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कहानी- सर्द ज़मीन (Short Story- Sard Zamin)

अकेलापन उसके अंदर इस कदर भर गया था कि दिनभर ऑफ़िस में थकने के बावजूद वह सो नहीं पाती. रात का सन्नाटा उसे तड़पाता. पुरुष की बलिष्ठ बांहों में समा जाने की चाह उसे करवटें बदलते हुए रात बिताने को मजबूर कर देती. क्या उसकी इच्छा अस्वाभाविक थी?

Hindi Kahani

वह बैग उठाए घर की दहलीज़ के बाहर क़दम रख देती है. इसके साथ ही कहानी ख़त्म हो जाती है… लतिका कहानी के समापन को एक अवास्तविक मोड़ मान उसका विश्‍लेषण करने लगती है. कहानी का हर पहलू, हर घटना उसे लगातार उलझन में डालती जाती है. उसे लगता है कि हंसा जैसी महिलाओं का समाज में होना सच है, पर उसके फैसले को कभी भी समाज की स्वीकारोक्ति नहीं मिल सकती है.

पिछले दो ह़फ़्तों से वह लगातार प्रेम कहानियों पर आधारित टीवी पर आनेवाले सीरियल की इस कहानी को देख रही थी. कहानी ‘हंसा’ नाम की एक महिला की थी, जिसके जीवन में अनायास ही एक पुरुष का प्रवेश होता है. पति के ज़्यादातर बाहर रहने व उसे समय न दे पाने के कारण अपनी तन्हा व उदास ज़िंदगी में रंग भरने की इच्छा उस पुरुष से मिलते ही हंसा के मन में पलने लगती है. बार-बार होती मुलाक़ातें नजदीकी बढ़ाती हैं, यहां तक कि उसका 8 वर्षीय बेटा भी उसमें अपने पिता की छवि व प्यार पाने की उम्मीद से उससे जुड़ता चला जाता है. पर पिता के आते ही अंकल की उपस्थिति उसके लिए गौण हो जाती है. उथल-पुथल से घिरी हंसा उस पुरुष के प्यार व सान्निध्य से जान पाती है कि पुरुष का स्पर्श कितना सुखद होता है. उसका साथ कितना विश्‍वास देनेवाला होता है. वह घर छोड़कर उसके साथ जाने का फैसला करती है. लेकिन अपनी बसी-बसायी गृहस्थी व बेटे को छोड़कर चले जाना उसके लिए सहज नहीं था. पर स्वयं के लिए जीने की ख़्वाहिश या पति के साथ बीते नौ वर्षों की पीड़ा शायद उसे स्वार्थी बनने को मजबूर कर देती है.

उसका जाना लतिका को ऐसा लग रहा था मानो किसी असंभव को जान-बूझकर लेखक ने संभव बनाने की कोशिश की है. समाज के नियमों व मर्यादाओं को दरकिनार कर इस तरह का क़दम उठाने की हिम्मत हंसा के अंदर हो ही नहीं सकती थी. उसे तो ज़बरदस्ती उसके अंदर ठूंसा गया था, ताकि नारी शक्ति को प्रस्तुत किया जा सके. फेमिऩिज़्म की परिभाषा को गढ़ने का यह प्रयास लतिका को परेशान किए जा रहा था.

आख़िर क्यों?

कहीं लतिका भी हंसा तो नहीं बनना चाह रही है?

लतिका हंसा नहीं है और हो भी नहीं सकती, लेकिन एक बार उसने भी तो हंसा बनने की कोशिश की थी.

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हर नारी के अंदर कहीं-न-कहीं एक हंसा छिपी होती है. कुछ उसे बाहर निकाल दबी-घुटी ज़िंदगी से छुटकारा पा लेती हैं तो कुछ जीवनभर दर्द के अंधेरे में स्वयं को गुम कर उस गुनाह की सज़ा भुगतती हैं, जो उन्होंने किया तो नहीं, पर उसके बारे में किसी कोने में बैठकर सोचा ज़रूर था. वही सोच उसे जीवनभर एक अपराधबोध, पीड़ा और ग़ुस्से के मिले-जुले भावों से जूझने के लिए मजबूर कर देगी, इसकी तो कल्पना उसने नहीं की थी. वही क्या, कोई भी इस तरह की कल्पना नहीं कर सकता.

लतिका ने भी सोचने की हिम्मत की थी. बहुत बार उसका मन भी किया कि वह इस नीरस और बेमानी ज़िंदगी के खोल से स्वयं को मुक्त कर ले. उसके और राजीव के  बीच शादी के शुरुआती दिनों से ही तालमेल नहीं बैठ पाया था. इसके कारण अनेक थे, जो शारीरिक व भावनात्मक रूप से जुड़े थे. हो सकता है कि उसने ही राजीव को समझने में भूल की हो. लेकिन सच तो यह था कि एक महिला को पुरुष के जिस साथ की अपेक्षा होती है, वह उसे राजीव से नहीं मिला. न ही शारीरिक रूप से और न ही मानसिक रूप से. न तो वह लतिका की ज़रूरतों को समझ पाया, न ही उसके अंदर किसी तरह की अनुभूति जागृत कर पाया. वह हमेशा ‘ठंडी औरत’ होने का ताना सहती रही. राजीव हर बात में उसका मज़ाक उड़ाता. उसकी बेइ़ज़्ज़ती करता. सीधी-सी बात थी कि वह उससे हर तरह से बेहतर जो थी. रंग-रूप, नौकरी व बुद्धि- हर मायने में वह राजीव से बढ़कर थी. ऐसे में राजीव को अपनी हीनभावना से उबरने के बजाय लतिका के अंदर ग़लतियां ढूंढ़ना ज़्यादा आसान लगता.

‘कहा जाता है कि जोड़ियां स्वर्ग में बनती हैं, लेकिन ग़लती तो किसी से भी हो सकती है, इसीलिए अक्सर दो विपरीत दिशाओं में सोचनेवालों की ईश्‍वर जोड़ी बना देता है. वह भी क्या करे, उसके पास काम का दबाव भी तो बहुत रहता है.’ राजीव अक्सर अपने दार्शनिक अंदाज़ में यह बात कहता था, लेकिन वह भी अपने बेमेल विवाह को संभाल नहीं पा रहा था.

दिन-रात के झगड़े और राजीव का जब-तब घर से गायब रहना लतिका को अक्सर सालता रहता. वह जानना भी चाहती कि वह कहां जाता है और क्या करता है तो दो टूक-सा जवाब मिलता, “मैं तुम्हें बताना ज़रूरी नहीं समझता.” वह सामंजस्य बिठाने की बहुत कोशिश करती. राजीव के साथ ही ख़ुशियां ढूंढ़ने की चाह में एक क़दम उसकी ओर बढ़ाती तो वह दो क़दम पीछे हट जाता. शराब की आदत ने उसमें और भी बुराइयां ला दीं. दूसरी महिलाओं का साथ उसे प्रिय लगता था.

जब राजीव और उसके बीच कोई रिश्ता ही नहीं था तो बच्चा होने का तो सवाल ही नहीं उठता था. अकेलापन उसके अंदर इस कदर भर गया था कि दिनभर ऑफ़िस में थकने के बावजूद वह सो नहीं पाती. रात का सन्नाटा उसे तड़पाता. पुरुष की बलिष्ठ बांहों में समा जाने की चाह उसे करवटें बदलते हुए रात बिताने को मजबूर कर देती. क्या उसकी इच्छा अस्वाभाविक थी? राजीव और वह अलग-अलग कमरों में सोते थे. शराब पीकर होश खोकर सोना कितना आसान होता है. किसी क़िस्म का ख़याल या भूख तब परेशान नहीं करती.

जीने का हक़ हर किसी को है, एक चिड़िया भी तमाम जिजीविषाओं को पूरा करने के लिए निरंतर प्रयास करती रहती है. उसके अंदर तो दिल, दिमाग़, भावनाएं सभी थीं. एक बार ऑफ़िस के टूर से दो दिन के लिए मुंबई गई थी. वहां उसका स्वागत आलोक ने ही किया था. वहां की ब्रांच का हेड था वह. दो दिन तक साए की तरह उसके साथ रहा. जान-पहचान, समान स्वभाव और मानसिक रूप से तालमेल बैठने से उनके बीच ऐसी दोस्ती हुई कि वापस आकर भी ऑफ़िस के काम के अतिरिक्त संवाद कायम रहा. फ़ोन, ईमेल और चैटिंग… बड़े ही ख़ुशनुमा पल हुआ करते थे वे.

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लतिका की बंधी-बंधाई ज़िंदगी में कुछ परिवर्तन आया. जैसे शांत सागर की लहरों में उफान आने लगा हो. दोनों ही अपने स्थिर जीवन से उकता चुके थे, शायद इसीलिए निकटता का सेतु बहुत जल्दी कायम हो गया. आलोक को अपना तन-मन समर्पित करने की तीव्र इच्छा लतिका को बार-बार उकसाने लगी. आलोक भी अपनी पत्नी से रिश्ता तोड़ उसके साथ जीवन बिताने को तत्पर था. तभी एक दिन लतिका के अंदर भी राजीव को छोड़ने की सोच उपजी. बेमानी रिश्ते को ढोने से फ़ायदा भी क्या था?

लेकिन इसी बीच पता चला कि राजीव का लिवर ख़राब हो गया है. शराब नहीं छोड़ी तो गुर्दे भी ख़राब हो सकते हैं. अस्पताल में भर्ती करा वह जी-जान से उसकी सेवा में जुट गई. पत्नी का फ़र्ज़ बाकी इच्छाओं पर भारी पड़ा. वैसे भी उस जैसे कमज़ोर इंसान को वह इस व़क़्त कोई झटका नहीं दे सकती थी. आलोक उसे समझेगा, यह भरोसा था उसे. पर आलोक का अस्पताल में आना राजीव को खल गया. बिस्तर पर लेटे-लेटे ही उसने उससे बिना कुछ कहे, बिना पूछे अपने मन में अनगिनत जाल बुन डाले. अविश्‍वास की झलक उसकी आंखों में देख लतिका ने उसे समझाना चाहा, पर उसकी हीनता ने तब तक उस पर गालियों के चाबुक बरसा डाले थे.

वह चुप हो गई. क्या फ़ायदा था ऐसे आदमी को किसी तरह का जस्टिफ़िकेशन देने का? वैसे भी सच को सुनने की समझ उसमें थी ही नहीं. आलोक लौट गया. कमज़ोरी और बेबसी से आतंकित राजीव को भला किस तरह की चुनौती दे? आलोक लतिका को अपने पास आने को कहता.

आलोक से उसकी मुला़क़ात फिर कभी नहीं हुई. न ही किसी और तरह से उन्होंने एक-दूसरे से संपर्क स्थापित करने की कोशिश की. मानो बिना कहे ही वे यह समझौता करने को तैयार हो गए थे. राजीव की हालत कुछ सुधरी तो वह उसे घर ले आई. उसकी सेवा और देखभाल ने उसे उठने के क़ाबिल बना दिया. पर राजीव का व्यवहार और सोच कुछ अधिक संकुचित होता चला गया था. उसकी नज़रों में लतिका ‘ठंडी औरत’ से ‘गिरी हुई औरत’ हो गई थी.

लतिका अपनी उस सोच को कोसती, जिसने उसे ख़्वाब देखने के लिए उकसाया था. कभी लगता कि उसे राजीव को बीमारी की हालत में ही छोड़कर चले जाना चाहिए था. वह हर ओर से रिक्त हो गई थी. देखे गए सपने उसे और तंग करते. बिस्तर पर दम तोड़ती इच्छाएं उसे अब जड़ बनाने लगी थीं. ‘ठंडी औरत’ ही बनेगी अब वह. दिन-रात के ज़ुल्म और प्रताड़ना सहने के बावजूद वह

राजीव को छोड़ने की हिम्मत नहीं कर पाई. वह कमज़ोर थी शायद. तभी तो राजीव उसे छोड़कर चला गया. साथ में महानता का लबादा भी ओढ़ लिया.

‘तुम आलोक के साथ ख़ुश रह सको, इसलिए जा रहा हूं. तुम आज से मुक्त हो.’ पत्र में लिखी इन पंक्तियों को पढ़ उसे लगा कि वह बेदर्दी से छली गई है.

राजीव जब साथ था, वह उसकी हीनता का बोझ ढोती रही और अब उसके जाने के बाद उसकी महानता का बोझ ढोने पर मजबूर है. अपनी ख़ुशियों को बंटोर कर अंजुरी में भरने की उसे इतनी बड़ी सज़ा मिलेगी, उसने सोचा न था. राजीव को क्या पता कि उसकी अंजुरी में से ख़ुशियां और तमाम इच्छाएं तो कब की फिसल कर सर्द और गीली ज़मीन पर बिछ चुकी हैं.

Suman Bajpai

   सुमन बाजपेयी

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कहानी- जीवनधारा (Short Story- Jeevandhara)

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बहुत ख़ुश थी मैं. मुझे जब पहली तनख़्वाह मिली, तो मम्मी-पापा और सास-ससुर के लिए उपहार ख़रीदा. मेरे लिए वो दो घंटे बेहद ख़ुशनुमा होते थे, जब मैं गुड्डू की बहू से अपराजिता बनती, पर समय हमेशा एक-सा नहीं होता न. जब कर्नल दुरानी ने गेस्ट हाउस की लीज़ ख़त्म होने की ख़बर मुझे सुनाई, तो मैं सन्न रह गई. लगा, अब मैं ज़िंदगीभर गुड्डू की बहू बनकर ही रह जाऊंगी.

आज मुझे ‘बेस्ट कॉर्पोरेट एक्ज़ीक्यूटिव’ का पुरस्कार मिला है. हाथ में इस ट्रॉफी को थामे अपनी कार में बैठकर मैं ख़ुद को दुनिया की महारानी महसूस कर रही हूं.

आज से 25 साल पुरानी बात यूं लगती है जैसे कल की ही बात हो. इंजीनियरिंग के आख़िरी साल में एक दिन जब मेरे हॉस्टल की सभी लड़कियां अपने करियर के बारे में बातें कर रही थीं, तभी मम्मी की चिट्ठी आई. चिट्ठी पढ़ी, तो अवाक् रह गई. लिखा था कि तुम्हारी शादी गुड्डू से तय हो गई है.

गुड्डू मेरी बुआ की जेठानी का लड़का था. बचपन में देखा था, पर कभी उस नज़र से नहीं. इतने सालों बाद आज भी नहीं बता सकती कि मैं शादी की ख़बर पर ख़ुश हुई थी या दुखी. ख़ैर, परीक्षा ख़त्म करके घर पहुंची. चार दिन में फटाफट शादी निपट गई और मैं अपराजिता से गुड्डू की बहू बनकर दिल्ली आ गई. हां, मैं इस बात से बेहद ख़ुश थी कि मैं दिल्ली आ गई. हर छोटे शहर की लड़की की तरह मेरा भी सपना था कि मैं मेट्रो सिटी में जाकर नौकरी करूं.

ससुराल में सभी मेरे रंग-रूप, समझदारी, शिष्टता और फर्राटेदार इंग्लिश के कायल थे. साधारण शक्ल-सूरत और कम बोलने वाले प्रवीण मेरे आगे ख़ुद को दबा हुआ महसूस करते थे. ये मैंने तब जाना, जब उन्होंने मुझे किसी से भी बात करने पर टोकना शुरू कर दिया. मेरी हर बात में कमी निकालना, लोगों से मिलने-जुलने पर रोक लगाना, चटकीले कपड़े पहनने से रोकना, ये सब रूटीन बातें हो गईं.

इसी दौरान जब मैंने प्रवीण से अपनी नौकरी की बात की, तो वे बिफर गए. कहने लगे, “क्या तुम्हें अपने पति पर इतना भी भरोसा नहीं कि वो तुम्हें कमाकर खिला सके?” रोती-सिसकती मैं सोचती रही कि क्या मेरे प्रो़फेसर पापा ने मुझे इंजीनियरिंग पढ़ाकर ग़लती की? ख़ैर, इसी बीच पता चला कि अनाम्या मेरे गर्भ में है. इस ख़ुशी में मैं सब भूल गई. बहुत-सी तकलीफ़ों के बाद जब पहली बार उसे अपने हाथों में थामा तो ख़ुद से एक वादा किया कि कभी भी इसकी ज़िंदगी अपनी जैसी नहीं होने दूंगी. यह अपनी मर्ज़ी की ज़िंदगी जीएगी.

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अनाम्या स्कूल जाने लगी. फिर से मेरी ज़िंदगी में वही खालीपन आ गया. दूसरे बच्चे के बारे में भी नहीं सोच सकती थी, क्योंकि डॉक्टर ने पहले बच्चे के समय ही चेतावनी दे दी थी कि दूसरा बच्चा प्लान करने पर जान को ख़तरा हो सकता है. इसी बीच प्रवीण अपने काम के लिए घर पर कंप्यूटर ले आए. मुझे तो जैसे खिलौना मिल गया था. बस, रात-दिन यही धुन रहती कि किसी भी तरह मैं कंप्यूटर का हर एप्लीकेशन सीख जाऊं.

धीरे-धीरे मैं कंप्यूटर में इतनी माहिर हो गई कि प्रवीण के कंप्यूटर के सारे काम मैं ही करने लगी. वे भी बेहद ख़ुश थे. एक तो मुफ़्त की कंप्यूटर ऑपरेटर मिल गई थी और मेरे हुनर को बरबाद करने की ग्लानि भी जाती रही. बाद में हमने घर पर ही साइबर कैफे खोल लिया और वहीं पर मैं लोगों को कंप्यूटर सिखाने लगी. अब ज़िंदगी पहले से बेहतर लगने लगी थी.

लोग नए मिलेनियम के लिए तैयार थे और मेरी ज़िंदगी में भी नया अध्याय शुरू होनेवाला था. रिटायर्ड कर्नल दुरानी मेरे साइबर कैफे कम कंप्यूटर इंस्टिट्यूट के सबसे होशियार स्टूडेंट थे. हमारी ख़ूब जमती थी. वो हमेशा कहते थे कि अपराजिता, तुम अपना टैलेंट बरबाद कर रही हो. रिटायर होने के बाद कर्नल दुरानी एक मल्टीनेशनल कंपनी के लिए गेस्ट हाउस चलाते थे. उनका गेस्ट हाउस हमारे घर से सौ गज की दूरी पर था. उन्होंने उसी गेस्ट हाउस में मैनेजर की नौकरी मुझे ऑफ़र की.

दिल में फिर से एक उम्मीद जागी. स़िर्फ दो घंटे के लिए जाना था और गेस्ट हाउस भी घर के इतने पास था कि प्रवीण को मनाना मुश्किल न था.

बहुत ख़ुश थी मैं. मुझे जब पहली तनख़्वाह मिली, तो मम्मी-पापा और सास-ससुर के लिए उपहार ख़रीदा. मेरे लिए वो दो घंटे बेहद ख़ुशनुमा होते थे, जब मैं गुड्डू की बहू से अपराजिता बनती, पर समय हमेशा एक-सा नहीं होता न. जब कर्नल दुरानी ने गेस्ट हाउस की लीज़ खत्म होने की ख़बर मुझे सुनाई, तो मैं सन्न रह गई. लगा, अब मैं ज़िंदगीभर गुड्डू की बहू बनकर ही रह जाऊंगी. साइबर कैफे का ट्रेंड भी तब तक ख़त्म हो चुका था. मुझे घर की चारदीवारी के अलावा कोई रास्ता नहीं दिख रहा था.

चार महीने से घर पर रहते हुए मैं अवसादग्रस्त हो गई. प्रवीण से लड़ती, अनाम्या को डांटती और कुढ़ती रहती. किसी से मिलना-जुलना, यहां तक कि फ़ोन पर बात करना भी बंद कर दिया था. लगता था कि सब मुझ पर हंस रहे हैं. जैसे कह रहे हों, “बड़ा इस उम्र में नौकरी करने चली थी. लौट के बुद्धू घर को आए…” पूरी तो नहीं, पर आधी पागल तो मैं हो ही गई थी.

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कर्नल दुरानी ने जब मेरे बारे में सुना, तो मिलने के लिए मेरे घर चले आए. बातों ही बातों में उन्होंने बताया कि उनके एक मित्र किसी मल्टीनेशनल कंपनी की शाखा भारत में खोलना चाहते हैं. उन्हें ऑफ़िस असिस्टेंट की ज़रूरत है, फिर कुछ सोचते हुए उन्होंने कहा, “अपराजिता, तुम उस पद के लिए आवेदन क्यों नहीं भरती?”

मैं भौंचक्की रह गई. इस उम्र में बिना किसी अनुभव के, वो भी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी! उन्होंने बहुत ज़ोर दिया, तो बिना किसी उम्मीद के मैं इंटरव्यू के लिए तैयार हो गई. धड़कते दिल से जब पांच सितारा होटल में इंटरव्यू के लिए पहुंची तो मिस्टर कुलकर्णी को देखकर मेरे हाथ-पांव फूल गए. 6 फ़ीट के मिस्टर कुलकर्णी मुझे बेहद रोबीले लगे, पर जब उनसे बात की तो काफ़ी सरल लगे.

इंटरव्यू भी अजीब था. जितने सवाल उन्होंने मुझसे किए, उससे कहीं ज़्यादा मैंने उनसे. “क्या इस उम्र में बिना किसी अनुभव के मैं यह काम कर पाऊंगी?” पूछने पर उन्होंने मुझे समझाया, “अपराजिता, तुम इंजीनियर हो, इतनी अच्छी अंग्रेज़ी बोलती हो, कंप्यूटर एक्सपर्ट हो और सबसे बड़ी बात है कि तुम काम करना चाहती हो. मैंने फैसला किया है कि इस पद के लिए तुम ही उपयुक्त उम्मीदवार हो.”

मैं तो सातवें नहीं, आठवें आसमान पर थी. पर कोई और भी था, जो मुझसे भी ज़्यादा ख़ुश था. वो थी मेरी टीनएजर बेटी. जब उसने मुझसे कहा, “ममा, मुझे आप पर गर्व है”, तो ऐसा लगा जैसे दुनिया की सारी ख़ुशियां मुझे मिल गई हों. मां-बेटी की जुगलबंदी के आगे प्रवीण भी हार गए और मुझे 38 साल की उम्र में अपना करियर शुरू करने का मौक़ा मिल ही गया.

संघर्ष यहीं ख़त्म नहीं हुआ. जिस ‘अपराजिता’ नाम की पहचान के लिए मैं इतनी परेशान थी, वह पहचान बनाने के लिए मुझे अब भी संघर्ष करना पड़ रहा था. जब मुझसे आधी उम्र की लड़कियां मेरा नाम लेकर बुलातीं, तो बेहद अजीब लगता. हर दिन एक नई चुनौती थी. पर मन में बस यही ठाना था कि कुछ भी हो, मुझे चारदीवारी में वापस कैद नहीं होना.

समय बीतता गया. मैं अपनी मेहनत और लगन से काम सीखती चली गई और यहां इस मुक़ाम तक पहुंच गई कि मुझे ‘बेस्ट कॉर्पोरेट एक्ज़ीक्यूटिव’ के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. मेरी कहानी शायद बहुत ख़ास नहीं है, पर फिर भी

चाहती हूं कि अपनी इस कहानी को हर उस औरत के साथ बांटूं, जो शादी, बच्चे-परिवार में गुम होकर अपने करियर को भूल-सी गई है. कोई बात नहीं, अगर आप आज कुछ नहीं कर पा रहीं, तो बस अपने आप को अपडेट रखें. करियर तो कभी भी शुरू किया जा सकता है.

बहुत साल पहले मेरी एक सहकर्मी थी अंकिता. उसे लिखने का बहुत शौक़ था.

वह अक्सर कहती थी, “अपराजिता, तुम्हारी कहानी सबको पता चलनी चाहिए, मैं एक दिन ज़रूर लिखूंगी.”

चलो, उसको फ़ोन करती हूं. दिल कर रहा है उससे बहुत कुछ कहने-सुनने का. अपनी जीवनधारा के अनकहे पन्नों को ख़ुद में समेट मैंने घर में प्रवेश किया, तो मेरी नातिन मचलती हुई मेरी तरफ़ भागी, इस ट्रॉफी को लेने के लिए.

Ankita Kashyap

 अंकिता कश्यप

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कहानी- खाली कमरे के मेहमान (Short Story- Khali Kamare Ke Mehman)

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“पागलोंवाली बात है तो पागलोंवाली ही सही. जानते हैं पापाजी, जब मैंने यूएस की अपनी अच्छी-ख़ासी नौकरी छोड़ अपने माता-पिता के साथ रहने के लिए भारत आने का निर्णय लिया, तो वहां भी सबने मुझे यही कहा कि मैं पागलोंवाली बात कर रहा हूं, मगर मैं जानता था कि मैं जो कर रहा हूं, सही कर रहा हूं.”

