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कहानी- सॉरी आंटी (Short Story- Sorry Aunty)

आंटी की आवाज़ में जो कुछ भी था, वह रिया के संवेदनशील, भावुक मन को अंदर तक छू गया. एक स्त्री होकर भी वह कभी अंदाज़ा क्यों नहीं लगा पाई कि इन अकेली जी रही आंटियों के जीवन में कितना अकेलापन होगा. कितनी तन्हा हैं सब, अकेले रहकर ख़ुश रहने की कोशिश में लगी रहती हैं. सबके साथ जो थोड़ा-बहुत हंस-बोल लेती हैं, यह देखकर वह क्यों कभी ख़ुश नहीं हुई.

Short Story- Sorry Aunty

अपनी किटी पार्टी का पूरा ग्रुप रिया को बहुत पसंद था. अपनी घर-गृहस्थी को थोड़ी देर भूलकर महीने में एक बार पंद्रह महिलाएं इकट्ठा होकर एंजॉय करती थीं. रिया को इस दिन का इंतज़ार रहता था. दो बच्चों की मां, चालीस वर्षीया रिया स्वभाव से ख़ुशमिज़ाज, मिलनसार महिला थी. अपने गु्रप में वह अच्छी-ख़ासी लोकप्रिय थी. इस गु्रप में तीस साल से लेकर साठ साल की मीरा, पैंसठ साल की सुमन और सत्तर साल की रेखा आंटी भी थीं. तीनों आंटी को सब बहुत पसंद करते थे. सुमन आंटी अकेली रहती थीं. कुछ साल पहले उनके पति का देहांत हो गया था. एक ही बेटी थी, जो ऑस्ट्रेलिया में अपने पति और बच्चों के साथ रहती थी. सुमन आंटी की जीवनशैली किटी के बाकी सदस्यों के लिए प्रेरणा का स्रोत थी. अकेले कैसे जिया जाता है, इसका जीवंत उदाहरण थीं सुमन आंटी. रेखा आंटी के पति का भी स्वर्गवास हो चुका था. वे अपने बेटे के साथ रहती थीं. मीरा आंटी के भी पति नहीं रहे थे. दो विवाहित बेटियां थीं और वे अपनी छोटी बेटी के साथ रहती थीं.

पर पता नहीं क्यों रिया की ऐसी सोच थी कि वह अपने ग्रुप की तीनों बुज़ुर्ग सदस्याओं से सहज नहीं थी. रिया ने नोट किया था कि बाकी सब तो तीनों को बहुत प्यार करती थीं, लेकिन रिया उनसे दूरी बनाए रखती थी. तीनों अच्छी तरह से पहन-ओढ़कर रहतीं. कभी तीनों मिलकर बाहर भी खाने-पीने जातीं, मूवी भी देख आतीं. रिया भी सोचती कि क्या बुराई है अगर ये तीनों अच्छी तरह से लाइफ एंजॉय कर रही है? फिर वह इन्हें नापसंद क्यों करती है? वह अपनी सोच पर हैरान हो जाती. वह कहीं ईर्ष्यालु प्रवृत्ति की महिला तो नहीं बनती जा रही है, जो उन अकेली स्त्रियों को ख़ुश देखकर ख़ुश नहीं हो पाती. फिर सोचती, नहीं-नहीं वह क्यों जलेगी. वह तो अपने जीवन से संतुष्ट है.

कभी वह सोचती हमारे गु्रप में बुज़ुर्ग सदस्याओं की क्या ज़रूरत है, इन्हें तो भजन-कीर्तन मंडली में होना चाहिए. ये हमारी किटी में आकर क्यों एंजॉय करती हैं. तीनों हर गेम को उत्साह से खेलतीं और  इनाम मिलने पर बच्चों-सी ख़ुश हो जातीं. सब एक ही सोसायटी में रहती थीं. कई बार ऐसा भी हुआ था, जब रिया के पति अनिल या उसकी कुछ ख़ास सहेलियों ने उसके गु्रप का मज़ाक उड़ाया था यह कहकर कि, ‘तुम्हारा तो उम्रदराज़ आंटी लोगों का गु्रप है.’ यह सुनकर रिया को और ग़ुस्सा आता था. रिया स्वभाव से काफ़ी भावुक महिला थी, पर पता नहीं क्यों इन उम्रदराज़ स्त्रियों की उपस्थिति उसे नागवार गुज़रती. वह कई बार अपनी ख़ास सहेली टीना को कह चुकी थी, “अब किसी आंटी को अपने गु्रप में नहीं लेना है, धीरे-धीरे यह किटी नानी-दादी की किटी होती जा रही है.” टीना ने उसे समझाया, “थोड़ी देर हम लोगों के साथ बैठकर, खा-पीकर ख़ुश हो लेती हैं. अच्छा ही तो है, इसमें बुरा क्या है.” यही तो रिया समझ नहीं पा रही थी कि वह क्यों मन ही मन चिढ़ती रहती है. टीना ने यह भी कहा था, “रिया, कल हम भी तो उस उम्र में पहुंचेंगी, तो क्या तब हमारा मन नहीं होगा सबके साथ गु्रप में हंसने-बोलने का या तुम किसी मंदिर में बैठकर भजन ही करनेवाली हो तब?” रिया कुछ बोली नहीं थी. धीरे-धीरे इस किटी पार्टी को शुरू हुए पांच साल बीत गए थे, सब लोग अब तक घर की सदस्याएं-सी हो गई थीं, पर रिया की मनोस्थिति आज भी वही थी.

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वह किटी में भरपूर आनंद उठाकर जब लौटती, तो कभी उसके पति या आस-पड़ोस के युवा बच्चे या कोई परिचित स्त्री कह देती, “क्या मज़ा आता है तुम्हें इस गु्रप में, उम्र देखी है सबकी? कैसे एंजॉय करती हो.” रिया को ग़ुस्सा तो बहुत आता, पर चुप रह जाती. वो कर भी क्या सकती थी?

इसी बीच रिया को पास की ही बिल्डिंग में अपने बेटे की ट्यूशन टीचर से मिलने जाना था. बारिश का मौसम था, लेकिन आसमान साफ़ था, तो वह बिना छतरी के ही घर से निकल गई. टीचर के घर की डोरबेल बजाकर कुछ देर इंतज़ार किया. जब किसी ने दरवाज़ा नहीं खोला, तो उसे लगा कि शायद घर पर कोई नहीं है. इसी बीच अचानक तेज़ बारिश शुरू हो गई. वह सोच में पड़ गई कि अब क्या करे? घर तक जाने में तो पूरी भीग जाएगी. टीचर के सामनेवाला फ्लैट सुमन आंटी का ही था. रिया ने सोचा, सुमन आंटी से छतरी मांग लेनी चाहिए, पर उनसे मिलने का उसका मन नहीं था. इतने में सुमन आंटी ने अपने फ्लैट का दरवाज़ा खोल दिया. बहुत प्यार से बोलीं, “रिया, मैंने तुम्हें खिड़की से बिल्डिंग के अंदर आते देखा, तो अंदाज़ा लगाया कि शायद तुम सामने टीचर से मिलने आई होगी. वे तो बाहर गई हैं, आओ न, अंदर आ जाओ.”

“नहीं आंटी, मैं चलती हूं, पर छतरी नहीं है मेरे पास, आपके पास एक्स्ट्रा छतरी है क्या?”

“हां है, पर पहले तुम्हें अंदर आकर एक कप चाय पीनी पड़ेगी मेरे साथ.” सुमन आंटी हंसते हुए बोलीं और रिया का हाथ स्नेहपूर्वक पकड़कर अंदर ले गईं.

साफ़-सुथरे घर के कोने-कोने से गृहस्वामिनी का कलाप्रेम दिखाई दे रहा था. सोफे पर बहुत बड़ा-सा टेडी बेयर रखा हुआ था. रिया ने पूछा, “आंटी, यह किसका है?”

“मेरा ही है.”

रिया चौंकी, “आपका?”

“हां, इसे यहां रख दिया मैंने, इसे देखकर मुझे लगता है कि सोफे पर कोई बैठा है, घर में है कोई.” आंटी के चेहरे पर भले ही मुस्कुराहट थी, पर उनकी आवाज़ की उदासी ने रिया के मन में हलचल-सी मचा दी थी. उनकी उदास आंखों की तरफ़ देखती हुई वह कुछ बोल नहीं पाई. आंटी ने स्नेहभरे स्वर में कहा, “आज पहली बार अकेली आई हो न! हमेशा किटी में ही आती हो, बैठो, मैं चाय लाती हूं.” जब तक आंटी चाय लाईं, रिया ड्रॉइंगरूम में रखी कलाकृतियां, सुंदर साफ़ शीशे से चमकते शोपीस, उनके स्वर्गीय पति की फोटो, बेटी और उसके परिवार की फोटो देखती रही, पर घर में जो सन्नाटा पसरा था, वह दिल को अजीब लग रहा था. एकदम शांत, पर उदास-सा घर.

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सुमन आंटी चाय ले आईं और रिया के साथ ही चाय पीते हुए उसके परिवार और बच्चों के बारे में पूछती रहीं. अपनी बेटी के बारे में भी बहुत-सी बातें बताते हुए कहने लगीं, “सुबह तो मैं फ्लैट का दरवाज़ा खोलकर कभी-कभी अख़बार पढ़ते हुए बाहर खड़ी हो जाती हूं और बीच-बीच में स्कूल जाते हुए बच्चों को देखती रहती हूं. लगता है चलो, सुबह कोई तो दिखा वरना अंदाज़ा लगा ही सकती हो कैसा लगता होगा अकेले.” आंटी की आवाज़ में जो कुछ भी था, वह रिया के संवेदनशील, भावुक मन को अंदर तक छू गया. एक स्त्री होकर भी वह कभी अंदाज़ा क्यों नहीं लगा पाई कि इन अकेली जी रही आंटियों के जीवन में कितना अकेलापन होगा. कितनी तन्हा हैं सब, अकेले रहकर ख़ुश रहने की कोशिश में लगी रहती हैं. सबके साथ जो थोड़ा-बहुत हंस-बोल लेती हैं, यह देखकर वह क्यों कभी ख़ुश नहीं हुई. यहां थोड़ी देर में ही घर में फैली उदासी उसे व्यथित कर रही है और ये अकेलापन, उदास रात-दिन उनके जीवन का हिस्सा बन चुके हैं. इसके बावजूद ये लोग कभी अपने जीवन में आई कमियों का रोना नहीं रोतीं. अपने सुख-दुख अकेले ही सहेजती हुई कैसे जी रही हैं सब और वह कितनी अविवेकी, असंवेदनशील है. ये सब थोड़ी देर सबके साथ बैठकर अपना अकेलापन कुछ पल के लिए भूल जाती हैं, तो उसे इस पर आपत्ति है. छि:, क्या कभी वह नहीं पहुंचेगी उम्र के इस पड़ाव पर! और सोचती रहती थी कि छोड़ देगी इस गु्रप को, कोई हम उम्र सदस्याओं वाला गु्रप जॉइन करेगी. आज सुमन आंटी की बातों में उनकी उम्र की उदासी, अकेलापन साफ़-साफ़ दिखा रिया को, वह अचानक कह उठी, “आंटी, आप जब भी चाहें, मेरे पास आ जाया करें, घर और बच्चों के काम के कारण मेरा जल्दी निकलना नहीं होता है. आप आती रहा करें. मुझे अपनी बेटी जैसी ही समझें, आंटी.”

“हां, और क्या, मैं अपनी बेटी से भी यही कहती हूं कि मेरे ग्रुप में मेरी कई बेटियां हैं, जिनके साथ बैठकर मैं सब कुछ भूल जाती हूं. कितनी अच्छी हो तुम सब, तुम लोगों के साथ बैठकर तो जी उठती हैं हम तीनों. ढेरों शुभकामनाएं निकलती हैं तुम लोगों के लिए. कितना प्यार, सम्मान देती हो तुम सब.” रिया मन ही मन आत्मग्लानि लिए बस हल्की मुस्कुराहट के साथ आंटी की बातें सुन रही थी और फिर बस ‘बाय’, बोलकर चल पड़ी, पर उसका रोम-रोम अपने पिछले सालों के रूखे व्यवहार पर बस दो शब्द बोल रहा था, ‘सॉरी आंटी.’

Poonam Ahmed

      पूनम अहमद

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कहानी- सास रोग (Short Story- Saas Rog)

“बस-बस. मैं तेरी मंशा समझ गई. वो ज़माना और था. कुछ लोगों की सोच संकुचित होती है, लेकिन हम भी वैसा ही नज़रिया रखें, तो उनमें और हममें फ़र्क़ ही क्या रह जाएगा. तेरी सास ने तुझसे काम करवाया, इसलिए तू भी अपनी बहू से बदला लेगी. यह ओछी प्रवृत्ति छोड़ दे. मैं तुझसे चार साल बड़ी हूं, लेकिन मेरा शरीर एकदम स्वस्थ है, क्योंकि मैं घर का काम करती रहती हूं. बहू को मदद भी हो जाती है और गृहस्थी संचालन में मेरी सशक्त भूमिका भी बरक़रार है. लेकिन तुम्हारे जैसी सास काम में मदद तो करेंगी नहीं, हां पलंग पर बैठे-बैठे गृहस्थी पर अपना आधिपत्य जताकर व्यर्थ विवाद और खीझ को बढ़ावा देंगी. सच है ‘खाली दिमाग़ शैतान का घर’ काम तो कुछ है नहीं, तो बहू को परेशान करने की व्यर्थ ख़ुराफ़ातें दिमाग़ में पैदा होती रहती हैं.”

Short Story- Saas Rog

”आह!” पलंग से नीचे पैर रखते ही वसुधा घुटनों पर हाथ रखकर कराह उठी. “अब तो लगता है, जल्दी ही काठी का मोहताज होना पड़ेगा. घुटने तो बिल्कुल ही काम से गए.

अच्छी-भली चलती-फिरती थी, पता नहीं क्या हो गया है?”

“अरे, पिछली बार आई थी, तब तो तुझे घुटने की कोई परेशानी नहीं थी. डेढ़ साल में अचानक क्या हो गया? आदित्य की शादी में तो तूने कितनी भागदौड़ की थी.” जया ने वसुधा की हालत देखकर दुख और अफ़सोस से कहा.

“हां, उम्रभर तो अच्छी रही, पर बस पिछले डेढ़ साल में ही पता नहीं क्या हो गया है. आदित्य की शादी के बाद से ही घुटनों में दर्द रहने लगा और अब तो पलंग से उठकर बाथरूम तक जाना भी मुश्किल हो गया है. दर्द के मारे जान निकल जाती है. इस डर से तो मैंने पानी पीना भी बहुत कम कर दिया है.” वसुधा जैसे-तैसे बाथरूम तक जाकर आई और फिर से पलंग पर बैठ गई. तब तक जया लहसुन डाला हुआ गरम तेल लेकर आई और वसुधा के घुटनों की मालिश करने लगी.

“अरे, जीजी ये क्या कर रही हो? तुम तो बड़ी हो, सेवा तो मुझे तुम्हारी करनी चाहिए.” वसुधा संकोच से भरकर बोली.

“तो क्या हुआ. जब मेरे घुटनों में दर्द होगा तो तुम तेल लगा देना. तकलीफ़ में क्या छोटा और क्या बड़ा.” कहकर जया ने वसुधा के घुटनों की मालिश कर दी.

वसुधा के बेटे आदित्य की शादी में दोनों बहनें मिली थीं, तब से डेढ़ साल हो गया. अब वसुधा ने बड़े आग्रह से जया को 4-5 दिन के लिए अपने घर रहने बुलाया था. जया कल रात में ही आई थी. दोनों बहनें देर रात तक बातें करती रही थीं.

सुबह के सात-साढ़े सात बजे थे. जया चाय बनाने किचन में जाने लगी, तो वसुधा ने उसे रोका कि बहू उठकर बना देगी, लेकिन जया आनन-फानन में अपनी, वसुधा की और वसुधा के पति सुरेश की चाय बना लाई.

“साढ़े सात हो गया है, लेकिन बहू के उठने का पता नहीं है. यह नहीं कि तुम आई हो, तो जल्दी उठकर चाय बना दे. रोज़ सुबह की चाय के लिए सात-साढ़े सात बजे तक राह देखते रहो.” वसुधा ने उलाहने के साथ कहा.

“आज आदित्य की छुट्टी है.

दस-बीस मिनट देर से भी उठ गए, तो क्या हुआ. और भई सुबह मुझे जल्दी चाय पीने की आदत है, तो मैं तो किसी के भरोसे नहीं रहती. अपनी और उनकी चाय ख़ुद बना लेती हूं और पेपर पढ़ते हुए या बगीचे का काम करते हुए गरम-गरम चाय का मज़ा लेती हूं.” जया ने कहा. “हमें अगर सुबह पांच बजे या और किसी ऐसे समय चाय पीने की आदत हो, जो आदत दूसरे के लिए सुविधाजनक ना हो, तो फिर हमें ये काम ख़ुद कर लेना चाहिए, बजाय दूसरे के बनाने का इंतज़ार करने और उस पर चिढ़ने के.” जया ने गंभीर स्वर में कहा.

पंद्रह मिनट बाद ही बहू यानी अनु रसोईघर में आई, तो चाय के बर्तन देखकर झेंप-सी गई.

“कोई बात नहीं अनु, चाय पी चुके तो क्या, तुम्हारे हाथ की बनी हुई फिर से पी लेंगे. अब बताओ सब्ज़ी क्या बनानी है.” जया ने कहा और अनु के मना करने पर भी फटाफट सब्ज़ियां निकालकर धोकर काटने लगी. तभी आदित्य भी किचन में आ गया. सुरेश भी वहां आ गए. अनु वसुधा को कमरे में ही चाय दे आई. बाकी सबने किचन में बैठकर साथ में चाय पी. जया नाश्ता और खाना बनाने में समान रूप से अनु की मदद कर रही थी, साथ ही पुरानी बातों का दौर और हंसी-मज़ाक भी चल रहा था. अनु भी खुलकर हंस रही थी. वसुधा के कमरे तक सबके हंसने-बोलने की आवाज़ें जा रही थीं. अनु की आवाज़ सुनकर वसुधा को आश्‍चर्य हो रहा था. अनु वसुधा से तो कभी इतनी बातचीत नहीं करती. महीनों से तो उसने उसे हंसते-मुस्कुराते भी नहीं देखा था.

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जब सबके खाने का समय हुआ, तब वसुधा ने नहाने जाने की बात की. अनु ने सबका खाना परोसकर वसुधा के लिए नहाने का पानी रखा. कपड़े बाथरूम में रख दिए. नहाने के बाद वसुधा पूजा करने बैठी. अनु सबको खाना भी परोसती जा रही थी और वसुधा के लिए पूजा की तैयारी भी करती जा रही थी. कभी पानी देना, फूल लाकर देना, चंदन घिस देना,  भगवान का चरणामृत, तुलसी चौरे में डालकर आना. पूजा के बाद भगवानजी का तौलिया धोकर सूखने डालना. फिर वसुधा को खाना खिलाकर तब अनु ने खाना खाया. खाने के बरतन आदि

समेटते हुए अनु को ढाई-तीन बज गए.

शाम को जया ने अनु और आदित्य को बाहर घूमने भेज दिया. दोनों का चेहरा खिल गया. महीनों के बाद वे घूमने जा पाए थे. हमेशा तो खाना बनाने, सुरेश और वसुधा को परोसने तक में ही इतनी देर हो जाती कि अनु मायूस होकर जाने से ही मना कर देती. अब भला रात में नौ बजे घूमने का समय ही कहां रह जाता. आज जया ने कहा, रात में वह कुछ भी बना लेगी और वसुधा तथा सुरेश को खिला देगी. जया ने देखा वसुधा को अनु का जाना अच्छा नहीं लगा.

“घर में मेहमान आए हैं और बहू यूं घूमने निकल गई.” वसुधा के स्वर में नाराज़गी थी.

“मैंने ही उन्हें भेजा है. वह तो जाने को तैयार भी नहीं थी और मैं कोई मेहमान थोड़े ही हूं.” जया ने कहा.

दूसरे दिन जया ने वसुधा को जल्दी नहाने और पूजा करने को कहा, ताकि वह भी सबके साथ बैठकर खाना खा सके. बड़ी अनिच्छा से वसुधा नहाने गई. उस दिन अनु काम से डेढ़ बजे ही फ्री हो गई, तो जया ने उन दोनों को पिक्चर देखने भेज दिया. दोपहर में आराम करने वसुधा और जया पलंग पर लेट गईं. वसुधा फिर घुटनों पर हाथ फेरते हुए कराहने लगी.

“पता नहीं, क्या जानलेवा बीमारी हो गई है. मैं तो अपनी ज़िंदगी से तंग आ गई हूं. न चल पाती हूं, न ही कहीं आ-जा पाती हूं. बस, इस कमरे में कैद होकर रह गई हूं.” वसुधा फिर अपने घुटनों का रोना लेकर बैठ गई.

“तुझे ‘सास’ नामक बीमारी हो गई है वसुधा. और कुछ नहीं.” अचानक जया बोल उठी.

“क्या?” वसुधा चौंक गई.

“हां, और यह बड़ी भयानक बीमारी है. एक बार यह रोग लग जाए, तो उम्रभर पीछा नहीं छोड़ती.” जया के स्वर में हल्का-सा व्यंग्य था.

“क्या कह रही हो दीदी? तुम भी न.” वसुधा चिढ़कर बोली.

“मैं ठीक कह रही हूं. तुझे कुछ नहीं हुआ है. मध्यमवर्गीय भारतीय घरों की सासों के साथ यही होता है. उम्रभर वे घर का सारा काम करती हैं, लेकिन जैसे ही बहू घर में आती है, सारा काम उसे सौंपकर पलंग पर बैठ जाती हैं और बीमारियों को न्योता देती हैं. अरे, मेनोपा़ॅज के समय हार्मोनल चेंजेस होते हैं, इस समय तो शरीर को व्यायाम की ज़्यादा ज़रूरत होती है, ताकि वह स्वस्थ रहे, लेकिन तुमने तो पलंग पकड़कर बीमारियों को न्योता दे दिया. उम्रभर घर का काम करने के बाद अचानक शरीर एकदम निठल्ला होकर बैठ जाए, तो क्या होगा. मशीन को भी बंद करके रख दो, तो उसमें भी ज़ंग लग जाती है, फिर यह तो शरीर है. पिछले डेढ़ साल में अपने शरीर की हालत देखी है, वज़न कम से कम पच्चीस किलो बढ़ गया है. अब घुटनों पर यह अतिरिक्त भार पड़ेगा, तो दर्द तो होगा ही. मोटापे से घुटने ख़राब और आगे मधुमेह को आमंत्रण और फिर कोसती हैं बेचारी बहू को कि इसके आने से ये सब हुआ.” जया ने खरी बात आख़िर बोल ही दी.

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“सारी उम्र तो काम में पिस गई. अब इस उम्र में थोड़ा आराम कर लिया तो…?”

“अरे, अपनी गृहस्थी, अपने ही पति-बच्चों के लिए काम किया ना? सब करते हैं और तुमने कोई एहसान नहीं किया है. किसी दूसरे के घर का काम तो नहीं किया ना.” जया ने उसे डांट लगाई.

“हमारी सास भी तो बैठी रहती थी. हम भी तो अकेले ही सारा काम करते थे तो…” वसुधा कुछ और कहना चाहती थी, मगर जया ने बीच ही में उसे रोककर कहा.

