Kavitayen

तुम्हारे शहर की अजब कहानी है… काग़ज़ों की कश्ती है, बारिशों का पानी है…
मिलते तो हैं लोग मुस्कुराकर यहां, पर ये भी दिखावे की ही एक निशानी है…
चाशनी में लिपटे रिश्ते हैं, पर इनको अपना समझ बैठना महज़ एक नादानी है…
चेहरे पे चेहरा है, राज़ ये गहरा है… अपनों को ही ठगने की यहां रीत पुरानी है…
किसे अपना कहें, किसे पराया… यही तो सबसे बड़ी परेशानी है…
ज़ुबां है जुदा, आंखें हैं ख़फ़ा… ख़ाक हो गए ख़्वाब, सुनो ये दास्तान मेरी ही ज़ुबानी है…
बेलौस मुहब्बत हुआ करती थी कभी यहां भी… लेकिन अब खो सी गई उसकी जवानी है…
भीतर से बदरंग है सबकी काया… झूठा है बाहरी दिखावा, पर ये कहते हैं हमारा चेहरा नूरानी है…
कहने को रौनक़ें हैं, रातें भी गुलाबी हैं… पर वो इक शाम कहीं नज़र नहीं आती, जो तुम संग मुझे बितानी है…

  • गीता शर्मा

इतनी क्यूं है हलचल
मन घबराए हर पल
बस जहां देखो वहीं है
इस मुए कोरोना वायरस की दहशत

वायरस है, आया है चला जाएगा
दुनिया को हाथ धोना सीखा जाएगा
खौफ़ और आतंक ना बनने दें इसे
यह तो सफ़ाई का सबक सीखा जाएगा

Poetries

मनुष्य जब ख़ुद को भगवान समझने लगे
हर चीज़ पर अपना हक़ जताने लगे
तब कुदरत की ख़ामोशी से एक लाठी चलती है
कहती है, आज भी अब भी हमारी चलती है

कल को यह चिंता शायद बेतुकी लगे
कल को यह खौफ़ शायद मज़ाक लगे
इस वक़्त की बस यही है गुहार
धोते रहो अपने हाथ बार-बार…

Poetries

यह भी ज़रूरी था…

बेलगाम हुई जा रही थी ज़िंदगी
सरपट अंधाधुंध दौड़ रही थी ज़िंदगी
थक-हारकर कहीं सांसें टूट ना जाएं
रफ़्तार को लगाम लगाना थोड़ा ज़रूरी था

धरती मां को जो हमने ज़ख़्म दिए
घायल किया ना जाने कितने दर्द दिए
इससे पहले कुदरत और रूद्र हो जाए
इसके ज़ख़्मों पर मलहम लगाना थोड़ा ज़रूरी था

मनुष्य ही मनुष्य का दुश्मन बन गया था
अपने ही अहम में चूर हो गया था
उसे इंसानियत से प्यार हो
अपने किए पर पश्चाताप हो
इसका एहसास दिलाना थोड़ा ज़रूरी था…

Priya Malhotra
प्रिया मल्होत्रा
Corona

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दिवाली की झालरें…

..टिम-टिम करती
रंग-बिरंगी झिलमिलाती हुईं झालरें
बतियाती रही रातभर
दो सहेलियों की तरह
कभी हंसतीं-खिलखिलाती..
कभी चुप-चुप
पोंछती आंसुओं को
एक-दूसरे के
दर्द.. कुछ क़िस्से..
कुछ तेरे.. कुछ मेरे..

शोर पटखों का भी अवाक् रहा..
“सहेलियां हमेशा बहुत बातूनी ही होतीं हैं”..
समझ से परे रही यह बात उनके लिए
अब तक…

2

मैंने रोशनी सा झिलमिलाने की बात की…

जब-जब भी दिखा गाढ़ा अंधेरा कहीं
मैैंने रोशनी सा झिलमिलाने बात की..

यहां जब भी चलन था आगे बढ़ने का
मैंने बीते पलों को संजोने की बात की..

आता है तुम्हें दुनिया को जीने का हुनर
पर मैंने ख़ुद को जिए जाने की बात की..

जहां उलझनों में उलझना ही सबब था
मैंने आभावों में भी उड़ने की बात की..

तुम तो खो ही गए थे इस सफ़र में कहीं
मैंने अंत तक तुमको तलाशने की बात की..

जहां शोर था मिलने और बिछड़ने का ही
मैंने मौन में ही अपने मिलने की बात की..

चाहे कोई जवाब आए या न आए तुम्हारा
फिर भी रोज़ ख़त लिखने की बात की..

और..
जीते रहे समझौतों को सौग़ात समझकर
मैंने बिना शर्त प्रेम किए जाने की बात की…

Namita Gupta 'Mansi'
नमिता गुप्ता ‘मनसी’

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Kavitayen-

झूठ-मूठ खांसा क्या बहू ने बन गए झटपट काम
पलंग छोड़ सासू भागी, उनका जीना हुआ हराम
जीना हुआ हराम सोचें, ‘क्यूं बाई की छुट्टी कर दी’
मन मसोस के बोलीं, ‘बहू तुमने तो हद ही कर दी’
जा कर करो आराम कमरे के बाहर मत आना
ख़बरदार जो आ पास मेरे अब पांव-हाथ दबाना
धो-धोकर हाथ थक गई, सासूजी कर कर काम
लाख समझाया फिर भी दूर से उसे किया सलाम…

लेटे लेटे देख रहा था टीवी, त्राहि त्राहि करोना करोना
थमा दिया बीवी ने झाड़ू प्रियतम कुछ तुम भी करो ना प्यारी वोडका से ऐसे डिस्पेंन्सर भर डाले, कुछ पूछो ना
छिला कलेजा उससे हाथों को सबका रह रह के धोना…

कोई कुछ करने नहीं देता कहता
घर में रहो ना
फिर भी ये शब्द हर ज़ुबां पे गूंजा
करोना… करोना…

कोरोना- एक अलग पहलू यह भी…

क्यों है कोरोना को रोना
कोरोना कोरोना, क्या रोना,
सब जो ठाने वो ही होना,
बस 3 एहतियात बरतना,
बाहर ज़रूरी तो ही जाना.
वरना घर का पकड़ो कोना

सबसे 3 फ़ीट दूर रहो ना,
इसी दूरी से बात करो ना.
हर 20 मिनट,20 सेकेंड,
तुम अपने हाथों को धोना.

शेष हुई प्रकृति की मर्ज़ी
उससे खिलवाड़ करो ना
अब धर्मों का छोड़ो रोना
तुम केवल इंसान बनो ना…

 
Corona Qahar
Dr. Neerja Srivastava 'Neeru'
डॉ. नीरजा श्रीवास्तव ‘नीरू’

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