Tag Archives: Kahani

अकबर-बीरबल की कहानी: राज्य के कौवों की गिनती (Akbar-Birbal Tale: How Many Crows In The Kingdom)

Akbar Birbal Story

अकबर-बीरबल की कहानी: राज्य के कौवों की गिनती (Akbar-Birbal Tale: How Many Crows In The Kingdom)

एक दिन राजा अकबर और बीरबल राज महल के बगीचे में टहल रहे थे. बहुत ही सुंदर सुबह थी. कई तरह के पंछी चहक रहे थे. वहीं तालाब के पास ही बहुत सारे कौवे भी आस-पास उड़ रहे थे. उन कौवों को देखते ही बादशाह अकबर के मन में एक सवाल उत्पन्न हुआ. उनके मन में यह सवाल आया कि उनके राज्य में कुल कितने कौवे होंगे?

बीरबल तो उनके साथ ही बगीचे में टहल रह थे, तो राजा अकबर ने बीरबल से ही यह सवाल कर डाला और पूछा कि बताओ बीरबल, आख़िर हमारे राज्य में कितने कौवे हैं? तुम तो बड़े चतुर हो, तुम्हें हर सवाल का उत्तर पता होता है.

यह सुनते ही चालाक बीरबल ने तुरंत उत्तर दिया कि महाराज, हमारे राज्य में कुल 95,463 कौवे हैं, आप चाहें तो गिनती करवा सकते हैं.
महाराज अकबर इतने तेज़ी से दिए हुए उत्तर को सुन कर हक्का-बक्का रह गए और उन्होंने बीरबल की परीक्षा लेने की सोची.

यह भी पढ़ें: अकबर-बीरबल की कहानी: बीरबल की खिचड़ी (Akbar-Birbal Tale: Birbal’s Stew)

Akbar Aur Birbal Ki Kahani

महाराज ने बीरबल से दोबारा सवाल किया- अगर तुम्हारी गणना के अनुसार कौवे ज़्यादा हुए तो?

बिना किसी संकोच के बीरबल बोले, हो सकता है महाराज, किसी पड़ोसी राज्य के कौवे हमारे राज्य में घूमने आये हों.

राजा फिर बोले- और अगर गिनती में कम कौवे हुए तो?

बीरबल ने फिर तपाक से उत्तर दिया- महाराज, हो सकता है हमारे राज्य के कुछ कौवे अपने किसी अन्य राज्यों के रिश्तेदारों के यहां घूमने गए हों.

यह सुन अकबर बेहद ख़ुश हुए, क्योंकि बीरबल ने अपनी चतुराई एक बार फिर साबित कर दी.

सीख: प्रश्‍न भले ही कितने मुश्किल क्यों न हों, बिना घबराई बुद्धि व चतुराई से काम लेना चाहिए. दुनिया का कोई ऐसा सवाल नहीं, जिसका जवाब न हो, बस ज़रूरत है, विवेक, धैर्य व बुद्धि की.

यह भी पढ़ें: पंचतंत्र की कहानी: जादुई चक्की (Panchtantra Story: The Magic Mill)

तेनालीराम और मूर्ख चोर (Tenali Rama And Foolish Thieves)

Tenali Rama Story

तेनालीराम और मूर्ख चोर (Tenali Rama And Foolish Thieves)

एक बार विजय नगर में बहुत अधिक गर्मी पड़ी. ऐसी भीषण गर्मी कि सूखे की नौबत आ गई. नदियों और तालाबों का जल स्तर घट गया. तेनालीराम के घर के पीछे भी एक बड़ा बाग था, जो सूखता जा रहा था. उसके बाग के बीच में एक कुआं था, मगर उसका पानी इतना नीचे चला गया था कि दो बाल्टी जल खींचना भी बेहद मुश्किल लग रहा था.

तेनालीराम को बाग की चिंता सताने लगी. एक शाम तेनालीराम अपने बेटे के साथ बाग का निरीक्षण कर रहा था और सिंचाई के विषय में ही बात कर रहा था. वो सोच रहा था कि सिंचाई के लिए मज़दूर को लगाया जाए या नहीं, लेकिन मज़दूर लगाएंगे, तो ख़र्चा भी बहुत अधिक होगा. इतने में ही उसकी नज़र तीन-चार व्यक्तियों पर पड़ी जो सड़क के दूसरी पार एक वृक्ष के नीचे खड़े उसके मकान की ओर देख रहे थे और फिर एक-दूसरे से संकेत व इशारों में कुछ बात कर रहे थे.

तेनालीराम को समझते देर नहीं लगी कि ये सेंधमार हैं और चोरी करने के इरादे से ही उसके मकान का मुआयना कर रहे हैं. तेनालीराम के मस्तिष्क में बाग की सिंचाई की एक युक्ति आ गई. उसने ऊंची आवाज़ में अपने पुत्र से कहा: बेटे! सूखे के दिन हैं. चोर-डाकू बहुत घूम रहे हैं. गहनों और अशर्फियों का वह संदूक घर में रखना ठीक नहीं. आओ, उस संदूक को उठाकर इस कुएं में डाल दें, ताकि कोई चुरा न सके.

अपनी बात कहकर तेनालीराम बेटे के साथ घर के भीतर चला गया. मन ही मन में वह कह रहा था… आज इन चोरों को ढंग का कुछ काम करने का मौका मिलेगा. अपने बाग की सिंचाई भी हो जाएगी. बाप-बेटे ने मिलकर एक सन्दूक में कंकर-पत्थर भरे और उसे उठाकर कुएं में फेंक दिया.

यह भी पढ़ें: पंचतंत्र की कहानी: जादुई चक्की (Panchtantra Story: The Magic Mill)

तेनालीराम फिर ऊंचे स्वर में बोला, अब हमारा धन सुरक्षित है. उधर घर के पिछवाड़े खड़े चोर मन ही मन मुस्कराए. लोग तो व्यर्थ ही तेनालीराम को चतुर कहते हैं. यह तो निरा मूर्ख है. इतना भी नहीं जानता कि दीवारों के भी कान होते हैं. एक चोर ने अपने साथी से कहा: आओ चलें, आज रात इसका सारा खज़ाना हमारे कब्ज़े में होगा.

रात हुई और चोर अपनी योजना को अंजाम देने आए. वे बाल्टी भर-भर कुएं से पानी निकलते और धरती पर उड़ेल देते. उधर, तेनालीराम और उसका पुत्र पानी को क्यारियों की ओर करने के लिए खुरपी से नालियां बनाने लगे.

उन्हें पानी निकालते-निकालते सुबह के चार बज गए, तब कहीं जाकर संदूक का एक कोना दिखाई दिया. बस, फिर क्या था, उन्होंने कांटा डालकर संदूक बाहर खींचा और जल्दी से उसे खोला, तो यह देखकर हक्के-बक्के रह गए कि उसमें पत्थर भरे थे.

अब तो चोर सिर पर पैर रखकर भागे कि मूर्ख तो बन ही चुके हैं, अब कहीं पकड़े न जाएं. दूसरे दिन जब तेनालीराम ने यह बात महाराज को बताई तो वे खूब हंसे और बोले: कभी-कभी ऐसा भी होता है कि मेहनत तो कोई करता है और फल कोई और ही खाता है.

यह भी पढ़ें: पंचतंत्र की कहानी: तीन काम (Panchtantra Story:Three Tasks)

पंचतंत्र की कहानी: जादुई चक्की (Panchtantra Story: The Magic Mill)

Panchtantra Story
पंचतंत्र की कहानी: जादुई चक्की (Panchtantra Story: The Magic Mill)

आज के हाईटेक युग में जब बच्चों को हर जानकारी कंप्यूटर/इंटरनेट पर ही मिल रही है, उनका पैरेंट्स से जुड़ाव कम हो रहा है. साथ ही उन्हें मोरल वैल्यूज़ (Moral Values) भी पता नहीं चल पाती, ऐसे में बेड टाइम स्टोरीज़ (Bed Time Stories) जैसे- पंचतंत्र (Panchtantra) की सीख देने वाली पॉप्युलर कहानियों के ज़रिए न स़िर्फ आपकी बच्चे से बॉन्डिंग स्ट्रॉन्ग होगी, बल्कि उन्हें अच्छी बातें भी पता चलती हैं.

एक गांव में दो भाई रहते थे. बड़ा भाई बेहद अमीर था और छोटा उतना ही ग़रीब. दिवाली के दिन पूरा गांव ख़ुश था. लेकिन छोटा भाई दुखी था, क्योंकि उसके परिवार के पास तो खाने को भी कुछ नहीं था. वो मदद मांगने अपने भाई के पास गया, पर भाई ने दुत्कार दिया. वो दुखी मन से वापस आने लगा, तो रास्ते में एक बूढ़ा व्यक्ति मिला. उसने कहा कि इतने दुखी क्यों हो, आज तो दिवाली है. ख़ुशियों को त्योहार. इस पर छोटे भाई ने अपनी व्यथा सुनाई.

बूढ़े व्यक्ति ने कहा कि तुम मेरा ये लकड़ियों का ढेर अगर मेरे घर तक पहुंचा दो, तो मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूं और तुम्हें अमीर बना सकता हूं. छोटा भाई मान गया और घर पहुंचने पर बूढ़े व्यक्ति ने उसे एक मालपुआ देकर कहा कि ये जंगल में लेकर जाओ. वहां तुम्हें तीन अजीब पेड़ दिखेंगे, जिसके पास एक चट्टान होगी. चट्टान के कोने में एक गुफा नज़र आएगी. उस गुफा में जाओगे, तो तुम्हें तीन बौने मिलेंगे. ये मालपुआ उन्हें देना, क्योंकि उनको यह बेहद पसंद है और इसके लिए वो हर क़ीमत चुकाने को तैयार होंगे, पर तुम उनसे धन मत मांगना. तुम कहना कि मुझे पत्थर की चक्की दे दो.

यह भी पढ़ें: पंचतंत्र की कहानी: दो दोस्त और बोलनेवाला पेड़ (Panchtantra Story: Two Friends And A Talking Tree)

Panchtantra Story

छोटे भाई ने वैसा ही किया, जैसा बूढ़े व्यक्ति ने कहा. चक्की लेकर जब छोटा बाहर जाने लगा, तब एक बौने ने कहा कि यह कोई मामूली चक्की नहीं है. इसे चलाने पर तुम जो मांगोगे वो मिलेगा. इच्छा पूरी होने पर इस पर लाल कपड़ा डाल देना, सामान निकलना बंद हो जाएगा.

छोटा घर पहुंचा, तो उसने चक्की को आज़माया. उसने चावल मांगा, फिर दाल मांगी… इस तरह खाने का ढेरों सामान उसे मिल गया, जिससे परिवार की भूख मिट गई. लाल कपड़े से चक्की को ढंककर वो चैन की नींद सो गया.

चक्की से निकला जो भी सामान बचा, उसे वो अगले दिन बाज़ार जाकर बेच आया. इस तरह से वो कुछ न कुछ सामान चक्की से निकालकर बाज़ार में बेच आता, कभी बादाम, कभी घी, नमक, मसाले, कपास आदि. देखते ही देखते वो बेहद अमीर हो गया.

