Kasauti Zindagi Ki

‘कसौटी ज़िंदगी की’ सीरियल की प्रेरणा यानी श्वेता तिवारी किसी परिचय की मोहताज़ नहीं हैं. टीवी इंडस्ट्री में श्वेता तिवारी एक जानामाना चेहरा हैं. शादी ग्लैमर वर्ल्ड में आपकी एंट्री रोक देती है, मां बनने के बाद महिलाएं करियर पर ज़्यादा ध्यान नहीं दे पातीं, शादी के बाद महिलाएं अपना फ़िगर मेंटेंन नहीं कर पातीं… ऐसी तमाम मान्यताओं को झुटलाकर श्‍वेता तिवारी ने साबित कर दिया है घर, बच्चा, करियर सब कुछ एक साथ आसानी से हैंडल किया जा सकता है. बस, मन में कुछ कर दिखाने का जज़्बा होना चाहिए. अपनी इस मल्टी टास्किंग स्किल और क़ामयाबी से जुड़े कई अनकहे राज़ श्‍वेता तिवारी ने शेयर किए हमारे साथ.

क्या आपने कभी सोचा था कि आप ग्लैमर इंडस्ट्री में काम करेंगी?
जब आपकी क़िस्मत में किसी फ़ील्ड से जुड़ना लिखा होता है, तो उसके लिए रास्ते अपने आप खुलते चले जाते हैं. मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. मैं अपने स्कूल में डांस कॉम्पटीशन में हिस्सा लिया करती थी. एक बार डांस कॉम्पटीशन में मैंने फ़र्स्ट प्राइज़ जीता था. उस शो के जज एक थियटर डायरेक्टर थे. उन्होंने मुझसे कहा, मैं एक प्ले कर रहा हूं, क्या तुम उसमें काम करना चाहोगी? मैंने सोचा, ट्राई करने में हर्ज़ क्या है? मैं अपनी मम्मी के साथ वहां गई और प्ले में काम करना शुरू कर दिया. थिएटर में काम करने के दौरान ही मुझे सीरियल में काम करने का मौका मिला, लेकिन मुझे बड़ा ब्रेक मिला एकता कपूर के शो ‘कसौटी ज़िंदगी की’ से. उसके बाद मुझे पीछे मुड़कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी.

आपने बचपन में बहुत स्ट्रगल किया है. क्या कभी अफसोस होता है अपने बचपन के बारे में सोचकर?
मेरे बचपन की यादें बहुत सुखद नहीं हैं. मैं एक मिडल क्लास, बल्कि लोअर मिडल क्लास फैमिली में पली-बढ़ी हूं. मेरे माता-पिता दोनों काम करते थे. पिता सेल्स मैनेजर थे और मां मोड रिसर्च कंपनी में काम करती थी. मैं और मेरा छोटा भाई कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ते थे. बहुत छोटी उम्र से ही मैं ये महसूस करने लगी थी कि मां को घर और हमारी पढ़ाई का ख़र्च उठाने में बहुत मुश्किल होती है इसलिए सातवीं क्लास से मैंने भी काम करना शुरू कर दिया. मैं एक ट्रैवेल एजेंट के यहां फ़ोन रिसीव करने का काम करती थी. इस काम के लिए मुझे पांच सौ रुपए तनख़्वाह मिलती थी. मां को मेरे काम करने से बहुत तकलीफ़ होती थी इसलिए वो अक्सर मुझे काम करने के लिए मना करती थीं. उन्हें डर लगा रहता था कि कहीं काम करने से मेरी पढ़ाई का नुक़सान न हो जाए. स्कूल की छुट्टियां पड़ने पर भी मैं काम किया करती थी. मैंने ट्यूशन लेने से लेकर डोर टु डोर सेल्स गर्ल का काम भी किया है. आई लैंस से लेकर मिक्सर बेचने तक का काम भी किया है. मां के साथ मैंने मोड रिसर्च सेंटर में भी काम किया. मैं छुट्टियों में इतना काम कर लेती थी कि मेरी पढ़ाई का ख़र्च निकल जाए.

