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बहुत समय पहले की बात है घने से जंगल में एक शेर और एक शेरनी साथ-साथ रहते थे. उन दोनों में बेहद प्यार, अपनापन और भरोसा था. वे दोनों एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे और रोज़ दोनों साथ में ही शिकार करने जाते थे. को भी शिकार मिलता उसको मारकर आपस में बराबर बांट कर खाते थे. ऐसे ही उनका जीवन हंसी-ख़ुशी चल रहा था कि कुछ समय के बाद शेर और शेरनी दो पुत्रों के माता-पिता बन गए.

जब शेरनी ने बच्चों को जन्म दिया, तो शेर ने कहा कि अब से तुम शिकार पर मत जाना. घर पर रहकर अपनी और बच्चों की देखभाल करना. अब से मैं अकेले ही शिकार पर जाऊंगा और हम सब के लिए शिकार लेकर आऊंगा. शेरनी अब घर पर रहकर बच्चों की देखभाल करती और शेर अकेले ही शिकार पर जाता.

उनकी ज़िंदगी मज़े से चल रही थी कि एक दिन शेर को कोई भी शिकार नहीं मिला. उसने बहुत ढूंढ़ा, यहां तक कि वो दूसरे जंगल में भी गया लेकिन उसके हाथ कुछ न लगा. आख़िरकार थक हारकर वह खाली हाथ ही घर की तरफ जा रहा था कि रास्ते में उसे एक लोमड़ी का बच्चा अकेले घूमता हुआ दिखाई दिया. शेर को पहले तो लगा कि ये बहुत ही छोटा बच्चा है, पर फिर उसने सोचा आज उसके पास शेरनी और बच्चों के लिए कोई भोजन नहीं है, तो वह इस लोमड़ी के बच्चे को ही अपना शिकार बनाएगा. शेर ने लोमड़ी का बच्चा पकड़ा, पर वह बहुत छोटा था, जिस वजह से वह उसे मार नहीं सका. वह उसे ज़िंदा ही पकड़कर घर ले गया.

घर जाकर शेरनी उसने सारा क़िस्सा बताया कि आज उसे एक भी शिकार नहीं मिला और वापसी में रास्ते में उसे यह लोमड़ी का बच्चा दिखाई दिया, तो वह उसे ही मारकर खा जाए. शेर की बातें सुनकर शेरनी बोली- जब तुम इसे बच्चे को नहीं मार पाए, तो मैं इसे कैसे मार सकती हूं? मैं इसे नहीं खा सकती है. इसे भी मैं अपने दोनों बच्चों की ही तरह पाल-पोसकर बड़ा करूंगी और यह अब से हमारा तीसरा पुत्र होगा.

उसी दिन से शेरनी और शेर लोमड़ी के बेटे को भी अपने पुत्रों ही तरह प्यार करने लगे और वो बच्चा भी शेर के परिवार के साथ घुल-मिल गया और वो उनके साथ बहुत खुश था. वो अब उनके परिवार उन्हीं के साथ खेलता-कूदता और बड़ा होने लगा. तीनों ही बच्चों को लगता था कि वह सारे ही शेर हैं. लोमड़ी का बच्चा भी इस अंतर को नहीं समझ पाया और न ही शेर के दोनों बच्चे.

जब वो तीनों थोड़े और बड़े हुए, तो खेलने के लिए जंगल में जाने लगे. एक दिन जंगल में खेलते-खेलते उन्होंने वहां एक हाथी को देखा. शेर के दोनों बच्चे उस हाथी के पीछे शिकार के लिए लग गए, लेकिन वहीं लोमड़ी का बच्चा इतने बड़े हाथी को देख डर गया और डर के मारे वापस घर पर शेरनी मां के पास आ गया. लोमड़ी के बच्चे ने अपने भाइयों को भी हाथी के पीछे जाने से मना किया था लेकिन वो दोनों नहीं माने.

कुछ देर बाद जब शेरनी के दोनों बच्चे भी वापस आए, तो उन्होंने जंगल वाली बात अपनी मां को बताई. उन्होंने बताया कि वह हाथी के पीछे गए, लेकिन उनका तीसरा भाई डर कर घर वापस भाग आया. अपने भाइयों की बातें सुनकर लोमड़ी के बच्चे को बहुत ग़ुस्सा आया और वो बहुत ग़ुस्सा हो गया. उसने गुस्से में कहा कि तुम दोनों जो खुद को बहादुर बता रहे हो, मैं तुम दोनों को पटकर ज़मीन पर गिरा सकता हूं.

