Kavya

टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ हमेशा टीआरपी की लिस्ट में टॉप पर बना रहता है. सीरियल में लीड रोल प्ले करने वाली रूपाली गांगुली (Rupali Ganguly) को ऑडियंस का प्यार भर-भर के मिलता है. तो वहीं नेगेटिव रोल प्ले करने वाली मदालसा शर्मा (Madalsa Sharma) भी लोगों का प्यार पाने में पीछे नहीं है. तभी तो मदालसा शर्मा (Madalsa Sharma) को एक अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है. जिसे पाकर वो काफी खुश हैं. 

Madalsa Sharma
फोटो सौजन्य – इंस्टाग्राम

हाल ही में मदालसा शर्मा (Madalsa Sharma) ने अपने इंस्टाग्राम हैंडल पर अपनी एक तस्वीर शेयर की है. तस्वीरों में उन्होंने एक अवॉर्ड अपने हाथ में पकड़ा हुआ है. फोटोज शेयर करते हुए एक्ट्रेस ने बताया है कि उन्हें ये अवॉर्ड बेस्ट खलनायिका के लिए मिला है. बता दें कि मदालसा को ये अवार्ड इंटरनेशनल आइकॉनिक अवार्ड्स द्वारा प्रदान किया गया है. 

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मदालसा शर्मा (Madalsa Sharma) को मिलने वाले इस सम्मान के लिए हर कोई उन्हें बधाई दे रहा है. उनके चाहने वालों ने उनके लिए खुशी जाहिर की है.    

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Madalsa Sharma
फोटो सौजन्य – इंस्टाग्राम
Madalsa Sharma
फोटो सौजन्य – इंस्टाग्राम

बता दें कि मदालसा शर्मा (Madalsa Sharma) ना सिर्फ हिंदी बल्कि उन्होंने तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और पंजाबी फिल्मों में भी अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाया है. मदालसा की मां शीला शर्मा ने भी कई हिंदी फिल्मों में काम किया है. जिनमें ‘हम साथ-साथ’ हैं, ‘चोरी-चोरी चुपके-चुपके’ और ‘नदिया के पार’ जैसी फिल्में शामिल हैं. फिल्मों के अलावा शीला शर्मा ‘दिल्ली वाली ठाकुर गर्ल्स’, ‘इश्क एक जुनून’ और ‘माता की चौकी’ जैसे शोज में भी काम कर चुकी हैं. 

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Madalsa Sharma
फोटो सौजन्य – इंस्टाग्राम
Madalsa Sharma
फोटो सौजन्य – इंस्टाग्राम

मदालसा शर्मा (Madalsa Sharma) ने तेलुगु फिल्म ‘फिटिंग मास्टर’ से साल 2009 में अपने करियर की शुरुआत की थी. वहीं फिल्म ‘जंगल’ से उन्होंने बॉलीवुड इंडस्ट्री में कदम रखा था. हालांकि बड़े पर्दे पर उनका सफर ज्यादा अच्छा नहीं रहा. ऐसे में उन्होंने टीवी की ओर रुख किया. आज के समय में उन्होंने टीवी इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बना ली है. 

किसी रिश्ते में
वादे और स्वीकारोक्ति
ज़रूरी तो नहीं
कई बार बिना आई लव यू 
कहे भी तो प्यार होता है
और न जाने
कितने वादे और
आई लव यू 
कहे रिश्ते
उम्र पूरी नहीं कर पाते
इसलिए मुझे
आई लव यू
कहना बेमानी लगता है
और मैं
प्यार को
सिर्फ़ एहसास में जीता हूं
किसी के कहे-अनकहे
शब्द में नहीं
वो एहसास
शब्द से कहीं अधिक क़ीमती होते हैं
जो बिना बोले
समझ लिए जाते हैं…

– शिखर प्रयाग

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कशमकश में थी कि कहूं कैसे मैं मन के जज़्बात को
पढ़ा तुमको जब, कि मन मेरा भी बेनकाब हो गया

नहीं पता था कि असर होता है इतना ‘जज़्बातों’ में
लिखा तुमको तो हर एक शब्द बहकी शराब हो गया

‘संजोए’ रखा था जिसको कहीं ख़ुद से भी छिपाकर
हर्फ-दर-हर्फ वो बेइंतहा.. बेसबब.. बेहिसाब हो गया