क्या बुरा व़क्त इंसान के व्यवहार को बदल देता है?
हां, मेरे साथ ऐसा हुआ है. मेरी पिछली ज़िंदगी का मेरे व्यवहार पर कुछ समय तक असर ज़रूर पड़ा, उस दौरान मैं काफ़ी चिड़चिड़ी हो गई थी, लेकिन मैंने अपनी पर्सनल लाइफ़ का अपने काम पर असर नहीं पड़ने दिया. जब भी कोई औरत तलाक़ लेने का फैसला करती है, तो लोग उसे ही दोषी मानते हैं. कोई ये जानने की कोशिश नहीं करता कि आखिर उसकी ज़िंदगी में क्या चल रहा है, वो अपनी पर्सनल लाइफ में किस दौर से गुज़र रही है. मेरी ज़िंदगी के कड़वे अनुभवों ने मुझे बहुत कुछ सिखाया, मुश्किल हालात में जीना और मुश्किलों से बाहर निकलना भी. मेरे ख़्याल से बुरा वक़्त परीक्षा की तरह होता है, जिसे पार करके आपको जीत हासिल होती है.

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आपके परिवार का आपकी ज़िंदगी पर क्या असर पड़ा है?
अच्छी-बुरी, चाहे जैसी भी हो, लेकिन ये एहसास ही अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि होती है कि आपके पास अपनी फैमिली है. हम जानते हैं कि ये वो लोग हैं जो हमें बिना किसी स्वार्थ के प्यार करते हैं. इनके प्यार में कोई दिखावा, कोई फरेब नहीं है. इनके लिए न तो हमारी हार-जीत या पैसे मायने रखते हैं और न ही हमारी शक्ल या क़ामयाबी, ये स़िर्फ हमें प्यार करते हैं. परिवार में रहकर ही हम एक-दूसरे से प्यार करना, बड़ों का सम्मान करना सीखते हैं. जो लोग अपने परिवार के साथ रहते हैं वे ख़ुद को सुरक्षित महसूस करते हैं, उनका फ्रस्टेशन लेवल कम होता है, उनकी ग्रोथ ज़्यादा होती है. तनावग्रस्त वही लोग रहते हैं, जिन्हें लगता है कि उनके पास कोई अपना नहीं है.

आप अपनी ज़िंदगी का सबसे ख़ूबसूरत लम्हा किसे मानती हैं?
जब मेरी बेटी का जन्म हुआ और मैंने महसूस किया कि मेरे पेट में से एक प्यारी-सी बच्ची बाहर आई है. जब मैंने उसे पहली बार देखा, तो मैं यकीन ही नहीं कर पा रही थी कि मेरे पेट में इतने दिनों तक इतनी प्यारी बच्ची की रूपरेखा तैयार हो रही थी. सच, औरत के लिए मां बनने से प्यारा एहसास और कोई हो ही नहीं सकता.

अपने फैन्स से कितना प्यार मिलता है आपको?
मैं लकी हूं कि मुझे ऐसे फैन्स मिले हैं, जिन्हें मेरे ऑटोग्राफ़, फोटोग्राफ़ वगैरह से कोई मतलब नहीं, वो बस मुझे गले लगाकर रोने लगते हैं. मेरे चेहरे, हाथ को छूकर देखते हैं. हां, कई बार ़फैन्स को रोक पाना मुश्किल ज़रूर हो जाता है. एक बार मैं एक सोशल इवेंट में रायपुर गई थी. वहां भीड़ इतनी जुट गई थी कि कंट्रोल कर पाना मुश्किल हो गया था और मेरे कपड़े तक फट गए थे. वो वाकया मैं कभी नहीं भूल सकती. इसी तरह बहुत पहले मैंने दिलेर मेहंदी का एक एलबम पैसा-पैसा किया था. उसमें मैंने कैट सूट पहना था. उसी दौरान जुहू (मुंबई) के एक सिग्नल पर मेरी कार के पास एक ज़ैन कार रुकी, जिसमें कुछ औरतें बैठी थीं. उनमें से एक ने मेरी कार के ग्लास को नॉक किया. मैंने सोचा, फैन होगी, कुछ कहना चाहती होगी, लेकिन जैसे ही मैंने ग्लास नीचे किया, उसने मुझे बुरी तरह डांटना शुरू कर दिया. कहने लगी, तुम्हें उस एलबम में इतना छोटा पैंट पहनने की क्या ज़रूरत थी? तुम्हें देखकर मेरी बेटी ने साड़ी पहनना शुरू किया. अब तुम आधा-आधा पैंट पहनोगी तो वो भी ऐसा ही करेगी. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं इसे कॉम्प्लिमेंट समझूं या क्रिटिसिज़्म, इस बात से ख़ुश होऊं कि लोग मेरा स्टाइल फॉलो कर रहे हैं या इस बात से दुखी होऊं कि लोग मुझे इसी गेटअप में देखना पसंद करते हैं. कई बार लोगों को समझाना मुश्किल हो जाता है कि हम एक पर्टिक्युलर क़िरदार को जी रहे होते हैं, असल में हम ऐसे नहीं हैं.

