Kavay

सुबहों को व्यस्त ही रखा, दुपहरियां थकी-थकी सी रही
कुछ जो न कह सकी, इन उदास शामों से क्या कहूं..

चुन-चुनकर रख लिए थे जब, कुछ पल सहेज कर
वो जो ख़र्चे ही नहीं कभी, उन हिसाबों का क्या कहूं..

न तुमने कुछ कहा कभी, मैं भी चुप-चुप सी ही रही
हर बार अव्यक्त जो रहा, उन एहसासों का क्या कहूं..

यूं तो गुज़र ही रहे थे हम-तुम, बगैर ही कुछ कहे-सुने
अब कि जब मिलें, छूटे हुए उन जज़्बातों से क्या कहूं..

हां है कोई चांद का दीवाना, कोई पूजा करे सूरज की
वो जो भटकते फिर रहे, मैं उन टूटे तारों से क्या कहूं..

न ख़त का ही इंतज़ार था, और न किसी फूल का
सिर्फ़ लिखी एक कविता, खाली लिफ़ाफ़ों से क्या कहूं…

Namita Gupta 'Manasi'
नमिता गुप्ता ‘मनसी’
Poetry

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सुनो दोस्तों,
तुम घबराना मत..
जल्दी ही हम फिर मिलेंगे
जो साथी छूट गए
उनकी बातें याद करेंगे
कभी हंस देंगे, कभी रो लेंगे
फिर बैठेंगे कॉफी के कप लेकर साथ
गले लेगेंगे, डालेंगे हाथों में हाथ
कुछ दिन की ही दूरी है
बस एक मजबूरी है
सुनो दोस्तों,
तुम घबराना मत..
फिर होगा समंदर का किनारा
रेत पर फिर दौड़ेंगे, भागेंगे
महफ़िलें फिर जमेगी
हंसी का दौर फिर आएगा
बस इस लंबी रात को जाने दो
इंतज़ार करेंगे
सुनो दोस्तों,
तुम घबराना मत..
सामनेवाले झूमते पेड़ को देखो
पिछले पतझड़ में कैसा था
अब पत्ता-पत्ता चहकता है
फूलों से कैसा महकता है
ऐसे ही हम चहकेंगे
जल्दी ही हम फिर मिलेंगे
सुनो दोस्तों,
तुम घबराना मत…

Poonam Ahmed
पूनम अहमद

Poetry

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हे प्रभु
जब मैं तुमसे
प्रेम मांगता था
तब तुमने
जीवन के संघर्ष के
रूप में
मुझे युद्ध प्रदान किया
आज मैं जीवन में
विभिन्न अस्त्र शस्त्र
व उनके संचालन की क्षमता में
पारंगत हो चुका हूं
तुम मुझे प्रेम
करने को कहते हो
आख़िर क्यों?
प्रभु मुस्कुराए और बोले
मैं तुम्हें वही दे सकता हूं
जो तुम्हारे पास नहीं है
बचपन में
तुम्हारे पास
जीवन के रणभूमि में
संघर्ष की
क्षमता नहीं थी
और वह मुझे तुम्हें
वरदान स्वरूप
प्रदान करनी पड़ी
आज तुम
युद्ध करते करते
इतनी दूर निकल आए हो
कि प्रेम भूल गए हो
सो तुम्हें मानवता से
प्रेम करने का वरदान
दे रहा हूं
एक बात और
तुम्हारी मांग
और मेरे प्रतिदान में
थोड़ा सा अंतर है
तुम बचपन में
व्यक्तिगत प्रेम में जीना
और सामाजिक संघर्ष
में निर्वाण चाहते थे
जबकि उस बिंदु पर संघर्ष
के व्यक्तिगत होने की आवश्यकता थी
अर्थात
संघर्षमय जीवन
तुम्हारे लिए
आवश्यक था
आज तुम
शक्ति के दुरुपयोग हेतु
व्यक्तिगत युद्ध
चाहते हो
और मैं तुम्हें
बचाने के लिए
सामाजिक प्रेम
प्रदान कर रहा हूं
बचपन में तुम्हें प्रेम
प्रदान करता
और आज तुम्हें युद्ध
प्रदान करता
तो तुम
भस्मासुर बन जाते
मानव नहीं…

Murali Manohar Srivastava
मुरली मनोहर श्रीवास्तव
Poetry

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कहानी अपना लेखक ख़ुद खोज लेती है

जब उतरना होता है उस भागीरथी को पन्नों पर

सुनानी होती है आपबीती इस जग को

तो खोज में निकलती है अपने भागीरथ के

और सौंप देती है स्वयं को एक सुपात्र को

लेखक इतराता है, वाह मैंने क्या सोचा! क्या लिखा! कमाल हूं मैं!

