Kahani

सोशल डिस्टेंसिंग करानेवाले कोरोना वायरस के जाने के बाद क्या सबके दिल मिल पाएंगे? क्या बच्चों में बाहर निकलने की, एक-दूसरे से मिलने-जुलने की नैसर्गिक उत्कंठा जागेगी?
दिनभर स्क्रीन में सिर दिए लोगों को आसपास सूखती रिश्तों की बेलों में अपने समय की खाद देकर हरियाने की इच्छा जागेगी. आज की चिंता क्या पर्यावरण के प्रति चिंतन में तब्दील होगी…

“हे भगवान्… कमरे का क्या हाल किया है तुम दोनों ने…”
शारदा ने कमरे छोटे-से कमरे को हैरानी से देखा. लैपटॉप से डाटा केबल द्वारा टीवी कनेक्ट करके एकलव्य और काव्या बिस्तर में बैठे कार्टून देख रहे थे… कुछ देर उनके पास बैठकर शारदा भी अजीब-सी आवाज़ निकालते कार्टून करेक्टर को देखने लगी. फिर कुछ ऊब से भरकर वह उठकर चली आई और बालकनी में बैठ गई. उन्हें अकेले बालकनी में बैठे देख बहू कविता ने उन्हें टोका, “क्या हुआ मां, आप यहां बालकनी में अकेले क्यों बैठी है…”
“क्या करूं, सुबह से कभी टीवी, तो कभी नेट पर कार्टून ही चल रहा है.“
“कार्टून नहीं एनीमेटेड मूवी है मां…”
“जो भी हो… सिरदर्द होने लगा है. दिनभर ये लैपटॉप नहीं, तो टीवी खोले बैठे रहते है… उनसे फुर्सत मिलती नहीं और जो मिल जाए, तो हाथों में मोबाइल आ जाता है… कुछ किताबे वगैरह दो बहू…”
“हां मम्मीजी, बेचारे अब करे भी तो क्या… इस कोरोना ने तो अच्छी-खासी मुसीबत कर दी. ईश्वर जाने कब स्कूल खुलेंगे…”
“मम्मी कोरोना को मुसीबत तो मत बोलो…”
काव्या की आवाज़ पर शारदा और कविता दोनों ने चौंककर काव्या को देखा, जो एकलव्य के साथ वॉशबेसिन में हाथ धोने आई थी…
काव्या की बात सुनकर कविता कुछ ग़ुस्से से बोली, “क्यों! कोरोना को मुसीबत क्यों न बोले?”
“अरे मम्मी, कोरोना की वजह से लग रहा है गर्मी की छुट्टियां हो गईं..” काव्या ने हंसते हुए कहा, तो कविता गंभीर हो गई.
“अरे! ऐसे नहीं बोलते काव्या… कोरोना की वजह से देखो कैसे हमारी आर्थिक व्यवस्था डांवाडोल हो रही है. इस वायरस का अब तक कोई इलाज नहीं निकला है. कितने लोग डरे हुए हैं. कितने लोग इसकी चपेट में आ गए है… और कितनों ने तो अपनी जान…”
“ओहो मम्मा, मज़ाक किया था और आप सीरियस हो गई… चलो सॉरी..” कविता के गले में गलबहियां डालते हुए काव्या उनकी मनुहार करती बोली, “छुट्टियां हो गई. पढ़ाई से फुर्सत मिल गई, इसलिए कह दिया.”
“ये मज़ाक का समय नहीं है समझी.” कविता ने डांटा, तो शारदा भी बड़बड़ा उठी…
“और क्या, आग लगे ऐसी छुट्टियों को. इस मुए कोरोना की वजह से पूरी दुनिया की जान सांसत में है और तू उसी को भला हुआ कह रही है. ऐसी छुट्टियों का क्या फ़ायदा, जिसमें न बाहर निकल पाए और न किसी को घर पर बुला पाए. न किसी से मेलजोल, न बातचीत… घूमना-फिरना सब बंद. सब अपने-अपने घरों में कैद कितने परेशान हैं…”
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“परेशानी कैसी दादी… टीवी, नेट सब तो खुला है न…” एकलव्य ने सहसा मोर्चा संभाल लिया…
“हम दोस्तों से जुड़े हैं. वाट्सअप और फोन से हमारी गप्पबाजी हो जाती है. मम्मी आजकल बढ़िया-बढ़िया खाना बना रही है… चिल दादी…” कहते हुए एकलव्य काव्या के साथ चला गया तो कविता शारदाजी से बोली, “मांजी रहने दीजिए, इनकी बात को इतना सीरियसली न लीजिए. वैसे देखा जाए, तो आज की जनरेशन का कूल रवैया हमारे लिए ठीक ही है… आज पूरे विश्‍व में इतनी भीषण विभीषिका आन पड़ी है, देश में घर में ही रहने का आह्वान किया जा रहा है. लोगों से दूर रहने को कहा जा रहा है. ऐसे में ये बिना शिकायत घर पर मज़े से बैठे है… ये कम है क्या…”
शारदाजी चुपचाप बहू की बातें सुनती रहीं…
“जानती हो मां, आज अख़बार में निकला है कि आपदा प्रबंधन में कोरोना वायरस को भी शामिल किया जा रहा है… और हां अब से विज्ञान के छात्र विभिन्न तरह के फ़्लू और बीमारियों के साथ कोरोना वायरस के बारे में भी पढ़ेंगे…”
“हां भई, परिवर्तन के इस युग में नई-नई चीज़ें पाठयक्रम में शामिल होंगी… जानती हो, जब मैंने उस जमाने में पर्यावरण का विषय लिया, तो लोग हंसते थे कि इसका क्या स्कोप है. आज देखो, पर्यावरण हमारी आवश्यकता बन गई… इसी तरह आज इस वायरस को लेकर जो बेचैनी की स्थिति बनी है, उसमे जागरूकता ज़रूरी है…”
अपनी शिक्षित सास की समझदारी भरी बातों से प्रभावित कविता देर तक उनसे वार्तालाप करती रही… फिर रसोई में चली गई. कविता के जाने के बाद शारदा ने अपनी नज़रे बालकनी से नीचे दिखनेवाले पार्क में गड़ा ली… पार्क में फैले सन्नाटे को देख मन अनमना-सा हो गया.
कोरोना के चक्कर में बाज़ार-मॉल सब बंद है… घर पर ऑनलाइन सामान आ जाता है. आगे की स्थिति की गंभीरता को देखते हुए राशन इकट्ठा कर लिया गया है, सो सब निश्चिन्त है. स्कूल बंद है, पर बच्चे ख़ुश है… लोगो से मिलने-जुलने पर लगी रोक का भी किसी को ख़ास मलाल नहीं, क्योंकि बहुत पहले से ही सबने ख़ुद को वाट्सअप-फेसबुक के ज़रिए ख़ुद को बाहरी दुनिया से जोड़ लिया है… वैसे ही रिश्तों में दूरियों का एहसास होता था, अब तो दूरियां जीवनरक्षक है.
उन्हें एकलव्य की भी चिंता हो रही है. पहले ही उसका वज़न इतना बढ़ा हुआ है… अब तो दिनभर लैपटॉप या टीवी स्क्रीन के सामने बैठे खाना खाते रहना मजबूरी ही बन गई है… ये अलग बात है कि इस मजबूरी पर वो ख़ुश है, पर उन्हें बेचैनी है. सामान्य स्थिति में डांट-फटकार कर उसे घर से बाहर खेलने साइकिल चलाने भेजा जाता था. आज वो भी बंद है… हैरानी होती है कि आज के बच्चों को बाहर खेलने भेजना भी टास्क है.
यक़ीनन इसकी वजह वो ‘यंत्र’ है जिस पर दिनभर बिना थके लोगो की उंगलियां थिरकती है. वो ऊब रही है, क्योंकि लाख चाहने के बाद भी वो स्मार्टफोन से दोस्ती नहीं कर पाई. यश ने कितनी बार उनसे कहा, “मां, स्मार्टफोन की आदत डाल लो. समय का पता ही नहीं चलेगा.” स्मार्टफोन लाकर भी दिया, पर उन्हें कभी भी स्मार्टफोन पर मुंह गाड़े लोग अच्छे नहीं लगे शायद इसी वजह से उन्होंने इस आदत को नहीं अपनाया… इसीलिए आज वो उकताहट महसूस कर रही है… घर में क़ैद ऊब रही है, पर ये क़ैद इन बच्चों को महसूस नहीं होती. पार्क में न जाने का उन्हें कोई मलाल नहीं… फ्रेंड्स से आमने-सामने न मिलने की कोई शिकायत नहीं… ऐसे में उसे बच्चों के व्यवहार से कविता की तरह संतुष्ट होना चाहिए, पर मन बेचैन है.
रात का खाना बच्चों ने अपने-अपने कमरे में स्क्रीन ताकते हुए खाया.. वो भी खाना खाकर अपने कमरे में आकर लेट गईं… घर की दिनचर्या बिगड़ गई थी, ऐसा लग रहा था मानो काव्या और एकलव्य की गर्मियों की छुट्टियां चल रही हो. सहसा उन्हें बीते ज़माने की गर्मियों की छुट्टियां याद आई… यश काव्या की उम्र का ही था… गर्मियों की दोपहर को चोरी-छिपे खेलने भाग जाता था… गर्मी-सर्दी सब खेल पर भारी थी… सातवीं कक्षा में उसका वार्षिक परीक्षा का हिन्दी का पर्चा याद आया… चार बजे शाम का निकला यश सात बजे खेलकर आया, तो वह कितना ग़ुस्सा हुई थी.. “ऐसा करो, अब तुम खेलते ही रहो… कोई ज़रूरत नहीं है इम्तहान देने की, मूंगफली का ठेला लगाना बड़े होकर.” उसकी फटकार वह सिर झुकाए सुनता रहा.
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शारदाजी ये सोचकर मुस्कुरा उठीं कि यश को खेलने की एवज में उससे कितनी बार दूध-फल-सब्जी बिकवाई… कभी-कभी तो रिक्शा भी चलवाया. उसके मन-मस्तिष्क में कूटकूटकर भर दिया था, जो ढंग से पढ़ाई नहीं करते, ज़्यादा खेलते है, वो यही काम करते है. कितनी ग़लत थी वह… आज पछतावा होता है कि नाहक ही उसे खेलने के लिए डांटा. आउटडोर खेल के महत्व को उस वक़्त नकारा, जबकि आज चाहती है कि बच्चे खेले… खेलते भी है, पर मैदान में नहीं स्क्रीन पर… घर बैठे ही. वैसे ही आजकल खुले में खेलने को ठेलना पड़ता था. अब कोरोना के चलते वो भी नहीं हो सकता. अब बच्चों की मौज है… उन्हें कोई शिकायत नहीं, काश! वो शिकायत करते. यश की तरह… यश की खिलंदड़ी प्रवृत्ति को लेकर वह हमेशा चिंतित रही. आज उसके बच्चे खेलने नहीं जाते तो चिंतित है.
विचारों में घिरे-घिरे झपकी आई कि तभी काव्या और एकलव्य के चीखने से ही हड़बड़ाकर उठ बैठी… उनके कमरे में जाकर देखा, तो काव्या ख़ुशी से नाच रही थी… एकलव्य भी बहुत ख़ुश था. यश और कविता के मुख पर मंद-मंद मुस्कान थी… यश बोला, “मां, इनके इम्तहान कैंसिल हो गए…”
“मतलब…”
“मतलब अब बिना इम्तहान के ही ये दूसरी कक्षा में चले जाएंगे.”
“अरे ऐसे कैसे…”
“सब कोरोना की वजह से दादी, अभी-अभी स्कूल से मेल आया है, क्लास आठ तक सब बच्चे बिना इम्तहान के ही पहले के ग्रेड के आधार पर प्रमोट हो जाएंगे… हुर्रे मैं क्लास नाइंथ में आ गई…” वो उत्साहित थी.
“और मैं क्लास सेवन्थ में…”
“हां वो भी बिना मैथ्स का एग्ज़ाम दिए हुए…” काव्य ने एकलव्य को छेड़ा.
एकलव्य का हाथ मैथ्स में तंग है. सब जानते थे, इसलिए सब हंस पड़े.
इम्तहान नहीं होंगे, उसे सेलीब्रेट करने के लिए रात देर तक अंग्रेज़ी पिक्चर देखी गई…
शारदा अपने कमरे में आकर सो गई… सुबह आंख खुली, तो देखा सूरज की धूप पर्दों से भीतर आने लगी थी. आज कविता ने चाय के लिए आवाज़ नहीं लगाई, यह देखने के लिए वह उठी, तो देखा बेटे-बहू का कमरा बंद था.
आज न शनिवार था, न इतवार, न ही कोई तीज-त्यौहार फिर छुट्टी..? वो सोच ही रही थी कि तभी दरवाज़ा खुला… कविता कमरे से निकली, शारदा को देख बोली, “आज इन्हें ऑफिस नहीं जाना है, इसलिए देर से उठे. आप बालकनी में बैठो चाय वहीं लाते है.” सुबह और शाम की चाय अक्सर तीनों साथ ही पीते है. शारदा बालकनी में आकर बैठ गई… यश भी अख़बार लेकर बालकनी में पास ही आकर बैठ गया, तो शारदा ने पूछा “आज काहे की छुट्टी..”
“मां, कोरोना के चलते हमारी भी छुट्टी हो गई… आज सुबह मेल देखा, तो पता चला. हमें आदेश मिला है कि घर से काम करने के लिए…”
“ओह!..” कहकर वह मौन हुई, तो यश बोला, “पता नहीं ये कब तक चलेगा… घर से कैसे काम होगा.” यश के चेहरे पर कुछ उलझन देखकर शारदा ने परिहास किया, “क्यों तुम्हारे बच्चे बिना इम्तहान दिए दूसरी कक्षा में प्रवेश कर सकते है, तो क्या तुम घर से काम नहीं कर सकते…” यश हंसते हुए कहने लगा, “सच कहती हो मां… मुझे तो जलन हो रही है इनसे, बताओ, बिना इम्तहान के दूसरी क्लास में चले जाएंगे… “
शारदा ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, तो यश बोला, “याद है मां, एक बार जब मुझे चिकनपाक्स हुआ था, तो भी मुझे इम्तहान देने पड़े थे वो भी अकेले…”
“अरे बाप रे! कैसे भूल सकती हूं. पहला पर्चा देकर घर आया और बस… ऐसे दाने निकले कि निकलते ही चले गए. सब बच्चों की छुट्टियां हुई, तब तूने इम्तहान दिए…”
“वही तो…” यश सिर हिलाते हुए कुछ अफ़सोस से बोला.
“बिना पढ़े मुझे तो नहीं मिली दूसरी क्लास… बीमारी में भी तुम मुझे कितना पढ़ाती थी. तुम पढ़कर सुनाती और मैं लेटा-लेटा सुनता रहता… जब तबीयत ठीक हुई, तब टीचर ने सारे एग्ज़ाम लिए. आज इन्हें देखो, मस्त सो रहे है दोनों.”
यश ने मां का हाथ थामकर कहा, “वक़्त कितना बदल गया है. मुझे याद है जब मुझे चिकनपाक्स हुआ था, तब मैं भी इनकी तरह क़ैद था घर में… छुआछूत वाली बीमारी के चलते न किसी से मिलना-जुलना, न किसी के साथ खेलना… बड़ा बुरा लगता था.”
“हां, बड़ा परेशान किया तूने उन पंद्रह दिन…”
“हैं अम्मा… ये परेशान करते थे क्या…” सहसा चाय की ट्रे लिए कविता आई और वह भी बातचीत में शामिल हो गई. शारदा यश के बचपन का प्रसंग साझा करने लगी.
“और क्या… एक दिन चोरी से निकल गया था बगीचे में… आम का पेड़ लगा था उस पर चढा बैठा था…” यश को वो प्रसंग याद आया और ख़ूब हंसा… “पता है कविता, मैं आम के पेड़ में चढा हुआ था अम्मा ने कहा एक बार तेरा चिकनपाक्स ठीक हो जाए, फिर बताती हूं.. मैं कितना डर गया था. लगा कि ठीक होऊं ही न….”
यह सुनते ही शारदा ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बड़ी ज्यादतियां की है तुझ पर…”
“कैसी बात कर रही हो मां… मैं था भी तो कितना शैतान कि मौक़ा मिलते ही बाहर भागने की सोचता… कभी क्रिकेट खेलता.. तो कभी फुटबॉल… कभी यूं ही पेड़ों में चढ़कर मस्ती करते…”
“जो आज जैसी सुविधाएं होती तो शायद तू बाहर निकलने को न छटपटाता…”
“अच्छा है जो आज जैसी सुविधाएं नहीं है. कम-से-कम हमने अपना बचपन तो जिया… सुविधाएं होती, तो शायद बचपन के क़िस्से नहीं होते… मां ये बच्चे अपने बचपन के कौन-से क़िस्से याद करेंगे.”
यश के मुंह से निकला, तो शारदा का मन भीग-सा गया. सहसा चुप्पी छा गई… तो कविता बोली, “कोरोना वायरस की वजह से हुई छुट्टियां और बिना इम्तहान दिए नई क्लास में प्रमोट होने जैसे क़िस्से याद करेंगे…”
हंसते हुए शारदा ने कविता से पूछा, “वो दोनों अभी उठे नहीं है क्या…”
“रात ढाई बजे तक चली है पिक्चर. इतनी जल्दी थोड़ी न उठनेवाले…”
“ठीक है सोने दे… उठकर करेंगे भी क्या, वही टीवी, नेट-गेम्स और स्मार्टफोन…” शारदा के कहने पर यश ने कहा, “अभी ये लोग सो रहे है… आओ, न्यूज सुन लेते है… देखे कोरोना वायरस का क्या स्टेटस है…”
“सच में बड़ा डर लग रहा है…” कविता ने कहा, तो यश बोला, “डरना नहीं है, वायरस से लड़ना है… अपने देश ने काबिलेतारीफ इंतज़ाम किए है. डब्ल्यूएचओ ने भी तारीफ़ की है, ये बड़ी बात है. आगे हमें ही सावधानियां रखनी है.” यश और कविता समाचार देखने चले गए..
शारदा सोचने लगी- कोरोना वायरस को भगाने के लिए जागरूक होना अतिआवश्यक है… सभी लोंगो के प्रयास से कोरोना देश-दुनिया से चला ही जाएगा… सैल्यूट है डॉक्टर को… सुरक्षाकर्मियों को और मीडियावालों को, जिनके काम घर से नहीं हैं.
इस वायरस से तो कभी-न-कभी छूटेंगे, पर उस वायरस का क्या… जिसने सबको दबोचा है और किसी को उसकी पकड़ में होने का अंदाज़ा भी नहीं है…
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मुआ इंटरनेट नाम का वायरस ज़रूरत के नाम पर घर-घर में प्रवेश कर चुका है. उसको दूर करने के इंतज़ाम कब होंगे. काश! समय रहते इसके प्रति भी जागरूकता आए, तो क्या बात हो… शायद बच्चों का बचपन बचपन जैसा बीते…
शारदा का मन बेचैन हो उठा. कुछ यक्ष प्रश्न उसके मन उद्वेलित करने लगे.
सोशल डिस्टेंसिंग करानेवाले कोरोना वायरस के जाने के बाद क्या सबके दिल मिल पाएंगे? क्या बच्चों में बाहर निकलने की, एक-दूसरे से मिलने-जुलने की नैसर्गिक उत्कंठा जागेगी?
दिनभर स्क्रीन में सिर दिए लोगों को आसपास सूखती रिश्तों की बेलों में अपने समय की खाद देकर हरियाने की इच्छा जागेगी. आज की चिंता क्या पर्यावरण के प्रति चिंतन में तब्दील होगी…
एक प्रश्न जो सबसे ज़्यादा उसे कचोट रहा था कि सब घर पर संतुष्ट है. वर्तमान की मांग होने पर भी आज ये संतुष्टि उसके मन को क्यों चुभ रही है?
“अरे मां, आप किस सोच में डूबी हैं…” कविता का स्वर उन्हें सोच-विचार घेरे से बाहर ले आया. भविष्य के गर्भ में छिपे उत्तर तो वर्तमान के प्रयासों और नीयत के द्वारा निर्धारित किए जाने हैं, ये सोचकर शारदा ने गहरी सांस भरी और उठ खड़ी हुईं…

मीनू त्रिपाठी

“ये सब क्या चल रहा है इनके यहां.” यश ने प्रॉपर्टी एजेंट से पूछा, जो ख़ुद भी सिंगापोरियन चाइनीज़ था.
“नॉट गुड, इस तरह की पूजा ज़्यादातर आत्माओं से कम्युनिकेट करने के लिए की जाती हैं.”
यश और स्वाति की आंखें मिलीं, दोनों की आंखों में हैरतमिश्रित बेचारगी तैर रही थी.