उसकी तऱक्क़ी देखकर उसका बड़ा भाई जलने लगा. उसने सोचा कैसे ये इतना अमीर हो गया? एक रात वो छोटे के घर में छिप गया और उसने उस चक्की को देख लिया.

Panchtantra Story
अगले दिन जब छोटा बाज़ार गया था, तो बड़े ने चालाकी से घर में घुसकर चक्की को चुरा लिया. उसने सोचा वो यह गांव छोड़कर दूर जा बसेगा, क्योंकि उसके हाथ ख़ज़ाना जो लग गया. वो जल्दबाज़ी में सब कुछ छोड़कर परिवार सहित भागने लगा. समंदर पर जाकर एक नाव में सवार हुआ, तो पत्नी ने पूछा कि यह सब क्या है. पत्नी को दिखाने के लिए उसने चक्की को कहा कि चक्की नमक निकाल. नमक निकलता गया. चूंकि बड़े भाई को चक्की को बंद करना नहीं आता था, तो नमक के बोझ से नाव सहित पूरा परिवार ही डूब गया. कहते हैं कि वो चक्की अब भी चल रही है, इसीलिए समंदर का पानी खारा है.

सीख: लालच और ईर्ष्या बुरी बला है.

यह भी पढ़ें: विक्रम-बेताल की कहानी- पति कौन? (Vikram-Baital Story- The Groom)

पंचतंत्र की कहानी: तीन काम (Panchtantra Story:Three Tasks)

Panchtantra Story
पंचतंत्र की कहानी: तीन काम (Panchtantra Story:Three Tasks)

आज के हाईटेक युग में जब बच्चों को हर जानकारी कंप्यूटर/इंटरनेट पर ही मिल रही है, उनका पैरेंट्स से जुड़ाव कम हो रहा है. साथ ही उन्हें मोरल वैल्यूज़ (Moral Values) भी पता नहीं चल पाती, ऐसे में बेड टाइम स्टोरीज़ (Bed Time Stories) जैसे- पंचतंत्र (Panchtantra) की सीख देने वाली पॉप्युलर कहानियों के ज़रिए न स़िर्फ आपकी बच्चे से बॉन्डिंग स्ट्रॉन्ग होगी, बल्कि उन्हें अच्छी बातें भी पता चलती हैं.

एक बार दो गरीब दोस्त एक सेठ के पास काम मांगने जाते हैं. कंजूस सेठ उन्हें फ़ौरन काम पर रख लेता है और पूरे साल काम करने पर साल के अंत में दोनों को 12-12 स्वर्ण मुद्राएं देने का वचन देता है. साथ ही सेठ यह भी शर्त रखता है कि अगर उन्होंने काम ठीक से नहीं किया या किसी आदेश का पालन ठीक से नहीं किया, तो उस एक गलती के बदले 4 सुवर्ण मुद्राएं वो उनकी तनख्वाह से काट लेगा.

दोनों दोस्त सेठ की शर्त मान जाते हैं और पूरे साल कड़ी मेहनत करते हैं. दौड़-दौड़कर सारे काम करते और सेठ के हर आदेश का पालन करते. इस तरह पूरा साल बीत गया. दोनों सेठ के पास 12-12 स्वर्ण मुद्राएं मांगने जाते हैं, पर सेठ बोलता है कि अभी साल का आखरी दिन पूरा नहीं हुआ है और मुझे तुम दोनों से आज ही तीन और काम करवाने हैं. दोनों हैरान थे, पर क्या कर सकते थे. सेठ ने तीन काम बताने शुरू किए-

पहला काम: छोटी सुराही में बड़ी सुराही डालकर दिखाओ.
दूसरा काम: दुकान में पड़े गीले अनाज को बिना बाहर निकाले सुखाओ.
तीसरा काम: मेरे सर का सही-सही वज़न बताओ.
यह तो असंभव है… उन दोनों ने सेठ से कहा.

यह भी पढ़ें: तेनालीरामा की कहानी: रसगुुल्ले की जड़

सेठ की चालकी काम कर गई, उसने कहा कि ठीक है तो फिर यहां से चले जाओ. इन तीन कामों को ना कर पाने के कारण मैं हर एक काम के लिए 4 स्वर्ण मुद्राएं काट रहा हूं. मक्कार सेठ की इस धोखाधड़ी से उदास हो कर दोनों दोस्त बोझिल मन से जाने लगते हैं. उन्हें रास्ते में एक चतुर पंडित मिलता है. उनके ऐसे चेहरे देखकर पंडित उनसे उनकी उदासी का कारण पूछता है और पूरी बात समझने के बाद उन्हें वापस सेठ पास भेजता है.

दोनों सेठ के पास पहुंचकर बोलते हैं, सेठजी अभी आधा दिन बाकी है, हम आपके तीनों काम कर देते हैं.

सेठ हैरान था, पर सोचा कि उसका क्या बिगड़ेगा. वो तीनों दुकान में जाते हैं. दोनों दोस्त अपना काम शुरू कर देते हैं. वो बड़ी सुराही को तोड़-तोड़कर उसके टुकड़े कर देते हैं और उन्हें छोटी के अन्दर डाल देते हैं. सेठ मन मसोसकर रह जाता है, पर कुछ कर नहीं पाता है.

इसके बाद दोनों गीले अनाज को दुकान के अन्दर फैला देते हैं, तो सेठ बोल पड़ता है कि स़िर्फ फैलाने से ये कैसे सूखेगा? इसके लिए तो धूप और हवा चाहिए, सेठ मुस्कुराते हुए कहता है.

देखते जाइए, ऐसा कहते हुए दोनों मित्र हथौड़ा उठा आगे बढ़ जाते हैं और दुकान की दीवार और छत तोड़ डालते हैं, जिससे वहां हवा और धूप दोनों आने लगती है.

क्रोधित मित्रों को सेठ और उसके आदमी देखते रह जाते हैं, पर किसी की भी उन्हें रोकने की हिम्मत नहीं होती.

अब आख़िरी काम बचा होता है, दोनों मित्र तलवार लेकर सेठ के सामने खड़े हो जाते हैं और कहते हैं, मालिक आपके सिर का सही-सही वज़न तौलने के लिए इसे धड़ से अलग करना होगा. कृपया बिना हिले स्थिर खड़े रहें.

अब सेठ को समझ आ जाता है कि वह ग़रीबों का हक इस तरह से नहीं मार सकता और बिना आनाकानी के वह उन दोनों को 12-12 स्वर्ण मुद्राएं सौंप देता है.

सीख: बेईमानी का फल हमेशा बुरा ही होता है.

यह भी पढ़ें: विक्रम-बेताल की कहानी- पति कौन?

तेनालीरामा की कहानी: रसगुुल्ले की जड़ (Tenali Rama Story: Root Of Rassagulla)

Tenali Rama Story, Root Of Rassagulla
Tenali Rama Story, Root Of Rassagulla
तेनालीरामा की कहानी: रसगुुल्ले की जड़ (Tenali Rama Story: Root Of Rassagulla)

बच्चों को हमेशा से ही प्रेरणादायक कहानियां (Motivational Stories) घर के बड़े-बुज़ुर्ग सुनाते आए हैं, जिनमें प्रमुख होती हैं तेनालीरामा (TenaliRama), पंचतंत्र (Panchtantra Talses) की कहानियां, फेयरी टेल्स (Fairy Tales), ऐसी किड्स स्टोरी (Kids Story) उन्हें सही-सच्ची सीख (Motivation-Inspiration) देती है और जीवन में सही दिशा भी.

एक बार मध्य पूर्वी देश से एक व्यापारी महाराज कृष्णदेव राय का अतिथि बनकर आया. महाराज ने उसके स्वागत में कोई कसर नहीं छोड़ी, क्योंकि अपने अतिथि का सत्कार वो हमेशा ही बड़े भव्य तरीके से करते हैं.

एक दिन भोजन पर महाराज का रसोइया व्यापारी के लिए स्वदिष्ट रसगुल्ले बनाकर लता है. व्यापारी कहता है कि उसे रसगुल्ले नहीं खाने हैं, पर हो सके तो उन्हें इस बात की जानकारी ज़रूर दी जाए कि दरअसल रसगुल्ले की जड़ क्या है?

रसोइया बेचारा सोच में पड़ जाता है और महाराज कृष्णदेव राय के पास जाकर उस व्यापारी की मांग बताता है. महाराज रसगुल्ले की जड़ पकड़ने के लिए चतुर तेनालीराम को बुलाते हैं, क्योंकि उन्हें भी पता है कि तेनालीरामा के पास हर सवाल का जवाब होता है.
तेनालीराम रसगुल्ले की जड़ खोजने की चुनौती का प्रस्ताव स्वीकार कर लेते हैं. वह एक खाली कटोरे और धारदार छुरी की मांग करते हैं और महाराज से एक दिन का समय मांगते हैं.

यह भी पढ़ें: पंचतंत्र की कहानी: वंश की रक्षा

Tenali Rama Story, Root Of Rassagulla

अगले दिन रसगुल्ले की जड़ से भरे कटोरे को मलमल के कपड़े से ढककर दरबार में बैठे व्यापारी को देते हैं और उसे कपड़ा हटाकर रसगुल्ले की जड़ देखने को कहते हैं. व्यापारी जैसे ही कपड़ा हटाता है, तो कटोरे में गन्ने के टुकड़े देखकर हैरान हो जाता है और सारे दरबारी तथा महाराज कृष्णदेव राय, तेनालीराम से पूछते हैं कि यह सब क्या है?

तेनालीराम समझाते हैं कि हर मिठाई शक्कर से बनती है और शक्कर का स्रोत गन्ना होता है, इसलिए रसगुल्ले की जड़ गन्ना है. तेनालीराम के इस गणित से सारे दरबारी, व्यापारी और महाराज भी बेहद प्रभावित हो जाते हैं. तेनालीराम के तर्क से सहमत भी होते हैं और सभी हंस पड़ते हैं.

यह भी पढ़ें: पंचतंत्र की कहानी: मूर्ख ब्राह्मण और तीन ठग

पंचतंत्र की कहानी: वंश की रक्षा (Panchtantra Ki Kahani: Frogs That Rode A Snake)

Panchtantra Ki Kahani

आज के हाईटेक युग में जब बच्चों को हर जानकारी कंप्यूटर/इंटरनेट पर ही मिल रही है, उनका पैरेंट्स से जुड़ाव कम हो रहा है. साथ ही उन्हें मोरल वैल्यूज़ (Moral Values) भी पता नहीं चल पाती, ऐसे में बेड टाइम स्टोरीज़ (Bed Time Stories) जैसे- पंचतंत्र (Panchtantra) की सीख देने वाली पॉप्युलर कहानियों के ज़रिए न स़िर्फ आपकी बच्चे से बॉन्डिंग स्ट्रॉन्ग होगी, बल्कि उन्हें अच्छी बातें भी पता चलती हैं.

