Kavya

काश कि
कभी तुमने
अपने स्कूल के बस्ते को
घर लौटते वक़्त
मेरे कंधे पर रक्खा होता

काश कि मैंने
तुम्हारे साथ लूडो, सांप-सीढ़ी
इक्खट-दुक्खट और घर-घर खेला होता

काश कि मुझे मौक़ा मिला होता
रेत को अपने और तुम्हारे
हाथों से थपथपाकर
घरौंदे बनाने का

काश कि उस घरौंदे में
दरवाज़ा बनाते हुए
एक तरफ़ से आ रहे तुम्हारे
हाथ को दूसरी तरफ़ से चल रहे मेरे हाथ ने
बालू के भीतर ही छुआ होता

काश कि मेरे भीतर
तुम्हारे हाथों के छू जाने की
सिहरन का एहसास बसा होता

काश कि मुझे
मौक़ा मिला होता
तुम्हारी टूटी हुई चूड़ियां
अपने ख़ज़ाने में छुपाकर
रखने का

काश कि
तुम्हारी भोली सूरत
और कोमल हाथों से
तुम्हारे लंच के कुछ निवाले
मुझे मिले होते

काश कि तुमने मेरे
लंच के डिब्बे को सुंदर और उसके
पराठे को स्वादिष्ट कहा होता
आह!

काश कि
मैं तुम्हारे साथ
बरसात में भीगा होता
और तुम्हें भीगने से
बचाने के लिए मैंने
अपने बस्ते से
तुम्हारा सिर
ढका होता

काश कि
तुम्हारे नोट्स
मांगने के बहाने
मैं तुम्हारे घर आया होता

काश कि
मेरे दिल में क़ैद होती
वो भोली
आंखें और मुस्कान
जो किसी को दरवाजे तक
छोड़ते हुए आती हैं

काश कि
तुम्हारा बड़ा होना,
मेरे साथ हुआ होता
मैंने घंटों निहारी होती
तुम्हारी राह वो एक झलक
पाने को

काश कि
तुमसे बात करने की हिम्मत में
अनेक बार मेरी ज़ुबान
लड़खड़ाई होती

काश कि
कि तुमने भोलेपन
से पूछा होता
हां बोलो ना
और मैं
लाख बातें दिल में होते हुए
हड़बड़ाहट में कुछ बोल न पाता
और कहता
नहीं कुछ नहीं
वो एक दोस्त का इंतज़ार कर रहा था
इतना बड़ा झूठ बोलता ठीक तुम्हारी
गली में तुम्हारे अहाते के सामने खड़े होकर

काश कि
मैं अपने हाथों में गुलाब का फूल
लेकर खड़ा होता
तुम्हारे काॅलेज
जाने के रास्ते में
और महीनों की
हिम्मत के बाद भी
तुम्हें वह गुलाब दे न पाता

काश कि उसे छुपाकर
चुपके से किसी किताब में
रखा होता
हल्की पेंसिल से
आई लव यू लिखकर

काश कि
मैंने हैप्पी बर्थडे का
ग्रीटिंग कार्ड खरीदा
होता और उसे औरों की गिफ्ट के मुक़ाबले
छोटा समझ दे न पाता
उसे छुपाकर रखा होता
फिर किसी दिन
देने के लिए

काश कि
तुम्हारे रिश्ते की बात चलती और
और मैं
मना करता यह कहकर कि
अभी शादी की जल्दी क्या है
थोड़ा इंतज़ार कर लो

काश कि
तुम मेडिकल की तैयारी करती और मैं
तुम्हें देख-देखकर फेल हुआ होता
तुम डाॅक्टर बनती और मैं उस ख़ुशी में
अपने फेल होने का दुख भूल जाता

काश कि मैंने
तुम पर कमेन्ट करनेवाले लड़कों से
लड़ाई की होती

काश की मैं अपनी मां से कह पाता कि
तुम अच्छी लड़की हो

काश कि
तुम्हें जाते हुए देख
मेरी आंखें
आंसुओं से नम होतीं

काश.. काश.. काश..

