुछ परिवर्तन आया. जैसे शांत सागर की लहरों में उफान आने लगा हो. दोनों ही अपने स्थिर जीवन से उकता चुके थे, शायद इसीलिए निकटता का सेतु बहुत जल्दी कायम हो गया. आलोक को अपना तन-मन समर्पित करने की तीव्र इच्छा लतिका को बार-बार उकसाने लगी. आलोक भी अपनी पत्नी से रिश्ता तोड़ उसके साथ जीवन बिताने को तत्पर था. तभी एक दिन लतिका के अंदर भी राजीव को छोड़ने की सोच उपजी. बेमानी रिश्ते को ढोने से फ़ायदा भी क्या था?

लेकिन इसी बीच पता चला कि राजीव का लिवर ख़राब हो गया है. शराब नहीं छोड़ी तो गुर्दे भी ख़राब हो सकते हैं. अस्पताल में भर्ती करा वह जी-जान से उसकी सेवा में जुट गई. पत्नी का फ़र्ज़ बाकी इच्छाओं पर भारी पड़ा. वैसे भी उस जैसे कमज़ोर इंसान को वह इस व़क़्त कोई झटका नहीं दे सकती थी. आलोक उसे समझेगा, यह भरोसा था उसे. पर आलोक का अस्पताल में आना राजीव को खल गया. बिस्तर पर लेटे-लेटे ही उसने उससे बिना कुछ कहे, बिना पूछे अपने मन में अनगिनत जाल बुन डाले. अविश्‍वास की झलक उसकी आंखों में देख लतिका ने उसे समझाना चाहा, पर उसकी हीनता ने तब तक उस पर गालियों के चाबुक बरसा डाले थे.

वह चुप हो गई. क्या फ़ायदा था ऐसे आदमी को किसी तरह का जस्टिफ़िकेशन देने का? वैसे भी सच को सुनने की समझ उसमें थी ही नहीं. आलोक लौट गया. कमज़ोरी और बेबसी से आतंकित राजीव को भला किस तरह की चुनौती दे? आलोक लतिका को अपने पास आने को कहता.

आलोक से उसकी मुला़क़ात फिर कभी नहीं हुई. न ही किसी और तरह से उन्होंने एक-दूसरे से संपर्क स्थापित करने की कोशिश की. मानो बिना कहे ही वे यह समझौता करने को तैयार हो गए थे. राजीव की हालत कुछ सुधरी तो वह उसे घर ले आई. उसकी सेवा और देखभाल ने उसे उठने के क़ाबिल बना दिया. पर राजीव का व्यवहार और सोच कुछ अधिक संकुचित होता चला गया था. उसकी नज़रों में लतिका ‘ठंडी औरत’ से ‘गिरी हुई औरत’ हो गई थी.

लतिका अपनी उस सोच को कोसती, जिसने उसे ख़्वाब देखने के लिए उकसाया था. कभी लगता कि उसे राजीव को बीमारी की हालत में ही छोड़कर चले जाना चाहिए था. वह हर ओर से रिक्त हो गई थी. देखे गए सपने उसे और तंग करते. बिस्तर पर दम तोड़ती इच्छाएं उसे अब जड़ बनाने लगी थीं. ‘ठंडी औरत’ ही बनेगी अब वह. दिन-रात के ज़ुल्म और प्रताड़ना सहने के बावजूद वह

राजीव को छोड़ने की हिम्मत नहीं कर पाई. वह कमज़ोर थी शायद. तभी तो राजीव उसे छोड़कर चला गया. साथ में महानता का लबादा भी ओढ़ लिया.

‘तुम आलोक के साथ ख़ुश रह सको, इसलिए जा रहा हूं. तुम आज से मुक्त हो.’ पत्र में लिखी इन पंक्तियों को पढ़ उसे लगा कि वह बेदर्दी से छली गई है.

राजीव जब साथ था, वह उसकी हीनता का बोझ ढोती रही और अब उसके जाने के बाद उसकी महानता का बोझ ढोने पर मजबूर है. अपनी ख़ुशियों को बंटोर कर अंजुरी में भरने की उसे इतनी बड़ी सज़ा मिलेगी, उसने सोचा न था. राजीव को क्या पता कि उसकी अंजुरी में से ख़ुशियां और तमाम इच्छाएं तो कब की फिसल कर सर्द और गीली ज़मीन पर बिछ चुकी हैं.

