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कहानी- मंज़िल तक (Short Story- Manzil Tak)

Manzil Tak

“जीवन केवल वह नहीं, जो अपनी इच्छित आकांक्षा को पूर्ण करने में ख़र्च किया जाए, जीवन वह है जो दूसरों को ख़ुश देखने, दूसरों को सहारा देने के लिए जीया गया हो. जीवन-पथ पर बहुत कुछ पीछे छूट जाता है.., कुछ छोड़ देना पड़ता है, जो स्वयं के लिए बोझ साबित हो… आगे बढ़ने के लिए बाधक साबित हो, उसे छोड़कर आगे बढ़ना ही जीवन है. उसी मोड़ पर बैठ जाना तो कर्महीनता है. मंज़िल तो आगे… बहुत आगे बढ़ने पर ही मिलती है. यह तो इंसान को स्वयं तय करना होता है कि उसकी मंज़िल क्या है, उसके जीवन का उद्देश्य क्या है?”

‘दक्षा तिवारी…’

नाम की घोषणा होते ही दक्षा आत्मविश्‍वास से भरी हुई अपनी कुर्सी से उठकर मंच की ओर चल पड़ी. मंच पर अतिथि महोदय से दक्षा ने अपना प्रशस्ति-पत्र और पी.एच.डी. की थिसिस थाम ली व गर्वित मुस्कान से अभिवादन कर मंच से नीचे उतरने लगी.

दो-तीन कैमरामैन नीचे से लगातार कार्यक्रम की फ़ोटो खींचने में व्यस्त थे. मंच से उतरते व़क़्त चेहरे पर पड़ी फ्लैश की चमक से सहसा दक्षा की नज़र कैमरामैन पर पड़ी. वह भी कुछ चकित, कुछ सहमा, कुछ लज्जित-सा नज़र चुराते एक तरफ़ चला गया.

दक्षा ने देखते ही पहचान लिया था उसे. यह वही शख़्स है, जो आज से क़रीब आठ वर्ष पूर्व बीए करने के बाद पहली बार दक्षा को वर के रूप में देखने पहुंचा था.

दक्षा अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गई व पुनः उसकी नज़रें कैमरामैन को खोजने लगीं. कहीं नज़र न आने पर वह मन ही मन बुदबुदाई. “कायर कहीं का…” एक व्यंग्यात्मक मुस्कान इसके चेहरे पर फैल गई.

दक्षा को देखते ही विवाह के लिए मना कर दिया था इसने. कारण था- लड़की का रंग दबा है. सुनकर दक्षा कितनी रोई थी. क्या है इस इंसान में? मामूली-सा कैमरामैन! किसी के यूं ही कह देने भर से क्या कोई योग्य-अयोग्य हो जाता है?

लेकिन उस व़क़्त उन्नीस वर्ष की अल्हड़ दक्षा में कहां थी इतनी समझ? यदि ‘मां’ जैसी मां न होती तो कहां जान पाती दक्षा ज़िंदगी के मायने… कार्यक्रम की गमगमाहट से दूर दक्षा का मन अतीत में विचरने लगा.

बीए करते-करते आम लड़की की तरह दक्षा भी अपने राजकुमार के सपने संजोने लगी थी. मां-पिताजी तो दक्षा की पूर्ण उच्च-शिक्षा के पश्‍चात ही विवाह के पक्ष में थे, पर बिस्तर पर पड़ी दादी दिन-रात पिताजी के कान खाती- “मेरे जीते जी दक्षा को ब्याह दो, वरना दामाद का मुंह नहीं देख पाऊंगी, अब गिनती के दिन शेष हैं मेरे…”

तभी दक्षा के मामाजी ने आकर रिश्ते की बात चलाई. किसी मित्र का भाई है, कैमरामैन है, अपना स्टूडियो है, प्रायवेट वीडियो शूटिंग करता है, ग्रेजुएट है, सुंदर है, गोरा है… और न जाने क्या-क्या.

हालांकि मां-पिताजी इन बातों से प्रभावित न हुए थे, पर दादी की ज़िद पर वर-दिखलाई का कार्यक्रम तय हुआ.

लड़का अपने मां-बाप व भाई के साथ दक्षा को देखने पहुंचा. दूसरे ही दिन ख़बर भिजवा दी कि लड़की नापसंद है, काली है.

दक्षा ने सुना तो रो-रोकर बुरा हाल बना लिया था. लड़के के मना करने का दुख कम, अपनी अवहेलना का ज़्यादा था.

मां पिताजी पर झल्ला पड़ी थी- “मैंने तो पहले ही मना किया था. न लड़की की पढ़ाई पूरी हुई है, न उम्र. बेवजह की तमाशाई हुई… लड़की का दिल दुखा सो अलग.”

पिताजी कम आहत नहीं थे, पर चुप ही रहे और मन-ही-मन तय किया कि जब तक बिटिया की पढ़ाई पूरी नहीं होगी, विवाह की चर्चा नहीं होगी.

समय के मरहम से दक्षा पूर्ववत हो गयी थी व फिर से पढ़ाई-खेल, साथी-सहेलियों की गतिविधियों में व्यस्त हो गई.

उन्हीं दिनों एमए के दौरान दक्षा का वंदन से परिचय हुआ. कॉलेज के सांस्कृतिक कार्यकम में वंदन दक्षा के साथ ही नाटक में काम कर रहा था. तीव्र बुद्धि, हंसमुख स्वभाव, लुभावनी काया-कुल मिलाकर एक चुंबकीय व्यक्तित्व का स्वामी था वंदन.

कुछ उम्र का असर, कुछ अनुकूल परिस्थितियां… दोनों का साथ-साथ हर गतिविधि में सम्मिलित होना धीरे-धीरे दक्षा व वंदन को क़रीब ले आया, इसका दोनों को ही भान न था. दोनों ही एक-दूसरे के आकर्षण में बंधे जा रहे थे.

हालांकि दक्षा का वंदन के प्रति व्यवहार केवल मित्रवत ही होता था, पर मां की पारखी नज़रों ने दक्षा के मन में छिपे चोर को ताड़ लिया था. मां आख़िर मां ही होती है.

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मां स्वभावगत चिंतित हो गई थी. वैसे दक्षा की पसंद उनकी अपनी पसंद थी. वंदन उन्हें भी भाता था. परंतु केवल लड़के-लड़की की आपसी पसंद से क्या होता है? “क्या वंदन के परिवारवाले भी दक्षा को पसंद करेंगे? यदि नहीं, तो क्या वंदन में इतना हौसला है कि घरवालों के विरोध के बावजूद दक्षा का हाथ थाम सके? यदि ऐसा न हुआ तो दक्षा एक बार फिर घायल होगी, टूटेगी, बिखरेगी… कैसे संभालूंगी बेटी को…?” आदि बहुत-सी चिंताएं जो हर मां को बेटी के प्रति होती हैं, दक्षा की मां को भी सताने लगीं.

मां ने दक्षा व वंदन से इस संबंध में बात करने का मन बनाया ही था कि उसके पूर्व ही एक शाम दक्षा कॉलेज से लौटते ही अपने कमरे में जाकर लेट गई. जो कभी न होता हो, उसके होने पर मन में आशंका उठना स्वाभाविक है. रोज़ आते ही कॉलेज की बातें सुनाना दक्षा की दिनचर्या का हिस्सा था.

शंकित मन से मां दक्षा के कमरे में दाख़िल हुई व दक्षा से कारण जानना चाहा, पर तबीयत ख़राब होने का बहाना बनाकर दक्षा ने स्वयं को चादर में छिपा लिया.

जिसकी आशंका थी, आख़िर वही हुआ. दूसरे ही दिन मां को दक्षा की सहेली से पता चला कि वंदन की सगाई तय हो गयी है.

एकबारगी मन हुआ कि बुलाकर भला-बुरा कहे वंदन को… कहे कि प्रेम की पेंगें बढ़ाना जितना आसान है, उतना ही कठिन है हाथ थामना. हिम्मत चाहिए, हौसला चाहिए, आत्मविश्‍वास चाहिए उसके लिए. जिसमें ये सब नहीं, वह दक्षा के काबिल नहीं. पर पराई संतान को भला क्या कहा जा सकता है. अतः वंदन का ख़याल झटके से मन के बाहर कर दिया मां ने.

उन्हें चिंता थी तो केवल दक्षा की… उसके टूटे मन की… उसकी दरकती भावनाओं की.

एक बार पिताजी ने कहा,“हम ख़ुद चलकर वंदन के मां-बाप से बात करते हैं.” पर मां नहीं मानी. जो लड़का अपने अधिकार के लिए ज़ुबान तक नहीं खोल सकता, ऐसे लड़के से ब्याहकर दक्षा को कौन से सुख मिल पाएंगे?

“नहीं…नहीं, बिल्कुल नहीं,” मां ने निर्णयात्मक स्वर में कहा, “वह कायर दक्षा के लायक नहीं है. रही दक्षा की बात तो वह आप मुझ पर छोड़ दीजिए, मैं उसे संभाल लूंगी.” आठ… दस… पंद्रह दिन हो गए… आख़िर महीना हो गया. दक्षा ने कॉलेज जाना बंद कर दिया था. यंत्रवत-सी वह दिनभर के आवश्यक काम निपटाती, खाने के नाम पर दो-चार निवाले मुंह में ठूंसती व उठकर फिर कछुए की तरह अपनी खोल में स्वयं को छिपा लेती.

मां ने दक्षा को कुछ दिन बिल्कुल नहीं टोका. वह जानती थी कि जब कभी हर उपदेश, समझाइश जवाब दे जाते हैं तब केवल ‘समय’ ही वह उपाय रह जाता है जो सब कुछ बदलने का सामर्थ्य रखता है. ऐसी स्थिति में दक्षा को सामान्य होने के लिए उसके हाल पर यथावत् छोड़ देना ही अंतिम उपाय था.

माह-दो माह पश्‍चात भी दक्षा की रुचि किसी कार्य में नहीं जाग रही थी. न टी.वी., न गाना, न सहेली, न फ़िल्म.. दक्षा को देख पिताजी भी स्वयं को बेबस पाते, उसकी हालत देख स्वयं तिल-तिल मर रहे थे.

आख़िर एक दिन मौक़ा देखकर खाने की मेज़ पर मां ने चर्चा छेड़ी. संबोधन पिताजी के लिए था, पर बात दक्षा के लिए उद्येशित थी. “आपने सुना, पड़ोस की निशी की वर्मा साहब ने ज़बरदस्ती शादी तय कर दी. वह भी उसकी इच्छा के विरुद्ध.”

“अच्छा.., लेकिन क्यों?” पिताजी बोले.

“क्यों क्या? उनकी मर्ज़ी! हर पिता तुम्हारी तरह नहीं होता, जो लड़की की भावनाओं का ख़याल कर पल-पल घुटता रहे. लड़की भूखी रहे तो ख़ुद भी भूखे उठ जाएं.” कनखियों से दक्षा पर नज़र डालते हुए मां ने अपनी बात ज़ारी रखी. “निशी को भी तो देखो. मज़ाल है कि विरोध में मुंह से दो शब्द भी निकल जाएं.”

आज दो माह में पहली बार दक्षा का ध्यान पिताजी पर गया. उसे देख-देखकर कितने चिंतित, कितने उदास, कितने दुर्बल लग रहे हैं, शायद पिताजी ने भी इतने दिनों से ठीक से खाना नहीं खाया. सोचते हुए दक्षा अपने कमरे में आ गई व रातभर मां की बातों का विश्‍लेषण करती रही. उसका मन ग्लानि से भर उठा. किसी की सज़ा किसी को क्यों दे? और ख़ासकर उन्हें, जो हर व़क़्त उसके भले की सोचते हैं. मां-पिताजी को अनजाने ही उसने दुःखी कर दिया, इस ख़याल से वह पछता उठी.

सुबह नहा-धोकर दक्षा किचन में आकर मां के काम में हाथ बंटाने लगी, “मां, आज पिताजी की पसंद का खाना मैं बनाऊंगी.”

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दक्षा में आए इस अप्रत्याशित परिवर्तन से मां का हृदय सुखानुभूति से भर गया. यही व़क़्त है दक्षा को कुछ कहने का… सही बात सही समय पर कही जाए तभी उसका सकारात्मक असर होता है… सोचते हुए मां ने दक्षा से कहा, “दक्षा, जीवन केवल वह नहीं, जो अपनी इच्छित आकांक्षा को पूर्ण करने में ख़र्च किया जाए, जीवन वह है जो दूसरों को ख़ुश देखने, दूसरों को सहारा देने के लिए जीया गया हो. जीवन-पथ पर बहुत कुछ पीछे छूट जाता है.., कुछ छोड़ देना पड़ता है, जो स्वयं के लिए बोझ साबित हो… आगे बढ़ने के लिए बाधक साबित हो, उसे छोड़कर आगे बढ़ना ही जीवन है. उसी मोड़ पर बैठ जाना तो कर्महीनता है. मंज़िल तो आगे… बहुत आगे बढ़ने पर ही मिलती है. यह तो इंसान को स्वयं तय करना होता है कि उसकी मंज़िल क्या है, उसके जीवन का उद्देश्य क्या है?”

“तुम तो भाग्यशाली हो जो तुम्हारे पिताजी आम इंसानों से हटकर तुम्हारी ऊंचाइयों के ख़्वाब देखते हैं, आम पिताओं की तरह तुम्हें ब्याहकर बोझ उतारने की भावना उनमें नहीं है. इन सबके बावजूद तुम ही हारकर रुक जाओगी तो क्या पिताजी के प्रति अन्याय नहीं करोगी?”

मां की एक-एक बात यथार्थ के पाठ की तरह दक्षा के मन-मस्तिष्क में बैठ गई. मां सच ही तो कहती है कि जीवन में उन कष्टप्रद यादों व पीड़ादायक बातों को दुःस्वप्न मानकर भूलना आवश्यक है. बीती बातों में उलझकर आने वाले उज्ज्वल ‘कल’ को अंधकारमय बना देना कहां की बुद्धिमानी है? विचारों में आए इस परिवर्तन के साथ ही दक्षा के मन से अवसाद और निराशा धुल गई व भविष्य का मार्ग प्रशस्त हो उठा. अब उसकी नज़र भविष्य-पथ पर स्थिर हो गयी… सीधे मंज़िल तक.

“मैडम, आज यहीं रुकने का इरादा है क्या?” प्रोफेसर शरद की आवाज़ पर दक्षा जैसे नींद से जाग उठी व हड़बड़ाहट में उठकर खड़ी हो गयी.

प्रोफेसर शरद को अपनी ओर मुस्कुराते देख कुछ झेंप-सी गई. कार्यक्रम संपन्न हो चुका था. लोग हॉल से बाहर निकल रहे थे.

“चलिए, मैं आपको रास्ते में ड्रॉप कर दूंगा और वैसे भी आपने आज मेरे प्रस्ताव का जवाब देने का वादा किया है. कहते हुए एक गहरी नज़र शरद ने दक्षा पर डाली.

दोनों आगे बढ़े ही थे कि कैमरामैन सामने आ गया- “एक्सक्यूज़ मी..” कहते हुए दक्षा से बोला “आपने शायद मुझे पहचाना नहीं, मैं…”

दक्षा बात काटते हुए आत्मविश्‍वास से भरे लहज़े में बोली “जी नहीं, मैंने आपको अच्छी तरह से पहचान लिया है. इनसे मिलिए प्रोफेसर शरद… मेरे होनेवाले पति…” कहकर दक्षा ने शर्माते हुए शरद की आंखों में झांका व उनके साथ आगे बढ़ गई.

 

स्निग्धा श्रीवास्तव

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कहानी- धाय (Short Story- Dhay)

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यक़ीनन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें विधाता अपनी पूरी लगन से गढ़ता है और पूर्ण संस्कारित करके ही धरा पर भेजता है. जो न मिला, उसके लिए कभी भगवान को दोष नहीं देते. कभी मुंह खोलकर अपने जीवन की त्रासदियों की शिकायत नहीं करते और मिसाल बन जाते हैं, जीती जागती… जिनका ‘होना’ बरगद की छांव-सा लगता है.

उसके देहावसान की सूचना मिले चार महीने से ऊपर हो गए. तब से एक दिन भी वह मेरी आंखों से ओझल नहीं हुई. खाना बनाते व़क़्त तवे पर सिंकते फुलके से उठनेवाली सौंधी सुगंध के साथ उसकी याद की टीस का क्या मेल हो सकता है, यह मैं समझ नहीं पा रही हूं. कदाचित यह कि बचपन में लकड़ी-उपले के चूल्हे में रोटी सेंकती वो… और उसके सामने बैठी हाथ तापती या खाना खाती मैं… अनजाने में रोटियों की वह सुगंध मेरे नथुनों में भरती चली गयी होगी. अर्थात् उसकी याद के साथ उस विशेष महक का मेल तो था. पहले यह बात समझ में नहीं आई मुझे. मगर, अब जबकि वह नहीं रही तो मैं… ह़ज़ारों कोस दूर बैठी तवे पर सिंकती रोटी से उठती महक के साथ कलेजे से उठती हूक को समझने की कोशिश में लगी हूं.
कितनी यादें… कितनी स्मृतियां- देखी हुई सुनी हुई… आज उनको पृष्ठों पर उतार देने का मन हो रहा है. शायद उस अनूठी हस्ती के प्रति मेरी अशेष श्रद्धा के सुमन अर्पित हो जाएं. मन में उठते भावों को शब्दों में बांधने का कितना भी प्रयास किया जाए… हूबहू करना सम्भव कहां हो पाता है? यदि होता, तो मैं आपको रोटी से उठनेवाली उस महक का स्वाद क्या न बता पाती कि किस तरह इधर कपड़े से फुलायी रोटी की भाप बाहर निकली और उधर उसकी तस्वीर मेरी आंखों के सामने आयी.
लगभग साठ या उससे भी पांच-सात वर्ष पहले की एक तपती दोपहरी में राजस्थान के बीकानेर शहर में ‘देशनोक’ गांव की वह सुतारी (लकड़ी का काम करनेवाले को सुतार कहते हैं) अपने साथ दस वर्षीया बालिका का हाथ थामे शहर के प्रतिष्ठित सेठ की ऊंची लाल पत्थरों की हवेली के विशाल आंगन में खड़ी कह रही थी.
“सेठाणीजी आपरा बाईसा ने रमावण ने कोई छोटी-छापरी चहिज ही सी. ई ने लाई हूं. करम फूटोड़ा हो, जिको पेला ईरा मां-बाप काल में मर गया अबे धणी. म्हें अभागण दिन-रात खेतां में रेंऊ ईरी रखवाली कोनी कर सकूं… आपरे दरबार में पल जायी माईता.” और रोने लगी वह.
विधवा के लिए निर्धारित क्रीम रंग के मोटे कपड़ों में गठरी बनी वह बच्ची, जिसका नख-शिख तक नहीं दिख रहा था, उसकी पुत्रवधू थी. इस कच्ची उम्र में विधवा…
सेठजी के यहां पांच-छ: महीने पहले ही प्रथम पुत्री का जन्म हुआ था. इतनी बड़ी हवेली में बच्ची को रखनेवालों का अभाव नहीं था, किन्तु एक तो सेठ स्वयं ‘देशनोक’ गांव के थे, उस पर ‘सुतार घराने’ के पुराने सेवाभाव के कारण उसे रख लिया गया.
सांवली-सलोनी कृशकाय बालिका का नाम था ‘चांद’. चांद की ही भांति उसके छोटे-से जीवनकाल में ‘विधवा’ का दाग़ लगा था. चुपचाप माथा झुकाए सुबह पांच से रात दस बजे तक सेठानी के पीछे-पीछे उनके बताए छोटे-मोटे काम वह नि:शब्द करती रहती. सेठजी की बेटी कमला को तो वह गोद से नीचे ही नहीं उतारती थी. इशारों में समझने और अद्भुत आज्ञाकारिता के दुर्लभ गुण के कारण उसे उपालम्भ देने का अवसर कभी किसी को नहीं मिला. संपन्न घर में खाने-पहनने की कमी तो थी नहीं. सेठानी ने भी अन्य सेवक-सेविकाओं की संगत में उसे कभी नहीं रखा. इसकी वजह उनका दयावान धर्मभीरू स्वभाव तो था ही, चांद का शांत, कर्मठ, समर्पित व्यवहार भी था. मेवा-मिष्ठान, फल-फूल, कपड़े-गहने, खेल-खिलौनों के अंबार देख कर भी उस अबोध बच्ची की आंखों में लोभ-लालच तो दूर, किसी प्रकार के कौतुहल का भाव तक नहीं आता था.

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लगता था जैसे भौतिक वस्तुओं से अघायी कोई देवबाला शापग्रस्त जीवन काटने आ पहुंची थी.
समय का रथ गतिमान था. सेठ का मोतीपुरा आंगन समृद्धि के साथ-साथ एक-एक करके पांच बेटियों की चहचहाहट से गुलज़ार हो गया. बालिका चांद कब ‘धायजी’ के संबोधन की हक़दार बन गयी, पता तक न चला. निःस्वार्थ कर्त्तव्यपरायणता अपना हक़ ख़ुद दिला देती है. जैन धर्मावलम्बी परिवार में अब सेठ-सेठानी बेटियों को घर पर धायजी की देख-रेख में छोड़ साधु-संतों के सेवा-दर्शन पर जाते रहते. घर की पूरी ज़िम्मेदारी धायजी के कंधों पर रहती. चार-पांच नौकर-नौकरानियों की बागडोर भी उसके हाथ में रहती, मगर धाय की कार्यकुशलता ने कभी मात खाना नहीं जाना. बड़ी बेटी कमला दस वर्ष की हुई तो बड़ी धूमधाम से अति संपन्न घर में उसका विवाह हुआ.
उन दिनों की प्रथा व अतिरिक्त प्रेम के कारण बालिका वधू के साथ धाय भी उसके ससुराल साथ जाती. दस वर्ष की कमला और बीस वर्ष की उसकी धाय. ससुराल में होनेवाली बहू की मनुहारें, लाड, प्रेम व अपेक्षाकृत युवा दूल्हे की प्यार भरी छेड़खानी, पत्नी का सामीप्य पाने की चेष्टाएं, धाय की आंखों के सामने घटते रहते… यक़ीनन उसका मन वैरागी ही रहा होगा… कि व़क़्त और वयस की किसी मौसमी हवा ने उसे हिलाया तक नहीं. उसने अपने मन के घोड़े को संयम के किस अदृश्य चाबुक से साधा था, जो कभी भटका नहीं.
इस दौरान सेठ के बेटा हुआ और कालांतर में एक-एक करके सभी बेटियां ससुराल चली गयीं. इतने बड़े घर की पाकशाला का दायित्व धाय के पटु हाथों में था. सेठानी ख़ुद उसके सहयोग को तत्पर रहती. बेटियां जैसे-जैसे बड़ी होती जातीं, वे उन्हें धाय का हाथ बंटाने व काम सीखने उसके पास भेजती रहती. अनजाने में सभी बेटियों ने गृहकार्य की दीक्षा धाय से ली और उसके साथ उन सबका नेह का नाता प्रगाढ़ होता गया.
धाय और सेठानी में एक बात को लेकर अक्सर तकरार होती. धाय जब खाने बैठती तो न जाने किस आले-अलमारी के ओने-कोने से निकालकर ठण्डी-बासी रोटी और बची सब्ज़ी अपनी थाली में रख लेती. सेठानी इस पर बरस पड़ती.
इस लम्बे अंतराल में यह ज़रूर हुआ कि धाय का सेवाभाव तो वही रहा, मगर अब अधिकार भाव भी आ गया. लड़कियां ससुराल से आतीं तो उनके वेश-व्यवहार या फिर बच्चों के रख-रखाव को लेकर सगी मां से पहले ही धाय डपट दिया करती.
लड़कियों के ससुराल उसी शहर में थे. आना-जाना लगा रहता. मारवाड़ी घरों में गहने पहनने का चलन कुछ ज़्यादा है. ससुराल से आतीं, तो वे अपने गहने उतार कर धाय को सौंप देतीं. ऊपर जाकर ताले-चाबी का झंझट कौन करे. शाम को ससुराल जाते व़क़्त वापस पहनना ही होता. धाय के रहते निश्‍चिंतता थी.
सभी लड़कियों की शादियां हो गयीं.. बेटा कलकत्ता पढ़ने चला गया. घर सूना हो गया था. सेठानी ने इस सूनेपन को कम करने के लिए अपनी एक नातिन मंजू को अपने पास रख लिया. मंजू की मां अब कलकत्ता रहने लगी थी. अब नानीमां और धाय की तमाम वर्जनाओं व दुलार का केन्द्र मंजू थी. बेटियों के सभी बच्चों की वह नानी थी और एक-एक की पसंद उसे कंठस्थ रहती थी. बच्चे आते, तो उन सबकी फरमाइशें पूरी करती रहती. अपने लिए रखती वही बासी रोटी और बची सब्ज़ी. कई बार नानीमां के इशारे से मंजू खाने की कोई वस्तु, फल या मिठाई फ्राक में छुपा कर लाती और खाना खाती धाय की थाली में चुपके से रख देती, तो वह बिगड़ उठती. थाली धो कर पीने का सनातन नियम पालने वाली धर्मभीरू धाय को फिर वह वस्तु खानी ही पड़ती. मंजू पर उसकी डांट का कोई असर नहीं होता था. उसे बहुत बुरा लगता कि नानी कोई अच्छी चीज़ क्यों नहीं खाती… और वह ताक में रहती इसी तरह उसकी जूठी थाली में कुछ रख देने के.
छुट्टियों में नानीमां उसे भी अपनी बेटियों की तरह नानी के पास रसोईघर में भेजती काम सीखने के लिए, “जा नानी खने घर का काम सीख, नहीं तो सासरे में गाल्या खासी.” रात के व़क़्त गलियों में कुत्तों का समवेत कर्णकटु आलाप मंजू को डराता. वह जब तक नानी का हाथ कस कर पकड़ कर नहीं सोती, उसे नींद नहीं आती.
सेठजी के बेटे की शादी की बात चलने लगी. लड़कियां देखी जातीं… धाय का पूरा दख़ल रहता. छांट कर रूपसी बहू लाए. बहू पर सगी सास-सा शासन करने व दुलार लुटाने वाली धाय बेटे के बच्चों पर तो जैसे जान छिड़कती थी. बहू ने भी उसका मान सास जैसा ही रखा. न कभी पलट कर जवाब दिया, न मनमानी की. अब धाय को बुढ़ापा आ रहा था. सेठजी का देहावसान हो गया था और यह परिवार कलकत्ता रहने लगा था.
साल में एक बार परिवार बीकानेर आता तो वह अपने गांव ‘देशनोक’ आठ-दस दिन जा आती थी. वहां उसके तीन देवर व उनके परिवार रहते थे. लकड़ी के काम में अच्छी आय थी उनकी और धाय का मान भी बहुत रखते थे. एक बार जब वह देशनोक गयी तो किसी ने उसके दिमाग़ में एक बात जमा दी, “पूरो जमारों तो सेठां रे घर में गाल दियों. पण आगलों जमारो क्या गमावों, अबे थारी ऊमर आयेगी. कदेई सांस निकल जाएगी तो बढ़े बिना पूरों बाल्यां नदी में फेंक देवे, जिके सु गति कोनी हूवें.”
और गांव से वापस आकर धाय ने ऐलान कर दिया वह अब कलकत्ता नहीं जाएगी. सभी को ताज्जुब हुआ. बहुत समझाया, मगर वह नहीं मानी. उसे वहां छोड़ते सभी को दुख हो रहा था, पर वह तो अड़ी गयी, रो रही थी. व्याकुल भी थी. जानती थी जहां कभी रही नहीं, वहां रहना कठिन तो होगा. लेकिन सद्गति व परलोक के भय ने उसे जकड़ रखा था. कलकत्ता में मंजू ने सुना, तो उसे बहुत ठेस लगी. सगी मां जैसे कहीं अकेली रह जाए, तो जैसा मन आकुल-व्याकुल हो उठे, ठीक वैसा ही लगा था उसे.