“ये जगह तो स्वर्ग-सी सुंदर है. इतनी सुंदर जगह का तो मुझे कभी सपना भी नहीं आया.” टैक्सी में बैठकर चांगी एयरपोर्ट से जुरोंग की तरफ़ जाती नवविवाहिता स्वाति ने अपनी ख़ुशी का इज़हार करते हुए यश से कहा.
“ये तो है, इसीलिए तो फ्लाइट में इतनी सारी लाल चूड़ेवालियां अपने पतियों के साथ दिख रही थीं. नॉर्थ इंडिया का पसंदीदा हनीमून डेस्टिनेशन बन गया है सिंगापुर.” यश का इशारा फ्लाइट में साथ यात्रा करनेवाले नवविवाहित जोड़ों की तरफ़ था.
“ओह यश! आई एम सो लकी कि तुम यहां काम करते हो और यहां के स्थायी नागरिक बन चुके हो. मुझे तो क़िस्मत ने हमेशा के लिए इस ख़ूबसूरत हनीमून डेस्टिनेशन में भेज दिया.” स्वाति का रोम-रोम पुलकित हो रहा था.
यश ने उसे कुछ इस अंदाज़ से देखा जैसे कह रहा हो कि तुम नहीं जानती कि जन्नत की हक़ीक़त क्या है, पर प्रत्यक्ष में उसने कुछ नहीं कहा, क्योंकि वह उसके उत्साह को कम नहीं करना चाहता था.
“इस जगह को देखकर ऐसा जान पड़ता है, जैसे प्लास्टिक के बड़े-बड़े बगीचों के बीच में गगनचुंबी इमारतों के मॉडल्स रख दिए गए हों. पूरा का पूरा देश ही किसी फिल्मी सेट-सा प्रतीत होता है. जिधर नज़र जाती है, वह जगह तस्वीर उतारने के लायक़ लगती है.” स्वाति घर से बाहर निकलते ही उमंग-उत्साह के साथ चहकने लगती. कभी वह सेल्फी लेती, तो कभी किसी अच्छी-सी जगह पर खड़ी होकर यश से अपनी तस्वीर निकालने को कहती.
यश भी उसे ज़िंदगी के पूरे मज़े लेने दे रहा था. नवविवाहित जोड़े को इसी तरह स्वप्ननगरी में विचरण करते-करते कब साल बीत गया पता ही न चला. फिर एक दिन यश के मम्मी-डैडी का फोन आया कि वह जल्दी ही उनसे मिलने सिंगापुर आएंगे. ख़बर सुनकर स्वाति ख़ुश हो गई, “मैं तो मम्मी-डैडी को सैंटोसा आइलैंड लेकर जाऊंगी, बर्ड पार्क घुमाऊंगी… और हां, वो जगह तो ज़रूर घुमाने ले जाऊंगी, जहां नेताजी ने आज़ाद हिंद फौज बनाई थी.”
“घुमाने तो उन्हें बाद में ले जाना, पहले उनके रहने का इंतज़ाम तो कर लो. जल्दी से जल्दी हमें दूसरा फ्लैट लेना पड़ेगा. हमारे इस एक बेडरूमवाले फ्लैट में मम्मी-डैडी हमारे साथ कैसे रहेंगे?”
“ओह हां, ये तो मैंने सोचा ही नहीं.” स्वाति जैसे नींद से जागी.
“नहीं सोचा, तो अब सोचना शुरू कर दो. मेरे पास तो ज़्यादा वक़्त नहीं है. तुम कल से ही रियल इस्टेट की वेबसाइट्स पर जाकर अपने हिसाब से किराए का फ्लैट देखना शुरू कर दो.”
जब स्वाति ने रियल इस्टेट वेबसाइट्स को ढूंढ़ना शुरू किया, तो हैरान रह गई, क्योंकि कई किराए के लिए उपलब्ध घरों के विज्ञापनों पर साफ़ लिखा था कि नॉट फॉर इंडियन्स. जब महीनों की खोज के बाद भी कोई मकान मन को न भाया, तो स्वाति ने यश पर ख़ुद का फ्लैट ख़रीदने के लिए दबाव डालना शुरू कर दिया.
“एक न एक दिन तो हमें अपना फ्लैट ख़रीदना ही है, तो क्यों न  बार-बार किराए का घर ढूढ़ने का झंझट अभी से ख़त्म कर दें और अपना ही फ्लैट ख़रीद लें.”
यश को स्वाति की बात मानने में ही समझदारी लगी और किराए के फ्लैट की तलाश अब फ्लैट ख़रीदने की मुहिम में बदल गई. क़िस्मत से बुकिट बटोकफ एरिया में एक कंडोमिनियम जल्दी ही पसंद आ गया. अगले दो महीनों में ख़रीद से संबंधित सभी औपचारिकताएं भी पूरी हो गईं. सिंगापोरियन्स से स्टेटस स्टैंडर्ड के तीसरे मानक को पाने के बाद स्वाति फूली नहीं समा रही थी. कैश, कार और कंडोमिनियम ये ही तीन मानक हैं सिंगापोरियन्स के ख़ुशहाल लाइफस्टाइल के.

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जब यश और स्वाति फाइनल सेटलमेंट के बाद प्रॉपर्टी एजेंट के साथ फ्लैट पर चाबी लेने पहुंचे, तो देखा कि अगले फ्लैट में रहनेवाले अधेड़ चाइनीज़ कपल्स के यहां कुछ अलग तरह का पूजा-पाठ चल रहा था और गृहस्वामी अपने ड्रॉइंगरूम में बने मंदिर के आगे कुछ मंत्र जपता हुआ अपनी पीठ में एक मोटी-सी रस्सी मार रहा था और गृहस्वामिनी एक अजीब-सा सिल्क का गाउन और स्कार्फ पहनकर सिंहासननुमा कुर्सी पर विराजमान थी. वो अपने मुंह से कुछ अजीब-सी आवाज़ें निकाल रही थी. एक और कोई जोड़ा हाथ में बड़ी-बड़ी थालियां, जिनमें कुछ खाद्य पदार्थ और नकली करेंसी थी, लेकर खड़े थे.
“ये सब क्या चल रहा है इनके यहां.” यश ने प्रॉपर्टी एजेंट से पूछा, जो ख़ुद भी सिंगापोरियन चाइनीज़ था.
“नॉट गुड, इस तरह की पूजा ज़्यादातर आत्माओं से कम्युनिकेट करने के लिए की जाती हैं.”
यश और स्वाति की आंखें मिलीं, दोनों की आंखों में हैरतमिश्रित बेचारगी तैर रही थी. अब तक की सारी जमा-पूंजी लगाने और बैंक से अच्छी-ख़ासी रक़म फाइनेंस कराने के बाद में जैसे-तैसे तो ये फ्लैट ख़रीदा गया और शुरुआत हो रही है, तो इस ख़बर के साथ कि अगले फ्लैट में आत्माओं से कम्युनिकेट करनेवाले लोग रहते हैं. लेकिन अब क्या हो सकता था. यश के मम्मी-डैडी के आने का समय क़रीब आता जा रहा था.
फॉल्टी सामान होता, तो रसीद दिखाकर दुकान से पैसे वापस ले आते, पर इस घर का क्या करें, जिसे क़रीब तीन महीने तक सिंगापुर के कोने-कोने में लगभग सौ फ्लैट्स देखने के बाद ख़रीदा गया था. जब से इसे फाइनल किया था, तब से इससे दिल से भी जुड़ गए थे. टॉप क्लास फर्नीचर शोरूम्स में घंटों घूम-घूमकर फ्लैट के इंटीरियर के साथ मैच करनेवाले फर्नीचर्स भी पेशगी देकर फाइनल कर दिए गए थे. उस दिन फ्लैट की चाबी लेकर जाते समय दोनों ख़ामोश थे. नए घर में प्रवेश की ख़ुशी थोड़ी कम हो गई थी.
“मैं जानता हूं स्वाति कि तुम्हारे मन में इस वक़्त क्या चल रहा है.” आख़िरकार यश ने चुप्पी तोड़ी.
“कुछ अजीब-सा महसूस हो रहा है यश. इतने शौक़ से घर लिया और पहुंचने के पहले ही पड़ोस में अजीब चीज़ें देखने को मिल रही हैं.”
“ऐसा कौन-सा आसमान फट गया है स्वाति? वो लोग अपने घर में अपने तरी़के से पूजा कर रहे थे, जैसे हम अपने घर में अपने तरी़के से करते हैं. कोई अपने घर में क्या कर रहा है, इससे हमारा कोई सरोकार नहीं होना चाहिए. वो लोग अपने फ्लैट में रहेंगे और हम लोग अपने में.”
“मगर अपने प्रॉपर्टी एजेंट ने तो उनकी पूजा का कुछ और ही स्पष्टीकरण दिया था. वह भी तो लोकल चाइनीज़ है, उसे इन सब क्रिया-कलापों का अर्थ पता ही होगा. किराए का घर होता, तो भी कोई बात न थी, पर अपने इस आशियाने में तो मैंने और तुमने उम्र बिताने के ख़्वाब देखे हैं.”
“इसके बारे में अधिक सोचने से कोई फ़ायदा नहीं होनेवाला. अब 15 दिन बाद तो हमें अपने इस आशियाने में शिफ्ट होना ही है. पूर्वाग्रह के साथ शुरुआत करोगी, तो कभी ख़ुश नहीं रह पाओगी.”
स्वाति ने सोचा- ‘यश ठीक ही कह रहा है. अपेक्षाकृत ठीक होगा कि वह पूरे उमंग-उत्साह के साथ नए घर में प्रवेश करे. वह सब कुछ भूलकर गृहप्रवेश की तैयारी में लग गई.
एक फ्लोर पर आठ घर बने हुए थे. चार फ्लैट एक तरफ़ और चार उसके दूसरी तरफ़. मगर ये क्या सामनेवाले फ्लैट में रहनेवाली चाइनीज़ बुढ़िया और उसका अविवाहित बेटा यश और स्वाति को देखते ही अपने फ्लैट का दरवाज़ा बंद कर लेते थे. आख़िरी कोने के फ्लैट में रहनेवाले मलेशियन परिवार में पति-पत्नी और तीन टीनएजर बेटियां थीं. मां-बेटी तो
कभी-कभार ग़लती से मुस्कुराकर नए पड़ोसी से ‘हेलो-हाय’ कर लिया करती थीं. लेकिन उस मलेशियन आदमी को तो यश और स्वाति के साथ लिफ्ट में आना-जाना भी पसंद न था. उन्हें लिफ्ट में जाता देखकर वह अपना रास्ता बदलकर दूसरी तरफ़ से सीढ़ियों से जाता-आता था.
जब उनके साइड में रहनेवालों का यह हाल था, तो दूसरी तरफ़ रहनेवालों की तरफ़ देखने की तो यश और स्वाति हिम्मत ही कैसे जुटाते? हां, उनकी तरफ़ के लोगों में उन्हें देखकर कोई वाक़ई ख़ुश होता था, तो वे थे ये अजीब-सी पूजा करनेवाले अधेड़ चाइनीज़ कपल्स- लिमपेंग आंटी और जोसुआ अंकल.
सिंगापुर के फ्लैट्स में मुख्यद्वार पर दो दरवाज़े लगे होते हैं. एक लकड़ी का, जिसे अधिकांश लोग स़िर्फ रात के समय ही बंद करते हैं और दूसरा लोहे की जालीवाला. स्वाति भी दिन के समय दूसरों की तरह स़िर्फ लोहे की जालीवाले दरवाज़े को ही बंद रखती और लकड़ीवाला दरवाज़ा पूरे दिन खुला रहता. ऐसा करने से एक तो कॉरिडोर में आते-जाते लोगों को देखकर अकेलेपन का एहसास न होता, दूसरा खुली हवा के आर-पार का आनंद भी मिलता था. लिमपेंग आंटी और जोसुआ अंकल जब भी कॉरिडोर से गुज़रते, तो दो पल रुककर उसका हालचाल ज़रूर पूछते. साथ ही यश और स्वाति से यह कहना भी नहीं भूलते कि वे यहां परदेस में अपने आपको अकेला न समझें और कोई भी ज़रूरत होने पर उन्हें ज़रूर बताएं.


लिमपेंग आंटी और जोसुआ अंकल बौद्ध धर्म मानने के साथ-साथ शुद्ध शाकाहारी थे. जब लिमपेंग आंटी को पता चला कि यश और स्वाति भी वेजीटेरियन हैं, तो वह अक्सर ही कुछ न कुछ चाइनीज़ वेजीटेरियन फूड बनाकर दे जातीं. चाइनीज़ बहुलवाले देश में वेजीटेरियन पड़ोसी मिलना यश और स्वाति के लिए भी बड़े ही सौभाग्य की बात थी, पर स्वाति की सोच पर तो पूर्वाग्रह की बेड़ियां पड़ चुकी थीं.

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जैसे ही लिमपेंग आंटी ताज़ा, ख़ुशबूदार भोजन स्वाति को पकड़ाकर जातीं, वैसे ही स्वाति पूरा खाना फेंक देती. उसे लगता कि अगर वह लिमपेंग आंटी के घर के भोजन को खाएगी, तो किसी टोने-टोटके का शिकार हो जाएगी. यह सिलसिला पूरे दो साल तक चला और आगे भी चलता रहता अगर परिस्थितियों ने स्वाति को उसकी क्रूरता का बोध न कराया होता.
स्वाति की प्रेग्नेंसी का तीसरा महीना चल रहा था कि उसे चिकन पॉक्स हो गया. डॉक्टर ने पूरी बॉडी पर लोशन लगाने को दिए. तीसरे दिन चिकन पॉक्स के कारण तेज़ बुख़ार भी हो गया. यश का प्रोजेक्ट लाइव जा रहा था, उसे स्वाति की देखभाल के लिए छुट्टियां मिलने की कोई गुंजाइश न थी, बल्कि ऐसे समय में उसका स्वाति से थोड़ा दूर रहना ही ठीक था. अब स्वाति क्या करे और कहां जाए… किससे मदद के लिए गुहार करे?
यश इंडियन रेस्टोरेंट से फोन द्वारा खाने की होम डिलीवरी करा लेता और स्वाति के लिए एक प्लेट उसके कमरे के दरवाज़े पर रखकर चला जाता था. उस शाम जब यश ऑफिस से लौटकर आ रहा था, तो लिफ्ट में उसकी मुलाक़ात लिमपेंग आंटी से हो गई.
“क्या बात है यश, मैंने तीन-चार दिन से स्वाति को नहीं देखा. वो इंडिया चली गई है क्या?” लिमपेंग आंटी की आंखों में बेचैनी थी.
यश से सारी घटना का ब्यौरा मिलते ही वह बिना देरी किए स्वाति की सेवा में हाज़िर हो गईं.
“जब तक स्वाति ठीक नहीं हो जाती, मैं उसके साथ तुम्हारे ही घर में रहूंगी यश.”
“मगर आंटी अगर उसके साथ रहने से आपको भी चिकन पॉक्स हो गया तो…?”
“तो क्या… अगर उसकी जगह मेरी बेटी इन्हीं हालात से गुज़र रही होती, तो क्या मैं उसको छूत के डर के कारण उसके हाल पर छोड़ देती? दूसरी बात कई वर्ष पूर्व मुझे चिकन पॉक्स हो चुका है, अत: अब इसके दोबारा होने की संभावना कम ही है.”
लिमपेंग आंटी की आर्थिक स्थिति बहुत सुदृढ़ न थी. वह और जोसुआ अंकल किसी ग्रॉसरी शॉप में डेली बेसिस पर काम करते थे. लेकिन वे बिना अपनी जीविका की परवाह किए स्वाति की ख़िदमत में लग गईं. स्वाति को शरीर पर हो रहे चिकन पॉक्स के लाल दानों से असहनीय पीड़ा हो रही थी. एक रात दर्द से कराहती हुई वह बाथरूम के लिए उठी, तो अंधेरे में साइड टेबल से टकराकर गिर गई.
कहां है वो… अर्धचेतन अवस्था में भी स्वाति को तीव्र वेदना की अनुभूति हो रही थी और फिर सब कुछ शून्य. फिर कुछ पल का शोर… और उसके चेहरे के आस-पास तैरते कुछ अजनबी, तो कुछ परिचित चेहरे.
जब चेतना वापस आई, तो ख़ुद को एक अस्पताल में पाया. पेट के निचले हिस्से में असहनीय पीड़ा का एहसास होने पर उसने अपना दायां हाथ उधर सहलाने के लिए उठाने की कोशिश की… मगर ये क्या सीधे हाथ की कलाई से तो एक टयूब जुड़ी हुई थी. स्वाति ने जब अपने बाएं हाथ से पेट को छुआ, तो एक खालीपन के एहसास से भरी सिहरन उसके समस्त शरीर को ठंडा कर गई. वह अप्रिय की आशंका से कंपकपा रही थी… पलकों के बांध को तोड़ता हुआ उसका रुदन हिचकियों के बीच करुण विलाप में परिवर्तित हो गया. वो ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी.
अचानक उसे अपने सिर पर स्नेहमयी स्पर्श महसूस हुआ और वह फफककर रोते हुए बोली, “यश प्लीज़, कह दो कि जो मैं सोच रही हूं, वह सच नहीं है.”
“स्वाति, मैं यश नहीं लिमपेंग हूं… यश यहां से थोड़ी देर पहले ही गया है. वह जाना तो नहीं चाहता था, पर मैंने ही उसे ज़बर्दस्ती घर भेज दिया. आख़िर रातभर का जगा हुआ था, कुछ देर सो लेगा, तो तुम्हारी भी देखभाल अच्छे-से कर पाएगा.”
स्वाति ने गर्दन को घुमाकर देखा, तो पाया कि बेड के साइडवाली कुर्सी पर लिमपेंग आंटी बैठी थीं. नींद न पूरी होने से उनकी आंखें लाल और थकान से शरीर का पोर-पोर मुरझा रहा था. ऐसा लग रहा था कि रातभर जगने के बाद अभी कुछ मिनट पहले ही उनकी आंख लगी थी, पर स्वाति के रोने से वे घबराकर उठ गई थीं.
“मैं यहां क्यों हूं आंटी?”
“मैं कुछ नहीं बता सकती… अभी तुम्हें आराम की सख़्त ज़रूरत है.”

