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पंचतंत्र की कहानी: दो दोस्त और बोलनेवाला पेड़ (Panchtantra Story: Two Friends And A Talking Tree)

 

Panchtantra Story

दो दोस्त और बोलनेवाला पेड़ (Panchtantra Story: Two Friends And A Talking Tree)

एक गांव में मनोहर और धर्मचंद नाम के दो दोस्त रहते थे. एक बार वे कमाने के लिए अपना गांव छोड़कर बाहर गए. दूसरे शहर से वो दोनों ख़ूब सारा धन कमाकर लाए. उन्होंने सोचा कि इतना सारा धन घर में रखेंगे, तो ख़तरा हो सकता है. बेहतर होगा कि इसे घर में न रखकर कहीं और रख दें, इसलिए उन्होंने उस धन को नीम के पेड़ की जड़ में गड्ढा खोदकर दबा दिया.

दोनों में यह भी समझौता हुआ कि जब भी धन निकालना होगा, साथ-साथ आकर निकाल लेंगे. मनोहर बेहद भोला और नेक दिल इंसान था, जबकि धर्मचंद बेईमान था. वह दूसरे दिन चुपके से आकर धन निकालकर ले गया, उसके बाद वह मनोहर के पास आया और बोला कि चलो कुछ धन निकाल लाते हैं. दोनों मित्र पेड़ के पास आए, तो देखा कि धन गायब है.

Two Friends And A Talking Tree Story

धर्मचंद ने फौरन मनोहर पर इल्ज़ाम लगा दिया कि धन तुमने ही चुराया है. दोनों मे झगड़ा होने लगा. बात राजा तक पहुंची, तो राजा ने कहा कि कल नीम की गवाही के बाद ही कोई फैसला लिया जाएगा. ईमानदार मनोहर ने सोचा कि ठीक है नीम भला झूठ क्यों बोलेगा?
धर्मचंद भी ख़ुशी-ख़ुशी मान गया. दूसरे दिन राजा उन दोनों के साथ जंगल में गया. उनके गांव के अन्य लोग भी थे. सभी सच जानना चाहते थे. राजा ने नीम से पूछा- हे नीमदेव बताओ धन किसने लिया है?

मनोहर ने… नीम की जड़ से आवाज़ आई.

यह सुनते ही मनोहर रो पड़ा और बोला- महाराज, पेड़ झूठ नहीं बोल सकता, इसमें ज़रूर किसी की कोई चाल है. कुछ धोखा है.
राजा ने पूछा कैसी चाल?

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मैं अभी सिद्ध करता हूं महाराज. यह कहकर मनोहर ने कुछ लकड़ियां इकट्ठी करके पेड़ के तने के पास रखी और फिर उनमें आग लगा दी.
तभी पेड़ से बचाओ-बचाओ की आवाज़ आने लगी. राजा ने तुरंत सिपाहियों को आदेश दिया कि जो भी हो उसे बाहर निकालो. सिपाहियों ने फौरन पेड़ के खोल में बैठे आदमी को बाहर निकाल लिया. उसे देखते ही सब चौंक पड़े, क्योंकि वह धर्मचंद का पिता था. अब राजा सारा माजरा समझ गया.

Two Friends And A Talking Tree Hindi Story

उसने पिता-पुत्र को जेल में डलवा दिया और उसके घर से धन ज़ब्त करके मनोहर को दे दिया. साथ ही उसकी ईमानदारी सिद्ध होने पर और भी बहुत-सा ईनाम व धन दिया.

सीख: विपरीत परिस्थितियों में भी अपना आपा नहीं खोना चाहिए. अपनी समझ-बूझ से काम करना चाहिए. कठिन परिस्थितियों में भी डरने की बजाय उसका सामना करने की हिम्मत करें और शांत होकर अपने दिमाग से फैसले लें.

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पंचतंत्र की कहानी: खरगोश, तीतर और धूर्त बिल्ली (Panchtantra Story: The Hare, Partridge & Cunning Cat)

Panchtantra Story

पंचतंत्र की कहानी: खरगोश, तीतर और धूर्त बिल्ली (Panchtantra Story: The Hare, Partridge & Cunning Cat)

आज के हाईटेक युग में जब बच्चों को हर जानकारी कंप्यूटर/इंटरनेट पर ही मिल रही है, उनका पैरेंट्स से जुड़ाव कम हो रहा है. साथ ही उन्हें मोरल वैल्यूज़ (Moral Values) भी पता नहीं चल पाती, ऐसे में बेड टाइम स्टोरीज़ (Bed Time Stories) जैसे- पंचतंत्र (Panchtantra) की सीख देने वाली पॉप्युलर कहानियों के ज़रिए न स़िर्फ आपकी बच्चे से बॉन्डिंग स्ट्रॉन्ग होगी, बल्कि उन्हें अच्छी बातें भी पता चलती हैं.

एक नगर में बड़े से पेड़ पर एक तीतर का घोंसला था. वो बड़े मज़े से वहां रहता था. एक दिन वह अपना भोजन व दाना पानी ढूंढ़ने के चक्कर में दूसरी जगह किसी अच्छी फसलवाले खेत में पहुंच गया. वहां उसके खाने पीने की मौज हो गई. उस खुशी में वो उस दिन घर लैटना भी भूल गया और उसके बाद तो वो मज़े से वहीं रहने लगा. उसकी ज़िंदगी बहुत अच्छी कटने लगी.

यहां उसका घोसला खाली था, तो एक शाम को एक खरगोश उस पेड़ के पास आया. पेड़ ज़्यादा ऊंचा नहीं था. खरगोश ने उस घोसले में झांककर देखा तो पता चला कि यह घोसला खाली पड़ा है. खरगोश को वो बेहद पसंद आया और वो आराम से वहीं रहने लगा, क्योंकि वो घोसला काफ़ी बड़ा और आरामदायक था.

कुछ दिनों बाद वो तीतर भी नए गांव में खा-खाकर मोटा हो चुका था. अब उसे अपने घोसले की याद सताने लगी, तो उसने फैसला किया कि वो वापस लौट आएगा. आकर उसने देखा कि घोसले में तो खरगोश आराम से बैठा हुआ है. उसने ग़ुस्से से कहा, “चोर कहीं के, मैं नहीं था तो मेरे घर में घुस गए… निकलो मेरे घर से.”

खरगोश शान्ति से जवाब देने लगा, “ये तुम्हारा घर कैसे हुआ? यह तो मेरा घर है. तुम इसे छोड़कर चले गए थे और कुआं, तालाब या पेड़ एक बार छोड़कर कोई जाता है, तो अपना हक भी गवां देता है. अब ये घर मेरा है, मैंने इसे संवारा और आबाद किया.”
यह बात सुनकर तीतर कहने लगा, “हमें बहस करने से कुछ हासिल नहीं होने वाला, चलो किसी ज्ञानी पंडित के पास चलते हैं. वह जिसके हक में फैसला सुनायेगा उसे घर मिल जाएगा.”

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उस पेड़ के पास से एक नदी बहती थी. वहां एक बड़ी सी बिल्ली बैठी थी. वह कुछ धर्मपाठ करती नज़र आ रही थी. वैसे तो बिल्ली इन दोनों की जन्मजात शत्रु है, लेकिन वहां और कोई भी नहीं था, इसलिए उन दोनों ने उसके पास जाना और उससे न्याय लेना ही उचित समझा. सावधानी बरतते हुए बिल्ली के पास जाकर उन्होंने अपनी समस्या बताई, “हमने अपनी उलझन बता दी, अब आप ही इसका हल निकालो. जो भी सही होगा उसे वह घोसला मिल जाएगा और जो झूठा होगा उसे आप खा लेना.”

