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कहानी- सच्चा समपर्ण (Short Story- Sachcha Samarparn)

वैसे भी अरेंज मैरिज में होता भी तो यही है, दो अजनबियों को मां-बाप एक ही छत के नीचे ताउम्र रहने को बांध देते हैं. एक घर, एक ही छत शेयर करने तक तो ठीक है, फिर तुरंत ही एक ही बिस्तर शेयर करना… और फिर तुरंत ही बच्चा…?

Hindi Short Story

हद हो गई…! कल तक जो लोग शर्मोहया को लड़की का गहना… और न जाने क्या-क्या कहते थे, वो ही आज लड़की को बेशरमी का पाठ पढ़ा रहे हैं! क्या है इस दोगलेपन की वजह? क्यों पैदा होते ही लड़की को मार नहीं देते थे लोग…? मेरे ये आक्रोश भरे शब्द क़लम से नहीं भीतर कहीं हृदय से निकल रहे हैं, जहां ज्वालामुखी सुलग रहा है. उसी का लावा शब्द बनकर फूट रहा है. अभी हाथों की मेहंदी को छूटे महीनाभर ही हुआ था कि ख़ुशख़बरी की फ़रमाइशें होने लगीं, “भाभी, हमारे घर नन्हा-मुन्ना कब आएगा?”

“अब देर नहीं, भले ही दूसरा बच्चा पांच साल बाद कर लेना.” मांजी उम्मीद भरी आवाज़ में कहतीं. मैं सकुचा कर पैर के अंगूठे से ज़मीन कुरेदती रह जाती. इतनी जल्दी…? अभी तो साहिल को ठीक तरह से जान भी नहीं पाई हूं मैं. वैसे भी अरेंज मैरिज में होता भी तो यही है, दो अजनबियों को मां-बाप एक ही छत के नीचे ताउम्र रहने को बांध देते हैं. एक घर, एक ही छत शेयर करने तक तो ठीक है, फिर तुरंत ही एक ही बिस्तर शेयर करना… और फिर तुरंत ही बच्चा…?

मेरी कड़वाहट का एहसास घर भर में स़िर्फ साहिल को है. सगाई और शादी के बीच मात्र पन्द्रह दिनों का अन्तराल, उसमें स़िर्फ दो बार फ़ोन पर हुई औपचारिक बातचीत क्या किसी को इतना क़रीब ला सकते हैं? इतना क़रीब, जहां से सृजन की कल्पना की जा सके?

यूं भी मैं विवाह पूर्व इसी रिश्ते से भयभीत रहती थी, क्योंकि बेहद संकोची स्वभाव, किसी के इस तरह अंतरंग होने की कल्पना भर से ही सिहर उठता था, किंतु मेरी क़िस्मत अच्छी निकली.

विवाह की पहली रात ही अपनी समझदारी का परिचय देते हुए कहा था साहिल ने, “मैं तुम्हारे डर से वाकिफ़ हूं. पहले तुमसे दोस्ती करना चाहता हूं, क्योंकि मैं जानता हूं तुम बचपन से ही लड़कों से दूर रही हो, इसलिए सामाजिक मान्यताओं पर मत जाना. मेरी ओर से तुम पर कभी कोई प्रतिबंध नहीं होगा. तुमसे गहरा भावनात्मक संबंध कायम करना चाहता हूं. जब ख़ुद को तुम्हारे भरोसे के क़ाबिल महसूस करने लगूंगा, तभी तुम्हें हाथ लगाऊंगा. अपने अधिकारों का इस्तेमाल करके एक हृदयविहीन तन को जीतना न प्रेम होता है, न ही पौरुष! तुम्हें जितना व़क़्त लगे मैं प्रतीक्षा करने को तैयार हूं, मगर प्लीज़, कभी भी बेमन से या डर से समर्पण मत करना आभा. मैं तुम्हारे सच्चे प्रेम का इच्छुक हूं. मन की दहलीज़ पार किए बिना मैं कोई दूसरा रिश्ता कायम नहीं करना चाहता.”

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मैं आश्‍चर्यचकित हो गई. भाभी, दीदी और सहेलियों ने जो पति के बारे में समझाया था, उससे सर्वथा अलग और मेरे मन के व्यक्ति से मेल खाता पति पाकर मैं धन्य हो गई.

और फिर दो ही दिन बाद मैं मायके आ गई. यहां भी ससुराल से संबंधित प्रश्‍नों में पहला प्रश्‍न यही होता, “पति कैसे हैं?” मैं आशय समझकर जान-बूझकर रहस्यमयी मुस्कान फेंक देती. जानती थी कि ये फलसफ़ा किसी के गले नहीं उतरेगा कि हृदयविहीन तन के नहीं, हृदययुक्त, बल्कि प्रेमयुक्त समपर्ण के इच्छुक हैं पतिदेव.

दो-चार दिन बीते ही थे कि पापा के मुंह से निकल पड़ा, “अब तो मुझे भी नानाजी पुकारनेवाला कोई जल्दी ही आए भगवान!” मैं सोचती रह जाती, लड़की को कुंवारेपन में सात तालों में बंद रखने वाले माता-पिता शादी होते ही ये कैसी मानसिकता ओढ़ लेते हैं. जहां पहले किसी लड़के से बात तक करना नागवार गुज़रता था, वहीं अब किसी लड़के के साथ इतनी घनिष्ठता की कामना करना… स़िर्फ इसलिए कि उस लड़के ने सात फेरे लिए हैं उस लड़की से?

क्या सात फेरे ही किसी शर्मीली लड़की की शर्मोहया के सातों द्वार खोलने के लिए काफ़ी होते हैं?… और किसी अनजान ‘पति’ नामक व्यक्ति को अपनाने की शक्ति प्रदान करते हैं? मैं जब-तब अपनी भड़ास डायरी में निकालती रहती. चाहे पूरी दुनिया मुझे अजीब समझे, मगर साहिल की नज़रों में मैं सही थी और वह मुझे तथा मेरी भावनाओं को पूरा सम्मान देते थे. मुझे मेरे खोल से बाहर निकालने के लिए साहिल बहुत प्रयास कर रहे थे. धीरे-धीरे मुझे बहुत अच्छा महसूस होने लगा. उनके सानिध्य में ख़ुद को निश्‍चिंत और सुरक्षित महसूस करती थी.

उनमें मेरे प्रति किसी प्रकार के उतावलेपन को न पाकर मैं इतनी प्रसन्न हो जाती कि बरबस लिख बैठती. ‘अभी भी दुनिया में ऐसे लोग बाकी हैं, जो रिश्तों को ढोते या निभाते नहीं, बल्कि जीते हैं, अपनी शर्तों पर और अपने तरी़के से…’ मैं अब साहिल के साथ बहुत ख़ुश रहने लगी थी. अभी मैं वहां रमने ही लगी थी कि मां का मनुहार भरा आमंत्रण आ गया. “तीन महीने हो चुके हैं विवाह हुए. एक बार आकर मिल जा बेटी, तुझे देखे बिना मन बेचैन हो रहा है.” मां के आग्रह और प्रेम ने मेरे मन में भी जाने की इच्छा पैदा कर दी, मगर साहिल का उदास चेहरा भी बार-बार घूम रहा था आंखों के आगे. अब भावनात्मक लगाव की नींव पड़ चुकी थी दोनों के हृदय धरा पर.

उससे दूर जाने का मन नहीं हो रहा था और मेरे जाने के नाम पर उसकी उदास आंखें जैसे कह रही हों, कैसे गुज़रेगा तुम्हें देखे बिना एक ह़फ़्ता….?  शारीरिक प्रेम से पहले जिस प्रेम की कामना मैंने सच्चे हृदय से की थी, वो हमारे बीच कायम हो चुका था और मन के तारों का जुड़ाव मैं साफ़ महसूस कर रही थी. ‘तो यूं कोई अच्छा लगते-लगते इस क़दर भा जाता है कि उससे बेइंतहा प्यार हो जाता है और उसका साथ अनिवार्य लगने लगता है…’ अब मेरी डायरी में इन सब बातों का समावेश होने लगा.

ख़ैर, ह़फ़्ताभर की इज़ाज़त ले मां से मिलने आ पहुंची. शाम को चाय और पकौड़ों के बीच मां पूछ बैठी, “बेटा तीन महीने हो गए विवाह को, कोई नई ख़बर…..?” मेरा मन ज़रा खिन्न हो गया. “क्यों मां, शादी होते ही यही पहली उम्मीद लगाकर बैठना उचित है? क्या ये सब नहीं पूछोगी… हम दोनों कैसे हैं? आपस में मेल- जोल कैसा है? वगैरह-वगैरह..?” इस पर मां हंस पड़ी, “तुझे देखते ही

समझ में आ गया कि तू सुखी है वहां पर, फिर और क्या पूछूं और शादी-ब्याह का मतलब ही क्या है, वंशबेल आगे बढ़ाने के लिए ही तो माता-पिता बेटे का विवाह करते हैं, ये अरमान तेरे सास-ससुर के मन में भी तो होगा.