मैं जानता हूं
वक़्त मुझे यह इजाज़त नहीं देता
उम्र मुझे
यह पाने की
स्वतंत्रता नहीं देती
पर ये दिल है कि
बार-बार सोचता है
काश
और इस सोच में जो उभरती है
तस्वीर वह मुझे
रोमांच से भिगो जाती है
हर काश हकीक़त नहीं होता
पर हर एहसास
छुवन को छोड़कर
ज़िंदगी की हकीक़त के सिवा
कुछ भी नहीं है.. कुछ भी नहीं है..

न जाने कितने स्पर्श के एहसास
वक़्त के साथ खो गए
लेकिन यह जो काश के स्पर्श का एहसास है
वह हर पल हृदय में
सांस की तरह चलता है
क्योंकि
वह जो चलती है तुम्हारी सांस
उसमें मैं अपनी ज़िंदगी देखता हूं

और रोज़ सुबह उठकर
दुआ मांगता हूं
उन सांसों के चलते रहने की
अपनी ज़िंदगी के लिए

वह जो उठती है उमंग की लहर
तुम्हारे सीने में
मुझे अनजाने ही भिगो जाती है
असीम आनंद के सागर में
और इसलिए प्रार्थना करता हूं
प्रभु से
कि हुलसता रहे तुम्हारा हृदय
जिससे आनंदित होता रहूं मैं
न जाने कब और कैसे
मैं अपने अस्तित्व के लक्षण
तुम्हारी संपूर्णता में
देखने लगा हूं
और इसीलिए काश के साथ जीते हुए भी
मैं तुम्हारे एहसास के साथ हूं…

– शिखर प्रयाग

यह भी पढ़े: Shayeri

Kavya

वृक्षों से ही वन बनते हैं, धरती हरी-भरी करते हैं।
वर्षा के कारण हैं जंगल, जिससे होता सबका मंगल।

वृक्षों बिन क्या जीवन होता, प्राण वायु हर कोई खोता।
काट-काट वृक्षों को ढोता, बिन वर्षा किस्मत को रोता।

जंगल धरती क्षरण बचायें, वर्षा जल भूतल पहुँचायें।
बाढ़ जनित विपदाएं आयें, अपनी करनी का फल पायें।

कितने प्राणी वन में रहते, प्रकृति संतुलन सब मिल करते।
जीव सभी हैं इन पर निर्भर, वनवासी के भी हैं ये घर।

औषधि भोजन लकड़ी देते, नहीं कभी कुछ वापस लेते।
अर्थव्यवस्था इनसे चलती, सारी दुनिया इन पर पलती।

औषधियाँ दें कितनी सारी, हरते हैं हारी बीमारी।
अंग-अंग गुणवान वनों का, संयम से संधान वनों का।

लकड़ी जो पेड़ों से मिलती, आग तभी चूल्हों में जलती।
अब विकल्प इसका आया, हमने नव ईंधन अपनाया।

काष्ठ शिल्प बिन वन कब होता, जीवनयापन साधन खोता।
घर के खिड़की अरु दरवाजे, गाड़ी हल लकड़ी से साजे।

वन की कीमत हम पहचानें, इन पर निर्भर सबकी जानें।
संरक्षण इनका है करना, सदा संतुलित दोहन करना।

काटना तनिक रोपना ज्यादा, करना होगा सबको वादा।
जीवन का आधार यही है, वन संरक्षण लक्ष्य सही है।

प्रवीण त्रिपाठी

यह भी पढ़े: Shayeri

मेरे प्रेम की सीमा

कितनी है, क्या है

तुम्हें क्या पता है?

बहुत छोटी हैं वो

मन की रेखाएं

Kavita

नाराज़ होे तो हंसना

ख़ामोश हो, खिलखिलाना

उदास हो, मुस्कुराना

दुखी हो, ख़ुश होना

 

झगड़े के बाद पूछना

छोड़ो न ग़ुस्सा अब

सह नही सकती

चुप हूं तो कहना

बोलो न क्यूं सताना

रुठो तुम, मेरा मनाना

 

मन नहीं लग रहा

गुमसुम रहना तुम्हारा

भला नहीं लग रहा

यही अंतिम परिधि है

तेरा खिलखिलाना

मुस्कुराना, मान जाना

 

अंत है, यही मेरी

प्रेम, सीमाओं का

नहीं चाहिए, आकाश

कायनात, न ही अनंत

अंतरिक्ष, न अलक्षित

अगणित तारे, न सितारे

 

