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कहानी- वैदेही (Short Story- Vaidehi)

Short Story in Hindi

तभी वैदेही ने अपनी मां की आवाज़ सुनी, “हम अपने बेटों के भविष्य की इतनी चिंता क्यों करते हैं कि बेटियों का भविष्य ही बर्बाद हो जाता है? क्या बेटियां हमारी कोखजाई नहीं होतीं? इनका भविष्य भी सुधारना है, यह बात समझने में हम इतनी देर क्यों लगा देते हैं?”

“हमेशा से हम अपने बेटों को अपनी प्रतिछाया समझ उन पर ज़रूरत से कुछ ज़्यादा ही भरोसा करते हैं. हमारा विश्‍वास होता है कि वे हमारे अधूरे कामों को पूरा करेंगे. यहीं पर हम शायद सबसे बड़ी ग़लती करते हैं, जो ल़ड़कों को लड़कियों से अलग समझ उन पर अधिक भरोसा करने लगते हैं.”

वैदेही के जीवन का एकमात्र लक्ष्य था- डॉक्टर बनना. बचपन से ही हॉस्पिटल में स़फेद कोट पहने यहां-वहां आते-जाते और काम करते डॉक्टरों को देख वह बेहद प्रभावित होती थी. तभी से उसने ठान रखा था कि चाहे जितनी मेहनत करनी पड़े, लेकिन बनेगी वह डॉक्टर ही. वैसे भी पढ़ाई में वह शुरू से ही काफ़ी कुशाग्र थी और मेहनत करने से भी पीछे नहीं हटती थी. कभी-कभी तो रात भर उसके कमरे की बत्तियां जलती रहतीं और वह अपनी पढ़ाई पूरी करने में जुटी रहती. उसकी पढ़ाई की इस ऱफ़्तार और अपने स्वास्थ्य के प्रति उसकी बढ़ती लापरवाही को देख

अक्सर उसकी मां समय पर उसे सोने और खाने के लिए डांटती रहती. उसकी बड़ी भाभी भी गाहे-बगाहे जब बिजली का बिल ज़्यादा आता तो उसे कुछ-न-कुछ सुना ही देती, लेकिन उस पर किसी बात का कोई असर न होता.

सभी बातों से बेअसर वैदेही पूरी लगन से पढ़ाई में जुटी रहती और हमेशा अपनी क्लास में प्रथम स्थान प्राप्त करती. बारहवीं की परीक्षा पास करते ही वह मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी में जुट गयी थी. उस कस्बानुमा शहर में जहां लड़कों की पढ़ाई के लिए कोई अच्छी सुविधा नहीं थी, वहां लड़कियों के लिए पढ़ाई-लिखाई और भी चुनौती भरी थी. फिर भी वैदेही स़िर्फ मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में चुनी ही नहीं गई, बल्कि लड़कियों की योग्यता सूची में उसका नाम सबसे ऊपर था.

उसकी सफलता ने स़िर्फ उसे ही नहीं, उसके मम्मी-पापा को भी ख़ुशी से आह्लादित कर दिया था. पहली बार उसकी सफलता से ख़ुश हो उसके पापा सुमंत बाबू ने बढ़कर उसका माथा चूम लिया था और मम्मी तो उसे गले से लगाकर ख़ुशी से रो ही पड़ी थी. हमेशा तानों-उलाहनों की आदी वैदेही मम्मी और पापा के बेशुमार प्यार को देखकर भरपूर उत्साह के साथ अख़बार थामे भागती जा पहुंची थी बड़े भैया के पास.

कहीं जाने के लिए तैयार भैया और भाभी के सामने अख़बार फैलाकर वो उनकी तरफ़ से मिलनेवाले प्रशंसात्मक शब्दों का इंतज़ार करने लगी. लेकिन भैया और भाभी के चेहरे पर बस हल्की-सी मुस्कुराहट फैल कर रह गई थी. जिस प्रशंसा का इंतज़ार उसका दिल कर रहा था, वह करता ही रह गया. जल्द ही भैया का चेहरा सपाट हो गया. न ख़ुशी, न ग़म. अख़बार लौटाते हुए बोले, “ठीक है, इसे रखो. आकर बात करता हूं.” फिर दोनों बाहर चले गए.