वैसे तेरे मन में क्या चल रहा है? अगर फैमिली प्लानिंग का भूत हो तो एक के बाद ही अपनाना वो सब चोंचले.”

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मां के इस वाक्य पर मैं चिढ़ गई, “बस करो मां… अभी हमने कुछ भी प्लान नहीं किया है. अभी तो हमारे रिश्ते की शुरुआत है…” कहते-कहते मैं रुक गई तो मां की सशंकित नज़रों को भांप कर भाभी मुझे ठेलते हुए कमरे में ले गई और कोने में ले जाकर पूछा, “सच बताना दीदी, अभी तक?”

मेरे इन्कार में सिर हिलाने पर वो लगभग बदहवास होकर कहने लगी, “क्या? मगर क्यों, क्या ये शादी उनकी मर्ज़ी से नहीं हुई? क्या आप उन्हें पसंद नहीं?”

मैं अवाक रह गई, “ये सब आप क्या समझ रही हैं भाभी… हम दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल अजनबी थे. क्या क़रीब आने के लिए थोड़ा व़क़्त नहीं लेना चाहिए.”

“थोड़ा व़क़्त, तीन महीने थोड़ा व़क़्त होता है दीदी?” ओह, इसका मतलब भाभी भी इसी मानसिकता की हैं, सोचते-सोचते मैं कह उठी.

“ये मुझ अकेले का नहीं, साहिल का भी निर्णय है.” फिर मेरे शर्मीलेपन को देखते हुए साहिल ने पहली बार मुझसे जो कुछ कहा उसे अक्षरश: दोहरा दिया.

पर इस बात से तो जैसे वहां कोहराम ही मच गया. मेरे शर्मीलेपन को कोसते-कोसते बात साहिल के पुरुष न होने तक पहुंच गई.

मां कह रही थी, “अजीब लड़का है, अरे इसने कहा और उसने मान लिया.”

“अरे कमी है उसमें तभी तो मान गया, वरना ऐसा हो सकता है क्या कभी? पुरुष होकर उसकी इस कायरता के पीछे जाने कौन-सी सच्चाई छिपी है…” ये दीदी के शब्द थे, “कहीं और किसी से तो उसके संबंध…?” मैं हतप्रभ-हैरान मुंह फाड़े कभी इसकी, तो कभी उसकी बातें सुनती जा रही थी. साहिल की शराफ़त को उसकी कायरता, बीमारी चरित्रहीनता-जाने क्या-क्या कहा जा रहा था और मैं अंदर-ही-अंदर उबल रही थी. तभी दीदी ने एक और विस्फोट किया, “तुमने कभी पहल करने की कोशिश नहीं की आभा?” तो मेरे सब्र का बांध टूट गया और मैं चीख पड़ी, “बंद करो आप सब लोग ये बकवास… क्या दोहरी मानसिकता है, शादी से पहले जिस लड़की को सदैव लड़कों से दूर रहना सिखाया जाता है, उसी लड़की को शादी होते ही कौन-से बेशरमी के पंख लग जाते हैं कि उसे ऐसा करना चाहिए?”

मैं बुरी तरह थक गई थी. उस बहस को मैंने दो वाक्यों में समाप्त किया. “ये हमारा नितान्त निजी मामला है और इसमें बोलने का हक़ मैं किसी को नहीं देती.” मेरे तीखे तेवर और शब्दों को सुनकर सभी चुप हो गए.

मेरे जीवन की ये सबसे कड़वी याद है, जिसे मैं ज़ेहन से जितना निकालना चाहती हूं, उतनी ही ये मेरे मस्तिष्क में चिपक-सी जाती है.

आज विवाह के पच्चीस साल बाद डायरी में मैंने इस बात का ज़िक्र किया है, क्योंकि आज यही सवाल मेरी बेटी मुझसे कर रही है.

“ममा, नीलेश और मैं एक-दूसरे से बिलकुल अन्जान हैं, मगर मैं जानती हूं कि आपने उसे मेरे लिए चुना है, तो ज़रूर कुछ सोचकर ही चुना होगा. मुझे आपके निर्णय पर कोई ऐतराज़ नहीं, मगर मुझे शादी से थोड़ा-सा डर लगता है.” कहते-कहते उसकी पलकें झुक गईं. मैं समझ गई कि मेरी बेटी भी वहीं पर खड़ी है, जहां पच्चीस साल पहले मैं खड़ी थी. पढ़ाई-लिखाई में अव्वल रहनेवाली मेरी बेटी प्यार-मुहब्बत और लड़कों से सदा दूरी रखनेवाली मेरी ही तरह संकोची है. लेकिन नीलेश भी कम समझदार नहीं, उसकी समझदारी की वजह से ही मैंने और साहिल ने उसे अपनी बेटी के लिए पसंद किया है.

उसके डर को भांपकर ही मैंने ये डायरी जान-बूझकर उसके कमरे में छोड़ी है, जो उसके डर से बाहर निकालने में उसकी मदद कर सके. और एक बार साहिल को भी खुलकर नीलेश से बात करनी होगी. बाकी कोई कुछ भी कहे… मेरी बेटी को भी सच्चे प्यार का सुख मिले, थोथी और खोखली मान्यताओं का बोझ नहीं… ये सब सोचते हुए मैं उसके कमरे से बाहर निकल आई.

– वर्षा सोनी

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कहानी- माफ़ करना शिखा! (Short Story- Maaf Karna Shikha!)

‘तुम नहीं जानती शिखा, तुम्हें खोने के एहसास ने मुझे किस क़दर झकझोर कर रख दिया था. अगर तुम्हें कुछ हो जाता, तो शायद मैं ख़ुद को कभी माफ़ न कर पाता. माफी के क़ाबिल तो मैं अब भी नहीं हूं, लेकिन तुम साथ हो, तो कम से कम अपने पापों का पश्‍चाताप तो कर सकूंगा.’

Short Story- Maaf Karna Shikha

शिखा जब से हॉस्पिटल से लौटी है, उसे घर में सब कुछ बदला-बदला सा नज़र आ रहा था. उसने एक नज़र पूरे घर पर दौड़ाई और फिर पास खड़े शिखर की तरफ़ देखा. शिखर ने प्यार से उसका माथा चूमा और उसे बांहों में भरते हुए कहा, ”शिखा, अब तुम्हें घर का नहीं, अपनी सेहत का ख़्याल रखना है. घर की चिंता तुम मुझ पर छोड़ दो, मैं सब संभाल लूंगा.” फिर शिखर उसे सहारा देते हुए बेडरूम में आराम करने के लिए ले गए.
शिखा ने सोचा था, जब वो घर पहुंचेगी, तो पूरा घर अस्त-व्यस्त पड़ा होगा. इस हालत में कैसे समेटेगी वो पूरे घर को, लेकिन यहां तो नज़ारा ही कुछ और था. इस परिवर्तन की वजह उसे समझ नहीं नहीं आ रही थी. उसकी हैरानी तब और बढ़ गई, जब उसने अपने बेड पर सुर्ख़ लाल गुलाब का गुलदस्ता और एक पत्र देखा. उसने फिर शिखर की तरफ देखा, शिखर जानते थे कि शिखा को लाल गुलाब बहुत पसंद हैं. इस बार शिखर ने कहा तो कुछ नहीं कहा, लेकिन उनकी आंखें नम हो आईं. वो कुछ कहती इससे पहले शिखर ने उसके होंठों पर अपना हाथ रख दिया और उसे बेड पर लिटाकर किचन की तरफ़ चले गए.
शिखर का ये बदला हुआ रूप उसे अजीब ज़रूर लग रहा था, लेकिन इस बात की ख़ुशी भी थी कि एक्सीडेंट के बहाने ही सही शिखर ने उसका ख़्याल तो रखा, वरना शिखर की बेरुख़ी उसे अंदर ही अंदर खोखला किए जा रही थी.
बेड पर लेटी शिखा देर तक पास रखे गुलदस्ते को निहारती रही जैसे उन सुर्ख़ गुलाबों से कुछ कहना चाहती हो. फिर उसे याद आया, ये पत्र भी तो उसी के लिए है. पत्र में शिखर की चिर-परिचित हैंड राइटिंग देख एक पल को उसे लगा जैसे गुज़रा ज़माना लौट आया है. शादी से पहले हर ख़ास मौ़के पर शिखर उसे पत्र लिखा करते थे. जो बात ज़ुबान से न कह पाते, उसे पत्र के माध्यम से उस तक पहुंचा देते. शिखर का पत्र लिखना शिखा को बहुत पसंद था. शिखर के लिखे सारे पत्र उसने आज तक सहेजकर रखे हैं.
इस बार क्या लिखा है शिखर ने, इसी उत्साह के साथ शिखा पत्र पढ़ने लगी.

