Kavya

कभी-कभी
मैं कुछ नहीं भी कहती हूं
तुम
तब भी सुन लेते हो..
कैसे!

कभी-कभी
मैं कुछ कहती हूं
तुम समझते कुछ और ही हो
पता नहीं, क्यों!

कभी-कभी
तुम कहते तो हो
पर, मैं समझना ही नहीं चाहती!

कभी-कभी
बहुत कुछ कहते-सुनते हैं
हम-दोनों
एक-दूसरे के मौन में
और
करते रहते हैं
मन की बात…

Namita Gupta 'Mansi
नमिता गुप्ता ‘मनसी

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Kavya

बारिश की बूंदों ने आज फिर दिल को गुदगुदाया है
रिमझिम फुहारों ने मौसम को आशिक़ाना बनाया है

ठंडी बयार कर रही आलिंगन मेरा
लगता है बिछड़ा मीत कोई मुझसे मिलने आया है

बारिश की बूंदों ने आज फिर दिल को गुदगुदाया है
ओढ़ इंद्रधनुषी चूनर आसमान ने किया श्रृंगार

मन मयूर भी नाच रहा जब बूंदों ने सुनाई मधुर झंकार
ऐसा लगा मानो कोई सोए अरमान जगाने आया है

बारिश की बूंदों ने आज फिर दिल को गुदगुदाया है
चंचल मन सी चंचल बूंदें हलचल सी पैदा करती है

गिली मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू मन में मदहोशी सी भर देती है
ऐसा लगता है दिल के साजों को बूंदों ने मधुर संगीत से सजाया है

बारिश की बूंदों ने आज फिर दिल को गुदगुदाया है…

सारिका फलोर

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Kavya

एक चुप होती हुई स्त्री कहती है बहुत कुछ…

तुलसी जताती है नाराज़गी
नहीं बिखेरती वो मंजरी
सारी फुलवारियां गुमसुम हो जाती हैं
घर की
कनेर.. सूरजमुखी..
सबके चेहरे नहीं दिखते
पहले जैसे
छौंका-तड़का हो जाता है और भी तीखा
रसोईघर में
नहीं मोहती ज़्यादा
भीने पकवानों की ख़ुशबू
और..
दूध उफन बाहर आता है रोज़

एक चुप होती हुई स्त्री..
मानो पृथ्वी का रुके रह जाना
अपनी धुरी पर

एक चुप होती हुई स्त्री..
लांघती है मन ही मन
खोखले रिश्तों की दीवारें
और प्रस्थान कर जाती देहरी के बाहर
बिना कोई आवाज़ किए हुए ही

एक चुप होती हुई स्त्री..
और भी बहुत कुछ सोचती है
वह ‘आती’ तो है
हां, उसे आना ही पड़ता है
पर, वह फिर कभी नहीं लौटती
पहले की तरह…

Namita Gupta 'Mansi'
नमिता गुप्ता ‘मनसी’

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Kavya

लिखा था धड़कते दिल से
और दिया था कांपते हाथों से
मैंने नजरें ज़मीन में ही गड़ा रखी थी
फिर भी पढ़ ली थी
तुम्हारी आंखों में प्रत्त्युत्तर की आस
उम्मीद की डोरियों में उलझी
मनाही की आशंका भी
देख ली थी
जितने धड़कते दिल से तुमने लिखा होगा
उतने ही धड़कते दिल से मैंने पढ़ा था
कई-कई बार पढ़ा
सांसों के आवेग के बीच
धड़कनों की आवाज़ दबाकर
कि कहीं कोई सुन न ले
प्रेम को मुखरित होते हुए
एक काग़ज़ के टुकड़े पर
तब तकिए के नीचे से
शब्द-शब्द प्रेम आता रहा सपनों में
छूता रहा होंठों को
चलता रहा साथ में
कॉलेज के रास्ते भर, क्लास में
और घर पर, बहता रहा रगों में
और आज तक बह रहा है
सुनो वो तुम्हारा प्रेम पत्र
आज भी तकिए के नीचे
महक रहा है…

Dr. Vinita Rahurikar
डॉ. विनीता राहुरीकर

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जिस दिन
तमन्ना बड़ी और
हौसला छोटा हो जाए
समझना कि
हार गए तुम

