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कहानी- मेला (Short Story- Mela)

छोटे-छोटे बच्चों का हाथ पकड़े परिवार के परिवार घूम रहे थे और जीवन के हर रंग का आनंद उठा रहे थे. वे जब पांच रुपए का गुब्बारा या सात रुपए की पिपिहरी भी ख़रीदते, तो रुपए-दो रुपए का मोलभाव कर लेते. इसके बाद छोटे-छोटे खिलौनों को बच्चों को सौंपते हुए अजीब-सी तृप्ति की अनुभूति होती उन्हें. बच्चे भी खिलौने पाकर ऐसे ख़ुश होते, जैसे उन्हें मुंहमांगी मुराद मिल गई हो.

कितना फ़र्क़ है इस मेले और शॉपिंग मॉल की भीड़ में, जहां 50% डिस्काउंट के बाद भी सामान ख़रीदने का कोई सुख नहीं है.

Hindi Kahani

अपने कंप्यूटर के पिक्चर-फोल्डर में कैद तस्वीरों को वो ध्यान से देखने लगा. शिमला टूर के ब़र्फ से भरे पहाड़ थे, तो जैसलमेर के रेत भरे छोटे-छोटे टीले. इस फोल्डर में एक तरफ़ मनाली की ख़ूबसूरत वादियां कैद थीं, तो दूसरी तरफ़ गोवा के समुद्र तट पर अठखेलियां करती ज़िंदगी की रंगीनियां. एक-एक तस्वीर कहीं न कहीं संपन्न जीवनशैली की गवाह थी. फिर भी जब उन तस्वीरों को ध्यान से देखते, तो लगता सब कुछ होने के बाद भी इनमें सूनापन है.

आदमी की भूख को ख़ूबसूरत नज़ारों, फाइव स्टार होटल के टेबल पर सजे खाने या जीवन की रंगीनियों से नहीं मिटाया जा सकता. सच तो यह है कि आदमी क्या चाहता है, यह वह भी नहीं जानता.

उसने कंप्यूटर बंद कर दिया. उसे एहसास हुआ कि यह खिलौना अब उसे ख़ुशी देने में नाकाम है. बारह घंटे की ड्यूटी में कम से कम सात-आठ घंटे तो वह इस कंप्यूटर से चिपका रहता है. अचानक उसने सोचा, क्या हमारा जीवन आज इतना एकाकी हो गया है कि हमें बातचीत करने के लिए भी अजनबियों की ज़रूरत पड़े?

उसने बैठे-बैठे ही रिवॉल्विंग चेयर पर अंगड़ाई ली और चेंबर के बाहर झांका, तो देखा रामदीन सिर झुकाए खड़ा था.

ओह, तो क्या सात बज गए और घर चलने का समय हो गया? रामदीन का नियम था कि वह सात बजे गाड़ी लगाकर साहब के केबिन के सामने बैठ जाता. कहता कुछ नहीं और शिखर समझ जाता कि काम ख़त्म होने से रहा, अब चलना चाहिए. हां, ज़्यादा ही ज़रूरी होता, तो वह रामदीन को कह देता कि आप घर निकल जाइए, आज मैं ख़ुद ही ड्राइव कर लूंगा, लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं कि रामदीन ने शिखर को अकेला छोड़ा हो. वह कहता, “साहब मुझे भी जल्दी घर जाकर क्या करना है?” और उसका यह जवाब सुन शिखर मुस्कुरा देता.

शिखर रामदीन से इतने दिनों में काफ़ी घुल-मिल गया था. अचानक शिखर ने रामदीन को इशारा किया, नियम के अनुसार रामदीन ने शीशे का दरवाज़ा खोला, ब्रीफकेस में लंच बॉक्स रखा और एक हाथ में पानी की बोतल और दूसरे हाथ में ब्रीफकेस उठाकर चल पड़ा. इससे पहले कि रामदीन बाहर निकलता, शिखर ने कहा, “रामदीन क्या आज तुम मुझे कोई नई जगह घुमा सकते हो?” रामदीन सोच में पड़ गया, “साहब, इस शहर का कोई भी होटल, शॉपिंग मॉल या क्लब आपसे छूटा नहीं है.”

“तभी तो तुमसे कह रहा हूं कि क्या कोई नई जगह दिखा सकते हो? ऐसी जगह जहां ज़िंदगी सांस लेती हो, क्योंकि होटल हो या शॉपिंग माल, ये सारी जगहें बेजान मशीन की तरह हो गई हैं. इनमें एक-सा स्वाद है. रहे क्लब्स, तो वो भी बस दिखावट के अड्डे भर रह गए हैं. रामदीन तुम उम्र में मुझसे बड़े हो, क्या तुम्हारी ज़िंदगी में भी इतनी कम उम्र में सूनापन आ गया था?”

रामदीन ने शिखर की आंखों में छुपे दर्द को पढ़ लिया था. बोला, “साहब बड़ी बातें मेरी समझ में नहीं आतीं. हां, आप कुछ अलग देखना चाहें, तो एक जगह है, पर वह आपके स्टैंडर्ड की नहीं है. वहां हम जैसे लोग ही जाते हैं.”

शिखर सोच में पड़ गया. फिर बोला, “कोई बात नहीं, तुम बताओ तो सही. यह छोटा-बड़ा कुछ नहीं होता.”

रामदीन का साहस थोड़ा बढ़ा. बोला, “साहब शहर के बाहर रामलीला ग्राउंड में मेला लगा है. आप कहें तो घुमा लाऊं, लेकिन अकेले नहीं. आप मेमसाब को भी लेंगे, तभी घूमने का मज़ा आएगा.”

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शिखर मेले के नाम से ही जैसे खो-सा गया. मेले में चर्खीवाला झूला, टोपी से फूल निकालनेवाला जादूगर, गुड़ की मिठाइयां… हा हा… वह ज़ोर से हंसा. कितने मेले तो देखे हैं उसने बचपन में. उसके घर के बगल में ही तो था मेला ग्राउंड और गर्मी की छुट्टियों में शाम होते ही जैसे कोई ताक़त उसे मैदान की तरफ़ खींचना शुरू कर देती और जब टिकट के पैसे न होते, तो वह मेले के बाहर ही खड़ा होकर भीतर के नज़ारों को महसूस करता.

शिखर को चुप देखकर रामदीन बोला, “साहब घर चलिए. वो तो मैंने ऐसे ही कह दिया था. मेला भी कोई घूमने की चीज़ है आज के ज़माने में.”

शिखर गंभीर होते हुए बोला, “रामदीन सचमुच मेला इस ज़माने में भी देखने की चीज़ है. रुको, मैं फ़ोन कर देता हूं घर पर और आज मेला देखने ही चलते हैं.”

“हैलो, हैलो… सुनो, तैयार हो जाओ, आधे घंटे में पहुंच रहा हूं. आज हम लोग अनोखी जगह घूमने जा रहे हैं और हां, सिंपल कपड़े ही पहनना. क्रेडिट कार्ड और पर्स की ज़रूरत नहीं है. बस, थोड़े पैसे रख लेना, काम चल जाएगा.”

“पहेलियां मत बुझाओ शिखर, ये बताओ हम जा कहां रहे हैं?” उधर से श्रुति की आवाज़ सुनाई दी. शिखर ने मुस्कुराते हुए कहा, “आज मैं तुम्हें मेला दिखाने ले जा रहा हूं.”

“तुम भी कमाल करते हो शिखर. अब इस उम्र में मुझे मेला दिखाने ले जाओगे.”

“कहते हैं ज़िंदगी ही एक मेला है, तो इस उम्र में मेला देखने में हर्ज़ क्या है?”

शिखर जब घर के दरवाज़े पर पहुंचा, तो गाड़ी का हॉर्न सुन श्रुति को बाहर निकलते देख चौंक गया. वह एक साधारण-सी सूती साड़ी में अत्यंत सौम्य लग रही थी.

उसका यह रूप देख शिखर मुस्कुराए बिना न रह सका.

“क्या भाई, आज मेरी चाय भी मारी गई इस मेले के चक्कर में…?” कहते हुए शिखर ने कार का दरवाज़ा खोल दिया और भीतर एक हल्की हंसी गूंज उठी.

अब तक रामदीन को जोश आ चुका था. “साहब आज चाय मैं पिलाऊंगा मुखिया ढाबे की. आप और मेमसाब बस बैठे रहना, मैं गाड़ी में ही ले आऊंगा.” नोक-झोंक में पता ही न चला कि कब हाई वे छोड़ कस्बे का टर्न आ गया और जब कस्बे के मोड़ पर गाड़ी रुकी तो रामदीन चाय लेने चला गया.

“साहब कहते हैं जिसने मुखिया के ढाबे की चाय नहीं पी, समझो उसने कुछ नहीं पिया.”

शिखर ने चाय ले ली और एक कुल्हड़ श्रुति की ओर बढ़ाते हुए जैसे ही पैसे के लिए पर्स निकाला, रामदीन बोला, “साहब यह चाय हमारी तरफ़ से. आप हमारे मेहमान हैं.”

शिखर की लाख कोशिशों के बाद भी रामदीन ने चाय के पैसे नहीं लिये. चाय वाकई लाजवाब थी और मिट्टी के बर्तन में होने के कारण एक सोंधी ख़ुश्बू उसमें से उठ रही थी, जो भीतर तक शिखर को तरोताज़ा कर गई. रामदीन ने गाड़ी आगे बढ़ाई और दस मिनट में कस्बे के रामलीला ग्राउंड के सामने लाकर रोक दी.

देखकर ही पता चल रहा था कि यह आम आदमी की जगह है. लोगों की अच्छी-ख़ासी तादाद थी, लेकिन उम्मीद के विपरीत धक्का-मुक्की और अव्यवस्था कहीं नहीं थी.

छोटे-छोटे बच्चों का हाथ पकड़े परिवार के परिवार घूम रहे थे और जीवन के हर रंग का आनंद उठा रहे थे. वे जब पांच रुपए का गुब्बारा या सात रुपए की पिपिहरी भी ख़रीदते, तो रुपए-दो रुपए का मोलभाव कर लेते. इसके बाद छोटे-छोटे खिलौनों को बच्चों को सौंपते हुए अजीब-सी तृप्ति की अनुभूति होती उन्हें. बच्चे भी खिलौने पाकर ऐसे ख़ुश होते, जैसे उन्हें मुंहमांगी मुराद मिल गई हो.

कितना फ़र्क़ है इस मेले और शॉपिंग मॉल की भीड़ में, जहां 50% डिस्काउंट के बाद भी सामान ख़रीदने का कोई सुख नहीं है.

अचानक शिखर ने श्रुति का हाथ पकड़ा, तो वह तंद्रा से जागी, “छोड़ो भी, कोई देख लेगा तो क्या कहेगा?” श्रुति ने हाथ छुड़ाते हुए कहा.

शिखर हंसने लगा. “यहां हमें जाननेवाला कौन है? चलो झूला झूलते हैं.”

ज़ोर से हंसी श्रुति, “और तुम्हें चक्कर आ गया तो?” “ओह! मैं तो भूल ही गया था कि मुझे झूले में चक्कर आता है. अरे यहां क्या है?” वो श्रुति का हाथ पकड़ एक रिंग की स्टॉल की ओर बढ़ते हुए बोला, “सुनो भैया, एक तरफ़ इनका और दूसरी तरफ़ मेरा नाम लिख दो.”

दुकानदार ने पूछा, “जी क्या नाम लिखूं?”

तभी एक आवाज़ सुनाई पड़ी, “क्यों रे कलुआ, तू हमारी मेमसाब को नहीं जानता? लिख श्रुति मेमसाब और बड़े साहब.”

अपना नाम सुनकर श्रुति चौंकी. पीछे देखा तो उसकी कामवाली खड़ी थी. “अरे तेरी तो तबियत ख़राब थी और तू यहां मेले में घूम रही है?” श्रुति ने उसे डांटते हुए कहा.

“सारी मेमसाब. हमें क्या पता था कि आप मेले में मिल जाएंगी. अब से ऐसी ग़लती नहीं होगी.”

श्रुति ने हंसते हुए पर्स से पचास रुपए निकाले और देते हुए बोली, “ले रख इसे और जाकर मेला घूम.”

उधर देखा, तो शिखर अपने और श्रुति के नामवाली रिंग बनवा बेहद ख़ुश था. देखते-देखते श्रुति ने भी मेले से ढेर सारी चीज़ें ख़रीद डालीं. रोज़मर्रा के सस्ते बर्तन, चूड़ी-बिंदी और न जाने क्या-क्या?

शिखर भी मेले के रंग में पूरी तरह डूब चुका था. वो कभी एयर गन से निशाना लगाता, तो कभी बॉल से ग्लास गिराने की कोशिश करता. भरपूर ख़रीददारी के बाद भी देखा, तो ख़र्च स़िर्फ सात या आठ सौ रुपए हुए थे,  जितने में शायद एक ब्रांडेड शर्ट ही आती.

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एक-दो घंटा घूमकर जब वे दोनों मेले से बाहर निकले, तो रोज़मर्रा के तनाव से बहुत दूर जा चुके थे. क्या नहीं देखा था उन्होंने मेले में… बोलनेवाले सांप से लेकर ताश के जादू तक. भीतर जाने पर सांप के पिंजरे पर लिखा था, “यह अपनी ज़ुबान में बोलता है, आप उसकी ज़ुबान जानते हैं, तो समझ सकते हैं.” वहीं जादूगर कहता, “साहब, सब नज़र का फेर है. पकड़नेवाले को पांच सौ का नगद इनाम और फिर बातों में ऐसे उलझाता कि हाथ की सफ़ाई कोई पकड़ ही नहीं पाता.

जब वे गाड़ी में बैठे, तो सोचने लगे कि हम अपनी सरल ज़िंदगी को दिखावे के चक्कर में कितना भारी बना लेते हैं. पूरी गाड़ी छोटे-छोटे सामानों से भर गई और रामदीन दोनों की ख़ुशी देखकर गदगद हुए जा रहा था. अगली सुबह संडे था और जब शिखर बरामदे में आया, तो देख कर हैरान रह गया कि श्रुति कल के लाए सामानों को आसपास छोटा-मोटा काम करनेवालों में बांट रही थी. किसी को खिलौना देती, तो किसी को चूड़ी-बिंदी. वह एक-एक चेहरे की ख़ुशी देखती और निहाल हो जाती. सच है, जो सुख बांटने में है, वह संग्रह करने में नहीं और जब उसने पीला कुर्ता रामदीन की ओर बढ़ाया, तो उसकी आंखें छलक आईं.

“जुग-जुग जीयो बेटी, भगवान तुम्हें लंबी उमर दे.” भर्राये गले से रामदीन बोला. उसे पहली बार एहसास हुआ कि वह केवल ड्राइवर भर नहीं, इस घर के किसी सदस्य की तरह है.

और फिर बोला, “बेटा, तुमने आज मेले के सही अर्थ को समझा है, यदि बाहरी मेले से हम हृदय में उमंग और ख़ुशी के असली मेले को जगा सकें, तो समझो घूमना-फिरना सफल हो गया, वरना पहाड़ पर घूम आओ या शॉपिंग माल में, सब निरर्थक है.” और अब शिखर रामदीन की सरल भाषा में कही हुई बात का ज़िंदगी के मेले के संदर्भ में गूढ़ अर्थ ढूंढ़ने लगा था.

Murli Manohar Shrivastav

 मुरली मनोहर श्रीवास्तव

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कहानी- फ्लैश फॉरवर्ड (Short Story- Flash Forward)

Hindi Story

”हां, तो मैं बता रही थी कि फिर एक दौर ऐसा आया कि हम दोनों ही अकेले हो गए. उसकी पत्नी की मृत्यु हो गई और मेरा पति…”

“क्या?” मैं ज़ोर से चिल्ला उठी.

“घबराओ मत. ये सब मैंने फ्लैश फॉरवर्ड में देखा था. फिर मैंने अपना पुश्तैनी मकान बेचा और समुद्र किनारे एक फ्लैट में रहने आ गई. वहां एक दिन शाम को पार्क में सैर करते व़क़्त मुझे रितु मिल गई…”

“क्या वह भी विधवा?”

“अरे, नहीं ममा. उसका पति जीवित था.

रिया बेहद अच्छे मूड में आकर मेरे पास बैठ गई और अपनी दोनों बांहें मेरे गले में डाल दीं. मैं समझ गई कि वह कुछ बात बताने के लिए उत्सुक है.

“ममा, मालूम है मैंने विवेक से शादी के लिए हां क्यों की?”

“तुम्हारी सहेली का भाई है और तुझे पसंद आ गया होगा?”

“वो भाई तो रितु का बचपन से ही है, तब से देखती आ रही हूं, पर मैंने उसे कभी इस एंगल से नहीं देखा था. जबकि रितु तो बात-बात में मुझे कहती रहती थी, ‘तुझे इस होटल का रवा डोसा पसंद है? अरे भैया को भी बहुत पसंद है…’ ‘क्या तुझे ‘रॉकस्टार’ फिल्म अच्छी लगी? अरे, भैया को भी बहुत अच्छी लगी…’ मैं तो उसकी बातों से बुरी तरह खीझ जाती थी. तब वह रोने-जैसा मुंह बनाकर बोलती थी. ‘तुझे लगता है मैं बातें बनाती हूं, लेकिन रिया सच, तुम्हारी क़सम! तुम्हारी और भैया की पसंद वाकई बिल्कुल एक जैसी है. तुम दोनों का स्वभाव भी काफ़ी मिलता है.”

“फिर?”

“मुझे उसकी बातों में रस आने लगा था. वह बात ही इतने मज़ेदार तरी़के से कह रही थी. फिर मैंने फ्लैश फॉरवर्ड में देखा कि हम दोनों की शादी हो गई. एक दूजे से नहीं, अलग-अलग जगह. हम अपनी-अपनी गृहस्थी में ख़ुश थे. बच्चे हो गए. उनकी भी शादियां हो गईं…”

मैं मुंह बाए सुन रही थी, पर मुझसे रहा नहीं जा रहा था.

“यह फ्लैश फॉरवर्ड क्या बला है?”

“अरे, बहुत सिंपल चीज़ है ममा. जैसे आप टीवी पर, सिनेमा में फ्लैशबैक देखती हैं. उसमें अतीत में घटी घटना आंखों के सामने साकार होने लगती है. ऐसा ही कुछ फ्लैश फॉरवर्ड में होता है, जिसमें हम अपने अनुमान के आधार पर भविष्य में कुछ घटित होता देखते हैं और वो सब कुछ एक चलचित्र की तरह हमारी आंखों के सामने चलता रहता है. हां, तो मैं बता रही थी कि फिर एक दौर ऐसा आया कि हम दोनों ही अकेले हो गए. उसकी पत्नी की मृत्यु हो गई और मेरा पति…”

“क्या?” मैं ज़ोर से चिल्ला उठी.

“घबराओ मत. ये सब मैंने फ्लैश फॉरवर्ड में देखा था. फिर मैंने अपना पुश्तैनी मकान बेचा और समुद्र किनारे एक फ्लैट में रहने आ गई. वहां एक दिन शाम को पार्क में सैर करते व़क़्त मुझे रितु मिल गई…”

“क्या वह भी विधवा?”

“अरे, नहीं ममा. उसका पति जीवित था. वह अपनी पोती को पार्क में घुमाने लाई थी. कुछ देर सुख-दुख की बातें चलती रहीं. मेरी बात ख़त्म होते ही वह बोल पड़ी. भैया भी बिल्कुल अकेले हो गए हैं. भाभी चल बसी और बच्चे विदेश में सेटल हो गए. वे भी आजकल इसी अपार्टमेंट में रहते हैं. लो, वे आ भी गए. मैंने बताया था न तुझे कि वे भी तेरी तरह शाम की सैर किए बगैर नहीं रह सकते. अब तुम दोनों बातें करो. मैं चलती हूं गुड़िया के दूध का वक़्त हो गया है. मैं विवेक को गौर से देखने लगी. अभी भी काफ़ी तंदुरुस्त और स्मार्ट लग रहे थे. हम रोज़ मिलने लगे और फिर हमने शादी का फैसला कर लिया. रितु ने ख़ुशी-ख़ुशी हम दोनों की शादी करवाई, तो मैंने सोचा, जो काम 40 साल बाद करना है, वह आज ही कर लिया जाए.”

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मैंने अपना सिर पकड़ लिया. “उ़फ्! यह आज की जनरेशन. क्या सोचती है, क्या बोलती है, क्या करती है, इन्हें कुछ होश नहीं रहता और ऊपर से तुर्रा ये कि हम स्पष्टवादी हैं. साफ़ बोलना पसंद करते हैं. लेकिन हम यदि दो बातें स्पष्ट सुना दें, तो इनका पारा चढ़ जाएगा. सोचकर मैंने मुंह सिल लेना ही बेहतर समझा. बड़ी मुश्किल से तो शादी के लिए राज़ी हुई है.

धूमधाम से विवाह संपन्न हुआ और देखते ही देखते नाज़ों पली बिटिया पराई हो गई. नाम के अनुरूप ही विवेक बहुत समझदार लड़का साबित हुआ. रिया प्रोफेशनली बहुत साउंड थी, लेकिन घर-गृहस्थी के मामले में थोड़ी कच्ची थी, पर विवेक के प्यार और विश्‍वास ने कभी गृहस्थी की गाड़ी डगमगाने नहीं दी. रिया जिस तरह मुझसे फोन पर खुलकर लंबी-लंबी बातें करती थी, उससे साफ़ ज़ाहिर होता था कि दोनों के बीच अच्छी अंडरस्टैंडिंग थी. स़िर्फ एक बात मुझे खटकती थी. दोनों जब भी दो-चार दिन की छुट्टियां लेकर आते, विवेक अपने शहर अपने घर चल देता और रिया मेरे पास रुक जाती. रितु की शादी के बाद वे लोग अपने पैतृक शहर जाकर बस गए थे.

“तुम कभी अपनी सास के पास छुट्टियां बिताने नहीं जाती रिया? विवेक या उसके माता-पिता कभी कुछ कहते नहीं? और न विवेक ही कभी यहां रुकता है?”

“यह हम दोनों ने आपस में तय कर रखा है ममा. अब क्या है बड़ी मुश्किल से कितने ही महीनों में दो-चार दिन की छुट्टी मिलती है, तो वह अपने ममा-पापा के पास रहना चाहता है और मैं आपके पास. फिर विवेक की ममा आपकी तरह हाउसवाइफ़ थोड़े ही हैं, वे वर्किंग वुमन हैं. मैं जाऊंगी, तो उन्हें असुविधा होगी. रितु भी अपने ससुराल में है. मेरे न जाने पर मां-बेटे पहले की तरह आराम से अपना व़क़्त गुज़ारते हैं. घूमते हैं, मिलकर पकाते-खाते हैं और गप्पे लड़ाते हैं. मैं दाल-भात में मूसलचंद नहीं बनना चाहती. दूसरे, चार दिन की छुट्टी में भी मैं वहां चली गई, तो फिर आपके पास कब रहूंगी?”

“पर बेटी?”

“हम सभी एक-दूसरे की मजबूरी को समझते हैं और इसलिए कोई इसे अन्यथा नहीं लेता. आप भी इन छोटी-छोटी बातों को लेकर परेशान न हों ममा.” रिया के समझाने पर मैंने सहमति में गर्दन तो हिला दी थी, पर दिल आशंकित ही रहा.

आम कामकाजी महिला की तरह रिया की ज़िंदगी की गाड़ी भी घर और ऑफिस के बीच हिचकोले खाती चलने लगी. कभी बाई नहीं आई, कभी कुक ने छुट्टियां ले लीं, कभी हाथ में चोट लग गई, कभी विवेक से खटपट… इन सब पर ऑफिस में भी बढ़ती ज़िम्मेदारी और तनाव. मैं अपनी ओर से भरसक उसकी समस्या सुलझाने का प्रयास करती, मुश्किलों से जूझने का हौसला भी देती, पर ख़ुद अंदर से टूट जाती. नन्हीं मासूम-सी जान कितने-कितने मोर्चे एक साथ संभालेगी? दिल की बेहद साफ़ और भोली रिया अक्सर ऑफिस में चल रही पॉलिटिक्स से परेशान हो उठती थी. “समझ ही नहीं आता ममा किस पर भरोसा करूं और किस पर नहीं? किसको काम के लिए हां कहूं और किसे साफ़ इंकार कर दूं? लगता है, हर कोई मुझ पर ही हावी हो रहा है.” मैं उसे समझाने का प्रयास करती, “बेटी, ऐसा तो हर ऑफिस में चलता रहता है.”

“आपको क्या पता? आप कब ऑफिस गईं?” वह तुनक उठती.

“नहीं गई. पर तुम्हारे पापा से और दूसरे लोगों से सुनती तो रहती हूं न? सब जगह ये ही ढाक के तीन पात हैं, पर जिनमें प्रतिभा है, जो परिश्रमी हैं, वे हर परिस्थिति से निबट लेते हैं और अधिक निखरकर सामने आते हैं.”

“आप ठीक कहती हैं ममा.” रिया का आत्मविश्‍वास लौट आता, तो मेरा मन भी प्रसन्न हो उठता.

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सप्ताहांत में दो छुट्टियों का संयोग देखकर रिया और विवेक ने घर आने का कार्यक्रम बना लिया. सुनकर मेरा मन मयूर नाच उठा और मैं बड़े उत्साह से उनके आने की तैयारियां करने लगी. लेकिन अपनी तैयारियों पर मुझे जल्द ही विराम लगाना पड़ा. रिया को पता चला, तो वह भी उदास हो उठी.

“क्या ममा! मेरी और विवेक की तो छुट्टी भी मंज़ूर हो गई है.”

“तो ऐसा कर इस बार तू भी उसके साथ अपने ससुराल हो आ. बहुत समय से तेरा वहां जाना नहीं हुआ. अब क्या करूं बेटा, तेरी मौसी का ऑपरेशन नहीं होता और वो नहीं बुलाती तो हम इस दौरान कहीं नहीं जाते. अब ऐसे अवसर पर ना भी नहीं कह सकते. ज़रूरत पड़ने पर घरवाले काम नहीं आएंगे, तो और कौन काम आएगा?”