प्यारी शिखा,
आज फिर मन में कई ऐसी बातें हैं, जिन्हें मैं तुमसे कहना चाहता हूं, लेकिन कह नहीं पा रहा इसलिए हमेशा की तरह पत्र का सहारा ले रहा हूं. मैं तुमसे माफ़ी मांगना चाहता हूं शिखा, लेकिन जानता हूं, मेरा गुनाह माफ़ करने लायक नहीं है. आज तुम्हारी इस हालत के लिए स़िर्फ और स़िर्फ मैं ज़िम्मेदार हूं. वो कार एक्सीडेंट तुम्हारी लापरवाही का नहीं, मेरी बेरुख़ी का नतीजा है. न मैं तुमसे सुबह-सुबह लड़ता और न तुम रोकर घर से निकलती. तुम नहीं जानती शिखा, तुम्हें खोने के एहसास ने मुझे किस क़दर झकझोर कर रख दिया था. अगर तुम्हें कुछ हो जाता, तो शायद मैं ख़ुद को कभी माफ़ न कर पाता. माफी के क़ाबिल तो मैं अब भी नहीं हूं, लेकिन तुम साथ हो, तो कम से कम अपने पापों का पश्‍चाताप तो कर सकूंगा.
मैं जानता हूं, मेरे साथ अपने रिश्ते और इस घर को बनाए, बसाए रखने के लिए तुमने क्या कुछ नहीं किया है. तुम मेरी तमाम ज़्यादतियों इस आस में बर्दाश्त करती रही कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा, लेकिन मैंने ऐसा कभी नहीं होने दिया. तुम मुझे समझाती रही और मैं तुम्हारी बातों को हवा में उड़ाता रहा.
जिस दिन से तुमसे मेरा रिश्ता तय हुआ, उसी दिन से तुमने मेरी ज़िम्मेदारियों का बोझ उठा लिया था और ये सिलसिला आज भी जारी है. मैं इस शहर में अकेला रहता था, इसलिए मुझसे रिश्ता जुड़ते ही तुम मेरा परिवार बन गई. तुम नौकरी कर रही थी और मैं नौकरी के साथ-साथ एमबीए भी कर रहा था. ऐसे में जब भी हम घर से बाहर मिलते, तो होटल का बिल, फिल्म का टिकट, यहां तक कि मेरी शॉपिंग का बिल भी तुम ही चुकाती. मैं मना करता, तो तुम कहती, ”मैं क्या आपसे अलग हूं? अभी आप पर घर का किराया, खाने-पीने की व्यवस्था, कॉलेज की फीस… बहुत सारी ज़िम्मेदारियां हैं, इसलिए मुझे ख़र्च करने दो.” फिर तुम अपनी प्यारी-सी मुस्कान बिखेरते हुए अपने मज़ाकिया अंदाज़ में कहती, ”जब आपका करियर सैटल हो जाएगा, तब मैं आपसे बड़ी-बड़ी फरमाइशें करूंगी. तब ना कैसे करोगे जनाब?”

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तुम्हारा ये अपनापन मुझे भीतर तक भिगो देता और मैं तुम्हें अपनी बांहों में भर लेता.
सच, कितने हसीन सपने बुने थे तुमने हमारे भविष्य के लिए. मेरे प्रति तुम्हारा समर्पण पहले दिन से शत-प्रतिशत था, मैं ही तुम्हारी बराबरी नहीं कर सका. ऐसा नहीं था कि मैं तुम्हारे प्यार और त्याग को नहीं समझता था, बल्कि मैं तो तुम्हारी झोली ख़ुशियों से भर देना चाहता था, दुनिया की हर ख़ुशी तुम्हारे क़दमों में लाकर रख देना चाहता था, लेकिन मैं उतना काबिल कभी न बन सका जैसा तुम चाहती थी, शायद इसके लिए मैंने कोशिश भी नहीं की. दरअसल, तुम मुझे ऐसे कंफर्ट ज़ोन में ले आई थी, जहां मैं ख़ुद को बेहद सुरक्षित महसूस कर रहा था. तुमने मुझे कभी किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं होने दी, इसलिए मैं आरामपरस्त हो गया. स़िर्फ अपने सुख, अपने ऐशो-आराम तक सीमित रह गया.
तुम हर जगह मुझे पैसों की मदद करती रही, ताकि मैं कभी अभाव महसूस न करूं और पूरा ध्यान अपने करियर व पढ़ाई पर लगा सकूं. शादी के बाद भी तुम मेरी पढ़ाई का ख़र्च उठाती रही, ताकि मुझे प्रमोशन मिले और हमारी गृहस्थी अच्छी तरह चल सके, लेकिन मुझे अब तुम्हारे पैसों की आदत पड़ गई थी. मेरे मुंह में जैसे खून लग गया था. अब मुझे हर समस्या का समाधान तुममे नज़र आने लगा था. जाने-अनजाने मैंने ख़ुद को लालची और आलसी बना दिया था. मेरी ख़ुशी के लिए तुम घर-बाहर की तमाम ज़िम्मेदारियां ख़ुशी-ख़ुशी उठाती रही.
हां, प्रत्युषा के जन्म के बाद तुमने पहली बार कहा था, ”शिखर, अब मैं नौकरी नहीं करना चाहती, अपनी बेटी के साथ रहना चाहती हूं, उसकी अच्छी परवरिश करना चाहती हूं.”
उस दिन पहली बार मेरा लालची मन बेचैन हुआ था. अंदर तक कांप गया था मैं तुम्हारी बातें सुनकर, लेकिन मैंने तुम पर कुछ भी जाहिर नहीं होने दिया. उस समय तो मैंने तुम्हारी हां में हां मिला दी, लेकिन अगले पल से ही मेरा लालची मन इस जुगाड़ में जुट गया कि कैसे तुम्हें फिर से नौकरी पर भेजा जाए, ताकि मैं घर की जिम्मेदारियों से मुक्त हो सकूं.
तुम कोई फैसला लेती, इससे पहले ही मैंने मां को कानपुर फोन किया और उनसे अनुरोध किया कि कुछ समय के लिए मेरी गृहस्थी संभालने आ जाएं. छोटी बहन की बीएससी फाइनल ईयर की परीक्षा होनेवाली थी, इसलिए मां ने आने में असमर्थता जताई, तो मैं फोन पर ही रो पड़ा. मैंने मां से कहा, ”मां, शिखा जॉब छोड़ना चाहती है. तुम तो जानती हो, मेरे सिर पर बैंक का कितना लोन है, मेरी पास सरकारी नौकरी भी नहीं है, जिसके भरोसे मैं निश्‍चिंत हो सकूं. प्राइवेट नौकरी का क्या है? एक ग़लती हुई नहीं कि नौकरी हाथ से जा सकती है. यदि शिखा ने नौकरी छोड़ दी, तो मुझ पर बहुत प्रेशर आ जाएगा. मुंबई जैसे शहर में एक आदमी की कमाई से घर कहां चलता है?”
मेरी स्थिति पर मां पसीज गईं और छोटी बहन को मंझधार में छोड़ कुछ समय के लिए मेरी गृहस्थी संभालने मेरे पास आ गईं. मैंने मां को समझा दिया कि वो शिखा को न बताएं कि मैंने उन्हें यहां बुलाया है. साथ ही शिखा से ये कहने को भी कहा कि वो नौकरी न छोड़े, मां प्रत्युषा की देखभाल कर लेंगी.
लेकिन तुम मेरा षडयंत्र शायद भांप गई थी. तुमने मुझसे कुछ कहा नहीं, लेकिन तुम्हारा मौन चीख-चीखकर अपना दर्द बयां कर रहा था. अंतरंग पलों में भी तुम मेरे पास, मेरी बांहों में तो होती, लेकिन मात्र एक शरीर के रूप में. मेरी शिखा ने शायद उसी दिन दम तोड़ दिया था, जिस दिन मैंने उसे उसकी बच्ची से अलग किया और उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ उस पर अपनी ज़िम्मेदारियों का बोझ डाला. जिस शिखर को तुमने ऊंचाइयों के शिखर पर देखना चाहा, वो तुम्हारी कमाई और तुम्हारे शरीर का भोगी बनकर रह गया था शिखा. उसने तुम में अपना कंफर्ट ज़ोन ढूंढ़ लिया था. मेरे संघर्ष के दिनों में तुम मेरा सहारा क्या बनी, मैं तुम पर आश्रित होकर जैसे निश्‍चिंत हो गया. जैसे मैंने तय कर लिया कि आगे का जीवन तुम्हारे भरोसे ही काटना है. घर-परिवार, बैंक, पैसा, पड़ोसी, नाते-रिश्तेदार… एक-एक कर मैं सारी ज़िम्मेदारियां तुम पर थोपता चला गया.
प्रत्युषा के स्कूल में पैरेंट्स-टीचर मीटिंग होती, तो मैं जान-बूझकर ऑफिस की मीटिंग का बहाना बनाकर घर से जल्दी निकल जाता. घर में मां या करीबी रिश्तेदार कुछ दिन रहने आते, तो मैं जान-बूझकर ऑफिस से लेट आता, ताकि तुम सब संभाल लो, मुझ तक कोई बात न आए. मैं इस क़दर स्वार्थी हो गया था कि बेटी के बीमार होने पर भी छुट्टी लेने से साफ़ मना कर देता था. तुम्हें अकेले खटते देखकर भी मेरा कठोर मन कभी न पसीजता.
तुम हर साल कहती, ”इस बार गर्मी में लंबी छुट्टी लूंगी, हम कहीं घूमने चलेंगे. ऐसा न कर सके, तो मैं घर पर प्रत्युषा के साथ रहूंगी. शाम को जब आप घर आओगे, तो साथ बैठकर चाय पीएंगे और ख़ूब सारी बातें करेंगे, जैसे शादी से पहले किया करते थे…” तुम कितने अरमान से अपनी भावनाएं व्यक्त करती थी, लेकिन मेरा लालची मन तुरंत केलक्युलेट करने लग जाता कि तुम्हारी छुट्टियों से मेरा कितना नुक़सान हो जाएगा.

