Kavay

देखा था पहली बार
वसंत को
तुम्हारी आंखों से
छलकते प्यार में
महसूस किया था
टेसू की तरह
रक्तिम अपने होंठों पर
हवा में लहराते पत्तों की तरह
सरगोशी करते कुछ शब्दों में
सुनी थी उसकी आवाज़
कानों के बेहद क़रीब
फिर रोम-रोम में
उतर गया था
एक स्पर्श सा वसंत
अमलतास के पीले उजालों सा
कचनार की कलियां
चटक कर खिल गई थी
गालों पर
आज भी
उस वसंत की छुवन
महुए के नशे सी
तारी है दिल पर…

Vinita Rahurikar
विनीता राहुरीकर

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Poetry

कोयलिया
तू हर दिन किसे बुलाती है?

भोर होते ही सुनती हूं तेरी आवाज़
विरह का आर्तनाद
प्रणयी की पुकार
मनुहार
सभी कुछ है उसमें
गूंज उठता है उपवन
हर दिन
दिन भर

ढूंढ़ती है उसे तू डाल-डाल
भोर से सांझ तक
तेरा खुला निमंत्रण पाकर भी
नहीं आता क्यों मीत तेरा?
विरक्त है तुझसे?
या वह
विवश?

प्रात: होते ही गूंज उठती है
फिर वही पुकार
कुहू-कुहू की अनुगूंज
खिड़की की राह भर जाती है
मेरे कमरे में
द्विगुणित हो गूंजती है
मेरे आहत मन में
पुकारता है मेरा भी मन
मनमीत को
विरह का आर्त्त
प्रणयी की पुकार
मनुहार
सभी कुछ उसमें
पर सखी
कैसे पहुंचे उस तक
मेरी आवाज़?
पंख विहीन मैं
मेरे तो लब भी सिले हुए हैं!..

Usha Wadhwa
उषा वधवा

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Kavita

*
गुज़र जानी थी ये उम्र
किसी बेनाम कहानी की तरह
कि बियाबान में फैली
ख़ुशबू और उसकी रवानी की तरह
गर ये दिल की धड़कन
तेरी आंखों के
समंदर में न उतरी होती..

*
न अफ़साने न फ़साने होते
न ही तक़दीर का मसला होता
गर फ़रिश्तों ने तेरी रूह को
धरती पे न छोड़ा होता..

*
क्यूं
गुज़रती है ज़िंदगी
बार-बार
तेरी चौखट से
उम्मीद के दामन में
तेरी तमन्ना
अभी बाकी तो नहीं है…

– शिखर प्रयाग

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Kavita

आज के हालातों में
हर कोई ‘बचा’ रहा है कुछ न कुछ
पर, नहीं सोचा जा रहा है
‘प्रेम’ के लिए
कहीं भी..

हां, शायद
‘उस प्रलय’ में भी
नाव में ही बचा रह गया था ‘कुछ’
कुछ संस्कृति..
कुछ सभ्यताएं..
और
.. थोड़ा सा आदमी!

प्रेम तब भी नहीं था
आज भी नहीं है
.. वही ‘छूटता’ है हर बार
हर प्रलय में
पता नहीं क्यों…

Hindi Kavita
Namita Gupta
नमिता गुप्ता

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मैं ख्वाब देखता था
तुम ख्वाब हो गए

उम्मीद के शहर में
तुम प्यास हो गए

उम्र मेरी एक दिन
लौट कर के आई

तुम आईने के लेकिन
एहसास हो गए…

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

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चित्र में रंग भर, मंत्रमुग्ध-सा
देख रहा था, कैनवास को
अंदर ही अंदर मेरा दंभ
मुझे शाबाशी दे रहा था
और जैसे पूछ रहा था
क्या कोई है, तेरे जैसा कलाकार
कितने ही नाम, कौंध गए ज़ेहन में मेरे
पर हर नाम मुझे, स्वयं से छोटा ही लगा
तभी एक रंगबिरंगी तितली
कहीं से आकर बैठ गई कैनवास पर
पलभर में हो गए जैसे
कैनवास के रंग फीके
अब मेरा दंभ, मुझसे ही
नज़रें चुरा रहा था… 

