Kids Story

एक गांव में मन्थरक नाम का जुलाहा यानी बुनकर रहता था. वो मेहनत से अपना काम करता था पर वो बेहद गरीब था. एक बार जुलाहे के उपकरण, जो कपड़ा बुनने के काम आते थे, टूट गए. जुलाहा चाहता था जल्द से जल्द उपकरण बनजाएं ताकि उसका परिवार भूखा ना रहे, लेकिन उपकरणों को फिर बनाने के लिये लकड़ी की जरुरत थी. जुलाहा लकड़ीकाटने की कुल्हाड़ी लेकर समुद्र के पास वाले जंगल की ओर चल पड़ा. बहुत ढूंढ़ने पर भी उसे अच्छी लकड़ी नहीं मिली तबउसने समुद्र के किनारे पहुंचकर एक वृक्ष देखा, उसकी लकड़ी उत्तम थी तो उसने सोचा कि इसकी लकड़ी से उसके सबउपकरण बन जाएंगे. लेकिन जैसे ही उसने वृक्ष के तने में कुल्हाडी़ मारने के लिए हाथ उठाया, उसमें से एक देव प्रकट हएऔर उसे कहा, मैं इस वृक्ष में वास करता हूं और यहां बड़े ही आनन्द से रहता हूं और यह पेड़ भी काफ़ी हराभरा है तो तुम्हेंइस वृक्ष को नहीं काटना चाहिए. 

जुलाहे ने कहा, मैं बेहद गरीब हूं और इसलिए लाचार हूं, क्योंकि इसकी लकड़ी के बिना मेरे उपकरण नहीं बनेंगे, जिससे मैंकपड़ा नहीं बुन पाऊंगा और मेरा परिवार भूखा मर जाएगा. आप किसी और वृक्ष का आश्रय ले लो. 

देव ने कहा, मन्थरक, मैं तुम्हारे जवाब से प्रसन्न हूं, इसलिए अगर तुम इस पेड़ को ना काटो तो मैं तुम्हें एक वरदान दूंगा, तुममांगो जो भी तुमको चाहिए. 

मन्थरक सोच में पड़ गया और बोला, मैं अभी घर जाकर अपनी पत्‍नी और मित्र से सलाह करता हूं कि मुझे क्या वर मांगना चाहिए. 

देव ने कहा, तुम जाओ मैं तब तक तुम्हारी प्रतीक्षा करता हूं. 

गांव में पहुंचने पर मन्थरक की भेंट अपने एक मित्र नाई से हो गई. उसने दोस्त को सारा क़िस्सा सुनाया और पूछा, मित्र, मैं तुमसे सलाह लेने ही आया हूं कि मुझे क्या वरदान मांगना चाहिए.

नाई ने कहा, क्यों ना तुम देव से एक पूरा राज्य मांग को, तुम वहां के राजा बन जाना और मैं तुम्हारा मन्त्री बन जाऊंगा. जीवन में सुख ही सुख होगा.

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मन्थरक को मित्र की सलाह अच्छी लगी लेकिन उसने नाई से कहा कि मैं अपनी पत्‍नी से सलाह लेने के बाद ही वरदान का निश्चय करुंगा. मंथरक को नाई ने कहा कि मित्र तुम्हारी पत्नी लोभी और स्वार्थी है, वो सिर्फ़ अपना भला और फायदा ही सोचेगी. 

मन्थरक ने कहा, मित्र जो भी है आख़िर मेरी पत्नी है वो तो उसकी सलाह भी ज़रूरी है. घर पहुंचकर वह पत्‍नी से बोला, जंगल में आज मुझे एक देव मिले है और वो मुझसे खुश होकर एक वरदान देना चाहते हैं, बदले में मुझे उस पेड़ को नहीं काटना है. नाई की सलाह है कि मैं राज्य मांग लूं और राजा बनकर सुखी जीवन व्यतीत करूं, तुम्हारी क्या सलाह है?

पत्‍नी ने उत्तर दिया, राज्य-शासन का काम इतना आसान नहीं है, राजा की अनेकों जिम्मेदारियाँ होती हैं, पूरे राज्य और जनता की सोचनी पड़ती है. इसमें सुख कम और कष्ट ज़्यादा हैं. 

मन्थरक को पत्नी की बात जम गई और वो बोला, बात तो बिलकुल सही है. राजा राम को भी राज्य-प्राप्ति के बाद कोई सुख नहीं मिला था, हमें भी कैसे मिल सकता है ? किन्तु राज्य की जगह वरदान में क्या मांगा जाए?

मन्थरक की पत्‍नी ने कहा, तुम सोचो कि तुम अकेले दो हाथों से जितना कपड़ा बुनते हो, उससे गुज़र बसर हो जाता है, पर यदि तुम्हारे एक सिर की जगह दो सिर हों और दो हाथ की जगह चार हाथ हों, तो तुम दुगना कपड़ा बुन पाओगे वो भी तेज़ीसे, इससे ज़्यादा काम कर पाओगे और ज़्यादा कमा भी पाओगे, जिससे पैसे ज़्यादा आएंगे और हमारी ग़रीबी दूर होजाएगी. 

मन्थरक को पत्‍नी की बात इतनी सही लगी कि वो वृक्ष के पास वह देव से बोला, मैंने सोच लिया है, आप मुझे यह वर दो कि मेरे दो सिर और चार हाथ हो जाएं. 

मन्थरक की बात सुन देव ने उसे उसका मनचाहा वरदान दे दिया और उसके अब दो सिर और चार हाथ हो गए. वो खुशहोकर गांव की तरफ़ चल पड़ा, लेकिन इस बदली हुई हालत में जब वह गांव  में आया, तो लोग उसे देखकर डर गए और लोगों ने उसे राक्षस समझ लिया. सभी लोग राक्षस-राक्षस कहकर सब उसे मारने दौड़ पड़े और लोगों ने उसको पत्थरों सेइतना मारा कि वह वहीं मर गया

सीख: यदि मित्र समझदार हो और उसकी सलाह सही लगे, तो उसे मानो. अपनी बुद्धि से काम लो और सोच-समझकर ही कोई निर्णय लो. बेवक़ूफ़ की सलाह और उसपे अमल आपको हानि ही पहुंचाएगी. 