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मुझे माफ़ करना शिखा, तुम मुझे हमेशा सपोर्ट करती रही, लेकिन मैं उसका इतना आदी हो गया कि तुम्हारी भावनाओं को समझना ही भूल गया. मुझे स़िर्फ अपना सुख, अपना आराम, अपनी सुरक्षा से मतलब था, तुम और प्रत्युषा भी मेरी ही ज़िम्मेदारी हो, इस बात को मैं जानकर भी नज़रअंदाज़ करता रहा.
लेकिन अब नहीं, तुम्हें खोने के एहसास ने मुझे तुम्हारी अहमियत समझा दी है. तुम्हारे बिना मैं एक क़दम भी नहीं चल सकता शिखा. अब मैं तुम्हें वो हर ख़ुशी दूंगा जिसकी तुम हक़दार हो. तुम्हें ऊंचाइयों के उस शिखर तक पहुंचकर दिखाउंगा जहां तुम मुझे देखना चाहती हो. हमारी बच्ची को ऐसी परवरिश दूंगा कि उसे कभी किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं होगी. शिखा, अब मैं वैसा बनना चाहता हूं जैसा तुम चाहती हो. यदि मैं ऐसा कर सका, तो यही मेरा प्रायश्‍चित होगा.
मैं माफ़ी के क़ाबिल तो नहीं शिखा, फिर भी हो सके तो मुझे माफ़ कर देना.
तुम्हारा,
शिखर

पत्र पढ़ते-पढ़ते शिखा की आंखें भी छलक पड़ीं. वर्षों का गुबार आज आंसुओं के रास्ते बह चला था. शिखर नाश्ता लिए कब से उसके पास बैठे थे. उन्होंने शिखा को रोका नहीं, क्योंकि वो जानते थे कि आंसुओं का ये सैलाब अपने साथ तमाम कड़ुवे अनुभव बहा ले जाएगा और फिर उनके जीवन में एक नया सवेरा होगा, जो बहुत सुहाना होगा.

Kamala Badoni

कमला बडोनी

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कहानी- ऐेसे ना करो रुसवा (Short Story- Aise Na Karo Ruswa)

Short Story- Aise Na Karo Ruswa

“आश्‍चर्य है?… तुम इतना अच्छा अभिनय कर लेते हो? वह भी तब जब तुम्हारे और संध्या के बारे में पूरे कॉलेज में चर्चा है.” अपने मुंह से निकले व्यंग्य को वह रोक न सकी.

“लोगों की मुझे परवाह नहीं, पर तुम तो मुझे ऐेसे रुसवा मत करो. मैंने संध्या का साथ दिया था, क्योंकि वह मुसीबत में थी. बाकी के सारे आरोप, जो लोग मुझ पर लगा रहे हैं, ग़लत हैं.”

शाम के छह बजनेवाले थे. तेज़ गति से भागती ट्रेन पल-पल अपने लक्ष्य की तरफ़ बढ़ रही थी. साथ ही पीछे छूटता जा रहा था अचला का वर्तमान और मन समाहित होता जा रहा था अतीत के गलियारों में. मन के किसी कोने में दबी स्मृतियों की यंत्रणा असहनीय हो उठी. वह घबराकर पत्रिका में मन लगाने की कोशिश करने लगी. लेकिन यादें थीं, जो मन को अवश किए हुए थीं. उसने उचटती नज़रों से डिब्बे का अवलोकन किया.

लगभग 17-18 वर्ष की तीन लड़कियां सामने की बर्थ पर बैठी बातों में मशगूल थीं. उनकी बेफ़िक़्री और छोटी-छोटी बातों पर भी खुलकर हंसने का अंदाज़ बता रहा था कि वे सभी स्टूडेंट्स हैं.

अचानक उसके हाथों से पत्रिका फिसलकर एक लड़की के पैरों के पास जा गिरी. बड़ी शालीनता से उस लड़की ने पत्रिका उठाकर अचला को पकड़ा दी. “क्या नाम है तुम्हारा?” अचला ने स्नेह से पूछा.

“मेरा नाम अर्चना है और ये मेरी सहेलियां सुप्रिया और सोनाली हैं. हम तीनों दिल्ली के एक कॉलेज में फ़र्स्ट ईयर की स्टूडेंट्स हैं. छुट्टियों में पटना अपने-अपने घर जा रही हैं. आप भी…?”

“हां, मैं भी पटना जा रही हूं, लेकिन उसके बाद मुज़फ्फरपुर तक जाना है.”

वह देर तक लड़कियों से गपशप करती रही. खाना खाते ही थकी-हारी लड़कियां सो गईं, पर अचला की आंखों में नींद का नामोनिशान न था. एक बार फिर वह अतीत के गलियारों में भटकने लगी. औरत चाहे कितनी ही पाषाण हृदय क्यों न हो, पर अपने पहले प्यार को भुला नहीं पाती. शायद यही कारण था कि न चाहते हुए भी अनमोल की यादें बार-बार उसे तड़पा रही थीं.

जिस शक के कारण वह आवेश में आकर अपने प्यार को ठोकर मार आई थी, आज पंद्रह साल गुज़र जाने के बाद भी क्या उसे अपने जीवन, अपनी सोच से ठोकर मारकर निकाल पाई थी? शायद नहीं.

उस पल को अचला कभी भूल न सकी, जब उसके द्वारा लगाए गए आरोपों को सुनकर अनमोल का चेहरा ज़र्द पड़ गया था,  पर उसके चेहरे पर किसी को छलने का भाव न था. बस, था तो स़िर्फ एक आश्‍चर्यमिश्रित क्रोध और अपमानित होने का भाव. शायद उसे विश्‍वास ही नहीं हो रहा था कि उस पर भी ऐसे गंभीर आरोप लगाए जा सकते हैं, वह भी अचला द्वारा. उसने बहुत कोशिश की थी अचला को समझाने की, लेकिन अचला के सामने उसकी एक न चली.

पूरे पंद्रह वर्ष गुज़र गए. इन बरसों में अचला ने क्या कुछ नहीं पाया. अच्छी नौकरी के साथ-साथ सभी सुख-सुविधाएं. नहीं मिला तो जीवन की शांति और जीवन जीने का मक़सद. उसके शादी न करने के फैसले को बदलने के लिए मम्मी-पापा ने उसे बहुत समझाया. लेकिन अंततः दोनों  को ही उसकी ज़िद के आगे झुकना पड़ा. एक-एक कर तीनों भाइयों की शादियां हो गईं और जल्द ही वे सभी अपनी-अपनी दुनिया में रम गए.

उसके शादी न करने का दर्द लिए पहले मम्मी गई, फिर पापा भी ज़्यादा दिनों तक जीवित न रह सके. अचला की ज़िंदगी पूरी तरह वीरान हो गई. परिवारविहीन एकाकी और निर्लिप्त जीवन से कभी-कभी उसका मन बुरी तरह घबरा जाता. दिमाग़ चाहे जो तर्क दे, पर उसका दिल कहता उसने अपने पैरों पर ख़ुद ही कुल्हाड़ी मारी थी.

अचला को आज भी याद है, जब उसकी पहली मुलाक़ात अपने से दो वर्ष सीनियर अनमोल से हुई थी. कॉलेज में होनेवाले डिबेट में वह उसका प्रतिद्वंद्वी था. लंबी क़द-काठी का अनमोल जितना देखने में सुदर्शन था, उतना ही मेधावी भी था. अपनी पढ़ाई-लिखाई के साथ, सौम्य, शांत और मिलनसार स्वभाव के कारण वह पूरे कॉलेज में काफ़ी लोकप्रिय था.