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लिमपेंग आंटी ने अपनी हथेलियों से स्वाति के आंसू पोंछते हुए कहा.
तब तक नर्स राउंड पर आ गई और उसने स्वाति का ब्लडप्रेशर और बुख़ार चेक करने के बाद उसे कुछ दवाइयां खाने को दीं. दवाइयों के असर और संताप से निढाल स्वाति फिर से सो गई. उसको दो दिन बाद अस्पताल से छुट्टी मिलनी थी, पर उसके पहले एक काउंसलिंग सेशन अटेंड करना था. यश ने भी उसके साथ सेशन जॉइन किया.
जब वो दोनों काउंसलिंग के लिए रुके हुए थे, तो लिमपेंग आंटी टैक्सी लेकर यह कहते हुए घर चली गईं कि चलकर तुम लोगों के खाने-पीने का इंतज़ाम करती हूं, स्वाति को तो अभी लंबे समय तक परहेज़ी खाने पर ही रहना होगा. रेस्टोरेंट का खाना उसकी सेहत के लिए ठीक न होगा.
जब यश कार से स्वाति को घर ले जा रहा था, तो उसने स्वाति से कहा, “अगर उस रात आंटी न होतीं, तो न जाने क्या होता… तुम्हारी चीख की आवाज़ से जब आंटी उठीं, तो तुम्हें होश न था, तुम्हें हैवी ब्लीडिंग हो रही थी… तुम्हें अस्पताल में लाने के बाद जब अल्ट्रासाउंड किया गया, तो भ्रूण में कुछ असामान्यता पाई गई और भी कई कॉम्प्लीकेशन थे, इसलिए तुरंत ही तुम्हारा ऑपरेशन करना पड़ा. स्वाति सच में अगर लिमपेंग आंटी न होतीं, तो मैं अकेला इन हालात से कैसे निपटता.”
कुछ रिश्ते अर्थहीन होते हैं और कुछ के अर्थ इतने गूढ़ होते हैं कि उन्हें औसत समझ का व्यक्ति नहीं समझ सकता. अपने आपको बहुत ज़्यादा बुद्धिजीवी और आधुनिक समझनेवाली स्वाति आज ख़ुद पर शर्मिंदा थी. वह स्तब्ध थी कि अपने शोध के लिए जूनियर साइंटिस्ट का अवॉर्ड जीतनेवाली वह असल में कितनी संकीर्ण मानसिकता की थी. किसी ने किसी के बारे में कुछ कहा और उसने बिना किसी तार्किक आधार के उस पर यकीन करके अपनी सोच की बेड़ियों पर एक बड़ा-सा ताला और लगा दिया.
हैरानी की बात थी कि वह काग़ज़ का एक टुकड़ा बर्बाद नहीं करती थी. पर्यावरण संरक्षक की वकालत करते हुए बिजली-पानी, खाना बर्बाद करनेवालों को हज़ारों दलीलें दे डालती थी. फिर कैसे दो साल तक किसी के प्यार के मसालों से महकते भोजन को वहमों की शिकार होकर कूड़े में फेंकती रही?
वे घर पहुंच चुके थे. स्वाति के कमज़ोर शरीर को ऊर्जा की ज़रूरत थी. भूख से उसका हाल बेहाल था. वो अभी कपड़े बदलकर फ्रेश भी न हो पाई थी कि लिमपेंग आंटी हाज़िर हो गईं. एक ट्रे में दो बड़े बाउल में वेजीटेबल सूप के साथ. स्वाति को तेज़ भूख लगी थी, वो दोनों बाउल के सूप तुरंत पी गई.
“लिमपेंग आंटी मेरी आंटी हैं यश. वो ये सूप अपनी बेटी यानी कि मेरे लिए लाई थीं. तुम फोन करके अपने लिए बाहर से खाना ऑर्डर कर लो.” स्वाति ने टिश्यू से अपना मुंह पोंछा और आंटी के गले लग गई. स्नेह के बल से सोच पर पड़ी बेड़ियां टूट चुकी थीं.

रीता कौशल

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अनेक कार्यक्रम थे उनकी लिस्ट में आज एक ही दिन के लिए, लेकिन मैं सिद्धि की यादों के संग अकेला रहना चाहता था. जी भरकर उसके ख़्यालों में खो जाना चाहता था. अभी तक तो मैंने सिद्धि से अपने मन की बात भी नहीं की थी. अपनी इंजीनियरिंग कर लूं, तभी कहूंगा, यही तय कर रखा था. इस बात का विश्‍वास था कि वह ना नहीं कहेगी. मुख से कभी कुछ न कहा हो, उसकी आंखों में देखा था मैंने अपने प्रति अनुराग…

इंजीनियरिंग का अंतिम पेपर देकर मैं सीधे अपने हॉस्टल के कमरे में आकर लेट गया. आज मैं जी भरकर सिद्धि के ख़्यालों में खो जाना चाहता था. मन ही मन बातें करना चाहता था उससे, ढेर सारी बातें.
इतने दिन पढ़ाई के कारण मैं किस मुश्किल से स्वयं को रोके हुआ था, यह मैं ही जानता हूं, पर अब इसकी ज़रूरत नहीं. लंबा सफ़र तय कर आज मैं अपनी मंज़िल के क़रीब पहुंच चुका हूं. बस, सिद्धि से बात करने की देर है. वह मना नहीं करेगी, विश्‍वास है मुझे. और न ही मेरे या उसके मम्मी-पापा को कोई ऐतराज़ होगा, यह भी जानता हूं.
भूख तो लगी है, पर न तो बाहर जाने की हिम्मत बची है, न ही स्वयं ही कुछ बनाकर खा लेने की. मां के भेजे लड्डू में से दो बचे हैं, फ़िलहाल वही खाकर तसल्ली कर ली है.
घर पर होता, तो मां यूं मुझे भूखा सो जाने देती क्या?
शुरुआती दिनों में हॉस्टल में रहना कितना अच्छा लगता था. अपनी मर्ज़ी से खाओ-पिओ. देर रात तक मित्रों के संग गप्पबाज़ी करो. जहां मर्ज़ी घूमने जाओ. कोई टोकनेवाला नहीं. किसी से पूछने की ज़रूरत नहीं. स्वतंत्रता का यह सुख थोड़े ही दिनों में ठंडा पड़ने लगा. घर पर मां कितना ख़्याल रखती थीं भोजन, कपड़े, सब चीज़ का, ताकि मैं निश्‍चिंत होकर पढ़ सकूं. इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश हेतु जब मैं पढ़ रहा होता, तो घर में जैसे कर्फ़्यू लग जाता. सब धीमी आवाज़ में बात करते. टीवी-रेडियो सब बंद. और ध्येय पर पहुंचने के लिए मेरा सबसे बड़ा प्रोत्साहन थी सिद्धि. घुंघराले बाल, कोमल-सा चेहरा और शहद-सी रंगत.

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बचपन से जानता था उसे, पर जानने और चाहने में जो फ़र्क़ होता है, वह समझ आया स्कूल ख़त्म होने के आसपास. वर्षों का परिचय था दोनों परिवारों में. हम दोनों के दादा की मैत्री थी और फिर आसपास रहने से उसके और मेरे पापा एक ही स्कूल में पढ़े थे. बस, एक क्लास आगे-पीछे. स्कूल के बाद साइकिल उठाकर निकल जाना, बाज़ार जाने का कोई छोटा-सा बहाना ढूंढ़ना, क्रिकेट खेलना, सब संग ही होता था. सिद्धि के पिता का नाम तो बहुत रौबदार था- राघवेंद्र सिंह, पर पापा उन्हें रघु बुलाते थे और हम दोनों बहन-भाई रघु चाचा.
दोस्तों का तो परीक्षा ख़त्म होने के बाद भी एक-दो दिन और रुकने का इरादा था. फिर जाने मिलना हो या नहीं. आज भी दिनभर संग मिलकर मौज-मस्ती करना चाहते थे, घूमना-फिरना, मूवी जाना… अनेक कार्यक्रम थे उनकी लिस्ट में आज एक ही दिन के लिए, लेकिन मैं सिद्धि की यादों के संग अकेला रहना चाहता था. जी भरकर उसके ख़्यालों में खो जाना चाहता था. अभी तक तो मैंने सिद्धि से अपने मन की बात भी नहीं की थी. अपनी इंजीनियरिंग कर लूं, तभी कहूंगा, यही तय कर रखा था. इस बात का विश्‍वास था कि वह ना नहीं कहेगी. मुख से कभी कुछ न कहा हो, उसकी आंखों में देखा था मैंने अपने प्रति अनुराग.
मेरी पढ़ाई पूरी हुई. कैंपस सिलेक्शन में अच्छी-सी नौकरी भी पा गया था मैं. बहुत हिम्मत करके मैंने उसके लिए नीले रंग का एक सूट भी ख़रीद लिया था. मन-ही-मन कल्पना कर रहा था कि इसे पहनकर वह कैसी नीलकमल-सी लगेगी. ख़रीदना तो साड़ी चाहता था, पर इतने पैसे नहीं थे मेरे पास. थोड़ा-थोड़ा करके बस इतना ही जोड़ पाया था कि एक साधारण-सा सूट ही ख़रीद सकूं. मन की भावनाओं को पैसे से नहीं तौला जा सकता. उससे दूर रहकर भी और पढ़ाई में इतना व्यस्त रहकर भी मैंने उसे हर दिन याद किया था.  आज भी काफ़ी समय था मेरे पास. गाड़ी तो सुबह आठ बजे निकलनी थी. सामान भी लगभग समेट चुका था. चाहता तो आज की शाम मित्रों के संग बिता सकता था, पर यह समय मैं सिद्धि के सपनों में गुज़ारना चाहता था, सिद्धि की यादों के संग.
दूसरे दिन घर पहुंचने तक अंधेरा घिर आया था. थोड़ी देर बातें कर मां रसोई में जुट गईं, मेरे मनपसंद भोजन की तैयारी में और बहन सरिता मेरे संग बतियाने में. दुनिया जहान की ख़बरें थीं उसके पास वर्ष बाद लौटे अपने भाई को सुनाने के लिए. स्कूल की, आसपास की, सखी-सहेलियों की. मैं जितना चुप्पा था, वह उतनी ही बातूनी. अभी हाल ही में उसे पिक्चरें देखने का शौक भी लग गया था. सो उन सबका ब्योरा भी दे डाला.
थकावट तो थी ही. मैं भोजन करके जल्दी ही सोने चला गया. पर सिद्धि से मिलने के विचार मात्र से ही ठीक से सो नहीं पाया…
कैसे बात शुरू करूंगा? क्या कहूंगा? यही तय नहीं कर पा रहा था. इस बात पर भी असमंजस में था कि पहले मां से बात करना ठीक रहेगा या सिद्धि से उसकी रज़ामंदी लेना. दरअसल, घर में कभी मेरे विवाह की चर्चा हुई होती, तो शायद मैंने मां से कह भी दिया होता, परंतु जब तक नौकरी न लग जाती, तो विवाह की बात उठती ही कैसे? और बग़ैर किसी भूमिका के अपने विवाह की बात उठाना भी कठिन था. बहुत सोचकर मैंने तय किया कि पहले सिद्धि से ही बात कर उसकी रज़ामंदी ले लेनी चाहिए. सुबह समय से उठकर तैयार भी हो गया. सोच रहा था कि यदि मां पूछेंगी, तो क्या बताऊंगा कि कहां जा रहा हूं? पर मुझे तैयार देख मां ने कहा, “अच्छा है समय से नहा-धो लिए, तुम्हारे रघु चाचा आ रहे हैं.”
मेरे पूछने पर कि इतनी सुबह-सुबह ही कैसे? मां ने बताया, “सिद्धि का विवाह है न! तो कार्ड लेकर आ रहे हैं. पापा से मशविरा भी करना है कुछ. बस आने ही वाले हैं, तब तक मैं जल्दी से कुछ बना लेती हूं.” कहकर वह रसोई की ओर चल दीं. न ही वह मेरे चेहरे के भाव पढ़ने तक रुकीं और न ही मुझे कुछ कहने की मोहलत मिली.
रघु चाचा और चाची दोनों आए थे. अच्छी तरह प्रेमपूर्वक मिला था मैं उनसे. हंसकर बात की थी. सिद्धि के विवाह की मुबारक़बाद भी दी. अपने ज़िम्मे काम सौंपने का अनुरोध भी किया. सही कहा है शेक्सपीयर ने कि यह दुनिया भी तो एक रंगमंच है, जिसमें हम अपना-अपना क़िरदार निभाने आते हैं, पर अफ़सोस, असल जीवन में न तो हमारे हाथ में कोई लिखित स्क्रिप्ट होती है और न ही अंत की पूर्व जानकारी. समय-समय पर झटके भी मिलते हैं और हमारी योजनाओं के एकदम विरुद्ध फैसले भी हो जाते हैं, जिन्हें हमें स्वीकार करना होता है. रंगमंच के क़िरदारों से बहुत कठोर है यह जीवन.
रघु चाचा की दो बेटियां थीं, अत: बाहर के बहुत से काम उन्होंने मेरे ज़िम्मे कर दिए. यथासंभव सब काम पूरे किए मैंने, पर सिद्धि से दूरी बनाए रखी. रघु चाचा घर आने की बात करते भी, तो मैं कोई-न-कोई बहाना बना उनके कार्यस्थल पर ही मिल आता.
इस बीच मैंने ऐलान कर दिया कि विवाह तक नहीं रुक पाऊंगा और ज़रूरी काम से मुझे एक बार फिर बनारस जाना ही पड़ेगा, पर सगाई की रस्म विवाह से चार दिन पूर्व होनी थी और उनके घर पर ही रखी गई थी. खाने-पीने का इंतज़ाम मेरे ज़िम्मे था. रघु चाचा वे अनुरोध किया था कि मैं कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही उनके घर पहुंच जाऊं.

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बहुत भारी मन से गया था. मैं वहां पूरी उम्र जिसके साथ जीवन बिताने के सपने देखता रहा था, आज वह किसी और की उंगली में अंगूठी पहनाकर अपना संबंध पक्का कर देगी और मैं खड़ा देखता रहूंगा. मैं उसका अमंगल नहीं सोच सकता था और उसे किसी और का देखने की शक्ति भी नहीं थी मुझमें. स्वयं को काम में व्यस्त रखने की कोशिश करता रहा.
वधू के कमरे से छोटी मेज़ उठा लाने का आदेश हुआ मुझे. दरवाज़ा भिड़ा हुआ था. मैं दरवाज़ा खटखटाकर रुका. भीतर कोई है कि नहीं यह भी नहीं, जानता था. तभी अंदर से आवाज़ आई, “अंदर आ जाओ सुषमा.”
मुझे दरवाज़े पर देख वह जड़ हो गई. निश्‍चय ही मेरा आना अपेक्षित नहीं था उसके लिए, पर मेरे लिए तो उसका वहां होना अपेक्षित था, फिर भी मैं कुछ पल मूर्तिवत खड़ा रहा. परंतु शीघ्र ही संभाल लिया स्वयं को.
“कैसे हो?” उसने कहा और जैसे उसे कुछ याद आ गया हो, वह जल्दी से मुड़ गई. आलमारी खोल एक बड़ा-सा बंद लिफ़ाफ़ा निकाल लाई और मेरी ओर बढ़ाते हए बोली, “जब बनारस जाओ, तो इसे यूं ही बंद गंगा में बहा देना. अब इन्हें संभालकर रखना मेरे वश में नहीं.”
उसकी आंखें भीगी हुई थीं या मेरा भ्रम था वह?
मैंने धीरे से पूछा, “क्या है यह?”
“कुछ टूटे हुए सपने, कुछ अधूरे अरमान… तुम जैसा अनाड़ी नहीं समझ पाएगा…”

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मैंने असमंजस से, पहले हाथ में आए उस पैकेट की ओर फिर सिद्धि की ओर देखा, परंतु उसने मुख फेर रखा था.
बस, दो क़दम की दूरी थी हमारे बीच, पर उसे पाटना असंभव-सा था.
मैं छोटी मेज़ और लिफ़ाफ़ा लिए बाहर चला आया. रात को पहनने के लिए जिस बैग में कपड़े लाया था, उसी में वह पैकेट रखकर मैं काम में लग गया. अभी कुछ भी सोचने का समय नहीं था मेरे पास और सगाई के दूसरे ही दिन बनारस लौट गया. काम तो कुछ था नहीं, कुछ करने को मन भी नहीं था. दिनभर बिस्तर पर पड़ा रहा. नींद तो क्या आनी थी, यूं ही लेटा रहा बस. अब तो सिद्धि के बारे में सोचना भी गुनाह हो गया था.
दूसरे दिन बनारस में रहनेवाले साथियों को मेरे आने का पता चल गया और मिलने आ गए, तो वह दिन बीत गया. उसके अगले दिन अनेक कोशिशों के बावजूद मन रघु चाचा के घर में ही अटका रहा. आज की ही तारीख़ थी, सिद्धि के विवाह की. ख़ूब ज़ोर-शोर से तैयारियां हो रही होंगी. शामियाना तन चुका होगा.
दिन ही नहीं बीत रहा था. सोचा गंगा पर जाकर सिद्धि का काम ही कर आऊं. लिफ़ाफ़ा निकाला, छूने से चिट्ठियों का बंडल लगा मुझे, खोला तो डोरी से कसकर बंधी हुई चिट्ठियां ही थीं. हाथ में लिए देर तक बैठा रहा. सिद्धि की अमानत थी, उसे ख़ुद से अलग करने का मन नहीं हो रहा था, पर उसकी बात भी रखनी थी. निकलने लगा, तो मन ने फिर रोक लिया. उत्सुकता हुई.
ज़रा देख तो लूं किसके नाम हैं ये चिट्ठियां? मैं स्वयं को रोक नहीं पाया. प्यार में तो सब जायज़ है न? मैंने बंडल की डोरी खोली और बारी-बारी से चिट्ठी निकालकर पढ़ने लगा.