न रेत के कण

या समय के क्षण

मेरे प्यार की

परिणीति भी

केंद्र भी, बिंदु भी

स़िर्फ इतनी छोटी है

ख़ुशियों की रेखाएं

 

स़िर्फ तुम्हारी हूं

क्यूं हूं कब से हूं

इतना सा सुनो ना

यही हैं सीमाएं,

मेरे प्रेम की

पता है तुम्हें

और कुछ भी नहीं

अनंत प्रेम मेरा

कैसी, क्यूं, कौन-सी

टूट गई बाधाएं

 

आगे बढ़ चुकी हूं

छोड़ सभी सीमाएं

साथ ले असीम आशाएं

हे प्रिय, तुम्ही में समाहित

दसों दिशाएं असीमित

सीमाएं…

– निरंजन धुलेकर

 

यह भी पढ़ेShayeri

Hindi Kavita

मैं पीतल नहीं सोना हूं और चमकूंगी

सितम की आंधियां कितनी चला लोगे?

स्त्री हूं दीया हिम्मत का जलाए रखूंगी

ताक़त पर कर लिया तुमने गुमान बहुत

चंदन हूं घिसो जितना भी और गमकूंगी

 

दीवार ऊंची बना लो निकल ही जाऊंगी

पानी सी हूं मैं भाप बन के उड़ जाऊंगी

रास्ते ख़ुद ब ख़ुद मंज़िल खड़ी कर देंगे

अपने पर जब आ गई बढ़ के निकलूंगी

 

सब्र की मियाद है जिस भी दिन टूटेगी

गर्म लावा सी चीरकर बहा ले जाऊंगी

जितना तपाओगे मुझको और दमकूंगी

मैं पीतल नहीं सोना हूं और चमकूंगी

Dr. Neerja Shrivastav Niru

डॉ. नीरजा श्रीवास्तव नीरू

 

मेरी सहेली वेबसाइट पर डॉ. नीरजा श्रीवास्तव ‘नीरू’ की भेजी गई कविता को हमने अपने वेबसाइट में शामिल किया है. आप भी अपनी कविता, शायरी, गीत, ग़ज़ल, लेख, कहानियों को भेजकर अपनी लेखनी को नई पहचान दे सकते हैं

यह भी पढ़ेShayeri

Gazal

बहार का तो महज़ एक बहाना होता है

तुम्हारे आने से मौसम सुहाना होता है

 

वाइज़ हमें भी कभी मयकदे का हाल सुना

सुना है रोज़ तेरा आना जाना होता है

 

मैं जो चलता हूं तो साया भी मेरे साथ नहीं

तू जो चलता है तो पीछे ज़माना होता है

 

ज़ुबां पे दिल की बात इसलिए नहीं लाता

तेरे मिज़ाज का कोई ठिकाना होता है

 

मैं मुद्दतों से यह सोचकर हंसा ही नहीं

हंसी के बाद फिर रोना रुलाना होता है…

 

Dinesh Khanna

           दिनेश खन्ना

मेरी सहेली वेबसाइट पर दिनेश खन्ना की भेजी गई ग़ज़ल को हमने अपने वेबसाइट में शामिल किया है. आप भी अपनी कविता, शायरी, गीत, ग़ज़ल, लेख, कहानियों को भेजकर अपनी लेखनी को नई पहचान दे सकते हैं…

 

यह भी पढ़े: Shayeri

 

 

Kavya- Wo Nigah Meri Hai

कुछ तो मिलता है सोच कर तुझको

हर उड़ान की जद में आसमां नहीं होता

 

दिल अगर आंख, आंख दिल होती

तो दर्द लफ़्ज़ों का कारवां नहीं होता

 

सदमें और हक़ीक़त का फैसला अधूरा था

वरना धड़कन में तेरा बयां नहीं होता

 

ख़्वाब की जागीर में पेंच थे घटाओं के

यूं ही तेरी ज़ुल्फ़ में रूहे मकां नहीं होता

 

फ़रिश्ते भी मांगते हैं छांव तेरे पलकों की

वो निगाह मेरी है जहां राजदां नहीं होता…

 

Murli Manohar Shrivastav

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

 

मेरी सहेली वेबसाइट पर मुरली मनोहर श्रीवास्तव की भेजी गई कविता को हमने अपने वेबसाइट में शामिल किया है. आप भी अपनी कविता, शायरी, गीत, ग़ज़ल, लेख, कहानियों को भेजकर अपनी लेखनी को नई पहचान दे सकते हैं…

यह भी पढ़े: Shayeri

 

 

 

Kavya, Bol Rahe Log, kavita

बोल रहे लोग कि दुनिया

बदल गई!