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डिबेट वाले दिन वह निश्‍चित समय पर बड़े ही आत्मविश्‍वास के साथ अनमोल के सामने जा खड़ी हुई थी. डिबेट शुरू होते ही दोनों अपना-अपना पक्ष एक-दूसरे के सामने रखने लगे थे. दोनों के ही तर्क-वितर्क बता रहे थे कि दिए गए विषय के वे सशक्त वक्ता हैं. फिर भी थोड़ी देर में ही अचला का पलड़ा भारी पड़ने लगा था. उसके एक-एक शब्द अपने पक्ष को कथानक की भांति जीवंतता से प्रस्तुत कर रहे थे, जो श्रोताओं को ही नहीं, उसके प्रतिद्वंद्वी को भी किंकर्त्तव्यविमूढ़ करता जा रहा था. उस दिन अचला की तो जीत हुई, पर अनमोल अपना दिल हार बैठा.

उस दिन के बाद से अचला सबकी नज़र में प्रशंसा का पात्र बन गई. धीरे-धीरे बढ़ती मुलाक़ातों के साथ अचला-अनमोल एक-दूसरे के बेहद क़रीब आ गए.

उन्हीं दिनों हॉस्टल में बी.ए. द्वितीय वर्ष की एक छात्रा संध्या अचला की रूम पार्टनर बनकर आई. शबनम में नहाई गुलाब की पंखुड़ियों की तरह ताज़गी भरा उसका सौंदर्य अद्वितीय था. संध्या जितनी सुंदर थी, उतनी ही सौम्य और सीधी-सादी भी थी. हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार. बिना भेदभाव के वह अचला के भी कई छोटे-मोटे काम संभालने लगी. कुछ ही दिनों में दोनों के बीच सगी बहनों-सा प्यार हो गया. अचला को लगता कि ईश्‍वर ने उसके जीवन में छोटी बहन की कमी पूरी कर दी है. जब भी अनमोल की चर्चा होती, वह अक्सर किलक पड़ती, “हाय राम! कितने हैंडसम हैं आपके अनमोलजी. काश! आपसे पहले मेरी नज़र पड़ गई होती, तो ज़रूर उड़ा ले जाती.”

अचला प्यार से उसे डांट देती.

“चुप कर पगली… यह क्या हाय-हाय लगा रखी है. देखना, एक दिन तुझे अनमोल से ज़्यादा हैंडसम पति मिलेगा.”

“मेरे ऐसे भाग्य कहां? अभी तक तो ज़िंदगी ने हर मोड़ पर मुझे छला ही है.” एक उसास उसके गले से निकल पड़ती.

देखते-देखते समय पंख लगाकर उड़ गया. परीक्षाएं नज़दीक आ गईं. अचला सारी मौज़-मस्ती भूल परीक्षा की तैयारियों में व्यस्त हो गई. अब उसका ध्यान संध्या की तरफ़ कम ही रहता.

समय पर परीक्षाएं शुरू हो गईं. एक दिन अचला परीक्षा देकर लौटी तो संध्या से बोली, “चल संध्या, कहीं मौज़-मस्ती करते हैं. कुछ खाते-पीते हैं, अभी अगला पेपर पूरे एक ह़फ़्ते बाद है.”

“नहीं दी… आज नहीं, मेरी तबियत थोड़ी ठीक नहीं है.”

उसकी फीकी हंसी, उदास चेहरा और धीमी आवाज़ ने अचला को चौंका दिया, “क्या बात है संध्या? तुम इतनी बीमार-सी क्यों लग रही हो?”

अचला की सहानुभूति पाकर संध्या की आंखें भर आईं, जिसे देखकर अचला का कलेजा एक अनजानी आशंका से धड़क उठा. तभी अपने आंसुओं को पोंछकर, हंसकर संध्या बोली, “ऐसी कोई गंभीर बात नहीं है, जिसके लिए मैं आपको परेशान करूं. जिस दिन आपकी परीक्षा समाप्त हो जाएगी, दिल में दो महीने से जमा बातों का पुलिंदा आपके सामने ही तो बांचूंगी.”

संध्या के आश्‍वासन से आश्‍वस्त वह फिर से अपनी परीक्षा की तैयारी में जुट गई. जिस दिन अचला अंतिम पेपर देकर लौटी, तो उसे पता चला कि संध्या के मम्मी-पापा आकर उसे ले गए. यूं अचानक उससे मिले बिना संध्या का चले जाना उसे व्यथित कर गया.

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दूसरे दिन सुबह तैयार होकर वह चाय बनाने जा ही रही थी कि उसके बगल के कमरे में रहनेवाली सुनंदा आ गई. चुपचाप बैठी सुनंदा के चेहरे पर आते-जाते रंग अचला की उत्सुकता बढ़ा रहे थे, “क्या बात है सुनंदा? क्या तुम मुझसे कुछ कहना चाहती हो?”

“हां, तुमने ठीक समझा है. मैं पिछले कई दिनों से तुम्हें संध्या के विषय में कुछ बताना चाह रही थी, लेकिन तुम्हारी परीक्षा चल रही थी, इसलिए चुप रही. वैसे भी तुम संध्या को इतना प्यार करती हो कि उसके विषय में कुछ बताना मेरे लिए मुश्किल हो रहा था. जाने कैसे रिएक्ट करोगी?”

फिर थोड़ा रुककर बोली,  “शायद तुम्हें पता नहीं था कि संध्या मां बननेवाली थी. वह डॉक्टर के पास गई थी एबॉर्शन के लिए, वो भी अनमोल को साथ लेकर. डॉक्टर अनुराधा मेरी कज़िन है, जहां मैंने इन दोनों को देखा था. अनुराधा से ही मुझे सारी जानकारियां मिल गई थीं. इन दिनों अनमोल के साथ चिपकी जाने कहां-कहां घूमती रही थी. पूरे कॉलेज में लोग जाने कैसी-कैसी बातें कर रहे हैं.”

सुनंदा की बातों से आश्‍चर्य, शर्म और गहरी आत्मवेदना से छटपटा उठी थी अचला. सुनंदा के जाते ही धम्म् से अपने बिस्तर पर आ गिरी थी. उसका सारा शरीर जैसे सुन्न पड़ गया था. अब तक अनमोल पर रहा विश्‍वास तिनका-तिनका कर बिखरने लगा था. फिर भी हिम्मत जुटा अनमोल से मिलने चल दी थी. रास्ते में ही अनमोल उसे मिल गया था. मिलते ही बोला, “अच्छा हुआ जो तुम मुझे मिल गई, मैं तुमसे ही मिलने आ रहा था. मुझे तुमसे एक बहुत ही ज़रूरी बात करनी है, साथ ही संध्या का मैसेज भी देना है.”

“आश्‍चर्य है… तुम इतना अच्छा अभिनय कैसे कर लेते हो? वह भी तब जब तुम्हारे और संध्या के बारे में पूरे कॉलेज में चर्चा है.” अपने मुंह से निकले व्यंग्य को अचला रोक न सकी.

“लोगों की मुझे परवाह नहीं, पर तुम तो मुझे ऐसे रुसवा मत करो. मैंने संध्या का साथ दिया था, क्योंकि वह मुसीबत में थी. बाकी के सारे आरोप, जो लोग मुझ पर लगा रहे हैं, ग़लत हैं.”

ग़ुस्से से सुलगती अचला अनमोल पर बरस पड़ी, “मैं सोच भी नहीं सकती थी कि तुम्हारे व्यक्तित्व का एक पहलू इतना गिरा हुआ है. संध्या मेरी छोटी बहन जैसी थी. कैसे किया तुमने इतना बड़ा छल हम दोनों के साथ?”

“अचला… तुम मुझे ग़लत समझ रही हो. पहले मेरी पूरी बात सुन लो, फिर तुम्हारे दिल में जो आए, फैसला करना.” पर अनमोल की बातें सुनने के लिए अचला रुकी ही कहां थी.

अनमोल उसे पुकारता रहा, फिर भी अचला ने उसकी तरफ़ पलटकर भी नहीं देखा. मन में अनमोल को त्याग देने का कठोर ़फैसला कर अचला दूसरे ही दिन मुज़फ्फरपुर आ गई. उसके बाद से ही उसने अनमोल से अपने सारे संपर्क तोड़ डाले. न उसका कोई फ़ोन कॉल रिसीव किया, न ही उसे कोई कॉल किया. वैसा ही उसने संध्या के साथ भी किया.

जल्द ही अचला अपनी नई ज़िंदगी शुरू करने दिल्ली आ गई. धीरे-धीरे वह अपनी सारी पीड़ा, वेदना और कृतियों को नई दिशा देने में जुट गई. कुछ दिनों की कड़ी मेहनत के बाद वह इनकम टैक्स ऑफ़िसर का पद प्राप्त करने में सफल हो गई, जिसके साथ ही उसके जीवन में आमूल परिवर्तन आ गया. काम की व्यस्तता ने अतीत में हुए धोखे को भुलाना आसान कर दिया.

अचला के बड़े भैया अमित आजकल मुज़फ्फरपुर के एक कॉलेज में कार्यरत थे. भैया-भाभी के बार-बार अनुरोध करने पर वह एक लंबे अरसे के बाद मुज़फ्फरपुर जा रही थी. दोनों को सरप्राइज़ देने के चक्कर में उसने अपने आने की सूचना भी नहीं दी थी.