पुणे शहर के कोलाहल और प्रदूषण को पीछे छोड़ कार तेज़ी से आगे बढ़ रही थी. जैसे ही सुधाकर को छोटी-छोटी पहाड़ियों और हरियाली के दर्शन शुरू हुए, उन्होंने विंडो ग्लास नीचे कर गहरी सांस इस तरह से खींची जैसे एक ही सांस में पूरे वायुमंडल को अपने फेफड़ों में भर लेना चाहते हों.

“बेटा, एसी बंद कर दो. अब उसकी ज़रूरत नहीं. देखो तो बारिश की हल्की फुहार से आबोहवा में कैसी सोंधी महक घुल गई है. वाह! तबीयत हरी-भरी हो गई.” उन्हें यूं प्रसन्न देख पत्नी सुमन भी मुस्कुराईं.

“तुम्हारे रेडियो में विविध भारती नहीं है क्या?” मौसम सुहावना होता देख उन्होंने एफएम सुन रहे रवि से चैनल बदलने की फ़रमाइश कर डाली. गाना ट्यून हुआ ‘मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया…’,

“वाह! सोने पे सुहागा. मैं ज़िंदगी का साथ…” वे सुमन को देखते हुए गाने के साथ गुनगुनाने लगे. दोनों एक-दूसरे की आंखों में झांककर मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे. आंखों में बेटे द्वारा दिए जानेवाले सरप्राइज़ गिफ्ट का कौतूहल था. कुछ समझ नहीं आ रहा था कि कहां ले जाए जा रहे हैं, फिर भी वे दोनों आनंदित थे.

एक सरकारी महकमे से रिटायर्ड क्लर्क सुधाकर बड़े आदर्शवादी थे. भले ही कितने  अभाव रहे हों, उन्होंने कभी ऊपर की कमाई स्वीकार नहीं की. ऐसे धन को हाथ लगाना भी उनके लिए पाप था. अपनी तीनों संतानों- बड़े बेटे निपुण, बेटी सारिका और छोटे बेटे प्रणव की सीमित संसाधनों में बड़ी मितव्ययिता से परवरिश की थी उन्होंने. जब उनके सहकर्मी रिश्‍वत की कमाई से अपने घर बना रहे थे, तो वे दो कमरों के छोटे से किराए के घर में ही संतुष्ट थे.

सुधाकर के सहकर्मी अक्सर उन्हें उलाहना देते, “ऊपर का तू लेता नहीं और जो तेरी गाढ़ी कमाई है, वह हैसियत से बढ़कर बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर ख़र्च कर रहा है, तो तेरे बुढ़ापे के लिए क्या बचेगा?”

वे बड़ी उम्मीद और आत्मविश्‍वास से सिर उठाकर कहते, “मेरे बच्चे पढ़-लिख गए, तो वे ही मेरे लिए घर बना देंगे. मुझे पाप की कमाई से बना घर नहीं चाहिए.” उनकी आदर्शवादी बातों का ऑफिस में जमकर मखौल उड़ाया जाता, मगर वे ज़रा भी विचलित नहीं होते. उनकी पत्नी सुमन ने भी घर और बच्चों को कुछ इस तरह से संभाला था कि भले ही कुछ जोड़ नहीं पाए, मगर समय के साथ सब ज़िम्मेदारियां सहजता से पूरी होती चली गई थीं.

आज की तारीख़ में निपुण और उसकी पत्नी ईला, दोनों अमेरिका में सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे. उसके दो किशोरवय बच्चे थे. सारिका नागपुर के एक कॉलेज में बॉटनी की लेक्चरर थी. वह भी अपने पति और बेटे के साथ सुखी जीवन व्यतीत कर रही थी. छोटे बेटे प्रणव की मुंबई में रिक्रूटमेंट कंसल्टेंसी फर्म थी, जिसमें उसकी पत्नी रागिनी भी उसका सहयोग करती थी. तीनों बच्चों के डाली-पत्ते लगने के बाद पुणे में दोनों पति-पत्नी अकेले रह गए थे. निपुण और प्रणव ने न जाने कितनी बार उन्हें अपने साथ शिफ्ट हो जाने को कहा, मगर अपने पुराने शहर का मोह क्या छूटता है कभी. सो दोनों पुणे छोड़ कहीं और जाने को तैयार न थे. साल में एक बार सभी बच्चे मिलने आ जाते. फोन पर तो बात होती ही रहती. बस, वे दोनों इसी से संतुष्ट थे.

सुधाकर और सुमन, दोनों मानकर बैठे थे कि अब वे ही एक-दूसरे के बुढ़ापे का सहारा हैं. मगर छह महीने पहले निपुण ने एक अप्रत्याशित निर्णय सुनाया कि वह सालभर के अंदर-अंदर पुणे शिफ्ट हो जाएगा और उन लोगों के साथ ही रहेगा. पहली बार में उनको बेटे की बात पर विश्‍वास नहीं हुआ. सोचा, वह भला अपनी इतनी अच्छी नौकरी और लक्ज़री लाइफ छोड़ वापस भारत क्यों आने लगा? और बात स़िर्फ अकेले उसकी नहीं थी, उनके दोनों बच्चे अमेरिका में पढ़ रहे थे. ईला भी जॉब करती थी. ऊपर से ईला की तो इकलौती बहन भी उसी के शहर में रहती थी, फिर वह क्यों आने लगी सब छोड़-छाड़कर?

दोनों ने इसे क्षणिक भावावेश मानकर बात आई-गई कर दी. मगर आज सुबह सुमन के 68वें जन्मदिन के अवसर पर निपुण का पुनः फोन आया, “पापा-मम्मी, शाम चार बजे तैयार रहना. मेरा दोस्त रवि आएगा आपको लेने के लिए, आपको उसके साथ कहीं जाना है. कहां जाना है यह सरप्राइज़ है. दरअसल, आपका सरप्राइज़ गिफ्ट है.” अब बेटे ने जो करने को कहा, वह उन्होंने किया. रवि आया और उन्हें कार में बैठाकर ले गया. वह सफ़र अभी भी जारी था.

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“बेटा, अब तो बता दो कहां ले जा रहे हो, बड़ी देर हो गई है चले हुए?” व्याकुल सुधाकर ने पुनः पूछा.

“बस, अंकलजी आ गया.” कहते हुए रवि ने एक बड़े-से घर के सामने कार रोक दी. “आंटीजी, ये घर देख रही हैं ना आप, यही है आपका बर्थडे गिफ्ट. ये आलीशान डुप्लेक्स घर, आपके बेटे की तरफ़ से.” रवि ने जब उस घर की ओर इशारा करते हुए कहा, तो दोनों को विश्‍वास ही नहीं हुआ. ‘ज़रूर इसे समझने में कोई ग़लती हुई है, इतना बड़ा घर… कोई मज़ाक है क्या…’ दोनों विस्मित से एक-दूसरे की ओर देखने लगे.

“रुको बेटा, मैं निपुण को फोन लगाता हूं. तुम्हें ज़रूर कुछ ग़लतफ़हमी हुई है.” वे कह ही रहे थे कि ख़ुद निपुण का फोन आ गया.

“कहिए पापा, कैसा लगा सरप्राइज़ गिफ्ट? अंदर से देखा क्या? रवि के पास चाबी है, वह आपको दिखा देगा.” निपुण की बात सुन सुधाकर स्तब्ध रह गए. सुमन को आंखों ही आंखों में कहा, रवि सही कह रहा है.

“मगर बेटा ये…”

“अगर-मगर कुछ नहीं पापा, ये घर मैंने ख़रीदा है. इंडिया शिफ्ट होने के बाद हम सब यहीं रहेंगे. आप उस घर के मालिक हो, मालिक की तरह अंदर जाना. चलिए पापा, कुछ ज़रूरी काम है, बाद में फोन करता हूं. घर देखकर बताइएगा कैसा लगा.” कहकर निपुण ने फोन रख दिया.

‘मालिक की तरह.’ सुधाकर अभिभूत हो उठे. कानों में बरसों पुराने साथियों की फ़ब्तियां गूंजने लगीं, ‘देखा, मैं ना कहता था, मेरा घर मेरे बच्चे बना देंगे.’ वे पुनः बुदबुदाए. कितना सुखद क्षण था वह उनके जीवन का. पूरी उम्र की तपस्या का जैसे आज फल मिला था. उस फल को चखने दोनों सधे क़दमों से घर के अंदर दाखिल हुए.

“अंकलजी, इस घर के इंटीरियर का काम निपुण ने मुझे ही सौंपा है. यह काम मुझे चार महीनों में पूरा करना है, वह चाहता है आपकी शादी की सालगिरह पर गृहप्रवेश हो जाए. तब तक वह भी यहां शिफ्ट हो जाएगा.”

“मगर बेटा यहां आकर करेगा क्या, हमें तो कुछ नहीं बताया, तुम्हें कुछ पता है क्या?”

“ज़्यादा कुछ तो नहीं, मगर कह रहा था यहां आकर अपनी एक कंपनी खोलना चाहता है. दोनों पति-पत्नी एक ही फील्ड में हैं, मिलकर चला लेंगे. बच्चे तो वैसे भी अगले साल से अमेरिका के एक हॉस्टल में रहेंगे.”

“अच्छा, ऐसी बात है.” सुधाकर घर का निरीक्षण करते हुए बोले.

“अंकलजी, यहां नीचेवाले फ्लोर पर तीन कमरे हैं. तीन कमरे ऊपर हैं. ऊपरवाला हिस्सा निपुण का है. एक-एक कमरा दोनों बच्चों का और एक उनका है. नीचे का यह कमरा आपका है.”

“इतना बड़ा कमरा!” सुमन की आंखें चौंधिया गईं. इतनी बड़ी जगह में तो अब तक उसने पूरे परिवार को पाला था.

“और बाकी दो कमरे?” सुधाकर ने पूछा.

“इनमें एक गेस्टरूम है, बाकी दूसरा आपके कमरे जितना ही बड़ा है, इसे भी निपुण ने आपके कमरे जैसा ही तैयार करने को कहा है, पर यह किसका है, मुझे नहीं पता.” रवि ने कहा.

नीचे के कमरों के बाहर बरामदा और उससे आगे बड़े-से लॉन के लिए भी जगह थी.

“आंटीजी, लॉन की एक साइड में आपके लिए मंदिर बनेगा. उसे मैं आपसे डिज़ाइन अप्रूव कराकर ही बनवाऊंगा.” सुनकर सुमन के चेहरे पर बच्चों जैसी ख़ुशी दौड़ पड़ी. वह मन ही मन अपने लायक बेटे की बलाइयां ले रही थीं, जिसने उनका इतना ध्यान रखा था.

“पूरे घर को अच्छे से देख-परख दोनों मंत्रमुग्ध से घर की ओर लौट पड़े. नया आलीशान घर, घर के पीछे दिखती पहाड़ियां और हरियाली… और सबसे बड़ी बात, उस घर में उनके बेटे-बहू उनके साथ रहनेवाले थे. उनके बुढ़ापे का सहारा बननेवाले थे. आज उनके पैर ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे. वे स्वयं को दुनिया के सबसे ख़ुशनसीब माता-पिता मान रहे थे.

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घर पहुंचकर सुमन चाय ले आई, मगर सुधाकर अभी भी जैसे उसी घर में चक्कर लगा रहे थे. “अकेले बैठे क्या सोच मुस्कुरा रहे हैं मकानमालिक साहब.” पत्नी के मुंह से यह नया संबोधन सुनकर सुधाकर गर्वित हो उठे.

“सच सुमन, सब कुछ एक सपने जैसा लग रहा है. निपुण का यहां आना, हमारे साथ रहने के लिए नया घर लेना, मुझे मालिक कहना, बड़ा अजीब लग रहा है. अभी तक तो हमेशा किराएदार ही बनकर रहा हूं.”

“तो अब मालिक बनने की आदत डाल लीजिए. मैं तो पहले ही कहती थी, हमारे बच्चे लाखों में एक हैं, नए ज़माने की हवा उन्हें नहीं लगी. आपने हमेशा उनका कितना ख़्याल रखा, अब उनकी बारी है. वैसे मानना पड़ेगा, हमारी बहू ईला भी लाखों में एक है, वरना आज के ज़माने में अपनी जमी-जमाई गृहस्थी छोड़ सास-ससुर के साथ रहने कौन बहू आती है. उसने हमें हमेशा ही अपने माता-पिता जैसा आदर दिया है.”

“वो तो है. अच्छा एक बात बताओ, वो हमारे साथवाला कमरा किसके लिए रख छोड़ा है निपुण ने? रवि ने भी कुछ नहीं बताया.”

“और किसके लिए होगा, प्रणव के लिए ही होगा, बहुत प्यार करता है वह अपने छोटे भाई से. सोचा होगा, जब भी वह मुंबई से आएगा, अपने कमरे में ही रुकेगा.”

सुमन पूरे आत्मविश्‍वास से बोली.

“पता नहीं क्यों मुझे लगता है वह कमरा सारिका के लिए है. याद है ना पिछले रक्षाबंधन पर जब दोनों मिले थे, निपुण ने उसे कहा था, अगली बार तुझे ऐसा गिफ्ट दूंगा, हमेशा याद रखेगी.” सुधाकर कुछ सोचते हुए बोले.

“हां, कहा तो था, पर फिर भी मुझे लगता है प्रणव का ही होगा. बेटियां तो

दो-चार दिन के लिए मायके आती हैं और फिर उसके लिए गेस्टरूम तो है ही. हो सकता है निपुण की योजना हो कि यहां आकर वह प्रणव को भी मुंबई से यहां अपने पास बुला लेगा और दोनों भाई साथ मिलकर कुछ काम कर लेंगे. इस तरह से पूरा परिवार एक साथ रह सकेगा.”

“हां, तुम्हारी बात में दम तो है. हो सकता है ऐसा ही हो.” सुधाकर बोले.

“हो सकता है नहीं, बल्कि सौ प्रतिशत ऐसा ही है, तुम देख लेना.” सुधा ने भविष्यवाणी कर दी थी.

देखते-देखते पांच महीने गुज़र गए. नए घर का इंटीरियर पूरा हो गया था. आज गृहप्रवेश की पूजा थी, अतः उसे फूलों और झालरों से ख़ूब सजाया गया था. निपुण, प्रणव, सारिका तीनों सपरिवार आ चुके थे. सारिका के सास-ससुर, बहू ईला, रागिनी के माता-पिता, और बाकी सभी मेहमान भी आ चुके थे. पूजा के बाद प्रीतिभोज का आयोजन था. गृहप्रवेश की पूजा संपन्न हुई. सुमन ने बहू ईला और रागिनी के साथ घर में विधिवत् प्रवेश किया. पूरा घर खुला था सिवाय उस एक बंद कमरे के जिसका कौन मेहमान है, यह अभी भी मिस्ट्री थी. उस कमरे के दरवाज़े पर लाल रिबन लगा हुआ था. सभी निपुण से पूछ रहे थे, ‘अभी तो बता दो कि यह सुंदर कमरा किसके लिए सजा है.’ मगर वह चुप था. सुधाकर धीरे से सुमन के कान में फुसफुसाए, “हमें पता है इसका सरप्राइज़, इस रिबन को यह अपने छोटे भाई के हाथ से ही कटवाएगा.” और मुस्कुरा उठे. सुमन भी दोनों बेटों के साथ रहने की कल्पना से आह्लादित थी.

तभी निपुण ने सबको इकट्ठाकर एक उद्घोषणा शुरू की. “आज सुबह से सभी मुझसे एक ही सवाल पूछ रहे हैं, यह लाल रिबन लगा कमरा किसका है? आप सभी को यह जानने की बड़ी उत्सुकता है कि आख़िर इस खाली कमरे का मेहमान कौन है, माफ़ कीजिए मेहमान नहीं, बल्कि मालिक कहना चाहिए. कौन है जो इसमें हमारे साथ रहेगा, तो अब मैं इस रहस्य से पर्दा उठाता हूं, वे हैं मेरे दूसरे मम्मी-पापा यानी मेरे आदरणीय सास-ससुर. यह कमरा उन्हीं के लिए बना है और आज मैं उन्हीं को समर्पित करता हूं. मैं उनसे विनती करता हूं कि वे आएं और इस रिबन को काटकर इस कमरे में गृहप्रवेश करें.”

यह सुनते ही सबके मुंह खुले के खुले रह गए. निपुण की इस योजना की ख़बर तो ईला को भी नहीं थी, वह भी इस उद्घोषणा से स्तब्ध रह गई… और सुधाकर एवं सुमन.., उन्होंने तो यह कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि निपुण ऐसा कुछ भी कर सकता है. ‘बेटी के माता-पिता कब उसकी ससुराल आकर रहते हैं, चलो कुछ दिनों के लिए आ भी गए, मगर मेहमान बनकर ही आते हैं और मेहमानों की तरह चले जाते हैं. मालिक की तरह हक़ से तो कभी नहीं रहते. और क्या ये अच्छा लगता है? लोग क्या कहेंगे? ये सब अमेरिका में चलता होगा यहां नहीं, दुनिया क्या कहेगी?’ सुमन के भीतर स्वसंवादों की लहर दौड़ रही थी. ‘इसे अकेले में ले जाकर समझाना पड़ेगा…’ वह सोच ही रही थी कि ईला के माता-पिता स्वयं निपुण का विरोध करने लगे.

“ये क्या कह रहे हो बेटा, हम यहां कैसे रह सकते हैं. ये हमारी बेटी का ससुराल है.”

“क्यों नहीं रह सकते पापाजी? एक तरफ़ तो आप मुझे बेटा बोल रहे हैं और दूसरी तरफ़, कैसे रह सकते हैं, सोच रहे हैं. इस घर में जैसे मेरे माता-पिता रहेंगे, वैसे ही आप दोनों रहेंगे. जिस हक़ से वे रहेंगे, उसी हक़ से आप भी रहेंगे. ये खाली मेरा ही नहीं, आपकी बेटी का भी घर है.”

“ये तो तुम बिल्कुल पागलोंवाली बातें कर रहे हो, ऐसा भी कभी होता है क्या, ईला तुम ही समझाओ अपने पति को.” सुमन को लगा जैसे उनके समधी ने उसके मुंह की बात छीन ली. वह मन ही मन ख़ुश हुई.

“पागलोंवाली बात है तो पागलोंवाली ही सही. जानते हैं पापाजी, जब मैंने यूएस की अपनी अच्छी-ख़ासी नौकरी छोड़ अपने माता-पिता के साथ रहने के लिए भारत आने का निर्णय लिया, तो वहां भी सबने मुझे यही कहा कि मैं पागलोंवाली बात कर रहा हूं, मगर मैं जानता था कि मैं जो कर रहा हूं, सही कर रहा हूं. मैंने अपने पापा से और आपसे भी कितनी बार कहा हमारे पास आ जाओ, मगर आप नहीं माने. अब आप लोगों की उम्र हो चली है. आए दिन कुछ-न-कुछ बीमारी लगी रहती है. मैं और ईला वहां बैठे-बैठे कुछ नहीं कर सकते. मेरे पैरेंट्स की देखरेख करने के लिए तो फिर भी यहां प्रणव और सारिका हैं, मगर आपकी तो दोनों ही बेटियां बाहर हैं. आपको तो यहां देखनेवाला कोई नहीं, इसलिए मैंने सोचा, क्यों न आप भी हमारे साथ ही रहें. इस तरह से मैं और ईला अपने दोनों पैरेंट्स का ख़्याल रख पाएंगे.”

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“लेकिन बेटा, दुनिया क्या कहेगी? हमें उलाहना देगी कि कैसे मां-बाप हैं, बेटी की ससुराल आकर पड़ गए?”

“दुनिया तो तब भी कुछ न कुछ कहेगी, जब आपके यहां न आने की स्थिति में मैं ईला को आपके पास छोड़ दूंगा. फिर वही दुनिया कहेगी कि शादी के इतने सालों बाद बेटी मायके आकर पड़ गई. अब निर्णय आपके हाथों में है. यह तो तय है कि इस उम्र में मैं अपने दोनों पैरेंट्स को अकेले रहने के लिए नहीं छोड़ूंगा. या तो आप यहां आएंगे या हम दोनों में से कोई एक आपके साथ रहेगा, निर्णय आपके हाथों में है. आप अपने बेटी-दामाद को अलग रखना चाहते हैं या उनके साथ रहना चाहते हैं.” निपुण ने ऐसा इमोशनल ब्लैकमेल किया कि उसके सास-ससुर निरुत्तर हो गए.

यह सुनकर ईला की आंखें भर आईं. आंखों से छलके आंसू जैसे निपुण के निर्णय के प्रति कृतज्ञता ज़ाहिर कर रहे थे. उसकी सराहना कर रहे थे. सच, अमेरिका में वह अपने पैरेंट्स के गिरते स्वास्थ्य को लेकर कितनी चिंतित रहती थी. हर पल लगता था, उन्हें कहीं कुछ हो न जाए. अपनी गृहस्थी और नौकरी छोड़ बार-बार भारत भी नहीं आ सकती थी, मगर आज निपुण ने यह अप्रत्याशित क़दम उठाकर उसकी सारी चिंताएं ही दूर कर दी थीं.

ईला अपने पैरेंट्स के पास जाकर बोली, “आपने मेरे लिए हमेशा किया ही है. मुझे बेटों की तरह पाला, मेरे नाज़ उठाए, मुझे आत्मनिर्भर बनाया, मेरा हमेशा ध्यान रखा. अब मेरी बारी है आपका ध्यान रखने की. चलिए ज़िद मत कीजिए, मान जाइए, आपको मेरी क़सम.” ईला के प्यारभरे अनुरोध के आगे उसके माता-पिता झुक गए.

उनके हाथों से उनके नए आशियाने का रिबन कट रहा था. उस खाली कमरे में गृहप्रवेश की रस्म निभाई गई. सभी निपुण के इस कृत्य की मुक्तकंठ से प्रशंसा कर रहे थे, कुछ लोग थे जिन्हें यह बात हज़म नहीं हो रही थी, वे कोने में खड़े खुसुर-फुसुर कर रहे थे. सुधाकर और सुमन मूकदर्शक बने खड़े थे. जाहिर है, उनको समझने और संभलने में थोड़ा व़क्त लगेगा. मगर जब समझेंगे, तो सबसे ज़्यादा वे ही अपने बेटे-बहू पर गर्व करेंगे.

       दीप्ति मित्तल

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कहानी- ऑर्डरवाली बहू (Short Story- Orderwali Bahu)

Hindi Short Story

मॉडर्न टेक्नोलॉजी का फ़ायदा उठाकर आजकल की ये कामकाजी बच्चियां घर-बाहर सब मैनेज कर तो लेती हैं, फिर क्यों पुरानी लीक पर अड़ी सासें ख़ुद को नहीं बदलतीं? घर के कामकाज का रोना रोकर क्यों कलह मचाए रखती हैं? इन बच्चियों को ज़रा-सा प्यार, सम्मान मिल जाए, तो कैसी खिली-सी रहती हैं और यह भी तो कम बड़ी बात नहीं कि स्वधा को ऑफिस के काम करते हुए भी घर के हर सदस्य की ज़रूरत का ध्यान रहता है.

फोन रखकर मैं सिर पकड़कर बैठ गई थी. ऑफिस के लिए बिल्कुल तैयार स्वधा मेरे माथे पर बल देखकर ठिठक गई. पूछा, “क्या हुआ मां? किसका फोन था?”

“रमाबाई नहीं आएगी.”

“ओह! यह भी ऐन मौ़के पर धोखा देती है.” वह फिर वापस मुड़ गई. बोली, “मां, मैं लेट हो रही हूं, निकलती हूं, आप बिल्कुल परेशान न हों.”

“परेशान कैसे न होऊं? कितने दिनों बाद मैंने अपनी सहेलियों को लंच पर बुलाया है. अब कहां मैं किचन में खड़े होकर ज़्यादा देर तक खाना बना सकती हूं? ओह! अब क्या करूं?”