एक गांव में युधिष्ठिर नाम का कुम्हार रहता था. एक दिन वह शराब के नशे में घर आया तो अपने घर पर एक टूटे हुए घड़े से टकराकर गिर पड़ा और उस घड़े के जो टुकड़े जमीन पर बिखरे हुए थे, उनमें से एक नुकीला टुकड़ा कुम्हार के माथे में घुस गया, जिससे उस स्थान पर गहरा घाव हो गया. वो घाव इतना गहरा था कि उसको भरने में काफ़ी लंबा समय लगा. घाव भर तो गया था लेकिन कुम्हार के माथे पर हमेशा के लिए निशान बन गया था.

कुछ दिनों बाद कुम्हार के गांव में अकाल पड़ गया था, जिसके चलते कुम्हार गांव छोड़ दूसरे राज्य में चला गया. वहां जाकर वह राजा के दरबार में काम मांगने गया तो राजा की नज़र उसके माथे के निशान पर पड़ी. इतना बड़ा निशान देख राजा ने सोचा कि अवश्य की यह कोई शूरवीर योद्धा है. किसी युद्ध के दौरान ही इसके माथे पर यह चोट लगी है.

राजा ने कुम्हार को अपनी सेना में उच्च पद दे दिया. यह देख राजा के मंत्री और सिपाही कुम्हार से ईर्ष्या करने लगे. लेकिन वो राजा का विरोध नहीं कर सकते थे, इसलिए चुप रहे. कुम्हार ने भी भी बड़े पद के लालच में राजा को सच नहीं बताया और उसने सोचा अभी तो चुप रहने में ही भलाई है!

समय बीतता गया और एक दिन अचानक पड़ोसी राज्य ने आक्रमण कर दिया. राजा ने भी युद्ध की तैयारियां शुरू कर दी. राजा ने युधिष्ठिर से भी कहा युद्ध में भाग लेने को कहा और युद्ध में जाने से पहले उससे पूछना चाहा कि उसके माथे पर निशान किस युद्ध के दौरान बना, राजा ने कहा- हे वीर योद्धा! तुम्हारे माथे पर तुम्हारी बहादुरी का जो प्रतीक है, वह किस युद्ध में किस शत्रु ने दिया था?

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तब तक कुम्हार राजा का विश्वास जीत चुका था तो उसने सोचा कि अब राजा को सच बता भी दिया तो वो उसका पद उससे नहीं छीनेंगे क्योंकि वो और राजा काफ़ी क़रीब आ चुके थे. उसने राजा को सच्चाई बता दी कि महाराज, यह निशान मुझे युद्ध में नहीं मिला है, मैं तो एक मामूली गरीब कुम्हार हूं. एक दिन शराब पीकर जब मैं घर आया, तो टूटे हुए घड़े से टकराकर गिर पड़ा. उसी घड़े का एक नुकीले टुकड़ा मेरे माथे में गहराई तक घुस गया था जिससे घाव गहरा हो गया था और यह निशान बन गया.

राजा सच जानकर आग-बबूला हो गया. उसने कुम्हार को पद से हटा दिया और उसे राज्य से भी निकल जाने का आदेश दिया. कुम्हार मिन्नतें करता रहा कि वह युद्ध लड़ेगा और पूरी वीरता दिखाएगा, अपनी जान तक वो राज्य की रक्षा के लिए न्योछावर कर देगा, लेकिन राजा ने उसकी बात नहीं सुनी और कहा कि तुमने छल किया और कपट से यह पद पाया. तुम भले ही कितने की पराक्रमी और बहादुर हो, लेकिन तुम क्षत्रियों के कुल के नहीं हो. तुम एक कुम्हार हो . तुम्हारी हालत उस गीदड़ की तरह है जो शेरों के बीच रहकर खुद को शेर समझने लगता है लेकिन वो हाथियों से लड़ नहीं सकता! इसलिए जान की परवाह करो और शांति से चले जाओ वर्ना लोगों को तुम्हारा सच पता चलेगा तो जान से मारे जाओगे. मैंने तुम्हारी जान बख्श दी इतना ही काफ़ी है!

कुम्हार चुपचाप निराश होकर वहां से चला गया.

सीख: सच्चाई ज़्यादा दिनों तक छिप नहीं सकती इसलिए हमेशा सच बोलकर सत्य की राह पर ही चलना चाहिए. झूठ से कुछ समय के लिए फ़ायदा भले ही हो लेकिन आगे चलकर नुक़सान ही होता है. इतना ही नहीं कभी भी घमंड में और अपने फ़ायदे के लिए सुविधा देखकर सच बोलना भारी पड़ता है!

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अकबर जानते थे कि बीरबल के पास हर सवाल का जवाब है और वो बीरबल की बुद्धिमत्ता से भी काफ़ी प्रभावित थे. फिर भी वो समय-समय पर उसे परखते रहते थे और अपने मन में आए सवालों के जवाब मांगते रहते थे. इन दोनों का ऐसा ही एक रोचक किस्सा है,  जिसमें अकबर ने बीरबल से ईश्वर से जुड़े तीन प्रश्न पूछे थे.
वो तीन प्रश्न थे-
1. ईश्वर कहां रहता है ?
2. ईश्वर कैसे मिलता है ?
3. ईश्वर करता क्या है?
जब अकबर ने ये प्रश्न पूछे तो बीरबल बहुत हैरान हुए और उन्होंने कहा कि इन प्रश्नों के उत्तर वह कल बताएंगे. इतना कहकर बीरबल घर लौट आए. बीरबल इन प्रश्नों को लेकर काफ़ी सोच-विचार कर रहे थे, जिसे देख बीरबर के पुत्र ने चिंता का कारण पूछा. बीरबल ने अकबर के तीन प्रश्नों का क़िस्सा बता दिया.