Suman Bajpai

   सुमन बाजपेयी

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अकबर-बीरबल की कहानी: राज्य के कौवों की गिनती (Akbar-Birbal Tale: How Many Crows In The Kingdom)

Akbar Birbal Story

अकबर-बीरबल की कहानी: राज्य के कौवों की गिनती (Akbar-Birbal Tale: How Many Crows In The Kingdom)

एक दिन राजा अकबर और बीरबल राज महल के बगीचे में टहल रहे थे. बहुत ही सुंदर सुबह थी. कई तरह के पंछी चहक रहे थे. वहीं तालाब के पास ही बहुत सारे कौवे भी आस-पास उड़ रहे थे. उन कौवों को देखते ही बादशाह अकबर के मन में एक सवाल उत्पन्न हुआ. उनके मन में यह सवाल आया कि उनके राज्य में कुल कितने कौवे होंगे?

बीरबल तो उनके साथ ही बगीचे में टहल रह थे, तो राजा अकबर ने बीरबल से ही यह सवाल कर डाला और पूछा कि बताओ बीरबल, आख़िर हमारे राज्य में कितने कौवे हैं? तुम तो बड़े चतुर हो, तुम्हें हर सवाल का उत्तर पता होता है.

यह सुनते ही चालाक बीरबल ने तुरंत उत्तर दिया कि महाराज, हमारे राज्य में कुल 95,463 कौवे हैं, आप चाहें तो गिनती करवा सकते हैं.
महाराज अकबर इतने तेज़ी से दिए हुए उत्तर को सुन कर हक्का-बक्का रह गए और उन्होंने बीरबल की परीक्षा लेने की सोची.

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Akbar Aur Birbal Ki Kahani

महाराज ने बीरबल से दोबारा सवाल किया- अगर तुम्हारी गणना के अनुसार कौवे ज़्यादा हुए तो?

बिना किसी संकोच के बीरबल बोले, हो सकता है महाराज, किसी पड़ोसी राज्य के कौवे हमारे राज्य में घूमने आये हों.

राजा फिर बोले- और अगर गिनती में कम कौवे हुए तो?

बीरबल ने फिर तपाक से उत्तर दिया- महाराज, हो सकता है हमारे राज्य के कुछ कौवे अपने किसी अन्य राज्यों के रिश्तेदारों के यहां घूमने गए हों.

यह सुन अकबर बेहद ख़ुश हुए, क्योंकि बीरबल ने अपनी चतुराई एक बार फिर साबित कर दी.

सीख: प्रश्‍न भले ही कितने मुश्किल क्यों न हों, बिना घबराई बुद्धि व चतुराई से काम लेना चाहिए. दुनिया का कोई ऐसा सवाल नहीं, जिसका जवाब न हो, बस ज़रूरत है, विवेक, धैर्य व बुद्धि की.

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तेनालीराम और मूर्ख चोर (Tenali Rama And Foolish Thieves)

Tenali Rama Story

तेनालीराम और मूर्ख चोर (Tenali Rama And Foolish Thieves)

एक बार विजय नगर में बहुत अधिक गर्मी पड़ी. ऐसी भीषण गर्मी कि सूखे की नौबत आ गई. नदियों और तालाबों का जल स्तर घट गया. तेनालीराम के घर के पीछे भी एक बड़ा बाग था, जो सूखता जा रहा था. उसके बाग के बीच में एक कुआं था, मगर उसका पानी इतना नीचे चला गया था कि दो बाल्टी जल खींचना भी बेहद मुश्किल लग रहा था.

तेनालीराम को बाग की चिंता सताने लगी. एक शाम तेनालीराम अपने बेटे के साथ बाग का निरीक्षण कर रहा था और सिंचाई के विषय में ही बात कर रहा था. वो सोच रहा था कि सिंचाई के लिए मज़दूर को लगाया जाए या नहीं, लेकिन मज़दूर लगाएंगे, तो ख़र्चा भी बहुत अधिक होगा. इतने में ही उसकी नज़र तीन-चार व्यक्तियों पर पड़ी जो सड़क के दूसरी पार एक वृक्ष के नीचे खड़े उसके मकान की ओर देख रहे थे और फिर एक-दूसरे से संकेत व इशारों में कुछ बात कर रहे थे.