“डोंट वरी मां, आप किचन में मत जाना, मैं सब मैनेज कर दूंगी, बाय मां.” कहते-कहते वह घर से निकल गई. मैं सिर पर हाथ रख बैठी रह गई. स्पाइन की कुछ समस्या के कारण कमरदर्द रहने से मेरा किचन में ज़्यादा काम करना छूट गया है. रमाबाई ही खाना बनाती है. मेरे पति अनिल और बेटा अंकित तो टूर पर गए हैं. हम सास-बहू ही आजकल घर पर हैं, तो मैंने अपनी फ्रेंड्स को आज घर पर बुला लिया था. अब? हम पांचों फ्रेंड्स अंकित और स्वधा के विवाह के बाद आज ही मिल रहे हैं. अंकित के विवाह को चार महीने ही हुए हैं. यहीं मुंबई में ही दोनों जॉब करते हैं. मुझे स्वधा अच्छी लगती है. मुझे ऐसी ही तो बहू चाहिए थी, हंसमुख, हमें प्यार करनेवाली. बस, स्वधा का किचन में जाने का मूड नहीं होता. हफ़्तेभर तो ऑफिस के काम रहते हैं, वीकेंड में वह आराम के मूड में रहती है, स्वाभाविक है. मुझे इससे कोई शिकायत नहीं. मैं पारंपरिक सास की तरह अपने बेटे-बहू पर कोई बंदिश लगाना ही नहीं चाहती. बच्चे हैं, उनकी भी लाइफ है. उन्हें अपनी मर्ज़ी से जीने का पूरा हक़ है. मैं तो कई बार यह सोचती हूं कि अगर कामकाजी बहू किचन में घुसना न चाहे, तो बुरा क्या है. सास बहू का करियर, उसकी डिग्रियों का महत्व क्यों नहीं समझती? बेटे ने डिग्रियां ली हैं, तो बहू ने भी मेहनत से अपना करियर संवारा है. बेटा छुट्टीवाले दिन पूरा आराम चाहता है, तो कामकाजी बहू को भी तो आराम की ज़रूरत है. घर के कामों का विकल्प हो, तो बहू को ही क्यों किचन में जाने के लिए बाध्य किया जाए.

ख़ैर, अब तो यह सोचना है कि क्या करूं. स्वधा को देर हो रही थी, वह निकल गई है. मैं किचन में कुछ बना भी लूंगी, तो खड़े होने से मेरी तकलीफ़ बढ़ जाएगी. दर्द शुरू हो जाएगा, तो अपनी फ्रेंड्स के साथ बैठने का आनंद कैसे लूंगी? इतने में ही मेरे व्हॉट्सएप पर स्वधा का मैसेज आया- आप चिंता न करना मां, मैंने आप सबके लिए खाना ऑर्डर कर दिया है, सब पहुंच जाएगा. और साथ में ढेर सारी किसेज़ की इमोजी देखकर मुझे हंसी आ गई. मैंने भी ‘थैंक्यू वेरी मच’ लिखते हुए किसेज़ की ख़ूब सारी इमोजी डालकर जवाब दिया. यह हम सास-बहू का पूरा दिन चलता है. मुझे हंसी आ रही थी. यह लड़की भी न! ऑर्डर करने में बहुत होशियार है, मुंह से कुछ निकलते ही झट से ऑनलाइन ऑर्डर कर देती है. इतने में डोरबेल बजी. मेड शीतल आई थी. मैंने उससे कहा, “शीतल, आज ज़रा अच्छी तरह से सफ़ाई करना.”

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“क्या हुआ मैडम?”

“लंच पर मेरी फ्रेंड्स आ रही हैं.” शीतल हमारी दस साल पुरानी मेड है, इतनी पुरानी मेड तो घर के सदस्य की ही तरह हो जाती है. बोली, “वाह, खाना बन गया?”

“नहीं, रमाबाई ने छुट्टी कर दी.”

“ओह! मैं कुछ काम कर दूं?” वह जानती है मेरे स्वास्थ्य के बारे में. मैंने कहा, “नहीं स्वधा ने सब ऑर्डर कर दिया है.” शीतल ने जैसी नज़रों से मुझे देखा, हम दोनों हंस पड़ीं. शीतल ने हंसते-हंसते कहा, “बाप रे! छोटी मैडम कितना ऑर्डर करती हैं.” मैं मुस्कुराते हुए सामान समेटने लगी, शीतल अपना काम करने लगी.

अचानक मैं पिछले चार महीनों पर नज़र डालने लगी. स्वधा जबसे आई है, हर समस्या का समाधान चुटकियों में खोज देती है. विवाह की भागदौड़ के बाद मेरी कमर का दर्द बढ़ गया, तो एक दिन उसने ऑफिस से ही ऑर्डर करके सरप्राइज़ में कुछ भेजा. मैंने डिलीवरी लेकर बॉक्स खोला, उसमें दर्द में सिंकाई के लिए एक इलेक्ट्रिक बॉटल थी, जो घंटों गर्म रह सकती थी. अभी तक मैं पुरानी तरह की ही बॉटल में पानी गर्म करके सेंकती थी. कभी-कभी आलस भी आ जाता था. मैं उसका यह सरप्राइज़ देखकर बहुत ख़ुश हुई थी. मैंने स्वधा को थैंक्स कहने के लिए उसी समय फोन किया था, तो हंसी थी. “मां, अच्छा लगा न सरप्राइज़?”

मैंने कहा था, “यह तो बहुत अच्छी चीज़ है, तुम्हें कैसे ख़्याल आया?”

“अरे, सब मिलता है मां, यह तो अंकित को पहले ही ऑर्डर कर देनी चाहिए थी.”

बहुत काम की चीज़ निकली थी यह. मुझे काफ़ी आराम हुआ था. अनिल को कई दिन से हाई ब्लड प्रेशर की शिकायत हो रही थी. वे बार-बार चेक करवाने के लिए डॉक्टर के पास जाते. एक दिन शाम को अचानक एक पार्सल आया. उसमें ब्लड प्रेशर चेक करने की मशीन थी. स्वधा ने ही ऑर्डर की थी. अनिल हंस पड़े थे, “यह तो बहुत अच्छा है हमारे घर में ऑर्डरवाली बहू आई है. ऑफिस से ही हमारी ज़रूरतों की चीज़ें ऑर्डर करती रहती है.”

वीकेंड में अगर रमाबाई न आए, तो स्वधा पूछती है, “मां कुछ ऑर्डर कर लें?” मैं कभी मना नहीं करती. सोचती हूं, रोज़ सब घर का बना ही तो खाते हैं. सब टिफिन लेकर जाते हैं. आज स्वधा को टिफिन नहीं चाहिए था, उसके ऑफिस में पार्टी थी. हां, तो फिर स्वधा सबकी पसंद का ध्यान रखते हुए ऑर्डर करने का काम संभाल लेती है.

शीतल काम करके चली गई, तो मैं भी नहा-धोकर तैयार हो गई. कामिनी, नीरा, आरती और मंजू तय समय पर आ गईं. स्वधा के आने के बाद हम आज पहली बार मिल रहे थे. हालचाल के बाद नीरा ने पूछा, “रश्मि, कैसा लग रहा है सास बनकर?”

“बहुत अच्छा! बेटी की कमी पूरी कर दी स्वधा ने. बहुत प्यारी बच्ची है. मुझे ऐसी ही बहू चाहिए थी.” इतने में डोरबेल बजी. हमारा खाना आ गया था. आरती ने पूछा, “कौन है?”

मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “हमारा लंच.”

“अरे, रमाबाई नहीं आई क्या?”

“नहीं.”

“ओह! फिर तो तुम्हें तकलीफ़ हो गई.”

“तकलीफ़ कैसी? घर में ऑर्डरवाली बहू आई है. ऑटो में बैठते ही लंच का ऑर्डर कर दिया था उसने.”

“सच?” फिर तो उन्हें स्वधा की ऑनलाइन मंगवाई चीज़ें बताने लगी. सब हैरान थीं. ख़ुश भी. अब तक हम पांचों में बस आरती को ही ऑनलाइन ऑर्डर से चिढ़ होती थी. जब तक वह दुकान-दुकान न भटक ले, उसकी शॉपिंग पूरी नहीं होती थी. उसकी फैमिली इस बात से ख़ूब परेशान रहती है. सब्ज़ी भी दस ठेलों पर देखकर ही ख़रीदती है.

आरती ने आदतानुसार कहा, “पता नहीं कैसा स्वाद होगा, कब का बना भेज दिया होगा और चीज़ें भी पता नहीं कैसी निकलेंगी?”

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नीरा ने कहा, “अच्छी ही रहती हैं. कुछ वापस भी करना हो, तो आराम से वापस होता है. दुकान-दुकान भटकने की एनर्जी अब हममें भी तो नहीं बची.”

मैंने पार्सल खोला. गर्म-गर्म पंपकिन सूप भी था. स्वधा जानती है मुझे सूप पीने का बहुत शौक़ है. हम जब भी बाहर जाते हैं, मैं सूप कभी मना नहीं करती. पिछली बार पंपकिन सूप पीया था. मुझे बहुत अच्छा लगा था. स्वधा ने कहा भी था, “मां, जब मन हो, बताना. मैं ऑर्डर कर दूंगी.” अंकित उस समय ज़ोर से हंसा था. कहा था, “मां, स्वधा को बस एक बार कुछ बोलो कि आपको क्या चाहिए. होम डिलीवरी हो जाएगी.”

हम सब इस बात पर उसे ख़ूब छेड़ते हैं, वह भी हंसती रहती है. सूप गर्म था. ठंडा न हो जाए, मैं सबके लिए निकालकर ट्रे में रखने लगी. सबको सूप बहुत पसंद आया, फिर कामिनी ने कहा, “चलो, देखते हैं और क्या ऑर्डर किया है बहूरानी ने. देखा, तो स्टार्टर्स थे- शाही पनीर, मिक्स वेज और नान. सबके मुंह से एक साथ निकला, “अरे, वाह, चलो खाते हैं.” हम सबने खाने का भरपूर लुत्फ़ उठाया. आइस्क्रीम तो एक दिन पहले आ ही गई थी. कुछ देर बातें होती रहीं. उसके बाद सब जाने के लिए उठने लगीं, तो आरती ने कहा, “सुनो.” हम सबने उसे प्रश्‍नवाचक निगाहों से देखा, तो वो मुस्कुराते हुए बोली, “बहू तो कमाल है. हम सबके लिए शानदार लंच मैनेज करवा दिया. मैं भी ऐसी ही बहू लाऊंगी?” नीरा ने उसे चिढ़ाया, “पहले बीस जगह घर-घर जाकर लड़की नहीं देखोगी?” सब हंस पड़े. सब चली गईं, तो मैंने स्वधा को फोन किया, “थैंक्यू बेटा, बहुत अच्छा लंच था. हम सबने बहुत एंजॉय किया.”

“गुड, अब आप रेस्ट करना और हां, शाम को भी रमाबाई नहीं आई, तो किचन में मत घुस जाना.”

“हां, ठीक है. काफ़ी खाना रखा भी है.”

“ठीक है फिर, हम दोनों ही तो हैं.”

मैं सामान समेटकर थोड़ी देर आराम करने के लिए लेट गई. ध्यान स्वधा की तरफ़ ही था. प्यार आ रहा था उस पर मुझे, नई तकनीक का लाभ सबसे ज़्यादा इन बच्चियों को ही हुआ है शायद. घर में कोई किटकिट नहीं, प्यार और शांति ही तो चाहिए होती है. मॉडर्न टेक्नोलॉजी का फ़ायदा उठाकर आजकल की ये कामकाजी बच्चियां घर-बाहर सब मैनेज कर तो लेती हैं, फिर क्यों पुरानी लीक पर अड़ी सासें ख़ुद को नहीं बदलतीं? घर के कामकाज का रोना रोकर क्यों कलह मचाए रखती हैं? इन बच्चियों को ज़रा-सा प्यार, सम्मान मिल जाए, तो कैसी खिली-सी रहती हैं और यह भी तो कम बड़ी बात नहीं कि स्वधा को ऑफिस के काम करते हुए भी घर के हर सदस्य की ज़रूरत का ध्यान रहता है. गर्मी, सर्दी, बरसात, पीरियड के दिनों में महानगरों में आना-जाना, फिर दिनभर ऑफिस में काम करना आसान है क्या? मुझे तो लगता है घरों में ज़्यादातर कलहों का कारण सास की पुरानी सोच ही है. मतलब यह कि बेटे की शादी के बाद बदलने की ज़रूरत बहू को नहीं, सास को ज़्यादा है. स्वधा के ही बारे में सोचते-सोचते मेरी पलकें मुंदने लगी थीं.

Poonam ahmed

पूनम अहमद

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कहानी- सच्चा समपर्ण (Short Story- Sachcha Samarparn)

वैसे भी अरेंज मैरिज में होता भी तो यही है, दो अजनबियों को मां-बाप एक ही छत के नीचे ताउम्र रहने को बांध देते हैं. एक घर, एक ही छत शेयर करने तक तो ठीक है, फिर तुरंत ही एक ही बिस्तर शेयर करना… और फिर तुरंत ही बच्चा…?

Hindi Short Story

हद हो गई…! कल तक जो लोग शर्मोहया को लड़की का गहना… और न जाने क्या-क्या कहते थे, वो ही आज लड़की को बेशरमी का पाठ पढ़ा रहे हैं! क्या है इस दोगलेपन की वजह? क्यों पैदा होते ही लड़की को मार नहीं देते थे लोग…? मेरे ये आक्रोश भरे शब्द क़लम से नहीं भीतर कहीं हृदय से निकल रहे हैं, जहां ज्वालामुखी सुलग रहा है. उसी का लावा शब्द बनकर फूट रहा है. अभी हाथों की मेहंदी को छूटे महीनाभर ही हुआ था कि ख़ुशख़बरी की फ़रमाइशें होने लगीं, “भाभी, हमारे घर नन्हा-मुन्ना कब आएगा?”

“अब देर नहीं, भले ही दूसरा बच्चा पांच साल बाद कर लेना.” मांजी उम्मीद भरी आवाज़ में कहतीं. मैं सकुचा कर पैर के अंगूठे से ज़मीन कुरेदती रह जाती. इतनी जल्दी…? अभी तो साहिल को ठीक तरह से जान भी नहीं पाई हूं मैं. वैसे भी अरेंज मैरिज में होता भी तो यही है, दो अजनबियों को मां-बाप एक ही छत के नीचे ताउम्र रहने को बांध देते हैं. एक घर, एक ही छत शेयर करने तक तो ठीक है, फिर तुरंत ही एक ही बिस्तर शेयर करना… और फिर तुरंत ही बच्चा…?

मेरी कड़वाहट का एहसास घर भर में स़िर्फ साहिल को है. सगाई और शादी के बीच मात्र पन्द्रह दिनों का अन्तराल, उसमें स़िर्फ दो बार फ़ोन पर हुई औपचारिक बातचीत क्या किसी को इतना क़रीब ला सकते हैं? इतना क़रीब, जहां से सृजन की कल्पना की जा सके?

यूं भी मैं विवाह पूर्व इसी रिश्ते से भयभीत रहती थी, क्योंकि बेहद संकोची स्वभाव, किसी के इस तरह अंतरंग होने की कल्पना भर से ही सिहर उठता था, किंतु मेरी क़िस्मत अच्छी निकली.

विवाह की पहली रात ही अपनी समझदारी का परिचय देते हुए कहा था साहिल ने, “मैं तुम्हारे डर से वाकिफ़ हूं. पहले तुमसे दोस्ती करना चाहता हूं, क्योंकि मैं जानता हूं तुम बचपन से ही लड़कों से दूर रही हो, इसलिए सामाजिक मान्यताओं पर मत जाना. मेरी ओर से तुम पर कभी कोई प्रतिबंध नहीं होगा. तुमसे गहरा भावनात्मक संबंध कायम करना चाहता हूं. जब ख़ुद को तुम्हारे भरोसे के क़ाबिल महसूस करने लगूंगा, तभी तुम्हें हाथ लगाऊंगा. अपने अधिकारों का इस्तेमाल करके एक हृदयविहीन तन को जीतना न प्रेम होता है, न ही पौरुष! तुम्हें जितना व़क़्त लगे मैं प्रतीक्षा करने को तैयार हूं, मगर प्लीज़, कभी भी बेमन से या डर से समर्पण मत करना आभा. मैं तुम्हारे सच्चे प्रेम का इच्छुक हूं. मन की दहलीज़ पार किए बिना मैं कोई दूसरा रिश्ता कायम नहीं करना चाहता.”

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मैं आश्‍चर्यचकित हो गई. भाभी, दीदी और सहेलियों ने जो पति के बारे में समझाया था, उससे सर्वथा अलग और मेरे मन के व्यक्ति से मेल खाता पति पाकर मैं धन्य हो गई.

और फिर दो ही दिन बाद मैं मायके आ गई. यहां भी ससुराल से संबंधित प्रश्‍नों में पहला प्रश्‍न यही होता, “पति कैसे हैं?” मैं आशय समझकर जान-बूझकर रहस्यमयी मुस्कान फेंक देती. जानती थी कि ये फलसफ़ा किसी के गले नहीं उतरेगा कि हृदयविहीन तन के नहीं, हृदययुक्त, बल्कि प्रेमयुक्त समपर्ण के इच्छुक हैं पतिदेव.

दो-चार दिन बीते ही थे कि पापा के मुंह से निकल पड़ा, “अब तो मुझे भी नानाजी पुकारनेवाला कोई जल्दी ही आए भगवान!” मैं सोचती रह जाती, लड़की को कुंवारेपन में सात तालों में बंद रखने वाले माता-पिता शादी होते ही ये कैसी मानसिकता ओढ़ लेते हैं. जहां पहले किसी लड़के से बात तक करना नागवार गुज़रता था, वहीं अब किसी लड़के के साथ इतनी घनिष्ठता की कामना करना… स़िर्फ इसलिए कि उस लड़के ने सात फेरे लिए हैं उस लड़की से?

क्या सात फेरे ही किसी शर्मीली लड़की की शर्मोहया के सातों द्वार खोलने के लिए काफ़ी होते हैं?… और किसी अनजान ‘पति’ नामक व्यक्ति को अपनाने की शक्ति प्रदान करते हैं? मैं जब-तब अपनी भड़ास डायरी में निकालती रहती. चाहे पूरी दुनिया मुझे अजीब समझे, मगर साहिल की नज़रों में मैं सही थी और वह मुझे तथा मेरी भावनाओं को पूरा सम्मान देते थे. मुझे मेरे खोल से बाहर निकालने के लिए साहिल बहुत प्रयास कर रहे थे. धीरे-धीरे मुझे बहुत अच्छा महसूस होने लगा. उनके सानिध्य में ख़ुद को निश्‍चिंत और सुरक्षित महसूस करती थी.

उनमें मेरे प्रति किसी प्रकार के उतावलेपन को न पाकर मैं इतनी प्रसन्न हो जाती कि बरबस लिख बैठती. ‘अभी भी दुनिया में ऐसे लोग बाकी हैं, जो रिश्तों को ढोते या निभाते नहीं, बल्कि जीते हैं, अपनी शर्तों पर और अपने तरी़के से…’ मैं अब साहिल के साथ बहुत ख़ुश रहने लगी थी. अभी मैं वहां रमने ही लगी थी कि मां का मनुहार भरा आमंत्रण आ गया. “तीन महीने हो चुके हैं विवाह हुए. एक बार आकर मिल जा बेटी, तुझे देखे बिना मन बेचैन हो रहा है.” मां के आग्रह और प्रेम ने मेरे मन में भी जाने की इच्छा पैदा कर दी, मगर साहिल का उदास चेहरा भी बार-बार घूम रहा था आंखों के आगे. अब भावनात्मक लगाव की नींव पड़ चुकी थी दोनों के हृदय धरा पर.

उससे दूर जाने का मन नहीं हो रहा था और मेरे जाने के नाम पर उसकी उदास आंखें जैसे कह रही हों, कैसे गुज़रेगा तुम्हें देखे बिना एक ह़फ़्ता….?  शारीरिक प्रेम से पहले जिस प्रेम की कामना मैंने सच्चे हृदय से की थी, वो हमारे बीच कायम हो चुका था और मन के तारों का जुड़ाव मैं साफ़ महसूस कर रही थी. ‘तो यूं कोई अच्छा लगते-लगते इस क़दर भा जाता है कि उससे बेइंतहा प्यार हो जाता है और उसका साथ अनिवार्य लगने लगता है…’ अब मेरी डायरी में इन सब बातों का समावेश होने लगा.

ख़ैर, ह़फ़्ताभर की इज़ाज़त ले मां से मिलने आ पहुंची. शाम को चाय और पकौड़ों के बीच मां पूछ बैठी, “बेटा तीन महीने हो गए विवाह को, कोई नई ख़बर…..?” मेरा मन ज़रा खिन्न हो गया. “क्यों मां, शादी होते ही यही पहली उम्मीद लगाकर बैठना उचित है? क्या ये सब नहीं पूछोगी… हम दोनों कैसे हैं? आपस में मेल- जोल कैसा है? वगैरह-वगैरह..?” इस पर मां हंस पड़ी, “तुझे देखते ही

समझ में आ गया कि तू सुखी है वहां पर, फिर और क्या पूछूं और शादी-ब्याह का मतलब ही क्या है, वंशबेल आगे बढ़ाने के लिए ही तो माता-पिता बेटे का विवाह करते हैं, ये अरमान तेरे सास-ससुर के मन में भी तो होगा.

वैसे तेरे मन में क्या चल रहा है? अगर फैमिली प्लानिंग का भूत हो तो एक के बाद ही अपनाना वो सब चोंचले.”

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मां के इस वाक्य पर मैं चिढ़ गई, “बस करो मां… अभी हमने कुछ भी प्लान नहीं किया है. अभी तो हमारे रिश्ते की शुरुआत है…” कहते-कहते मैं रुक गई तो मां की सशंकित नज़रों को भांप कर भाभी मुझे ठेलते हुए कमरे में ले गई और कोने में ले जाकर पूछा, “सच बताना दीदी, अभी तक?”

मेरे इन्कार में सिर हिलाने पर वो लगभग बदहवास होकर कहने लगी, “क्या? मगर क्यों, क्या ये शादी उनकी मर्ज़ी से नहीं हुई? क्या आप उन्हें पसंद नहीं?”

मैं अवाक रह गई, “ये सब आप क्या समझ रही हैं भाभी… हम दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल अजनबी थे. क्या क़रीब आने के लिए थोड़ा व़क़्त नहीं लेना चाहिए.”

“थोड़ा व़क़्त, तीन महीने थोड़ा व़क़्त होता है दीदी?” ओह, इसका मतलब भाभी भी इसी मानसिकता की हैं, सोचते-सोचते मैं कह उठी.

“ये मुझ अकेले का नहीं, साहिल का भी निर्णय है.” फिर मेरे शर्मीलेपन को देखते हुए साहिल ने पहली बार मुझसे जो कुछ कहा उसे अक्षरश: दोहरा दिया.

पर इस बात से तो जैसे वहां कोहराम ही मच गया. मेरे शर्मीलेपन को कोसते-कोसते बात साहिल के पुरुष न होने तक पहुंच गई.

मां कह रही थी, “अजीब लड़का है, अरे इसने कहा और उसने मान लिया.”

“अरे कमी है उसमें तभी तो मान गया, वरना ऐसा हो सकता है क्या कभी? पुरुष होकर उसकी इस कायरता के पीछे जाने कौन-सी सच्चाई छिपी है…” ये दीदी के शब्द थे, “कहीं और किसी से तो उसके संबंध…?” मैं हतप्रभ-हैरान मुंह फाड़े कभी इसकी, तो कभी उसकी बातें सुनती जा रही थी. साहिल की शराफ़त को उसकी कायरता, बीमारी चरित्रहीनता-जाने क्या-क्या कहा जा रहा था और मैं अंदर-ही-अंदर उबल रही थी. तभी दीदी ने एक और विस्फोट किया, “तुमने कभी पहल करने की कोशिश नहीं की आभा?” तो मेरे सब्र का बांध टूट गया और मैं चीख पड़ी, “बंद करो आप सब लोग ये बकवास… क्या दोहरी मानसिकता है, शादी से पहले जिस लड़की को सदैव लड़कों से दूर रहना सिखाया जाता है, उसी लड़की को शादी होते ही कौन-से बेशरमी के पंख लग जाते हैं कि उसे ऐसा करना चाहिए?”

मैं बुरी तरह थक गई थी. उस बहस को मैंने दो वाक्यों में समाप्त किया. “ये हमारा नितान्त निजी मामला है और इसमें बोलने का हक़ मैं किसी को नहीं देती.” मेरे तीखे तेवर और शब्दों को सुनकर सभी चुप हो गए.

मेरे जीवन की ये सबसे कड़वी याद है, जिसे मैं ज़ेहन से जितना निकालना चाहती हूं, उतनी ही ये मेरे मस्तिष्क में चिपक-सी जाती है.

आज विवाह के पच्चीस साल बाद डायरी में मैंने इस बात का ज़िक्र किया है, क्योंकि आज यही सवाल मेरी बेटी मुझसे कर रही है.

“ममा, नीलेश और मैं एक-दूसरे से बिलकुल अन्जान हैं, मगर मैं जानती हूं कि आपने उसे मेरे लिए चुना है, तो ज़रूर कुछ सोचकर ही चुना होगा. मुझे आपके निर्णय पर कोई ऐतराज़ नहीं, मगर मुझे शादी से थोड़ा-सा डर लगता है.” कहते-कहते उसकी पलकें झुक गईं. मैं समझ गई कि मेरी बेटी भी वहीं पर खड़ी है, जहां पच्चीस साल पहले मैं खड़ी थी. पढ़ाई-लिखाई में अव्वल रहनेवाली मेरी बेटी प्यार-मुहब्बत और लड़कों से सदा दूरी रखनेवाली मेरी ही तरह संकोची है. लेकिन नीलेश भी कम समझदार नहीं, उसकी समझदारी की वजह से ही मैंने और साहिल ने उसे अपनी बेटी के लिए पसंद किया है.