Panchtantra Ki Kahani

पंचतंत्र की कहानी: वंश की रक्षा (Panchtantra Ki Kahani: Frogs That Rode A Snake)

एक पर्वत प्रदेश में मन्दविष नाम का एक बूढ़ा सांप रहता था. एक दिन वह विचार करने लगा कि ऐसा क्या उपाय हो सकता है, जिससे बिना परिश्रम किए ही उसकी आजीविका चलती रहे. उसने बहुत सोचा और उसके मन में एक विचार आया.
वह पास के मेंढकों से भरे तालाब के पास चला गया. वहां पहुंचकर वह बड़ी बेचैनी से इधर-उधर घूमने लगा. उसे घूमते देखकर तालाब के किनारे एक पत्थर पर बैठे मेंढक को आश्‍चर्य हुआ तो उसने पूछा, “आज क्या बात है मामा? शाम हो गई है, पर तुम भोजन-पानी की व्यवस्था नहीं कर रहे हो?”

Panchtantra Ki Kahani
सांप बड़े दुखी मन से कहने लगा, “क्या करूं बेटा, अब मैं बूढ़ा हो चला हूं. मुझे तो अब भोजन की अभिलाषा ही नहीं रह गई है. आज सवेरे ही मैं भोजन की खोज में निकल पड़ा था. एक सरोवर के तट पर मैंने एक मेंढक को देखा. मैं उसको पकड़ने की सोच ही रहा था कि उसने मुझे देख लिया. पास ही कुछ ब्राह्मण तपस्या में लीन थे, वह उनके बीच जाकर कहीं छिप गया. उसको तो मैंने फिर देखा नहीं, पर उसके भ्रम में मैंने एक ब्राह्मण के पुत्र को काट लिया, जिससे उसकी तत्काल मृत्यु हो गई. उसके पिता को इसका बड़ा दुख हुआ और उस शोकाकुल पिता ने मुझे शाप देते हुए कहा, “दुष्ट सांप! तुमने मेरे पुत्र को बिना किसी अपराध के काटा है, अपने इस अपराध के कारण तुमको मेंढकों का वाहन बनना पड़ेगा.”

Panchtantra Ki Kahani

मैं बस अपने पाप का प्रायश्‍चित करना चाहता हूं और तुम लोगों के वाहन बनने के उद्देश्य से ही मैं यहां तुम लोगों के पास आया हूं.
मेंढक सांप से यह बात सुनकर अपने परिजनों के पास गया और उनको भी उसने सांप की वह बात बता दी. इस तरह से यह बात सब मेढकों तक पहुंच गई.

Panchtantra Ki Kahani

उनके राजा जलपाद को भी इसकी ख़बर लगी. उसको यह सुनकर बड़ा आश्‍चर्य हुआ. सबसे पहले वही सांप के पास जाकर उसके फन पर चढ़कर बैठ गया. उसे चढ़ा हुआ देखकर अन्य सभी मेंढक उसकी पीठ पर चढ़ गए. सांप ने किसी को कुछ नहीं कहा.

Panchtantra Ki Kahani

यह भी पढ़ें: पंचतंत्र की कहानी: दो सांपों की कहानी 

मन्दविष ने उन्हें तरह-तरह के करतब दिखाए. सांप की कोमल त्वचा का स्पर्श पाकर जलपाद तो बहुत ही प्रसन्न हुआ. इस प्रकार एक दिन निकल गया.

Panchtantra Ki Kahani

दूसरे दिन जब वह उनको बैठाकर चला, तो उससे चला नहीं गया.  उसको देखकर जलपाद ने पूछा, “क्या बात है, आज आप चल नहीं पा रहे हैं?”
“हां, मैं आज भूखा हूं और इस उम्र में कमज़ोरी भी बहुत हो जाती है, इसलिए चलने में कठिनाई हो रही है.”

जलपाद बोला, “अगर ऐसी बात है, तो आप परेशना न हों. आप आराम से साधारण कोटि के छोटे-मोटे मेंढकों को खा लिया कीजिए और अपनी भूख मिटा लिया कीजिए.”

Panchtantra Ki Kahani
इस प्रकार वह सांप अब रोज़ बिना किसी परिश्रम के अपना भोजन करने लगा. किन्तु वह जलपाद यह भी नहीं समझ पाया कि अपने क्षणिक सुख के लिए वह अपने वंश का नाश करने का भागी बन रहा है. धीरे-धीरे सांप ने अपनी चालाकी से सभी मेंढकों को खा लिया और उसके बाद एक दिन जलपाद को भी खा गया. इस तरह मेंढकों का पूरा वंश ही नष्ट हो गया.

 

सीख: अपने हितैषियों की रक्षा करने से हमारी भी रक्षा होती है.

यह भी पढ़ें: पंचतंत्र की कहानी: लालची कुत्ता

कहानी- आख़िरकार (Short Story- Aakhirkar)

Short Story, Aakhirkar, hindi short stories, hindi short story

 Short Story, Aakhirkar, hindi short stories, hindi short story

”शायद तुम ठीक कहती हो. अब ज़िंदगी आराम की रहेगी. आख़िर तुम्हारी तो पूरी ज़िंदगी ही एक रिटायर्ड लाइफ़ रही है. एक हाउसवाइफ़ की ज़िंदगी तो होती ही रिटायर्ड लाइफ़ है, आराम की ज़िंदगी…” प्रभात पता नहीं और क्या-क्या कहते जा रहे थे, पर दया के कान अब आगे कुछ सुन नहीं पा रहे थे. कॉफी का प्याला वैसे ही हाथ में रह गया था. मुंह का स्वाद भी कसैला हो गया था. एक ही शब्द कानों में गूंज रहा था, ‘रिटायर्ड लाइफ़’. क्या पूरी ज़िंदगी में उसकी बस एक यही उपलब्धि रही है?

सामने के फ़्लैट में रहनेवाली श्यामली से दया का मिलना तो कम हो पाता था, लेकिन दया का उसकी हर गतिविधि पर ध्यान जाने-अनजाने चला ही जाता था. दोनों के घर की रसोई की खिड़कियां आमने-सामने ही पड़ती थीं, तभी तो श्यामली कई बार मज़ाक में कह भी चुकी थी, “लगता है आपका सारा दिन रसोईघर में ही बीतता है.” सुनकर दया चुप रह जाती.
यूं देखा जाए, तो दोनों की दिनचर्या में भी काफ़ी अंतर था. श्यामली बैंक में काम करती थी. पति अक्सर दौरे पर रहते थे और बच्चे बाहर हॉस्टल में थे. श्यामली का क्या, थोड़ा-बहुत कच्चा-पक्का बना लिया और कभी मूड नहीं हुआ, तो बाहर से कुछ मंगा लिया, पर दया… वह तो जब से ब्याहकर इस घर में आई थी, तभी से अधिकांश समय रसोईघर में ही बीता. तब तो भरा-पूरा ससुराल था. सब साथ रहते थे और वह थी घर की बड़ी बहू.
आज भी जब कभी वे दिन याद आते हैं, तो वह सोचती है कि कितना कुछ बदलाव आया था उसके व्यक्तित्व में इस घर में आकर.
बेटी रीना उस दिन पूछ रही थी, “मम्मी, आप क्या बचपन से ही इतनी अच्छी कुकिंग करती थीं? मुझसे तो अब तक गोल रोटी भी नहीं बन पाती है.”
“हूं… बचपन… तब कहां कुछ आता था? छोटा-सा परिवार था. मां-बाबूजी और बस दो भाई-बहन.”
बी.ए. करने के बाद उसकी बहुत इच्छा थी आगे और पढ़ने की, पर परिस्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि जल्दी शादी हो गई. ससुराल आकर देखा, सास तो घर के हर कामकाज में पारंगत थीं, पर ससुराल के इस पारंपरिक वातावरण में सामंजस्य बैठाना उसे काफ़ी मुश्किल लगा था. चूल्हा छुआई की रस्म तो ख़ैर जैसे-तैसे हो गई, पर जब कुछ दिनों बाद ननद प्रभा ने आदेश दिया कि अब सुबह की चाय भाभी बनाएंगी तो वह चौंक ही गई थी. कम से कम पच्चीस-तीस लोग तो होंगे ही उस समय घर में. और तब तक तो उस घर में गैस भी नहीं आई थी. उसने तो अब तक अपने घर में ज़्यादा से ज़्यादा चार-पांच लोगों की चाय बनाई होगी. चूल्हे पर काम करने की भी आदत नहीं थी. ख़ैर, चूल्हा तो प्रभा ने जला दिया था, पर जब वह भगौने में पानी कप से नापकर डालने लगी तो प्रभा हंसी थी.
“भाभी, कहां तक नापोगी? पूरा भगौना भरकर चढ़ा दो.”
फिर जब शक्कर के नाप के लिए चम्मच टटोलने लगी, तो प्रभा फिर हंसी थी.

यह भी पढ़ें: जीवन में ख़ुशियों के रंग भरें 
“अरे भाभी, ये जो शक्कर के डिब्बे में बड़ा-सा कटोरा है न, भरकर डाल देना और हां, चाय के डिब्बे में भी एक छोटी कटोरी है, वही नाप है.”
प्रभा ही थी, जो उस समय हर काम में उसकी मदद कर देती थी, सब्ज़ी के तेल- मसाले से लेकर रोटी और परांठे के आटे तक का नाप-तौल वही बताती रहती. फिर तो काम करते-करते उसकी भी आदत हो गई थी.
सास ने तो सिलाई, बुनाई, अचार, पापड़ तक घर के सारे काम सिखाए थे और कब वह एक अल्हड़ लड़की से एक कुशल गृहिणी बन गई, वह स्वयं भी नहीं समझ पाई थी.
धीरे-धीरे संयुक्त परिवार से वे लोग एकल परिवार हो गए. बच्चे भी अब बड़े होने लगे थे, पर घर को सुव्यवस्थित रखने, सुचारु रूप से चलाने में ही उसका पूरा दिन खप जाता था. मेहमानों की आवाजाही भी बनी ही रहती थी.
पति प्रभात तो शुरू से ही कम बोलते थे और अधिक टोका-टोकी भी नहीं करते थे. फिर भी कई बार वह महसूस करती कि अन्य कामकाजी महिलाओं को देखकर शायद वे भी कामकाजी पत्नी की ही कामना करते होंगे. घर के बढ़ते ख़र्च से बजट भी डगमगाने लगा था. बेटे की कॉलेज की पढ़ाई थी. फिर बेटी रीना की शादी आ गई तो कर्ज़ बढ़ गया था.
तब तो उसने एक बार रीना से कहा भी था, “मैं भी शादी के बाद बी.एड. करके नौकरी कर लेती, तो अच्छा रहता. पैसों की इतनी कमी तो महसूस नहीं होती. अब देख तेरी शादी के बाद अगर छोटा-सा भी फ्लैट लेने की सोचेंगे तो उसके लिए भी भारी कर्ज़ का इंतज़ाम करना होगा.”
“मम्मी…” रीना ने तो तुरंत टोक दिया था. “आप नौकरी करतीं, तो हम भाई-बहन की इतनी अच्छी परवरिश कैसे हो पाती? पापा तो नौकरी के सिलसिले में अक्सर बाहर ही रहते थे. फिर हमें साफ़-सुथरा, सजा-संवरा घर, स्वादिष्ट खाना कैसे मिलता? मुझे तो अब तक याद है कि हम भले ही कितनी देर में घर पहुंचते, आप हमेशा ही हमें गरम-गरम खाना खिलाती थीं. अब मुझे देखो न, दीपू का कहां इतना ध्यान रख पाती हूं. कभी-कभी तो उसे बुखार में भी घर छोड़कर ऑफ़िस जाना पड़ता है.”
“पर रीना, तेरे पापा ने तो शायद ही कभी महसूस किया हो कि घर में रहकर मैंने कभी कोई योगदान दिया है इस गृहस्थी को चलाने में.”
“मम्मी…” रीना ने फिर बात काट दी.
“आप भी कैसी बातें कर रही हो? पापा कब मुंह पर किसी की तारीफ़ करते हैं, पर इसका यह मतलब तो नहीं है कि वे समझते ही नहीं हों कि आपने कितना कुछ किया है? हमारे लिए ही नहीं, पूरे परिवार के लिए भी. यहां तक कि चाचा-बुआ सबके लिए और अभी भी तो करती ही रहती हो. अब जब पापा रिटायर हो जाएंगे, तब ख़ूब समय होगा आप दोनों के पास, ज़िम्मेदारियां भी तब कम हो जाएंगी. तब पापा आपको बता पाएंगे कि कितना योगदान है आपका इस परिवार को बनाने में. आप लोग फिर ख़ूब घूमने जाना, अपना दूसरा हनीमून मनाने.”
दया तब हंसकर रह गई थी.
“बातें बनाना तो कोई तुमसे सीखे.” रीना को हल्की-सी झिड़की भी दी थी उसने.