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जब सभी बीकानेर जाते तो वह गांव से आ जाती थी. इस बीच एक बार मंजू का राजस्थान जाना हुआ, तो वह नानी से मिलने देशनोक गयी. उसे देख कर मंजू की आंखों से ढल-ढल आंसू टपकने लगे.
ख़ुद पर उसका वश नहीं रहा. वह धाय के देवरों से कह बैठी, “थे केवता हा इने खने राखर पूरी सेवा चाकरी करसा. इसी सेवा करो हो कई आ हालत हुगी. इसी तो आ कदेई कोनी ही.”
मंजू की बात सुन कर कोई कुछ नहीं बोला, सब कमरे से बाहर निकल गये तो धाय ने उसे हाथ दबा कर चुप रहने का इशारा किया और बोली, “गेली हुयी है… क्यां रोवे है. ए सगला बापड़ा तो मारे आगे-भारे फिरे हैं. अबे बुढ़ापो है, पीला पान हां… कदेई झर जासा… रो मती तू तो म्हारी साणी बाई है.”
मंजू भी उसके संकोची स्वभाव को जानती थी. संभव है, हमेशा जिनके साथ रही. उनसे दूर रहने के कारण उसकी यह हालत हो गयी है. सब पर पूरे अधिकार से गरजने वाली नानी की सूखी देह और गठरी-सी बनी पांवों में माथा डाले, दीन-हीन-सा बैठा रहना मंजू को कचोट गया और वह आपा खो बैठी थी. उसने फिर नानी को समझाने का पूरा प्रयास किया. पर वह कहां मानने वाली थी.
सोचती हूं, उस जैसे इन्सान को भी अपने अगले जनम के लिए चाह कर पुण्यों को अर्जित करने की आवश्यकता थी क्या? काम, मोह, लोभ, लालच को इसने जितना साधा था, उतना तो कोई संसार त्यागी साधु भी नहीं साध पाता. उसे अपना अगला जनम सुधारने के लिए अन्तिम प्रहर के तप के मूलधन से कहीं ज़्यादा आजीवन नि:स्वार्थ सेवाभाव, अलौकिक ईमानदारी तथा उम्र के कच्चे पड़ावों पर भी अडिग रहने की दृढ़ता का पुण्य क्या कम था?
ऐसे किसी इंसान की गढ़न में मां-बाप के उच्च संस्कार, सुशिक्षा तथा वैसा ही परिवेश का बड़ा हाथ होता है. कब पाये उसने मां-बाप से संस्कार…? कब मिली शिक्षा…? और कहां मिला परिवेश…? यक़ीनन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें विधाता अपनी पूरी लगन से गढ़ता है और पूर्ण संस्कारित करके ही धरा पर भेजता है. जो न मिला, उसके लिए कभी भगवान को दोष नहीं देते. कभी मुंह खोलकर अपने जीवन की त्रासदियों की शिकायत नहीं करते और मिसाल बन जाते हैं, जीती जागती… जिनका ‘होना’ बरगद की छांव-सा लगता है. अदृश्य, मगर सुकून भरा, शीतल-शांत, घनघोर, लेकिन जब चले जाते हैं तो छोड़ जाते हैं एक एहसास… एक सुगंध.

– निर्मला डोसी

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कहानी- प्रत्यावर्तन (Short Story- Pratyavartan)

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मैंने राजू के नन्हे-मुन्ने हाथ देखे. जाड़ों में कुसुमी अक्सर दूध के जूठे भगौने की तली में चिपकी रह गयी मलाई कांछकर उसके हाथ-पैरों में मलती थी. कल से इन छोटी-छोटी उंगलियों में पेचकस, पाना और रिंच होंगे. कलेजे में मरोड़-सी उठी. मैंने उसे सीने से चिपटा लिया. माथा चूमकर भरे गले से बोली, “जब भी कोई ज़रूरत हो, बेहिचक चले आना.”
उदास आंखें लिये राजू ने ‘अच्छा’ के भाव से सिर हिला दिया.
मंगला के पीछे छोटे-छोटे क़दम रखकर जाते हुए राजू को मैं अपनी डबडबाई आंखों से ओझल होने तक देखती रही. कमरे में आकर हिलक-हिलककर रोई अपनी विवशता पर. जीवन में पहली बार ये मुझे बहुत बुरे लगे.

सुखदेई की कार्यकुशलता ने पांच सालों में ही मुझे एकदम निकम्मा बना दिया था. इसलिए जब एक दिन उसने स्थायी रूप से गांव जा बसने का ऐलान करके बोरिया-बिस्तर समेटा तो मेरे तो हाथ-पैर ही फूल गये. घर के इस छोर से लेकर उस छोर तक फैले काम में समझ ही नहीं आता था कि काम की शुरुआत करूं तो कहां से करूं? ऐसे संकट काल में कुसुमी का आगमन मुझे वरदान जैसा लगा.

पड़ोस में रहनेवाले मालवीयजी की नौकरानी मंगला की बहन बीस वर्षीया कुसुमी पति की असामयिक मौत के बाद दो महीने के राजू के साथ भरण-पोषण के अलावा आवास की समस्या से भी जूझ रही थी. कुसुमी की समस्याएं मेरी समस्याओं के निवारण का ज़रिया बन गयीं. हालांकि उसकी आवासीय समस्या हल करने में मुझे ख़ासी मेहनत करनी पड़ी. दरअसल नौकरों के बारे में इनके उसूल निश्‍चित और एकदम स्पष्ट हैं. उनके साथ इन्सानियत के बर्ताव की हिमायत के बावजूद ये एक निश्‍चित दूरी रखना पसन्द करते हैं. इसलिए साथ रखने के पक्ष में नहीं हैं. पिछवाड़े वाली कोठरी में कुसुम को रखने के लिए इन्हें मुश्किल से राज़ी कर पायी.

अपनी असहायता के एहसास ने कुसुमी को इतना अधिक विनम्र बना दिया था कि कई बार उसकी विनम्रता मुझे दीनता-सी लगने लगती. धीरे-धीरे उसने घर के सारे उत्तरदायित्व संभाल लिए. अब अलसुबह किचन में जाकर मुझे बेडटी नहीं बनानी पड़ती थी. बाथरूम धोकर मंजी हुई बाल्टी में पानी भरकर, कपड़े अरगनी पर टांग कर कुसुमी मुझे नहाने के लिए पुकारती. पूजा की अलग व्यवस्था मिल जाती. पूजा निबटते-निबटते वह मैले कपड़े वॉशिंग मशीन के सुपुर्द कर नाश्ते की तैयारी में लग चुकी होती. रसोईघर में कुसुमी की घुसपैठ ने दोनों समय के भोजन बनाने के मेरे दायित्व को काट-छांटकर स़िर्फ सब्ज़ियां छौंकने और खाना परोसने तक समेट दिया था. अपने इसी गुण से कुसुमी मेरे मन में जगह बनाती चली गयी और मैं जान भी नहीं पायी कि नौकरानी बनकर घर में प्रविष्ट हुई कुसुमी कब मेरे लिए परिवार के सदस्य जैसी अपनी और आत्मीय बन गयी.

कुसुमी जिस दिन घर आयी, उसी दिन सुशान्त का सीपीएमटी का परीक्षाफल निकला. परीक्षा के दौरान सुशान्त के बीमार पड़ जाने के कारण हम उसकी सफलता के प्रति आशान्वित नहीं थे, पर वह चयनित हो गया था. अंधविश्‍वासी न होने के बावजूद मेरे मन में एक विश्‍वास घर कर गया

कि कुसुमी के पैर मेरे घर के लिए शुभ हैं. प्रसन्न मन:स्थिति में उपज आयी उदारता में मैंने उसे आश्‍वासन दे डाला, “मैं तेरे राजू को पढ़ाऊंगी.”

सुशान्त का जब एमबीबीएस पूरा हुआ तब मैं राजू को ‘क’ से कबूतर ‘ख’ से खरगोश पढ़ना सिखा रही थी. सुशान्त के छोटे पड़ गये कपड़ों से मैं बर्तन ख़रीदकर उकता चुकी थी. राजू के माध्यम से उनका सदुपयोग कर एक संतोष मिला. वह सुशान्त के स्कूल दिनों वाली ग्रे नीकर और स़फेद कमीज़ पहनकर पढ़ने बैठता तो कई बार मुझे लगता मेरे सामने बीस साल पहले का छोटा-सा सुशान्त आ बैठा है. उसके तेल चुआते बाल, मोटे काजल से आंजी आंखों और कडुए तेल से गंधाती देह से वितृष्ण हुए बिना मैं उसे सीने से चिपटा लेती. एक आध बार इन्होंने देखा, लगा, पसन्द नहीं आया. अकेले में समझाते हुए बोले, “देखो, नौकर-चाकर के प्रति मैं स्नेह-ममता का विरोधी नहीं हूं, पर इन भावों का मन में रहना ही अच्छा है, ऐसा खुला प्रदर्शन उचित नहीं.”

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“क्यों भला?” मैंने किंचित अप्रसन्नता से पूछा.

“इसलिए कि अगर कल यही बराबरी उसकी तरफ़ से हुई, तब तुम्हें ही गवारा नहीं होगा.”

हालांकि इनकी बात अपनी जगह सही थी, पर मुझे अच्छी नहीं लगी. चिढ़कर जवाब दिया, “आप पुरुष हैं, स्त्री होते तो जानते स्त्री की ममता भेदभाव नहीं जानती.”

इन्हें ग़ुस्से से अपनी ओर घूरता पाया तो जैसे और चिढ़ाती-सी बोली, “मैंने तो कहीं पढ़ा है कि जो व्यक्ति संगीत, फूल और बच्चों से प्यार नहीं करता वो…”

“ख़ून कर सकता है, यही ना.” इन्होंने ग़ुस्से से मेरा वाक्य पूरा किया.

“ठीक है, नौकरानी के लड़के को कलेजे से चिपका-चिपकाकर जब आपकी ममता तृप्त हो ले, तो मेरे कमरे में एक कप चाय भिजवा दीजिएगा.”

इसके बाद इस विषय पर इनकी ओर से कोई टिप्पणी नहीं हुई.

सुशान्त को डॉक्टर बने एक वर्ष पूरा होने को आ रहा था. कुलीन घर-परिवार का लड़का अगर काम पर लग जाये और सुदर्शन भी हो तो जाने किन बेतार के तारों पर तैरती हुई उसकी विवाह पात्रता की सूचना अविवाहित कन्याओं के पिताओं तक जा पहुंचती है. प्रस्तावों का तांता लग गया था. ढोलक की थाप पर गूंजते बन्ने की पृष्ठभूमि में  घोड़ी पर सेहरा बांधे सुशान्त की मनमोहक कल्पना करते हुए मैं तो अभी से मगन हुई जा रही थी. लेकिन मेरी ग़लतफ़हमी के नाज़ुक कांच को सुशान्त की वयस्कता के एक ही ऐलान ने फ़र्श पर पटक कर झन्न से चकनाचूर कर दिया, “मम्मी, तुम किसी जगह ‘हां’ मत कर बैठना. मेरी अपनी लाइकिंग है.”

बेटे की इस बेहिचक, बल्कि सच कहूं तो निर्लज्ज उद्घोषणा से हम मियां-बीबी आसमान से ज़मीन पर आ गए. और जब बेटे की ‘लाइकिंग’ को प्रत्यक्षत: देखा तब तो जैसे निष्प्राण ही हो गये. यह उसकी सुरूचि का अध:पतन था या सौंदर्य के नये मापदण्ड, हम समझ नहीं सके.

सुशान्त की पत्नी का तीखे नाक-नक्शों के बावजूद रंग गहरा सांवला था और चेहरे पर नाराज़गीभरी ऐसी शुष्कता व्याप्त थी, जो आमतौर पर पब्लिक डीलिंग का काम करनेवालों के चेहरे की स्थायी पहचान बन जाती है. पुरुषों जैसी ऊंचाई के साथ शरीर इतना दुबला था कि डॉक्टरनी ख़ुद ही रोगिणी होने का भ्रम पैदा करती थी. कहां अपनी अछूती सुन्दरता को घूंघट में ढंके, पलकें झुकाए, सकुचाए क़दमों से चलती आती पुत्रवधू की हमारी कोमल कल्पना और कहां इस छह फुटी विजातीय श्यामा की किसी विख्यात मॉडल जैसी दर्पीले आत्मविश्‍वास भरी एक बार बाएं दूसरी बार दाएं लचकती नि:संकोच चाल का कठोर यथार्थ. मैंने इसे अपनी नियति समझकर स्वीकार कर लिया.

शादी के दौरान मुझे कुसुमी की तबीयत ढीली होने की ख़बर मिली तो थी, पर मैं उसकी गम्भीरता का अनुमान नहीं लगा पायी थी. एक-दो बुखार की गोलियां देकर सोचा था मौसमी बुखार है, उतर जायेगा. मगर शादी निबटते-निबटते जब वह बिस्तर से जा लगी तो मुझे चिंता होने लगी. बुखार उतरने का नाम नहीं ले रहा था. जांचें हुईं, परिणाम देखकर मेरे तो पैरों तले धरती ही खिसक गयी. कुसुमी को रक्त कैंसर था.

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कुसुमी की बीमारी से मैं मानसिक रूप से बहुत परेशान थी. ऐसे में बहू का असहयोग मुझे और भी दुखी कर जाता. वह कुसुमी को सरकारी अस्पताल में भर्ती करवाने का कई बार मशवरा दे चुकी थी. उसकी तार्किक सोच में तनख़्वाह और नौकर का गणित एकदम साफ़ था. वेतन थमाते ही नौकर मिल जाने की सुविधा होते हुए भी नौकरानी की सेवा करना और नौकरानी भी वह, जिसे ठीक ही नहीं होना है, उसके लिए भावनात्मक मूर्खता थी. यह सच था कि कभी कुसुमी की ओर से चाकरी और मेरी तरफ़ से वेतन हमारे सम्बन्ध जोड़ने का पुल बना था. लेकिन आत्मीयता की बाढ़ में वह पुल तो कब का टूटकर बह चुका था. अब तो इस पार से लेकर उस पार तक केवल हार्दिकता का छलछलाता जल था. इसे मेरी बहू कभी समझ नहीं सकी.

इस तरह की छोटी-छोटी घटनाएं भविष्य के एकदम साफ़ संकेत दे रही थीं. लेकिन शायद सच स्वीकारने की हिम्मत न होने से मैं जान-बूझकर अनदेखी कर रही थी. ये मुझसे ़ज़्यादा दुनियादार हैं और कुशाग्र बुद्धि भी, इसलिए आगत को मुझसे कहीं ़ज़्यादा साफ़ देख रहे थे. पर इनका पुरुष अहं इन्हें दुख को स्वीकार नहीं करने दे रहा था. इसलिए ये दोहरी पीड़ा झेल रहे थे. अंदर दुख सहने की, बाहर छिपाने की. मैं तो फिर भी रसोईघर में मसाला भूनते हुए, कपड़े प्रेस करते हुए या मंदिर में रामायण पढ़ते हुए मौक़ा पाकर चोरी से रो लेती थी, पर ये गम्भीर मुद्रा और ख़ामोशी के आवरण तले भीतर का चीत्कार छिपाये रखते.

सुशान्त के विवाह को छह महीने हो चले थे. इन छह महीनों में बहू-बेटे ने हमें हर तरह से जता दिया था कि हमने उनके लिए स़िर्फ समस्याएं खड़ी की हैं. बहू-बेटे के मनोभाव भांप कर हालांकि ये किसी भी तरह की टोका-टाकी कब की छोड़ चुके थे, पर उस दिन पता नहीं कैसे भूल हो गयी. पार्टी से आधी रात गये लौटने पर इनका मामूली सवाल-जवाब दोनों की नाराज़गी का बहुत बड़ा कारण बन गया और उनके निर्मम प्रस्ताव की भूमिका भी. इसमें इन्होंने पुराने मुहल्ले के इस ‘ओल्ड ़फैशन्ड’ पुश्तैनी मकान को बेचकर नयी कालोनी में नये ढंग के मकान बनवाने की इच्छा प्रस्तावित की थी, जिसमें आने-जाने के दो स्वतंत्र रास्ते निश्‍चित रूप से हों, ताकि उनके देर-सबेर आने का अव्वल तो हमें पता ही न लगे और लग जाये तो आपत्ति का कोई आधार न हो.

उस दिन इनका संचित आक्रोश एक साथ फूट पड़ा. इनके शांत स्वभाव का उत्तेजना भरा यह नया रूप देखकर मैं तो सहम गयी.

“न ये मकान बिकेगा, न इसे छोड़कर हम कहीं जाएंगे. हां, तुम अपनी सुख-सुविधा के हिसाब से जहां चाहो जा सकते हो.” नपे-तुले शब्दों में दो टूक जवाब का पत्थर उनके मुंह पर मारकर जैसे ये ख़ुद ही आहत हो आए.

लगा, बहू-बेटे ने शायद इसी हरी झण्डी को पाने के लिए ही सारा उपक्रम रचा था. कुछ ही दिन बीते कि बहू ने खाड़ी देश में बसे अपने भाई का भेजा नियुक्ति पत्र हमारी विस्फारित आंखों के सामने लहरा दिया, जिसमें दोनों के लिए पैसा उगलती नौकरियों के आमंत्रण थे.

‘अपनी सुख-सुविधा के हिसाब से जहां चाहो जा सकते हो’ कथन कहने में जितना आसान था, उसकी वास्तविकता झेलना उतना ही मुश्किल था, लेकिन तीर कमान से निकल चुका था.

आनेवाला हर दिन कुसुमी और मौत का फ़ासला कम करता जा रहा था. सुशान्त की उड़ान को बीस दिन बचे थे, जब कुसुमी ने अन्तिम विदा ली. उसके अन्तर्मन की याचना शब्द विहीन होकर भी शून्य में टिकी उसकी आंखों की कातरता और सूखे होंठों की फड़फड़ाहट में पूरी तरह अर्थपूर्ण थी. मैंने उसकी दुबली हथेलियां थाम लीं. माथे पर स्नेह भरा हाथ फेर कर आश्‍वासन दिया, “मैं हूं न, तेरा राजू मेरी ज़िम्मेदारी है.”

मैंने तो बड़े आत्मविश्‍वास से राजू की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ली थी, पर मुझे क्या पता था कि मुझे परलोकवासी कुसुमी का अपराधी बनना पड़ेगा.

इनका व्यवहार अप्रत्याशित था, जैसे बेटे से मिले आघात का बदला निर्दोष राजू से ले रहे हों- “आख़िर तुम समझने की कोशिश क्यों नहीं करती? इस नासमझ बच्चे को किस हक़ से अपने साथ रखना चाहती हो?”

राजू को अपने साथ रखने में किसी हक़ की भी ज़रूरत पड़ सकती है, ये तो मैंने कभी सोचा ही नहीं था. कोई जवाब नहीं सूझा. सिटपिटाकर बोली, “जैसा कुसुमी को रखा था, वैसे ही राजू को भी रख लूंगी.”

“पागल हुई हो?” ये मेरे गैर दुनियादार रवैये पर झल्लाकर बोले, “नाबालिग बच्चा है. दस तरह के झंझट खड़े हो सकते हैं. कल किसी ने बच्चे को नौकरी पर रखने की झूठी रिपोर्ट दर्ज करा दी, तो जेल जाने की नौबत आ सकती है. रखा रह जायेगा सारा परोपकार.”

“फिर कहां रहेगा ये बेचारा?” पूछती हुई मैं अपनी लाचारी पर रो पड़ी.

“क्यों, मंगला… इसकी मौसी नहीं है? वहीं रहेगा.” ये कठोरता से बोले.

“आपके हाथ जोड़ती हूं, इसे मेरे साथ रहने दीजिए.” अनुनय में मैंने सचमुच ही हाथ जोड़ दिये.

“देखो, मैं कोई क़ानूनी झमेला नहीं चाहता.” कहते ही ये एक क्षण को रुके. इनका स्वर एकदम उतार पर आ गया, “एक धक्का खाकर अभी जी भरा नहीं, जो फिर नया नाता जोड़ने चली हो.” इनकी ओढ़ी हुई कठोरता की वजह मेरी समझ में आ रही थी.

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मंगला के चेहरे पर अनचाहा बोझ आ पड़ने का असंतोष साफ़ ज़ाहिर था. एक कोने में मासूम राजू सहमा खड़ा सब देख रहा था. मैं सामान के साथ मंगला को राजू का बस्ता भी थमाने लगी तो वह किंचित उकताकर बस्ता वापस करती हुई बोली, “बहूजी, ये पोथी-पत्तर तो आप ही रखो. हमारे घर में इसका कोई काम नहीं है.”

मेरा अनबूझा सवाल भांपकर ही शायद उसने जवाब दिया, “कल से अपने बड़े भाइयों के साथ गैराज के काम पर ये भी जाएगा.” अपने कहे को जायज़-सा ठहराती वह बोली, “क्या करें बहूजी, हम गरीबों के यहां तो जितने पेट हैं, उतने ही जोड़ी हाथ काम करें, तभी दाल-रोटी का जुगाड़ हो पाता है.”

मैंने राजू के नन्हे-मुन्ने हाथ देखे. जाड़ों में कुसुमी अक्सर दूध के जूठे भगौने की तली में चिपकी रह गयी मलाई कांछकर उसके हाथ-पैरों में मलती थी. कल से इन छोटी-छोटी उंगलियों में पेचकस, पाना और रिंच होंगे. कलेजे में मरोड़-सी उठी. मैंने उसे सीने से चिपटा लिया. माथा चूमकर भरे गले से बोली, “जब भी कोई ज़रूरत हो, बेहिचक चले आना.”

उदास आंखें लिये राजू ने ‘अच्छा’ के भाव से सिर हिला दिया.

मंगला के पीछे छोटे-छोटे क़दम रखकर जाते हुए राजू को मैं अपनी डबडबाई आंखों से ओझल होने तक देखती रही. कमरे में आकर हिलक-हिलककर रोई अपनी विवशता पर. जीवन में पहली बार ये मुझे बहुत बुरे लगे. कुछ दिनों के लिए हम दोनों में संवादहीनता की स्थिति उत्पन्न हो गयी, लेकिन जिस दिन बेटा-बहू रवाना हुए, इनकी हालत देखकर मैं सारा आक्रोश भूल गयी. संधि प्रस्ताव लेकर ख़ुद ही आगे बढ़ आयी. किसी अनहोनी के घटने का डर हो आया था मुझे. बहू-बेटे की पीठ फिरते ही इनके संयम का बांध भरभरा कर ढह गया था. इतना विचलित मैंने इन्हें कभी नहीं देखा था. भीतर से उमड़ता रुलाई का वेग रोकने की कोशिश में इनके होंठ कांप रहे थे. समूची देह हवा से झकझोर डाली गयी टहनी-सी हिल रही थी. सहारा देकर मैं इन्हें बिस्तर तक लायी और रोने का अवकाश देने के लिए झूठ बोलती पलट गयी, “हाय राम, आग लगे मेरी याद को, गैस पर दूध चढ़ा ही छोड़ आयी हूं.”

