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कविता- प्रेम (Kavita- Prem)

Kavita, Prem

Kavita, Prem

बेशक़ीमती हैं पल तुम्हारे

यूं ख़्वाबों में आया न करो

माना ह्रदय में

उमड़ता प्यार बहुत है

कहूं क्या बेबस याद बहुत है

न कहीं उमड़ पाया तो क्या?

आंसुओं संग ढुलक जाएगा

माटी संग मिल हर रुत में

नए-नए रूप धरेगा

आएगी जो वर्षा तो

महक उठेगी धरती

सोंधी महक से

मेरा प्यार ही तो होगा

रुत बदलेगी

रूप-रंग बदल जाते हैं जैसे

वैसे ही मेरा प्यार

धरती की उमस में

कसमसाता-सा

नव रूप धरेगा

आएगी जो शिशिर

रंगबिरंगे फूलों में

छवि उसकी ही होगी

बदलती भावों की तरह

वह फिर बदलेगा

उष्मा कैसे वह इतनी सहेगा?

ताप हरने को

बिखरने से पहली ही

फिर से, वह रंग बदलेगा

हां, तुम देख लेना

मेरा प्यार वहीं कहीं

तुम्हारे ही आस-पास

सफेद लिली के रूप में

हंस रहा होगा कि

तुम छू लो एक बार उसे

 

– सुनीता नैनम

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 ख़्वाबों की ज़िंदगी… (Khwabon Ki Zindagi…)

ख़्वाबों की ज़िंदगी, Khwabon Ki Zindagi

Khwabon Ki Zindagi

अपने ख़्वाबों की ज़िंदगी 
तो सभी जीते हैं..
पर ज़िंदगी तो वह है,
जो किसी का ख़्वाब हो जाए…

Murli Manohar Shrivastav      

     मुरली मनोहर श्रीवास्तव   

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रोहित की कलम से… (Rohit Ki Kalam Se…)

Rohit Ki Kalam Se

 

बदला हुआ मौसम
अचानक हिंदी पर गोष्ठियां, सम्मेलन व तरह-तरह के समारोह आयोजित होने लगे थे. हिंदी नारे बुलंदियो पर थे. सरकारी संगठनो से साठ-गांठ के ताबड़तोड़ प्रयास भी जोरों पर थे.
इन दिनों ’अंग्रेज़ी’ भी ’हिंदी’ बोलने लगी थी. मौसम बदला-बदला महसूस हो रहा था. कुछ बरसों में ऐसा मौसम तब आता है, जब ’विश्व हिंदी सम्मेलन’ आनेवाला होता है.

संवाद (लघु-कथा)
पिंजरे में बंद दो सफ़ेद कबूतरों को जब भारी भरकम लोगों की भीड़ के बीच लाया गया, तो वे पिंज़रे की सलाखों में सहम कर दुबकते जा रहे थे. फिर, दो हाथों ने एक कबूतर को जोर से पकड़कर पिंज़रे से बाहर निकालते हुए दूसरे हाथों को सौंप दिया. मारे दहशत के कबूतर ने अपनी दोनों आँखे भींच ली थी. समारोह के मुख्य अतिथि ने बारी-बारी से दोनों कबूतर उड़ाकर समारोह की शुरूआत की. तालियों की गड़गड़ाहट जोरों पर थी.
एक झटका-सा लगा, फिर उस कबूतर को एहसास हुआ कि उसे तो पुन उन्मुक्त गगन में उड़ने का अवसर मिल रहा है. वह गिरते-गिरते संभलकर जैसे-तैसे उड़ चला. उसकी खुशी का ठिकाना न रहा, जब बगल में देखा कि दूसरा साथी कबूतर भी उड़कर उसके साथ आ मिला था. दोनों कबूतर अभी तक सहमे हुए थे. उनकी उड़ान सामान्य नहीं थी.
थोड़ी देर में सामान्य होने पर उड़ान लेते-लेते एक ने दूसरे से कहा, आदमी को समझना बहुत मुश्किल है. पहले हमें पकड़ा, फिर छोड़ दिया! यदि हमें उड़ने को छोड़ना ही था, तो पकड़कर इतनी यातना क्यों दी? मैं तो मारे डर के बस मर ही चला था.
चुप, बच गए ना आदमी से! बस उड़ चल!