“अरे, यह कैसी बातें कर रहे हो, हिंसा जैसा पाप नहीं है कोई इस दुनिया में. दूसरों को मारनेवाला खुद नरक में जाता है. मैं तुम्हें न्याय देने में तो मदद करूंगी लेकिन झूठे को खाने की बात है तो वह मुझसे नहीं हो पाएगा. मैं एक बात तुम लोगों को कानों में कहना चाहती हूं, ज़रा मेरे करीब आओ तो.”

खरगोश और तीतर खुश हो गए कि अब फैसला होकर रहेगा और उसके बिलकुल करीब गए. बस फिर क्या था, करीब आए खरगोश को पंजे में पकड़कर मुंह से तीतर को भी उस चालाक बिल्ली बिल्ली ने नोंच लिया और दोनों का काम तमाम कर दिया.

सीख: अपने शत्रु को पहचानते हुए भी उस पर विश्‍वास करना बहुत बड़ी बेवक़फ़ी है. तीतर और खरगोश इसी विश्‍वास और बेवक़फ़ी के चलते को अपनी जान गवांनी पड़ी.

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पंचतंत्र की कहानी: तीन काम (Panchtantra Story:Three Tasks)

Panchtantra Story
पंचतंत्र की कहानी: तीन काम (Panchtantra Story:Three Tasks)

आज के हाईटेक युग में जब बच्चों को हर जानकारी कंप्यूटर/इंटरनेट पर ही मिल रही है, उनका पैरेंट्स से जुड़ाव कम हो रहा है. साथ ही उन्हें मोरल वैल्यूज़ (Moral Values) भी पता नहीं चल पाती, ऐसे में बेड टाइम स्टोरीज़ (Bed Time Stories) जैसे- पंचतंत्र (Panchtantra) की सीख देने वाली पॉप्युलर कहानियों के ज़रिए न स़िर्फ आपकी बच्चे से बॉन्डिंग स्ट्रॉन्ग होगी, बल्कि उन्हें अच्छी बातें भी पता चलती हैं.

एक बार दो गरीब दोस्त एक सेठ के पास काम मांगने जाते हैं. कंजूस सेठ उन्हें फ़ौरन काम पर रख लेता है और पूरे साल काम करने पर साल के अंत में दोनों को 12-12 स्वर्ण मुद्राएं देने का वचन देता है. साथ ही सेठ यह भी शर्त रखता है कि अगर उन्होंने काम ठीक से नहीं किया या किसी आदेश का पालन ठीक से नहीं किया, तो उस एक गलती के बदले 4 सुवर्ण मुद्राएं वो उनकी तनख्वाह से काट लेगा.

दोनों दोस्त सेठ की शर्त मान जाते हैं और पूरे साल कड़ी मेहनत करते हैं. दौड़-दौड़कर सारे काम करते और सेठ के हर आदेश का पालन करते. इस तरह पूरा साल बीत गया. दोनों सेठ के पास 12-12 स्वर्ण मुद्राएं मांगने जाते हैं, पर सेठ बोलता है कि अभी साल का आखरी दिन पूरा नहीं हुआ है और मुझे तुम दोनों से आज ही तीन और काम करवाने हैं. दोनों हैरान थे, पर क्या कर सकते थे. सेठ ने तीन काम बताने शुरू किए-

पहला काम: छोटी सुराही में बड़ी सुराही डालकर दिखाओ.
दूसरा काम: दुकान में पड़े गीले अनाज को बिना बाहर निकाले सुखाओ.
तीसरा काम: मेरे सर का सही-सही वज़न बताओ.
यह तो असंभव है… उन दोनों ने सेठ से कहा.

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सेठ की चालकी काम कर गई, उसने कहा कि ठीक है तो फिर यहां से चले जाओ. इन तीन कामों को ना कर पाने के कारण मैं हर एक काम के लिए 4 स्वर्ण मुद्राएं काट रहा हूं. मक्कार सेठ की इस धोखाधड़ी से उदास हो कर दोनों दोस्त बोझिल मन से जाने लगते हैं. उन्हें रास्ते में एक चतुर पंडित मिलता है. उनके ऐसे चेहरे देखकर पंडित उनसे उनकी उदासी का कारण पूछता है और पूरी बात समझने के बाद उन्हें वापस सेठ पास भेजता है.

दोनों सेठ के पास पहुंचकर बोलते हैं, सेठजी अभी आधा दिन बाकी है, हम आपके तीनों काम कर देते हैं.

सेठ हैरान था, पर सोचा कि उसका क्या बिगड़ेगा. वो तीनों दुकान में जाते हैं. दोनों दोस्त अपना काम शुरू कर देते हैं. वो बड़ी सुराही को तोड़-तोड़कर उसके टुकड़े कर देते हैं और उन्हें छोटी के अन्दर डाल देते हैं. सेठ मन मसोसकर रह जाता है, पर कुछ कर नहीं पाता है.

इसके बाद दोनों गीले अनाज को दुकान के अन्दर फैला देते हैं, तो सेठ बोल पड़ता है कि स़िर्फ फैलाने से ये कैसे सूखेगा? इसके लिए तो धूप और हवा चाहिए, सेठ मुस्कुराते हुए कहता है.

देखते जाइए, ऐसा कहते हुए दोनों मित्र हथौड़ा उठा आगे बढ़ जाते हैं और दुकान की दीवार और छत तोड़ डालते हैं, जिससे वहां हवा और धूप दोनों आने लगती है.

क्रोधित मित्रों को सेठ और उसके आदमी देखते रह जाते हैं, पर किसी की भी उन्हें रोकने की हिम्मत नहीं होती.

अब आख़िरी काम बचा होता है, दोनों मित्र तलवार लेकर सेठ के सामने खड़े हो जाते हैं और कहते हैं, मालिक आपके सिर का सही-सही वज़न तौलने के लिए इसे धड़ से अलग करना होगा. कृपया बिना हिले स्थिर खड़े रहें.

अब सेठ को समझ आ जाता है कि वह ग़रीबों का हक इस तरह से नहीं मार सकता और बिना आनाकानी के वह उन दोनों को 12-12 स्वर्ण मुद्राएं सौंप देता है.

सीख: बेईमानी का फल हमेशा बुरा ही होता है.

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तेनालीरामा की कहानी: रसगुुल्ले की जड़ (Tenali Rama Story: Root Of Rassagulla)

Tenali Rama Story, Root Of Rassagulla
Tenali Rama Story, Root Of Rassagulla
तेनालीरामा की कहानी: रसगुुल्ले की जड़ (Tenali Rama Story: Root Of Rassagulla)

बच्चों को हमेशा से ही प्रेरणादायक कहानियां (Motivational Stories) घर के बड़े-बुज़ुर्ग सुनाते आए हैं, जिनमें प्रमुख होती हैं तेनालीरामा (TenaliRama), पंचतंत्र (Panchtantra Talses) की कहानियां, फेयरी टेल्स (Fairy Tales), ऐसी किड्स स्टोरी (Kids Story) उन्हें सही-सच्ची सीख (Motivation-Inspiration) देती है और जीवन में सही दिशा भी.

एक बार मध्य पूर्वी देश से एक व्यापारी महाराज कृष्णदेव राय का अतिथि बनकर आया. महाराज ने उसके स्वागत में कोई कसर नहीं छोड़ी, क्योंकि अपने अतिथि का सत्कार वो हमेशा ही बड़े भव्य तरीके से करते हैं.

एक दिन भोजन पर महाराज का रसोइया व्यापारी के लिए स्वदिष्ट रसगुल्ले बनाकर लता है. व्यापारी कहता है कि उसे रसगुल्ले नहीं खाने हैं, पर हो सके तो उन्हें इस बात की जानकारी ज़रूर दी जाए कि दरअसल रसगुल्ले की जड़ क्या है?