उसके डर को भांपकर ही मैंने ये डायरी जान-बूझकर उसके कमरे में छोड़ी है, जो उसके डर से बाहर निकालने में उसकी मदद कर सके. और एक बार साहिल को भी खुलकर नीलेश से बात करनी होगी. बाकी कोई कुछ भी कहे… मेरी बेटी को भी सच्चे प्यार का सुख मिले, थोथी और खोखली मान्यताओं का बोझ नहीं… ये सब सोचते हुए मैं उसके कमरे से बाहर निकल आई.

– वर्षा सोनी

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कहानी- एम्पायर स्टेट (Short Story- Empire State)

Hindi Story

“तुम यहां मुझे पहली बार मिले थे जेम्स और याद है, यहीं पर तुमने मुझे प्रपोज़ भी किया था, तो फिर हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण फैसला भी इसी एम्पायर स्टेट बिल्डिंग पर होना चाहिए न!”

न्यूयॉर्क की शान एम्पायर स्टेट की 102 मंज़िल की बिल्डिंग एक समय में दुनिया की सबसे ऊंची बिल्डिंग थी. यहां से पूरे न्यूयॉर्क का विहंगम दृश्य दिखाई देता है. इसीलिए मुझे एम्पायर स्टेट बिल्डिंग बहुत पसंद है. दरअसल, मुझे ऊंचाइयों से प्यार है. जीवन में ऊंचा मुक़ाम हासिल करने की ख़ातिर ही मैं आईटी इंजीनियर बनकर दो साल पहले अपनी कंपनी की तरफ़ से न्यूयॉर्क आई थी. तब से अब तक मेरे हर एहसास की साक्षी रही है यह एम्पायर स्टेट बिल्डिंग. और आज जब मुझे अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण फैसला करना है, तब मैं इसके टॉप फ्लोर पर खड़ी कशमकश की स्थिति में पिछले दो वर्षों में जेम्स के साथ बिताए लम्हों को पुनः जीने का प्रयास कर रही हूं.

उससे जुड़ी एक-एक बात आज मेरी स्मृतियों के द्वार पर दस्तक दे रही है. पहली बार इसी एम्पायर स्टेट बिल्डिंग पर मिला था वह

मुझे. न्यूयॉर्क आए हुए दस दिन ही हुए थे मुझे. वीकेंड पर अपनी सहेली नेहा के साथ न्यूयॉर्क घूमने निकली थी. मेट्रो स्टेशन के बाहर थी, तभी नेहा के भाई का फोन आ गया. दो घंटे बाद मिलने के लिए कहकर वह चली गई. मैं एम्पायर स्टेट पहुंची. टिकट लेने के लिए जैसे ही बैग में हाथ डाला, पर्स नदारद देख मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई. उसमें मेरे क्रेडिट कार्ड्स थे. घबराई हुई मैं उसे चारों ओर तलाश कर ही रही थी कि एक अमेरिकन युवक ने मेरे क़रीब आकर कहा, “अरे,

कमाल करती हैं आप भी. कब से आपको पुकार रहा हूं, पर आप हैं कि एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा. यह लीजिए आपका पर्स. स्टेशन पर गिर गया था. चेक कर लीजिए. सब कुछ ठीक है न.” मैं ख़ुशी से उसे ताकती रह गई थी. उसे धन्यवाद कहने के लिए मेरे पास शब्द नहीं थे. मुझे कितनी बड़ी मुसीबत से उबार लिया था उसने. हमने एक-दूसरे को अपना परिचय दिया. उसका नाम जेम्स था और मेरी तरह वह भी इंजीनियर था.

वह बोला, “चलो रिद्म, जब तक तुम्हारी फ्रेंड नहीं आती, मैं तुम्हारे साथ हूं.” एम्पायर स्टेट के टॉप फ्लोर पर पहुंचकर मैं न्यूयॉर्क की ख़ूबसूरती को निहारती रह गई. काफ़ी देर तक नेहा वापस नहीं लौटी, तो मैंने घर जाना चाहा, पर अकेले जाने में मुझे घबराहट हो रही थी, तब जेम्स मुझे घर पहुंचाने के लिए तैयार हो गया. घर पहुंचकर उसे धन्यवाद देते हुए मैंने कहा, “आज का तुम्हारा सारा दिन मेरी वजह से ख़राब हो गया.”

“लेकिन इसके बदले मुझे एक अच्छा दोस्त भी तो मिल गया. मैं अगले वीकेंड पर फ्री हूं. तुम चाहो तो हम साथ घूम सकते हैं.” मैंने मुस्कुराकर अपनी स्वीकृति दे दी.

कुछ ही दिनों में हम दोनों अच्छे दोस्त बन गए. अब हर वीकेंड पर हम दोनों मिलते और सारा दिन साथ व्यतीत करते. मुझे पता भी नहीं चला कि कब मेरे हृदय की मरुभूमि पर प्रेम का एक छोटा-सा बीज अंकुरित होने लगा था. इसमें नन्हीं-नन्हीं कोपलें निकल आई थीं और उस दिन मेरे आश्‍चर्य की सीमा न रही, जब मैंने देखा, नन्हा-सा यह पौधा बढ़कर हरा-भरा वृक्ष बन गया है. रात-दिन अब जेम्स मेरे ख़्यालों में छाया रहता था.

एक दिन जेम्स ने कहा, “रिद्म, इस वीकेंड  पर मुझे अपने मॉम और डैड से मिलने जाना है. तुम साथ चलोगी?”

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“ऑफकोर्स.” मैं जेम्स के साथ उसके पैरेंट्स के घर पहुंची. वे दोनों मुझसे बहुत गर्मजोशी से मिले. जेम्स अपने फादर के साथ बातों में बिज़ी हो गया और मैं उसकी मॉम के साथ किचन में चली गई. बातों के दौरान मैंने उनसे पूछा, “इस उम्र में क्या आपका मन नहीं करता, आप अपने बेटे के साथ रहें?” उन्होंने मुस्कुराकर मेरी ओर देखा और बोलीं, “यहां का ऐसा ही कल्चर है और यह बुरा भी नहीं है. चाहे बच्चे हों या बड़े, हर इंसान की अपनी ज़िंदगी होती है. हर किसी को स्पेस चाहिए. रिश्ते साथ रहने से ही मज़बूत नहीं बनते हैं. रिश्ते मज़बूत बनते हैं, परस्पर प्रेम और आपसी सूझबूझ से. साथ रहकर एक-दूसरे को बोझ समझने से बेहतर क्या यह नहीं है कि दूर रहकर एक-दूसरे का ख़्याल रखा जाए. जेम्स माह में दो-तीन बार हमसे

मिलने आता है और हमारे सुख-दुख का ख़्याल रखता है, यही बहुत है. आवश्यकता से अधिक आशाएं सदैव दुख को जन्म देती हैं.” उनका जीवन के प्रति यह नज़रिया देख मैं बहुत प्रभावित हुई.

लंच के बाद हम सभी एक्वेरियम देखने गए. जेम्स के डैड के घुटनों में तकलीफ़ थी, इसलिए वो उन्हें व्हीलचेयर पर बैठाकर एक्वेरियम दिखा रहा था. शाम को उसके पैरेंट्स को घर पहुंचाकर हम वापस लौटे, तो मैंने कहा, “जेम्स, तुम्हारे अपने पैरेंट्स के प्रति जुड़ाव और सेवा से मैं बहुत प्रभावित हूं. उन्हें पैदल घूमने में तकलीफ़ होती है, तो तुम उन्हें व्हीलचेयर पर ले गए, यह बहुत बड़ी बात है. अन्य कोई होता, तो उन्हें ले जाने से इंकार कर देता.”

“इसमें बड़ी बात क्या है रिद्म? यह तो मेरी ड्यूटी है. इंसान कितना भी बूढ़ा हो जाए, उसका मन कभी बूढ़ा नहीं होता. उसकी इच्छाएं कभी नहीं मरती हैं. अपने शौक़ पूरे करने में यहां उम्र आड़े नहीं आती है. मैं ही क्या, तुम यहां किसी भी टूरिस्ट प्लेस पर चली जाओ, तुम्हें बहुत से ऐसे लोग दिखाई देंगे, जो अपने पैरेंट्स को व्हीलचेयर पर घुमा रहे होंगे.”

उस रात मैं बिस्तर पर सोने के लिए लेटी, तो अपने देश की याद ताज़ा हो आई. मैं सोचने लगी, यूं तो हमारे देश में लोग विदेशी संस्कृति की आलोचना करते हैं और भारतीय संस्कृति की दुहाई देते नहीं थकते, पर आज कितने ऐसे लोग हैं, जो बूढ़े माता-पिता का दायित्व ख़ुशी से उठाते हैं. उन्हें बोझ नहीं समझते. मेरे अपने ही घर में मम्मी-पापा के प्रति भइया का रवैया कितना उदासीन है, जबकि पापा ने रिटायरमेंट के बाद मिले पैसे का काफ़ी हिस्सा भइया को दे दिया था, फिर भी वह मम्मी-पापा के प्रति कितने लापरवाह हैं.

उस दिन की बात बार-बार मेरे मन को व्यथित कर रही थी. बुआ और उनका बेटा घर में आए हुए थे. सब लोग पिकनिक मनाने जा रहे थे. मम्मी-पापा भी साथ जाना चाहते थे, पर भइया-भाभी का मन उन्हें ले जाने का नहीं था. भइया रूखे स्वर में बोले थे, “आप क्या करेंगे वहां जाकर? आराम से घर में बैठिए.”

मैंने सुना, भाभी बुआ की बहू से बोली थीं, “मम्मी-पापा की तो पूछो मत. बुढ़ापा आ गया, पर घूमने का चस्का कम नहीं हुआ.” अपमान से मम्मी-पापा का चेहरा कितना निरीह हो गया था. ऐसे ही न जाने कितने ही प्रसंग दिमाग़ में घूम रहे थे. अगली सुबह पापा को फोन मिलाया, तो वह बोले, “रिद्म, तुझे नवीन याद है, अपने मेहता का बेटा, जो डॉक्टर है.”

“हां पापा, नवीन को कैसे भूल सकती हूं, उसके साथ तो मेरा बचपन बीता है. क्या हुआ पापा?”

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“कल मेहता का फोन आया था. उन्होंने नवीन के लिए तेरा रिश्ता मांगा है.” एक पल के लिए मैं ख़ामोश हो गई. फिर बोली, “ठीक है पापा, मैं सोचकर बताती हूं.” मैंने फोन रख दिया. नवीन पापा के मित्र मेहता अंकल का बेटा था. मैं जानती थी, वो एक क़ाबिल डॉक्टर होने से पहले बहुत अच्छा इंसान भी है. साथ ही उसके परिवार के लोग भी अच्छे व मिलनसार हैं. जो भी लड़की उस घर में बहू बनकर जाएगी, बहुत सुखी रहेगी, पर मैं अपने इस मन का क्या करती, जहां पहले से ही जेम्स बस चुका था.

जब से मैं जेम्स की फैमिली से मिली थी, रात-दिन मन में यही विचार घूमता था कि जेम्स से विवाह करके अमेरिका में बस जाऊं, तो जीवन कितना सुखमय होगा. इस ख़ूबसूरत देश में रहना अपने आप में कितना सुखद एहसास है. यहां रोज़मर्रा की ज़िंदगी तनावरहित और सहज है. लोग ख़ुशमिज़ाज और ईमानदार हैं. हर कोई नियमों का पालन करता है. कोई किसी की ज़िंदगी में दख़ल नहीं देता. किंतु मुझे जेम्स के मन को भी टटोलना था.

अगले वीकेंड पर मेरे क़दम ख़ुद-ब-ख़ुद एम्पायर स्टेट की ओर उठ गए. जेम्स वहां पहुंचा, तो मैंने कहा, “जेम्स, मैं तुम्हें कुछ बताना चाहती हूं. पापा ने मेरे लिए एक डॉक्टर लड़का पसंद किया है.” जेम्स गंभीर स्वर में बोला, “मैं भी तुमसे कुछ कहना चाहता हूं रिद्म, मैं तुमसे प्यार करता हूं और तुम्हारे साथ ज़िंदगी बिताना चाहता हूं. मेरे पैरेंट्स भी सहमत हैं. क्या तुम्हें मुझसे प्यार है?” मुझे ऐसा लगा, मानो मेरे कानों में शहनाइयां बज उठी हों. मैंने तुरंत अपनी स्वीकृति दे दी.

मम्मी-पापा को जेम्स के बारे में बताया, तो कुछ पल की ख़ामोशी के बाद वे बोले, “रिद्म, लड़कियां तो अन्तर्जातीय विवाह में ही परेशान हो जाती हैं, फिर यहां तो देश ही दूसरा है. इनका धर्म, संस्कृति, रहन-सहन, खानपान सभी कुछ अलग है. क्या तुम इनके साथ एडजस्ट कर पाओगी? रिद्म, जीवन के महत्वपूर्ण ़फैसले सोच-समझकर करने चाहिए. जल्दबाज़ी में नहीं. तुम एक बार फिर सोच लो आख़िर यह तुम्हारी ज़िंदगी का सवाल है.”

“पापा, मैंने अच्छी तरह सोच-समझकर ही यह फैसला किया है. मैं जेम्स और उसके परिवार के साथ एडजस्ट कर लूंगी. आप मुझ पर विश्‍वास रखिए.”

“ठीक है रिद्म, किंतु हर माता-पिता की तरह हमारी भी इच्छा है कि हम अपनी बेटी की शादी में शरीक हों, फिर चाहे शादी न्यूयॉर्क में हो या भारत में.” पापा भीगे स्वर में बोले.

“ऑफकोर्स पापा, आपके और मम्मी के आशीर्वाद के बिना मैं शादी नहीं करूंगी.” वह दिन मेरी ज़िंदगी का सबसे ख़ुशी का दिन था. मुझे याद नहीं पड़ता, इससे पहले मैं कभी इतना ख़ुश रही थी. अगले दिन जेम्स से मिलने के लिए जाते समय मुझे लग रहा था, मानो ज़मीन पर नहीं चल रही वरन् हवा में तैर रही थी.

मैंने जेम्स को बताया, “मम्मी-पापा तुम्हारे साथ मेरी शादी के लिए सहमत हैं. बस, उनकी यही इच्छा है कि वे हमारी शादी में अवश्य शामिल हों.” जेम्स कुछ क्षण मुझे देखता रहा फिर बोला, “सुुनो रिद्म, हम अभी शादी नहीं करेंगे, पहले कुछ समय तक साथ रहेंगे.”

“क्या मतलब, लिव इन रिलेशनशिप में?”

“हां रिद्म, इसमें कोई बुराई नहीं है. अमेरिका में हज़ारों लोग ऐसे रहते हैं. कुछ समय बाद जब हमें लगेगा कि हम दोनों के बीच कोई मतभेद नहीं होगा, हमारी अच्छी निभेगी, तब हम शादी कर लेंगे.”

“लेकिन जेम्स, लिव इन रिलेशनशिप में हमेशा असुरक्षा की भावना रहती है. ऐसे रिश्ते लंबी दूरी तय नहीं करते हैं. तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि हमारी नहीं निभेगी. हम दोनों एक-दूसरे को चाहते हैं. मैं तुम्हारे कल्चर के साथ पूरी तरह एडजस्ट होकर दिखाऊंगी. क्या तुम्हें मुझ पर विश्‍वास नहीं है.”

“विश्‍वास तो है रिद्म, दरअसल, मैं सावधानीवश ऐसा कर रहा हूं. अमेरिका के क़ानून के अनुसार, अगर पति-पत्नी के बीच तलाक़ होता है, तो पति को अपनी प्रॉपर्टी और पैसे का आधा हिस्सा पत्नी को देना पड़ता है. इसलिए बहुत-से लोग सावधानी बरतते हैं और वर्षों शादी नहीं करते.”

“और इस बीच बच्चा हो जाए तो?” मैंने पूछा.

“हां, तो इसमें बुराई क्या है? देखो रिद्म, यहां बिना शादी के बच्चे हो जाना ग़लत नहीं माना जाता. यहां कोई किसी की ज़िंदगी में दख़ल नहीं देता है. न तो यहां किसी के पास इतना समय है कि कोई दूसरों की ज़िंदगी में ताकाझांकी करे और न ही लोगों की ऐसी मानसिकता है.”

“लेकिन जेम्स, बगैर शादी के…?”

“तुम व्यर्थ ही संकोच कर रही हो रिद्म. ठीक है, तुम अच्छी तरह सोच लो, फिर मुझे बताना.”

जेम्स जल्दी ही चला गया था और आज मुझे उसको अपने ़फैसले से अवगत कराना था. सोचते-सोचते मैं अतीत से वर्तमान में आ गई, पर मन में चल रहा अंतर्द्वंद्व थमने का नाम नहीं ले रहा था. इंसान खानपान, रहन-सहन और रीति-रिवाज़ों के साथ समझौता कर सकता है, पर माता-पिता के दिए संस्कारों को कैसे भूल जाए? इन्हीं संस्कारों से तो व्यक्ति के आचार-विचार बनते हैं. मेरी आत्मा में बसे हुए हैं मेरे संस्कार, फिर अपनी आत्मा का गला कैसे घोंट दूं.

अच्छाई-बुराई, सही-ग़लत के बीच के अंतर को कैसे मिटा दूं. आधुनिकता के नाम पर विवाह जैसे पवित्र बंधन को कैसे झुठला दूं? थोड़ी देर बाद जेम्स आकर बोला, “आज तुम फिर यहां चली आई.?”

“तुम यहां मुझे पहली बार मिले थे जेम्स और याद है, यहीं पर तुमने मुझे प्रपोज़ भी किया था, तो फिर हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण फैसला भी इसी एम्पायर स्टेट बिल्डिंग पर होना चाहिए न!”

“हां, तो फिर क्या सोचा तुमने?”

“नहीं जेम्स, मैं शादी किए बिना तुम्हारे साथ नहीं रह सकती. मेरी महत्वाकांक्षाएं मेरे संस्कारों से ऊंची नहीं हैं. मेरे माता-पिता की यह छोटी-सी इच्छा है कि वे मेरी शादी में सम्मिलित हों, तो मैं उनसे क्या कहूं कि मैं जेम्स के साथ बिना शादी किए ही रहना चाहती हूं. कल को मैं लोगों से क्या कहकर तुम्हारा परिचय करवाऊंगी? जिस रिश्ते में विश्‍वास ही न हो, वह रिश्ता तो टिक ही नहीं पाएगा. जल्द ही दम तोड़ देगा.

जेम्स, मुझे ऊंचाइयों से बहुत प्यार है, लेकिन इतना भी नहीं कि पांव के नीचे से ज़मीन ही निकल जाए.” जेम्स से विदा लेते हुए मेरी आंखें आंसुओं से भीग उठीं, पर जल्द ही मैंने उन्हें पोंछ दिया. पापा कहा करते थे कि आंसू इंसान के मन की कमज़ोरी को दर्शाते हैं और तुम्हें जीवन में कमज़ोर नहीं, मज़बूत बनना है. अब मैं जल्द से जल्द घर पहुंचना चाहती थी, पापा को फोन पर यह बताने के लिए मुझे डॉक्टर नवीन का रिश्ता मंज़ूर है.

 

 

shubhi mandal

      शुभि मंडल

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कहानी- मेला (Short Story- Mela)

छोटे-छोटे बच्चों का हाथ पकड़े परिवार के परिवार घूम रहे थे और जीवन के हर रंग का आनंद उठा रहे थे. वे जब पांच रुपए का गुब्बारा या सात रुपए की पिपिहरी भी ख़रीदते, तो रुपए-दो रुपए का मोलभाव कर लेते. इसके बाद छोटे-छोटे खिलौनों को बच्चों को सौंपते हुए अजीब-सी तृप्ति की अनुभूति होती उन्हें. बच्चे भी खिलौने पाकर ऐसे ख़ुश होते, जैसे उन्हें मुंहमांगी मुराद मिल गई हो.

कितना फ़र्क़ है इस मेले और शॉपिंग मॉल की भीड़ में, जहां 50% डिस्काउंट के बाद भी सामान ख़रीदने का कोई सुख नहीं है.

Hindi Kahani

अपने कंप्यूटर के पिक्चर-फोल्डर में कैद तस्वीरों को वो ध्यान से देखने लगा. शिमला टूर के ब़र्फ से भरे पहाड़ थे, तो जैसलमेर के रेत भरे छोटे-छोटे टीले. इस फोल्डर में एक तरफ़ मनाली की ख़ूबसूरत वादियां कैद थीं, तो दूसरी तरफ़ गोवा के समुद्र तट पर अठखेलियां करती ज़िंदगी की रंगीनियां. एक-एक तस्वीर कहीं न कहीं संपन्न जीवनशैली की गवाह थी. फिर भी जब उन तस्वीरों को ध्यान से देखते, तो लगता सब कुछ होने के बाद भी इनमें सूनापन है.

आदमी की भूख को ख़ूबसूरत नज़ारों, फाइव स्टार होटल के टेबल पर सजे खाने या जीवन की रंगीनियों से नहीं मिटाया जा सकता. सच तो यह है कि आदमी क्या चाहता है, यह वह भी नहीं जानता.

उसने कंप्यूटर बंद कर दिया. उसे एहसास हुआ कि यह खिलौना अब उसे ख़ुशी देने में नाकाम है. बारह घंटे की ड्यूटी में कम से कम सात-आठ घंटे तो वह इस कंप्यूटर से चिपका रहता है. अचानक उसने सोचा, क्या हमारा जीवन आज इतना एकाकी हो गया है कि हमें बातचीत करने के लिए भी अजनबियों की ज़रूरत पड़े?

उसने बैठे-बैठे ही रिवॉल्विंग चेयर पर अंगड़ाई ली और चेंबर के बाहर झांका, तो देखा रामदीन सिर झुकाए खड़ा था.

ओह, तो क्या सात बज गए और घर चलने का समय हो गया? रामदीन का नियम था कि वह सात बजे गाड़ी लगाकर साहब के केबिन के सामने बैठ जाता. कहता कुछ नहीं और शिखर समझ जाता कि काम ख़त्म होने से रहा, अब चलना चाहिए. हां, ज़्यादा ही ज़रूरी होता, तो वह रामदीन को कह देता कि आप घर निकल जाइए, आज मैं ख़ुद ही ड्राइव कर लूंगा, लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं कि रामदीन ने शिखर को अकेला छोड़ा हो. वह कहता, “साहब मुझे भी जल्दी घर जाकर क्या करना है?” और उसका यह जवाब सुन शिखर मुस्कुरा देता.

शिखर रामदीन से इतने दिनों में काफ़ी घुल-मिल गया था. अचानक शिखर ने रामदीन को इशारा किया, नियम के अनुसार रामदीन ने शीशे का दरवाज़ा खोला, ब्रीफकेस में लंच बॉक्स रखा और एक हाथ में पानी की बोतल और दूसरे हाथ में ब्रीफकेस उठाकर चल पड़ा. इससे पहले कि रामदीन बाहर निकलता, शिखर ने कहा, “रामदीन क्या आज तुम मुझे कोई नई जगह घुमा सकते हो?” रामदीन सोच में पड़ गया, “साहब, इस शहर का कोई भी होटल, शॉपिंग मॉल या क्लब आपसे छूटा नहीं है.”

“तभी तो तुमसे कह रहा हूं कि क्या कोई नई जगह दिखा सकते हो? ऐसी जगह जहां ज़िंदगी सांस लेती हो, क्योंकि होटल हो या शॉपिंग माल, ये सारी जगहें बेजान मशीन की तरह हो गई हैं. इनमें एक-सा स्वाद है. रहे क्लब्स, तो वो भी बस दिखावट के अड्डे भर रह गए हैं. रामदीन तुम उम्र में मुझसे बड़े हो, क्या तुम्हारी ज़िंदगी में भी इतनी कम उम्र में सूनापन आ गया था?”

रामदीन ने शिखर की आंखों में छुपे दर्द को पढ़ लिया था. बोला, “साहब बड़ी बातें मेरी समझ में नहीं आतीं. हां, आप कुछ अलग देखना चाहें, तो एक जगह है, पर वह आपके स्टैंडर्ड की नहीं है. वहां हम जैसे लोग ही जाते हैं.”

शिखर सोच में पड़ गया. फिर बोला, “कोई बात नहीं, तुम बताओ तो सही. यह छोटा-बड़ा कुछ नहीं होता.”

रामदीन का साहस थोड़ा बढ़ा. बोला, “साहब शहर के बाहर रामलीला ग्राउंड में मेला लगा है. आप कहें तो घुमा लाऊं, लेकिन अकेले नहीं. आप मेमसाब को भी लेंगे, तभी घूमने का मज़ा आएगा.”