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‘यह एकतरफ़ा प्यार निभाना भी कितना कठिन होता है? जब से तुम गए हो, कोई खोज-ख़बर ही नहीं ली. पत्र लिख भी रही हूं और जानती भी हूं कि भेजूंगी नहीं. पता नहीं तुम मेरे बारे में क्या सोचने लगो?’ बाकी इधर-उधर की अनेक बातें थीं. अन्य परिचितों की बातें. अपनी दिनचर्या के बारे में लिखा था. कॉलेज की बातें की थीं. छोटी बहन की पढ़ाई के बारे में लिखा था. ठीक जैसे अपने किसी निजी के साथ हालचाल बांटा जाता है. कौन हो सकता है यह?
मैंने दूसरा पत्र निकाला.
‘क्यों मुझे लगता रहा कि तुम भी मुझे उसी तरह चाहते रहे हो, जिस तरह से मैं? क्या यह मेरी कोरी कल्पना ही थी? यूं ही मुझे तुम्हारी आंखों में प्यार नज़र आता रहा? चूंकि मेरे मन में तुम्हारे प्रति अथाह प्यार था, तो क्या मैंने यही मान लिया कि तुम्हारे मन में भी मेरे प्रति वही भावना है. लेकिन शायद यह महज़ मेरी ख़ुशफ़हमी थी. तुमने तो कभी कुछ कहा ही नहीं. कितने ही तो अवसर मिले थे हमें.’
‘कल शकु चाची से मुलाक़ात हुई थी. बहुत जी चाहा तुम्हारे बारे में पूछने को, पर यह मेरे ही मन का चोर था जिसने मुझे रोके रखा.’
मेरा माथा ठनका, मेरी मां को ही तो दोनों बहनें शकु चाची बुलाती थीं. उनका वास्तविक नाम शकुंतला है. इसके आगे भी बहुत कुछ लिखा था, परंतु अब उन बातों की ओर मेरा ध्यान नहीं जा रहा था.
‘घर में मेरे विवाह की चर्चा चल रही है. किससे कहूं? क्या कहूं? किस अधिकार से मां को मना करूं? जब तुमने अभी तक कुछ कहा ही नहीं?’
‘कभी-कभी स्वयं पर ग़ुस्सा भी आता है. तुमने नहीं कहा था, तो मैं ही कह देती, पर मन में डर था, यदि तुम्हारे मन में मेरा कोई स्थान न हुआ तो? कितना अपमान होगा मेरा? क्या सोचते तुम मेरे बारे में? नहीं मैं तुम्हारी नज़रों में गिरना नहीं चाहती थी.’
‘अब जा रही हूं मन में तुम्हारी याद लेकर. जानती हूं मुझे इन पत्रों को नष्ट कर देना चाहिए, वह भी जाने से पहले. करूंगी भी, बस, हर रोज़ कल पर टाल रही हूं. इनसे बिछड़ना मतलब तुमसे बिछड़ना. इन पत्रों द्वारा मैंने लंबे समय तक तुमसे बात की है, पर अब तुम पर भी मेरा हक़ नहीं रहा.
बस, अब दो दिन और हैं ये पत्र मेरे साथ. कल सगाई की रस्म है, परसों अवश्य इन्हें नष्ट कर दूंगी. यह वादा है मेरा स्वयं से.’
पत्रों को सामने खोल विमूढ-सा बैठा हूं. हतभाग्य! यह कैसा खेल खेला विधाता ने मेरे साथ!

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गोस्वामी तुलसीदासजी कह गए हैं ‘नयन बिनु वाणी।’ नयनों की वाणी चाहे न हो, मन का आईना होते हैं वह. हू-ब-हू व्यक्त कर देते हैं मन की बात. बस पढ़नेवाले की नज़र चाहिए. इसके विपरीत जो बात शब्दों द्वारा व्यक्त की जाती है, वह मस्तिष्क से निकली होती है, उसमें समाज का अंकुश रहता है, निज स्वार्थ का पुट हो सकता है.
काश! मैने सिद्धि के नयनों पर विश्‍वास कर लिया होता.

        – उषा वधवा

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उषा वधवा
इतने समझदार कि जानकी चाहती रही मोबाइल पर रोज़ बात करें, पर संभव ने शादी की तारीख़ तक चार-छह बार ही बात की. बारात में गिनती के लोग आए. जानकी बड़ी हसरत से जयमाला के लिए मंच पर आई.
मतिभ्रम हुआ है कि यही यथार्थ है? जिसे चाचा समझा था वह डॉ. संभव हैं और जिसे डॉ. संभव समझ पहली नज़र में दिल दे दिया, वह उनके ठीक बगल में खड़ा उनका अनुज संयम है. जानकी सदमे में. संयम पूरी तरह चंचल हो रहा था, “भौजाईजी, भइया को माला पहनाइए.”
मैथिली भी यथार्थ पर अचंभित थी. उसने भी वही समझा था, जो जानकी ने, लेकिन अब स्थिति का सामना करना है. बोली, “पहना रही हैं भौजाईजी के देवरजी. थोड़ा धीर धरें.”…

विकास की ओर अग्रसर कस्बा-करारी. करारी का चार पुत्रियोंवाला साधारण-सा परिवार. निजी संस्थान के मामूली पद पर कार्यरत बाबूजी का स्तर साधारण है, पर लक्ष्य बड़ा है- पुत्रियों को कुछ दे सकें, न दे सकें, पर पढ़ने का पूरा अवसर देंगे.
बड़ी पुत्री जानकी हिंदी विषय में एमए उत्तीर्ण कर करारी की निजी स्कूल में प्राथमिक कक्षा में अध्यापन करते हुए इसी साल 25 की हुई है. उसके परिणय के लिए बाबूजी जहां भी गए, एक ही प्रश्‍न- कितना देंगे? बाबूजी पिटे हुए प्यादे की तरह घर लौट आते. कोई ख़बर नहीं थी बात बनेगी और आसानी से बनेगी. तय तिथि पर लड़केवाले जानकी को देखने आ रहे हैं. माता-पिता जीवित नहीं हैं. दो भाई हैं, जो चाचाजी के साथ आएंगे, लेकिन तीन नहीं, दो प्राणी ही तशरीफ लाए. जानकी से छोटी, मेहमानों की आवभगत में तल्लीन मैथिली, बुलावे के लिए सजकर तैयार बैठी जानकी से बोली, “चाचाजी और लड़का ही आए हैं. लड़का इतना सजीला है कि जानकी तुम्हारा जी मचल-मचल जाएगा.”
जानकी घबरा गई, “मैथिली, मैं तुम्हारी तरह बेशर्म नहीं हूं.”
“सजीले को देखकर मदहोश हो जाओगी. चलो, बैठक में तुम्हारी पुकार हो रही है.”
बैठक में सलज्ज जानकी की दृष्टि नहीं उठती थी. बड़ा ज़ोर लगाकर उसने अगल-बगल बैठे दोनों प्राणियों को देखा. सचमुच सजीला है. यदि कुछ पूछा जाएगा, तो बताते समय अच्छी तरह देख लेगी. वे दोनों इतने सज्जन निकले कि कुछ नहीं पूछा.
सज्जनों के जाने के उपरांत तीसरी बहन वैदेही ने पूछा, “जानकी, हरण करनेवाले कैसे लगे?”
“मैं बेशर्म नहीं हूं.”
बाबूजी योजना बनाने लगे, “लड़केवाले शादी जल्दी चाहते हैं. अगले माह अच्छा मुहूर्त है.”
अम्मा संशय में है, “सब कुछ बहुत अच्छा है, लेकिन संभव जानकी से 10 साल बड़े हैं.”
बाबूजी बेफ़िक्र हैं, “संभव डॉक्टर हैं. सुपर स्पेशिलाइज़ेशन, फिर प्रैक्टिस जमाने तक डॉक्टरों की इतनी उम्र हो जाती है. मुझे तो संभव बहुत सीधे-सादे और समझदार लगते हैं.”
इतने समझदार कि जानकी चाहती रही मोबाइल पर रोज़ बात करें, पर संभव ने शादी की तारीख़ तक चार-छह बार ही बात की. बारात में गिनती के लोग आए. जानकी बड़ी हसरत से जयमाला के लिए मंच पर आई.
मतिभ्रम हुआ है कि यही यथार्थ है? जिसे चाचा समझा था वह डॉ. संभव हैं और जिसे डॉ. संभव समझ पहली नज़र में दिल दे दिया, वह उनके ठीक बगल में खड़ा उनका अनुज संयम है. जानकी सदमे में. संयम पूरी तरह चंचल हो रहा था, “भौजाईजी, भइया को माला पहनाइए.”
मैथिली भी यथार्थ पर अचंभित थी. उसने भी वही समझा था, जो जानकी ने, लेकिन अब स्थिति का सामना करना है. बोली, “पहना रही हैं भौजाईजी के देवरजी. थोड़ा धीर धरें.”
जानकी के हाथों को सहारा देकर मैथिली और वैदेही ने माला डलवा दी. फोटो शूट के बाद जानकी अंदर कमरे में लाई गई. उसे ससुराल से आए वस्त्र पहनकर चढ़ावा के लिए तैयार होना है. तैयार होने का उमंग गायब था. बिछावन पर बैठकर हिचककर रोने लगी. अम्मा जानती थीं कि उस दिन चाचा नहीं आ पाए थे. जानकी ने सामान्य कद-सूरत व रंगतवाले संभव को चाचा और सजीले संयम को संभव समझ लिया है. उन्होंने बाबूजी से कहा था संभव अपनी उम्र से बड़े लगते हैं. दुबली जानकी अपनी उम्र से कम लगती है, पर बाबूजी ने निर्णय सुना दिया था, “लड़के का रूप-रंग नहीं, पद-प्रतिष्ठा देखी जाती है.” अम्मा विवश हुई. जानकी को इस तरह रोते देख, रिश्ते-नातेदार, महिलाएं पता नहीं क्या अर्थ लगाएंगी. वे उनसे बोलीं, “जानकी आज पराई हुई. ऐसे मौ़के पर रोना आ ही जाता है. आप लोग भोजन करें. मैं इसे आगे की रस्म के लिए तैयार कर दूं.”
उनके जाते ही अम्मा ने जानकी को गले से लगा लिया, मत रो जानकी.”
“अम्मा, तुमने मुझे धोखे में रखा.”

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“मैं नहीं जानती जानकी तुमने क्या देखा और क्या समझा. संभव की डॉक्टरी अच्छी चलती है. घर में पैसा भरा है.”
“तुम्हें पैसा दिखता है. अधेड़ नहीं दिखता?”
“35 का लड़का अधेड़ नहीं हो जाता. बाबूजी की हैसियत जानती हो. जो कर सकते हैं, कर रहे हैं. न रोओ. बात फैलेगी, तो बारात लौट सकती है. हम तो जीते जी मर जाएंगे.”
जानकी ने मान लिया विरोध का कोई मतलब नहीं. यदि बारात लौट गई, तो बहनों के विवाह में अड़चन आएगी. जिस संयम को पहली नज़र में दिल दे दिया, वह नफ़रत से भर जाएगा. छोटी हैसियतवालों को बड़े सपने नहीं देखने चाहिए. सजीले राजकुमार अमीरजादियों को मिलते हैं. वह तैयार होने लगी. संयम फोटोग्राफर को ले आया, “भौजाईजी, तैयार नहीं हुईं? फोटो शूट होना है.”
मैथिली ने माहौल को हल्का करने की कोशिश की, “ठहरिए, भौजाई के देवरजी. लड़कियों को तैयार होने में व़क्त लगता है. वह तो आप लड़के हैं कि कोट-पैंट पहना और हो गए तैयार.”
संयम, मैथिली को देखता रह गया, “आप लड़की हैं कि क्या हैं?”
“आना-जाना बना रहेगा. जान लीजिएगा हम मैथिली हैं.”
संयम पूरी रात संभव और जानकी के आसपास मंडराता रहा. किसी मित्र ने नियंत्रित किया, “बहुत ऊपर-ऊपर हो रहे हो. शादी तुम्हारी नहीं, भइया की हो रही है.”
“इस समय मैं भौजाई की ननद का रोल कर रहा हूं. मेरी बहन आज होती, तो इन्हें इसी तरह घेरे रहती.”
जानकी विदा होकर संगतपुर आ गई. बड़ा और व्यवस्थित मकान. पहली रात का आरंभ संभव ने अपनी पारिवारिक रूपरेखा बताकर किया.
“जैसा कि तुम जानती होगी पापा और मां डॉक्टर थे. यह मकान व संपत्ति उनकी बनाई हुई है. दोनों का अच्छा नाम था. उनके नाम का पूरा फ़ायदा मुझे मिल रहा है. वे हम तीनों भाई-बहन को डॉक्टर बनाना चाहते थे, पर संयम को आर्ट्स सब्जेक्ट अच्छा लगता था. बीकॉम के बाद लॉ किया. अब कचहरी में प्रैक्टिस करता है.”
“आपकी बहन भी है?”
“थी. मुझसे छोटी, संयम से बड़ी थी. मेडिकल कर रही थी. पापा-मां उसे छोड़ने हॉस्टल जा रहे थे. कार का एक्सीडेंट हो गया. तीनों नहीं रहे. मैं और संयम अचानक बेसहारा हो गए. पैसे की कमी नहीं थी, पर मानसिक संबल की ज़रूरत थी. चाचाजी ने बड़ा सहारा दिया. वे तुम्हें देखने आते, पर उन्हें छुट्टी नहीं मिली. मैंने संयम को बच्चे की तरह संभाला है. नादानी करे, तो अपना बच्चा समझकर माफ़ कर देना.”
जानकी आत्मयंत्रणा से गुज़र रही है, जिसे पहली नज़र में दिल दे बैठी, जो आयु में उससे बड़ा है, उसे अपना बच्चा कैसे समझ सकती है? जिसे चाचाजी समझा, उसे पति कैसे समझ ले?
“जब मैं तुम्हें देखने आया तुम नाज़ुक लग रही थी. घर आकर मैंने साफ़ कह दिया था कि मिस मैच हो जाएगा. शादी नहीं करना चाहता था, पर संयम अड़ गया कि वह तुम्हें पसंद कर चुका है. चाचाजी अड़ गए कि उन्होंने तुम्हारे बाबूजी को उम्मीद दी है.”
जानकी आत्मयंत्रणा से गुज़र रही है. मैं संयम की पसंद और बाबूजी को दी गई उम्मीद की भेंट चढ़ गई.
“मां के बाद यह घर कभी घर नहीं लगा. वे पता नहीं कैसे इतना संभाल लेती थीं. मैं तो चाबियां देखते ही घबरा जाता हूं. संयम की स्थिति तो मुझसे भी दयनीय है. तुम हंसोगी, पर मुंह दिखाई में मैं तुम्हें चाबियां दूंगा. संभालो अपना घर.”
“चाबियां नहीं ले सकती. अभी आप मुझे ठीक तरह से नहीं जानते हैं, उस पर…”
“सात फेरों का बंधन मज़बूत होता है. घर तुम्हारा, ज़िम्मेदारी तुम्हारी. मैं मुक्त हुआ.”
जानकी संगतपुर में 10 दिन रही. संभव उसकी सहूलियत का ख़्याल रखते. संयम उसे प्रसन्न रखने का प्रयास करता, “अरे भाभी, तुम अच्छा आ गई. घर में मर्दाने चेहरे देखकर मैं संन्यासी बनता जा रहा था. यहां कामवाली बाई भी नहीं है कि उसका मुख देख लूं. खाना बनाने से लेकर बगीचे मेें पानी देने तक सारा काम बुढ़ऊ काका करते हैं.”
संभव मुस्कुरा दिए, “अब घर कैसा लगता है?”
“जन्नत. कचहरी जाने की इच्छा नहीं होती. लगता है भाभी के पास डटा रहूं.”
“शादी के बाद मेरे पैरों में बेड़ियां पड़नी चाहिए, पड़ गई तुम्हारे पैरों में.”
“सही फ़रमाते हो भइया. मां होतीं, तो भाभी को रसोई के राज-रहस्य बतातीं. आजकल मैं सास के रोल में हूं.”
संभव कृतज्ञ थे. “जानकी, दिनों बाद घर में रौनक़ लौटी है. इसी तरह मुझे सहयोग और संयम को स्नेह देती रहना.”
संयम ने अभूतपूर्व बयान दिया, “भइया के मुख से अब जाकर सहयोग, स्नेह, सहभागिता जैसे शब्द सुन रहा हूं, वरना वही एक्स रे, एमआरआई, ईसीजी, सिरिंज, ड्रिप. बाप रे! इसीलिए मैं डॉक्टर नहीं बना. डॉक्टर लोग बहुत कम हंसते हैं.” संभव हंसते हुए बोले, “मैं हंस रहा हूं.”
“अब थोड़ा हंसने लगे हो भइया. भाभी, भइया तुम पर लट्टू हैं. मैं हौसला न बढ़ाता, तो कुंआरे रह जाते.”
जानकी आत्मयंत्रणा से गुज़र रही है. यह हो जाता, तो विधाता शायद मेरा संयोग तुमसे जोड़ देते संयम…
जानकी करारी लौटी. अम्मा गदगद.
“दोनों भाइयों में बहुत प्रेम है. जानकी तुम संयम को संभव से कम न मानना.”
“संयम को कम नहीं बढ़कर मानती हूं.”
मैथिली बोली, “न सास-ससुर की रोक-टोक, न ननद की दादागिरी. जानकी मुझे जो ऐसा घर मिल जाए, तो ख़ूब मौज उड़ाऊं.”
“मेरा विवाह संयम से होता, तो मैं भी उड़ाती.”
अम्मा ने मैथिली को डपट दिया, “कुछ भी बोलती है. जानकी, बाबूजी से कहूंगी डॉक्टर साहब को फोन करके कहें कि तुम्हें लेने दोनों भाई आएं.”
मेरी नज़र तो संयम पर टिक गई है. चाहती हूं कि डॉक्टर साहब नहीं, संयम आएं.