बीरबल के पुत्र ने कहा कि परेशान ना हों वह खुद कल दरबार में बादशाह को इन तीनों प्रश्नों के जवाब देगा और अगले दिन बीरबल अपने पुत्र के साथ दरबार में पहुंचे. बीरबल ने बादशाह से कहा कि आपके तीनों प्रश्नों के जवाब तो मेरा पुत्र भी दे सकता है.

अकबर ने कहा, ठीक है, तो सबसे पहले बताओ कि ईश्वर कहां रहता है?

प्रश्न सुनकर बीरबल के पुत्र ने चीनी मिला हुआ दूध मंगाया और उसने वह दूध अकबर को दिया और कहा कि चखकर बताइए दूध कैसा है?

अकबर ने दूध चखकर बताया कि यह मीठा है.

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इस पर बीरबल के पुत्र ने कहा कि क्या आपको इसमें चीनी दिख रही है?

अकबर ने कहा, नहीं, चीनी तो नहीं दिख रही है, वह तो दूध में घुली हुई है.

बीरबल के पुत्र ने कहा, जहांपनाह, ठीक इसी तरह ईश्वर भी संसार की हर चीज़ में घुला हुआ है, लेकिन दूध में घुली हुई चीनी की तरह दिखाई नहीं देता है.

बादशाह अकबर जवाब से संतुष्ट हो गए.

अकबर ने दूसरा प्रश्न पूछा, ठीक है तो अब ये बताओ कि ईश्वर कैसे मिलता है?

इस प्रश्न का जवाब देने के लिए बीरबल के पुत्र ने इस बार दही मंगवाया और अकबर को दही देते हुए कहा, जहांपनाह, क्या आपको इसमें मक्खन दिखाई दे रहा है?

अकबर ने कहा, दही में मक्खन तो है, लेकिन दही मथने पर ही मक्खन दिखाई देगा.

बीरबल के पुत्र ने कहा, जी हां, ठीक इसी प्रकार ईश्वर भी मन का मंथन करने पर ही मिल सकते हैं.

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बादशाह अकबर इस जवाब से भी संतुष्ट हो गए.

अकबर ने तीसरा प्रश्न पूछा, ईश्वर करता क्या है?

बीरबर के पुत्र ने कहा, इस प्रश्न के जवाब के लिए आपको मुझे गुरु मानना होगा.

बादशाह अकबर ने कहा, ठीक है, अब से तुम मेरे गुरु और मैं तुम्हारा शिष्य.

बीरबल के पुत्र ने आगे कहा, गुरु हमेशा ऊंचे स्थान पर बैठता है और शिष्य हमेशा नीचे बैठता है.

बादशाह अकबर तुरंत ही अपने सिंहासन से उठ गए और बीरबल के पुत्र को सिंहासन पर बैठाकर खुद नीचे बैठ गए.

सिंहासन पर बैठते ही बीरबल के पुत्र ने कहा, जहांपनाह, यही आपके तीसरे प्रश्न का जवाब है. ईश्वर राजा को रंक बनाता है और रंक को राजा बना देता है.

बादशाह अकबर इस जवाब से भी संतुष्ट हो गए और बीरबल के पुत्र की बुद्धिमत्ता से प्रभावित हो उसको ईनाम दिया!

सीख: धैर्य और सूझबूझ से हर प्रश्न का जवाब और हर समस्या का हल पाया जा सकता है!

एक जंगल में महाचतुरक नामक सियार रहता था. वो बहुत तेज़ बुद्धि का था और बेहद चतुर था. एक दिन जंगल में उसने एक मरा हुआ हाथी देखा, अपने सामने भोजन को देख उसकी बांछे खिल गईं, लेकिन जैसे ही उसने हाथी के मृत शरीर पर दांत गड़ाया, चमड़ी मोटी होने की वजह से, वह हाथी को चीरने में नाकाम रहा.
वह कुछ उपाय सोच ही रहा था कि उसे सामने से सिंह आता दिखाई दिया, सियार ने बिना घबराए आगे बढ़कर सिंह का स्वागत किया और हाथ जोड़कर कहा- स्वामी आपके लिए ही मैंने इस हाथी को मारकर रखा है, आप इसका मांस खाकर मुझ पर उपकार करें! सिंह ने कहा- मैं किसी और के हाथों मारे गए जीव को खाता नहीं हूं, इसे तुम ही खाओ.
सियार मन ही मन खुश तो हुआ, पर उसकी हाथी की चमड़ी को चीरने की समस्या अब भी हल न हुई थी. थोड़ी देर में उस तरफ से एक बाघ भी आता नज़र आया. बाघ ने मरे हाथी को देखकर अपने होंठ पर जीभ फिराई, तों सियार ने उसकी मंशा भांपते हुए कहा- मामा, आप इस मृत्यु के मुंह में कैसे आ गए? सिंह ने इसे मारा है और मुझे इसकी रखवाली करने को कह गया है. एक बार किसी बाघ ने उनके शिकार को जूठा कर दिया था, तब से आज तक वे बाघ जाति से नफरत करने लगे हैं. आज तो हाथी को खाने वाले बाघ को वह मार ही गिराएंगे.
यह सुनते ही बाघ डर गया और फ़ौरन वहां से भाग खड़ा हुआ. थोड़ी ही देर में एक चीता आता हुआ दिखाई दिया, तो सियार ने सोचा कुछ तो ऐसा करूं कि यह हाथी की चमड़ी भी फाड़ दे और मांस भी न खा पाए!