“नहीं, नहीं. आप निश्‍चिंत होकर जाइए. मैं विवेक के संग मेरठ ही हो आती हूं.” रिया का निर्णय सुन मुझे कुछ तसल्ली मिली.

छोटी बहन का ऑपरेशन निबटाकर मैं घर लौटी, तब तक रिया की छुट्टियां समाप्त हो चुकी थीं और वे लोग भी अपने शहर लौट गए थे. मुकुल को ऑफिस रवाना कर मैं सूटकेस, बैग आदि खाली करने लगी. तभी रिया का फोन आ गया. वह ऑफिस जा रही थी. चहकते हुए उसने बताया कि उसका ससुराल का कार्यक्रम बहुत मज़ेदार रहा. “मम्मीजी और पापाजी तो इतने ख़ुश थे ममा कि मैं आपको बता नहीं सकती. उन्होंने भी अपने-अपने ऑफिस से दो-दो दिन की छुट्टी ले ली थी. हम पूरा मेरठ घूमे. मम्मीजी कह रही थीं कि वे तो हमेशा से चाहती थीं कि मैं भी विवेक के साथ छुट्टियों में उनके पास जाऊं. पर मेरी इच्छा न जानकर संकोच के मारे चुप रह जाती थीं. बता रही थीं कि इस बार विवेक भी ख़ूब खिला-खिला लग रहा है, वरना हमेशा तो आकर बस सोया रहता है. कहीं चलने को कहते हैं, तो कहता है सब देखा हुआ तो है. मैं तो यहां थकान उतारने आया हूं. पर इस बार तो उसका घूमने और खाने की फरमाइशों का दौर ही ख़त्म नहीं हो रहा है. यूं लग रहा है, जैसे दो ही दिनों में तुझे सब कुछ दिखा और खिला देना चाहता है. घर में कितनी रौनक़ हो गई है…” रिया की आवाज़ की चहचहाहट बता रही थी कि वह कितनी ख़ुश है. मैं आनंद के सागर में गोते लगाने लगी. उसकी बातें थीं कि ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थीं.

“और पता है ममा, उन्होंने मेरी ऑफिस संबंधी सारी समस्याएं चुटकियों में सुलझा दीं, जिन्हें आप भी नहीं सुलझा सकती थीं, क्योंकि आप वर्किंग नहीं हैं और विवेक भी नहीं सुलझा पाया था, क्योंकि वह वुमन नहीं है.” मैं अनायास ही मुस्कुरा उठी थी.

“उन्होंने मुझे घर और ऑफिस में तालमेल के इतने कारगर टिप्स बताए हैं कि मुझे सब कुछ बेहद आसान लगने लगा है. मम्मीजी तो वर्किंग वुमन होते हुुए भी घर को इतना सुव्यवस्थित और साफ़ रखती हैं कि मैं तो दंग रह जाती हूं. नौकर तो वहां भी हैं, पर उनसे काम लेने का भी एक तरीक़ा होता है, ये मुझे अब समझ आया. मैं उनसे विवेक की पसंद की कुछ डिशेज़ भी सीखकर आई हूं. और हां, उन्होंने मुझे एक बेहद ख़ूबसूरत घाघरा-चोली ड्रेस दिलवाई है, वो मैं नवरात्रि में पहनूंगी. मैंने और विवेक ने अब निश्‍चय किया है कि हम दोनों अब अपनी छुट्टियां ख़ुद को बांटकर नहीं, बल्कि छुट्टियों को बांटकर बिताएंगे. अगली छुट्टियों में विवेक भी मेरे साथ आपके पास रहेगा और लौटते समय हम दोनों दो दिन मेरठ रुकेंगे. क्यों ठीक है न ममा? आप तो हमेशा से यही चाहती थीं.”

“पर तू मानती कहां थी? तभी तो हमें जबरन मौसी के यहां जाना पड़ा.”

“जबरन? तो क्या मौसी का ऑपरेशन नहीं था?”

“अरे था. कैटरेक्ट (मोतियाबिंद) का छोटा-सा ऑपरेशन था. दो घंटे में करवाकर घर आ गए थे. उनकी बेटी लीना और दामादजी भी आए हुए थे. इसलिए ज़्यादा कुछ काम था ही नहीं. हम तो ऐसे ही अपनी तसल्ली के लिए चले गए थे.”

“ओह! तो मुझे सबक सिखाने के लिए यह योजना बनाई गई थी.”

“फिर क्या करती? मैंने फ्लैश फॉरवर्ड में देखा कि तेरे बार-बार अकेले आने से और विवेक के अकेले घर जाने से कोई भी ख़ुश नहीं था. पर तुम दोनों पति-पत्नी के निर्णय के बीच बोलकर कोई बुरा भी नहीं बनना चाहता था. बेटी, विवाह दो इंसानों का नहीं, दो परिवारों का मिलन होता है. दो इंसान निस्संदेह एक-दूसरे के साथ बेहद ख़ुश रह सकते हैं, लेकिन परस्पर जुड़ाव के लिए उसे दूसरे पक्ष से जुड़ी सभी चीज़ों से जुड़ना होता है. जैसे मुझे तुम अत्यंत प्रिय हो, तो तुमसे जुड़ा विवेक, उसके माता-पिता, भाई-बहन आदि स्वतः ही प्रिय लगने लगे. उनसे जुड़ाव तुम्हारे प्रति जुड़ाव बढ़ाएगा, घटाएगा नहीं. क्या तुम्हें नहीं लगता कि ससुराल से लौटने के बाद विवेक तुम्हें और भी ज़्यादा प्यार करने लग गया है?”

“हां ममा, बिल्कुल ऐसा ही है. मैं ख़ुद इस बदलाव पर हैरान हूं, पर तुम्हें कैसे पता चला?”

“अपनी फ्लैश फॉरवर्डवाली रील में मुझे सब कुछ साफ़-साफ़ नज़र आ रहा है.”

“ओह ममा, आपने तो मेरा तीर मुझ ही पर चलाकर मेरी ज़ुबान पर ताला लगा दिया है.” अपनी पराजय स्वीकारते हुए भी रिया की ख़ुशी छुपाए नहीं छुप रही थी.

shaili mathur

    शैली माथुर

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कहानी- डोर का धागा (Short Story- Dor Ka Dhaga)

Hindi Story

उसे अपने शरीर में एक लिजलिजाहट-सी महसूस हुई. अलग होने पर दुखी होने की बजाय ये सब भद्देपन का प्रदर्शन कर रही हैं. क्या अभय से तलाक़ लेकर वह भी ऐसी बन जाएगी. नहीं, वह तो कतई ऐसी नहीं बनना चाहती… घर-परिवार, बच्चे… सब उसे चाहिए. पुरुष के अपने जीवन में होने के सच को वह सुखद मानती है, कोई नफ़रत थोड़े ही है उसे अभय से या पुरुष सत्ता से…

अग्नि के समक्ष सात फेरे लेने से ही स्त्री-पुरुष क्या जन्म-जन्म के बंधन में बंध जाते हैं और फिर सात जन्मों तक उनका साथ हो जाता है… नहीं मानती मैं इन बातों को. सब बकवास है कि मन का मेल होने के लिए सात फेरे लेने ज़रूरी हैं और अब तो व़क्त इतना बदल गया है कि तन का मेल होने के लिए भी सात फेरे लेने की ज़रूरत ख़त्म हो गई है… जानती हूं कि मेरी सोच और बातें समाज विरोधी हैं और न जाने कितने धर्म के ठेकेदार यह सुनते ही मुझे समाज से बहिष्कृत करने को आतुर हो उठेंगे, पर यही सच है. तुम चाहो तो किसी का भी मन टटोलकर देख लेना.”

मनस्वी की बातें सुन हैरान सुधा के मुंह से केवल इतना ही निकला, “क्यों ऐसी बातें कर रही है. जो नियम है उसका पालन तो हमें करना ही होगा, चाहे इच्छा से, चाहे अनिच्छा से.” पर उसकी बात को अनसुना कर मनस्वी अपनी ही रौ में बोलती जा रही थी.

“देख न सुधा, कैसी विडंबना है यह भी कि भारतीय विवाह की परंपराओं में सात फेरों का चलन है. हिंदू धर्म के अनुसार सात फेरों के बाद ही शादी की रस्में पूरी होती हैं. सात फेरों में दूल्हा व दुल्हन दोनों से सात वचन लिए जाते हैं. ये सात फेरे ही पति-पत्नी के रिश्ते को सात जन्मों तक बांधते हैं. हर फेरे का एक वचन होता है, जिसमें पति-पत्नी जीवनभर साथ निभाने का वादा करते हैं. इसका मतलब तो यह हुआ कि विदेशों की शादियां सात जन्मों के लिए नहीं होती हैं. वहां तो वे फेरे लेते ही नहीं हैं. अच्छा ही है एक जन्म में ही पीछा छूट जाता है.” मनस्वी के स्वर में कड़वाहट थी.

“अरे वहां तो जब चाहे पीछा छूट जाता है, फिर शादी हुए दो दिन या दो महीने ही क्यों न हुए हों. वहां न समझौता करने की ज़रूरत है, न निभाने की मजबूरी. झट से डिवोर्स लिया और हो गए अलग.” सुधा ने माहौल को थोड़ा हल्का करने के ख़्याल से मज़ाकिया अंदाज़ में कहा.

“वही तो मैं कह रही हूं कि वहां जब सात फेरे और सात वचन लिए ही नहीं जाते, तो क्या जो लोग अलग नहीं होते, वे क्या एक-दूसरे का ख़्याल नहीं रखते! वे भी तो प्यार करते ही हैं एक-दूसरे को, फिर क्यों परंपरा निभाने के नाम पर हमारे यहां रिश्तों की ज़ंजीरों में बंधे रहने को बाध्य किया जाता है. क्या ज़िंदगीभर समझौता करते रहना जीने का सही तरीक़ा है?”

“देख मनस्वी, समझौता करने में कोई बुराई तो नहीं है, क्योंकि अलग होकर ज़िंदगी जीना भी आसान नहीं है. मैं यह नहीं कह रही कि तू सक्षम नहीं है और अकेले जीवन नहीं काट सकती, पर मुझे लगता है कि डिवोर्स लेने जैसा क़दम तभी उठाना चाहिए, जब तुम किसी और के साथ बंधने को तैयार हो. क्या तूने और कोई साथी ढूंढ़ लिया है, जो अभय से अलग होने का ़फैसला ले रही है? जो भी करना, बहुत सोच-समझकर करना. बात न फेरे लेने की है, न सात वचनों या सात जन्मों की, बात तो कमिटमेंट, विश्‍वास और समर्पण की है.”

सुधा की बात सुन मनस्वी सोच में पड़ गई. वह बेशक अभय के साथ नहीं रहना चाहती, पर किसी और की अपने जीवन में कल्पना तक नहीं कर सकती है. उसके मन में ऐसा ख़्याल तक कभी नहीं आया. अभय के सिवाय कोई और… नहीं, नहीं… मनस्वी सिहर उठी. वह बेशक एक मॉडर्न, एजुकेटेड और वर्किंग वुमन है, पर कहीं न कहीं भीतर परिवार और संग-साथ की इच्छा रखती ही है. अभय में बहुत सारी बुराइयां हैं, पर यह सच है कि जब भी उसके साथ होती है, वह सुरक्षित महसूस करती है. बस, यही शिकायत है कि अभय उसे समझने की कोशिश नहीं करता. उसकी काम की परेशानियों को उसके देर से आने का बहाना कह मज़ाक उड़ाता है और उसका दूसरे पुरुषों से बात करना उसके अंदर शक पैदा करता है. आख़िर क्यों नहीं वह उसे एक स्पेस देना चाहता.

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उसने कहीं पढ़ा था कि औरत भी पतंग की तरह होती है, जब तक उसकी डोर किसी के हाथ में होती है, वह इठलाती, इतराती आसमान में उड़ती रहती है. जब वह आसमान में लहरा रही होती है, तो सबकी नज़रें और सिर उसकी ओर होते हैं. सम्मान भाव होता है सबके मन में. हर कोई उसे संभालने के प्रयास में लगा रहता है. पूरा परिवार उसे संभालने के लिए एकजुट हो खड़ा रहता है, जैसे वह मानो उनकी ख़ुशियों का आधार हो, लेकिन जैसे ही वह पतंग कटती है, सबके चेहरे लटक जाते हैं और फिर वह या तो कट-फटकर इधर-उधर गिर जाती है या किसी के पैरों के नीचे आ जाती है. जाने-आनजाने हर कोई उसे रौंदता आगे बढ़ जाता है.

औरत भी जब तक एक डोर से बंधी रहती है, तो उसका मान-सम्मान बना रहता है, लेकिन डोर के टूटते ही उसके भटकाव की कोई सीमा नहीं रहती है.

“क्या सोचने लगी मनस्वी, बता न जो तू अभय से तलाक़ लेने की ज़िद कर रही है, क्या तू फिर से दूसरी शादी करेगी?”

“दूसरी शादी करने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता सुधा.” मनस्वी धीरे-से बोली. वह अंदर ही अंदर स्वयं को मथ रही थी जैसे.

“फिर क्या सारी ज़िंदगी अकेले काटने का इरादा है. माना तुझे फाइनेंशियली कोई प्रॉब्लम नहीं है, पर अकेलेपन को भरने कौन आएगा तेरे पास. तेरे भाई-बहन तो तुझे उकसा रहे हैं कि अभय से अलग हो जा, तो क्या वे तेरा साथ देंगे. याद रख, उनका अपना घर-संसार है. कुछ दिन तो वे तेरा साथ देंगे, पर फिर अपनी दुनिया में मस्त हो जाएंगे. ऐसा ही होता है. बेशक वे तुझसे प्यार करते हैं, पर उनकी अपनी भी ज़िम्मेदारियां हैं. इस कठोर सत्य को जितनी जल्दी तू स्वीकार लेगी, उतना अच्छा होगा. अभी पैंतीस साल की है तू. पूरी ज़िंदगी पड़ी है.”

“तो तू ही बता मैं क्या करूं? अगर मैं मां नहीं बन सकती, तो इसमें मेरा क़सूर है. अगर मैं अभय से ज़्यादा कमाती हूं, तो क्या इसमें मेरा कसूर है… अगर मैं उससे ज़्यादा कामयाब हूं, तो मेरा कसूर है… क्यों नहीं वह चीज़ों को सहजता से लेता, बस हमेशा मानसिक रूप से प्रताड़ित करता रहता है. हम साथ ख़ुश रह सकते हैं, पर वह तो जैसे ख़ुश रहने को कोई बड़ा क्राइम मानता है.” मनस्वी के आंसू बह निकले थे.

सुधा उसकी पीठ सहलाती हुई बोली, “चल मान लिया कि अभय में लाख बुराइयां हैं और तू कहती है कि वह तुझे नहीं समझना चाहता, पर क्या तूने कभी उसे समझने की कोशिश की है. शायद उसके मन में भी दुविधाओं के अनगिनत जाले हों.”

“सुधा, उसकी तरफ़दारी मत करो. सारे जाले उसने ख़ुद बुने हैं. मैंने उसे कभी ऐसा करने को मजबूर नहीं किया. उसके छोटे शहर की मानसिकता उसे यह सब करने के लिए उकसाती रहती है. शहर आना तो अच्छा लगता है, पर शहर के तौर-तरी़के और शहर की बीवी न जाने क्यों कुछ समय बाद आंख की किरकिरी बन जाती है.”

“तेरे सारे तर्क क़बूल… पर ज़रा सोच तो, उसके साथ बंधी तो हुई है, अभय नाम की डोर जिस दिन कट गई तो क्या होगा.”

“तो उसकी ज़्यादतियां सहन करती रहूं?”

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“मैं नहीं कहती कि तू ज़्यादतियां सहे, पर हो सकता है, जो तुझे उसकी ज़्यादतियां लग रही हों, वह उसका स्वभाव हो. ठोस ज़मीन पर पैर रखकर एक बार सोच मनस्वी. ये ज़्यादतियां तेरी उस ज़िंदगी से अच्छी होंगी, जो तुझे तलाक़ लेने के बाद झेलनी पड़ेंगी. आसान नहीं होता अकेले रहना… सुनने और पढ़ने में बेशक अच्छा लगे कि पति के ज़ुल्मों को सहने से इंकार करके, फलां ने विद्रोह किया और उसे कोर्ट में घसीटकर सबक सिखाया… औरत होने के हक़ की लड़ाई की… पर वास्तव में सच्चाई इसके विपरीत होती है. क्या किसी ने कभी यह ख़बर छापी है कि उस फलां औरत ने तलाक़ के बाद किस तरह ज़िंदगी काटी… यह औरतों की मर्दों के ख़िलाफ़ लड़ाई… कुछ तथाकथित फेमिनिस्टों की साज़िश है और तू इसका शिकार बन रही है.”

सही कह रही थी क्या सुधा… मनस्वी की आंखों के आगे अपनी ऑफिस की कुछ कलीग्स के चेहरे घूम गए. स्वयं को गर्व से फेमिनिस्ट कहनेवाली रीमा, तो अक्सर ही उसे तलाक़ लेने के लिए उकसाती आ रही है, वरना मनस्वी के दिमाग़ में इससे पहले कभी अभय से अलग हो जाने की बात आई ही नहीं थी.

अगले दिन जब वह ऑफिस गई, तो रीमा उसे देखते ही बोली, “क्या सोचा तूने. तलाक़ ले रही है न… मैं तो कहती हूं जूते की नोक पर रखना चाहिए इन मर्दों को. अरे, तू क्या किसी से कम है. मुझे देख, शादी के एक साल बाद ही अलग हो गई थी और अब अपनी मर्ज़ी से जीती हूं. कोई रोक-टोक नहीं है. मस्त लाइफ है अब यार.”

पूजा जो तीन साल से अलग रह रही थी, बोली, “मैंने तो बच्चा भी उसके पास ही छोड़ दिया. कस्टडी के लिए हल्ला कर रहा था, तो मैंने सोचा चलो ज़िम्मेदारी से छुट्टी मिल गई. हफ़्ते में एक दिन मिलने चली जाती हूं बेटी से.”

“मेरा एक्स हस्बैंड तो आज भी मेरे पीछे घूमता है, पर मैं घास नहीं डालती.” नैना ने आंखें मटकाते हुए कहा था.

“तुम भी हमारे फेमिनिस्ट क्लब का हिस्सा बन जाओ मनस्वी.” बेशर्मों की तरह हंसी थी रीमा उसे आंख मारते हुए.

उसे अपने शरीर में एक लिजलिजाहट-सी महसूस हुई. अलग होने पर दुखी होने की बजाय ये सब भद्देपन का प्रदर्शन कर रही हैं. क्या अभय से तलाक़ लेकर वह भी ऐसी बन जाएगी. नहीं वह तो कतई ऐसी नहीं बनना चाहती…

घर-परिवार, बच्चे… सब उसे चाहिए. पुरुष के अपने जीवन में होने के सच को वह सुखद मानती है, कोई नफ़रत थोड़े ही है उसे अभय से या पुरुष सत्ता से… अभय, समझो तो मुझे एक बार… नहीं कटने देना चाहती वह डोर को. थाम लेगी अब की बार वह डोर के धागे को…

देर ही हो गई थी उसे ऑफिस से निकलने में. फाइनेंशियल ईयर एंडिंग था… सारे डेटा दुरुस्त करने थे. वह टैक्सी लेने के लिए चलते-चलते ऑफिस के पास ही बने होटल तक आ गई थी. उसका एक कप कॉफी पीने का मन हो रहा था. वैसे भी सवारियों को छोड़ने आने के कारण टैक्सी यहां से तुरंत ही मिल जाती थी. वह होटल के अंदर घुसने ही वाली थी कि तभी एक जाना-पहचाना स्वर उसके कानों से टकराया.

“ओह, करण, तुम नहीं जानते कि मुझे तुम्हारी कितनी ज़रूरत है. अपने पति से अलग हो जाने के बाद खालीपन भर गया है ज़िंदगी में. मुझे अपनी ज़िंदगी में किसी पुरुष की ज़रूरत है. मैं जानती हूं कि तुम शादीशुदा हो, पर प्लीज़ मुझसे अलग मत हो…” नशे में धुत रीमा, एक पुरुष के कंधे का सहारा लेकर लड़खड़ाती हुई टैक्सी में बैठ रही थी.

Suman Bajpai

   सुमन बाजपेयी

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कहानी- स्वध्यान (Short Story- Swadhyan)

Hindi Kahani

सबके हंसते-खिलखिलाते चेहरों के बीच वो भी हंसती-खिलखिलाती काम किए जा रही थी. हर काम के लिए उसे पुकारा जाना, हर सलाह-मशवरे में उसकी राय लेना, इतना ही काफ़ी था उसका ये विश्‍वास कायम रखने के लिए कि सब उसे चाहते हैं, उसकी कद्र करते हैं. मगर तीन-चार दिनों से उसका ये विश्‍वास एक छलावा सिद्ध हो रहा है. उसे लग रहा है कि यह एक सोच-समझकर बुना गया भ्रमजाल है, जो उसके इर्द-गिर्द फैलाया गया है, ताकि कहीं किसी विद्रोही स्वर की गुंजाइश न बचे.

मानसी ने घड़ी पर नज़र डाली, 6 बज चुके हैं. उफ्! इतनी ज़ल्दी सुबह क्यों हो जाती है? उसके मानस पटल पर अगले तीन  घंटे चलनेवाला दैनिक घटनाक्रम घूमने लगा. बच्चों को उठाना, नहलाकर तैयार करना, पापाजी का बादाम दूध और स्प्राउट… मम्मीजी का चरणामृत… उफ्! उसे इतने काम सोचकर ही चक्कर आने लगे. झटके से चादर हटाकर उठना चाहती थी, मगर कमर जवाब दे गई थी. हफ़्ते भर से पीछे पड़ा बुखार कल विदा हो गया, मगर कमज़ोरी अभी भी साथ छोड़ने को तैयार नहीं थी. ऊपर से इस कमरदर्द ने आ जकड़ा था.

मानसी ने ख़ुद को इतना असहाय कभी महसूस नहीं किया होगा, जितना आज कर रही है. घर की बैकबोन, अकेली कर्ता-धर्ता गृहिणी के बिस्तर पर पड़े रहने से घर की सारी व्यवस्था ही चरमरा गई थी, कोई काम ठीक से और समय पर नहीं हो पा रहा था. जिधर देखो बिखरा सामान, बच्चों की क़िताबें, धुले-बेधुले कपड़े. मानसी को ऐसी अव्यवस्था की तनिक भी आदत नहीं है. बीमारी से ़ज़्यादा बदहाल घर ने उसे फ्रस्ट्रेट कर रखा है. कल ख़ुद से वादा करके सोई थी कि सुबह उठेगी और घर की गाड़ी वापस पटरी पर ले आएगी, मगर आज उसकी कमर धोखा दे गई.

अब चाहे जो भी हाल हो, काम तो करने ही हैं. उसने एक स्ट्रॉन्ग पेनकिलर निगला, ख़ुद को संयत किया और उठ खड़ी हुई. “शुभम, शैली उठो, स्कूल को देर हो जाएगी.” बच्चों को उठाकर बाहर आई. पतिदेव नितिन हॉल में अख़बार पढ़ रहे थे, चाय शायद ख़ुद बना ली है. मांजी नहाने जा चुकी हैं. बाथरूम से ही मंत्रों की आवाज़ें आ रही हैं. उनका पूजा-पाठ नहाने के साथ ही शुरू हो जाता है. रसोई में आई, तो देखा कुछ भी काम शुरू नहीं हुआ. लाचारी मिश्रित ग़ुस्सा उबलने को तैयार है. मन किया फट पड़े सभी पर. घर में किसी का भी दुख-दर्द हो, हारी-बीमारी हो, बढ़-चढ़कर सेवा की है और ये लोग उसे हफ़्ता भर भी न निबाह पाए. माना नितिन को ऑफ़िस जाना है, तो क्या थोड़ा जल्दी उठकर अख़बार पढ़ने की बजाय बच्चों को तैयार नहीं कर सकते? मम्मीजी उठकर सीधे नहाने और पूजा-पाठ करने की बजाय बच्चों के टिफ़िन तैयार नहीं कर सकतीं? पापाजी 5 बजते ही सैर और योगा के लिए क्लब चले जाते हैं और फिर नाश्ते तक का समय अख़बारों के ढेर में घिरे बिताते हैं, क्या वो बच्चों को बस स्टॉप तक छोड़ने की ज़िम्मेदारी भी नहीं उठा सकते?

आज तक उसने ऐसा कुछ नहीं सोचा था, जो आज सोच रही है. अब तक ज़रूरत ही नहीं पड़ी कभी. हफ़्ते भर पहले तक सब सामान्य था. पिछले 12 सालों से सभी की पसंद-नापसंद और ज़रूरतों का ख़्याल रखते हुए घर के सभी काम नियत समय पर आगे से भाग-भागकर किए जा रही थी, वो भी स्वेच्छा और ख़ुशी के साथ. अजीब-सी संतुष्टि मिलती थी उसे ऐसा करके. सास- ससुर तारीफ़ करते नहीं थकते थे. बड़ी क़ाबिल है हमारी बहू. घर के साथ-साथ बाहर के सभी कामों को भी बख़ूबी करती है. कार ड्राइव करती है, तो बच्चों को क्लासेस में लाना-ले जाना, ख़रीददारी, बैंक के काम सभी वही निपटा लेती है. ‘मानसी तुम न होती तो ये घर कैसे चलता, इस घर के लिए तुम्हारा जो कॉन्ट्रीब्यूशन है उसका कोई मूल्य नहीं है.’ नितिन भी अक्सर प्रशंसा करते. ऐसी तारीफ़ ही उसे थकान के बावजूद निरंतर कार्यरत रहने की ऊर्जा प्रदान करती थी. ख़ुद को लकी समझती थी वो. उसके जैसी कितनी ऐसी गृहिणियां हैं, जो गृहकार्यों की अनवरत् चलनेवाली चक्की में पिसती जाती हैं, मगर कहीं किसी प्रशंसा के दो बोल भी सुनने को नहीं मिलते. उनके हर काम को टेक इट फॉर ग्रांटेड लिया जाता है, मगर उसे कितनी सराहना मिलती है. ख़ासकर उसके बनाए हुए खाने को लेकर. पापाजी तो मम्मीजी को कह भी देते हैं, ‘तुम तो अब किचन में हाथ मत ही लगाओ तो अच्छा है, बहू जैसी पाक कला तुममें कहां?’ और चाहे-अनचाहे मम्मीजी ने इस तथ्य को स्वीकारते हुए अपना कार्यक्षेत्र सीमित कर लिया. सबके हंसते-खिलखिलाते चेहरों के बीच वो भी हंसती-खिलखिलाती काम किए जा रही थी. हर काम के लिए उसे पुकारा जाना, हर सलाह-मशवरे में उसकी राय लेना, इतना ही काफ़ी था उसका ये विश्‍वास कायम रखने के लिए कि सब उसे चाहते हैं, उसकी कद्र करते हैं. मगर तीन-चार दिनों से उसका ये विश्‍वास एक छलावा सिद्ध हो रहा है. उसे लग रहा है कि यह एक सोच-समझकर बुना गया भ्रमजाल है, जो उसके इर्द-गिर्द फैलाया गया है, ताकि कहीं किसी विद्रोही स्वर की गुंजाइश न बचे.