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लेकिन संभव आए. जानकी निरुत्साहित.
कार ड्राइव कर रहे संभव ने उसके निरुत्साह को लक्ष्य किया, “उदास हो?”
“संयम को भी लाते.”
“उसे बुख़ार है.”
“कब से?”
“उदास थी, अब घबरा गई?”
घर पहुंचकर संभव ने संयम का टेंपरेचर चेक किया.
“मैं इसकी हाय-तौबा से परेशान हो गया हूं. जानकी अब तुम करो इसकी सेवा.”
संयम ने मुस्कुराते हुए कहा, “भाभी, तुमने मेरी केयर भइया से कम की, तो मैं तहलका मचा दूंगा. देवर का अर्थ जानती हो?  दूसरा वर. मैं तुम्हारा दूसरा वर हूं.”
जानकी उसे अपलक देखती रही. संकेत तो नहीं दे रहा है? इस तरह घेरे रहता है जैसे समीपता चाहता है. इसी को मन में बसाकर तो यहां रहने की कोशिश कर रही हूं, पर जानकी की क़िस्मत में सदमे ही लिखे हैं.
बाबूजी अचानक आए, “डॉक्टर साहब, मैथिली ने बीएससी कर लिया है. एमएससी बायो टेक में करना चाहती है. करारी में यह विषय नहीं है. कहें तो यहां रहकर पढ़े. जानकी को अकेलापन नहीं लगेगा.”
जानकी आत्मयंत्रणा से गुज़र रही है. बाबूजी ने मेरा इस्तेमाल करने के लिए ही मुझे अधेड़ से ब्याह दिया है. सास-ससुर का झमेला नहीं है, इसलिए इन लोगों को चाहे जब टपक पड़ने की पात्रता मिल गई है. अभी अम्मा बीमार पड़ीं, बाबूजी यहां पटक गए कि करारी के डॉक्टर बेव़कूफ़ हैं. संभव अच्छा इलाज करेंगे. क्षीण बुद्धि संभव ने उपचार किया और माता जैसा आदर दिया. अब मैथिली पढ़ना चाहती है. फिर वैदेही फिर छोटी सिया. मैं अपने घर में, ख़ासकर संयम को लेकर दख़ल नहीं चाहती. बोली, “बाबूजी, सुनो तो…”
लेकिन क्या करे इस क्षीण बुद्धि प्राणनाथ का. अविलंब कहा, “बाबूजी, सुनना क्या है? आपका घर है. मैथिली रहेगी, तो चहल-पहल बनी रहेगी.”
बाबूजी उद्देश्य पूरा कर चलते बने. जानकी सदमे में. संभव ने हाल पूछा, “जानकी परेशान लगती हो.”
“बाबूजी आप पर भार डाल रहे हैं. मुझे संकोच होता है.”
“संकोच क्यों? इस घर में तुम्हारा अधिकार है.”
संयम ख़ुश हो गया, “बुला लो भाभी. मैथिली ने शादी में बहुत सताया था. गिन-गिनकर बदला लूंगा.”
मैथिली आकर माहौल में रंग भरने लगी. जानकी को संदेह नहीं पुख्ता विश्‍वास है कि मैथिली, संयम को लपेटे में लेने के लिए यहां स्थापित हुई है. उसमें रुचि लेकर संयम चालबाज़ी दिखा रहा है. फोर्थ सेमिस्टर पूरा होते-होते समझ में आ गया रचना रची जा चुकी है. राज़ खोलने का भार संयम पर डाल फोर्थ सेम की परीक्षा होते ही मैथिली करारी खिसक ली कि उसकी अनुपस्थिति में संयम प्रस्ताव पारित करा ले.
संयम प्रस्ताव लेकर जानकी के सम्मुख आया, “भाभी, कुछ कहना है.”
“कहो.”
“भइया से कहने की हिम्मत नहीं हो रही है. तुम मेरी अर्जी उनके दरबार में लगा देना.”
जानकी सब समझ रही है, पर फिर भी कहा, “अर्जी का मजमून तो सुनूं.”
“मैं मैथिली से शादी करना चाहता हूं.”
अब तक का सबसे भीषण सदमा. इस तरह चीखकर अभद्रता दिखाते हुए जानकी पहली बार बोल रही है, “पागल हुए हो?”
“उसी दिन पागल हो गया था, जब मैथिली को पहली बार देखा था.”
“मैथिली प्रेम-वेम पसंद नहीं करती.”
“उसका समर्थन है. कह रही थी तुम्हारा सामना नहीं कर सकेगी, इसलिए जब वह करारी चली जाए, तब मैं तुमसे बात करूं.”
जानकी रो देगी.
“देखती हूं संयम तुम्हारे भइया क्या कहते हैं?”
जानकी आत्मयंत्रणा से गुज़र रही है. जिसे पहली नज़र में दिल दे दिया, वह मैथिली के नाम की लौ जलाए बैठा है. मैथिली कितनी घाघ है. मेरी स्थिति जानती है, फिर भी… ज़रूर अम्मा ने भेजा होगा कि संयम पर मोहिनी डाले. एक और लड़की के हाथ सस्ते में पीले हो जाएं. मैथिली ने ऐसी मोहिनी डाली… नहीं, मुझे मनचाहा नहीं मिला, मैं मैथिली को मनचाहा नहीं पाने दूंगी.
जानकी को रातभर नींद नहीं आई. ख़ुद को असहाय, उपेक्षित पा रही है. संभव की संगत नहीं चाहती, पर वे अपनी भलमनसाहत में उसके समीप आना चाहते हैं. संयम की संगत चाहती है, पर वह पकड़ से छूटता जा रहा है. अब उसके व्यवहार में रोमांच नहीं कपट का आभास होता है. पहले दिन से ही मैथिली को पाने की योजना बना रहा था. योजना सफल हो, इसलिए भाभी… भाभी… कहकर उसकी ख़ुशामद करता रहा.
जानकी निराशा, ईर्ष्या, क्रोध, बौखलाहट से गुज़र रही थी. अम्मा का फोन बौखलाहट को पराकाष्ठा पर ले आया.
“जानकी, मैथिली ने सब समाचार बताया. तुमको लेकर वह बड़े संकोच में है, पर संयम उससे शादी करना चाहता है. हमारे तो भाग्य जाग गए. दोनों बहनें मिल-जुल कर रहोगी. बाबूजी इतवार को डॉक्टर साहब से बात करने आएंगे.”
जानकी बौखलाहट में ललकारने लगी, “अम्मा, तुमने मैथिली को जान-बूझकर पढ़ने के बहाने मेरे घर भेजा कि संयम पर मोहिनी डाले. संयम, मोहिनी की चाल में फंस गया. क्षीण बुद्धि डॉक्टर साहब को क्या कहूं? संयम उनके दिमाग़ में इतना घुस गया है कि उसकी ख़ुशी के अलावा इन्हें कुछ नहीं सूझता.”
“नहीं…”
“मैं बोलूंगी अम्मा. तुम्हें मैथिली का बड़ा ख़्याल है. मुझे धोखे में रखकर अधेड़, बदसूरत के साथ बांधा, तब मेरा ख़्याल नहीं आया था? जब ये दोनों भाई मुझे देखने आए थे, मैंने डॉक्टर साहब को चाचा, संयम को डॉक्टर साहब समझ लिया था. तुम जानती थी असलियत क्या है, लेकिन मुझे नहीं बताया. मेरे साथ कपट किया.”
“नहीं बेटी…”

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“मैं बोलूंगी अम्मा. मैं अब भी सदमे से उबर नहीं पाई हूं. अच्छी चाल चली तुम लोगों ने. मेरा दिमाग़ ख़राब है. इस विषय में मुझसे बात न करना.”
जानकी ने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया. ठीक इसी क्षण स्वर उभरा, “भाभी…”
जानकी के कान बज रहे हैं या संयम कचहरी से लौट आया है?
बैठक में बैठी, तेज़ आवाज़ में अम्मा को ललकार रही जानकी को आभास नहीं था कि ज़रूरी फाइल लेने के लिए अचानक आ पहुंचा संयम उसकी कटुता सुनकर बैठक से लगे बाहरी खुले बरामदे में ठिठका खड़ा है. इसके आने की आहट नहीं मिली या दबी चाप से बैठक में दाख़िल हुआ है.
“संयम तुम? जल्दी आ गए.”
“फाइल भूल गया था.”
“पानी पियोगे?”
“हां.”
जानकी को राहत मिली कि संयम ने फोन पर की गई उसकी बातचीत नहीं सुनी. सुनता तो प्रतिक्रिया ज़रूर देता.
लेकिन जानकी महसूस करने लगी है कि संयम बहुत बदल गया है. कुटनी मैथिली करारी क्या गई, संयम की हंसी ले गई.”
“संयम, मैथिली की याद आ रही है?”
“उससे मेरा कोई वास्ता नहीं.”
“शादी नहीं करोगे?”
“नहीं.”
“क्यों?”

अम्मा से तुम जो बातें कर रही थीं, सुनकर शादी से मेरा विश्‍वास उठ गया. शादी के समय तुम्हारे मन में जो भी था, पर भइया के इतने अपनेपन को देखकर तुम्हारी धारणा में बदलाव नहीं आना चाहिए था? अधेड़, बदसूरत… भइया में इतने गुण हैं, पर तुम इस मामूली बात पर अटकी हो कि वे ख़ूबसूरत नहीं हैं? तुम तो बहुत ख़ूबसूरत हो, पर दिल साफ़ नहीं है, तो ख़ूबसूरती किस काम की? कपट तो हम लोगों के साथ हुआ है. सोचता था तुमने भइया का जीवन परिपूर्ण कर दिया है. उनकी भावनाओं को समझती हो. सब ढोंग. भैया हमेशा मुझसे कहते हैं कि मुझे फुर्सत नहीं मिलती, संयम तुम अपनी भाभी का ख़्याल रखा करो. मैंने तुम्हें इतना मान-सम्मान दिया, ख़्याल रखा… छी… छी…”

“संयम सुनो तो…”
“तुम सुनो. मिस मैच होगा सोचकर भइया शादी का मन नहीं बना रहे थे. मैं अड़ गया, मुझे तुम बहुत अच्छी लगी हो. अफ़सोस, मैं ग़लत था.”
“सुनो तो…”
“तुम सुनो. मैं मानता हूं कि भइया जैसे इंसान के लिए जो अच्छे विचार नहीं रखता, वह अच्छा नहीं हो सकता. भइया मेरे लिए क्या हैं, तुम नहीं समझोगी… मेरे लिए उनसे बढ़कर कुछ नहीं है. न तुम, न मैथिली.”
“संयम…”
“मैंने तुम्हारे भीतर का कालापन देख लिया, पर भइया को मत दिखाना. वे तुम पर विश्‍वास करते हैं. उन्हें तकलीफ़ होगी. उनके सामने मेरे साथ सहज व्यवहार करती रहना. मैं भी नाटक करता रहूंगा. नहीं करूंगा, तो भइया को कारण क्या बताऊंगा.”
संयम वहां से चला गया.
जानकी आत्मयंत्रणा से गुज़र रही है. संयम की आंखें सुलग रही थीं. शब्द लड़खड़ा रहे थे. कितना अपमानजनक है भाभी… भौजाई… रटनेवाले जिस देवर ने एक दिन दूसरा वर होने जैसी बात की थी. आज उसे भाभी कहने से भरपूर बच रहा था.

सुषमा मुनीन्द्र
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सुषमा मुनीन्द्र

“अम्मा, आपको याद है… जब विहान छोटा था, तो मुझे चाय पीते देख गर्म कप को पकड़ने की ज़िद करता था. एक बार झुंझलाकर मैंने उसकी नरम हथेली पर चाय का गर्म कप छुआ दिया. उसके बाद वो चाय के कप से दूर ही रहता था. ज़िम्मेदारी के बोझ को समेटे शादी का लड्डू थामना इनके बस का नहीं था, ये मैं जानती थी…”

Kahaniya

”जलपा… ए जलपा कहां हो तुम…?” मायादेवी की आवाज़ सुनकर जलपा झटपट रसोई से बाहर आ गई. पांव छूने झुकी, तो जलपा को आशीर्वाद देने की जगह वह उस पर बरस पड़ी. “ऐसे तो तुम लोग बड़े मॉडर्न बने फिरते हो… अब क्या हो गया, सारी अक्ल ताक पर रखकर बित्ते भर के लड़के की शादी करने चले हो.”

“आप को शादीवाली बात किसने बताई? अभी तो मैंने किसी को बताया ही नहीं है. और मां, बित्ते भर का नहीं रह गया है आपका पोता, मुझसे दो हाथ लंबा हो गया है.” जलपा ने अपनी सास की बात का शांतिपूर्वक जवाब दिया, तो वे अपना सिर पकड़कर बैठ गईं.

“हे भगवान… विहान नहीं बताता, तो क्या तुम लोग शादीवाले दिन बताते कि घर में गुड्डे-गुड़ियों का खेल हो रहा है.”

“मां, आप धूप में चलकर आ रही हो, पहले एक ग्लास ठंडा पानी पी लो.”

“मेरा दिमाग़ इतना गर्म है कि ठंडा होनेवाला नहीं है. कहां है मेरा विहान?…”

“पढ़ रहा है, बाद में मिल लेना.”

“रहने दे, पढ़ाई की इतनी चिंता होती, तो शादी का लड्डू ना थमाती इस उम्र में. क्या हो गया रे जलपा तेरी बुद्धि को…? सत्रह साल के लड़के की शादी… क्यों गड्ढे में ढकेल रही है?”

“मां, तुम भी तो पंद्रह साल की उम्र में ब्याहकर आई थी और बाबूजी भी अट्ठारह के थे. अपना विहान भी अपनी शादी तक अट्ठारह का हो जाएगा.”

“अरे, कुछ अच्छी बातें लेता हमारी पीढ़ी से…

पंद्रह-अट्ठारह की उम्र में शादी करके क्या सुख देखा, क्या दुनिया… कभी सोचा है.”

मायादेवीजी की आवाज़ दर्द में डूब गई थी, मानो अतीत की ओढ़ी ज़िम्मेदारियों का बोझ सहसा कंधों पर महसूस किया हो. “हमारे मां-बाप तो पुराने ज़माने के थे, पर तू ऐसी ज़्यादती कैसे कर सकती है?”

“ज़्यादती कहां अम्मा… उसकी मर्ज़ी से कर रही हूं. अब इतनी भी पुराने विचारों की नहीं हूं. प्यार करता है अपना विहान तनीशा से… शादी हो जाएगी, तो खुलकर एक-दूसरे के साथ घूमेंगे-फिरेंगे और मौज-मस्ती करेंगे. अब ऐसे में थोड़ी ज़िम्मेदारियां बढ़ेंगी, तो उसे निभाना सीखेंगे. अच्छा है जल्दी गृहस्थी बसा लें.” “प्यार…!”

मायादेवी कुछ पल के लिए जड़ खड़ी रहीं, फिर सहसा बोलीं, “हे भगवान! तू कैसी मां है? उसकी कोई उम्र है गृहस्थी और प्यार समझने की. तेरी बुद्धि को क्या हो गया है. अरे, समझा देती उसे प्यार से.

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ऊंच-नीच के बारे में बताती. अब ये क्या… कि उसकी ग़लती पर तूने शादी का दहला मार दिया. अब तू मेरा दिमाग़ गरम मत कर… मैं पहले अपने विहान से मिलना चाहती हूं.” मायादेवी विहान के कमरे की ओर लपकीं, तो अबकी बार जलपा ने रास्ता नहीं रोका. भीतर गईं, तो विहान क़िताबों में मुंह गड़ाए बैठा था. चेहरा ऐसा पीला, मानो हल्दी मल दी गई हो. हाव-भाव बता रहे थे कि मां और दादी की बातें उसके कानों में पड़ चुकी थीं.

दादी ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरा, तो वह फफक पड़ा. मायादेवी का कलेजा निचुड़-सा गया था. “हंसता-बोलता मस्त बच्चा ये शादी के पचड़े में कैसे फंस गया?” दादी की बात सुनकर विहान की सिसकियां और बढ़ गई थीं. उसकी हालत देखकर मायादेवी ने उसे गले से लगा लिया.

टूटते-फूटते शब्दों में उसके मुंह से निकला, “दादी, मैं ये शादी नहीं करना चाहता हूं. मैं अभी पढ़ना चाहता हूं… मम्मी मेरा फ्यूचर ख़राब कर देंगी.”

“ना… ना… विहान अब देख मैं तेरे साथ कैसे खड़ी होती हूं. तेरी मम्मी की ज़िद की ऐसी की तैसी…” दुलारती दादी सहसा ठिठकीं, “अच्छा, ये तो बता मम्मी की बेव़कूफ़ी में और कौन-कौन साथ दे रहा है?”

“अमिता आंटी. वो अपनी बेटी की शादी मुझसे कराना चाहती हैं.”

“तेरी अमिता आंटी की बेटी करती क्या है?” “वो पढ़ाई कर रही है, मेरी क्लास में ही है.” “पर वो बेव़कूफ़ कैसे तैयार हो गई?”

“दादी, अब तो वो भी तैयार नहीं है. सच तो ये है कि हम दोनों ही इस जंजाल में नहीं पड़ना चाहते हैं.”

“अब नहीं तैयार हैं का क्या मतलब…? क्या पहले तैयार थे. कहीं प्यारवाली बात…”

“अरे, वही तो एक ग़लती हुई है.” नज़रें चुराते विहान ने धीरे से कहा, तो दादी ने पूरी बात बताने को उकसाया… “दादी, तनीशा  मुझे अच्छी लगती थी. हम दोनों को एक-दूसरे का साथ पसंद था. इस बात को लेकर पहले मम्मी चिढ़ती भी थीं… लेकिन बाद में पता नहीं क्या हुआ, वो अचानक हमारी शादी करने को तैयार हो गईं. आप कुछ करो दादी, इस शादी से बचा लो. अभी तो मम्मी ने किसी को नहीं बताया है, पर कुछ दिनों में जब सबको पता चलेगा तो सोचो… मेरे दोस्त मुझे कितना चिढ़ाएंगे..!” विहान टकटकी लगाए अपनी दादी को देख रहा था, लेकिन मायादेवी तो किसी अंधेरे में छिपे पक्ष को देखने का प्रयास कर रही थीं.

“अरे, अम्मा बड़े मौ़के से आई हो, देखो तो  आपकी होनेवाली बहू आई है…” जलपा की तेज़ आवाज़ से मायादेवी चौंकीं, वहीं विहान का चेहरा और बुझ गया.

“विहान, ओ विहान… कहां हो बेटा, देख तेरे लिए क्या लाई हूं.” अमिता की आवाज़ सुनकर विहान ने अपने कानों में उंगली डाल ली थी. और इधर जलपा ‘मेरी बहू’ कहती हुई बैठक की ओर दौड़ी. अचानक तनीशा की तेज़ आवाज़ आई, “आंटी प्लीज़, अब ये बहू-बहू का नाटक बंद करिए.” अमिता ने तुरंत तनीशा को डांटा, “ये क्या तरीक़ा है अपनी होनेवाली सास से बात करने का…”

“ममा प्लीज़, अब आप लोग एक बात कान खोलकर सुन लीजिए, मैं कोई शादी-वादी नहीं करने जा रही हूं और यही बात बताने मैं आपके साथ आई हूं.”

“तो क्या आप लोगों ने सात जनम तक साथ निभाने की झूठी क़सम खाई थी?”

“भाड़ में गई क़सम… हम दोनों ग़लत थे, तो आप लोगों ने हमारी ग़लती सुधारने की बजाय एक नया हंगामा शुरू कर दिया.”

“बेटा, हम तो तुम्हारे सच्चे प्यार से द्रवित हो गए थे.” जलपा ने भीगे शब्दों में कहा, तो तनीशा और भड़क गई. “आंटी, आप ये फिल्मी डायलॉग मत बोलिए. अट्ठारह का विहान और लगभग उतने साल की मैं… इस उम्र में आप सच्चे प्यार की उम्मीद करती हैं. अरे, कुछ दिन हमने एक-दूसरे की कंपनी को एंजॉय किया था, बस… बच्चे ग़लत हो सकते हैं, ऐसे में आपका फ़र्ज़ था हमें सही-ग़लत समझाना, पर यहां तो आप लोग ख़ुद ही बचपना करने पर उतारू हैं. हमारी शादी… उ़फ्! सोचकर ही अजीब लग रहा है… हमारी पढ़ाई-लिखाई, सपने, करियर, पूरी ज़िंदगी इस प्यार के चक्कर में… मुझे तो प्यार शब्द सुनने से घुटन हो रही है. कोई प्यार-व्यार नहीं है हमें. अच्छी-ख़ासी पढ़ाई-लिखाई छोड़कर शादी कर लूं मैं… वो भी विहान से?”

“ओ मैडम..! ग़लती आपसे नहीं मुझसे भी हुई है… जिस उम्र में करियर पर फोकस करना था, तुम्हारी वजह से कहीं और चला गया.” दोनों के झगड़े को जहां अमिता और जलपा मुंह बाए देख रही थीं, वहीं मायादेवी ने उन्हें रोका, “बस, चुप हो जाओ तुम लोग,

तुम्हारी इस हालत का ज़िम्मेदार और कोई नहीं तुम ख़ुद हो. फोकस ध्यान से, एकाग्रता, संयम और अनुशासन से आती है, जिसे तुम लोगों ने तोड़ा…” दादी की बात से छाई चुप्पी को विहान ने तोड़ा, “दादी, इससे पहले कि मम्मी और आंटी हमारी जगहंसाई कराएं, इस क़िस्से को यहीं ख़त्म कर दो.”

“इसका मतलब है तुम दोनों दुनियावालों की वजह से अलग होना चाहते हो.”

