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काव्य- सावन से पहले चले आना… (Kavay- Sawan Se Pahle Chale Aana…)

Hindi Kavita

सुनो ना…

सावन से पहले चले आना

बड़ा तरसी है आरज़ू तेरी ख़ातिर

इस बरस खुल के बरस जाना

मद्धिम हवा को साथ लिए

कुछ गुनगुनी बूंदों को हाथ लिए

जब दूर कहीं सूरज ढले

जब यहीं कहीं गगन धरा से मिले

दबे पांव

धीमी दस्तक से

दर मेरा खटखटाना

सुनो ना…

सावन से पहले चले आना

                                               – मंजू चौहान

 

मेरी सहेली वेबसाइट पर मंजू चौहान की भेजी गई कविता को हमने अपने वेबसाइट में शामिल किया है. आप भी अपनी कविता, शायरी, गीत, ग़ज़ल, लेख, कहानियों को भेजकर अपनी लेखनी को नई पहचान दे सकते हैं

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काव्य- क्यों है? (Kavay- Kyon Hai?

किसी की ज़िंदगी इतनी आसान

तो किसी की इतनी मुश्किल क्यों है?

काव्य

किसी के पास सब कुछ है

तो कोई कंगाल क्यों है?

 

कोई अकेले होकर भी किसी के साथ है

तो कोई भीड़ में भी तन्हा क्यों है?

 

कोई ग़मों में भी मुस्कुराता है

तो कोई ख़ुशियों में भी उदास क्यों है?

 

कोई एक लम्हे में ज़िंदगी जी लेता है

तो कोई ज़िंदगीभर उस एक लम्हे की

तलाश में क्यों है?

 

कोई अपने फैसलों में आज़ाद है

तो कोई रिश्तों की ज़ंजीरों में कैद क्यों है?

 

किसी को पल भर में ख़ुदा मिल जाता है

तो किसी का इंतज़ार इतना लंबा क्यों है?

 

किसी का सपना एक उड़ता हुआ गुब्बारा

तो किसी का आसमान क्यों है?

 

किसी के पास रास्ते ही रास्ते हैं

तो किसी के पास हर बार बंद दरवाज़ा क्यों है?

 

किसी की ज़िंदगी इतनी आसान

तो किसी इतनी मुश्किल आख़िर क्यों है?…

                                           – शिल्पी राय जेम्स

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ग़ज़ल- जब भी मैंने देखा है… (Gazal- Jab Bhi Maine Dekha Hai…)

Hindi Gazal

जब भी मैंने देखा है दिलदार तुम्हारी आंखों में

चाहत का इक़रार मिला हर बार तुम्हारी आंखों में

 

रमता जोगी भूल गया है रस्ता अपनी मंज़िल का

देख लिया है उसने अब इक़रार तुम्हारी आंखों में

 

जो सदियों से गुम था मेरा, आज मिला दिल क़िस्मत से

उसको मैंने ढूंढ़ लिया दिलदार तुम्हारी आंखों में

 

जिसको योगी ढूंढ़ रहे थे, युगों युगों से जंगल में

मैंने है वो खोज लिया इसरार तुम्हारी आंखों में

 

हर कोई मेरी जां का दुश्मन बना हुआ है महफ़िल में

जाने कितने 1फ़ितने हैं सरकार तुम्हारी आंखों में

vedprakash pahwa

वेद प्रकाश पाहवा ‘कंवल’

  1. शरारतें

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काव्य- कौन कहता है… (Kavay- Kaun Kahta Hai…)

 

कौन कहता है अकेले ज़िंदगी नहीं गुज़रती

मैंने चांद को तन्हा देखा है सितारों के बीच में

Kavay

 

कौन कहता है ग़म में मुस्कुराया नहीं जाता

मैंने फूलों को हंसते देखा है कांटों के बीच में

कौन कहता है पत्थरों को एहसास नहीं होता

मैंने पर्वतों को रोते देखा है झरने के रूप मेंं

कौन कहता है दलदल में जाकर सब गंदे हो जाते हैं

मैंने कमल को खिलते देखा है कीचड़ के बीच में

कौन कहता है दूसरे की आग जला देती है

मैंने सूरज को जलते देखा है ख़ुद की आग में

कौन कहता है ज़िम्मेदारी निभाना आसान नहीं होता

मैंने प्यार से सबका बोझ उठाते देखा है धरती माता के रूप में

– रेश्मा कुरेशी

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काव्य- तुम सम्हालो ख़ुद को… (Kavay- Tum Samhalo Khud Ko…)