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इससे पहले जब कभी बुखार आया, पेनकिलर खाकर किसी भी तरह खड़ी हो जाती थी. धीरे-धीरे ही सही सब निपटा देती थी, मगर इस बार शरीर साथ नहीं दे रहा है. नितिन ने कह दिया कि मेरे नाश्ते-टिफ़िन की चिंता मत करो, ऑफ़िस में खा लूंगा. मम्मीजी भी अपना और पापाजी का टोस्ट व दाल-रोटी से काम चला रही हैं, मगर उसका क्या?  और बच्चे, नित नए व्यंजन खानेवाले बच्चे कब तक टोस्ट व दाल-रोटी खा पाएंगे? उनके कपड़े, यूनिफ़ॉर्म, होमवर्क, प्रोजेक्ट वर्क – वो सब कौन देखेगा? इतने सालों में पहली बार स्कूल से शिकायत आई है. शैली का प्रोजेक्ट समय पर नहीं बना, कोई साथ बैठकर कराता तभी तो. पापाजी चाहते, तो बनवा सकते थे, ग्लोबल वॉर्मिंग पर ही तो था. सबने अपना-अपना खाना-पीना संभाल लिया, पर इससे आगे कुछ करने की किसी ने ज़रूरत नहीं समझी. क्या इसी को कहते हैं सहयोग देना और ख़्याल करना?

मम्मीजी ने भी दो दिन तो हालचाल पूछा, तीसरे दिन स्वर से चिंता और झल्लाहट टपकने लगी. “अभी भी बुखार उतरा नहीं क्या? खड़ी नहीं हो पा रही हो क्या? दवाई बदल कर देख लो.” चेहरे के भाव स्पष्ट थे- बहुत आराम हुआ, अब खड़े होकर घर संभालो. नितिन भी एक-दो दिन सपोर्ट दिखाकर तीसरे दिन से रूटीन लाइफ़ में व्यस्त हो गए. सबसे ज़्यादा बच्चों पर बन आई है. अब न कोई उन्हें टीवी से हटकर पढ़ाई करने को कहता है, न ही कोई रात को ज़बरदस्ती ब्रश कराता है. किसी-किसी दिन तो बगैर नहाए ही स्कूल चले गए हैं. छठे दिन बुखार उतरा, तो मम्मीजी ने राहत की सांस ली और पहले की तरह अपने रूटीन पूजा-पाठ में लग गईं. ये पूछना भी ज़रूरी नहीं समझा कि मेरी सुबह उठकर काम करने की हालत है भी या नहीं… मानसी के विचारों की अनवरत धारा बहे जा रही थी. सोचते-सोचते बच्चों का नाश्ता, टिफ़िन कब तैयार हो गए, उसे पता ही नहीं चला. मानसी दोहरे अवसाद में है. पहला यह कि उसे घरवालों का रवैया ग़ैरज़िम्मेदाराना लग रहा है और दूसरा यह कि अब उसका शरीर उसकी ज़िम्मेदारियों से लय नहीं मिला पा रहा है.

“नितिन आज बच्चों को स्कूल बस में बैठा कर ऑफ़िस जाना.” स्वर आदेशात्मक था और गंभीर भी, नितिन कोई ना-नुकुर नहीं कर पाए.

मम्मीजी पूजा से निपटकर रसोई में आ गई हैं. “बहू पापाजी के लिए कुछ तैयार किया क्या?” मानसी ने प्रत्युत्तर नहीं दिया. इतनी ऊर्जा भी शेष नहीं बची है कि किसी से उलझ सके. बच्चों का काम ख़त्म कर चुपचाप कमरे में आकर लेट गई. उसके विचित्र व्यवहार से मांजी हतप्रभ थीं. नितिन भी कुछ घबरा गए.

“तबियत अभी भी ठीक नहीं है क्या? मेरी चिंता मत करना, मैं ऑफ़िस में कुछ खा लूंगा.”

“तुम्हारी चिंता नहीं, अपनी चिंता है मुझे.” स्वर तीखा हो चला.

“डॉक्टर को कंसल्ट…”

“थैंक्स, मैं अपना ख़ुद देख लूंगी.” मानसी ने बात बीच में ही काट दी. नितिन ने चुपचाप कमरे के बाहर जाना ही बेहतर समझा.

पेनकिलर अपना असर दिखा चुकी थी, मानसी हिम्मत बटोरकर अपनी फैमिली डॉक्टर से कंसल्ट करने चली गई. सभी रिपोर्ट साथ ले ली थी. उसने पिछली बार न जाने क्या-क्या टेस्ट और एक्स-रे बताए थे. सभी रिपोर्ट देखकर डॉक्टर कुछ देर मौन रही.

“सब ठीक तो है न डॉक्टर?”

“हूं… मेरी नज़र से तो कुछ भी ठीक नहीं है. हां, मगर तुम्हारे जैसी औरतों के लिए ये कुछ ख़ास बात नहीं है. तुम्हारे लिए तो ख़ास बात उस दिन होती है, जब तुम बिल्कुल ही बिस्तर पकड़ लेती हो.”

“क्या मतलब? मैं समझी नहीं.”

“मतलब ये मानसी कि तुम्हारी सभी रिपोर्ट मुझसे तुम्हारी ये शिकायत कर रही हैं कि घर में सबका बख़ूबी ख़्याल रखनेवाली मानसी ने अपना ज़रा भी ख़्याल नहीं रखा. तुम में कैल्शियम, विटामिन ‘बी-12’ की ज़बरदस्त कमी है. हीमोग्लोबिन भी बहुत कम है और तुम्हारी स्पाइन का एक्स-रे बता रहा है कि अगर तुमने तुरंत फ़िज़ियोथेरेपी और प्रॉपर एक्सरसाइज़ शुरू नहीं की, तो कभी भी स्लिप डिस्क हो सकती है.”

“डॉक्टर, आप तो जानती हैं मेरे घर का हाल, मरने तक की फुर्सत नहीं निकाल पाती हूं.”

“हां, मैं अच्छे से जानती हूं और ये वाला जुमला तो मैं रोज़ अपने न जाने कितने पेशेंट से सुनती हूं, जिन्हें लगता है कि दुनिया उनके दम पर ही चल रही है. अगर उन्होंने अपनी व्यस्त दिनचर्या के कुछ लम्हे ख़ुद को दे दिए, तो संसार में बड़ी भारी उथल-पुथल मच जाएगी. अच्छा, ज़रा सोचकर बताओ तुम्हारी हफ़्ते भर की बीमारी ने घर को हिलाकर रख दिया, तो अगर अगली बार ये अवधि ज़्यादा बढ़ गई, तो फिर उनका क्या होगा? तब क्या तुम्हारे बच्चे परेशान नहीं होंगे और अगर तुम्हें स्पाइन की कोई बड़ी प्रॉबल्म हो गई, तो संभव है महीनों बिस्तर पर रहना पड़े, तब क्या करोगी?”

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डॉक्टर की बातों ने मानसी को हिला दिया. पिछले एक हफ़्ते में जो उसके बच्चों पर गुज़री थी, उसके दोहराव की बात सोचकर ही वो कांप उठी. बच्चों के साथ वो किसी बात पर समझौता नहीं कर सकती थी. उनके खान-पान, पढ़ाई, स्वास्थ्य आदि को लेकर वो बेहद सजग थी. डॉक्टर ने अपना काम कर दिया था. कुछ फूड सप्लिमेंट्स, कुछ दवाइयां, लगातार 15 दिनों की फ़िज़ियोथेरेपी और प्रॉपर रेस्ट प्रिस्क्राइब कर दिया. इससे ज़्यादा वो कुछ नहीं कर सकती थी. इससे आगे जो कुछ करना था, मानसी को ही करना था. उसे पता था, इस बिज़ी शेड्यूल से दो-तीन घंटे अपने लिए निकालना टेढ़ी खीर है. घर में सब को जी हुज़ूरी की आदत जो लगी हुई है, मगर वो जानती थी कि इसके लिए वो स्वयं ही ज़िम्मेदार है. शैली 10 और शुभम 8 साल का है. मगर अभी तक वही उनके सारे काम कर रही है. चाहे कपड़े निकालकर देना हो, बाथरूम में तौलिया पकड़ाना हो, जूते-चप्पलें व्यवस्थित रखना हो, बैग लगाना हो या फिर बाल बनाना हो. हर काम के लिए वे उसी पर निर्भर हैं. हों भी क्यों न, उसने कभी कोशिश ही नहीं की, उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की. ममता में अंधी होकर उसने कभी ये भी नहीं सोचा कि ऐसी आदतें आगे बच्चों को दुख देंगी और उसे भी. तभी उसकी हफ़्तेभर की बीमारी ने बच्चों पर इतना बुरा असर डाला. अगर वो अपने काम ख़ुद करना जानते, तो इस समय न उसे परेशानी होती, न ही उन्हें. ख़ैर जो हो गया, उसके बारे में सोचकर कुढ़ने से क्या फ़ायदा? अब आगे कैसे स्थिति सुधारी जाए, इस पर ध्यान देना है. सबका अच्छे से ध्यान रखने के लिए उसे अपना ध्यान रखना ही होगा. धीरे-धीरे ही सही, सब ठीक हो जाएगा. मन में सकारात्मक पहल लिए मानसी घर की ओर चल पड़ी.

“आ गई बहू, क्या बोली डॉक्टर? सब ठीक है न?” मांजी चिंतित थीं.

“हां, अभी तक तो सब ठीक, मगर…”

“चलो शुक्र है भगवान का.” मांजी मानसी की बात बीच में ही काटते हुए ईश्‍वर को धन्यवाद देने लगीं. इतना भर सुनकर ही उनकी समस्त चिंताएं दूर हो गई थीं. इससे आगे कुछ डिटेल जानने की न उन्हें ज़रूरत थी, न ही चाहत. “लंच के लिए काफ़ी देर हो गई है. ऐसा करो कुछ हल्का-फुल्का ही बना लो. तुम्हारे पापाजी भी आते होंगे.” मांजी ने फटाफट आदेश दिया.

“मेरी तो अभी हिम्मत नहीं है. आपने पीछे कुछ नहीं बनाया है, तो फिर कुछ बाहर से ही ऑर्डर कर दीजिए.” मानसी ने स्पष्ट लाचारी व्यक्त की. जवाब सुन मांजी के चेहरे पर भले ही तनाव की रेखा खिंच गई थी, मगर मानसी ने ख़ुद को बेहद हल्का महसूस किया. उसे लगा जैसे इतना कहने भर से ही उसके ऊपर लदा भारी लबादा एकाएक उतर गया. शायद एक निश्‍चित निर्णय पर पहुंचकर असंभव-सी दिखनेवाली चीज़ें भी आसान हो जाती हैं.

“तेरे पापाजी को तो बाहर का खाना बिल्कुल भी पसंद नहीं. बेकार में उनका मूड बिगड़ जाएगा.”

“तो फिर आप देखिए, कैसे मैनेज करना है. वैसे स़िर्फ आज ही की बात है, कल से एक नौकर आ रहा है. मैंने बात कर ली है, वो घर के ऊपर के काम के साथ-साथ खाना भी बना लिया करेगा.”

“मगर तेरे पापाजी को तो नौकरों के हाथ का बिल्कुल नहीं चलता.” स्वर के साथ-साथ चेहरे पर भी कड़वाहट छितरने लगी.

“तो फिर पापाजी के लिए आप देख लेना, बाकी सबका वो बना दिया करेगा.”

“फिर तुम क्या करोगी?” लगभग चीखती-सी मांजी पहली बार अपना आपा खो बैठीं.

“मुझे अब ख़ुद को भी समय देना है.” संक्षिप्त-सा उत्तर देकर मानसी अपने कमरे की तरफ़ बढ़ चली. वो विस्मित थी. कितनी बड़ी बात हो गई आज घर में, जीवन में पहली बार उसके और सासू मां के बीच इस तरह की बात हुई, मगर उसे न कोई ग्लानि है, न ही कोई चिड़चिड़ाहट, बल्कि वो ख़ुद को बेहद शांत और सहज महसूस कर रही है.

बच्चे स्कूल से आ चुके थे. मानसी उनका खाना-पीना अच्छे-से निपटाकर ऊपर अपने कमरे में ले गई. मांजी घंटे भर से अपने कमरे में अकेले बैठी बड़बड़ा रही थीं, जब बात बर्दाश्त से बाहर हो चली, तो रहा न गया. सोचा बहू की ऐसी बेअदबी बिल्कुल नहीं सहेगी. जो भी हो, वो अभी भी घर की बड़ी हैं. माना बहू को थोड़ी ढील दे रखी थी, मगर ज़रूरत पड़ने पर लगाम कसना उन्हें आता है. अगर वो चाहती है कि घर के कामकाज से कटकर बस अपने बच्चों का करे, तो इस घर में ऐसा नहीं चलेगा. उसके बिगड़े तेवर ठीक करने ही पड़ेंगे. रौद्र रूप धारण किए मांजी मानसी के कमरे की ओर बढ़ चलीं, मगर अंदर से आती आवाज़ों ने उनके क़दम रोक दिए. मानसी बच्चों को अपनी बिगड़ती सेहत और उनकी ज़िम्मेदारियों के बारे में समझा रही थी और बच्चे उससे वादा कर रहे थे कि वो न स़िर्फ अपने काम अच्छे से करेंगे, बल्कि अपनी प्यारी मम्मी की सेहत का भी ध्यान रखेंगे. मांजी सब चुपचाप सुन रही थीं. उन्होंने महसूस किया कि उनके पैर कमरे में दाख़िल होने को तैयार नहीं हैं और वो बोझिल क़दमों से अपने कमरे में वापस लौट गईं.

 

Deepali Agarwal

दीपाली अग्रवाल

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कहानी- शेष प्रश्‍न… (Short Story- Shesh Prashan…)

Hindi Story

“दीदी, आप मेरी गुरु हैं, इसलिए आपके घर आ सकती हूं, वरना जिस घर में लड़के होते हैं, वहां मां मुझे जाने ही नहीं देतीं. कहीं कोई ऊंच-नीच न हो जाए.” उसकी सहज साधारण-सी बात पर मैं मुस्कुरा उठी थी.

“और फिर मैंने उन्हें बताया ही नहीं है कि आपका एक युवा बेटा भी है.” सुनकर मैं चकित हुई थी और उसी दिन समझ गई थी कि उसके व्यक्तित्व के जिस मासूम आवरण को आज तक देखा है, उसके नीचे और भी परतें हैं. लड़की अपने लक्ष्य तक पहुंचने की बैसाखियां खोजना जानती है.

दूर खड़ी वो क्षीणकाय लड़की सीमा-सी लग रही थी. यहां कोर्ट में क्या कर रही है? वो तो कनाडा जा चुकी होगी. मेरा भ्रम होगा सोचकर मैं आगे बढ़ने लगी. इतने में ही उसकी आवाज़ ने पैरों में बेड़ियां पहना दीं. “दीदी आप? कितने दिनों बाद मिली हैं.”

“हां, बहुत दिनों बाद तुम्हें देख रही हूं. तुम कैसी हो? यहां कैसे?” उसके चेहरे पर पसरा मौन अनकहे ही बहुत कुछ कह गया था. चिरपरिचित गुलाबी आभा जाने कहां लुप्त हो गई थी?

“क्या बताऊं दीदी, अब हारकर कोर्ट में केस किया है. उसे मैं छोड़ूंगी तो नहीं. अब तो न उसके घरवाले बात करते हैं, न ही उससे कोई संपर्क रहा है.” सीमा अपने कनाडा स्थित एनआरआई पति से परेशान है. उड़ती-सी ख़बर काफ़ी पहले मेरे कानों में भी पड़ी थी. एक बार सीमा का फोन भी आया था. किसी नारी सहयोगी संस्था का पता अपनी किसी सहेली की मदद के लिए मांगा था.

“दीदी, मेरे साथ छल हुआ है.” विवशता से छलकती उसकी आंखें देखकर मैं समझ चुकी थी कि निराशा से उपजे अवसाद के कठिन क्षणों को वो शायद शिद्दत से झेल रही है. “हिम्मत रखो, सब ठीक हो जाएगा.” मैंने पीठ थपथपाते हुए कहा. “हां दीदी, मगर उसे तो सबक सिखा के रहूंगी.” क्रोध से उसका चेहरा क्षणभर को लाल हो उठा.

“दीदी, आपसे पता लेकर मैं उस नारी संस्था के लोगों से मिली थी. उन्होंने भी साथ देने का आश्‍वासन दिया है. बस, ये सारा झंझट निबट जाए, तो फिर से घर बसा लूं.  बहुत भागदौड़ रही हूं पिछले दो बरसों से. थक चुकी हूं.” कुछ ही पलों की व्याकुलता के बाद फिर वही महत्वाकांक्षी सीमा मेरे सामने थी. “दीदी, शादी के लिए एक-दो प्रस्ताव आए भी हैं. एक विधुर हैं, उनका अपना व्यापार है. दूसरे तलाक़शुदा हैं, उनकी इंक फैक्टरी है. काफ़ी संपन्न घराने से हैं. गाड़ी-बंगला सब है, परंतु जब तक तलाक़ नहीं मिल जाता, मेरी ज़िंदगी तो अधर में ही लटकी रहेगी.”

“घबराओ नहीं, सब ठीक हो जाएगा.” सीमा से विदा ले जब घर पहुंची, तो सारा घर अस्त-व्यस्त पड़ा था. मुझे देखते ही दोनों बच्चे घर को व्यवस्थित करने में जुट गए, लेकिन मेरे मन की उथल-पुथल कैसे व्यवस्थित हो सकेगी? सीमा के सुख की कामना के साथ विचारों की मंजूषा खुलने लगी थी. ऐश्‍वर्य और चकाचौंध में जीने की लालसा सहेजे, धन-दौलत की कसौटी पर रिश्तों को तोलती यह लड़की क्या वास्तव में गृहस्थी और विवाहित जीवन का अर्थ समझ पाएगी?

12वीं कक्षा तक सीमा मेरी छात्रा रही है. ज़माने से अलग-थलग उसका भोला व्यक्तित्व मुझे अचंभित करता था. आज के युग में जहां लड़कियां स्वतंत्र निर्णय लेना अपना अधिकार समझती थीं, वहीं इसके लिए माता-पिता की इच्छा किसी वेद वाक्य से कम नहीं थी. बेहद आज्ञाकारी और अनुशासनपूर्ण व्यवहार औरों के लिए आदर्श स्वरूप था.  मेरे घर कभी-कभी पढ़ने आ जाती थी. मेरे दोनों बच्चे अंकित व अनुभा बराबर के-से थे. अनुभा के साथ सहज मित्रता थी, लेकिन अंकित की उपस्थिति में असहज होने लगती थी. “दीदी, आप मेरी गुरु हैं, इसलिए आपके घर आ सकती हूं, वरना जिस घर में लड़के होते हैं, वहां मां मुझे जाने ही नहीं देतीं. कहीं कोई ऊंच-नीच न हो जाए.” उसकी सहज साधारण-सी बात पर मैं मुस्कुरा उठी थी.

“और फिर मैंने उन्हें बताया ही नहीं है कि आपका एक युवा बेटा भी है.” सुनकर मैं चकित हुई थी और उसी दिन समझ गई थी कि उसके व्यक्तित्व के जिस मासूम आवरण को आज तक देखा है, उसके नीचे और भी परतें हैं. लड़की अपने लक्ष्य तक पहुंचने की बैसाखियां खोजना जानती है. माता-पिता को अंधेरे में रखने की बात ज़रूर गले नहीं उतरी थी. शायद इस बात को महत्वहीन समझना गुरु की हैसियत से मेरा अपराध भी था.

परिवार में पढ़ाई का माहौल न होते हुए भी अनवरत परिश्रम के बलबूते कुछ बनने की महत्वाकांक्षा सीमा में मुझे स्पष्ट दिखती थी. वो जानती थी, यदि पढ़ाई में ढील हुई, तो स्कूल छुड़ा दिया जाएगा, लेकिन उसे तो पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी करके वैभवपूर्ण ज़िंदगी चाहिए थी. किसी बड़े अधिकारी या संपन्न व्यापारी से विवाह का सपना था. मैं उसकी महत्वाकांक्षा से प्रसन्न भी होती थी और डरती भी थी. कहीं कुछ ग़लत न कर बैठे. फिर भी मैंने इसे मात्र कुंआरे मन के दिवास्वप्न से अधिक कुछ भी नहीं समझा था. सोचती थी, समय से बड़ा गुरु कौन हो सकता है? स्वयं ही समझ जाएगी.

12वीं के बाद आगे की पढ़ाई के ख़र्च के लिए सीमा ने अंशकालिक नौकरी ढूंढ़ ली. नौकरी की मंज़ूरी आसानी से नहीं मिली थी, लेकिन इच्छाशक्ति का संबल था, तो साधन भी जुट गए. ग्रेजुएशन के बाद सीमा को एक विज्ञापन कंपनी में नौकरी मिल गई थी. कंपनी के मालिक उनके परिचित थे. सीमा की योग्यता व लगन से प्रभावित हो, उन्होंने उसके पिता को हर प्रकार की देखभाल का आश्‍वासन दिया था. घर में चार पैसे आने लगे, तो अनजाने ही माता-पिता का अंकुश ढीला पड़ने लगा.

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एक शाम सीमा का उत्साह देखते ही बनता था. उसे एक बड़ी विज्ञापन कंपनी में नौकरी मिल गई थी. 30 हज़ार रुपए वेतन था. मैं ख़ुश थी उसकी तरक़्क़ी से, लेकिन उस शाम मेरा मन आशंकित हो हतप्रभ हो गया, जब वो बड़ी सहजता के साथ अनुभा को बता रही थी, “अपने देसाई सर को मैंने सौगंध दिला दी है कि मेरी नई नौकरी की ख़बर मेरे घर तक न पहुंचने पाए, वरना मुझे घर बैठना पड़ जाएगा. अनजान लोगों के बीच मेरे पापा मुझे कभी नौकरी नहीं करने देंगे.”

“कभी न कभी तो पता लग ही जाएगा. कभी कोई फोन या मिलनेवाला आ गया तो?” अनुभा ने टोका था.

“वो सब मैंने सोच लिया है. फोन या विज़िटर के आने पर देसाई सर कह देंगे कि मैं  मीटिंग में हूं या कहीं बाहर गई हूं और फिर सर मुझे फोन करके बता देंगे. मैं उस व्यक्ति को फोन कर लूंगी. मैंने पूरी योजना बना ली है. हर पहलू पर हर दृष्टिकोण से सोच लिया है.” सीमा आत्मविश्‍वास से चहक रही थी.

“लेकिन देसाई सर ऐसा करेंगे क्यों?”

“क्यों नहीं करेंगे? मैं रोज़ एक घंटे उनका काम मुफ़्त जो करूंगी.”

सचमुच विस्मित थी मैं उसकी दूरदर्शिता पर. उसकी दुनियादारी व होशियारी पर चाहकर भी कुछ नहीं कह पाई. माता-पिता के भरोसे को अनदेखा कर सफलता के सोपान चढ़ती लड़की को इस अवस्था में नैतिकता का पाठ पढ़ाने का मतलब होगा, भैंस के आगे बीन बजाना. इस नौकरी के दौरान सीमा में नित नए परिवर्तन परिलक्षित होने लगे थे. ख़ूबसूरत तो वो थी ही, पर अब और भी निखर गई थी. अपने रूपाकर्षण से वो भी अनभिज्ञ नहीं थी. प्रतिभा की धनी तो थी ही. जतन से संवारी देह के कारण वो स्त्रियों की ईर्ष्या, लेकिन पुरुषों के आकर्षण का केंद्र बनी. बचपन से अभावों में पली बेटी को माता-पिता द्वारा तलाशे रिश्ते रास नहीं आ रहे थे. समृद्ध घराना व ऐश्‍वर्ययुक्त साथी की खोज में कई वसंत सरक गए. माता-पिता ढीले पड़ गए. घर आई लक्ष्मी को तो भरे-पूरे ब्राह्मण भी नहीं लौटाते हैं, फिर यहां तो आवश्यकताओं का तकाज़ा था.

फिर अचानक एक दिन सुनाई दिया कि  सीमा की शादी हो गई. कई दिन बाद सीमा मुझसे मिलने आई. हाथों में सोने के भारी जड़ाऊ कंगन, तीन लड़ीवाले मंगलसूत्र में लटकता हीरे का अर्धचंद्राकार पेंडेंट, बड़े-बड़े हीरे के कर्णफूल और महंगी साड़ी से मेलखाती मयूर पंखी बिंदिया. चेहरे पर उल्लास बिखरा पड़ा था. मुझे देख नज़रें झुका लीं थी. क्षमा प्रार्थिनी-सी बोली थी, “दीदी, सब कुछ बहुत जल्दी में हो गया. किसी को आमंत्रित करने का समय ही नहीं मिला. 12 तारीख़ को रमेश कनाडा से आए और 15 तारीख़ को हमारी शादी हो गई.”

“सीमा, तुम ख़ुश तो हो न?”

