Kavita

Poetry

संघर्ष चल रहा है
युद्धीय स्तर पर
मन और बुद्धि के बीच
निरंतर संघर्ष..

विचार शक्ति का तर्क है कि
‘तुम्हें यूं याद करना
व्यर्थ है- पीड़ा दायक है
पागलपन भी
वह एक सपना था
मीठा ही सही
पर
बहुत पुराना
नामुमकिन है अब
उसको पाना
सपने टूटे तो
आहत करते हैं..

यह मन भी तो
पर कहां मौन है?
उत्तर है उसका
‘जीवन जिया जाता होगा
दिमाग़ी क़ानूनों से
मैं तो जानू बस
प्रीत की भाषा’

अजब टेढ़ी हैं इसकी राहें
है दलदल भी बहुत
ऊबड़-खाबड़ इस पथ पर
आंख मूंद चलोगे तो
घायल तुम ही हो जाओगे
रे मन..

पर यह मन
सुनकर भी अनसुनी कर देता है
मुस्कुराकर मन ही मन
अपने मन की ही करता है…

Usha Wadhwa
उषा वधवा

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Poetry

द्रौपदी

स्वयंवर

मैं अग्निसुता, मैं स्वयंप्रभा

मैं स्वयं प्रभासित नारी हूं

मैं यज्ञ जन्मा, और पितृ धर्मा

नहीं किसी से हारी हूं

हे सखे बताओ किंचित ये

क्यों हलचल सी मेरे मन में है?

वरण करूं मैं जिसका क्या

ऐसा कोई इस जग में है?

कैसे चुनूंगी योग्य पति

कैसे मैं उसे पहचानूंगी?

गर मेरे योग्य नही है वो,

तो कैसे मैं ये जानूंगी,

मेरे तेज को क्या कोई

सामान्य जन सह पाएगा

फिर सिर्फ़ निशाना साध मुझे

कोई कैसे ले जाएगा?

हे प्रभु, कहा है सखा मुझे

तो सखा धर्म निभाना तुम

क्या करूं क्या नहीं

सही राह दिखलाना तुम!..

bhavana prakaash
भावना प्रकाश

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Kavita-

देखा था पहली बार
वसंत को
तुम्हारी आंखों से
छलकते प्यार में
महसूस किया था
टेसू की तरह
रक्तिम अपने होंठों पर
हवा में लहराते पत्तों की तरह
सरगोशी करते कुछ शब्दों में
सुनी थी उसकी आवाज़
कानों के बेहद क़रीब
फिर रोम-रोम में
उतर गया था
एक स्पर्श सा वसंत
अमलतास के पीले उजालों सा
कचनार की कलियां
चटक कर खिल गई थी
गालों पर
आज भी
उस वसंत की छुवन
महुए के नशे सी
तारी है दिल पर…

Vinita Rahurikar
विनीता राहुरीकर

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Poetry

पूर्णता की चाहत लिए
प्रतीक्षारत कविताएं..

कुछ अधमिटे शब्दों की
प्रस्तावित व्याख्याएं..

कब से, पल-पल संजोई हुई
आशान्वित कल्पनाएं..

संभावनाओं की देहरी पर
राह तकती आकांक्षाएं..

और

मन्नतों के धागों में पिरोई हुई
अनगिनत गांठें..

सुनो,
..ऐसा है मेरा ये आंचल!..

नमिता गुप्ता ‘मनसी’

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मुझे तन्हाई से अक्सर मिला है
ख़्यालों में वहीं दिलबर मिला है

यूं मिलने के ठिकाने और भी थे
कभी छज्जे कभी छत पर मिला है

वो मेरे संग था बेफ़िक्र कितना
कि ग़म में भी सदा हंस कर मिला है

कोई वजह तो होगी कुछ तो होगा
किसी से आज वो छुपकर मिला है

दिखाया ख़ुद को जब से आईना है
मिला जो भी मुझे बेहतर मिला है

archana jauhari
अर्चना जौहरी
Gazal

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कभी-कभी
मैं कुछ नहीं भी कहती हूं
तुम
तब भी सुन लेते हो..
कैसे!

कभी-कभी
मैं कुछ कहती हूं
तुम समझते कुछ और ही हो
पता नहीं, क्यों!

कभी-कभी
तुम कहते तो हो
पर, मैं समझना ही नहीं चाहती!

कभी-कभी
बहुत कुछ कहते-सुनते हैं
हम-दोनों
एक-दूसरे के मौन में
और
करते रहते हैं
मन की बात…

Namita Gupta 'Mansi
नमिता गुप्ता ‘मनसी

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Kavya

*
गुज़र जानी थी ये उम्र
किसी बेनाम कहानी की तरह
कि बियाबान में फैली
ख़ुशबू और उसकी रवानी की तरह
गर ये दिल की धड़कन
तेरी आंखों के
समंदर में न उतरी होती..

*
न अफ़साने न फ़साने होते
न ही तक़दीर का मसला होता
गर फ़रिश्तों ने तेरी रूह को
धरती पे न छोड़ा होता..