देर रात तक वैदेही इंतज़ार करती रही भैया के लौटने का. उसके भैया और भाभी देर रात लौटे भी तो अपने कमरे में जा घुसे और वह ठगी-सी अपने कमरे में खड़ी रह गई. भैया के इस बेरूख़े रूप की तो उसने कल्पना भी न की थी. प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक पद के अवकाश प्राप्त उसके पापा ने उसकी पढ़ाई से लेकर शादी तक की सारी ज़िम्मेदारियां अपने तीनों बेटों को ही सौंप रखी थी, क्योंकि अपनी सारी ज़िंदगी की कमाई तो वे पहले ही अपने तीनों बेटों को पढ़ा-लिखाकर अच्छी नौकरी प्राप्त करने में ख़र्च कर चुके थे.

दूसरे दिन सुबह-सुबह भैया और उसके पापा के बीच बहस हो रही थी.

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“पापा, आप समझ क्यों नहीं रहे हैं? स़िर्फ पचास हज़ार रुपयों की बात नहीं है. अभी नामांकन में इतने पैसे लगेंगे, उसके बाद भी पढ़ाई में लाखों रुपए ख़र्च होंगे. लड़की है- पराया धन. कल को उसकी शादी करनी होगी तो दहेज के लिए भी तो रकम जुटाना होगा. इतने पैसे कहां से आएंगे. आप थोड़ी समझदारी से काम लीजिए. उसका मेडिकल कॉलेज में एडमिशन करवाने के बदले उन्हीं पैसों से उसकी शादी करवाने की सोचिए.”

“कैसी बातें करते हो ज्ञान? वैदेही का दिल टूट जाएगा. उसके सारे सपने बिखर जाएंगे. मेरा तुम तीनों भाइयों से यही अनुरोध है कि उसकी शादी मत करवाना, लेकिन उसे पढ़ाकर डॉक्टर बना दो.”

सुमंत बाबू की आवाज़ गिड़गिड़ाने की हद तक कातर हो आई थी. लेकिन बड़े भैया अपने फैसले पर अड़े रहे.

तब सुमंत बाबू ने तीनों बेटों को एक साथ बुलाकर बातचीत की, पर नतीज़ा वही ढाक के तीन पात रहा. और किसी बात पर तीनों भाइयों की राय शायद ही कभी एक रही हो, लेकिन वैदेही की पढ़ाई को लेकर सभी भाई एकमत थे. फिर सुमंत बाबू ने किसी बेटे के सामने अपनी झोली नहीं फैलाई. स़िर्फ इतना ही बोले, “तुम तीनों भाइयों को पढ़ाने और योग्य बनाने में मैंने अपनी सारी ज़िंदगी की कमाई होम कर दी. अपने बुढ़ापे तक का नहीं सोचा और तुम मिलकर मेरी एकमात्र बची ज़िम्मेदारी को निभाने से कतरा रहे हो. एक बात और जान लो. वैदेही स़िर्फ मेरी ज़िम्मेदारी ही नहीं है, बल्कि तुम सभी की तरह वह भी मेरे वजूद का एक हिस्सा है. आज अपना सुख तलाशते-तलाशते तुम सभी की सोच इतनी छोटी हो गई है कि बिना बंटवारा किए ही तुम सभी के दिल बंट चुके हैं. तुम लोगों की नज़र में स़िर्फ पत्नी और अपने बच्चे ही प्यार के रिश्ते रह गए हैं. जिस बहन के साथ खेलकर-लड़कर बड़े हुए हो, उसके साथ भी कच्चे-धागे से बंधा एक प्यार का रिश्ता ही था, लेकिन बड़ी आसानी से तुम सभी ने उस रिश्ते से किनारा कर लिया.”