हां, कहीं कोई कुछ तो कमी थी इस भरे-पूरे आंगन में
बस एक तेरे ही आ जाने से घर मेरा आबाद हो गया

मुद्दतों से एक ख़्वाहिश थी कि कहना है ‘बहुत कुछ’
तुम सामने जो आए, क्यों ये दिल चुपचाप हो गया

सोचती थी मैं जिसको सिर्फ़ ख़्यालों में ही अब तलक
मिला वो, तो बहुत ख़ूबसूरत मेरा ‘इंतज़ार’ हो गया

ये ‘वक़्त के लेखे’ मिटाए कब मिटे ‘मनसी’
जो था नहीं लकीरों में, आज राज़ वो सरेआम हो गया…

Namita Gupta 'Manasi'
नमिता गुप्ता’ मनसी’

Poetry

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अलग फ़लसफ़े हैं हमेशा ही तेरे, सुन ऐ ज़िंदगी
बटोरकर डिग्रियां भी यूं लगे कि कुछ पढ़ा ही नहीं

ये पता कि सफ़र है ये, कुछ तो‌ छूटना ही था कहीं
पर वही क्यों छूटा, अब तक जो मिला ही नहीं

ये बात और है कि समझा ही लेंगे, ख़ुद को कैसे भी
मैं उसकी राह भी तकूं कैसे, जिसको आना ही नहीं

Kavya

अक्सर गुज़र जाती है ज़िंदगी, रास्ते तय करने में ही
वो जो मिले हैं पहली दफा, लगे आख़िरी भी नहीं

दोस्तों, कशमकश का दौर ये बहुत लंबा है शायद
हक़ जताऊं कैसे, न वो पराया है, पर हमारा भी नहीं…

Namita Gupta 'Mansi'
नमिता गुप्ता ‘मनसी’
Kavya

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कैसे मनाएंगे महिला दिवस?
केक कटवाकर
गुब्बारे लगाकर
ख़ूब हल्ला-गुल्ला
शोर मचाकर?
या फिर वो शोर ढूंढ़ेंगे
जो किसी की चुप्पी में
सालों से क़ैद है!
भले ही आज उपहार न देना
बधाई न देना
लेकिन आज के दिन
ताने भी मत देना
कि तुम्हारे लिए कुछ भी कर लो
तुम ख़ुश क्यों नहीं होती हो,
बल्कि सिर पर हाथ फेरकर
माथा चूमकर पूछना
तुम इतनी चुप क्यों रहती हो?..

Lucky Rajiv
लकी राजीव

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Kavita

और…
प्रेम के लिए क्या गया स्त्री का समर्पण
ना जाने कब बदल गया समझौते में उपेक्षा
तिरस्कार से कुम्हला गए पत्ते प्रेम के
सहनशक्ति की झीनी चादर तले
दब गए इंद्रधनुषी रंग नेह के
दो व्यक्ति के मध्य किया जाने वाला प्रेम
शनै शनै बदल गया एकालाप में
वह अब बात तो करते हैं
मगर ख़ुद से…

एकतरफ़ा इन संवादों से
मौन हो गया है मुुुखर
खिलखिलाहटें खो गई हैं
मुंह छुपाए बैठी हैं मुस्कुराहटें
हरसिंगार के फूल खिलकर गिर जाते हैं
कि ढल गए हैं दिन गजरे के
बारिश की बूंदें बरसते ही गुम हो जाती हैं
विरह की तपिश में
गरम तवे पर पड़ी पानी की बूंदों सदृश
सावन के झूले पड़े हैं रीते
कि यदा-कदा छोटी चिड़िया आ बैठती हैं उन पर
लेना चाहती हैं पींगे पर
पुरवाई से हिल कर ही रह जाता है झूला…

प्रेम से पहले…
स्त्री चाहती है मान सम्मान के दो बोल
तिरस्कार, उपेक्षा में लिपटे प्रेम के शब्द भी
लगते हैं चासनी में लिपटे करेले सरीखे
क्या-क्या नहीं किया तुम्हारे लिए मैंने
भौतिक सुविधाओं की लंबी फ़ेहरिस्त
पर छीन ली गई आज़ादी
हाथ बराबरी का, स्वीकारोक्ति एक स्वतंत्र व्यक्तित्व की
स्त्री का समर अभी शेष है
ए पुरुष! कब लोगे तुम
आहत आत्मसम्मान की सुधि
काश के दो बोल प्रेम के बोलना भी
तुमको रहता याद…