तभी एक हिचकोले के साथ ट्रेन रुक गई. पता चला, आगे कोई ट्रेन पटरी से उतर गई है. धीरे-धीरे सरकती ट्रेन के रात नौ बजे से पहले पटना पहुंचने के आसार नज़र नहीं आ रहे थे.

जाने कैसे उसके मन की बात और घबराहट को पढ़ अर्चना बोली, “आंटी, आप चिंता न करें. आज रात पटना में आप मेरे घर रुक जाइएगा और सुबह मुज़फ्फरपुर के लिए बस पकड़ लीजिएगा.”

वह असमंजस की स्थिति में थी. स्टेशन पर अर्चना के पापा उसे लेने आए थे. अर्चना से अचला के विषय में जानकारी मिलते ही बड़े सम्मान के साथ उन्होंने अचला से अपने घर रुकने का आग्रह किया, तो वह टाल न सकी.

जब फ्रेश होकर वह खाने के टेबल पर पहुंची, तो घर के लोग उसका ही इंतज़ार कर रहे थे. उसके साथ ही इंतज़ार कर रहा था एक ऐसा सरप्राइज़, जिसे देखते ही उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई. आगे बढ़कर डायनिंग टेबल का कोना न थामा होता, तो शायद गिर ही जाती. सामने की कुर्सी पर अनमोल बैठा था. अपने को संभालकर बैठी, तो अर्चना घर के सभी सदस्यों से परिचय कराते हुए अनमोल की तरफ़ मुड़ी. “यह मेरे सबसे छोटे चाचाजी अनमोल हैं. यहां के एक कॉर्पोरेशन में एम.डी. हैं.”

दोनों की आंखों में एक आश्‍चर्यमिश्रित झलक देख अर्चना बोली, “क्या आप दोनों एक-दूसरे को पहले से जानते हैं?”

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“ऑफ़कोर्स जानते हैं. यह मेरी क्लास मेट अचला है. मैं तुम्हारा शुक्रगुज़ार हूं कि तुमने मुझे अचला से मिलवा दिया.”

अचला चुपचाप खाने की कोशिश करने लगी, पर एक भी निवाला उसके गले के नीचे उतर नहीं रहा था. किसी तरह कुछ खा-पीकर अर्चना के बताए कमरे में सोने आई, तो पीछे-पीछे अनमोल भी आ गया. पास ही रखी कुर्सी खींचकर बैठते हुए बोला, “इतने साल बीत जाने के बाद अब मैं न तुम्हें कोई सफ़ाई देना चाहता हूं, न ही इसकी कोई ज़रूरत रही. बस, तुम्हारे नाम संध्या का एक पत्र आज तक मेरे पास पड़ा है, जिसे मैं तुम्हें सौंपना चाहता था. लेकिन तुम्हारे मन में अपने लिए उमड़ती घृणा के कारण मैंने कभी कोशिश ही नहीं की तुमसे मिलने की. संयोग से आज तुम मिल ही गई हो, तो तुम्हें वह पत्र दे रहा हूं.”

अपनी बातें समाप्त कर अनमोल ने जेब से एक पत्र निकालकर अचला को पकड़ा दिया. संध्या का पत्र देखकर अचला का सर्वांग सिहर उठा. हिम्मत करके कांपते हाथों से उसने पत्र खोला-

दीदी नमस्कार,

मैं नहीं जानती कि मैंने कौन-सा ऐसा पुण्य किया था, जो आप जैसी प्यार करनेवाली बहन मुझे मिली. उसी के साथ जाने कौन-सा ऐसा पाप भी कर आई थी, जो राघव जैसे लड़के से प्यार कर बैठी. जब मैं मां बननेवाली थी, उसी समय उसे अमेरिका जाने का मौक़ा मिला. मैं उसके सामने बहुत रोई, गिड़गिड़ाई कि वह मुझसे शादी करने के बाद अमेरिका चला जाए, लेकिन वह नहीं माना और चला गया.

मैं घोर संकट में थी. आपकी परीक्षा चल रही थी. दूसरा कोई मदद करनेवाला था नहीं, इसलिए मैंने सारा दर्द अनमोलजी के साथ बांटा. वे जी-जान से मेरी मदद में जुट गए. हम दोनों ने कई डॉक्टरों के चक्कर लगाए. एबॉर्शन करवाती, उसके पहले ही जाने कैसे वॉर्डन ने मेरी तबियत ख़राब होने की सूचना मेरे घर भिजवा दी. ज़बर्दस्ती मेरे मम्मी-पापा आकर मुझे घर ले जा रहे हैं. जब आपकी परीक्षा समाप्त हो जाएगी, अनमोलजी यह पत्र आपको दे देंगे. आप कैसे भी करके यहां आकर मुझे ले जाइएगा, वरना मेरी सौतेली मां मेरी क्या दुर्दशा करेगी, यह मुझे ख़ुद भी नहीं मालूम. प्लीज़ दीदी, इस संकट से मुझे उबार लीजिए. आपके इंतज़ार में…

आपकी छोटी बहन,

संध्या

पत्र पढ़कर स्तब्ध अचला स़िर्फ इतना ही बोल पाई, “अब कहां है संध्या?”

“तुम्हारे हॉस्टल छोड़ने के पंद्रह दिन बाद उसने आत्महत्या कर ली. इसके साथ ही तुमसे और तुम्हारे प्यार से मेरा मोहभंग हो गया. संध्या मेरी छोटी बहन जैसी थी, उसे बचाने के लिए मैंने काफ़ी बदनामियां भी झेलीं, फिर भी उसे बचा नहीं पाया. काश! तुमने मुझ पर थोड़ा-सा भी भरोसा किया होता. संध्या के जाने के बाद मुझे तुमसे इतनी नफ़रत हो गई कि मैंने सारी ज़िंदगी शादी न करने का फैसला कर लिया.”

अनमोल की बातें समाप्त होते-होते, अचला का मन हाहाकार कर उठा.  बरसों से मन में दबी पीड़ा आंसुओं का सैलाब बन आंखों से उमड़ पड़ी. वह फूट-फूटकर रोती रही. थोड़ी संभली तो बोली, “कितनी तड़पी होगी संध्या मेरे इंतज़ार में. कितनी मजबूरी और निराशा में उसने इस दुनिया का मोह छोड़, मौत को गले लगाया होगा. मैं मरकर भी उसके प्यार का कर्ज़ नहीं चुका सकती. हे भगवान! मैं क्या करूं? मेरी ग़लती माफ़ी के लायक ही नहीं है.”

पश्‍चाताप की आग में झुलसती अचला का बुरा हाल देख अनमोल से चुप नहीं रहा गया.

“ख़ुद को संभालो अचला. मैं शायद तुम्हें कभी माफ़ न करता, लेकिन अपनी ग़लती के पश्‍चाताप में तुम्हें टूटकर बिखरते देख मुझे लगने लगा है कि यदि आज मैंने तुम्हें माफ़ नहीं किया, तो शायद इतिहास ख़ुद को दोहरा देगा.”

अचला के सब्र का बांध भी टूट चुका था. वह अचानक उठकर अनमोल की बांहों में समा गई. अनमोल भी अपने आंसुओं को रोक न सका.

Rita kumari

       रीता कुमारी

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हिंदी कहानी- जीवन संध्या (Hindi Short Story- Jeevan Sandhya)

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“आप लोग आज की पीढ़ी के हैं. आपकी सभ्यता में प्रेम विवाह भी ख़ूूब हो रहे हैं. मेरे बेटे सुहास के कुछ दोस्त यहां आते हैं- अपने लिव इन पार्टनर्स के साथ. उनको तो कोई कुछ नहीं कहता, क्योंकि वे आपकी पीढ़ी हैं ना! लेकिन यहां सुधाजी और मैं जीवन संध्या के कगार पर खड़े हैं और आप लोगों के पास हमारे लिए आज कोई समय नहीं है. हमने अगर दोस्ती कर ली, तो आप क्यों परेशान हैं?”05

पार्क के एक कोने में बेंच पर विशालजी चुपचाप बैठे थे. चारों तरफ़ फूल खिले हुए थे, बच्चे खेलने में मग्न थे. शाम के साये लंबे होने लगे थे. एक ठंडी सांस खींचकर उन्होंने उठने की कोशिश की, पर फिर बैठ गए. विचारों के भंवर में एक बार फिर गोते लगाने लगे.

यह रिटायरमेंट उन पर भारी पड़ रहा था. पहले सुबह तैयार होकर ऑफिस चले जाते थे. सारा दिन कैसे कट जाता था, पता ही नहीं चलता था. टेलिफोन, मीटिंग, फाइलें, पार्टियां, क्लब- क्या नहीं था उनकी ज़िंदगी में. ठाठ ही ठाठ थे. समय कैसे भाग रहा था कुछ पता ही नहीं चलता था, लेकिन एक दिन अचानक जब पत्नी राधिका को दिल का दौरा पड़ा, तब यूं लगा मानो ज़िंदगी रुक-सी गई है. राधिका के जाने के बाद जीवन में खालीपन-सा आ गया. घर में बेटा सुहास व बहू लक्ष्मी, पोता रोहन और पोती रोहिणी सभी उनका बहुत ख़्याल रखते थे, परंतु रिटायरमेंट के बाद समय काटे नहीं कट रहा था.