हिंदी दोहे 

हिंदी दोहे बाहर से तो पीटते, सब हिंदी का ढोल ।

अंतस में रखते नहीं, इसका कोई मोल ।।

एक बरस में आ गई, इनको हिंदी याद ।

भाषण-नारे दे रहे, दें ना पानी-खाद ।।

अपनी मां अपनी रहे, इतना लीजे जान ।

उसको मिलना चाहिए, जो उसका सम्मान ।।

हिंदी की खाते रहे, अंग्रेजी से प्यार ।

हिंदी को लगती रही, बस अपनों की मार ।।

हिंदी को मिलते रहे, भाषण-नारे-गीत ।

पर उसको तो चाहिए, तेरी-मेरी प्रीत ।।

सुन! हिंदी में बोल तू, कर कुछ ऐसा काम ।

दुनियाभर में हिंद का, होवे ऊंचा नाम ।।

हिंदी में मिलती हमें, ‘रोहित’ बड़ी मिठास ।

इससे सुख मिलता हमें, सबसे लगती खास ।।

खुसरो के अच्छे लगें, ‘रोहित’ हिंदवी गीत ।

मीरा-तुलसी-सूर से, लागी हमको प्रीत ।।

रोहित कुमार ‘हैप्पी’ 

(संपादक- भारत दर्शन, न्यूज़ीलैंड)

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कविता- तीन तलाक़ एक अभिशाप! (Kavita- Teen Talak Ek Abhishap)

Kavita Teen Talak Ek Abhishap

Kavita Teen Talak Ek Abhishap

गड़ा हुआ सीने पे कब से पत्थर तीन तलाक़ का
क्यों नहीं गिरने देती तुम, पाखंड निरे नकाब का

बुरखे के भीतर से दो आंखें करती रही सवाल
बेमोल हो गया है जीवन सारा, कर लो अब ख़्याल

जिसने छीन ली आज़ादी तेरी, तुझको औरत जान
क्यों करती हो ऐसे पाखंडी मौलवियों का मान

आगे आओ बोलो जूझो, कर लो ख़ुद को आज़ाद
तुम भी तो भारतवासी हो, छेड़ो गहन गरजता नाद

गूंज उठे सारे जग में, मांगों हर औरत का मान
सबक सीखा दो उनको, भूले तीन तलाक़ का मान…

कंचन देवड़ा

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कविता- आशा-निराशा (Kavita- Aasha-Nirasha)

Kavita, Aasha-Nirasha

Kavita, Aasha-Nirasha

मैं, मेरा व्याकुल मन, जब रात देर तक जाग रहे थे
इक मुट्ठी भर आसमान, हम हसरत से ताक रहे थे

तभी उठी लेखनी मेरी, अपने नन्हें कोमल पंख पसार
उड़ चली सब बंधन तोड़, उस निस्सीम गगन के पार

डर और आलस त्यागा तो, चाँद और तारे दोस्त बने
उजालों को ज़मी पर ले आई, वो चीर कर बादल घने

यारों हम सबकी अकुला में, हुनर की आतिश सोती है
ये मशाल न बन जाए, तक़दीरों की साजिश होती है

ये साजिशें हम अपने, संकल्प से ही झुठला सकते
छोड़ निराशा खुशियों को, मन की राह बता सकते

भावना प्रकाश

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याद आओगे तुम… (Yaad Aaoge Tum…)

Yaad Aaoge Tum

Yaad Shayari

                                                            – ख़ुशबू यादव

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गीत- तन्हाई का ज़ख़्म (Geet- Tanhai Ka Zakham)

Geet, Tanhai Ka Zakham

Geet, Tanhai Ka Zakham

           तन्हाई का ज़ख़्म

ज़ख़्म कोशिश दर कोशिश बढ़ता गया
ज्यों-ज्यों मैं तन्हाइयों से लड़ता गया

एक अनदेखी सी दौड़ लगी है हर कहीं
दौड़ते-दौड़ते मैं घर में ही पिछड़ता गया

किसी मुनासिब ख़त की ख़ातिर
मैं हर हवा का झोंका पढ़ता गया

मैंने तुझे एक क्षितिज समझकर
तेरी ओर चलता गया तेरी ओर चलता गया

आग के बीच कोई माकूल माहौल हो
यही देखने मैं सच के अंगार निगलता गया

हर शख़्स बस एक सांप की तरह,
ज़िंदगी की बीन पर इधर-उधर मुड़ता गया

ज़िंदा रहने के ऐवज़ में शर्त हमें ऐसी मिली
कि मैं रोज़ ही सूली उतरता-चढ़ता गया

‘बैरागी‘ किसी मखमली राह की उम्मीद में
बस कांटों से ही वास्ता बढ़ता गया

 

       अमित कुमार

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