Hindi Poems

बेटी तो होती है एक कली

अगर खिलेगी वह नन्ही कली

तो बनेगी एक दिन फूल वह कली

चाहे हो वह बेटी किसी की भी

बस तुम सम्हालो ख़ुद को

बेटी तो सम्हल जाएगी अपने आप

फिर चाहे तुम दो या ना दो साथ

 

तुम संभालो ख़ुद को

अपनी बुरी नज़र को

अपनी भूखी हवस को

अपनी झूठी मर्दानगी को

अपने वहशीपन को

अपनी दरिंदगी को

अपनी हैवानियत को

जगाओ अपनी इंसानियत को

फिर बेटी तो सम्हल जाएगी ख़ुद अपने आप

 

तुम सम्हालो ख़ुद को

छोड़ो करना भेदभाव

छोड़ो करना अन्याय

छोड़ो कसना फ़ब्तियां उस पर

छोड़ो करना बदनाम उसे

छोड़ो डालना हीन दष्टि उस पर

छोड़ों जंजीरों में जकड़ना उसे

फिर बेटी तो सम्हल जाएगी ख़ुद अपने आप

 

तुम सम्हालो ख़ुद को

मारो ना कोख में ही उसे

आने दो इस दुनिया में भी उसे

दो जीने का अधिकार उसे

दो उसका पूरा हक़ उसे

दो बराबरी का मौक़ा उसे

दो आगे बढ़ने का हौसला उसे

दो थोड़ा तो समय उसे

फिर बेटी तो सम्हल जाएगी ख़ुद अपने आप

 

तुम सम्हालो ख़ुद को

बुनने दो कुछ सपने उसे

उड़ने दो खुले नभ में उसे

पढ़ने दो किताबें उसे

बढ़ाने दो आगे कदम उसे

करो उसका भी सम्मान

समझो उसे घर की शान

फिर बेटी तो सम्हल जाएगी ख़ुद अपने आप

 

अगर तुम सम्हाल लोगे अभी ख़ुद को

सम्हालेगी बुढ़ापे में वह तुम्हें

जब होगे तुम बहुत लाचार

और चलना-फिरना भी होगा दुष्वार

बेटी तो सम्हल जाएगी ख़ुद अपने आप

फिर चाहे तुम दो या ना दो साथ

बस तुम सम्हालो खुद को…

– सुरेखा साहू

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काव्य- स्त्री हूं… (Kavya- Stri Hoon…)

Hindi Kavita

मैं पीतल नहीं सोना हूं और चमकूंगी

सितम की आंधियां कितनी चला लोगे?

स्त्री हूं दीया हिम्मत का जलाए रखूंगी

ताक़त पर कर लिया तुमने गुमान बहुत

चंदन हूं घिसो जितना भी और गमकूंगी

 

दीवार ऊंची बना लो निकल ही जाऊंगी

पानी सी हूं मैं भाप बन के उड़ जाऊंगी

रास्ते ख़ुद ब ख़ुद मंज़िल खड़ी कर देंगे

अपने पर जब आ गई बढ़ के निकलूंगी

 

सब्र की मियाद है जिस भी दिन टूटेगी

गर्म लावा सी चीरकर बहा ले जाऊंगी

जितना तपाओगे मुझको और दमकूंगी

मैं पीतल नहीं सोना हूं और चमकूंगी

Dr. Neerja Shrivastav Niru

डॉ. नीरजा श्रीवास्तव नीरू

 

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काव्य- मुझ पर एक किताब… (Kavay- Mujh Par Ek Kitab…)

Poem

लिख दे लिखनेवाले

मुझ पर एक किताब

संग बैठ आ किसी पहर

दूं जीवन का हिसाब

 

अश्क दिखें ना किसी अक्षर में

बस मुस्कुराहट हंसती हो

पन्ने तले छिपा देना दर्द

लिखना ख़ुशियां बेहिसाब

 

लिख दे लिखनेवाले

मुझ पर एक किताब

ना कहना बेवफ़ा उसको

जिसने छोड़ा भरे बाज़ार

 

देकर राधा नाम मुझको

लिख देना प्रेम अप्रम्पार

लिख दे लिखनेवाले

मुझ पर एक किताब

 

– मंजू चौहान

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काव्य- जीवन-मृत्यु (Kavay- Jeevan-Mrityu)

Kavay- Jeevan-Mrityu

जीवन-मृत्यु अद्भुत प्रेमी

मिल जाने को हैं ये आतुर

जीवन जूझ रहा है पल-पल

बढ़ा जा रहा है मिलने उससे

आहट दबा हौले से चली आ रही वो

चिर आलिंगन में लेने अपने

स्तब्ध रात्रि की बेला में

चुपके से आ जाना तुम

कोलाहल की इस दुनिया से

अहंकार और राग द्वेष सब छोड़-छाड़कर

मैं चल दूंगा साथ प्रिये!