रसोइया बेचारा सोच में पड़ जाता है और महाराज कृष्णदेव राय के पास जाकर उस व्यापारी की मांग बताता है. महाराज रसगुल्ले की जड़ पकड़ने के लिए चतुर तेनालीराम को बुलाते हैं, क्योंकि उन्हें भी पता है कि तेनालीरामा के पास हर सवाल का जवाब होता है.
तेनालीराम रसगुल्ले की जड़ खोजने की चुनौती का प्रस्ताव स्वीकार कर लेते हैं. वह एक खाली कटोरे और धारदार छुरी की मांग करते हैं और महाराज से एक दिन का समय मांगते हैं.

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Tenali Rama Story, Root Of Rassagulla

अगले दिन रसगुल्ले की जड़ से भरे कटोरे को मलमल के कपड़े से ढककर दरबार में बैठे व्यापारी को देते हैं और उसे कपड़ा हटाकर रसगुल्ले की जड़ देखने को कहते हैं. व्यापारी जैसे ही कपड़ा हटाता है, तो कटोरे में गन्ने के टुकड़े देखकर हैरान हो जाता है और सारे दरबारी तथा महाराज कृष्णदेव राय, तेनालीराम से पूछते हैं कि यह सब क्या है?

तेनालीराम समझाते हैं कि हर मिठाई शक्कर से बनती है और शक्कर का स्रोत गन्ना होता है, इसलिए रसगुल्ले की जड़ गन्ना है. तेनालीराम के इस गणित से सारे दरबारी, व्यापारी और महाराज भी बेहद प्रभावित हो जाते हैं. तेनालीराम के तर्क से सहमत भी होते हैं और सभी हंस पड़ते हैं.

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पंचतंत्र की कहानी: वंश की रक्षा (Panchtantra Ki Kahani: Frogs That Rode A Snake)

Panchtantra Ki Kahani

आज के हाईटेक युग में जब बच्चों को हर जानकारी कंप्यूटर/इंटरनेट पर ही मिल रही है, उनका पैरेंट्स से जुड़ाव कम हो रहा है. साथ ही उन्हें मोरल वैल्यूज़ (Moral Values) भी पता नहीं चल पाती, ऐसे में बेड टाइम स्टोरीज़ (Bed Time Stories) जैसे- पंचतंत्र (Panchtantra) की सीख देने वाली पॉप्युलर कहानियों के ज़रिए न स़िर्फ आपकी बच्चे से बॉन्डिंग स्ट्रॉन्ग होगी, बल्कि उन्हें अच्छी बातें भी पता चलती हैं.

Panchtantra Ki Kahani

पंचतंत्र की कहानी: वंश की रक्षा (Panchtantra Ki Kahani: Frogs That Rode A Snake)

एक पर्वत प्रदेश में मन्दविष नाम का एक बूढ़ा सांप रहता था. एक दिन वह विचार करने लगा कि ऐसा क्या उपाय हो सकता है, जिससे बिना परिश्रम किए ही उसकी आजीविका चलती रहे. उसने बहुत सोचा और उसके मन में एक विचार आया.
वह पास के मेंढकों से भरे तालाब के पास चला गया. वहां पहुंचकर वह बड़ी बेचैनी से इधर-उधर घूमने लगा. उसे घूमते देखकर तालाब के किनारे एक पत्थर पर बैठे मेंढक को आश्‍चर्य हुआ तो उसने पूछा, “आज क्या बात है मामा? शाम हो गई है, पर तुम भोजन-पानी की व्यवस्था नहीं कर रहे हो?”

Panchtantra Ki Kahani
सांप बड़े दुखी मन से कहने लगा, “क्या करूं बेटा, अब मैं बूढ़ा हो चला हूं. मुझे तो अब भोजन की अभिलाषा ही नहीं रह गई है. आज सवेरे ही मैं भोजन की खोज में निकल पड़ा था. एक सरोवर के तट पर मैंने एक मेंढक को देखा. मैं उसको पकड़ने की सोच ही रहा था कि उसने मुझे देख लिया. पास ही कुछ ब्राह्मण तपस्या में लीन थे, वह उनके बीच जाकर कहीं छिप गया. उसको तो मैंने फिर देखा नहीं, पर उसके भ्रम में मैंने एक ब्राह्मण के पुत्र को काट लिया, जिससे उसकी तत्काल मृत्यु हो गई. उसके पिता को इसका बड़ा दुख हुआ और उस शोकाकुल पिता ने मुझे शाप देते हुए कहा, “दुष्ट सांप! तुमने मेरे पुत्र को बिना किसी अपराध के काटा है, अपने इस अपराध के कारण तुमको मेंढकों का वाहन बनना पड़ेगा.”

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मैं बस अपने पाप का प्रायश्‍चित करना चाहता हूं और तुम लोगों के वाहन बनने के उद्देश्य से ही मैं यहां तुम लोगों के पास आया हूं.
मेंढक सांप से यह बात सुनकर अपने परिजनों के पास गया और उनको भी उसने सांप की वह बात बता दी. इस तरह से यह बात सब मेढकों तक पहुंच गई.

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उनके राजा जलपाद को भी इसकी ख़बर लगी. उसको यह सुनकर बड़ा आश्‍चर्य हुआ. सबसे पहले वही सांप के पास जाकर उसके फन पर चढ़कर बैठ गया. उसे चढ़ा हुआ देखकर अन्य सभी मेंढक उसकी पीठ पर चढ़ गए. सांप ने किसी को कुछ नहीं कहा.

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मन्दविष ने उन्हें तरह-तरह के करतब दिखाए. सांप की कोमल त्वचा का स्पर्श पाकर जलपाद तो बहुत ही प्रसन्न हुआ. इस प्रकार एक दिन निकल गया.

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दूसरे दिन जब वह उनको बैठाकर चला, तो उससे चला नहीं गया.  उसको देखकर जलपाद ने पूछा, “क्या बात है, आज आप चल नहीं पा रहे हैं?”
“हां, मैं आज भूखा हूं और इस उम्र में कमज़ोरी भी बहुत हो जाती है, इसलिए चलने में कठिनाई हो रही है.”

जलपाद बोला, “अगर ऐसी बात है, तो आप परेशना न हों. आप आराम से साधारण कोटि के छोटे-मोटे मेंढकों को खा लिया कीजिए और अपनी भूख मिटा लिया कीजिए.”

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इस प्रकार वह सांप अब रोज़ बिना किसी परिश्रम के अपना भोजन करने लगा. किन्तु वह जलपाद यह भी नहीं समझ पाया कि अपने क्षणिक सुख के लिए वह अपने वंश का नाश करने का भागी बन रहा है. धीरे-धीरे सांप ने अपनी चालाकी से सभी मेंढकों को खा लिया और उसके बाद एक दिन जलपाद को भी खा गया. इस तरह मेंढकों का पूरा वंश ही नष्ट हो गया.

 

सीख: अपने हितैषियों की रक्षा करने से हमारी भी रक्षा होती है.

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Kids Story… उल्लू और बाज़ की कहानी: धोखा (The Story Of Owl And Falcon: Betrayal)

The Story Of Owl And Falcon, Betrayal

The Story Of Owl And Falcon, Betrayal

Kids Story… उल्लू और बाज़ की कहानी: धोखा (The Story Of Owl And Falcon: Betrayal)

एक बार उल्लू और बाज़ में दोस्ती हो जाती है. दोनों साथ बैठकर ख़ूब बातें करते. बाज़ ने उल्लू से कहा कि अब जब हम दोस्त बन ही गए हैं, तो मैं तुम्हारे बच्चों पर कभी हमला नहीं करूंगा और न ही उन्हें मारकर खाऊंगा. लेकिन मेरी समस्या यह है कि मैं उन्हें पहचानूंगा कैसे कि ये तुम्हारे ही बच्चे हैं?