फिर थोड़ा रुककर बोले, “ख़ैर, मैं पिता हूं, तुम सभी के लिए बुरा सोच भी नहीं सकता, फिर भी यह तो नहीं भूला जा सकता कि अभी से अपने बच्चों के लिए कई-कई ट्यूशन लगाने वाले मेरे बेटों पर अपनी बहन की पढ़ाई पर ख़र्च होनेवाला बिजली का बिल भी भारी पड़ रहा है. आज से मैं तुम लोगों को उसकी शादी की ज़िम्मेदारी से भी मुक्त करता हूं. जिस दिन वह अपने जीवन का लक्ष्य पा लेगी, उसकी मानसिकता के अनुरूप उसकी शादी भी करवा दूंगा. स़िर्फ खाता-पीता परिवार देखकर उसकी शादी नहीं करवाऊंगा.”

बोलते-बोलते सुमंत बाबू का गला भर्रा गया. उसके बाद कई दिनों तक वे पैसों के इंतज़ाम करने के लिए इधर-उधर भटकते रहे, लेकिन पैसों का इंतज़ाम न हो सका. जैसे-जैसे नामांकन के लिए निर्धारित अंतिम तारीख़ नज़दीक आ रही थी, सुमंत बाबू की बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी.

नामांकन भरने की अंतिम तारीख़ से एक दिन पहले तक भी सुमंत बाबू पैसों का इंतज़ाम न कर पाए. वैदेही की पीड़ा असहनीय हो गई थी. वह एकांत में फूट-फूटकर रो पड़ी. बचपन से एक ही तो सपना देखा था उसने. डॉक्टर बनने का और वही सपना यूं हथेली पर आकर फिसल जाएगा, इसकी तो उसने कभी कल्पना भी न की थी. अपनी मनोव्यथा को कम करने के लिए वो बरामदे में आ बैठी थी.

वहीं बरामदे में सुमंत बाबू भी आरामकुर्सी पर अधलेटे से पड़े थे. अपनी असमर्थता और लाचारी ने उन्हें पूरी तरह तोड़ दिया था. जैसे ही घड़ी ने बारह का घंटा बजाया, उनकी बंद आंखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा. पास ही खाट पर लेटी उसकी मां ने अपना चेहरा आंचल से ढंक रखा था. शायद उन्हें अपनी मजबूरी और आंसुओं को छिपाने के लिए आंचल से अच्छा कुछ और नहीं मिला था.

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तभी वैदेही ने अपनी मां की आवाज़ सुनी, “हम अपने बेटों के भविष्य की इतनी चिंता क्यों करते हैं कि बेटियों का भविष्य ही बर्बाद हो जाता है? क्या बेटियां हमारी कोखजाई नहीं होतीं? इनका भविष्य भी सुधारना है, यह बात समझने में हम इतनी देर क्यों लगा देते हैं?”

“हमेशा से हम अपने बेटों को अपनी प्रतिछाया समझ उन पर ज़रूरत से कुछ ज़्यादा ही भरोसा करते हैं. हमारा विश्‍वास होता है कि वे हमारे अधूरे कामों को पूरा करेंगे. यहीं पर हम शायद सबसे बड़ी ग़लती करते हैं, जो ल़ड़कों को लड़कियों से अलग समझ उन पर अधिक भरोसा करने लगते हैं.

वे भी क्या करें. उनकी ज़रूरत और दिखावे उनकी कमाई से ज़्यादा हो गए हैं. वे भी विवश हैं. यह सोचकर कि कहीं इस आधुनिकता के स्वार्थपूर्ण दौड़ में पिछड़ न जाएं, इसी अंधी दौड़  ने हमारे बच्चों को उत्तरदायित्व शून्य बना दिया है. वे समझते हैं कि हमने जो उनके लिए किया, जो दुख-तकली़फें सही, वह हमारा कर्त्तव्य था, त्याग नहीं. इसलिए वे वैदेही का दायित्व लेने से कतरा रहे हैं. उनकी इसी सोच की वजह से मैंने उन्हें हर उत्तरदायित्व से मुक्त कर दिया है.”

मम्मी एक गहरा निःश्‍वास खींच चुप हो गई थी. मम्मी-पापा के मन का बढ़ता सूनापन और यूं टूट-टूटकर बिखरना वैदेही को असहनीय हो रहा था. वह तड़पकर पापा के पास आ गई.