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उसने चीते से कहा- मेरे प्रिय भांजे, इधर कैसे? क्या बात है कुछ भूखे भी दिखाई पड़ रहे हो? सिंह ने इस मरे हुए हाथी की रखवाली मुझे सौंपी है, पर तुम इसमें से कुछ मांस खा सकते हो. मैं तुम्हें सावधान कर दूंगा, जैसे ही सिंह को आता हुआ देखूंगा, तुम्हें सूचना दे दूंगा, तुम फ़ौरन भाग जाना. ऐसे तुम्हारा पेट भी भर जाएगा और जान भी बच जाएगी!
चीते को सियार की बात और योजना अच्छी तो लगी लेकिन डर के कारण उसने पहले तो मांस खाने से मना कर दिया, पर सियार के विश्वास दिलाने पर वो तैयार हो गया. सियार मन ही मन प्रसन्न था कि चीते के तेज़ दांत उसका काम कर देंगे! चीते ने पलभर में हाथी की चमड़ी फाड़ दी पर जैसे ही उसने मांस खाना शुरू किया, दूसरी तरफ देखते हुए सियार ने घबराकर कहा- जल्दी भागो सिंह आ रहा है.
इतना सुनते ही चीता बिना देर किए सरपट भाग खड़ा हुआ. सियार बहुत खुश हुआ और उसने कई दिनों तक उस विशाल हाथी का मांस खाकर दावत उड़ाई!

उस सियार ने अपनी चतुराई और सूझ-बूझ से बड़ी ही आसानी से अपने से बलवान जानवरों का सामना करते हुए उन्हीं के ज़रिए अपनी समस्या का हल निकाल लिया!

सीख: बुद्धि का बल शरीर के बल से कहीं बड़ा होता है और अगर सूझबूझ से काम किया जाए तो कठिन से कठिन समस्या आसानी से हल हो सकती है! इसलिए समस्या देखकर या ख़तरा देखकर घबराने की बजाए चतुराई से काम लें!

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मित्र की सलाह
बहुत समय पहले की बात है, एक गांव में एक धोबी रहता था लेकिन वो बहुत कंजूस था. उसका एक गधा था, धोबी दिनभर उससे काम कराता और वो गधा दिनभर कपडों के गट्ठर इधर से उधर ढोने में लगा रहता. धोबी ना सिर्फ़ कंजूस था बल्कि निर्दयी भी था. अपने गधे को वो भूखा ही रखता था और उसके लिए चारे का प्रबंध नहीं करता था. बस रात को उसे चरने के लिए खुला छोड देता था. लेकिन पास में कोई चरागाह भी नहीं था इसलिए गधा बहुत कमज़ोर और दुर्बल हो गया था.
एक रात वो गधा चारे की तलाश में घूम रहा था तो उसकी मुलाकात एक गीदड़ से हुई. गीदड़ ने उससे पूछा कि वो इतना कमज़ोर क्यों है?
गधे ने अपना दुख उसे बताया कि कैसे उसे दिन भर काम करना पडता है और उसका मालिक उसे खाने को कुछ नहीं देता, इसलिए वो रात को अंधेरे में खाने की तलाश करता रहता है.
गीदड़ बोला, मित्र अब तुम्हें घबराने की बात नहीं, समझो अब तुम्हारे दुःख और भुखमरी के दिन ख़त्म. यहां पास में ही एक बड़ा सब्जियों और फलों का बाग़ है. वहां तरह-तरह की सब्जियां और मीठे फल उगे रहते हैं. हर तरह की सब्ज़ी और फल की बहार है. मैंने बाग़ में घुसने का गुप्त मार्ग भी बना रखा है. मैं तो हर रात अंदर घुसकर छककर खाता हूं. तुम भी मेरे साथ आया करो.
बस फिर क्या था गधा भी गीदड़ के साथ हो लिया और बाग़ में घुसकर महीनों के बाद पहली बार गधे ने भरपेट खाना खाया. अब यह हर रात का सिलसिला हो गया था. दोनों रात भर बाग़ में ही रहये और दिन निकलने से पहले गीदड़ जंगल की ओर चला जाता और गधा अपने धोबी के पास आ जाता.
धीरे-धीरे गधे की कमज़ोरी दूर होने लगी, उसका शरीर भरने लगा, बालों में चमक आने लगी और वो खुश रहने लगा, क्योंकि वो अपनी भुखमरी के दिन बिल्कुल भूल गया था.

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एक रात खूब खाने के बाद गधे का मूड काफ़ी अच्छा हो गया और वो झूमने लगा. वो अपना मुंह ऊपर उठाकर कान फडफडाने लगा और लोटने लगा. गीदड़ को शंका हुई तो उसने चिंतित होकर पूछा कि आख़िर तुम यह क्या कर रहे हो? तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ना?
गधा बोला आज मैं बहुत खुश हूं और फिर आंखें बंद करके मस्त स्वर में बोला कि मेरा दिल गाना गाने का कर रहा हैं. अच्छा भोजन करने के बाद मैं प्रसन्न हूं. एक गाना तो बनता है. सोच रहा हूं ढेंचू राग गाऊँ!
गीदड़ उसकी बात सुन घबरा गया और उसने तुरंत चेतावनी दी मेरे भाई ऐसा न करना, क्योंकि हम दोनों यहां चोरी कर रहे हैं ऐसे में तुम्हारा गाना सुन माली जाग जाएगा और हम मुश्किल में पड़ जाएँगे. मुसीबत को न्यौता मत दो.
गधे ने गीदड़ को देखा और बोला, तुम जंगली के जंगली ही रहोगे. हम ख़ानदानी गायक हैं, तुम संगीत के बारे में क्या जानो?
गीदड़ ने फिर समझाया कि भले ही मैं संगीत के बारे में कुछ नहीं जानता, लेकिन मैं जान बचाना जानता हूं. तुम ज़िद छोडो, उसी में हम दोनों की भलाई है, वर्ना तुम्हारी ढेंचू सुन के माली जाग जाएगा.