उल्लू ने कहा कि तुम्हारा बहुत-बहुत शक्रिया दोस्त. मेरे बच्चों को पहचानना कौन-सा मुश्किल है भला. वो बेहद ख़ूबसूरत हैं, उनके सुनहरे पंख हैं और उनकी आवाज़ एकदम मीठी-मधुर है.

बाज़ ने कहा ठीक है दोस्त, मैं अब चला अपने लिए भोजन ढूंढ़ने. बाज़ उड़ते हुए एक पेड़ के पास गया. वहां उसने एक घोसले में चार बच्चे देखे. उनका रंग काला था, वो ज़ोर-ज़ोर से कर्कश आवाज़ में चिल्ला रहे थे. बाज़ ने सोचा न तो इनका रंग सुनहरा, न पंख, न ही आवाज़ मीठी-मधुर, तो ये मेरे दोस्त उल्लू के बच्चे तो हो ही नहीं सकते. मैं इन्हें खा लेता हूं. बाज़ ने उन बच्चों को खा लिया.

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इतने में ही उल्लू उड़ते हुए वहां पहुंचा और उसने कहा कि ये क्या किया, ये तो मेरे बच्चे थे. बाज़ हैरान था कि उल्लू ने उससे झूठ बोलकर उसकी दोस्ती को भी धोखा दिया. वो वहां से चला गया.

उल्लू मातम मना रहा था कि तभी एक कौआ आया और उसने कहा कि अब रोने से क्या फ़ायदा, तुमने बाज़ से झूठ बोला, अपनी असली पहचान छिपाई और इसी की तुम्हें सज़ा मिली.

सीख: कभी भी अपनी असली पहचान छिपाने की भूल नहीं करनी चाहिए. न ही दोस्तों को धोखा देने की कोशिश करनी चाहिए.

विक्रम-बेताल की कहानी- पति कौन? (Vikram-Baital Story- The Groom)

Vikram-Baital Story, The Groom

Vikram-Baital Story, The Groom

विक्रम-बेताल की कहानी- पति कौन? (Vikram-Baital Story- The Groom)

बहुत समय पहले की बात है, धर्मस्थल नाम का एक नगर था, वहां एक विद्वान ब्राह्मण अपने परिवार के साथ रहता था. उसकी एक पुत्री थी, जो बेहद ख़ूबसूरत और रूपवती थी. जब उसकी शादी की उम्र हुई, तो उसके माता, पिता और भाई उसकी शादी के बारे में सोचने लगे.
एक दिन जब ब्राह्मण अपने किसी यजमान की बारात में गया था और भाई पढ़ने गया था, तभी उनके घर में एक ब्राह्मण का लड़का आया. लड़की की मां ने उसके रूप और गुणों को देखकर उससे कहा कि मैं तुमसे अपनी बेटी की शादी करूंगी.

दूसरी तरफ़ उधर ब्राह्मण पिता को भी एक दूसरा लड़का मिल गया और उसने भी उस लड़के को बेटी की शादी का वचन दे दिया. अब ब्राह्मण का लड़का जहां पढ़ने गया था, वहां वह भी एक लड़के से यही वादा कर आया.

कुछ समय बाद बाप-बेटे घर लौटे, तो देखता कि वहां एक तीसरा लड़का और मौजूद है. दो उनके साथ आये थे. अब सब दुविधा में पड़ गए कि क्या किया जाए?

इतने में ही उनकी बेटी को सांप ने काट लिया और वह मर गई. उसके पिता, भाई और तीनों लड़कों ने बड़ी भागदौड़ की, ज़हर झाड़नेवालों को बुलाया, पर सब बेकार साबित हुआ.

अंत में दुखी होकर वे उस लड़की को श्मशान ले गये और क्रिया-कर्म कर आये. तीनों लड़कों में से एक ने तो उसकी हड्डियां चुन लीं और फकीर बनकर जंगल में चला गया. दूसरे ने राख की गठरी बांधी और वहीं झोपड़ी डालकर रहने लगा. तीसरा योगी होकर देश-देश घूमने लगा.

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एक दिन की बात है, वह तीसरा लड़का घूमते-घूमते किसी नगर में पहुंचा और एक तांत्रिक के घर वो रहने लगा. एक दिन वो तांत्रिक अपनी साधना में मग्न था कि उसका बेटा आकर वहां खेलने लगा, जिससे उसे विघ्न महसूस होने लगा. तांत्रिक को बहुत गुस्सा आया. उसने अपने बेटे को झिड़का, मारा-पीटा, फिर भी वह न माना तो ब्राह्मणी ने उसे उठाकर जलते हवन कुंड में पटक दिया.

लड़का जलकर राख हो गया. ब्राह्मण क्रोधित हो उठा, उसने घरवालों से कहा, जिस घर में ऐसे कठोर दिलवाले राक्षसी लोग हों, वहां मैं अब नहीं रह सकता. इतना सुनकर वह तांत्रिक भीतर गया और विद्या की पोथी लाकर एक मंत्र पढ़ा. जलकर राख हो चुका लड़का फिर से जीवित हो गया.

यह देखकर ब्राह्मण ने उससे पूछा कि यह कैसे किया, तो तांत्रिक ने कहा विद्या से. ब्राहम्ण सोचने लगा कि अगर यह पोथी मेरे हाथ पड़ जाए, तो मैं भी उस लड़की को फिर से जीवित कर सकता हूं. इसके बाद उसने भोजन किया और वहीं ठहर गया. जब रात को सब खा-पीकर सो गए, तो वह ब्राह्मण चुपचाप वह पोथी लेकर चल दिया. जिस स्थान पर उस लड़की को जलाया गया था, वहां जाकर उसने देखा कि दूसरे लड़के वहां बैठे बातें कर रहे हैं.

इस ब्राह्मण के यह कहने पर कि उसे संजीवनी विद्या की पोथी मिल गई है और वह मन्त्र पढ़कर लड़की को ज़िंदा सकता है, उन दोनों ने हड्डियां और राख निकाली. ब्राह्मण ने जैसे ही मंत्र पढ़ा, वह लड़की जी उठी. अब तीनों उसके पीछे आपस में झगड़ने लगे कि लड़की से शादी मैं करूंगा.

इतना कहकर बेताल बोला, राजा, बताओ कि वह लड़की किसकी पत्नी बननी चाहिए? अगर तुमने मुंह नहीं खोला, तो तुम्हारी मौत निश्‍चित है.

राजा ने जवाब दिया, जो वहां कुटिया बनाकर रहा, उसकी.

बेताल ने पूछा, क्यों?

राजा बोला, जिसने हड्डियां रखीं, वह तो उसके बेटे के बराबर हुआ, जिसने विद्या सीखकर जीवन-दान दिया, वह बाप के बराबर हुआ. जो राख लेकर रमा रहा, वही उसकी हक़दार है.

राजा का यह जवाब सुनकर बेताल बोला कि राजन तुम बहुत ही चतुर हो, मानना पड़ेगा, लेकिन तुमने अपना मुंह खोला, तो मैं चल पड़ा. बेताल फिर पेड़ पर जा लटका. राजा को फिर लौटना पड़ा.