“पापा, आप क्यों उदास हैं? आपको शायद पता नहीं कि मैंने अपना फैसला बदल दिया है. मुझे डॉक्टर नहीं बनना है, अब मैं प्रशासनिक सेवा में जाऊंगी. मैंने तो इस परीक्षा की तैयारी के लिए कुछ क़िताबें भी ख़रीद ली हैं. स्नातक करने के साथ ही मैं आपको आईएएस अधिकारी बनकर दिखाऊंगी.” उसकी आवाज़ की दृढ़ता ने सुमंत बाबू को चौंका दिया, लेकिन आश्‍वस्त नहीं कर पाई.

अपने वायदे के मुताबिक वैदेही स्नातक करने के बाद दूसरे साल ही प्रतियोगी परीक्षा में सफल हो आईएएस अधिकारी बन गई थी. जिस दिन परीक्षाफल आया था, वह ख़ुद ही अपनी सफलता पर अचंभित रह गई थी. हाथों में परीक्षाफल फड़फड़ा रहा था, लेकिन उसे फिर भी विश्‍वास नहीं हो रहा था कि वह इतनी बड़ी सफलता हासिल कर चुकी है. उसकी सफलता ने स्वयं उसे ही चमत्कृत कर दिया था.

जैसे ही उसने परीक्षाफल पापा के हाथों में पक़ड़ाया, देखते ही उनकी आंखों में गर्व, हैरानी और प्रसन्नता के भाव एक साथ छलक आए थे.

“आज तुमने मेरा सीना गर्व से…” उनके आगे के बोल अवरुद्ध गले और डबडबाई आंखों में डूब कर रह गए थे. सारी ज़िंदगी सर उठाकर जीनेवाले उसके पापा की अपनी ही मजबूरी ने उम्र के तीसरे पड़ाव पर उन्हें काफ़ी कमज़ोर बना दिया था. लेकिन अपने पापा और मम्मी की ख़ुशी देख वैदेही की आत्मा तृप्त हो गई थी.

आज वैदेही को अपने-पराए सभी बधाइयां दे रहे थे. उसके भाई-भाभियां भी काफ़ी ख़ुश थे. पर उससे नज़रें नहीं मिला पा रहे थे. अपनी बहन के प्रति अपना फज़र्र् पूरा न कर पाने का अपराधबोध उन्हें साल रहा था. वहीं सफलता के उच्चतम शिखर पर पहुंचकर वैदेही के दिल में अब तक भाइयों के प्रति पलता विद्रोह और पराएपन की भावना जाने कहां तिरोहित हो गई थी. अचानक ही उसे सब कुछ अच्छा और अपना लगने लगा था और पिछली सारी बातें भुलाकर पहले की तरह ही वो अपने भाई और भाभियों से आशीर्वाद लेने जा पहुंची थी. वैदेही के इस एक क़दम ने कई वर्षों से बहन-भाइयों के बीच आए फ़ासले को मिटा दिया. वैदेही ने भले ही भाइयों के स्वार्थपरता को भुला दिया, लेकिन उसके बहुत कोशिश करने के बावजूद उसके माता-पिता अपने बेटों को कभी माफ़ नहीं कर पाए थे.

अकस्मात् घर में आई ढेर सारी ख़ुशियों ने घर का माहौल ही बदल दिया था, जिसके बीच यह कोई नहीं जान सका कि वैदेही के जीवन में डॉक्टर बनने की सबसे बड़ी अभिलाषा के राख से उत्पन्न चिंगारी ने भले ही उसे सफलता के उच्चतम शिखर पर पहुंचा दिया था, लेकिन वह एक बदले की भावना से उत्पन्न संकल्प मात्र था- पैसा, ताक़त, हिम्मत और ऊंचाई प्राप्त करने के लिए.

वैदेही को आज भी सपने आते हैं कि वह मेडिकल प्रवेश परीक्षा दे रही है. कभी देखती मेडिकल कॉलेज जानेवाली बस छूट गई है. जब नींद खुलती, वह मन ही मन संकल्प करती कि इस घर की कोई लड़की, चाहे उसकी बेटी हो या भतीजी वह उनके सपनों को कभी राख नहीं होने देगी, क्योंकि उनके सपनों को संरक्षित करने के  लिए वैदेही ख़ुद समर्थ हो गई थी.