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आप किस तरह के आउटफिट पहनना पसंद करती हैं?
मुझे साड़ी और सलवार-कमीज़ पहनना पसंद है, इन्हें पहनकर मुझे ये नहीं सोचना पड़ता कि मैंं कैसी लग रही हूं, क्योंकि मुझे पता होता है कि इनमें मैं अच्छी लगती हूं. हां, रेग्युलर वेयर में मैं जीन्स-टीशर्ट पहनना पसंद करती हूं, क्योंकि इन्हें मेंटेनेंस की ज़रूरत नहीं होती.

आपके बाल बहुत ख़ूबसूरत हैं. इनकी देखभाल कैसे करती हैं आप?
अपने बालों की देखभाल के लिए मैं नानी-दादी के ज़माने का फ़ॉर्मूला इस्तेमाल करती हूं. मैं अपने बालों में ख़ूब तेल लगाती हूं, वो भी बाल धोने के एक-दो घंटे पहले नहीं, बल्कि एक रात पहले. मेरे ख़्याल से बालों के लिए तेल से अच्छी खुराक और कोई हो ही नहीं सकती. इससे बाल नहीं झड़ते, डैंड्रफ़ नहीं होता, बाल सॉफ़्ट और हेल्दी बने रहते हैं.

बालों की बात तो हो गई, अब हमें अपनी ख़ूबसूरती का राज़ भी बता दीजिए.
शूटिंग पर मेकअप के अलावा मैं अपनी त्वचा के लिए अलग से कुछ नहीं करती. हां, मैंने सुना है कि पानी त्वचा को यंग और हेल्दी बनाए रखता है, इससे त्वचा रूखी नहीं होती, जिससे झुर्रियां नहीं पड़तीं इसलिए मैं ख़ूब पानी पीती हूं.

आपको किस तरह का खाना पसंद है?
मुझे सिंपल खाना पसंद है. दाल-चावल मेरा फेवरिट है. मैं बहुत अच्छी दाल बना भी लेती हूं.

कोई ऐसा झूठ जिसे आपने अब तक छुपाकर रखा है?
मां को पता चलेगा कि मैंने नॉनवेज खाना शुरू कर दिया है तो मुझे मार डालेंगी. मैं चिकन बहुत अच्छा बना लेती हूं. मेरी बेटी को मेरे हाथों से बना ऑमलेट, भुर्जी, एग पकौड़ा, एग करी आदि बहुत पसंद है.

क्या शॉपिंग की दीवानी हैं आप?
मैं जब अपसेट होती हूं तो शॉपिंग करती हूं. हालांकि शॉपिंग मेरा एडिक्शन नहीं है, लेकिन जब भी अपसेट होती हूं तो शॉपिंग करने निकल जाती हूं. इससे मुझे बहुत ख़ुशी मिलती है.

क्या किसी चीज़ की लत है आपको?
हां, सुबह की चाय मेरा एडिक्शन है. सुबह की चाय न मिले तो मेरा पूरा दिन ख़राब जाता है.