*
क्यूं
गुज़रती है ज़िंदगी
बार-बार
तेरी चौखट से
उम्मीद के दामन में
तेरी तमन्ना
अभी बाकी तो नहीं है…

– शिखर प्रयाग

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Kavita

बारिश की बूंदों ने आज फिर दिल को गुदगुदाया है
रिमझिम फुहारों ने मौसम को आशिक़ाना बनाया है

ठंडी बयार कर रही आलिंगन मेरा
लगता है बिछड़ा मीत कोई मुझसे मिलने आया है

बारिश की बूंदों ने आज फिर दिल को गुदगुदाया है
ओढ़ इंद्रधनुषी चूनर आसमान ने किया श्रृंगार

मन मयूर भी नाच रहा जब बूंदों ने सुनाई मधुर झंकार
ऐसा लगा मानो कोई सोए अरमान जगाने आया है

बारिश की बूंदों ने आज फिर दिल को गुदगुदाया है
चंचल मन सी चंचल बूंदें हलचल सी पैदा करती है

गिली मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू मन में मदहोशी सी भर देती है
ऐसा लगता है दिल के साजों को बूंदों ने मधुर संगीत से सजाया है

बारिश की बूंदों ने आज फिर दिल को गुदगुदाया है…

सारिका फलोर

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लॉकडाउन पर विशेष

सब प्रतीक्षारत हैं
बैठे हैं
वक़्त की नब्ज़ थामे
कि कब समय सामान्य हो
और रुके हुए लम्हे चल पड़ें

राहों को प्रतीक्षा है
पदचापों की, घंटियों की, होर्न्स की
एक अनवरत चलते आवागमन की
जो उनकी धड़कन हैं
उनके होने का प्रमाण
उन्हें प्रतीक्षा है यात्रियों की
जिन्हें वो मंज़िल तक पहुंचा सकें
अपने होने को सार्थक बना सकें

घरों को प्रतीक्षा है
हलचल की
हंसी, ठिठोली, कहकहों की
दहलीज़ की
लक्ष्मण-रेखा लांघ कर
कोई भीतर आ सके
बाहर जा सके
उन्हें प्रतीक्षा है अपनों की
ख़ुशियों के उस सन्दूक के खुलने की
जिसकी चाभी अपनों के
पास है
ख़ुशियों का वो सन्दूक
अब न जाने कब खुले

रसोईघरों को प्रतीक्षा है
उनमें पसरी हुई ख़ामोशी के टूटने की
चाय का पानी उबले
कप खनकें
बर्तन सजें
पकवान बनें
अतिथि आएं
अतिथि देवो भव:
अब ये देवता न जाने कब आ पाएं
सब प्रतीक्षारत हैं

प्रार्थनाघरों, स्कूलों, दफ़्तरों
क्रीडांगनों को प्रतीक्षा है
कि उनके प्रांगण और दर-ओ-दीवार
फिर से एक बार ज़िंदगी से भर जाएं
हर आंख लगी है
उस तरफ़
जिधर से आएगा
एक झोंका
हवा का
सकारात्मकता का
ईश कृपा का
और बदल जाएगी पूरी की पूरी दुनिया…

Archana jauhari
अर्चना जौहरी

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Kavay

सुनो कवि..
पहाड़ी के उस पार
वो स्त्री.. रोप रही है नई-नई पौध
सभ्यताओं की
और उधर.. गंगा के किनारे
विवश खड़ी है.. वो स्त्री
एक और ‘कर्ण’ लिए
तर-बतर हैं दोनों की ही आंखें
बताओ तो
क्या गीले नहीं हुए अब भी तुम्हारे शब्द!

सुनो लेखक..
पीठ पर बच्चा बांधे
वह स्त्री कर रही है मजदूरी
और उधर, व्यस्त है वो स्त्री कब से
सरकारें बनाने-गिराने में
कहो न
क्यों तुम्हारी बहस में शामिल नहीं होते वो नाम
जो संभाले रहते हैं गृहस्थी को अंत तक!

सुनो ईश्वर..
तुमने तुलसी को गढ़ा, लक्ष्मी को भेजा..
दुर्गा, सीता, राधा, मीरा..
जब भी दफ़नाया होगा उसने अपने सपनों को
थोड़ा-बहुत तुम भी मृत ज़रूर हुए होंगे
बता सकते हो
क्यों हर बार रखा तुमने उसको पराश्रित ही!

नहीं है कोई जवाब.. किसी के पास भी!

Namita Gupta 'Mansi'
नमिता गुप्ता ‘मनसी’

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एक चुप होती हुई स्त्री कहती है बहुत कुछ…

तुलसी जताती है नाराज़गी
नहीं बिखेरती वो मंजरी
सारी फुलवारियां गुमसुम हो जाती हैं
घर की
कनेर.. सूरजमुखी..
सबके चेहरे नहीं दिखते
पहले जैसे
छौंका-तड़का हो जाता है और भी तीखा
रसोईघर में
नहीं मोहती ज़्यादा
भीने पकवानों की ख़ुशबू
और..
दूध उफन बाहर आता है रोज़

एक चुप होती हुई स्त्री..
मानो पृथ्वी का रुके रह जाना
अपनी धुरी पर

एक चुप होती हुई स्त्री..
लांघती है मन ही मन
खोखले रिश्तों की दीवारें
और प्रस्थान कर जाती देहरी के बाहर
बिना कोई आवाज़ किए हुए ही

एक चुप होती हुई स्त्री..
और भी बहुत कुछ सोचती है
वह ‘आती’ तो है
हां, उसे आना ही पड़ता है
पर, वह फिर कभी नहीं लौटती
पहले की तरह…

Namita Gupta 'Mansi'
नमिता गुप्ता ‘मनसी’

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Kavya

इस से पहले कि
मैं तुम्हें
आई लव यू
कहने का साहस जुटा सकूं
डरता हूं
कहीं ये तीन शब्द
डिक्शनरी से
डिलीट न हो जाएं
वजह इतनी आसान होती
तो बता देता
न जाने क्यों
वे सारे शब्द डिक्शनरी में हैं
जो बोले और कहे जा सकते हैं
और मुझे अपना प्यार
उन शब्दों से परे लगता है
जो बोले कहे लिखे जा सकें
या इस जहां में कहीं भी
किसी भी डिक्शनरी में मौजूद हों…

– शिखर प्रयाग

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