जिस दिन
राजनीति बड़ी
और दोस्ती छोटी हो जाए
समझना कि
हार गए तुम

जिस दिन रिश्ते में
अहंकार बड़ा
और प्यार छोटा हो जाए
समझना कि
हार गए तुम

जिस दिन
दौलत बड़ी
और आदमी छोटा हो जाए
समझना कि
हार गए तुम

जिस दिन काम बड़ा
और उसे करनेवाले छोटे हो जाए
समझना कि
हार गए तुम

जिस दिन
सरहद बड़ी
और बलिदान छोटा हो जाए
समझना कि
हार गए तुम

जिस दिन
दिमाग़ बड़ा
और दिल छोटा हो जाए
समझना कि
हार गए तुम…

Murali Manohar Srivastava
मुरली मनोहर श्रीवास्तव
Kavya

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सांस, ख़ुशबू गुलाब की हो

धड़कन ख़्वाब हो जाए

उम्र तो ठहरी रहे

हसरत जवान हो जाए

बहार उतरे तो कैमरा लेकर

तेरी सूरत से प्यार ले जाए

जो नाचता है मोर सावन में

तेरी सीरत उधार ले जाए

लहर गुज़रे तेरे दर से तमन्ना बनकर

तेरे यौवन का भार ले जाए

आज मौसम में कुछ नमी उतरे

तेरी परछाईं बहार ले जाए

रात ख़ामोश हो गई क्यूं कर

अपना सन्नाटा चीर दे बोलो

तेरी आंखों से प्यार ले जाए

ऐ दोस्त ‘तेरी हस्ती’ लिखूं कैसे

फ़क्र हो अगर ‘तुझ पे’

मेरी हस्ती निसार हो जाए…

– शिखर प्रयाग

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Kavya
Poetry

तेरी तस्वीर…

मैं जहां में
कुछ अनोखी चीज़
ढूंढ़ने निकला
और शहर में मुझे
सिर्फ़ आईना मिला
जो मेरी बेबसी पर
मुस्कुराता दिखा
वही
जब दिल के सामने रखा
तो बेसाख्ता
तेरी तस्वीर देख
जवाब मिल गया…

ज़िंदगी के पन्ने

दे देना
वे शब्द
मुझे जो
तुम्हारे दिल के
क़रीब होकर गुज़रे
होंगे शब्द वो
तुम्हारे लिए
अनजाने ही वो
मेरे लिए
ज़िंदगी के
पन्ने हो जाएंगे…

Poetry

Murali Srivastava
मुरली श्रीवास्तव

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वह स्त्री..
बचाए रखती है कुछ ‘सिक्के’
पुरानी गुल्लक में
पता नहीं कब से
कभी खोलती भी नहीं
कभी-कभार देखकर हो जाती है संतुष्ट

वह स्त्री..
बचाए रखती है कुछ ‘पल’
फ़ुर्सत के
सहेजती ही रहती है
पर, फ़ुर्सत कहां मिलती है
उन्हें एक बार भी जीने की

वह स्त्री..
बचाए रखती है कुछ ‘स्पर्श’
अनछुए से
महसूस करती रहती है
कभी छू ही नहीं पाती
अंत तक

वह स्त्री..
झाड़ती-बुहारती है सब जगह
सजाती है करीने से
एक-एक कोना
सहजे रखती है कुछ ‘जगहें’
आगंतुकों के लिए
पर, तलाशती रहती है ‘एक कोना’
अपने लिए
अपने ही घर में
अंत तक…

Kavita

Namita Gupta 'Mansi'
नमिता गुप्ता ‘मनसी’

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काश कि
कभी तुमने
अपने स्कूल के बस्ते को
घर लौटते वक़्त
मेरे कंधे पर रक्खा होता

काश कि मैंने
तुम्हारे साथ लूडो, सांप-सीढ़ी
इक्खट-दुक्खट और घर-घर खेला होता

काश कि मुझे मौक़ा मिला होता
रेत को अपने और तुम्हारे
हाथों से थपथपाकर
घरौंदे बनाने का

काश कि उस घरौंदे में
दरवाज़ा बनाते हुए
एक तरफ़ से आ रहे तुम्हारे
हाथ को दूसरी तरफ़ से चल रहे मेरे हाथ ने
बालू के भीतर ही छुआ होता

काश कि मेरे भीतर
तुम्हारे हाथों के छू जाने की
सिहरन का एहसास बसा होता

काश कि मुझे
मौक़ा मिला होता
तुम्हारी टूटी हुई चूड़ियां
अपने ख़ज़ाने में छुपाकर
रखने का

काश कि
तुम्हारी भोली सूरत
और कोमल हाथों से
तुम्हारे लंच के कुछ निवाले
मुझे मिले होते

काश कि तुमने मेरे
लंच के डिब्बे को सुंदर और उसके
पराठे को स्वादिष्ट कहा होता
आह!