Rita kumari

       रीता कुमारी

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कहानी- सम्मोहन (Short Story- Sammohan)

मेरे सवाल को उन्होंने टालने की बहुत कोशिश की, पर फिर हथियार डाल दिए. मुझसे वायदा लिया कि मैं कभी किसी से इस राज़ का खुलासा नहीं करूंगी.
वह मुझे बताने लगीं.
“हम औरतें सहनशील होती हैं. रिश्तों के खोखलेपन और खालीपन को पी जाती हैं. किसी को कुछ नहीं बतातीं, पर मुझसे इनकी पीड़ा देखी नहीं जाती थी. एक सीमा जब पार होती दिखी, तो मैंने अपने भीतर छिपाए एक राज़ का पर्दाफाश कर दिया.”
“राज़?” मैंने सवाल किया.
“हां राज़.”

Hindi Short Story

यज्ञदत्त शर्मा ‘नवीन’- अब तक वे केवल यज्ञदत्त शर्मा थे. 70 साल की उम्र में ‘नवीन’ उपनाम लगाने की क्या सूझी उन्हें, यह सवाल मेरे मन में उमड़ी उत्सुकता की सारी हदें पार कर गया. यज्ञदत्तजी से सीधा सवाल करना मुझे ठीक नहीं लगा, सो मैंने तारीफ़ का तीर फेंका-
“अरे वाह यज्ञदत्तजी, यह नवीन उपनाम तो बहुत ‘सूट’ करता है आप पर. हमें भी तो हमराज़ बनाइए न? बुढ़ापे में हमारे भी काम आएगा.”
सवाल का असर हुआ. 70 साल का कमान-सा शरीर तीर-सा तन गया. मोटे चश्मे के पीछे मुरझाई-सी दो बूढ़ी आंखों में चमक आ गई, जैसी बच्चों की आंखों में होती है. यज्ञदत्तजी बोले, “मेरा जीवन बदल गया है. मेरे जीवन में नवीनता आ गई है. जब से मैंने बांसुरी बजानी शुरू की है, तब से मेरे परिवार के लोग मेरे पास आकर बैठने लगे हैं. मेरी बांसुरी की आवाज़ से सम्मोहित होने लगे हैं. मेरे बेटे, मेरी बहुएं, मेरे पोते-पोतियां सब मुझे चाहने लगे हैं. इसलिए मैंने अपने नाम के आगे ‘नवीन’ उपनाम लगा दिया है. सच पूछो तो अपनी जवानी के दिनों में यह मेरी दिली इच्छा थी, पर मौक़ा ही नहीं मिला, सोचने की फुर्सत ही नहीं मिली. जवानी की चाहत बुढ़ापे में पूरी कर ली.”
यज्ञदत्तजी को मैं पिछले 12 सालों से जानती हूं. ह़फ़्ते में दो बार मेरे द़फ़्तर आना उनका नियम-सा बन गया था. द़फ़्तर में आते तो सबसे दो मीठे बोल बोलते, सबसे हाथ मिलाते, हालचाल पूछते, फिर आकर मुझे अपनी राम कहानी सुनाते. पहली बार जब मिले थे तो नौकरी से हाल ही में रिटायर हुए थे. चुस्ती-तंदुरुस्ती बरकरार थी. तब एक शौक़ उनके जीवन का पर्याय बना हुआ था, पेड़ों में आकृतियां तलाशते फिरते थे. पेड़ की शाखों, तनों और जड़ों में आकृतियां ढूंढ़ने का यह शौक़ उनके जीवन की एकमात्र उपलब्धि था.
उनका शयनगार किसी और को पहली नज़र में कबाड़खाना नज़र आ सकता था. पर यज्ञदत्तजी की नज़र में वह उनके जीवन की अमूल्य धरोहर था.
उनकी इस धरोहर में शामिल थी गिरगिट के आकार की एक जड़, शेर की मुखाकृति से मेल खाता एक तना, सांप-सी लहराती एक शाखा, बुढ़ापे के उजाड़ को चिह्नित करता एक झुरमुट, जो किसी पेड़ की जड़ थी, बारहसिंघा का मुंह और ऐसी लगभग 20 आकृतियां.
यज्ञदत्तजी अपनी इस धरोहर को संवारते और तराशते भी रहते थे. आकार और आकृति के अनुरूप अपनी कल्पना से कभी कुछ जोड़ देते, तो कभी कहीं से थोड़ा कुछ काट देते. कई दिनों की अथक मेहनत के बाद तैयार होती थी एक धरोहर. जैसे ही कोई आकृति तैयार होती, सीधे मेरे द़फ़्तर आते, अनुग्रह और आग्रह करने. धरोहर की फ़ोटो खिंचवाते. एक लेख लिखवाते, पत्र-पत्रिका में भेज देते.