“नहीं दादी, हम अपने अच्छे फ्यूचर के लिए अलग होना चाहते हैं. अब तो बस आप लोग हमें एग्ज़ाम की तैयारी करने दीजिए. इस चक्कर में वैसे ही बहुत समय बर्बाद हो गया है.” विहान की बात से सहमत तनीशा तुरंत बोली, “अब दस साल तक मुझे मेरे करियर को शेप देने के लिए छोड़ दो. मुझे मेडिकल के लिए तैयारी करनी होगी. सच, बड़ा ख़राब चक्कर है ये प्यार-व्यार…” तनीशा चुप हुई, तो अमिता कुछ सोचते हुए बोली, “जलपा, अगर बच्चों की यही मर्ज़ी है, तो हम कुछ दिन और…” “ओह! नो…! अब आप लोग कोई दूसरा कमिटमेंट मत कर लेना. जीवन के ऐसे डिसीज़न यूं जल्दबाज़ी में नहीं लिए जाते. इनका भी अपना एक समय और समझ होती है, जो उम्र के साथ आती है.” कहती हुई तनीशा अमिता को लगभग खींचती हुई साथ ले गई.

वो घर से क्या गई, विहान के तो ख़ुशी के मारे पंख ही निकल आए. “मैं भगवान के सामने दीया लगाती हूं.” कहती हुई मायादेवी पूजा के कमरे में चली गईं. जलपा आंखें मूंदें सोफे पर धम्म से बैठ गई. सहसा उसके होंठों से एक रहस्यमई, पर स्मित हंसी झलकी… उसके जेहन में तनीशा की बात… ‘जीवन के ऐसे डिसीज़न यूं…’ गूंज रही थी. यही बात तो उसने भी कही थी, पर उस व़क्त तो लगा था जीवन का सार उनके कानों तक पहुंचा ही नहीं था. चार-पांच महीने पहले की ही तो बात है, जब उसने विहान और तनीशा को एक साथ मोटरसाइकिल पर बैठे देखा था. साथ बैठना अजीब नहीं था, अजीब था तनीशा का उससे हद तक चिपककर बैठना. जलपा का मन निचुड़-सा गया था, पर एक दिन बड़े संकोच से अमिता ने कहा कि विहान और तनीशा के बीच कुछ चल रहा है. तनीशा ने विहान को लेकर मुझसे झूठ भी बोलना शुरू कर दिया है. अमिता की बात सुनकर जलपा के पांव तले ज़मीन खिसक गई थी. दबे शब्दों में उसने विहान को समझाया, तो वह भड़क गया. इधर अमिता के प्रति तनीशा के बागी तेवर मुखर हो गए थे. जब दोनों ने मिलकर उनको समझाने की कोशिश की, तो दोनों ने मिलकर घरवालों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया था. पढ़ाई-लिखाई ताक पर रखकर एक-दूसरे का साथ निभाने की घोषणा कर दी. उनका जोश दूध के उफान की तरह अपनी उठान पर था कि तभी जलपा ने अचानक दोनों की शादी की पेशकश की, जिसे अमिता ने मंज़ूरी दे दी. विहान और तनीशा के बागी तेवर सहसा मंद पड़ने लगे. यकायक उलझन में पड़े… कुम्हलाने लगे… अब ना तो फोन पर लंबी बातें होतीं, ना ही आपस में मैसेज का आदान-प्रदान होता.

मिलना-जुलना भी लगभग बंद था. दोनों अपने कमरों में क़िताबों में मुंह घुसाए नज़र आते. अब वे एक-दूसरे का नाम सुनकर चिढ़ने लगे थे. अमिता कहती भी थी कि विहान के साथ घूम आओ, तो तनीशा चिढ़ जाती. कमोबेश यही स्थिति विहान की भी थी और आज विस्फोट ही हो गया. एक-दूसरे से रिश्ता तोड़कर वो एक-दूसरे को देखना भी गंवारा नहीं कर रहे थे. विचारों में खोई जलपा की तंद्रा विहान ने भंग की, “मम्मी, मैं आर. के. सर के पास मैथ्स पढ़ने जा रहा हूं. आज से एक्स्ट्रा कोचिंग लूंगा.” कहता हुआ वह तेज़ी से बाहर चला गया. दरवाज़ा बंदकर वो पलटी ही थी कि मायादेवी चाय की ट्रे पकड़े खड़ी थीं. “अच्छा, अब चाय पी ले… इस दिन के लिए बड़ी मेहनत की है तुमने…” वे धीमे से मुस्काईं, तो जलपा ठठाकर हंस पड़ी, “अम्मा, आप ने जान लिया था कि हम…?”

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“अरे, ये बाल धूप की स़फेदी नहीं लिए हैं. सच बताऊं, जब विहान ने शादीवाली बात बताई, तो तू मुझे सिरफिरी लगी. सुशांत से बात की, तो वो भी तेरा समर्थन कर रहा था. तब तो मैंने अपना माथा ठोंक लिया. विहान के दादा एक हफ़्ते के लिए गांव गए थे. मुझसे तो उनके आने तक सब्र भी नहीं हुआ. सो अकेली ही चली आई. यहां जब शादी का कारण पता चला, तो माथा ठनका. विहान से बात करते ही तेरी योजना का अंदाज़ा हुआ. फिर सोचा जैसा चल रहा है, चलने देती हूं.”

“क्या करती अम्मा, विहान इस उम्र में प्यार के चक्कर में पड़ गया. हमारे समझाने, डराने-धमकाने का उलटा असर हुआ. दोनों असुरक्षित महसूस करते हुए एक-दूसरे के और क़रीब आ गए थे. ऐसे में योजना के तहत दोनों को एक-दूसरे के पास ढकेला, तो उनका सारा एडवेंचर धरा का धरा रह गया.”

“बड़ी बदमाश है रे जलपा.” अम्मा लाड़ से बोलीं. हंसते हुए जलपा बोल रही थी, “ये उम्र इंफेचुएशन को प्यार समझने की भूल करती ही है. पर विहान और तनीशा के मामले में प्यार की तीव्रता अधिक थी, सो डर गए.”

“मैं अक्सर सोचती थी कि आज की पीढ़ी क़िताबों पर ज़्यादा निर्भर है, पर मनोवैज्ञानिक तरी़के से हल हुआ मामला क़ाबिले-तारीफ़ है.” मायादेवी की बात सुन जलपा को मानो कुछ याद आया, “अम्मा, आपको याद है… जब विहान छोटा था, तो मुझे चाय पीते देख गर्म कप को पकड़ने की ज़िद करता था. एक बार झुंझलाकर मैंने उसकी नरम हथेली पर चाय का गर्म कप छुआ दिया. उसके बाद वो चाय के कप से दूर ही रहता था. ज़िम्मेदारी के बोझ को समेटे शादी का लड्डू थामना इनके बस का नहीं था ये मैं जानती थी, पर इस योजना में भी ख़तरा कम नहीं था. डर लगा रहता था कि दोनों विवाह के लिए राज़ी ना हो जाएं.”

“ऐसा मुमकिन नहीं. गर्लफ्रेंड को मोटरसाइकिल पर बैठाने से शान बढ़ती है, पर इस उम्र में बीवी को बैठाकर घुमाने की बात, ना… ना… आख़िर विहान को दोस्त-बिरादरी में मुंह दिखाना है या नहीं.”

मायादेवी के कहने के ढंग से जलपा हंस पड़ी थी. सुशांत घर आए, तो आज का सारा क़िस्सा पता चला. वे भी योजना के सफल अंत पर अपनी टिप्पणी दे रहे थे कि आग से खेलने की ज़िद करते बच्चों को आग के पास ले जाना ज़रूरी होता है, ताकि आंच का अंदाज़ा लगाकर आनेवाले ख़तरे को समझें. “जो हुआ सो हुआ… अब इस घर में विहान की पढ़ाई के अलावा और कोई बात नहीं होगी.”

मायादेवी एक हफ़्ता रुककर विहान के पढ़ाई के प्रति समर्पण और एकाग्रता को देख उसे ढेरों शुभकामनाएं देकर वापस चली गई थीं. इसी बीच अलका ने फोन पर बताया कि तनीशा ने विहान के नाम से तौबा कर ली है, वो पूरी तरह से अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित कर रही है. जो बच्चे कल तक अपने वर्तमान और भविष्य के साथ खेल रहे थे, वो अपने आज और उज्ज्वल कल के प्रति पूरी तरह समर्पित थे और उनका साथ देने के लिए हर पल प्रहरी की तरह खड़े उनके माता-पिता एक बार फिर उन्हें सधे क़दमों से चलते देख सुकून से भरे थे.

Meenu Tripathi

         मीनू त्रिपाठी

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उससे संपर्क करने के बाद ही मैंने जाना कि पुरुष का वासनापूर्ण रूप ही होता है, यह हमारी पूरी पुरुष जाति के लिए अवधारणा है, तो ग़लत है. वापस लौटते समय सुनील का शरीर मुझसे दूर हो गया, साथ आया तो स़िर्फ एक एहसास मानो उसका शरीर नश्‍वर है और एहसास रूपी आत्मा अमर है, जो हर समय मेरे साथ रहेगा. यह एहसास कि कोई मुझे शिद्दत से चाहता है और मुझे ख़ुश देखना चाहता है, काफ़ी है जीने के लिए.

Short Story

जादू-सा असर किया मोबाइल के स्क्रीन पर लिखे सुनील के गाने की एक लाइन ने. उसने बिना कुछ कहे ही सब कुछ कह दिया. वह कुछ भी तो भूला नहीं था. हमारी 15 दिनों की मुलाक़ात में वह गाना ही तो था, जो गुनगुनाते हुए वह अपने सारे ज़ज़्बात व्यक्त कर देता था और मैंने भी उस गाने के अर्थ में स्वयं को तलाशते हुए, शब्दहीन, अपने हाव-भाव से उसका मौन निमंत्रण स्वीकार कर लिया था.

तीस साल बाद अचानक सोशल मीडिया पर उसका नाम और औपचारिकतापूर्ण संदेश- ‘हैलो पूजा! कैसी हो?’ ने तो मेरे मन में पहले ही तूफ़ान पैदा कर दिया था. परिस्थितियों और समय की मोटी चादर के तले दबकर उसका अस्तित्व ही मेरे लिए समाप्त हो चुका था. कहते हैं न कि रख-रखाव न किया जाए, तो महल भी खंडहर बन जाता है, फिर वह अल्हड़ उम्र ही ऐसी थी, जिसमें न कोई भविष्य के सपने होते हैं, न कोई वादे होते हैं. बस, किसी की मूक प्रशंसाभरी आंखों से

साक्षात्कार होने मात्र से इतना ख़ूबसूरत एहसास होता है कि मन रंगीन सपने सजाने लगता है. समय बहुत बलवान है, जो अच्छी-बुरी सभी यादों को भुलाने के लिए मरहम का काम करता है. लेकिन इस नए टेक्नोलॉजी ने तो मेरे अतीत को साक्षात् सामने लाकर खड़ा कर दिया था. शांत समंदर में झंझावात पैदा कर दिया था.

यह मेरे लिए अभिशाप है या वरदान, सोच में पड़ गई थी. वर्तमान परिस्थितियों के कारण इसका अब कोई औचित्य ही दिखाई नहीं दे रहा था. यह मन को उद्वेलित करके बेचैन ही करेगा.

आरंभ में औपचारिकतापूर्ण बातचीत से पता चला कि वह भोपाल में और मैं मुंबई में अपने-अपने परिवार के साथ जीवन बिता रहे हैं. फिर अचानक एक दिन मोबाइल के स्क्रीन पर उस गाने की लाइन पढ़कर मेरे मन की स्थिति बिल्कुल वैसी ही हो गई थी. जैसी उसकी आंखों में पहली बार मूक प्रेम निवेदन देखकर हुई थी. तो क्या वह कुछ भी नहीं भूला अब तक? उसके गाने की लाइन के प्रतिक्रियास्वरूप मैं तीस साल पहले की अव्यक्त भावनाओं में अपने को बहने से रोक नहीं पाई और उनको व्यक्त करने के लिए जवाब देने के लिए मजबूर हो गई.

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मैंने लिखा- ‘तो क्या तुम्हें सब कुछ याद है… परिस्थितियां अनुकूल नहीं हैं, लेकिन हम दोस्त बनकर बातें तो कर सकते हैं. हम दोनों ही अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हैं, इसलिए हमारे रिश्ते के इस नए मोड़ से हमारे अपने परिवारों के प्रति हमारे कर्त्तव्यों का हनन तो होगा नहीं, बल्कि उम्र के इस पड़ाव में जो खालीपन आ गया है, वह भर जाएगा. वैसे भी तुम्हारी भरपाई कभी हो नहीं पाई, वह दिल का कोना सूना ही है…’ मैसेज भेजते ही मुझे अजीब-सी ग्लानि होने लगी. यह मैंने क्या कर डाला! उसने तो स़िर्फ एक गाने की लाइन लिखी थी. उसके पीछे उसका अभिप्राय क्या था, यह जाने बिना ही मैंने क्या कुछ लिख डाला…

इतने वर्षों में उसके व्यक्तित्व में क्या बदलाव आया होगा? कैसी उसकी सोच होगी? क्या सोचेगा वह पढ़कर? एक शादीशुदा महिला भी शादी के बाद परपुरुष से संबंध रखना चाहती है. हां, परपुरुष ही तो था, केवल 15 दिनों की औपचारिक मुलाक़ात और उसके बाद इतने वर्षों का अंतराल किसी आत्मीय रिश्ते की ओर तो इंगित करता नहीं है. वैसे भी पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं की इतनी बेबाक़ी को निर्लज्जता का दर्जा ही दिया जाता है, ख़ासकर उस ज़माने में, जब हम मिले थे. हमारे संस्कार तो यही कहते थे.

काश! कोई ऐसा बटन भी होता, जिसे प्रेस करने से भेजा हुआ संदेश भी डिलीट हो जाता. अपने स्क्रीन पर तो घबराकर तुरंत डिलीट कर ही दिया था. उसका जवाब आने के बाद मेरी आत्मग्लानि और बढ़ गई. उसका जवाब था- ‘मैं आपसे स़िर्फ दोस्ती चाहता हूं, इतना इमोशनल होना ठीक नहीं है…’ मैंने प्रत्युत्तर में लिखा- ‘मुझे थोड़ा समय चाहिए…’

मन बड़ा खिन्न हो गया था. मैं सब कुछ भूल चुकी थी. अपने नीरस वैवाहिक जीवन के साथ समझौता कर चुकी थी. फिर यह सब क्यों? और उम्र के उस पड़ाव पर थी, जब शारीरिक शक्ति क्षीण हो जाती है. बस, स्वस्थ रहने के लिए मानसिक ख़ुशी मिलने के लिए मनुष्य भटकता है और जहां कहीं थोड़ा प्यार मिलता है, वहीं जाना चाहता है अर्थात् अल्हड़ उम्र की और इस उम्र की ज़िम्मेदारी मुक्त मानसिक स्थिति और आवश्यकताओं में विशेष अंतर नहीं होता.

मेरा मानना था कि प्यार कभी दोस्ती में परिवर्तित नहीं हो सकता. दोस्ती और प्यार के बीच सीमा रेखा खींचना असंभव है. मैंने मन ही मन तय कर लिया कि अपनी भावनाओं पर पूरी तरह कंट्रोल रखूंगी और उसके सामने उजागर नहीं होने दूंगी, लेकिन औपचारिक चैटिंग करते हुए मन होता कि थोड़ा तो वह रोमांटिक बात लिखे. उसके हर वाक्य में अपने मनोकूल अर्थ ढूंढ़ती रहती. और कभी-कभी असफल होने पर अतृप्त मन उदास हो जाता और असुरक्षा की भावना से घिर जाती कि पहले की तरह यह रिश्ता अस्थाई तो नहीं है. और यदि निभेगा भी, तो प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण कैसे निभेगा?

मैं चैटिंग से ही संतुष्ट रहना चाहती थी, लेकिन मेरी आवाज़ सुनने के उसके प्रस्ताव के सम्मोहन से ख़ुद को वंचित नहीं रख सकी. फोन करते ही मेरा पहला वाक्य था, “क्या अब तक याद हू मैं तुम्हें?”

“याद उसे किया जाता है, जिसे भुला दिया गया हो. मैं तो तुम्हें कभी भूला ही नहीं. तुम्हारी यादों के साथ जीना सीख लिया था. लगा ही नहीं तुम कभी मुझसे दूर हो…” इस तरह हमारी मूक यादों को उसने और मैंने शब्दों का जामा पहनाया.

समय ने हमारी भावनाओं को रत्तीभर भी नहीं बदला था, लेकिन परिस्थितियों ने हमारी ज़ुबान को संयमित शब्दों का चयन करने की ही अनुमति दी थी, इसलिए शब्दों को संभालकर बोल रही थी, जिससे दोस्ती की परिधि में ही रहूं. कितना मुश्किल था तब, जब उम्र ही ऐसी थी कि अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए शब्दों का ज्ञान अधूरा था और अब अपार ज्ञान होते हुए भी अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं है.

बात समाप्त करने के बाद भी एक अधूरी प्यास से मन व्याकुल रहता था. लेकिन मैं उसे खोना नहीं चाहती थी और मन ही मन भगवान पर निर्णय की ज़िम्मेदारी छोड़ दी थी. उससे मिलने में मेरा तो कोई प्रयास था नहीं, यह सब तो ईश्‍वर की ही योजना थी. कहते हैं, जीवन में किसी के मिलने के पीछे भी कोई उद्देश्य होता है, शायद मेरे प्यार के लिए भटकते, वैरागी, निश्छल मन को सहारा देने के लिए ही भगवान ने उसे मुझसे मिलवाया था.

इतना तो मैं विगत 15 दिनों की मुलाक़ात में जान गई थी कि वह हमारे मूक प्रेम के लिए बहुत गंभीर है. लेकिन हमारा सामाजिक रिश्ता ऐसा है, जिसके कारण इसका कोई भविष्य नहीं था. उससे बात करके यह भी पता चल गया कि मेरे लिखे एक पत्र के उनके बड़े भाई के हस्तगत होते ही हमारे पत्र-व्यवहार पर पूर्ण विराम लगा दिया गया था और मैं भी उसके पत्र के न आने के कारण को जाने बिना ही अपनी शादी के पहले उन पत्रों को भूमिगत कर आई और हमेशा के लिए इस रिश्ते को धराशाई कर दिया था. लेकिन बादलों में जिस प्रकार बिजली चमककर अपने अस्तित्व की याद दिलाती है, उसी प्रकार वह भी अपनी धूमिल-सी उपस्थिति मेरे मानस पटल पर कभी-कभी दिखा देता था, फिर बादल छंटने के साथ सब एकसार हो जाता था.

हर दूसरे दिन बातें होने लगीं. उसके लिए समय निश्‍चित किया गया. फोन आने के पहले तो अजीब-सी बेचैनी रहती ही थी, फोन करते समय अजब-सा रोमांच का अनुभव होता था. ऐसी जगह जाकर बात करती थी, जहां कोई नहीं देखे. एक अपराध भावना घेरे रहती. सोचती ऐसा कौन-सा पाप कर रही हूं, जो पति से छिपाकर करना पड़ रहा है. बात ही तो कर रही हूं… यह कैसा रिश्ता है, जो इतना पवित्र होते हुए भी, विवाह के बाद अनैतिक माना जाता है.