काश कि
मैं तुम्हारे साथ
बरसात में भीगा होता
और तुम्हें भीगने से
बचाने के लिए मैंने
अपने बस्ते से
तुम्हारा सिर
ढका होता

काश कि
तुम्हारे नोट्स
मांगने के बहाने
मैं तुम्हारे घर आया होता

काश कि
मेरे दिल में क़ैद होती
वो भोली
आंखें और मुस्कान
जो किसी को दरवाजे तक
छोड़ते हुए आती हैं

काश कि
तुम्हारा बड़ा होना,
मेरे साथ हुआ होता
मैंने घंटों निहारी होती
तुम्हारी राह वो एक झलक
पाने को

काश कि
तुमसे बात करने की हिम्मत में
अनेक बार मेरी ज़ुबान
लड़खड़ाई होती

काश कि
कि तुमने भोलेपन
से पूछा होता
हां बोलो ना
और मैं
लाख बातें दिल में होते हुए
हड़बड़ाहट में कुछ बोल न पाता
और कहता
नहीं कुछ नहीं
वो एक दोस्त का इंतज़ार कर रहा था
इतना बड़ा झूठ बोलता ठीक तुम्हारी
गली में तुम्हारे अहाते के सामने खड़े होकर

काश कि
मैं अपने हाथों में गुलाब का फूल
लेकर खड़ा होता
तुम्हारे काॅलेज
जाने के रास्ते में
और महीनों की
हिम्मत के बाद भी
तुम्हें वह गुलाब दे न पाता

काश कि उसे छुपाकर
चुपके से किसी किताब में
रखा होता
हल्की पेंसिल से
आई लव यू लिखकर

काश कि
मैंने हैप्पी बर्थडे का
ग्रीटिंग कार्ड खरीदा
होता और उसे औरों की गिफ्ट के मुक़ाबले
छोटा समझ दे न पाता
उसे छुपाकर रखा होता
फिर किसी दिन
देने के लिए

काश कि
तुम्हारे रिश्ते की बात चलती और
और मैं
मना करता यह कहकर कि
अभी शादी की जल्दी क्या है
थोड़ा इंतज़ार कर लो

काश कि
तुम मेडिकल की तैयारी करती और मैं
तुम्हें देख-देखकर फेल हुआ होता
तुम डाॅक्टर बनती और मैं उस ख़ुशी में
अपने फेल होने का दुख भूल जाता

काश कि मैंने
तुम पर कमेन्ट करनेवाले लड़कों से
लड़ाई की होती

काश की मैं अपनी मां से कह पाता कि
तुम अच्छी लड़की हो

काश कि
तुम्हें जाते हुए देख
मेरी आंखें
आंसुओं से नम होतीं

काश.. काश.. काश..

मैं जानता हूं
वक़्त मुझे यह इजाज़त नहीं देता
उम्र मुझे
यह पाने की
स्वतंत्रता नहीं देती
पर ये दिल है कि
बार-बार सोचता है
काश
और इस सोच में जो उभरती है
तस्वीर वह मुझे
रोमांच से भिगो जाती है
हर काश हकीक़त नहीं होता
पर हर एहसास
छुवन को छोड़कर
ज़िंदगी की हकीक़त के सिवा
कुछ भी नहीं है.. कुछ भी नहीं है..

न जाने कितने स्पर्श के एहसास
वक़्त के साथ खो गए
लेकिन यह जो काश के स्पर्श का एहसास है
वह हर पल हृदय में
सांस की तरह चलता है
क्योंकि
वह जो चलती है तुम्हारी सांस
उसमें मैं अपनी ज़िंदगी देखता हूं

और रोज़ सुबह उठकर
दुआ मांगता हूं
उन सांसों के चलते रहने की
अपनी ज़िंदगी के लिए

वह जो उठती है उमंग की लहर
तुम्हारे सीने में
मुझे अनजाने ही भिगो जाती है
असीम आनंद के सागर में
और इसलिए प्रार्थना करता हूं
प्रभु से
कि हुलसता रहे तुम्हारा हृदय
जिससे आनंदित होता रहूं मैं
न जाने कब और कैसे
मैं अपने अस्तित्व के लक्षण
तुम्हारी संपूर्णता में
देखने लगा हूं
और इसीलिए काश के साथ जीते हुए भी
मैं तुम्हारे एहसास के साथ हूं…

– शिखर प्रयाग

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Kavya

वृक्षों से ही वन बनते हैं, धरती हरी-भरी करते हैं।
वर्षा के कारण हैं जंगल, जिससे होता सबका मंगल।

वृक्षों बिन क्या जीवन होता, प्राण वायु हर कोई खोता।
काट-काट वृक्षों को ढोता, बिन वर्षा किस्मत को रोता।