यह भी पढ़ें: Successful लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप के टॉप सीक्रेट्स 
पर अब तो प्रभात वास्तव में रिटायर होने जा रहे हैं. आज ऑफ़िस का आख़िरी दिन है. पार्टी वगैरह भी है, फिर अगले ह़फ़्ते बच्चे भी आ जाएंगे. पापा का रिटायरमेंट और साठ वर्ष पूरे होने की ख़ुशी दोनों ही साथ मनाने का कार्यक्रम है. सोचती हुई दया बाहर लॉन में आकर बैठ गई थी.
श्यामली भी शायद अभी बैंक से लौटी थी. स्कूटर खड़ा करके अंदर जा रही थी. उसके चेहरे पर मुस्कुराहट थी. जाने-अनजाने पता नहीं क्यों वह अपनी और श्यामली की तुलना करने लगती है. चुस्त, स्मार्ट श्यामली बैंक की नौकरी के बाद भी कितना व़क़्त निकाल लेती है. उस दिन पता नहीं कितने टीवी सीरियल्स की बातें कर रही थी?
“दयाजी, आजकल टीवी पर बहुत अच्छे प्रोग्राम्स आ रहे रहे हैं, आप ज़रूर देखना. कई बार तो बहुत अच्छी फ़िल्में भी आती हैं.”
वह सोचती कि वह तो कभी भी पूरी फ़िल्म देख ही नहीं पाती है. घर-परिवार, मेहमान, घर के कामकाज से मुश्किल से कुछ समय निकालकर अख़बार देख लिया या न्यूज़ सुन ली तो बहुत हो गया.
उसकी ननद, देवर-देवरानी सब यही कहते हैं, “बस भाभी, आप हो तो मायका-ससुराल सब यहीं है हमारा.”
चलो, सबकी अलग-अलग ज़िंदगी और ज़िम्मेदारियां होती हैं, वह क्यों तुलना करे किसी से अपनी. सोचकर उसने फिर आज ख़ुद को समझा लिया था.
प्रभात को भी लौटने में काफ़ी देर हो गई. वह सोच रही थी कि एक कप कॉफी बनाकर पी ले. तभी स्कूटर की आवाज़ सुनाई दी.
‘चलो, ये भी आ गए, अब साथ ही बैठकर कॉफी पी लेंगे.’ सोचते हुए वह रसोईघर में आ गई थी.
प्रभात कपड़े बदलकर सोफे पर आराम से पसर गए थे. वह कॉफी के साथ कुछ बिस्किट्स भी ले आई थी.
“अरे, खाना-पीना तो बहुत हो गया, बस कॉफी ही लूंगा.”
“बहुत थक गए लगते हो?” वह पास आकर बैठ गई थी.
“थका तो नहीं हूं, पर सोच रहा हूं कि कल से करूंगा क्या? बरसों से रोज़ सुबह तैयार होकर ऑफ़िस जाने की आदत रही है, अब घर पर अकेले…”
“क्यों? अकेले क्यों… हम दो तो हैं न. अब बरसों बाद समय मिला है, तो घूमेंगे, कहीं बाहर जाएंगे, अब तो आपकी ज़िम्मेदारियां भी पूरी हो गई हैं.”
दया ने कॉफी का कप आगे बढ़ाया और फिर अपना कप उठाया.
“शायद तुम ठीक कहती हो. अब ज़िंदगी आराम की रहेगी. आख़िर तुम्हारी तो पूरी ज़िंदगी ही एक रिटायर्ड लाइफ़ रही है. एक हाउसवाइफ़ की ज़िंदगी तो होती ही रिटायर्ड लाइफ़ है, आराम की ज़िंदगी…”
प्रभात पता नहीं और क्या-क्या कहते जा रहे थे, पर दया के कान अब आगे कुछ सुन नहीं पा रहे थे. कॉफी का प्याला वैसे ही हाथ में रह गया था. मुंह का स्वाद भी कसैला हो गया था. एक ही शब्द कानों में गूंज रहा था, ‘रिटायर्ड लाइफ़’. क्या पूरी ज़िंदगी में उसकी बस एक यही उपलब्धि रही है? अपने ही ख़यालों में डूबी दया यह सोचती रही…

– डॉ. क्षमा चतुर्वेदी

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORIES

पंचतंत्र की कहानी: दो सांपों की कहानी (Panchtantra Ki Kahani: The Tale Of Two Snakes)

Panchtantra Ki Kahani, The Tale Of Two Snakes

देवशक्ति  नाम का एक राजा था, वो बेहद परेशान था और उसकी परेशानी की वजह थी, उसका बेटा, जो बहुत कमज़ोर था. वह दिन व दिन और कमज़ोर होता जा रहा था.

कई प्रसिद्ध चिकित्सक भी उसे ठीक नहीं कर पा रहे थे. दूर-दराज़ के कई मशहूर चिकित्सकों को भी बुलाया गया, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ, क्योंकि उसके पेट में सांप था.

Panchtantra Ki Kahani, The Tale Of Two Snakes

वह राजकुमार भी अपनी कमज़ोरी और सेहत को लेकर बेहद परेशान था. अपने पिता को दुखी देखकर बहुत निराश भी था. अपनी ज़िंदगी से तंग आकर एक रात वह महल छोड़कर कहीं दूसरे राज्य में चला गया. उसने एक मंदिर में रहना शुरू कर दिया और अन्य लोग जो कुछ भी उसे दान देते थे,  उसी से उसका काम चल रहा था. वो वही खा-पी लेता था.

इस नए राज्य का जो राजा था, उसकी दो जवान बेटियां थीं. वे बेहद अच्छे संस्कारी और ख़ूबसूरत थीं. बेटियों में से एक ने कहा, पिताजी, आपके आशीर्वाद से हमें दुनिया के सभी सुख प्राप्त हैं, वहीं दूसरी बेटी ने कहा इंसान को स़िर्फ अपने कार्यों का ही फल मिलता है. दूसरी बेटी की इस टिप्पणी से राजा क्रोधित हो गया. एक दिन उसने अपने मंत्रियों को बुलाकर कहा कि इसे ले जाओ और इसका महल के बाहर किसी के भी साथ इसका विवाह कर दो. यह अपने कार्यों का फल भोगेगी.

मंत्रियों ने मंदिर में रह रहे युवा राजकुमार से उसका विवाह कर दिया, क्योंकि उन्हें कोई और नहीं मिल रहा था. राजकुमारी अपने पति को भगवान मानती थी. वह ख़ुश थी और अपनी शादी से संतुष्ट थी. उन्होंने देश के एक अलग हिस्से की यात्रा करने का निर्णय लिया, क्योंकि मंदिर में घर बनाना सही नहीं था.

यह भी पढ़ें: Kids Story… उल्लू और बाज़ की कहानी: धोखा 

Panchtantra Ki Kahani, The Tale Of Two Snakes

चलते-चलते राजकुमार थक गया था और एक पेड़ की छाया के नीचे आराम करने लगा. राजकुमारी ने पास के बाज़ार से कुछ भोजन लाने का फैसला किया. जब वह लौटकर आई, तो उसने अपने पति को सोया देखा और पास के एक बिल से उभरते सांप को भी देखा. उसकी नज़र पति के मुख पर गई, तो उसने अपने पति के मुंह से उभरते हुए एक और सांप को देखा. वह छिपकर सब देखने लगी.

पेड़ के पास  के सांप ने दूसरे सांप से कहा,  तुम इस प्यारे राजकुमार को इतना दुःख क्यों दे रहे हो? इस तरह तुम खुद का जीवन खतरे में डाल रहे हो. अगर राजकुमार जीरा और सरसों का गर्म पानी पी लेगा, तो तुम मर जाओगे.

राजकुमार के मुंह के सांप ने कहा, तुम सोने की दो घड़ों की रक्षा अपनी ज़िंदगी को ख़तरे में डालकर भी क्यों करते हैं? इसकी तुमको कोई ज़रूरत नहीं है. अगर किसी ने गर्म पानी और तेल को डाला, तो तुम भी तो मर जाओगे.

बातें करने के बाद, वे अपने-अपने स्थानों के अंदर चले गए, लेकिन राजकुमारी उनके रहस्य जान चुकी थी.

 

Panchtantra Ki Kahani, The Tale Of Two Snakes

यह भी पढ़ें: पंचतंत्र की कहानी: मूर्ख ब्राह्मण और तीन ठग 

उसने जीरा और सरसों का गर्म पानी तैयार करके अपने पति को भोजन के साथ दिया. कुछ ही घंटों में राजकुमार ठीक होना शुरू हो गया और उसकी ऊर्जा व ताकत वापस आ गई. उसके बाद, उसने सांप के बिल में गर्म पानी और तेल डाला और सोने के दो बर्तन ले लिए. वह राजकुमार अब पूरी तरह से ठीक हो गया था और उनके पास दो बर्तन भर सोना भी था. वे दोनों ही ख़ुशी-ख़ुशी से रहने लगे.

सीख: दुश्मनों की लड़ाई में आपको फ़ायदा हो सकता है, इसलिए सतर्क रहें और अपने दुश्मनों पर नज़र रखें.

 

कहानी- सिस्टिन चैपल का वह चित्र (Short Story- Sistine Chapel Ka Woh Chitr)

कहानी, सिस्टिन चैपल का वह चित्र, Short Story, Sistine Chapel Ka Woh Chitr

कहानी, सिस्टिन चैपल का वह चित्र, Short Story, Sistine Chapel Ka Woh Chitr

क्या यह प्यार एकतरफ़ा था? शायद नहीं. यक़ीनन नहीं. मैं सोचती थी मैं अपने मन के नहीं दिमाग़ के आधीन हूं, तार्किक रूप से सोच कर सही और ग़लत की तुला पर तौलकर ही अपने निर्णय लेती हूं. मुझे गर्व था अपने संस्कारों पर. फिर क्यों मुझे रणधीर की आंखों के प्यार का निमंत्रण बुरा नहीं लगा- ग़लत नहीं लगा? लगता है, जैसे मेरे संस्कारों की सुदृढ़ दीवार में कहीं एक बहुत कमज़ोर स्थल था, जिसमें से अनजाने ही प्यार मेरे जीवन में प्रवेश कर गया था.