कहां बदली दुनिया?

औरत तो एक गठरी तले दब गई..

 

गठरी हो चाहे संस्कारों की,

रस्मों को, रिवाज़ों को निभाने की

बंधनों की, मर्यादाओं की,

औरत तो वही तक सिमट गई..

 

तहज़ीब और तालीम

घर हो या बाहर

ज़िम्मेदारी का ढेर

औरत उन्हीं ज़िम्मेदारियां को निभाने में रह गई..

 

भाव एक, भावनाएं अनेक

मन में आस

काश!

मुझे भी मिले एक आकाश

आकाश छूने की अभिलाषा

औरत तो काल्पनिक दुनिया में रह गई

 

लोगों के लिए दुनिया बदल गई

औरत जहां थीं वहीं रह गई…

 

अनूपा हर्बोला

मेरी सहेली वेबसाइट पर अनूपा हर्बोला की भेजी गई कविता को हमने अपने वेबसाइट में शामिल किया है. आप भी अपनी कविता, शायरी, गीत, ग़ज़ल, लेख, कहानियों को भेजकर अपनी लेखनी को नई पहचान दे सकते हैं…

यह भी पढ़े: Shayeri

Shayari, Nida Fazli Special
ग़ज़ल 1

गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया

होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया

इक इश्क़ नाम का जो परिंदा ख़ला में था

उतरा जो शहर में तो दुकानों में बट गया

पहले तलाशा खेत फिर दरिया की खोज की

बाक़ी का वक़्त गेहूँ के दानों में बट गया

जब तक था आसमान में सूरज सभी का था

फिर यूँ हुआ वो चंद मकानों में बट गया

हैं ताक में शिकारी निशाना हैं बस्तियाँ

आलम तमाम चंद मचानों में बट गया

ख़बरों ने की मुसव्वरी ख़बरें ग़ज़ल बनीं

ज़िंदा लहू तो तीर कमानों में बट गया

ग़ज़ल 2

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता

कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता

तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो

जहाँ उमीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता

कहाँ चराग़ जलाएँ कहाँ गुलाब रखें

छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता

ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं

ज़बाँ मिली है मगर हम-ज़बाँ नहीं मिलता

चराग़ जलते हैं बीनाई बुझने लगती है

ख़ुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता

यह भी पढ़ें: काव्य- जब भी मायके जाती हूं…

यह भी पढ़ें: मैं शायर तो नहीं… 

 

बदला हुआ मौसम
अचानक हिंदी पर गोष्ठियां, सम्मेलन व तरह-तरह के समारोह आयोजित होने लगे थे. हिंदी नारे बुलंदियो पर थे. सरकारी संगठनो से साठ-गांठ के ताबड़तोड़ प्रयास भी जोरों पर थे.
इन दिनों ’अंग्रेज़ी’ भी ’हिंदी’ बोलने लगी थी. मौसम बदला-बदला महसूस हो रहा था. कुछ बरसों में ऐसा मौसम तब आता है, जब ’विश्व हिंदी सम्मेलन’ आनेवाला होता है.