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गधे ने गीदड़ की बात का बुरा मानकर कहा, तुम मेरा अपमान कर रहे हो, तुमको मेरा राग बेसुरा लगता है जबकि हम गधे एक लय में रेंकते हैं, जो तुम जैसे मूर्खों की समझ में नहीं आ सकता.
गीदड़ बोला चलो माना कि मैं मूर्ख जंगली हूं लेकिन एक मित्र के नाते मेरी सलाह मानो और अपना मुंह मत खोलो, वर्ना मालिक भी जाग जाएगा.
गधा हंसकर बोला- अरे मूर्ख गीदड़! मेरा राग सुनकर बाग़ के चौकीदार तो क्या, बाग़ का मालिक भी फूलों का हार लेकर आएगा और मेरे गले में डालकर मेरा सम्मान करेगा.

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गीदड़ ने को लगा इस मूर्ख को समझाने से कोई फायदा नहीं, उसने चतुराई से काम लिया और हाथ जोडकर बोला, मेरे प्यारे गधे भाई, मुझे अपनी ग़लती का एहसास हो गया है, तुम महान गायक हो और मैं तुम्हारे गले में डालने के लिए फूलों की माला लाना चाहता हूं, तुम मेरे जाने के दस मिनट बाद ही गाना शुरू करना, ताकि मैं गाना समाप्त होने तक फूल मालाएं लेकर लौट सकूं.
गधे ने गर्व से सहमति में सिर हिलाया और गीदड़ वहां से जंगल की ओर भाग गया. गधे ने उसके जाने के कुछ समय बाद मस्त होकर रेंकना शुरू किया. उसकी आवाज़ सुनते ही बाग़ के चौकीदार जाग गए और लाठी लेकर दौडे. वहां पहुंचते ही गधे को देखकर चौकीदार बोला, अच्छा तो तू है, तू ही वो दुष्ट गधा है जो हमारा बाग़ में चोरी से फल सब्ज़ी खाता था.
बस उसके बाद गधे पर डंडों की बरसात होने लगी और कुछ ही देर में गधा अधमरा होकर गिरकर बेहोश हो गया!

सीख: इस कहानी से यही सीख मिलती है कि अगर कोई हमारा मित्र हमारी भलाई के लिए कुछ समझाता है, तो उसे मान लेना चाहिए. अपने हितैषियों की सलाह पर गौर करना चाहिए ना कि अपने घमंड में ग़लत रास्ता अपनाकर खुद को मुसीबत में डालना चाहिए! अपनी कमज़ोरियों को पहचानने की क्षमता रखनी चाहिए वर्ना नतीजा बुरा हो सकता है.

एक पर्वतीय प्रदेश में एक बड़े से पेड़ पर एक पक्षी रहता था, जिसका नाम सिंधुक था. आश्चर्य की बात थी कि उस पक्षी की विष्ठा यानी मल सोने में बदल जाती थी. यह बात किसी को भी पता नहीं थी. एक बार उस पेड़ के नीचे से एक शिकारी गुज़र रहा था. शिकारी को चूंकी सिंधुक के स्वर्ण मल के बारे में पता नहीं था, इसलिए वो आगे बढ़ता गया, लेकिन इसी बीच सिंधुक ने शिकारी के सामने ही मल त्याग कर दिया. जैसे ही पक्षी का मल ज़मीन पर पड़ा, वो सोने में बदल गया. यह देखते ही शिकारी बहुत खुश हुआ और उसने उस पक्षी को पकड़ने के लिए जाल बिछाया दिया और पक्षी को शिकारी अपने घर ले आया.

पिंजरें में बंद सिंधुक को देख शिकारी को चिंता सताने लगी कि यदि  राजा को इस बारे में पता चला, तो वो न सिर्फ पक्षी को  दरबार में पेश करने को कहेंगे बल्कि मुझे भी दंड देंगे. इसलिए  डर के मारे शिकारी खुद ही सिंधुक को राजा के दरबार में पेश करने ले गया और उसने राजा को सारी बात बताई.

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राजा ने आदेश दिया कि पक्षी को सावधानी से रखा जाए और उस पर नज़र रखी जाए. पक्षी की देखभाल में कमी ना हो. ये सब सुनने के बाद मंत्री ने राजा को कहा- आप इस बेवकूफ शिकारी की बात पर भरोसा मत कीजिये. सभी हम पर हंसेंगे. कभी ऐसा होता है कि कोई पक्षी सोने का मल त्याग करे? इसलिए, अच्छा होगा कि इसे आज़ाद कर दें.

मंत्री की बात सुनकर राजा ने को लगा कि सही कह रहे हैं मंत्री , इसलिए रजा ने पक्षी को आजाद करने का आदेश दे दिया. सिंधुक उड़ते-उड़ते राजा के द्वार पर सोने का मल त्याग करके गया. उड़ते-उड़ते सिंधुक कह गया-

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“पूर्वं तावदहं मूर्खो द्वितीयः पाशबन्धकः । ततो राजा च मन्त्रि च सर्वं वै मूर्खमण्डलम् ॥

अर्थात्- सबसे पहले तो मैं मूर्ख था, जो शिकारी के सामने मल त्याग किया, शिकारी मुझसे बड़ा बेवकूफ था, जो मुझे राजा के पास ले गया और राजा व मंत्री मूर्खों के सरताज निकले, क्योंकि राजा बिना सच जाने मंत्री की बात में आ गया. सभी मूर्ख एक जगह ही हैं.
हालाँकि राजा के सिपाहियों ने पक्षी को पकड़ने की चेष्टा की लेकिन तब तक देर हो चुकी थी.

सीख: बिना खुद जांचे-परखे किसी निर्णय तक ना पहुंचे. कभी भी दूसरे की बातों में नहीं आना चाहिए और अपने दिमाग से काम लेना चाहिए.

राजा कृष्णदेव प्रकृति प्रेमी थे और उन्हें पंछियों से भी बेहद लगाव था. एक रोज़ एक व्यक्ति राजा के पास आया और उसके पास एक पिंजरे में बेहद खूबसूरत और रंग बिरंगा पंछी भी था.