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शिखर मेले के नाम से ही जैसे खो-सा गया. मेले में चर्खीवाला झूला, टोपी से फूल निकालनेवाला जादूगर, गुड़ की मिठाइयां… हा हा… वह ज़ोर से हंसा. कितने मेले तो देखे हैं उसने बचपन में. उसके घर के बगल में ही तो था मेला ग्राउंड और गर्मी की छुट्टियों में शाम होते ही जैसे कोई ताक़त उसे मैदान की तरफ़ खींचना शुरू कर देती और जब टिकट के पैसे न होते, तो वह मेले के बाहर ही खड़ा होकर भीतर के नज़ारों को महसूस करता.

शिखर को चुप देखकर रामदीन बोला, “साहब घर चलिए. वो तो मैंने ऐसे ही कह दिया था. मेला भी कोई घूमने की चीज़ है आज के ज़माने में.”

शिखर गंभीर होते हुए बोला, “रामदीन सचमुच मेला इस ज़माने में भी देखने की चीज़ है. रुको, मैं फ़ोन कर देता हूं घर पर और आज मेला देखने ही चलते हैं.”

“हैलो, हैलो… सुनो, तैयार हो जाओ, आधे घंटे में पहुंच रहा हूं. आज हम लोग अनोखी जगह घूमने जा रहे हैं और हां, सिंपल कपड़े ही पहनना. क्रेडिट कार्ड और पर्स की ज़रूरत नहीं है. बस, थोड़े पैसे रख लेना, काम चल जाएगा.”

“पहेलियां मत बुझाओ शिखर, ये बताओ हम जा कहां रहे हैं?” उधर से श्रुति की आवाज़ सुनाई दी. शिखर ने मुस्कुराते हुए कहा, “आज मैं तुम्हें मेला दिखाने ले जा रहा हूं.”

“तुम भी कमाल करते हो शिखर. अब इस उम्र में मुझे मेला दिखाने ले जाओगे.”

“कहते हैं ज़िंदगी ही एक मेला है, तो इस उम्र में मेला देखने में हर्ज़ क्या है?”

शिखर जब घर के दरवाज़े पर पहुंचा, तो गाड़ी का हॉर्न सुन श्रुति को बाहर निकलते देख चौंक गया. वह एक साधारण-सी सूती साड़ी में अत्यंत सौम्य लग रही थी.

उसका यह रूप देख शिखर मुस्कुराए बिना न रह सका.

“क्या भाई, आज मेरी चाय भी मारी गई इस मेले के चक्कर में…?” कहते हुए शिखर ने कार का दरवाज़ा खोल दिया और भीतर एक हल्की हंसी गूंज उठी.

अब तक रामदीन को जोश आ चुका था. “साहब आज चाय मैं पिलाऊंगा मुखिया ढाबे की. आप और मेमसाब बस बैठे रहना, मैं गाड़ी में ही ले आऊंगा.” नोक-झोंक में पता ही न चला कि कब हाई वे छोड़ कस्बे का टर्न आ गया और जब कस्बे के मोड़ पर गाड़ी रुकी तो रामदीन चाय लेने चला गया.

“साहब कहते हैं जिसने मुखिया के ढाबे की चाय नहीं पी, समझो उसने कुछ नहीं पिया.”

शिखर ने चाय ले ली और एक कुल्हड़ श्रुति की ओर बढ़ाते हुए जैसे ही पैसे के लिए पर्स निकाला, रामदीन बोला, “साहब यह चाय हमारी तरफ़ से. आप हमारे मेहमान हैं.”

शिखर की लाख कोशिशों के बाद भी रामदीन ने चाय के पैसे नहीं लिये. चाय वाकई लाजवाब थी और मिट्टी के बर्तन में होने के कारण एक सोंधी ख़ुश्बू उसमें से उठ रही थी, जो भीतर तक शिखर को तरोताज़ा कर गई. रामदीन ने गाड़ी आगे बढ़ाई और दस मिनट में कस्बे के रामलीला ग्राउंड के सामने लाकर रोक दी.

देखकर ही पता चल रहा था कि यह आम आदमी की जगह है. लोगों की अच्छी-ख़ासी तादाद थी, लेकिन उम्मीद के विपरीत धक्का-मुक्की और अव्यवस्था कहीं नहीं थी.

छोटे-छोटे बच्चों का हाथ पकड़े परिवार के परिवार घूम रहे थे और जीवन के हर रंग का आनंद उठा रहे थे. वे जब पांच रुपए का गुब्बारा या सात रुपए की पिपिहरी भी ख़रीदते, तो रुपए-दो रुपए का मोलभाव कर लेते. इसके बाद छोटे-छोटे खिलौनों को बच्चों को सौंपते हुए अजीब-सी तृप्ति की अनुभूति होती उन्हें. बच्चे भी खिलौने पाकर ऐसे ख़ुश होते, जैसे उन्हें मुंहमांगी मुराद मिल गई हो.

कितना फ़र्क़ है इस मेले और शॉपिंग मॉल की भीड़ में, जहां 50% डिस्काउंट के बाद भी सामान ख़रीदने का कोई सुख नहीं है.

अचानक शिखर ने श्रुति का हाथ पकड़ा, तो वह तंद्रा से जागी, “छोड़ो भी, कोई देख लेगा तो क्या कहेगा?” श्रुति ने हाथ छुड़ाते हुए कहा.

शिखर हंसने लगा. “यहां हमें जाननेवाला कौन है? चलो झूला झूलते हैं.”

ज़ोर से हंसी श्रुति, “और तुम्हें चक्कर आ गया तो?” “ओह! मैं तो भूल ही गया था कि मुझे झूले में चक्कर आता है. अरे यहां क्या है?” वो श्रुति का हाथ पकड़ एक रिंग की स्टॉल की ओर बढ़ते हुए बोला, “सुनो भैया, एक तरफ़ इनका और दूसरी तरफ़ मेरा नाम लिख दो.”

दुकानदार ने पूछा, “जी क्या नाम लिखूं?”

तभी एक आवाज़ सुनाई पड़ी, “क्यों रे कलुआ, तू हमारी मेमसाब को नहीं जानता? लिख श्रुति मेमसाब और बड़े साहब.”

अपना नाम सुनकर श्रुति चौंकी. पीछे देखा तो उसकी कामवाली खड़ी थी. “अरे तेरी तो तबियत ख़राब थी और तू यहां मेले में घूम रही है?” श्रुति ने उसे डांटते हुए कहा.

“सारी मेमसाब. हमें क्या पता था कि आप मेले में मिल जाएंगी. अब से ऐसी ग़लती नहीं होगी.”

श्रुति ने हंसते हुए पर्स से पचास रुपए निकाले और देते हुए बोली, “ले रख इसे और जाकर मेला घूम.”

उधर देखा, तो शिखर अपने और श्रुति के नामवाली रिंग बनवा बेहद ख़ुश था. देखते-देखते श्रुति ने भी मेले से ढेर सारी चीज़ें ख़रीद डालीं. रोज़मर्रा के सस्ते बर्तन, चूड़ी-बिंदी और न जाने क्या-क्या?

शिखर भी मेले के रंग में पूरी तरह डूब चुका था. वो कभी एयर गन से निशाना लगाता, तो कभी बॉल से ग्लास गिराने की कोशिश करता. भरपूर ख़रीददारी के बाद भी देखा, तो ख़र्च स़िर्फ सात या आठ सौ रुपए हुए थे,  जितने में शायद एक ब्रांडेड शर्ट ही आती.

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एक-दो घंटा घूमकर जब वे दोनों मेले से बाहर निकले, तो रोज़मर्रा के तनाव से बहुत दूर जा चुके थे. क्या नहीं देखा था उन्होंने मेले में… बोलनेवाले सांप से लेकर ताश के जादू तक. भीतर जाने पर सांप के पिंजरे पर लिखा था, “यह अपनी ज़ुबान में बोलता है, आप उसकी ज़ुबान जानते हैं, तो समझ सकते हैं.” वहीं जादूगर कहता, “साहब, सब नज़र का फेर है. पकड़नेवाले को पांच सौ का नगद इनाम और फिर बातों में ऐसे उलझाता कि हाथ की सफ़ाई कोई पकड़ ही नहीं पाता.

जब वे गाड़ी में बैठे, तो सोचने लगे कि हम अपनी सरल ज़िंदगी को दिखावे के चक्कर में कितना भारी बना लेते हैं. पूरी गाड़ी छोटे-छोटे सामानों से भर गई और रामदीन दोनों की ख़ुशी देखकर गदगद हुए जा रहा था. अगली सुबह संडे था और जब शिखर बरामदे में आया, तो देख कर हैरान रह गया कि श्रुति कल के लाए सामानों को आसपास छोटा-मोटा काम करनेवालों में बांट रही थी. किसी को खिलौना देती, तो किसी को चूड़ी-बिंदी. वह एक-एक चेहरे की ख़ुशी देखती और निहाल हो जाती. सच है, जो सुख बांटने में है, वह संग्रह करने में नहीं और जब उसने पीला कुर्ता रामदीन की ओर बढ़ाया, तो उसकी आंखें छलक आईं.

“जुग-जुग जीयो बेटी, भगवान तुम्हें लंबी उमर दे.” भर्राये गले से रामदीन बोला. उसे पहली बार एहसास हुआ कि वह केवल ड्राइवर भर नहीं, इस घर के किसी सदस्य की तरह है.

और फिर बोला, “बेटा, तुमने आज मेले के सही अर्थ को समझा है, यदि बाहरी मेले से हम हृदय में उमंग और ख़ुशी के असली मेले को जगा सकें, तो समझो घूमना-फिरना सफल हो गया, वरना पहाड़ पर घूम आओ या शॉपिंग माल में, सब निरर्थक है.” और अब शिखर रामदीन की सरल भाषा में कही हुई बात का ज़िंदगी के मेले के संदर्भ में गूढ़ अर्थ ढूंढ़ने लगा था.

Murli Manohar Shrivastav

 मुरली मनोहर श्रीवास्तव

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कहानी- फ्लैश फॉरवर्ड (Short Story- Flash Forward)

Hindi Story

”हां, तो मैं बता रही थी कि फिर एक दौर ऐसा आया कि हम दोनों ही अकेले हो गए. उसकी पत्नी की मृत्यु हो गई और मेरा पति…”

“क्या?” मैं ज़ोर से चिल्ला उठी.

“घबराओ मत. ये सब मैंने फ्लैश फॉरवर्ड में देखा था. फिर मैंने अपना पुश्तैनी मकान बेचा और समुद्र किनारे एक फ्लैट में रहने आ गई. वहां एक दिन शाम को पार्क में सैर करते व़क़्त मुझे रितु मिल गई…”

“क्या वह भी विधवा?”

“अरे, नहीं ममा. उसका पति जीवित था.

रिया बेहद अच्छे मूड में आकर मेरे पास बैठ गई और अपनी दोनों बांहें मेरे गले में डाल दीं. मैं समझ गई कि वह कुछ बात बताने के लिए उत्सुक है.

“ममा, मालूम है मैंने विवेक से शादी के लिए हां क्यों की?”

“तुम्हारी सहेली का भाई है और तुझे पसंद आ गया होगा?”

“वो भाई तो रितु का बचपन से ही है, तब से देखती आ रही हूं, पर मैंने उसे कभी इस एंगल से नहीं देखा था. जबकि रितु तो बात-बात में मुझे कहती रहती थी, ‘तुझे इस होटल का रवा डोसा पसंद है? अरे भैया को भी बहुत पसंद है…’ ‘क्या तुझे ‘रॉकस्टार’ फिल्म अच्छी लगी? अरे, भैया को भी बहुत अच्छी लगी…’ मैं तो उसकी बातों से बुरी तरह खीझ जाती थी. तब वह रोने-जैसा मुंह बनाकर बोलती थी. ‘तुझे लगता है मैं बातें बनाती हूं, लेकिन रिया सच, तुम्हारी क़सम! तुम्हारी और भैया की पसंद वाकई बिल्कुल एक जैसी है. तुम दोनों का स्वभाव भी काफ़ी मिलता है.”

“फिर?”

“मुझे उसकी बातों में रस आने लगा था. वह बात ही इतने मज़ेदार तरी़के से कह रही थी. फिर मैंने फ्लैश फॉरवर्ड में देखा कि हम दोनों की शादी हो गई. एक दूजे से नहीं, अलग-अलग जगह. हम अपनी-अपनी गृहस्थी में ख़ुश थे. बच्चे हो गए. उनकी भी शादियां हो गईं…”

मैं मुंह बाए सुन रही थी, पर मुझसे रहा नहीं जा रहा था.

“यह फ्लैश फॉरवर्ड क्या बला है?”

“अरे, बहुत सिंपल चीज़ है ममा. जैसे आप टीवी पर, सिनेमा में फ्लैशबैक देखती हैं. उसमें अतीत में घटी घटना आंखों के सामने साकार होने लगती है. ऐसा ही कुछ फ्लैश फॉरवर्ड में होता है, जिसमें हम अपने अनुमान के आधार पर भविष्य में कुछ घटित होता देखते हैं और वो सब कुछ एक चलचित्र की तरह हमारी आंखों के सामने चलता रहता है. हां, तो मैं बता रही थी कि फिर एक दौर ऐसा आया कि हम दोनों ही अकेले हो गए. उसकी पत्नी की मृत्यु हो गई और मेरा पति…”

“क्या?” मैं ज़ोर से चिल्ला उठी.

“घबराओ मत. ये सब मैंने फ्लैश फॉरवर्ड में देखा था. फिर मैंने अपना पुश्तैनी मकान बेचा और समुद्र किनारे एक फ्लैट में रहने आ गई. वहां एक दिन शाम को पार्क में सैर करते व़क़्त मुझे रितु मिल गई…”

“क्या वह भी विधवा?”

“अरे, नहीं ममा. उसका पति जीवित था. वह अपनी पोती को पार्क में घुमाने लाई थी. कुछ देर सुख-दुख की बातें चलती रहीं. मेरी बात ख़त्म होते ही वह बोल पड़ी. भैया भी बिल्कुल अकेले हो गए हैं. भाभी चल बसी और बच्चे विदेश में सेटल हो गए. वे भी आजकल इसी अपार्टमेंट में रहते हैं. लो, वे आ भी गए. मैंने बताया था न तुझे कि वे भी तेरी तरह शाम की सैर किए बगैर नहीं रह सकते. अब तुम दोनों बातें करो. मैं चलती हूं गुड़िया के दूध का वक़्त हो गया है. मैं विवेक को गौर से देखने लगी. अभी भी काफ़ी तंदुरुस्त और स्मार्ट लग रहे थे. हम रोज़ मिलने लगे और फिर हमने शादी का फैसला कर लिया. रितु ने ख़ुशी-ख़ुशी हम दोनों की शादी करवाई, तो मैंने सोचा, जो काम 40 साल बाद करना है, वह आज ही कर लिया जाए.”

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मैंने अपना सिर पकड़ लिया. “उ़फ्! यह आज की जनरेशन. क्या सोचती है, क्या बोलती है, क्या करती है, इन्हें कुछ होश नहीं रहता और ऊपर से तुर्रा ये कि हम स्पष्टवादी हैं. साफ़ बोलना पसंद करते हैं. लेकिन हम यदि दो बातें स्पष्ट सुना दें, तो इनका पारा चढ़ जाएगा. सोचकर मैंने मुंह सिल लेना ही बेहतर समझा. बड़ी मुश्किल से तो शादी के लिए राज़ी हुई है.

धूमधाम से विवाह संपन्न हुआ और देखते ही देखते नाज़ों पली बिटिया पराई हो गई. नाम के अनुरूप ही विवेक बहुत समझदार लड़का साबित हुआ. रिया प्रोफेशनली बहुत साउंड थी, लेकिन घर-गृहस्थी के मामले में थोड़ी कच्ची थी, पर विवेक के प्यार और विश्‍वास ने कभी गृहस्थी की गाड़ी डगमगाने नहीं दी. रिया जिस तरह मुझसे फोन पर खुलकर लंबी-लंबी बातें करती थी, उससे साफ़ ज़ाहिर होता था कि दोनों के बीच अच्छी अंडरस्टैंडिंग थी. स़िर्फ एक बात मुझे खटकती थी. दोनों जब भी दो-चार दिन की छुट्टियां लेकर आते, विवेक अपने शहर अपने घर चल देता और रिया मेरे पास रुक जाती. रितु की शादी के बाद वे लोग अपने पैतृक शहर जाकर बस गए थे.

“तुम कभी अपनी सास के पास छुट्टियां बिताने नहीं जाती रिया? विवेक या उसके माता-पिता कभी कुछ कहते नहीं? और न विवेक ही कभी यहां रुकता है?”

“यह हम दोनों ने आपस में तय कर रखा है ममा. अब क्या है बड़ी मुश्किल से कितने ही महीनों में दो-चार दिन की छुट्टी मिलती है, तो वह अपने ममा-पापा के पास रहना चाहता है और मैं आपके पास. फिर विवेक की ममा आपकी तरह हाउसवाइफ़ थोड़े ही हैं, वे वर्किंग वुमन हैं. मैं जाऊंगी, तो उन्हें असुविधा होगी. रितु भी अपने ससुराल में है. मेरे न जाने पर मां-बेटे पहले की तरह आराम से अपना व़क़्त गुज़ारते हैं. घूमते हैं, मिलकर पकाते-खाते हैं और गप्पे लड़ाते हैं. मैं दाल-भात में मूसलचंद नहीं बनना चाहती. दूसरे, चार दिन की छुट्टी में भी मैं वहां चली गई, तो फिर आपके पास कब रहूंगी?”

“पर बेटी?”

“हम सभी एक-दूसरे की मजबूरी को समझते हैं और इसलिए कोई इसे अन्यथा नहीं लेता. आप भी इन छोटी-छोटी बातों को लेकर परेशान न हों ममा.” रिया के समझाने पर मैंने सहमति में गर्दन तो हिला दी थी, पर दिल आशंकित ही रहा.

आम कामकाजी महिला की तरह रिया की ज़िंदगी की गाड़ी भी घर और ऑफिस के बीच हिचकोले खाती चलने लगी. कभी बाई नहीं आई, कभी कुक ने छुट्टियां ले लीं, कभी हाथ में चोट लग गई, कभी विवेक से खटपट… इन सब पर ऑफिस में भी बढ़ती ज़िम्मेदारी और तनाव. मैं अपनी ओर से भरसक उसकी समस्या सुलझाने का प्रयास करती, मुश्किलों से जूझने का हौसला भी देती, पर ख़ुद अंदर से टूट जाती. नन्हीं मासूम-सी जान कितने-कितने मोर्चे एक साथ संभालेगी? दिल की बेहद साफ़ और भोली रिया अक्सर ऑफिस में चल रही पॉलिटिक्स से परेशान हो उठती थी. “समझ ही नहीं आता ममा किस पर भरोसा करूं और किस पर नहीं? किसको काम के लिए हां कहूं और किसे साफ़ इंकार कर दूं? लगता है, हर कोई मुझ पर ही हावी हो रहा है.” मैं उसे समझाने का प्रयास करती, “बेटी, ऐसा तो हर ऑफिस में चलता रहता है.”

“आपको क्या पता? आप कब ऑफिस गईं?” वह तुनक उठती.

“नहीं गई. पर तुम्हारे पापा से और दूसरे लोगों से सुनती तो रहती हूं न? सब जगह ये ही ढाक के तीन पात हैं, पर जिनमें प्रतिभा है, जो परिश्रमी हैं, वे हर परिस्थिति से निबट लेते हैं और अधिक निखरकर सामने आते हैं.”

“आप ठीक कहती हैं ममा.” रिया का आत्मविश्‍वास लौट आता, तो मेरा मन भी प्रसन्न हो उठता.

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सप्ताहांत में दो छुट्टियों का संयोग देखकर रिया और विवेक ने घर आने का कार्यक्रम बना लिया. सुनकर मेरा मन मयूर नाच उठा और मैं बड़े उत्साह से उनके आने की तैयारियां करने लगी. लेकिन अपनी तैयारियों पर मुझे जल्द ही विराम लगाना पड़ा. रिया को पता चला, तो वह भी उदास हो उठी.

“क्या ममा! मेरी और विवेक की तो छुट्टी भी मंज़ूर हो गई है.”

“तो ऐसा कर इस बार तू भी उसके साथ अपने ससुराल हो आ. बहुत समय से तेरा वहां जाना नहीं हुआ. अब क्या करूं बेटा, तेरी मौसी का ऑपरेशन नहीं होता और वो नहीं बुलाती तो हम इस दौरान कहीं नहीं जाते. अब ऐसे अवसर पर ना भी नहीं कह सकते. ज़रूरत पड़ने पर घरवाले काम नहीं आएंगे, तो और कौन काम आएगा?”

“नहीं, नहीं. आप निश्‍चिंत होकर जाइए. मैं विवेक के संग मेरठ ही हो आती हूं.” रिया का निर्णय सुन मुझे कुछ तसल्ली मिली.

छोटी बहन का ऑपरेशन निबटाकर मैं घर लौटी, तब तक रिया की छुट्टियां समाप्त हो चुकी थीं और वे लोग भी अपने शहर लौट गए थे. मुकुल को ऑफिस रवाना कर मैं सूटकेस, बैग आदि खाली करने लगी. तभी रिया का फोन आ गया. वह ऑफिस जा रही थी. चहकते हुए उसने बताया कि उसका ससुराल का कार्यक्रम बहुत मज़ेदार रहा. “मम्मीजी और पापाजी तो इतने ख़ुश थे ममा कि मैं आपको बता नहीं सकती. उन्होंने भी अपने-अपने ऑफिस से दो-दो दिन की छुट्टी ले ली थी. हम पूरा मेरठ घूमे. मम्मीजी कह रही थीं कि वे तो हमेशा से चाहती थीं कि मैं भी विवेक के साथ छुट्टियों में उनके पास जाऊं. पर मेरी इच्छा न जानकर संकोच के मारे चुप रह जाती थीं. बता रही थीं कि इस बार विवेक भी ख़ूब खिला-खिला लग रहा है, वरना हमेशा तो आकर बस सोया रहता है. कहीं चलने को कहते हैं, तो कहता है सब देखा हुआ तो है. मैं तो यहां थकान उतारने आया हूं. पर इस बार तो उसका घूमने और खाने की फरमाइशों का दौर ही ख़त्म नहीं हो रहा है. यूं लग रहा है, जैसे दो ही दिनों में तुझे सब कुछ दिखा और खिला देना चाहता है. घर में कितनी रौनक़ हो गई है…” रिया की आवाज़ की चहचहाहट बता रही थी कि वह कितनी ख़ुश है. मैं आनंद के सागर में गोते लगाने लगी. उसकी बातें थीं कि ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थीं.

“और पता है ममा, उन्होंने मेरी ऑफिस संबंधी सारी समस्याएं चुटकियों में सुलझा दीं, जिन्हें आप भी नहीं सुलझा सकती थीं, क्योंकि आप वर्किंग नहीं हैं और विवेक भी नहीं सुलझा पाया था, क्योंकि वह वुमन नहीं है.” मैं अनायास ही मुस्कुरा उठी थी.

“उन्होंने मुझे घर और ऑफिस में तालमेल के इतने कारगर टिप्स बताए हैं कि मुझे सब कुछ बेहद आसान लगने लगा है. मम्मीजी तो वर्किंग वुमन होते हुुए भी घर को इतना सुव्यवस्थित और साफ़ रखती हैं कि मैं तो दंग रह जाती हूं. नौकर तो वहां भी हैं, पर उनसे काम लेने का भी एक तरीक़ा होता है, ये मुझे अब समझ आया. मैं उनसे विवेक की पसंद की कुछ डिशेज़ भी सीखकर आई हूं. और हां, उन्होंने मुझे एक बेहद ख़ूबसूरत घाघरा-चोली ड्रेस दिलवाई है, वो मैं नवरात्रि में पहनूंगी. मैंने और विवेक ने अब निश्‍चय किया है कि हम दोनों अब अपनी छुट्टियां ख़ुद को बांटकर नहीं, बल्कि छुट्टियों को बांटकर बिताएंगे. अगली छुट्टियों में विवेक भी मेरे साथ आपके पास रहेगा और लौटते समय हम दोनों दो दिन मेरठ रुकेंगे. क्यों ठीक है न ममा? आप तो हमेशा से यही चाहती थीं.”

“पर तू मानती कहां थी? तभी तो हमें जबरन मौसी के यहां जाना पड़ा.”

“जबरन? तो क्या मौसी का ऑपरेशन नहीं था?”

“अरे था. कैटरेक्ट (मोतियाबिंद) का छोटा-सा ऑपरेशन था. दो घंटे में करवाकर घर आ गए थे. उनकी बेटी लीना और दामादजी भी आए हुए थे. इसलिए ज़्यादा कुछ काम था ही नहीं. हम तो ऐसे ही अपनी तसल्ली के लिए चले गए थे.”