“बस-बस. मैं तेरी मंशा समझ गई. वो ज़माना और था. कुछ लोगों की सोच संकुचित होती है, लेकिन हम भी वैसा ही नज़रिया रखें, तो उनमें और हममें फ़र्क़ ही क्या रह जाएगा. तेरी सास ने तुझसे काम करवाया, इसलिए तू भी अपनी बहू से बदला लेगी. यह ओछी प्रवृत्ति छोड़ दे. मैं तुझसे चार साल बड़ी हूं, लेकिन मेरा शरीर एकदम स्वस्थ है, क्योंकि मैं घर का काम करती रहती हूं. बहू को मदद भी हो जाती है और गृहस्थी संचालन में मेरी सशक्त भूमिका भी बरक़रार है. लेकिन तुम्हारे जैसी सास काम में मदद तो करेंगी नहीं, हां पलंग पर बैठे-बैठे गृहस्थी पर अपना आधिपत्य जताकर व्यर्थ विवाद और खीझ को बढ़ावा देंगी. सच है ‘खाली दिमाग़ शैतान का घर’ काम तो कुछ है नहीं, तो बहू को परेशान करने की व्यर्थ ख़ुराफ़ातें दिमाग़ में पैदा होती रहती हैं.”

“पर मैंने बहू को क्या परेशान किया?” वसुधा हैरानी से बोली.

“ये जो देर से नहाना है, देर से खाना खाने बैठना है, इसके पीछे की चालाकी मैं सब समझ रही हूं.” जया ने कहा तो वसुधा ने सकपकाकर सिर झुका लिया.

“देख, बहू के भी अपने सपने हैं. खाली बैठकर तेरा दिमाग़ उल्टी दिशा में चलने लगा है. तू जान-बूझकर उसे काम में उलझाए रखती है, ताकि वह आदित्य के साथ बाहर न जा पाए. तू अपने दिनों की कुंठा अब उस पर निकाल रही है. यह ठीक नहीं है. किसी दिन अगर वो दोनों अलग हो जाएं, तो फिर ये घुटनों का दर्द लेकर भी सारी गृहस्थी तुझे अकेले ही खींचनी पड़ेगी, तब उसे मत कोसना. शरीर तो काम करने के लिए ही होता है. रवींद्रनाथ टैगोर ने भी सत्तर वर्ष की उम्र में जाकर चित्रकारी सीखी और चित्र बनाना प्रारंभ किया. वे अगर उम्र की सोचते तो इतना नाम नहीं कमाते.” अंतिम बात करने तक जया का स्वर काफ़ी हद तक संयत हो चुका था.

वसुधा सोच में पड़ गई. जया दूसरी ओर मुंह करके सो गई. थोड़ी देर बाद वसुधा पानी लेने किचन में गई. जया ने चुपचाप देखा वसुधा बड़े आराम से चल रही थी. वह मुस्कुरा दी.

जया को सुबह सैर करने की आदत थी. दूसरे दिन वह सुबह उठी, तो देखा वसुधा उससे पहले ही उठकर बाहर जाने को तैयार थी. यह देखकर जया सुखद आश्‍चर्य से भर गई.

थोड़ी दूर ही सही, पर वसुधा जया के साथ पैदल घूमने गई. इतने दिनों से उसके पैर बैठे-बैठे अकड़ गए थे. अब जोड़ खुलने में थोड़ा व़क्त तो लगेगा. लेकिन जया को तसल्ली थी कि कम से कम वसुधा की बुद्धि पलटी तो.

घर जाकर चाय भी वसुधा ने ही बनाई. बर्तनों की खटपट सुनकर अनु दौड़ी-दौड़ी किचन में आई, तो वसुधा को काम करते देख आश्‍चर्यचकित रह गई. वह चाय बनाने जा ही रही थी कि जया ने इशारे से उसे मना कर दिया. आदित्य और सुरेश भी किचन में चले आए.

वसुधा ने सबकी चाय टेबल पर रखी. आज पूरा परिवार एक साथ बैठा था.

“लो अनु, तुम्हारी सास अब एकदम स्वस्थ हो गई है. अब वह सब काम कर सकती है. बस, अब तुम उस पर एक नई ज़िम्मेदारी डालने के लिए फटाफट उसे दादी बनाने की तैयारी शुरू कर दो.” जया ने कहा तो अनु शरमा गई और सब खिलखिलाकर हंस दिए.

 

Dr. Vineeta Rahurikar

डॉ. विनीता राहुरीकर

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कहानी- डर अनजाना-सा (Short Story- Darr Anjana-Sa)

”आप विश्‍वास नहीं करेंगी डॉक्टर, पिछले कई महीनों से मेरा लेखन कार्य बिल्कुल ठप्प पड़ा है. मैं चंद पंक्तियां लिखने में भी स्वयं को असमर्थ पा रही हूं. मेरी सृजन क्षमता को मानो लकवा मार गया हो, जबकि अध्ययन और लेखन मेरे लिए संजीवनी बूटी की तरह हैं. ये मुझमें प्राणवायु का संचार करते हैं. इनके बिना तो मैं जीते जी ही मर जाऊंगी. मैं क्या करूं डॉक्टर, मैं क्या करूं??” कहते-कहते मैं फफककर रो पड़ी.

Short Story- Darr Anjana-Sa

”नहीं…” एक घुटी-घुटी चीख मुंह से निकली और मैं झटके से उठ बैठी. जब आंखें अंधेरे में देखने की अभ्यस्त हुईं तो पता चला पूरा शरीर पसीने से तरबतर था.

‘उफ़, फिर वही भयानक सपना!’

‘सपना नहीं मिताली, यह हक़ीक़त है. यह सपना तुम्हारे भविष्य का आईना है. इसे पहचानो और व़क़्त रहते संभल जाओ.’ अंदर से उठती आवाज़ ने मुझे चेतावनी दी.

हां, मुझे ख़ुद को बदलना ही होगा. मुझे अपने खोल से बाहर निकलना ही होगा, वरना कहीं मेरा भी वही अंजाम? एक अज्ञात भय से मैं पुन: सिहर उठी. अब फिर से नींद आना नामुमकिन था. बेहतर है, मैं अपनी अधूरी पड़ी कहानी पूरी कर लूं. लेकिन लाख प्रयास के बावजूद दिमाग़ काम नहीं कर रहा था. और दिमाग़ के ज़ोर के बगैर क़लम ने चलने से इंकार कर दिया. हारकर मैंने भी हथियार डाल दिए.

‘बह जाने दो दिमाग़ी धारा को, जिस ओर भी वह बहना चाहे.’ सामने ही मौसी की पोती की शादी का कार्ड पड़ा था. ‘चलो, यहीं से शुरुआत करती हूं.’ मैंने फटाफट सूटकेस में दो भारी साड़ियां और शगुन का लिफ़ाफ़ा डाला और अगले ही दिन पहुंच गई शादी में. मुझे देखकर वहां जो कानाफूसी शुरू हुई, तो वह मेरी रवानगी तक चलती रही. खिन्न मन से मैं घर लौटी. दिल ने कहा, ‘रिश्तेदारी निभाना तुम्हारे बस का नहीं मिताली.’ लेकिन मन ने समझाया, ‘यदि एक बार ठान लो तो क्या मुश्किल है? इतने बरसों बाद किसी पारिवारिक समारोह में सम्मिलित हुई हो तो ऐसी प्रतिक्रिया तो स्वाभाविक है. धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा.’

कांताबाई आ चुकी थी. उसे सफ़ाई में जुटा देख मैं भी सहज होकर सूटकेस संभालने लगी. अचानक दिमाग़ में बिजली कौंधी. ‘बाई से घनिष्ठता भी तो ज़रूरी है.’

“अं…तुम्हारे कितने बच्चे हैं?”

“हं…?”  वह चिहुंककर पलटी और मुझे घूरने लगी.

“मैं तुम्हीं से पूछ रही हूं.” मैंने मुस्कुराने का असफल प्रयास करते हुए कहा.

“तीन. हं….., हां तीन ही हैं. आप ठीक तो हैं बीबीजी?”

“हां, मैं बिल्कुल ठीक हूं.  मुझे क्या हुआ है?”

“नहीं, ऐसे ही मुझे लगा…..”

“तुम्हें लगा मानो कोई भूत देख लिया हो.” ग़ुस्सा पीते हुए मैं मन-ही-मन बुदबुदाई. सब लोग मुझे समझते क्या हैं? क्या मैं हाड़-मांस के इंसानों से अलग हूं? मुझमें कोई भावना या संवेदना नहीं है? दिल कर रहा था फूट-फूटकर रोऊं, लेकिन मन-मसोसकर रह जाना पड़ा, क्योंकि बाई अब भी मुझे ही घूर-घूरकर देखे जा रही थी. दिन भर किसी काम में मन नहीं लगा और रात होते ही फिर वहीं भयानक सपना! मुझे लगा यदि जल्दी ही कुछ किया नहीं गया तो मैं पागल हो जाऊंगी.

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विचारों की कड़ी में उलझा मेरा दिमाग़ मेरे क़दमों को कब मनोचिकित्सक तक ले गया, ख़ुद मुझे भी पता न चला. भान तो तब हुआ जब मनोचिकित्सक ने मुझे विश्‍वास में लेकर मेरी अंतर्व्यथा को शब्दों में ढलवाना आरंभ किया और मैं यंत्रचलित-सी सब कुछ बताती चली गई.

“युवावस्था में एक के बाद पहले मां और फिर पिताजी को खो बैठी. मां को मेरी शादी का बड़ा चाव था. भाई-भाभी ने उस ज़िम्मेदारी को निभाना चाहा, पर मैंने ही किनारा कर लिया. शुरू से ही मैं गंभीर और एकाकी प्रवृत्ति की रही हूं. मां-पिताजी की असमय मृत्यु ने मुझे और भी अपने खोल में समेट लिया. मैंने गांव में अध्यापिका की नौकरी कर ली और इस तरह भैया-भाभी से भी धीरे-धीरे हमेशा के लिए दूर होती चली गई. गांव-गांव, शहर-शहर घूमते-घूमते सेवानिवृत्त होकर अंतत: मैं यहां इस महानगर में आकर बस गई. मेरी एक साथी अध्यापिका ने मुझे उचित क़ीमत पर यह छोटा-सा आशियाना दिलवा दिया था. मुझे लिखने का शौक़ रहा है. सेवानिवृत्ति के बाद मैंने स्वयं को पूरी तरह से इसी शौक़ में डुबो दिया. समय-समय पर मेरी रचनाएं छपती रहती हैं. पेंशन की निश्‍चित रकम मेरे लिए पर्याप्त है. मेरी एक बंधी-बंधाई दिनचर्या है. मुझे न अपने पड़ोसियों से मतलब रहा है, न रिश्तेदारों से. यहां तक कि बाई से भी कभी कोई विशेष बात नहीं होती. मैंने न तो कभी किसी से कोई अपेक्षा रखी है और न ही मैं चाहती हूं कि कोई मुझसे कुछ अपेक्षा रखे. मुझे अपनी ज़िंदगी से कभी कोई शिकायत नहीं रही. कुछ समय पूर्व तक मैं पूर्णत: आत्मसंतुष्ट थी. लेकिन…?”

“लेकिन क्या? बोलिए मितालीजी. आपको अपने संतुष्ट जीवन से एकाएक असंतुष्टि क्यों हो गई? किसने आपकी शांत और स्थिर जीवनधारा में कंकड़ फेंका है?”

“मैं अख़बारों में आए दिन छपनेवाली ख़बरों से असहज हो उठी हूं. मेरे जैसा एकाकी जीवन गुज़ारनेवाले प्रौढ़ और वृद्ध अब इस महानगर में सुरक्षित नहीं हैं. हालांकि इस असुरक्षा का एहसास मुझे पहले से ही था, इसलिए मैंने विशेष सुरक्षा व्यवस्था कर रखी है. सुरक्षागार्ड रात को दो बार विशेष रूप से मेरे घर के चक्कर लगा जाता है. दूधवाला, सब्ज़ीवाला घंटी बजाकर दूध-सब्ज़ी दे जाते हैं. किरानेवाला एक फ़ोन करने पर सारा सामान पहुंचा जाता है. मैं ही कभी-कभी बदलाव के लिए नीचे घूमने आ जाती हूं तो आवश्यक ख़रीददारी कर लेती हूं, अन्यथा मुझे कोई असुविधा नहीं है. लेकिन एकाकी प्रौढ़ों के दर्दनाक अंत संबंधी ख़बरें पढ़-पढ़कर मैं अपने होश खो बैठी हूं. पहले प्रसिद्ध अभिनेत्री ललिता पवार, फिर परवीन बॉबी, फिर ‘बुलेट’ फ़िल्म की वह अभिनेत्री और भी न जाने कितनी महिलाएं! ये सभी अपने घरों में मृत पाई गईं और दो-दो तीन-तीन दिनों तक इनकी लाशें सड़ती रहीं. कोई इनका अंतिम संस्कार करनेवाला भी नहीं था. ये सभी तो अपने ज़माने की मशहूर हस्तियां थीं, मैं तो एक अदना-सी प्रौढ़ा हूं. जब उनका अंत इतना बुरा था तो मेरा अंत कैसा होगा? ये सोच-सोचकर ही मैं सिहर उठती हूं. अक्सर मुझे रात में दु:स्वप्न आ घेरते हैं. मैं मृत्युशैया पर पड़ी हूं और कोई मुझे पानी देनेवाला भी नहीं है. छटपटाते हुए मैं प्राण त्याग देती हूं. मेरी मृतदेह अंतिम संस्कार के इंतज़ार में बंद घर में पड़ी है. बाई, दूधवाला, सब्ज़ीवाला घंटी बजाकर मेरे घर में न होने का कयास लगाते हुए निकल जाते हैं. मैं बेबस-सी आवाज़ें लगाकर उन्हें रोकने का प्रयास कर रही हूं, पर वे तो मानो न तो मुझे देख रहे हैं और न मुझे सुन रहे हैं. तीसरे दिन लाश से उठती दुर्गन्ध पड़ोसियों को पुलिस को फ़ोन करने के लिए तत्पर करती है. पुलिस आकर दरवाज़ा तोड़ती है. बदबू का एक भभका उठता है. लोग नाक पर रुमाल रखकर दूर छिटक जाते हैं… और मैं चिल्लाकर नींद से जाग जाती हूं. लेकिन अफ़सोस, मेरी भयभीत चीख की आवाज़ भी किसी के कानों तक नहीं पहुंचती और कोई मेरे पास आकर यह नहीं पूछता कि मैं क्यों चिल्लाई?” उत्तेजना में मैं हांफने लगी.

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“लीजिए, ठंडा पानी पी लीजिए.” डॉक्टर ने सामने रखा ग्लास मुझे थमा दिया. मैंने एक ही सांस में ग्लास खाली कर दिया.

“थैंक्यू, आपको यह सब कुछ बताकर मैं बहुत हल्का महसूस कर रही हूं.”

“मैं समझ सकती हूं. प्लीज़ गो ऑन.” डॉक्टर ने मेरी हौसलाअफ़ज़ाई की.

“अपने दुर्दान्त की कल्पना से सिहरकर मैंने लोगों से मेल-जोल बढ़ाने का प्रयास किया. लेकिन मुझे लगता है, जितनी तकलीफ़ मुझे अपने खोल से निकलने में होती है, उतनी ही, बल्कि उससे कहीं ज़्यादा तकलीफ़ लोगों को मुझे आत्मसात करने में होती है. आप विश्‍वास नहीं करेंगी डॉक्टर, पिछले कई महीनों से मेरा लेखन कार्य बिल्कुल ठप्प पड़ा है. मैं चंद पंक्तियां लिखने में भी स्वयं को असमर्थ पा रही हूं. मेरी सृजन क्षमता को मानो लकवा मार गया हो, जबकि अध्ययन और लेखन मेरे लिए संजीवनी बूटी की तरह हैं. ये मुझमें प्राणवायु का संचार करते हैं. इनके बिना तो मैं जीते जी ही मर जाऊंगी. मैं क्या करूं डॉक्टर, मैं क्या करूं??” कहते-कहते मैं फफककर रो पड़ी.

डॉक्टर ने उठकर मेरी पीठ सहलाई. “आप घर जाइए और आराम कीजिए. आपकी समस्या कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं है. परसों आप इसी समय आकर मुझसे मिलें. थैंक्स फॉर कॉपरेशन.”

होंठों पर फीकी-सी मुस्कुराहट लिए मैंने डॉक्टर से विदा ली. घर आकर मैं बिस्तर पर औंधी पड़ गई. नींद ने कब मुझे अपनी आगोश में ले लिया, कुछ भान न रहा. ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाने और घंटी बजने की आवाज़ से मुझे कुछ चेतना हुई, लगा फिर वही दु:स्वप्न देख रही हूं. मगर ‘माई! माई!’ की आवाज़ से नींद उड़ गई और मैंने उठकर दरवाज़ा खोल दिया.

“क्या बीबीजी, कितनी देर करती हो दरवाज़ा खोलने में? मैं कब से खड़ी हूं… और घरों का भी तो काम निबटाना है.” मैं बुत-सी उसे निहारती रही. शायद ख़ुद को यह विश्‍वास दिला रही थी कि यह सपना नहीं, हक़ीकत है और मैं ज़िंदा हूं.

मुझे निर्निमेष निहारते देख बाई घबरा गई. “लगता है आपकी तबियत ठीक नहीं है.” कहते हुए बाई ने मेरी कलाई पकड़ ली.

“उई मां, आपको तो बहुत तेज़ बुखार है. पहले क्यूं नहीं बताया? चलो बिस्तर पर जाकर लेटो, मैं तुलसी-अदरक की चाय बनाकर लाती हूं.” वह मुझे घसीटकर बिस्तर तक ले गई और लिटाकर चादर ओढ़ा दी. मैं कुछ समझ या कह पाऊं, इससे पूर्व ही वह गरम चाय का प्याला लेकर हाज़िर थी. मैंने चाय के संग एक क्रोसीन ले ली.

“आपको बुखार में तनिक भी हिलने की ज़रूरत नहीं है, मैं सब संभाल लूंगी. आप मुंह से बात नहीं करतीं तो क्या हुआ, हम जानती हैं कि आप दिल की बहुत अच्छी हैं. और मेमसाब लोग तो इधर-उधर की पचास बातें पूछती हैं, लेकिन आप बस अपने काम से काम रखती हैं.” बाई की बातों से मुझे ऐसा महसूस हो रहा था मानो मरुस्थल में एकाएक हरियाली लहलहा उठी हो. मैं इस हरियाली का भरपूर आनन्द उठा पाऊं, इससे पूर्व ही दरवाज़े की घंटी बज उठी.

“आप बैठी रहिए, मैं देख लूंगी.” बाई ने दरवाज़ा खोल दिया. सामने वाले मकान की मिसेज मल्होत्रा एक महिला के संग खड़ी थीं. मेरा उनसे कोई विशेष परिचय नहीं था, बस एक-दो बार हाय-हैलो हुई थी.

“नमस्ते मितालीजी, यह मेरी सहकर्मी सानिया है. आपकी कहानियां और लेख बड़े चाव से पढ़ती है. कई बार आपसे मिलवाने का आग्रह कर चुकी है. आज ऑफ़िस से ज़रा जल्दी फ्री हो गए तो मैं उसे आपसे मिलवाने ले आई. शायद आपकी तबियत ठीक नहीं है. कोई बात नहीं, आप आराम करें, हम फिर आ जाएंगे.” “अरे नहीं, बैठिए.” मैंने बाई को दो चाय लाने का इशारा किया. “ऐसे ही थोड़ा बुखार हो गया था. अभी क्रोसीन ली है, उतर जाएगा.” हम देर तक साहित्यिक चर्चा करते रहे. मुझे लग रहा था दवा की असली खुराक तो मुझे अब मिल रही है. दो घंटे बाद वे जाने के लिए उठ खड़ी हुईं. “मैं बिट्टू के संग आपके लिए अभी दलिया बनाकर भिजवा दूंगी. आप आराम कीजिए.”

“अरे आप क्यूं तकलीफ़…” मैं कहती ही रह गई, पर वे नहीं मानीं.

“आप इसी तरह लिखती रहिएगा. आप नहीं जानतीं, आपकी रचनाओं से हमें हमारी कितनी ही समस्याओं का समाधान मिल जाता है. और सबसे बड़ी बात, उन्हें पढ़ने से हमें आत्मिक तृप्ति होती है.”

“मैं आपकी भावनाओं का ख़याल रखूंगी. आप भी मुझे ऐसे ही सहयोग करती रहिएगा.” बड़े ही तृप्त मन से मैंने उनसे विदा ली. अब लेटने का मन नहीं कर रहा था. मैं बालकनी में कुर्सी लगाकर बैठ गई. संध्या की सुरमई छटा चारों ओर पसरने लगी थी. सड़क पर कारों का धीरे-धीरे बढ़ता क़ाफिला बहुत भला लग रहा था. कभी यही रेंगता क़ाफिला झुंझलाहट से भर देता था. सच है, जब मन शांत हो तो सब कुछ सुहाना लगता है. मैं भी कितनी बुद्धू हूं! जीवन की सार्थकता किसमें है, यही नहीं समझ पाई. इस नश्‍वर शरीर का क्या होगा, यह बेसिर पैर की बात सोच-सोचकर ज़िंदा शरीर को दुख देती रही. अरे, जिस शरीर में प्राण ही नहीं, उसकी क्या चिंता करना? मौत तो किसी को कभी भी, कहीं भी आ सकती है. यदि सीमा पर लड़ने वाला जवान अपनी मौत को लेकर इतना फ़िक्रमंद हो जाए तो देश का क्या होगा? इंसान यदि मौत से डर-डरकर जीता रहा तो वह तो जीते जी मर जाएगा.

मैं अपने ढंग से ज़िंदगी जीते हुए आत्मसंतुष्ट हूं. दूसरों के लिए मेरा जीवन अनुकरणीय और सराहनीय रहेगा, यह सुखद एहसास यदि दिल में है, तो मौत हमेशा सुखद ही लगेगी. सोचते हुए मैंने काग़ज़- क़लम उठा ली. अधूरी कहानी आज अवश्य ही पूरी हो जाएगी.

 

Sangeeta Mathur

     संगीता माथुर

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कहानी- शिखर पर (Short Story- Shikhar Par)

उस पल मुझे लगा कि गुत्थियों के जंगल से निकल मैं एक शिखर पर खड़ी हुई हूं, जहां सम्मान के साथ मुझे एक अच्छी पत्नी आदर्श मां होने का दर्जा दिया जा रहा है.