वह राजा से बोला, महाराज, इस सुंदर व विचित्र पक्षी में बहुत सी खूबियाँ हैं. यह कोयल की तरह बहुत मीठा गाता है तथा तोते के समान बोल भी सकता है. यह मोर की तरह रंग-बिरंगा ही नहीं है बल्कि उसके समान नाच भी सकता हैं। मैं यहां यह पक्षी आपको देने आया हूँ.

राजा ने पक्षी को देखा और वो बेहद खुश हुए. उन्होंने उस व्यक्ति को कहा कि तुम्हें इस पंछी का उपयुक्त मूल्य मिलेगा. राजा ने बहेलिए को 50 स्वर्ण मुद्राएं दीं. यह सब देखकर तेनालीराम से रहा नहीं गया और वो बोला, महाराज, मुझे नहीं लगता कि यह पक्षी बरसात में मोर के समान नृत्य कर सकता है बल्कि मुझे तो लगता है कि यह पक्षी कई वर्षों से नहाया भी नहीं है.

तेनालीराम की बात सुनकर बहेलिया दुखी स्वर में राजा से बोला, महाराज, मैं एक निर्धन बहेलिया हूं और पक्षियों को पकड़ना व बेचना ही मेरी आजीविका है. ऐसे में तेनालीराम का मुझे झूठा कहना बेहद दुखद है.

Tenali Rama And The Coloured Nails

बहेलिए की यह बात सुन महाराज भी तेनालीराम पर क्रोधित हुए और उन्होंने कहा तेनालीराम, क्या तुम अपनी बात सिद्ध कर सकते हो? इस तरह किसी पे इल्ज़ाम लगाना ठीक नहीं.

मैं अपनी बात सिद्ध करना चाहता हूं, महाराज. तेनालीराम ने एक ग्लास पानी पक्षी के पिंजरे में गिरा दिया. पक्षी गीला हो गया और सभी पक्षी को आश्चर्य से देखने लगे, क्योंकि पंछी का रंग उतर चुका था.

तेनालीराम ने कहा ल, हाराज यह कोई विचित्र पक्षी नहीं है बल्कि जंगली कबूतर है.

महाराज को तो यक़ीन ही नहीं हुआ, उन्होंने तेनालीराम से पूछा कि तुम्हें कैसे पता लगा कि यह पक्षी रंगा गया है?

तेनालीराम ने कहा, महाराज, इस बहेलिए के रंगीन नाखूनों से मुझे अंदाज़ा हो गया था. पक्षी पर लगे रंग व उसके नाखूनों का रंग एक समान है.

पोल खुलते ही बहेलिया भागने का प्रयास करने लगा, परंतु सैनिकों ने उसे पकड़ लिया.

राजा ने उसे जेल में डाल दिया और 50 स्वर्ण मुद्राएं तेनालीराम को दे दी गईं.

सीख: आँख बंद करके किसी की भी बातों में ना आयें. सतर्क रहें और बुद्धि का इस्तेमाल करें.

फ़ोटो सौजन्य: bedtimeshortstories.com

एक गाँव में ब्राह्मण और उसकी पत्नी रहते थे. उनकी कोई संतान नहीं थीं, उनके पास एक पालतू नेवला था जो उनके साथ रहता था. ब्राह्मणी उस नेवले को संतान की तरह ही प्यार करती थीं. इसी बीच ब्राह्मणी को पुत्र की प्राप्ति हुई. अब उनका परिवार पूरा हो चुका ठाँव. ब्राह्मण ने यह आशंका जताई कि कहीं नेवला उनके पुत्र को कोई नुक़सान ना पहुँचाए तो क्या उसे बाहर निकाल देना चाहिए, परंतु ब्राह्मणी ने मना कर दिया. ब्राह्मण का पुत्र और नेवला बहुत क़रीब आ गए थे और साथ साथ खेलते थे. नेवला अपने भाई से बहुत प्रेम करता था. एक दिन, जब ब्राह्मण काम पर गया था, तो उसकी पत्नी ने बच्चे को पालने में छोड़ दिया और पानी का भरने के लिए चली गयी.

Panchtantra Ki Kahani: The Loyal Mangoose
सौजन्य: Tell A Tale

जब वह बाहर गई, उसने नेवले को बच्चे की देखभाल करने के लिए कहा. ब्राह्मणी के जाने के बाद घर में एक सांप आ गया. वह सांप बच्चे की ओर बढ़ रहा था, जैसे ही नेवले ने सांप को देखा उसने उस पर आक्रमण कर दिया और उसे मार दिया.

इसी बीच ब्राह्मण की पत्नी पानी लेकर घर लौटी नेवले ने उसके मुंह पर रक्त के साथ खुशी से उसका स्वागत किया. ब्राह्मणी उसे देख कर डर गई. उसने सोचा कि नेवले ने बच्चे को मार दिया है. बिना कुछ सोचे समझे ब्राह्मणी ने नेवले पर पानी के बर्तन को गिरा दिया और उसे मार दिया.
बाद में वह अंदर गई और बच्चा खुशी से पालने में खेलता मिला, उसके पास ही खून से लथपथ सांप के टुकड़े हुए पड़े थे, तो ब्राह्मणी को एहसास हुआ कि उसने यह क्या किया. पुत्र समान नेवले को बिना सोचे-समझे मार दिया जबकि उसने तो बच्चे की रक्षा की थी.

सीख: कोई भी बड़ा क़दम उठाने से पहले अच्छी तरह सोच समझ लेना चाहिए. पूरी छानबीन करके ही आगे बढ़ना चाहिए. आवेश और आक्रोश में आकर कुछ नहीं करना चाहिए. कभी कभी आँखें भी धोखा दे सकती हैं.

Akbar Birbal Ki Khaniya
सौजन्य: lets-inspire.com

अकबर-बीरबल कथा: पूर्णिमा का चांद (Akbar-Birbal Story: poornima Ka Chand)

एक बार बीरबल फारस देश के राजा के निमंत्रण पर उनके देश गए हुए थे. उनके सम्मान दावत का आयोजन किया गयाथा और अनेक उपहार दिए गए थे. अपने देश लौटने की पूर्व संध्या पर एक अमीर व्यक्ति ने पूछा कि वह कैसे अपने राजाकी फारस के राजा से तुलना करेंगे?