लोमड़ी के बच्चे की बात सुनकर शेरनी ने उसे समझाया कि उसे अपने भाइयों से इस तरह की बात नहीं करनी चाहिए. शेरनी मां की बात लोमड़ी के बच्चों को अच्छी नहीं लगी. गुस्से में उसने कहा, तो क्या आपको भी लगता है कि मैं डरपोक हूं और हाथी को देखकर डर गया था?

लोमड़ी के बच्चे की इस बात को सुनकर शेरनी उसे अकेले में ले गई और उसे उसके लोमड़ी होने का सच बताया. हमने तुम्हें भी अपने दोनों बच्चों की तरह ही बड़ा किया है, उन्हीं के साथ तुम्हारी भी परवरिश की है और तुमसे हम बहुत प्यार करते हैं, लेकिन तुम लोमड़ी वंश के हो और अपने वंश के कारण ही तुम हाथी जैसे बड़े जानवर को देखकर डर गए और घर वापस भाग आए. वहीं, तुम्हारे दोनों भाई शेर वंश के हैं, जिस वजह से वह हाथी का शिकार करने के लिए उसके पीछे भागे थे.

शेरनी ने आगे कहा कि अभी तक तुम्हारे दोनों भाईयों को तुम्हारे लोमड़ी होने का पता नहीं है. लेकिन जिस दिन उन्हें यह पता चलेगा वह तुम्हारा भी शिकार कर सकते हैं. इसलिए, तुम्हारे लिए भी अच्छा होगा कि तुम यहां से जल्द ही चले जाओ और अपने वंश के लोगों के साथ रहो… तुम यहां से भागकर अपनी जान बचा लो.

शेरनी से अपने बारे में अपना सच सुनकर लोमड़ी का बच्चा वाक़ई डर गया और मौका मिलते ही वह रात में वहां से छिपकर भाग गया.

सीख: जंगल का अपना क़ानून है और हर जानवर का स्वभाव व आदत अपने वंश पर ही होती है फिर भले ही वो निडर और बहादुर लोगों के बीच रहें. वहीं दूसरी ओर ये कहानी यह भी बताती है कि शेर होने बाद भी लोमड़ी के बच्चे से प्यार व उसका पालन-पोषण करना यही दर्शाता है कि जानवरों के मन में भी प्यार और दया का भाव होता है.

बहुत समय पहले की बात है, हिम्मतनगर नाम के एक गांव में दो मित्र रहते थे, जिनका नाम धर्मबुद्धि और पापबुद्धि था. धर्मबुद्धि सीधा-साधा ईमानदार और नेक इंसान था और पापबुद्धि बेहद धूर्त और चालाक था. पापबुद्धि के चालक मन में एक दिन ये ख्याल आया कि मैं धर्मबुद्धि के साथ दूसरे नगर जाकर ढेर सारा धन कमाऊंगा और किसी ना किसी तरीके से वह सारा धन धर्मबुद्धि से हड़प लूंगा और आगे का सारा जीवन बड़े ही सुख-चैन से बिताऊंगा.

उसने किसी ना किसी तरीके से धर्मबुद्धि को अपने साथ चलने के लिए तैयार कर लिया और फिर दोनों अन्य नगर के लिए निकल गए. जाते समय वे अपने साथ ढेर सारा सामान लेकर गए थे और उसे अन्य नगरी में मुंह मांगे दामों में बेचकर खूब पैसा और स्वर्ण मुद्राएं इकट्ठी कर ली. दोनों ख़ुशी-ख़ुशी अपने गांव की ओर लौटने लगे.

गांव से पास पहुंचने पर बस कुछ दूर पहले ही पाप बुद्धि ने धर्म बुद्धि से कहा- अगर हम इतना सारा धन एक साथ गांव में ले जाएंगे तो हो सकता है कि गांव वाले हमसे कुछ धनराशि कर्ज के रूप में ले लें या हो सकता है कि लोग हमसे जलने लगें या फिर कोई चोर इस धन को हमसे चुरा ले. इसलिए हमें इस धन को किसी सुरक्षित स्थान पर छुपा देना चाहिए. इतना सारा धन एक साथ देखने पर तो किसी साधु-संन्यासी, योगी-महात्मा का मन भी डोल सकता है.

धर्मबुद्धि ने पापबुद्धि की बात से सहमति जताई और दोनों ने जंगल में एक सुरक्षित जगह खोजी और एक पेड़ के नीचे गड्ढा खोदकर उसमें धन को छिपा दिया. इसके बाद दोनों गांव चले गए.