Short Story- Shikhar Par

“आप ज़हर खाकर मर क्यों नहीं जातीं.” नीरव की बात सुन मैंने हंसते हुए उससे पूछा, “तुम लोग रह लोगे मेरे बिना?”
“हां रह लूंगा.” वह तमतमाते हुए बोला.
अब तक मैं समझ रही थी कि वह किसी कार्टून के पात्र को अपने में उतारकर उसकी भूमिका अदा कर रहा है, पर उसके चेहरे पर छाई तटस्थता और एक मौन स्वीकृति के भाव ने मुझे एहसास कराया कि वह गंभीर है.
अपने 14 वर्षीय बेटे के मुंह से यह बात सुन मैं हैरान रह गई. मुझे अपनी मां होने की क्षमताओं पर संदेह होने लगा.
“आप और बच्चों की मम्मी जैसी क्यों नहीं हैं? आप घर पर भी नहीं रहतीं. बस, पापा अच्छे हैं. हर समय मेरा ख़याल रखते हैं. स्कूल से आता हूं तो पापा ही घर पर मिलते हैं, आप नहीं.”
“बेटा, मेरा जॉब ही ऐेसा है, जिसमें मुझे ज़्यादा व़क़्त घर से बाहर रहना पड़ता है. तुम्हारे पापा का काम ऐसा है कि वे लंच के लिए घर आ सकते हैं. फिर घर के पास ही है उनका ऑफ़िस. पापा ख़ुद ही बॉस हैं, इसलिए जब चाहे घर आ-जा सकते हैं.” मैंने उसे समझाने की कोशिश की.
हालांकि इस उम्र में उसे समझाना बेमानी लगता था. वह काफ़ी समझदार हो चुका था. यह भी समझता था कि मम्मी की नौकरी की वजह से ही सुख-सुविधाओं के अंबार जुटते थे… फिर भी मन को समझाया, आख़िर है तो बच्चा ही.
“आप अच्छी मम्मी नहीं हैं. आप मम्मी जैसी मम्मी नहीं हैं.” मुझे लगा कि जैसे नीरव ने मेरे मुंह पर करारा तमाचा जड़ दिया है. ‘मम्मी जैसी मम्मी नहीं.’ आख़िर उसकी नज़र में मम्मी की क्या परिभाषा है? शायद वही ठीक है. मैं एक आदर्श मां की श्रेणी में नहीं आती हूं. आती तो मैं एक आदर्श पत्नी की श्रेणी में भी नहीं हूं… अपेक्षाओं को ठीक से समझकर पूरा करना दूसरों को ख़ुश रखने के लिए आवश्यक होता है. तभी दूसरे चाहे वह पति हो या बच्चा या कोई और. आपसे ख़ुश रह सकते हैं और अपनी ख़ुशी… अपनी अपेक्षाएं… क्या उनके बारे में सोचना स्वार्थी होने की निशानी होती है?
सिलसिला उस दिन ही रुका नहीं, क्योंकि नीरव की वह प्रतिक्रिया मात्र क्षणिक नहीं थी, दबे हुए ज्वालामुखी के फूटते लावे जैसी थी. वह भूला नहीं कि उसने क्या कहा था, वरना ग़ुस्से में तो वह न जाने क्या-क्या कह जाता था. उस दिन ऑफ़िस से आकर बैठी ही थी कि बोला, “ज़रा मार्केट जाना है, एक क़िताब ख़रीदनी है. आप चलो.”
“बेटा, अभी तो आई हूं, थोड़ी देर में पापा आ जाएंगे, तब उनके साथ चले जाना.”
बस तुनक गया वह. “आप मेरी मम्मी नहीं हैं.” अपने कमरे में जाकर उसने चीज़ों को इधर-उधर फेेंकना शुरू कर दिया. मन तो हुआ उसे झिंझोड़ डालूं, पर ठहर गई. थकावट और दर्द के सैलाब को स़िर्फ आंखों में समेट लिया. उम्र के कारण शरीर में हो रहे बदलावों की वजह से वह इस तरह रिएक्ट करने लगा था या सचमुच में वही उसकी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पा रही थी.
नौकरी को मजबूरी कहकर नौकरी करना स्वयं को जस्टिफाई करने जैसा होता है. उसकी मजबूरी तो नहीं थी, हां शा़ैक था. वह घर बैठ ही नहीं सकती थी और फिर अच्छा जॉब मिलना भी क्या आसान होता है. क्षितिज का बिज़नेस ठीक-ठाक चल रहा था. ऊपर-नीचे तो बिज़नेस में होता ही रहता है, लेकिन अगर वह नौकरी न भी करे तो भी अच्छी ज़िंदगी जी जा सकती थी. अच्छी ज़िंदगी यानी अच्छा खाना, अच्छे कपड़े. ज़रूरतें पूरी हो सकती थीं, पर लिविंग स्टैंडर्ड मेंटेन उसकी नौकरी के चलते ही हो पाता था.
“ज़रूरत क्या है तुम्हें धक्के खाने की, घर में रहो और नीरव पर ध्यान दो.” क्षितिज कई बार उससे कह चुका था. आज भी उसके आते ही वही बहस शुरू हो गई थी. “एक दिन उसकी बात मान उसके साथ चली जातीं तो क्या हो जाता? कितनी बार कहा है कि नौकरी छोड़ दो, पर तुम तो बस अपने बारे में सोचती हो.”
“सही समझे, आख़िर नौकरी तो मैं अपने लिए कर रही हूं. बढ़ती महंगाई और रिसेशन के इस समय में तुम्हें क्यों नहीं यह बात समझ आती कि नौकरी आजकल कोई मौज-मस्ती करने की चीज़ नहीं है, एक ज़रूरत है. उन लोगों से जाकर पूछो, जिनके यहां कमानेवाला एक ही है. कितनी परेशानियां झेलनी पड़ती हैं उन्हें और तुम चाहते हो कि मैं सारे दिन किचन में घुसी रहकर अपने टैलेंट और हर महीने मिलने वाले वेतन को नज़रअंदाज़ कर दूं.”
“मैं ये सब नहीं जानता बस…” क्षितिज को मानो कहने के लिए शब्द नहीं मिल रहे थे.

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“मैं भी नीरव के साथ क्वालिटी टाइम गुज़ारती हूं, पर उसने अपने मन में मुझे लेकर न जाने कैसी धारणाएं बना ली हैं. उसे समझाने से पहले तुम्हें मुझे समझना होगा. मैं इस तरह की ज़िंदगी नहीं जी सकती. मुझे लोगों से मिलना-जुलना अच्छा लगता है. इतने बरसों से नौकरी करते-करते इसकी आदत हो गई है. अब छोड़ दी तो फिर नहीं मिलेगी. बी प्रैक्टिकल क्षितिज. फिर आगे नीरव की पढ़ाई का ख़र्च दिन-ब-दिन बढ़ेगा ही.”
“तुम तो अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए घर से बाहर रहना चाहती हो. न जाने कौन-सी उपलब्धि की चाह तुम्हें घर के बाहर रहने के लिए उकसाती है. और फिर मैं कौन-सा तुम्हें घर में ़कैद होने के लिए कह रहा हूं. तुम्हें घूमने-फिरने की मनाही तो नहीं है. नीरव जिस दौर से गुज़र रहा है, ऐसे में बिगड़ने की संभावना ज़्यादा रहती है. तुम घर पर रहोगी तो कम से कम यह तो देख सकोगी कि वह टीवी पर क्या देख रहा है, नेट स़िर्फंग के कितने भयानक परिणाम देख-सुन चुके हैं हम.”
“पर तुम तो घर पर काफ़ी व़क़्त बिताते हो. तुम उस पर नज़र रख सकते हो. नीरव हम दोनों की ही ज़िम्मेदारी है. जैसी जिसकी सुविधा हो क्या, मैनेज नहीं करना चाहिए? ” इस बार उसकी आवाज़ में न तो तल्खी थी, न ही रोष. क्षितिज की ओर से कोई जवाब न पाकर मैंने फिर कहा, “क्या कोई और रास्ता नहीं निकल सकता?” मैं अपनी तरफ़ से किसी भी तरह की कोशिश करने में कोताही नहीं करना चाहती थी.
“जब रास्ता साफ़ दिख रहा है तो बेवजह दिमाग़ ख़राब करने से क्या फ़ायदा?” क्षितिज ने चिढ़कर कहा.
“यानी हर स्तर पर समझौता मुझे ही करना होगा?”
“तुम औरत हो और एक औरत को ही समझौता करना होता है. वैसे भी एक मां होने का दायित्व तो तुम्हें ही निभाना होगा. अपनी हद में रहना सीखो.” क्षितिज की बात सुन मेरा मन जल उठा.
मैं घायल शेरनी की तरह वार करने को तैयार हो गई, “अच्छा आज यह भी बता दो कि मेरी हद क्या है?”
“हद से मेरा मतलब है कि घर संभालो, नीरव को संभालो. खाओ-पीओ, मौज करो.” क्षितिज के स्वर में बेशक पहले जैसी कठोरता नहीं थी. आवाज़ में कंपन था, लेकिन उसकी सामंतवादी मानसिकता के बीज प्रस्फुटित होते अवश्य महसूस हुए. एक सभ्य समाज का प्रतिनिधित्व करनेवाला पुरुष लाख शिक्षित हो, पर बचपन में उसके अंदर औरत को दबाकर रखने के रोपे गए बीजों को झाड़-झंखाड़ बनने से कोई नहीं रोक सकता.
क्षितिज की बात सुन मैं हैरान रह गई. क्षितिज जैसे पढ़े-लिखे इंसान की मानसिकता ऐसी हो सकती है? क्या पत्नी से उसकी अपेक्षाएं बस इतनी ही हैं? मेरी इच्छाओं का मान रखना, मेरे व्यक्तित्व को तराशने तक का ख़याल नहीं आता उसे? मैं कब अपने मां होने की ज़िम्मेदारियों से पीछे हटना चाहती हूं, पर क्षितिज का साथ भी तो नीरव को सही सोच देने के लिए
ज़रूरी है.

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अपने आंसुओं को पीते हुए इस बार बिना कोई जवाब दिए मैं अंदर कमरे में चली गई. समझाया तो उसे जाता है, जो समझने को तैयार हो, जिसके मन की खिड़कियां खुली हों. क्या नीरव की चिंता उसे नहीं है? वह तो बस उससे थोड़ा-सा सहयोग चाहती है.
नीरव उन दोनों को लड़ते देख अपने कमरे में चला गया था. उसे अपने ख़ुद पर भी ग्लानि हो रही थी. वह इतना छोटा तो नहीं कि ख़ुद मार्केट न जा सके. अब वह नौवीं में है और हर काम ख़ुद कर सकता है… वैसे भी पढ़ने और ट्यूशन में काफ़ी समय निकल जाता है. फिर क्यों वह हर समय… पर पल भर के लिए मन में आए ये विचार उसके अंदर जड़ जमाई सोच के आगे पानी के बुलबुले की मानिंद ही साबित हुए.
‘नो, मम्मी इज़ रॉन्ग’, वह बुदबुदाया.
इधर क्षितिज को समझ नहीं आ रहा था कि वह किस तरह से इस ‘हद’ को परिभाषित करे. उसने तो वही कहा था, जो आज तक वह देखता आया था. उसकी दादी, मां, बुआ, चाची, यहां तक कि बहनें और भाभी भी इसी परंपरा का निर्वाह कर संतुष्ट जीवन जी रही थीं.
‘क्या वाकई में वे संतुष्ट हैं?’ उसकी अंतरात्मा ने उसे झकझोरा. अपनी मां को पिता की तानाशाही के आगे कितनी ही बार उसने बिखरते देखा था. पिताजी के लिए तो मां की राय का न कोई महत्व था, न ही उनका वजूद था. मां जब भी कुछ कहतीं, पिताजी चिल्लाकर उन्हें चुप करा देते थे. सारी ज़िंदगी मां चूल्हे-चौके में खपती रहीं. केवल जीना है, इसीलिए जीती रहीं. अंत तक उनके चेहरे पर सुकून और संतुष्टि का कोई भाव नहीं था. मां का दुख हमेशा ही उसे दर्द देता था, फिर आज क्यों वह…
उसकी बहनों को भी पिताजी ने कभी सिर उठाकर जीने का मौक़ा नहीं दिया. न मन का पहना, न खुलकर वे हंसीं. जहां क्षितिज की हर इच्छा को वह सिर माथे लेते थे, वहीं उसकी बहनों की हर छोटी से छोटी बात में कांट-छांट कर देते थे. वे हमेशा ही डर-डर कर जीं और आज ब्याह के बाद भी उनकी दुनिया घर की देहरी के अंदर तक ही सिमट कर रह गई है. उससे छोटी हैं, पर समय से पहले ही कुम्हला गई हैं. एक वीरानी-सी छाई रहती है उनके चेहरे पर. ख़ुशी की कोई किरण तक उन तक पहुंचती होगी, ऐसा लगता नहीं.
“पापा, बुक लेने चलेंगे? इस पास वाली मार्केट में नहीं, आगे वाली में मिलेगी, वरना मैं ख़ुद ले आता.” नीरव ने उसकी तंद्रा भंग की तो वह सोच के ताने-बाने से बाहर आया.
“हां, क्यों नहीं.” क्षितिज ने उसका कंधा थपथपाया.
“यू आर ग्रेट पापा, लेकिन मम्मी तो बस… उनके पास मेरे लिए समय ही नहीं है. मैं उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं करता…” नीरव की बातें मेरे कान में पिघले हुए सीसे की भांति घुल रही थीं. एक बच्चा अपनी मां के बारे में ऐसा सोचे, इससे ज़्यादा आहत करने वाली बात और क्या हो सकती है? मेरा बेटा मुझसे दूर हो जाए, इससे तो बेहतर है कि मैं नौकरी छोड़ दूं. तभी शायद मैं उसकी उम्मीदों की मां बन सकूं.
नीरव शायद अपनी रौ में बहता ही जाता मानो मन की सारी भड़ास वह आज ही निकाल लेना चाहता हो. क्षितिज ने उसे कभी रोका भी तो नहीं, बल्कि उसके सामने मुझमें ही ग़लतियां निकालते रहते हैं. पर आशा के विपरीत क्षितिज की आवाज़ गूंजी.
“चुप रहो! अपनी मां के बारे में इस तरह बात करते तुम्हें शर्म नहीं आती? उनकी रिस्पेक्ट करना सीखो. वे तुम्हारी ख़ुशियों और इच्छाओं को पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत करती हैं. उनको जितना भी समय मिलता है, वह तुम्हारे साथ बिताती हैं और तुम हो कि…
वह दुनिया की सबसे अच्छी मां ही नहीं, पत्नी भी हैं.”
मेरी आंखों में नमी तैर गई. मैंने क्षितिज की ओर देखा. उसकी आंखों में आज पहली बार वह भाव दिखा जो जता रहा था कि वह मेरी भावनाओं की कद्र करता है. उसने मेरे हाथ को अपने हाथ में लिया तो मुझे आशवस्ति का एहसास हुआ. अपनों का विश्‍वास ही तो कठिन से कठिन परिस्थितियों से उबारने में मदद करता है.
नीरव को सिर नीचा किए खड़े देख मैंने उसके बालों को सहलाया तो वह मुझसे लिपट गया, “आई एम सॉरी मम्मी, अब मैं कभी आपसे ग़लत ढंग से बात नहीं करूंगा. आई लव
यू मम्मी.”
उस पल मुझे लगा कि गुत्थियों के जंगल से निकल मैं एक शिखर पर आ खड़ी हुई हूं , जहां सम्मान के साथ मुझे एक अच्छी पत्नी व आदर्श मां होने का दर्जा दिया जा रहा है.

Suman Bajpai

   सुमन बाजपेयी

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कहानी- प्रकृति के विरुद्ध (Short Story- Prakriti Ke Virudh)

Short Story- Prakriti Ke Virudh

 

 

“बच्चे की देखभाल का काम अब मम्मी-पापा या आया के बस का नहीं है संदीप. मां की जगह तो कोई नहीं ले सकता है. भला बच्चे के रहते मैं घर और ऑफिस दोनों में सामंजस्य कैसे बैठा पाऊंगी? मैं दोनों के साथ न्याय नहीं कर पाऊंगी.” श्रुति ने अपनी मजबूरी जताई.

 

डिंग-डांग, डिंग-डांग… डोरबेल बजती ही जा रही थी. श्रुति नींद में से उठकर झल्लाती हुई बाहर आई. दरवाज़ा खोला, तो पोस्टमैन सामने खड़ा था. अनमनी-सी उसने डाक ली और

खोलकर देखने लगी. डाक देखते ही उसके मुंह से ‘वाह!’ निकला. कंपनी के मैनेजर के जिस जॉब के लिए उसने इंटरव्यू दिया था, उसके लिए वो सिलेक्ट हो गई थी.

श्रुति ने ख़ुशी-ख़ुशी संदीप को फोन मिलाया और सिलेक्शन के बारे में बताया. उसने मम्मी-पापा, सास-ससुर, भाई-बहन, सहेलियों- सभी को सूचना दे दी और शाम को घर पर पार्टी का प्रोग्राम बन गया. सभी उससे दावत जो चाह रहे थे.

पहले इंटरव्यू में ही श्रुति ने इतनी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी पा ली थी. यह बड़े गर्व की बात थी. शादी को चार-पांच महीने ही हुए थे. श्रुति की इच्छा काम करने की थी, सो उसने संदीप को पहले ही बता दिया था. संदीप भी चाहता था कि बीवी काम करे. अपने घर में इकलौता था संदीप और श्रुति जैसी ख़ूबसूरत और बुद्धिमान पत्नी पाकर बहुत खुश था. घर के साज-संभाल से लेकर मम्मी-पापा की देखभाल, लज़ीज़ खाना बनाने तक सब कुछ श्रुति ने अच्छी तरह से संभाल रखा था.

मां तो श्रुति की अक्सर तारीफ़ ही करती रहती. आज के ज़माने में इकलौते बेटे के लिए अच्छी बहू मिल जाए, तो पैरेंट्स मानो घर बैठे गंगा नहा लेते हैं. संदीप के माता-पिता बहुत ख़ुश थे. बस, अब उन्हें इंतज़ार था दादा-दादी बनने का, लेकिन श्रुति अभी इसके लिए तैयार नहीं थी.

संदीप भी नई-नई शादी के इस मोह को ज़िम्मेदारियों से लादना नहीं चाहता था.

दोनों की गृहस्थी अच्छी चल रही थी. श्रुति को नया काम पसंद आ रहा था. ऑफिस में सभी उसकी योग्यता के कायल हो गए थे. अपने मृदु स्वभाव और व्यवहारकुशलता से श्रुति ने सभी का दिल जीत लिया था. संदीप श्रुति के साथ बहुत ख़ुश था.

दोनों सुबह ऑफिस साथ जाते थे. शाम को साथ ही आते भी थे. कुछ ही महीनों में श्रुति ने अपनी कार ख़रीद ली. अब मम्मी-पापा को कहीं ले जाना होता, तो वही ले जाती थी.

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घर के काम में तो श्रुति परफेक्ट थी ही, अब वो बाहर के काम भी करने लगी थी. वीकेंड पर दोनों अक्सर शहर से दूर किसी रिसॉर्ट पर घूम आते थे. संदीप ने पहली एनीवर्सरी पर बच्चा प्लान करने की ज़िद श्रुति से की, तो उसने ‘बहुत जल्दी है’ कहकर टाल दिया. मम्मी-पापा जब भी श्रुति के मां बनने की इच्छा जताते, तो वो हंसकर टाल देती. श्रुति कोई ऐसी बात ही नहीं करती थी कि किसी को शिकायत हो, लिहाज़ा मम्मी-पापा ज़्यादा बोल नहीं पाते.

संदीप-श्रुति की शादी को अब पांच बरस होने को आए थे. दोनों अभी भी ‘जस्ट मैरिड’ कपल ही लगते थे. बस, लोग इनके विवाह की अवधि और संतान न हो पाने को सवालिया नज़रों से देखने लगे थे अब. एक-दो दोस्तों ने तो संदीप से पूछ भी लिया कि बाप बनने की पार्टी कब देगा. कब तक मैरिज एनीवर्सरी पर ही बुलाता रहेगा.

संदीप थोड़ा चिंतित हो उठा. उसने उसी रात श्रुति से बात करने की सोची. “श्रुति आज पार्टी में सभी दोस्त पूछ रहे थे कि बाप बनने की पार्टी कब दे रहा है. सच, अब तो मेरा भी मन करता है कि कोई मुझे डैडी कहे,  अपनी छोटी-छोटी उंगलियों से मेरा हाथ पकड़े.” संदीप ने श्रुति को प्यार से निहारते हुए कहा.

“मन तो मेरा भी बहुत करता है.” श्रुति ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया. “पर सोचती हूं कि एक प्रमोशन और ले लूं. काम थोड़ा कम हो जाए, फिर बच्चे की देखभाल अच्छे से कर पाऊंगी.”

“पर दोनों साथ-साथ भी तो चल सकते हैं. घर पर मम्मी-पापा तो हैं ना, वो देख लेंगे बच्चे को. फिर हम आया भी रख सकते हैं. कहीं कोई कमी तो है नहीं.” संदीप ने समझाते हुए कहा.

“बच्चे की देखभाल का काम अब मम्मी-पापा या आया के बस का नहीं है संदीप. मां की जगह तो कोई नहीं ले सकता है. बच्चे के रहते मैं घर और ऑफिस दोनों में सामंजस्य कैसे बैठा पाऊंगी?” श्रुति ने अपनी मजबूरी जताई.

“श्रुति, सभी वर्किंग कपल्स के बच्चे होते हैं. सब कुछ मैनेज हो जाता है. अब तो मम्मी-पापा ने टोकना भी बंद कर दिया है.” संदीप नाराज़गी भरे स्वर में बोला.

श्रुति ने संदीप के गले में बांहें डाल दीं और इस बातचीत को विराम देते हुए सोने का आग्रह किया. अगले दिन सुबह ऑफिस के लिए तैयार होते हुए संदीप ने श्रुति की आंखों में झांकते हुए पूछा, “हमारे प्रपोज़ल का क्या हुआ भई?”

“अरे, अभी भी वहीं अटके हो!” श्रुति हैरान थी. दोनों हंस पड़े और अपने-अपने ऑफिस को निकल गए. श्रुति अच्छी पोस्ट मिलते ही थोड़ी महत्वाकांक्षी हो गई थी. नौकरी के कारण ही उच्च प्रतिष्ठित वर्ग में उठना-बैठना, कंपनी की तरफ़ से देश-विदेश जाना, हाई प्रोफाइल लोगों से मेल-मिलाप आदि बातें हो रही थीं. ऐसे में मां बनने पर उसे छुट्टी लेनी पड़ती और कंपनी यक़ीनन उसके काम को किसी अन्य को सौंप देती, इसलिए मां बनने के अपने निर्णय को टालती ही जा रही थी.

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उस दिन मम्मी को हार्ट अटैक आ गया. तुरंत हॉस्पिटल में एडमिट किया गया और समय पर इलाज भी हो गया, लेकिन संदीप-श्रुति घबरा से गए थे. पापा भी गुमसुम ही थे. हॉस्पिटल में बीमारी के समय मम्मी ने यह कहते हुए कि ‘मरने से पहले पोते-पोती का मुंह देख लूं, बस यही इच्छा रह गई है’ कहकर श्रुति को मां बनने के लिए बाध्य कर दिया.

संदीप-श्रुति ने बच्चा कंसीव करने की प्लानिंग कर ली. इसके लिए वे गायनाकोलॉजिस्ट के पास गए. लेडी डॉक्टर ने श्रुति का पूरी तरह से चेकअप करने के बाद कुछ और जांच करवाने के लिए कहा. तीन दिन बाद दोनों डॉक्टर के पास रिपोर्ट के साथ थे. रिपोर्ट देखने के बाद डॉक्टर ने गंभीरता से कहना शुरू किया, “सॉरी संदीपजी, आप दोनों के कुछ प्रॉब्लम्स डिटेक्ट हुए हैं. दरअसल, बढ़ती उम्र में कंसीव करने की संभावनाएं कम होती जाती हैं. कॉम्प्लीकेशन्स का भी डर लगा रहता है. शादी के इतने साल गुज़र जाने के बाद भी आप दोनों ने कोई चांस नहीं लिया, इसलिए इंफर्टिलिटी की समस्या हो गई है.” डॉक्टर कहती जा रही थी और श्रुति स्तब्ध-सी बैठी रही.