दूध का ग्लास और दवा की गोली लेकर जब मैं लौटी तो ये बाहर जा चुके थे. मालवीयजी के यहां ही गये होंगे, मैंने सोचा. उन्हीं के यहां इनका सुबह-शाम का उठना-बैठना था. तसल्ली हुई- चलो, कह-सुनकर मन हल्का कर आयेंगे. ये दोपहर के खाने तक नहीं लौटे, तो मैंने मालवीयजी के यहां फ़ोन किया. ये वहां गये ही नहीं थे. फिर कहां जा सकते हैं? सोचते-सोचते मुझे चिंता होने लगी. एक-एक करके सभी परिचितों के यहां फ़ोन मिला डाले. इनका कुछ पता नहीं चला. इंतज़ार करते-करते घड़ी की सुई चार को पार कर चली थी. अब मेरे हाथ-पैर ठण्डे पड़ने लगे. अर्द्धमूर्च्छित-सी मैं भगवान के सामने ढह पड़ी, “हे प्रभु, अनजाने में किये मेरे पापों का दण्ड उन्हें मत देना.”

तभी डोरबेल बजी, यही थे. क्रोध और रुलाई के आवेग में इतना ही कह पायी, “बता कर तो जाते.”

“फिर ये सरप्राइज़ कैसे देता?” कहने के साथ इन्होंने बोगनबेलिया की आड़ में छिपे राजू को खींचकर सामने कर दिया.

“क्या?” आनन्द और आश्‍चर्य के अतिरेक में मैं और कुछ बोल ही नहीं पायी.

“लो सम्हालो अपना राजू…” मेरे एक हाथ में राजू का हाथ पकड़ा कर, “और ये रहा तुम्हारा अधिकार पत्र.” कहते हुए इन्होंने मेरे दूसरे हाथ में एक लिफ़ाफ़ा थमा दिया. खोलकर देखा तो गोद लेने की क़ानूनी कार्यवाही के काग़ज़ थे. मैंने आभार और आनन्दभरी नज़रों से इनकी ओर देखा. इनकी आंखों में नटखट शरारत थी और होंठों पर सुशान्त की शादी के बाद पहली बार आयी मुस्कान. कुछ वैसी ही मीठी-सी, जैसी नवजात सुशान्त के माथे पर पहला चुम्बन रखते हुए आयी थी.

– निशा गहलोत

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कहानी- बोझ (Short Story- Bojh)

Short Story, Bojh, hindi kahani

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रिया भौंचक्की रह गई… वह अपनी धुंधली आंखों से कभी शेखर को, कभी कमला जी को देख रही थी. जो रिश्ता उसके लिए बोझ से ज़्यादा कभी कुछ नहीं रहा, आज उसी रिश्ते ने उसके आंसुओं को अपनी हथेलियों पर ले लिया था. उसका मन आत्मग्लानि से भर उठा.

”शेखर, क्या मम्मी का यहां आकर रहना ज़रूरी है? मेरठ में उन्होंने पूरा जीवन बिताया, अब इस उम्र में? वहां उनका अपना एक दायरा है. और महेश भी तो है न वहां उनकी देखभाल के लिए.”

“महेश? रिया वह स़िर्फ एक नौकर है. पापा के देहांत के बाद मम्मी कितनी अकेली हो गई हैं. ऐसे में उन्हें अपनों की ज़रूरत है. और हमारे सिवा…”

“वो तो ठीक है, पर उनकी लाइफ़स्टाइल बिल्कुल अलग है. सुबह जल्दी उठो, नॉनवेज मत खाओ, स़िर्फ साड़ी पहनो… प्लीज़ शेखर, एक-दो दिन की बात हो तो झेल भी लिया जाए, पर हमेशा के लिए…?”

“इसका मतलब मेरी मम्मी तुम्हारे लिए बोझ हैं, जिन्हें तुम्हें झेलना पड़ेगा? अगर यही बात तुम्हारी भाभी तुम्हारी मम्मी के लिए कहें तो?”

“मेरी मम्मी ने कभी भाभी पर अपनी मर्ज़ी नहीं थोपी. उन्हें अपने तरी़के से ज़िंदगी जीने की पूरी आज़ादी दी है. पर तुम्हारी मम्मी? रिया ये मत करो, वो मत करो… देखो शेखर, मैं एक बात तुम्हें अभी से क्लीयर कर देती हूं. मम्मी के आने के बाद मैं वैसे ही रहूंगी जैसे रहती आ रही हूं. तुम्हें अच्छा लगे या बुरा.” रिया की इस बात पर शेखर ने कोई जवाब नहीं दिया.

शाम को शेखर ऑफ़िस से जल्दी लौट आया. “रिया तुम जल्दी से तैयार हो जाओ, मम्मी को लेने स्टेशन चलना है.”

“मैं तो तैयार हूं.”

“इन कपड़ों में?”

“क्या बुरा है इनमें?” रिया का इशारा अपनी जीन्स की ओर था.

“मैं तो तुम्हें पहले ही कह चुकी थी शेखर. तुम इतने हिप्पोके्रट क्यों हो? तुम्हें जब मम्मी की गैरमौजूदगी में इस ड्रेस से कोई प्रॉब्लम नहीं, तो अब अचानक…?”

“प्लीज़ रिया, मैं तुम्हें कैसे समझाऊं? तुम बात को ग़लत ढंग से देख रही हो. मैंने कभी तुम्हारी फ्रीडम में बाधक बनना नहीं चाहा. लेकिन परिवार के अन्य सदस्यों की ख़ुशियों का ध्यान भी तो रखना होता है. और छोटे होने के नाते हमारा कर्त्तव्य बनता है कि हम अपने बड़ों के विचारों को भी सम्मान दें, आउटडेटेड कहकर उन्हें परिवार से ही काटें नहीं.”

“शेखर, तुम ये सब इसलिए कह रहे हो, क्योंकि सवाल तुम्हारी मम्मी का है. पर मैं जैसी हूं, वैसी ही रहूंगी. मुझे दो चेहरे रखने की आदत नहीं.”

“ठीक है. जो मन में आए, करो.” कहकर शेखर ने ग़ुस्से में कार की चाभी उठाई और बाहर निकल गया. पीछे से रिया भी आ गई.

स्टेशन पर दोनों बिल्कुल शांत खड़े थे, पर दोनों के मन के भीतर उथल-पुथल मची हुई थी. ‘कुछ न कुछ तो ज़रूर कहेंगी. वैसे आज मैं साड़ी ही पहन लेती तो ठीक रहता. नहीं, अगर आज पहन लेती, तो रोज़ पहनना पड़ता. न बाबा, मुझे नहीं बनना बहनजी. और फिर क्यों रहूं उनके मुताबिक? मेरी मर्ज़ी, मेरा घर है. अगर कुछ कहा तो करारा जवाब दूंगी. नहीं, कुछ नहीं कहूंगी, वरना बेवजह शेखर से झगड़ा होगा. चुप ही रहूंगी. सुनो सबकी, करो मन की. हां, यही ठीक रहेगा.’ रिया के भीतर विचारों के भंवर घेरा बना रहे थे.

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शेखर का भी यही हाल था. ‘रिया को देखते ही मम्मी अपसेट हो जाएंगी. रिया ने जान-बूझकर ऐसा किया है. वह क्यों नहीं समझती कि…’ शेखर की विचार शृंखला को ट्रेन की सीटी की आवाज़ ने तोड़ दिया. ट्रेन से उतरने पर रिया ने जब कमलाजी के पांव छुए तो शेखर का पूरा ध्यान उनके चेहरे के आते-जाते रंगों पर था, पर अपेक्षा से बिल्कुल विपरीत उन्होंने कुछ नहीं कहा.

अगले दिन सुबह-सुबह किचन में खटर-पटर की आवाज़ सुनकर रिया की आंख खुली.

“क्या ढूंढ़ रही हैं आप?”

“रिया, चीनी और चायपत्ती का डिब्बा नहीं मिल रहा.”

“इतनी सुबह! मम्मी, अभी तो स़िर्फ छह ही बजे हैं.”

“सुबह हो चुकी है बेटा. देर से उठना अच्छा नहीं है. तुम देर से उठोगी, तो शेखर भी देर से उठेगा. कितना वज़न बढ़ गया है उसका. मोटापा अपने साथ ढेरों बीमारियां भी लाता है. अब जाकर उसे उठाओ.”

‘ओ़फ्! कितना बोलती हैं सुबह-सुबह. अभी से इतना भाषण. पता नहीं, आगे क्या होगा.’ रिया रैक से चीनी का डिब्बा उतारते हुए सोचने लगी.

“डिब्बा मुझे दो, तुम शेखर को उठाओ.”

“उठो शेखर.” रिया ने शेखर को इतनी तेज़ी से झकझोरा कि शेखर हड़बड़ा गया.

“क्या हुआ?”

“ये तुम अपनी मम्मी से पूछो.”

“रिया बेटा, इधर तो आओ.”

“ओह गॉड! तुम्हारी मम्मी एक पल सांस भी लेती हैं या नहीं. चलो तुम उठो, नहीं तो थोड़ी देर में आवाज़ लगा-लगाकर सारी कॉलोनी को जगा देंगी.”

रिया और शेखर कमरे से बाहर आ गए.

“रिया शेखर टिफिन में क्या लेकर जाएगा? मैं तैयारी शुरू कर देती हूं.”

“शेखर खाना लेकर नहीं जाते. ऑफ़िस में ही कुछ मंगाकर खा लेते हैं.”

“क्यों शेखर, ये शौक़ कब से लगा लिया? रोज़ बाहर का खाना?”

“क्या करूं? ऑफ़िस नौ बजे निकलना होता है, कामवाली बाई तब तक आती नहीं.”

“बाई? रिया ने जॉब कर ली है?”

“नहीं-नहीं, वो मुझसे खाना अच्छा नहीं बनता. वैसे भी मुझे कुकिंग में कोई दिलचस्पी नहीं है.” रिया ने सफ़ाई दी.

“कोई बात नहीं, मैं तुम्हें खाना बनाना सिखा दूंगी.” और कमलाजी उठकर किचन में चली गईं.

“देखो शेखर, अपनी मम्मी को समझा दो, मुझे कुछ भी सीखना नहीं है. मैं जितना जानती हूं, मेरे लिए उतना ही काफ़ी है. तुम मुझे ऑफ़िस जाते हुए संजना के घर ड्रॉप कर देना.”

“तुम्हारा दिमाग़ तो ठीक है! मम्मी को कैसा लगेगा? तुम घर पर ही रहो.”

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“शेखर, तुम मुझसे ऐसे कैसे बात कर रहे हो? देखो मम्मी ने आते ही अपनी हुकूमत चलानी शुरू कर दी है. अगर तुम घर में शांति चाहते हो, तो मेरा तुम्हारी मम्मी से दूर रहना ही ठीक है, वरना फिर तुम्हीं कहोगे कि मैंने तुम्हारी मम्मी की इन्सल्ट…”

“आगे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है. तुम्हें जहां जाना है, जाओ.” शेखर ने झुंझलाकर कहा और निकल गया. उसके जाते ही रिया भी घर से निकल गई. शाम को जब वह लौटी, तो कमलाजी घर के बाहर बेचैनी से घूम रही थीं.

“रिया इतनी देर कर दी. फ़ोन ही कर देती, मुझे चिंता हो रही थी.”

“मम्मी, मैं बच्ची नहीं हूं, जो कहीं खो जाती.” रिया के शब्दों की चुभन कमलाजी को तड़पा गई.

रात को खाना खाते समय कमलाजी की चुप्पी से शेखर सब समझ गया.

“मम्मी, कल संडे है. मंदिर चलेंगी?” शेखर ने पूछा.

“ज़रूर चलूंगी, कहां है? घर से ज़्यादा दूर है?” और फिर बातों का सिलसिला शुरू हो गया. शेखर जानता था, जब भी मम्मी का मन अशांत होता, तो पापा उन्हें मंदिर ले जाते थे और मंदिर से लौटते ही वह कहतीं, ‘मैं अपनी सारी परेशानियां ईश्‍वर को उसके घर जाकर दे आई हूं, अब वही जानें.’

दूसरे दिन शेखर सुबह-सुबह उठ गया. उसने जागते ही पूछा, “रिया, तुम भी चलोगी न?”

“नहीं.” रिया ने करवट बदलते हुए कहा और सो गई.

शेखर और कमलाजी मंदिर से लौटकर आए, तो शालू बाई बर्तन साफ़ कर रही थी.

“शालू, तू बस बर्तन साफ़ कर ले. आज खाना मैं बनाऊंगी.”

“क्या बात करती हो आंटी? सच? चलो, आज मेरा आदमी ख़ुश हो जाएगा.” शालू के हाथ जल्दी-जल्दी बर्तनों पर चलने लगे.

“रिया, तुम्हें खाने में क्या पसंद है?”

“मुझे? आप शेखर से पूछ लें.”

“चलो, ठीक है.” कमलाजी पूरे उत्साह से खाना बनाने में जुट गईं.

लंच के व़क़्त पहला कौर खाते ही शेखर बोला, “मम्मी, आज बहुत दिनों बाद इतना अच्छा खाना खा रहा हूं, वरना शालू की बनाई सब्ज़ी में तेल ज़्यादा और सब्ज़ी कम नज़र आती है.”

“क्यों रिया, क्या शेखर सही कह रहा है?”

“नहीं तो. ऐसा कुछ नहीं है.” रिया ने भावहीन चेहरे से कुछ इस तरह कहा कि खाने की बात वहीं ख़त्म हो गई.

“शेखर सुबह जल्दी उठ जाना. कल से हम सब सुबह थोड़ी दूर घूम आया करेंगे.”

“मैं तो बिल्कुल नहीं जाऊंगी.” रिया ने हाथ खड़े कर दिए.

सुबह शेखर जल्दी उठ गया. पार्क में घूमते हुए वह इंतज़ार करता रहा कि मम्मी शायद कुछ कहें, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. फिर यह रोज़ का सिलसिला बन गया.

एक दिन कमलाजी बोलीं, “रिया मैं सोच रही थी कि शालू से खाना बनवाने के बजाय, क्यों न हम दोनों मिलकर…”

“नहीं मम्मी, बिल्कुल नहीं. कल आपको ही लगेगा कि मैंने घर का सारा काम आप पर डाल दिया. प्लीज़ जैसे चल रहा है, वैसे ही चलने दीजिए. और हां, आज मैं शॉपिंग करने जा रही हूं, आप मेरा इंतज़ार मत करना.”

शाम को जब रिया लौटी, तो उसके हाथों में कई बैग्स थे.

“कुछ लाई हो?”

“हां, अपने लिए कुछ कपड़े.”

“लाओ, मैं भी देखूं.” कमलाजी ने उत्सुकतावश रिया के हाथों से बैग्स ले लिए. वे एक-एक कर कपड़ों को देखने लगीं. हर कपड़े पर लगा प्राइसटैग उनकी आंखों में विस्मय भरने लगा.

“इतने महंगे? रिया, अभी तुम्हारी नई गृहस्थी है. कुछ सोच-समझकर ख़र्च करो. इस तरह तो तुम…” कमलाजी कुछ कहते-कहते रुक गईं.

“मम्मी, अब वो पुराना समय नहीं रहा कि अपनी इच्छाओं को मारकर आनेवाली जनरेशन के लिए पैसे बचाए जाएं. और फिर हम कमाते क्यों हैं? अच्छा खाओ, अच्छा पहनो और लाइफ़ को भरपूर जियो. कल किसने देखा है?”

“ठीक कह रही हो रिया. जीवन तो भरपूर जीने के लिए ही है. पर ये फिज़ूलख़र्ची? ये मैं इसलिए नहीं कह रही, क्योंकि मैं सास हूं. मेरी जगह तुम्हारी मम्मी होतीं, तो वे भी यही कहतीं. शेखर ऐसा करता, तो मैं उसे भी टोकती. रिया, तुम्हें जीवन का अनुभव नहीं है. शेखर बता रहा था कि हर महीने बीस हज़ार रुपए तो बैंक लोन की किश्त जाती है. बेटा, कर्ज़ लेकर सुविधाएं जुटाना अक्लमंदी नहीं. तुम समझदार हो, इस घर और शेखर की पूरी ज़िम्मेदारी तुम्हारे ऊपर है. जैसा चाहोगी वैसा ही तुम्हारा घर बनेगा. फिर बुरे व़क़्त के लिए भी कुछ पैसे हमेशा पास में होने चाहिए.”

“तो आप चाहती हैं कि हमारा बुरा व़क़्त आए?” रिया का यह विष बाण कमलाजी के मन में धंस गया.

ऑफ़िस से लौटकर आने के बाद अपनी मां की नम आंखों को देखकर शेखर भांप गया कि आज घर में ज़रूर कुछ हुआ है.

“मम्मी, क्या हुआ? तबीयत ठीक नहीं है क्या?”

“नहीं बेटा, ऐसी कोई बात नहीं है. बस अब यहां मेरा मन नहीं लगता. मुझे मेरठ वापस जाना है. तू मेरा रिज़र्वेशन करवा दे.”

“क्या हुआ मम्मी?” शेखर घबरा गया. “रिया ने कुछ कहा या मुझसे कोई ग़लती हो गई? आप तो हमेशा के लिए आई थीं न.”

“मेरे बच्चे, ऐसा मैंने कब कहा कि मैं यहां हमेशा रहने के लिए आई हूं. मैं तो तुम दोनों की गृहस्थी देखना चाहती थी. तुम दोनों यहां ठीक हो, ख़ुश हो, देख लिया. बस, अब जाना चाहती हूं. वहां घर सूना पड़ा है.”

“मम्मी, आप ही तो कहा करती थीं कि घर तो घर के लोगों से बनता है, वरना ईंट-गारे की दीवारों को तो स़िर्फ मकान कहते हैं. मम्मी, वहां कौन है? आप कहीं नहीं जाएंगी.” शेखर की आवाज़ अपराधबोध से थरथरा गई. वह ख़ुद को बहुत असहाय महसूस कर रहा था. जिस मां ने जीवनभर उस पर अपनी ममता लुटाई, आज उसी मां का वह ख़याल नहीं रख पाया. उसका मन कर रहा था कि वह चीख-चीखकर रिया से लड़े, लेकिन उससे भी क्या हासिल होगा.

“तू परेशान मत हो शेखर. मैं एक-दो महीने में फिर आ जाऊंगी.”

“सच?”

“हां बेटा.” कमलाजी ने शेखर के सिर पर हाथ फेरा. उनकी ज़िद के कारण शेखर ने रिज़र्वेशन करवा दिया.

“रिया, तुमने मम्मी से क्या कहा?”

“मैं क्यों कुछ कहूंगी? पर मैं उनके इशारों पर अपनी ज़िंदगी नहीं चलाऊंगी. शेखर, हम बच्चे नहीं हैं. क्या हम अपना भला-बुरा नहीं समझते? फिर क्यों मम्मी हमेशा ये प्रूव करने में लगी रहती हैं कि मैं मैच्योर नहीं हूं. उनका हर मामले में दख़लअंदाज़ी करने का नेचर ही सारी समस्या की जड़ है और इस उम्र में उनको हैंडल करना बहुत ही मुश्किल है.”

“बस करो रिया, प्रॉब्लम तुममें है. तुम स़िर्फ और स़िर्फ अपने बारे में सोचती हो. तुम कभी यह नहीं मानती कि तुमसे कभी ग़लती हो सकती है. तुम्हारा यही ईगो तुम्हें…” शेखर आगे कुछ कहता, उससे पहले ही कमलाजी की आवाज़ ने उसे चुप करा दिया.

“शेखर, रिया की भाभी का फ़ोन है.”

रिया ने तुरंत कमरे से बाहर निकलकर फ़ोन उठा लिया.

“रिया, कब से तुम्हारा मोबाइल ट्राई कर रही हूं. ख़ैर, मैंने तुम्हें ये बताने के लिए फ़ोन किया है कि मैं और तुम्हारे भैया दो दिन बाद दुबई जा रहे हैं.”

“बधाई हो भाभी. कितने दिनों के लिए जा रहे हो आप लोग? मम्मी का ध्यान रखना.”

“मम्मी? वो हमारे साथ नहीं जा रहीं. इनकी कंपनी किस-किस का ख़र्च उठाएगी. मम्मी यहीं रहेंगी. उनके लिए मैंने एक नौकरानी का इंतजाम कर

दिया है.”

“ये कैसे हो सकता है भाभी?”

“रिया, अब तो निर्णय हो चुका है. और हम भी कब तक उन्हें अपने साथ बांधे घूमेंगे? वैसे भी हमें दो साल बाद तो वापस इंडिया आना ही है.”

“दो साल? भाभी…”

“रिया, मैं तुमसे बाद में बात करती हूं. दरवाज़े पर कोई है.” फ़ोन कट गया, पर रिया बुत बनी फ़ोन को हाथ में लिए खड़ी रही.

“क्या हुआ रिया? अभी तो तुम भाभी को बधाई दे रही थी और अब…”

“शेखर, भैया-भाभी दुबई जा रहे हैं और मम्मी अकेली रहेंगी.”

“ये कैसे हो सकता है रिया? अभी दो महीने पहले ही तो उन्हें हार्टअटैक हुआ था. उन्हें तो बहुत केयर की ज़रूरत है.”

“यही तो. मुझे भैया पर बहुत ग़ुस्सा आ रहा है. भाभी को छोड़ो, पर भैया को तो मम्मी का ख़याल होना चाहिए. मम्मी अकेली कैसे रहेगी?” रिया रुआंसी हो गई.

“रिया, तुम्हारी मम्मी अकेली कहां हैं? तुम रहोगी न उनके साथ. शेखर, तुम कल ही पूना जाकर रिया की मम्मी को ले आओ.”

“यहां?” रिया भौंचक्की रह गई.

“और नहीं तो क्या? वह यहीं रहेंगी, तुम दोनों के पास. रिया, जब तुम छोटी थी और तुम्हें उनकी ज़रूरत थी, तो वे तुम्हारे पास थीं. आज उन्हें बच्चों की ज़रूरत है तो तुम्हें उनके साथ होना चाहिए. क्यों शेखर?”

“हां मम्मी, आप बिल्कुल ठीक कह रही हैं. मैं कल ही मम्मी को लेने जाता हूं. भैया के वापस आने तक वे हमारे पास ही रहेंगी.”

रिया अपनी धुंधली आंखों से कभी शेखर को, तो कभी कमलाजी को देख रही थी. जो रिश्ता उसके लिए बोझ से ज़्यादा कुछ नहीं था, आज उसी रिश्ते ने उसके आंसुओं को अपनी हथेलियों पर ले लिया था. उसका मन आत्मग्लानि से भर उठा.

“मम्मी, शेखर मेरी मम्मी को तभी लेने जाएंगे, जब आप वादा करेंगी कि आप अब हमेशा हमारे साथ रहेंगी. हमारे साथ नहीं, बल्कि हम आपके साथ रहेंगे, क्योंकि ये घर आपका है और हम…” रिया आगे कुछ नहीं कह पाई और रोने लगी.

“मेरी बच्ची, हम सब हमेशा साथ-साथ रहेंगे.” उन्होंने रिया को गले से लगा लिया.

डॉ. ऋतु सारस्वत

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कहानी- आत्मतृप्ति (Short Story- Atmatripti)

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पूरी रात मैं सो न सकी. यही सोचती रही कि ऐसा क्या कर सकती हूं, जिससे ये सब लड़के राजू न बनने पाएं… तभी मुझे याद आया कि मेरी मौसी की लड़की ने मुंबई में एक प्लेसमेंट कन्सलटेंसी खोली है. सुबह उठते ही उसे फ़ोन मिलाया…

ऑफ़िस से घर पहुंचकर ताला खोलने ही जा रही थी कि देखा सामने गुप्ताजी के घर काफ़ी भीड़ है. सोचा, किसी से पूछूं आख़िर हुआ क्या है? तभी पड़ोसन मिसेज़ वर्मा दिखाई दे गईं.

मैंने उनसे पूछा, “गुप्ता जी के यहां ये भीड़ कैसी है?”

वे बोलीं, “अरे दीदी, उनके साथ एक बहुत बड़ा हादसा हो गया है. उनका बेटा था ना राजू, वो नहीं रहा.”

“अरे, कैसे? अभी दो-तीन दिन पहले ही तो भला-चंगा देखा था मैंने उसे.” मुझे सहसा विश्‍वास ही नहीं हुआ.

मिसेज़ वर्मा ने कहा, “क्या हुआ, ये तो हमें भी नहीं मालूम. पर कहते हैं कि उसका मर्डर हुआ है. चाकू से गोद-गोद कर मारा गया है उसे. वैसे भी आप तो जानती हैं दीदी, कितने दिनों तक वो बेरोज़गार था. फिर अचानक जाने कैसे ऐसी नौकरी मिली कि तीन सालों में क्या कुछ नहीं कर लिया उसने? क्या करता था, ये उसके परिवारवालों ने कभी बताया नहीं किसी को?”

इससे पहले कि मिसेज़ वर्मा की गुप्ता जी के परिवार पर टीका-टिप्पणी आगे बढ़ती, मैंने ताला खोला और घर के अंदर हो ली.

मन अनमना हो आया इस दुर्घटना की बात सुनकर. उम्र ही क्या रही होगी उसकी? 29-30 बरस. हाथ-मुंह धोया और सोचा गुप्ताजी के यहां हो आती हूं. बाहर जाकर देखा, तो उनके घर पर लोगों की भीड़ बहुत हो गई थी और पुलिस भी थी… मुझे लगा कि इस समय उनके यहां जाना उचित नहीं होगा. मैं अंदर आई और चाय बनाने लगी. जी इतना ख़राब हो आया था कि घर के अंदर अकेले चाय पीने का मन नहीं हुआ. चाय का प्याला लिए अपने बरामदे में आ बैठी. छोटे शहरों में घरों के बरामदे भी तो एक-दूसरे से लगे हुए ही होते हैं. मिसेज़ वर्मा अब तक बाहर ही थीं, मुझे देखा तो वो मेरे पास ही आ गईं और ख़ुद ही शुरू हो गईं.. “दीदी, दोपहर में पुलिस ले कर आई थी राजू की लाश. अब शायद पोस्टमार्टम के लिए ले गए हैं. अंतिम संस्कार तो कल ही हो सकेगा…”

बस, मैं इतना ही सुन सकी और उसके बाद की उनकी बातों का “हूं…हां” में जवाब देकर चाय का प्याला रखने के बहाने अंदर आ गई.