“हां दीदी, बहुत. कनाडा में उनका बहुत बड़ा व्यापार है. तीन गाड़ियां हैं.” उसका चेहरा उल्लास से खिला जा रहा था.

“समय हो तो किसी दिन तुम लोग खाने पर आओ.”

“रमेश तो चले गए, अब मुझे भी जाने की तैयारी करनी है. वो तो स़िर्फ 15 दिनों के लिए ही आए थे. शादी के बाद हम तुरंत ही हनीमून के लिए निकल गए. लौटकर दो दिन उनकी बहन के पास रहे. मैं इंडिया से बिल्कुल कट न जाऊं, इसलिए एक फैक्टरी यहां भी लगाने की सोच रहे हैं.”

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“बहुत अच्छी बात है. इतना प्यार करनेवाला पति मिला है.” उसके वैभव व भाग्य को सराहने के बावजूद मेरी स्त्री सुलभ जिज्ञासा ख़त्म नहीं हो पाई. “ये संबंध किसी परिचित के माध्यम से हुआ है या…” सीमा फिर हंसी, “नहीं दीदी, एजेंट द्वारा हुआ है, सारा पत्र-व्यवहार, मेल-मिलाप व बातचीत मैंने ख़ुद की है. मेरे इस रिश्ते पर रिश्तेदारों को भी जलन हो रही है.” उसकी आवाज़ में उपलब्धि का आभास था.

उसके जाने के बाद बहुत कुछ सोचती रही. फिर काफ़ी दिनों तक सीमा से मुलाक़ात नहीं हुई. सोचा कनाडा चली गई होगी. ज़रूरी तो नहीं कि मुझे बताकर ही जाती. क़रीब एक साल बाद अचानक एक दिन सीमा का फोन आया, तो मैंने उलाहना दिया, “बिना मिले ही चली गई.”

“इसी सिलसिले में फोन किया है दीदी, आपके कोई परिचित कनाडा में हैं क्या? मेरा मन घबरा रहा है. रमेश न तो फोन उठाते हैं, न पत्रों का जवाब देते हैं. उनकी बहन भी बहुत परेशान कर रही है. मैं कल मां के पास आ गई हूं.”

“तुम घर आओ, बैठकर बात करते हैं.”

घर आने पर सीमा ने जो कुछ बताया, वो बिल्कुल पत्रिकाओं में छपी कहानियों जैसा था. सीमा के पास न रमेश का सही पता-ठिकाना था, न उसकी वो बहन ही सगी थी. शुरू में रमेश कनाडा बुलाने का आश्‍वासन  देता रहा… इसी बीच बहन कही गई महिला ने सीमा को विश्‍वास में लेकर सारे गहने कब्ज़े में कर लिए. ऐसे में पुलिस और उस नारी संस्था की धमकी देकर किसी तरह ज़ेवर वापस लेकर सीमा मां के पास लौट आई. खोजबीन के दौरान कई तथ्य सामने आए. रमेश पहले से ही शादीशुदा था. वह यहां आकर मौज-मस्ती के लिए शादी करता था. उसकी बहन कही जानेवाली महिला व एजेंट भी उससे मिले हुए थे. वे लोग दहेज का सामान व ज़ेवर हथियाकर ग़ायब हो जाते थे किसी दूसरे शहर में, फिर किसी और को फंसाकर लूटते थे.

सीमा का क्रोध व क्रंदन चरम सीमा पर था, काफ़ी समझाने के बाद हल्की हुई थी. “आप ठीक कह रही हैं. एक तरह से अच्छा ही हुआ जो जल्दी पता चल गया. मैं बच गई.” ढांढस बंधाती मैं सीमा को देखती रही. कुछ ही महीनों में कुंदन-सी देह स़फेद पड़ गई थी. उस दरिंदे ने सारा रक्त निचोड़ लिया था. कुछ रातें साथ बिताकर एक लड़की को तबाह कर गया था, लेकिन धन-दौलत और आधुनिकता के नशे में डूब अपना सर्वस्व न्योछावर करने की आतुरता भी तो सीमा की ही थी. यदि ख़ुद पर भरोसा था, तो माता-पिता पर भी भरोसा रखना चाहिए था. ग़लती मेरी भी थी. एक बार तो मुझे भी उसे समझाना चाहिए था कि विवाह का आधार प्रेम, विश्‍वास, सहयोग और समर्पण है. माता-पिता बेटी के लिए घर और वर दोनों की छानबीन करते हैं, तब कहीं अपनी लाडली को दूसरे हाथों में सौंपते हैं. मात्र वैभव के आधार पर किसी रिश्ते की नींव कैसे टिक सकती है?

उस दिन के बाद सीमा को आज देखा था. कोर्ट की धूल फांकते देख अपनी प्रिय छात्रा के प्रति मेरा मन बहुत कोमल हो उठा. ईश्‍वर जल्दी ही उसे उसकी मंज़िल तक पहुंचाए. लेकिन मन आशंकित है, क्योंकि सीमा आज भी शादी व गृहस्थी का आधार रुपए-पैसे, मोटर, बंगले में ढूंढ़ रही है. आधुनिकता के रंग और भौतिकता की अंधी दौड़ में शामिल, धन की लालसा को सुख का पर्याय माननेवाली मेरी ये शिष्या क्या कभी रिश्तों का मोल व ब्याह के पवित्र बंधन की मर्यादा को समझ पाएगी? यह प्रश्‍न तो आज भी शेष ही है.

Prasoon Bhargava

    प्रसून भार्गव

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कहानी- बॉडी लैंग्वेज (Short Story- Body Language)

Hindi Kahani

“किसी के भी हाव-भाव देखकर बताया जा सकता है कि वह भविष्य में कैसा पार्टनर साबित होगा. पता है विदेशों में तो पहली मुलाक़ात की वीडियो रिकॉर्डिंग तक होती है. एक्सपर्ट वीडियो में हाव-भाव देखकर भावी कपल की मैरिड लाइफ की भविष्यवाणी भी कर देते हैं. सच कह रही हूं मम्मी, मैंने बॉडी लैंग्वेज पर स्टडी की है, यहां तक कि पहली मुस्कुराहट के भी कई मायने हैं.”

“मान्या तृषा को फोन लगाकर पूछ न, सब कैसा चल रहा है.”

“मम्मी,  कैसी बात कर रही हो. अच्छा लगता है क्या इस व़क्त मैं उन्हें डिस्टर्ब करूं? हमारा फोन हमारी बेसब्री ज़ाहिर करेगा. ध्रुव को लगेगा तृषा दीदी के साथ-साथ उनके घरवाले भी शादी को लेकर बेचैन हैं. वैसे भी मुझे लगता है कि दीदी ने फोन बंद कर दिया होगा.”

मान्या के यूं लापरवाहीभरे अंदाज़ से अमोली उद्विग्न होकर मान्या से बोली, “अरे, तेरी दीदी को लड़का पसंद आया कि नहीं, ये पूछ बस.”

“डोंट वरी, दीदी की बॉडी लैंग्वेज ने बता दिया था कि फोटो में उन्हें ध्रुव पसंद आ गया. अब ध्रुव बॉडी लैंग्वेज का टेस्ट कैसे पास कर पाता है और दीदी उसे कितना रीड कर पाती हैं, ये देखना है.” मान्या के इस भाव पर अमोली चिढ़कर बोली, “पहले भी तुम दोनों मिलकर चार लड़के नकार चुकी हो. अब कम से कम इसे तो बख़्श दो.”

“मम्मी, शादी जीवनभर का साथ है. हम एक रूम पार्टनर रखते हुए भी कितना ध्यान रखते हैं, ये तो पूरी ज़िंदगी का सवाल है. बॉडी लैंग्वेज रीड करना बहुत बड़ी विद्या है. मैंने दीदी को पारंगत कर दिया है इस विद्या में. आज उनका इम्तहान है. वह ज़रूर पास होंगी, ध्रुव को रिजेक्ट करके या फिर उसे सिलेक्ट करके.” मान्या की ऊलजुलूल बातों से बचने के लिए अमोली पूजाघर चली गई. वैसे भी आज सुबह से जाने कितने चक्कर भगवान के लगा लिए थे.

कितने लड़के देखने के बाद ये रिश्ता सही लगा, वरना अब तक कभी किसी के घर-परिवार में कोई खोट निकल आता, तो कभी लड़का सही नहीं लगता, जो लड़का ठीक होता भी तो उसका भविष्य उज्ज्वल नहीं लगता. एक-दो में सब ठीक लगा, तो बॉडी लैंग्वेज की पारखी मान्या को संदेह हो गया कि यह लड़का भविष्य में अच्छा जीवनसाथी साबित नहीं होगा.

सोच-विचार के बीच आधा घंटा किसी तरह बीता कि सहसा तृषा धड़धड़ाती हुई अपने कमरे में जाती दिखी. उसके तेवर कह रहे थे कि इस बार फिर बात नहीं बनी. महज़ एक घंटे के भीतर ही उसका वापस चले आना अच्छा संकेत नहीं था. मान्या को अपने कमरे में आने का इशारा करके वह अपने कमरे में चली गई. अमोली उसके लिए चाय बनाने चली गई. तृषा कहीं से भी आती है, तो चाय ज़रूर पीती है. चाय पीने के साथ वह अपने अनुभव साझा करती है. इसी उम्मीद से उसने चाय चढ़ाई. हालांकि उसके तेवर और निर्णय की झलकी बेतरतीबी से पड़ी सैंडल और उल्टे पड़े पर्स में दिख गए थे. बुझे मन से अमोली चाय के लिए अदरक कूट ही रही थी कि मान्या भेदभरी आवाज़ में बोली, “मम्मी, मुलाक़ात फ्लॉप रही ये बात पक्की समझो. अब या तो लड़का उसे पसंद नहीं आया या फिर…” मान्या के अधूरे वाक्य को अमोली ने निर्लिप्त भाव से सुना.

लड़के की तस्वीर उसने देखी थी. कितना सुदर्शन लग रहा था वो, उसे पसंद नहीं आया तो हद ही थी. उसे कल से ही आसार सही नहीं नज़र आ रहे थे, क्योंकि मान्या कल से ही उसे बॉडी लैंग्वेज रीड करने के गुर सिखा रही थी. तृषा से ज़्यादा उसे मान्या पर ग़ुस्सा आ रहा था. मान्या ही अमूमन लड़कों के खड़े होने, बात करने, देखने के अंदाज़ पर कोई न कोई शको-शुबह ज़ाहिर कर सबको असमंजस में डालती. इस बार तृषा को अकेले भेजा भी, तो कोई फ़ायदा नहीं हुआ. अपरोक्ष रूप से मान्या ही दोषी थी.  मेरठवाली ननद ने कितना ठोक बजा के रिश्ता खोज निकाला था, पर इनकी पहली मुलाक़ात फलदाई नहीं हुई. ट्रे लेकर वह तृषा के कमरे में गई, तो देखा वह बारह सौ रुपये लगाकर कर्ल करवाए बालों को बेतरतीबी से जूड़े में तब्दील कर चुकी थी और मज़े से मान्या से बतिया रही थी. “मान्या, तूने सक्सेसफुल रिलेशनशिप के लिए पहली मुलाक़ात के जो साइन बताए थे, वो एक भी नहीं मिले. उसकी बॉडी लैंग्वेज से मुझे सभी साइन निगेटिव लगे.”

“तूने ध्यान से बॉडी लैंग्वेज रीड की थी न?” मान्या गंभीरता से उससे पूछ रही थी और तृषा अपना अनुभव उससे साझा कर रही थी, “हां यार, वो शादी में इंट्रेस्टेड ही नहीं है. पहला साइन था समय से पहले आना और उसी में फेल हुआ वह. एक तो आधा घंटा देरी से आया और इस तरह आया जैसे मुझसे मिलने नहीं, मुझ पर एहसान करने आया था. चेहरे पर ज़बर्दस्ती वाली मुस्कुराहट छाई हुई थी. मुझे तो उसी व़क्त अच्छा संकेत नहीं लगा.”

“अरे! तो पूछ लेती कि वह इतना बुझा-सा क्यों है?” अभी तक चुप अमोली चिढ़कर बोली, तो तृषा तुनककर कहने लगी, “आप तो ऐसे कह रही हैं, जैसे मैंने उसकी ख़ुशमिज़ाजी देखी हो. सीधी-सी बात है पहली बार सब अपना बेस्ट रखते हैं, उसका बेस्ट वही होगा. मैंने महसूस किया कि वह ज़बर्दस्ती मुस्कुराने का प्रयास कर रहा था. हो सकता है वह परिवार के दबाव में मुझसे मिलने आया हो. हैंडसम है, उसका करियर अच्छा है, तो क्या यही सब देखकर आंख मूंदकर शादी कर लें? एक लड़की को बस यही चाहिए?”

तृषा के आकलन पर अमोली चिढ़कर वहां से चली आई. उसे देखकर नरेश बोले, “इतनी चिंता मत किया करो, जहां होनी होगी झटपट तय हो जाएगी.”

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“अरे! तुम तो रहने ही दो, तुम्हारी छोटी बेटी शादी होने दे तब न. तुम्हीं ने उसे बढ़ावा दिया है. बड़ा कहते थे कि तृषा सीधी है, सब पर विश्‍वास कर लेती है, पर मान्या के लिए निश्‍चिंत हूं. उसमें इंसान पहचानने की क्षमता है, वह कभी धोखा नहीं खाएगी. सही कहा था तुमने, मान्या न शादी करेगी न करने देगी. उसने तो बॉडी लैंग्वेज पर रिसर्च कर रखी है न. चिंता न करो अपनी सीधी-साधी तृषा को भी इस विद्या में पारंगत कर दिया है. अब मजाल है जो कोई लड़का उसे पसंद आए.”

अमोली के ग़ुस्से को नरेश ने शांत करने की कोशिश की, तो वह और उखड़ गई, “बताओ, आजकल के बच्चे बॉडी लैंग्वेज देखकर शादी का डिसीज़न लेंगे. याद करो, जब तुम मुझे देखने आए थे कैसा सड़ा-सा मुंह बनाया हुआ था. फिर भी शादी हुई और सफल भी हुई.” अमोली की बात पर नरेश हैरानी से बोले, “अरे! अब उसका ग़ुस्सा मुझ पर क्यों निकाल रही हो. मेरा सड़ा मुंह याद है, पर मेरे बड़े ताऊजी, पिताजी और काका नहीं याद हैं, जो वहीं जमे थे. क्या सोचती हो, तुम आती और तुम पर दिलकश मुस्कान फेंकता और हां, तुमने कौन-सी मोहिनी मुस्कान मुझ पर डाली थी. थरथरा तो ऐसे रही थी, जैसे मैं तुम्हें देखने नहीं, खाने आया हूं.” नरेश और अमोली को उलझे देखकर तृषा और मान्या उनके कमरे में आ गईं.

“ओहो! अब आप लोग तो मत झगड़ो, इसीलिए अकेले में मिलने का रिवाज़ बनाया है, ताकि किसी की मौजूदगी में हम असहज न रहें. खुलकर बात कर सकें.” मान्या ने कहा.

“किसी के भी हाव-भाव देखकर बताया जा सकता है कि वह भविष्य में कैसा पार्टनर साबित होगा. पता है विदेशों में तो पहली मुलाक़ात की वीडियो रिकॉर्डिंग तक होती है. एक्सपर्ट वीडियो में हाव-भाव देखकर भावी कपल की मैरिड लाइफ की भविष्यवाणी भी कर देते हैं. सच कह रही हूं मम्मी, मैंने बॉडी लैंग्वेज पर स्टडी की है, यहां तक कि पहली मुस्कुराहट के भी कई मायने हैं. अब जैसे कि तृषा दीदी ने बताया कि वो जब आज ध्रुव से मिलीं, तो उसकी जबरन ओढ़ी मुस्कुराहट बता रही थी कि वह कुछ तनाव में है. दीदी से मिलने का तनाव… अगर कोई साधारण-सी बातों पर आंखों की पुतलियों को अधिक नचाते हुए हंसी दबाता है, इसका अर्थ है कि वह दूसरों को ख़ुद से कमतर आंक रहा है. एटीट्यूडवाला है. धीमे-धीमे मुस्कुरानेवाला अंदर-बाहर से अलग है और हां, अगर कोई…”

“मान्या बेटा, सारी स्टडी लड़कों पर ही है या कुछ लड़कियों पर भी की है.” सहसा नरेश ने उसे टोका, तो वह झट से बोली, “की है न पापा, अगर लड़की खुलकर हंसे, तो मतलब बिंदास, वह अपनी कोई कमी छिपाने में विश्‍वास नहीं करती है, अगर वह लगातार मुस्कुराए मतलब वह अपनी अच्छी इमेज बनाना चाहती है और अगर…”

“अरे! चुप हो जा मेरी मां, बॉडी लैंग्वेज पढ़-पढ़कर चार लड़के नकार चुकी हो.” सहसा अमोली अपना माथा पकड़कर बोली, तो तृषा उसके गले में बांहें डालकर कहने लगी, “मुझे तो पांचवां पसंद आ ही गया था, पर क्या करूं, उसका देर से आना, कुछ हड़बड़ाया-सा रहना और हां, जब मैंने चलने को कहा, तो उसका मुझे नहीं रोकना, वहां से निकलने के लिए झट तैयार हो जाना सब अजीब था, वरना तो मैंने पसंद कर ही लिया था. फोन पर भी ठीक लगा.” तृषा मानो ख़ुद से बात करने लगी थी कि तभी अमोली की आवाज़ आई, “मां हूं तेरी, तेरी बॉडी लैंग्वेज समझती हूं. तुझे ध्रुव पसंद है, फिर क्यों नखरे कर रही है?”

“नहीं-नहीं मम्मी, मेरी लाइफ का सवाल है.” तृषा धीमे-से बोली कि तभी फोन की घंटी बजी, “हेलो, अच्छा कब? कल… जी-जी.” कहते हुए उसने फोन रखा, चेहरे पर कई रंग आए-गए, सभी की प्रश्‍नवाचक नज़रें ख़ुद पर टिकी देखकर वह बोली, “ध्रुव की मम्मी थीं. कल उनकी शादी की सालगिरह है. भुवन विलास में पार्टी है. हमें बुला रही हैं. क्या करें?”

अमोली की बात पर मान्या चहकी, “भुवन विलास, वाऊ… वहां की तो एक कॉफी ही हज़ार रुपए की है. ज़रूर चलेंगे. वहां का एंबियंस देखेंगे. कुछ सेल्फी-वेल्फी खींचेंगे और वापस आ जाएंगे.” मान्या का उत्साह देखकर कुछ ना-नुकुर के बाद तृषा ने हामी भर दी. दूसरे दिन धड़कते दिल से अमोली सबके साथ भुवन विलास पहुंची, तो देखा ध्रुव के माता-पिता स्वागत में खड़े थे, उसने भी ध्यान दिया ध्रुव सहज नहीं था. शायद तृषा ने सही अंदाज़ा लगाया, यह सोचकर अमोली कुछ आश्‍वस्त हुई, न कहने में अब कोई मलाल नहीं रहेगा. अपने माता-पिता के कहने के बाद वह काफ़ी हड़बड़ी में उनको डाइनिंग एरिया तक ले गया. डीजे की तैयारी देखकर नाच-गाने के कार्यक्रम का भी उसने अंदाज़ा लगाया. कुछ हड़बड़ी में ध्रुव उनको वहां बिठाकर चला गया. उसके चेहरे का तनाव साफ़ नज़र आता था.

“देखो  मम्मी, इसकी चाल देखो. कितनी जल्दी-जल्दी चल रहा है, जैसे मैं मरी जा रही हूं इसके पीछे.” तृषा ने चिढ़कर कहा, फिर वह मान्या के साथ पार्टी एंजॉय करने में व्यस्त हो गई. अमोली वॉशरूम गई, तो ध्रुव को देखा. वह कुछ बेचैन-सा लगा. उसे देखकर अमोली ने उससे कहा, “ध्रुव बेटे! सब ठीक तो है? कोई बात है तो कहो.” यह सुनकर वह जबरन ओढ़ी मुस्कान के साथ हड़बड़ी में कहने लगा, “आंटी, मैं अभी कुछ जल्दी में हूं. आपसे बाद में बात करता हूं.” यह कहते हुए वह तेज़ी से होटल के ऊपर बने हिस्से में निकल गया. एक-डेढ़ घंटा हो गया फिर भी ध्रुव नहीं दिखा. उसका व्यवहार निस्संदेह संदेह के घेरे में था.

पार्टी में अमोली और नरेश का मन नहीं लग रहा था. ध्रुव के माता-पिता आसभरी नज़रें नरेश-अमोली पर टिकाए थे. उन्हें तृषा बहुत पसंद आई, एक-दो बार इशारे में यह ज़ाहिर कर चुके थे, पर वो क्या कहें.

ऊहापोह के बीच डिनर से कुछ समय पूर्व उन्होंने ध्रुव को आता देखा, जो सीधा तृषा के पास आकर मनमोहक मुस्कान के साथ कह रहा था, “क्या मैं तुम्हारे साथ डांस कर सकता हूं?” ध्रुव के चेहरे की मुस्कान देखकर तृषा उसके सम्मोहन में बंधी उठ खड़ी हुई. डांस फ्लोर की ओर उसे जाते देख मान्या की भौंहें सिकुड़ गईं, “मम्मा, तृषा दीदी को एकदम नहीं जाना चाहिए था और इस ध्रुव को तो देखो, ये ज़रूरत से ज़्यादा हंस रहा है यानी अपनी घबराहट को छिपाने की कोशिश कर रहा है. देखना डांस के बहाने ये तृषा को कुछ बताएगा.” अमोली ने भी महसूस किया कि दोनों डांस के हल्के-फुल्के स्टेप करते हुए बातें कर रहे थे. तृषा के चेहरे पर हैरानी के चिह्न थे. हां, शायद वह किसी और से कमिटेड है. “सुनिए, मान्या ठीक ही कहती थी. इसकी बॉडी लैंग्वेज संदेह उत्पन्न करती है, रहने देते हैं.

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मुग़लसरायवाले लड़के की बॉडी लैंग्वेज मतलब कि उसकी सूरत-सीरत खानदान की जन्मपत्री निकलवाओ.” अमोली उद्विग्न हो रही थी. सहसा म्यूज़िक बंद हो गया. स्पॉटलाइट ध्रुव पर ठहर  गई. अमोली का जी अटक गया. ध्रुव बड़ी अदा से तृषा का हाथ पकड़कर कह रहा था, “क्या तुम मुझसे शादी करोगी?” अमोली का जी ज़ोर से धड़का, तभी तृषा बड़ी अदा से अपने गुलाबी गाउन को चुटकी से पकड़कर बोल पड़ी, “हां.”

तालियों की गूंज के साथ कई चेहरों पर अलग-अलग भाव प्रदर्शित हुए. बधाइयों के शोर के बाद तृषा को घेरकर एकांत खोजा गया, वहां उत्साह में उसने कुछ यूं ख़ुलासा किया, “मम्मी, बॉडी लैंग्वेजवाली रीडिंग सही थी, वाक़ई उसका ध्यान कुछ देर पहले तक मुझ पर नहीं था. आज भी नहीं और कल भी नहीं था. दरअसल, कल जब ध्रुव मुझसे मिलने आ रहा था, तभी कैलिफोर्निया की एक मशहूर आईटी कंपनी से उसके लिए फोन आया इंटरव्यू के लिए. अमूमन वो आपकी सुविधा पूछते हैं, पर उस आईटी कंपनी के चेयरपर्सन के पास समय नहीं था. वो उसी समय ध्रुव का इंटरव्यू लेना चाहते थे. ध्रुव इस सुनहरे मौ़के को खोना नहीं चाहता था. इसीलिए वह उसी समय फर्स्ट राउंड के लिए तैयार हो गया. इंटरव्यू के पैनल मेंबर ने फर्स्ट राउंड लिया. ध्रुव को लगा था कि कुछ जवाब वह और अच्छे दे सकता था. चेयरपर्सन से दो-तीन घंटे बाद बात होनी थी, इस बीच वह मुझसे मिलने आ गया, इसीलिए कुछ अनमना-सा रहा. मुझसे पहली बार मिला था, इसीलिए कुछ बता नहीं पाया कि उसका ध्यान बंट चुका है. आनेवाले इंटरव्यू को लेकर वह कॉन्शियस था.”

“अरे! तो ये बात बतानी चाहिए थी तुझे.” अमोली अविश्‍वास से बोली, तो तृषा कहने लगी, “मैंने भी अभी यही कहा, तो वह कहने लगा कि अगर बताता तो तुम सोचती कि मैं तुमसे ज़्यादा महत्व इंटरव्यू को दे रहा हूं. मेरा पहला इंप्रेशन ख़राब हो जाता, इसीलिए सिचुएशन थोड़ी अजीब हो गई.”

“अरे! ये क्या बात है इंटरव्यू तो था ही ज़रूरी, इसमें कौन-सी दो राय थी.” अमोली झुंझलाती हुई बोली, तो तृषा कहने लगी, “मम्मी, अब तो सब क्लियर हो गया है और हां, चेयरपर्सन मिस्टर भावेजा के साथ उसका इंटरव्यू कल भी नहीं हो पाया. आज जब हम पहुंचे, तो कमोबेश कलवाली ही सिचुएशन थी, वह मिल तो सबसे रहा था, पर ध्यान कहीं और था. कुछ देर पहले हुआ इंटरव्यू सक्सेसफुल हुआ. ध्रुव को कैलिफोर्निया बुलाया है. शादी के बाद मैं भी उसे जॉइन करूंगी. ध्रुव बहुत ख़ुश है और मैं भी.”

“हे भगवान! इतनी-सी बात थी. जो बॉडी लैंग्वेज समझने की जगह उससे बात कर ली होती, उसकी उलझन पूछ ली होती, तो इतनी ग़लतफ़हमी न होती. और दोनों ने एक-दूसरे को प्रपोज़ भी कर दिया.” अमोली की झुंझलाहट में प्रसन्नता झलक रही थी और मान्या अभी भी बॉडी लैंग्वेज का विश्‍लेषण कर रही थी, “तृषा दीदी उसके प्रपोज़ल का जवाब कुछ देर से देतीं तो शायद…” मान्या के मुंह से निकला ही था कि तृषा ने उसका मुंह दबा दिया. दोनों बहनों के बीच होती चुहल देख नरेश-अमोली बेसाख़्ता हंस पड़े.