तेनालीरामा की कहानी: अरबी घोड़े (Tenali Rama Story: The Arab Horse Trader)

Tenali Rama Story, The Arab Horse Trader

Tenali Rama Story, The Arab Horse Trader

तेनालीरामा की कहानी: अरबी घोड़े (Tenali Rama Story: The Arab Horse Trader)

एक अरब प्रदेश का व्यापारी महाराज कृष्णदेव राय के दरबार में घोड़े बेचने आता है. वह अपने घोड़ों की खूब तारीफ़ करता है, जिससे प्रभावित होकर महाराज कृष्णदेव राय उसके सारे घोड़े खरीद लेते हैं. इतने घोड़ों को खरीदने के बाद एक समस्या यह खड़ी हो जाती है कि इन्हें रखा कहां जाये? क्योंकि महाराज के घुड़साल में इतने अधिक घोड़े रखने की जगह नहीं बचती. महाराज को एक उपाय सूझता है वो घोड़ों को विजयनगर के नागरिकों और राजदरबार के कुछ लोगों को तीन महीने तक देखभाल के लिए दे देते हैं. घोड़ों की देखभाल करनेवालों को घोड़ों के पालन खर्च और प्रशिक्षण के लिए प्रति माह एक सोने का सिक्का दिया जाता है.

इसी क्रम में तेनालीराम को भी एक घोडा दिया गया. तेनालीराम ने घोड़े को घर लेजा कर घर के पिछवाड़े एक छोटी सी घुड़साल बना कर बांध दिया और घुड़साल की खिड़की से उसे थोड़ी मात्रा में चारा खिलाने लगे.

बाकी लोग भी महाराज की सौंपी गयी ज़िम्मेदारी को निभाने लगे. महाराज क्रोधित हो कोई दंड ना दे दें, इस भय से सभी लोग अपना पेट काट-काट कर भी घोड़े को उत्तम चारा खिलाने लगे.

घोड़ों की देखभाल करते-करते तीन महीने बीत गए थे और तय दिन सभी लोग घोड़े लेकर महाराज के सामने आ जाते हैं, पर तेनालीराम बिना घोड़े के ही खाली हाथ आते हैं. तेनालीराम से घोड़ा ना लाने की वजह पूछी जाती है तो वो कहते हैं कि घोड़ा काफी बिगडैल और खतरनाक हो चुका है, इसलिए उसके पास जाना भी मुमकिन नहीं. राजगुरु , महाराज से कहते हैं के तेनालीराम झूठ बोल रहे है. महाराज सच्चाई का पता लगाने के लिए तेनालीराम के साथ राजगुरु को भेजते हैं.

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Tenali Rama Story, The Arab Horse Trader

तेनालीराम राजगुरु की साथ ले जाते हैं. राजगुरु तेनालीराम के घर के पीछे बनी उस घुड़साल को देख गुस्से में कहते हैं कि मूर्ख! तुम इस छोटी कुटिया को घुड़साल कहते हो? तेनालीराम शांति से मुस्कुराते हुए जवाब देते हैं कि राजगुरु आप मुझे क्षमा करें, मैं अज्ञानी हूं, लेकिन घुड़साल में अंदर जाने से पहले सावधानीपूर्वक पहले खिड़की से देख लें.

राजगुरु जैसे ही खिड़की से भीतर झांकते हैं तो घोडा लपक कर उनकी दाढ़ी पकड़ लेता है। काफी मशक्कत के बाद भी भूखा घोड़ा राजगुरु की दाढ़ी नहीं छोड़ता है. लोग जमा होने लगते हैं. अंत में कुटिया तोड़ कर तेज हथियार से राजगुरु की दाढ़ी काट कर घोड़े के चंगुल से छुड़ाया जाता है. आखिरकार किसी तरह से राजगुरु और तेनालीराम भूखे घोड़े को ले कर राजा के पास पहुंचते हैं.

घोड़े की दुबली-पतली हालत देखकर महाराज तेनालीराम से इसका कारण पूछते हैं। तेनालीराम कहते है कि मैं घोड़े को रोजाना बस थोड़ा सा चारा ही देता था, इसी वजह से घोडा इतना दुबला हो गया और गुस्सैल भी, क्योंकि उसकी ज़रुरत की आपूर्ति नहीं हो रही थी. राजा तेनाली इसकी वजह पूछते हैं तो वो कहते हैं कि क्षमा करें महाराज, लेकिन आपकी गरीब प्रजा परिवार का पालन जैसे तैसे कर रही थी, इसके बाद उसे घोड़े को संभालने की अतिरिक्त जिम्मेदारी दे दी गई, जिस वजह से वो भी भूखे घोड़े की तरह परेशान और त्रस्त हो गई है.

राजा का कर्तव्य प्रजा की रक्षा करना होता है, उन पर अधिक बोझ डालना नहीं. आपके आदेश से घोड़े तो बलवान हो गए पर आप की प्रजा दुर्बल हो गयी है. महाराज कृष्णदेव राय को अपनी ग़लती का एहसास होता है और तेनालीराम की बात समझ में आ जाती है, और वह तेनालीराम की प्रसंशा करते हुए उन्हे पुरस्कार देते है.

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पंचतंत्र की कहानी: मूर्ख ब्राह्मण और तीन ठग (Panchtantra Ki Kahani: The Brahmin & Three Crooks)

Panchtantra Ki Kahani, The Brahmin,Three Crooks

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किसी गांव में एक ब्राह्मण रहता था. एक दिन वो दावत में गया जहां उसे यजमान से एक बकरा मिली. वो ख़ुशी ख़ुशी उसको लेकर अपने घर जा रहा था. रास्ता लंबा और सुनसान था. आगे जाने पर रास्ते में उसको ठगों ने देखा और सोचा कि क्यों न इससे यह बकरा हथिया लिया जाये. तीनों ठगों ने ब्राह्मण के कंधे पर बकरे को देखकर उसे हथियाने की योजना बनाई.

जैसे ही ब्राह्मण आगे गया एक ठग ने ब्राह्मण को रोककर कहा, “अरे पंडित जी यह क्या अनर्थ कर रहे हैं? आप अपने कंधे पर क्या उठा कर ले जा रहे हैं? आप तो ब्राह्मण हैं और ब्राह्मण होकर कुत्ते को कंधों पर बैठा कर ले जा रहे हैं.”

ब्राह्मण ने क्रोधित होकर उसे झिड़कते हुए कहा, “पागल है क्या? या अंधा हो गया है? दिखाई नहीं देता यहकुत्ता नहीं बकरा है.”

पहले ठग ने फिर कहा, “खैर मेरा काम आपको बताना था. अगर आपको कुत्ता ही अपने कंधों पर ले जाना है तो मुझे क्या? आप जानें और आपका काम.”

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थोड़ी दूर चलने के बाद ब्राह्मण को दूसरा ठग मिला. उसने ब्राह्मण को रोका और कहा, “पंडित जी क्या हो गया है आपको? ब्राह्मण होकर मरी हुई बछिया को कंधे पर लादकर ले जा रहे हैं? उच्चकुल के लोगों को क्या यह शोभा देता है?”

पंडित उसे भी झिड़क कर आगे बढ़ गया. आगे जाने पर उसे तीसरा ठग मिला. उसने भी ब्राह्मण को टोका और कहा कि इस गधे को कंधे पर क्यों ले जा रहे हो? ब्राह्मण अब घबरा गया. उसको लगा कि ये ज़रूर कोई मायावी जीव है, जो बार बार रूप बदल रहा है, वरना इतने सारे लोग झूठ क्यों बोलेंगे?

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थोड़ी दूर जाकर, उसने बकरे को कंधे से उतार दिया और आगे बढ़ गया. इधर तीनों ठग ने उस बकरे को हथिया लिया और उस ब्राह्मण की मूर्खता पर उनको हंसी भी आई.

सीख: कहते हैं कि किसी झूठ को बार-बार बोलने से वह सच की तरह लगने लगता है, इसलिए अपने दिमाग से काम लें और अपने आप पर विश्वास करें.