बच्चे अपने स्कूल और सुहास व लक्ष्मी अपने-अपने ऑफिस चले जाते थे. उनके लिए तो बस ‘हाय पापा-बाय पापा’ से आगे बातों के लिए समय ही कहां था?

हां! उन्हें याद आया कि कॉलेज के दिनों में उनके प्रोफेसर रामदयाल अक्सर कहा करते थे, “बेटे, पढ़ाई तो ठीक है, बढ़िया नौकरी भी लग जाएगी, पर कुछ और भी सीखो, जैसे- संगीत, नाटक, पेंटिंग आदि, ताकि अपने खाली समय को भर सको.” ‘खाली समय’ विशालजी हंसते थे. खाली समय था किसके पास? वे तो चाहते थे कि दिन में कुछ और घंटे होते, तो एक आध काम और कर डालते.

फिर राधिका भी शायद ऐसा ही कुछ कहती थी, “आप परिवार में भी कुछ रुचि लिया करें. बच्चों के साथ रिश्ते बढ़ाएं. उनके साथ उठे-बैठें.” पर विशालजी को ये सब बातें खोखली लगती थीं. पर आज…

अब तक पेड़ों में पक्षियों की चहचहाहट बढ़ने लगी थी, शायद सभी रात के लिए ठिकाना ढूंढ़ रहे थे. उनके भी ख़्यालों की लड़ियां टूट गईं और वे भारी क़दमों से घर की ओर चल पड़े.

रोहन और रोहिणी पढ़ रहे थे. बीच-बीच में रोहिणी रोहन से कुछ पूछ भी लेती थी. रोहन कभी-कभी खीझ भी उठता था. विशालजी रोहिणी के पास गए और बोले, “मैं तुम्हारे होमवर्क में सहायता कर देता हूं.” वह हैरानी से उन्हें देखने लगी और फिर बोली, “नहीं दादाजी, मैं कर लूंगी या फिर भैया से पूछ लूंगी.”

विशालजी ने कहा, “मैं कराता हूं ना…”

वह फिर बोली, “नहीं, मां डांटेंगी. वे कहती हैं कि आपको हम तंग न

करें और आपके घर आने के बाद हमें बिल्कुल चुपचाप रहना चाहिए,

नहीं तो आप नाराज़ हो जाएंगे.”

विशालजी सकपका गए और वापस सोफे पर आकर बैठ गए. वे सुबह का बासी अख़बार देखने लगे. मन नहीं लगा, तो उन्होंने टीवी चलाया, लेकिन कोई भी प्रोग्राम पसंद नहीं आया और उन्होंने टीवी बंद कर दी. बच्चे होमवर्क कर अपने कमरे में जाकर टीवी देख रहे थे. उनके हंसी-मज़ाक में वे भी शामिल होना चाहते थे, पर ऐसा हो न सका.

नौकर ने आकर खाना लगाने के लिए पूछा, तो उन्होंने पूछा, “बच्चे भी खाएंगे?” नौकर ने बताया कि वे तो खा चुके हैं. उन्होंने सुहास और लक्ष्मी के बारे में पूछा, तो पता चला कि वे दोनों बाहर से खाकर आएंगे. उन्होंने खाना लगाने के लिए कह तो दिया, पर चाहकर भी वे खा न सके और दो ही कौर खाकर उठ गए. उन्हें राधिका की बहुत कमी महसूस हो रही थी. वे अपने कमरे में चले गए और कपड़े बदलकर लेट गए. लेटने पर भी नींद आंखों से कोसों दूर थी, बिस्तर पर करवटें बदलते रहे और फिर जाने कब उन्हें नींद आ गई.

सुबह जागने पर भी उठने का मन नहीं किया. उनके सामने सारा दिन पहाड़-सा खड़ा था. नौकर चाय रख गया. नहाकर निकले, तो बच्चे स्कूल जा चुके थे. सुहास और लक्ष्मी अभी नाश्ते के लिए आए नहीं थे. वे जाकर टेबल पर बैठ गए. पहले सुहास आया, बोला, “हाय पापा कैसे हैं?” जवाब के लिए रुके बिना अख़बार देखते हुए दूसरे हाथ में चाय का कप उठा लिया और चाय पीते हुए बोला, “आज बहुत काम है और कुछ ज़्यादा ही बिज़ी रहूंगा.” चाय ख़त्म करके बोला, “अच्छा मैं चलूं, बाय पापा…” सुहास के जाने के कुछ देर बाद लक्ष्मी आई. पांव छूते हुए बोली, “कैसे हैं पापा?” साथ ही नौकर को आवाज़ देते हुए बोली, “रामू, बड़े साहब से पूछकर खाना बना लेना. शाम को बच्चों की पसंद का भी कुछ ज़रूर बनाना. मुझे शायद लौटने में देर हो जाएगी. अच्छा पापा, मैं चलूं.” और वह भी चली गई.

अकेले रह गए विशालजी. सोचने लगे कि अब क्या करें? किसी से मिलने या फोन करने का मन भी नहीं कर रहा था. थक-हारकर पार्क की ओर ही निकल गए. पार्क में अधिकांश बूढ़े लोग ही थे, जिन्हें उनकी तरह ही कुछ करने को न था. वे आपस में बैठे बतिया रहे थे या टहलते हुए घूम रहे थे. एक बेंच पर एक भद्र महिला अधलेटी-सी बैठी थीं. विशालजी को लगा उनकी तबीयत शायद ठीक नहीं है. वे उनके पास चले गए. उनके पुकारने पर महिला ने आंखें खोलीं. उनकी आंखें लाल थीं. विशालजी को लगा कि उन्हें तेज़ बुख़ार है. पूछने पर ज़रा-सा सिर हिलाकर उन्होंने हामी भरी. विशालजी ने उनका हाथ छूकर देखा, तो तेज़ बुख़ार लगा.

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पूछने पर पता लगा कि इस समय उनके घर पर कोई नहीं है, लेकिन बुख़ार के कारण उनका मन घबरा रहा था, इसलिए वे पार्क में आ गई थीं. किसी तरह सहारा देकर विशालजी उन्हें घर ले गए.

उनका नाम सुधा था. घर का ताला खोलकर वे अंदर गए. विशालजी ने सुधाजी को सोफे पर लेटा दिया. उन्होंने पूछा, “घर में कोई बुख़ार की दवा है?” सुधाजी ने कहा, “रसोई की आलमारी में है.” वे रसोई में गए. आलमारी से दवा निकाली. पानी का ग्लास भर रहे थे, तो सोचा कि चाय बना ली जाए, तो ज़्यादा अच्छा रहेगा.

चाय के लिए नापकर दो कप पानी पतीले में डाला, पर गैस उन्होंने आज तक नहीं जलाई थी. उन्हें याद आया कि राधिका अक्सर कहा करती थी कि कम से कम गुज़ारे लायक चाय, खिचड़ी इत्यादि ही बनाना सीख लो. कौन जाने कब काम आएगी, पर तब वे हंस देते थे.

हारकर पानी और दवा लेकर वे बैठक में आ गए. उन्होंने सहारा देकर सुधाजी को उठाया और दवा देते हुए बोले, “सॉरी, चाय नहीं बना पाया, कभी बनाई ही नहीं है. राधिका कहा करती थी… पर ख़ैर! छोड़ो. दवा खा लो.”

सुधाजी ने पानी के साथ दवा ले ली. थोड़ी देर बाद उन्हें जब कुछ राहत महसूस हुई, तो उन्हें ख़्याल आया कि मेहमान को चाय तो पिलानी चाहिए. विशालजी के लाख मना करने पर भी वे चाय बनाने के लिए उठ ही गईं. थोड़ी देर में वे दो कप चाय और कुछ मठरियां लेकर आ गईं. विशालजी को शर्मिंदगी महसूस तो हुई, पर उन्होंने चाय और मठरी ले ली.

चाय पीकर सुधाजी की तबीयत कुछ और संभली, तो दोनों बातें करने लगे. विशालजी ने उन्हें अपने परिवार के बारे में बताया. फिर सुधाजी ने बताया कि वह अपनी बेटी-दामाद और दो नातिनों के साथ रह रही हैं. उनके पति का बरसों पहले देहांत हो गया था. बेटी-दामाद काम पर जाते हैं और नातिन कॉलेज. सब अपनी ज़िंदगी में मस्त हैं. किसे ़फुर्सत है उनके लिए? वह घर चलाती हैं, गृहिणी की तरह या फिर नौकर की तरह, वे नहीं जानतीं? सब उन पर निभर्र्र रहते हैं. पहले तो उनको अच्छा लगता था, पर अब वे थक गई हैं. सब अधिकार से बोलते हैं. प्यार या इ़ज़्ज़त जैसी कोई भावना अब कहीं नज़र नहीं आती है. किसी के पास छुट्टी के दिन भी उनके लिए कोई समय नहीं होता है.

