Kavay

Hindi Gazal

जब भी मैंने देखा है दिलदार तुम्हारी आंखों में

चाहत का इक़रार मिला हर बार तुम्हारी आंखों में

 

रमता जोगी भूल गया है रस्ता अपनी मंज़िल का

देख लिया है उसने अब इक़रार तुम्हारी आंखों में

 

जो सदियों से गुम था मेरा, आज मिला दिल क़िस्मत से

उसको मैंने ढूंढ़ लिया दिलदार तुम्हारी आंखों में

 

जिसको योगी ढूंढ़ रहे थे, युगों युगों से जंगल में

मैंने है वो खोज लिया इसरार तुम्हारी आंखों में

 

हर कोई मेरी जां का दुश्मन बना हुआ है महफ़िल में

जाने कितने 1फ़ितने हैं सरकार तुम्हारी आंखों में

vedprakash pahwa

वेद प्रकाश पाहवा ‘कंवल’

  1. शरारतें

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कौन कहता है अकेले ज़िंदगी नहीं गुज़रती

मैंने चांद को तन्हा देखा है सितारों के बीच में

Kavay

 

कौन कहता है ग़म में मुस्कुराया नहीं जाता

मैंने फूलों को हंसते देखा है कांटों के बीच में

कौन कहता है पत्थरों को एहसास नहीं होता

मैंने पर्वतों को रोते देखा है झरने के रूप मेंं

कौन कहता है दलदल में जाकर सब गंदे हो जाते हैं

मैंने कमल को खिलते देखा है कीचड़ के बीच में

कौन कहता है दूसरे की आग जला देती है

मैंने सूरज को जलते देखा है ख़ुद की आग में

कौन कहता है ज़िम्मेदारी निभाना आसान नहीं होता

मैंने प्यार से सबका बोझ उठाते देखा है धरती माता के रूप में

– रेश्मा कुरेशी

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Hindi Gazal

मेरे होंठों के तबस्सुम कहीं गुम हो गए हैं

जब से सुना है ग़ैर के वो हो गए हैं

मेरे अरमानों को ना अब जगाना

बड़ी मुश्किल से थक कर सो गए हैं

मेरी यादों को ज़ेहन से मिटा दिया उसने

आज इतने बुरे हम हो गए हैं

ग़ैर की छोड़िए अपनों से मुलाक़ात नहीं

सोच के दायरे अब कितने छोटे हो गए हैं

व़क्ते पीरी भी दुश्मनों ने याद रखा मुझे

दोस्त तो न जाने कहां गुम हो गए हैं

कौन निकला है सैरे गुलशन को

सारे कांटे गुलाब हो गए हैं

 

   दिनेश खन्ना

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Hindi Poems

बेटी तो होती है एक कली

अगर खिलेगी वह नन्ही कली

तो बनेगी एक दिन फूल वह कली

चाहे हो वह बेटी किसी की भी

बस तुम सम्हालो ख़ुद को

बेटी तो सम्हल जाएगी अपने आप

फिर चाहे तुम दो या ना दो साथ

 

तुम संभालो ख़ुद को

अपनी बुरी नज़र को

अपनी भूखी हवस को

अपनी झूठी मर्दानगी को

अपने वहशीपन को

अपनी दरिंदगी को

अपनी हैवानियत को

जगाओ अपनी इंसानियत को

फिर बेटी तो सम्हल जाएगी ख़ुद अपने आप

 

तुम सम्हालो ख़ुद को

छोड़ो करना भेदभाव

छोड़ो करना अन्याय

छोड़ो कसना फ़ब्तियां उस पर

छोड़ो करना बदनाम उसे

छोड़ो डालना हीन दष्टि उस पर

छोड़ों जंजीरों में जकड़ना उसे

फिर बेटी तो सम्हल जाएगी ख़ुद अपने आप

 