बीरबल ने कहा, “आपके राजा पूर्णिमा के चांद जैसे हैं. हालांकि हमारे राजा दूज के चंद्रमा के समान हैं.”

यह सुन फारसी बहुत खुश थे, लेकिन जब बीरबल घर गए, तो उन्होंने पाया कि सम्राट अकबर बहुत गुस्से में थे.

अकबर ने गुस्से में कहातुम अपने राजा को कैसे कमजोर बता सकते हो.”  तुम एक गद्दार हो !” बीरबल ने कहा, “नहीं, महाराज मैंने आपको कमज़ोर नहीं बताया है.

दरसल, पूर्णिमा का चांद कम हो जाता है और गायब हो जाता है, जबकि दूज के चांद में शक्ति बढ़ती है.

मैं वास्तव में दुनिया को बताता हूं कि दिन प्रतिदिन आपकी शक्ति बढ़ रही है, जबकि फारस के राजा का पतन हो रहा है.”

अकबर ने बीरबल की बुद्धिमत्ता का फिर लोहा माना. उनकी बात का असली अर्थ समझकर संतोष व्यक्त किया औरबीरबल का गर्मजोशी से स्वागत किया.

सीख: शब्दों से खेलकर कैसे गूढ़ अर्थ में अपनी बात भी कही जा सकती है और समानेवाले को नाराज़ भी नहीं किया गयायह कला सीखना ज़रूरी है.

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अकबर-बीरबल की कहानी: सोने के सिक्के (Akbar-Birbal Tale: Gold Coins)

बीरबल की तेज़ बुद्धि के जितने अकबर कायल थे, उतना ही उनसे ईर्ष्या रखनेवाले लोग भी थे. इसी कड़ी में थे अकबर के एक रिश्तेदार भी. उनको बीरबल से बहुत ईर्ष्या थी, उन्होंने एक बार बादशाह अकबर से कहा- क्यों न बीरबल को हटाकर उसकी जगह मुझे नियुक्त किया जाए, क्योंकि मैं बीरबल की तुलना में अधिक सक्षम हूं.

इससे पहले कि बादशाह फैसला ले पाते, बीरबल को इस बात की भनक पड़ गई. बीरबल ने तुरंत ही इस्तीफा दे दिया और बादशाह अकबर के रिश्तेदार को बीरबल की जगह नियुक्त कर दिया गया.

बादशाह ने नए मंत्री परीक्षा लेनी चाही. बादशाह ने उसे 300 सोने के सिक्के दिए और कहा- इन सिक्कों को इस तरह खर्च करो कि 100 सिक्के मुझे इस जीवन में ही मिलें, 100 सिक्के दूसरी दुनिया में मिलें और आखिरी 100 सिक्के न यहां मिलें और न वहां मिलें.

बादशाह की इस पहेली ने मंत्री को असमंजस की स्थिति में डाल दिया. उसकी रातों की नींद हराम हो गई. यह देख मंत्री की पत्नी ने कहा आप परेशान क्यों हैं? मंत्री ने राजा की पहेली वाली बात बताई और कहा कि उनकी इस पहेली ने दुविधा में फंसा दिया है.

मंत्री की पत्नी ने उनको सुझाव दिया कि क्यों न बीरबल से सलाह ली जाए. पत्नी की बात सुनकर वह बीरबल के पास पहुंच गया. बीरबल ने सारा किस्सा सुना तो कहा कि तुम मुझे यह सोने के सिक्के दे दो, बाकी मैं सब संभाल लूंगा.

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बीरबल सोने के सिक्कों से भरी थैली लेकर शहर की गलियों में घूमने लगे. वहां उनकी नज़र एक अमीर व्यापारी पर पड़ी,ल जो अपने बेटे की शादी का जश्‍न मना रहा था. बीरबल ने 100 सोने के सिक्के निकालकर उस व्यापारी को दे दिए और कहा- बादशाह अकबर ने तुम्हारे बेटे की शादी की शुभकामनाएं और आशीर्वाद स्वरूप यह 100 सोने के सिक्के भेंट दिए हैं.

यह सुनकर व्यापारी को बड़ा ही गर्व महसूस हुआ कि राजा ने इतना महंगा उपहार उन्हें दिया है. उस व्यापारी ने बीरबल को सम्मानित किया और उन्हें राजा के लिए उपहार स्वरूप बड़ी संख्या में महंगे उपहार और सोने के सिक्कों से भरा हुआ थैला थमा दिया.

अगले दिन बीरबल शहर के ऐसे क्षेत्र में गए जहां गरीब लोग रहते थे. उन्होंने 100 सोने के सिक्कों से भोजन और कपड़े खरीदे और उन्हें बादशाह अकबर के नाम पर गरीबों में बांट दिया.

जब बीरबल वापस आए, तो उन्होंने संगीत और नृत्य का एक कार्यक्रम आयोजित किया जहां उन्होंने 100 सोने के सिक्के खर्च कर दिए.

अगले दिन बीरबल बादशाह अकबर के दरबार में पहुंचे और घोषणा कर दी कि उसने वह काम किया है जो उनके दामाद नहीं कर पाए. अकबर यह जानना चाहते थे कि बीरबल ने यह सब कैसे किया.

बीरबल ने सिलसिलेवार पूरी बात व घटना बताई और कहा कि जो धन मैंने व्यापारी को उसके बेटे की शादी में दिया था वह वापस आप तक पहुंच गया और जो धन मैंने गरीबों में बांटा, वह धन आपको दूसरी दुनिया में जाकर मिलेगा और जो धन मैंने नृत्य और संगीत में खर्च कर दिया, वह आपको ना यहां मिलेगा और न वहां मिलेगा.

यह सुनकर अकबर के दामाद को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और बीरबल को अपना स्थान वापस मिल गया.