कहानी को गौण कर, मद से भरा वो मन पहाड़ चढ़ता है श्रेय के

और दूर खड़ी कहानी हंसती है एक मां की तरह, उसके भोलेपन पर

भूल जाता है वो तो निमित मात्र था, कहानी की दया का पात्र था…

कहानी कृतज्ञता की अपेक्षा किए बिना लेखक का भोला मन बहलाती है

और उसे भ्रमित छोड़.. पन्नों पर, किताबों में, ध्वनियों पर आरूढ़ हो इतराती है…

दीप्ति मित्तल
दीप्ति मित्तल
Poem

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बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं! माँ शारदे की कृपा बनी रहे!..

दिवस आज है पंचमी, यौवन पर ऋतुराज।
बसें शारदा लेखनी, सदा सँवारें काज।।

पुष्प प्रफुल्लित हो रहे, बिखरे चहुँ दिशि रंग।
कोयलिया की तान पर, तन मन भरे उमंग।।

पुष्प खिले हैं हर कहीं, पवन बहे अति मंद।
भँवरे आतुर हैं सभी, पीने को मकरंद।।

छटा बिखेरें तितलियां, रंग-बिरंगे फूल।
खग छेड़ें स्वर लहरियां, पा मौसम अनुकूल।।

ऋतु बसंत का ताज बन, आया फागुन माह।
रंग बिरंगे कुसुम सँग, लाया नव उत्साह।।

चहुँ दिशि उड़ती तितलियाँ, भ्रमर करें गुंजार।
फागुन रस में डूबने, हर मानव तैयार।।

कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

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Kavita

तेरी आंखों से कब राहों का उजाला मांगा
अपनी आंखों में बस थोड़ी सी ज़िंदगी दे दे

सदियों से इस जहां में इश्क़ इक गुनाह ठहरा
ज़ुल्फ़ों की छांव में मुझे थोड़ी सी ज़िंदगी दे दे

खुदा ने तिल तेरे चेहरे को नज़र कर रखा है
अपने पहलू में मुझे थोड़ी सी ज़िंदगी दे दे

रस्मों-रिवाज दुनिया के पत्थरों के साये हैं
अपने ख़्वाबों तले मुझे थोड़ी सी ज़िंदगी दे दे

हर तरफ़ मौत के सायों के खौफ़ फैले हैं
दिल मे रख ले मुझे थोड़ी सी ज़िंदगी दे

पीरो दरगाह जा के एक दुआ मांगी है
अपनी तमन्ना में मुझे थोड़ी सी ज़िंदगी दे दे

ज़िंदगी बस ज़िंदगी है ज़िंदगी से क्या मांगूं
अपने साये में मुझे थोड़ी सी ज़िंदगी दे दे…

शिखर प्रयाग

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Gazal

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जैसे लौट आती हैं चिड़ियां
दिनभर की उड़ान के बाद
थकी-हारी
वापस घोंसलों में

जैसे लौट आते हैं बीज
ओढ़े हुए
अनंत संभावनाओं के कवच को
हरियाली के सफ़र के बाद
चुपचाप
सूखे हुए फूलों में

जैसे लौट आती हैं बारिशें
समेटे हुए
तमाम नदियों को
और उड़ेल देती हैं
अपना सर्वस्व
जी भर
रेगिस्तानों में

जैसे लौट आता है प्रेम
बगैर ही किसी
मिलने-बिछुडने की शर्तों के साथ
अनसुना करते हुए
सारी नसीहतें
ग्रह-नक्षत्रों की
सुनते हुए सारी फटकारें
जन्म-जन्मांतरों की

सुनो,
लौट आएंगे हम-तुम भी
घोंसलों में
चिड़ियां की तरह ,
बीजों में
फूलों की तरह
रेगिस्तानों में
बारिशों की तरह
एक-दूसरे की कविताओं में
ठीक प्रेम की ही तरह…

नमिता गुप्ता ‘मनसी’

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Kavya-
Kavita

वस्त्रहरण

दौपदी का, हुआ था युगों पहले

धृतराष्ट्र के

द्यूत क्रीड़ागृह में

युगों के प्रवाह में नष्ट नहीं हुआ वो

द्यूत क्रीड़ागृह

अपितु इतना फैला

इतना फैला कि आज समूचा देश ही

बन गया है

द्यूत क्रीड़ागृह

दाँव पर लगती है

हर मासूम लड़की की ज़िंदगी

जिसने किया है गुनाह

सपने देखने का

किया है गुनाह

युगों के संवेदनहीन अंधत्व पर हंसने

और

अपनी शर्तों के साथ आत्मनिर्भर जीवन जीने का

युगों पहले कहा था

भीष्म ने सिर झुकाकर अग्निसुता से

धर्म की गति अति सूक्ष्म होती है पुत्री

नहीं है प्रावधान

धर्म में

रोकने का दुःशासन के हाथ

और मैं हूँ बंधा धर्म के साथ

विवश हूँ, क्षमा करो

और आज फिर वही

अनर्गल, नपुंसक विवशता

क़ानून की

मैं विवश हूँ, बंधा हूँ क़ानून के साथ

नहीं रोक सकता किसी नाबालिग के हाथ

पिंजरे में हैं मेरे अधिकार

और

वो है स्वतंत्र करने को, नृशंसता के सभी हदें पार

अभिभावकों, मंच पर आओ

‘ओ री चिरैया’ के गीत गाओ,

और दो आँसू बहाकर

घर जाकर

अपने आँगन की चिरैया के पर कतरकर

कर दो उसे पिंजरे में बंद

क्योंकि हम हैं विवश

अपराधियों को सड़कों पर

विचरने देने को स्वच्छंद

तो क्या

इक क्रांति युग में लाने की

सैलाब दिलों में उठाने की

अथक यात्रा ख़त्म हुई?