तुम सम्हालो ख़ुद को

मारो ना कोख में ही उसे

आने दो इस दुनिया में भी उसे

दो जीने का अधिकार उसे

दो उसका पूरा हक़ उसे

दो बराबरी का मौक़ा उसे

दो आगे बढ़ने का हौसला उसे

दो थोड़ा तो समय उसे

फिर बेटी तो सम्हल जाएगी ख़ुद अपने आप

 

तुम सम्हालो ख़ुद को

बुनने दो कुछ सपने उसे

उड़ने दो खुले नभ में उसे

पढ़ने दो किताबें उसे

बढ़ाने दो आगे कदम उसे

करो उसका भी सम्मान

समझो उसे घर की शान

फिर बेटी तो सम्हल जाएगी ख़ुद अपने आप

 

अगर तुम सम्हाल लोगे अभी ख़ुद को

सम्हालेगी बुढ़ापे में वह तुम्हें

जब होगे तुम बहुत लाचार

और चलना-फिरना भी होगा दुष्वार

बेटी तो सम्हल जाएगी ख़ुद अपने आप

फिर चाहे तुम दो या ना दो साथ

बस तुम सम्हालो खुद को…

– सुरेखा साहू

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Poem

लिख दे लिखनेवाले

मुझ पर एक किताब

संग बैठ आ किसी पहर

दूं जीवन का हिसाब

 

अश्क दिखें ना किसी अक्षर में

बस मुस्कुराहट हंसती हो

पन्ने तले छिपा देना दर्द

लिखना ख़ुशियां बेहिसाब

 

लिख दे लिखनेवाले

मुझ पर एक किताब

ना कहना बेवफ़ा उसको

जिसने छोड़ा भरे बाज़ार

 

देकर राधा नाम मुझको

लिख देना प्रेम अप्रम्पार

लिख दे लिखनेवाले

मुझ पर एक किताब

 

– मंजू चौहान

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Kavay- Jeevan-Mrityu

जीवन-मृत्यु अद्भुत प्रेमी

मिल जाने को हैं ये आतुर

जीवन जूझ रहा है पल-पल

बढ़ा जा रहा है मिलने उससे

आहट दबा हौले से चली आ रही वो

चिर आलिंगन में लेने अपने

स्तब्ध रात्रि की बेला में

चुपके से आ जाना तुम

कोलाहल की इस दुनिया से

अहंकार और राग द्वेष सब छोड़-छाड़कर

मैं चल दूंगा साथ प्रिये!

घर परिवारजन, इष्ट मित्र सब

बलात पीछे खींच रहे हैं उसको

फिर भी जीवन मोहजाल को काट-कूटकर

बढ़ा जा रहा गले लगाने उसको

मत रोको, मत रोको मुझे जाने दो

बाट जोह रही है वो मेरी

बुला रही है मुझे पास वो

घड़ी आ गई है अब मिलन की

तड़प रही है आत्मा मेरी

परम शांति को पाने को

परमात्मा में मिल जाने को

अब मत रोको, मुझे जाने दो

चिर निद्रा में सोने दो

परम सत्य को पा लेने दो

सदा कृतज्ञ हूं प्रभु तुम्हारा

झोली तुमने सुख से भर दी

अब इतनी और दया करना प्रभु मेरे

दुख पीड़ा मेरी हर लेना

डर-संशय को दूर भगाकर

मधुर मिलन की ये बेला भी

सुखद बना देना प्रभु मेरे!