एक रात पापबुद्धि ने मौका पाकर जंगल में जाकर वो सारा धन निकाल लिया और अपने साथ ले गया. धर्मबुद्धि इस बात से अनजान था और कई दिन बीत जाने के बाद वो पापबुद्धि के पास आया और बोला- भाई मुझे धन की आवश्यकता आ पड़ी है, आप चलो मेरे साथ तो हम दोनों उस गाढ़े हुए धन को निकाल लाते हैं. पापबुद्धि तैयार हो गया.

दोनों ने जब इस पेड़ के पास से मिट्टी हटाई तो वहां पर कुछ नहीं था. पापबुद्धि ने सीधे-सीधे धर्मबुद्धि पर धन चुराने का आरोप लगा दिया. इस बात पर दोनों में बहस होने लगी और फिर जब दोनों में झगड़ा बढ़ा तो दोनों न्यायाधीश के पास पहुंचे.

दोनों से कहा गया कि वो अपना पक्ष रखें. इसके बाद न्यायाधीश ने सच्चाई का पता लगाने के लिए दिव्य परीक्षा लेने का निर्णय लिया और दोनों से कहा कि वो जलती हुई आग में हाथ डालें. पापबुद्धि ने इसका विरोध किया और कहा कि आग में हाथ डालने की ज़रूरत नाहीं है, सच्चाई की गवाही तो वन देवता देंगे. न्यायाधीश तैयार हो गए.

धूर्त पापबुद्धि ने पहले ही एक खोखले वृक्ष के तने में अपने पिता को बैठा दिया था. जब उस पेड़ के पास पहुंच कर न्यायाधीश ने वन देवता से पूछा कि दोनों में से चोर कौन है तो पेड़ के तने से आवाज़ आई कि चोर धर्मबुद्धि है.

धर्मबुद्धि ने जब यह सुना तो उसने उस पेड़ के नीचे आग लगा दी. थोड़ी देर में जब आग बढ़ने लगी तो पापबुद्धि का पिता भी जलने लगा और कुछ देर में आग से झुलसने के कारण पापबुद्धि का पिता रोने-चिल्लाने लगा और वो तड़पते हुए उस पेड़ से बाहर निकल आया वो भी एकदम झुलसा हुआ और उसने न्यायाधीश के सामने पापबुद्धि की सारी योजना का खुलासा कर दिया.

सच्चाई सामने आने पर न्यायाधीश ने पापबुद्धि को मौत कि सज़ा सुनाई.

सीख: लालच बुरी बला है और उससे भी बुरा है अपनों के साथ धोखा और विश्वासघात करना. इन बुराइयों से दूर रहें और ईमानदारी व सच्चाई के साथ चलें.

बहुत समय पहले की बात है. एक घंटाघर में टींकू चिड़िया अपने माता-पिता और 5 भाइयों के साथ रहती थी. टींकू चिड़िया छोटी और बेहद प्यारी थी. उसके पंख बड़े मुलायम थे. उसकी मां ने उसे घंटाघर की ताल पर चहकना सिखाया था.

उसी घंटाघर के पास ही एक घर भी था, जिसमें पक्षियों से प्यार करने वाली एक भली महिला रहती थी. वह टींकू चिड़िया और उसके परिवार के लिए रोज़ खाना खिलाती थी, वो उनको कभी रोटी तो कभी ब्रेड का टुकड़ा डाल देती थी जिससे उनका पेट भर जाता था.

लेकिन फिर वो महिला बीमार पड़ गई और उसकी मृत्यु हो गई. टींकू चिड़िया और उसका पूरा परिवार उस महिला द्वारा दिए गए खाने पर निर्भर था, लेकिन महिला की मौत के बाद अब उनके पास खाने के लिए कुछ नहीं था.

लेकिन भूख से बेहाल होने पर टींकू चिड़िया के पिता ने कीड़ों का शिकार करने का फैसला किया. बहुत मेहनत और कोशिश के बाद उन्हें 3 कीड़े मिले, जो परिवार के लिए काफी नहीं थे, क्योंकि उनका परिवार बड़ा था. वे 8 लोग थे, इसलिए उन्होंने टींकू और उसके 2 छोटे भाइयों को खाना खिलाने का निर्णय लिया.

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इधर, खाने की तलाश में भटक रही टींकू, उसके भाई और उसकी मां ने एक घर की खिड़की में चोंच मारी, ताकि कुछ खाने को मिल जाए, लेकिन खाना तो दूर की बात है, उस घर के मालिक ने उन पर राख फेंक दी, जिससे उन तीनों का रंग भूरा हो गया.