संवाद (लघु-कथा)
पिंजरे में बंद दो सफ़ेद कबूतरों को जब भारी भरकम लोगों की भीड़ के बीच लाया गया, तो वे पिंज़रे की सलाखों में सहम कर दुबकते जा रहे थे. फिर, दो हाथों ने एक कबूतर को जोर से पकड़कर पिंज़रे से बाहर निकालते हुए दूसरे हाथों को सौंप दिया. मारे दहशत के कबूतर ने अपनी दोनों आँखे भींच ली थी. समारोह के मुख्य अतिथि ने बारी-बारी से दोनों कबूतर उड़ाकर समारोह की शुरूआत की. तालियों की गड़गड़ाहट जोरों पर थी.
एक झटका-सा लगा, फिर उस कबूतर को एहसास हुआ कि उसे तो पुन उन्मुक्त गगन में उड़ने का अवसर मिल रहा है. वह गिरते-गिरते संभलकर जैसे-तैसे उड़ चला. उसकी खुशी का ठिकाना न रहा, जब बगल में देखा कि दूसरा साथी कबूतर भी उड़कर उसके साथ आ मिला था. दोनों कबूतर अभी तक सहमे हुए थे. उनकी उड़ान सामान्य नहीं थी.
थोड़ी देर में सामान्य होने पर उड़ान लेते-लेते एक ने दूसरे से कहा, आदमी को समझना बहुत मुश्किल है. पहले हमें पकड़ा, फिर छोड़ दिया! यदि हमें उड़ने को छोड़ना ही था, तो पकड़कर इतनी यातना क्यों दी? मैं तो मारे डर के बस मर ही चला था.
चुप, बच गए ना आदमी से! बस उड़ चल!

हिंदी दोहे 

हिंदी दोहे बाहर से तो पीटते, सब हिंदी का ढोल ।

अंतस में रखते नहीं, इसका कोई मोल ।।

एक बरस में आ गई, इनको हिंदी याद ।

भाषण-नारे दे रहे, दें ना पानी-खाद ।।

अपनी मां अपनी रहे, इतना लीजे जान ।

उसको मिलना चाहिए, जो उसका सम्मान ।।

हिंदी की खाते रहे, अंग्रेजी से प्यार ।

हिंदी को लगती रही, बस अपनों की मार ।।

हिंदी को मिलते रहे, भाषण-नारे-गीत ।

पर उसको तो चाहिए, तेरी-मेरी प्रीत ।।

सुन! हिंदी में बोल तू, कर कुछ ऐसा काम ।

दुनियाभर में हिंद का, होवे ऊंचा नाम ।।

हिंदी में मिलती हमें, ‘रोहित’ बड़ी मिठास ।

इससे सुख मिलता हमें, सबसे लगती खास ।।

खुसरो के अच्छे लगें, ‘रोहित’ हिंदवी गीत ।

मीरा-तुलसी-सूर से, लागी हमको प्रीत ।।

रोहित कुमार ‘हैप्पी’ 

(संपादक- भारत दर्शन, न्यूज़ीलैंड)

मेरी सहेली वेबसाइट पर रोहित कुमार ‘हैप्पी’ की भेजी गई रचनाएं हमने अपने वेबसाइट पर प्रकाशित किया है. आप भी अपनी शायरी, गीत, ग़ज़ल, लेख, कहानियों को भेजकर अपनी लेखनी को नई पहचान दे सकते हैं…

यह भी पढ़े: Shayeri

 

Gazal, Ret Pe Likhti Rahi, Mitati Rahi, Woh Tera

रेत पे लिखती रही, मिटाती रही, वो तेरा नाम था
रातभर जिसे दिल गुनगुनाता रहा, वो तेरा नाम था…

रूह में उतर गए हो सुकून बनकर
तेरी नज़रों ने छू लिया मुझे चंदन बनकर

सांसों में बस गए हो मेरी नज़्म बनकर
तेरी ख़ुशबू ने भर दिया है मुझे धड़कन बनकर

रेत पे लिखती रही, मिटाती रही, वो तेरा नाम था
रातभर जिसे दिल गुनगुनाता रहा, वो तेरा नाम था…

ख़ूबसूरत हूं, तेरी नज़रों ने माना है मुझे
मैं ज़िंदा हूं, तूने ज़िंदगी से मिलाया है मुझे

ख़्वाबों का नहीं, ख़ुश्क रेत का समंदर था भरा
ख़्वाब देकर तुमने, फूलों के रंग से सजाया है मुझे

रेत पे लिखती रही, मिटाती रही, वो तेरा नाम था
रातभर जिसे दिल गुनगुनाता रहा, वो तेरा नाम था…

 

 

 

 

कंचन देवड़ा

मेरी सहेली वेबसाइट पर कंचन देवड़ा की भेजी गई ग़ज़ल को हमने अपने वेबसाइट के गीत/ग़ज़ल संग्रह में शामिल किया है. आप भी अपनी शायरी, गीत, ग़ज़ल, लेख, कहानियों को भेजकर अपनी लेखनी को नई पहचान दे सकते हैं…

यह भी पढ़े: Shayeri