टूटी सारी आशाएँ?

मिट गए सभी भ्रम?

नहीं, नहीं, हम अग्निसुता, हम भैरवी

हम रणचंडी, हम माँ काली

हम इतने कमज़ोर नहीं

अभी नहीं मिटा है एक हमारा

उस परमशक्ति पर दृढ़ विश्‍वास

सह लेंगे हम उसी भरोसे

और कुछ वर्षों का वनवास

बाधा, विघ्नों में तप-तपकर

आत्मशक्ति को और प्रखरकर

पाएंगे हम पात्रता

हो उस महाशक्ति के हाथ हमारे रथ की डोर

फिर जोड़ेंगे महासमर

फिर होगा विप्लव गायन

देंगे फिर युग को झकझोर

शर शैया पर लेटेगा ही

इक दिन ये जर्जर क़ानून

मिटाने को अंधी संवेदनहीनता

जब होगा हर इक दिल में जुनून

लचर न्याय व्यवस्था को

जगत से जाना ही होगा

हम सबको संगठित तपस्या कर

नवयुग को लाना ही होगा…

bhavana prakash
भावना प्रकाश

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Hindi Poems

देखा था पहली बार
वसंत को
तुम्हारी आंखों से
छलकते प्यार में
महसूस किया था
टेसू की तरह
रक्तिम अपने होंठों पर
हवा में लहराते पत्तों की तरह
सरगोशी करते कुछ शब्दों में
सुनी थी उसकी आवाज़
कानों के बेहद क़रीब
फिर रोम-रोम में
उतर गया था
एक स्पर्श सा वसंत
अमलतास के पीले उजालों सा
कचनार की कलियां
चटक कर खिल गई थी
गालों पर
आज भी
उस वसंत की छुवन
महुए के नशे सी
तारी है दिल पर…

Vinita Rahurikar
विनीता राहुरीकर

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Poetry

कोयलिया
तू हर दिन किसे बुलाती है?

भोर होते ही सुनती हूं तेरी आवाज़
विरह का आर्तनाद
प्रणयी की पुकार
मनुहार
सभी कुछ है उसमें
गूंज उठता है उपवन
हर दिन
दिन भर

ढूंढ़ती है उसे तू डाल-डाल
भोर से सांझ तक
तेरा खुला निमंत्रण पाकर भी
नहीं आता क्यों मीत तेरा?
विरक्त है तुझसे?
या वह
विवश?

प्रात: होते ही गूंज उठती है
फिर वही पुकार
कुहू-कुहू की अनुगूंज
खिड़की की राह भर जाती है
मेरे कमरे में
द्विगुणित हो गूंजती है
मेरे आहत मन में
पुकारता है मेरा भी मन
मनमीत को
विरह का आर्त्त
प्रणयी की पुकार
मनुहार
सभी कुछ उसमें
पर सखी
कैसे पहुंचे उस तक
मेरी आवाज़?
पंख विहीन मैं
मेरे तो लब भी सिले हुए हैं!..

Usha Wadhwa
उषा वधवा

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Kavita

*
गुज़र जानी थी ये उम्र
किसी बेनाम कहानी की तरह
कि बियाबान में फैली
ख़ुशबू और उसकी रवानी की तरह
गर ये दिल की धड़कन
तेरी आंखों के
समंदर में न उतरी होती..

*
न अफ़साने न फ़साने होते
न ही तक़दीर का मसला होता
गर फ़रिश्तों ने तेरी रूह को
धरती पे न छोड़ा होता..

*
क्यूं
गुज़रती है ज़िंदगी
बार-बार
तेरी चौखट से
उम्मीद के दामन में
तेरी तमन्ना
अभी बाकी तो नहीं है…

– शिखर प्रयाग

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Kavita

आज के हालातों में
हर कोई ‘बचा’ रहा है कुछ न कुछ
पर, नहीं सोचा जा रहा है
‘प्रेम’ के लिए
कहीं भी..

हां, शायद
‘उस प्रलय’ में भी
नाव में ही बचा रह गया था ‘कुछ’
कुछ संस्कृति..
कुछ सभ्यताएं..
और
.. थोड़ा सा आदमी!

प्रेम तब भी नहीं था
आज भी नहीं है
.. वही ‘छूटता’ है हर बार
हर प्रलय में
पता नहीं क्यों…

Hindi Kavita
Namita Gupta
नमिता गुप्ता

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