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ऐसी कौन-सी चीज़ है जिसे पाकर आपको बहुत ख़ुशी हुई?
जब मैं छोटी थी तो किसी ज्योतिषी ने कहा था कि इसे थ्री कैरेट डायमंड पहनना चाहिए. तब मेरे लिए उसे ख़रीदना आसान नहीं था, लेकिन पांच-छह साल पहले जब मैंने यह ख़रीदा, तो मुझे एक तरह से जीत का एहसास हो रहा था कि आख़िरकार मैंने थ्री कैरेट डायमंड पा ही लिया. मैंने कभी सोचा नहीं था कि ज़िंदगी मुझे इतना आगे ले जाएगी, लेकिन मुझे सब कुछ आसानी से नहीं मिला है इसलिए मैं चीज़ों की क़द्र करना जानती हूं. मैं ये मानती हूं कि अगर हम बहुत मेहनत करें, तो अपनी क़िस्मत बदल सकते हैं. मैं भाग्य को मानती हूं, लेकिन क़िस्मत के भरोसे भी नहीं बैठी रहती.

– कमला बडोनी

जब एक साउंड रिकॉर्डिस्ट ने ‘भाभीजी घर पर हैं’ सीरियल की अंगूरी भाभी यानी शुभांगी अत्रे का मज़ाक उड़ाया और कहा कि इनका कुछ नहीं होने वाला, तो इस पर शुभांगी अत्रे ने क्या जवाब दिया. इतनी पॉप्युलर एक्ट्रेस के लिए आखिर एक साउंड रिकॉर्डिस्ट ने ऐसा क्यों कहा? अंगूरी भाभी उर्फ शुभांगी अत्रे से इस बात की सच्चाई जानने के लिए हमने उनसे बात की और सच्चाई का पता लगाया. आइए, हम आपको शुभांगी अत्रे से हुई हमारी बातचीत के कुछ दिलचस्प किस्से बताते हैं.  

Angoori Bhabhi Shubhangi Atre

शुभांगी, आजकल लॉकडाउन में आप क्या कर रही हैं? 
जैसा कि आप जानती हैं, लॉकडाउन में घर में कोई डोमेस्टिक हेल्प नहीं है, तो सुबह का आधा दिन तो घर के कामों में ही निकल जाता है. मेरे पति पियूष और बेटी आशी घर के कामों में मेरा हाथ बंटाते हैं, इसलिए मिल जुलकर काम आसानी से हो जाता है. हम मध्यप्रदेश से हैं और आप तो जानती हैं कि मध्यप्रदेश के लोग खाने के लिए जीते हैं. हमारे घर में हम तीनों ही फूडी हैं और मेरी बेटी मुझे लिस्ट दे देती है कि हम क्या-क्या खाएंगे. मुझे भी खाना बनाने का बहुत शौक है इसलिए मैं रोज़ कुछ न कुछ नया बनाने की कोशिश करती रहती हूं. हमारे घर में सबको पनीर बहुत पसंद है इसलिए लॉकडाउन में मैंने कड़ाही पनीर, बटर पनीर मसाला, पनीर दोप्याज़ा जैसी पनीर की बहुत सारी रेसिपीज़ बनाई हैं. कल मैंने अमृतसरी कुलचे और छोले बनाए थे. खाना बनाने के अलावा मुझे डांस का भी शौक है, मैंने कथक सीखा है इसलिए जब भी टाइम मिलता है मैं डांस जरूर करती हूं. सोशल मीडिया पर आप मेरे डांस वीडियो देख सकते हैं. हम लोग बहुत बिज़ी रहते हैं इसलिए हम घर पर चुपचाप बैठ नहीं सकते, लॉकडाउन में भी हम कुछ न कुछ नया ट्राई करते रहते हैं.