Yamini Nayan Gupta
यामिनी नयन गुप्ता
Poetry
    

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मनमुटाव तो शुरुआत से ही रहा
इसीलिए खींच दी गई
लक्ष्मण-रेखाएं
ईश्वर को ढूंढ़ा गया
उससे मिन्नतें-मनुहार की
फ़ैसला तब भी न हुआ

तब..
धर्मों को गढ़ा
जातियों को जन्म दिया
परंपराओं की दुहाई दी
बंटवारा किया गया सभ्यताओं का भी
और
मनुष्यता कटघरे में ही रही

आरोप-प्रत्यारोप किए
ईश्वर को दोषी करार दिया गया
कभी प्रश्न उठाए गए
उसके होने-न होने पर भी
इसीलिए
स्वयं को भी ईश्वर घोषित किया
समस्याएं जस की तस

सुनो,
ईश्वर की खोज जारी है…

Namita Gupta 'Mansi'
नमिता गुप्ता ‘मनसी’
Kavya

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गर्मी में भी
सबसे ज़्यादा खीझ मनुष्य को हुई
उसने हवाओं को क़ैद किया
बना डाले एसी
और.. रही-सही हवा भी जाती रही

सर्दियों में भी
सबसे ज़्यादा वही ठिठुरा
उसने कोहरे ढकने की कोशिश की
और.. धूप भी रूठी रही
कोहरा भी ज़िद पर अड़ा

बारिश में भी सबसे पहले सीले
मनुष्य के ही संस्कार
परिणामस्वरूप
बारिश नहीं रही अब पहले जैसी

बसंत में भी
उसको नहीं भाया फूलों का खिलना
उसने पेड़ काटे.. जंगल खोदे
परिणामत:
वह भटक रहा है
अपने ही कंक्रीट के जंगलों में

और इस तरह..
वह अंत तक ढोता रहा
अपने झूठ-मूठ के मनुष्यपन को…

Namita Gupta 'Mansi'
नमिता गुप्ता ‘मनसी’
Kavita

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वक़्त से लम्हों को
ख़रीदने की कोशिश की
वह मुस्कुराया
बोला
क्या क़ीमत दे सकोगे
मैं बोला
अपने जज़्बात दे देता हूं
तुम मुझे लम्हे दे दो
वह बोला कम हैं
इस मोल न ख़रीद सकोगे
मैं बोला जीवन ले लो
वह बोला
वह तो महबूब के हाथों
गिरवी रख चुके हो
और उस उधार को चुका कर
तुम्हारे महबूब से
तुम्हारी ज़िंदगी ले पाने की
औकात मेरी नहीं है
मैं बोला तुम क़ीमत बता तो
ऐ वक़्त
बिना लम्हों के
ज़िंदा कैसे रहूंगा
सुनो मुझ से मेरी यादें ले लो
बड़ी क़ीमती है
वह हंसा
एक तरफ़ मुझ से लम्हों की क़ीमत पूछते हो
और दूसरी तरफ़ मोलभाव कर
ऑफर देते हो
इंसान हो
अपनी फ़ितरत से
नहीं बाज आओगे
चलो मैं बता देता हूं
अपने दिल को
शीशा कर लो
कुछ ओस की बूंदें
भर लो
देख लो आर-पार ज़िंदगी के
अपनी मुट्ठी खोल लो
अपनी आंखों को ऊपर कर लो
तुम इंसान सिर्फ़
ख़रीदना और बेचना जानते हो
यहां तक कि
प्यार भी
लम्हे ख़रीद पाना
तुम्हारी औकात के बाहर है
कोई दौलत दे कर
न ख़रीद पाओगे
हां वक़्त के कदमों में झुक सको
तो हाथ ऊपर कर अजान दे दुआ मांगना
हो सकता है
उसकी रहमत से
कुछ लम्हे
तुम्हारी झोली में
आ गिरे
आमीन…

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

Kavita

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जी हां, सही समझा आपने
आज एक जनवरी है
नए साल का पहला दिन है
चारों तरफ़ उमंग और उत्साह है
चारों तरफ़ चेहरों पर मुस्कुराहट है
और, चारों तरफ़ शुभकामनाओं का तांता सा है…