बेताल पच्चीसी: विक्रम-बेताल की कहानी- दगड़ू के सपने (Baital Pachisi: Vikram-Baital Story- The Dreams Of Dagdu)

Baital Pachisi Vikram-Baital Story, The Dreams Of Dagdu

Baital Pachisi Vikram-Baital Story, The Dreams Of Dagdu

बेताल पच्चीसी: विक्रम-बेताल की कहानी- दगड़ू के सपने (Baital Pachisi: Vikram-Baital Story- The Dreams Of Dagdu)

राजा विक्रमादित्य एक आदर्श राजा थे. वो अपने साहस, पराक्रम और शौर्य के लिए जाने जाते थे. प्राचीन साहित्य बेताल पच्चीसी महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा 2500 वर्ष पूर्व रचित किया गया था और उसी के अनुसार, राजा विक्रम ने बेताल को पच्चीस बार पेड़ से उतार कर ले जाने की कोशिश की थी और बेताल ने हर बार रास्ते में एक नई कहानी राजा विक्रम को सुनाई थी.

कौन था बेताल और वो राजा को कहानी क्यों सुनाता था?
एक तांत्रिक अपनी असुरी शक्तियों को बढ़ाने के लिए बत्तीस लक्षणवाले ब्राह्मण पुत्र की बली देने का अनुष्ठान करता है. वह एक ब्राह्मण पुत्र को मारने के लिए उसके पीछे पड़ता है, लेकिन वह ब्राह्मण पुत्र भागकर जंगल में छिप जाता है. वहां उसे एक प्रेत मिलता है, जो ब्राह्मण पुत्र को उस तांत्रिक से बचने के लिए शक्तियां देता है और वहीं प्रेत रूप में पेड़ पर उल्टा लटक जाने को कहता है और यह भी कहता है कि जब तक वह उस पेड़ पर रहेगा, तब तक वह तांत्रिक उसे मार नहीं पाएगा. वही ब्राह्मण पुत्र बेताल होता है, जिसे पकड़ने के लिए वो तांत्रिक एक भिक्षुक योगी का स्वांग रचता है और राजा विक्रम से अपना काम निकलवा लेने का जाल बिछाता है. राजा विक्रम उस ब्राह्मण पुत्र यानी बेताल को खोज लेते हैं, क्योंकि वो बेहद पराक्रमी थे. हालांकि राजा उस तांत्रिक की असली मंशा और छल-कपट से अनजान थे, इसलिए वो उसका काम करने निकल पड़ते हैं.

राजा विक्रम बेताल को हर बार पेड़ से उतार लेते और उस भिक्षुक के पास ले जाने लगते. रास्ता लंबा होने की वजह से हर बार बेताल कहानी सुनाने लगता और यह शर्त रखता है कि कहानी सुनने के बाद वो राजा से प्रश्‍न करेगा, यदि राजा विक्रम ने उसके सवाल का सही उत्तर ना दिया, तो उसी व़क्त राजा विक्रम का सिर फट जाएगा और उनकी मौत हो जाएगी. और अगर राजा ने जवाब देने के लिए मुंह खोला, तो वह फिर से अपने पेड़ पर जा कर उल्टा लटक जाएगा.

बेताल कहानी सुनाना शुरू करता है…

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चंदनपुर गांव में एक बूढ़ी महिला अपने बेटे के साथ रहती थी. उसके बेटे का नाम दगड़ू था. वह स्त्री कपड़े सिलने का काम करके अपना गुज़ारा करती थी. दगड़ू बेहद आलसी किस्म का कामचोर लड़का था. वह दिन-रात सोता रहता और सपने देखा करता था. दगड़ू को अक्सर बुरे सपने ही आते थे और जब भी कोई बुरा सपना आता था, वह सपना हकीकत बन जाता था.

एक दिन दगड़ू को सपना आया कि कुछ लोग एक बारात को लूट रहे हैं. दगड़ू ने जिसे सपने में देखा होता है, वही दुल्हन बनने वाली लड़की अपनी शादी का लहंगा सिल जाने के बाद वापिस लेने दगड़ू की मां के पास आती है. दगड़ू फौरन उसे सपने वाली बात कह देता है. वह लड़की अपनी मां और ससुराल वालों को यह बताती है, पर सब लोग इसे वहम समझ कर अनसुना कर देते हैं.
शादी के बाद जब सपने वाली घटना घटित होती है और इस पूरी घटना में दगड़ू पर आरोप लगते हैं कि वही लुटेरों से मिला होगा वरना उसे कैसे पता चल सकता है कि ऐसा ही होगा. सब लोग दगड़ू की पिटाई कर डालते हैं.

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कुछ दिनों बाद दगड़ू को सपना आता है कि मोहल्ले में रह रही चौधरन का नया मकान गृहप्रवेश के दिन ही जल जाता है. अगले दिन जब चौधरन उस मकान को बनवाने की खुशी में लड्डू लेकर दगड़ू के घर आती है और गृहप्रवेश का न्योता देती है, तो दगड़ू सपने वाली बात कह देता है. चौधरन गुस्से में जली-कटी सुनाकर चल देती है.

गृहप्रवेश समारोह के दौरान कोई घटना ना हो इसके लिए पूरे इंतज़ाम किये जाते हैं, फिर भी दगड़ू के सपने की बात सच निकल जाती है. दगड़ू समझ नहीं पाता है कि लोगों को सच सुनकर उसी पर क्रोध क्यों आता है? इन सबसे तंग आकर दगड़ू एक दूसरे राज्य चला जाता है, वहां उसे रात महल की चौकीदारी का काम मिलता है.

वहां के राजा को अगले दिन किसी काम से अन्य प्रदेश सोनपुर जाना होता है, इसलिए वो रानी को कहते हैं कि उन्हें जल्दी उठा दिया जाए. इसी बीच आलसी दगड़ू रात में महल की चौकीदारी करते-करते सो जाता है और उसे सपना आता है कि सोनपुर में भूकंप आया है और वहां मौजूद सभी लोग मर गए. दगड़ू की नींद खुल जाती है.

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दगड़ू को जब पता चलता है कि राजा भी सोनपुर जा रहे हैं, तो वो उनका का रथ रुकवा कर अपने सपनेवाली बात बता देता है और राजा को सोनपुर जाने से रोक लेता है. अगले ही दिन समाचार आता है कि सोनपुर में भूकंप आने से वहां कोई भी जीवित नहीं बचा.
राजा तुरंत दगड़ू को दरबार में बुलाकर सोने का हार भेंट देते हैं, लेकिन साथ ही उसे उसी समय नौकरी से निकाल देते हैं.

इतनी कहानी सुनाकर बेताल रुक जाता है और राजा विक्रम से पूछता है कि हे राजन! बताओ राजा ने दगड़ू को पुरस्कार क्यों दिया? और पुरस्कार दिया, तो उसे काम से क्यों निकाला?

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बेताल कहता है कि तुरंत जवाब दो, वरना तुम्हारा सिर फट जाएगा… राजा विक्रम उत्तर देते हैं कि दगड़ू ने सपने की बात बताकर राजा की जान बचाई इसलिए उसे पुरस्कार में सोने का हार दिया, लेकिन इसके साथ ही दगड़ू काम के व़क्त सो गया, जबकि उसका काम चौकीदारी का था, इसलिए राजा ने उसे काम से निकाल दिया.

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राजा का उत्तर सुन बेताल बोला कि मानना पड़ेगा, तुम्हारी चतुराई का, लेकिन तुमने मुंह खोल दिया, तो अब मैं वापस जा रहा हूं. पकड़ सको, तो पकड़ लो. बेताल उड़कर वापस पेड़ पर लटक जाता है.