किसी काम में मन ही नहीं लग रहा था. रह-रह कर राजू का चेहरा मेरी आंखों के आगे घूम रहा था.

“नमस्ते दीदी!” मेरे ऑफ़िस से आते और जाते दोनों ही व़क़्त नुक्कड़ के पान वाले की दुकान पर ये आवाज़ मुझे रोक लेती थी. समय होता तो पूछ लेती, “कैसे हो राजू?” वरना नमस्ते का जवाब दे कर मैं अपने रास्ते हो लेती.

हमारे मोहल्ले के  नुक्कड़ पर बनी पान की दुकान ही तो अड्डा है इन शिक्षित बेरोज़गार युवाओं का. ये लोग दिन भर यहां बैठे रहते हैं, गप्पे मारते हैं, मसखरी भी करते हैं यहां से गुज़रने वालों के साथ. हमारे मोहल्ले के नौकरीपेशा पिताओं और भाइयों ने तो इन सभी नुक्कड़ पर बैठनेवाले लड़कों को बाक़ायदा आवारा और निकम्मा करार दे दिया है. दूर क्यों जाना? हमारे पड़ोसी शर्माजी तो जब-तब इन युवाओं पर बिफर पड़ते हैं. तब उनका ख़ास डायलॉग होता है, “काम-धाम कुछ है नहीं सालों को, इसलिए यहां खड़े-खड़े गरियाते रहते हैं.”

कोई तीन बरस पहले तक राजू भी इन शिक्षित बेरोज़गारों की जमात में शामिल था…

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अचानक मैं उठी और स्टडी टेबल पर आ गई. सोचा, जो आर्टिकल ऑफ़िस में अधूरा रह गया था उसे पूरा कर लूं. पेन हाथ में ले तो लिया, लेकिन ध्यान लिखने में नहीं लगा… विचारों में तो राजू ही घूम रहा था. उसने बी.कॉम किया था- फ़र्स्ट डिविज़न में. ये बात उसने मुझे ख़ुद ही बताई थी, वहीं नुक्कड़ वाली पान की दुकान पर. उस

दिन मैं ऑफ़िस से जल्दी लौट आयी थी. नुक्कड़ पर वही चिर-परिचित आवाज़ सुनाई दी, “नमस्ते दीदी!”

“कैसे हो राजू?” मैंने पूछा.

“ठीक हूं दीदी.”  कहता हुआ वह अपने दोस्तों के बीच से निकलकर मेरे सामने आ खड़ा हुआ.

“दीदी, आपसे कुछ कहना था.” झिझकते हुए उसने कहा.

“कहो.”

“दीदी, मैंने बी.कॉम किया है फ़र्स्ट डिविज़न में. काफ़ी तलाश के बाद भी मुझे कोई नौकरी नहीं मिल रही है. यदि आपके अख़बार में कोई जगह हो तो देखिएगा.”

“हां, ज़रूर. अभी तो कोई जगह खाली नहीं है, लेकिन मैं ध्यान रखूंगी. कुछ हुआ तो ज़रूर बताऊंगी.”

नुक्कड़ पर बैठने वाले इन बेरोज़गार लड़कों की बातें कई बार सुनी हैं मैंने- ‘इस बार एसबीआई की 40 पोस्ट निकली हैं, फॉर्म भरा कि नहीं तुमने.’ ‘अरे यार पिछली बार दो नंबर से ही चूक गया था. पिछले डेढ़ साल से पीएससी की भर्ती का फॉर्म ही नहीं निकला.’ ‘अरे! जल्दी कुछ करना होगा. घर पर बैठो तो पिताजी डांटते रहते हैं. कहते हैं सबको नौकरी मिल जाती है… तुझे ही पता नहीं, क्यों नहीं मिलती. सारे इंटरव्यू दिया कर… दिन भर तो नुक्कड़ पर बैठा रहता है आवारा लड़कों के साथ, तुझे नौकरी

क्या ख़ाक मिलेगी?’ यही सब बातें तो करते रहते हैं ये.

वैसे मोहल्ले भर के लोग इन्हें आवारा कहते मिल जाएंगे, लेकिन जब दुर्गा पूजा, गणेशोत्सव और दही हंडी का अवसर होगा तो ये बच्चे ही दौड़-दौड़ कर बड़े उत्साह से काम करते हैं. तब सभी इन्हें बेटा-बेटा कह कर बुलाते हैं. इन त्योहारों के जाने भर की देर है, फिर दोबारा इन्हें आवारा-बदमाश की जमात में शामिल कर दिया जाता है.

एक बार तो गुप्ताजी की पत्नी ख़ुद आई थीं मेरे पास. राजू की नौकरी को लेकर काफ़ी परेशान थीं. कहने लगीं, “नीलम, राजू के पापा तो उसकी नौकरी ना लगने की वजह से हमेशा ही उस पर चिल्लाते रहते हैं. मुझसे देखा नहीं जाता. वह अपनी तरफ़ से कोशिश तो करता ही रहता है, पर ज़रा तुम भी देखो ना… अपने ऑफ़िस में उसकी कोई छोटी-मोटी नौकरी ही लगवा दो.”

मैंने कहा, “भाभी! अभी तो हमारे यहां कोई जगह ख़ाली नहीं है, मैं ध्यान रखूंगी. उसके लायक कोई काम निकलातो ज़रूर बताऊंगी.”

…पर मैं जानती थी. हमारे यहां तो वैसे भी स्टाफ़ ज़रूरत से ़ज़्यादा है और कुछ समय तक कोई जगह खाली होने का कोई सवाल ही नहीं उठता. गुप्ता जी की पत्नी चली गयीं और बात आयी-गयी हो गई.

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तकरीबन महीने भर बाद वो दोबारा आयी थीं मेरे यहां. बड़ी ख़ुश थीं और हाथ में मिठाई का डिब्बा भी था. आते ही बोल पड़ीं, “नीलम! राजू की नौकरी लग गई है.”

“बधाई हो भाभी! कहां?”

“मुंबई की कोई कंपनी है, ज़्यादा तो मुझे पता नहीं.”

“काम कहां करेगा, क्या वो मुंबई जा रहा है?”

“15 दिन यहीं रहेगा और 15 दिन टूर पर.”

इसके बाद वो दुनिया-जहां की दूसरी बातें कर के चली गईं.

कुछ दिनों बाद जब मैं ऑफ़िस से घर लौटी तो मिसेज़ वर्मा बाहर ही मिल गईं. उन्होंने मुझे देखते ही पूछा, “दीदी, क्या आपको पता है कि राजू कहां नौकरी करता है?”

“मुंबई की कोई कंपनी है, क्यूं?”

“जानती हो दीदी, अपनी पहली ही कमाई से वह घर में नया टीवी, फ्रिज ले आया. और तो और, नई वाशिंग मशीन भी ख़रीद कर दे दी है अपनी मां को”

“अच्छा तो है.” मैंने मुस्कराते हुए जवाब दिया.

पूरे मोहल्ले में बात आग की तरह फैल गई. फिर क्या था, उड़ते-उड़ते मेरे कानों तक भी बात आ पहुंची कि राजू अंडरवर्ल्ड के लिए हथियार सप्लाई करने का काम करने लगा है. मुझे मोहल्लेवालों के दोगलेपन पर बड़ा अचरज हुआ. जब राजू बेरोज़गार था, तो उसे बेरोज़गार होने के ताने देते थे. जब नौकरी पर लगा है, तो भी इन्हें चैन नहीं है.

…लेकिन जिस तरह कहते हैं कि आग लगने पर ही धुआं निकलता है, उसी तरह जहां धुआं निकलता है, वहां ढूंढ़ो तो आग निकल ही आती है. एक शाम जब लौटी, तो पता चला कि गुप्ताजी के यहां पुलिस का छापा पड़ा है. मैं उसी मोहल्ले में रहती थी, सो ऑफ़िस के लिए इस ख़बर को हैंडल करने का ज़िम्मा मुझ पर ही आ गया. इस सिलसिले में पुलिस स्टेशन जाकर तहक़ीकात की, तो पता चला कि पुलिस को गुप्ताजी के यहां गैरलाइसेंसी हथियार रखे होने की सूचना मिली थी. हालांकि छापे में पुलिस के हाथ कुछ नहीं लगा था और मामला भी ख़त्म हो गया था, लेकिन इस घटना के बाद से गुप्ताजी का परिवार मोहल्ले के लोगों से कुछ कटा-कटा रहने लगा था.

ये सब सोचते-सोचते अचानक घड़ी पर नज़र गई…सवा दस बज गए थे. बाई जो खाना बना गई थी, उसे बेमन से गर्म किया और खाकर बिस्तर पर आ गयी. सुबह उठी तो सिर भारी हो आया था. जल्दी-जल्दी तैयार होकर 9 बजे ही ऑफ़िस पहुंच गयी. अपना अधूरा आर्टिकल पूरा किया और हाफ़-डे लेकर ऑफ़िस के पास ही बने पार्क में आ गयी.

मैं सोच रही थी कि यदि राजू अंडरवर्ल्ड से जुड़ा, तो उसने क्या बुरा किया. पढ़ने-लिखने के बाद भी जब हमारी सरकार युवाओं को रोज़गार न दे सके, ऊपर से लोग बेरोज़गारी के ताने दें… तो क्या हमारे युवा पथभ्रष्ट नहीं होंगे? पिछले तीन सालों में अपनी मां की सभी इच्छाएं पूरी कीं उसने, परिवार को ख़ुश भी रखा और बेरोज़गारी से मुक्ति मिली सो मुना़फे में… अगले ही पल लगा, इतना काला और अंधकारमय भविष्य सोच रही हूं मैं अपने देश के युवाओं का… लानत है मुझ पर! …पर मैं क्या करूं? ये सब सोचते-सोचते कब गुप्ताजी के घर आ पहुंची, पता ही नहीं चला. आगे के कमरे में गुप्ताजी अपने पुरुष रिश्तेदारों से घिरे बैठे थे. उनका चेहरा दुख से काला पड़ गया था. अंदर के कमरे में गुप्ताजी की पत्नी की आंखों के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. मैं उनके पास जा बैठी. उनके कंधे पर हाथ रखकर मैंने कहा, “धीरज रखिए भाभी!” …और सांत्वना के सारे शब्द मौन हो गए.

इस बार भी अख़बार के लिए राजू के केस को मैं ही हैंडल कर रही थी. शाम को पुलिस स्टेशन पहुंची, तो इंस्पेक्टर सूद ने बताया कि उन्हें कुछ सबूत मिले हैं, जो बताते हैं कि राजू हथियार सप्लाई करने के एक गिरोह से जुड़ गया था. वहीं के किसी दूसरे आदमी ने उसका मर्डर करवाया है. मामले की छानबीन जारी है.

…घटना को 6 माह बीत चुके थे. मानसपटल पर दूसरी घटनाओं की तरह इस हादसे के दाग़ भी धुंधले हो चले थे कि आज शाम अचानक मेरा दिल बैठ गया,

जब नुक्कड़ की पान की दुकान के पास से मैं गुज़र रही थी, तो फिर एक आवाज़ ने मुझे रोका…

“नमस्ते दीदी!”

मैंने मुड़कर देखा, तो उन बेरोज़गार लड़कों की मंडली से वर्माजी का बेटा नंदू मेरी ओर बढ़ा, समस्या उसकी भी वही थी… नौकरी की.

पूरी रात मैं सो न सकी. यही सोचती रही कि ऐसा क्या कर सकती हूं, जिससे ये सब लड़के राजू न बनने पाएं… तभी मुझे याद आया कि मेरी मौसी की लड़की ने मुंबई में एक प्लेसमेंट कन्सलटेंसी खोली है. सुबह उठते ही उसे फ़ोन मिलाया… उसे इस बात के लिए राज़ी किया कि हमारे छोटे से शहर में वो अपनी कन्सलटेंसी की एक ब्रांच खोले. उसे हौसला भी दिया कि मैं इसमें उसकी मदद करूंगी. अगले ह़फ़्ते ही वह आ गयी. तब तक मैंने उसके लिए जगह का इंतज़ाम कर लिया था. दस दिनों बाद ही हमने अपनी कन्सलटेंसी के ज़रिए बेरोज़गार युवाओं के आवेदन मुंबई और दिल्ली की कंपनियों को भेजने शुरू कर दिए.

कुछ दिन गुज़र गए… आज जब कोरियर ब्वॉय कुछ लड़कों के इंटरव्यू लेटर्स लाया, तो मेरी आंखों से ख़ुशी के आंसू छलक गए. इन बेरोज़गार बच्चों को एक दिशा देकर आज मैं तृप्त थी.

– शिल्पा शर्मा

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कहानी- दीदी (Short Story- Didi)

Didi, hindi short story

Didi, hindi short story

जब डायरी बंद की, तब मुझे एहसास हुआ कि मेरी आंखों से अश्रुधारा बह रही थी. दीदी, जो ऊपर से इतनी शांत दिखाई देती थी, अंदर से विचारों से इतनी उद्वेलित होगी. उसके चेहरे पर कभी भावों को आते-जाते नहीं देखा मैंने. मैं अनुमान ही लगाती रहती थी कि अब दीदी क्या सोच रही होगी. लेकिन आज उसकी डायरी सब कुछ कह गई थी मुझे.

सफलता और असफलता की आशा-निराशा के बीच मन में एक तूफ़ान चल रहा था. ऑपरेशन थियेटर की टिप-टिप होती लाल बत्ती कभी आशंकाओं को बढ़ा देती, तो कभी दिलासा देती प्रतीत होती. नर्सों के पैरों की आहट, दिल की धड़कनों के साथ मिलकर चलने लगती. ऑपरेशन थियेटर का कांच पारदर्शी होते हुए भी हरे पर्दों से ढंका हुआ… लाख आंखें गड़ाने पर भी कुछ भी दिखने की कोई संभावना नहीं. मेरे परिवार के दो जीवन डॉक्टरों के पास प्रयोग के लिए पड़े थे. मेरे पापा और मेरी इकलौती दीदी नीना.
पिछले दो सालों से चल रही कशमकश आज मंज़िल तक पहुंचने के प्रयास में थी. दो साल पहले का वो दिन, मुझे आज भी याद है जब महीनों पुराना दर्द झेलते हुए पापा के दोनों गुर्दों को डॉक्टरों ने बेकार साबित कर दिया था.
कुछ दिनों तक तो पूरे परिवार में विचारशून्यता की स्थिति बनी रही. परिवार में मैं और दीदी थी. भैया तो विदेश में पढ़ाई कर बस, वहीं का ही होकर रह गया था. वहां की यंत्रवत् ज़िंदगी का एक हिस्सा बनकर, जहां न कोई एहसास होता है, न भावनाएं.
भैया को पत्र डालकर सूचित किया, तो यंत्रवत् जवाब आया कि पापा को अमेरिका भेज दो, वहां इलाज हो जाएगा. ये तो जैसे एक औपचारिकता हुई, जिसमें तथ्य तक पहुंचने का प्रयास नहीं किया गया. न पूछा था तबियत कैसी है? न ही ये जानने का प्रयास किया कि पापा के अमेरिका आने का ख़र्च और वहां जाने का प्रबंध कौन करेगा?
फिर मम्मी का जोश उभरकर सामने आया. मम्मी ने पापा के इलाज का सारा भार अपने कंधों पर ले लिया. कभी दिल्ली, कभी अहमदाबाद, तो कभी मुंबई. इलाज के सिलसिले में मम्मी पापा को लेकर चक्कर लगाती रहीं. मैं और दीदी हमेशा अकेले रहते थे, पड़ोसियों के सहारे.
फिर एक दिन निराशाजनक चेहरा लिए मम्मी टैक्सी से उतरीं. पापा को हल्का-सा सहारा देते हुए मम्मी की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली, लेकिन मम्मी के मुंह में न तो शब्द थे, न सिसकियां. मैं और दीदी तो समझ ही नहीं पा रहे थे कि क्या हुआ.
पापा मुंह-हाथ धोने को उठे तो मम्मी ने धीरे-से हमें बताया, “पापा के दोनों गुर्दे ख़राब हो गए हैं और इलाज भी शायद…” आगे के शब्द जैसे बिना बोले ही समझ में आ गए थे.

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“लेकिन मम्मी, गुर्दा तो बदल सकता है न?” मैंने इतनी मासूमियत से कह दिया जैसे कोई पुर्जा बदलना हो.
“लेकिन बेटा, इतना आसान नहीं है, जितना तुम सोच रही हो.”
“मैं दूंगी गुर्दा मम्मी, मैं दूंगी…” मैं चिल्ला पड़ी. मेरे भोलेपन पर उस समय मम्मी हंस भी नहीं पाई थीं.
फिर एक नया सिलसिला शुरू हुआ था गुर्दा देने की ज़िद का. परिवार के सदस्यों के अलावा और देता भी कौन? परिवार के सदस्यों के नाम पर थी तो बस मम्मी, मैं और नीना दीदी.
इस बार पापा का चेकअप करवाने मम्मी अहमदाबाद गईं तो हम दोनों को भी साथ ले गईं. डॉक्टर ने पूछा, “गुर्दा कौन देगा?” तो मैं और मम्मी एक साथ बोले ‘मैं’, जबकि दीदी ने आगे बढ़कर अपनी तरफ़ इशारा ही किया था. मम्मी की प्रौढ़ावस्था देखकर डॉक्टर उनके गुर्दा देने पर सहमत नहीं हुए और हम दोनों बहनों को अगले दिन सुबह बिना कुछ खाए-पीए आने को कहा. हमारी मम्मी तो किंकर्त्तव्यविमूढ़-सी हो गई थीं. करतीं भी क्या? एक तरफ़ तो पापा की ज़िंदगी का सवाल था और दूसरी तरफ़ उनके शरीर के दो टुकड़े थे.
धर्मशाला के उस छोटे-से कमरे में हम चार प्राणियों ने चुपचाप रात बिताई जैसे कुछ घटित ही नहीं हो रहा, जबकि दिलों के भीतर कितना भयंकर तूफ़ान चल रहा था यह मेरा नवपरिपक्व मन अच्छी तरह जानता था. मम्मी की नज़र कभी पापा को, तो कभी हमें देखती और पापा… उन्हें तो हम दोनों को देखकर ही शायद जीने की ललक पैदा होती होगी. मैं सोच रही थी यदि मेरा गुर्दा पापा के काम आएगा तो मैं धन्य हो जाऊंगी, शायद ऐसे ही भाव दीदी के मन में भी थे.
डॉक्टर ने चेकअप किया और यह अवसर दीदी के हिस्से में गया. मुझे लगा, जैसे मुझसे कोई बहुत बड़ी ग़लती हो गई है. जो भी हो, अब हमें अगले मंगलवार को होनेवाले ऑपरेशन के लिए तैयार करना था अपने आपको. ऑपरेशन एक नहीं, दो थे. एक पापा का और एक नीना दीदी का. दीदी का गुर्दा निकालकर पापा को जो लगाना था.
ऑपरेशन थियेटर का दरवाज़ा खुला तो एक नर्स बाहर निकली. मैं भागकर उसके पास गई, तो उसने हाथ से धैर्य रखने का इशारा किया और चली गई. कुछ देर बाद ही डॉक्टरों की पूरी टीम बाहर निकली. उनमें से एक डॉक्टर ने मम्मी से कहा, “चिंता की कोई बात नहीं है, सब ठीक हो जाएगा.” तो राहत की सांस ली थी हमने.
लगभग एक घंटे बाद पापा और दीदी को वार्ड में लाया गया. दोनों को पास-पास ही बिस्तर दिया गया. पहले दीदी की आंखें खुलीं, तो पहला ही सवाल था, “पापा ठीक हैं?”
मैं झटपट आगे बढ़ी और कहा, “हां… हां… बिल्कुल ठीक हैं. वो देखो.” मैंने साथवाले बिस्तर पर लेटे पापा की ओर इशारा किया. अधमुंदी आंखों से दीदी ने पापा को देखा, मानो अपने पूरे होते सपनों को पूरा होते देख रही हों और उन्होंने फिर आंखें मूंद लीं.
पापा ने भी अपनी अधखुली आंखों में बुदबुदाया था, “नीना कहां है?”
और मम्मी ने भी नीना दीदी की ओर इशारा करके बताया था.
पंद्रह दिन बाद पापा और दीदी को कुछ हिदायतें देकर डॉक्टरों ने छुट्टी दे दी और हम अपने शहर वापस लौट आए, कुछ खोकर और कुछ लेकर.
धीरे-धीरे दीदी और पापा सामान्य होते जा रहे थे. पापा जब भी नीना दीदी की ओर देखते तो भाव-विभोर हो जाते. अपने भाव वे शब्दों में नहीं बांध सकते थे.
कई बार मुझे ऐसा लगता था कि दीदी के प्राण पापा में दौड़ रहे हैं और पापा, दीदी को जी रहे हैं. चार महीने गुज़र चुके थे और पापा ने दीदी के प्राणों को पूरी तरह अपना लिया था.
ऑपरेशन के ठीक छह महीने बाद अचानक ही एक शाम को पापा की तबीयत ख़राब हो गई. जब तक भागदौड़ की, तब तक पापा हमें छोड़कर जा चुके थे. विश्‍वास ही नहीं हो रहा था कि पापा हमें छोड़कर जा सकते हैं. ऐसा लग रहा था, पापा सो रहे हैं, क्योंकि रात के सन्नाटे में सारा शहर सो रहा था और… दीदी के प्राण भी सो गए थे.
रोने की सीमा के बाद एक ग़म पीना पड़ा हम सभी को, जिसे पीने से आंसू आंखों से नहीं निकलते, बल्कि सीधे दिल पर गिरकर उसे भिगोते हैं. गुनगुनाती हुई दीदी चुप हो गई थी और मम्मी तो जैसे शांति की प्रतिमा ही बन गई थीं, स्वयं को तटस्थ बनाने की कोशिश में.
फिर शुरू हुआ समस्याओं का सिलसिला. एम.ए. की पढ़ाई स्थगित करके दीदी ने बी.एड. करने का फ़ैसला किया. नए माहौल में स्वयं को ढालने में क़रीब एक साल लगा हमें. दीदी का बी.एड. पूरा हुआ और मेरा बी.ए. यह समय हमारे लिए आर्थिक और मानसिक कशमकश का रहा. हम तीनों ने स्वयं को ऐसे सिकोड़ लिया था मानो, अपनी भावनाओं के आदान-प्रदान की क्षमता को भी नष्ट कर दिया हो.
दीदी ने प्राइवेट स्कूल में अध्यापिका की नौकरी कर ली थी. फिर आर्थिक संबल से मिले आत्मविश्‍वास की धूप से जब हमारे मन सिंकने लगे तो हमारे सिकुड़े मन खुलने लगे. अब हम एक-दूसरे से चर्चा करने लगे थे.