सीख: नेक कार्य व दान में खर्च किया गया धन ईश्‍वर के आशीर्वाद में परिवर्तित हो जाता है और उसका फल हमें ज़रूर मिलता है, जबकि ऐशो-आराम या गलत उद्देश्यों कार्यों में खर्च हुआ पैसा किसी काम का नहीं होता.

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पंचतंत्र की कहानी: जब शेर जी उठा… (Panchtantra Story: The Lion That Sprang To Life)

एक नगर में चार दोस्त रहते थे. उनमें से तीन बड़े वैज्ञानिक थे, किन्तु बुद्धिरहित थे, जबकि चौथा वैज्ञानिक नहीं था, पर वह बहुत समझदार और बुद्धिमान था. चारों ने सोचा कि उनकी विद्या का लाभ तभी मिल सकता है, जब वे देश-विदेश में जाकर धन संग्रह करें. यही सोचकर वे यात्रा पर निकल पड़े.

कुछ दूर जाकर उनमें से सबसे बड़े ने कहा- हम चारों में एक विद्या-शून्य है, वह स़िर्फ बुद्धिमान है, पर हमारी तरह वैज्ञानिक नहीं. धनोपार्जन के लिये विद्या आवश्यक है. हम अपनी विद्या के चमत्कार से लोगों को प्रभावित कर सकते हैं, इसलिए हम अपने धन का कोई भी भाग इस विद्याहीन को नहीं देंगे. वह चाहे तो घर वापिस जा सकता है.

दूसरे ने भी इस बात का समर्थन किया, किन्तु, तीसरे ने कहा- नहीं, यह बात उचित नहीं है. बचपन से ही हम एक-दूसरे के सुख-दुःख के सहभागी रहे हैं. हम जो भी धन कमायेंगे, उसमें इसका हिस्सा रहेगा. अपने-पराये की गणना छोटे दिल वालों का काम है. हमें उदारता दिखलानी चाहिये.

उसकी बात मानकर चारों आगे चल पड़े. थोड़ी दूर जाकर उन्हें जंगल में एक शेर का मृत-शरीर मिला. उसके अंग-प्रत्यंग बिखरे हुए थे. तीनों वैज्ञानिकों ने कहा- क्यों न हम अपनी शिक्षा की परीक्षा करें. विज्ञान के प्रभाव से हम इस मृत-शरीर में नया जीवन डाल सकते हैं. यह कह कर तीनों उसकी हड्डियां बटोरने और बिखरे हुए अंगों को मिलाने में लग गये. एक ने अस्थियां इकट्ठी कीं, दूसरे ने चमड़ी, मांस आदि, तो तीसरे ने प्राणों के संचार की प्रक्रिया शुरू की.

इतने में चौथे मित्र ने उन्हें सावधान करते हुए कहा- तुम लोग अपनी विद्या के प्रभाव से शेर को जीवित कर रहे हो, इसलिए सोच लो. वह जीवित होते ही तुम्हें मारकर खा जायेगा.

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वैज्ञानिक मित्रों ने उसकी बात को अनसुना कर दिया. तब वह बुद्धिमान बोला- यदि तुम्हें अपनी विद्या का चमत्कार दिखलाना ही है तो दिखलाओ, लेकिन एक क्षण ठहर जाओ, मैं वृक्ष पर चढ़ जाऊं… यह कहकर वह पेड़ पर चढ़ गया.

इतने में तीनों वैज्ञानिकों ने शेर को जीवित कर दिया. जीवित होते ही शेर ने तीनों पर हमला कर दिया और तीनों मारे गये.

सीख: केवल शास्त्रों में कुशल होना ही पर्याप्त नहीं है, लोक-व्यवहार को समझने की बुद्धि भी होनी चाहिये. मात्र विद्या या ज्ञान की ज़रूरी नहीं, सामान्य ज्ञान व बुद्धि भी आवश्यक है, वरना विद्वान भी मूर्ख ही साबित होता है.

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Kids Story: अमरूद किसका? (Amrood Kiska?)

कुछ बच्चे पार्क में खेल रहे थे. उनमें से दो दोस्त भी थे. खेलते-खेलते उन्हें दूर एक अमरूद का पेड़ नज़र आया. दोनों उस पेड़ के पास गए, तो देखा एक अमरूद लगा हुआ है. दोनों ने सोचा क्यों न इसको तोड़कर खाया जाए. पर दोनों के मन में एक सवाल था कि ये अमरूद कौन खाएगा. ख़ैर दोनों ने मिलकर अमरूद तोड़ लिया.

अब उनमें झगड़ा होने लगा, एक ने कहा कि मैंने यह पेड़ पहले देखा, तो यह अमरूद मेरा, दूसरे का कहना था कि इस अमरूद को मैंने पहले देखा, तो यह मेरा.

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दोनों का झगड़ा इतना बढ़ गया कि बाकी के बच्चे भी वहां आ गए. सबने पूछा कि क्यों लड़ रहे हो, तो उन्होंने बताया. उन बच्चों में से एक लड़के ने कह कि मैं तुम्हारे झगड़े का निपटारा कर सकता हूं. यह अमरूद मुझे दिखाओ.

 

उन दोनों ने उसे अमरूद दे दिया. वो लड़के मज़े से अमरूद खाने लगा और देखते ही देखते पूरा अमरूद खा गया. बाद में बोला, वाह अमरूद सच में बहुत ही मीठा था और हंसते हुए वहां से चला गया.

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दोनों दोस्त देखते रह गए और फिर सोचने लगे कि काश, झगड़ा करने की बजाय यह अमरूद दोनों ने आधा-आधा बांट लिया होता, तो आज कोई और इसे नहीं हथिया सकता था.

सीख: इस कहानी से यही सीख मिलती है कि कभी भी छोटी-छोटी बात पर आपस में झगड़ा नहीं करना चाहिए, वरना दूसरे इसका फ़ायदा उठा लेते हैं. जो भी हो आपस में मिल-बांटकर ही फैसला करना चाहिए.

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