लॉकडाउन में आपकी बेटी आपसे क्या सवाल करती है?
मेरी बेटी जब पूछती है कि कब लॉकडाउन खुलेगा, हम बाहर कब जाएंगे, तो मेरे पास उसके सवालों का कोई जवाब नहीं होता. मैं सोचती हूं कि हमने अपने बच्चों के लिए कैसा भविष्य बना दिया है. हमने प्रकृति का इतना नुकसान कर दिया है कि इसका खामियाजा हमारी अगली पीढ़ी को भुगतना पड़ रहा है. इस लॉकडाउन ने बहुत से लोगों का नज़रिया बदल दिया है. अब लोगों को ये समझ आने लगा है कि ज़िंदगी से बढ़कर कुछ नहीं, एक छोटे-से वायरस ने पूरी दुनिया को घरों में बंद होने पर मजबूर कर दिया है. एक वायरस यदि इतनी तबाही मचा सकता है, तो सोचिए, यदि प्रकृति अपने रौद्र रूप में आएगी, तो क्या होगा. हमें अपनी ज़िंदगी के लिए ऊपर वाले को शुक्रिया कहना चाहिए और हर जीव की कद्र करनी चाहिए. हमारे लिए ये सीखने का समय है. यदि हम प्रकृति से कुछ ले रहे हैं, तो हमें प्रकृति को लौटाना भी होगा. अगर आपने एक पेड़ काटा है, तो आपको दो पेड़ लगाने होंगे. एक समय में डायनासोर इतनी भारी मात्रा में इसीलिए बढ़ गए थे, क्योंकि उन्होंने किसी और को पनपने ही नहीं दिया. फिर एक समय ऐसा आया जब इस दुनिया से डायनासोर ही लुप्त हो गए. हम इंसान भी तो यही कर रहे हैं, हमने पेड़ काट दिए, नदियां दूषित कर दी, हवा को प्रदूषित कर दिया, अब प्रकृति हमें सज़ा दी रही है. बाढ़, तूफ़ान, भूकंप के साथ-साथ अब हम कोरोना से भी जूझ रहे हैं. यदि हम अब भी नहीं सुधरे, तो हमें इसके और बुरे परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं. लॉकडाउन का एक फायदा ये भी हुआ है कि इस दौरान प्रकृति ने खुद को हील किया है और अब प्रकृति ज्यादा खूबसूरत हो गई है. लॉकडाउन में हमारे कई नए दोस्त भी बन गए हैं. इन दिनों हमारे लॉन में कई नए-नए पक्षी आने लगे हैं, हमने इन्हें पहले कभी यहां नहीं देखा था. पिछले हफ्ते हमारे लॉन में एक किंगफिशर भी आया था. अब हम उन पक्षियों के लिए पानी रखते हैं, उन्हें दाना डालते हैं.

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Angoori Bhabhi Shubhangi Atre

क्या आप बचपन से एक्टर ही बनना चाहती थीं?
हां, ये मेरा बचपन का सपना था कि मैं एक्टर बनूं, लेकिन मेरी फैमिली को लगता था कि ये कैसे हो पाएगा. एक्टिंग में करियर बनाने के लिए मुझे मुंबई भेजने से मेरे पैरेंट्स डरते थे. मैंने कथक सीखा है और बहुत छोटी उम्र से ही मैंने कई शहरों में कथक के परफॉर्मेंस शुरू कर दिए थे. जब मैं ग्यारहवीं में थी, तब मैंने कथक में नेशनल कॉम्पटीशन जीता था. एक्टिंग का चांस मुझे तब मिला जब मेरी बेटी का जन्म हो चुका था. हमारी लव मैरिज हुई है. शादी के बाद पीयूष को पुणे में एक अच्छा ऑफर मिला, तो हम पुणे आ गए. तब तक मैं मां बन चुकी थी. फिर एक दिन पीयूष ने बताया कि एक एडवरटाइजिंग एजेंसी को एक शैम्पू के लिए मॉडल चाहिए, ग्लैमर इंडस्ट्री में वो मेरा पहला काम था. मैंने प्रिया हर्बल शैम्पू के लिए पहला ऐड किया था, जिसके लिए मुझे ढाई हजार रुपये मिले थे. वो मेरी एक्टिंग की पहली कमाई थी. तब मेरे फोटोग्राफर ने कहा कि तुम्हारा इंडियन फेस है, तुम्हें टीवी या फिल्म के लिए ट्राई करना चाहिए. मैंने उनसे कहा कि मैं काम करना चाहती हूं, लेकिन मैं इस इंडस्ट्री में किसी को जानती नहीं हूं.