“आजकल के वर्किंग कपल्स आज़ादी में खलल, बच्चे को संभालनेवाला कोई न होना, करियर में ऊंचाई अचीव करना या ख़र्चों आदि से बचने का सहज उपाय लेट प्रेग्नेंसी को मानते हैं, जो मेडिकली ग़लत है. पैरेंट्स बनने की सही उम्र इक्कीस से चौबीस-पच्चीस है और तीस के बाद तो कई कॉम्प्लीकेशन्स हो जाते हैं. प्रकृति के भी कुछ नियम हैं. मेडिकल साइंस चाहे कितनी भी तऱक्क़ी कर ले, यदि हम प्रकृति के विरुद्ध काम करेंगे, तो नुक़सान ही उठाएंगे.” इतनी-सी  भूल की इतनी बड़ी सज़ा! संदीप भी परेशान था. डॉक्टर की आवाज़ भी उसे अब सुनाई नहीं दे रही थी.

श्रुति डॉक्टर के चेंबर में ही फफक-फफककर रोने लगी. श्रुति सोचने लगी कि आख़िर इतनी बड़ी ग़लती उससे कैसे हो गई? मां बनने की नैसर्गिक उम्र को उसने भी तो टाला था, पर अब क्या हो सकता था. उसे अपराधबोध हो रहा था कि वो कितनी स्वार्थी हो गई थी. स़िर्फ अपने बारे में सोचती रही. मम्मी-पापा और संदीप किसी की भी भावना की उसने परवाह नहीं की, यहां तक कि अपने मम्मी-पापा की भी उसने कहां सुनी थी?

श्रुति को अपनी वो सारी सहेलियां याद आ रही थीं, जिन्होंने जॉब करते हुए संतानों को जन्म दिया और उनकी परवरिश की. उनमें कहीं भी संस्कारों की कमी न थी, न ही जॉब में उन सहेलियों ने कुछ गंवाया था. श्रुति को अब लगने लगा था कि नौकरी करते हुए भी बच्चे की अच्छी परवरिश की जा सकती है. बस, ज़रूरत है घरवालों के सहयोग की, टाइम मैनेजमेंट की और क्वालिटी टाइम बच्चों के साथ बिताने की, पर अब पछताने से क्या होनेवाला था.

अगली सुबह फोन की घंटी बजी. श्रुति ने फोन उठाया. फोन पर उसकी गायनाकोलॉजिस्ट थी. “आपका इलाज संभव है. मैंने दोबारा से रिपोर्ट्स देखी हैं.” श्रुति में मानो नवजीवन का संचार हुआ. वो जल्दी से डॉक्टर के पास जाने के लिए तैयार होने लगी. उसने ठान लिया था कि इस बार वो प्रकृति के विरुद्ध नहीं जाएगी.

Poonam Mehta

       पूनम मेहता

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कहानी- तोहफ़ा (Short Story- Tohfa)

Short Story, Tohfa

Short Story, Tohfa

“… मुझे यही सही लगा कि आपके जन्मदिन के अवसर पर आपको अपना परिवार तोहफे के रूप में लौटाऊं. मैं भइया-भाभी को साथ ले आई. अब यही हमारे माता-पिता हैं. घर के बड़े हैं. इनके आशीर्वाद के बिना हमारा परिवार और हमारा प्यार अधूरा है. आगे आप जैसा ठीक समझें.”

“नम्रता, सच में तुम मेरी सच्ची जीवनसंगिनी हो. मुझे इससे अनमोल तोहफ़ा मिल ही नहीं सकता था. मैं स़िर्फ तुमसे प्यार ही नहीं करता अब, बल्कि बेहद सम्मान भी करता हूं.”

दिल्ली की ओर उड़ान भर रहा विमान शीघ्र ही आकाश की ऊंचाइयों में समाने लगा. नम्रता उस उड़ान की विमान परिचारिका थी. विमान में दो यात्री ऐसे भी थे, जिनके बारे में ख़ास हिदायतें नम्रता को दी गई थीं. ये थे चार साल की गुड्डी और सात साल का दीपू. ये दोनों मुंबई के एक स्कूल में पढ़ते थे और उसी स्कूल के छात्रावास में रहते थे. वहां की वार्डन ने ख़ासतौर पर बच्चों को संभालने के लिए कहा था.

नम्रता अन्य यात्रियों की सुख-सुविधाएं पूछने के बाद बच्चों के पास ही आकर बैठ जाती और उनसे बातें करने लगती. वह सोच रही थी कि इतने छोटे बच्चों को माता-पिता छात्रावास में कैसे डाल देते हैं? जब उससे रहा नहीं गया, तो उसने पूछ ही लिया, “दीपू, तुम्हारे माता-पिता दिल्ली में हैं?”

दीपू ने अपनी बड़ी-बड़ी मासूम आंखों से नम्रता की ओर देखकर कहा, “ हां, मेरे पिताजी दिल्ली में हैं और वे कहते हैं कि मां चंदामामा के पास गई हैं. जब हम पढ़कर बड़े हो जाएंगे, तो मां बड़ी ख़ुश होंगी और वापस आ जाएंगी.”

नम्रता को बच्चों की मासूमियत पर प्यार आ गया. दिल्ली पहुंचने पर नम्रता दीपू और गुड्डी के साथ उनके पिता का इंतज़ार कर रही थी. शाम ढल रही थी, तो नम्रता ने कहा, “दीपू, तुम्हें घर का पता मालूम है?”

दीपू ने जेब से झट से कार्ड निकालकर नम्रता को दे दिया. पता पढ़कर नम्रता बोली, “मेरा घर भी उसी रास्ते पर है, मैं तुम्हें घर छोड़कर आगे चली जाऊंगी.”

नम्रता की टैक्सी एक विशाल कोठी के आगे जाकर खड़ी हो गई. नौकर ने दौड़कर गेट खोला और नम्रता से बोला, “साहब बच्चों को लेने ही गए हैं, वो अभी आते ही होंगे.”

नम्रता ने जब बैठक में क़दम रखा, तो भव्य साज-सज्जा को देखकर वह खो सी गई. तभी बच्चों की आवाज़ ने उसे चौंका दिया, “पापा आ गए… पापा आ गए…” नम्रता उठकर खड़ी हो गई. तभी 28-29 साल के आकर्षक व्यक्ति ने बैठक में प्रवेश किया. नम्रता ने मुस्कुराकर हाथ जोड़ दिए.

उस व्यक्ति ने धीमे स्वर में कहा, “मुझे अशोक कहते हैं. दरअसल, रास्ते में जुलूस जा रहा था, इसलिए मुझे आने में देर हो गई. आपको कष्ट तो हुआ होगा.”

“नहीं-नहीं…” नम्रता ने सकुचाकर  कहा और उसके गोरे कपोल गुलाबी हो गए. अशोक उसकी सुंदरता पर मुग्ध होकर निहारता रहा.

चंद क्षणों के बाद नम्रता ने कहा, “मेरी टैक्सी बाहर खड़ी है, मैं अब जाती हूं.”

बच्चों ने नम्रता का हाथ पकड़कर कहा, “फिर आओगी न दीदी?” नम्रता ने हंसकर कहा, “हां, ज़रूर आऊंगी.”

रास्ते में नम्रता अशोक के आकर्षक व्यक्तित्व के बारे में ही सोच रही थी. उधर अशोक बच्चों को पाकर बहुत ख़ुश थे. एक दिन अशोक एक दुकान से निकल रहे थे, तो अचानक उनकी नम्रता से भेंट हो गई. बच्चों ने तो दीदी-दीदी कहकर उसे घेर लिया. अशोक के बहुत आग्रह करने पर उसने दोपहर का भोजन उनके साथ ही किया.

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अब अक्सर अशोक और नम्रता की बात होने लगी थी. अशोक ने नम्रता को गुड्डी के जन्मदिन पर बुलाया. नम्रता सुबह से ही जन्मदिन की तैयारी कर रही थी. एक बात उसे हैरान कर रही थी कि पूरे घर में उसे कहीं भी अशोक की पत्नी की कोई तस्वीर नहीं दिखी.

धीरे-धीरे नम्रता और अशोक की मुलाकातें बढ़ने लगीं. दोनों को जीवन में मुहब्बत का एहसास होने लगा. अशोक के कोरे मन पर एक हसीन तस्वीर बन गई थी और आंखों में सपने पलने लगे थे. एक अजीब बात नम्रता ने यह महसूस की कि अशोक उससे कुछ कहना चाहते थे, पर कह नहीं पाते.

नम्रता ने सोचा क्यों न वो ख़ुद ही अशोक से उनकी उलझन के बारे में पूछ ले, “अशोक, मुझे अधिकार तो नहीं, पर कोई तो बात है, जो आपको परेशान किए रहती है. आपने अपने बारे में तो कुछ नहीं बताया… यानी अपनी पत्नी के बारे में?”

“आपने पूछा नहीं, तो मैंने बताया नहीं. लेकिन समय आने पर ज़रूर बताऊंगा नम्रता. अभी तो यही कह पाऊंगा कि इन बिन मां के बच्चों का सब कुछ मैं ही हूं.”

इस बीच अशोक यह महसूस कर रहे थे कि अब नम्रता के बिना जीना उनके लिए मुश्किल था. उन्होंने नम्रता से अपने मन की बात कहने की ठान ली, “नम्रता क्या तुम मुझे अपना जीवनसाथी बनाना पसंद करोगी? वैसे तो मैं तुम्हारे योग्य नहीं हूं, क्योंकि मेरे दो बच्चे हैं. बहुत-सी लड़कियां आई थीं शादी का प्रस्ताव लेकर… मगर बच्चे देखकर लौट गईं. पर बच्चे तुम्हें बहुत प्यार करते हैं.  इसलिए पूछने का साहस कर सका. वैसे कोई ज़बर्दस्ती नहीं है.”

“नहीं… नहीं.. अशोक. यह बात नहीं है. ये दोनों तो बहुत प्यारे बच्चे हैं, पर फिर भी मुझे अपने परिवारवालों से पूछना ही पड़ेगा.”

“हां नम्रता, मैं तुम्हें सोचने का पूरा मौक़ा दूंगा. ऐसी कोई जल्दी भी नहीं है. वैसे भी इस बीच मुझे काम के सिलसिले में आगरा जाना है. वहां दो-चार दिन लग जाएंगे. क्या तुम तब तक बच्चों का ख़्याल रखोगी प्लीज़?”

“हां, क्यों नहीं.” कहकर नम्रता विदा लेकर चली गई. नम्रता अशोक के घर रोज़ आती और घंटों बच्चों के साथ रहती. अशोक को आगरा गए आठ दिन हो गए थे. नम्रता अशोक को फोन करने के बारे में सोच ही रही थी कि तभी अशोक की गाड़ी आ गई. आवाज़ सुनकर नम्रता संभलकर बैठ गई.

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“पापा आ गए…” कहते हुए दीपू और गुड्डी बाहर भाग गए. अशोक ने कमरे में प्रवेश किया, तो नम्रता को देखकर बहुत ख़ुश हुआ. नम्रता की आंखें शर्म से झुक गई और चेहरा सुर्ख़ हो गया. अशोक ने मुस्कुराते हुए पूछा, “इसका मतलब मैं ‘हां’ में लूं या ‘ना’ में?”

नम्रता ने दोनों हाथों से अपना चेहरा छिपा लिया और ‘हां’ में गर्दन हिला दी.

“यह हुई न बात.” कहकर अशोक ने दीपू और गुड्डी को दोनों हाथों से उठा लिया. उसी व़क्त रामू मिठाई की प्लेट लेकर आ गया.

कुछ दिनों बाद ही अशोक की कोठी दुल्हन की तरह सजी हुई थी. नम्रता शादी के जोड़े में बहुत हसीन लग रही थी. शादी भी धूमधाम से हो गई.

अशोक अपने कमरे में गए, जहां नम्रता  सजी हुई सेज पर बैठी हुई थी. दोनों बच्चे उसके पास बैठे थे. वह प्यार से उन्हें समझा रही थी, “बेटे, अब मुझे मम्मी कहना.”

अशोक ने बच्चों को प्यार करते हुए कहा, “बेटे, मम्मी ठीक कह रही हैं.”

नम्रता अशोक को देखकर शरमा गई. थोड़ी देर बाद अशोक बोला, “बच्चों रात बहुत हो गई. अब आप लोग जाकर सो जाओ.” बच्चे उन दोनों को प्यार करके चले गए.

रात के क़रीब तीन बजे अशोक के कमरे की खिड़की पर कोई ठक-ठक कर रहा था. वह झटके से उठ बैठा. नम्रता गहरी नींद में सो रही थी. अशोक ने खिड़की के पास एक साया देखा और धीरे-से दरवाज़ा खोला. फिर वह उस साये के पीछे-पीछे चल पड़ा. साया भागकर अंधेरे में बगीचे के पास खड़ा हो गया. अशोक ने भागकर उसे पकड़ लिया और ग़ुस्से में बोला, “तुम यहां क्यों आए हो?”

“अशोक, मैं 20 तारी़ख़ को जेल से छूटा हूं.”

“कौन-सा बड़ा काम करके आए हो.”

“ऐसा मत कहो, अशोक. मुझे माफ़ कर दो… मुझे मेरे बच्चों से मिला दो.”

“नहीं, मैं तुम्हें बच्चों से नहीं मिलने दूंगा. क्या बच्चों की भी ज़िंदगी बर्बाद करना चाहते हो?”

“अशोक, मेरे भाई… एक बार उनसे मिला दो. मैं तुम्हारे पैर पड़ता हूं.”

“तुम चले जाओ यहां से. इसी में सबकी भलाई है. तुम मेरे माता-पिता के हत्यारे हो. मैं तुम्हारी शक्ल तक नहीं देखना चाहता.”

“अशोक, क्या मां-पिताजी चल बसे? यह क्या अनर्थ हो गया.” कहकर वह साया फूट-फूटकर रोने लगा.

अशोक को उस पर दया आ गई, तो वह उसे उठाकर बोला, “भैया, मेरी आज ही शादी हुई है. भलाई इसी में है कि आप यहां से चले जाएं. वह क्या सोचेगी, उसे तो कुछ मालूम नहीं है.”

उसी समय कुछ आहट हुई, तो आलोक भाग गया. अशोक का नौकर रामू भागता हुआ वहां पहुंचा. “कौन था साहब, मुझे कुछ आहट-सी सुनाई पड़ी थी.”

अशोक ने उसे कड़ी हिदायत दी. “सतर्क रहना, कोई चोर था शायद.”

जब अशोक कमरे में पहुंचा, तो नम्रता बहुत डरी हुई थी. “मुझे अकेला छोड़कर आप कहां चले गए थे? और बाहर कोई था न? मैंने खिड़की से देखा था. आप अकेले बाहर क्यों गए? अगर कुछ हो जाता तो…” नम्रता की आंखों से आंसू बहने लगे.

अशोक ने उसे धैर्य बंधाते हुए कहा, “अरे, मैं तो यहीं था. कोई चोर था शायद.”

“अशोक, आप मुझसे कुछ छिपा रहे हो? मैंने आपको किसी से बातें करते हुए देखा है. अगर वह सचमुच चोर होता, तो आप इस तरह से बातें नहीं करते. मैंने सात फेरे लिए हैं आपके साथ. क्या अब भी मुझे अपना हमराज़ नहीं बनाएंगे आप?”

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“नहीं नम्रता, अब मैं तुमसे कुछ नहीं छिपाऊंगा. तुमने बिना किसी स्वार्थ के मुझसे प्यार किया और अब तुम मेरी जीवनसंगिनी हो. नम्रता, बाहर जिस व्यक्ति से मैं बात कर रहा था, वो मेरा बड़ा भाई आलोक है. दरअसल, वो बुरी संगत में पड़कर नशे के आदी हो चुके थे. मां-पिताजी ने यह सोचकर उनकी शादी करवाई कि शायद उनमें सुधार आ जाए, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ. ये दोनों बच्चे मेरे भाई आलोक के ही हैं. मेरी भाभी रजनी भी इनकी आदतों की वजह से मानसिक रूप से बीमार हो गई थीं. मैं उन्हीं से मिलने आगरा जाता था. आलोक भइया को ड्रग्स की तस्करी के इल्ज़ाम में सज़ा हो गई थी और इसी सदमे में मां-पिताजी भी गुज़र गए. बस, यही है मेरी सच्चाई. मुझे लगा न जाने तुम क्या सोचोगी मेरे परिवार के बारे में. एक ड्रग एडिक्ट और ड्रग डीलर का भाई, एक अपराधी का भाई हूं मैं. मुझे डर लगा रहता था कि कहीं मेरे परिवार की सच्चाई जानकर तुम मुझसे दूर न हो जाओ, इसलिए एक झिझक थी. आलोक भइया जेल से छूट गए हैं, लेकिन मैं तुमसे वादा करता हूं कि उनका साया तुम पर और अपने बच्चों पर नहीं पड़ने दूंगा.”

“अशोक, आप अकेले ही इतना सब सहते रहे. मुझे इस क़ाबिल भी नहीं समझा कि आपके दर्द को बांट सकूं? क्या मैं इतनी नासमझ हूं, जो आपके भाई के किए की सज़ा अपने प्यार को देती? ख़ैर, जो हो गया, उसे भूल जाइए. आपकी भाभी अब कैसी हैं?” नम्रता ने पूछा.

“वो अब पहले से बेहतर हैं.”

“अशोक, रात बहुत हो गई, अब सो जाइए. हम कल बात करेंगे. वैसे भी कल आपका जन्मदिन है. मैं आपको ख़ास तोहफ़ा देना चाहती हूं. जल्दी उठकर मंदिर जाऊंगी और अपने परिवार की सलामती की दुआ मांगूंगी. कोई बुरा साया हमारे बच्चों पर नहीं पड़ेगा.” यह कहकर नम्रता और अशोक सो गए.

सुबह होते ही अशोक ने देखा कि नम्रता  और बच्चे घर पर नहीं हैं. उसे याद आया कि वो मंदिर जानेवाली थी. शायद बच्चों को भी ले गई होगी. लेकिन दोपहर हो गई और फिर शाम होने लगी, तो अशोक का मन आशंकित हो उठा. कई तरह के विचार उसके मन में आने लगे. नम्रता का फोन भी नहीं लग रहा था. वो घबरा गया कि कहीं आलोक भइया ने तो कोई चाल नहीं चली.

शाम के 7 बज चुके थे. अशोक का मोबाइल बजा… अंजान नंबर से उसे एक फोन आया… ‘अगर अपने परिवार की सलामती चाहते हो, तो ठीक 8 बजे होटल सिटी पैलेस पहुंच जाना.’

अशोक ने बिना देर किए, गाड़ी निकाली और निकल पड़ा. होटल पहुंचते ही उसे वेटर ने एक चिट दी, जिस पर आगे बढ़ने के निर्देश लिखे थे. निर्देशों के अनुसार अशोक एक बड़े-से हॉल में पहुंचे, तो वहां अंधेरा था. जैसे ही अशोक ने नम्रता, गुड्डी, दीपू पुकारा तो मद्धिम रोशनी के साथ फूलों की बरसात होने लगी और ‘हैप्पी बर्थडे’ की आवाज़ से हॉल गूंज उठा. अशोक ने देखा, तो हैरान था. सामने उनके भइया-भाभी, गुड्डी, दीपू और नम्रता थी. इससे पहले कि अशोक कुछ पूछते, नम्रता ने ख़ुद ही कहना शुरू कर दिया, “अशोक, मुझे माफ़ करना कि आपसे बिना पूछे ही मैंने अकेले यह निर्णय ले लिया. लेकिन मैं रजनी भाभी से मिली और वहीं मुझे आलोक भइया भी मिले. भइया की आंखों में पछतावा साफ़ झलक रहा था. वो हालात के हाथों उस दलदल में फंस गए थे. अपनी पत्नी और बच्चों के लिए तड़प रहे थे. अपने भाई और अपने माता-पिता के प्यार को मिस कर रहे थे. अपने माता-पिता की मौत के लिए ख़ुद को ज़िम्मेदार मानकर फूट-फूटकर रो रहे थे. मुझे यही सही लगा कि आपके जन्मदिन के अवसर पर आपको अपना परिवार तोहफे के रूप में लौटाऊं. मैं भइया-भाभी को साथ ले आई. अब यही हमारे माता-पिता हैं. घर के बड़े हैं. इनके आशीर्वाद के बिना हमारा परिवार और हमारा प्यार अधूरा है. आगे आप जैसा ठीक समझें.”

“नम्रता, सच में तुम मेरी सच्ची जीवनसंगिनी हो. मुझे इससे अनमोल तोहफ़ा मिल ही नहीं सकता था. मैं स़िर्फ तुमसे प्यार ही नहीं करता अब, बल्कि बेहद सम्मान भी करता हूं.”

इसी बीच हंसी-ख़ुशी में आलोक और रजनी भी अपने प्यार को आंखों ही आंखों में फिर से तलाश रहे थे और दोनों बच्चे सबके बीच बेहद ख़ुश थे.

 

उषा किरन तलवार

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कहानी- बहू-बेटी (Short Story- Bahu-Beti)

 

Short Story- Bahu-Beti

”हमें अपनी लड़ाई स्वयं ही लड़नी है और इसके लिए पुरुषों के विरुद्ध झण्डा उठाने की भी ज़रूरत नहीं. हमें ही एक-दूसरे का सहारा बनना है, एक-दूसरे का दर्द पहचानना है. सौभाग्यवश आज की सास शिक्षित है. उसकी सोच संकुचित नहीं रह गई. अब वह घर बैठ हर समय बहू की नुक्ताचीनी करने में अपना समय नहीं गंवाती.”

जया स्वयं को उतना उत्साहित नहीं पा रही थी, जितना कि छह माह पश्‍चात् घर लौटने पर उसे होना चाहिए था. स्पष्ट कुछ भी नहीं था. बस लौटना था, इसलिए लौट रही है. अमेरिका का उसका छह माह का वीज़ा समाप्त होने पर था. यह समय वह अपनी बेटी, दामाद और दो नटखट नातिओं के संग बिता कर अब अपने घर आ रही थी. यहां भी भरा-पूरा परिवार है. एक ही घर के ऊपर-नीचे की मंज़िल में दोनों बेटे सपरिवार रहते हैं. मकान तो उसके पति का ही बनवाया हुआ है और यहां उसका

निरादर होता हो, ऐसा भी नहीं है. तो फिर मन क्यों उचाट है? पिता की मृत्यु के बाद बेटी ने बुलवा भेजा था, ताकि मन बहल जाए कुछ दिन, पर रहना तो आख़िर यहीं है. अपने वतन और अपने लोगों के बीच और यही उसे पसन्द भी है.

हवाई जहाज के उड़ान भरते ही उसने अपनी दृष्टि पासवाली छोटी-सी बन्द खिड़की के पास ग़ड़ा दी. हवाई टिकट बुक कराते समय वह सदैव ही खिड़की वाली सीट के लिए भी आवेदन कर देती है. केबिन के खिड़की से बाहर देखना उसे बहुत अच्छा लगता है. एकदम अलौकिक दृश्य- दूर तक फैला अनन्त. दूर- बहुत दूर एक होते पृथ्वी और आकाश- बस और कुछ नहीं. कहां दिखता है ये सब महानगरों की बहुमंज़िली इमारतों के बीच. बादलों के आ जाने पर हवाई जहाज उनके भी ऊपर चला जाता है. स़फेद रूई के फाहों जैसे बादलों के ऊपर यह दृश्य एकदम अलग होता है.