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शुरू-शुरू में तो मुझे मज़ा आता था, पर फिर मैं उनसे कतराने लगी. टालने-टरकाने का बहाना ढूंढ़ने लगी. उन्हें टालने-टरकाने का यह पल और उस पल से उपजा हुआ एहसास, कभी-कभी मुझे आत्मग्लानि से भर देता था. मेरे इस व्यवहार से उन्हें पीड़ा भी होती थी, पर अपने जीवन में अपनों से मिली पीड़ा के वह इतने आदी हो चुके थे कि सब कुछ हंसकर झेल जाते थे. मेरा टरकाना उनके अपने घरवालों की दुत्कार से बहुत कम पीड़ादायक था. उन्होंने कई बार अपनों से मिली इस दुत्कार की रामकहानी मुझे सुनाई थी. पकी हुई उम्र के थे, इसलिए रामकहानी सुनाते व़क़्त मन के भीतर उमड़ी आंसुओं की बाढ़ को आंखों के बांध से बांधे रखते थे. क्या मजाल, जो एक बूंद भी छलक जाए. मुझे भी अपनी आंखों के गीलेपन को पीना पड़ता था.
रिटायरमेंट (सेवानिवृत्ति) पर मिला सारा पैसा अपनी पत्नी को देना वे अपने जीवन की पहली और सबसे बड़ी भूल मानते थे. उनकी पत्नी बेटे-बहुओं के मोहपाश में बंधी हुई थी. रिटायरमेंट पर मिला रुपया बेटों को देती रही. बेटों ने दो कमरोंवाले पुराने मकान को चार कमरोंवाले आधुनिक मकान बनाने में सारे रुपए ख़र्च कर दिए. यज्ञदत्तजी के अनुसार उनकी पत्नी सब कुछ लुटा बैठी थीं. वे कई बार इस बात को दोहराते थे. इस वाक्य को कभी-कभी ‘हादसे’ का नाम भी देते थे. अपने दर्द को छुपाने के लिए ज़ोर से हंस भी देते थे.
मकान बन गया, तो सब कुछ बदल गया. मकान का आंगन तो गया ही, अपने भी पराए हो गए. यज्ञदत्त शर्मा के तीन बेटों ने एक-एक कमरा अपने कब्ज़े में ले लिया और चौथे कमरे को ड्रॉइंगरूम बना दिया.
आदमी अपनी हैसियत को छुपाने के लिए अक्सर इस ड्रॉइंगरूम का सहारा लेता है. ख़ूब सजा-धजा के रखा जाता है इसे. ड्रॉईंगरूम में सभी बूढ़ों का प्रवेश वर्जित रहता है. कोई तख़्ती तो नहीं टांगता, पर होता यही है. नए ज़माने की नई सोच.
यज्ञदत्त शर्मा का घर भी नए ज़माने की इस रीति-नीति से कैसे बच सकता था भला? परोक्ष-अपरोक्ष रूप से उनकी बहुओं ने उन्हें जता दिया था कि ड्रॉइंगरूम में उनका प्रवेश वर्जित है. मेहमानों के सामने आने की भी सख़्त मनाही थी.
उनकी जीवनभर की जमा-पूंजी से बने उनके अपने घर में उन्हें मकान का वो हिस्सा दिया गया, जिसे पुराने ज़माने का चौक या वराण्डा कहते थे. अब उसका नामकरण ‘लॉबी’ कर दिया गया है.
चार कमरों के बीच की खुली जगह के दो कोने यज्ञदत्त शर्मा और उनकी बीवी को मिले. एक कोने में यज्ञदत्तजी का पुराना पलंग और कबाड़ जमा था, दूसरे कोने में पत्नी की खाट लगा दी गई. चौक में एक लंबा-सा पर्दा भी था. मेहमानों के आने पर इस पर्दे को खींच दिया जाता था, ताकि ड्रॉइंगरूम का रौब कम न हो जाए.
“यह तो गनीमत है कि सरकार ने एक नियम बना दिया है. पेंशन एकाउण्ट (खाता) ज्वाइंट एकाउण्ट (संयुक्त खाता) नहीं हो सकता, वरना शायद ये दो कोने और दो व़क़्त का खाना भी नसीब न होता.” यज्ञदत्त जी के ये शब्द मेरे कानों में अक्सर गूंजते रहते थे.