तेनालीराम को समझते देर नहीं लगी कि ये सेंधमार हैं और चोरी करने के इरादे से ही उसके मकान का मुआयना कर रहे हैं. तेनालीराम के मस्तिष्क में बाग की सिंचाई की एक युक्ति आ गई. उसने ऊंची आवाज़ में अपने पुत्र से कहा: बेटे! सूखे के दिन हैं. चोर-डाकू बहुत घूम रहे हैं. गहनों और अशर्फियों का वह संदूक घर में रखना ठीक नहीं. आओ, उस संदूक को उठाकर इस कुएं में डाल दें, ताकि कोई चुरा न सके.

अपनी बात कहकर तेनालीराम बेटे के साथ घर के भीतर चला गया. मन ही मन में वह कह रहा था… आज इन चोरों को ढंग का कुछ काम करने का मौका मिलेगा. अपने बाग की सिंचाई भी हो जाएगी. बाप-बेटे ने मिलकर एक सन्दूक में कंकर-पत्थर भरे और उसे उठाकर कुएं में फेंक दिया.

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तेनालीराम फिर ऊंचे स्वर में बोला, अब हमारा धन सुरक्षित है. उधर घर के पिछवाड़े खड़े चोर मन ही मन मुस्कराए. लोग तो व्यर्थ ही तेनालीराम को चतुर कहते हैं. यह तो निरा मूर्ख है. इतना भी नहीं जानता कि दीवारों के भी कान होते हैं. एक चोर ने अपने साथी से कहा: आओ चलें, आज रात इसका सारा खज़ाना हमारे कब्ज़े में होगा.

रात हुई और चोर अपनी योजना को अंजाम देने आए. वे बाल्टी भर-भर कुएं से पानी निकलते और धरती पर उड़ेल देते. उधर, तेनालीराम और उसका पुत्र पानी को क्यारियों की ओर करने के लिए खुरपी से नालियां बनाने लगे.

उन्हें पानी निकालते-निकालते सुबह के चार बज गए, तब कहीं जाकर संदूक का एक कोना दिखाई दिया. बस, फिर क्या था, उन्होंने कांटा डालकर संदूक बाहर खींचा और जल्दी से उसे खोला, तो यह देखकर हक्के-बक्के रह गए कि उसमें पत्थर भरे थे.

अब तो चोर सिर पर पैर रखकर भागे कि मूर्ख तो बन ही चुके हैं, अब कहीं पकड़े न जाएं. दूसरे दिन जब तेनालीराम ने यह बात महाराज को बताई तो वे खूब हंसे और बोले: कभी-कभी ऐसा भी होता है कि मेहनत तो कोई करता है और फल कोई और ही खाता है.

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पंचतंत्र की कहानी: जादुई चक्की (Panchtantra Story: The Magic Mill)

Panchtantra Story
पंचतंत्र की कहानी: जादुई चक्की (Panchtantra Story: The Magic Mill)

आज के हाईटेक युग में जब बच्चों को हर जानकारी कंप्यूटर/इंटरनेट पर ही मिल रही है, उनका पैरेंट्स से जुड़ाव कम हो रहा है. साथ ही उन्हें मोरल वैल्यूज़ (Moral Values) भी पता नहीं चल पाती, ऐसे में बेड टाइम स्टोरीज़ (Bed Time Stories) जैसे- पंचतंत्र (Panchtantra) की सीख देने वाली पॉप्युलर कहानियों के ज़रिए न स़िर्फ आपकी बच्चे से बॉन्डिंग स्ट्रॉन्ग होगी, बल्कि उन्हें अच्छी बातें भी पता चलती हैं.

एक गांव में दो भाई रहते थे. बड़ा भाई बेहद अमीर था और छोटा उतना ही ग़रीब. दिवाली के दिन पूरा गांव ख़ुश था. लेकिन छोटा भाई दुखी था, क्योंकि उसके परिवार के पास तो खाने को भी कुछ नहीं था. वो मदद मांगने अपने भाई के पास गया, पर भाई ने दुत्कार दिया. वो दुखी मन से वापस आने लगा, तो रास्ते में एक बूढ़ा व्यक्ति मिला. उसने कहा कि इतने दुखी क्यों हो, आज तो दिवाली है. ख़ुशियों को त्योहार. इस पर छोटे भाई ने अपनी व्यथा सुनाई.