पहले तो ये नज़ारे सदैव ही उसके मन में पुलक जगा जाते थे, पर आज ये भी उसे अधिक समय तक नहीं बांध सके. वह आंखें मूंद अपने अतीत के गलियारों में घूमने लगी. कितना बदल गया है समय. जब उसका विवाह हुआ था तो सास अर्थात् बिना ताज की एकछत्र साम्राज्ञी. तिस पर उसकी सास तो कठोर और निर्मम भी थी. पति भी तो ऐसे नहीं थे कि कभी दबी ज़ुबान से ही पत्नी के पक्ष में बोल देते. घोर अन्याय तक की बात में भी ख़ामोश ही रहते. पुरुष जो ठहरे.

पर जया को अपने बड़े बेटे समीर का बहुत सहारा है. जाने किस मिट्टी का बना है वह. कभी किसी का दिल नहीं दुखाया होगा उसने. मां की पूरी देखभाल करता है और पत्नी वसुधा भी प्रसन्न है. और क्यों न हो? अपनी इच्छा से ही तो विवाह किया है दोनों ने. बैंगलौर में दोनों ने एक संग मैनेजमेन्ट का कोर्स किया है. दोस्ती हुई और विवाह का फ़ैसला कर लिया. कितना परेशान हो गए थे वे दोनों. ‘वसुधा को एक शब्द भी हिन्दी बोलनी नहीं आती’ बताया था समीर ने.

“अब हमें क्या अपने घर में अंग्रेज़ी बोलनी पड़ेगी? या फिर तमिल ही सीखनी पड़ेगी?” झुंझलाकर कहते उसके पिता.

पर ऐसा कुछ भी नहीं करना पड़ा था. सादे-से विवाह समारोह के पश्‍चात् बेटे-बहू ने प्रयत्न करके उसी शहर में नौकरी ढूंढ़ी और एक संग रहने का फैसला भी किया. वसुधा ने एक दिन भी महसूस नहीं होने दिया कि उन्हें अंग्रेज़ी सीखनी पड़ेगी, बल्कि सालभर के भीतर हिन्दी बोलने-समझने तो लगी ही थी, साथ में कुछ शब्द पंजाबी के भी सीख लिए थे. बहुत आदर-सम्मान करती थी सब का. उसके नौकरी करने से सास पर ही काम का सब बोझ न आन पड़े, इसलिए दिनभर के लिए आया की भी व्यवस्था कर दी थी और जल्द ही घर नन्हीं किलकारियों से भी गूंज उठा.

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इतना कुछ पाकर भी एक अरमान रह गया था जया के मन में. दूसरी बहू तो वह अपने कुल-गोत्र की ही लाएगी. अपने सब अरमान पूरे करेगी वह अपने बेटे रंजन के ज़रिए. पूरे रस्मो-रिवाज़ के साथ व्याह रचाएगी. बहुत-सी लड़कियों से मिलवाने के बाद ही रंजन ने माधवी को पसन्द किया था. पूरे विधि-विधान से विवाह सम्पन्न हुआ. जया ने बहू माधवी का बहुत खुलेदिल से स्वागत किया और अपनत्व देने का प्रयत्न किया. पर वह सबसे खिंची-खिंची अलग-थलग ही रहती. अपने कमरे में चुपचाप कुछ पढ़ती रहती अथवा रेडियो चला कर आंखें मूंदे लेटी रहती.

जया उससे बात करने का प्रयत्न भी करती लेकिन वह या तो चुप ही रहती अथवा रूखा, संक्षिप्त-सा उत्तर देकर चली जाती.

जया को अपने प्रति किया व्यवहार न अखरता, यदि रंजन-माधवी आपस में ही हंसी-ख़ुशी रह लेते, पर दोनों का ही मुंह अलग-अलग दिशा में रहता. वह यह भी नहीं कह सकती कि पूरा दोष माधवी का ही था. उसका बेटा भी तो कम आत्मकेन्द्रित नहीं. साथ ही पूरी तरह से पुरुष सत्तात्मक सोच भी थी उसकी. कहां ग़लती हो गई

उसके लालन-पालन में? संस्कार तो उसने अपने दोनों पुत्रों में एक-से ही डाले थे. वह इस आशा में थी कि मेरी परवाह भले ही न करे, लेकिन कम-से-कम अपनी पत्नी को तो प्यार करेगा. वह किसी तरह आपस

में ही सामंजस्य बिठा ले, यही सोचकर उसने ऊपर वाला हिस्सा उन्हें अलग रहने के लिए दे दिया.

प्रायः ऐसा होता है कि बहू सास से प्रताड़ना पाती है और अपना समय आने पर ब्याज सहित अपनी बहू से वसूलती है. पर जया ने इसके विपरीत यह तय किया कि जो कुछ उसने सहा-सुना, वह उसकी बहुओं के साथ न हो. वह उन्हें बेटियों-सा ही स्नेह देती. बड़ी से तो ख़ैर उसे कोई शिकायत नहीं थी. पर माधवी…? और जब उसे मालूम था कि वसुधा अपनी बीमार मां को देखने गई हुई है, तब भी क्यों उसे घर पहुंचने का उत्साह नहीं हो रहा? समीर उसे हवाई अड्डे लेने आया. रास्ते में उसने बताया कि रंजन और माधवी में तनातनी कुछ बढ़ी ही है, कम नहीं हुई और उनके बीच होते तकरार प्राय: ही नीचे सुनाई देते रहते हैं.

दूसरे दिन इतवार था. दोपहर के भोजन के पश्‍चात वह लेटी ही थी कि बाहर आहट हुई. बाहर के दरवाज़े की सांकल भी खुली. नीचे के हिस्से में उस व़क़्त कौन जा रहा है? यह देखने कमरे से बाहर आई तो पाया माधवी खड़ी है. द्वार के पास एक अटैचीकेस भी रखा है.

“कहां जा रही हो इस तपती दोपहरी में?” उसने पूछा.

“अभी सोचा नहीं.”

“मतलब?”

“आपके बेटे ने कहा है कि यह घर उसका है और मैं यहां से चली जाऊं.”

जया उसका हाथ थाम अपने कमरे में ले आई. उसे स्नेहपूर्वक अपने पास बिठाया और कहा.

“हां, अब बताओ.”

पर वह तो मुंह खोलने को ही तैयार नहीं थी.

“माधवी, तुम इस घर में व्याह कर आई हो. अतः अब यह घर उतना ही तुम्हारा है, जितना रंजन का.”

“घर तो आप लोगों का है, रंजन का है. मेरा कैसे हो सकता है?”

“फिर तो यह घर मेरा भी न हुआ. मैं भी तो तुम्हारी तरह बाहर से आई हूं… अच्छा, फिर यह बताओ मेरा और तुम्हारा घर कौन-सा है?”

माधवी चुप ही बैठी रही.

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“मां के घर सुनते रहे कि बेटी पराया धन है और ससुराल का घर तो पति का होता है, भले ही यह घर स्त्री ही तिनका-तिनका जोड़कर बनाती है. उस घर की दिन-रात देखभाल करती है. अपने से पहले पति और बच्चों की ज़रूरत पूरी करती है. फिर भी घर उसका नहीं. अच्छा, फिर यह बताओ उसका घर कौन-सा है?”

“क्या पता?” माधवी ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया.

“हमने कभी संग बैठ बातें नहीं की. दुख-सुख नहीं बांटा. चलो आज ही शुरुआत करते हैं…”

माधवी की तरफ़ से कुछ हरकत न पा जया ने ही आगे जोड़ा.

“मायके में जब भी तुम्हें कोई समस्या होती थी तो तुम मां से अथवा घर के किसी अन्य सदस्य से बात कर मन का बोझ

हल्का कर लेती थी न? वैसे ही आज भी कर लो… चलो पहले मैं ही तुम्हें आपबीती सुनाती हूं. तब तुम्हें शायद मन की बात कहने का हौसला मिल जाए.

मेरा विवाह हुआ तो मेरे साथ क्या होता था, जानती हो? शाम को बेटे के घर में घुसते ही दिनभर की शिकायतों का पुलिन्दा खोल कर बैठ जाती थीं अम्मा. कूप मण्डूक-सा ही जीवन जीया था उन्होंने और मैं सह शिक्षा में पढ़ी हुई थी. अत: अम्मा को तो मेरी हर बात नागवार गुज़रती. मेरी हर बात पर नुक्ताचीनी करतीं वह. पति के मित्रों के साथ हंसकर बात कर लेना उन्हें अक्षम्य अपराध लगता. पति भी तो ऐसे नहीं थे कि मां से कहते- ‘मां अब सिर ढंककर रहने का ज़माना नहीं रहा.’ अपनी पत्नी की हर बात, हर ज़रूरत को नज़रअंदाज़ कर अपने माता-पिता की ही हर बात सुनना- यही तो उस ज़माने में आदर्श बेटा होने का प्रमाण था.

यूं पूरा दोष अम्मा का भी नहीं था. पढ़ी-लिखी वह थीं नहीं. उस समय स्त्रियों की बातचीत का मुद्दा प्राय: इधर-उधर की शिकायतें, मीन-मेख निकालने का ही होता था. फिर उन्होंने स्वयं बहुत प्रताड़ना सही थी. युवावस्था में ही पति की मृत्यु हो गई.

पहले की महिला आर्थिक, सामाजिक रूप से पूर्णत: पति पर निर्भर थी तो ससुराल की सब धौंस चुपचाप सहती थी. पर अब शिक्षित होने पर वह उतनी निर्भर नहीं है. उसमें आत्मविश्‍वास भी आ चुका है तो वह ये सब क्यों सहे? पर सास की छवि आज भी वही है और इसका एक दुष्परिणाम यह हुआ है कि संयुक्त परिवार टूटने लगे हैं. जबकि दरअसल उनकी ज़रूरत बढ़ी है, कम नहीं हुई. मिल-जुलकर रहने से दोनों का ही लाभ है. मां के नौकरी करने पर छोटे बच्चे दादा-दादी की स्नेह की छत्रछाया में पलते हैं और वृद्धावस्था में बच्चे मां-बाप का सहारा बन जाते हैं.

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लड़की कितनी भी पढ़ी-लिखी हो, आधुनिक हो- परिचित माहौल को छोड़कर नई जगह में बसने का भय, एक झिझक तो होती ही है. उस पर यदि घर की प्रमुख स्त्री यानी सास विद्रोही खेमे में ही खड़ी हो तो समस्या और भी बढ़ जाती है. तुम्हारे मन में भी शायद मेरी यही छवि बनी हुई है.

सदियों से चली आ रही परम्परा को तोड़ना इतना आसान न भी हो, पर इतना तो हम कर ही सकते हैं कि नई नवेली दुल्हन का विशाल हृदय से स्वागत करें. यह तो संभव है कि हम आपस में मां-बेटी-सा रिश्ता कायम कर लें, दोस्ताना व्यवहार करें. एक-दूसरे के दुख-दर्द को समझें.

हमें अपनी लड़ाई स्वयं ही लड़नी है और इसके लिए पुरुषों के विरुद्ध झण्डा उठाने की भी ज़रूरत नहीं. हमें ही एक-दूसरे का सहारा बनना है, एक-दूसरे का दर्द पहचानना है. सौभाग्यवश आज की सास शिक्षित है. उसकी सोच संकुचित नहीं रह गई. अब वह घर बैठ हर समय बहू की नुक्ताचीनी करने में अपना समय नहीं गंवाती. उसकी अपनी रुचियां हैं, सामाजिक दायरा है.

अब आई बात रंजन और तुम्हारी. ज़िन्दगी की प्रत्येक समस्या का हल न हो तो भी अनेक का होता ही है, बशर्ते हम उसे शान्तिपूर्वक बैठ कर सुलझाने का प्रयत्न करें. यदि रंजन कुछ ग़लत करता है और सोचता है कि पुरुष होने के नाते अथवा इस घर का सदस्य होने के नाते उसकी मनमानी चल जाएगी तो वह ग़लत सोच रहा है. यदि वह तुम पर अन्यायपूर्ण बात थोपता है तो मैं तुम्हारे साथ हूं और उसकी मां होने के नाते सही राह दिखाना मेरा फ़र्ज़ है और यदि तुम  कोई ग़लती करोगी तो मैं तुम्हें भी डांट सकती हूं, क्योंकि तुम भी अब इसी घर की बेटी हो.”

जया खिसक कर माधवी के क़रीब आ गई और स्नेहपूर्वक उसे आलिंगनबद्ध कर लिया. माधवी एक पल के लिए रुकी रही. पर उसके चेहरे से लग रहा था कि ब़र्फ पिघल रही है. उसने पहले झिझकते हुए, फिर कस के जया का आलिंगन किया और अपना सिर उसके कंधे पर टिका कर आंखें मूंद लीं. फिर आंसुओं को पीते हुए बोली, “मां, मैंने तो हमेशा ही इस घर को और आप सभी को अपना समझा, पर इनका रूखा व्यवहार मुझे निराश करता चला गया. लेकिन धीरे-धीरे मैं बहुत-कुछ समझने और जानने लगी हूं. बस, एक परायेपन की फांस थी, जो आपने बहुत कुछ कह कर और प्रेम, अपनेपन से दूर कर दी है. सच, मैं ख़ुद को बेहद भाग्यशाली मानती हूं कि हमारा रिश्ता सास-बहू का नहीं, बल्कि मां-बेटी का है.”

जया प्यार से माधवी के सिर पर हाथ फेरने लगी.

Usha Drava

       उषा वधवा

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कहानी- सबक (Short Story- Sabak)

Short Story- Sabak

मुझे तो अभी-अभी जीवन का एक सबक मिला था कि चाहे रिश्ता जो भी हो, कभी एक तरफ़ की बात सुनकर किसी के बारे में कोई राय नहीं बना लेनी चाहिए, पता नहीं सच क्या हो.

सोसायटी के गार्डन में अपनी सहेलियों- तनु और रश्मि के साथ शाम की सैर करती हुई मैंने कोने में स्थित एक बेंच पर गुमसुम बैठी माया आंटी पर उड़ती हुई नज़र डाली. वे किसी सोच में गुम कुछ गंभीर व उदास लगीं. आंटी अक्सर यहीं मिलती हैं, ख़ूब बातें करती हैं. अंकल की पांच साल पहले मृत्यु हो गई थी. वे अपनी बेटी सोनल के साथ रहती हैं. सोनल की बेटी दसवीं क्लास में है और बेटा आठवीं में.

सोनल के पति अनिल की दस साल पहले एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी, तब से आंटी और सोनल से तीन साल छोटा उनका बेटा अनुज सोनल के साथ ही रहते हैं. गार्डन का हर चक्कर पूरा करने पर मेरा ध्यान आंटी की तरफ़ जा रहा था. वे आज कुछ ज़्यादा ही गंभीर थीं, नहीं तो हमें आवाज़ देकर बुला लिया होता. तनु और रश्मि तो सैर करके घर चली गईं, पर मेरा मन नहीं माना.

“हेलो आंटी!” कहते हुए मैं उनके पास ही बैठ गई. आंटी फीकी-सी हंसी हंसते हुए बोलीं, “आओ शुभा, कैसी हो?”

“मैं ठीक हूं आंटी. आज आप अकेली क्यों बैठी हैं? बाकी आंटी कहां हैं? आपकी सहेलियां?”

“वे सब सैर करके घर चली गईं.”

“आप नहीं गईं?”

“घर जाने का मन नहीं हुआ.”

“ओह! सोनल नहीं है घर पर?”

“नहीं, मूवी गई है बच्चों के साथ.”

“आप नहीं गईं?”

“मुझे कौन ले जाता है?” इससे ज़्यादा किसी के जीवन में हस्तक्षेप करना मुझे ठीक नहीं लगा, मैं चुप रही. पर आंटी ने ख़ुद ही अपने मन का गुबार निकालना शुरू कर दिया. जैसे-जैसे आंटी अपने मन की पीड़ा बांट रही थीं, मेरा दिल उनके प्रति असीम सहानुभूति से भरता जा रहा था.

आंटी कह रही थीं, “इस सोनल को सहारा देने के लिए सालों से इसके साथ रह रही हूं. आज जब इसके बच्चे बड़े हो गए, इसे मेरी ज़रूरत ही नहीं रही. कभी भी दोनों बच्चों को लेकर बाहर चली जाती है. कभी मूवी, कभी डिनर. मैं अनुज को नौकरी मिलते ही उसके साथ चली जाऊंगी. बेसहारा-सी पड़ी हूं, कोई और ठिकाना नहीं है न! नहीं तो इसके इतने नखरे क्यों उठाती. अभी तक उसके बच्चे छोटे थे. उसे हमारी ज़रूरत थी. उसका पति इतना पैसा छोड़कर गया है, तब भी उसे मुझ पर और अनुज पर ख़र्च करने में तकलीफ़ होती है.” मैं हैरान, दुखी-सी आंटी की बातें सुन रही थी.

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सोनल ऐसी है! मुझे तो जब भी मिली, सभ्य, कोमल स्वभाव की लगी. घर में अपनी मां के साथ उसका व्यवहार ऐसा है? मुझे मन-ही-मन उस पर ग़ुस्सा आया. अंधेरा होने लगा, तो आंटी को ज़बर्दस्ती वहां से उठाकर घर भेजकर मैं भी अपने घर लौट आई. फिर किसी काम में मन ही नहीं लगा. यही सोच रही थी कि वृद्धावस्था तो बहुत परेशानी की चीज़ है. अपनी बेटी पर आश्रित रहकर दिन-रात अपमान सहन करना आसान तो नहीं है, पर कोई बेटी अपनी मां के साथ दुर्व्यवहार कैसे कर पाती है! रह-रहकर आंटी का उदास चेहरा मेरी आंखों के आगे आ रहा था.

मुझे क्या करना चाहिए? सोनल से बात कर उसे समझाना ठीक रहेगा क्या? पर आजकल किसी के जीवन में हस्तक्षेप करना समझदारी तो नहीं है न! दो-चार दिन और निकल गए. आंटी उसके बाद भी मुझे गार्डन में दिखीं, पर बैठकर बातें करने का मौक़ा नहीं मिला. एक दिन आंटी नहीं थीं गार्डन में, अचानक सोनल दिखी. मैं हैरान हुई, वह भी मुस्कुराई. मैंने कहा, “तुम आज काफ़ी दिन बाद दिखी. आज आंटी नहीं आईं.”

“मां की किटी पार्टी है आज!”

“अच्छा?”

“हां, आज बच्चे भी बर्थडे पार्टी में गए हैं. मैंने सोचा मैं भी सैर पर निकल जाऊं.”

“अच्छा किया.” मैंने कहा तो उसने भी मेरे साथ क़दम बढ़ा दिए. वह मेरे बच्चों की पढ़ाई के बारे में पूछती रही. उसका सभ्य स्वभाव मुझे हमेशा अच्छा तो लगा था, पर आंटी की बातों के बाद मैं काफ़ी दुविधा में थी और उससे आंटी के बारे में बात करना चाहती थी. सैर के बाद मैंने कहा, “सोनल, पांच मिनट बेंच पर बैठें?”

“हां, क्यों नहीं!” हम दोनों बैठ गए. कैसे बात शुरू करूं, मैं सोच रही थी. आख़िर मैंने पूछ ही लिया, “अनुज को कहीं जॉब मिला?” सोनल के चेहरे पर दुख का एक साया-सा लहराता साफ़-साफ़ देखा मैंने. ठंडी सांस लेकर बोली, “मिलेगा उसे न जो ढ़ूंढ़ना चाहता हो! क्या बताऊं शुभा, घर-घर की कहानी है. छोड़ो, आज इतने दिनों बाद तुमसे मिली हूं. क्या अपना रोना लेकर बैठूं.”

“अरे नहीं, तुम मुझे अपने दिल की बात बता सकती हो, कुछ परेशानी है?”

“तुम्हें तो पता ही है, मेरे पति मेरा साथ बहुत जल्दी छोड़ गए, तब बच्चे कितने छोटे थे! मां अनुज और पिताजी के साथ मेरे पास रहने आ गई थीं कि मुझे सहारा रहेगा. पर मैं आज भी उस दिन को कोसती हूं, जब मां मेरे साथ रहने आई थीं.” मैं बुरी तरह चौंकी, “सच? क्या हुआ?”

“हमारा एक फ्लैट और दो दुकाने हैं. वहां से जो किराया आता है, उससे और मेरे पति की जो बीमा रक़म मिली, उससे मैंने घर-गृहस्थी और बच्चों की पढ़ाई संभाली हुई है. किसी तरह मैनेज कर ही लेती हूं.

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एक-दो बार मैंने कहीं जॉब भी किया, पर मुझे एक महीने में ही छोड़ना पड़ गया, क्योंकि अनुज और मां ने बच्चों को संभालने के लिए

साफ़-साफ़ मना कर दिया था. पिताजी नहीं रहे, तो मैं ही अपनी परेशानियां एक तरफ़ रख मां को संभालती रही. तुम्हें पता है शुभा, मां के तीन फ्लैट्स हैं, तीनों किराए पर दिए हैं. किराए का और पिताजी का काफ़ी पैसा मां के पास आता है, पर मां एक रुपया भी कभी मुझ पर या मेरे बच्चों पर ख़र्च नहीं करतीं. उनका सब कुछ अनुज के लिए है और अनुज! वह इतना कामचोर और निकम्मा है कि दिनभर बस टीवी या कंप्यूटर पर लगा रहता है. बच्चों को पढ़ना होता है, तो यही कहती रहती हूं कि टीवी की आवाज़ धीमी कर लो. फिर मां को यह इतना बुरा लगता है कि पूछो मत. खाने में मां और अनुज के इतने नखरे हैं कि बता नहीं सकती. मेड से भी दोनों बहुत किटकिट करते हैं. अपने ही घर में दम घुटता है मेरा, तो निकल जाती हूं कभी बच्चों को लेकर.

तीन-तीन किटी पार्टी है मां की. अपने और अनुज के लिए, सब तरह के मनोरंजन के लिए पर्याप्त धनराशि है मां के पास, पर कभी उनका हमारे ऊपर कुछ ख़र्च हो जाए, तो दिनभर सुनाती हैं. काश, सहारा देने के नाम पर मां हमारे पास न आतीं. मैं ज़्यादा चैन से जी लेती. वे कभी अपने फ्लैट में रहने के बारे में सोचती भी नहीं, क्योंकि वहां उनके ख़र्चे होंगे.

शुभा, आज सुबह मां ने बहुत सुनाया था, दिल भरा हुआ था. आज तुमसे सब कह दिया. पर प्लीज़, किसी को कहना मत. अपनी परेशानियां आज तक किसी को नहीं कही, कोई जल्दी यक़ीन भी तो नहीं कर पाएगा. जो सामने दिखता है, वही सच नहीं होता, बहुत कुछ अनदेखा रह जाता है. चलें?” आंखें पोंछते हुए सोनल ने कहा, तो मुझे भी अपनी आंखों की नमी का एहसास हुआ. हम दोनों अपनी-अपनी बिल्डिंग के रास्ते की तरफ़ बढ़ गए. मैंने उसे मुड़कर देखा. उसके थके सुस्त क़दमों से उसके दिल की उदासी महसूस हो रही थी मुझे. और मैं? मुझे तो अभी-अभी जीवन का एक सबक मिला था कि चाहे रिश्ता जो भी हो, कभी एक तरफ़ की बात सुनकर किसी के बारे में कोई राय नहीं बना लेनी चाहिए. पता नहीं सच क्या हो. दूसरा अपने अंदर पता नहीं कितने दुख समेटकर जी रहा हो. बुज़ुर्ग माता-पिता भी तो कर देते हैं न ग़लतियां! स़िर्फ बड़े होने से ही तो उनकी हर बात सही, सच नहीं हो जाती न!