उन्होंने एक समझौता किया था. इस समझौते के तहत पेंशन के तीन चौथाई हिस्से के बदले उन्हें रहने-खाने की सुविधाएं मिल रही थीं. बेटों का सुख भी मिल रहा था. इसे ‘नामसुख’ कहते हैं. बाप का नाम बेटे के नाम के साथ जुड़ा रहे तो वह ‘नामसुख’ कहलाता है. कई लोग तड़पते हैं इस ‘नामसुख’ के लिए.
यज्ञदत्तजी ने जब अपने तीनों बेटों का स्कूल में दाखिला करवाया था, तो बहुत गर्व से नाम लिखा था- राजेश यज्ञदत्त शर्मा, विमल यज्ञदत्त शर्मा, कमल यज्ञदत्त शर्मा. उनके रिटायरमेंट तक यही नाम चले. घर में भी और घर के बाहर लगी नेमप्लेट पर भी. नया मकान बना, तो पुरानी नेमप्लेट फेंक दी गई और एक नई तख़्ती टांग दी गई. इस तख़्ती पर लिखा था ‘कमल वाई. शर्मा, विमल वाई. शर्मा तथा राजेश वाई. शर्मा’ मन और एहसासों के साथ नाम भी छोटे हो गए थे.
यूं तो यज्ञदत्तजी का नाम हर तरह से गायब हो गया था, पर उससे क्या फ़र्क़ पड़ता है. यज्ञदत्त का ‘वाई.’ तो बचा है अभी. इसी वाई को ज़िंदा रखने के लिए दुआएं मांगी जाती हैं, मन्नतें मांगी जाती हैं, एक अदद बेटे की. यज्ञदत्तजी तो ख़ुशनसीब थे, तीन-तीन ‘वाई’ टंगे थे उनके घर के आगे.
ऐसे यज्ञदत्तजी ने अपना शौक़ बदल लिया और अब वे ख़ुश हैं, यह देखकर मुझे आत्मसंतोष मिल रहा था.
यज्ञदत्त शर्मा ‘नवीन’ अपने इस नए शौक़ के सम्मोहन में पूरी तरह बंध गए थे. बेटे-बहुएं, पोते-पोतियां यूं एकदम बदल जाएंगे, उनके अपने जो पराए हो गए थे, फिर अपने हो जाएंगे, मेरे लिए यह बात सच्चाई कम और अजूबा अधिक थी. जीवन के आख़िरी मोड़ पर आकर अचानक ज़िंदगी यूं करवट ले सकती है, इस बात को देखते-समझते हुए भी मुझे इस पर विश्‍वास नहीं हो सका.
इस सम्मोहन की टोह लेना मुझे सबसे ज़रूरी लगने लगा. यज्ञदत्तजी से पूछना बेकार था. वह अपने आपमें इतने मंत्रमुग्ध थे कि उन्हें अब दुनिया के किसी और सुख से कोई सरोकार न था. वह एक बात बार-बार बताते और गद्गद् होते रहते थे. वह कहते- “न जाने क्या जादू हो गया. जब भी बांसुरी बजाता हूं पोता-पोती, बेटे-बहुएं पास आ बैठती हैं. बांसुरी सुनते हैं सभी ध्यान से. सब मुझसे प्यार से बातें भी करने लगे हैं.”
फिर धीरे से बोले, “अब तो ड्रॉइंगरूम में जाने की मनाही भी नहीं.”
मुझे लगा कि यज्ञदत्तजी को टटोलना, उनके सम्मोहन का कारण जानना मकड़ी के जाल के सिरे को तलाशने जैसा है.
मैंने तय कर लिया कि मैं यज्ञदत्त शर्मा ‘नवीन’ की पत्नी से मिलूंगी.
एक दिन मौक़ा तलाश कर मैं उनके घर गई. मेरा सौभाग्य कि मैं उनके घर ऐसे व़क़्त पहुंची, जब घर पर उनकी पत्नी अकेली थीं. उनकी पत्नी से मेरा मिलना तो कम होता था, पर वे जानती थीं कि मैं यज्ञदत्तजी की एकमात्र सच्ची हमदर्द हूं. उनकी पत्नी से थोड़ी देर तक मैंने इधर-उधर की बात की, फिर सीधा सवाल किया.
मेरे सवाल को उन्होंने टालने की बहुत कोशिश की, पर फिर हथियार डाल दिए. मुझसे वायदा लिया कि मैं कभी किसी से इस राज़ का खुलासा नहीं करूंगी.
वह मुझे बताने लगीं.