Meenu Tripathi

       मीनू त्रिपाठी

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कहानी- ज़रूरतमंद (Short Story- Zaruratmand)

“अपने इस देश में लाखों ऐसे लोग बेरोज़गार हैं, जिन्हें नौकरी की आवश्यकता है और लाखों ऐसे लोग नौकरी कर रहे हैं, जिनके लिए नौकरी आवश्यकता नहीं केवल एक शग़ल है. यदि ऐसे लोग अपना मन बहलाने या स़िर्फ ख़ुद को साबित करने के लिए नौकरी का रास्ता छोड़कर कोई और रास्ता अपना लें तो उन लोगों की रोज़ी-रोटी की समस्या हल हो सकती है, जिनके लिए नौकरी जीवन-मरण के समान महत्वपूर्ण है.” सासू मां ने दार्शनिक अंदाज़ में कहा.

Hindi Short Story

पार्किंग में कार पार्क करते हुए मानवी ने अपने दिल में एक अनोखे उत्साह का अनुभव किया. अब तक वह नितीश के साथ हुई अपनी तीखी बातचीत की सारी कड़वाहट अपने मन से झटक चुकी थी.

“घर में कौन-सी कमी है, मैं स्वयं अच्छा-खासा कमाता हूं. बंगला, कार, ज़मीन-जायदाद सब कुछ तो है…. और मैं वादा करता हूं कि तुम्हें कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने दूंगा!” मानवी को नितीश की यह दुहाई एक परंपरागत पति की दुहाई प्रतीत हुई.

उफ! ये पुरुष स्त्री को अपने पैरों पर खड़ी होते हुए देख ही नहीं पाते हैं, मानवी ने सोचा. उसे नितीश की इस अपेक्षा से चिढ़ हुई थी. किन्तु सब पुरुष एक जैसे नहीं होते हैं. अब प्रशांत को ही लो, उसने पहल करते हुए मानवी से कहा था, “भाभी, आप तो वेल-क्वॉलीफाइड हैं, आपको मेरा ऑफ़िस ज्वाइन कर लेना चाहिए.”

प्रशांत के मुंह से अपने लिए ‘वेल-क्वॉलीफाइड’ सुन कर मानवी गद्गद् हो उठी थी. नितीश और सास-ससुर कभी मानवी के विचार से सहमत नहीं हुए, जबकि उन्होंने मानवी को एक पढ़ी-लिखी बहू के रूप में ही चुना था.

विवाह के दो महीने बाद जब नितीश अपने कारोबार में व्यस्त हो गया तो मानवी का दिल एक बार फिर अंगड़ाइयां लेने लगा.

“सुनिए, आप तो अपने कारोबार में डूबे रहते हैं और मैं घर में बैठी-बैठी बोर हो जाती हूं. अगर मैं कहीं नौकरी कर लूं तो…?” उसने दबे स्वर में नितीश से कहा.

“देखो मानवी, मैंने तुम्हें पहले भी समझाया है कि जब हमारे घर में किसी प्रकार की आर्थिक तंगी नहीं है तो फिर तुम्हें नौकरी करने की क्या आवश्यकता है?” नितीश ने शांत भाव से उत्तर दिया.

“प्रश्‍न आर्थिक तंगी या आर्थिक आवश्यकताओं का नहीं है…मैं पढ़ी-लिखी हूं और अपनी पढ़ाई का सदुपयोग करना चाहती हूं… मैं अपने अस्तित्व को महसूस करना चाहती हूं.” मानवी ने झिझकते हुए तर्क दिया.

“ये सब तो तुम बिना नौकरी किए भी कर सकती हो. ओ हां, तुम किसी समाज सेवा संगठन से क्यों नहीं जुड़ जाती?” नितीश ने उसे सलाह देते हुए स्वयं अपनी सलाह पर मुहर भी लगा दी, “हां, ये ठीक रहेगा.”

“नहीं, ये ठीक नहीं रहेगा!”

नितीश के जाने के बाद मानवी मन-ही-मन देर तक कुनमुनाती रही. उसे उखड़ा-उखड़ा देख कर सासू मां ने प्यार से कारण पूछा.

सासू मां की ममता को महसूस करते हुए मानवी ने उनके सामने अपना दिल खोल कर रख दिया.

“मांजी, शादी से पहले मैं नौकरी करती थी और उस समय मुझे लगता था कि मेरा अपना भी कोई व्यक्तित्व है…अब शादी के बाद ऐसा लगता है कि मैं उनकी परछाईं मात्र बन कर रह गई हूं….”

“तो तुम क्या करना चाहती हो?” सासू मां ने पूछा.

“मैं नौकरी करना चाहती हूं.”

“क्या यही एकमात्र रास्ता है? यदि कोई और काम…?”

“नहीं मांजी!” मानवी ने सासू मां की बात काटते हुए कहा, “मैं और कोई काम नहीं करना चाहती हूं.”

“मैं तुम्हारी भावना समझ रही हूं बेटी, लेकिन ज़रा सोचो, क्या तुम्हारा नौकरी करना ऐसा नहीं लगेगा जैसे तुम किसी दूसरे का अधिकार छीन रही हो?” सासू मां ने बड़ा अजीब-सा तर्क दिया.

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“इसमें किसी दूसरे का अधिकार छीनने की कौन-सी बात है? आख़िर मैं जो भी नौकरी हासिल करूंगी, वो मुझे मेरी योग्यता के बल पर मिलेगी.” मानवी ने आश्‍चर्यचकित होते हुए कहा.

“खैर, मैं तो यही चाहती हूं कि तुम नौकरी मत करो, लेकिन अगर तुम चाहती ही हो तो कम-से-कम सालभर तो ठहर जाओ, वरना अच्छा नहीं लगेगा कि नई बहू को नौकरी करने जाने दिया जा रहा है.” सासू मां ने मानो हथियार डालते हुए कहा.

“ठीक है मांजी! मैं सालभर ठहर जाऊंगी.” मानवी को भी लगा कि बात बढ़ते-बढ़ते बिगड़ जाए इससे अच्छा है कि सालभर वाली बात मान ली जाए.

“मेरी अच्छी बेटी!” सासू मां ने दुलारते हुए कहा था, “तुझे क्या लगता है कि मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूं? मैं समाजशास्त्र में पीएचडी हूं.”

“क्या?” मानवी चकित रह गई थी. उसे नहीं पता था कि उसकी सासू मां उच्च शिक्षा प्राप्त हैं.

“तो फिर आपने नौकरी क्यों नहीं की?” मानवी अपने आश्‍चर्य को छिपा नहीं सकी.

“क्योंकि मैंने यह महसूस किया कि वो काम नहीं करना चाहिए, जिससे किसी का अहित हो!” सासू मां ने गोलमाल-सा जवाब दिया.

“लेकिन इससे किसी का अहित कैसे हो सकता है?” मानवी को बिलकुल भी समझ में नहीं आया.

“अपने इस देश में लाखों ऐसे लोग बेरोज़गार हैं, जिन्हें नौकरी की आवश्यकता है और लाखों ऐसे लोग नौकरी कर रहे हैं, जिनके लिए नौकरी आवश्यकता नहीं केवल एक शग़ल है. यदि ऐसे लोग अपना मन बहलाने या स़िर्फ ख़ुद को साबित करने के लिए नौकरी का रास्ता छोड़कर कोई और रास्ता अपना लें तो उन लोगों की रोज़ी-रोटी की समस्या हल हो सकती है, जिनके लिए नौकरी जीवन-मरण के समान महत्वपूर्ण है.” सासू मां ने दार्शनिक अंदाज़ में कहा.

“लेकिन मांजी!…” मानवी ने उन्हें टोकना चाहा.

“छोड़ो इस बात को. बस, एक प्याला गरमा गरम चाय पिला दो.” सासू मां की बात सुन कर न चाहते हुए भी मानवी को बात वहीं समाप्त कर देनी पड़ी.

देखते-ही-देखते बारह माह व्यतीत हो गए. सासू मां भी रिश्तेदारी में बाहर गई हुई थीं. एक दिन उचित अवसर देख कर मानवी ने नितीश से एक बार फिर अनुरोध किया. जैसे कि उसे आशा थी, नितीश ने उसे समझाना चाहा. किन्तु इस बार मानवी नितीश की एक भी बात सुनने को तैयार नहीं हुई.

यहां तक कि आज इंटरव्यू के लिए निकलते समय भी दोनों के बीच काफ़ी कहा-सुनी हुई. मानवी नितीश के इस व्यवहार को अनदेखा करते हुए इंटरव्यू के लिए निकल पड़ी. मानवी ने कार पार्क की और सीढ़ियां चढ़ती हुई प्रशांत के द़फ़्तर जा पहुंची.

“हैलो मैम? मैं आपके लिए क्या कर सकती हूं?” काउंटर पर बैठी रिसेप्शनिस्ट ने मानवी को टोका.

मानवी सीधे प्रशांत के कक्ष की ओर बढ़ी जा रही थी. रिसेप्शनिस्ट की आवाज़ सुन कर हड़बड़ाकर बोल उठी, “मैं यहां इंटरव्यू के लिए आई हूं.”

“ओह, आपका नाम?”

“मानवी”

“हूं! आप कृपया उधर सोफे पर प्रतीक्षा कीजिए. आपकी बारी आने पर आपको सूचित कर दिया जाएगा.” रिसेप्शनिस्ट ने मधुर स्वर में मानवी से कहा.

“ठीक है.” मानवी को यह आशा नहीं थी कि उसे अन्य लोगों की भांति अपनी बारी की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी.

सोफे पर बैठते ही मानवी का ध्यान गया उस सहमी-परेशान लड़की पर गया, जो सोफे के दूसरे छोर पर बैठी हुई थी. उसने साधारण-सा सलवार-कुर्ता पहन रखा था. उसने अपने दोनों हाथों में अपनी फ़ाइल को कुछ इस तरह थाम रखा था जैसे वह उसकी सबसे क़ीमती चीज़ हो.

“आप भी इंटरव्यू देने आई हैं?” मानवी ने उस लड़की के निकट सरकते हुए पूछा.

“जी!” लड़की ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया.

“मैंने समाजशास्त्र में डॉक्टरेट किया है.” मानवी ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा.

“मैंने भी.” फिर संक्षिप्त उत्तर मिला.

“आपने इसके पहले भी कहीं जॉब किया है?” मानवी ने पूछा.

“जी हां, वर्ल्ड बैंक और यूनीसेफ के प्रोजेक्ट्स में काम कर चुकी हूं.” लड़की ने सहजता से उत्तर दिया.

“ओह! तो फिर इस नौकरी के लिए क्यों?” मानवी ने पूछा.

“वो दोनों अस्थाई नौकरियां थीं.” लड़की मानवी का आशय समझ गई.

“आप शादीशुदा हैं?” मानवी ने अचानक व्यक्तिगत प्रश्‍न पूछ डाला.

“नहीं.” लड़की ने कहा.

“ओह! फिर तो आप शादी होते ही ये नौकरी छोड़ देंगी या फिर आपके ससुरालवाले आपसे नौकरी छुड़वा देंगे.”

“हुंह! मेरी शादी होगी भी या नहीं, ये तो मुझे पता नहीं है, लेकिन इतना ज़रूर पता है कि मैं अपने बूढ़े, असहाय माता-पिता का इकलौता सहारा हूं और इसलिए आज मुझे इस नौकरी की अत्यंत आवश्यकता है.” लड़की के स्वर में व्यंग और पीड़ा का मिला-जुला भाव था.

“आपके भाई-बहन?” मानवी ने पूछना चाहा.

“हैं, लेकिन नहीं के समान. वे सब अपना-अपना घर बसा कर हमसे मुंह मोड़ चुके हैं, लेकिन मैं किसी भी क़ीमत पर अपने माता-पिता को नहीं छोडूंगी. किसी भी क़ीमत पर नहीं!” लड़की भावुक हो उठी.

मानवी समझ नहीं पा रही थी कि उस लड़की को कैसे दिलासा दे. उसी समय लड़की का नाम पुकारा गया.

“कुमारी श्‍वेता!”

लड़की अपना नाम सुन कर उठ खड़ी हुई और अपनी फ़ाइल को लिए उस कक्ष में चली गई, जहां इंटरव्यू चल रहा था.

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पांच मिनट बाद श्‍वेता बाहर आई. उसका चेहरा खिला हुआ था. शायद उसका इंटरव्यू सफल रहा था. वह काफ़ी हद तक आश्‍वस्त थी कि यह नौकरी अब उसे मिल ही जाएगी.

अब मानवी को भीतर जाने का संकेत किया गया. मानवी ने अपनी रेशमी साड़ी का पल्ला करीने से संभाला और कक्ष में जा पहुंची.

“आइए मानवीजी! प्लीज़ बैठिए.” प्रशांत चहककर बोला. प्रशांत की बगलवाली कुर्सियों पर दो और व्यक्ति बैठे हुए थे. मेज़ के सामने रखी कुर्सी पर मानवी जा बैठी.

“आप लोग पूछिए भाई, इनसे जो कुछ पूछना हो.” प्रशांत हंसता हुआ बोला.

“आप ही शुरू करिए.” पहला व्यक्ति चापलूसीभरे अंदाज में बोला.

“देखिए, मेरी तो ये भाभी लगती हैं, इसलिए मैं तो इनसे यही पूछ सकता हूं कि आज आप डिनर में क्या पकानेवाली हैं?” प्रशांत हो-हो करके हंस पड़ा. वे दोनों व्यक्ति भी सुर-में-सुर मिलाकर हंसने लगे.

मानवी को यह सब बड़ा अजीब लगा.

“आप लोग यदि मुझसे कुछ पूछेंगे नहीं, तो मुझे नौकरी कैसे देंगे?” मानवी ने पूछ ही लिया.

“नौकरी तो आपके लिए ही है. क्या मैं आपकी योग्यता नहीं जानता हूं?” प्रशांत ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया.

“और वो लड़की श्‍वेता, जिसका इंटरव्यू अभी मुझसे पहले हुआ?” मानवी ने पूछा.

“हां, वो भी बहुत योग्य है, लेकिन उसका नंबर आपके बाद आता है.” प्रशांत लापरवाही से बोला.

“ओह, यानी मैं नौकरी पक्की समझूं?” मानवी ने ख़ुश होकर पूछा.

“हंड्रेड परसेंट पक्की!” प्रशांत ने कहा. “और अब आप हमें मिठाई खिलाइए!”

“ज़रूर खिलाऊंगी, लेकिन पहले नितीशजी का मुंह मीठा कराऊंगी.” मानवी ने कहा.

मानवी प्रशांत के द़फ़्तर से निकलकर नितीश से मिलने चल पड़ी. उसने रास्ते में गाड़ी रोक कर नितीश के पसंद की मिठाई ख़रीदी. वह ख़ुश थी. वह अपने मन में एक अनोखी शांति का अनुभव कर रही थी. उसे अपना मन बहुत हल्का लग रहा था. एकदम तनावरहित.

“अरे तुम! तुम तो आज इंटरव्यू देने गई थी.” नितीश मानवी को अपने सामने पाकर चौंक उठा.

“ये लो मुंह मीठा करो!” कहते हुए मानवी ने मिठाई का एक टुकड़ा नितीश के मुंह की ओर बढ़ाते हुए कहा.

“ओह, बधाई! नौकरी मुबारक़ हो!” नितीश ने संयत स्वर में कहा.

“ये मिठाई नौकरी मिलने की नहीं, बल्कि नौकरी छोड़ने की है श्रीमानजी!” मानवी ने मुस्कुराते हुए कहा.

“क्या मतलब?” नितीश चौंका उठा.

“हां! आज मुझे आपकी और मांजी की बातों का मतलब समझ में आ गया.”

“कैसा मतलब?”

“यही कि नौकरी ज़रूरतमंद को ही करना चाहिए, टाइमपास करनेवालों को नहीं. मात्र चंद साड़ियों या अपनी फ़िज़ूल जेबख़र्ची के लिए नहीं या फिर स़िर्फ यह दिखाने के लिए भी नहीं कि नौकरी करने में ही स्त्री की स्वतंत्रता निहित है. ऐसा करनेवाली औरतें न जाने कितने ज़रूरतमंदों का अधिकार छीन लेती हैं. यह मैं आज समझ गई हूं.” मानवी उत्साहित स्वर में बोलती चली गई. उसने नितीश को श्‍वेता के बारे में बताया और अपने इंटरव्यू के बारे में भी, साथ ही यह भी बताया कि उसने रास्ते में ही प्रशांत को फ़ोन करके स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि यदि वह सच्चे अर्थों में संबंध निभाना चाहता है तो उसके बदले उस लड़की को नौकरी दे दे, जो उससे ज़्यादा योग्य है और जिसे इस नौकरी की सबसे अधिक ज़रूरत है. प्रशांत भी मानवी के इस आग्रह को सुनकर गदगद हो उठा.

“आज तक मुझे तुमसे प्यार था, लेकिन आज तुम पर बहुत गर्व महसूस हो रहा है!” कहते हुए नितीश ने मानवी को अपनी बांहों में भर लिया.

“अच्छा-अच्छा, अब आप अपना काम करिए, मैं चली घर.”

“घर पर अकेली बोर तो नहीं होगी?” नितीश ने संदेहभरे स्वर में पूछा.

“नहीं! अब कभी नहीं!” मानवी ने दृढ़ताभरे स्वर में उत्तर दिया और प्रफुल्लित मन से अपने घर की ओर चल दी.

– डॉ. सुश्री शरद सिंह

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कहानी- सच्चा सुख (Short Story- Sachcha Sukh)

Short Story

 

एक कोने में खड़ी मैं ये सब देख-सुन रही थी. मेरी बेटी का भविष्य मुझे अपने सामने दिखाई दे रहा था. कमरे में आई तो आहट से सुमित जाग गये थे. जब उन्होंने पूछा कि मैं कहां थी, तो मैंने उन्हें सब कुछ बता दिया. आज मैं जीत और हार दोनों को एक साथ देख रही थी. तब हम दोनों ने मिलकर एक फैसला किया.

Short Story

“मनीषा, तुम्हारा फ़ोन है, जल्दी आओ.” सुमित की आवाज़ आयी. मेरी बचपन की सहेली तान्या का फ़ोन था.

“हेलो.”

“हाय मनीषा, कैसी हो?”

“तान्या मैं तो बिल्कुल ठीक हूं, पर तू कैसी है? आज कितने समय के बाद तेरा फ़ोन आया है… कहां है तू?”

“मैं बिल्कुल ठीक हूं.” तान्या ने कहा. “अभी कुछ दिन पहले ही लंदन आयी हूं. मां से तो मिल चुकी थी, अब मैं शिमला आ रही हूं. रोहन का कुछ काम भी है और तुझसे मिल भी लूंगी. मनीषा, एक ह़फ़्ते के लिए किसी अच्छे होटल में मेरे लिए कमरा बुक कर देना प्लीज़.”

“होटल में नहीं तुझे मेरे घर पर रुकना होगा, समझी.” मैंने तान्या पर दोस्ती का अधिकार जताते हुए कहा.

“पर तुझे कुछ परेशानी तो नहीं होगी?” तान्या कुछ झिझकते हुए बोली.

“नहीं यार, अच्छा बता… तू कब आ रही है?”

“परसों शाम तक.”

“ठीक है, मैं तेरा इन्तज़ार करूंगी.”

तान्या से बात करके अच्छा लगा. सारा काम करके जब सोने के लिए गयी तो नींद कोसों दूर थी. धीरे-धीरे तान्या के साथ बिताया हर लम्हा याद आने लगा. वो बचपन के दिन, स्कूल की शरारतें, कॉलेज का साथ और हमारी शादी…. कुछ दिनों तक हम एक-दूसरे से मिलते रहे, पर फिर सम्पर्क के तार टूटने लगे. एकाध बार फ़ोन पर भी बातें हुईं… पर हमारी दोस्ती नहीं टूटी. तान्या के लिए कमरा ठीक किया. उसकी पसंद की ज़्यादातर चीज़ें मैंने तैयार कर ली थीं. अब तो बस उसी का इंतज़ार था. तभी डोरबेल बजी. दरवाज़ा खोला तो सामने सुमित के साथ तान्या खड़ी थी. उसे देखकर इतनी ख़ुशी हुई कि न तो उसे गले लगा पाई और न ही अन्दर आने के लिए कह पाई. मेरे कंधे पर हाथ रखकर सुमित ने मेरा ध्यान भंग किया. मैंने तान्या को गले लगा लिया.

फिर तो हमने ढेर सारी बातें कीं- अपने बचपन की बातें, शरारतें और वो बातें जो अचानक ही हमारे चेहरे पर हंसी ले आतीं. तान्या से रोहन के बारे में पूछा, तो तान्या ने बताया- शादी के 4 साल बाद वह और रोहन लंदन चले गए. वहां पर रोहन का व्यवसाय बहुत अच्छा चल रहा है. लंदन के रईस लोगों में उनकी गिनती होती है. फिर वो अपनी हाई सोसायटी की बातें बताने लगी.

पता नहीं क्यों, मुझे यूं लगा जैसे तान्या कुछ बदल-सी गई है. हो सकता है बहुत समय बाद मैं तान्या से मिली थी, इसीलिए मुझे  ऐसा लग रहा हो. शाम को सुमित का फ़ोन आया तो उसने कहा कि खाना बाहर खा लेंगे. इसी बहाने तान्या घूम भी लेगी.

सुबह सुमित को जल्दी क्लीनिक जाना था, इसीलिए जल्दी उठकर नाश्ता बनाया. कामवाली आयी तो सारा किचन साफ़ करवाया. तान्या ये सब देख रही थी. अचानक वह बोली, “एक बात कहूं मनीषा, तुम घर का सारा काम करती हो, नौकर क्यों नहीं रख लेती?”

“बस यूं ही…. मुझे ख़ुद काम करना अच्छा लगता है.”

“घर का काम, बाहर का काम, क्या तुम अकेले थक नहीं जाती?”

“नहीं तो.”

“मुझे यक़ीन नहीं होता कि तुम वही मनीषा हो, जिसका काम करने के लिए नौकर आगे-पीछे घूमा करते थे. कहां गयी वो मनीषा? लेकिन तुम्हीं ने अपना भाग्य बनाया है. तुम्हारे माता-पिता तुम्हारी शादी एक ऊंचे और रईस घर में कराना चाहते थे. पर तुमने साफ़ मना कर दिया और ज़िद पकड़ ली कि तुम सुमित से ही शादी करोगी. इसी वजह से तुम्हें घर छोड़ना पड़ा. जब तुम्हारी और सुमित की शादी हुई, उस समय सुमित ने प्रैक्टिस शुरू ही की थी. तुमने अपनी ज़िंदगी के सुनहरे दिन संघर्ष में गंवा दिये. हालांकि आज तुम्हारे पास बहुत कुछ है फिर भी वो नहीं है, जो होना चाहिए था. क्या मिला तुम्हें मनीषा?”

“तान्या छोड़ ना, तू भी क्या बातें ले बैठी.”

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“नहीं मनीषा, तू मेरी सबसे अच्छी दोस्त है, आज तुझे एक बात बताती हूं. बचपन में जब मैं तेरे घर आती थी, तो उस ऐशो-आराम की ज़िंदगी को देखकर सोचती थी कि काश, मेरे पास भी वो सब कुछ हो, जो तेरे पास है. फिर रोहन से मेरी शादी ने तो मेरी क़िस्मत ही बदल दी. आज मेरे पास मेरी चाहत से बहुत ज़्यादा है. यदि उस समय तूने भी अपने पिताजी की बात मान ली होती तो…”

“तो मैं इस तरह घर का काम नहीं कर रही होती. है ना…”

“मनीषा, तू बिल्कुल नहीं बदली.”

“पर तू ज़रूर कुछ बदल गयी है तान्या, पहले से मोटी हो गयी है.” मैंने बात बदलते हुए कहा, तो दोनों को हंसी आ गयी और वातावरण फिर से सहज हो गया.

“चल मनीषा, मार्केट चलते हैं, थोड़ी-सी शॉपिंग भी हो जाएगी.” तान्या ने कहा.

“ठीक है, मैं तैयार हो जाती हूं.”

तभी डोरबेल बजी, दरवाज़ा खोला तो सामने अक्षय और गौरी खड़े थे. दोनों मम्मी-मम्मी कहते हुए ऐसे चिपक गए, मानों बरसों बाद मुझसे मिल रहे हो. दोनों 4 दिन पहले ही तो टूर पर गये थे. अक्षय ने इंजीनियरिंग की और गौरी मेडिकल की तैयारी कर रही थी.

“कौन है मनीषा?” तान्या ने अन्दर से पूछा.”

“बच्चे घर वापस आये हैं, तान्या हम शाम को चलेंगे.”

“अरे…. अक्षय और गौरी कैसे हो तुम लोग?”

“हम ठीक हैं, आप तान्या मौसी ही हो ना? मम्मी ने आपके बारे में काफ़ी बातें बतायी हैं.” गौरी और अक्षय दोनों तान्या से बातें करने लगे.

“अच्छा भई, फ्रेश हो जाओ, मैंने तुम दोनों की पसंद का खाना बनाया है, चलो जल्दी करो.”

“मम्मी, हमें आपकी और पापा की बहुत याद आयी.”

“बेटा, मुझे और तुम्हारे पापा को भी तुम्हारी बहुत याद आती थी. अच्छा ये तो बताओ, तुम्हारा टूर कैसा रहा?”

“बहुत अच्छा, बहुत मज़ा आया.” गौरी ने ख़ुश होते हुए कहा. फिर नाश्ता करते हुए दोनों बच्चे अपनी-अपनी बातें बताने लगे कि उन्होंने चार दिन में क्या-क्या किया.

अचानक तान्या बोली, “ये दोनों चार दिन के लिए बाहर गये और तुझे इस तरह से बातें बता रहे हैं जैसे छोटे बच्चे स्कूल से आकर बताते हैं. और लगता है छोटे बच्चों की तरह ही ये दोनों तुझसे दूर भी नहीं रह सकते. है ना मनीषा.”