Poonam ahmed

    पूनम अहमद

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कहानी- ऐेसे ना करो रुसवा (Short Story- Aise Na Karo Ruswa)

Short Story- Aise Na Karo Ruswa

“आश्‍चर्य है?… तुम इतना अच्छा अभिनय कर लेते हो? वह भी तब जब तुम्हारे और संध्या के बारे में पूरे कॉलेज में चर्चा है.” अपने मुंह से निकले व्यंग्य को वह रोक न सकी.

“लोगों की मुझे परवाह नहीं, पर तुम तो मुझे ऐेसे रुसवा मत करो. मैंने संध्या का साथ दिया था, क्योंकि वह मुसीबत में थी. बाकी के सारे आरोप, जो लोग मुझ पर लगा रहे हैं, ग़लत हैं.”

शाम के छह बजनेवाले थे. तेज़ गति से भागती ट्रेन पल-पल अपने लक्ष्य की तरफ़ बढ़ रही थी. साथ ही पीछे छूटता जा रहा था अचला का वर्तमान और मन समाहित होता जा रहा था अतीत के गलियारों में. मन के किसी कोने में दबी स्मृतियों की यंत्रणा असहनीय हो उठी. वह घबराकर पत्रिका में मन लगाने की कोशिश करने लगी. लेकिन यादें थीं, जो मन को अवश किए हुए थीं. उसने उचटती नज़रों से डिब्बे का अवलोकन किया.

लगभग 17-18 वर्ष की तीन लड़कियां सामने की बर्थ पर बैठी बातों में मशगूल थीं. उनकी बेफ़िक़्री और छोटी-छोटी बातों पर भी खुलकर हंसने का अंदाज़ बता रहा था कि वे सभी स्टूडेंट्स हैं.

अचानक उसके हाथों से पत्रिका फिसलकर एक लड़की के पैरों के पास जा गिरी. बड़ी शालीनता से उस लड़की ने पत्रिका उठाकर अचला को पकड़ा दी. “क्या नाम है तुम्हारा?” अचला ने स्नेह से पूछा.

“मेरा नाम अर्चना है और ये मेरी सहेलियां सुप्रिया और सोनाली हैं. हम तीनों दिल्ली के एक कॉलेज में फ़र्स्ट ईयर की स्टूडेंट्स हैं. छुट्टियों में पटना अपने-अपने घर जा रही हैं. आप भी…?”

“हां, मैं भी पटना जा रही हूं, लेकिन उसके बाद मुज़फ्फरपुर तक जाना है.”

वह देर तक लड़कियों से गपशप करती रही. खाना खाते ही थकी-हारी लड़कियां सो गईं, पर अचला की आंखों में नींद का नामोनिशान न था. एक बार फिर वह अतीत के गलियारों में भटकने लगी. औरत चाहे कितनी ही पाषाण हृदय क्यों न हो, पर अपने पहले प्यार को भुला नहीं पाती. शायद यही कारण था कि न चाहते हुए भी अनमोल की यादें बार-बार उसे तड़पा रही थीं.

जिस शक के कारण वह आवेश में आकर अपने प्यार को ठोकर मार आई थी, आज पंद्रह साल गुज़र जाने के बाद भी क्या उसे अपने जीवन, अपनी सोच से ठोकर मारकर निकाल पाई थी? शायद नहीं.

उस पल को अचला कभी भूल न सकी, जब उसके द्वारा लगाए गए आरोपों को सुनकर अनमोल का चेहरा ज़र्द पड़ गया था,  पर उसके चेहरे पर किसी को छलने का भाव न था. बस, था तो स़िर्फ एक आश्‍चर्यमिश्रित क्रोध और अपमानित होने का भाव. शायद उसे विश्‍वास ही नहीं हो रहा था कि उस पर भी ऐसे गंभीर आरोप लगाए जा सकते हैं, वह भी अचला द्वारा. उसने बहुत कोशिश की थी अचला को समझाने की, लेकिन अचला के सामने उसकी एक न चली.

पूरे पंद्रह वर्ष गुज़र गए. इन बरसों में अचला ने क्या कुछ नहीं पाया. अच्छी नौकरी के साथ-साथ सभी सुख-सुविधाएं. नहीं मिला तो जीवन की शांति और जीवन जीने का मक़सद. उसके शादी न करने के फैसले को बदलने के लिए मम्मी-पापा ने उसे बहुत समझाया. लेकिन अंततः दोनों  को ही उसकी ज़िद के आगे झुकना पड़ा. एक-एक कर तीनों भाइयों की शादियां हो गईं और जल्द ही वे सभी अपनी-अपनी दुनिया में रम गए.

उसके शादी न करने का दर्द लिए पहले मम्मी गई, फिर पापा भी ज़्यादा दिनों तक जीवित न रह सके. अचला की ज़िंदगी पूरी तरह वीरान हो गई. परिवारविहीन एकाकी और निर्लिप्त जीवन से कभी-कभी उसका मन बुरी तरह घबरा जाता. दिमाग़ चाहे जो तर्क दे, पर उसका दिल कहता उसने अपने पैरों पर ख़ुद ही कुल्हाड़ी मारी थी.

अचला को आज भी याद है, जब उसकी पहली मुलाक़ात अपने से दो वर्ष सीनियर अनमोल से हुई थी. कॉलेज में होनेवाले डिबेट में वह उसका प्रतिद्वंद्वी था. लंबी क़द-काठी का अनमोल जितना देखने में सुदर्शन था, उतना ही मेधावी भी था. अपनी पढ़ाई-लिखाई के साथ, सौम्य, शांत और मिलनसार स्वभाव के कारण वह पूरे कॉलेज में काफ़ी लोकप्रिय था.

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डिबेट वाले दिन वह निश्‍चित समय पर बड़े ही आत्मविश्‍वास के साथ अनमोल के सामने जा खड़ी हुई थी. डिबेट शुरू होते ही दोनों अपना-अपना पक्ष एक-दूसरे के सामने रखने लगे थे. दोनों के ही तर्क-वितर्क बता रहे थे कि दिए गए विषय के वे सशक्त वक्ता हैं. फिर भी थोड़ी देर में ही अचला का पलड़ा भारी पड़ने लगा था. उसके एक-एक शब्द अपने पक्ष को कथानक की भांति जीवंतता से प्रस्तुत कर रहे थे, जो श्रोताओं को ही नहीं, उसके प्रतिद्वंद्वी को भी किंकर्त्तव्यविमूढ़ करता जा रहा था. उस दिन अचला की तो जीत हुई, पर अनमोल अपना दिल हार बैठा.

उस दिन के बाद से अचला सबकी नज़र में प्रशंसा का पात्र बन गई. धीरे-धीरे बढ़ती मुलाक़ातों के साथ अचला-अनमोल एक-दूसरे के बेहद क़रीब आ गए.

उन्हीं दिनों हॉस्टल में बी.ए. द्वितीय वर्ष की एक छात्रा संध्या अचला की रूम पार्टनर बनकर आई. शबनम में नहाई गुलाब की पंखुड़ियों की तरह ताज़गी भरा उसका सौंदर्य अद्वितीय था. संध्या जितनी सुंदर थी, उतनी ही सौम्य और सीधी-सादी भी थी. हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार. बिना भेदभाव के वह अचला के भी कई छोटे-मोटे काम संभालने लगी. कुछ ही दिनों में दोनों के बीच सगी बहनों-सा प्यार हो गया. अचला को लगता कि ईश्‍वर ने उसके जीवन में छोटी बहन की कमी पूरी कर दी है. जब भी अनमोल की चर्चा होती, वह अक्सर किलक पड़ती, “हाय राम! कितने हैंडसम हैं आपके अनमोलजी. काश! आपसे पहले मेरी नज़र पड़ गई होती, तो ज़रूर उड़ा ले जाती.”

अचला प्यार से उसे डांट देती.

“चुप कर पगली… यह क्या हाय-हाय लगा रखी है. देखना, एक दिन तुझे अनमोल से ज़्यादा हैंडसम पति मिलेगा.”

“मेरे ऐसे भाग्य कहां? अभी तक तो ज़िंदगी ने हर मोड़ पर मुझे छला ही है.” एक उसास उसके गले से निकल पड़ती.

देखते-देखते समय पंख लगाकर उड़ गया. परीक्षाएं नज़दीक आ गईं. अचला सारी मौज़-मस्ती भूल परीक्षा की तैयारियों में व्यस्त हो गई. अब उसका ध्यान संध्या की तरफ़ कम ही रहता.

समय पर परीक्षाएं शुरू हो गईं. एक दिन अचला परीक्षा देकर लौटी तो संध्या से बोली, “चल संध्या, कहीं मौज़-मस्ती करते हैं. कुछ खाते-पीते हैं, अभी अगला पेपर पूरे एक ह़फ़्ते बाद है.”

“नहीं दी… आज नहीं, मेरी तबियत थोड़ी ठीक नहीं है.”

उसकी फीकी हंसी, उदास चेहरा और धीमी आवाज़ ने अचला को चौंका दिया, “क्या बात है संध्या? तुम इतनी बीमार-सी क्यों लग रही हो?”

अचला की सहानुभूति पाकर संध्या की आंखें भर आईं, जिसे देखकर अचला का कलेजा एक अनजानी आशंका से धड़क उठा. तभी अपने आंसुओं को पोंछकर, हंसकर संध्या बोली, “ऐसी कोई गंभीर बात नहीं है, जिसके लिए मैं आपको परेशान करूं. जिस दिन आपकी परीक्षा समाप्त हो जाएगी, दिल में दो महीने से जमा बातों का पुलिंदा आपके सामने ही तो बांचूंगी.”

संध्या के आश्‍वासन से आश्‍वस्त वह फिर से अपनी परीक्षा की तैयारी में जुट गई. जिस दिन अचला अंतिम पेपर देकर लौटी, तो उसे पता चला कि संध्या के मम्मी-पापा आकर उसे ले गए. यूं अचानक उससे मिले बिना संध्या का चले जाना उसे व्यथित कर गया.

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दूसरे दिन सुबह तैयार होकर वह चाय बनाने जा ही रही थी कि उसके बगल के कमरे में रहनेवाली सुनंदा आ गई. चुपचाप बैठी सुनंदा के चेहरे पर आते-जाते रंग अचला की उत्सुकता बढ़ा रहे थे, “क्या बात है सुनंदा? क्या तुम मुझसे कुछ कहना चाहती हो?”

“हां, तुमने ठीक समझा है. मैं पिछले कई दिनों से तुम्हें संध्या के विषय में कुछ बताना चाह रही थी, लेकिन तुम्हारी परीक्षा चल रही थी, इसलिए चुप रही. वैसे भी तुम संध्या को इतना प्यार करती हो कि उसके विषय में कुछ बताना मेरे लिए मुश्किल हो रहा था. जाने कैसे रिएक्ट करोगी?”

फिर थोड़ा रुककर बोली,  “शायद तुम्हें पता नहीं था कि संध्या मां बननेवाली थी. वह डॉक्टर के पास गई थी एबॉर्शन के लिए, वो भी अनमोल को साथ लेकर. डॉक्टर अनुराधा मेरी कज़िन है, जहां मैंने इन दोनों को देखा था. अनुराधा से ही मुझे सारी जानकारियां मिल गई थीं. इन दिनों अनमोल के साथ चिपकी जाने कहां-कहां घूमती रही थी. पूरे कॉलेज में लोग जाने कैसी-कैसी बातें कर रहे हैं.”

सुनंदा की बातों से आश्‍चर्य, शर्म और गहरी आत्मवेदना से छटपटा उठी थी अचला. सुनंदा के जाते ही धम्म् से अपने बिस्तर पर आ गिरी थी. उसका सारा शरीर जैसे सुन्न पड़ गया था. अब तक अनमोल पर रहा विश्‍वास तिनका-तिनका कर बिखरने लगा था. फिर भी हिम्मत जुटा अनमोल से मिलने चल दी थी. रास्ते में ही अनमोल उसे मिल गया था. मिलते ही बोला, “अच्छा हुआ जो तुम मुझे मिल गई, मैं तुमसे ही मिलने आ रहा था. मुझे तुमसे एक बहुत ही ज़रूरी बात करनी है, साथ ही संध्या का मैसेज भी देना है.”

“आश्‍चर्य है… तुम इतना अच्छा अभिनय कैसे कर लेते हो? वह भी तब जब तुम्हारे और संध्या के बारे में पूरे कॉलेज में चर्चा है.” अपने मुंह से निकले व्यंग्य को अचला रोक न सकी.

“लोगों की मुझे परवाह नहीं, पर तुम तो मुझे ऐसे रुसवा मत करो. मैंने संध्या का साथ दिया था, क्योंकि वह मुसीबत में थी. बाकी के सारे आरोप, जो लोग मुझ पर लगा रहे हैं, ग़लत हैं.”

ग़ुस्से से सुलगती अचला अनमोल पर बरस पड़ी, “मैं सोच भी नहीं सकती थी कि तुम्हारे व्यक्तित्व का एक पहलू इतना गिरा हुआ है. संध्या मेरी छोटी बहन जैसी थी. कैसे किया तुमने इतना बड़ा छल हम दोनों के साथ?”

“अचला… तुम मुझे ग़लत समझ रही हो. पहले मेरी पूरी बात सुन लो, फिर तुम्हारे दिल में जो आए, फैसला करना.” पर अनमोल की बातें सुनने के लिए अचला रुकी ही कहां थी.

अनमोल उसे पुकारता रहा, फिर भी अचला ने उसकी तरफ़ पलटकर भी नहीं देखा. मन में अनमोल को त्याग देने का कठोर ़फैसला कर अचला दूसरे ही दिन मुज़फ्फरपुर आ गई. उसके बाद से ही उसने अनमोल से अपने सारे संपर्क तोड़ डाले. न उसका कोई फ़ोन कॉल रिसीव किया, न ही उसे कोई कॉल किया. वैसा ही उसने संध्या के साथ भी किया.

जल्द ही अचला अपनी नई ज़िंदगी शुरू करने दिल्ली आ गई. धीरे-धीरे वह अपनी सारी पीड़ा, वेदना और कृतियों को नई दिशा देने में जुट गई. कुछ दिनों की कड़ी मेहनत के बाद वह इनकम टैक्स ऑफ़िसर का पद प्राप्त करने में सफल हो गई, जिसके साथ ही उसके जीवन में आमूल परिवर्तन आ गया. काम की व्यस्तता ने अतीत में हुए धोखे को भुलाना आसान कर दिया.

अचला के बड़े भैया अमित आजकल मुज़फ्फरपुर के एक कॉलेज में कार्यरत थे. भैया-भाभी के बार-बार अनुरोध करने पर वह एक लंबे अरसे के बाद मुज़फ्फरपुर जा रही थी. दोनों को सरप्राइज़ देने के चक्कर में उसने अपने आने की सूचना भी नहीं दी थी.

तभी एक हिचकोले के साथ ट्रेन रुक गई. पता चला, आगे कोई ट्रेन पटरी से उतर गई है. धीरे-धीरे सरकती ट्रेन के रात नौ बजे से पहले पटना पहुंचने के आसार नज़र नहीं आ रहे थे.

जाने कैसे उसके मन की बात और घबराहट को पढ़ अर्चना बोली, “आंटी, आप चिंता न करें. आज रात पटना में आप मेरे घर रुक जाइएगा और सुबह मुज़फ्फरपुर के लिए बस पकड़ लीजिएगा.”

वह असमंजस की स्थिति में थी. स्टेशन पर अर्चना के पापा उसे लेने आए थे. अर्चना से अचला के विषय में जानकारी मिलते ही बड़े सम्मान के साथ उन्होंने अचला से अपने घर रुकने का आग्रह किया, तो वह टाल न सकी.

जब फ्रेश होकर वह खाने के टेबल पर पहुंची, तो घर के लोग उसका ही इंतज़ार कर रहे थे. उसके साथ ही इंतज़ार कर रहा था एक ऐसा सरप्राइज़, जिसे देखते ही उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई. आगे बढ़कर डायनिंग टेबल का कोना न थामा होता, तो शायद गिर ही जाती. सामने की कुर्सी पर अनमोल बैठा था. अपने को संभालकर बैठी, तो अर्चना घर के सभी सदस्यों से परिचय कराते हुए अनमोल की तरफ़ मुड़ी. “यह मेरे सबसे छोटे चाचाजी अनमोल हैं. यहां के एक कॉर्पोरेशन में एम.डी. हैं.”

दोनों की आंखों में एक आश्‍चर्यमिश्रित झलक देख अर्चना बोली, “क्या आप दोनों एक-दूसरे को पहले से जानते हैं?”

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“ऑफ़कोर्स जानते हैं. यह मेरी क्लास मेट अचला है. मैं तुम्हारा शुक्रगुज़ार हूं कि तुमने मुझे अचला से मिलवा दिया.”

अचला चुपचाप खाने की कोशिश करने लगी, पर एक भी निवाला उसके गले के नीचे उतर नहीं रहा था. किसी तरह कुछ खा-पीकर अर्चना के बताए कमरे में सोने आई, तो पीछे-पीछे अनमोल भी आ गया. पास ही रखी कुर्सी खींचकर बैठते हुए बोला, “इतने साल बीत जाने के बाद अब मैं न तुम्हें कोई सफ़ाई देना चाहता हूं, न ही इसकी कोई ज़रूरत रही. बस, तुम्हारे नाम संध्या का एक पत्र आज तक मेरे पास पड़ा है, जिसे मैं तुम्हें सौंपना चाहता था. लेकिन तुम्हारे मन में अपने लिए उमड़ती घृणा के कारण मैंने कभी कोशिश ही नहीं की तुमसे मिलने की. संयोग से आज तुम मिल ही गई हो, तो तुम्हें वह पत्र दे रहा हूं.”

अपनी बातें समाप्त कर अनमोल ने जेब से एक पत्र निकालकर अचला को पकड़ा दिया. संध्या का पत्र देखकर अचला का सर्वांग सिहर उठा. हिम्मत करके कांपते हाथों से उसने पत्र खोला-

दीदी नमस्कार,

मैं नहीं जानती कि मैंने कौन-सा ऐसा पुण्य किया था, जो आप जैसी प्यार करनेवाली बहन मुझे मिली. उसी के साथ जाने कौन-सा ऐसा पाप भी कर आई थी, जो राघव जैसे लड़के से प्यार कर बैठी. जब मैं मां बननेवाली थी, उसी समय उसे अमेरिका जाने का मौक़ा मिला. मैं उसके सामने बहुत रोई, गिड़गिड़ाई कि वह मुझसे शादी करने के बाद अमेरिका चला जाए, लेकिन वह नहीं माना और चला गया.

मैं घोर संकट में थी. आपकी परीक्षा चल रही थी. दूसरा कोई मदद करनेवाला था नहीं, इसलिए मैंने सारा दर्द अनमोलजी के साथ बांटा. वे जी-जान से मेरी मदद में जुट गए. हम दोनों ने कई डॉक्टरों के चक्कर लगाए. एबॉर्शन करवाती, उसके पहले ही जाने कैसे वॉर्डन ने मेरी तबियत ख़राब होने की सूचना मेरे घर भिजवा दी. ज़बर्दस्ती मेरे मम्मी-पापा आकर मुझे घर ले जा रहे हैं. जब आपकी परीक्षा समाप्त हो जाएगी, अनमोलजी यह पत्र आपको दे देंगे. आप कैसे भी करके यहां आकर मुझे ले जाइएगा, वरना मेरी सौतेली मां मेरी क्या दुर्दशा करेगी, यह मुझे ख़ुद भी नहीं मालूम. प्लीज़ दीदी, इस संकट से मुझे उबार लीजिए. आपके इंतज़ार में…

आपकी छोटी बहन,

संध्या

पत्र पढ़कर स्तब्ध अचला स़िर्फ इतना ही बोल पाई, “अब कहां है संध्या?”

“तुम्हारे हॉस्टल छोड़ने के पंद्रह दिन बाद उसने आत्महत्या कर ली. इसके साथ ही तुमसे और तुम्हारे प्यार से मेरा मोहभंग हो गया. संध्या मेरी छोटी बहन जैसी थी, उसे बचाने के लिए मैंने काफ़ी बदनामियां भी झेलीं, फिर भी उसे बचा नहीं पाया. काश! तुमने मुझ पर थोड़ा-सा भी भरोसा किया होता. संध्या के जाने के बाद मुझे तुमसे इतनी नफ़रत हो गई कि मैंने सारी ज़िंदगी शादी न करने का फैसला कर लिया.”

अनमोल की बातें समाप्त होते-होते, अचला का मन हाहाकार कर उठा.  बरसों से मन में दबी पीड़ा आंसुओं का सैलाब बन आंखों से उमड़ पड़ी. वह फूट-फूटकर रोती रही. थोड़ी संभली तो बोली, “कितनी तड़पी होगी संध्या मेरे इंतज़ार में. कितनी मजबूरी और निराशा में उसने इस दुनिया का मोह छोड़, मौत को गले लगाया होगा. मैं मरकर भी उसके प्यार का कर्ज़ नहीं चुका सकती. हे भगवान! मैं क्या करूं? मेरी ग़लती माफ़ी के लायक ही नहीं है.”

पश्‍चाताप की आग में झुलसती अचला का बुरा हाल देख अनमोल से चुप नहीं रहा गया.

“ख़ुद को संभालो अचला. मैं शायद तुम्हें कभी माफ़ न करता, लेकिन अपनी ग़लती के पश्‍चाताप में तुम्हें टूटकर बिखरते देख मुझे लगने लगा है कि यदि आज मैंने तुम्हें माफ़ नहीं किया, तो शायद इतिहास ख़ुद को दोहरा देगा.”

अचला के सब्र का बांध भी टूट चुका था. वह अचानक उठकर अनमोल की बांहों में समा गई. अनमोल भी अपने आंसुओं को रोक न सका.

Rita kumari

       रीता कुमारी

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कहानी- अंधकार की किरण (Short Story- Andhkar Ki Kiran)

Short Story- Andhkar Ki Kiran

भविष्य की तो कौन जानता है, पर किशोरवय की चंचलता के कारण उन्हें कई बार मां की ही नहीं, पिता की भी डांट खानी पड़ती. मां-पिता भविष्य देखते थे और वे किशोरियां वर्तमान, जिसमें भरे होते सपने-ही-सपने. असत्य तो उन सपनों के बीच समाता ही न था. हर लड़का राजा, हर लड़की रानी. काश कि बचपन वहीं ठहर जाता.

जैसे ही तांगा गली के मोड़ पर मुड़ा, सत्या का दिल बैठने लगा था. ऐसा नहीं था कि वह इस शहर में पहली बार आई हो. यहां तो उसके बचपन से लेकर किशोरवय तक के किलकते-हंसते दिन बीते थे. जीवन के सबसे सुखद सपने उसने और मीरा ने यहीं देखे थे. वह तो ऐसी उम्र थी जब वह सत्य और कल्पना में भेद नहीं कर पाती थी. सारी कल्पनाएं उसे सुनहरी और सत्य लगती थीं. मीरा और वह घंटों बतियाती रहतीं, पर उनमें कभी कहीं कोई निराशा की गंध नहीं होती थी. भविष्य की तो कौन जानता है, पर किशोरवय की चंचलता के कारण उन्हें कई बार मां की ही नहीं, पिता की भी डांट खानी पड़ती. मां-पिता भविष्य देखते थे और वे किशोरियां वर्तमान, जिसमें भरे होते सपने-ही-सपने. असत्य तो उन सपनों के बीच समाता ही न था. हर लड़का राजा, हर लड़की रानी. काश कि बचपन वहीं ठहर जाता.