सुबह दरवाज़ा खोला, तो देखा बरसात हो रही है. सोते में पता ही नहीं चला. पहलेवाले आंगन भी तो नहीं रहे कि बाहर पड़ी बाल्टी, टिन की छत पर टप-टप पड़ती बूंदों की आवाज़ से नींद खुल जाए. चार मंज़िल इमारत की दूसरी मंज़िल पर मानो किसी बक्से में बना हो फ्लैट, चाहे तो घुटन महसूस करो, चाहे सुरक्षित. कड़ी ठंड के बावजूद चाय बनाकर बालकनी में आ बैठी. छुट्टी का दिन है. न कहीं जाना है, न किसी के आने की उम्मीद ही है. कामवाली बाई के सिवा आता भी कौन है यहां और आज तो न आने का उसके पास अच्छा बहाना है.
हर रोज़ इस समय सामनेवाले पार्क में लोग टहल रहे होते हैं, व्यायाम और योग हो रहा होता है. सड़क पर भी चहल-पहल प्रारंभ हो जाती है. परंतु आज तो सब वीरान है ठीक मेरे घर की ही मानिंद. मानो मैं अकेली ही बच गई हूं सारी सृष्टि में और मुझे अकेली पा मन के भीतर से ही चेहरे निकल-निकलकर और अपना वास्तविक रूप धारण कर मेरे चारों ओर जुटे हैं.
हू-ब-हू वैसे ही जैसे बरसों से उन्हें जानती थी. सच है हमारे पास स़िफर्र् वही लोग नहीं होते, जिन्हें हम देख और छू सकते हैं. बीते जीवन के अनेक संगी-साथी हमारे जीवन में रचे-बसे रहते हैं- अपनी आवाज़ और भाव-भंगिमाओं समेत- किसी अविभाज्य अंग की तरह ही. कुछ अजब संबंध है बारिश से मेरा, अजब सम्मोहन… बरसात होने पर न कुछ काम कर पाती हूं, न सो ही पाती हूं. घंटों बैठी बारिश को ही देखती रहती हूं. प्रकृति की अनुपम देन- बादलों से चूकर आती ये बूंदें. कभी कोमल और धीमी तन सहलाती-सी. कभी क्रोधित अपना प्रचंड रूप दिखाती, जीवनदायिनी भी, प्रलयकारी भी.
ज़िंदगी बदलती तो है, पर क्या इतना भी बदल सकती है- नहीं जानती थी. वह भी तो एक ऐसी ही बरसती शाम थी जब मैं उस बड़े-से होटल से बाहर आई थी. रणधीर की मांजी ने तो कहा भी था कि टैक्सी बुला देती हूं. मैंने ही मना कर दिया, “मैं स्वयं चली जाऊंगी.” मैंने बहुत आत्मविश्‍वास के साथ कहा था. बसों में सफ़र करने की ही आदी थी मैं. पर पांच सितारा उस होटल के आसपास तो क्या, दूर-दूर तक कोई बस स्टॉप नहीं दिखा. सही है पांच सितारा होटल के पास बस स्टॉप का क्या काम? आकाश एक सार स्लेटी रंग का हो रहा था और जल्द बारिश रुकने की कोई उम्मीद न थी. चलते-चलते थक गई, तो राह में आए एक बगीचे में जा बैठी. धीमी-धीमी बारिश हो रही थी. तन सहलाती-सी. चोट पर मरहम लगाती-सी. परंतु जब कांटा भीतर धंसा हो और ज़ख़्म ताज़ा हो, तो सहलाने से पीड़ा और अधिक होती है. वीरान बगीचे में बहुत देर बैठना भी सही नहीं लगा और घर जाने को भी मन नहीं था.

यह भी पढ़ें: कितने दानी हैं आप?
रणधीर से मेरा परिचय मेरे छोटे भाई अनीश के कारण था और उन दोनों को एक सूत्र में बांधता था उनका क्रिकेट प्रेम, जुनून कहना अधिक उपयुक्त होगा. हमारे घर के ठीक सामने पड़ता था शिवाजी पार्क, जहां हर शाम क्रिकेट खेला जाता और हमारा घर शाम भर के लिए उसी पार्क का हिस्सा बन जाता. कभी क्रिकेट का सामान रखने-उठाने, कभी पानी पीने लड़के हमारे घर आते-जाते रहते. इसी टीम का कप्तान था रणधीर सिंह. गेहुंआ रंग, लंबा-चौड़ा अपने साथियों से पूरा सिर ऊपर उठता हुआ. गेंद फेंकने के अपने अंदाज़ से जाना जाता था. मेरा भाई था तो दुबला-पतला और ठिगना, परंतु ग़ज़ब की फुर्ती थी उसमें. यूं हमारे घर के सभी लोग नाज़ुक बदन ही थे. मैं जब कॉलेज में पढ़ रही थी, तब भी अनेक लोग मुझे स्कूली छात्रा ही समझते रहे.
मां का नौकरी करना उनका शौक़ या अस्मिता की तलाश जैसी बात नहीं थी अपितु बच्चों को अच्छी शिक्षा एवं कुछ सुविधाओं की मूलभूत ज़रूरतें ही पूरीे हो पातीं. अतः मां के नौकरी करने की आवश्यकता महसूस की गई. उन्होंने बीए कर रखा था और पढ़ाने के लिए बीएड करना अनिवार्य था. मैं तब दो वर्ष की रही होऊंगी, जब मां ने पढ़ाई शुरू की. मुझे व्यस्त रखने के लिए वह मेरे हाथ में चित्रों की कोई क़िताब पकड़ा देतीं. उन्होंने पढ़ाना प्रारंभ किया, तो मेरा दाख़िला भी उसी स्कूल में करवा दिया. आना-जाना संग हो जाता, परंतु लौटकर उन्हें ढेरों काम करने होते. मेरा साथ तो पुस्तकों से ही जुड़ा रहा. फ़र्क़ बस इतना पड़ा कि फोटोवाली क़िताबों की जगह कहानियोंवाली क़िताबों ने ले ली.
अनीश के जन्म के समय पहले मां छुट्टी पर थीं, फिर नानी आकर रहीं. मैं कुछ बड़ी हुई, तो घर की देखभाल की कमान मैंने संभाल ली. मां इधर से निश्‍चिंत स्कूल की अन्य गतिविधियों में व्यस्त हो गईर्ं. कभी वार्षिकोत्सव, कभी कोई प्रोजेक्ट और कभी जांचने के लिए परीक्षा-पत्रों का बड़ा-सा बंडल. अनीश तो स्कूल से आते ही खेलने भाग जाता. उसके लिए पढ़ना एक मजबूरी थी. असली शौक़ तो क्रिकेट ही था.
एक दिन इन लोगों का क्रिकेट शुरू होते ही बारिश शुरू हो गई. आसपासवाले लड़के तो अपने-अपने घरों को भाग गए, दूरवाले भीगे हुए हमारे घर आन पहुंचे. चाय को मैंने पूछा, तो मना कर दिया, परंतु उनके चेहरे कुछ और कह रहे थे. मैंने मसालेदार चाय बनाकर सब को पिलाई. रणधीर को बहुत पसंद आई. डरते-डरते बोला, “और मिलेगी क्या?”
उनका इतना सामान पड़ा रहता स्टोर में कि हमारे घुसने तक की जगह न बचती. दूर रहनेवाले लड़कों के तो लेग पैड्स, ग्लव्ज़ तक रखे होते. अधिकतर तो रणधीर ही आता लेने और फिर संभालकर रखने के लिए. रखते समय उसके चेहरे पर अपराधबोध-सा कुछ रहता. कहता, “छोटा-सा स्टोर है, जिसमें आधा तो हमने ही घेर रखा है.” मैं कुछ पढ़ रही होती, तो उसमें रुचि लेता. देशी-विदेशी साहित्य के अलावा मैं अन्य देशों के बारे में, वहां की संस्कृति और कला के बारे में भी पढ़ा करती थी. रणधीर ने कई देश देख रहे थे, सो वह उनके बारे में मुझे बताता. एक बार बोला, “हमारे घर में तो पढ़ने को कोई महत्व ही नहीं देता. लड़कियों को
गहने-कपड़ों के अलावा और कोई शौक़ नहीं. विदेश घूमने भी जाएंगे, तो पुरुष व्यापार बढ़ाने के लिए और स्त्रियां स़िर्फ बाज़ारों में घूमने की ख़ातिर.” शुरू में तो मैं रणधीर से बात करने में थोड़ा हिचकिचाती थी, फिर मन को समझाया कि छोटे भाई का दोस्त ही तो है, वह भी इतना सुसंस्कृत और शालीन स्वभाव का.

यह भी पढ़ें: क्या है आपकी ख़ुशी का पासवर्ड? 
धीरे-धीरे वह बहुत अपना-सा लगने लगा, घर के सदस्य-सा, बहुत बातूनी नहीं था वह, पर उसमें सादगी भरी एकनिष्ठा थी.
एक दिन जब वह क्रिकेट का सामान उठाने आया, तो उसे तेज़ ज़ुकाम के साथ हल्का बुखार भी था. लेकिन उस दिन खेलना आवश्यक था, क्योंकि उनकी टीम का मैच एक अन्य मैदानवाली टीम के संग था. मैंने उसे दवा दी और तुलसी-अदरकवाली चाय पिलाई, तो उसे कुछ राहत मिली. टीम ने बहुत अच्छा खेला और ये लोग मैच जीत गए. जाते समय वह सामान रखने आया, तो कुछ पल खड़ा रहा, मानो कुछ कहना चाहता हो. उसे चुप देख मैंने ही पूछा कि क्या बात है? झिझकता हुआ बोला, “मुझे यहां आकर बहुत अच्छा लगता है. बहुत अपना-सा लगता है यह घर. पूरी उम्र तो नौकर-नौकरानियों के भरोसे पले. बचपन में भी माता-पिता से मिलने, बात करने का समय फिक्स होता था. यह नहीं कि खेलकर आए और मां की गोद में चढ़ गए. बच्चों के छोटे-छोटे डर होते हैं, यह कोई नहीं समझता था. बस, बहादुर होने का आचरण करना पड़ता सदैव. चोट लगने पर भी रोना मना था. हर समय औपचारिकता निभाई जाती. घरभर में आज कोई नहीं जानता कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है. यहां जो अपनापन मिलता है, वह अपने घर में नहीं मिलता.”
सहसा ही उसने हाथ बढ़ाकर कहा, “मुझसे दोस्ती करोगी? सदैव निभाओगी?” तब फेसबुक जैसी चीज़ नहीं होती थी, पर कुछ उसी तरह की दोस्ती का निमंत्रण था वह भी- उतना ही स्पष्ट. मैंने भी उसी रौ में हाथ बढ़ाकर कह दिया, “क्यों नहीं?” अच्छा तो वह मुझे लगता ही था. परंतु यूं दोस्ती का नामकरण किया जाता है, यह नहीं जानती थी.
समय के साथ हमारी मैत्री प्रगाढ़ होती गई. हम अपने मन की बात एक-दूसरे से कहने के लिए, सलाह-मशविरा करने के लिए, अपने डर, अपनी महत्वाकांक्षाएं बांटने के लिए एक-दूसरे पर निर्भर होते चले गए. मेरे जीवन में भी तो अकेलापन था. घर और स्कूल की चक्की में पिसती मां को इतना समय ही कहां मिलता था और अनीश तो अपने यार-दोस्तों में ही मस्त रहता.
इस बात के दो-तीन दिन बाद ही उसने कहा, “मैं तुम्हें फ्रेंड के रूप में खोना नहीं चाहता…” मैंने बीच में ही टोकते हुए कहा, “पर मैंने दोस्ती तोड़ने की बात कब कही तुमसे?”