हम कृष्ण के राधा के साथ अलौकिक प्रेम की गाथा गाते-गाते नहीं थकते. सारा वृंदावन नगरी राधा के नाम से गूंजता रहता है और लौकिक प्रेम को व्यभिचार मानते हैं. यह कैसी दोहरी मानसिकता है? क्या विवाह के समय लिए गए सात वचन मनुष्य को सब ख़ुशी दे देते हैं, जो इस अनाम रिश्ते से मिलती है? क्या विवाह एक बेड़ी नहीं है? क्या जीने के लिए आर्थिक और शारीरिक सुरक्षा के

साथ-साथ भावनात्मक सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है? जो अधिकतर वैवाहिक जीवन में अस्तित्वहीन है.

पति हमारी भावना न समझे, बावजूद उसके साथ हम घुट-घुटकर जीने पर मजबूर हो जाते हैं. क्या जीवन सांसें पूरी करने का नाम है? यह समाज द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा मानसिक शोषण ही तो है. यह आक्रोश ‘सिलसिला’ मूवी में अमिताभ बच्चन द्वारा बोले गए शब्दों में साफ़ उजागर होता है- ‘दिल कहता है, दुनिया की हर एक रस्म उठा दें, दीवार जो हम दोनों में  है, आज गिरा  दें… क्यों दिल में सुलगते रहें, दुनिया को बता दें… हां, हमको मुहब्बत है…’ यह कैसा रिश्ता है, जो जीवनदायिनी होकर भी असामाजिक कहलाता है.

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जब भी फोन से उससे बात होती थी, मैं तो उसकी बातों के बयार में बहती रहती थी. वही याद दिलाता था कि आज की मुलाक़ात, बस इतनी ही. एक बार उसका फोन निश्‍चित समय पर नहीं आया. मन अजीब आशंकाओं से भर गया कि कहीं उसकी पत्नी ने हमारी बात सुनकर हमारी बातचीत पर पूर्ण विराम तो नहीं लगा दिया? बाद में बात करने से पता लगा कि वह व्यस्त था. इसकी कई बार पुनरावृत्ति होने लगी. मन असुरक्षित रिश्ते के संदेह से घिरने लगा.

फिर धीरे-धीरे बात करने का अंतराल बढ़ने लगा, तो इसका कारण पूछने पर उसने मुझे समझाया. “हमारे रिश्ते में यही ठीक है. बातें तो अंतहीन हैं. मैं चाहता हूं कि हमारी भावनाएं इतनी नॉर्मल हो जाएं कि रिश्ते में बेचैनी ही न रहे.” पहले तो मुझे उसकी बात अटपटी लगी, लेकिन धीरे-धीरे उसके फोन आने का इंतज़ार ही कम होने लगा और जीवन व्यवस्थित-सा हो गया. यह स्थिति ठीक वैसी ही थी, जब प्यार या शादी के आरंभिक दिनों की रूमानियत धीरे-धीरे समाप्त होकर जीवन सामान्य हो जाता है. रिश्ते की तपिश धीरे-धीरे भीषण ग्रीष्म ऋतु में पहली बरसात की सोंधी ख़ुशबू के साथ ठंडक प्रदान करती है. ये बहुत ही सुखद एहसास था, जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता.

हम दोनों ही जीवन के इस पड़ाव में एक-दूसरे में आए बदलाव को एक बार मिलकर देखना चाहते थे. ‘जहां चाह वहां राह’ वाली कहावत चरितार्थ हुई और एक पारिवारिक समारोह में उसके शहर में अपने पति के साथ जाकर उससे मिलने का मौक़ा मिला. उसके परिवारवाले हमारे इस रिश्ते के बारे में जानते थे, फिर भी उसने मुझे अपने घर आने का निमंत्रण देकर हमारे इस बेनाम रिश्ते पर मुहर लगा दी, तो मुझे सुखद आश्‍चर्य हुआ और यह सोचकर गर्व हुआ कि मैं उसके लिए आज भी विशेष स्थान रखती हूं.

उसने रास्ते में रखे दीये को मंदिर में रखे दीये का स्थान दे दिया था. उसके घर में मुश्किल से एक घंटे की सामूहिक मुलाक़ात में हम तटस्थ रहने का नाटक तो कर रहे थे, लेकिन मूक भाषा का दिल ही दिल में आदान-प्रदान भी चल रहा था. उसकी सुखी गृहस्थी को देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई. इस रिश्ते के इतना सुंदर और सुलझे हुए स्वरूप का पूरा श्रेय उसे जाता है. मैं तो एक समंदर के समान थी, जिसका बांध अचानक खोल देने पर वह निर्बाध गति से बहने के लिए व्याकुल हो गया था. उसके बहाव को कंट्रोल उसी ने किया, क्योंकि अति का परिणाम तबाही ही होता है. उससे संपर्क करने के बाद ही मैंने जाना कि पुरुष का वासनापूर्ण रूप ही होता है, यह हमारी पूरी पुरुष जाति के लिए अवधारणा है, तो ग़लत है.

वापस लौटते समय सुनील का शरीर मुझसे दूर हो गया, साथ आया तो स़िर्फ एक एहसास मानो उसका शरीर नश्‍वर है और एहसास रूपी आत्मा अमर है, जो हर समय मेरे साथ रहेगा. यह एहसास कि कोई मुझे शिद्दत से चाहता है और मुझे ख़ुश देखना चाहता है, काफ़ी है जीने के लिए. शायर साहिर लुधियानवी ने ऐसे रिश्ते को बेहद ख़ूबसूरती से परिभाषित किया है- ‘वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा…’ आज के विकसित टेक्नोलॉजी के संदर्भ में जब संपर्क के इतने साधन हैं, तो स्त्री-पुरुष के रिश्ते में ज़माने की सोच में आए बदलाव के कारण इसकी परिभाषा को परिवर्तित किया जा सकता है. छोड़ना के स्थान पर यदि हम जोड़ना लिखें तो यह रिश्ता सार्थक होगा.

Sudha Kasera

       सुधा कसेरा

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मैं स्तब्ध खड़ी रह गई थी. मेरा बुद्धिजीवी तार्किक मस्तिष्क संज्ञाशून्य हो गया था. तकनीक और विज्ञान हमें चांद-सूरज पर पहुंचा सकता है, पर किसी के दिल तक पहुंचने के लिए तो एक संवेदनशील दिल ही चाहिए.

Hindi Kahani

बेटे पिंटू को फिज़ियोथेरेपी के लिए ले जाते हुए यह मेरा छठा दिन था. खेलते व़क्त गिर जाने के कारण उसके घुटने की सर्जरी हुई थी और अब फिर से अपने पैरों पर खड़े होने के लिए उसे लगभग दो महीने की फिज़ियोथेरेपी की आवश्यकता थी. फिज़ियोथेरेपी सेंटर लगभग पूरे दिन ही खुला रहता था, इसलिए मैं अपनी सुविधानुसार सुबह, दोपहर, शाम- कभी भी उसे लेकर वहां पहुंच जाती थी. कभी नए चेहरे नज़र आते, तो कभी रोज़वाले ही परिचित चेहरे. कुछ स्वयं चलकर आने वाले होते, कुछ को छोड़ने और लेने आनेवाले होते थे, तो कुछ मेरे जैसे भी थे, जो आरंभ से अंत तक पेशेंट के साथ ही बने रहते थे. मैं और पिंटू जल्द ही वहां के माहौल में अभ्यस्त होने लगे थे.

लगभग हर उम्र, धर्म और आर्थिक स्तर के स्त्री-पुरुष वहां आते थे. मैंने गौर किया अधिकांश पुरुष और कुछ महिलाएं तो आते ही अपने-अपने मोबाइल पर व्यस्त हो जाते. वाट्सऐप, फेसबुक, वीडियो गेम या फिर गाने सुनने में थेरेपी के उनके डेढ़-दो घंटे ऐसे ही निकल जाते. मैंने सोच लिया, अब से मैं भी सारे मैसेजेस वहीं देखा और भेजा करूंगी.

उस दिन यही सोचकर मैंने पर्स से मोबाइल निकालने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि पास के बेड पर लेटे एक बुज़ुर्ग सज्जन के सवाल ने मुझे चौंका दिया.

“एक्सीडेंट हुआ था क्या?”

“ज…जी. खेलते व़क्त घुटने का लिगामेंट रप्चर हो गया था. सर्जरी हुई है.” न चाहते हुए भी मेरे चेहरे पर 9 वर्षीय पिंटू के लिए चिंता की लकीरें उभर आई थीं.

“अरे, चिंता मत करो. जिस तरह अच्छा व़क्त जल्दी गुज़र जाता है, उसी तरह बुरा व़क्त भी ज़्यादा दिन नहीं ठहरता. जल्दी ठीक हो जाएगा. इस उम्र में रिकवरी जल्दी होती है. समस्या तो हम जैसों के साथ है.”

“आपको क्या प्रॉब्लम है?”

“फ्रोज़न शोल्डर्स! वैसे तो बुढ़ापा अपने आप में ही एक बीमारी है और उसमें भी कुछ समस्या हो जाए, तो लंबा खिंच जाता है. यहां आ जाता हूं, फिज़ियोथेरेपिस्ट की निगरानी में कुछ व्यायाम कर लेता हूं, मशीन से थोड़ी सिंकाई करवा लेता हूं, तो आराम मिल जाता है.”

“सही है. लोगों से मिलकर, बात करके थोड़ा मन भी बहल जाता होगा.” मैंने उनके समर्थन में सुर मिलाया.

“हां, पर आजकल लोगों के पास मिलने-बतियाने का व़क्त कहां है? देखो, सब के सब अपने-अपने मोबाइल पर व्यस्त हैं. मीलों दूर बैठे व्यक्ति को मैसेज पर मैसेज, फोटोज़ भेजते रहेंगे, पर मजाल है बगल में दर्द से कराहते व्यक्ति की ज़रा-सी सुध ले लें.”

इस बार मैं उनकी हां में हां नहीं मिला सकी. मेरे बुद्धिजीवी मस्तिष्क ने अपना तर्क रख ही दिया. “दर्द से ध्यान हटाने के लिए ही तो हर कोई अपने को मोबाइल में व्यस्त किए हुए है.”

“मतलब?”

“अब देखिए न अंकल, थेरेपी में थोड़ा-बहुत दर्द तो होता ही है. ध्यान गानों में, संदेश भेजने-पढ़ने में, फोटोज़ देखने में लगा रहेगा तो दर्द की अनुभूति कम होगी. मैंने इसीलिए तो पिंटू को हेडफोन लगा दिया है. ख़ुद मैं भी अपना मोबाइल ही चेक करने जा रही थी…”

“कि मैंने तुम्हें बातों में लगाकर तुम्हारा टाइम ख़राब कर दिया.” अंकल ने मेरी बात झटके से समाप्त करते हुए दूसरी ओर मुंह फेर लिया. शायद मैंने उन्हें नाराज़ कर दिया था.

“आह!” उनके मुंह से कराह निकली.

“देखिए, आपका ध्यान दर्द पर गया और दर्द महसूस होने लगा. इतनी देर मुझसे बातें करते हुए आपको दर्द का एहसास ही नहीं हो रहा था. बात स़िर्फ ख़ुद को व्यस्त रखकर दर्द से ध्यान बंटाने की है. देखिए, आपसे बातों-बातों में पिंटू की एक्सरसाइज़ पूरी भी हो गई. न उसे कुछ पता चला, न मुझे, वरना वो यदि दर्द से परेशान होता रहता, तो उसे तड़पता देख मैं दुखी होती रहती.”

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केयरटेकर ने आकर अंकल की मशीन हटाई, तो उनके मुंह से निकल गया, “अरे, हो भी गई. आज तो पता ही नहीं चला.”

केयरटेकर सहित मेरे चेहरे पर भी मुस्कान दौड़ गई. अंकल झेंप गए.

“टेक्नोलॉजी इतनी बुरी भी नहीं है अंकल! हां, अति सर्वत्र वर्जयेत्.”

प्रत्युत्तर में अंकल मुस्कुरा दिए, तो मैं फूलकर कुप्पा हो गई. घर लौटकर मैंने यह बात अपने पति को बताई, तो वे भी मुस्कुराए बिना न रह सके.

“मतलब, वहां भी तुमने अपनी समझदारी का सिक्का जमाना आरंभ कर दिया है. सॉरी नीतू, घर के कामों के साथ-साथ पिंटू को लाने-ले जाने की ज़िम्मेदारी भी तुम्हें संभालनी पड़ रही है. क्या करूं? आजकल ऑफिस में वर्कलोड ज़्यादा होने से लगभग रोज़ ही लौटने में देरी हो जाती है. देखो, शायद अगले महीने थोड़ा फ्री हो जाऊं, तो फिर पिंटू को लाने-ले जाने की ज़िम्मेदारी मैं संभाल लूंगा.”

“अरे नहीं, मुझे कोई परेशानी नहीं है, बल्कि कुछ नया देखने-समझने को मिल रहा है.” मैंने उन्हें अपराधबोध से उबारना चाहा.

“ओहो! तो लेखिका महोदया को यहां भी कहानी का कोई प्लॉट मिल गया लगता है.”

पति ने चुटकी ली, तो मैं मन ही मन इनकी समझ की दाद दिए बिना न रह सकी. वाकई इस एंगल से तो मैंने सोचा ही नहीं था. सेंटर में तो इतने तरह के कैरेक्टर्स मौजूद हैं कि कहानी क्या, पूरा उपन्यास लिखा जा सकता है. मैं अब और भी जोश के साथ पिंटू को सेंटर ले जाने लगी. पर उन अंकल से फिर बातचीत नहीं हो सकी. एक-दो बार आते-जाते आमना-सामना ज़रूर हो गया था, पर हम मुस्कुराकर आगे बढ़ गए थे. उन्हें जाने की जल्दी थी, तो मुझे आने की. इस बीच मेरा जन्मदिन आया, तो पति ने मुझे उपहारस्वरूप किंडल लाकर दिया.

“इसमें तुम कोई भी क़िताब सॉफ्ट कॉपी के रूप में स्टोर कर कहीं भी पढ़ सकती हो. हैंडल करने में बेहद सुविधाजनक.”

स्मार्टफोन, चश्मे के अलावा अब किंडल भी मेरे हैंडबैग की एक आवश्यक एक्सेसरी हो गई थी. सेंटर में मेरा व़क्त और भी आराम से गुज़रने लगा था. पिंटू के घुटने में भी काफ़ी सुधार था. मुझे किंडल पर व्यस्त देख वह मज़ाक करता.

“ममा, आप अपना लैपटॉप भी साथ ले आया करो. यहीं स्टोरी टाइप कर लिया करो.”

“नहीं, इतना भी नहीं.” मैं मुस्कुरा देती. पर्स में किंडल आ जाने के बाद से मेरी आंखें उन अंकल को और भी बेचैनी से तलाशने लगी थीं. शायद मैं उन्हें उन्नत टेक्नोलॉजी का एक और अजूबा दिखाने के लिए बेक़रार हो रही थी. उनसे उस दिन की मुलाक़ात न जाने क्यों मेरे दिल में बस-सी गई थी, आख़िर मेरी मुराद पूरी हो ही गई. उस दिन पिंटू को फिज़ियोथेरेपिस्ट के हवाले कर मैंने किंडल पर अपना अधूरा नॉवल पढ़ना शुरू ही किया था कि एक परिचित स्वर ने मुझे चौंका दिया. देखा तो अंकल थे.

“अंकल, आप कैसे हैं? कितने दिनों बाद फिर से मुलाक़ात हुई है?”

“हां, बीच में कुछ दिन तो मैं आया ही नहीं था. विदेश से बेटी-दामाद आए हुए थे. उनके और नाती-नातिन के संग दिन कब गुज़र जाता था पता ही नहीं चलता था. भगवान का शुक्र है उस समय कंधों में कोई दर्द नहीं हुआ.”

मैं मुस्कुरा दी. “अंकल दर्द तो हुआ होगा, पर आप बेटी और उसके बच्चों में इतने मगन थे कि आपको दर्द का एहसास ही नहीं हुआ.” अंकल हंसने लगे थे. “तुमसे मैं तर्क में नहीं जीत सकता बेटी. अपनी बेटी को भी मैंने तुम्हारे बारे में बताया था. कहने लगी ठीक ही तो कह रही हैं वे. कब से आपसे कह रही हूं कि इस बटनवाले मोबाइल को छोड़कर स्मार्टफोन ले लीजिए. आपका मन लगा रहेगा और हमें भी तसल्ली रहेगी. वह तो ख़ुद लाने पर उतारू थी, पर मैंने ही मना कर दिया. मेरे भला कौन-से ऐसे यार-दोस्त हैं, जिनसे वाट्सएप पर बातें करूंगा. जो दो-चार हैं, वे मेरे जैसे ही हैं, जो या तो ऐसे ही मिल लेते हैं या फोन पर बातें कर लेते हैं. अपना पुराना लैपटॉप वह पिछले साल आई थी, तब यहीं छोड़ गई थी. उस पर स्काइप पर बात कर लेती है. बाकी सुबह-शाम टीवी देख लेता हूं. मोबाइल में जितने ज़्यादा फंक्शन होंगे, मेरे लिए उसे हैंडल करना उतना ही मुश्किल होगा. शरीर संभल जाए वही बहुत है. और पिंटू बेटा कैसा है? ठीक है? यह तुम्हारे हाथ में क्या है?”

“यह किंडल है अंकल!” मैं उत्साहित हो उठी थी. “मेरे हसबैंड ने मुझे बर्थडे पर गिफ्ट किया है. मुझे पढ़ने-लिखने का बहुत शौक़ है न, तो इसलिए.” मैं उत्साह से उन्हें दिखाने लगी, तो आसपास के कुछ और लोग भी उत्सुकतावश जुट आए.

“यह देखिए. यह मैंने इसमें कुछ क़िताबें मंगवाई हैं. अब ये इसमें सॉफ्ट कॉपी के रूप में उपलब्ध हो गई हैं. मेरा जब जहां मन चाहे खोलकर पढ़ने लग जाती हूं मोबाइल की तरह. यह भी बैटरी से चार्ज होता है. मेरी अपनी लिखी क़िताब भी सॉफ्ट कॉपी के रूप में इसमें उपलब्ध है. आप कभी पढ़ना चाहें तो!”

“वाह, क्या टेक्नोलॉजी है!” आसपास के लोग सराहना करते धीरे-धीरे छितरने लगे, तो मेरा ध्यान अंकल की ओर गया. अंकल किसी गहरी सोच में डूबे हुए थे.

“क्या हुआ अंकल?”

“अं… कुछ नहीं. मैंने तुम्हें बताया था न कि बेटी ने स्मार्टफोन दिलवाने की बात कही थी और मैंने इंकार कर दिया था. तब वह यही, जो तुम्हारे हाथ में है- किंडल, यह भेजने की ज़िद करने लगी. दरअसल, उसने मुझे उसकी मां की डायरी पढ़ते देख लिया था.”

“आपकी पत्नी डायरी लिखती हैं?” मैंने बीच में ही बात काटते हुए प्रश्‍न कर डाला था.“लिखती है नहीं, लिखती थी? दो वर्ष पूर्व वह गुज़र गई.”

“ओह, आई एम सॉरी!”