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व्यावहारिकता की दुनिया में लौटे तो मम्मी दीदी की शादी की बात को ले बैठीं, पर दीदी ने बड़ी दृढ़ता से मना कर दिया और उल्टा मेरी शादी का प्रस्ताव रखा. लेकिन मैं… दीदी से छोटी मैं, यह कैसे मान सकती थी? अब मैं भी परिपक्व थी. बी.एड. में प्रवेश ले ही लिया था. बस, पूरा होते ही नौकरी कर सकती थी.
मैंने दीदी और मम्मी को तर्क भी दिया था. लेकिन दीदी की आंखों में आशंका के जो अस्पष्ट शब्द थे, वो मैं पढ़ तो नहीं पाई थी, लेकिन उनकी बनावट से उनके भावों को ज़रूर समझ गई थी.
कशमकश के इस दौर में लड़के देखने आते रहे. हम दोनों ही विवाह योग्य थीं, इसलिए दोनों पर ही सबकी नज़रें पड़ती थीं. औपचारिक या अनौपचारिक रूप से देखते हुए न जाने कब विनय ने मुझे पसंद कर लिया था. विवाह की रस्में न चाहते हुए भी यंत्रवत् निभा गई थी मैं… और अपनी मम्मी और दीदी से अलग हो गई थी.
अब दीदी और मम्मी अकेले ही जीवन व्यतीत किए जा रही थीं. दीदी के पास जाने कौन-सा उद्देश्य था. मैं दबी ज़बान में दीदी से शादी की बात करती, तो दीदी की चुप्पी जैसे मुझसे प्रश्‍न करती… “क्या तुम्हारी नज़र में ऐसा कोई लड़का है जो…” दीदी के मन की बात मैं भी जानती थी, लेकिन कुछ न कर पाने को मजबूर थी. क्या कोई लड़का यह बात जानकर दीदी को स्वीकार कर पाएगा कि दीदी का एक ही गुर्दा है?
मैं एक बच्चे की मां बन चुकी थी, लेकिन उसकी हर किलकारी मुझे अपराधबोध से भर देती.
फिर एक दिन हमारी दूर की बुआजी ने अपने किसी रिश्तेदार के लिए शादी का प्रस्ताव भेजा. इस बार मैं मौक़ा नहीं खोना चाहती थी. मैं और विनय इंदौर जाकर लड़का देख आए थे. मध्यमवर्गीय परिवार का लड़का प्राइवेट कंपनी में कार्यरत था. इस बार मैं दीदी से बड़ी बन गई थी और मम्मी को घर-वर के बारे में बताकर संतुष्ट कर दिया था. मैं नहीं चाहती थी कि इस बार हम किसी छोटे-से कारण से रिश्ता अस्वीकार कर दें. ‘चट मंगनी पट ब्याह’ का प्रस्ताव रखा. दीदी को इस बार बोलने का अवसर ही नहीं दिया. दीदी भी शायद सहमत थी.
मैंने और विनय ने दौड़-धूपकर शादी का सारा काम किया. दीदी को विदा करके ही दम लिया. दीदी की विदाई के बाद मैं घर समेटने में मम्मी की मदद कर रही थी कि दीदी की अलमारी में मुझे एक डायरी नज़र आई. उत्सुकतावश खोल बैठी तो पूरी पढ़कर ही दम लिया.
डायरी पापा को गुर्दा देने के बाद ही लिखी गई थी. शुरू के पन्नों में प्रसन्नता के भाव नज़र आ रहे थे, जहां पापा को गुर्दा देकर दीदी बहुत ख़ुश थी. एक जगह तो दीदी ने लिखा था, “मेरे शरीर में लगे टांकों में उठती टीस से मैं कभी आहत नहीं होती हूं, बल्कि ऐसा लगता है कि मैं पापा के दर्द को बांट रही हूं. बहुत अच्छा लगता है, सचमुच.”
फिर एक जगह लिखा था, “उस दिन जब नर्स ने मेरे टांकों को स्पिरिट से साफ़ किया तो मुझे वो दर्द अपना नहीं लगा, बल्कि पापा का दर्द लगा…” आगे एक जगह लिखा था- “सोचती हूं कि मुझमें बड़प्पन कब से आ गया?”
“पापा को जीते देखकर बहुत ख़ुश होती हूं.”
“पापा मुझे देखकर ख़ुश होते हैं.”
यानी पापा के जीने तक सारी डायरी पापा के इर्द-गिर्द ही थी. फिर पापा की मौत… काफ़ी दिनों तक कुछ नहीं लिखा था दीदी ने. फिर शुरू किया तो निराशाजनक शब्दों से- “पापा नहीं मरे, मैं मर गई हूं. मेरे शरीर का हिस्सा पापा को ज़िंदा नहीं रख पाया. दिल करता है अपने दूसरे गुर्दे को भी काट फेंकूं.’
फिर बहुत-सी ऐसी बातों के बाद दीदी ने लिखा था, “रीना और मम्मी आजकल शादी की बात करती हैं मुझसे. हंसी आती है मुझे उनकी बातों पर. भला, मुझसे कौन करेगा शादी? सारी दुनिया को पता है मेरे गुर्दा देने की बात. न करे शादी कोई, लेकिन ग़म तो इस बात का है कि पापा भी नहीं रहे. यदि वो रह जाते तो मेरा त्याग सार्थक हो जाता.”
जब डायरी बंद की, तब मुझे एहसास हुआ कि मेरी आंखों से अश्रुधारा बह रही थी. दीदी, जो ऊपर से इतनी शांत दिखाई देती थी, अंदर से विचारों से इतनी उद्वेलित होगी. उसके चेहरे पर कभी भावों को आते-जाते नहीं देखा मैंने. मैं अनुमान ही लगाती रहती थी कि अब दीदी क्या सोच रही होगी. लेकिन आज उसकी डायरी सब कुछ कह गई थी मुझे.
इन विचारों की दुनिया से बाहर आई तो एकदम आशंकित हो उठी कि कहीं ये डायरी जीजाजी के हाथ न लग जाए. उनको हमने इस बात का खुलेआम ज़िक्र नहीं किया. दीदी के भावों का कहीं पता चल गया तो कहीं वे भी पश्‍चाताप से न भर उठें. मैंने वो डायरी अपनी अटैची में डाल ली.
दो दिन बाद दीदी हम लोगों से मिलने आई तो गले लगकर रो पड़ी. मैंने दीदी से पूछा, “सब ठीक है न ससुराल में?”
“हां… हां…”
“और जीजाजी?”
“उनके बारे में तो पूछ ही मत, सही अर्थों में इंसान हैं.” सुनकर मैंने राहत की सांस ली.
चाय-पानी के दौर के बाद मैं एकांत कोना ढूंढ़ने लगी, जहां दीदी से कुछ बात कर सकूं. मौक़ा पाते ही मैंने दबे स्वर में कहा, “दीदी, वो डायरी… आपकी… सोचती हूं कहीं छुपा दूं या फाड़ दूं.”
“हट पगली, क्या ज़रूरत है?”
“कहीं जीजाजी को पता न चल जाए.”
“अरे नहीं, वही तो कह रही थी मैं. पहली मुलाक़ात में मैं सोच रही थी कि इस बारे में बात करूं या नहीं. फिर तुम्हारे जीजाजी ने ही शुरुआत की… तुम तो बहुत महान हो…”
“कैसे?” मैं भौंचक्की रह गई थी.
“इतना महान कोई नहीं होता नीना. मुझे बुआजी ने सब कुछ बता दिया है. इसी बात पर तो तुम्हें पसंद किया है मैंने. त्याग की मूर्ति को कौन नहीं अपने घर पर स्थापित करना चाहेगा? और मैं तो जैसे भावविह्वल हो गई थी ऐसा पति पाकर.” दीदी भावुकता में अनवरत बोले जा रही थी.
“ओह दीदी, मैं तो सोच रही थी…” और मैं दीदी के गले से लिपट गई. मैं दीदी के भावों को पढ़ने का प्रयास कर रही थी.
ऐसा लग रहा था, कोहरा साफ़ हो गया है और दीदी साफ़ परदे पर अपनी ज़िंदगी की संवरती तस्वीर देख रही है.

     संगीता सेठी

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कहानी- प्रारब्ध (Short Story- Prarabdh)

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जब छोटी-सी दामिनी अपने नन्हें हाथों में पापा का रूल लेकर कलेक्टर बन अकड़कर घूमती थी, तो पापा स्नेह से अपनी बिटिया को गोद में उठा लेते थे. उस वक़्त उनकी आंखों में भी वह यही चमक देखती थी. दामिनी के पाले सपने पापा ने अपनी आंखों में बसा लिए थे. फिर जाने कैसे और कब उसके सपने पापा के सपनों से अलग हो गए. क्या वास्तव में उसके सपनों को सहेज पापा ने एक भूल की थी? उसे इस मुक़ाम तक पहुंचाने के लिए पापा द्वारा की गई सख़्ती क्या क्षमा योग्य नहीं है?

कोई नहीं पापा, मैं अविरल से शादी कभी नहीं करूंगी. अविरल तो क्या, मैं किसी से भी शादी नहीं करूंगी. मेरी शादी का ख़्याल आप अपने दिल से निकाल दीजिए. मेरी ज़िंदगी में पलाश की जगह और कोई नहीं ले सकता.” आज दामिनी को अपने ही शब्द अंतर्मन में गूंजते से प्रतीत हो रहे थे. तभी पलाश का फ़ोन आ गया, “दामिनी, आज तुम आ रही हो न? अंजलि तुम्हारा बेसब्री से इंतज़ार कर रही है.”
‘और तुम पलाश?’ वह पूछना चाहती थी, लेकिन पूछ नहीं पाई. अरसे बाद पलाश से मुलाक़ात हुई भी तो कैसे? कोई कहां जानता था कि पलाश, जिसे उसने इतने जतन से अपने हृदय में यूं संजोए रखा था, वह इस तरह मिलेगा. बार-बार आंखों के सामने एक स्कूल का जलसा नाच रहा था, जिसमें पुरस्कार वितरण के समय पुरस्कार लेने आई एक प्यारी-सी बच्ची ने अनायास ही उसका ध्यान खींच लिया था. उसे ड्रॉइंग कॉम्पटीशन में छह साल के वर्ग में प्रथम पुरस्कार मिला था. दामिनी उसके हाथ में पुरस्कार थमाते हुए पूछ बैठी, “आप बड़े होकर क्या बनोगे?”
“परी मम्मी की तरह सिंगर…” उसके इस जवाब पर सब हंस पड़े. वह उस बच्ची से डॉक्टर, इंजीनियर जैसे जवाब की अपेक्षा कर रही थी, जो अक्सर बच्चे देते हैं. उसके जवाब की वह कायल हो गई और पूछ बैठी कि इस भावी सिंगर के पैरेंट्स कौन हैं, वो देखना चाहती है. तभी भीड़ से दो लोग उसकी ओर आते नज़र आए. उस प्यारी-सी बच्ची की मां उसी की तरह ख़ूबसूरत थी और बगल में ये पलाश? दामिनी की धड़कनें रुक-सी गईं. भीड़ और उसका शोर मानो गायब से हो गए थे.
“दामिनीजी, ये इस बच्ची के पैरेंट्स…” तीन-चार बार बताने के बाद मानो वर्तमान में ज़बरदस्ती लाकर पटक दी गई हो. दामिनी ने तुरंत वस्तुस्थिति व अपनी पोज़ीशन का ख़्याल कर संभलते हुए उससे पूछा, “ये परी मम्मी क्या होता है? ज़रा मुझे भी तो बताओ.” बच्ची इठलाती हुई बोली, “मम्मी जादू की छड़ी से घर के, मेरे और पापा के सारे काम कर देती हैं. पापा कहते हैं कि मेरी मम्मी परी हैं, तभी तो मैं जो बोलती हूं, मम्मी झट से दे देती हैं, इसलिए वो हुई न मेरी परी मम्मी. मैं भी उनकी तरह सिंगर बनना चाहती हूं.” छोटी-सी वैभवी की प्यारी-प्यारी बातों ने सबको ख़ूब हंसाया, पर दामिनी के दिल में कुछ दरक-सा गया था. सभी अभिभावकों से बातचीत के दौरान उसकी निबद्ध नज़रें पलाश पर ही लगी रहीं.
“कैसी हो दामिनी? तुम्हें इस मुक़ाम पर देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है. अंजलि, ये दामिनीजी हैं, हम दोनों एक साथ कॉलेज में थे.” पलाश के मुंह से निकला ‘जी’ शब्द दामिनी को खल गया. उसके दिल में बसे और सामने खड़े पलाश में कोई साम्य न था. बातों ही बातों में अंजलि और पलाश ने उसे घर आने का न्यौता दिया, तो पसोपेश में पड़ी दामिनी चाहते हुए भी मना न कर पाई या शायद पलाश के दिल में दबी राख को कुरेदकर बची चिंगारी की आंच को देखना चाहती थी.
वॉर्डरोब से साड़ियां ढूंढ़ने में मशक़्क़त करनी पड़ी. सब एक जैसी बॉर्डरवाली सूती साड़ियां.
“मैडम कोई आया है?”
“आ-हां… उन्हें बिठाओ, मैं आती हूं.” उ़फ्! क्या पहनूं आज समझ में नहीं आ रहा है. दामिनी के दिल की धड़कन की गति वैसी ही थी, जब वह कॉलेज कैंटीन में अपने जन्मदिन पर पलाश का दिया गुलाबी सूट पहनकर उसका इंतज़ार कर रही थी.
“पिंक कलर का सूट कैसे पहन लिया तूने, ये तो तुझे बिल्कुल पसंद नहीं है न?” संजना के पूछने पर वह मुस्कुरा दी थी. कैसे बताती कि यह पलाश का फेवरेट कलर है.
दामिनी का हाथ एक गुलाबी साड़ी की ओर बढ़ा ही था कि वह एक अजीब-से संकोच से घिर उठी और उसके हाथ अनायास ही एक सुंदर-सी रेशमी साड़ी की ओर बढ़ गए. दामिनी तैयार हुई, तो कुछ देर ख़ुद को निहारती रही. उसे याद आया जब जन्मदिन पर अविरल ने उसे यही साड़ी देते हुए अर्थपूर्ण ढंग से कहा था, “दामिनी, मुझे तुम्हारी पसंद के बारे में नहीं मालूम है, पर इतना जानता हूं कि तुम इसे पहनकर बहुत अच्छी लगोगी और तुम्हें इसमें देखकर मुझे बहुत अच्छा लगेगा.” निर्विकार भाव से दामिनी ने उसे स्वीकार तो कर लिया, पर वह इसे कभी पहन नहीं पाई, लेकिन आज अचानक पलाश की पसंद का रंग न पहन उसने अविरल की दी साड़ी कैसे पहन ली, वो ख़ुद भी नहीं समझ पाई. अतीत और वर्तमान में हिलोरें लेती दामिनी तैयार हो बाहर आई, तो हाथों में लिए कुछ काग़ज़ों में दृष्टि गड़ाए पलाश नज़र आया. दामिनी को सामने देख, वो चौंककर खड़ा हो गया.

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“सॉरी दामिनी, मुझे आने में देर हो गई. दरअसल, परसों एक सेमिनार है. उसके लिए एक प्रोजेक्ट तैयार करना है, उसमें मैं ऐसा डूब गया कि समय का पता ही नहीं चला.” पलाश की सहज बातें दामिनी की धड़कनों की रफ़्तार को थाम गईं. कुछ ही देर में दोनों पलाश के घर पहुंच गए. दामिनी ने 4-5 घंटे उसके यहां बिताए.
अंजलि और वैभवी की स्नेहसिक्त बातों से दामिनी प्रभावित हुए बिना न रह पाई. अंजलि ने खाना बहुत अच्छा बनाया था. घर के रख-रखाव को देख कहा जा सकता था कि वैभवी की मम्मी वास्तव में परी मम्मी थी. पलाश अपनी पत्नी और बेटी के प्रति पूरी तरह समर्पित था. दामिनी के भीतर अभी भी बहुत कुछ बह रहा था. जाने क्यों पलाश उसे जाना-पहचाना नहीं लगा. पूरे समय वह अपनी बेटी वैभवी की उपलब्धियां गिनाता रहा. उसके छोटे-छोटे सर्टिफ़िकेट पलाश ने बहुत ही अच्छी तरह से संभालकर रखे थे. बातों-बातों में उसने बताया कि अंजलि गाती बहुत अच्छा है. बैठक के कोने में रखा तानपुरा भी मानो उनके जीवन में बिखरे सुरों को बयां कर रहा था. चारों ओर पलाश का वर्तमान अंजलि और वैभवी के रूप में अपने पूरे अस्तित्व के साथ खड़ा था.
अतीत का एक कतरा भी शेष न था. दामिनी घर आकर निढाल-सी आंखें मूंदे सोफे पर ही लेट गई. अतीत अनेक सवालों के साथ सामने आकर खड़ा हो गया. दामिनी बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि की थी. आंखों में सदा ही आकाश कुसुम तोड़ लाने के सपने मचलते, तभी उसकी मुलाक़ात पलाश से हुई. दिल के तार उससे कुछ यूं बंधे कि पता ही न चला. आंखों में पले पूर्व स्वप्न कब तिरोहित हो गए, वो जान ही न पाई. पलाश के प्यार की सुगंध कस्तूरी की भांति बयार को महका चुकी थी.
उस दिन पापा की कड़कदार आवाज़ दिल को दहला गई थी, “सरिताजी, पूछिए अपनी लाडली से, शाम को किसके साथ थी?”
मां हैरान-सी मुंह देखती रह गई, “दामिनी, तुम तो अपनी सहेली के यहां पढ़ने गई थी न?”
दामिनी आंखें चुराते हुए बोल पड़ी, “पापा, पलाश नाम है उसका, शादी करना चाहता है मुझसे.”
“करता क्या है?”
“मेडिकल की पढ़ाई कर रहा है.”
“ख़ुद तो मेडिकल की पढ़ाई कर रहा है और तुझे अपने लक्ष्य से भटका रहा है. बेवकूफ़ लड़की, क्यों अपने भविष्य को ध्वस्त कर रही है?”
“पापा, पलाश बहुत अच्छा लड़का है. आप एक बार…” बात आधी हलक में ही अटक गई, पापा के झन्नाटेदार थप्पड़ के साथ घर में नीरवता छा गई.
“पापा, आप अपना सपना मुझ पर क्यों लादना चाहते हैं?” दामिनी के शब्द पापा के सीने पर नश्तर से चला गए. उन्होंने चुप्पी साध ली थी. ब्लड प्रेशर पहले से ही था. मां की चिंता और उनकी मिन्नतें आख़िर में दामिनी को पिघला गईं.
“हमेशा इंतज़ार करूंगा.” इन शब्दों के साथ मेडिकल के आख़री साल के ख़त्म होते ही पलाश बैंगलुरु चला गया. पर पलाश कहां उसका इंतज़ार कर पाया था? पलाश की शादी की ख़बर आई भी तो उस दिन, जिस दिन दामिनी को अपने आईएएस में सिलेक्ट होने की ख़बर मिली थी. घर पर जश्‍न की स्थिति थी. दामिनी पापा से नाराज़ थी. उन्होंने अपनी ज़िद उसके प्यार को रौंदकर पूरी की थी.
“मम्मी, मैंने पापा का सपना पूरा कर दिया है. अब मुझसे कोई और उम्मीद आप लोग मत रखना.” मां उखड़ गई थी, “दामिनी, पापा ने तुम्हारा भविष्य बनाया है, कोई गुनाह नहीं किया. तुम्हारे जीवन को एक दिशा दी है.”
“तो अब उसी दिशा में बहेगा मेरा जीवन.” दामिनी के प्रस्तर शब्द घायल कर गए थे. पापा उसे अक्सर समझाते, “हर चीज़ का समय होता है. जो मुक़ाम तुम्हें मिला है, वो कितने लोग पाते हैं. बचपन से ही तुम कुछ बड़ा करना चाहती थी. पढ़ने-लिखने और करियर बनाने की उम्र में तुम शादी के चक्कर में पड़ गई. उस वक़्त आवेश में पलाश के साथ जीवन बिताने का किया गया तुम्हारा फैसला तुम्हें ग़लत साबित करता. बचपन में तुम्हारे द्वारा देखे गए अधूरे सपने, कभी न कभी तुमसे हिसाब मांगते, तो क्या तुम चैन से रह पाती? अब जब तुम्हारा करियर बन चुका है, तो गृहस्थ जीवन अपनाकर अपनी ज़िंदगी को संपूर्णता प्रदान करो. वैसे यदि पलाश चाहता, तो तुम्हारा इंतज़ार कर सकता था.” पापा की ये बातें आग में घी डालने का काम करतीं.

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‘पापा, पलाश आपकी वजह से मुझसे दूर हुआ है. मैं आपको कभी माफ़ नहीं करूंगी.’ दामिनी बोल तो न पाती, पर अपने आचार, व्यवहार से जता देती. पापा के भीतर बेटी के प्रति किए गए अन्याय से ग्लानि उत्पन्न होने लगी थी. वे अब कम ही बात करते, लेकिन मां तो मां ही थीं. वे अपने मान-अपमान की चिंता किए बगैर बेटी को मनाने का कोई प्रयास नहीं छोड़तीं. उन्होंने दामिनी के ब्याह की तैयारियों में कपड़ों से आलमारियां और बक्से भर लिए थे.
“ये हरी साड़ी तुम पर बहुत फबेगी और ज़रा ये गोटा का काम तो देख, कितना सुंदर है. ये जोधपुर से करवाया है.” दामिनी उनकी उन बातों से चिढ़कर स्वयं को फ़ाइलों में डुबो लेती. सूती बॉर्डरवाली साड़ियां ही उसकी पहचान बन चुकी थीं.
तभी दामिनी का तबादला सूरत में हो गया, जहां उसकी मुलाक़ात अविरल से हुई. अविरल को दामिनी की सादगी और कर्मठता भा गई थी. मम्मी-पापा को सरल स्वभाव का अविरल भा गया था, लेकिन दामिनी भावशून्य-सी पलाश के इर्द-गिर्द ही सिमटकर रह गई थी.
आज जब परिस्थितियों ने पलाश से उसे मिलवाया, तो उसे महसूस हुआ कि इस लंबे अंतराल में बहुत कुछ बदल चुका है. पलाश समय के साथ आगे बढ़ चुका था. अपने परिवार और कार्यक्षेत्र में रम चुका था, पर दामिनी ठहरे हुए पानी की तरह वहीं रुकी हुई थी. यदि आज पलाश से मुलाक़ात नहीं होती, तो क्या वो पूरा जीवन यूं ही भ्रमित गुज़ार देती? पलाश ने ज़िंदगी के नए रंग अपना लिए थे, पर वो अपने जीवन को बेरंग किए बैठी थी.
तभी दामिनी को पलाश के यहां बिताए लम्हों में याद आया कि किस तरह पलाश ने अपनी बेटी वैभवी की आइस्क्रीम खाने की ज़िद पर सख़्ती बरती थी. पलाश के इस व्यवहार से असहज दामिनी बोल पड़ी, “इतनी ज़िद कर रही है, तो थोड़ी-सी देने में क्या हर्ज है?”
“अरे नहीं दामिनी, तुम नहीं जानती, इसे टॉन्सिल है. ठंडा बिल्कुल मना है इसे. गला ख़राब हो गया, तो हाई फीवर हो जाता है. दो हफ़्ते बाद एक सिंगिंग कॉम्पटीशन में भाग ले रही है, जिसके लिए इसने बहुत मेहनत की है.” उस वक़्त पलाश की आंखों में बेटी को सफल देखने की एक चमक-सी उभर आई थी. कुछ ऐसी ही चमक वो अपने पापा की आंखों में भी देखती थी. जब छोटी-सी दामिनी अपने नन्हें हाथों में पापा का रूल लेकर कलेक्टर बन अकड़कर घूमती थी, तो पापा स्नेह से अपनी बिटिया को गोद में उठा लेते थे. उस वक़्त उनकी आंखों में भी वह यही चमक देखती थी. दामिनी के पाले सपने पापा ने अपनी आंखों में बसा लिए थे. फिर जाने कैसे और कब उसके सपने पापा के सपनों से अलग हो गए. क्या वास्तव में उसके सपनों को सहेज पापा ने एक भूल की थी? उसे इस मुक़ाम तक पहुंचाने के लिए पापा द्वारा की गई सख़्ती क्या क्षमा योग्य नहीं है?
नहीं, क्षमादान की पात्र, तो वह स्वयं है, जिसने पलाश के लिए अपने मम्मी-पापा का दिल दुखाया.
जाने क्यों पापा को यादकर उसका कंठ अवरुद्ध-सा होने लगा. आख़िर कब तक पलाश को न पाने की सज़ा वह ख़ुद को और अपनों को देती रहेगी? कब तक वह अविरल की स्वयं के प्रति अनुरक्ति को यूं ही अनदेखा करती रहेगी और मम्मी के सपनों को सपना ही रहने देगी? नहीं, पलाश को खोने की सज़ा वह स्वयं को नहीं देगी. पलाश से मिलने के बाद आज उसे एहसास हुआ कि वह किस भ्रम में जी रही थी.
अनायास दामिनी का हाथ फ़ोन की ओर बढ़ गया, भावावेश में वह पापा को फ़ोन मिला बैठी. फ़ोन मम्मी ने उठाया था, “हेलो मम्मी, मैं दामिनी, पापा हैं क्या?” मम्मी ने आशंका से भरकर रिसीवर पापा को पकड़ा दिया था.
“पापा, कैसे हैं आप?” इतना बोलते ही आंखें पनियां आई थीं. रुलाई रोकने की कोशिश में गले में कांटे-से चुभने लगे थे. पापा चुप थे, पर उनकी चुप्पी बता रही थी कि बेटी के मुंह से यह बोल सुनने को वो कितना तरस गए थे. दामिनी के दिल का ज्वार उमड़ पड़ा था.
“आपने कितना कुछ किया, लेकिन मैं…”
“दामिनी, ये सब समय का फेर है, हमारा प्रारब्ध हमें कितना कुछ दे जाता है, पर हम उसकी कद्र करने में समय लगा देते हैं.”
“पापा, आप और मम्मी अविरल के पैरेंट्स से मिलना चाहते थे न?” दामिनी की बात का अर्थ समझ वे जल्दी से बोल उठे, “बस, समझ गया. हम अगली गाड़ी से आ रहे हैं.” पापा की आवाज़ ख़ुशी से कांप रही थी. भ्रम की अंधेरी रात बीत चुकी थी. पलाश के मोहपाश से मुक्त दामिनी आनेवाले सुनहरे पलों को सहेजने के लिए तैयार थी.

         मीनू त्रिपाठी

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कहानी- एक ही थैली के चट्टे-बट्टे (Short Story- Ek Hi Thaili Ke Chatte-Batte)

Short Story, Ek Hi Thaili Ke Chatte-Batte

Short Story, Ek Hi Thaili Ke Chatte-Batte

उसकी नज़र में अनशन पर बैठे लोग देश के सच्चे हीरो थे. वो सोच रही थी काश, उसे भी मौक़ा मिलता देश के लिए कुछ कर गुज़रने का, तो वो भी दुनिया को दिखाती कि उसके दिल में देश के लिए कितना प्रेम और समर्पण भाव है. मगर इस घर-गृहस्थी के चक्कर में फंसकर कहां कुछ कर सकती है वो?