यह भी पढ़ें: स्त्रियों की 10 बातें, जिन्हें पुरुष कभी समझ नहीं पाते
सहसा ही हम दोनों ने एक-दूसरे को ‘तुम’ कहकर संबोधित किया था, यह बाद में ध्यान आया.
वह कुछ देर मुझे देखता रहा और फिर धीरे से परंतु आत्मविश्‍वासपूर्वक पूछा, “क्या तुम मुझसे विवाह करोगी?”
प्रश्‍न इतना आकस्मिक था कि मैं थोड़ी देर आश्‍चर्यचकित उसे देखती रही. यूं मैं पिछले कई दिनों से उसके बदलते मनोभावों को देख रही थी, पर वह ऐसा कोई प्रस्ताव रख देगा, यह नहीं सोचा था. लेकिन क्या यह प्यार एकतरफ़ा था? शायद नहीं. यक़ीनन नहीं. मैं सोचती थी मैं अपने मन के नहीं दिमाग़ के आधीन हूं, तार्किक रूप से सोच कर सही और ग़लत की तुला पर तौलकर ही अपने निर्णय लेती हूं. मुझे गर्व था अपने संस्कारों पर. फिर क्यों मुझे रणधीर की आंखों के प्यार का निमंत्रण बुरा नहीं लगा- ग़लत नहीं लगा? लगता है, जैसे मेरे संस्कारों की सुदृढ़ दीवार में कहीं एक बहुत कमज़ोर स्थल था, जिसमें से अनजाने ही प्यार मेरे जीवन में प्रवेश कर गया था. उम्र में मुझसे छह महीने कम, जीवन स्तर में बहुत बड़ा उच्च कुलीन और धनी-नामी परिवार का. और मैं एक अति साधारण परिवार से, पर जब साथ होते, तो ये सब मायने न रखता. न उम्र का हिसाब, न आर्थिक या प्रांतीय भेद. अब मेरा मन पुस्तकों में न लगता. कहानी के नायक में मुझे उसी का चेहरा नज़र आता. प्यार में शायद कुछ तर्कसंगत होता ही नहीं, कोई नियम-क़ानून लागू होता ही नहीं.
मां को प्रमोशन मिला और वे एजुकेशन डायरेक्टर बन गईं. परंतु इसके साथ ही उन्हें दूसरे शहर जाने का आदेश भी मिल गया. पापा तो रिटायर हो ही चुके थे. अतः परिवार को दूसरे शहर जाने में क्या आपत्ति होती, सो उन्होंने अपनी स्वीकृति दे दी. रणधीर ने घर में बात करने का ऐलान किया. मुझे डर लग रहा था, पर वो आश्‍वस्त था, क्योंकि वो माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध जाने को भी तैयार था. उसके माता-पिता ने मना तो नहीं किया, पर ‘सोचते हैं’ कहकर बात को फ़िलहाल टाल दिया. इसी बीच रणधीर को उसके पिता काम के सिलसिले में थोड़े दिनों के लिए अपने संग विदेश ले गए. उन लोगों के जाने के दो दिन के पश्‍चात् उसकी मां का टेलीफोन आया. वह मुझसे मिलना चाहती थीं और एक पांच सितारा होटल में मिलने का समय और जगह बता दी.
ठीक ही तो था. ‘वे मुझसे मिलना चाहती हैं’ यह सोचकर मैं ख़ुश हुई और सलीके से तैयार होकर उनसे मिलने पहुंची. उन्होंने स्नेहपूर्वक मेरा हालचाल पूछा, इधर-उधर की बात की और फिर बोलीं, “तुम एक अच्छी लड़की हो, समझदार लगती हो. मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं, पर हमारे
समाज में रिश्ते लड़के-लड़की के बीच नहीं, परिवारों के बीच तय किए जाते हैं. और प्रायः ही छुटपन में तय कर दिए जाते हैं. उस लड़की की सोचो जिसने इतने वर्ष रणधीर के लिए सपने संजोए हैं. इसकी मंगल कामना के लिए व्रत-उपवास रखे हैं. आसानी से न मानता रणधीर, इसीलिए उसके काका बहाने से उसे विदेश ले गए हैं.
मैं समझती हूं तुम्हारी भावनाओं को, नए युग की सोच को. यह भी जानती हूं कि तुम मेरी मजबूरी समझोगी. तुम लोगों का यहां से जाने का सुन मेरा काम सरल हो गया. रणधीर के लौटने पर मैं उसे संभाल लूंगी. बस, तुम उससे संपर्क करने का प्रयत्न मत करना. इतनी ही गुज़ारिश है मेरी तुमसे. मेरा ढेर सारा आशीर्वाद है तुम्हारे साथ.
पढ़ी-लिखी हो, अपनी ख़ुशी तलाश लोगी. जीवन का ध्येय ढूंढ़ लोगी.”
पारंपरिक राजस्थानी वेशभूषा में भी वे बहुत आधुनिक एवं गरिमामयी लग रही थीं. उनके चेहरे से छलकता स्नेह आकर्षित कर रहा था. और वह मुझे आशीर्वचन कह रही थीं. संस्कारवश मैंने झुककर उनके पैर छूने चाहे, परंतु उन्होंने बीच में ही रोककर मुझे गले लगा लिया और कहा, “बेटियां पैर नहीं छूती हैं और तुम भी तो मेरी बेटी समान हो.” उन्हें वहीं किसी का इंतज़ार करना था, अतः मैं अकेली वहां से बाहर निकली. देखा बारिश हो रही थी. आकाश सलेटी रंग का यूं एकसार था. लगता नहीं था कि जल्दी रुकेगी.
मौसम की मनःस्थिति भी हम मानवों जैसी होती है क्या? रंग-बिरंगे फूलों से लदा वसंत कितना प्रसन्न दिखाई देता है.
फूलों की खिलखिलाहट से, मंद बयार की मस्ती से भरपूर और झड़ते पत्तों के दुख से पतझड़-उदास और थका-हारा, झंझावात और तेज़ बरसात में अपने क्रोध को दर्शाता है मॉनसून, पर वहीं हल्की-हल्की बूंदनियां टपकाता ऐसा प्रतीत होता है, जैसे वर्षभर की संजोई व्यथा आंसू बन पृथ्वी को भिगो रही हो.
शहर छोड़ा, तो बहुत कुछ से नाता टूट गया. ज़िंदगी का एक बहुत बड़ा हिस्सा पीछे रह गया. पर कुछ लोग हैं, जो यादें बनकर संग चले आए हैं मेरा अकेलापन बांटने. पानी बरसने पर आज भी वही दिन सामने आन खड़ा होता है और जिस प्रकार पेड़ की एक शाख हिलाने से अन्य शाखाएं भी साथ हिलने लगती हैं, उनसे भी फल-फूल टपकने लगते हैं. यादों की एक शाख हिलाने से एक के बाद एक यादें आती चली जाती हैं. वृक्ष की शाखाओं की मानिंद ही एक-दूसरे से गुथी रहती हैं हमारी यादें भी.
मां और पापा ने तो बहुत प्रयत्न किया कि मैं कहीं विवाह करने को मान जाऊं. परंतु जिस प्रकार रणधीर की वाग्दता ने उसे लेकर सपने बुने थे- व्रत-उपवास न रखे हों, सपने तो मैंने भी देखे थे न! मैंने अपना जीवन मानसिक रूप से विकलांग बच्चों को सौंप दिया, जिन्हें कुछ अतिरिक्त स्नेह व धैर्य की ज़रूरत पड़ती है और मेरे पास तो अब असीम समय था. बस, बरसात के दिनों में ही न मैं सो पाती हूं, न कुछ काम ही कर पाती हूं. बारिश को देखती अतीत में विचरती रहती हूं; रणधीर ने ही मुझमें प्रेम का एहसास जगाया था, किसी स्वप्नलोक का-सा ही सुख भोगा था मैंने. उसे खोकर ही पीड़ा समझ पाई हूं और पीड़ा के दरिया से गुज़रकर ही तो आज दूसरों के दुख को समझने के क़ाबिल हुई हूं. ज़िंदगी से कोई गिला-शिकवा नहीं. और जब इसी जीवन का नहीं बता सकते कि भविष्य के गर्भ में क्या छुपा है, तो अगले जन्म की बात क्या की जाए?
कल सांझ द्वार पर दस्तक हुई. खोला तो कुरियर था लंबा-चौड़ा-सा एक पार्सल पकड़े. साथ में एक पत्र भी. हस्ताक्षर कर उसे रवाना किया और जल्दी से पत्र खोला. रणधीर का था. लगभग पंद्रह वर्षों के पश्‍चात्. “बहुत मुश्किल से तुम्हारा पता ढूंढ़ पाया हूं. क्रिकेट के साथियों से अनीश का पता मिला और फिर अनीश से तुम्हारा. अभी तक तो यही सोचता रहा कि तुम स्वयं अपनी इच्छा से सारे संबंध तोड़ गई हो, क्योंकि मैं तुम्हारा नया ठिकाना नहीं जानता था, तुम तो जानती ही थी. तुम्हारी नाराज़गी का कारण जानना चाहता था, परंतु पूछता किससे? पिछले हफ़्ते मां की मृत्यु हुई और मृत्यु से कुछ दिन पूर्व उन्होंने तुमसे हुई मुलाक़ात और तुमसे लिए वादे के बारे में बताया. मन के एक कोने में तुम सदैव रही, पर अब तुम्हारा स्थान कुछ और ऊपर हो गया है. लेकिन अब तो बहुत देर हो चुकी है. तुम्हारी तरह मैंने भी अपनी परिस्थिति से समझौता कर लिया है. छोटा-सा एक तोहफ़ा भेज रहा हूं क़बूल कर लेना- रणधीर.”


माइकल एंजलो की पेंटिंग थी. वैटिकन के सिस्टन चैपल की छत पर बना सृष्टि की रचना का सबसे मशहूर चित्र- सृष्टि के रचयिता का आदम की ओर बढ़ा हाथ. न! शायद आदम का अपने रचयिता को छू लेने की अदम्य इच्छा से बढ़ा हाथ. बस, ज़रा-सा ही फासला बाकी है. सदियां बीत चुकी हैं, यह ज़रा-सा फासला तय नहीं हो पाया. कितनी कसक, कितनी विवशता है एक-दूसरे की ओर बढ़े उन दो हाथों में!
परिवार की मान-मर्यादा का ध्यान, अपने संस्कारों एवं सामाजिक व्यवस्था का सम्मान, जाने कितनी वर्जनाओं से बंधे हम! हमने अपने हाथ आगे बढ़ाने से स्वयं ही रोक रखे हैं.