– डॉ (श्रीमती) कृष्णा

 

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आईने को आईने की ज़रूरत क्या है

दिल हो आईना तो सूरत की ज़रूरत क्या है

ज़िंदगी मुश्किल है या आसां फ़र्क़ नहीं है

तू साथ है तो सहारे की ज़रूरत क्या है

हर एक दिल शिकायतों से भारी है

अब किसी को कुछ देने की ज़रूरत क्या है

ज़िंदगी दर्द का सफ़र है न कि सैर सपाटा

इसमें सब मिल जाने की ज़रूरत क्या है

कभी ख़ुद से पूछिए कि किसके काम आए हैं

अब कोई काम न आए तो उम्मीद की ज़रूरत क्या है…

 

Murli Manohar Shrivastav           

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

 

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Gazal

मेरी आंख से बता क्यों ख़्वाब झांकता है
एहसास का समंदर तेरी आंख में छुपा है

दिल मेरा स़िर्फ लफ़्ज़ों का आईना ठहरा
रूमानियत का परचम तेरे अश्क में छुपा है

तू आस पास हो तो तस्वीर खींच लूं
मेरे दिल में जो बसा है वो रूह-सा छुपा है05

तुझे ढूढ़ने को निकले तो उस तक पहुंच गए
तेरी पाकीजगी में हमदम अभी और क्या छुपा है…

 

Murli Manohar Shrivastav

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

 

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Kavita- Zaruri Thi

बाकी थी तमन्नाएं हसरत अधूरी थी

चाहतें तड़पती थीं और दुआ अधूरी थी

फिर तेरी आंख से जीने का उजाला मांगा

उम्र तो मिली थी मुझे रोशनी ज़रूरी थी

व़क्त तो कट जाता ज़ुल्फ़ों की छांव में

पर ज़िंदगी गुज़रने को धूप भी ज़रूरी थी

धूल तेरे पांव की चंदन सी महकी थी

ख़ुशबू बदन की तेरी सांस में ज़रूरी थी

ऩज़रें बदलती रहीं हालात देख कर

एक निगाह ऐसे में तेरी ज़रूरी थी…

Murli Manohar Shrivastav

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

 

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Gazal

ऐ दोस्त यह जीने का कोई ढंग नहीं है

कि सांस चल रही है पर उमंग नहीं है

अब जिससे पूछिए, है इसी बात का गिला

कि ज़िंदगी में पहले सा वो रंग नहीं है

अब ढूंढ़े से भी घर कोई ऐसा नहीं मिलता

जिसमें किसी मसले पे कोई जंग नहीं है

ये ज़िंदगी की राहें भी अजीब हैं यारों

सब साथ चल रहे हैं, पर कोई संग नहीं है…

 

        दिनेश खन्ना

 

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Gazal

 

नमी आंखों में तेरी देखकर घुटता है दम मेरा

बड़ा बेचैन करता है तेरा उतरा हुआ चेहरा

तेरी मायूसियां दिल को परेशां करती रहती हैं

खुदा के वास्ते दे दे मुझे रंज-ओ-अलम तेरा

तेरे दुख बांट कर मुझ को बड़ा आराम मिलता है

बनूं मैं राज़दां तेरा शरीके ग़म बनूं तेरा

नहीं मिलता सुकूं मुझको परेशां देख कर तुझको

यही है कशमकश मेरी इसी उलझन ने है घेरा

मिले आराम से मंज़िल बना ले हमसफ़र मुझको

बनूं मैं हमनवा तेरा तू बन जा हमनवा मेरा…

वेद प्रकाश पाहवा ‘कंवल’

 

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World Poetry Day

World Poetry Day

मैं जब भी अकेला होता हूं
क्यों ज़ख़्म हरे हो जाते हैं

क्यों याद मुझे आ जाती हैं
वो बातें सारी दर्द भरी

मैं जिनको भूल नहीं पाता
वो घाव कितने गहरे हैं

किस-किसने दिए हैं ग़म कितने
किस-किसका नाम मैं लूं हमदम

जिस-जिसने मुझपे वार किए
वो सारे अपने थे हमदम

एक बात समझ में आई है
है चलन यही इस दुनिया का

जिस पेड़ ने धूप में छांव दी
उस पेड़ को जड़ से काट दिया…

 

वेद प्रकाश पाहवा ‘कंवल’

 

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