(more…)

जब ज़िक्र फूलों का आया याद तुम आए बहुत

चांद जब बदली से निकला, याद तुम आए बहुत

Gazal

कुछ न पूछो किस तरह परदेस में जीते हैं हम

ख़त तो आया है किसी का, याद तुम आए बहुत

यार आए थे वतन से प्यार के क़िस्से लिए

दिल है धड़का बेतहाशा, याद तुम आए बहुत

मैं हूं कोसों दूर तुम से उड़ के आ सकता नहीं

जब भी चाहा है भुलाना, याद तुम आए बहुत

जब हवा पूरब से आ सरगोशियां करने लगी

दिल में एक तूफ़ां उठा था, याद तुम आए बहुत

Vedprakash Pahwa

वेद प्रकाश पाहवा ‘कंवल’

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Kavay

मैं तुम्हारी हर चीज़ से

प्यार करती हूं

न चाहते हुए भी

जैसे

तुम्हारे सिगार की महक

बिस्तर पर फेंकी

हुई तुम्हारी टाई

ज़मीन पर पड़े बेतरतीब जूते

बाथरूम में पड़ा शेविंग रेजर

वैसे

तुम्हारी किताब में रखे सूखे

गुलाब भी समझते हैं

मेरे मौन को

और मोबाइल में रखी

ढेर सारी तस्वीरें भी

मुझे परेशान नहीं करती

क्योंकि

तुम्हारा साथ तो पा लिया

पर प्यार नहीं पाया

फिर भी मैं

प्यार करती हूं

तुम्हारी सब

प्रेमिकाओं से

हां

मैं तुम्हारी हर चीज़ से

प्यार करती हूं…

              – नीरज कुमार मिश्रा

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नज़रें जो उनकी बदलीं, ज़माने बदल गए

मयखाना तो वही है, पैमाने बदल गए

Kavay

तुम पूछते हो उनके, जाने से क्या हुआ

होंठों के गुनगुनाते, तराने बदल गए

वादा वो करके आए थे, न आए हैं वो अब

हर रोज़ उनके न आने के, बहाने बदल गए

जज़्बा मुहब्बतों का, है पाक आज भी

फिर क्यों मुहब्बतों के, फसाने बदल गए

कहने को क्या नहीं है, अब आदमी के पास

लेकिन अब दौलतों के, ख़ज़ाने बदल गए

नज़रें जो उनकी बदलीं, ज़माने बदल गए

मयखाना तो वही है, पैमाने बदल गए

Dinesh Khanna

  दिनेश खन्ना

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Kavay

लिपटकर रो लेती गर तुम होते

ग़म कुछ कम होते गर तुम होते

बांहों में सिमट जाते खो जाते गर तुम होते

तुम्हारे हो जाते गर तुम होते

कल भी पुकारा था दोराहे पर

आंख न नम होती गर तुम होते

हां उसी मोड़ पर जाकर देखा है अभी

साथ-साथ चलती गर तुम होते

मुकम्मल हो जाती मुहब्बत मेरी

हां तुम गर तुम बस तुम होते…

 

– विद्यावती

यह भी पढ़ेShayeri

दग़ाबाज़ दुनिया हसीं दिख रही है

बता साकिया तूने क्या दे दिया है

दराज़-ए-उमर की दुआ देने वालों

न दो बद्दुआएं, बहुत जी लिया है

Shayari

क़यामत बने या 1 हशर वो बला से

हमें क्या, गिरेबान को सी लिया है

 

बहुत देख ली है फ़रेबों की दुनिया

उठा ले ख़ुदाया, बहुत जी लिया है

निगाहों में 2 वहशत, ज़बां बहकी-बहकी

न जाने ‘कंवल’ ने ये क्या पी लिया है

Vedprakash Pahwa

वेद प्रकाश पाहवा ‘कंवल’

  1. मुसीबत 
  2. पागलपन

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Kavay- Diwali

Kavay

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