           उषा वधवा

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORIES

तेनालीरामा की कहानी: अरबी घोड़े (Tenali Rama Story: The Arab Horse Trader)

Tenali Rama Story, The Arab Horse Trader

Tenali Rama Story, The Arab Horse Trader

तेनालीरामा की कहानी: अरबी घोड़े (Tenali Rama Story: The Arab Horse Trader)

एक अरब प्रदेश का व्यापारी महाराज कृष्णदेव राय के दरबार में घोड़े बेचने आता है. वह अपने घोड़ों की खूब तारीफ़ करता है, जिससे प्रभावित होकर महाराज कृष्णदेव राय उसके सारे घोड़े खरीद लेते हैं. इतने घोड़ों को खरीदने के बाद एक समस्या यह खड़ी हो जाती है कि इन्हें रखा कहां जाये? क्योंकि महाराज के घुड़साल में इतने अधिक घोड़े रखने की जगह नहीं बचती. महाराज को एक उपाय सूझता है वो घोड़ों को विजयनगर के नागरिकों और राजदरबार के कुछ लोगों को तीन महीने तक देखभाल के लिए दे देते हैं. घोड़ों की देखभाल करनेवालों को घोड़ों के पालन खर्च और प्रशिक्षण के लिए प्रति माह एक सोने का सिक्का दिया जाता है.

इसी क्रम में तेनालीराम को भी एक घोडा दिया गया. तेनालीराम ने घोड़े को घर लेजा कर घर के पिछवाड़े एक छोटी सी घुड़साल बना कर बांध दिया और घुड़साल की खिड़की से उसे थोड़ी मात्रा में चारा खिलाने लगे.

बाकी लोग भी महाराज की सौंपी गयी ज़िम्मेदारी को निभाने लगे. महाराज क्रोधित हो कोई दंड ना दे दें, इस भय से सभी लोग अपना पेट काट-काट कर भी घोड़े को उत्तम चारा खिलाने लगे.

घोड़ों की देखभाल करते-करते तीन महीने बीत गए थे और तय दिन सभी लोग घोड़े लेकर महाराज के सामने आ जाते हैं, पर तेनालीराम बिना घोड़े के ही खाली हाथ आते हैं. तेनालीराम से घोड़ा ना लाने की वजह पूछी जाती है तो वो कहते हैं कि घोड़ा काफी बिगडैल और खतरनाक हो चुका है, इसलिए उसके पास जाना भी मुमकिन नहीं. राजगुरु , महाराज से कहते हैं के तेनालीराम झूठ बोल रहे है. महाराज सच्चाई का पता लगाने के लिए तेनालीराम के साथ राजगुरु को भेजते हैं.

यह भी पढ़ें: पंचतंत्र की कहानी: मूर्ख ब्राह्मण और तीन ठग 

Tenali Rama Story, The Arab Horse Trader

तेनालीराम राजगुरु की साथ ले जाते हैं. राजगुरु तेनालीराम के घर के पीछे बनी उस घुड़साल को देख गुस्से में कहते हैं कि मूर्ख! तुम इस छोटी कुटिया को घुड़साल कहते हो? तेनालीराम शांति से मुस्कुराते हुए जवाब देते हैं कि राजगुरु आप मुझे क्षमा करें, मैं अज्ञानी हूं, लेकिन घुड़साल में अंदर जाने से पहले सावधानीपूर्वक पहले खिड़की से देख लें.

राजगुरु जैसे ही खिड़की से भीतर झांकते हैं तो घोडा लपक कर उनकी दाढ़ी पकड़ लेता है। काफी मशक्कत के बाद भी भूखा घोड़ा राजगुरु की दाढ़ी नहीं छोड़ता है. लोग जमा होने लगते हैं. अंत में कुटिया तोड़ कर तेज हथियार से राजगुरु की दाढ़ी काट कर घोड़े के चंगुल से छुड़ाया जाता है. आखिरकार किसी तरह से राजगुरु और तेनालीराम भूखे घोड़े को ले कर राजा के पास पहुंचते हैं.

घोड़े की दुबली-पतली हालत देखकर महाराज तेनालीराम से इसका कारण पूछते हैं। तेनालीराम कहते है कि मैं घोड़े को रोजाना बस थोड़ा सा चारा ही देता था, इसी वजह से घोडा इतना दुबला हो गया और गुस्सैल भी, क्योंकि उसकी ज़रुरत की आपूर्ति नहीं हो रही थी. राजा तेनाली इसकी वजह पूछते हैं तो वो कहते हैं कि क्षमा करें महाराज, लेकिन आपकी गरीब प्रजा परिवार का पालन जैसे तैसे कर रही थी, इसके बाद उसे घोड़े को संभालने की अतिरिक्त जिम्मेदारी दे दी गई, जिस वजह से वो भी भूखे घोड़े की तरह परेशान और त्रस्त हो गई है.

राजा का कर्तव्य प्रजा की रक्षा करना होता है, उन पर अधिक बोझ डालना नहीं. आपके आदेश से घोड़े तो बलवान हो गए पर आप की प्रजा दुर्बल हो गयी है. महाराज कृष्णदेव राय को अपनी ग़लती का एहसास होता है और तेनालीराम की बात समझ में आ जाती है, और वह तेनालीराम की प्रसंशा करते हुए उन्हे पुरस्कार देते है.

यह भी पढ़ें: तेनालीरामा की कहानी: अंगूठी चोर 

Fairy Tales: द लिटिल मरमेड… नन्हीं जलपरी (The Little Mermaid)

Fairy Tales, द लिटिल मरमेड नन्हीं जलपरी, The Little Mermaid

Fairy Tales, द लिटिल मरमेड नन्हीं जलपरी, The Little Mermaid

द लिटिल मरमेड… नन्हीं जलपरी (The Little Mermaid)

बहुत गहरे समुद्र में समुद्री राजा का महल था. वो अपनी बेटियों और बूढ़ी मां के साथ वहां रहता था. राजा का महल बेहद ख़ूबसूरत था और वो अपनी बेटियों से बहुत प्यार करता था. सबसे ज़्यादा प्यार वो अपनी सबसे छोटी बेटी से करता था.

इस समुद्री राज्य का एक नियम था कि जो भी राजकुमारी 18 साल की हो जाती थी, उसे समंदर की सतह पर जाने का मौक़ा मिलता था. उससे पहले कोई भी राजकुमारी सतह पर नहीं जा सकती थी. राजा की पांचवीं बेटी की सालगिरह का मौक़ा था. सभी बहुत ख़ुश थे. राजकुमारी को सभी जन्मदिन की बधाई दे रहे थे. राजा ने ऐलान किया कि मरीना अब 18 साल की हो गई और उसे सतह पर जाने की इजाज़त दी जाती है, ताकि वो बाहरी की दुनिया, धूप व इंसानी दुनिया देख सके, उसका आनंद ले सके. राजा ने साथ ही मरीना को आगाह भी किया कि सागर की दुनिया इंसानी दुनिया से बहुत अलग होती है, इसलिए वो इंसानों के क़रीब न जाए और समय रहते अपनी दुनिया में लौट आए. यह सुन सबसे छोटी राजकुमारी इवा भी सतह पर जाने की ज़िद करने लगी, लेकिन राजा ने साफ़ इंकार कर दिया, क्योंकि वो 18 साल की नहीं हुई थी. इवा बहुत दुखी हुई, उसे बेसब्री से अपने 18वें जन्मदिन का इंतज़ार था. इवा बेहद ख़ूबसूरत थी और उसकी सबसे बड़ी ख़ासियत यह थी कि वो बेहद दयालू थी. समंदर के सभी जीवों से उसे प्यार थे. यही वजह थी कि वो सबकी फेवरेट थी.


इवा को इंसानों के बारे में जानने की बहुत उत्सुकता रहती थी. वो अक्सर अपनी दादी मां से उन्हीं के बारे में पूछती रहती थी. एक बार यूं ही उसने पूछा कि क्या इंसान हमारी तरह ही होते हैं या हमसे बेहतर होते हैं?

दादी में ने बताया कि उनके पैर होते हैं, जबकि हमारे पैर नहीं होते, मछलियों की तरह हमारे शरीर की बनावट होती है. इंसान बहुत प्रदूषण फैलाते हैं, इसलिए वो हमसे बेहतर नहीं होते. इवा ने जानना चाहा कि क्या इंसान हमसे ज़्यादा जीते हैं, तो दादी मां ने समझाया कि वो 100 साल से ज़्यादा नहीं जीते, जबकि मरमेड्स 300 साला तक जी सकती हैं और मरने के बाद वो समुद्री झाग बन जाती हैं. लेकिन यदि हम जीवनभर भले काम करें, तो हम अमर हो सकते हैं और हवा की परियां हमें स्वर्ग ले जाती हैं उनके साथ रहने के लिए.

इसी तरह समय बीतता गया और इवा का 18वां जन्मदिन आ गया. उसे सबने बधाई दी. वो ख़ुद बेहद उत्साहित थी, आख़िर जिस पल का उसे इंतज़ार था, वो आ गया था. राजा ने कहा कि मैं तुम्हें बाहरी दुनिया दिखा लाता हूं, पर इवा ने कहा कि बाकी सब अकेले गए, तो वो भी अकेली ही जाना चाहती है. इतने में उसके दोस्त श्रिंप ने राजा से कहा कि वो उसका ख़्याल रखेगा. राजा ने कहा कि सूर्यास्त से पहले लौट आना. इवा तेज़ी से सतह की ओर चल पड़ी. बाहर आते ही वो मंत्रमुग्ध हो गई. इस नई अंजान दुनिया ने उसे मोहित कर लिया. इतने में ही उसे एक जहाज़ नज़र आया, जिसमें एक युवक था. उसने श्रिंप से पूछा कि ये क्या चीज़ है. फिर उसने देखा कि वो युवक तो बिल्कुल उसके गुड्डे जैसा ही है. श्रिंप ने बताया कि वो राजकुमार है और शायद अपना जन्मदिन मनाने आया है. इवा राजकुमार की ख़ूबसूरती से मोहित हो गई थी और वो गाना गाने लगी. इतने में ही तूफ़ान आ गया. आसमान में काले बादल छा गए और तेज़ लहरों के बीच राजकुमार का जहाज़ फंस गया. इस तूफ़ान में जहाज़ डूब गया. इवा ने देखा, तो वो राजकुमार को बचाने चल पड़ी और वो कामयाब भी रही. राजकुमार को वो किनार पर लाई. इतने में ही किसी के आने की आहट सुनकर वो छिप गई.

यह भी पढ़ें: Fairy Tales: फूलों की राजकुमारी थंबलीना की कहानी! 