बालाजी में आपकी एंट्री कैसे हुई?
उस समय (वर्ष 2006) पुणे में बालाजी के ऑडिशन हो रहे थे. इसे आप डेस्टिनी कह सकती हैं, मेरे पहले ऑडिशन में ही मुझे बालाजी में काम करने का मौका मिला और हम मुंबई आ गए. ‘कसौटी ज़िंदगी की’ सीरियल में एक-डेढ़ महीने काम करने के बाद एकता कपूर ने मुझे ‘कस्तूरी’ सीरियल का टाइटल कैरेक्टर दे दिया और वहां से मुझे एक नई पहचान मिली. लेकिन वो दौर मेरे लिए आसान नहीं था, मेरी बेटी उस समय 11 महीने की थी और मुझे उसके साथ समय बिताने का टाइम ही नहीं मिलता था. उस समय पीयूष ही आशी की पूरी ज़िम्मेदारी निभा रहे थे. उस वक़्त मैं ख़ुश भी थी, क्योंकि मैं अपने सपने को जी रही थी, लेकिन इसके लिए मुझे मेरी बेटी से दूर रहना पड़ता था. आज मैं जो भी हूं, उसका क्रेडिट मैं एकता कपूर को दूंगी. मैं उस वक़्त बहुत रॉ थी, फिर भी एकता ने मुझे लीड रोल दिया. मुझे लगता है कि कामयाबी का सफर बहुत आसान होना भी नहीं चाहिए, क्योंकि मुश्किल समय आपको स्ट्रॉन्ग बनाता है.

Angoori Bhabhi Shubhangi Atre

अंगूरी भाभी का किरदार आपको कैसे मिला?
अंगूरी भाभी के लिए बहुत सारे लोगों का नाम सामने आया था. उस समय हर कोई ये जानना चाहता था कि अब अंगूरी भाभी कौन बनेगी. जब इस रोल के लिए मेरी मीटिंग हुई थी, उस वक़्त ही ये एक नेशनल न्यूज़ बन गई थी. अंगूरी भाभी का कैरेक्टर मेरे लिए एक्टिंग से ज्यादा लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरना था. उस वक़्त मेरे शो के प्रोड्यूसर और डायरेक्टर ने मुझसे कहा था कि अगले एक-दो महीनों तक सोशल साइट्स को मत देखना, क्योंकि लोग तुलना करेंगे और इससे आपका स्ट्रेस बढ़ेगा. आप सिर्फ अपने काम पर ध्यान दो. ‘भाभीजी घर पर हैं’ सीरियल के लिए जब मेरा सलेक्शन हुआ, तो मैं एक अच्छे रोल की तलाश में थी, तब मैंने ये नहीं सोचा था कि मुझ पर इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी है. मैंने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया और दर्शकों को मेरा काम पसंद आया. अंगूरी भाभी का कैरेक्टर इतना अच्छा है कि ये रोल करने में किसी भी एक्ट्रेस को बहुत मज़ा आएगा. अंगूरी भाभी भावुक भी है, मासूम भी है, मॉडर्न भी है… इस कैरेक्टर में बहुत सारे शेड्स हैं इसलिए मुझे ये कैरेक्टर बहुत पसंद है.

अंगूरी भाभी के कैरेक्टर के लिए आपको किस तरह के कॉम्प्लिमेंट्स मिलते हैं?
लोग जब मुझे किसी इवेंट या एयरपोर्ट पर देखते हैं, तो कई लोग हैरानी से पूछते हैं कि आप तो अंगूरी भाभी से बिल्कुल अलग हैं. कई दर्शकों को लगता है कि मैं रियल लाइफ में भी भाभीजी वाले गेटअप में ही रहती हूं. एक बार यूपी से स्कूल के बच्चों की ट्रिप हमारे सेट पर आई थी, तब अंगूरी भाभी का कैरेक्टर शुरू किए हुए मुझे एक-दो महीने ही हुए थे. उस समय कई स्टूडेंट्स ने मुझसे कहा था कि अब हम जब आंख बंद करके देखते हैं, तो हमें आप ही अंगूरी भाभी नज़र आती हैं, वो कॉम्प्लिमेंट मेरे लिए बहुत बड़ा था. अब तो मैं अंगूरी भाभी के किरदार में पूरी तरह ढल गई हूं, लेकिन शुरू में लोगों की मुझसे बहुत सारी उम्मीदें थीं.