“हां तान्या, तू ठीक कह रही है. ना तो ये हमारे बिना रह सकते हैं और ना हम इनके बिना. अक्षय की तो ठीक है, पर जब गौरी की शादी हो जाएगी तो कैसे रहेंगे इसके बिना, सोचकर ही दिल घबराने लगता है. अच्छा तान्या, तुषार कैसा है? क्या कर रहा है?”

“तुषार रोहन के साथ बिज़नेस में हाथ बंटाता है. रोहन की तरह उसे भी काम की बहुत समझ हो गयी है.”

रात को मैं और तान्या बातें कर रहे थे. बातों-बातों में तान्या ने गौरी और तुषार के रिश्ते की बात की. “मनीषा, मुझे गौरी बहुत पसंद है और तुषार के लिए वह पऱफेक्ट है. क्या कहती हो?”

“तान्या, मैं अभी कुछ नहीं कह सकती हूं. सुमित से बात करके बताऊंगी.”

अगले दिन सुमित क्लीनिक नहीं गये. तान्या को भी वापस जाना था.

तान्या को लंदन गये तीन महीने हो चुके थे. एक दिन सुमित बड़े ख़ुश होते हुए घर वापस आये. जब मैंने उनसे पूछा तो सुमित ने बताया, “एक रिसर्च के लिए उसे दोबारा लंदन जाना है. पंद्रह दिन लग जायेंगे. एक व्यक्ति साथ जा सकता है, तो मैं सोच रहा था कि तुम साथ चलो.”

“नहीं सुमित, बहुत ख़र्चा होगा. आप ही जाइए और वैसे भी एक बार तो मैं हो आयी हूं.” मैंने सुमित को मना करते हुए कहा, “मनीषा, हमारे टिकट तो फ्री हैं और हम तान्या के घर रह लेंगे.”

“हां मम्मी, आप लोग जाओ. मैं अपना, भइया और घर का अच्छी तरह ध्यान रखूंगी.” गौरी ने कहा.

“कब जाना है सुमित?”

“अगले ह़फ़्ते. हां, तुम तान्या को फ़ोन कर देना.”

मैंने तान्या को बताया तो वो बहुत ख़ुश हुई. अगले ह़फ़्ते हम दोनों लंदन पहुंच गये. तान्या हमें एयरपोर्ट पर लेने अकेले आयी. रोहन के बारे में पूछने पर तान्या ने बताया रोहन और तुषार दोनों बाहर गये हुए हैं.

तान्या के घर पहुंचे तो ऐसा लग रहा था जैसे किसी आलीशान महल को मॉडर्न लुक दे दिया हो. घर के हर काम के लिए नौकर लगे हुए थे. कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी. सुमित रोज़ सुबह अपनी रिसर्च के लिए निकल जाते. मैं और तान्या मार्केट के लिए. मुझे आये तीन दिन हो गये थे. जब मैं पहली बार रोहन से मिली. उसमें भी वे स़िर्फ 2 घंटे घर पर रुके, जिसमें उनके 15 बार फ़ोन आये. तान्या घर पर नहीं थी. रोहन के पास तान्या के लिए इंतज़ार करने का भी टाइम नहीं था, उसे अपनी फ्लाइट जो पकड़नी थी. मुझे लगा कि तान्या को बहुत बुरा लगेगा. और जब तान्या के वापस आने पर मैंने उसे बताया तो उसके चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं थी. मुझे अटपटा-सा लगा.

हमें आये एक ह़फ़्ता हो गया था. ज़्यादातर तान्या ने हमें सभी देखने लायक जगहों पर घुमा दिया था. अब तो हमें बच्चों की भी बहुत ज़्यादा याद आने लगी थी. मैंने तान्या से तुषार के बारे में पूछा तो उसने कहा- “तुषार आज आयेगा. तब मिलवा दूंगी.”

रात में अचानक मेरी आंख खुली. प्यास लग रही थी. पर कमरे में पानी नहीं था. पानी लेने उठी तो डोरबेल बजी, इतनी रात को कौन हो सकता है. मैं दरवाज़ा खोलने जा ही रही थी कि तभी नौकर ने दरवाज़ा खोल दिया. सामने तुषार ही था. सीधे अपने बेडरूम में गया. नौकर ने खाने के लिए कहा तो तुषार ने मना कर दिया. तभी तान्या वहां आ गयी. तान्या को देखकर तुषार चौंक गया, “मम्मी, आप इस समय?”

“हां, मैंने काका से कह दिया था, जब तुम आओ तो वो मुझे बता दें.”

“तभी तो मैं सोच रहा था कि आज आपको मेरी याद कैसे आयी?” तुषार ने कुछ तीखे स्वर में कहा.

“तुषार, मैंने तुझे गौरी के बारे में बताया था ना.”

“गौरी… कौन गौरी?”

“भूल गया… मेरी बचपन की सहेली मनीषा की बेटी. कुछ सोचा तूने इस बारे में.”

“सोचना क्या है, आपको तो पता है मैंने अभी बिज़नेस ज्वाइन किया है और मैं पापा के पीछे नहीं रहना चाहता. मैं काम के साथ कोई कॉम्प्रोमाइज़ नहीं करना चाहता. फिर भी यदि वो लड़की इतनी अच्छी है तो सोचूंगा, पर फ़िलहाल मैं बहुत बिज़ी हूं. कल मैं मॉरीशस जा रहा हूं. काका को पैकिंग के लिए कह दीजिए.”

“ठीक है.” तान्या ने कहा और वो अपने कमरे में चली गयी.

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एक कोने में खड़ी मैं ये सब देख-सुन रही थी. मेरी बेटी का भविष्य मुझे अपने सामने दिखाई दे रहा था. कमरे में आई तो आहट से सुमित जाग गये थे. जब उन्होंने पूछा कि मैं कहां थी, तो मैंने उन्हें सब कुछ बता दिया. आज मैं जीत और हार दोनों को एक साथ देख रही थी. तब हम दोनों ने मिलकर एक फैसला किया. फिर अगले दिन रोज़ की तरह सुमित रिसर्च के लिए निकल गये. शाम को जब वो वापस आये, तो सुमित ने चाय के लिए कहा. तभी रोहन और तुषार भी आ गये. तुषार की फ्लाइट मौसम की वजह से काफ़ी लेट थी. सभी के लिए तान्या ने चाय मंगाई. आज मैंने पहली बार तान्या को तुषार और रोहन दोनों के साथ देखा. सभी बातें करने लगे. सभी को मूड में देखकर बड़ा अच्छा लगा. हमें यहां आये बीस दिन हो गये थे. सुमित की रिसर्च भी पूरी हो गयी थी. हमने जाने के लिए इजाज़त मांगी.

“तान्या तुम मेरी बहुत अच्छी दोस्त हो, मैं बहुत दिनों से तुमसे कुछ कहना चाह रही थी, आशा है, तुम बुरा नहीं मानोगी और इस बात से ना ही हमारी दोस्ती में फ़र्क़ आएगा.”

“तुम कहना क्या चाहती हो तान्या?”

“तान्या, मैं तुम्हारे वर्तमान को अपनी बेटी का भविष्य नहीं बनाना चाहती.”

“क्या मतलब…? मैं समझी नहीं मनीषा?”

“मतलब ये तान्या कि एक दिन तुमने पूछा था ना कि मैंने उस रईस और ऊंचे घर में शादी से क्यों मना कर दिया था और मुझे घर का काम करते देख तुम कहा करती थी कि मुझे सुमित से शादी करके क्या मिला? तो सुनो, मेरे पिता सचमुच एक बहुत रईस आदमी थे. उन्होंने मुझे हर वो चीज़ दी, जो वो ख़रीद कर दे सकते थे. तुमने सही कहा था, काम करने के लिए मेरे आगे-पीछे नौकर घूमा करते थे, पर मेरे माता-पिता नहीं. छींक आने पर डॉक्टरों की लाइन तो लग जाती थी, पर मां के ममताभरे स्पर्श का एहसास नहीं होता था. कभी भी घर, घर-सा नहीं लगता था. हमेशा दम घुटता रहता था.

इसी घुटन से बाहर निकलने के लिए मैं तुम्हारे घर आती थी थोड़ा-सा सुख तलाशने. तुम्हारी मां के हाथों के खाने का स्वाद मुझे आज भी याद है. तुम्हारे उस छोटे घर में मुझे बहुत अच्छा लगता. मैंने तभी फैसला किया था कि ऐसी जगह शादी करूंगी, जहां एक-दूसरे के लिए दिलों में प्यार बसता हो. सुमित मेरी ज़िंदगी में आये, तो मेरे सपनों को पंख मिल गये. मुझे अपने फैसले पर आज भी गर्व है. जो प्यार मुझे नहीं मिला, वो मैंने अपने बच्चों को दिया है. तभी तो हमारे बच्चे हमारे इतने क़रीब हैं.

पर तान्या तुम… तुम्हीं बताओ क्या है तुम्हारे पास? ना पति ना बेटा. एक ही घर में रहते, तुम तीनों को मिले ह़फ़्तों हो जाते हैं. तुम्हारा नौकर हर काम करता है. नौकर को पता है तुषार कब आता है, कब जाता है, उसका सामान कहां है, उसकी ज़रूरतें क्या हैं? फिर तुम उसकी मां कैसे हुई? तुम्हारा मन नहीं करता कि अपने पति और बच्चों की ज़रूरतों को तुम पूरा करो. पैसा ही सब कुछ नहीं होता. क्या तुम पैसों से अपना अकेलापन दूर कर सकती हो? नहीं तान्या, कभी नहीं. अब बताओ तुमने क्या पाया?”

अपने परिवार और उसकी ख़ुशियों से ज़्यादा कुछ नहीं होता. मैं गौरी की शादी तुषार से नहीं कर सकती, क्योंकि मैं गौरी को अकेलापन नहीं देना चाहती. यदि गौरी की शादी तुषार से हुई, तो तुम्हारा वर्तमान ही उसका भविष्य होगा.” तान्या मूक-सी हो गयी. वाकई सच्चे सुख की परिभाषा कहां समझ पायी वो.

– पारूल गोयल

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कहानी- स्वीट डिश (Short Story- Sweet Dish)

Hindi Short Story

“कोई रिश्ता हमें कितना अच्छा लगेगा या कितना बुरा, वह हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण होगा, यह जानने के लिए ज़रूरी है कि हम खुले और साफ़ दिल से उस रिश्ते को स्वीकारें. जिस दिल में पहले से ही कोई पूर्वाग्रह पल रहा हो, वहां किसी सुमधुर रिश्ते का प्रवेश भला कैसे संभव है?”

“बड़ी नानी आ गई, बड़ी नानी आ गई.” का हल्ला मचते ही कुमुद पल्लू सिर पर लेकर सास का स्वागत करने दरवाज़े पर पहुंच गई. चरण स्पर्श का दौर समाप्त हुआ, तो विमलाजी के मुंह से पहले बोल ये फूटे, “चिंकी आई नहीं अभी तक?”

“उसकी ट्रेन लेट है, देर से आएगी. आप हाथ-मुंह धोकर फ्रेश हो जाइए. सभी आपका खाने पर इंतज़ार कर रहे हैं.” खाने पर भी चिंकी की ही बातें होती रहीं. चिंकी दादी की सबसे छोटी लाडली पोती है, तो निकिता और नीरज की दुलारी छोटी बहन. निकिता के दोनों बच्चे अपनी इकलौती मौसी की शादी की बात को लेकर काफ़ी उत्साहित थे.

“ममा, आपने चिंकी मौसी के लिए मौसाजी तो ढूंढ़ लिया. अब नीरज मामा के लिए मामीजी भी आप ही ढूंढ़ेंगी?”

“हां बहू, बच्चे सही कह रहे हैं. नीरज के लिए भी लड़की खोजकर दोनों भाई-बहन का एक ही मंडप में ब्याह रचा दे. तुझे भी तो अब आराम चाहिए.” विमलाजी ने कुमुद की ओर देखकर दिल की बात कही, तो उसने भी सहमति में गर्दन हिला दी, लेकिन चेहरा उसका गुमसुम ही बना रहा. नीरज खाना खाकर बच्चों को लेकर अपने कमरे में चला गया, तो विमलाजी से रहा नहीं गया.

“क्या बात है? तुम दोनों के चेहरों को देखकर तो लग ही नहीं रहा है कि चिंकी के रिश्ते की बात तय हो गई है.”

“दादी, दरअसल बात यह है कि पवन वैसे तो बहुत अच्छा लड़का है. फ़ोटोग्राफ़, बायोडाटा आदि देखकर दोनों परिवारवालों ने एक-दूसरे को पसंद भी कर लिया है. मैंने चिंकी और पवन को फेसबुक पर मिला भी दिया है, पर अब एक वजह से मुझे और मम्मी को यह रिश्ता खटाई में पड़ता नज़र आ रहा है. पवन संयुक्त परिवार से है. अपने परिवार के साथ इतना घुला-मिला हुआ है कि हमें नहीं लगता कि वह अपनी अलग गृहस्थी बसाएगा और चिंकी को जब यह बात पता चलेगी, तो वह इस शादी के लिए बिल्कुल तैयार नहीं होगी. आप तो जानती ही हैं, वह कितनी बिंदास और मनमौजी है. घर में कोई भी चीज़ आए, सबसे पहले उसे मिलनी चाहिए. यहां तक कि कोई मेहमान भी पहले उससे न मिले, तो उसका मूड उखड़ जाता है.”

“अब वह बच्ची नहीं है, बड़ी हो गई है. नौकरी करने लगी है.” विमलाजी ने टोका.

“और बड़े होने के साथ-साथ उसकी यह आज़ाद ख़यालात की प्रवृत्ति और भी बढ़ गई है दादी. तभी तो मेरे इतना कहने पर भी अलग कमरा लेकर रह रही है.”

“वह तो बेटी, वहां से उसका ऑफ़िस नज़दीक है इसलिए. तू बेकार ही इस बात का बुरा मान रही है.” कुमुद ने बात संभाली.

“जो भी हो मम्मी, मुझे नहीं लगता कि यह बात पता चलने पर चिंकी इस रिश्ते के लिए राज़ी होगी.” निकिता अभी भी आश्‍वस्त नहीं थी.

“मैं ऊपर बालकनी में जा रही हूं. चिंकी आ जाए, तो वहीं भेज देना.” विमलाजी यकायक उठकर सीढ़ियों की ओर बढ़ गईं, तो मां-बेटी आश्‍चर्यचकित हो उन्हें जाते देखती रह गईं.

“यह दादी को अचानक क्या हो गया?” निकिता के प्रश्‍न को अनसुना कर कुमुद गहरी सोच में डूब गई.

“हमें मांजी के सामने इस तरह संयुक्त परिवार के मुद्दे को नहीं उछालना चाहिए था निक्की. तू जानती तो है, तेरी दादी ने पूरा जीवन कितने बड़े परिवार को संभालते हुए गुज़ारा है. पूरे परिवार की धुरी थीं वे. वो तो तेरे पापा और चाचा की अलग-अलग शहरों में नौकरियां लग गईं, जिससे हम अलग-अलग रहने पर मजबूर हो गए.”

“वैसे भी आज के ज़माने में वह सब कैसे मुमकिन है मम्मी?”

“हालात के चलते बिखरना अलग बात है बेटी, लेकिन आधुनिकता और आज़ादी का दंभ भरते हुए अलग हो जाना थोड़ा अलग मुद्दा है. शायद तुम्हारी इन्हीं बातों से तुम्हारी दादी को ठेस लगी और वे उठकर चली गईं.”

“वे अपनी जगह सही हो सकती हैं मम्मी, लेकिन चिंकी को अच्छी तरह से जानते हुए मैं भी अपनी जगह ग़लत नहीं हूं, बल्कि मैं तो ख़ुद चाहती हूं कि चिंकी उस परिवार को अपना ले. मैं न केवल पवन, बल्कि उसके घरवालों से भी मिल चुकी हूं. सभी बहुत अच्छे लोग हैं. समस्या स़िर्फ चिंकी के दिमाग़ में बसे पूर्वाग्रह को तोड़ने की है.”

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“अब बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? ख़ैर, इस बारे में बाद में सोचेंगे. पहले मैं तेरी दादी को मनाकर आती हूं. वे अभी आईं और अभी हमने उनका मूड ख़राब कर दिया.” कुमुद सीढ़ियां फलांगते तुरंत विमलाजी के पास बालकनी में जा पहुंची.

विमलाजी आरामकुर्सी पर आंखें मूंदें विगत की यादों में खोई थीं. कुमुद की पदचाप से उनकी चेतना लौटी और उन्होंने आंखें खोल दीं. “आपकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए मैं क्षमा चाहती हूं. हमारा ऐसा कोई इरादा नहीं था. मैं और निक्की तो स्वयं चाहते हैं कि चिंकी उस परिवार को अपना ले, पर आप तो चिंकी को जानती हैं न. उसे कौन समझाएगा?” कुमुद के चेहरे पर चिंता की लकीरें और भी गहरी हो उठी थीं.

“चिंकी आ जाए और तुम सबसे मिल ले, तो उसे मेरे पास भेज देना. मैं यहीं उसका इंतज़ार कर रही हूं.” अपनी बात समाप्त कर विमलाजी ने फिर से सिर टिकाकर आंखें मूंद लीं. सुखद अतीत के झरोखे से उन्हें बाहर निकाला दो ख़ूबसूरत बांहों ने, जिन्होंने न जाने कब चुपके से आकर उन्हें अपने आगोश में ले लिया.

“आ गई तू?” विमलाजी ने चिंकी को पीछे से खींचकर सामने रखी कुर्सी पर बिठा दिया और गौर से निहारने लगीं, तो चिंकी झेंप गई.

“ऐसे क्या देख रही हैं दादी?”

“देख रही हूं कल की नन्हीं-सी गुड़िया आज दुल्हन बनने जा रही है.”

“अभी वक़्त है दादी. कहीं छुपकर बैठे उस हमसफ़र को खोजकर लाने में अभी और वक़्त लगेगा.” चिंकी की बातों से विमलाजी को अंदाज़ा हो गया कि चिंकी को पवन के परिवार के बारे में बताया जा चुका है और इस बात को लेकर उसने अपनी सोच भी बदल ली है. क्या हो गया है आज की पीढ़ी को? कोई समझौता करने को तैयार ही नहीं. हर चीज़ उन्हें एकदम अपने मन-मुताबिक चाहिए. पल में सिलेक्ट,

पल में रिजेक्ट… मानो शादी न हुई गुड्डे-गुड़िया का खेल हो गया और कोई दुख या अफ़सोस भी नहीं.

“चिंकी, ले मैं तेरी थाली यहीं ले आई हूं. आराम से दादी से गप्पे मारते हुए खाना खा.” कुमुद ने चिंकी को थाली पकड़ाई, तो अपनी मनपसंद स्वीट डिश रसगुल्ला देखकर चिंकी चहक उठी. चिंकी खाना खाती रही और विमलाजी उससे इधर-उधर की, ऑफ़िस, कैंटीन, सहकर्मियों आदि की बातें करती रहीं.

“यह पालकवाली सब्ज़ी क्यों नहीं खा रही तू?”

“उं… यह मुझे पसंद नहीं है दादी.” चिंकी ने मुंह बनाते हुए कहा.

“तो क्या हुआ? बहुत पौष्टिक होता है पालक, फटाफट खा ले और यह रसगुल्ला तो तुझे बहुत पसंद है न, यह क्यों नहीं खा रही?”

“हूं… इसे तो मैंने अंत में खाने के लिए बचाकर रखा है. पहले फटाफट सारा खाना ख़त्म कर दूं, फिर लास्ट में मज़े ले-लेकर अपनी मनपसंद स्वीट डिश खाऊंगी.” मस्ती से गर्दन हिलाते हुए चिंकी ने कहा, तो उसके भोलेपन पर विमलाजी को ढेर सारा प्यार उमड़ आया.

“तेरी इस स्वीट डिश वाली बात से मुझे तेरे दादाजी की याद आ गई.”

“हाउ स्वीट एंड रोमांटिक दादी! दादाजी को भी रसगुल्ले पसंद थे क्या?” चिंकी थोड़ा पास खिसक आई. “बताओ न दादी.”

“अरे नहीं, वो बात नहीं है. तब हमारा संयुक्त परिवार था. एक-दूसरे की पसंद-नापसंद जानने-पूछने का होश ही कहां था? हर वक़्त एक संकोच घेरे रहता था. रोमांस की तो सोच भी नहीं सकते थे.”

“वही तो दादी. ऐसे में प्यार पनपना तो दूर रहा, जो है वो भी ख़त्म हो जाता है.” चिंकी थोड़ा जोश में आ गई थी, लेकिन दादी के अगले ही वाक्य ने उसके उत्साह पर पानी फेर दिया.

“बस, यहीं पर आज की पीढ़ी मात खा जाती है. खुल्लम-खुल्ला छेड़छाड़, आई लव यू कहना, किस करना. तुम लोग इन्हीं सब को प्यार समझते हो. प्यार की गहराई से तो तुम लोगों का दूर-दूर तक कोई नाता ही नहीं है… वैसे तुम्हारी भी ग़लती नहीं है. मैं भी पहले ऐसा ही कुछ समझती थी. तुम्हारे दादाजी जब ऑफ़िस से घर लौटते, तो बरामदे में ही बैठे अपने माता-पिता से पहले बतियाते. तब तक बड़े भाईसाहब के बच्चे ‘चाचा-चाचा’ करते उन्हें घेर लेते. वे कभी बच्चों को चॉकलेट-टॉफी पकड़ाते, तो कभी नन्हें मुन्नू को गोद में लेकर दुलारते, तब तक ननदजी अपने कॉलेज की बात बताने लगतीं. सबसे बतियाते हुए अंत में वे मुझ तक पहुंचते, तब तक मैं अपने कमरे में ग़ुस्से से गुड़मुड़ होती रहती. वे मुझसे प्यार भरी बातें करना चाहते, तो मैं मुंह फेर लेती या हां-हूं करके टरकाने लगती. वे मेरी मनःस्थिति समझ जाते.”

“नाराज़ हो मुझसे? मैं तुम्हारी नाराज़गी समझ सकता हूं. पर क्या करूं? सब के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी निभाते-निभाते इतना वक़्त लग ही जाता है.”

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मैं फिर भी मुंह फुलाए रहती.

“मैं तुम्हारा ग़ुस्सा समझता हूं. तुम सोचती होगी सबके प्रति ज़िम्मेदारी समझता हूं और तुम्हारे प्रति नहीं. सबके लिए वक़्त निकाल सकता हूं, तुम्हारे लिए नहीं, पर सच्चाई कुछ और है. मेरी ज़िंदगी रूपी थाली में तुम्हारा स्थान स्वीट डिश की तरह है. जल्दी-जल्दी पूरा खाना ख़त्म कर मैं अंत में आराम से इस स्वीट डिश का पूरा लुत्फ़ लेना चाहता हूं. तुम्हारे लिए मुझे वक़्त निकालने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मेरा पूरा वक़्त तुम्हारा है. उसमें से दूसरे कामों के लिए, दूसरे लोगों के लिए मुझे वक़्त निकालना होता है.”

“मैं अवाक् उन्हें देखती रह गई थी. मैं उनके लिए इतनी महत्वपूर्ण हूं, इसकी तो मैंने कल्पना भी नहीं की थी, तब से मुझे उनसे कभी कोई शिकायत नहीं रही. उनके अंत समय तक मैं उनके लिए स्वीट डिश ही बनी रही.” विमलाजी थोड़ी भावुक होने लगीं, तो चिंकी ने हास-परिहास से वातावरण को हल्का करना चाहा.

“समझ नहीं आता आपको शुगर की बीमारी कैसे हो गई? जबकि आप तो ख़ुद स्वीट डिश हैं.”

विमलाजी कुछ संभल चुकी थीं और उन्हें अपना मक़सद भी याद आ गया था. “चिंकी, यह ज़िंदगी बड़ी अजीब है. कोई भी इंसान सारी ज़िंदगी केवल स्वीट डिश खाकर नहीं गुज़ार सकता. शरीर के लिए आवश्यक सारे पोषक तत्व पाने के लिए उसे सब कुछ खाना पड़ता है. पसंद हो, चाहे न हो. जैसे अभी तुम्हें पालक की सब्ज़ी ज़बरन गले के नीचे उतारनी पड़ी. रिश्तों की माया भी बहुत कुछ ऐसी ही है. पसंद न होते हुए भी कुछ रिश्तों को निभाना हमारी मजबूरी बन जाती है. यह मजबूरी धीरे-धीरे आदत बनती चली जाती है, फिर हमें इसमें भी आनंद आने लगता है, जैसा कि मेरे संग हुआ. स्वीट डिश यानी तुम्हारे दादाजी का साथ पाने के लालच में मैं सारे रिश्ते बख़ूबी निभाती चली गई और धीरे-धीरे मुझे उन रिश्तों से भी प्यार होने लगा. मैं सबकी और सब मेरी ज़रूरत बनते चले गए.

मुझे एहसास होने लगा कि यदि मन में भाव अच्छे नहीं हैं, तो पकवान भी निरे बेस्वाद लगेंगे. यदि मुंह में पहले से ही कड़वाहट घुली हो, तो उसमें कितना भी स्वादिष्ट व्यंजन रख दो, उसका स्वाद कड़वा ही आएगा. कोई रिश्ता हमें कितना अच्छा लगेगा या कितना बुरा, वह हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण होगा, यह जानने के लिए ज़रूरी है कि हम खुले और साफ़ दिल से उस रिश्ते को स्वीकारें. जिस दिल में पहले से ही कोई पूर्वाग्रह पल रहा हो, वहां किसी सुमधुर रिश्ते का प्रवेश भला कैसे संभव है?” चिंकी के खाना खाते हाथ यकायक थम से गए. वह गहन सोच की मुद्रा में आ गई थी. विमलाजी ख़ुश थीं कि तीर निशाने पर लग गया था.

“अरे! तुम खाना खाते-खाते रुक क्यों गई? यह रसगुल्ला तो लो, जो तुम्हें इतना पसंद है और जिसके लालच में तुमने पूरा खाना ख़त्म किया है.”