कुछ लड़कियां वहां से गुज़र रही थीं और उन्होंने देखा कि राजकुमार वहां बेहोश था. इतने में राजकुमार को भी होश आ गया और उसने देखा कि एक ख़ूबसूरत लड़की वहां खड़ी है. राजकुमार ने उसे अपनी जान बचाने के लिए धन्यवाद कहा. राजकुमार उसे अपना दिल दे बैठा. उस लड़की ने भी सच नहीं कहा. एवा ने यह सब देखा, श्रिंप ने कहा कि वो लड़की झूठा श्रेय ले रही है. पर इवा ने कहा कि कोई बात नहीं, राजकुमार की जान बच गई, वो इसी से ख़ुश है. सूर्यास्त होने को था, तो दोनों वापस समंदर में लौट आए.

नन्हीं जलपरी का मन उदास था, क्योंकि वो राजकुमार को पहली नज़र में ही दिल दे बैठी थी. पर वो जानती थी कि उसे पाना नामुमकिन है. सागर के नियम ऐसे ही थे कि वो इंसानों से नहीं मिल सकती थी. श्रिंप ने नन्हीं राजकुमारी की हालत देख उसे एक उपाय सुझाया. वो उसे समुद्री डायन के बारे में बताने लगा, लेकिन उसने आगाह भी किया कि इसमें बहुत ख़तरा भी हो सकता है, लेकिन नन्हीं जलपरी को तो बस राजकुमार को पाने की धुन थी. वो चल पड़ी समुद्री डायन से मिलने.

समुद्री डायन ने अपने जादुई गोले में देखा कि लिटिल मरमेड उसकी मांद की ओर आ रही है. इतने में ही गोले में से एक भविष्यवाणी हुई कि राजकुमारी सबसे प्यारी और भावुक मन की है. वो अपने अच्छे कामों की वजह से एक पवन परी बन जाएगी और उसी व़क्त तुम्हारे पाप ख़त्म हो जाएंगे और तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी. डायन ने कहा कि ऐसा कभी नहीं होगा.

इतने में ही राजकुमारी डायन तक पहुंच गई और उसने गुज़ारिश की कि वो इंसान बनना चाहती है. डायन ने कहा कि उस राजकुमार के लिए ऐसा करना सही नहीं, क्योंकि ये तुम्हारे दुखों का कारण भी बन सकता है. एवा ने कहा वो हर क़ीमत के लिए तैयार है. डायन ने कहा कि मैं तुम्हें इंसान तो मैं बना दूंगी, लेकिन तुम्हारी आवाज़ छीन लूंगी. तुम्हें राजकुमार का दिल जीतना होगा, अगर तुम कामयाब रही, तो तुम्हारी आवाज़ भी लौट आएगी, लेकिन यदि ऐसा नहीं हो सका, तो तुम्हारी मौत निश्‍चित है और तुम समुद्री झाग बन जाओगी.

यह भी पढ़ें: Fairy Tales: स्नो व्हाइट और सात बौने

नन्हीं जलपरी ने शर्त मान ली. डायन ने उसे जादुई शर्बत दिया और कहा इसे तट पर जाकर पीना. मरमेड ने ऐसा ही किया. शर्बत पीते ही वो बेहोश हो गई. इस बीच उसकी मछली जैसी पूंछ पैरों में बदल गई, पर उसकी आवाज़ चली गई. उसे होश आया तो सामने राजकुमार था. राजकुमार ने कहा तुम ठीक हो, पर तुम हो कौन? और सागर तट पर क्या कर रही थी? राजकुमार ने उसे आराम करने की सलाह दी.

अगले दिन वो चलने लगी, तो राजकुमार बेहद ख़ुश हुआ. उसने उसके साथ डांस किया और उसकी नृत्य कला से काफ़ी प्रभावित हुआ. राजकुमार ने कहा कि आज का दिन बहुत अच्छा है, मुझे मेरे जीवन का प्यार भी मिल गया. नन्हीं परी को लगा कि वो उसकी बात कर रहा है. इतने में ही राजा का आगमन हुआ और राजकुमार ने राजा से उस लड़की का परिचय करवाया, जो उसे तूफ़ान वाले दिन मिली थी. राजकुमार ने कहा कि इसी ने मेरी जान बचाई थी. मैं इससे शादी करना चाहता हूं. राजा भी मान गए. लिटिल मरमेड का दिल टूट चुका था. यह सब देख श्रिंप ने सागर में जाकर राजा को सब कुछ बताया.

 

राजा ने सागर की देवी से प्रार्थना की और सतह पर चला गया. एवा की बहनें डायन के पास गई, ताकि वो अपना श्राप वापस ले. डायन ख़ुश थी कि राजा की बेटियां उसके सामने गिड़गिड़ा रही हैं. फिर डायन ने कहा कि उसके पास एक उपाय है, लेकिन उसके लिए एवा को राजकुमार की हत्या करनी होगी. यदि लिटिल मरमेड इस जादुई खंजर से राजकुमार को मार देगी, तो उसे अपनी जलपरी वाली ज़िंदगी वापस मिल जाएगी. उसकी बहनें वो खंजर लेकर सतह पर गई. सबने देखा इवा अपने गुड्डे के साथ सागर तट पर एक पेड़ के नीचे उदास बैठी है. राजा ने उसे आवाज़ लगाई. इवा बेहद भावुक हो उठी. राजा ने इवा को वो खंजर दिया, पर इवा ने कहा कि वो राजकुमार को नहीं मार सकती. पर अपने भावुक पिता और बहनों को देख वो खंजर ले लेती है. वो राजकुमार के महल तक गई, पर वो राजकुमार को मार नहीं पाई, क्योंकि वो उसका प्यार था. वो लौट आई. अपने पिता और बहनों से माफ़ी मांगी. इवा ने कहा कि अब मेरी मौत निश्‍चित है. आप सब मुझे माफ़ कर देना. मैं अब झाग में बदलना चाहती हूं. इस दुनिया से जाना चाहती हूं. इतना कहकर वो समंदर में कूद गई. इतने में ही एक चमत्कारी शक्ति ने उसे खींच लिया और उसने देखा कि सामने पवन परी है. राजा बेहद ख़ुश था कि उसकी सबसे प्यारी बेटी की जान बच गई. राजा ने परी को धन्यवाद कहा.

इवा समझ नहीं पा रही थी. परी ने बताया कि हम आकाश की परियां हैं और तुम अब हमारे साथ परी बनकर रहोगी. तुम्हारे उदार मन और सागर व इंसानों के प्रति प्यार को देखते हुए ये तुम्हारा इनाम है. तुम भविष्य में इंसानी रूप में भी जन्म ले सकती हो. लिटिल मरमेड ने सबको अलविदा कहा और अपने राजकुमार से भी कहा कि अगले जन्म में तुम ही मेरा प्यार बनोगे. मैं हमेशा तुम से प्यार करूंगी. उसने परी मां को धन्यवाद कहा और उनके साथ स्वर्ग में चली गई. ऐसा होते ही उस डायन और उसके पापों का भी अंत हो गया. सभी लोग संतुष्ट थे.

[amazon_link asins=’8184517017,1730120083,9350896958,B00BJLWQT2,1445464829′ template=’ProductCarousel’ store=’pbc02-21′ marketplace=’IN’ link_id=’e5436998-154f-11e8-9906-03f0856644a0′]

तेनालीरामा की कहानी: अंगूठी चोर (Tenali Rama Story: The Lost Ring)

Tenali Rama Story, The Lost Ring

Tenali Rama Story, The Lost Ring

तेनालीरामा की कहानी: अंगूठी चोर (Tenali Rama Story: The Lost Ring)

एक बार की बात है, राजा कृष्ण देव राय उदास होकर अपने सिंहासन पर बैठे थे. तभी तेनालीराम आ पहुंचे. उन्होंने राजा की उदासी का कारण पूछा, तो राजा ने बताया कि उनकी पसंदीदा अंगूठी खो गयी है, दरअसल वो अंगूठी रत्न जड़ित और बेहद कीमती थी. राजा को वो बहुत पसंद थी. राजा को शक था कि उनके बारह अंग रक्षकों में से किसी एक ने वो अंगूठी चुराई है.

तेनालीराम ने कहा, “मैं अंगूठी चोर को बहुत जल्द पकड़ लूंगा”, यह सुनकर राजा कृष्ण देव राय बहुत प्रसन्न हुए.

तेनालीराम ने राजा के अंगरक्षकों को बुलाकर उनसे कहा, “राजा की अंगूठी आपमें से किसी एक ने चुराई है, लेकिन मैं इसका पता बड़ी आसानी से लगा लूंगा. चोर को कड़ी सज़ा मिलकर रहेगी और जो सच्चा है उसे डरने की कोई ज़रुरत नहीं. आप सब मेरे साथ काली मां के मंदिर चलो.”

राजा हैरान थे कि चोर को पकड़ने के लिए भला मंदिर क्यों जाना है?

यह भी पढ़ें: तेनालीरामा की कहानी: स्वर्ग की खोज 

मंदिर पहुंचकर तेनालीराम पुजारी के पास गए और उन्हें कुछ निर्देश दिए. इसके बाद उन्होंने अंगरक्षकों से कहा, “आप सबको बारी-बारी से मंदिर में जाकर मां काली की मूर्ति के पैर छूने हैं और फ़ौरन बाहर निकल आना है. ऐसा करने से मां काली आज रात स्वप्न में मुझे उस चोर का नाम बता देंगी.”

सारे अंगरक्षक बारी-बारी से मंदिर में जाकर माता के पैर छूने लगे. जैसे ही कोई अंगरक्षक पैर छूकर बाहर निकलता तेनालीराम उसका हाथ सूंघते और एक कतार में खड़ा कर देते. कुछ ही देर में सभी अंगरक्षक एक कतार में खड़े हो गए.

महाराज बोले, “क्या हुआ? चोर का पता क्या कल लगेगा? तब तक क्या किया जाये?”

“नहीं महाराज, चोर का पता तो ला चुका है। सातवें स्थान पर खड़ा अंगरक्षक ही चोर है।

ऐसा सुनते ही वह अंगरक्षक भागने लगा, पर वहां मौजूद सिपाहियों ने उसे धर दबोचा.

यह भी पढ़ें: Fairy Tales: स्नो व्हाइट और सात बौने

राजा और बाकी सभी लोग हैरान थे कि तेनालीराम ने कैसे पता कर लिया कि चोर वही है.
तेनालीराम ने राज़ खोला ,”मैंने पुजारीजी से कहकर काली मां के पैरों पर तेज़ सुगन्धित इत्र छिड़कवा दिया था.जिस कारण जिसने भी मां के पैर छुए उसके हाथ में वही सुगन्ध आ गयी, लेकिन सातवें अंगरक्षक के हाथ में कोई खुशबू नहीं थी… उसने पकड़े जाने के डर से मां काली की मूर्ति के पैर छूए ही नहीं.”

राजा कृष्ण देव राय तेनालीराम की बुद्धिमत्ता से फिर से प्रभावित हुए बिना न रह सके.

[amazon_link asins=’B06XG5JZFZ,8124114986,8128805274,B06XG6GNCX’ template=’ProductCarousel’ store=’pbc02-21′ marketplace=’IN’ link_id=’6791b709-0fda-11e8-ad48-f16591d52da0′]