लेकिन अचानक सुधाजी को लगा कि एक अजनबी के साथ इस तरह बातें करना उचित नहीं है, वे रुक गईं और माफ़ी मांगने लगीं. इस पर विशालजी बोले, “सुधाजी, माफ़ी न मांगें. शायद मेरे भी दिल में कुछ ऐसे ही फफोले हैं. हम दोनों के हालात एक जैसे ही हैं, फिर शरमाना कैसा? चलो बात करके आपका मन कुछ तो हल्का हुआ.”

सुधाजी ने उन्हें खाने के लिए रोकना चाहा, पर वे रुके नहीं और लौट आए.

दूसरे दिन पार्क में विशाल बैठे थे, तो दूर से देखा कि सुधाजी आ रही थीं. वे सीधी उनके पास ही चली आईं और पिछले दिन के लिए धन्यवाद देने लगीं. फिर वे दोनों बैठकर बातें करने लगे.

फिर तो यह सिलसिला सुबह-शाम चलने लगा और धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे का इंतज़ार भी करने लगे. कभी-कभी पास के रेस्टॉरेंट में वे दोनों चाय भी पीने चले जाते थे. एक दिन सुधाजी ने उन्हें अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया. वे मान गए. सुधाजी ने उनकी पसंद के आलू के परांठे बनाए थे. खाते हुए उन्हें पत्नी राधिका की याद आ गई.

कुछ दिन विशालजी पार्क नहीं गए, क्योंकि उन्हें कुछ हरारत-सी महसूस हो रही थी. तब दो-तीन दिन बाद सुधाजी उनका हाल पूछने उनके घर चली आईं. विशालजी ने नौकर से कहकर चाय बनवाई और बाद में सुधाजी को खाने के लिए भी रोक लिया.

समय इसी तरह बीत रहा था. एक शाम जब वे पार्क में घूम रहे थे, तभी रोहन दादाजी को ढूंढ़ता हुआ वहां आया और बोला, “दादाजी, रोहिणी की नाक से ख़ून बह रहा है. जल्दी घर चलो.”

वे बदहवास-से घर की ओर चले, तो सुधाजी भी उनके साथ हो लीं. सुधाजी ने रोहिणी की नाक धुलाई, उसका सिर गीला किया और सिर पीछे करके उसे कुर्सी पर बैठा दिया. थोड़ी देर में ख़ून बहना बंद हो गया, तो विशालजी ने चैन की सांस ली. बच्चों ने सुधाजी के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा, “ये सुधा आंटी हैं. मेरी मित्र हैं. यहीं पास में रहती हैं.” चाय पीकर और कुछ देर बच्चों से खेलकर सुधाजी चली गईं.

जब कुछ दिनों बाद बच्चे सुधाजी से दुबारा मिले, तो विशालजी ने बच्चों से कहा, “बेटा, आंटीजी को नमस्ते करो.” तो रोहन ने तो नमस्ते कर दिया, पर रोहिणी ने कहा, “नमस्ते दादी.”

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विशालजी को लगा कि सुधाजी को शायद बुरा लगा है, इसलिए उन्होंने रोहिणी से ऐसा कहने का कारण पूछा तो वह बोली, “मां ने कहा था कि ये सुधा आंटी नहीं, सुधा दादी हैं.” सुधाजी चुपचाप वहां से चली गईं.

शाम को लक्ष्मी के घर लौटने पर विशालजी ने उसे सारी बात बताई और इसका कारण पूछा. उसने यह भी बताया कि सुधाजी को बुरा लगा था, पर लक्ष्मी ने कुछ नहीं कहा. रात को विशालजी ने सुहास को बताया, तो वह भी चुपचाप ही रहा.

अगले दिन सुधाजी पार्क में नहीं आईं. उसके अगले दिन भी जब वे नहीं आईं, तो विशालजी उनके घर गए. वे उन्हें देखकर परेशान-सी हो गईं. बहुत पूछने पर वे रो ही पड़ीं और बोलीं, “मेरी नातिनें भी आपके बारे में ‘नानी का बूढ़ा बॉयफ्रेंड’ कहकर मज़ाक करती हैं. मुझे बुरा लगता है और मैं उन्हें डांट देती हूं. पर रोहिणी की बातों…”

विशालजी को भी ये बातें चुभ रही थीं. उन्होंने सुधाजी को विश्‍वास दिलाया कि वे इस समस्या का कुछ न कुछ समाधान निकालेंगे. उन्होंने कुछ दिन का समय मांगा. दो-तीन दिन सोचने के बाद वह सुधाजी के घर गए. उन्होंने सुधाजी को आनेवाले शनिवार को परिवारसहित शाम को पांच बजे चाय के लिए आमंत्रित किया. सुधाजी तो बिल्कुल मान नहीं रही थीं, पर फिर यह समझाने पर कि ‘वे दोनों कब तक घरवालों के ताने सुनते रहेंगे,’ वे मान गईं.

लक्ष्मी और सुहास को भी विशालजी ने शनिवार शाम को घर पर ही रहने को कहा और बताया कि कुछ ख़ास मेहमान चाय पर आ रहे हैं.

शनिवार की शाम को दरवाज़े की घंटी बजी और सुधाजी का परिवार अंदर आया, तो लक्ष्मी की व्यंग्यपूर्ण मुस्कान विशालजी से छिपी न रह सकी. परिवार के लोगों का आपस में परिचय करवाकर जब बैठाया गया, तब वातावरण बहुत बोझिल-सा था. ख़ैर, चाय-नाश्ता आ जाने पर माहौल कुछ हल्का-फुल्का नज़र आने लगा.

चाय समाप्त होने पर विशालजी ने रोहिणी वाला क़िस्सा सुनाया. फिर से कमरे में चुप्पी छा गई. उसके बाद सुधाजी ने अपनी नातिनों का कहा दोहराया, तो उनके परिवार में बहुत अकुलाहट-सी दिखने लगी. वातावरण फिर से बोझिल हो गया.

तब विशालजी ने कहा, “आप लोग आज की पीढ़ी के हैं. आपकी सभ्यता में प्रेम विवाह भी ख़ूूब हो रहे हैं. मेरे बेटे सुहास के कुछ दोस्त यहां आते हैं- अपने लिव इन पार्टनर्स के साथ. उनको तो कोई कुछ नहीं कहता, क्योंकि वे आपकी पीढ़ी हैं ना! लेकिन यहां सुधाजी और मैं जीवन संध्या के कगार पर खड़े हैं और आप लोगों के पास हमारे लिए आज कोई समय नहीं है. हमने अगर दोस्ती कर ली, तो आप क्यों परेशान हैं? हम दो-चार बातें करके आपस में हंस-बोल लेते हैं, तो आपको ऐतराज़ होता है. आप हमारे रिश्ते को शायद अश्‍लील समझते हैं और आप हमसे इस रिश्ते का नाम जानना चाहते हैं, तो आज मैं आप सभी को बताता हूं कि हम दोस्त हैं. लेकिन आपकी नज़र में हम गुनाह कर रहे हैं, क्योंकि मैं एक पुरुष हूं और सुधाजी एक स्त्री हैं. मैं जानता हूं कि आपके मित्रों और सहयोगियों में स्त्री और पुरुष दोनों ही हैं. आप उनके साथ हंसते और बोलते भी हैं, तो मैं आपसे पूछता हूं कि आपका रिश्ता उनसे क्या केवल दोस्ताना ही है या उससे कुछ ज़्यादा?”

कमरे में फिर एक अजीब-सा तनाव छा गया. सभी के सिर झुके हुए थे. अपने चारों ओर निगाहें घुमाकर देखने के बाद विशालजी ने फिर कहना शुरू किया, “सच तो यह है कि हम इस घुटी-बंधी ज़िंदगी से तंग आ गए हैं. आपको ऐतराज़ हमारी दोस्ती से है, तो आज और अभी मैं इस घर को, जिसे मैंने बनाया था, छोड़कर जाने के लिए तैयार हूं. सुधाजी अगर चाहेंगी, तो वे भी मेरे साथ आ सकती हैं, क्योंकि हम भी जीना चाहते हैं. हमें भी जीने का हक़ है.”

कुछ रुककर वे आगे बोले, “मैं आप पर फैसला छोड़ रहा हूं, पर यह फैसला मैं आज और अभी सुनना चाहता हूं.”

कमरे की चुप्पी को तोड़ती हुई कई आवाज़ें एक साथ आईं “पापा…” “मां…” “नानी…” फिर कमरा गूंज उठा, “हमें माफ़ कर दीजिए. हमने आप दोनों को बहुत दुख दिया है, पर आप हमें छोड़कर जाने की बात न करें.”

– राजेश्‍वरी सिंह

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