“हूं… हां खाती हूं.” कहते हुए चिंकी ने गप से पूरा रसगुल्ला मुंह में रख लिया. रसगुल्ले के मीठे-मीठे स्वाद ने उसे झूमने पर मजबूर कर दिया. “वाउ! मज़ा आ गया. पूरा खाना खाने के बाद स्वीट डिश खाने का अपना ही आनंद है. वैसे दादी, आप मुझे जो समझाना चाह रही हैं, मैं बख़ूबी समझ रही हूं. दादाजी का प्यार पाने के लालच में आप सारे रिश्ते निभाती चली गईं और प्यार का असली आनंद आपको इसी में मिला.” चिंकी अब वाकई गंभीर हो उठी थी, क्योंकि यह उसकी ज़िंदगी से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा था. पवन को वह पसंद करने लगी थी, लेकिन उसे पाने के लिए उसके पूरे परिवार को अपनाना होगा, यह विचार उसे परेशानी में डाल रहा था और इसीलिए वह अभी भी थोड़ा झिझक रही थी.

“मैं तुम्हें किसी भुलावे में नहीं रखना चाहती चिंकी. इसलिए झूठ नहीं बोलूंगी. यह राह इतनी आसान नहीं है. कई अप्रिय प्रसंग ऐसे आए, जिन्हें कड़वी दवा समझकर मुझे एक सांस में हलक से नीचे उतार लेना पड़ा, यह सोचकर कि चलो इससे जल्दी स्वस्थ हो जाऊंगी और फिर से एक ख़ुशहाल जीवन जीने लगूंगी और ऐसा हुआ भी.”

“कितना कुछ सहा है दादी आपने और कितना कुछ किया है आपने अपने परिवार को एक बनाए रखने के लिए. इतने परिश्रम का फल तो वैसे भी मीठा होना ही था और एक मैं हूं बिना कुछ किए ही मीठे फल पा लेना चाहती हूं. ऐसे में भला उसमें वह स्वाद कहां से आएगा?” चिंकी मुस्कुरा रही थी और उसकी मुस्कुराहट में उसके इरादों की चमक साफ़ नज़र आ रही थी.

“चिंकी, तुमने खाना ख़त्म कर लिया? देखो, मैं तुम्हारे लिए और रसगुल्ला

लाई हूं.” कहते हुए कुमुद ने चिंकी की प्लेट में एक और रसगुल्ला रख दिया. “आप भी एक लीजिए न मांजी?” कुमुद ने आग्रह किया.

“मैं मीठा कहां लेती हूं बहू?.. पर हां, चिंकी के राज़ी हो जाने की ख़ुशी में तेरा मुंह मीठा करा देती हूं.” कहते हुए विमलाजी ने कुमुद के मुंह में एक रसगुल्ला ठूंस ही दिया.

Sangeeta Mathur

     संगीता माथुर

 

कहानी- चौथा पड़ाव (Short Story- Chautha Padaav)

अब समय के बदलाव के अनुसार ज़रूरत है हमें हमारी सोच बदलने की, क्योंकि अब बच्चों की और प्रौढ़ लोगों की जीवनशैली में इतना अंतर आ गया है कि दोनों को ही साथ रहने में असुविधा होती है. हर उम्र में हरेक को अपने निजी जीवन को अपनी इच्छानुसार जीने के लिए स्वतंत्रता चाहिए होती है, जो साथ रहकर नहीं मिलती.

मैं सुबह अलसाए मन से सोकर उठी, क्योंकि आज मेरे रिटायरमेंट का पहला दिन था और मुझे पढ़ाने के लिए स्कूल जाने की जल्दी नहीं थी, इसलिए मेरा मन भी बहुत प्रफुल्लित था. अन्य दिनों के विपरीत जल्दी-जल्दी चाय बनाने की अपेक्षा मैं अपनी बालकनी में जाकर खड़ी हो गई. रातभर बरसात होने के कारण अमलतास और रात की रानी के पेड़ों से पानी टपक रहा था और उनके फूल ज़मीन पर बिखरे हुए थे. दूर-दूर तक सड़कें नहाई हुई लग रही थीं. बौछार के साथ ठंडी-ठंडी हवा और चिड़ियों की चहचहाहट मन को पुलकित कर रही थी. इस दृश्य की अनुभूति मुझे बिल्कुल नई लग रही थी, क्योंकि दस साल पहले इस मकान में आने के बाद जितनी फुर्सत से आज इसका अवलोकन कर रही हूं, इससे पहले कभी नहीं कर सकी.

स्कूल की नौकरी और बेटे समर के पालन-पोषण में घड़ी की सुइयों के अनुसार जीवन बीत रहा था. दृश्य देखने में इतनी खो गई थी कि मेरे पति सुनील के पुकारने की आवाज़ भी मेरे कानों से टकराकर लौट गई थी. हमेशा की तरह वे मुझे ढूंढ़ते हुए बालकनी में आ पहुंचे और बोले, “क्यों भई, आज चाय नहीं मिलेगी क्या? कल तक तो सुबह की चाय मैं ही तुम्हें बनाकर देता था. आज तो तुम भी मेरी तरह रिटायर हो, आज तुम चाय बनाओगी… ठीक है.”

“सच में तुमने यदि सहयोग नहीं दिया होता, तो मेरे लिए नौकरी करना बहुत कठिन था. अब सुबह की चाय मैं ही बनाऊंगी, लेकिन सुबह पांच बजे नहीं, सात बजे, नो रूटीन. कभी थोड़ा जल्दी… कभी थोड़ा लेट, चलेगा? मैं रूटीन से थक गई हूं.”

“हां, ठीक है. रिटायरमेंट का समय मिलता ही है अपने जीवन को अपने अनुसार जीने के लिए. नो वर्क प्रेशर.” इतना कहकर उन्होंने अपनी हथेली फैला दी और मैंने भी उस पर अपनी हथेली ज़ोर से रखते हुए ‘डन’ कहा और हम दोनों खिलखिलाकर हंस दिए.

मैं दो प्याली चाय बनाकर बालकनी में लाई और सुनील को, जो डायनिंग टेबल पर मेरा इंतज़ार कर रहे थे, आवाज़ देकर बुलाया और बोली, “अब हम सुबह की चाय बालकनी में ही लेंगे.” वे मुस्कुराते हुए बैठ गए. मैं जल्दी से उठकर अख़बार उठा लाई और सोचने लगी कि इस बालकनी में, जिसमें अभी तक बेतरतीबी से घर का फालतू सामान रखा था, उसे हटाकर बैठने के लिए दो कुर्सियां और एक मेज़ रखूंगी और यहीं बैठकर चाय पीया करेंगे. नौकरी की आपाधापी में कभी यह ख़्याल आया ही नहीं था. मुझे याद आया कि स्कूल के लिए जाते समय मैं चाय पीती नहीं थी, बल्कि घुटकती थी. वह भी कभी बैठकर और कभी-कभी खड़े-खड़े ही. छुट्टीवाले दिन भी घर के अन्य कार्यों में इतनी व्यस्त हो जाती थी कि आराम से चाय पीने का मौक़ा ही नहीं मिलता था.

मैंने महसूस किया कि बालकनी में चाय पीने का मज़ा ही अलग था. अब चाय घुटकने के स्थान पर उसको चुस्कियों के साथ पीते हुए बाहरी दृश्यों का आनंद लेना अख़बार की ख़बरों को पढ़ते हुए उस पर चर्चा करना, अलौकिक आनंद की अनुभूति दे रहा था, जिसे मैं शब्दों में नहीं बांध सकती.

मैंने लिस्ट बनाई कि किस-किस से मिलने का मन करता था और अब तक  उनसे मिलना टालती रही थी. सबसे पहले मुझे मुंबई में रहनेवाली अपनी बचपन की सखी पूनम का ख़्याल आया. उससे चार साल पहले उसके बेटे के विवाह पर ही मिली थी और विवाह की व्यस्तता के कारण 3 दिन में अधूरे मन से वापिस आना पड़ा था. मैंने झटपट वहां जाने की घोषणा अपने पति और बेटे समर के सामने कर दी और एक हफ़्ते के बाद ही वहां जाने का प्रोग्राम बना लिया. मुझे याद आया कि एक बार जब मेरी मां बीमार थीं, मैं मन मसोस कर रह गई थी, क्योंकि बच्चों के इम्तिहान और अपनी नौकरी के कारण उनको देखने भी नहीं जा पाई थी और वे दुनिया से भी चली गईं. कई बार तो घर पर मेहमान रहते थे और मुझे मजबूर होकर स्कूल जाना पड़ता था. उन दिनों की बेचारगी याद करके मेरा मन कसैला हो गया.

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अभी मुझे पूनम के पास गए दो दिन भी नहीं हुए थे कि समर का फोन आया कि उसकी कंपनी उसे बहुत जल्दी लंदन ट्रांसफर करना चाहती है. मैंने प्रत्युत्तर में ख़ुशी ज़ाहिर की, तो वह बोला, “मैं जानता था कि आप सुनकर ख़ुश होंगी, जबकि आपका और पापा का अपनी पोती और हमारे बिना रहना काफ़ी कठिन होगा और नए सिरे से अपनी ज़िंदगी आरंभ करनी होगी, लेकिन मैं आपको अधिक दिन तक अपने से दूर नहीं रहने दूंगा, जल्दी ही आप दोनों को अपने पास बुला लूंगा. पहले थोड़ा मुझे वहां सेटल होने दीजिए.” इससे पहले कि मैं कुछ उत्तर देती, फोन कट गया.

पूनम के साथ एक हफ़्ता रहकर बहुत आनंद आया. हम दोनों अतीत की यादें ताज़ा करके, मानो उसी युग में पहुंच गए थे. समय के बहाव ने हमारी दोस्ती पर रत्तीभर भी प्रभाव नहीं छोड़ा था. संतुष्ट मन से मैं वापिस दिल्ली आ गई.

समर एक महीने बाद ही अपने परिवार के साथ लंदन चला गया. एक बार तो उसके जाने से हमें झटका लगा कि अकेले कैसे रहेंगे? लेकिन जल्दी ही हमने अपने आपको संभाल लिया. उसके साथ रहते हुए, कुछ कार्यों के लिए अपने को असमर्थ समझकर उस पर आश्रित रहते थे, उसके जाने के बाद उन्हें स्वयं करने के लिए हमारे अंदर नई ऊर्जा का संचार हुआ और हम उसे करने में सक्षम हो गए. कहते हैं ना ‘आवश्यकता आविष्कार की जननी है’. मुझे आरंभ से ही पढ़ने में बहुत रुचि थी, जो विवाह के बाद कभी पूरी नहीं कर पाई थी. अब ऑनलाइन किताबें मंगवाकर पढ़ने में व्यस्त रहने लगी. लाइब्रेरी की मेंबरशिप ले ली. वहां जाने से पढ़ने का शौक़ तो पूरा होता ही था, बहुत से पढ़ने के शौक़ीन लोगों से वहीं जान-पहचान भी हो गई और पुस्तकों के बारे में उनसे चर्चा करने में जहां ज्ञान की वृद्धि होती थी,

वहीं जान-पहचान के लोगों का दायरा भी बढ़ गया था. इंटरनेट पर भी बहुत से परिचित लोगों से कनेक्टेड होने से अकेलेपन का एहसास ही जैसे समाप्त हो गया था. फिल्मों का शौक़ भी मनचाही फिल्में देखने से पूरा हो रहा था. सबसे मिलने-जुलने में और फोन पर लंबी बातें करने में समय कहां बीत रहा था, पता ही नहीं चला. ऐसा लग रहा था जैसे बचपन के केयरफ्री दिन फिर लौटकर आ गए थे. किसी ने सही परिभाषा दी है कि ‘प्रौढ़ावस्था बचपन का पर्याय होता है’.

समर ने कुछ महीनों बाद ही हमारा वीज़ा प्रोसेस करना आरंभ कर दिया और जल्दी ही हमें अपने पास बुला लिया. उसकी सुखी गृहस्थी देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई. जब हमारे साथ रहता था, तब  मुझे अक्सर चिंता होती थी कि वह हमसे इतना अटैच्ड था कि कभी हमारे बिना रह भी पाएगा, लेकिन यह देखकर कि अकेले रहकर वह बहुत स्वावलंबी हो गया था और दैनिक क्रिया-कलाप सुचारु रूप से हो रहे थे. मैंने महसूस किया कि बच्चों में अपने माता-पिता से दूर रहकर ही आत्मनिर्भरता आती है, इसलिए उनसे कुछ समय के लिए दूर रहना भी आवश्यक है. हमें उनके साथ रहते हुए छह महीने बीत गए, तो मुझे इंडिया की याद आने लगी और मैंने समर को जब अपने लौटने की इच्छा बताई, तो वह बोला, “ममा, आप लोग वहां जाकर क्या करेंगे? दूर रहेंगे तो मुझे भी आप लोगों की चिंता रहेगी.”

मैंने प्रत्युत्तर में कहा, “नहीं बेटा, तुम हमारी चिंता बिल्कुल नहीं करो, हमारी वहां की और यहां की जीवनशैली भिन्न होते हुए भी अपनी जगह दोनों ही बहुत महत्वपूर्ण हैं और मैं दोनों में से पूर्णरूप से किसी से भी कटकर नहीं रहना चाहती. यहां कुछ महीनों के लिए तुम लोगों के साथ रहकर तुम्हारे जीवन-चर्या के अनुसार ज़िम्मेदारी-मुक्त होकर जीने का अलग ही आनंद है. मैं  हमेशा के लिए तुम्हारे साथ रहकर तुम्हारी ज़िम्मेदारियों को बढ़ाना नहीं चाहती, इसलिए इंडिया में रहकर अपना जीवन, अपनी दिनचर्या के अनुसार भी जीना चाहती हूं. बेटा बुरा मत मानना, मैं यह भी चाहती हूं कि हर लड़की की तरह गीता भी अपना घर अपनी इच्छानुसार सजाने-संवारने का अपना सपना पूरा करे और तुम भी अपने परिवार की ज़िम्मेदारी हमारे बिना संभालते हुए अपना जीवन स्वतंत्र रूप से अपनी इच्छानुसार जीयो और हमें भी जीने दो. तुम्हें जब भी हमारी ज़रूरत होगी, हम तुरंत तुम्हारे पास आ जाएंगे.” मैंने दृढ़ स्वर में जब अपना प्रस्ताव समर के सामने रखा और सुनील ने भी उस पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी, तो उसे मेरी बात अधूरे मन से माननी पड़ी.

हम वापिस इंडिया आ गए और अपने रूटीन के अनुसार तनावरहित जीवन जीने लगे. हमें अपने स्वास्थ्य के लिए भी टहलने  और व्यायाम करने का भरपूर समय मिलता था. मैं सोचती थी कि समर लंदन चला गया, तो हमें अकेले रहने का मौक़ा मिला, लेकिन इंडिया में एक शहर में रहते हुए भी बेटा-बहू से अलग रहा जाए, तो क्या बुराई है? जिसके लिए समाज की प्रतिक्रिया तो नकारात्मक ही होगी. अब समय के बदलाव के अनुसार ज़रूरत है हमें हमारी सोच बदलने की, क्योंकि अब बच्चों की और प्रौढ़ लोगों की जीवनशैली में इतना अंतर आ गया है कि दोनों को ही साथ रहने में असुविधा होती है. हर उम्र में हरेक को अपने निजी जीवन को अपनी इच्छानुसार जीने के लिए स्वतंत्रता चाहिए होती है, जो साथ रहकर नहीं मिलती. इसका दूसरा सकारात्मक परिणाम यह है कि दोनों पीढ़ियों के पास दो घर हो जाते हैं और जब भी बदलाव का मन हो, तो एक-दूसरे के घर आ-जा सकते हैं और बच्चे भी आत्मनिर्भर होकर अपनी ज़िम्मेदारी संभालना सीख जाते हैं.

मुझे याद आया कि जब मेरे रिटायर होने  में कुछ महीने ही शेष रह गए थे, तब मेरी कलीग मिसेज़ पारीख बोलीं, “मैं भी अगले साल रिटायर हो जाऊंगी, आपके साथ तो आपका बेटा रहता है, इसलिए आपको घर में अकेलापन नहीं लगेगा. मेरी तो एक बेटी ही है, उसकी भी शादी हो गई है. मैं अकेले कैसे रहूंगी?”

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मैंने उनको जवाब दिया था, “हमारे उम्र के इस पड़ाव तक आते-आते बेटा हो या बेटी, दोनों ही अपने-अपने जीवन में व्यस्त हो जाते हैं. बेटी विवाह के कारण दूर जा सकती है, तो बेटा भी नौकरी के कारण हमसे दूर जा सकता है, यह सब स्वाभाविक है. ऐसा तो कभी न कभी होना ही है. यह जानते हुए भी हम अपने को ख़ुश रखने के लिए अपने बच्चों पर आश्रित रहते हैं, तो रिटायरमेंट के बाद का समय हमारे लिए अभिशाप बन जाता है. इसलिए आत्मनिर्भर रहकर अपने को ख़ुश रखने के अन्य रास्ते तलाशने चाहिए. अपनी दबी हुई इच्छाओं को पूरा करने का सुनहरा मौक़ा रिटायरमेंट के बाद ही मिलता है. वह हम बिना किसी पर आश्रित रहकर ही पूरा कर सकते हैं.” उन्हें मेरी बातें व्यावहारिक ना लगकर मात्र उपदेश लगीं. प्रत्युत्तर में बोलीं,  “ठीक है. आपका वह समय भी जल्दी ही आनेवाला है, तब देखूंगी…” और अब वह समय आ ही गया.

मेरे इंडिया पहुंचने पर वे मुझसे मिलने आईं और मेरे चेहरे की चमक देखकर हतप्रभ होकर बोलीं, “मैं तो समझी, अब तुम वहीं रहोगी!” तो मैं उनकी बात पूरी होने से पहले ही बोली, “देखो जो मैं कह रही थी, उसे मैंने सच कर दिखाया. मैं यहां अकेले बहुत ख़ुश हूं, ऐसा लग रहा है, जैसे कि मेरे नए पंख उग आए हैं और मैं जहां चाहूं उड़ सकती हूं.” मेरी बात सुनकर वे बोलीं, “सच में मैंने तो हमेशा लोगों को रिटायरमेंट के बाद बीमारियों का रोना रोते ही देखा है. आपसे मिलकर मुझे इस उम्र को जीने की कला सीखने को मिली है. आपका बहुत धन्यवाद.”

“वास्तव में ऐसे लोगों का शरीर बीमार नहीं होता, उनकी सोच बीमार होती है. वे अपने को बूढ़ा सोचकर अपने को असहाय और अक्षम मान लेते हैं और अपने शेष जीवन को जीने का एकमात्र उद्देश्य मृत्यु की प्रतीक्षा करना ही समझने लगते हैं. उनकी इस नकारात्मक सोच का प्रभाव उनके शरीर पर भी पड़ता है. उम्र के अनुसार शरीर पर बाहरी बदलाव तो आता है, लेकिन हमारी सोच हमारी बढ़ती उम्र के प्रति सकारात्मक हो, तो उसका प्रभाव हमारे मन पर कभी नहीं पड़ता. मन हमेशा उमंग से भरा होना चाहिए, उम्र को अपने मन पर कभी हावी नहीं होने देना चाहिए और यह कला मुझे भी अपने आप नहीं आई, मैंने भी किताबें पढ़कर सीखी है. एक किताब में मैंने पढ़ा था, जब तुम अपनी सोच को नियंत्रित कर लेते हो, तो अपने मस्तिष्क में आए विचारों को भी नियंत्रित कर लेते हो और जब तुम अपने मस्तिष्क में आए विचारों को नियंत्रित कर लेते हो, तो अपने जीवन को भी नियंत्रित कर लेते हो… इस बात का प्रभाव मुझ पर जीवनपर्यंत रहा और मेरी जीवन के प्रति सोच ही सकारात्मक हो गई.” मेरी बात सुनकर मिसेज़ पारीख के चेहरे की प्रतिक्रिया ऐसे लग रही थी, जैसे कि मैंने जीवन के चौथे पड़ाव को ख़ुशी से जीने की कला ही उन्हें सिखा दी हो.

         सुधा कसेरा


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कहानी- चेस्ट ऑफ ड्रॉअर (Short Story- Chest Of Drawer)

Hindi Kahani

विवाह के शुरुआती दिनों में वह अजीत के बारे में, उसके काम के बारे में, उससे मिलने-जुलनेवालों, सहयोगियों के बारे में पूछने, जानने में संकोच करती थी. अब वह अजीत के हर पहलू से जुड़ना चाहती है, पर कैसे जुड़े. अपनी दराज़ पर तो अजीत ने ताला लगा रखा है.

काम ख़त्म होने के बाद ज़रा कमर सीधी करने के ख़्याल से अर्पिता कमरे में आकर पलंग पर लेट गई. सुबह पांच बजे से उठकर जो गृहस्थी के कामों में लगती है, तो बारह-एक बजे जाकर सबसे ़फुर्सत मिलती है. तब तक कमर बुरी तरह से दुखने लगती है. साइड टेबल से एक पत्रिका उठाकर अर्पिता लेटे-लेटे ही उसके पन्ने पलट रही थी कि उसे याद आया, बेटी अनु को जल्दी ही स्कूल में अपना प्रोजेक्ट जमा करना है और उसके कुछ ज़रूरी काग़ज़ और चित्र मिल नहीं रहे थे. वो तीन-चार दिनों से अर्पिता से बोल रही थी कि ढूंढ़कर रख दे, लेकिन उसे ध्यान ही नहीं रहता.

बच्चे स्कूल से आकर खाना खाते हैं और पढ़ाई करने बैठ जाते हैं, वो उनका होमवर्क करवाती है और शाम को रसोई में लग जाती है. बस दिन ख़त्म. अनु रोज़ स्कूल जाते हुए उसे याद दिलाती है कि आज काग़ज़ ढूंढ़ देना. अर्पिता को कोफ़्त हुई. पढ़ाई के नाम पर पता नहीं क्या-क्या बेकार के काम करवाते रहते हैं ये स्कूलवाले. मैगज़ीन एक ओर रखकर वह उठ गई. दरवाज़े की आड़ में चार ड्रॉअरवाला चेस्ट ऑफ ड्रॉअर रखा था. चारों के एक-एक ड्रॉअर थे, जिनमें उनका महत्वपूर्ण सामान रखा था. एक ड्रॉअर में अर्पिता का, एक में बेटी अनु का, एक में बेटे अरु का और एक में अजीत का.

अर्पिता दूसरे नंबर का ड्रॉअर खोलकर अनु के काग़ज़ ढूंढ़ने लगी. पांच-सात मिनट में ही उसे प्रोजेक्ट के लिए ज़रूरी काग़ज़ और चित्र मिल गए. अभी तो बिटिया बस छठवीं में ही है, लेकिन प्रोजेक्ट के नाम पर क्या कुछ नहीं बनाना पड़ता है. काम के काग़ज़ निकालकर उसने अलग रखे और ड्रॉअर बंद कर दिया. आकर दुबारा पलंग पर लेट गई, तो नज़र एकबारगी फिर से चेस्ट ऑफ ड्रॉअर पर चली गई.

पिछले कुछ महीनों से अपने बारे में सोचते हुए उसे बहुत साल पहले पढ़ी हुई कहानी ‘बंद दराज़ों का साथ’ याद आ जाती. वह भी तो ऐसे ही दराज़ों के साथ जी रही है, जो अपने आप में अपने-अपने रहस्यों को छुपाकर जी रहे हैं.

कहने को चेस्ट ऑफ ड्रॉअर एक ही होता है, लेकिन उसके हर दराज़ में अलग-अलग सामान भरा होता है. किसी भी दराज़ को पता नहीं होता है कि दूसरे के अंदर क्या भरा है, जबकि ऊपर से देखने पर वे एक ही आलमारी के हिस्से दिखाई देते हैं.

उसका और अजीत का रिश्ता भी तो पिछले कुछ महीनों से ऐसा ही हो गया है. अजीत का देर से घर आना, पूछने पर टाल जाना, अपने आप में खोया रहना… यह सब देखकर अर्पिता भी अपने आपमें व अपने बच्चों में सिमट गई.

अर्पिता को इस चेस्ट ऑफ ड्रॉअर से हमेशा चिढ़ होती, क्योंकि यह रहस्य छुपानेवाला और अपने खोल में सिमटा हुआ-सा प्रतीत होता है. उसे आलमारी ज़्यादा अच्छी लगती. दरवाज़ा खोला और सारा सामान आंखों के सामने. कोई दुराव-छुपाव नहीं. सब कुछ खुला, जीवन और रिश्ते भी ऐसे ही होने चाहिए. स्पष्ट, खुले हुए, कहीं कोई अलगाव व  कोई रहस्य नहीं.

इधर कुछ दिनों से अजीत की व्यस्तता और ज़्यादा बढ़ गई थी. अब तो बहुत ज़रूरी बातें ही बड़ी मुश्किल से हो पाती थीं. नौकरी में तो काम के बंधे हुए घंटे ही होते हैं. सप्ताह में एक दिन की छुट्टी होती है, लेकिन व्यवसाय में तो वह भी नहीं. याद नहीं आ रहा कि पिछला कौन-सा रविवार पूरे परिवार ने साथ में गुज़ारा था. बच्चे तो कभी-कभी पूरे हफ़्ते ही अजीत को देख नहीं पाते हैं. रविवार की सुबह ही बच्चों की अजीत से मुलाक़ात हो पाती है.

अर्पिता ने मैगज़ीन एक ओर रख दी. पढ़ने में अब ध्यान नहीं लग रहा था. मन विचारों के कंटीले तारों में उलझ गया. एक-एक कर कई ख़्याल मन में आने लगे. क्यों कोई पुरुष ऐसा होता है… अपने खोल में सिमटा हुआ, सारी बातों को अपने अंदर दबाकर, छुपाकर रखनेवाला, कितना पराया लगने लगा है अजीत आजकल.