जब बाहर पसरते अंधेरे ने हॉल में भी दस्तक दी, तो सुलभा ने घड़ी की तरफ़ देखा, 7 बजने को थे… “ओह! घंटा भर हो गया टीवी देखते हुए, पता ही नहीं चला…” उसके पति सुधीर अभी तक ऑफ़िस से नहीं आए थे. जाने क्या बात है? वैसे तो 6 बजे तक आ जाते हैं. सुलभा चिंतित हो उठी, तभी मोबाइल फ़ोन पर एसएमएस आया. सुधीर टैफ़िक में फंसे थे. आने में देरी थी. 11 वर्षीय बेटा बंटी भी बाहर फुटबॉल खेल रहा था. कोई ख़ास काम भी नहीं था, सो सुलभा पुनः टीवी से चिपक गई.
एक न्यूज़ चैनल पर देश में फैले भ्रष्टाचार और विदेशों में जमा काले धन पर बड़ी रोचक परिचर्चा चल रही थी. मुद्दा ज्वलंत था और सुलभा का फेवरेट भी. एक से बढ़कर एक वक्ता थे, जो जी-जान लगाकर सरकार और सिस्टम पर शब्दों के आक्रमण कर रहे थे. सुलभा के रोंगटे खड़े हो गए थे. वो भी उनके साथ सुर से सुर मिलाकर भ्रष्ट लोगों को कोस रही
थी कि तभी दरवाज़े पर बजी घंटी ने उसका प्रवाह रोका.
दो घंटे की देरी से ही सही, अंततः सुधीर घर आ गए थे. थके-हारे सो़फे पर पसर गए. वैसे तो सुलभा सुधीर के घर आने पर टीवी ऑफ़ करके उसके लिए चाय-पानी के इंतज़ाम में लग जाती है, मगर आज उसका टीवी बंद करने का मन न हुआ. बस, उसने थोड़ा-सा वॉल्यूम कम कर दिया.
“इतनी देर कैसे हो गई? क्या ज़्यादा ट्रैफ़िक था?”
“बस, पूछो मत. जगह-जगह रोड डायवर्ट की हुई है. पूरी दिल्ली नापकर आ रहा हूं. आधे घंटे के रास्ते को तय करने में पूरे दो घंटे लग गए. दिल्ली अब रहने लायक नहीं बची है, जब देखो लोग एक मुद्दा पकड़कर कभी धरना, तो कभी अनशन… कभी मोर्चा, तो कभी चक्का जाम शुरू कर देते हैं और हम जैसे सुबह-शाम सड़क नापनेवाले लोगों की शामत आ जाती है.”
सुधीर की व्यथा सुन सुलभा थोड़ी सजग हुई, “मैं मानती हूं इस तरह के आंदोलनों से थोड़ी जन व्यवस्था बिगड़ती है, मगर देश के वर्तमान हालात में इस तरह की आवाज़ उठाना बहुत ज़रूरी है. हम लोग ईमानदारी से अपने कर्त्तव्यों का पालन करते हैं, पूरा टैक्स जमा करते हैं और हमारे खून-पसीने की कमाई से इन भ्रष्ट लोगों की जेबें भरती हैं. ऐसे में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन होना समय की मांग है. ये हमारे ही हित में है.” सुलभा का चेहरा देश के लिए मर मिटनेवाले किसी क्रांतिकारी की भावभंगिमा से भर गया.
“सारा दिन घर के सुरक्षित माहौल में बैठकर ऐसी बड़ी-बड़ी बातें करना बहुत आसान है, पर ज़रा हमारी सोचो. सारा दिन ऑफ़िस में पिसो, फिर आधे घंटे का सफ़र चींटी की चाल से चलकर दो घंटे में पूरा करो और जब घर आओ, तो बीवी बजाय एक कप अच्छी-सी चाय पिलाने के उन्हीं लोगों की तरफ़दारी करे, जो उसके पति के घर देर से लौटने के कारण हैं, तो…” सुधीर ने व्यंग्यात्मक चुटकी ली. सुलभा को अपनी भूल का एहसास हुआ और वो हड़बड़ाकर रसोई की ओर भागी.
“सुनो, चाय के साथ कुछ स्नैक्स भी ले आना, बहुत भूख लगी है. खाना थोड़ा रुककर खाऊंगा.” सुधीर ने रिमोट से टीवी चैनल बदलते हुए कहा. तभी बंटी भी खेलकर हांफता हुआ घर आ गया और सीधे सुधीर से रिमोट झपट लिया.
“सॉरी पापा, अभी मेरा फेवरेट शो आ रहा है, आप बाद में देख लेना.” सुधीर में अभी इतनी हिम्मत नहीं बची थी कि वो बंटी को डांटे या उससे बहस करे, अतः उसने चुपचाप सरेंडर करना ही बेहतर समझा.

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सुलभा गरम-गरम चाय और ब्रेड रोल ले आई थी. आते ही उसने रिमोट पर वापस कब्ज़ा जमा लिया. “चल बदमाश कहीं का… पहले ये फुटबॉल जगह पर रख और जूते उतारकर हाथ-मुंह धो. तब यहां आकर बैठना.” बंटी को चलता कर उसने वापस अपनी परिचर्चा लगा ली.
“बंद करो सुलभा ये सब. आजकल ऑफ़िस में भी यही सब डिस्कशन चलता रहता है, कम से कम घर पर तो शांति रखो.” सुधीर खीझता हुआ बोला.
“बस, दस मिनट का प्रोग्राम रह गया है. शुरू से देख रही हूं, पूरा होने दो न.”
“क्या मिलेगा ये सब देखकर?”
“कैसी बातें करते हो सुधीर? एक ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते हमें अपने देश और समाज में हो रही हलचलों की पूरी जानकारी होनी चाहिए. हमारी भलाई के लिए चल रहे आंदोलनों को समर्थन देना चाहिए. उनमें अपना योगदान मसलन डोनेशन…”
“बस-बस, बहुत हुआ…” डोनेशन के नाम पर सुधीर बिदका.
“कबूतर के आंख बंद करने से बिल्ली का ख़तरा टल तो नहीं जाता न. ज़रा सोचो, कैसी भ्रष्ट व्यवस्था छोड़कर जाएंगे हम अपने बच्चों के लिए, इसे तो सुधारना ही होगा.” सुलभा का स्वर आक्रामक और जोशीला
हो चला था.
बंटी अपने काम निपटाकर वापस आ गया था. चैनल बदला हुआ देख वो बेचैन हो उठा “मम्मी…”
“चुप करो… बारह साल के होने जा रहे हो, कब तक यूं कार्टून चैनलों से चिपके रहोगे. ज़रा न्यूज़ भी देखा करो. बस, अपनी दुनिया में मस्त रहते हो. ज़रा देखो तो सही देश में क्या चल रहा है.” मम्मी का एग्रेसिव मूड देखकर बंटी चुपचाप अपने पापा की बगल में दुबक गया.
सुधीर उसकी मनोस्थिति समझकर मुस्कुराए और उसके मुंह में ब्रेड रोल डालते हुए धीरे से कान में फुसफुसाए, “आज मम्मी को देखने दो, कल मैं ऑफ़िस से आते हुए एक कार्टून मूवी की सीडी लाऊंगा और उसे स़िर्फ हम दोनों देखेंगे.” प्रस्ताव सुनकर बंटी का मुरझाया चेहरा खिल उठा.
परिचर्चा अपने चरम पर थी. ‘करप्शन हमारी नसों के साथ ख़ून में दौड़ रहा है. इसने स़िर्फ शासन वर्ग में ही नहीं, बल्कि हर स्तर पर अपनी पैठ बना ली है. पुलिस, प्रशासन और नेता ही नहीं, बल्कि आम आदमी भी उसमें सहभागी हो रहा है…’ टीवी पर चल रही बातों ने बंटी का ध्यान खींचा.
“मम्मी, ये करप्शन और काला धन क्या है?” बंटी ने जिज्ञासा जाहिर की.
“बाद में बताऊंगी. अभी मुझे सुनने दो.” थोड़ी देर बाद परिचर्चा बिना किसी निष्कर्ष और समाधान के समाप्त हो गई, मगर सुलभा अभी भी अभिभूत थी. उसकी नज़र में अनशन पर बैठे लोग देश के सच्चे हीरो थे. वो सोच रही थी काश, उसे भी मौक़ा मिलता देश के लिए कुछ कर गुज़रने का, तो वो भी दुनिया को दिखाती कि उसके दिल में देश के लिए कितना प्रेम और समर्पण भाव है. मगर इस घर-गृहस्थी के चक्कर में फंसकर कहां कुछ कर सकती है वो? प्रोग्राम ख़त्म हुआ देख बंटी ने अपनी जिज्ञासा पुनः प्रकट की, मगर सुलभा को डिनर बनाना था, अतः उसने बंटी का प्रश्‍न वापस टाल दिया.
अगले दिन स्कूल में बंटी ने टीचर के सामने अपनी जिज्ञासा रखी, तो टीचर ने छोटे-छोटे उदाहरण देकर उसे करप्शन, काला धन, रिश्‍वत जैसे शब्दों के मायने समझाए. अब वह भी कभी अख़बारों में तो कभी टीवी के ज़रिए भ्रष्टाचार विषय संबंधीजानकारियां लेने लगा. ‘हम भ्रष्टाचार के दानव को तभी हरा पाएंगे, जब आम आदमी मज़बूती से इस व्यवस्था के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करेगा और इसका हिस्सा बनने से इंकार करेगा.’ अख़बार में छपे ये शब्द मासूम बंटी के मस्तिष्क पर छप गए थे.
आज सुधीर जल्दी घर आ गए थे, “क्या बात है, बेहद ख़ुश लग रही हो?” सुलभा का खिला चेहरा देख उसने पूछा.
“पापा का फ़ोन आया था. अगले ह़फ़्ते लखनऊ से आ रहे हैं… ट्रेन से.”

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“अचानक कैसे? पहले से तो कोई प्रोग्राम नहीं था. इतनी जल्दी रिज़र्वेशन मिलेगा क्या?”
“पापा कह रहे थे मामाजी के रेलवे में कुछ कनेक्शन हैं. उन्होंने ही कहा है कि अभी वेटिंग में ले लो, बाद में कुछ ले-देकर क्लियर करा लेंगे.” सुलभा चहकते हुए बोली. पास बैठा बंटी सब सुन रहा था. ले-देकर… मतलब रिश्‍वत. उसके दिमाग़ की घंटी बजी. मतलब नानाजी रिश्‍वतख़ोरी और भ्रष्टाचार में सहयोग कर रहे हैं. मम्मी को तो इसका विरोध करना चाहिए था, वो तो भ्रष्टाचार विरोधी हैं, पर वो बड़ी ख़ुश हैं. बंटी को याद आया, अभी कुछ दिन पहले उसके दादाजी शिर्डी होकर आए थे. उन्होंने प्रसाद देते हुए बताया था कि इस बार वहां बहुत भीड़ थी. वो तो एक एजेंट को कुछ रुपए देकर वीआईपी पास का इंतज़ाम करा लिया था, अतः लंबी लाइन में नहीं लगना पड़ा, वरना 4 घंटे खड़ा रहना पड़ता. तो क्या वो भ्रष्टाचारी हैं? बंटी का दुनिया देखने का नज़रिया ही बदल गया था. जिन बातों पर उसका कभी ध्यान भी नहीं जाता था, अब वो उनकी गहराई में जाकर नए अर्थ खोज रहा था.
“आज बंटी की भी छुट्टी है. क्यों न पिक्चर चला जाए?” सुधीर के प्रस्ताव पर बंटी और सुलभा दोनों उछल पड़े. “मैं फ़ोन करके शर्मा को टिकट का इंतज़ाम करने को कह देता हूं.” शर्मा सुधीर के अधीनस्थ क्लर्क थे.
तीनों तैयार हो रहे थे कि तभी मि. शर्मा का फ़ोन आया.
“सुलभा टिकट एवेलेबल नहीं हैं, पर वो कह रहा है कि शायद ब्लैक में इंतज़ाम हो जाए. तुम क्या कहती हो?”
“हां, तो लेने को कहिए न… अभी पिक्चर नहीं गए, तो बेकार में बंटी का मूड ऑफ होगा.” सुलभा ने सहर्ष स्वीकृति दे दी. बंटी अंदर से सब सुन रहा था. ब्लैक के नाम से उसका सारा उत्साह ठंडा पड़ गया. तीनों कार से थियेटर की ओर बढ़ चले, मगर बंटी के संवेदनशील मस्तिष्क में टीवी में सुने भ्रष्टाचार विरोधी कथन गूंज रहे थे, ‘आम आदमी भी भ्रष्टाचार में सहभागी हो रहा है. वो भी रिश्‍वत देकर अपना काम बनवाने का सुलभ रास्ता चुन रहा है, हम भ्रष्टाचार के दानव को तभी हरा पाएंगे, जब आम आदमी मज़बूती से इस व्यवस्था के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करेगा और इसका हिस्सा बनने से इंकार करेगा.’
थियेटर आ गया था. शर्माजी गेट पर टिकट लेकर उनका इंतज़ार कर रहे थे. सुधीर टिकट लेकर पैसे देने लगे, तो शर्माजी ने पैसे लेने से इंकार कर दिया. “क्या करते हैं साहब? ये पिक्चर भाभीजी और बंटी को मेरी तरफ़ से…” वो चापलूसी भरे स्वर में हंसते हुए बोले. सुधीर के चेहरे पर मुस्कुराहट फैल गई. अभी तक उन्हें यही मलाल हो रहा था कि बेकार में पिक्चर जाने का प्रस्ताव रखा और ब्लैक में टिकट पर डबल ख़र्चा करवाया. मगर शर्माजी के प्रस्ताव से उनकी सारी मायूसी दूर हो गई. शो शुरू होनेवाला था. सुधीर और सुलभा तेज़ी से चलने लगे, मगर बंटी वहीं ज़ड़वत् खड़ा रहा. “क्या हुआ, चलना नहीं?” सुलभा ने पूछा.
“नहीं. मैं देश का ईमानदार और ज़िम्मेदार नागरिक हूं और भ्रष्टाचार को अपने किसी भी एक्शन से हेल्प नहीं करूंगा.” बंटी सिर ऊंचा कर दृढ़ता से बोला.
बंटी की बात सुन सुधीर और सुलभा सकते में आ गए. “क्या कह रहे हो? हमने कौन-सा भ्रष्टाचार किया है?”
“क्यों… ब्लैक में टिकटें लेना और वो भी शर्माजी से इनडायरेक्टली रिश्‍वत के तौर पर लेना, ये भ्रष्टाचार नहीं तो और क्या है? आप सभी भ्रष्टाचारी और एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं.” बंटी की स्वाभिमानी भावभंगिमा बरक़रार थी.
सुधीर ने सुलभा को ऐसे घूरा जैसे कह रहा हो कि ये सब तुम्हारा ही किया-धरा है और अपडेट करो इसे ऐसे आंदोलनों के बारे में. वहीं सुलभा अवाक् थी. आज बंटी ने उसे उसके व्यक्तित्व के ऐसे पहलू से परिचित कराया था, जिससे वो अब तक अनभिज्ञ थी.

        दीप्ति मित्तल

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कहानी- अनचाही (Short Story- Anchahi)

Anchahi, hindi kahani, hindi short story

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“क्यों मुझे भी जीते जी मारने पर तुली है तू? अगर तुझे कुछ हो जाता तो? अंजली तो यही कहती कि आप तो घर में ही थीं. आख़िर कर क्या रही थीं, जब आपकी लाड़ली पोती… आप ही तो ज़िद करके इसे संसार में लाई थीं. फिर क्यों मर जाने दिया?”

अनुमान ठीक ही था, अंजली का ही फ़ोन था. विमलाजी ने उठकर फ़ोन उठाया, धीरे से यही कहा था, “ठीक है, मैं सुबह निकल रही हूं, वहीं बात करेंगे!”
फ़ोन रखकर घड़ी देखी, रात के ग्यारह बज रहे थे, आठ से ग्यारह के बीच तीन फ़ोन आ चुके हैं उसके. विमलाजी समझ नहीं पा रही थीं कि क्या करें. इसी बात को लेकर पति सुरेशजी से इतनी बहस हो चुकी है, पर वह क्या करे? छोड़ दे पोती श्‍वेता को उसके हाल पर?
बहस का मुद्दा ही श्‍वेता थी और सुरेशजी की वही पुरानी दलील थी, “विमला, अब तो बाहर निकलो इन घर-गृहस्थी के पचड़ों से, बहुत मर-खप लीं तुम और अब हमारी यह उम्र भी नहीं रही है कि हम बच्चों की हर छोटी-बड़ी बातों में अपनी दलील दें और बच्चे, अब वे वयस्क हो चुके हैं.”
अब वह कैसे समझाए कि बात श्‍वेता की शादी की ही नहीं, बल्कि उसके भविष्य की भी है. अभी बारहवीं पास की है, अठारह की हुई है पिछले महीने. दो बड़ी बहनें हैं, जो इंजीनियरिंग और डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही हैं, श्‍वेता तो सबसे छोटी है, फिर उसके विवाह की इतनी जल्दी क्यों?
अंजली से हुई फ़ोन की लंबी बातचीत के शब्द फिर से विमलाजी के कानों में गूंजने लगे थे, “मां, श्‍वेता जब ज़िद ठाने बैठी है कि उसे अब आगे पढ़ना ही नहीं है और शादी करके घर ही बसाना है, तो हम कर ही क्या सकते हैं. आप जानती हो कि पढ़ाई-लिखाई में उसका मन लगता ही नहीं है. अभी तो एक ठीक-ठाक लड़का मिल रहा है, घर का बिज़नेस है उनका, लड़की सुखी रहेगी. अब आप ही बताओ.”
पहले तो बात सुनते ही बिगड़ी थीं विमलाजी अंजली पर कि इतनी पढ़ी-लिखी होकर भी ऐसी बातें कर रही है, पर आख़िर में यही कहा उसने, “ठीक है मां, आप ही आकर समझाइए अपनी लाड़ली पोती को कि कॉलेज में एडमिशन ले ले.”
जब भी अंजली ग़ुस्से में होती है, श्‍वेता को उनकी ‘लाड़ली पोती’ कहकर ही संबोधित करती है.
रातभर विमलाजी सोचती रहीं कि सुरेशजी को कैसे मनाएंगी अपने भोपाल जाने के बारे में? आशा के विपरीत सुबह कुछ शांत थे सुरेशजी. सुबह उठकर विमलाजी को खटपट करते देख कह भी दिया था उन्होंने, “अपना सामान जमा लेना और हां, ज़्यादा मत रुकना. श्‍वेता से एक बार कहकर देख लेना, मान जाए तो ठीक, नहीं तो हमारी समस्या नहीं है यह अब.”
विमलाजी ने एक राहत की सांस ली. तैयारी तो क्या ख़ास करनी थी, दो-चार जोड़ी कपड़े डाल लिए बैग में. रामू आ गया था, तो बस स्टैंड तक वही छोड़ गया. पर बस में बैठते ही फिर से श्‍वेता का चेहरा विमलाजी की आंखों के सामने घूमने लगा. खिड़की के बाहर झांकते हुए विमलाजी का मन कहीं अतीत में ले जा रहा था उन्हें…
अंजली तब अपने बैंक की ट्रेनिंग में थी और विमलाजी उसके पास ही थीं. दो-तीन महीने बाद पता चला था अंजली को अपनी प्रेग्नेंसी के बारे में, तो वह चौंक गई थी.
“मां, मैं अभी इस बच्चे को जन्म देने की स्थिति में नहीं हूं. एक तो ट्रेनिंग लंबी चलेगी और दूसरे रीता और मीता भी अभी छोटी ही हैं, मेरे लिए तो ये दो बच्चे ही बहुत हैं.”
अंजली तब बिना बताए चुपचाप अपनी सोनोग्राफ़ी भी करवा आई थी. “मां, इस बार भी लड़की ही है, मैं तो अब इसे बिल्कुल जन्म नहीं दे सकती.” विमलाजी बुरी तरह चौंक गई थीं.

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“क्या कह रही है यह? इतनी पढ़ी-लिखी होकर भी यह भेदभाव?” बड़ी मुश्किल से समझाकर विमलाजी ने उसे रोका था. फिर भी एक तरह से अनचाही संतान ही रही श्‍वेता. श्‍वेता को पालने का सारा भार विमलाजी पर ही था. अंजली ने भी उसे विमलाजी की गोद में ही डाल दिया था, “लो संभालो अपनी ‘लाड़ली पोती’ को.”
धीरे-धीरे श्‍वेता बड़ी होने लगी. वह विमलाजी को ही अपनी मां समझने लगी थी. उनके आगे-पीछे साड़ी का पल्ला थामे घूमती. उसके तोतले बोल अभी भी विमलाजी को याद हैं. बड़ी होकर भी जब स्कूल की लंबी छुट्टियां होतीं, तो वह जबलपुर उन्हीं के पास आ जाती.
विमलाजी के पास रहकर वह सिलाई, बुनाई, कुकिंग, संगीत, नृत्य में पारंगत हो गई थी. पर पता नहीं क्यों? पढ़ाई में उसे शुरू से ही अरुचि थी और इसी बात से अंजली से उसके मतभेद भी थे.
फिर वह दिन याद आते ही बस में बैठे-बैठे विमलाजी का कलेजा कांप गया था. उन दिनों वह अंजली के पास ही थीं, श्‍वेता का हाई स्कूल का रिज़ल्ट आनेवाला था. पता चला कि इस साल भी फेल थी. अंजली का तो पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया था. वो उसे डांट-डपटकर ऑफ़िस चली गई, पर फिर श्‍वेता का घर में पता ही नहीं चल रहा था. ढूंढ़ते-ढूंढ़ते जब विमलाजी नीचे के कमरे में पहुंचीं, तो सन्न रह गईं. देखा तो एक लंबी साड़ी का फंदा बनाकर पंखे से लटक रही थी श्‍वेता.
“यह… यह क्या…?” दौड़कर श्‍वेता को बांहों में जकड़ा था उन्होंने.
“छोड़ दो मां मुझे. मर जाने दो. मैं हूं ही इस लायक.” बड़ी मुश्किल से विमलाजी उसे खींचते हुए कमरे से बाहर लाई थीं. दिल बुरी तरह धड़क रहा था. हे भगवान! वहां पहुंचने में मिनट भर की भी देर हो जाती, तो बड़ा अनर्थ हो जाता?
“क्यों मुझे भी जीते जी मारने पर तुली है तू? अगर तुझे कुछ हो जाता तो? अंजली तो यही कहती कि आप तो घर में ही थीं. आख़िर कर क्या रही थीं, जब आपकी लाड़ली पोती… आप ही तो ज़िद करके इसे संसार में लाई थीं. फिर क्यों मर जाने दिया?”
“क्या… क्या कहा मां…?”
“हां बेटा, तेरी मां तुझे जन्म देने के पक्ष में ही नहीं थी, वो नहीं चाहती थी कि दो बेटियों के बाद फिर एक तीसरी भी बेटी हो, वो तो मैंने ही रोका था उसे और तू यह सिला दे रही है हमें?”
श्‍वेता एकदम चुप हो गई थी, फिर धीरे से विमलाजी के गले से चिपट गई. “मां, अब मैं कभी आपको दुख नहीं दूंगी.” फिर भी दोनों देर तक सिसकती रही थीं.
पर श्‍वेता इसके बाद से अंजली से और दूर होती गई. कई बार ग़ुस्से में कह देती, “मैं तो अनचाही संतान हूं ना? तो क्यों रीता दी और मीता दी से मेरी तुलना करती हैं?” और तब अंजली को लगता कि शायद विमलाजी ने ही श्‍वेता को भड़काया है. हालांकि विमलाजी ने अंजली से कहा भी था कि श्‍वेता कितना ग़लत क़दम उठाने जा रही थी, मुश्किल से उसे रोका है, अब उसे प्यार से संभालना होगा. फिर भी अंजली कहीं न कहीं अपनी सास को ही कुसूरवार समझने लगी थी.

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बस में बैठे-बैठे बीती बातें याद करते-करते कब भोपाल आ गया, विमलाजी को पता ही नहीं चला. भोपाल बस स्टैंड पर अंजली उन्हें लेने आ गई थी. “अच्छा हुआ मां, आप आ गईं. अब अगर आप ही श्‍वेता को कुछ समझा सको तो ठीक है.”
घर पहुंचते ही श्‍वेता उसी प्रकार लपककर मिली थी. “मां, आ गईं आप. चलो मेरे कमरे में, वहीं सामान रखना.”
“वो सब तो ठीक है, पर अब तू थोड़ी देर मेरे पास बैठ और यह बता कि अचानक यह शादी का भूत क्यों सवार हुआ है तुझ पर?” विमला ख़ुद को रोक नहीं पाई थीं.
“आपको तो ख़ुशी होनी चाहिए कि इतने दिनों बाद घर में उत्सव का माहौल होगा. आपकी लाड़ली पोती की शादी है.” श्‍वेता हंसकर बता रही थी.
“देख बेटा…” उन्होंने श्‍वेता को टोका. “तू स्वयं अपने भविष्य की सोच. आगे पढ़ेगी नहीं तो क्या करेगी? तेरी मम्मी पढ़ी-लिखी है, तो बैंक में बड़ी ऑफ़िसर है, पापा और मम्मी दोनों की कमाई है, तभी तो तुम लोगों के इतने ठाठ हैं, सब कुछ है…”
“पर मां.” श्‍वेता बीच में ही बोल पड़ी थी. “आप चाहती हो कि मम्मी की तरह पढ़-लिखकर मैं भी आगे चलकर अपनी किसी अनचाही संतान का गला घोंट दूं? नहीं, जो भी आएगा, मैं उसे ख़ूब प्यार दूंगी. शादी करके मैं मम्मी, पापा का बोझ ही हल्का कर रही हूं, अनचाही बेटी से उन्हें छुटकारा मिलेगा.”
विमलाजी सन्न रह गई थीं, यह अनचाहा शब्द कितनी गहराई से इसके दिमाग़ में घुस गया है. विमलाजी समझ नहीं पा रही थीं कि अपनी इस हार के बारे में क्या कहें? बेमन से रसोईघर में जाकर नौकरानी को कुछ निर्देश दे रही थीं कि दरवाज़े की घंटी बजी…
“अब कौन आ गया?” दरवाज़ा खोला तो देखा यह तो हरीश की पत्नी उषा है. दो महीने पहले हरीश का एक्सीडेंट में निधन हो गया था. वहीं अंजली के साथ बैंक में ही काम करता था.
उन्होंने ऊषा को बैठाया और कहने लगीं, “तुम्हारे पति के बारे में जानकर बहुत दुख हुआ बेटा.”
ऊषा रोते हुए बोली, “मम्मीजी, मैडम नहीं हैं क्या?”
“हां बेटा, अभी-अभी ही निकली है बैंक के लिए, क्यों कोई काम था क्या?”
“हां, उन्हें दरख़्वास्त देनी थी, इनकी जगह पर मुझे बैंक में लेने की बात थी.”
“अरे, तो क्या तुम नौकरी करोगी? वहां क्या क्लर्क वग़ैरह की…?”
“नहीं मम्मीजी, मैं इतनी पढ़ी-लिखी कहां, चपरासी की ही नौकरी मिल जाए, तो बहुत है. कम से कम सरकारी नौकरी होगी. दोनों बच्चों को पाल-पोष तो सकूंगी.” वह फिर रोने लगी थी. विमलाजी अवाक् थीं. भले घर की लड़की अब चपरासी बनेगी.
कुछ देर बाद ऊषा लौट गई, पर विमलाजी सोच में ही डूबी थीं, उन्हें तो पता ही नहीं चला कि श्‍वेता कब-से पीछे खड़ी हुई सारी बातें सुन रही थी. उसके कुछ शब्द ही पड़े थे विमलाजी के कानों में, “मां, मैं भी अब कॉलेज में एडमिशन लूंगी… आप मम्मी से कह दें.”