Fairy Tales: द लिटिल मरमेड… नन्हीं जलपरी (The Little Mermaid)

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द लिटिल मरमेड… नन्हीं जलपरी (The Little Mermaid)

बहुत गहरे समुद्र में समुद्री राजा का महल था. वो अपनी बेटियों और बूढ़ी मां के साथ वहां रहता था. राजा का महल बेहद ख़ूबसूरत था और वो अपनी बेटियों से बहुत प्यार करता था. सबसे ज़्यादा प्यार वो अपनी सबसे छोटी बेटी से करता था.

इस समुद्री राज्य का एक नियम था कि जो भी राजकुमारी 18 साल की हो जाती थी, उसे समंदर की सतह पर जाने का मौक़ा मिलता था. उससे पहले कोई भी राजकुमारी सतह पर नहीं जा सकती थी. राजा की पांचवीं बेटी की सालगिरह का मौक़ा था. सभी बहुत ख़ुश थे. राजकुमारी को सभी जन्मदिन की बधाई दे रहे थे. राजा ने ऐलान किया कि मरीना अब 18 साल की हो गई और उसे सतह पर जाने की इजाज़त दी जाती है, ताकि वो बाहरी की दुनिया, धूप व इंसानी दुनिया देख सके, उसका आनंद ले सके. राजा ने साथ ही मरीना को आगाह भी किया कि सागर की दुनिया इंसानी दुनिया से बहुत अलग होती है, इसलिए वो इंसानों के क़रीब न जाए और समय रहते अपनी दुनिया में लौट आए. यह सुन सबसे छोटी राजकुमारी इवा भी सतह पर जाने की ज़िद करने लगी, लेकिन राजा ने साफ़ इंकार कर दिया, क्योंकि वो 18 साल की नहीं हुई थी. इवा बहुत दुखी हुई, उसे बेसब्री से अपने 18वें जन्मदिन का इंतज़ार था. इवा बेहद ख़ूबसूरत थी और उसकी सबसे बड़ी ख़ासियत यह थी कि वो बेहद दयालू थी. समंदर के सभी जीवों से उसे प्यार थे. यही वजह थी कि वो सबकी फेवरेट थी.


इवा को इंसानों के बारे में जानने की बहुत उत्सुकता रहती थी. वो अक्सर अपनी दादी मां से उन्हीं के बारे में पूछती रहती थी. एक बार यूं ही उसने पूछा कि क्या इंसान हमारी तरह ही होते हैं या हमसे बेहतर होते हैं?

दादी में ने बताया कि उनके पैर होते हैं, जबकि हमारे पैर नहीं होते, मछलियों की तरह हमारे शरीर की बनावट होती है. इंसान बहुत प्रदूषण फैलाते हैं, इसलिए वो हमसे बेहतर नहीं होते. इवा ने जानना चाहा कि क्या इंसान हमसे ज़्यादा जीते हैं, तो दादी मां ने समझाया कि वो 100 साल से ज़्यादा नहीं जीते, जबकि मरमेड्स 300 साला तक जी सकती हैं और मरने के बाद वो समुद्री झाग बन जाती हैं. लेकिन यदि हम जीवनभर भले काम करें, तो हम अमर हो सकते हैं और हवा की परियां हमें स्वर्ग ले जाती हैं उनके साथ रहने के लिए.

इसी तरह समय बीतता गया और इवा का 18वां जन्मदिन आ गया. उसे सबने बधाई दी. वो ख़ुद बेहद उत्साहित थी, आख़िर जिस पल का उसे इंतज़ार था, वो आ गया था. राजा ने कहा कि मैं तुम्हें बाहरी दुनिया दिखा लाता हूं, पर इवा ने कहा कि बाकी सब अकेले गए, तो वो भी अकेली ही जाना चाहती है. इतने में उसके दोस्त श्रिंप ने राजा से कहा कि वो उसका ख़्याल रखेगा. राजा ने कहा कि सूर्यास्त से पहले लौट आना. इवा तेज़ी से सतह की ओर चल पड़ी. बाहर आते ही वो मंत्रमुग्ध हो गई. इस नई अंजान दुनिया ने उसे मोहित कर लिया. इतने में ही उसे एक जहाज़ नज़र आया, जिसमें एक युवक था. उसने श्रिंप से पूछा कि ये क्या चीज़ है. फिर उसने देखा कि वो युवक तो बिल्कुल उसके गुड्डे जैसा ही है. श्रिंप ने बताया कि वो राजकुमार है और शायद अपना जन्मदिन मनाने आया है. इवा राजकुमार की ख़ूबसूरती से मोहित हो गई थी और वो गाना गाने लगी. इतने में ही तूफ़ान आ गया. आसमान में काले बादल छा गए और तेज़ लहरों के बीच राजकुमार का जहाज़ फंस गया. इस तूफ़ान में जहाज़ डूब गया. इवा ने देखा, तो वो राजकुमार को बचाने चल पड़ी और वो कामयाब भी रही. राजकुमार को वो किनार पर लाई. इतने में ही किसी के आने की आहट सुनकर वो छिप गई.

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कुछ लड़कियां वहां से गुज़र रही थीं और उन्होंने देखा कि राजकुमार वहां बेहोश था. इतने में राजकुमार को भी होश आ गया और उसने देखा कि एक ख़ूबसूरत लड़की वहां खड़ी है. राजकुमार ने उसे अपनी जान बचाने के लिए धन्यवाद कहा. राजकुमार उसे अपना दिल दे बैठा. उस लड़की ने भी सच नहीं कहा. एवा ने यह सब देखा, श्रिंप ने कहा कि वो लड़की झूठा श्रेय ले रही है. पर इवा ने कहा कि कोई बात नहीं, राजकुमार की जान बच गई, वो इसी से ख़ुश है. सूर्यास्त होने को था, तो दोनों वापस समंदर में लौट आए.

नन्हीं जलपरी का मन उदास था, क्योंकि वो राजकुमार को पहली नज़र में ही दिल दे बैठी थी. पर वो जानती थी कि उसे पाना नामुमकिन है. सागर के नियम ऐसे ही थे कि वो इंसानों से नहीं मिल सकती थी. श्रिंप ने नन्हीं राजकुमारी की हालत देख उसे एक उपाय सुझाया. वो उसे समुद्री डायन के बारे में बताने लगा, लेकिन उसने आगाह भी किया कि इसमें बहुत ख़तरा भी हो सकता है, लेकिन नन्हीं जलपरी को तो बस राजकुमार को पाने की धुन थी. वो चल पड़ी समुद्री डायन से मिलने.

समुद्री डायन ने अपने जादुई गोले में देखा कि लिटिल मरमेड उसकी मांद की ओर आ रही है. इतने में ही गोले में से एक भविष्यवाणी हुई कि राजकुमारी सबसे प्यारी और भावुक मन की है. वो अपने अच्छे कामों की वजह से एक पवन परी बन जाएगी और उसी व़क्त तुम्हारे पाप ख़त्म हो जाएंगे और तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी. डायन ने कहा कि ऐसा कभी नहीं होगा.

इतने में ही राजकुमारी डायन तक पहुंच गई और उसने गुज़ारिश की कि वो इंसान बनना चाहती है. डायन ने कहा कि उस राजकुमार के लिए ऐसा करना सही नहीं, क्योंकि ये तुम्हारे दुखों का कारण भी बन सकता है. एवा ने कहा वो हर क़ीमत के लिए तैयार है. डायन ने कहा कि मैं तुम्हें इंसान तो मैं बना दूंगी, लेकिन तुम्हारी आवाज़ छीन लूंगी. तुम्हें राजकुमार का दिल जीतना होगा, अगर तुम कामयाब रही, तो तुम्हारी आवाज़ भी लौट आएगी, लेकिन यदि ऐसा नहीं हो सका, तो तुम्हारी मौत निश्‍चित है और तुम समुद्री झाग बन जाओगी.