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Angoori Bhabhi Shubhangi Atre

आपका बचपन कहां बीता है?
मेरा बचपन मध्यप्रदेश में बीता है और मेरी पढ़ाई भी वहीँ हुई है. बचपन की बहुत सारी खट्टी-मीठी यादें हैं. हम तीन बहनें हैं और मैं सबसे छोटी हूं. बचपन में मेरी बीच वाली बहन और मेरी खूब लड़ाई होती थी, यहां तक कि हम मॉस्किटो मैट लगाने को लेकर भी झगड़ते थे. एक दिन वो मॉस्किटो मैट लगाती थी और एक दिन मैं, लेकिन संडे कौन लगाएगा, ये मसला सुलझाने के लिए मेरे उस दिन मेरे पापा मॉस्किटो मैट लगाना पड़ता था. हम सब मिलकर चाट खाने जाते थे. आज हम वो सब बातें याद करके बहुत हंसते हैं. मैंने इंदौर में ही अपनी पढ़ाई की है. बीएससी के बाद मैंने एमबीए किया. मैंने कॉलेज के दिनों में लेक्चर बंक करके बहुत सारी फिल्में देखी हैं और ये बात मैं अब अपने पैरेंट्स को बताती हूं. एक बार जब अटेंडेंस को लेकर मेरा नाम आया था, तो मैं डर गई थी कि अब घर में सबको पता चल जाएगा, लेकिन पैरेंट्स को बुलाने की नौबत नहीं आई और मैं बच गई. मुझे पानीपुरी बहुत पसंद है, लेकिन अब मैं पहले की तरह ठेले पर जाकर पानीपुरी नहीं खा सकती, ये चीज़ मैं बहुत मिस करती हूं. हालांकि कई बार मैं खुद को रोक नहीं पाती और चुपचाप ठेले पर जाकर पानीपुरी खा लेती हूं, जब तक लोग मुझे पहचानते हैं, तब तक मैं 5-6 पानीपुरी खा चुकी होती हूं.

एक साउंड रिकॉर्डिस्ट ने आपका मज़ाज क्यों उड़ाया था?
जब मैं ‘कसौटी ज़िंदगी की’ सीरियल कर रही थी, तब मैं बिल्कुल रॉ थी, मेरे लिए इस इंडस्ट्री की हर चीज़ नई थी. शुरू में मुझे कैमरे की भाषा समझ नहीं आती थी, मुझे समझ नहीं आता था कि मुझे कहां लुक देना है. डायलॉग याद होते हुए भी कई बार मैं कैमरे के सामने फंबल करने लगती थी. उस वक़्त एक साउंड रिकॉर्डिस्ट ने मेरा मज़ाक उड़ाया था. उन्होंने कहा, “इनका कुछ नहीं होने वाला.” उनकी वो बात मुझे इतनी चुभ गई कि मैंने उसे एक चैलेंज तरह लिया और अपने काम पर बहुत मेहनत की. पांच-छह महीने बाद जब मैं ‘कस्तूरी’ शो कर रही थी, तब वो साउंड रिकॉर्डिस्ट मेरे पास आए और बोले, “मैं अपने उस दिन के शब्द वापस लेता हूं, तुम वाकई एक स्टार हो.” उस दिन उन्होंने मुझे बहुत सारी ब्लेसिंग्स दी. कई बार किसी का मज़ाक उड़ाना भी आपके लिए तरक्की के रास्ते खोल देता है, मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ.

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Angoori Bhabhi Shubhangi Atre

आप शूटिंग में इतनी बिज़ी रहती हैं, फिर बेटी के लिए समय कैसे निकाल पाती हैं?
मैंने हमेशा अपनी बेटी को क्वालिटी टाइम दिया है और वो मेरे काम को समझती है. मुझे लगता है कि जब बच्चे घर में ऐसा माहौल देखते हैं, जहां उनके पैरेंट्स अपना काम बहुत मेहनत से करते हैं, तो वो भी उन्हें देखकर वैसा ही करने लगते हैं. बच्चे मां-बाप को देखकर सीखते हैं, आपको इसके लिए अलग से कुछ करने की जरूरत नहीं होती. वर्किंग मदर के बच्चे जल्दी आत्मनिर्भर बनते हैं. हमारे घर में सबके पास अपनी-अपनी चाबी है और सब अपना काम नियम से करते हैं और सभी अपने काम के लिए बहुत मेहनत करते हैं.
– कमला बडोनी