– डॉ. क्षमा चतुर्वेदी

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कहानी- बदलते रंग (Short Story- Badalte Rang)

Short Story, Badalte Rang

Short Story, Badalte Rang

ऐसे आदमी के लिए वह ख़ुद को सज़ा देती रही, जिसने रिश्तों को खेल बना रखा था. जैसे वर्जनाएं मात्र नारी के नाम लिख दी गई हों और पुरुष… वह कहीं भी मुंह मारता फिरे, कोई हर्ज नहीं! उस दोगले इंसान के खोखले आदर्श जीवन पर बोझ-से थे.

अपर्णा अपना मोबाइल बजते हुए सुन रही थी. मां का नंबर था. सूनी आंखों से उनके नाम को फ्लैश होते हुए देखती रही. उसका हाथ कांपा और फोन की तरफ़ बढ़ा, पर अपर्णा ने सायास उसे पीछे खींच लिया. विरक्ति होने लगी थी उसे. मां का वही रटा-रटाया प्रश्‍न, “रुड़की कब आ रही हो? लड़केवाले दबाव बना रहे हैं हम पर.” बहाना बनाते-बनाते थक गई थी वह. कभी व्यस्तता का नाटक, कभी कॉलेज की परीक्षाओं के नाम पर, तो कभी शोधकार्य की आड़ में! पर कब तक? विवाह का फंदा कब तक अपने गले से दूर रख पाएगी? कैसे बताए मां को कि दिल पर उसका वश ही नहीं. वह तो कब का खो गया… सदा के लिए!
वह अनमनी-सी उठी और दराज से एक पुरानी डायरी निकाली. हवा सायं-सायं बह रही थी, खिड़कियों के पट डोलने लगे और पेड़ों के पत्ते सिहर उठे, मानो अंतस की उथल-पुथल से तारतम्य हो प्रकृति का. उसने यंत्रवत् डायरी का पहला पन्ना खोलकर देखा. रोमांच हो आया, ऐसे जैसे पहली बार देख रही हो. वही टेढ़ी-मेढ़ी विशिष्ट लिखाई- ‘अपनी प्रिय छात्रा अपर्णा को सस्नेह- दिनेश.’ साथ में सूखे गुलाब की पंखुड़ियां. दिनेश सर की यादें कुलबुलाने लगी थीं. अपर्णा ने ख़ुद को शॉल में कसकर लपेट लिया. पत्तों की सिहरन उसकी देह… यहां तक कि मन में उतर आई थी.
एक हूक-सी उठी भीतर. नैतिकता की गांठ, जो अवचेतन में कहीं गहरे दबी थी, आज फिर कसने लगी. दो जलती हुई आंखें कह रही थीं- ‘अपर्णा तुमसे यह उम्मीद न थी. तुम और…!’ दिल हुआ, फूट-फूटकर रोये और चिल्ला-चिल्लाकर कहे, ‘नहीं दिनेश… आप ग़लत समझ रहे हैं. समित मेरा कोई नहीं, वह बस एक दोस्त है पुराना. हमारी दोस्ती नादानी भरी थी, किशोरावस्था की बचकानी दोस्ती!’ पर जब ये सब कहना था, तब स्वर उसके कंठ में ही घुटकर रह गए. अपने बचाव में एक भी दलील न दे पाई वो. असहाय-सी देखती रही दिनेश को जाते हुए. उनकी घृणा को आज तक जी रही थी अपने भीतर. यह घृणा नत्थी हो गई थी उसके वजूद से. दिनेश की अंतिम स्मृति बनकर मर्म पर, जलती शलाका से लिखे गए इतिहास जैसी!
परिपक्व प्रेम क्या होता है? किसी से बौद्धिक जुड़ाव होना कितना संतोष देता है? उनके बिना ये जान ही न पाती. सर की सबसे मेधावी छात्रा होने का गौरव, उस गहन गंभीर व्यक्तित्व का सान्निध्य उसकी असाधारण मेधा को परिष्कृत करता गया. क्या अजब नशा था… विद्वान गुरु के साथ बौद्धिक चर्चाओं में शामिल होना… यह सौभाग्य किसी और को नहीं मिला. ज़ाहिर था कि एमए में अपर्णा से अच्छे नंबर कोई नहीं ला सकता था. दिनेशजी गंभीरता के आवरण में उसके प्रति अपने कोमल भावों को दबाए रहते थे. एक अध्यापक की गरिमा को खंडित कैसे करते? परीक्षाफल घोषित हुआ, तो अपेक्षानुसार कॉलेज में अव्वल नंबर पर अपर्णा ही थी. एक शिक्षिका के तौर पर जूनियर सेक्शन में उसकी नियुक्ति भी सुनिश्‍चित हो गई.

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दिनेश तब रोक न सके आकुल भावनाओं के प्रस्फुटन को. उन्होंने सम्मान स्वरूप अपर्णा को एक डायरी दी और उसमें दबा एक सुर्ख़ गुलाब भी, जिसने उनके लगाव को बिना बोले ही व्यक्त कर दिया. फिर तो प्रेम पूरे वेग से पेंगे लेने लगा था. हालांकि उन्होंने शालीनता की सीमा रेखा कभी नहीं लांघी, पर चोरी-छुपे मिलना शुरू हो गया. अपर्णा के पीएचडी की रूपरेखा भी बनने लगी, साथ ही साथ यह भी तय हुआ कि अब विवाह के बारे में अभिभावकों से बात कर लेनी चाहिए. तब न जाने कहां से उनके बीच किसी दुस्वप्न की तरह समित कूद पड़ा. वह दिनेश के निर्देशन में शोध करना चाहता था. अपनी पुरानी ‘मित्र’ से टकराना स्वाभाविक ही था और एक दिन… जब वह अपर्णा से कह रहा था, “कम ऑन डियर, माना पहले हमारा ब्रेकअप हो चुका है, पर उस कारण तुम सीधे मुंह बात ही न करो, ये तो…” उसे चुप होना पड़ा, क्योंकि चोरों की तरह दम साधकर सर उसकी ही बात सुन रहे थे. उन्हें देखते ही वह वहां से खिसक लिया. रह गई अपर्णा, अपनी सफ़ाई में कुछ कह पाने का उसे मौक़ा ही नहीं मिल पाया. दिनेश के हाव-भाव से छलकती घृणा, अकल्पनीय थी! उसकी ज़ुबान मानो तालु से चिपककर रह गई थी. उन चंद पलों में ही सब कुछ मिट गया हो जैसे!
वह कहना चाहती थी, ‘आप ग़लत समझ रहे हैं. सहेलियों की देखा-देखी मैंने भी बॉयफ्रेंड बनाया ज़रूर था, पर वो बस एक जुनून था, दिखावा मात्र था. मैंने कोई मर्यादा नहीं तोड़ी, बल्कि मेरी तो हिम्मत ही नहीं थी ऐसा कुछ भी करने की.’ लेकिन ‘कारवां गुज़र गया’ और ‘गुबार’ ही देखती रह गई! हर दिन ख़ुद को कोसती रहती कि मैंने दिनेश सर जैसे नैतिकतावादी इंसान से प्रेम ही क्यों किया? सर नहीं जानते थे, पर मुझे तो पता था कि छिछोरापन उन्हें पसंद नहीं होगा. उनका गहरा व्यक्तित्व किसी भी प्रकार की उच्छृंखलता को सह न सकेगा. वह ही मूरख थी, जो यह जानते हुए उनके प्यार में पड़ गई.
मन में एक कुंठा घर करने लगी, जो रोज़ उसे कठघरे में खड़ा करती. रोज़ उससे कहती- ‘तू गुनहगार है. तूने एक सच्चा प्रेम करनेवाले का दिल दुखाया. अपना अतीत छुपाकर उन्हें अंधेरे में रखा.’
वो भी कितनी नादान थी. विगत बातों को समाज की संकरी सोच से जोड़ पाती, तो उनके निकट जाने की ग़लती ही क्यों करती? उनकी नज़रों में गिरना मौत से भी बदतर लग रहा था. मां-बाऊजी उस पर शादी के लिए ज़ोर डाल रहे थे, पर वह अपनी मनःग्रंथि से कहां उबर पा रही थी, फिर शादी के लिए तैयार कैसे होती? इसी तरह साल निकल गया. दिनेश सर ने जान-बूझकर, दूसरे किसी संस्थान में नियुक्ति ले ली थी. शायद भागना चाहते थे उससे!
सुनने में आया कि उनका विवाह किसी ख़ूबसूरत और परंपरावादी युवती से हो गया था. सुनकर पहले तो दिल में टीस-सी उठी, पर फिर सोचा- ‘चलो अच्छा ही हुआ, उन्हें उनकी आदर्श पत्नी मिल गई. वे ख़ुश रहेंगे, तो शायद मैं भी… उनकी ख़ुशी में ही मेरी…’ चिंतन प्रक्रिया इससे आगे नहीं बढ़ पाती. कैसे बढ़ती? कैसे मान लेती कि उनकी ख़ुशी, उसे उसके दुख, उसके अपराधबोध से उबार सकती थी.
“सर ने सबको बुलाया है. विदेश से एक मैडम आई हैं. उन्होंने अपने पुराने हिंदी ग्रंथों पर रिसर्च कर रखी हैं और कॉलेज में चर्चा के लिए भी आ रही हैं.”

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रजनी की बकबक ने उसे विचारों के सागर से खींच निकाला. ज़्यादा कुछ तो नहीं, पर इतना समझ पाई कि उसकी प्रिय साहित्यिक चर्चा होनेवाली थी, एक निराले ही अंदाज़ में. उसने जल्दी-जल्दी ख़ुद को व्यवस्थित किया और हॉस्टल से हॉल की तरफ़ बढ़ चली. रजनी का हाथ उसके हाथ में था. सीटें पहले ही काफ़ी कुछ भर चुकी थीं. अभी दोनों बैठे ही थे कि प्रिंसिपल सर उस विदुषी को स्टेज पर लेकर आए. उसे देख अपर्णा की तो सांस ही रुक गई! साड़ी में वह बेहद ख़ूबसूरत लग रही थी. विदेशी होते हुए भी ऐसा मर्यादित पहनावा! दीपदान में दीये जलाकर कार्यक्रम का शुभारंभ होना था. जलती हुए मोमबत्ती लेकर कोई पीछे से स्टेज पर आया. कौन था वह, जिसने अपर्णा के होश उड़ा दिए? जो उस युवती को दीप प्रज्ज्वलित करने के लिए मोमबत्ती थमा रहा था. यह तो वे ही थे, जिनकी स्मृतियां उसे कभी सहज न होने देती थीं… उसके परम प्रिय दिनेश सर!
सभी दर्शक मंत्रमुग्ध-से उस विदेशी कन्या डोना को हिंदी में बोलते हुए सुन रहे थे. बीच-बीच में वह अंग्रेज़ी का सहारा भी लेती. सब कुछ अच्छे से चल रहा था, बस अपर्णा का ही मन नहीं ठहर रहा था उन गतिविधियों में. कई वक्ता आए और अपने-अपने विचार व्यक्त करके चले गए, लेकिन अपर्णा के पल्ले कुछ भी न पड़ा.
कार्यक्रम के अंत में जो फुसफुसाहटें सुनाई दीं, उनसे अलबत्ता उसके कान ज़रूर खड़े हो गए. “पता है, लंदन में दिनेश सर को टेम्परेरी अपॉइंटमेंट मिला था, वहीं के किसी कॉलेज में…”
“तो क्या उधर ही टकरा गए इस डोना से?”
“टकरा गए! अरे भई, वे वहां लिव इन में रह रहे थे…!”
“ओह गॉड! और उनकी पत्नी?”
“उनको अपनी पत्नी से कोई मतलब नहीं है. दिनेश सर तो परमानेंटली वहीं सेटल होने की कोशिश में हैं.” आगे सुन नहीं सकी अपर्णा. दिमाग़ जैसे सुन्न पड़ गया था. जिस ग्लानि ने उसके जीवन को अधूरा रखा, पलभर में तिरोहित हो चला! ऐसे आदमी के लिए वह ख़ुद को सज़ा देती रही, जिसने रिश्तों को खेल बना रखा था. जैसे वर्जनाएं मात्र नारी के नाम लिख दी गई हों और पुरुष… वह कहीं भी मुंह मारता फिरे, कोई हर्ज नहीं! उस दोगले इंसान के खोखले आदर्श जीवन पर बोझ-से थे. अपर्णा ने तुरंत मां को फोन
लगाया और कहा, “मैं जल्द से जल्द रुड़की आ रही हूं. लड़केवालों को इत्तला कर देना…”

      विनीता शुक्ला

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कहानी- मां का कमरा (Short Story- Maa Ka Kamra)

Short Story, Maa Ka Kamra, hindi kahani

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आजकल मां को अपने पुराने घर की बहुत याद आती है. वह घर पुराना था, असुविधाजनक था, परंतु वह उनका अपना घर था. आंगन में रोपी वह मोगरे की बेल, अपने आप उग आया वह नीम का पेड़ उनका अपना था. यहां तो बालकनी में उनके स्वयं के लगाए पौधे भी उनके अपने नहीं. जब वे स्वयं ही यहां मेहमान हैं तो यहां की कोई वस्तु उनकी कैसे हो सकती है?

“चलो मां कार में तुम्हारा सामान रख दिया है.” जितनी देर मुझे मां को कार तक ले जाने में लगी, वह तीन बार पूछ चुकीं, “पर मैं तुम्हारे घर क्यों जा रही हूं?”
कार में बैठते ही मां ने हैरान होते हुए कहा, “इतना सारा सामान? बुधवार को तो मुझे वापस आना ही है. चंद्रप्रभा के घर सत्यनारायण की कथा है और मुझे सुबह ही जाकर प्रसाद बनाने में उसकी मदद करनी है.”
मां का मन शांत करने के लिए मैंने कहा, “सामान रखने में क्या हर्ज़ है मां. कार में ही तो जाना है. वहां किसी चीज़ की ज़रूरत पड़ गई तो?” कार में बैठी मां परेशान-सी रहीं. उन्हें यह आभास हो गया था कि कोई बात उनसे छुपाई जा रही है.
उनका ध्यान बंटाने के लिए मैंने चन्द्रा मौसी का ज़िक्र छेड़ दिया. हमारे घर से चार मकान छोड़कर रहती हैं वह. दोनों में बहनों-सा स्नेह है, तभी तो हम उन्हें चन्द्रा मौसी कहकर बुलाते हैं. “वैसे ही करवा रही हैं सत्यनारायण की कथा या कुछ विशेष अवसर है?” मैंने मां से पूछा.
“उन्हें इस घर में आए पच्चीस वर्ष हो गए, इसीलिए करवा रही हैं. हमसे दो वर्ष पहले आए थे वे लोग. हमारा मकान बनते व़क्त बहुत सहारा रहा उनका.
चन्द्रा मौसी का ज़िक्र छिड़ते ही वह पुरानी यादों में खो गईं. “गांव की ज़मीन बेचकर यह प्लॉट तो ख़रीद लिया था हमने, पर मकान बनवाने के पैसे कहां से आते? एक जन कमानेवाला. पांच जन का अपना परिवार पाला, साथ में दोनों छोटी बुआओं का विवाह भी किया. तुम्हारे दादा-दादी को भी हर महीने पैसे भेजने होते थे. तबादलेवाली नौकरी थी और उन्हें अपने घर रहना ही अच्छा लगता था. रिश्तेदारी भी पूरी निभाई. किसी तरह थोड़ा धन जमा किया और यह मकान बनवाना शुरू किया. जीवन बीमावालों से कर्ज़ लिया था, फिर भी अंत तक आते-आते गहने बेचने पड़े, नहीं तो मकान बीच में ही रुक जाता. एक दिन घर में आटा नहीं था रोटी बनाने को. इसी चन्द्रा से मांगने गई, तो उसने मुझे ज़बर्दस्ती एक के बदले दोे व़क्त का आटा दे दिया. साथ में दाल भी. यह बात तुम्हारे पिता को भी मैंने नहीं बताई. दुख होता उन्हें यह सोचकर कि वह परिवार की ज़रूरत पूरी करने में असफल रहे, जबकि मैं जानती हूं कितने मेहनती थे वह.
कड़ी मेहनत की हम सबने इस मकान को बनवाने में. नई कॉलोनी थी और अभी नल की पाइप नहीं बिछी थी. हैंडपंप से पानी निकालना होता था. मज़दूर दिन के बीस रुपए मांगता, तो वह बचाने के लिए हम ख़ुदबारी-बारी हैंडपंप चलाते थे. तुम्हें तो याद भी होगा. भोलू-बबलू भी खेल-खेल में काफ़ी पानी निकाल देते.”
पिछली बातें याद करने पर मां उनमें पूरी तरह खो जाती हैं और एक के बाद एक याद करने लगती हैं. “आज ईश्‍वर का दिया सब कुछ है, पर तुम्हारे पापा तो अभावों में ही चले गए. मकान के कर्ज़े उतरे तो बच्चों की ऊंची पढ़ाइयां, शादी-ब्याह. अपने लिए तो जी ही नहीं पाए वह. दिन फिरने लगे, तो बीमारी ने आ घेरा और लेकर ही गई. अभी तो सुख भोगने का समय आया था. तसल्ली है कि तुम्हारा विवाह कर गए. बहुओं को आशीष दे गए. मैंने तो सब देख लिया. अब तो बस एक ही इच्छा बाकी है, इसी घर में अपने बिस्तर पर प्राण निकले.”
नहीं बता पाई तुरंत कि उनकी यह इच्छा अब पूरी नहीं होनेवाली. मकान तो बिक चुका है. बिल्डर ने ख़रीदा है. इसे पूरा तोड़कर फ्लैट बनाकर बेचने हैं उसे. सो चुपचाप बैठक में ही सौदा हो गया और मां को ख़बर भी नहीं लगी. मां को अपने घर लाने के दो कारण थे. एक तो यह कि पीछे से भाई मकान शिफ्ट कर लें. ‘मां के सामने घर खाली करने में जाने उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी’ यह सोचकर डरते थे. दूसरी बात यह कि मां को अपने घर लाकर मुझे उन्हें धीरे-धीरे राज़ी करवाना था, ताकि उन्हें झटका न लगे और यह ज़िम्मेदारी मैंने स्वयं उठाई थी.

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मेरे छोटे दोनों भाई जुड़वां थे- भोलू और बबलू. बाकायदा नाम थे उनके- सार्थक और ओजस, परंतु मां और मेरे लिए वे जीवनभर भोलू और बबलू ही बने रहे. भोलू बड़ा होकर फौज में चला गया और उससे दस मिनट छोटा बबलू बैंक अधिकारी बन गया. भोलू तो अक्सर ही अलग-अलग जगह पर भेजा जाता. मां को इस तरह का जीवन पसंद नहीं था. बहुत कहने पर वह एक-दो बार भोलू के घर गई थीं. पापा की नौकरी में बहुत जगह घूमी थीं. अब न वह उत्साह बचा था, न हिम्मत. सभी रिश्तेदार भी इसी शहर में अथवा आसपास थे. अतः उनका यही आग्रह रहता कि भोलू ही छुट्टियों में परिवार के साथ आकर सब को मिल जाए.
अभी तक तो जहां भी भोलू का तबादला होता, उसे फर्नीचर के साथ सुसज्जित घर मिलता था. पर एक दिन तो उसे कहीं अपना ठिकाना बनाना ही था. सो उसने पूना में अपने लिए फ्लैट बुक करा लिया. पैसों की ज़रूरत पड़ी, तो उसने सुझाव रखा कि यह पुराना मकान बेचकर दोनों भाई अपना अलग-अलग फ्लैट ख़रीद लें. हो सकता है कि उसके मन के भीतर कहीं यह बात रही हो कि बबलू के परिवार के वहां रहने से कहीं पूरा मकान उन्हीं का ही न हो जाए. ख़ैर, उसके मन की बात तो वही जाने, पर देखा जाए तो मकान बेचने में कोई हर्ज़ भी नहीं था. मकान बहुत पुराने ढंग का बना हुआ था. रसोईघर बाहर आंगन में और आंगन के दूसरे कोने में स्नानघर और शौचालय.
आजकल इतने सुविधाजनक घर बन रहे थे. बाथरूम, रसोई सब कमरों से जुड़े हुए. एसी चलाकर पूरा घर ठंडा कर लो और कहीं जाना हो, तो एक ही किवाड़ बंद करने से पूरा घर बंद हो जाता है. पहले की दीवारें मोटी-मोटी बनी हुई थीं, अब बीम डालकर पार्टिशन बना देते हैं, ताकि कमरे बड़े हो जाएं.
पर मां का दिल भी कोई नहीं दुखाना चाहता था. अतः यही तय हुआ कि मैं उन्हें घर ले जाकर थोड़ा-थोड़ा करके बताऊं. मैं नए बन रहे सुविधाओं से परिपूर्ण मकानों की चर्चा छेड़ देती. अपनी दो सहेलियों के घर बहाने से ले जाकर उनके नए फ्लैट भी दिखाए. उनकी ख़ूबियां गिनवाईर्ं. आख़िरकार इस बात के लिए राज़ी करवा लिया कि पुराना मकान बेचकर दोनों भाई अपना-अपना फ्लैट ले लें.
मैंने तुरंत यह बताने की ज़रूरत नहीं समझी कि मकान बिक चुका है और दोनों ने अपने लिए नए फ्लैट भी चुन लिए हैं. सदैव की भांति मां ने अपने बच्चों की ख़ुशी को अपनी इच्छा के ऊपर रखा था. पुराने दिन याद करती हूं, तो ढूंढ़ने से भी नहीं मिलता कभी वह क्षण जब मां ने अपनी इच्छा को परिवार से ऊपर स्थान दिया हो. और परिवार से मेरा मतलब स़िर्फ हम भाई-बहनों से नहीं है. बुआ आई हैं, तो अपने लिए ली हुई साड़ी भी उठाकर दे दी.‘बेटी खाली हाथ थोड़े ही जाएगी.’ आप सोचोगे उनके पास आलमारी भर कपड़े होंगे, जबकि बाहर पहनने के लिए कोई ढंग की साड़ी न होने पर पिछले माह यही साड़ी ज़बर्दस्ती दिलवाई थी. सेवइयां बनाने की नई मशीन पड़ोसवाली आंटी को पसंद आई तो ‘पहले आप बना लो मैं तो बाद में बना लूंगी’ कहकर पकड़ा देतीं, पर मकान बेचना और बात थी. उसकी हामी भरने के लिए मां ने जी कितना कड़ा किया होगा यह मैं समझ सकती थी, पर इसके अलावा चारा ही क्या था?
भैया-भाभी नए घर में सामान लगा चुके और फोन किया कि मां को ले आऊं. मैंने मां को अपने नए घर में जाने के लिए उत्साहित किया. वह जाने को तैयार बैठी थीं. वह आज भी बेटी के घर में रहने में असहज महसूस करती थीं और पहली बार वह मेरे घर इतने दिन रुकी थीं अथवा कहूं कि किसी न किसी बहाने मैंने उन्हें रोके रखा था.