क्या कोई संकल्प लिया है आपने?
हां, लेना है ना कोई भी संकल्प क्योंकि
नए साल का पहला दिन है
सब लोग कुछ सोच-विचार कर संकल्प ले रहे हैं
सब लोग छुप-छुप के दूसरे से पूछ रहे हैं
साथ ही, सब लोग क़समें खा रहे हैं और
वादे भी कर रहे हैं…

तो बताइए क्या संकल्प लिया आपने?
अरे! बता भी दीजिए क्योंकि
नए साल का पहला दिन है
कोई अपनी बुरी आदत छोड़ना चाहता है
कोई पुरानी यादों को भूलना चाहता है
और, कोई बहुत सारे पैसे कमाना चाहता है…

परंतु कभी सोचा है आपने?
क्या संकल्प होने चाहिए हमारे क्योंकि
नए साल का पहला दिन है
मुझे दूसरों के दुखों को दूर करने का प्रयास करना है
मुझे संसार के सभी जीवों से प्रेम करना है
और सबसे महत्वपूर्ण,
मुझे एक और बेहतर इंसान बनना है…

Amrita sinha
अमृता सिन्हा

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नव वर्ष की पावन बेला मन मेरा तो हर्षित है
नए सूर्य की आभा से मानो सब आलोकित है

उम्मीद और आशा की ओढ़ चुनर ये आया है
स्वागत में अल्लाहदित इसके हवाओं ने गीत गाया है

चहुं ओर उल्लास है आनंदमयी प्रकाश है
चांद और तारों के संग झूमता आकाश है

निराशा के घोर तम का तर्पण आओ करते हैं
पुष्प आशा के नव वर्ष को सब मिल अर्पण करते हैं

बिखर गया जो गए साल में फिर से उसे संजोते हैं
उजड़ गया था चमन हमारा नई फसल फिर बोते हैं

ग़म में अश्रु बहुत बहाए अब ख़ुशियों की बारी है
नव चेतना से संचित हो जीने की तैयारी है

वर्ष था संघर्षोंभरा मुश्किलों का जोर था
सीखा गया जो हमें भूले अपनेपन का दौर था

खोई थी पहचान हमारी स्वयं से नाता जोड़ गया
हम ही श्रेष्ठ धरा पर इस भ्रम को कैसे तोड़ गया

चिरनिद्रा में सोकर हम तो भौतिकता में खोए थे
प्रतिफल मिला हमे वो ही जो बीज हमने बोए थे

सरिता का नीर स्वच्छ कलकल पंछियों का मधुर गान
कोरोना आया कैसा कुदरत से कराई पहचान

जीवन का अनूठा सबक गत वर्ष जाते दे गया
पर थे जो कुछ अनमोल पल वो छीन हमसे ले गया

जो चला गया, बीत गया, वो था कल पुराना
दृढ़ संकल्पों की ख़ुशबू से महकेगा नया ज़माना

सकारात्मक सोच की उड़ान आओ भरते हैं
नव भावों के नव सृजन से नव वर्ष का आगाज़ करते हैं…

Saarika phalor
सारिका फलोर

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तुम और मैं
मिले तो मुझे अच्छा लगा
गुज़रे वक़्त की कसक कुछ कम हुई
परंतु मन के डर ने कहा
तुम दूर ही अच्छे हो..

जानती हूं मैं
तुम्हारे आने से होंठो पर मुस्कान आई
और मन में उमंग भी छाई
फिर भी कहती हूं
तुम दूर ही अच्छे हो..

देखने लगी मैं
भविष्य के लिए सुनहरे सपने
सजने लगे आंखों में नई उम्मीदें
फिर भी यह लगा
तुम दूर ही अच्छे हो..

समझ गई मैं
तुम क्षणिक जीवन में विश्‍वास करते हो
परंतु मैंने शाश्वत जीवन की कल्पना की थी
इसलिए मैंने कहा
तुम दूर ही अच्छे हो..

जान गई मैं
हमसफ़र ना हुए तो क्या हुआ
ख़ूबसूरत और मीठी याद तो हो
पास होकर भी
तुम दूर ही अच्छे हो…

अमृता सिन्हा

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