घर परिवारजन, इष्ट मित्र सब

बलात पीछे खींच रहे हैं उसको

फिर भी जीवन मोहजाल को काट-कूटकर

बढ़ा जा रहा गले लगाने उसको

मत रोको, मत रोको मुझे जाने दो

बाट जोह रही है वो मेरी

बुला रही है मुझे पास वो

घड़ी आ गई है अब मिलन की

तड़प रही है आत्मा मेरी

परम शांति को पाने को

परमात्मा में मिल जाने को

अब मत रोको, मुझे जाने दो

चिर निद्रा में सोने दो

परम सत्य को पा लेने दो

सदा कृतज्ञ हूं प्रभु तुम्हारा

झोली तुमने सुख से भर दी

अब इतनी और दया करना प्रभु मेरे

दुख पीड़ा मेरी हर लेना

डर-संशय को दूर भगाकर

मधुर मिलन की ये बेला भी

सुखद बना देना प्रभु मेरे!

– डॉ (श्रीमती) कृष्णा

 

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काव्य- उम्मीद की ज़रूरत क्या है? (Kavay- Ummeed Ki Zarurat Kya Hai?)

 

आईने को आईने की ज़रूरत क्या है

दिल हो आईना तो सूरत की ज़रूरत क्या है

ज़िंदगी मुश्किल है या आसां फ़र्क़ नहीं है

तू साथ है तो सहारे की ज़रूरत क्या है

हर एक दिल शिकायतों से भारी है

अब किसी को कुछ देने की ज़रूरत क्या है

ज़िंदगी दर्द का सफ़र है न कि सैर सपाटा

इसमें सब मिल जाने की ज़रूरत क्या है

कभी ख़ुद से पूछिए कि किसके काम आए हैं

अब कोई काम न आए तो उम्मीद की ज़रूरत क्या है…

 

Murli Manohar Shrivastav           

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

 

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ग़ज़ल- बहार का तो महज़… (Gazal- Bahar Ka To Mahaz…)

Gazal

बहार का तो महज़ एक बहाना होता है

तुम्हारे आने से मौसम सुहाना होता है

 

वाइज़ हमें भी कभी मयकदे का हाल सुना

सुना है रोज़ तेरा आना जाना होता है

 

मैं जो चलता हूं तो साया भी मेरे साथ नहीं

तू जो चलता है तो पीछे ज़माना होता है

 

ज़ुबां पे दिल की बात इसलिए नहीं लाता

तेरे मिज़ाज का कोई ठिकाना होता है

 

मैं मुद्दतों से यह सोचकर हंसा ही नहीं

हंसी के बाद फिर रोना रुलाना होता है…

 

Dinesh Khanna

           दिनेश खन्ना

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ग़ज़ल- तेरी पाकीज़गी में हमदम (Gazal- Teri Pakeezgi Mein Humdam)

Best Hindi gazal

Gazal

मेरी आंख से बता क्यों ख़्वाब झांकता है
एहसास का समंदर तेरी आंख में छुपा है

दिल मेरा स़िर्फ लफ़्ज़ों का आईना ठहरा
रूमानियत का परचम तेरे अश्क में छुपा है

तू आस पास हो तो तस्वीर खींच लूं
मेरे दिल में जो बसा है वो रूह-सा छुपा है05

तुझे ढूढ़ने को निकले तो उस तक पहुंच गए
तेरी पाकीजगी में हमदम अभी और क्या छुपा है…

 

Murli Manohar Shrivastav

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

 

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काव्य- वो निगाह मेरी है… (Kavya- Wo Nigah Meri Hai…)

 

Kavya- Wo Nigah Meri Hai

कुछ तो मिलता है सोच कर तुझको

हर उड़ान की जद में आसमां नहीं होता

 

दिल अगर आंख, आंख दिल होती

तो दर्द लफ़्ज़ों का कारवां नहीं होता

 

सदमें और हक़ीक़त का फैसला अधूरा था

वरना धड़कन में तेरा बयां नहीं होता

 

ख़्वाब की जागीर में पेंच थे घटाओं के

यूं ही तेरी ज़ुल्फ़ में रूहे मकां नहीं होता

 

फ़रिश्ते भी मांगते हैं छांव तेरे पलकों की

वो निगाह मेरी है जहां राजदां नहीं होता…

 

Murli Manohar Shrivastav

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

 

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