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एक पॉश कॉलोनी में नई बनी बिल्डिंग की पहली मंज़िल पर बढ़िया बना फ्लैट है बबलू का. लिफ्ट भी लगी है. मैं तो एक बार पहले भी चक्कर मार गई हूं. पर अब फर्नीचर सेट हो जाने से और पर्दे लग जाने से उसकी शक्ल ही बदल गई है और वह घर लगने लगा है. मां का सामान सामने की तरफ़ बने खुले हवादार कमरे में रखा गया है. आगे एक छोटी-सी बालकनी भी है. बाथरूम साथ जुड़ा है, सो ठंडी-गर्मी में आधी रात बाहर जाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. डबल बेड है और दो बड़ी अलमारियां. एक में भाभी ने बेड कवर, तौलिया इत्यादि सामान रखा हुआ है, दूसरी में मैंने मां के कपड़े लगा दिए हैं. एक ड्रेसिंग टेबल भी है. “मां होटल का कमरा मिल गया है तुम्हें, तो मज़े से रहो.” मैंने मां को छेड़ते हुए कहा. “ड्रॉइंगरूम से जुड़ा होने के कारण आने-जानेवालों की रौनक़ भी रहेगी.”
शाम को बबलू के एक सहयोगी उसके साथ ही घर आए हैं. उनका भी फ्लैट ख़रीदने का इरादा है, जिसके लिए वह सर्वे कर रहे हैं. शशि भाभी घूम-घूम कर उन्हें अपना नया घर दिखा रही हैं. हम भी उनकी प्रसन्नता से प्रसन्न हैं. “एक कमरा शशि-बबलू का, बेटे-बेटी का अलग-अलग कमरा और यह एक गेस्ट रूम भी है.” भाभी ने मां के कमरे की ओर बढ़ते हए कहा.
गेस्टरूम? मुझे कुछ अटपटा-सा लगा. मेरे दिमाग़ में तो वह मां का कमरा ही है.
ख़ैर, मां अपने कमरे से ख़ुश हैं. कमरे की बालकनी से नीचे काफ़ी हरियाली दिखाई देती है और बालकनी में भी बहुत से गमले रख लिए हैं उन्होंने.
दो-ढाई महीने बीतते कि मां का टेलिफोन आया. वह पूना जा रही हैं भोलू के पास उससे मिलने. मां को इस उम्र में सफ़र करना मुश्किल लगता है, परंतु भोलू ने सब इंतज़ाम कर दिया है. सामान बंधने से लेकर स्टेशन ले जाने का काम भोलू का अर्दली मुस्तैदी से कर रहा है और मां का हाथ पकड़कर बड़े ध्यान से उन्हें ले गया है. मां ने भी मन को समझा लिया है कि एक बार भोलू का नया घर भी देख ही आऊं. छह महीने बाद लौटीं, तो बहुत ख़ुश थीं. साफ़-सुथरा शहर, बढ़िया मौसम. यहां आकर तो ठंड के मारे बुरा हाल था. उस पर सूर्य नारायण हफ़्तों बिस्तर में दुबके रहते. कपड़ों की अटैची खोली, तो पाया शॉल और स्वेटर तो वहीं रह गए हैं. यूं तो पता था पूना में ऐसी ठंडी नहीं पड़ती, परंतु सोचा ज़रूरत पड़ गई तो? एक स्वेटर और शॉल रखने में क्या हर्ज़ है. वहां मां ने दोनों सबसे ऊपरवाली शेल्फ में रख दिए और छूट गए. गर्म कपड़े तो और भी हैं ‘पर शॉल मुलायम-सी थी. वह स्वेटर भी सब कपड़ों के साथ चल जाता था.’ मां अक्सर दोहरातीं. आ भी जाएंगे, परंतु ज़रूरत तो अभी है न!
भोलू-बबलू ने यह तय किया था कि मां अपने दोनों बेटों के पास छह-छह महीने रहेंगी. मां के जाने के बाद मुझे बताया था बबलू ने. तब तो मुझे भी लगा कि चलो अच्छा है घूमने-फिरने से मां का मन बहला रहेगा. और भोलू का अर्दली ऐसा ध्यान रखता है कि घर का सदस्य भी न रख पाए. पापा की नौकरी में भी वह अनेक जगह रही हैं, कई शहर बदले हैं. पर मां को अब सफ़र करना मुश्किल लगने लगा था. शायद एक उम्र होती है, जिसमें घूमना-फिरना अच्छा लगता है, क्योंकि तब मन में उत्साह होता है, नई जगह देखने की ललक होती है एवं नई चुनौतियों का मुक़ाबला करने का भी एक आनंद होता है.

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छह महीने देखते-देखते बीत जाते. और मां को बबलू के पास लौटते ही लगता कि वह तो यहां मेहमान हैं और छह महीने बाद तो फिर उन्हें जाना है. नए घर में मां की मैत्री आसपास के बहुत कम लोगों से ही हो पाई है. पुराने घर की बात और थी. सभी जानते थे उन्हें वहां. बाद में बहुएं बनकर आई थीं, वे भी मां के साथ हिल-मिल गई थीं. कोई स्वेटर बनाते-बनाते कंधा अथवा गला घटाने का हिसाब पूछने आ जाती, तो कई मां से उनके जैसी कढ़ी सीखने. यहां मां को यह घर ही अपना नहीं लगता, तो आसपास के लोगों से अपनत्व कैसे महसूस हो? वह पुराना घर उनका अपना घर था. हालांकि उन्होंने कभी भी वहां बेटे अथवा उसके परिवार को मेहमान नहीं माना था, परंतु इस घर में वह स्पष्टतः मेहमान ही हैं. घर तो उनके बेटे-बहू का है.
आजकल मां को अपने पुराने घर की बहुत याद आती है. वह घर पुराना था, असुविधाजनक था, परंतु वह उनका अपना घर था. आंगन में रोपी वह मोगरे की बेल, अपने आप उग आया वह नीम का पेड़ उनका अपना था. यहां तो बालकनी में उनके स्वयं के लगाए पौधे भी उनके अपने नहीं. जब वे स्वयं ही यहां मेहमान हैं, तो यहां की कोई वस्तु उनकी कैसे हो सकती है?

 

         उषा वधवा

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कहानी- फाउल (Short Story- Foul)

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बाप रे! एक भी उत्तर इस तरह नहीं दे रही है कि कोई सुराग मिले. तो क्या व़क़्त आ गया है स्पष्ट पूछने का कि तुमने किसी से प्रेम किया है? किसी की हरे रंग की शालूवाली बनी हो? क्या तुम्हारे परिवार की मर्यादाएं भी प्रेम पर आकर भंग होती हैं? पर ऐसा कोई एपीसोड इसके जीवन में न हुआ, तो यह कितना बुरा मानेगी कि मुझे अपने जैसा धूर्त समझा है? अभिज्ञान यह पूछने का साहस न दिखा सका.

अभिज्ञान को लगता है वह अलग-अलग तरह से स़िर्फ सोचता आ रहा है. उसने जो काम सबसे अधिक किया है, वह है सोचने का. अब तक कुछ नहीं किया है सिवाय सोचने के. जब नई-नई जवानी के दिन थे तब सोचता था कि ‘गुलेरी’ की कहानी ‘उसने कहा था’ की हरे रंग की शालूवाली एक उसकी ज़िंदगी में भी आये, तो वह आई, जब वह इस विकासशील नगर के सुस्थापित अधिवक्ता अयोध्या प्रसाद के अण्डर में वकालत सीख रहा था. अयोध्या प्रसादजी के चैम्बर में उस व़क़्त पांच जूनियर थे. चार लड़के और पांचवीं वही… जो अंततः हरे रंग की शालूवाली निकली. चारों लड़के उस पर समान भाव से फिदा थे, पर वह अभिज्ञान पर फिदा हुई. अभिज्ञान इसे एक उपलब्धि की तरह देखता था.
पर शायद सभी हरे रंग की शालू वालियां एक-सी क़िस्मत लिखाकर लाती हैं. इस प्रकरण में इतनी भर विविधता हुई कि कुड़माई शालूवाली की नहीं, अभिज्ञान की हो गई. जैसा कि आरंभ में ही स्पष्ट किया गया है, अभिज्ञान अलग-अलग तरह से सोचता आ रहा है तो उसने सोचा कुड़माई का कड़ा विरोध करेगा, पर नहीं कर पाया. उसे लगता है वह तीन भाइयों और एक बहन में सबसे बड़ा है, पर उसकी हमेशा कम सुनी गई है. कारण बहुत साफ़ है, मझला भाई ध्वज एम.डी. कर रहा है, छोटा भाई धरम एम.बी.ए. कर अभी-अभी एक मल्टीनेशनल कंपनी में आकर्षक वेतन पर लगा था, जबकि अभिज्ञान कुछ ख़ास नहीं कर पाया था, जिसका परिणाम पूरा परिवार भुगत रहा था. दोनों छोटे भाइयों के लिये शानदार वैवाहिक प्रस्ताव निरंतर आ रहे थे, जबकि अभिज्ञान के लिये प्रस्ताव आ नहीं रहे थे और जो आ रहे थे, वे उस गौरव को कम कर देते थे जो इस परिवार को दोनों छोटे लड़कों के कारण प्राप्त हो रहा था. ऐसी संवेदनशील स्थिति में भाग्य से आये मनीषी के प्रस्ताव पर बाबूजी ने अभिव्यक्ति दे दी.
“अभिज्ञान, बेवकूफ़ी छोड़ो और हमें कुछ जीने दो… क्या यह शोभा देता है कि एक तुम्हारी वजह से मैं उन बड़े-बड़े लोगों को कोई उत्तर न दूं, जो ध्वज और धरम के लिये आ रहे हैं?”
“तो ध्वज और धरम की शादी कर दीजिए.”
“बड़ा बैठा रहे और छोटों की शादी हो जाये तो इस खानदान की प्रतिष्ठा बची रहेगी?”
“तो पहले मेरी कर दीजिए, सुहानी से.”
“यह नहीं होगा. निम्न वर्ग की लड़की विप्र कुल में नहीं आयेगी. और तुम इश्क़ में निकम्मे न बनो. बड़े इंतज़ार के बाद यह जो प्रस्ताव आया है, इसकी कद्र करो. मैं न जानता था अयोध्या प्रसाद के चैम्बर में वकालत नहीं इश्क़ सिखाया जाता है… तुम्हारा कैरेक्टर ख़राब हो गया.”
अभिज्ञान क्या-क्या तो सोच रहा था. वह और सुहानी जल्दी ही अयोध्या प्रसाद से अलग होकर पार्टनरशिप में स्वतंत्र वकालत शुरू करेंगे, विवाह करेंगे और दुनिया को मुट्ठी में कर लेंगे और यहां पता नहीं क्या हुआ जा रहा था उसे.

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वह पता नहीं कितना कुछ सोचता रहा और एक रात जब पता नहीं कितना बजा था तब बहन ने उसे उसके कमरे में ठेल दिया इस उम्मीद के साथ कि घर में जबरन बस जानेवाली फाख़्ता से भी मोह हो जाता है, मनीषी तो कमनीय कन्या है. वह ठिठका रहा, क्या करे अब इस मनीषी नाम की परिणीता का? कैसे स्वीकारे? पर मनीषी ज़हीन निकली. वह सो चुकी थी. अभिज्ञान अपने ही कमरे में अपने ही बिस्तर की छोटी-सी जगह में इस तरह सिकुड़ कर बैठा रहा मानो अब वह बिस्तर उसका नहीं था. देर तक व्यर्थताबोध में बैठा रहा, फिर सोचने लगा मनीषी को जगाये और वकील से सधे अंदाज़ में प्रश्‍न पूछे, “यह विवाह तुमने क्यों किया? मर्ज़ी से किया या…? तुमने कभी प्रेम किया है? बनी हो किसी की हरे रंग की शालूवाली? नहीं? तो फिर मेरे प्रश्‍नों का सही उत्तर नहीं दे सकोगी. बहुत अंतर होता है प्रेम करनेवालों और न करने वालों के अनुमान और मानसिकता में.”
विचित्र था मनीषी का अंदाज़े-बयां. वह चुप रहती थी. अभिज्ञान उसकी इस चुप्पी पर हैरान था. अम्मा बात-बात में बड़बड़ाती हैं, बहन बात-बात में पैर पटकती है, सुनने में आया है ससुराल में भी उसकी आदत गई नहीं है. सुहानी बात-बात में हंसती है. मौन रहनेवाली लड़की शायद यह पहली ही है, जबकि मनीषी का मौन घरवालों को कृतज्ञ किये था. इस तरह के बहुत से प्रश्‍नों से बचे हुए थे. वे मनीषी के प्रति संवेदनशील होते जा रहे थे. बाबूजी ने एक बार फिर समझाया, “अभिज्ञान, अब तुम पर एक ज़िम्मेदारी है. स्वतंत्र रूप से वकालत क्यों नहीं शुरू करते?”
“सोच रहा हूं, सुहानी के साथ पार्टनरशिप में शुरू कर दूं.”
“एक स्त्री और एक पुरुष की पार्टनरशिप जैसा कुकाण्ड इस शहर में अब तक नहीं हुआ है. लोग तुम्हें केस तो क्या देंगे, मु़फ़्त तमाशा ज़रूर देखेंगे.”
“हम दोनों वकील हैं, पुरुष-स्त्री जैसी बात बीच में क्यों लाते हैं?”
वस्तुतः यह एक विचित्र स्थिति थी. मनीषी से विवाह कर अम्मा-बाबूजी की हसरत पूरी कर देने के साथ ही अभिज्ञान मानो दबाव से मुक्त हो गया था और अपनी मर्ज़ी चला कर अम्मा-बाबूजी दबाव में आ गये थे. दोनों पक्ष इतनी सावधानी व सतर्कता ज़रूर बरत रहे थे कि उनके आपसी अवरोध-प्रतिरोध मनीषी तक न पहुंचें और हालात एक दिन सुधर जाएंगे.
इधर मनीषी अम्मा-बाबूजी की जद्दोज़ेहद और अभिज्ञान के फितूर से ख़ुद को पूरी तरह अलग रखे हुए थी. यहां तक कि वह जब मायके जाने लगी तब भी उसने अभिज्ञान से बात न की. अभिज्ञान ने सोचा था, वह इतना तो ज़रूर पूछेगी और पूछना ही चाहिए कि आख़िर आप इस तरह छिटके हुए क्यों हैं? नहीं पूछा. यह नहीं, पर कुछ तो पूछती. तब अभिज्ञान ने पूछा, “मायके जा रही हो? पैसे हैं न?”
“अम्मा ने दे दिये हैं. वैसे वहां पैसे की क्या ज़रूरत होगी?” मनीषी ने आंखें झुकाए हुए कहा. तो अम्मा ने पैसे दिये. बीच में ध्वज आया था, तो इसके लिये साड़ी और चूड़ियां लाया था. तो हर कोई इस पर चाहतें लुटा रहा है कि फिर यह एक दिन प्रसन्न करेगी. ख़ैर, मैं प्रसन्न होने से रहा. यह मायके जा रही है फ़िलहाल यह प्रसन्नता ज़रूरी है. बड़े दिन हुए अपने ही कमरे में अजनबी की तरह सोते हुए. ख़ूब पसर कर सोऊंगा… पर रात तो आई, नींद नहीं आई. वही सोचने की बीमारी. क्या कोई लड़की इतनी शांत हो सकती है? लगभग अनुपस्थित, अदृश्य. मनीषी इतने दिनों यहां रही, क्या सोचती रही होगी? मौन रहकर क्या इस रिश्ते को अमान्य कर रही है? या एहतियात बरत रही है कि सब ठीक हो जायेगा? या चुनौती दे रही है कि ऐसे आदमी का तिरस्कार ही करना चाहिए? पर मनीषी से मुझे क्या प्रयोजन? मैं इतना क्यों सोच रहा हूं? यह सोचना थमता क्यों नहीं?

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घर में ये सब चल रहा था तो घर से बाहर भी वारदातें हो रही थीं. जैसे कि सुहानी ने बताया, “अभिज्ञान, मेरी शादी हो रही है. तुम पुरुष होकर ज़माने से न लड़ सके, फिर मैं कब तक लड़ती? वकालत में भी काम नहीं जम पा रहा है. वकालत ने काले कोट के अलावा कुछ न दिया, तुमने दी निराशा. ज़माने ने बनाया तमाशा… तो तुम्हीं कहो क्या करती?” अभिज्ञान के सामने मानो बिजली गिरी. इसी सुहानी ने तो कहा था, “अभि, तुम्हारा विवाह भले ही हो गया, हमारा इश्क़ ठंडा नहीं पड़ना चाहिए.” इसी दम पर तो मनीषी से मतलब न रखा. अभिज्ञान अपमान, अवमानना, अवमूल्यन जैसी अकबकाहट से भर गया. सचमुच जगत मिथ्या है. सिद्धांत या आदर्श जैसा तो कुछ रहा ही नहीं.
सुहानी के विवाह को अभिज्ञान के घर में चमत्कार के तौर पर देखा गया- अम्मा ने भगवान को बूंदी के लड्डुओं का भोग चढ़ाया.
मनीषी ने पूछा, “यह किस ख़ुशी में अम्मा?”
“उस मुसुटिया (चुहिया) के बियाह की ख़ुशी में.” अम्मा विहंस कर बोलीं.
मुसुटिया के बियाह की प्रतिक्रिया क्या रही, जानने के लिए अभिज्ञान ने हठात मनीषी को देखा. वहां ईर्ष्या या द्वेष जैसा कोई भाव नज़र नहीं आया. अभिज्ञान का सोचना तेज़ हो गया. तो मनीषी को इस प्रेम-प्रसंग की जानकारी है? क्या अम्मा ने संज्ञान दिया कि जैसे भी हो, तुम अभिज्ञान को मुसुटिया के जाल से निकालो? तो क्या मनीषी की दृष्टि में मेरी छवि ध्वस्त हो चुकी है? और यही है इसके मौन का कारण…?
उधर सुहानी फिर कचहरी में नज़र न आई. इधर मनीषी का तटस्थ भाव. अभिज्ञान की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? न घर में लगे दिल न बाहर. बाबूजी ने उसकी उलझन भांपी और बड़े दिनों बाद दुलार से उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, “अभिज्ञान, तुम्हारी परेशानी यह है कि तुम सकारात्मक नहीं सोचते.”
सकारात्मक सोचने का क्रम कुछ यूं जमा. आख़िर मनीषी इतनी चुप क्यों रहती है? कुछ सोचती नहीं मेरे बारे में? अम्मा द्वारा ध्वस्त की गई मेरी छवि के बारे में? क्या कभी भी मुझमें रुचि नहीं लेगी? सोचा था रोने-धोने, मनावन-रिझावन, उठा-पटक, ध्वंस- जैसा कुछ होगा, पर यहां तो ऐसी शांति बहाल है कि अब अड़चन होने लगी है. रात में यह जल्दी सो जाती है. दिनभर काम में लगी रहती है. अब पूजा कर रही है… अब खाना बना रही है… अम्मा-बाबूजी को खिला रही है- कपड़े धो रही है- यह थकती-खीजती, ऊबती नहीं? इसकी कोई अपेक्षा, उम्मीद, साध नहीं? नहीं, सुहानी अभिज्ञान के जेहन से गई नहीं थी. वह मनीषी को लेकर धड़कन, संवेदन, स्पंदन भी अपने भीतर नहीं पा रहा था, पर पता नहीं क्यों चाहने लगा था कि मनीषी इस तरह तुच्छ बनकर न रहे, बल्कि कायदे से रहे, तो अम्मा से बोला, “अम्मा, ऐसे तो यह बीमार हो जायेगी. थोड़ा भी आराम नहीं करती.”
अम्मा मोद मगन हो गई, “तुम्हें फ़िक़्र होने लगी?”
“फ़िक़्र की क्या बात…” कहकर अभिज्ञान ने लापरवाही दिखानी चाही, पर उसे सचमुच फ़िक्र होने लगी थी. यही कि कुछ गड़बड़ है. इसके मौन के कुछ मायने हैं. यह कि मैं ही दूर नहीं भाग रहा हूं, मनीषी भी मुझसे दूर भाग रही है. यह भी मुझे स्वीकार नहीं कर रही है. यह भी मुझे एक हस्तक्षेप की तरह देख रही है. और बिल्कुल करिश्माई ढंग से उसने यह भी सोचा कि यह भी किसी से प्रेम करती है जैसे कि मैं… उफ्, यह क्या करती है इससे मुझे क्या? मैं यह सब क्यों जानना चाहता हूं? क्योंकि मुझे जानना चाहिए. मैं इसके बारे में जानू यह मेरा नैतिक, मौलिक, संवैधानिक अधिकार है. और कुछ न बताकर यह मेरे अधिकारों का हनन कर रही है. तब अभिज्ञान ने पूछ ही लिया, “तुम्हें यहां अच्छा लगता है?”
“हां.”
“उस दिन अम्मा जो मुसुटियावाली बात कर रही थीं, ऐसा कुछ सुनकर भी?”
“उसमें आपका दोष नहीं है, क्योंकि बहुत से लोग प्रेम करते हैं.”
“तो तुम्हें आपत्ति नहीं है?”
“मेरी आपत्ति पर ध्यान कौन देता है?”
“क्या तुम्हें लगता है कि ये बातें तुम्हें न बताई जातीं तो बेहतर होता?”
“बातें छिपाना भी ठीक नहीं.”

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बाप रे! एक भी उत्तर इस तरह नहीं दे रही है कि कोई सुराग मिले. तो क्या व़क़्त आ गया है स्पष्ट पूछने का कि तुमने किसी से प्रेम किया है? किसी की हरे रंग की शालूवाली बनी हो? क्या तुम्हारे परिवार की मर्यादाएं भी प्रेम पर आकर भंग होती हैं? पर ऐसा कोई एपीसोड इसके जीवन में न हुआ, तो यह कितना बुरा मानेगी कि मुझे अपने जैसा धूर्त समझा है? अभिज्ञान यह पूछने का साहस न दिखा सका. इतना ज़रूर हुआ कि उसने मनीषी को बहुत गौर से देखा. मूर्त आकृति की तरह बैठी मनीषी के नैन-नक्श बहुत धारदार तो नहीं हैं, पर दूधिया स्निग्ध त्वचा चेहरे को स्वस्थ-सुंदर लुक देती है.
मनीषी का मौन अभिज्ञान को गैरक़ानूनी-सा लगने लगा. एक वह दिन था जब सोचा था इसकी सूरत नहीं देखेगा. एक यह दिन है जब लग रहा है यह कुछ बोले. अपने ग़ुस्से-चिढ़ का प्रदर्शन करे, प्रतिसाद करे, अभियोग ही लगाये. यह क्या है कि कमरे में मैं अवांछित-सा पड़ा हूं यह विरक्त-सी पड़ी है. वह बेचैन होकर कहने लगा,
“मनीषी, तुम अपनी दशा पर ख़ुश हो?” वह पत्नी को पहली बार नाम से
पुकार रहा था.
“हां.”
“यह जानने के बाद भी कि मैं ऐसा क्यों हूं?”
“आप कैसे हैं?”
“तुम्हें निराश किया.”
“नहीं तो.”
“तुम कुछ और चाहती थी?”
“मैं समझी नहीं.”
प्रेम-प्रसंग की सीधे जासूसी न कर उसने सभ्यता से काम लिया, “तुम स्टेट लेवल की बैडमिन्टन प्लेयर रही हो न… तो मेरा मतलब शादी के बाद करियर में रुकावट तो नहीं पाती हो? तुम अपने जिले की बेस्ट महिला खिलाड़ी मानी जाती थी न?”
“हां.”
“तो ग्राफ़ में जीत अधिक दर्ज है कि हार?”
“सिंगल्स, डबल्स में कुछ बार हारी हूं, पर मिक्स्ड में हमेशा जीती हूं.”
मिक्स्ड डबल्स… कौन था, इसका साथी? खेलने के अलावा और क्या काम करता होगा? क्या उम्र होगी? दोनों के बीच अनुराग जैसे तत्व…
“जब मायके जाती हो तब खेलती हो?”
“नहीं. खेल किसी के लिये नहीं रुका रहता. वहां दूसरे खिलाड़ी आ जाते हैं.”
“मिक्स्ड डबल्स में…” मनीषी ने उत्तर देने में तत्परता दिखाई, “मेरी जगह मिहार आ गई है. अच्छा तालमेल बना लिया है.”
“मिहार को अपनी जगह देखकर तुम्हें बुरा लगा?”
मनीषी ने इतना भर कहा, “खेल और ज़िंदगी के नियम अक्सर एक से होते हैं. जगहें भर जाती हैं.”
मनीषी का मौन और अभिज्ञान की बढ़ती मुश्किलें. दरअसल सब कुछ उल्टा हो गया था. सोचा था, वह भाग रहा होगा और यह रिझा रही होगी. लेकिन हुआ यह कि वह भाग रहा था, यह सिमट रही थी. उसका भागना थम गया, इसका सिमटना जारी रहा. अभिज्ञान प्रेम में वहशी होकर कपड़े फाड़कर न तो सड़क पर घूम रहा था, न वैरागी बन भगवा धारण कर सका था. तो अब आवश्यकता और उपयोगिता के मद्देनज़र वह समन्वय पर आना चाहता था.
सकारात्मक सोचना चाहता था. तो सकारात्मक सोचते हुए उसने पाया कि वैसे तो उसने मनीषी पर ज़ुल्म नहीं किया है, पर फिर भी किया है. वह ख़ुद को गुनहगार पाने लगा, लज्जित हो गया, फिर क्षमाप्रार्थी की तरह मनीषी के सामने प्रस्तुत हुआ,
“मनीषी, तुम्हें मेरे बुरे व्यवहार से दुख तो ज़रूर पहुंचा होगा.”
“नहीं.”
“मैं क्या करता? मेरी मनःस्थिति तब क्या रही होगी. वह समय मैंने कैसे बिताया, तुम अनुमान नहीं लगा सकती.”
“लगा सकती हूं.”
“जो हुआ, मुझे उसका अफ़सोस है.”
“अफ़सोस न करें. आपके व्यवहार से मुझे सुविधा हो गई. मुझे ख़ुद को संभालने का समय मिल गया.” मनीषी ने अब भी आंखें झुका रखी थीं और आंखों पर ये जो पलकें तनी हुई थीं, वे भापने न देती थीं, आंखों में क्या ठहरा हुआ है? कोई कसक, कोई चुभन, अफ़सोस, पीछे छूट गई कोई स्मृति… अभिज्ञान को अनायास मिक्स्ड डबल्सवाले का ख़याल आ गया. तो घटा है कुछ मनीषी के साथ भी? नहीं कर पाई होगी मां-बाप का विरोध, रहे हैं कुछ अनिश्‍चय? भूलने में लगा होगा व़क़्त… और अब संभल रही है… ठीक मेरी तरह…
अभिज्ञान ने मानो बेसुध में पूछा, “तो क्या तुमने भी कुछ फाउल किये हैं?”
“हां, खेल की तरह ज़िंदगी में भी फाउल होते हैं, पर सच यह भी है कि फाउल के बाद हम सम्भलते भी हैं.”
और यह पहली बार हुआ जब मनीषी ने आंखें उठाकर अभिज्ञान को भरपूर देखा.
अभिज्ञान के चेहरे पर ज़बर्दस्त बदलाव का दौर था. पहले बिजली गिरी, फिर अकबकाहट हुई, फिर सकारात्मक भाव उदित हुआ. यही कि घर में जबरन बस जानेवाली फाख़्ता से भी मोह हो जाता है, यह तो कमनीय कन्या है.

 

   सुषमा मुनीन्द्र

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