जंगल धरती क्षरण बचायें, वर्षा जल भूतल पहुँचायें।
बाढ़ जनित विपदाएं आयें, अपनी करनी का फल पायें।

कितने प्राणी वन में रहते, प्रकृति संतुलन सब मिल करते।
जीव सभी हैं इन पर निर्भर, वनवासी के भी हैं ये घर।

औषधि भोजन लकड़ी देते, नहीं कभी कुछ वापस लेते।
अर्थव्यवस्था इनसे चलती, सारी दुनिया इन पर पलती।

औषधियाँ दें कितनी सारी, हरते हैं हारी बीमारी।
अंग-अंग गुणवान वनों का, संयम से संधान वनों का।

लकड़ी जो पेड़ों से मिलती, आग तभी चूल्हों में जलती।
अब विकल्प इसका आया, हमने नव ईंधन अपनाया।

काष्ठ शिल्प बिन वन कब होता, जीवनयापन साधन खोता।
घर के खिड़की अरु दरवाजे, गाड़ी हल लकड़ी से साजे।

वन की कीमत हम पहचानें, इन पर निर्भर सबकी जानें।
संरक्षण इनका है करना, सदा संतुलित दोहन करना।

काटना तनिक रोपना ज्यादा, करना होगा सबको वादा।
जीवन का आधार यही है, वन संरक्षण लक्ष्य सही है।

प्रवीण त्रिपाठी

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मेरे प्रेम की सीमा

कितनी है, क्या है

तुम्हें क्या पता है?

बहुत छोटी हैं वो

मन की रेखाएं

Kavita

नाराज़ होे तो हंसना

ख़ामोश हो, खिलखिलाना

उदास हो, मुस्कुराना

दुखी हो, ख़ुश होना

 

झगड़े के बाद पूछना

छोड़ो न ग़ुस्सा अब

सह नही सकती

चुप हूं तो कहना

बोलो न क्यूं सताना

रुठो तुम, मेरा मनाना

 

मन नहीं लग रहा

गुमसुम रहना तुम्हारा

भला नहीं लग रहा

यही अंतिम परिधि है

तेरा खिलखिलाना

मुस्कुराना, मान जाना

 

अंत है, यही मेरी

प्रेम, सीमाओं का

नहीं चाहिए, आकाश

कायनात, न ही अनंत

अंतरिक्ष, न अलक्षित

अगणित तारे, न सितारे

 

न रेत के कण

या समय के क्षण

मेरे प्यार की

परिणीति भी

केंद्र भी, बिंदु भी

स़िर्फ इतनी छोटी है

ख़ुशियों की रेखाएं

 

स़िर्फ तुम्हारी हूं

क्यूं हूं कब से हूं

इतना सा सुनो ना

यही हैं सीमाएं,

मेरे प्रेम की

पता है तुम्हें

और कुछ भी नहीं

अनंत प्रेम मेरा

कैसी, क्यूं, कौन-सी

टूट गई बाधाएं

 

आगे बढ़ चुकी हूं

छोड़ सभी सीमाएं

साथ ले असीम आशाएं

हे प्रिय, तुम्ही में समाहित

दसों दिशाएं असीमित

सीमाएं…

– निरंजन धुलेकर

 

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Hindi Kavita

मैं पीतल नहीं सोना हूं और चमकूंगी

सितम की आंधियां कितनी चला लोगे?

स्त्री हूं दीया हिम्मत का जलाए रखूंगी

ताक़त पर कर लिया तुमने गुमान बहुत

चंदन हूं घिसो जितना भी और गमकूंगी

 

दीवार ऊंची बना लो निकल ही जाऊंगी

पानी सी हूं मैं भाप बन के उड़ जाऊंगी

रास्ते ख़ुद ब ख़ुद मंज़िल खड़ी कर देंगे

अपने पर जब आ गई बढ़ के निकलूंगी

 

सब्र की मियाद है जिस भी दिन टूटेगी

गर्म लावा सी चीरकर बहा ले जाऊंगी

जितना तपाओगे मुझको और दमकूंगी

मैं पीतल नहीं सोना हूं और चमकूंगी

Dr. Neerja Shrivastav Niru

डॉ. नीरजा श्रीवास्तव नीरू

 

मेरी सहेली वेबसाइट पर डॉ. नीरजा श्रीवास्तव ‘नीरू’ की भेजी गई कविता को हमने अपने वेबसाइट में शामिल किया है. आप भी अपनी कविता, शायरी, गीत, ग़ज़ल, लेख, कहानियों को भेजकर अपनी लेखनी को नई पहचान दे सकते हैं

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