बूढ़े व्यक्ति ने कहा कि तुम मेरा ये लकड़ियों का ढेर अगर मेरे घर तक पहुंचा दो, तो मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूं और तुम्हें अमीर बना सकता हूं. छोटा भाई मान गया और घर पहुंचने पर बूढ़े व्यक्ति ने उसे एक मालपुआ देकर कहा कि ये जंगल में लेकर जाओ. वहां तुम्हें तीन अजीब पेड़ दिखेंगे, जिसके पास एक चट्टान होगी. चट्टान के कोने में एक गुफा नज़र आएगी. उस गुफा में जाओगे, तो तुम्हें तीन बौने मिलेंगे. ये मालपुआ उन्हें देना, क्योंकि उनको यह बेहद पसंद है और इसके लिए वो हर क़ीमत चुकाने को तैयार होंगे, पर तुम उनसे धन मत मांगना. तुम कहना कि मुझे पत्थर की चक्की दे दो.

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Panchtantra Story

छोटे भाई ने वैसा ही किया, जैसा बूढ़े व्यक्ति ने कहा. चक्की लेकर जब छोटा बाहर जाने लगा, तब एक बौने ने कहा कि यह कोई मामूली चक्की नहीं है. इसे चलाने पर तुम जो मांगोगे वो मिलेगा. इच्छा पूरी होने पर इस पर लाल कपड़ा डाल देना, सामान निकलना बंद हो जाएगा.

छोटा घर पहुंचा, तो उसने चक्की को आज़माया. उसने चावल मांगा, फिर दाल मांगी… इस तरह खाने का ढेरों सामान उसे मिल गया, जिससे परिवार की भूख मिट गई. लाल कपड़े से चक्की को ढंककर वो चैन की नींद सो गया.

चक्की से निकला जो भी सामान बचा, उसे वो अगले दिन बाज़ार जाकर बेच आया. इस तरह से वो कुछ न कुछ सामान चक्की से निकालकर बाज़ार में बेच आता, कभी बादाम, कभी घी, नमक, मसाले, कपास आदि. देखते ही देखते वो बेहद अमीर हो गया.

उसकी तऱक्क़ी देखकर उसका बड़ा भाई जलने लगा. उसने सोचा कैसे ये इतना अमीर हो गया? एक रात वो छोटे के घर में छिप गया और उसने उस चक्की को देख लिया.

Panchtantra Story
अगले दिन जब छोटा बाज़ार गया था, तो बड़े ने चालाकी से घर में घुसकर चक्की को चुरा लिया. उसने सोचा वो यह गांव छोड़कर दूर जा बसेगा, क्योंकि उसके हाथ ख़ज़ाना जो लग गया. वो जल्दबाज़ी में सब कुछ छोड़कर परिवार सहित भागने लगा. समंदर पर जाकर एक नाव में सवार हुआ, तो पत्नी ने पूछा कि यह सब क्या है. पत्नी को दिखाने के लिए उसने चक्की को कहा कि चक्की नमक निकाल. नमक निकलता गया. चूंकि बड़े भाई को चक्की को बंद करना नहीं आता था, तो नमक के बोझ से नाव सहित पूरा परिवार ही डूब गया. कहते हैं कि वो चक्की अब भी चल रही है, इसीलिए समंदर का पानी खारा है.

सीख: लालच और ईर्ष्या बुरी बला है.

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पंचतंत्र की कहानी: तीन काम (Panchtantra Story:Three Tasks)

Panchtantra Story
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पंचतंत्र की कहानी: तीन काम (Panchtantra Story:Three Tasks)

आज के हाईटेक युग में जब बच्चों को हर जानकारी कंप्यूटर/इंटरनेट पर ही मिल रही है, उनका पैरेंट्स से जुड़ाव कम हो रहा है. साथ ही उन्हें मोरल वैल्यूज़ (Moral Values) भी पता नहीं चल पाती, ऐसे में बेड टाइम स्टोरीज़ (Bed Time Stories) जैसे- पंचतंत्र (Panchtantra) की सीख देने वाली पॉप्युलर कहानियों के ज़रिए न स़िर्फ आपकी बच्चे से बॉन्डिंग स्ट्रॉन्ग होगी, बल्कि उन्हें अच्छी बातें भी पता चलती हैं.