अंकल, शायद किसी और ही दुनिया में चले गए थे, क्योंकि मेरी प्रतिक्रिया पर भी वे निर्लिप्त बने रहे और पत्नी की स्मृतियों में खोए रहे.

“उसके जीते जी तो कभी उसकी डायरी पढ़ने की आवश्यकता महसूस ही नहीं हुई. बहुत जीवंत व्यक्तित्व की स्वामिनी थी तुम्हारी आंटी. बेहद हंसमुख, बेहद मिलनसार, बेहद धार्मिक… हर किसी को अपना बना लेने का जादू आता था उसे. मैं ज़रा अंतर्मुखी हूं, लेकिन वो हर व़क्त बोलती रहती थी. पर कैंसर के आगे उसकी भी बोलती बंद हो गई.”

“क्या? कैंसर था उन्हें?”

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“ख़ूब लंबा इलाज चला. अपनी जिजीविषा के सहारे वो लंबे समय तक उस भयावह बीमारी से संघर्ष करती रही, पर अंत में थक-हारकर उसने घुटने टेक दिए. उसके दिन-प्रतिदिन टूटने का सफ़र याद करता हूं, तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं. तुम उस दिन फिज़ियोथेरेपी के दर्द के व़क्त ध्यान दूसरी ओर लगाने की बात कर रही थी न? तुम्हारी आंटी के कीमोथेरेपी के दर्द के सम्मुख यह दर्द कुछ भी नहीं है. मैं तो उस व़क्त आंखें बंद कर बस उसका ध्यान कर लेता हूं. उसका हंसता-मुस्कुराता जीवंत चेहरा मेरी स्मृति में तैर जाता है और मैं सब भूलकर किसी और ही दुनिया में पहुंच जाता हूं.”

अंकल को भावुक होते देख मैंने उनका ध्यान बंटाना चाहा. “आप उनकी डायरी के बारे में बता रहे थे.”

“हां, उसके जाने के बाद मैंने एक दिन वैसे ही उसकी डायरी खोलकर पढ़ना शुरू किया, तो हैरत से मेरी आंखें चौड़ी हो गई थीं. भावनाओं को इतनी ख़ूबसूरती से शब्दों में पिरोया गया था कि मैं उसकी सशक्त लेखनी की दाद दिए बिना नहीं रह सका. किसी कवयित्री की कविता से कम नहीं है उसकी डायरी. एक-एक शब्द जितनी शिद्दत से काग़ज़ पर उकेरा गया था, पढ़ते व़क्त उतनी ही गहराई से दिल में उतरता चला जाता है. जाने कितनी बार पढ़ चुका हूं, पर मन ही नहीं भरता. दिन में एक बार उसके पन्ने न पलट लूं, तब तक मन को शांति नहीं मिलती. बेटी परिवार सहित आई हुई थी, फिर भी मैं आंख बचाकर, मौक़ा निकालकर एक बार तो डायरी के पन्ने पलट ही लेता था और रवाना होने से एक दिन पहले बस बेटी ने यही देख लिया. मां की डायरी देख, पढ़कर पहले तो वह भी ख़ूब रोई. फिर बोली, “ठीक है पापा, मान लिया स्मार्टफोन आपके काम का नहीं. अब मैं आपके लिए किंडल भेजूंगी. उसमें आप न केवल मम्मी की डायरी, वरन और भी बहुत सारी क़िताबें पढ़ सकेंगे. देखिए, मम्मी की डायरी की क्या हालत हो गई है. एक-एक पन्ना छितरा पड़ा है.”

“वो तो बेटी मैं रोज़ देखता हूं न तो इसलिए…” मैंने सफ़ाई दी थी.

“पर किंडल में यह समस्या नहीं होगी, चाहे आप दिन में 20 बार पढ़ें.”

“हां, बिल्कुल. यह देखिए न आप.” मैंने अपना किंडल उनके हाथ में पकड़ा दिया. वे कुछ देर उसे देखते-परखते रहे. फिर लौटा दिया.

“लेकिन बेटी इसमें वो डायरीवाली बात कहां? उस डायरी के पन्नों के बीच तो मेरे द्वारा तुम्हारी आंटी को दिए सूखे गुलाब हैं. जगह-जगह हल्दी-तेल के निशान हैं. आंसुओं से धुंधलाए अक्षर हैं. उसके पन्नों पर हाथ फेरता हूं, तो लगता है तुम्हारी आंटी को ही स्पर्श कर रहा हूं.”

मैं स्तब्ध खड़ी रह गई थी. मेरा बुद्धिजीवी तार्किक मस्तिष्क संज्ञाशून्य हो गया था. तकनीक और विज्ञान हमें चांद-सूरज पर पहुंचा सकता है, पर किसी के दिल तक पहुंचने के लिए तो एक संवेदनशील दिल ही चाहिए. तभी तो कहा गया है ‘जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि’. शायद इसीलिए अंकल से रू-ब-रू वार्तालाप से मुझे जितना सुकून मिलता है, उतना वाट्सऐप पर पिंटू के लिए मिले गेट वेल सून मैसेजेस से नहीं.

Sangeeta Mathur

    संगीता माथुर

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Akbar Birbal Ki Khaniya
सौजन्य: lets-inspire.com

अकबर-बीरबल कथा: पूर्णिमा का चांद (Akbar-Birbal Story: poornima Ka Chand)

एक बार बीरबल फारस देश के राजा के निमंत्रण पर उनके देश गए हुए थे. उनके सम्मान दावत का आयोजन किया गयाथा और अनेक उपहार दिए गए थे. अपने देश लौटने की पूर्व संध्या पर एक अमीर व्यक्ति ने पूछा कि वह कैसे अपने राजाकी फारस के राजा से तुलना करेंगे?

बीरबल ने कहा, “आपके राजा पूर्णिमा के चांद जैसे हैं. हालांकि हमारे राजा दूज के चंद्रमा के समान हैं.”

यह सुन फारसी बहुत खुश थे, लेकिन जब बीरबल घर गए, तो उन्होंने पाया कि सम्राट अकबर बहुत गुस्से में थे.

अकबर ने गुस्से में कहातुम अपने राजा को कैसे कमजोर बता सकते हो.”  तुम एक गद्दार हो !” बीरबल ने कहा, “नहीं, महाराज मैंने आपको कमज़ोर नहीं बताया है.

दरसल, पूर्णिमा का चांद कम हो जाता है और गायब हो जाता है, जबकि दूज के चांद में शक्ति बढ़ती है.

मैं वास्तव में दुनिया को बताता हूं कि दिन प्रतिदिन आपकी शक्ति बढ़ रही है, जबकि फारस के राजा का पतन हो रहा है.”

अकबर ने बीरबल की बुद्धिमत्ता का फिर लोहा माना. उनकी बात का असली अर्थ समझकर संतोष व्यक्त किया औरबीरबल का गर्मजोशी से स्वागत किया.

सीख: शब्दों से खेलकर कैसे गूढ़ अर्थ में अपनी बात भी कही जा सकती है और समानेवाले को नाराज़ भी नहीं किया गयायह कला सीखना ज़रूरी है.

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Image Credit: moralstories.org

अकबर-बीरबल की कहानी: सोने के सिक्के (Akbar-Birbal Tale: Gold Coins)

बीरबल की तेज़ बुद्धि के जितने अकबर कायल थे, उतना ही उनसे ईर्ष्या रखनेवाले लोग भी थे. इसी कड़ी में थे अकबर के एक रिश्तेदार भी. उनको बीरबल से बहुत ईर्ष्या थी, उन्होंने एक बार बादशाह अकबर से कहा- क्यों न बीरबल को हटाकर उसकी जगह मुझे नियुक्त किया जाए, क्योंकि मैं बीरबल की तुलना में अधिक सक्षम हूं.

इससे पहले कि बादशाह फैसला ले पाते, बीरबल को इस बात की भनक पड़ गई. बीरबल ने तुरंत ही इस्तीफा दे दिया और बादशाह अकबर के रिश्तेदार को बीरबल की जगह नियुक्त कर दिया गया.

बादशाह ने नए मंत्री परीक्षा लेनी चाही. बादशाह ने उसे 300 सोने के सिक्के दिए और कहा- इन सिक्कों को इस तरह खर्च करो कि 100 सिक्के मुझे इस जीवन में ही मिलें, 100 सिक्के दूसरी दुनिया में मिलें और आखिरी 100 सिक्के न यहां मिलें और न वहां मिलें.

बादशाह की इस पहेली ने मंत्री को असमंजस की स्थिति में डाल दिया. उसकी रातों की नींद हराम हो गई. यह देख मंत्री की पत्नी ने कहा आप परेशान क्यों हैं? मंत्री ने राजा की पहेली वाली बात बताई और कहा कि उनकी इस पहेली ने दुविधा में फंसा दिया है.

मंत्री की पत्नी ने उनको सुझाव दिया कि क्यों न बीरबल से सलाह ली जाए. पत्नी की बात सुनकर वह बीरबल के पास पहुंच गया. बीरबल ने सारा किस्सा सुना तो कहा कि तुम मुझे यह सोने के सिक्के दे दो, बाकी मैं सब संभाल लूंगा.

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बीरबल सोने के सिक्कों से भरी थैली लेकर शहर की गलियों में घूमने लगे. वहां उनकी नज़र एक अमीर व्यापारी पर पड़ी,ल जो अपने बेटे की शादी का जश्‍न मना रहा था. बीरबल ने 100 सोने के सिक्के निकालकर उस व्यापारी को दे दिए और कहा- बादशाह अकबर ने तुम्हारे बेटे की शादी की शुभकामनाएं और आशीर्वाद स्वरूप यह 100 सोने के सिक्के भेंट दिए हैं.

यह सुनकर व्यापारी को बड़ा ही गर्व महसूस हुआ कि राजा ने इतना महंगा उपहार उन्हें दिया है. उस व्यापारी ने बीरबल को सम्मानित किया और उन्हें राजा के लिए उपहार स्वरूप बड़ी संख्या में महंगे उपहार और सोने के सिक्कों से भरा हुआ थैला थमा दिया.

अगले दिन बीरबल शहर के ऐसे क्षेत्र में गए जहां गरीब लोग रहते थे. उन्होंने 100 सोने के सिक्कों से भोजन और कपड़े खरीदे और उन्हें बादशाह अकबर के नाम पर गरीबों में बांट दिया.

जब बीरबल वापस आए, तो उन्होंने संगीत और नृत्य का एक कार्यक्रम आयोजित किया जहां उन्होंने 100 सोने के सिक्के खर्च कर दिए.

अगले दिन बीरबल बादशाह अकबर के दरबार में पहुंचे और घोषणा कर दी कि उसने वह काम किया है जो उनके दामाद नहीं कर पाए. अकबर यह जानना चाहते थे कि बीरबल ने यह सब कैसे किया.

बीरबल ने सिलसिलेवार पूरी बात व घटना बताई और कहा कि जो धन मैंने व्यापारी को उसके बेटे की शादी में दिया था वह वापस आप तक पहुंच गया और जो धन मैंने गरीबों में बांटा, वह धन आपको दूसरी दुनिया में जाकर मिलेगा और जो धन मैंने नृत्य और संगीत में खर्च कर दिया, वह आपको ना यहां मिलेगा और न वहां मिलेगा.

यह सुनकर अकबर के दामाद को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और बीरबल को अपना स्थान वापस मिल गया.

सीख: नेक कार्य व दान में खर्च किया गया धन ईश्‍वर के आशीर्वाद में परिवर्तित हो जाता है और उसका फल हमें ज़रूर मिलता है, जबकि ऐशो-आराम या गलत उद्देश्यों कार्यों में खर्च हुआ पैसा किसी काम का नहीं होता.

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Panchtantra Ki Kahani

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पंचतंत्र की कहानी: चूहा और संन्यासी (The Hermit And The Mouse)

बहुत समय पहले की बात है. एक गांव में एक संन्यासी रहता था. वह संन्यासी एकांत में गांव के एक मंदिर में रहता था और लोगों की सेवा करता था. भिक्षा मांगकर जो कुछ भी उसे मिलता, वह उसे उन लोगों को दान कर देता, जो मंदिर के रख-रखाव व साफ़-सफ़ाई करने में उसका सहयोग करते थे.

उस मंदिर में एक शैतान चूहा भी रहता था. वह चूहा अक्सर उस संन्यासी का रखा हुआ अन्न खा जाता था. संन्यासी ने चूहे को कई भगाने की कई कोशिशें कीं, लेकिन वह चकमा देकर छिप जाता.

संन्यासी ने उस चूहे को पकड़ने की भी काफी कोशिश की, लेकिन वह हर बार असफल रहता. एकदिन परेशान होकर संन्यासी अपने एक मित्र के पास गया.

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उसके मित्र ने उसे एक योजना बताई कि चूहे ने मंदिर में अपना कहीं बिल बना रखा होगा और वह वहां अपना सारा खाना जमा करता होगा. अगर उसके बिल तक पहुंचकर सारा खाना निकाल लिया जाए, तो चूहा खुद ही कमज़ोर होकर मर जायेगा.

अब संन्यासी और उसके मित्र ने बिल को खोजना शुरू कर दिया और बहुत ढूंढ़ने के बाद अंत में उनको बिल मिल ही गया जिसमें चूहे ने खूब सारा अन्न चुराकर इकठ्ठा कर रखा था. उन्होंने बिल खोदकर सारा अन्न बाहर निकाल लिया.

अब चूहे को खाना नहीं मिला तो वह कमज़ोर हो गया और संन्यासी ने अपनी छड़ी से कमज़ोर चूहे पर हमला किया. चूहा डरकर तुरंत भाग खड़ा हुआ और फिर कभी मंदिर में नहीं आया.

सीख: अपने शत्रु को परास्त है तो पहले उसकी शक्तियों पर हमला करो. शक्तियां खत्म तो शत्रु स्वयं कमज़ोर पड़ जायेगा.

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Panchtantra Story

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पंचतंत्र की कहानी: जब शेर जी उठा… (Panchtantra Story: The Lion That Sprang To Life)

एक नगर में चार दोस्त रहते थे. उनमें से तीन बड़े वैज्ञानिक थे, किन्तु बुद्धिरहित थे, जबकि चौथा वैज्ञानिक नहीं था, पर वह बहुत समझदार और बुद्धिमान था. चारों ने सोचा कि उनकी विद्या का लाभ तभी मिल सकता है, जब वे देश-विदेश में जाकर धन संग्रह करें. यही सोचकर वे यात्रा पर निकल पड़े.

कुछ दूर जाकर उनमें से सबसे बड़े ने कहा- हम चारों में एक विद्या-शून्य है, वह स़िर्फ बुद्धिमान है, पर हमारी तरह वैज्ञानिक नहीं. धनोपार्जन के लिये विद्या आवश्यक है. हम अपनी विद्या के चमत्कार से लोगों को प्रभावित कर सकते हैं, इसलिए हम अपने धन का कोई भी भाग इस विद्याहीन को नहीं देंगे. वह चाहे तो घर वापिस जा सकता है.

दूसरे ने भी इस बात का समर्थन किया, किन्तु, तीसरे ने कहा- नहीं, यह बात उचित नहीं है. बचपन से ही हम एक-दूसरे के सुख-दुःख के सहभागी रहे हैं. हम जो भी धन कमायेंगे, उसमें इसका हिस्सा रहेगा. अपने-पराये की गणना छोटे दिल वालों का काम है. हमें उदारता दिखलानी चाहिये.

उसकी बात मानकर चारों आगे चल पड़े. थोड़ी दूर जाकर उन्हें जंगल में एक शेर का मृत-शरीर मिला. उसके अंग-प्रत्यंग बिखरे हुए थे. तीनों वैज्ञानिकों ने कहा- क्यों न हम अपनी शिक्षा की परीक्षा करें. विज्ञान के प्रभाव से हम इस मृत-शरीर में नया जीवन डाल सकते हैं. यह कह कर तीनों उसकी हड्डियां बटोरने और बिखरे हुए अंगों को मिलाने में लग गये. एक ने अस्थियां इकट्ठी कीं, दूसरे ने चमड़ी, मांस आदि, तो तीसरे ने प्राणों के संचार की प्रक्रिया शुरू की.

इतने में चौथे मित्र ने उन्हें सावधान करते हुए कहा- तुम लोग अपनी विद्या के प्रभाव से शेर को जीवित कर रहे हो, इसलिए सोच लो. वह जीवित होते ही तुम्हें मारकर खा जायेगा.

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वैज्ञानिक मित्रों ने उसकी बात को अनसुना कर दिया. तब वह बुद्धिमान बोला- यदि तुम्हें अपनी विद्या का चमत्कार दिखलाना ही है तो दिखलाओ, लेकिन एक क्षण ठहर जाओ, मैं वृक्ष पर चढ़ जाऊं… यह कहकर वह पेड़ पर चढ़ गया.

इतने में तीनों वैज्ञानिकों ने शेर को जीवित कर दिया. जीवित होते ही शेर ने तीनों पर हमला कर दिया और तीनों मारे गये.

सीख: केवल शास्त्रों में कुशल होना ही पर्याप्त नहीं है, लोक-व्यवहार को समझने की बुद्धि भी होनी चाहिये. मात्र विद्या या ज्ञान की ज़रूरी नहीं, सामान्य ज्ञान व बुद्धि भी आवश्यक है, वरना विद्वान भी मूर्ख ही साबित होता है.

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Kids Story: अमरूद किसका? (Amrood Kiska?)

कुछ बच्चे पार्क में खेल रहे थे. उनमें से दो दोस्त भी थे. खेलते-खेलते उन्हें दूर एक अमरूद का पेड़ नज़र आया. दोनों उस पेड़ के पास गए, तो देखा एक अमरूद लगा हुआ है. दोनों ने सोचा क्यों न इसको तोड़कर खाया जाए. पर दोनों के मन में एक सवाल था कि ये अमरूद कौन खाएगा. ख़ैर दोनों ने मिलकर अमरूद तोड़ लिया.

अब उनमें झगड़ा होने लगा, एक ने कहा कि मैंने यह पेड़ पहले देखा, तो यह अमरूद मेरा, दूसरे का कहना था कि इस अमरूद को मैंने पहले देखा, तो यह मेरा.

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दोनों का झगड़ा इतना बढ़ गया कि बाकी के बच्चे भी वहां आ गए. सबने पूछा कि क्यों लड़ रहे हो, तो उन्होंने बताया. उन बच्चों में से एक लड़के ने कह कि मैं तुम्हारे झगड़े का निपटारा कर सकता हूं. यह अमरूद मुझे दिखाओ.

 

उन दोनों ने उसे अमरूद दे दिया. वो लड़के मज़े से अमरूद खाने लगा और देखते ही देखते पूरा अमरूद खा गया. बाद में बोला, वाह अमरूद सच में बहुत ही मीठा था और हंसते हुए वहां से चला गया.

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दोनों दोस्त देखते रह गए और फिर सोचने लगे कि काश, झगड़ा करने की बजाय यह अमरूद दोनों ने आधा-आधा बांट लिया होता, तो आज कोई और इसे नहीं हथिया सकता था.

सीख: इस कहानी से यही सीख मिलती है कि कभी भी छोटी-छोटी बात पर आपस में झगड़ा नहीं करना चाहिए, वरना दूसरे इसका फ़ायदा उठा लेते हैं. जो भी हो आपस में मिल-बांटकर ही फैसला करना चाहिए.

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