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नन्हीं जलपरी ने शर्त मान ली. डायन ने उसे जादुई शर्बत दिया और कहा इसे तट पर जाकर पीना. मरमेड ने ऐसा ही किया. शर्बत पीते ही वो बेहोश हो गई. इस बीच उसकी मछली जैसी पूंछ पैरों में बदल गई, पर उसकी आवाज़ चली गई. उसे होश आया तो सामने राजकुमार था. राजकुमार ने कहा तुम ठीक हो, पर तुम हो कौन? और सागर तट पर क्या कर रही थी? राजकुमार ने उसे आराम करने की सलाह दी.

अगले दिन वो चलने लगी, तो राजकुमार बेहद ख़ुश हुआ. उसने उसके साथ डांस किया और उसकी नृत्य कला से काफ़ी प्रभावित हुआ. राजकुमार ने कहा कि आज का दिन बहुत अच्छा है, मुझे मेरे जीवन का प्यार भी मिल गया. नन्हीं परी को लगा कि वो उसकी बात कर रहा है. इतने में ही राजा का आगमन हुआ और राजकुमार ने राजा से उस लड़की का परिचय करवाया, जो उसे तूफ़ान वाले दिन मिली थी. राजकुमार ने कहा कि इसी ने मेरी जान बचाई थी. मैं इससे शादी करना चाहता हूं. राजा भी मान गए. लिटिल मरमेड का दिल टूट चुका था. यह सब देख श्रिंप ने सागर में जाकर राजा को सब कुछ बताया.

 

राजा ने सागर की देवी से प्रार्थना की और सतह पर चला गया. एवा की बहनें डायन के पास गई, ताकि वो अपना श्राप वापस ले. डायन ख़ुश थी कि राजा की बेटियां उसके सामने गिड़गिड़ा रही हैं. फिर डायन ने कहा कि उसके पास एक उपाय है, लेकिन उसके लिए एवा को राजकुमार की हत्या करनी होगी. यदि लिटिल मरमेड इस जादुई खंजर से राजकुमार को मार देगी, तो उसे अपनी जलपरी वाली ज़िंदगी वापस मिल जाएगी. उसकी बहनें वो खंजर लेकर सतह पर गई. सबने देखा इवा अपने गुड्डे के साथ सागर तट पर एक पेड़ के नीचे उदास बैठी है. राजा ने उसे आवाज़ लगाई. इवा बेहद भावुक हो उठी. राजा ने इवा को वो खंजर दिया, पर इवा ने कहा कि वो राजकुमार को नहीं मार सकती. पर अपने भावुक पिता और बहनों को देख वो खंजर ले लेती है. वो राजकुमार के महल तक गई, पर वो राजकुमार को मार नहीं पाई, क्योंकि वो उसका प्यार था. वो लौट आई. अपने पिता और बहनों से माफ़ी मांगी. इवा ने कहा कि अब मेरी मौत निश्‍चित है. आप सब मुझे माफ़ कर देना. मैं अब झाग में बदलना चाहती हूं. इस दुनिया से जाना चाहती हूं. इतना कहकर वो समंदर में कूद गई. इतने में ही एक चमत्कारी शक्ति ने उसे खींच लिया और उसने देखा कि सामने पवन परी है. राजा बेहद ख़ुश था कि उसकी सबसे प्यारी बेटी की जान बच गई. राजा ने परी को धन्यवाद कहा.

इवा समझ नहीं पा रही थी. परी ने बताया कि हम आकाश की परियां हैं और तुम अब हमारे साथ परी बनकर रहोगी. तुम्हारे उदार मन और सागर व इंसानों के प्रति प्यार को देखते हुए ये तुम्हारा इनाम है. तुम भविष्य में इंसानी रूप में भी जन्म ले सकती हो. लिटिल मरमेड ने सबको अलविदा कहा और अपने राजकुमार से भी कहा कि अगले जन्म में तुम ही मेरा प्यार बनोगे. मैं हमेशा तुम से प्यार करूंगी. उसने परी मां को धन्यवाद कहा और उनके साथ स्वर्ग में चली गई. ऐसा होते ही उस डायन और उसके पापों का भी अंत हो गया. सभी लोग संतुष्ट थे.

तेनालीरामा की कहानी: अंगूठी चोर (Tenali Rama Story: The Lost Ring)

Tenali Rama Story, The Lost Ring

Tenali Rama Story, The Lost Ring

तेनालीरामा की कहानी: अंगूठी चोर (Tenali Rama Story: The Lost Ring)

एक बार की बात है, राजा कृष्ण देव राय उदास होकर अपने सिंहासन पर बैठे थे. तभी तेनालीराम आ पहुंचे. उन्होंने राजा की उदासी का कारण पूछा, तो राजा ने बताया कि उनकी पसंदीदा अंगूठी खो गयी है, दरअसल वो अंगूठी रत्न जड़ित और बेहद कीमती थी. राजा को वो बहुत पसंद थी. राजा को शक था कि उनके बारह अंग रक्षकों में से किसी एक ने वो अंगूठी चुराई है.

तेनालीराम ने कहा, “मैं अंगूठी चोर को बहुत जल्द पकड़ लूंगा”, यह सुनकर राजा कृष्ण देव राय बहुत प्रसन्न हुए.

तेनालीराम ने राजा के अंगरक्षकों को बुलाकर उनसे कहा, “राजा की अंगूठी आपमें से किसी एक ने चुराई है, लेकिन मैं इसका पता बड़ी आसानी से लगा लूंगा. चोर को कड़ी सज़ा मिलकर रहेगी और जो सच्चा है उसे डरने की कोई ज़रुरत नहीं. आप सब मेरे साथ काली मां के मंदिर चलो.”

राजा हैरान थे कि चोर को पकड़ने के लिए भला मंदिर क्यों जाना है?

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मंदिर पहुंचकर तेनालीराम पुजारी के पास गए और उन्हें कुछ निर्देश दिए. इसके बाद उन्होंने अंगरक्षकों से कहा, “आप सबको बारी-बारी से मंदिर में जाकर मां काली की मूर्ति के पैर छूने हैं और फ़ौरन बाहर निकल आना है. ऐसा करने से मां काली आज रात स्वप्न में मुझे उस चोर का नाम बता देंगी.”

सारे अंगरक्षक बारी-बारी से मंदिर में जाकर माता के पैर छूने लगे. जैसे ही कोई अंगरक्षक पैर छूकर बाहर निकलता तेनालीराम उसका हाथ सूंघते और एक कतार में खड़ा कर देते. कुछ ही देर में सभी अंगरक्षक एक कतार में खड़े हो गए.

महाराज बोले, “क्या हुआ? चोर का पता क्या कल लगेगा? तब तक क्या किया जाये?”

“नहीं महाराज, चोर का पता तो ला चुका है। सातवें स्थान पर खड़ा अंगरक्षक ही चोर है।

ऐसा सुनते ही वह अंगरक्षक भागने लगा, पर वहां मौजूद सिपाहियों ने उसे धर दबोचा.

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राजा और बाकी सभी लोग हैरान थे कि तेनालीराम ने कैसे पता कर लिया कि चोर वही है.
तेनालीराम ने राज़ खोला ,”मैंने पुजारीजी से कहकर काली मां के पैरों पर तेज़ सुगन्धित इत्र छिड़कवा दिया था.जिस कारण जिसने भी मां के पैर छुए उसके हाथ में वही सुगन्ध आ गयी, लेकिन सातवें अंगरक्षक के हाथ में कोई खुशबू नहीं थी… उसने पकड़े जाने के डर से मां काली की मूर्ति के पैर छूए ही नहीं.”

राजा कृष्ण देव राय तेनालीराम की बुद्धिमत्ता से फिर से प्रभावित हुए बिना न रह सके.