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जब नई-नई शादी हुई थी, तो एक-दूसरे को समझने की कोशिशों में ही दिन चुक गए. जब समझने लगे, तो एक-दूसरे की पसंद-नापसंद के अनुसार अपने आपको ढालने में कुछ समय और आगे सरक गया. जब ढलने लगे, तो बीच में संतान का आगमन. दोनों अपने कर्त्तव्य पूर्ति में लग गए. अजीत व्यवसाय में व्यस्त होते गए और अर्पिता दोनों बच्चों की परवरिश में. जो रिश्ता एक खुली आलमारी की तरह था, स्पष्ट था, उसमें

धीरे-धीरे न जाने कब अलग-अलग दराज़ें बनती गईं और वो खानों में बंटते गए.

विवाह के शुरुआती दिनों में वह अजीत के बारे में, उसके काम के बारे में, उससे मिलने-जुलनेवालों, सहयोगियों के बारे में पूछने, जानने में संकोच करती थी. अब वह अजीत के हर पहलू से जुड़ना चाहती है, पर कैसे जुड़े. अपनी दराज़ पर तो अजीत ने ताला लगा रखा है. बच्चे बड़े हो गए, तो अर्पिता भी ज़िम्मेदारियों से थोड़ा हल्की हो गई. अब वह अजीत के साथ आत्मीय होना चाहती है, उसके साथ खड़े होकर अपने दोनों बच्चों को हंसते-खेलते देखना चाहती है, लेकिन अब अजीत के पास समय नहीं है.

अर्पिता ने एक गहरी सांस ली. क्या सभी के रिश्ते ऐसे ही होते हैं. आलमारी के खुलेपन और पारदर्शिता से शुरू होकर चेस्ट ऑफ ड्रॉअर की तरह रहस्यमयी, चीज़ों को छुपानेवाले बंद दराज़ों पर जाकर ख़त्म होनेवाले या स़िर्फ उसका और अजीत का ही रिश्ता ऐसा हो गया है. अर्पिता आंखें बंद करके अपना ध्यान दूसरी ओर लगाने का प्रयत्न करने लगी, लेकिन मन में उन्हीं विचारों का झंझावात चलता रहा. उसका सर भारी होने लगा.

थोड़ी ही देर में अनु और अरु आ गए. बच्चों के कपड़े बदलवाकर उन्हें खाना खिलाया और फिर दोनों अपनी दिनभर की रामकहानी

सुनाने लगे. एक-दूसरे को चुप करवा-करवाकर अपनी बातें बताने लगे. अर्पिता को हंसी आ गई. वह अनु की बात सुनती, तब तक अरु उसका चेहरा अपनी ओर घुमाकर उसे कुछ बताने लगता. वह अरु की सुनती, तो अनु बीच में ही अपनी कहने लगती. दोनों जब तक उसे स्कूल की एक-एक बात नहीं बता देते, उन्हें चैन नहीं आता. अर्पिता सोचती बड़े भी ऐसे क्यों नहीं होते. मुक्त मन से अपना अंतर खोलकर रख देने वाले.

बच्चों को आज कोई होमवर्क नहीं था, तो अर्पिता अनु का प्रोजेक्ट बनवाने लगी.

कुछ महीने और आगे सरक गए. अजीत और भी अधिक व्यस्त हो गया था. आजकल तो वह अर्पिता से आंखें भी कम ही मिलाता था. ऐसा लगता, जैसे कोई चोरी पकड़े जाने से डर रहा हो या अंदर का कोई भेद छुपा रहा हो. दरवाज़े के पीछे रखे चेस्ट ऑफ ड्रॉअर के प्रति अर्पिता की चिढ़ अब गहरी उदासीनता में बदल गई थी. शायद ऐसा ही होता है, कुछ रिश्ते डोर टूटने पर इतनी दूर चले जाते हैं कि उनके साथ स्नेह तो क्या, क्रोध के धागे भी टूट जाते हैं और फिर व्यक्ति उनकी ओर से सारी भावनाएं ख़त्म कर तटस्थ होकर उदासीन हो जाता है.

एक रोज़ बच्चों को स्कूल भेजने के बाद अर्पिता की नज़र कैलेंडर पर गई. उसे ध्यान आया, आज तो उसके विवाह की सालगिरह है. पिछले आठ दिनों से तो अजीत इतने अधिक व्यस्त रहे कि बस कुछ घंटे सोने के लिए ही घर आते थे. बेचैनी से आवाज़ धीमी करके न जाने किससे बातें करते रहते थे. आज तो बहुत ही जल्दी घर से चले गए.

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अर्पिता ने कैलेंडर से नज़रें फेर लीं. अब उनके जीवन में वैसे भी इस तारीख़ का क्या महत्व रह गया है. दराज़ों में न जाने

क्या-क्या जमा हो गया था. ऊपर से सब साफ़, दबा-ढंका दिखता था, लेकिन अंदर…

अंदर सब कुछ अस्त-व्यस्त, ठुंसा हुआ, रात अजीत बहुत देर से घर आए. बच्चे सो गए थे. अर्पिता ने उसे खाना परोसा, खाना खाकर दोनों अपने कमरे में आ गए.

“शादी की सालगिरह मुबारक हो.” अजीत ने एक लिफ़ाफ़ा अर्पिता के हाथ में थमाते हुए बहुत कोमल स्वर में कहा.

अर्पिता चौंक गई. उसने तो उम्मीद ही नहीं की थी कि अजीत को आज का दिन याद होगा.

“इसमें क्या है?” लिफ़ाफ़ा हाथ में लेते हुए उसने पूछा.

“इसमें तुम्हारा घर है.” अजीत ने मुस्कुराते हुए कहा. आज उसके चेहरे पर लंबे समय बाद वही निश्छल और सहज मुस्कान तैर रही थी.

“मेरा घर? मैं समझी नहीं.” अर्पिता ने आश्‍चर्य से कहा.

“मेरे पास बैठो अर्पिता, मैं आज तुम्हें सारी बातें सच-सच बताता हूं.” कहते हुए अजीत ने उसे अपने पास पलंग पर बिठा दिया.

“दरअसल, सालभर पहले मुझे व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए और कुछ नए इन्वेस्टमेंट करने के लिए बहुत से पैसों की ज़रूरत पड़ी. मेरे पास और कोई चारा नहीं था, तो मैंने अपना घर गिरवी रखकर बैंक से पैसे उधार लिए.

मैं जानता हूं तुम्हें अपने घर से कितना प्यार है. तुम बच्चों की तरह अपने घर को सहेजती हो. एक-एक वस्तु को प्यार और अपनेपन से संभालती हो, इसलिए मैं दिन-ब-दिन अपराधबोध से घिरता जा रहा था और तुमसे आंखें मिलाने की भी हिम्मत नहीं कर पाता था. अपने मन में मैं अपने आपको तुम्हारा गुनहगार महसूस करता. मन में हर पल बस एक ही धुन समाई रहती कि जल्द से जल्द अपने घर को मुक्त करवाऊं, इसलिए रात-दिन काम में डूबा रहता. इस बीच व्यवसाय में बहुत उतार-चढ़ाव आए. तनावपूर्ण स्थितियां उत्पन्न हुईं, लेकिन ईश्‍वर के आशीर्वाद से अंत में जाकर सब ठीक हो गया. आज अपने घर के काग़ज़ वापस मिल गए. व्यवसाय प्रगति कर रहा है और सब कुछ अच्छा चल रहा है.

मैं देख रहा था महीनों से तुम उपेक्षित और अकेला महसूस कर रही थी. मेरा मन अंदर से छटपटाता रहता, लेकिन सारी परेशानियां बताकर मैं तुम्हें दुखी नहीं करना चाहता था.”

“ओह अजीत.” अर्पिता की आंखों से आंसू बह रहे थे. वह अजीत के गले लग गई. अजीत उसकी पीठ सहलाते हुए बोले, “मेरे पास तुम्हारे लिए एक और तोहफ़ा है. बहुत दिनों से हम साथ नहीं रहे न. मैंने कई दर्शनीय शहरों में होटल बुक करवा लिए हैं और टिकट भी आ गई हैं. तीन दिन बाद हम चारों पंद्रह दिनों के लिए बाहर घूमने जा रहे हैं.”

“सच अजीत? मैं अभी बच्चों को उठाकर उन्हें ये ख़ुशख़बरी सुनाती हूं.” अर्पिता ख़ुशी से चहकते हुए बोली. उसने तुरंत जाकर बच्चों को उठाया और उन्हें बताया. दोनों बच्चे अपने माता-पिता के पास चहकने लगे. अर्पिता अजीत के सीने से लग गई. बच्चे दोनों से लिपट गए. अर्पिता की नज़रें दरवाजे के पीछे की ओर गईं. आज उसे पहली बार एहसास हुआ दराज़ें रहस्य नहीं छुपातीं, वे तो अपने अंतर में सारी अस्त-व्यस्तता और दर्द को समेट लेती हैं, ताकि दूसरों को तकलीफ़ न हो.

पति भी ऐसे ही होते हैं, जो दराज़ बनकर सारी परेशानियों को, मुसीबतों को, दर्द को अपने अंदर छुपा लेते हैं, ताकि उनके प्रियजनों पर दुख की छाया भी न पड़े और घर ख़ुशहाल रहे. अर्पिता ने एक आभार भरी मुस्कान से चेस्ट ऑफ ड्रॉअर को देखा और धीरे से कहा ‘धन्यवाद.’

Dr. Vineeta Rahurikar

   डॉ. विनीता राहुरीकर

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कहानी- इस्तेमाल (Short Story- Istemaal)

Hindi Short Story

मनोरंजन के लिए तोते और मैना को पिंजरे में कैद किया जाता है, मछलियों को एक्वेरियम में कि मछलियां देखने से तनाव दूर होता है. लोग अपनी सुख-सुविधा के लिए पशु को स़िर्फ और स़िर्फ इस्तेमाल करते हैं, हिफ़ाज़त नहीं करते.

रोज़ की तरह वे सुबह जल्दी उठ गए. पुलिस विभाग की नौकरी ने जल्दी उठने की जो आदत डाल दी है, वह सेवानिवृत्ति के बाद भी कायम है. मधु मालती की छतनार बेल पर रातभर सोई समूहभर चिड़िया, चहकते हुए मानो प्रभाती गा रही थीं. वे चिड़ियों के चहकने पर तब ध्यान नहीं देते थे. पुलिस विभाग की नौकरी और दौरे की व्यस्तता में न ठीक से खा पाते थे, न नींदभर सो पाते थे. चिड़ियों के चहकने जैसे छोटे-छोटे उपक्रमों पर ध्यान देने का अवकाश उन्हें कभी नहीं मिला. इन दिनों उनका चहकना सुना करते थे. सोचते थे, किस कार्य प्रयोजन के लिए चिड़िया इतना चहकती हैं? अपने अस्तित्व के लिए, अधिकार के लिए, आवश्यकता के लिए, आज़ादी के लिए या यूं ही. वे अपने आप में मुस्कुरा दिए.

पक्षी जगत के बारे में इतना क्यों जानना-सोचना चाहते थे? जब से उनके कमरे के रोशनदान में चिड़िया के एक जोड़े ने घोंसला बनाया था, वे चिड़िया के प्रति काफ़ी संवेदनशील हो गए थे. चिड़िया उन्हें आकर्षित करती थी. उन्हें कोई कल्पना नहीं थी कि आंत के बड़े ऑपरेशन के कारण बिस्तर पर समय बिताएंगे और गौरैया समय बिताने का साधन बनेगी. कार्यकाल में सोचा करते थे सेवानिवृत्ति के बाद ख़ूब खाएंगे, ख़ूब सोएंगे और इत्मीनान से रहेंगे. अब जब बिस्तर पर शिथिल पड़े थे, लग रहा था बिना किसी कार्य और व्यस्तता के बिस्तर पर समय बिताना बहुत बड़ी सज़ा है. अस्पताल से घर आए, तब कुछ दिन परिचित-नातेदार देखने आते थे. अब नहीं आते. एक ही ग्रामीण बैंक में कार्यरत पुत्र अमृत और पुत्रवधू वृंदा ने उनकी सेवा के लिए काफ़ी छुट्टी ली, लेकिन अब नौकरी पर जाना ज़रूरी था. पोता जोश स्कूल और गृहकार्य में लगा रहता था. पत्नी गृहस्थी के बिखराव को समेटती रहती थी. अब वे थे, सेवानिवृत्ति थे, बीमारी, बिस्तर, परहेज़ी खाना, दवाइयां और खाली समय था. और सहसा उनका ध्यान घोंसले की ओर गया. पत्नी उनके कमरे की सफ़ाई करते हुए ग़ुस्सा हो रही थी, “चिड़िया रोशनदान में घोंसला बना रही है. कचरा फैला रही है, जबकि मरीज़ का कमरा साफ़ रहना चाहिए.”

उन्होंने निर्मित हो रहे घोंसले को देखा. इस बुद्धिमान चिड़िया ने उनकी अनुपस्थिति का अच्छा लाभ लिया. खाली कमरा देखकर कब्ज़ा जमाने लगी.

पत्नी ने चिड़िया को भगाने की तमाम कोशिश की, लेकिन ज़िद्दी चिड़िया ने घोंसला बनाकर ही दम लिया. वे कमरे में आती-जाती नर और मादा गौरैया की गतिविधि पर ध्यान देने लगे. चिड़िया की गतिविधि देखना उन्हें अच्छा लगने लगा. चिड़िया के व्यवहार पर सोचने लगे. यह मामूली-सा पक्षी घोंसला बनाने के लिए स्थान किस तरह चुनता होगा? इतना साहस कहां से लाता होगा कि पत्नी के दख़ल देने पर इधर-उधर उड़कर बार-बार रोशनदान पर आ जाता है और घोंसला बनाने लगता है. किस तरह मनुष्य के साथ रहने की आदत डाल लेता है कि घर का एक कोना अपना बना लेता है. इच्छा होती बर्ड वॉचर होते, तो चिड़ियों के संसार को थोड़ा-बहुत समझ पाते. वैसे इतना समझ गए थे कि पक्षी बड़ों और बच्चों में फ़र्क़ करना जानते हैं. चिड़िया जोश के समीप आकर जिस तरह चावल के कण उठा लेती, उनके समीप नहीं आती. इसे जोश की समीपता में वैसा जोखिम नहीं लगता, जिस तरह बड़ों की आहट होने पर लगता था. उन्हें आजकल चिड़िया की चर्चा करना बहुत अच्छा लगने लगा था. जोश को जब से उन्होंने घोंसला दिखाया था, वह चिड़िया और घोंसले को देखने के लिए कई मर्तबा उनके कमरे में आता था. उनके कमरे में पढ़ता था, नाश्ता करता था, खाना खाता था. अक्सर चावल, पोहा या रोटी का टुकड़ा फर्श पर फैला देता था. पहले चिड़िया झिझकती थी, अब जोश के बहुत समीप आकर चावल चोंच में उठा ले जाती थी और सुरक्षित जगह पर बैठकर खाती थी. जोश कटोरी में पानी भरकर कटोरी को स्टूल पर रख देता, पर चिड़िया पानी नहीं पीती. जोश हैरान होता, “दादू, चिड़िया को प्यास नहीं लगती?”

वे हंसते, “जोश, मुझे लगता है कि चिड़िया की नज़र कटोरी पर नहीं पड़ी है. यह भी हो सकता है कि उसे मालूम न हो कि पानी उसके लिए रखा है.”

“हो सकता है बगीचे की हौज के पास जिस छोटे गड्ढे में पानी भरा रहता है, वहां पी लेती हो.” उन्होंने जोश की बात का अनुमोदन किया, “ठीक कहते हो.”

हौज के नल से बूंद-बूंद पानी रिसकर एक छोटे गड्ढे में भर जाता था. कभी-कभी वे बिस्तर पर बैठकर खिड़की से बाहर का नज़ारा देखते. गड्ढे में भरे पानी में कुछ चिड़िया पंख फड़फड़ाकर अपनी देह को गीलाकर पानी में खेलतींं. देर तक उनका सामूहिक स्नान चलता. वे बिल्कुल नहीं पहचान पाते घोसला बनानेवाली दो चिड़िया कौन-सी हैं. इतना ज़रूर जान गए थे कि काले गाढ़े चित्तिदार पंखवाली नर चिड़िया होती है, भूरे चित्तिदार पंखवाली मादा चिड़िया. सोचते, चिड़िया की तरह मनुष्य भी एक जैसे रंग-रूप, कद-काठी के होते, तो सबको भेदभाव मुक्त समान अवसर, स्थिति और महत्व मिलता. समानता के बावजूद लोग अपने परिवार के सदस्यों को पहचान लेते, जैसे ये पक्षी अपने जोड़े को पहचान लेते हैं. उन्होंने जोश को दृश्य दिखाया, “जोश, चिड़िया मज़े से नहा रही हैं. तुम नहाने में सुस्ती दिखाते हो, रोते हो.”

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“दादू, मैं भी चिड़िया की तरह रोज़ नहाऊंगा. रोऊंगा नहीं.”

वे अचरज में थे. चिड़िया से प्रेरित होकर जोश सचमुच रोज़ नहाने लगा.

चिड़िया दिनभर कमरे में आती-जाती. कभी सीलिंग फैन पर बैठती, कभी रोशनदान पर, कभी दरवाज़े पर, कभी चावल खाने के लिए फ़र्श पर. चिड़िया को क्षति न पहुंचे, इसलिए वे गर्मी सह लेते, लेकिन पंखा नहीं चलाते. पत्नी उनकी तरह चिड़िया को लेकर सतर्क नहीं थी. उनके कमरे में आते ही पंखा चला देती. वे सतर्क हो जाते, “बंद करो. चिड़िया पंखे से कटकर मर जाएगी.”

“चिड़िया की बड़ी फ़िक्र है. हमसे गर्मी नहीं सही जाती.”

“दूसरे कमरे में जाकर पंखा चला लो. मुझे लगता है चिड़िया अंडे दे चुकी है. देखो न, कितना चौकस होकर इधर-उधर देखती है. जैसे डरती है कि कोई घोंसले को नुक़सान पहुंचा सकता है.”

“तुम चिड़िया की फ़िक्र करो. मैं गर्मी में नहीं बैठूंगी.”

पत्नी चली जाती. वे पत्नी के जाने का बुरा नहीं मानते थे. उन्हें चिड़िया की सुरक्षा अधिक ज़रूरी लगने लगी थी. वे दोपहर का खाना खाकर झपकी ले रहे थे कि चिड़िया के तेज़ स्वर और फड़फड़ाने से झपकी टूट गई. देखा नर और मादा चिड़िया में लड़ाई हो रही थी. कभी दोनों एक-दूसरे पर चोंच से आघात करतीं, कभी पीछा करते हुए इधर-उधर उड़तीं. इसी उपक्रम में मादा चिड़िया उनके बिस्तर पर आ गिरी. उन्होंने चिड़िया की प्रत्येक गतिविधि की तरह इस लड़ाई का भी एक कारण ढूंढ़ लिया. जिस तरह हर मां अपने बच्चे को लेकर बेहद सतर्क रहते हुए पिता पर कम सतर्क होने का आरोप लगाती है, शायद उसी तरह मादा चिड़िया का नर चिड़िया से विवाद हुआ होगा और लड़ पड़ी होगी. चिड़िया कुछ क्षण स्तब्ध बैठी रही. जैसे महसूस कर रही हो कि सुरक्षित है या नहीं. उन्होंने सुरक्षित होने का बोध कराने के लिए चिड़िया को पुचकारा. पुचकार का दुष्प्रभाव पड़ा. चिड़िया भयभीत होकर पूरी ताक़त लगाकर उड़ी और रोशनदान पर बैठ गई. दृश्य देख रही नर चिड़िया बिजली के तारवाली पट्टी के कोने, जहां रात को सिकुड़कर सोती थी, में जाकर बैठ गई.

वे बारी-बारी से दोनों को देखने लगे. चिड़िया के इस जोड़े को मालूम न होगा उनकी दिनचर्या में वह किस कदर शुमार हो गए थे.

बीमारी के उबाऊ दिन कुछ आसान हो गए थे. चिड़िया से अनाम संबंध बन गया था. पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ते थे, गौरैया की संख्या कम होती जा रही है. पेड़ काटकर, मच्छरों की रोकथाम के लिए घर के दरवाज़ों, खिड़कियों, रोशनदानों में मज़बूत जाली लगवाकर इनके घर के भीतर आने के रास्ते बंद किए जा रहे हैं. जब वे छोटे थे गांव में टिटहरी, पोड़की, महोखा, हुदहुद, पता नहीं कितने क़िस्म की चिड़िया आसपास रहती थीं.

जोश लुप्त होती जा रहीं इन चिड़ियों का नाम नहीं जानता या क़िताब में छपे चित्रों की सहायता से जानता था, जबकि चिड़िया की गतिविधि देखते हुए उन्हें लगने लगा है कि पशु-पक्षी न रहेंगे, तो कुछ भी सुंदर और सुरम्य न रहेगा. चिड़ियों का चहकना कितना आनंद देता है. बिल्कुल संगीत की तरह. वे आंखें मूंदकर तब तक शांत पड़े रहते थे, जब तक कि चिड़िया चहकना रोककर दानों की तलाश में इधर-उधर उड़ नहीं जाती.

“उठोगे नहीं क्या? सात बज रहा है.” पत्नी कमरे में आई, तो उन्हें लगा चिड़िया और उनके बीच का कोई सूत्र छूट रहा है. बोले, “जाग रहा हूं. चिड़ियों का चहकना सुन रहा था.”

“आजकल आप चिड़िया के अलावा कुछ नहीं सोचते. चलो ब्रश कर लो.”

“जोश जाग गया?”

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“नहीं. आज इतवार है. अमृत, वृंदा, जोश सब तानकर सो रहे हैं. अरे हां, अमृत के बॉस शाम को आपको देखने आ रहे हैं. मैं कमरा ठीक कर दूं. जोश का स्कूल बैग, क़िताबें, खिलौने सब यूं ही पड़े रहते हैं. चादर कितनी गंदी हो गई है.”

वे उठ गए, “चादर बदल दो. कमरा साफ़ रहे, तो मन ख़ुश रहता है.”

वे नहीं जानते थे कि पत्नी कमरा साफ़ नहीं कर रही है, बल्कि उनका दिल तोड़ दे रही है. फ्रेश होकर लौटे, तो देखा कि कमरे का परिदृश्य ही बदला हुआ था. पहली बार जाना कि परिदृश्य बदलने के लिए कुछ क्षण ही बहुत होते हैं. पत्नी ने बांसवाले लंबे झाड़ू से कमरे के जाले साफ़ करते हुए घोंसले को भी धराशायी कर दिया था. सुडौल घोंसला करुण तरी़के से फर्श पर छितराया पड़ा था. पास ही गुलाबी पारदर्शी त्वचावाले दो बच्चे निस्पंद पड़े थे. दो छोटे मांस पिंड. दुनिया में पूरी तरह आने से पहले विदाई. दोनों चिड़िया पूरी ताक़त से चीखकर सामर्थ्यभर विरोध कर रही थीं. वे जितना चीखना चाहते थे, स्तब्धता में नहीं चीख सके, “क्या किया? छोटे-से घोंसले से तुम्हें इतनी परेशानी थी?”

चिड़िया के बच्चों की दशा देख पत्नी को स्वाभाविक रूप से दुख हो रहा था, लेकिन अपनी चेष्टा को वाजिब ठहराते हुए बोली, “परेशानी थी. चिड़िया गंदगी फैलाती थी. कमरे में जहां-तहां

घास-फूस पड़े देख अमृत के साहब क्या सोचते? और फिर मैं नहीं जानती थी कि घोंसले में बच्चे होंगे.”

“चिड़िया ने मेहनत से घोंसला बनाया था. बच्चों के लिए दिनभर चिंतित रहती थी. तुमने सब ख़त्म कर दिया. देख रही हो, दोनों चिड़िया कितनी व्याकुल हैं?”

“कहा तो, नहीं जानती थी कि घोंसले में बच्चे होंगे. तुम आजकल चिड़िया के अलावा कुछ नहीं सोचते हो. वृंदा कह रही थी कि तुम्हारे कारण जोश पढ़ाई छोड़कर चिड़िया के पीछे बौराया रहता है.”

वे कहना चाहते थे- ‘चिड़िया थोड़े-से तिनके ही तो फैलाती थी. यह इतना बड़ा अपराध नहीं है कि इसकी प्रजाति को ख़त्म कर दिया जाए. चिड़िया का यह जोड़ा न होता, तो लंबी बीमारी के ये लंबे दिन बिताना मेरे लिए कठिन होता.’ नहीं कह सके. कह देते तो पत्नी कहती कि अपने दिमाग़ का इलाज कराओ. चिड़िया तुम्हारे दिमाग़ में घुस गई है. वे शिथिल होकर बिस्तर पर बैठ गए. यहां अभी-अभी दो बच्चों की मौत हुई थी. वे पूरी तरह विचलित थे, ठीक चिड़िया की तरह. चिड़िया क्रंदन कर रही थी. वे सोच रहे थे- ‘पशु-पक्षी पर्यावरण को संतुलित रखने में योगदान देते हैं. हम मनुष्य समझकर भी नहीं समझना चाहते. कहीं मांसाहार के लिए इन्हें मारा जा रहा है, कहीं अभयारण्य बनाकर इनकी सीमा निश्‍चित की जा रही है, चिड़ियाघरों में इन्हें पिंजरों में कैद किया जा रहा है. सर्कस और फिल्मों में करतब दिखाने के लिए प्रशिक्षित करते हुए दैहिक-मानसिक प्रताड़ना दी जाती है. जंगल काटकर इनके जीवनयापन में व्यवधान डाला जा रहा है. मनोरंजन के लिए तोते और मैना को पिंजरे में ़कैद किया जाता है, मछलियों को एक्वेरियम में कि मछलियां देखने से तनाव दूर होता है. लोग अपनी सुख-सुविधा के लिए पशु को स़िर्फ और स़िर्फ इस्तेमाल करते हैं, हिफ़ाज़त नहीं करते.’ वे ग्लानि से भरे थे.

जाने-अनजाने चिड़िया उनका मनोरंजन करती थी. वे इसके बच्चों की हिफ़ाज़त नहीं कर सके. पता नहीं क्यों, लेकिन उन्हें लग रहा था कि अपने खाली, लंबे, बीमार दिनों की बोरियत और सन्नाटे को कम करने के लिए उन्होंने चिड़िया का इस्तेमाल किया था.

Sushma Munindra

       सुषमा मुनीन्द्र

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