बचपन कब रू-ब-रू नहीं हो पाया है ज़िंदगी की धुंधली राहों से. ज़िंदगी के हर मोड़ पर वह खड़ा हो जाता है.

उनके घर कितने छोटे थे और सपने कितने बड़े. छोटे घरों में बड़े सपने देखना कोई गुनाह तो नहीं था.

तांगे वाले ने फिर पूछा, “कहां तक जाना है बहनजी?”

“आगे तो चलो अभी.”

सर्दी का सूरज साढ़े चार बजते-बजते धुंधला गया था. छोटा शहर, भीड़-भाड़ से दूर, इस कॉलोनी की गली में इक्का-दुक्का लोग ही चलते नज़र आ रहे थे. तांगे के घोड़े की टाप सुन कुछ लोग घर के बाहर निकल-निकलकर देखने भी लगे थे. सत्या की आंखें मकानों के नम्बरों पर टिकी थीं और मन बिजली की गति से दौड़ रहा था.

“मीरा सुना है, पिताजी का ट्रांसफर होनेवाला है.”

“ये….! नहीं यह नहीं हो सकता.” मीरा एकदम तिलमिला उठी थी. सत्या के पिता का ट्रांसफर होने का अर्थ है सहेली सत्या का भी चले जाना. वह यहां पर इसीलिए तो है कि उसके पिता यहां बैंक अधिकारी हैं. पिछले सात वर्षों से वे यहीं टिके हैं. मीरा के पिता का तो व्यवसाय ही यहां है. दोनों सखियों के घर नज़दीक थे. वे आसानी से एक-दूसरे के घर किसी भी समय आ-जा सकती थीं. एक ही स्कूल में पढ़ने के कारण उनकी मित्रता और भी गहरी हो गई थी. मीरा और सत्या की दोस्ती में कोई दुराव-छिपाव नहीं था. छोटी-से-छोटी चीज़ भी वे एक-दूसरे को दिखाने दौड़ पड़तीं. पहनने-ओढ़ने, किताब-कॉपी, एक जैसे बस्ते, एक जैसे कपड़े, एक जैसी किताबें और एक जैसा खाना, एक जैसी पसंद, एक जैसा फैशन.

समय नदी की धार बन बहता रहा. उस धारा में बह गये थे बड़े-बड़े समय के पत्थर. पिता की बदली के संग बिछुड़ गई थीं दोनों सखियां-सत्या और मीरा. दोनों की पढ़ाई पूरी हुई. फिर शादियां हुईं. एक-दूसरे के घर शादी के निमंत्रण आये थे. कोई जा तो नहीं सका था. केवल शुभकामनाओं के पत्र भेज दिए गए थे.

मीरा अपनी शादी के आठ दिन बाद ही सत्या की शादी का बहुत ही सादा-सा निमंत्रण पत्र देख हैरान रह गई थी. सत्या की शादी साहिल से? साहिल सत्या के साथ पढ़ने वाला लड़का था. निरंतर रहनेवाले पत्र-व्यवहार में दोनों सहेलियों को एक-दूसरे की पूरी जानकारी रहती थी. साहिल का ज़िक्र तो सत्या ने कई पत्रों में किया था, पर बात यहां तक बढ़ जाएगी, यह अंदाज़ा उसे नहीं था. मीरा को इस बात पर कुछ क्रोध भी आया-सत्या की बच्ची इतनी बड़ी बात मुझसे छुपा गई.

मीरा ने जब अपनी सहेली को क्रोध और उलाहने से भरा पत्र लिखा तो उसका छोटा-सा उत्तर क्षमा प्रार्थना के साथ आया था-

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सत्या, साहिल के साथ शादी की बात छिपा लेने का कारण यह था कि हम दोनों के परिवार तो इस शादी के लिए राज़ी थे, पर दोनों की बिरादरी इस रिश्ते को नहीं स्वीकार पाई. शादी के दूसरे ही दिन लोगों की भीड़ ने हमारे घर पर हमला बोल दिया. मां-पिता ने हमें पिछले रास्ते से भगा दिया. हम भागकर ट्रेन में चढ़े और एक अन्य दोस्त के यहां महीने भर छिपे रहे. फिर दूसरे रिश्तेदार के यहां रहे. इस बीच हमारे लंदन जाने का इंतज़ाम हो गया. आगे की कहानी तुम्हें मेरे पिता ने बताई ही होगी.

साहिल की ओर मेरा आकर्षण तो था, किन्तु पिता ने वचन लिया था कि जब तक मैं तुम्हारी शादी न कर दूं तब तक तुम अपनी मां से भी यह बात नहीं कहोगी. और मां को तब बतलाया गया, जब हम दोनों कोर्ट में शादी करके घर लौटे. पिता के साहस, उदारता और प्यार के आगे मैं नतमस्तक हूं मीरा. उन्हें भी बिरादरी के बंदों का डर था, वही हुआ. भड़के लोगों ने घर ही नहीं तोड़ा पिता के हाथ-पैर भी तोड़ दिए थे. वे छ: माह बिस्तर पर पड़े रहे. वो तो कुछ भले मानसों ने उन्हें बचा लिया.

हम लंदन के लिए रवाना हों, उसके पहले ही मेरे पेट में दर्द होने लगा. इतना भारी दर्द मैं सह नहीं सकी. प्रथम मातृत्व का दर्द सातवें मास में ही उठा और बेटे का जन्म हो गया. इतने कमज़ोर, समय से पूर्व जन्मे बच्चे को बीस दिन अस्पताल में ही रखा गया. फिर आठ दिन मां के दूध पर पला. हमें लंदन जाना था. इतने छोटे कमज़ोर बच्चे को सम्भालना भी कठिन था. अभी तक हम समाज की नज़रों से छिपकर रह रहे थे. पिता या ससुर के घर मैं जा नहीं सकती थी. दोनों घरों में बार-बार धमकी भरे पत्र मिल रहे थे कि अब जब भी लड़का या लड़की हमें घर में दिखाई देंगे, हम उन्हें ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे. धर्म के ठेकेदारों का यह जुनून दो प्रेमियों के साथ-साथ दो परिवारों को भी नष्ट कर रहा था.

समझदार परिवारों ने दोनों बच्चों को बचाने के लिए पहले तो देश में ही आठ माह छिपाकर रखा, फिर विदेश भेजने की व्यवस्था कर दी. उन्होंने सोचा कुछ साल यहां से दूर चले जायेंगे, तब तक लोगों का क्रोध शांत हो जाएगा. किन्तु अब तीन सप्ताह के बच्चे की समस्या थी. इतने छोटे कमज़ोर बच्चे को प्लेन में ले जाने की अनुमति भी नहीं मिली. कुछ मित्रों ने सुझाया, बच्चे को किसी बालगृह में दे दो. इस बात पर मैं और साहिल दोनों ही राज़ी नहीं हुए. मेरा तो रोते-रोते बुरा हाल था.

“पापा, मैं छिपकर भागना नहीं चाहती. मैं उनका सामना करूंगी, जो हमें बरबाद करने पर तुले हैं.”

“बेटी, मैं तु्झे कैसे समझाऊं. भीड़ और क्रोध की बुद्धि नहीं होती. विवेक नहीं होता.”

“पापा उनका सामना करने के लिए हमें एक मौक़ा तो दो.”

“बेटी अपनी टांगें सदा के लिए खोकर मैं ऐसी चुनौती कैसे ले सकता हूं. अपनी आंखों की ज्योति को मैं आग में नहीं झोंक सकता.”

साहिल और सत्या के पिता भी लोगों की नज़रें बचाकर मिलते थे. अपने बच्चों को बचाये रखने की योजना वे दिन-रात बनाते रहे. भारी विडम्बना यह थी कि जिन्हें लड़ना चाहिए था, वे तो गले मिल रहे थे और लड़ रहे थे वे, जिन्हें इनसे कोई लेना-देना नहीं था.

घर और बाहर जलती आग के बीच उस छोटे बच्चे को मीरा के घर रातोंरात पहुंचाया गया था. आधी रात को चलने वाली गाड़ी से सत्या के मां-पिता बच्चे को लेकर जब मीरा के घर मुंह अंधेरे पहुंचे तो उन्हें देख वह हैरान रह गई.

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अपनी प्राणप्रिय सहेली के माता-पिता को इस संकट से उबारने के लिए उसने बच्चे को स्वीकार कर लिया. उस समय उसकी अपनी दो साल की एक बेटी थी. बच्चे को उसने अपने दूध से  ही नहीं, प्राणों से सींचा, उसकी किलकारियों में तो वह भूल भी गई कि बच्चे को जन्म देनेवाली मां वह नहीं है. और एक दिन तो ऐसा आया, जब उसे मां-पिता का नाम भी देना पड़ा. बड़ा होता जलज अपने मां-पिता इन्हीं को समझता रहा. स्कूल के कॉलेज के रजिस्टरों में पिता मीरा के पति थे. सारी स्थिति-परिस्थिति को समझकर मीरा के पति ने बहुत समझदारी से काम लिया. उन्हें सत्या का परिचय अपनी पत्नी मीरा से ही मिला था. मीरा के लिए सत्या का परिचय देना केवल एक सहेली का परिचय नहीं था. वह परिचय उसके जान-प्राण का परिचय था. मीरा के परिचय वर्णन से ही वे सत्या की तस्वीर मन में बनाकर उसका सम्मान करने लगे थे. अपनी पत्नी का भी वे सम्पूर्ण हृदय से प्यार और आदर करते थे. उसकी किसी बात को वे कभी थोथी या निरर्थक नहीं समझते थे. यही कारण था कि उन्होंने पत्नी की सहेली के मात्र बीस दिन के बेटे को अपने पास रखना स्वीकार कर लिया. एक वर्ष तक चला तूफान शांत हो गया और जीवन सहज सुचारू रूप से चलने लगा. अब मीरा अपने पितृ नगर में रहने आ गई थी.

जलज बड़ा होता गया. पढ़ने के साथ-साथ वह खेल-कूद में भी हमेशा आगे रहा. समय की गति बहुत तेज़ रही. सत्या और उसके पति आठ वर्ष तक विदेशों में जगह-जगह घूमते हुए अपने पैर जमाने का प्रयत्न करते रहे. इधर मीरा के पति दूर अरूणाचल स्थानांतरित हो गये. बेटा जलज तो आगे बढ़ता रहा, किन्तु दोनों मां-बाप के बीच सम्पर्क टूट गया. एक-दूसरे का कुशलक्षेम जानने के लिए दोनों सखियां बेचैन रहतीं, किन्तु बरसों एक-दूसरे के पते नहीं जान पाईं. उधर सत्या के मां-पिता भी जीवित नहीं रहे. इधर मीरा के माता-पिता भी दुनिया छोड़ गये. युग बदल गये. माता-पिता का इतिहास अब बेटे-बेटी दुहराने लगे थे. बेटी ने जिसे पसंद किया, मीरा ने बिना किसी विवाद के ख़ुशी से उसकी शादी कर दी.

एक दिन जब बेटा भी अपनी पसंद की लड़की के साथ इन पालनहार माता-पिता के सामने खड़ा हो गया, तब मीरा कुछ उलझन में पड़ गई. वह सत्या को खोजकर उसे इस शुभ सूचना से अवगत कराना चाहती थी. बेटे की बेचैनी बढ़ रही थी. मां जल्दी उसकी पसंद स्वीकार नहीं कर रही थी.

“मां आख़िर नैनी में बुराई क्या है?”

“बुराई कुछ नहीं बेटा. कुछ दिन सोच लेने में क्या बुराई है?”

“और कितने दिन सोचोगी मम्मी?”

“बेटा अपने घर जिसे लाना है, उसके लिए धैर्य से सोच-विचार करना होगा.”

“मम्मी बताओ न तुम्हें कितना समय चाहिए?”

“बहुत बेचैन हो रहा है!” हंसते हुए मीरा ने कहा.

मीरा का सुखी-संतुष्ट मन कई परतों के नीचे एक भारी अकुलाहट अनुभव कर रहा था. वैसे यह अकुलाहट नई उत्पत्ति नहीं थी. पिछले बाईस सालों से मन के किसी कोने में पड़ी आग आज जैसे भभककर ऊपर आना चाहती थी. अब वह हर क्षण यही सोचती थी कि किस तरह जलज को सत्य बताऊं? बताऊं भी या नहीं. सत्या मिल पाती तो उससे सलाह करती. अब जब कभी वह अपने बेटे को देखकर ले जाना चाहेगी तब क्या होगा? मैं कैसे सहूंगी? और जलज जाएगा? आसानी से वह मानेगा क्या?

एक मकान के गेट पर नामपट्ट देखकर तांगा रुका. “यही नम्बर है न बहनजी?” तांगे वाले ने कहा तो सत्या एकदम चौंकी, “हां-हां यही.” उसका दिल तीव्र गति से धड़क रहा था. धीमे क़दमों से चलकर वह गेट तक पहुंची. काफ़ी बदल दिया है मकान को मीरा ने. इस सुन्दर सुहाने मकान में वह तो पिता के समय का पुरानापन ढूंढ़ रही थी. वह ईंटों की दीवार को छूता हरसिंगार, वह पीछे आंगन से झांकता आम, आंगन के साथ-साथ चलती कच्ची नाली और बरामदे में पड़ी चिकें. मीरा ने घर और युग दोनों ही बदल दिए हैं. उसने गेट पर लगी बेल बजाई. किसी युवक ने आकर दरवाज़ा खोला. क्षण मात्र को वह सत्या के पैरों पर झुका और झट सामान उठाकर अन्दर चला गया. सत्या उसके पूरे रूप को आंखों में भी नहीं भर पाई. वह तांगे वाले को पैसे चुकाकर मुड़ी तो मीरा सामने खड़ी थी. घर के बरामदे में ही भरत-मिलाप-सा दृश्य उपस्थित हो गया. दोनों के आंसुओं से धरती भीगने लगी. बेटा जलज खिड़की से यह दृश्य देखकर चकित था कि दोनों सहेलियां ‘हैलो हाय’ के साथ मिलने के बजाय रोकर गले मिल रही हैं. हां मां ने बताया था, शायद मिलने का पुराना ढंग यही था. पर आंटी तो बरसों विदेश में रही हैं? कुछ लोग होते हैं जो अपना पुराना ढंग नहीं छोड़ते. क्या किया जाए. पर मम्मी को रोते देखना उसे अच्छा नहीं लग रहा. हां- वो भी होस्टल से आकर जब मम्मी के गले लगता तो मम्मी की आंखें भर आती थीं. महिलाएं भावुक होती ही हैं.

वे दोनों ड्राईंगरूम में आकर बैठ गई थीं और जलज क्रिकेट मैच देखने में व्यस्त था. सत्या की आंखें ड्राईंगरूम में लगे युवा के चित्रों पर अटक-अटक जा रही थीं. इसकी आंखें कितनी मिल रही हैं उनसे. जब दोनों सहेलियों की आंखें टकराईं तो मौन बहुत कुछ कह गया. चाय पीते-पीते सत्या की आंखें उन चित्रों पर बार-बार टिक रही थीं और मीरा की आंखें डबडबा रही थीं.

“बेटा जलज आओ. मौसी के साथ चाय पीयो.”

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अपने लिए ‘मौसी’ शब्द सुन एकबारगी सत्या कांप उठी. फिर अपने को संयत कर बातें करने का प्रयत्न करने लगी. पर सामने बैठे जलज को देख-देख उसका ज़िंदगीभर का रुका ममत्व फूट पड़ने को आतुर हो उठा. मीरा ने नाज़ुक स्थिति को समझा और जलज को किसी बहाने बाहर भेज दिया. दो स्त्रियों के इस भावनात्मक संघर्ष को समझने में जलज असमर्थ था. फिर भी वह इतना बच्चा नहीं था. कुछ गम्भीर बात है, यह उसे समझमें आ रहा था. सत्या चाहकर भी जलज से बात नहीं कर पा रही थी.

कितनी बातों के ग्रंथ भरे थे मन में, फिर भी दोनों सहेलियां ऊपरी बातों में अपना समय काट रही थीं. रात का खाना तीनों ने साथ खाया. थकी होने के कारण सत्या जल्दी सोने चली गई. मन में उठती ऊंची लहरें उसे नींद में जाने से रोक रही थींं. वह चाह रही थी कि जलज के पास ही बैठे और उसे ही निहारती रहे. अंतर्मन ने पूछा, ‘क्या जलज मेरे साथ जाने को राज़ी होगा? जब उसे सत्य पता चलेगा तब भी क्या वह अपनी इस जन्मदात्री मां का आदर करेगा?’ सत्या का सिर फटने को हुआ. एक नींद की गोली निगल वह सो गई.

उधर मीरा बेटे के पास आ बैठी थी.

“ममा… आज तुम कुछ परेशान लग रही हो?”

“नहीं तो बेटे. बस कुछ थकी हूं.”

“नहीं ममा कुछ बात है. डैडी की याद आ रही है?”

मीरा मुस्करा दी, “वो कौन-से बहुत दूर गए हैं, कल या परसों आ जाएंगे.”

“फिर क्या बात है मम्मी?”

“सोचती हूं अगर तुझे लंदन पढ़ने भेज दूं, तो मैं कैसे रहूंगी अकेली.”

“मां मैं कहीं नहीं जाऊंगा.” कहते हुए जलज मां के गले में झूल गया.

मां ने बेटे का माथा चूमा. “अच्छा बेटे, अब सो जा. मैं भी सोऊंगी.”

सत्या चार दिन मीरा के पास रही. दोनों सहेलियां उठते-बैठते, घूमते-फिरते, खाते-पीते तनाव में बनी रहीं. दोनों में से किसी का साहस नहीं हुआ कि बेटे को सच से अवगत करा दें. हालांकि पहले दोनों में यह तय हो चुका था कि जब हम दोनों सामने होंगी, बेटा भी सामने होगा, तब उसे सत्य से परिचित करा देंगे.

मीरा और जलज का लाड-दुलार भरा सम्बन्ध देखकर सत्या का मन सत्य को चोट करने को नहीं हुआ. यदि उस समय बीस दिन के बालक को मीरा स्वीकार न करती तो…?

सत्या ने दूसरे दिन जाने की तैयारी कर ली. मीरा ने देखा तो सत्या के पास आ खड़ी हुई. सत्या ने मीरा के कंधे पर सिर टिका दिया और रो पड़ी.

मीरा की आंखें भी बरस पड़ीं.

“मीरा, मैं तुम्हारी कोख सूनी करने का साहस नहीं कर सकती.”

“यह क्या कह रही हो सत्या? कोख तुम्हारी सूनी हुई है.”

“कोख मेरी थी, पर उसकी रौनक तुम्हारे घर में समाई है. अब उसे सूनापन देना अन्याय होगा. तुम्हारे तप की मैं तुम्हें सज़ा नहीं दे सकती.”

मीरा का मन हुआ, सहेली के पैर पकड़ ले.

पूर्व में प्रभात की किरणें फूट रही थीं और बेटा जलज ‘मौसी मां’ को छोड़ने स्टेशन जा रहा था. दो दिन से वह अपनी मम्मी के कहने पर

सत्या को इसी सम्बोधन से बुला रहा था.

– उर्मि कृष्ण

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कहानी- जीवन ठहरा नहीं (Short Story- Jeevan Thahara Nahi)

Short Story- Jeevan Thahara Nahi

“नहीं सुधा, जीवन अभी ठहरा नहीं, बस एक पड़ाव से गुज़र रहा है. अभी तो बहुत रास्ते तय करने हैं, बहुत दूर जाना है… साथ-साथ एक-दूसरे का हाथ थामे. सच, मैं तो सोचकर ही रोमांचित हो रहा हूं. ऐसा लग रहा है कि असुरक्षा और चिंताओं की परछाइयों से निकलकर इतने सालों के बाद अब हमारा समय आया है कि हम अपना जीवन अपने ढंग से जी सकें, अपने अधूरे सपने पूरे कर सकें…”

 रात के अंधियारे में जब निद्रा रानी पूरे जग को अपनी आगोश में समेटे लोरियां गा रही थी, सुधा की आंखों में न नींद थी, न ही दिल में चैन. वो रसोईघर में भारी मन से बैठी आटे के लड्डू बनाने में व्यस्त थी. बीच-बीच में जब नज़र कुछ धुंधला जाती, तो आंखों से छलक आई वेदना को साड़ी के पल्लू से पोंछ पुनः लड्डू बनाने लगती. दिनभर में कितना कुछ बना लिया था उसने अपने छोटे बेटे अमित के लिए- नमकीन मठरी, मीठे पारे, चकली, गुझिया और भी न जाने क्या-क्या… मगर दिल को अभी भी संतोष नहीं था. जो हाल घर से पहली बार हॉस्टल जा रहे हर बेटे की मां का होता है, वही हाल आज सुधा का भी था.

कैसे रहेगा इतनी दूर? मेरे बिना तो एक काम भी ठीक से नहीं कर पाता… पता नहीं ठीक से खाएगा-पिएगा भी या नहीं?… कौन रखेगा उसका ध्यान?… नन्हीं-सी जान है. देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान आईआईटी में 25वां रैंक पानेवाला 18 वर्षीय मेधावी अमित सुधा के लिए अभी भी ‘नन्हीं-सी जान’ ही था, जो सुबह की ट्रेन से कानपुर आईआईटी जा रहा था.

सुधा दिनभर के जतन से बनाए गए नाश्ते को बैग में व्यवस्थित कर ही रही थी कि पीछे से अमित रसोई में आ धमका, “प्लीज़ मम्मी सोने भी दो ना, कितनी देर से सोने की कोशिश कर रहा हूं, मगर तुम्हारी खटर-पटर रुकने का नाम ही नहीं ले रही… और ये क्या-क्या भर दिया बैग में? उ़फ् मम्मी, कानपुर भारत में ही है चीन में नहीं, वहां ये सब मिलता है…” अमित की झल्लाहट से सुधा की आंखें पुनः नम हो गईं. “ओह मम्मी, प्लीज़ अब रोओ मत… मेरी प्यारी मम्मी… मेरा वो मतलब नहीं था…” अमित अपनी दुखी मां को बांहों में भर दिलासा देने लगा. “मम्मी, आपका और पापा का यही सपना था कि मैं आईआईटी से इंजीनियरिंग करूं और आज जब मैं आपका सपना पूरा करने जा रहा हूं तो आपका ये हाल हो रहा है. जब जतिन भइया एन.डी.ए. में गए थे, तब भी आपका ऐसा ही हाल हुआ था. आपको तो ख़ुश होना चाहिए कि आपके दोनों बच्चे आपकी ही दिखाई हुई राह पर आगे बढ़ रहे हैं, अपना मुक़ाम हासिल कर रहे हैं और आप हैं कि यूं रोनी सूरत बनाए बैठी हैं.”

“मैं ख़ुश हूं बेटा… बहुत ख़ुश… बस तुम्हारे दूर जाने से ज़रा-सा मन भारी हो रहा था, मगर अब मैं ठीक हूं… चलो चलकर सो जाओ, वरना सुबह आंख नहीं खुलेगी.” अमित सोने चला गया और रसोई से निवृत्त हो सुधा भी लेट गई, मगर उसकी आंखों से नींद अभी भी कोसों दूर थी. मन ही मन अमित के लिए पैक किया हुआ एक-एक सामान दोहरा रही थी, सब कुछ रख लिया न… कुछ भूल तो नहीं गया… थोड़ा लापरवाह है… कैसे ख़याल रखेगा अपना? कैसे रहेगा? और एक बार फिर सुधा के मस्तिष्क में उन्हीं प्रश्‍नों की पुनरावृत्ति होने लगी.