“ओह! तो मुझे सबक सिखाने के लिए यह योजना बनाई गई थी.”

“फिर क्या करती? मैंने फ्लैश फॉरवर्ड में देखा कि तेरे बार-बार अकेले आने से और विवेक के अकेले घर जाने से कोई भी ख़ुश नहीं था. पर तुम दोनों पति-पत्नी के निर्णय के बीच बोलकर कोई बुरा भी नहीं बनना चाहता था. बेटी, विवाह दो इंसानों का नहीं, दो परिवारों का मिलन होता है. दो इंसान निस्संदेह एक-दूसरे के साथ बेहद ख़ुश रह सकते हैं, लेकिन परस्पर जुड़ाव के लिए उसे दूसरे पक्ष से जुड़ी सभी चीज़ों से जुड़ना होता है. जैसे मुझे तुम अत्यंत प्रिय हो, तो तुमसे जुड़ा विवेक, उसके माता-पिता, भाई-बहन आदि स्वतः ही प्रिय लगने लगे. उनसे जुड़ाव तुम्हारे प्रति जुड़ाव बढ़ाएगा, घटाएगा नहीं. क्या तुम्हें नहीं लगता कि ससुराल से लौटने के बाद विवेक तुम्हें और भी ज़्यादा प्यार करने लग गया है?”

“हां ममा, बिल्कुल ऐसा ही है. मैं ख़ुद इस बदलाव पर हैरान हूं, पर तुम्हें कैसे पता चला?”

“अपनी फ्लैश फॉरवर्डवाली रील में मुझे सब कुछ साफ़-साफ़ नज़र आ रहा है.”

“ओह ममा, आपने तो मेरा तीर मुझ ही पर चलाकर मेरी ज़ुबान पर ताला लगा दिया है.” अपनी पराजय स्वीकारते हुए भी रिया की ख़ुशी छुपाए नहीं छुप रही थी.

shaili mathur

    शैली माथुर

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कहानी- डोर का धागा (Short Story- Dor Ka Dhaga)

Hindi Story

उसे अपने शरीर में एक लिजलिजाहट-सी महसूस हुई. अलग होने पर दुखी होने की बजाय ये सब भद्देपन का प्रदर्शन कर रही हैं. क्या अभय से तलाक़ लेकर वह भी ऐसी बन जाएगी. नहीं, वह तो कतई ऐसी नहीं बनना चाहती… घर-परिवार, बच्चे… सब उसे चाहिए. पुरुष के अपने जीवन में होने के सच को वह सुखद मानती है, कोई नफ़रत थोड़े ही है उसे अभय से या पुरुष सत्ता से…

अग्नि के समक्ष सात फेरे लेने से ही स्त्री-पुरुष क्या जन्म-जन्म के बंधन में बंध जाते हैं और फिर सात जन्मों तक उनका साथ हो जाता है… नहीं मानती मैं इन बातों को. सब बकवास है कि मन का मेल होने के लिए सात फेरे लेने ज़रूरी हैं और अब तो व़क्त इतना बदल गया है कि तन का मेल होने के लिए भी सात फेरे लेने की ज़रूरत ख़त्म हो गई है… जानती हूं कि मेरी सोच और बातें समाज विरोधी हैं और न जाने कितने धर्म के ठेकेदार यह सुनते ही मुझे समाज से बहिष्कृत करने को आतुर हो उठेंगे, पर यही सच है. तुम चाहो तो किसी का भी मन टटोलकर देख लेना.”

मनस्वी की बातें सुन हैरान सुधा के मुंह से केवल इतना ही निकला, “क्यों ऐसी बातें कर रही है. जो नियम है उसका पालन तो हमें करना ही होगा, चाहे इच्छा से, चाहे अनिच्छा से.” पर उसकी बात को अनसुना कर मनस्वी अपनी ही रौ में बोलती जा रही थी.

“देख न सुधा, कैसी विडंबना है यह भी कि भारतीय विवाह की परंपराओं में सात फेरों का चलन है. हिंदू धर्म के अनुसार सात फेरों के बाद ही शादी की रस्में पूरी होती हैं. सात फेरों में दूल्हा व दुल्हन दोनों से सात वचन लिए जाते हैं. ये सात फेरे ही पति-पत्नी के रिश्ते को सात जन्मों तक बांधते हैं. हर फेरे का एक वचन होता है, जिसमें पति-पत्नी जीवनभर साथ निभाने का वादा करते हैं. इसका मतलब तो यह हुआ कि विदेशों की शादियां सात जन्मों के लिए नहीं होती हैं. वहां तो वे फेरे लेते ही नहीं हैं. अच्छा ही है एक जन्म में ही पीछा छूट जाता है.” मनस्वी के स्वर में कड़वाहट थी.

“अरे वहां तो जब चाहे पीछा छूट जाता है, फिर शादी हुए दो दिन या दो महीने ही क्यों न हुए हों. वहां न समझौता करने की ज़रूरत है, न निभाने की मजबूरी. झट से डिवोर्स लिया और हो गए अलग.” सुधा ने माहौल को थोड़ा हल्का करने के ख़्याल से मज़ाकिया अंदाज़ में कहा.

“वही तो मैं कह रही हूं कि वहां जब सात फेरे और सात वचन लिए ही नहीं जाते, तो क्या जो लोग अलग नहीं होते, वे क्या एक-दूसरे का ख़्याल नहीं रखते! वे भी तो प्यार करते ही हैं एक-दूसरे को, फिर क्यों परंपरा निभाने के नाम पर हमारे यहां रिश्तों की ज़ंजीरों में बंधे रहने को बाध्य किया जाता है. क्या ज़िंदगीभर समझौता करते रहना जीने का सही तरीक़ा है?”

“देख मनस्वी, समझौता करने में कोई बुराई तो नहीं है, क्योंकि अलग होकर ज़िंदगी जीना भी आसान नहीं है. मैं यह नहीं कह रही कि तू सक्षम नहीं है और अकेले जीवन नहीं काट सकती, पर मुझे लगता है कि डिवोर्स लेने जैसा क़दम तभी उठाना चाहिए, जब तुम किसी और के साथ बंधने को तैयार हो. क्या तूने और कोई साथी ढूंढ़ लिया है, जो अभय से अलग होने का ़फैसला ले रही है? जो भी करना, बहुत सोच-समझकर करना. बात न फेरे लेने की है, न सात वचनों या सात जन्मों की, बात तो कमिटमेंट, विश्‍वास और समर्पण की है.”

सुधा की बात सुन मनस्वी सोच में पड़ गई. वह बेशक अभय के साथ नहीं रहना चाहती, पर किसी और की अपने जीवन में कल्पना तक नहीं कर सकती है. उसके मन में ऐसा ख़्याल तक कभी नहीं आया. अभय के सिवाय कोई और… नहीं, नहीं… मनस्वी सिहर उठी. वह बेशक एक मॉडर्न, एजुकेटेड और वर्किंग वुमन है, पर कहीं न कहीं भीतर परिवार और संग-साथ की इच्छा रखती ही है. अभय में बहुत सारी बुराइयां हैं, पर यह सच है कि जब भी उसके साथ होती है, वह सुरक्षित महसूस करती है. बस, यही शिकायत है कि अभय उसे समझने की कोशिश नहीं करता. उसकी काम की परेशानियों को उसके देर से आने का बहाना कह मज़ाक उड़ाता है और उसका दूसरे पुरुषों से बात करना उसके अंदर शक पैदा करता है. आख़िर क्यों नहीं वह उसे एक स्पेस देना चाहता.

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उसने कहीं पढ़ा था कि औरत भी पतंग की तरह होती है, जब तक उसकी डोर किसी के हाथ में होती है, वह इठलाती, इतराती आसमान में उड़ती रहती है. जब वह आसमान में लहरा रही होती है, तो सबकी नज़रें और सिर उसकी ओर होते हैं. सम्मान भाव होता है सबके मन में. हर कोई उसे संभालने के प्रयास में लगा रहता है. पूरा परिवार उसे संभालने के लिए एकजुट हो खड़ा रहता है, जैसे वह मानो उनकी ख़ुशियों का आधार हो, लेकिन जैसे ही वह पतंग कटती है, सबके चेहरे लटक जाते हैं और फिर वह या तो कट-फटकर इधर-उधर गिर जाती है या किसी के पैरों के नीचे आ जाती है. जाने-आनजाने हर कोई उसे रौंदता आगे बढ़ जाता है.

औरत भी जब तक एक डोर से बंधी रहती है, तो उसका मान-सम्मान बना रहता है, लेकिन डोर के टूटते ही उसके भटकाव की कोई सीमा नहीं रहती है.

“क्या सोचने लगी मनस्वी, बता न जो तू अभय से तलाक़ लेने की ज़िद कर रही है, क्या तू फिर से दूसरी शादी करेगी?”

“दूसरी शादी करने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता सुधा.” मनस्वी धीरे-से बोली. वह अंदर ही अंदर स्वयं को मथ रही थी जैसे.

“फिर क्या सारी ज़िंदगी अकेले काटने का इरादा है. माना तुझे फाइनेंशियली कोई प्रॉब्लम नहीं है, पर अकेलेपन को भरने कौन आएगा तेरे पास. तेरे भाई-बहन तो तुझे उकसा रहे हैं कि अभय से अलग हो जा, तो क्या वे तेरा साथ देंगे. याद रख, उनका अपना घर-संसार है. कुछ दिन तो वे तेरा साथ देंगे, पर फिर अपनी दुनिया में मस्त हो जाएंगे. ऐसा ही होता है. बेशक वे तुझसे प्यार करते हैं, पर उनकी अपनी भी ज़िम्मेदारियां हैं. इस कठोर सत्य को जितनी जल्दी तू स्वीकार लेगी, उतना अच्छा होगा. अभी पैंतीस साल की है तू. पूरी ज़िंदगी पड़ी है.”

“तो तू ही बता मैं क्या करूं? अगर मैं मां नहीं बन सकती, तो इसमें मेरा क़सूर है. अगर मैं अभय से ज़्यादा कमाती हूं, तो क्या इसमें मेरा कसूर है… अगर मैं उससे ज़्यादा कामयाब हूं, तो मेरा कसूर है… क्यों नहीं वह चीज़ों को सहजता से लेता, बस हमेशा मानसिक रूप से प्रताड़ित करता रहता है. हम साथ ख़ुश रह सकते हैं, पर वह तो जैसे ख़ुश रहने को कोई बड़ा क्राइम मानता है.” मनस्वी के आंसू बह निकले थे.

सुधा उसकी पीठ सहलाती हुई बोली, “चल मान लिया कि अभय में लाख बुराइयां हैं और तू कहती है कि वह तुझे नहीं समझना चाहता, पर क्या तूने कभी उसे समझने की कोशिश की है. शायद उसके मन में भी दुविधाओं के अनगिनत जाले हों.”

“सुधा, उसकी तरफ़दारी मत करो. सारे जाले उसने ख़ुद बुने हैं. मैंने उसे कभी ऐसा करने को मजबूर नहीं किया. उसके छोटे शहर की मानसिकता उसे यह सब करने के लिए उकसाती रहती है. शहर आना तो अच्छा लगता है, पर शहर के तौर-तरी़के और शहर की बीवी न जाने क्यों कुछ समय बाद आंख की किरकिरी बन जाती है.”

“तेरे सारे तर्क क़बूल… पर ज़रा सोच तो, उसके साथ बंधी तो हुई है, अभय नाम की डोर जिस दिन कट गई तो क्या होगा.”

“तो उसकी ज़्यादतियां सहन करती रहूं?”

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“मैं नहीं कहती कि तू ज़्यादतियां सहे, पर हो सकता है, जो तुझे उसकी ज़्यादतियां लग रही हों, वह उसका स्वभाव हो. ठोस ज़मीन पर पैर रखकर एक बार सोच मनस्वी. ये ज़्यादतियां तेरी उस ज़िंदगी से अच्छी होंगी, जो तुझे तलाक़ लेने के बाद झेलनी पड़ेंगी. आसान नहीं होता अकेले रहना… सुनने और पढ़ने में बेशक अच्छा लगे कि पति के ज़ुल्मों को सहने से इंकार करके, फलां ने विद्रोह किया और उसे कोर्ट में घसीटकर सबक सिखाया… औरत होने के हक़ की लड़ाई की… पर वास्तव में सच्चाई इसके विपरीत होती है. क्या किसी ने कभी यह ख़बर छापी है कि उस फलां औरत ने तलाक़ के बाद किस तरह ज़िंदगी काटी… यह औरतों की मर्दों के ख़िलाफ़ लड़ाई… कुछ तथाकथित फेमिनिस्टों की साज़िश है और तू इसका शिकार बन रही है.”

सही कह रही थी क्या सुधा… मनस्वी की आंखों के आगे अपनी ऑफिस की कुछ कलीग्स के चेहरे घूम गए. स्वयं को गर्व से फेमिनिस्ट कहनेवाली रीमा, तो अक्सर ही उसे तलाक़ लेने के लिए उकसाती आ रही है, वरना मनस्वी के दिमाग़ में इससे पहले कभी अभय से अलग हो जाने की बात आई ही नहीं थी.

अगले दिन जब वह ऑफिस गई, तो रीमा उसे देखते ही बोली, “क्या सोचा तूने. तलाक़ ले रही है न… मैं तो कहती हूं जूते की नोक पर रखना चाहिए इन मर्दों को. अरे, तू क्या किसी से कम है. मुझे देख, शादी के एक साल बाद ही अलग हो गई थी और अब अपनी मर्ज़ी से जीती हूं. कोई रोक-टोक नहीं है. मस्त लाइफ है अब यार.”

पूजा जो तीन साल से अलग रह रही थी, बोली, “मैंने तो बच्चा भी उसके पास ही छोड़ दिया. कस्टडी के लिए हल्ला कर रहा था, तो मैंने सोचा चलो ज़िम्मेदारी से छुट्टी मिल गई. हफ़्ते में एक दिन मिलने चली जाती हूं बेटी से.”

“मेरा एक्स हस्बैंड तो आज भी मेरे पीछे घूमता है, पर मैं घास नहीं डालती.” नैना ने आंखें मटकाते हुए कहा था.

“तुम भी हमारे फेमिनिस्ट क्लब का हिस्सा बन जाओ मनस्वी.” बेशर्मों की तरह हंसी थी रीमा उसे आंख मारते हुए.

उसे अपने शरीर में एक लिजलिजाहट-सी महसूस हुई. अलग होने पर दुखी होने की बजाय ये सब भद्देपन का प्रदर्शन कर रही हैं. क्या अभय से तलाक़ लेकर वह भी ऐसी बन जाएगी. नहीं वह तो कतई ऐसी नहीं बनना चाहती…

घर-परिवार, बच्चे… सब उसे चाहिए. पुरुष के अपने जीवन में होने के सच को वह सुखद मानती है, कोई नफ़रत थोड़े ही है उसे अभय से या पुरुष सत्ता से… अभय, समझो तो मुझे एक बार… नहीं कटने देना चाहती वह डोर को. थाम लेगी अब की बार वह डोर के धागे को…

देर ही हो गई थी उसे ऑफिस से निकलने में. फाइनेंशियल ईयर एंडिंग था… सारे डेटा दुरुस्त करने थे. वह टैक्सी लेने के लिए चलते-चलते ऑफिस के पास ही बने होटल तक आ गई थी. उसका एक कप कॉफी पीने का मन हो रहा था. वैसे भी सवारियों को छोड़ने आने के कारण टैक्सी यहां से तुरंत ही मिल जाती थी. वह होटल के अंदर घुसने ही वाली थी कि तभी एक जाना-पहचाना स्वर उसके कानों से टकराया.

“ओह, करण, तुम नहीं जानते कि मुझे तुम्हारी कितनी ज़रूरत है. अपने पति से अलग हो जाने के बाद खालीपन भर गया है ज़िंदगी में. मुझे अपनी ज़िंदगी में किसी पुरुष की ज़रूरत है. मैं जानती हूं कि तुम शादीशुदा हो, पर प्लीज़ मुझसे अलग मत हो…” नशे में धुत रीमा, एक पुरुष के कंधे का सहारा लेकर लड़खड़ाती हुई टैक्सी में बैठ रही थी.

Suman Bajpai

   सुमन बाजपेयी

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कहानी- स्वध्यान (Short Story- Swadhyan)

Hindi Kahani

सबके हंसते-खिलखिलाते चेहरों के बीच वो भी हंसती-खिलखिलाती काम किए जा रही थी. हर काम के लिए उसे पुकारा जाना, हर सलाह-मशवरे में उसकी राय लेना, इतना ही काफ़ी था उसका ये विश्‍वास कायम रखने के लिए कि सब उसे चाहते हैं, उसकी कद्र करते हैं. मगर तीन-चार दिनों से उसका ये विश्‍वास एक छलावा सिद्ध हो रहा है. उसे लग रहा है कि यह एक सोच-समझकर बुना गया भ्रमजाल है, जो उसके इर्द-गिर्द फैलाया गया है, ताकि कहीं किसी विद्रोही स्वर की गुंजाइश न बचे.

मानसी ने घड़ी पर नज़र डाली, 6 बज चुके हैं. उफ्! इतनी ज़ल्दी सुबह क्यों हो जाती है? उसके मानस पटल पर अगले तीन  घंटे चलनेवाला दैनिक घटनाक्रम घूमने लगा. बच्चों को उठाना, नहलाकर तैयार करना, पापाजी का बादाम दूध और स्प्राउट… मम्मीजी का चरणामृत… उफ्! उसे इतने काम सोचकर ही चक्कर आने लगे. झटके से चादर हटाकर उठना चाहती थी, मगर कमर जवाब दे गई थी. हफ़्ते भर से पीछे पड़ा बुखार कल विदा हो गया, मगर कमज़ोरी अभी भी साथ छोड़ने को तैयार नहीं थी. ऊपर से इस कमरदर्द ने आ जकड़ा था.

मानसी ने ख़ुद को इतना असहाय कभी महसूस नहीं किया होगा, जितना आज कर रही है. घर की बैकबोन, अकेली कर्ता-धर्ता गृहिणी के बिस्तर पर पड़े रहने से घर की सारी व्यवस्था ही चरमरा गई थी, कोई काम ठीक से और समय पर नहीं हो पा रहा था. जिधर देखो बिखरा सामान, बच्चों की क़िताबें, धुले-बेधुले कपड़े. मानसी को ऐसी अव्यवस्था की तनिक भी आदत नहीं है. बीमारी से ़ज़्यादा बदहाल घर ने उसे फ्रस्ट्रेट कर रखा है. कल ख़ुद से वादा करके सोई थी कि सुबह उठेगी और घर की गाड़ी वापस पटरी पर ले आएगी, मगर आज उसकी कमर धोखा दे गई.

अब चाहे जो भी हाल हो, काम तो करने ही हैं. उसने एक स्ट्रॉन्ग पेनकिलर निगला, ख़ुद को संयत किया और उठ खड़ी हुई. “शुभम, शैली उठो, स्कूल को देर हो जाएगी.” बच्चों को उठाकर बाहर आई. पतिदेव नितिन हॉल में अख़बार पढ़ रहे थे, चाय शायद ख़ुद बना ली है. मांजी नहाने जा चुकी हैं. बाथरूम से ही मंत्रों की आवाज़ें आ रही हैं. उनका पूजा-पाठ नहाने के साथ ही शुरू हो जाता है. रसोई में आई, तो देखा कुछ भी काम शुरू नहीं हुआ. लाचारी मिश्रित ग़ुस्सा उबलने को तैयार है. मन किया फट पड़े सभी पर. घर में किसी का भी दुख-दर्द हो, हारी-बीमारी हो, बढ़-चढ़कर सेवा की है और ये लोग उसे हफ़्ता भर भी न निबाह पाए. माना नितिन को ऑफ़िस जाना है, तो क्या थोड़ा जल्दी उठकर अख़बार पढ़ने की बजाय बच्चों को तैयार नहीं कर सकते? मम्मीजी उठकर सीधे नहाने और पूजा-पाठ करने की बजाय बच्चों के टिफ़िन तैयार नहीं कर सकतीं? पापाजी 5 बजते ही सैर और योगा के लिए क्लब चले जाते हैं और फिर नाश्ते तक का समय अख़बारों के ढेर में घिरे बिताते हैं, क्या वो बच्चों को बस स्टॉप तक छोड़ने की ज़िम्मेदारी भी नहीं उठा सकते?

आज तक उसने ऐसा कुछ नहीं सोचा था, जो आज सोच रही है. अब तक ज़रूरत ही नहीं पड़ी कभी. हफ़्ते भर पहले तक सब सामान्य था. पिछले 12 सालों से सभी की पसंद-नापसंद और ज़रूरतों का ख़्याल रखते हुए घर के सभी काम नियत समय पर आगे से भाग-भागकर किए जा रही थी, वो भी स्वेच्छा और ख़ुशी के साथ. अजीब-सी संतुष्टि मिलती थी उसे ऐसा करके. सास- ससुर तारीफ़ करते नहीं थकते थे. बड़ी क़ाबिल है हमारी बहू. घर के साथ-साथ बाहर के सभी कामों को भी बख़ूबी करती है. कार ड्राइव करती है, तो बच्चों को क्लासेस में लाना-ले जाना, ख़रीददारी, बैंक के काम सभी वही निपटा लेती है. ‘मानसी तुम न होती तो ये घर कैसे चलता, इस घर के लिए तुम्हारा जो कॉन्ट्रीब्यूशन है उसका कोई मूल्य नहीं है.’ नितिन भी अक्सर प्रशंसा करते. ऐसी तारीफ़ ही उसे थकान के बावजूद निरंतर कार्यरत रहने की ऊर्जा प्रदान करती थी. ख़ुद को लकी समझती थी वो. उसके जैसी कितनी ऐसी गृहिणियां हैं, जो गृहकार्यों की अनवरत् चलनेवाली चक्की में पिसती जाती हैं, मगर कहीं किसी प्रशंसा के दो बोल भी सुनने को नहीं मिलते. उनके हर काम को टेक इट फॉर ग्रांटेड लिया जाता है, मगर उसे कितनी सराहना मिलती है. ख़ासकर उसके बनाए हुए खाने को लेकर. पापाजी तो मम्मीजी को कह भी देते हैं, ‘तुम तो अब किचन में हाथ मत ही लगाओ तो अच्छा है, बहू जैसी पाक कला तुममें कहां?’ और चाहे-अनचाहे मम्मीजी ने इस तथ्य को स्वीकारते हुए अपना कार्यक्षेत्र सीमित कर लिया. सबके हंसते-खिलखिलाते चेहरों के बीच वो भी हंसती-खिलखिलाती काम किए जा रही थी. हर काम के लिए उसे पुकारा जाना, हर सलाह-मशवरे में उसकी राय लेना, इतना ही काफ़ी था उसका ये विश्‍वास कायम रखने के लिए कि सब उसे चाहते हैं, उसकी कद्र करते हैं. मगर तीन-चार दिनों से उसका ये विश्‍वास एक छलावा सिद्ध हो रहा है. उसे लग रहा है कि यह एक सोच-समझकर बुना गया भ्रमजाल है, जो उसके इर्द-गिर्द फैलाया गया है, ताकि कहीं किसी विद्रोही स्वर की गुंजाइश न बचे.

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इससे पहले जब कभी बुखार आया, पेनकिलर खाकर किसी भी तरह खड़ी हो जाती थी. धीरे-धीरे ही सही सब निपटा देती थी, मगर इस बार शरीर साथ नहीं दे रहा है. नितिन ने कह दिया कि मेरे नाश्ते-टिफ़िन की चिंता मत करो, ऑफ़िस में खा लूंगा. मम्मीजी भी अपना और पापाजी का टोस्ट व दाल-रोटी से काम चला रही हैं, मगर उसका क्या?  और बच्चे, नित नए व्यंजन खानेवाले बच्चे कब तक टोस्ट व दाल-रोटी खा पाएंगे? उनके कपड़े, यूनिफ़ॉर्म, होमवर्क, प्रोजेक्ट वर्क – वो सब कौन देखेगा? इतने सालों में पहली बार स्कूल से शिकायत आई है. शैली का प्रोजेक्ट समय पर नहीं बना, कोई साथ बैठकर कराता तभी तो. पापाजी चाहते, तो बनवा सकते थे, ग्लोबल वॉर्मिंग पर ही तो था. सबने अपना-अपना खाना-पीना संभाल लिया, पर इससे आगे कुछ करने की किसी ने ज़रूरत नहीं समझी. क्या इसी को कहते हैं सहयोग देना और ख़्याल करना?