एक बार दो गरीब दोस्त एक सेठ के पास काम मांगने जाते हैं. कंजूस सेठ उन्हें फ़ौरन काम पर रख लेता है और पूरे साल काम करने पर साल के अंत में दोनों को 12-12 स्वर्ण मुद्राएं देने का वचन देता है. साथ ही सेठ यह भी शर्त रखता है कि अगर उन्होंने काम ठीक से नहीं किया या किसी आदेश का पालन ठीक से नहीं किया, तो उस एक गलती के बदले 4 सुवर्ण मुद्राएं वो उनकी तनख्वाह से काट लेगा.

दोनों दोस्त सेठ की शर्त मान जाते हैं और पूरे साल कड़ी मेहनत करते हैं. दौड़-दौड़कर सारे काम करते और सेठ के हर आदेश का पालन करते. इस तरह पूरा साल बीत गया. दोनों सेठ के पास 12-12 स्वर्ण मुद्राएं मांगने जाते हैं, पर सेठ बोलता है कि अभी साल का आखरी दिन पूरा नहीं हुआ है और मुझे तुम दोनों से आज ही तीन और काम करवाने हैं. दोनों हैरान थे, पर क्या कर सकते थे. सेठ ने तीन काम बताने शुरू किए-

पहला काम: छोटी सुराही में बड़ी सुराही डालकर दिखाओ.
दूसरा काम: दुकान में पड़े गीले अनाज को बिना बाहर निकाले सुखाओ.
तीसरा काम: मेरे सर का सही-सही वज़न बताओ.
यह तो असंभव है… उन दोनों ने सेठ से कहा.

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सेठ की चालकी काम कर गई, उसने कहा कि ठीक है तो फिर यहां से चले जाओ. इन तीन कामों को ना कर पाने के कारण मैं हर एक काम के लिए 4 स्वर्ण मुद्राएं काट रहा हूं. मक्कार सेठ की इस धोखाधड़ी से उदास हो कर दोनों दोस्त बोझिल मन से जाने लगते हैं. उन्हें रास्ते में एक चतुर पंडित मिलता है. उनके ऐसे चेहरे देखकर पंडित उनसे उनकी उदासी का कारण पूछता है और पूरी बात समझने के बाद उन्हें वापस सेठ पास भेजता है.

दोनों सेठ के पास पहुंचकर बोलते हैं, सेठजी अभी आधा दिन बाकी है, हम आपके तीनों काम कर देते हैं.

सेठ हैरान था, पर सोचा कि उसका क्या बिगड़ेगा. वो तीनों दुकान में जाते हैं. दोनों दोस्त अपना काम शुरू कर देते हैं. वो बड़ी सुराही को तोड़-तोड़कर उसके टुकड़े कर देते हैं और उन्हें छोटी के अन्दर डाल देते हैं. सेठ मन मसोसकर रह जाता है, पर कुछ कर नहीं पाता है.

इसके बाद दोनों गीले अनाज को दुकान के अन्दर फैला देते हैं, तो सेठ बोल पड़ता है कि स़िर्फ फैलाने से ये कैसे सूखेगा? इसके लिए तो धूप और हवा चाहिए, सेठ मुस्कुराते हुए कहता है.

देखते जाइए, ऐसा कहते हुए दोनों मित्र हथौड़ा उठा आगे बढ़ जाते हैं और दुकान की दीवार और छत तोड़ डालते हैं, जिससे वहां हवा और धूप दोनों आने लगती है.

क्रोधित मित्रों को सेठ और उसके आदमी देखते रह जाते हैं, पर किसी की भी उन्हें रोकने की हिम्मत नहीं होती.

अब आख़िरी काम बचा होता है, दोनों मित्र तलवार लेकर सेठ के सामने खड़े हो जाते हैं और कहते हैं, मालिक आपके सिर का सही-सही वज़न तौलने के लिए इसे धड़ से अलग करना होगा. कृपया बिना हिले स्थिर खड़े रहें.

अब सेठ को समझ आ जाता है कि वह ग़रीबों का हक इस तरह से नहीं मार सकता और बिना आनाकानी के वह उन दोनों को 12-12 स्वर्ण मुद्राएं सौंप देता है.

सीख: बेईमानी का फल हमेशा बुरा ही होता है.

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