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“हम औरतें सहनशील होती हैं. रिश्तों के खोखलेपन और खालीपन को पी जाती हैं. किसी को कुछ नहीं बतातीं, पर मुझसे इनकी पीड़ा देखी नहीं जाती थी. एक सीमा जब पार होती दिखी, तो मैंने अपने भीतर छिपाए एक राज़ का पर्दाफाश कर दिया.”
“राज़?” मैंने सवाल किया.
“हां राज़. जब मैं इस परिवार में आई, तब से मैंने मन ही मन कुछ निर्णय कर लिया था. यह बहुत दरियादिल थे. दिल भी खुला रखते थे, जेब भी. हर महीने पूरी तनख़्वाह मेरे हाथ में रखते थे. फिर जब जितनी ज़रूरत होती, लेते रहते.
हर महीने मैं इनकी तनख़्वाह में से कुछ रुपए बचा लेती थी. ये सारे रुपए आड़े समय में काम आएंगे, यह सोचकर मैं ऐसा करती थी. इसके लिए साल में बारह झूठ बोलने पड़ते थे मुझे.”
“बारह झूठ?” मैंने चौंककर कहा.
“हां बारह झूठ. हर महीने तनख़्वाह में से जो पैसे बचाती थी, उसके बारे में हर महीने एक झूठ बोलना पड़ता था कि सब पैसे ख़त्म हो गए. फिर इनका रिटायरमेंट हुआ. इन्होंने हमेशा की तरह सारी रकम मेरे हाथ में रख दी. हमने मकान बनवाया. मकान का ख़र्चा मैं देती रही. एक हद के बाद मैंने कह दिया कि रकम ख़त्म हो गई.
यूं करते-करते मेरे पास पांच लाख रुपए जमा हो गए. शुरू में ही मैंने पोस्ट ऑफ़िस में खाता खुलवा रखा था. ये सारे पैसे उसमें जमा करवाती रही. ब्याज मिलता रहा. बूंद-बूंद करके घड़ा भर गया.
वह थोड़ी देर चुप हो गईं. गहरी पीड़ा की रेखाएं उनके चेहरे पर उभर आईं.
“फिर?” मैंने सवाल किया.
“फिर क्या? मैं जानती थी बेटे-बहुएं रकम ख़त्म होते ही मुंह फेर लेंगे, पर इतने संगदिल हो जाएंगे, मुझे विश्‍वास न था. जिन बच्चों पर हमने कभी हाथ नहीं उठाया, वे बच्चे अपने पिता पर हाथ उठा लें, यह कड़वा सच मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ. मैंने अपनी पासबुक अपने बेटे-बहुओं के सामने रख दी. एक समझौता किया अपनों के साथ, मैं उन्हें रकम दूंगी, वे लोग मुझे और मेरे पति को माता-पिता का सम्मान देंगे. सम्मान का यही समझौता रिश्तों का सम्मोहन है.
कोई सवाल बाकी न बचा था. मैं उठी और चली आई. घर के बाहर लगी तख़्ती भी बदल गई थी. अब उसमें ‘वाई’ की जगह ‘यज्ञदत्त’ चिपक गया था.

– पूनम रतनानी

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