मम्मीजी ने भी दो दिन तो हालचाल पूछा, तीसरे दिन स्वर से चिंता और झल्लाहट टपकने लगी. “अभी भी बुखार उतरा नहीं क्या? खड़ी नहीं हो पा रही हो क्या? दवाई बदल कर देख लो.” चेहरे के भाव स्पष्ट थे- बहुत आराम हुआ, अब खड़े होकर घर संभालो. नितिन भी एक-दो दिन सपोर्ट दिखाकर तीसरे दिन से रूटीन लाइफ़ में व्यस्त हो गए. सबसे ज़्यादा बच्चों पर बन आई है. अब न कोई उन्हें टीवी से हटकर पढ़ाई करने को कहता है, न ही कोई रात को ज़बरदस्ती ब्रश कराता है. किसी-किसी दिन तो बगैर नहाए ही स्कूल चले गए हैं. छठे दिन बुखार उतरा, तो मम्मीजी ने राहत की सांस ली और पहले की तरह अपने रूटीन पूजा-पाठ में लग गईं. ये पूछना भी ज़रूरी नहीं समझा कि मेरी सुबह उठकर काम करने की हालत है भी या नहीं… मानसी के विचारों की अनवरत धारा बहे जा रही थी. सोचते-सोचते बच्चों का नाश्ता, टिफ़िन कब तैयार हो गए, उसे पता ही नहीं चला. मानसी दोहरे अवसाद में है. पहला यह कि उसे घरवालों का रवैया ग़ैरज़िम्मेदाराना लग रहा है और दूसरा यह कि अब उसका शरीर उसकी ज़िम्मेदारियों से लय नहीं मिला पा रहा है.

“नितिन आज बच्चों को स्कूल बस में बैठा कर ऑफ़िस जाना.” स्वर आदेशात्मक था और गंभीर भी, नितिन कोई ना-नुकुर नहीं कर पाए.

मम्मीजी पूजा से निपटकर रसोई में आ गई हैं. “बहू पापाजी के लिए कुछ तैयार किया क्या?” मानसी ने प्रत्युत्तर नहीं दिया. इतनी ऊर्जा भी शेष नहीं बची है कि किसी से उलझ सके. बच्चों का काम ख़त्म कर चुपचाप कमरे में आकर लेट गई. उसके विचित्र व्यवहार से मांजी हतप्रभ थीं. नितिन भी कुछ घबरा गए.

“तबियत अभी भी ठीक नहीं है क्या? मेरी चिंता मत करना, मैं ऑफ़िस में कुछ खा लूंगा.”

“तुम्हारी चिंता नहीं, अपनी चिंता है मुझे.” स्वर तीखा हो चला.

“डॉक्टर को कंसल्ट…”

“थैंक्स, मैं अपना ख़ुद देख लूंगी.” मानसी ने बात बीच में ही काट दी. नितिन ने चुपचाप कमरे के बाहर जाना ही बेहतर समझा.

पेनकिलर अपना असर दिखा चुकी थी, मानसी हिम्मत बटोरकर अपनी फैमिली डॉक्टर से कंसल्ट करने चली गई. सभी रिपोर्ट साथ ले ली थी. उसने पिछली बार न जाने क्या-क्या टेस्ट और एक्स-रे बताए थे. सभी रिपोर्ट देखकर डॉक्टर कुछ देर मौन रही.

“सब ठीक तो है न डॉक्टर?”

“हूं… मेरी नज़र से तो कुछ भी ठीक नहीं है. हां, मगर तुम्हारे जैसी औरतों के लिए ये कुछ ख़ास बात नहीं है. तुम्हारे लिए तो ख़ास बात उस दिन होती है, जब तुम बिल्कुल ही बिस्तर पकड़ लेती हो.”

“क्या मतलब? मैं समझी नहीं.”

“मतलब ये मानसी कि तुम्हारी सभी रिपोर्ट मुझसे तुम्हारी ये शिकायत कर रही हैं कि घर में सबका बख़ूबी ख़्याल रखनेवाली मानसी ने अपना ज़रा भी ख़्याल नहीं रखा. तुम में कैल्शियम, विटामिन ‘बी-12’ की ज़बरदस्त कमी है. हीमोग्लोबिन भी बहुत कम है और तुम्हारी स्पाइन का एक्स-रे बता रहा है कि अगर तुमने तुरंत फ़िज़ियोथेरेपी और प्रॉपर एक्सरसाइज़ शुरू नहीं की, तो कभी भी स्लिप डिस्क हो सकती है.”

“डॉक्टर, आप तो जानती हैं मेरे घर का हाल, मरने तक की फुर्सत नहीं निकाल पाती हूं.”

“हां, मैं अच्छे से जानती हूं और ये वाला जुमला तो मैं रोज़ अपने न जाने कितने पेशेंट से सुनती हूं, जिन्हें लगता है कि दुनिया उनके दम पर ही चल रही है. अगर उन्होंने अपनी व्यस्त दिनचर्या के कुछ लम्हे ख़ुद को दे दिए, तो संसार में बड़ी भारी उथल-पुथल मच जाएगी. अच्छा, ज़रा सोचकर बताओ तुम्हारी हफ़्ते भर की बीमारी ने घर को हिलाकर रख दिया, तो अगर अगली बार ये अवधि ज़्यादा बढ़ गई, तो फिर उनका क्या होगा? तब क्या तुम्हारे बच्चे परेशान नहीं होंगे और अगर तुम्हें स्पाइन की कोई बड़ी प्रॉबल्म हो गई, तो संभव है महीनों बिस्तर पर रहना पड़े, तब क्या करोगी?”

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डॉक्टर की बातों ने मानसी को हिला दिया. पिछले एक हफ़्ते में जो उसके बच्चों पर गुज़री थी, उसके दोहराव की बात सोचकर ही वो कांप उठी. बच्चों के साथ वो किसी बात पर समझौता नहीं कर सकती थी. उनके खान-पान, पढ़ाई, स्वास्थ्य आदि को लेकर वो बेहद सजग थी. डॉक्टर ने अपना काम कर दिया था. कुछ फूड सप्लिमेंट्स, कुछ दवाइयां, लगातार 15 दिनों की फ़िज़ियोथेरेपी और प्रॉपर रेस्ट प्रिस्क्राइब कर दिया. इससे ज़्यादा वो कुछ नहीं कर सकती थी. इससे आगे जो कुछ करना था, मानसी को ही करना था. उसे पता था, इस बिज़ी शेड्यूल से दो-तीन घंटे अपने लिए निकालना टेढ़ी खीर है. घर में सब को जी हुज़ूरी की आदत जो लगी हुई है, मगर वो जानती थी कि इसके लिए वो स्वयं ही ज़िम्मेदार है. शैली 10 और शुभम 8 साल का है. मगर अभी तक वही उनके सारे काम कर रही है. चाहे कपड़े निकालकर देना हो, बाथरूम में तौलिया पकड़ाना हो, जूते-चप्पलें व्यवस्थित रखना हो, बैग लगाना हो या फिर बाल बनाना हो. हर काम के लिए वे उसी पर निर्भर हैं. हों भी क्यों न, उसने कभी कोशिश ही नहीं की, उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की. ममता में अंधी होकर उसने कभी ये भी नहीं सोचा कि ऐसी आदतें आगे बच्चों को दुख देंगी और उसे भी. तभी उसकी हफ़्तेभर की बीमारी ने बच्चों पर इतना बुरा असर डाला. अगर वो अपने काम ख़ुद करना जानते, तो इस समय न उसे परेशानी होती, न ही उन्हें. ख़ैर जो हो गया, उसके बारे में सोचकर कुढ़ने से क्या फ़ायदा? अब आगे कैसे स्थिति सुधारी जाए, इस पर ध्यान देना है. सबका अच्छे से ध्यान रखने के लिए उसे अपना ध्यान रखना ही होगा. धीरे-धीरे ही सही, सब ठीक हो जाएगा. मन में सकारात्मक पहल लिए मानसी घर की ओर चल पड़ी.

“आ गई बहू, क्या बोली डॉक्टर? सब ठीक है न?” मांजी चिंतित थीं.

“हां, अभी तक तो सब ठीक, मगर…”

“चलो शुक्र है भगवान का.” मांजी मानसी की बात बीच में ही काटते हुए ईश्‍वर को धन्यवाद देने लगीं. इतना भर सुनकर ही उनकी समस्त चिंताएं दूर हो गई थीं. इससे आगे कुछ डिटेल जानने की न उन्हें ज़रूरत थी, न ही चाहत. “लंच के लिए काफ़ी देर हो गई है. ऐसा करो कुछ हल्का-फुल्का ही बना लो. तुम्हारे पापाजी भी आते होंगे.” मांजी ने फटाफट आदेश दिया.

“मेरी तो अभी हिम्मत नहीं है. आपने पीछे कुछ नहीं बनाया है, तो फिर कुछ बाहर से ही ऑर्डर कर दीजिए.” मानसी ने स्पष्ट लाचारी व्यक्त की. जवाब सुन मांजी के चेहरे पर भले ही तनाव की रेखा खिंच गई थी, मगर मानसी ने ख़ुद को बेहद हल्का महसूस किया. उसे लगा जैसे इतना कहने भर से ही उसके ऊपर लदा भारी लबादा एकाएक उतर गया. शायद एक निश्‍चित निर्णय पर पहुंचकर असंभव-सी दिखनेवाली चीज़ें भी आसान हो जाती हैं.

“तेरे पापाजी को तो बाहर का खाना बिल्कुल भी पसंद नहीं. बेकार में उनका मूड बिगड़ जाएगा.”

“तो फिर आप देखिए, कैसे मैनेज करना है. वैसे स़िर्फ आज ही की बात है, कल से एक नौकर आ रहा है. मैंने बात कर ली है, वो घर के ऊपर के काम के साथ-साथ खाना भी बना लिया करेगा.”

“मगर तेरे पापाजी को तो नौकरों के हाथ का बिल्कुल नहीं चलता.” स्वर के साथ-साथ चेहरे पर भी कड़वाहट छितरने लगी.

“तो फिर पापाजी के लिए आप देख लेना, बाकी सबका वो बना दिया करेगा.”

“फिर तुम क्या करोगी?” लगभग चीखती-सी मांजी पहली बार अपना आपा खो बैठीं.

“मुझे अब ख़ुद को भी समय देना है.” संक्षिप्त-सा उत्तर देकर मानसी अपने कमरे की तरफ़ बढ़ चली. वो विस्मित थी. कितनी बड़ी बात हो गई आज घर में, जीवन में पहली बार उसके और सासू मां के बीच इस तरह की बात हुई, मगर उसे न कोई ग्लानि है, न ही कोई चिड़चिड़ाहट, बल्कि वो ख़ुद को बेहद शांत और सहज महसूस कर रही है.

बच्चे स्कूल से आ चुके थे. मानसी उनका खाना-पीना अच्छे-से निपटाकर ऊपर अपने कमरे में ले गई. मांजी घंटे भर से अपने कमरे में अकेले बैठी बड़बड़ा रही थीं, जब बात बर्दाश्त से बाहर हो चली, तो रहा न गया. सोचा बहू की ऐसी बेअदबी बिल्कुल नहीं सहेगी. जो भी हो, वो अभी भी घर की बड़ी हैं. माना बहू को थोड़ी ढील दे रखी थी, मगर ज़रूरत पड़ने पर लगाम कसना उन्हें आता है. अगर वो चाहती है कि घर के कामकाज से कटकर बस अपने बच्चों का करे, तो इस घर में ऐसा नहीं चलेगा. उसके बिगड़े तेवर ठीक करने ही पड़ेंगे. रौद्र रूप धारण किए मांजी मानसी के कमरे की ओर बढ़ चलीं, मगर अंदर से आती आवाज़ों ने उनके क़दम रोक दिए. मानसी बच्चों को अपनी बिगड़ती सेहत और उनकी ज़िम्मेदारियों के बारे में समझा रही थी और बच्चे उससे वादा कर रहे थे कि वो न स़िर्फ अपने काम अच्छे से करेंगे, बल्कि अपनी प्यारी मम्मी की सेहत का भी ध्यान रखेंगे. मांजी सब चुपचाप सुन रही थीं. उन्होंने महसूस किया कि उनके पैर कमरे में दाख़िल होने को तैयार नहीं हैं और वो बोझिल क़दमों से अपने कमरे में वापस लौट गईं.

 

Deepali Agarwal

दीपाली अग्रवाल

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कहानी- शेष प्रश्‍न… (Short Story- Shesh Prashan…)

Hindi Story

“दीदी, आप मेरी गुरु हैं, इसलिए आपके घर आ सकती हूं, वरना जिस घर में लड़के होते हैं, वहां मां मुझे जाने ही नहीं देतीं. कहीं कोई ऊंच-नीच न हो जाए.” उसकी सहज साधारण-सी बात पर मैं मुस्कुरा उठी थी.

“और फिर मैंने उन्हें बताया ही नहीं है कि आपका एक युवा बेटा भी है.” सुनकर मैं चकित हुई थी और उसी दिन समझ गई थी कि उसके व्यक्तित्व के जिस मासूम आवरण को आज तक देखा है, उसके नीचे और भी परतें हैं. लड़की अपने लक्ष्य तक पहुंचने की बैसाखियां खोजना जानती है.

दूर खड़ी वो क्षीणकाय लड़की सीमा-सी लग रही थी. यहां कोर्ट में क्या कर रही है? वो तो कनाडा जा चुकी होगी. मेरा भ्रम होगा सोचकर मैं आगे बढ़ने लगी. इतने में ही उसकी आवाज़ ने पैरों में बेड़ियां पहना दीं. “दीदी आप? कितने दिनों बाद मिली हैं.”

“हां, बहुत दिनों बाद तुम्हें देख रही हूं. तुम कैसी हो? यहां कैसे?” उसके चेहरे पर पसरा मौन अनकहे ही बहुत कुछ कह गया था. चिरपरिचित गुलाबी आभा जाने कहां लुप्त हो गई थी?

“क्या बताऊं दीदी, अब हारकर कोर्ट में केस किया है. उसे मैं छोड़ूंगी तो नहीं. अब तो न उसके घरवाले बात करते हैं, न ही उससे कोई संपर्क रहा है.” सीमा अपने कनाडा स्थित एनआरआई पति से परेशान है. उड़ती-सी ख़बर काफ़ी पहले मेरे कानों में भी पड़ी थी. एक बार सीमा का फोन भी आया था. किसी नारी सहयोगी संस्था का पता अपनी किसी सहेली की मदद के लिए मांगा था.

“दीदी, मेरे साथ छल हुआ है.” विवशता से छलकती उसकी आंखें देखकर मैं समझ चुकी थी कि निराशा से उपजे अवसाद के कठिन क्षणों को वो शायद शिद्दत से झेल रही है. “हिम्मत रखो, सब ठीक हो जाएगा.” मैंने पीठ थपथपाते हुए कहा. “हां दीदी, मगर उसे तो सबक सिखा के रहूंगी.” क्रोध से उसका चेहरा क्षणभर को लाल हो उठा.

“दीदी, आपसे पता लेकर मैं उस नारी संस्था के लोगों से मिली थी. उन्होंने भी साथ देने का आश्‍वासन दिया है. बस, ये सारा झंझट निबट जाए, तो फिर से घर बसा लूं.  बहुत भागदौड़ रही हूं पिछले दो बरसों से. थक चुकी हूं.” कुछ ही पलों की व्याकुलता के बाद फिर वही महत्वाकांक्षी सीमा मेरे सामने थी. “दीदी, शादी के लिए एक-दो प्रस्ताव आए भी हैं. एक विधुर हैं, उनका अपना व्यापार है. दूसरे तलाक़शुदा हैं, उनकी इंक फैक्टरी है. काफ़ी संपन्न घराने से हैं. गाड़ी-बंगला सब है, परंतु जब तक तलाक़ नहीं मिल जाता, मेरी ज़िंदगी तो अधर में ही लटकी रहेगी.”

“घबराओ नहीं, सब ठीक हो जाएगा.” सीमा से विदा ले जब घर पहुंची, तो सारा घर अस्त-व्यस्त पड़ा था. मुझे देखते ही दोनों बच्चे घर को व्यवस्थित करने में जुट गए, लेकिन मेरे मन की उथल-पुथल कैसे व्यवस्थित हो सकेगी? सीमा के सुख की कामना के साथ विचारों की मंजूषा खुलने लगी थी. ऐश्‍वर्य और चकाचौंध में जीने की लालसा सहेजे, धन-दौलत की कसौटी पर रिश्तों को तोलती यह लड़की क्या वास्तव में गृहस्थी और विवाहित जीवन का अर्थ समझ पाएगी?

12वीं कक्षा तक सीमा मेरी छात्रा रही है. ज़माने से अलग-थलग उसका भोला व्यक्तित्व मुझे अचंभित करता था. आज के युग में जहां लड़कियां स्वतंत्र निर्णय लेना अपना अधिकार समझती थीं, वहीं इसके लिए माता-पिता की इच्छा किसी वेद वाक्य से कम नहीं थी. बेहद आज्ञाकारी और अनुशासनपूर्ण व्यवहार औरों के लिए आदर्श स्वरूप था.  मेरे घर कभी-कभी पढ़ने आ जाती थी. मेरे दोनों बच्चे अंकित व अनुभा बराबर के-से थे. अनुभा के साथ सहज मित्रता थी, लेकिन अंकित की उपस्थिति में असहज होने लगती थी. “दीदी, आप मेरी गुरु हैं, इसलिए आपके घर आ सकती हूं, वरना जिस घर में लड़के होते हैं, वहां मां मुझे जाने ही नहीं देतीं. कहीं कोई ऊंच-नीच न हो जाए.” उसकी सहज साधारण-सी बात पर मैं मुस्कुरा उठी थी.

“और फिर मैंने उन्हें बताया ही नहीं है कि आपका एक युवा बेटा भी है.” सुनकर मैं चकित हुई थी और उसी दिन समझ गई थी कि उसके व्यक्तित्व के जिस मासूम आवरण को आज तक देखा है, उसके नीचे और भी परतें हैं. लड़की अपने लक्ष्य तक पहुंचने की बैसाखियां खोजना जानती है. माता-पिता को अंधेरे में रखने की बात ज़रूर गले नहीं उतरी थी. शायद इस बात को महत्वहीन समझना गुरु की हैसियत से मेरा अपराध भी था.

परिवार में पढ़ाई का माहौल न होते हुए भी अनवरत परिश्रम के बलबूते कुछ बनने की महत्वाकांक्षा सीमा में मुझे स्पष्ट दिखती थी. वो जानती थी, यदि पढ़ाई में ढील हुई, तो स्कूल छुड़ा दिया जाएगा, लेकिन उसे तो पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी करके वैभवपूर्ण ज़िंदगी चाहिए थी. किसी बड़े अधिकारी या संपन्न व्यापारी से विवाह का सपना था. मैं उसकी महत्वाकांक्षा से प्रसन्न भी होती थी और डरती भी थी. कहीं कुछ ग़लत न कर बैठे. फिर भी मैंने इसे मात्र कुंआरे मन के दिवास्वप्न से अधिक कुछ भी नहीं समझा था. सोचती थी, समय से बड़ा गुरु कौन हो सकता है? स्वयं ही समझ जाएगी.

12वीं के बाद आगे की पढ़ाई के ख़र्च के लिए सीमा ने अंशकालिक नौकरी ढूंढ़ ली. नौकरी की मंज़ूरी आसानी से नहीं मिली थी, लेकिन इच्छाशक्ति का संबल था, तो साधन भी जुट गए. ग्रेजुएशन के बाद सीमा को एक विज्ञापन कंपनी में नौकरी मिल गई थी. कंपनी के मालिक उनके परिचित थे. सीमा की योग्यता व लगन से प्रभावित हो, उन्होंने उसके पिता को हर प्रकार की देखभाल का आश्‍वासन दिया था. घर में चार पैसे आने लगे, तो अनजाने ही माता-पिता का अंकुश ढीला पड़ने लगा.

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एक शाम सीमा का उत्साह देखते ही बनता था. उसे एक बड़ी विज्ञापन कंपनी में नौकरी मिल गई थी. 30 हज़ार रुपए वेतन था. मैं ख़ुश थी उसकी तरक़्क़ी से, लेकिन उस शाम मेरा मन आशंकित हो हतप्रभ हो गया, जब वो बड़ी सहजता के साथ अनुभा को बता रही थी, “अपने देसाई सर को मैंने सौगंध दिला दी है कि मेरी नई नौकरी की ख़बर मेरे घर तक न पहुंचने पाए, वरना मुझे घर बैठना पड़ जाएगा. अनजान लोगों के बीच मेरे पापा मुझे कभी नौकरी नहीं करने देंगे.”

“कभी न कभी तो पता लग ही जाएगा. कभी कोई फोन या मिलनेवाला आ गया तो?” अनुभा ने टोका था.

“वो सब मैंने सोच लिया है. फोन या विज़िटर के आने पर देसाई सर कह देंगे कि मैं  मीटिंग में हूं या कहीं बाहर गई हूं और फिर सर मुझे फोन करके बता देंगे. मैं उस व्यक्ति को फोन कर लूंगी. मैंने पूरी योजना बना ली है. हर पहलू पर हर दृष्टिकोण से सोच लिया है.” सीमा आत्मविश्‍वास से चहक रही थी.

“लेकिन देसाई सर ऐसा करेंगे क्यों?”

“क्यों नहीं करेंगे? मैं रोज़ एक घंटे उनका काम मुफ़्त जो करूंगी.”

सचमुच विस्मित थी मैं उसकी दूरदर्शिता पर. उसकी दुनियादारी व होशियारी पर चाहकर भी कुछ नहीं कह पाई. माता-पिता के भरोसे को अनदेखा कर सफलता के सोपान चढ़ती लड़की को इस अवस्था में नैतिकता का पाठ पढ़ाने का मतलब होगा, भैंस के आगे बीन बजाना. इस नौकरी के दौरान सीमा में नित नए परिवर्तन परिलक्षित होने लगे थे. ख़ूबसूरत तो वो थी ही, पर अब और भी निखर गई थी. अपने रूपाकर्षण से वो भी अनभिज्ञ नहीं थी. प्रतिभा की धनी तो थी ही. जतन से संवारी देह के कारण वो स्त्रियों की ईर्ष्या, लेकिन पुरुषों के आकर्षण का केंद्र बनी. बचपन से अभावों में पली बेटी को माता-पिता द्वारा तलाशे रिश्ते रास नहीं आ रहे थे. समृद्ध घराना व ऐश्‍वर्ययुक्त साथी की खोज में कई वसंत सरक गए. माता-पिता ढीले पड़ गए. घर आई लक्ष्मी को तो भरे-पूरे ब्राह्मण भी नहीं लौटाते हैं, फिर यहां तो आवश्यकताओं का तकाज़ा था.

फिर अचानक एक दिन सुनाई दिया कि  सीमा की शादी हो गई. कई दिन बाद सीमा मुझसे मिलने आई. हाथों में सोने के भारी जड़ाऊ कंगन, तीन लड़ीवाले मंगलसूत्र में लटकता हीरे का अर्धचंद्राकार पेंडेंट, बड़े-बड़े हीरे के कर्णफूल और महंगी साड़ी से मेलखाती मयूर पंखी बिंदिया. चेहरे पर उल्लास बिखरा पड़ा था. मुझे देख नज़रें झुका लीं थी. क्षमा प्रार्थिनी-सी बोली थी, “दीदी, सब कुछ बहुत जल्दी में हो गया. किसी को आमंत्रित करने का समय ही नहीं मिला. 12 तारीख़ को रमेश कनाडा से आए और 15 तारीख़ को हमारी शादी हो गई.”

“सीमा, तुम ख़ुश तो हो न?”

“हां दीदी, बहुत. कनाडा में उनका बहुत बड़ा व्यापार है. तीन गाड़ियां हैं.” उसका चेहरा उल्लास से खिला जा रहा था.

“समय हो तो किसी दिन तुम लोग खाने पर आओ.”

“रमेश तो चले गए, अब मुझे भी जाने की तैयारी करनी है. वो तो स़िर्फ 15 दिनों के लिए ही आए थे. शादी के बाद हम तुरंत ही हनीमून के लिए निकल गए. लौटकर दो दिन उनकी बहन के पास रहे. मैं इंडिया से बिल्कुल कट न जाऊं, इसलिए एक फैक्टरी यहां भी लगाने की सोच रहे हैं.”

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“बहुत अच्छी बात है. इतना प्यार करनेवाला पति मिला है.” उसके वैभव व भाग्य को सराहने के बावजूद मेरी स्त्री सुलभ जिज्ञासा ख़त्म नहीं हो पाई. “ये संबंध किसी परिचित के माध्यम से हुआ है या…” सीमा फिर हंसी, “नहीं दीदी, एजेंट द्वारा हुआ है, सारा पत्र-व्यवहार, मेल-मिलाप व बातचीत मैंने ख़ुद की है. मेरे इस रिश्ते पर रिश्तेदारों को भी जलन हो रही है.” उसकी आवाज़ में उपलब्धि का आभास था.

उसके जाने के बाद बहुत कुछ सोचती रही. फिर काफ़ी दिनों तक सीमा से मुलाक़ात नहीं हुई. सोचा कनाडा चली गई होगी. ज़रूरी तो नहीं कि मुझे बताकर ही जाती. क़रीब एक साल बाद अचानक एक दिन सीमा का फोन आया, तो मैंने उलाहना दिया, “बिना मिले ही चली गई.”