सारी रात खुली आंखों से काटकर उठी सुधा ने ठीक चार बजे अमित को जगा दिया. अमित तैयार हो अपनी मंज़िल की ओर रवाना होने लगा. जाने से पहले तक सुधा को समझाता रहा, “अकेली परेशान मत होना, 10-15 दिन में तो पापा आ ही जाएंगे, चाहो तो इस बीच मौसी के यहां चली जाना. मेरी चिंता मत करना. अब मैं अपना ख़याल ख़ुद रख सकता हूं.” मम्मी के लिए ढेरों नसीहतें छोड़ अमित चला गया.

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उसकी नसीहतें सुन सुधा को बेटे के बड़े और समझदार होने का एहसास होने लगा. इतना बड़ा कि वो दुनिया का अकेले मुक़ाबला करने को तैयार है. उसे अब मां के सुरक्षित आंचल की ज़रूरत नहीं. उसे अब मेरी ज़रूरत नहीं. ऐसी ही व्यथाओं में उलझी सुधा अमित के जाने के बाद अपने चार कमरों के आलीशान फ्लैट में इधर-उधर चक्कर लगा रही थी. किसी काम में मन नहीं लग रहा था और सच पूछो तो अब काम ही क्या बचा था उसके पास. जब कुछ न सूझा तो न जाने क्या सोचकर सुधा ने आलमारी से पुराना एलबम निकाला और देखने बैठ गई. पहले ही फ़ोटोग्राफ़ पर नज़र जम गई. आशीष के साथ पहली फ़ोटो थी उसकी. कैसे डर-डरकर, छुपकर, आशीष के ज़बरदस्ती करने पर खिंचवाई थी. कितना छुपाकर रखती थी उसे… कभी तकिये के नीचे, तो कभी आलमारी में बिछे अख़बार के नीचे. फ़ोटो देखकर पुरानी मधुर स्मृतियां सुधा के मन को गुदगुदा गईं.

नया-नया प्यार था सुधा और आशीष का. दोनों कॉलेज में साथ ही पढ़ते थे. दोनों के प्यार का आधार उनकी पारस्परिक समझ और दोस्ती थी. एक ओर जहां आशीष इलेक्ट्रॉनिक्स में पी.एच.डी. करके इलेक्ट्रॉनिक गुड्स की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाना चाहता था, वहीं सुधा पत्रकार बन अपनी लेखन प्रतिभा को नए आयाम देना चाहती थी. दोनों अपने-अपने सपनों को साकार करने के साथ-साथ एक-दूसरे के सहयोगी होने के लिए भी वचनबद्ध थे. मगर आशीष के पैरेंट्स की एक दुर्घटना में हुई असमय मृत्यु से घर और दो छोटी बहनों की ज़िम्मेदारी उसके कंधों पर आ पड़ी. फलस्वरूप आशीष को पढ़ाई बीच में ही छोड़ नौकरी करनी पड़ी और घर संभालने के लिए सुधा से शादी भी. दोनों ने सोचा था कि एक बार घर की गाड़ी वापस पटरी पर आ जाए, तो अपने-अपने सपने भी पूरे कर लेंगे. पिता के निधन से श्रीहीन हुए परिवार को वैभव की ऊंचाइयों पर पुनः प्रतिष्ठित करने को प्रतिबद्ध आशीष ने दोनों बहनों के विवाह की ज़िम्मेदारी से निबटकर बैंक से लोन ले छोटी-सी इलेक्ट्रॉनिक्स पार्ट्स की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाई और ख़ुद को अनवरत परिश्रम की भट्टी में झोंक डाला. अपनी अथक मेहनत और लगन के चलते वो जल्दी ही अपने क्षेत्र में स्थापित हो गया, मगर इस आयोजन में घर को बिल्कुल भुला बैठा.

आशीष के सपने साकार होने के बाद सुधा भी पत्रकारिता का कोर्स करने की सोच ही रही थी कि गर्भ में एक नवीन सृजन की आकस्मिक उत्पत्ति के बाद घर-संसार की ज़िम्मेदारियों में कुछ ऐसी उलझी कि आज तक नहीं निकल पाई थी. अपनी महत्वाकांक्षा को तो कब का भुला बैठी थी वो. आशीष तो पहले से ही घर को सुधा के भरोसे छोड़े बैठे थे, दो साल पहले बड़ा बेटा जतिन भी आर्मी में चला गया था और आज जब उसकी जीवन परिधि का अंतिम केंद्र अमित भी उसके वात्सल्य की छांव को छोड़ अपने क्षितिज की तलाश में बढ़ चला, तो नितांत अकेली खड़ी रह गई सुधा को स्वयं का अस्तित्व बिखरता-सा महसूस हो रहा था, निराधार… अर्थहीन…

सुधा दो सप्ताह घर में अकेली रही, कहीं आने-जाने का मन नहीं किया. कभी अपने अतीत के पन्ने पलटती, तो कभी अपने 23 साल के लंबे वैवाहिक जीवन की समीक्षा करने लग जाती. आज अचानक ही खाली बैठी सुधा की नज़रों के सामने वो लम्हे तैरने लगे, जब दिन के 24 घंटे भी उसके काम को निपटाने के लिए कम हुआ करते थे, ‘सुधा… सुधा… मम्मी… मम्मी…’ घर में पल-पल गूंजती पुकारें, “ओफ़़्, अभी आई… कुछ काम तो ख़ुद से किया करो.” सुधा झल्लाकर कहती. आशीष तो एक रुमाल भी ख़ुद से नहीं ले सकते थे और बच्चे, जब देखो उसके पल्लू से चिपके रहते. कितना थक जाती थी सुधा उस व़क़्त. सोचा करती थी, न जाने कब मुक्ति मिलेगी मुझे इन ज़िम्मेदारियों से और आज जब सच में उसे मुक्ति मिल चुकी थी तो वो अपनों के बीच उस ‘मोस्ट-वॉन्टेड’ होने के एहसास को मिस कर रही थी. आशीष के साथ तो तसल्ली से बैठ दो बातें करने को तरस गई थी वो. लगता था जैसे उनके ढीले पड़ चुके प्रेम सूत्र मात्र औपचारिकताओं पर ही टिके थे.

कुछ ही दिनों में कितना बड़ा शून्य उभर आया था सुधा के जीवन में. क्या-क्या सोचने लगी थी वो? सभी ने अपनी-अपनी डगर ले ली, किसी को मेरी ज़रूरत नहीं रही… कैसे ढोऊंगी इस उद्देश्यहीन जीवन का भार? अपनी मनोव्यथा वो स्वयं भी नहीं समझ पा रही थी. जितना सोचती, उतना ही उलझती जाती स्वयं के बनाए हुए भ्रमजाल में.

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आज सवेरे ही आशीष का मलेशिया से फ़ोन आया था, दो दिन बाद वे घर वापस आ रहे थे. हर बार जब भी आशीष टूर से वापस आने की ख़बर देते, तो घर में जैसे बहार आ जाती, मगर इस बार ऐसा कुछ भी नहीं था.

आशीष आ गए थे. सुधा खाना बना रही थी और बीच-बीच में पास खड़े हुए आशीष को उनकी अनुपस्थिति में हुए क्रियाकलापों की जानकारी दे रही थी. खाना खाकर आशीष बैठक में बैठ गए और सुधा के पास आकर बैठने का इंतज़ार करने लगे, मगर सुधा थी कि कोई न कोई काम निकालकर अपनी व्यस्तता ज़ाहिर कर रही थी. वो आशीष के सान्निध्य से भी कतरा रही थी. उसे डर था कि कहीं उसके भीतर का गुबार बाहर निकल उनके शेष बचे-खुचे सूत्रों को भी अपने साथ बहाकर न ले जाए.

“सुधा, थोड़ी देर यहां आकर बैठो न, मुझे तुमसे कुछ ज़रूरी बात करनी है.” सुनकर सुधा का मन स्वयं से बोल उठा, उहं… अपना काम छोड़कर कभी बैठे हो मेरे पास जो मैं बैठूं, मगर आशीष के विनम्र आग्रह को ठुकरा न सकी और एक नियत दूरी बनाकर बैठक में बैठ गई.

“कहिए.” उसकी शारीरिक भाषा अभी भी काम की हड़बड़ी जता रही थी.

“सुधा, तुम ख़ुश तो हो न मेरे साथ? कोई शिकायत?” आशीष ने सुधा की आंखों में झांककर पूछा.

“अ…हं… शिकायत?” सुधा को लगा जैसे उसके मन का चोर आंखों के रास्ते निकल आशीष के सामने जा खड़ा हुआ, मन किया फट पड़े और बता दे कि हां शिकायतें तो बहुत हैं. कितनी और कौन-कौन सी, ये तो वो स्वयं भी नहीं जानती, मगर कुछ बोल न सकी.

“नहीं, मुझे क्या शिकायत होने लगी भला.”

“ये भी नहीं कि मैं तुम्हें बिल्कुल समय नहीं देता.”

“तुम अपने काम में व्यस्त रहते हो, अपना क़ीमती समय मेरे साथ बैठकर थोड़े ही गंवाओगे.” आशीष को सुधा का कटाक्ष आहत कर गया, उसने आगे बढ़कर सुधा के हाथों को थाम लिया

“सुधा, तुम्हारे साथ बिताया गया एक-एक लम्हा अनमोल है मेरे लिए. कितना तरसता हूं मैं तुम्हारे लिए… तुम्हारे साथ के लिए… ये तुम नहीं जान सकती. मुझे

इस बात का एहसास है कि मैंने अपने बिज़नेस के पीछे घर को और तुम्हें बिल्कुल अनदेखा कर दिया, मगर क्या करता? मैं ख़ुद मजबूर था.”

“मजबूर…?” सहसा सुधा को अपने कानों पर यक़ीन नहीं हुआ.

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“हां सुधा, तुम तो जानती ही हो मम्मी-पापा के अचानक चले जाने के बाद मुझ पर क्या गुज़री? उनके बिज़नेस पार्टनर्स ने हमारा हिस्सा दबाकर हमें सड़क पर खड़ा कर दिया था, ऊपर से बहनों की ज़िम्मेदारियां, हमारा भविष्य… सब कुछ अधर में था. ख़ैर भगवान की कृपा से धीरे-धीरे सब संभल गया, पर इन कटु अनुभवों और अभावों के चलते मन में एक तरह की इनसिक्योरिटी घर कर गई.”

“कैसी इनसिक्योरिटी?” सुधा ने उत्सुकता से पूछा.

“लगता था कि अगर पापा की तरह मुझे भी अचानक से कुछ हो जाए, तो तुम्हारा क्या होगा? बच्चों का भविष्य कैसे बनेगा? रात-दिन बस यही चिंता खाए जाती थी, इसीलिए बिज़नेस बढ़ाता रहा, बैंक बैलेंस बनाता रहा. मगर जब अमित का आई.आई.टी.में सिलेक्शन हुआ तो मैं इन इनसिक्योरिटीज़ से उबर गया. मुझे विश्‍वास हो चला कि अब मेरे बच्चे इस लायक़ हो गए हैं कि उन्हें मेरे सहारे की, मेरी तरफ़ से किसी सिक्योरिटी की ज़रूरत नहीं, तो मैंने अपने बिज़नेस को सीमित करने का निश्‍चय कर लिया. बहुत हो चुका यहां-वहां भागना, रात-दिन काम में पिसना, बस अब बाकी की ज़िंदगी तुम्हारे साथ सुकून से गुज़ारना चाहता हूं और तुम्हारी लेखन प्रतिभा को निखरते हुए, आगे बढ़ते हुए देखना चाहता हूं.”

“ये क्या कह रहे हैं? मैं और लेखन प्रतिभा, वो सब तो अतीत की बातें हैं.”

“नहीं सुधा, प्रतिभा कभी नहीं मरती. हां, अनुकूल परिस्थितियां न होने पर कुछ समय के लिए दब अवश्य जाती है, मगर उसका अस्तित्व कभी नहीं मिटता. तुम्हारे सहयोग और कर्त्तव्यनिष्ठा से हम सभी के सपने पूरे हो गए, मगर तुम वहीं की वहीं रह गईं और तुम्हें इसकी कोई शिकायत भी नहीं. मगर मुझे हमेशा यह ग्लानि रही कि मुझसे शादी कर तुम्हारी प्रतिभा का गला घुट गया. पर अब समय आ गया है कि तुम अपने बारे में सोचो और आगे बढ़ो. इस बार पीछे खड़े रहकर सहयोग देने की मेरी बारी है.”

“ये अचानक कैसी बातें कर रहे हैं आप? अब कहां लिख पाऊंगी कुछ…? मेरी तो सोच में भी जंग लग चुका है… इस उम्र में नए सिरे से शुरुआत करना असंभव है… जीवन में एक ठहराव आ चुका है.”

“नहीं सुधा, जीवन अभी ठहरा नहीं, बस एक पड़ाव से गुज़र रहा है. अभी तो बहुत रास्ते तय करने हैं, बहुत दूर जाना है… साथ-साथ एक-दूसरे का हाथ थामे. सच, मैं तो सोचकर ही रोमांचित हो रहा हूं. ऐसा लग रहा है कि असुरक्षा और चिंताओं की परछाइयों से निकलकर इतने सालों के बाद अब हमारा समय आया है कि हम अपना जीवन अपने ढंग से जी सकें, अपने अधूरे सपने पूरे कर सकें…” आशीष बोल रहे थे और उनका एक-एक शब्द सुधा के हिमशिला बने मन-मस्तिष्क को पिघलाता जा रहा था. तेज़ हुए रुधिर प्रवाह ने शिथिल पड़ी धमनियों को पुनः थरथरा दिया था. मन के समस्त पूर्वाग्रह तो न जाने कहां हवा हो चले थे और 23 साल पुराने ‘जीवन में कुछ कर गुज़रने’ के तूफ़ानी उद्वेग उनकी जगह लेते जा रहे थे.

दो दिन बाद अमित का फ़ोन आया, “मम्मी, आप जर्नल़िज़्म का कोर्स कर रही हैं… आपने कभी बताया ही नहीं कि आप लिखती भी हैं. वो तो पापा ने बताया… मम्मी, कीप इट अप, मुझे आप पर गर्व है, आप अपनी हमउम्र औरतों के लिए एक मिसाल हैं. मम्मी, बेस्ट ऑफ़ लक…” सुधा बेटे की शुभकामनाओं से भावविह्वल हो रही थी, वहीं थोड़ी दूर खड़े आशीष सुधा के चेहरे पर लौट आई बरसों पुरानी चमक निहार रहे थे. एक पड़ाव पर कुछ देर ठहर सुधा का जीवन नए कुलांचे भरने को तैयार था.

दीप्ति मित्तल

       दीप्ति मित्तल

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कहानी- शुद्धिकरण (Short Story- Shudhikaran)

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अनुज को आश्‍चर्य में छोड़ मनीषा सोच रही थी, ‘तन से और नियम से तो वो सवा महीने बाद शुद्ध होगी, लेकिन उसकी आत्मा का ‘शुद्धिकरण’ आज ही हो गया है.’

रसोई से आ रही आवाज़ से नींद टूटी. अभी 6 ही बजे थे. ‘पता नहीं मौसी को भी इतनी सुबह रसोई में क्या काम रहता है?’ मनीषा अभी उठने के मूड में नहीं थी, लेकिन वो जानती थी कि अभी मौसी आवाज़ें देने लगेंगी, इसलिए खीझते हुए उसे उठना ही पड़ा.

मनीषा और अनुज की शादी को तीन साल हो गए थे. मनीषा मां बननेवाली थी. उसे सातवां महीना चल रहा था, इसलिए उसकी देखभाल के लिए अनुज ने मौसी को विशेष आग्रह से अपने यहां बुलाया था. मनीषा की मां लंदन में छोटे बेटे के पास रह रही थी और उसके परिवार में ऐसा कोई नहीं था, जो ऐसे समय में उसकी देखभाल करता.

अनुज की मां का देहांत 10 साल की उम्र में हो गया था. पिता ने दूसरी शादी नहीं की, लेकिन स्वयं को काम में उलझा लिया था. अनुज को तकलीफ़ न हो, इसलिए उसे अपनी साली अलका के पास भेज दिया. मौसी व मौसा के स्नेह और उनके बच्चे सुधा व वैभव के साथ खेलते हुए अनुज अपने सारे दुख भूल चुका था.

पढ़ाई पूरी कर अपनी योग्यता के बल पर उच्च पद पर आसीन भी हो गया और पिता के पास लौट आया. दोनों पिता-पुत्र बेहद ख़ुश थे, लेकिन छह माह के भीतर उसके पिता का भी देहांत हो गया.

मनीषा से अनुज ने मौसी की सहमति से ही प्रेम-विवाह किया था. मनीषा एक सुलझे विचारों की लड़की थी. उसका स्वभाव भी अच्छा था.

अनुज अपने आनेवाली संतान को लेकर चिंतित था, इसीलिए वह हर पल मौसी को अपने पास रखना चाहता था. वैभव जोधपुर में था और सुधा कानपुर में ब्याही थी. सभी दायित्वों से मुक्त हो अब वे अपने इस बेटे को सहयोग देने के लिए आ पहुंची थीं.

मनीषा आजकल बहुत परेशान रहती थी. कुछ दिनों से दोपहर के समय जब वो सोती तो रसोई से देशी घी और मेवे की ख़ुशबू आती, लेकिन शाम को रसोई में किसी भी चीज़ का नामोनिशान न रहता. वह संकोचवश मौसी से कुछ पूछ भी नहीं पाती थी.

कभी-कभी दोपहर को मौसी बाज़ार जातीं. वे क्या लातीं? कहां रखतीं? न आज तक उन्होंने बताया, न मनीषा ने पूछा.

लेकिन वो जानती थी कि कुछ गड़ब़ड़ ज़रूर चल रहा है. एक दिन अनुज के सामने ही वो मौसी से तपाक से पूछ बैठी, “आज दोपहर में आपने क्या ख़रीदारी की?” मौसी ने जवाब दिया, “सुधा के बच्चे के लिए कुछ सामान लेना था. वही लेने गई थी.” और इस तरह उन्होंने बात को टाल दिया. उसी दिन से मनीषा उनसे चिढ़ने लगी थी.

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एक दिन डॉक्टर के पास से लौटी, तो देखा मौसी स्टोर रूम में थीं. कामवाली ने बताया कोई आदमी आया था, लकड़ी की बात हो रही थी. मनीषा ग़ुस्से से भर उठी. अब घर के सामानों की भी ख़रीद-फ़रोख़्त शुरू कर दी गई है.

‘हे भगवान, मैं क्या करूं?’ इन सब बातों से मनीषा का स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा था. लेकिन शक का कीड़ा उस पर पूरी तरह से हावी हो चुका था. वह किसी भी तरह मौसी को गांव वापस भेजना चाहती थी.

सबसे पहले उसने एक आया की व्यवस्था की. अब वो मौ़के की तलाश में थी. संजोग से सुधा का फ़ोन आया, जिसे मनीषा ने ही उठाया था. सुधा ने बताया राजीव बाहर गए हैं और उसकी तबियत भी ठीक नहीं है. अगर मां 10-15 दिन के लिए आ सकें तो..?

बस, मनीषा ने इस मुद्दे को इतना बढ़ा दिया कि हम अपने स्वार्थ के लिए मौसी को नहीं रख सकते. सुधा को उनकी ज़रूरत है. इस तरह की कई बातें उसने कह डालीं. एक तीर से दो शिकार हो गए. वो महान भी बन गयी और उसकी समस्या भी सुलझ गयी.

मौसी के जाने के बाद ही आया को देख अनुज कुछ-कुछ समझ गया था, लेकिन बोला कुछ नहीं.

नियत समय पर मनीषा ने एक सुंदर बेटी को जन्म दिया. चार-पांच दिनों में वह घर भी आ गयी. अब आया को रात में भी रुकना था, इसलिए उसे मौसीवाला कमरा साफ़ करने को कहा. वह पास वाले कमरे में आ गयी. अभी उसे और बच्ची को सवा महीने इसी कमरे में रहना था. उसके पश्‍चात् दोनों की शुद्धि-पूजा तथा बेटी का नामकरण होना था. ये सारे नियम मौसी समझाकर गयी थी, इसलिए अनुज ने वैसी ही व्यवस्था की थी.

मनीषा लेटने जा ही रही थी कि अनुज ने उसे एक लिफ़ाफ़ा दिया और कहा, “मौसी ने दिया था. कहा था जिस दिन तुम घर आ जाओ, उसी दिन तुम्हें दूं.”

इतना कहकर अनुज बाहर चला गया. मनीषा ने लिफ़ाफ़ा खोलकर पत्र पढ़ना शुरू किया.

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प्रिय बेटी मनीषा,

आज तुम मां बन गयी हो, बधाई! मुझे पोता हुआ है या पोती, जो भी है, उसे ढेरों आशीष.

बेटी, मुझे माफ़ करना, मैं तुम्हारे साथ नहीं रह पायी. मैं तो शुद्धि-पूजा के बाद ही जाना चाहती थी, लेकिन सुधा के लिए पहले ही जाना पड़ रहा है.

मेरे कमरे में तुम्हें वो सारी चीज़ें मिल जाएंगी, जिसकी तुम्हें ज़रूरत है. बेटा, ये सारी चीज़ें तुमसे छुपाकर रखनी पड़ी. कहते हैं, जन्म से पहले कुछ ख़रीदारी नहीं करनी चाहिए, इसलिए मैंने सुधा के बच्चे के नाम से ही ये सारी चीज़ें जुटा ली थीं.

तुम्हारे लिए लड्डू बनाकर रखे हैं. डॉक्टर ने गरिष्ठ खाने से मना किया था, इसीलिए चखा भी नहीं पायी. हां, पूजावाले दिन के लिए बच्चे का पालना उसके दादाजी की आरामकुर्सी की लकड़ी से बनवा कर रख दिया है. उसे उसी पालने में डालना, दादाजी का आशीर्वाद भी तो ज़रूरी है! मैंने अनुज को सब बता दिया है. अपना ख़याल रखना. जाना ज़रूरी है, इसलिए जा रही हूं.

तुम्हारी मौसी,

अलका

पत्र समाप्त हो चुका था. आया सिर के पास सारा सामान लेकर खड़ी थी. जनवरी के इस ठंड में भी मनीषा पसीने से लथपथ हो गयी. उफ़! कितने छोटे मन की थी मैं! जो मौसी रात-दिन मेरे और मेरी संतान के लिए सोचती रहीं, उन्हें ही घर से भगाने के लिए मैं हरदम परेशान रही.

तभी अनुज मोबाइल लिए अंदर आए. मौसी का फ़ोन था. औपचारिक बातें हुईं. मनीषा के मुंह से आवाज़ नहीं निकल रही थी. अंत में उसने इतना ही कहा, “जब तक आप नहीं आएंगी, आपकी पोती का नाम नहीं रखा जाएगा. आपको मेरी क़सम, जो मना किया.” मौसी ने हंसकर कहा, “अरे! मैं तो ऐसे ही आ जाती, इसमें क़सम देने की क्या ज़रूरत है?”

अनुज को आश्‍चर्य में छोड़ मनीषा सोच रही थी, ‘तन से और नियम से तो वो सवा महीने बाद शुद्ध होगी, लेकिन उसकी आत्मा का ‘शुद्धिकरण’ आज ही हो गया है.’

आया के हाथ से मौसी की बनाई रजाई लेकर उसने बिटिया को ओढ़ा दी.

रूपाली भट्टाचार्या

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