“इसी सिलसिले में फोन किया है दीदी, आपके कोई परिचित कनाडा में हैं क्या? मेरा मन घबरा रहा है. रमेश न तो फोन उठाते हैं, न पत्रों का जवाब देते हैं. उनकी बहन भी बहुत परेशान कर रही है. मैं कल मां के पास आ गई हूं.”

“तुम घर आओ, बैठकर बात करते हैं.”

घर आने पर सीमा ने जो कुछ बताया, वो बिल्कुल पत्रिकाओं में छपी कहानियों जैसा था. सीमा के पास न रमेश का सही पता-ठिकाना था, न उसकी वो बहन ही सगी थी. शुरू में रमेश कनाडा बुलाने का आश्‍वासन  देता रहा… इसी बीच बहन कही गई महिला ने सीमा को विश्‍वास में लेकर सारे गहने कब्ज़े में कर लिए. ऐसे में पुलिस और उस नारी संस्था की धमकी देकर किसी तरह ज़ेवर वापस लेकर सीमा मां के पास लौट आई. खोजबीन के दौरान कई तथ्य सामने आए. रमेश पहले से ही शादीशुदा था. वह यहां आकर मौज-मस्ती के लिए शादी करता था. उसकी बहन कही जानेवाली महिला व एजेंट भी उससे मिले हुए थे. वे लोग दहेज का सामान व ज़ेवर हथियाकर ग़ायब हो जाते थे किसी दूसरे शहर में, फिर किसी और को फंसाकर लूटते थे.

सीमा का क्रोध व क्रंदन चरम सीमा पर था, काफ़ी समझाने के बाद हल्की हुई थी. “आप ठीक कह रही हैं. एक तरह से अच्छा ही हुआ जो जल्दी पता चल गया. मैं बच गई.” ढांढस बंधाती मैं सीमा को देखती रही. कुछ ही महीनों में कुंदन-सी देह स़फेद पड़ गई थी. उस दरिंदे ने सारा रक्त निचोड़ लिया था. कुछ रातें साथ बिताकर एक लड़की को तबाह कर गया था, लेकिन धन-दौलत और आधुनिकता के नशे में डूब अपना सर्वस्व न्योछावर करने की आतुरता भी तो सीमा की ही थी. यदि ख़ुद पर भरोसा था, तो माता-पिता पर भी भरोसा रखना चाहिए था. ग़लती मेरी भी थी. एक बार तो मुझे भी उसे समझाना चाहिए था कि विवाह का आधार प्रेम, विश्‍वास, सहयोग और समर्पण है. माता-पिता बेटी के लिए घर और वर दोनों की छानबीन करते हैं, तब कहीं अपनी लाडली को दूसरे हाथों में सौंपते हैं. मात्र वैभव के आधार पर किसी रिश्ते की नींव कैसे टिक सकती है?

उस दिन के बाद सीमा को आज देखा था. कोर्ट की धूल फांकते देख अपनी प्रिय छात्रा के प्रति मेरा मन बहुत कोमल हो उठा. ईश्‍वर जल्दी ही उसे उसकी मंज़िल तक पहुंचाए. लेकिन मन आशंकित है, क्योंकि सीमा आज भी शादी व गृहस्थी का आधार रुपए-पैसे, मोटर, बंगले में ढूंढ़ रही है. आधुनिकता के रंग और भौतिकता की अंधी दौड़ में शामिल, धन की लालसा को सुख का पर्याय माननेवाली मेरी ये शिष्या क्या कभी रिश्तों का मोल व ब्याह के पवित्र बंधन की मर्यादा को समझ पाएगी? यह प्रश्‍न तो आज भी शेष ही है.

Prasoon Bhargava

    प्रसून भार्गव

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कहानी- बॉडी लैंग्वेज (Short Story- Body Language)

Hindi Kahani

“किसी के भी हाव-भाव देखकर बताया जा सकता है कि वह भविष्य में कैसा पार्टनर साबित होगा. पता है विदेशों में तो पहली मुलाक़ात की वीडियो रिकॉर्डिंग तक होती है. एक्सपर्ट वीडियो में हाव-भाव देखकर भावी कपल की मैरिड लाइफ की भविष्यवाणी भी कर देते हैं. सच कह रही हूं मम्मी, मैंने बॉडी लैंग्वेज पर स्टडी की है, यहां तक कि पहली मुस्कुराहट के भी कई मायने हैं.”

“मान्या तृषा को फोन लगाकर पूछ न, सब कैसा चल रहा है.”

“मम्मी,  कैसी बात कर रही हो. अच्छा लगता है क्या इस व़क्त मैं उन्हें डिस्टर्ब करूं? हमारा फोन हमारी बेसब्री ज़ाहिर करेगा. ध्रुव को लगेगा तृषा दीदी के साथ-साथ उनके घरवाले भी शादी को लेकर बेचैन हैं. वैसे भी मुझे लगता है कि दीदी ने फोन बंद कर दिया होगा.”

मान्या के यूं लापरवाहीभरे अंदाज़ से अमोली उद्विग्न होकर मान्या से बोली, “अरे, तेरी दीदी को लड़का पसंद आया कि नहीं, ये पूछ बस.”

“डोंट वरी, दीदी की बॉडी लैंग्वेज ने बता दिया था कि फोटो में उन्हें ध्रुव पसंद आ गया. अब ध्रुव बॉडी लैंग्वेज का टेस्ट कैसे पास कर पाता है और दीदी उसे कितना रीड कर पाती हैं, ये देखना है.” मान्या के इस भाव पर अमोली चिढ़कर बोली, “पहले भी तुम दोनों मिलकर चार लड़के नकार चुकी हो. अब कम से कम इसे तो बख़्श दो.”

“मम्मी, शादी जीवनभर का साथ है. हम एक रूम पार्टनर रखते हुए भी कितना ध्यान रखते हैं, ये तो पूरी ज़िंदगी का सवाल है. बॉडी लैंग्वेज रीड करना बहुत बड़ी विद्या है. मैंने दीदी को पारंगत कर दिया है इस विद्या में. आज उनका इम्तहान है. वह ज़रूर पास होंगी, ध्रुव को रिजेक्ट करके या फिर उसे सिलेक्ट करके.” मान्या की ऊलजुलूल बातों से बचने के लिए अमोली पूजाघर चली गई. वैसे भी आज सुबह से जाने कितने चक्कर भगवान के लगा लिए थे.

कितने लड़के देखने के बाद ये रिश्ता सही लगा, वरना अब तक कभी किसी के घर-परिवार में कोई खोट निकल आता, तो कभी लड़का सही नहीं लगता, जो लड़का ठीक होता भी तो उसका भविष्य उज्ज्वल नहीं लगता. एक-दो में सब ठीक लगा, तो बॉडी लैंग्वेज की पारखी मान्या को संदेह हो गया कि यह लड़का भविष्य में अच्छा जीवनसाथी साबित नहीं होगा.

सोच-विचार के बीच आधा घंटा किसी तरह बीता कि सहसा तृषा धड़धड़ाती हुई अपने कमरे में जाती दिखी. उसके तेवर कह रहे थे कि इस बार फिर बात नहीं बनी. महज़ एक घंटे के भीतर ही उसका वापस चले आना अच्छा संकेत नहीं था. मान्या को अपने कमरे में आने का इशारा करके वह अपने कमरे में चली गई. अमोली उसके लिए चाय बनाने चली गई. तृषा कहीं से भी आती है, तो चाय ज़रूर पीती है. चाय पीने के साथ वह अपने अनुभव साझा करती है. इसी उम्मीद से उसने चाय चढ़ाई. हालांकि उसके तेवर और निर्णय की झलकी बेतरतीबी से पड़ी सैंडल और उल्टे पड़े पर्स में दिख गए थे. बुझे मन से अमोली चाय के लिए अदरक कूट ही रही थी कि मान्या भेदभरी आवाज़ में बोली, “मम्मी, मुलाक़ात फ्लॉप रही ये बात पक्की समझो. अब या तो लड़का उसे पसंद नहीं आया या फिर…” मान्या के अधूरे वाक्य को अमोली ने निर्लिप्त भाव से सुना.

लड़के की तस्वीर उसने देखी थी. कितना सुदर्शन लग रहा था वो, उसे पसंद नहीं आया तो हद ही थी. उसे कल से ही आसार सही नहीं नज़र आ रहे थे, क्योंकि मान्या कल से ही उसे बॉडी लैंग्वेज रीड करने के गुर सिखा रही थी. तृषा से ज़्यादा उसे मान्या पर ग़ुस्सा आ रहा था. मान्या ही अमूमन लड़कों के खड़े होने, बात करने, देखने के अंदाज़ पर कोई न कोई शको-शुबह ज़ाहिर कर सबको असमंजस में डालती. इस बार तृषा को अकेले भेजा भी, तो कोई फ़ायदा नहीं हुआ. अपरोक्ष रूप से मान्या ही दोषी थी.  मेरठवाली ननद ने कितना ठोक बजा के रिश्ता खोज निकाला था, पर इनकी पहली मुलाक़ात फलदाई नहीं हुई. ट्रे लेकर वह तृषा के कमरे में गई, तो देखा वह बारह सौ रुपये लगाकर कर्ल करवाए बालों को बेतरतीबी से जूड़े में तब्दील कर चुकी थी और मज़े से मान्या से बतिया रही थी. “मान्या, तूने सक्सेसफुल रिलेशनशिप के लिए पहली मुलाक़ात के जो साइन बताए थे, वो एक भी नहीं मिले. उसकी बॉडी लैंग्वेज से मुझे सभी साइन निगेटिव लगे.”

“तूने ध्यान से बॉडी लैंग्वेज रीड की थी न?” मान्या गंभीरता से उससे पूछ रही थी और तृषा अपना अनुभव उससे साझा कर रही थी, “हां यार, वो शादी में इंट्रेस्टेड ही नहीं है. पहला साइन था समय से पहले आना और उसी में फेल हुआ वह. एक तो आधा घंटा देरी से आया और इस तरह आया जैसे मुझसे मिलने नहीं, मुझ पर एहसान करने आया था. चेहरे पर ज़बर्दस्ती वाली मुस्कुराहट छाई हुई थी. मुझे तो उसी व़क्त अच्छा संकेत नहीं लगा.”

“अरे! तो पूछ लेती कि वह इतना बुझा-सा क्यों है?” अभी तक चुप अमोली चिढ़कर बोली, तो तृषा तुनककर कहने लगी, “आप तो ऐसे कह रही हैं, जैसे मैंने उसकी ख़ुशमिज़ाजी देखी हो. सीधी-सी बात है पहली बार सब अपना बेस्ट रखते हैं, उसका बेस्ट वही होगा. मैंने महसूस किया कि वह ज़बर्दस्ती मुस्कुराने का प्रयास कर रहा था. हो सकता है वह परिवार के दबाव में मुझसे मिलने आया हो. हैंडसम है, उसका करियर अच्छा है, तो क्या यही सब देखकर आंख मूंदकर शादी कर लें? एक लड़की को बस यही चाहिए?”

तृषा के आकलन पर अमोली चिढ़कर वहां से चली आई. उसे देखकर नरेश बोले, “इतनी चिंता मत किया करो, जहां होनी होगी झटपट तय हो जाएगी.”

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“अरे! तुम तो रहने ही दो, तुम्हारी छोटी बेटी शादी होने दे तब न. तुम्हीं ने उसे बढ़ावा दिया है. बड़ा कहते थे कि तृषा सीधी है, सब पर विश्‍वास कर लेती है, पर मान्या के लिए निश्‍चिंत हूं. उसमें इंसान पहचानने की क्षमता है, वह कभी धोखा नहीं खाएगी. सही कहा था तुमने, मान्या न शादी करेगी न करने देगी. उसने तो बॉडी लैंग्वेज पर रिसर्च कर रखी है न. चिंता न करो अपनी सीधी-साधी तृषा को भी इस विद्या में पारंगत कर दिया है. अब मजाल है जो कोई लड़का उसे पसंद आए.”

अमोली के ग़ुस्से को नरेश ने शांत करने की कोशिश की, तो वह और उखड़ गई, “बताओ, आजकल के बच्चे बॉडी लैंग्वेज देखकर शादी का डिसीज़न लेंगे. याद करो, जब तुम मुझे देखने आए थे कैसा सड़ा-सा मुंह बनाया हुआ था. फिर भी शादी हुई और सफल भी हुई.” अमोली की बात पर नरेश हैरानी से बोले, “अरे! अब उसका ग़ुस्सा मुझ पर क्यों निकाल रही हो. मेरा सड़ा मुंह याद है, पर मेरे बड़े ताऊजी, पिताजी और काका नहीं याद हैं, जो वहीं जमे थे. क्या सोचती हो, तुम आती और तुम पर दिलकश मुस्कान फेंकता और हां, तुमने कौन-सी मोहिनी मुस्कान मुझ पर डाली थी. थरथरा तो ऐसे रही थी, जैसे मैं तुम्हें देखने नहीं, खाने आया हूं.” नरेश और अमोली को उलझे देखकर तृषा और मान्या उनके कमरे में आ गईं.

“ओहो! अब आप लोग तो मत झगड़ो, इसीलिए अकेले में मिलने का रिवाज़ बनाया है, ताकि किसी की मौजूदगी में हम असहज न रहें. खुलकर बात कर सकें.” मान्या ने कहा.

“किसी के भी हाव-भाव देखकर बताया जा सकता है कि वह भविष्य में कैसा पार्टनर साबित होगा. पता है विदेशों में तो पहली मुलाक़ात की वीडियो रिकॉर्डिंग तक होती है. एक्सपर्ट वीडियो में हाव-भाव देखकर भावी कपल की मैरिड लाइफ की भविष्यवाणी भी कर देते हैं. सच कह रही हूं मम्मी, मैंने बॉडी लैंग्वेज पर स्टडी की है, यहां तक कि पहली मुस्कुराहट के भी कई मायने हैं. अब जैसे कि तृषा दीदी ने बताया कि वो जब आज ध्रुव से मिलीं, तो उसकी जबरन ओढ़ी मुस्कुराहट बता रही थी कि वह कुछ तनाव में है. दीदी से मिलने का तनाव… अगर कोई साधारण-सी बातों पर आंखों की पुतलियों को अधिक नचाते हुए हंसी दबाता है, इसका अर्थ है कि वह दूसरों को ख़ुद से कमतर आंक रहा है. एटीट्यूडवाला है. धीमे-धीमे मुस्कुरानेवाला अंदर-बाहर से अलग है और हां, अगर कोई…”

“मान्या बेटा, सारी स्टडी लड़कों पर ही है या कुछ लड़कियों पर भी की है.” सहसा नरेश ने उसे टोका, तो वह झट से बोली, “की है न पापा, अगर लड़की खुलकर हंसे, तो मतलब बिंदास, वह अपनी कोई कमी छिपाने में विश्‍वास नहीं करती है, अगर वह लगातार मुस्कुराए मतलब वह अपनी अच्छी इमेज बनाना चाहती है और अगर…”

“अरे! चुप हो जा मेरी मां, बॉडी लैंग्वेज पढ़-पढ़कर चार लड़के नकार चुकी हो.” सहसा अमोली अपना माथा पकड़कर बोली, तो तृषा उसके गले में बांहें डालकर कहने लगी, “मुझे तो पांचवां पसंद आ ही गया था, पर क्या करूं, उसका देर से आना, कुछ हड़बड़ाया-सा रहना और हां, जब मैंने चलने को कहा, तो उसका मुझे नहीं रोकना, वहां से निकलने के लिए झट तैयार हो जाना सब अजीब था, वरना तो मैंने पसंद कर ही लिया था. फोन पर भी ठीक लगा.” तृषा मानो ख़ुद से बात करने लगी थी कि तभी अमोली की आवाज़ आई, “मां हूं तेरी, तेरी बॉडी लैंग्वेज समझती हूं. तुझे ध्रुव पसंद है, फिर क्यों नखरे कर रही है?”

“नहीं-नहीं मम्मी, मेरी लाइफ का सवाल है.” तृषा धीमे-से बोली कि तभी फोन की घंटी बजी, “हेलो, अच्छा कब? कल… जी-जी.” कहते हुए उसने फोन रखा, चेहरे पर कई रंग आए-गए, सभी की प्रश्‍नवाचक नज़रें ख़ुद पर टिकी देखकर वह बोली, “ध्रुव की मम्मी थीं. कल उनकी शादी की सालगिरह है. भुवन विलास में पार्टी है. हमें बुला रही हैं. क्या करें?”

अमोली की बात पर मान्या चहकी, “भुवन विलास, वाऊ… वहां की तो एक कॉफी ही हज़ार रुपए की है. ज़रूर चलेंगे. वहां का एंबियंस देखेंगे. कुछ सेल्फी-वेल्फी खींचेंगे और वापस आ जाएंगे.” मान्या का उत्साह देखकर कुछ ना-नुकुर के बाद तृषा ने हामी भर दी. दूसरे दिन धड़कते दिल से अमोली सबके साथ भुवन विलास पहुंची, तो देखा ध्रुव के माता-पिता स्वागत में खड़े थे, उसने भी ध्यान दिया ध्रुव सहज नहीं था. शायद तृषा ने सही अंदाज़ा लगाया, यह सोचकर अमोली कुछ आश्‍वस्त हुई, न कहने में अब कोई मलाल नहीं रहेगा. अपने माता-पिता के कहने के बाद वह काफ़ी हड़बड़ी में उनको डाइनिंग एरिया तक ले गया. डीजे की तैयारी देखकर नाच-गाने के कार्यक्रम का भी उसने अंदाज़ा लगाया. कुछ हड़बड़ी में ध्रुव उनको वहां बिठाकर चला गया. उसके चेहरे का तनाव साफ़ नज़र आता था.

“देखो  मम्मी, इसकी चाल देखो. कितनी जल्दी-जल्दी चल रहा है, जैसे मैं मरी जा रही हूं इसके पीछे.” तृषा ने चिढ़कर कहा, फिर वह मान्या के साथ पार्टी एंजॉय करने में व्यस्त हो गई. अमोली वॉशरूम गई, तो ध्रुव को देखा. वह कुछ बेचैन-सा लगा. उसे देखकर अमोली ने उससे कहा, “ध्रुव बेटे! सब ठीक तो है? कोई बात है तो कहो.” यह सुनकर वह जबरन ओढ़ी मुस्कान के साथ हड़बड़ी में कहने लगा, “आंटी, मैं अभी कुछ जल्दी में हूं. आपसे बाद में बात करता हूं.” यह कहते हुए वह तेज़ी से होटल के ऊपर बने हिस्से में निकल गया. एक-डेढ़ घंटा हो गया फिर भी ध्रुव नहीं दिखा. उसका व्यवहार निस्संदेह संदेह के घेरे में था.

पार्टी में अमोली और नरेश का मन नहीं लग रहा था. ध्रुव के माता-पिता आसभरी नज़रें नरेश-अमोली पर टिकाए थे. उन्हें तृषा बहुत पसंद आई, एक-दो बार इशारे में यह ज़ाहिर कर चुके थे, पर वो क्या कहें.

ऊहापोह के बीच डिनर से कुछ समय पूर्व उन्होंने ध्रुव को आता देखा, जो सीधा तृषा के पास आकर मनमोहक मुस्कान के साथ कह रहा था, “क्या मैं तुम्हारे साथ डांस कर सकता हूं?” ध्रुव के चेहरे की मुस्कान देखकर तृषा उसके सम्मोहन में बंधी उठ खड़ी हुई. डांस फ्लोर की ओर उसे जाते देख मान्या की भौंहें सिकुड़ गईं, “मम्मा, तृषा दीदी को एकदम नहीं जाना चाहिए था और इस ध्रुव को तो देखो, ये ज़रूरत से ज़्यादा हंस रहा है यानी अपनी घबराहट को छिपाने की कोशिश कर रहा है. देखना डांस के बहाने ये तृषा को कुछ बताएगा.” अमोली ने भी महसूस किया कि दोनों डांस के हल्के-फुल्के स्टेप करते हुए बातें कर रहे थे. तृषा के चेहरे पर हैरानी के चिह्न थे. हां, शायद वह किसी और से कमिटेड है. “सुनिए, मान्या ठीक ही कहती थी. इसकी बॉडी लैंग्वेज संदेह उत्पन्न करती है, रहने देते हैं.

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मुग़लसरायवाले लड़के की बॉडी लैंग्वेज मतलब कि उसकी सूरत-सीरत खानदान की जन्मपत्री निकलवाओ.” अमोली उद्विग्न हो रही थी. सहसा म्यूज़िक बंद हो गया. स्पॉटलाइट ध्रुव पर ठहर  गई. अमोली का जी अटक गया. ध्रुव बड़ी अदा से तृषा का हाथ पकड़कर कह रहा था, “क्या तुम मुझसे शादी करोगी?” अमोली का जी ज़ोर से धड़का, तभी तृषा बड़ी अदा से अपने गुलाबी गाउन को चुटकी से पकड़कर बोल पड़ी, “हां.”

तालियों की गूंज के साथ कई चेहरों पर अलग-अलग भाव प्रदर्शित हुए. बधाइयों के शोर के बाद तृषा को घेरकर एकांत खोजा गया, वहां उत्साह में उसने कुछ यूं ख़ुलासा किया, “मम्मी, बॉडी लैंग्वेजवाली रीडिंग सही थी, वाक़ई उसका ध्यान कुछ देर पहले तक मुझ पर नहीं था. आज भी नहीं और कल भी नहीं था. दरअसल, कल जब ध्रुव मुझसे मिलने आ रहा था, तभी कैलिफोर्निया की एक मशहूर आईटी कंपनी से उसके लिए फोन आया इंटरव्यू के लिए. अमूमन वो आपकी सुविधा पूछते हैं, पर उस आईटी कंपनी के चेयरपर्सन के पास समय नहीं था. वो उसी समय ध्रुव का इंटरव्यू लेना चाहते थे. ध्रुव इस सुनहरे मौ़के को खोना नहीं चाहता था. इसीलिए वह उसी समय फर्स्ट राउंड के लिए तैयार हो गया. इंटरव्यू के पैनल मेंबर ने फर्स्ट राउंड लिया. ध्रुव को लगा था कि कुछ जवाब वह और अच्छे दे सकता था. चेयरपर्सन से दो-तीन घंटे बाद बात होनी थी, इस बीच वह मुझसे मिलने आ गया, इसीलिए कुछ अनमना-सा रहा. मुझसे पहली बार मिला था, इसीलिए कुछ बता नहीं पाया कि उसका ध्यान बंट चुका है. आनेवाले इंटरव्यू को लेकर वह कॉन्शियस था.”

“अरे! तो ये बात बतानी चाहिए थी तुझे.” अमोली अविश्‍वास से बोली, तो तृषा कहने लगी, “मैंने भी अभी यही कहा, तो वह कहने लगा कि अगर बताता तो तुम सोचती कि मैं तुमसे ज़्यादा महत्व इंटरव्यू को दे रहा हूं. मेरा पहला इंप्रेशन ख़राब हो जाता, इसीलिए सिचुएशन थोड़ी अजीब हो गई.”

“अरे! ये क्या बात है इंटरव्यू तो था ही ज़रूरी, इसमें कौन-सी दो राय थी.” अमोली झुंझलाती हुई बोली, तो तृषा कहने लगी, “मम्मी, अब तो सब क्लियर हो गया है और हां, चेयरपर्सन मिस्टर भावेजा के साथ उसका इंटरव्यू कल भी नहीं हो पाया. आज जब हम पहुंचे, तो कमोबेश कलवाली ही सिचुएशन थी, वह मिल तो सबसे रहा था, पर ध्यान कहीं और था. कुछ देर पहले हुआ इंटरव्यू सक्सेसफुल हुआ. ध्रुव को कैलिफोर्निया बुलाया है. शादी के बाद मैं भी उसे जॉइन करूंगी. ध्रुव बहुत ख़ुश है और मैं भी.”

“हे भगवान! इतनी-सी बात थी. जो बॉडी लैंग्वेज समझने की जगह उससे बात कर ली होती, उसकी उलझन पूछ ली होती, तो इतनी ग़लतफ़हमी न होती. और दोनों ने एक-दूसरे को प्रपोज़ भी कर दिया.” अमोली की झुंझलाहट में प्रसन्नता झलक रही थी और मान्या अभी भी बॉडी लैंग्वेज का विश्‍लेषण कर रही थी, “तृषा दीदी उसके प्रपोज़ल का जवाब कुछ देर से देतीं तो शायद…” मान्या के मुंह से निकला ही था कि तृषा ने उसका मुंह दबा दिया. दोनों बहनों के बीच होती चुहल देख नरेश-अमोली बेसाख़्ता हंस पड़े.

Meenu Tripathi

       मीनू त्रिपाठी

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