उधर टींकू के पिता को आख़िरकार बड़ी मेहनत के बाद एक ऐसी जगह मिल गई जहां काफी संख्या में कीड़े थे. अब उनके कई दिनों के खाने का इंतजाम हो चुका था, इसलिए वो खुशी-खुशी ढेर सारे कीड़े लेकर घर पहुंचा, लेकिन वहां कोई नहीं था. घोंसले में किसी को भी न पाकर वो परेशान हो गया था और इतने में ही टींकू चिड़िया, उसका भाई और मां वापस लौटे, लेकिन उन पर राख गिरने के कारण भूरे रंग का होने पर पिता ने उन्हें पहचाना ही नहीं और उन्होंने सबको भगा दिया.

वो लोग निराश हो गए, लेकिन टींकू ने हार नहीं मानी. वो सब के पास के तालाब में गए और नहाकर अपने ऊपर लगी राख हटा दी. तीनों घोसले के पास आकर चहकने लगे, जिससे टींकू के पिता ने उन्हें पहचान लिया और माफी मांगी.

अब सब मिलकर खुशी-खुशी एक साथ रहने लगे. उनके पास खाने की भी कमी नहीं थी, क्योंकि उन्होंने अपनी मेहनत से खाना प्राप्त करना सीख लिया था और अब उनके पास खाने की कोई कमी नहीं थी.

सीख: अपनी ज़रूरतों के लिए कभी भी किसी पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि हम सबको खुद मेहनत करके अपना पेट भरना चाहिए और अपनी ज़रूरतें पूरी करनी चाहिए.

एक जंगल में एक चालाक लोमड़ी और सारस रहते थे. दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे. साथ घूमते, साथ ही खाते-पीते थे. सारस लोमड़ी को तालाब से मछली पकड़ कर खाने के लिए देता था. उनके दिन मज़े से कट रहे थे.

सारस बहुत भोला था, पर लोमड़ी शैतान भी थी और चालाक भी. उसे दूसरों का मजाक उड़ाने में बहुत मजा आता था, इसलिए वह हमेशा दूसरों को परेशान करती रहती थी.

एक दिन उसने सोचा कि क्यों न इस भोले से सारस का भी मजाक उड़ाया जाए. उसने सारस को अपने घर दावत पर बुलाया और जान बूझकर खीर एक प्लेट में परोसी. उसे पता था कि सारस प्लेट में खीर को नहीं खा पाएगा, क्योंकि उसकी लंबी चोंच है. उसे इस तरह परेशान देख लोमड़ी मन ही मन बहुत खुश हुई और झूठी चिंता दिखाते हुए सारस से पूछने लगी कि क्या बात है दोस्त, खीर पसंद नहीं आई? जल्द ही लोमड़ी अपनी पूरी खीर चट कर गई और बेचारा सारस मन ही मन ग़ुस्से और अपमान का घूंट पीकर रह गया. पर जाते-जाते सारस ने भी उसे मज़ा चखाने की सोची.

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कुछ दिन बाद उसने भी लोमड़ी को अपने घर दावत पर बुलाया और उसने भी खीर बनाई. सारस ने दो सुराही में खीर परोस दी और लोमड़ी से खाने को कहा. सुराही ऊपर से पतली थी जिसकी वजह से लोमड़ी कुछ न खा सकी और सारस की अपनी लंबी चोंच से पूरी खीर मज़े से खा गया.

लोमड़ी को एहसास हुआ कि उसने जैसा सारस के साथ किया, खुद उसके साथ भी वैसा ही हुआ. पर वो कुछ बोली नहीं और मन ही मन अपने किए पर पछताने लगी.

सीख: किसी को छोटा या कमजोर मानकर उसका मज़ाक़ उड़ाना या अपमानित करना ग़लत है, हम जैसा करेंगे हमारे साथ भी वैसा ही होगा.

एक घने जंगल के पास एक नदी बहती थी और उसी जंगल के बीचोंबीच एक तालाब था, जिसमें ढेर सारे मेंढक रहते थे. वो सभी तालाब में ही रहते और खाते-पीते थे. उन्हीं में एक मेंढक अपने तीन बच्चों के साथ उसी तालाब में रहता था. वो खूब खाता-पीता और मस्त रहता था, इसी वजह से उस मेंढक की सेहत अच्छी-खासी हो चुकी थी और वो उस तालाब का सबसे बड़ा और विशाल मेंढक बन चुका था. उस मेंढक को अपने बड़े शरीर पर बड़ा घमंड हो चला था. उसके बच्चे भी उसे देखकर काफी खुश होते थे. उसके बच्चों को लगता कि उनके पिता ही दुनिया में सबसे बड़े, शक्तिशाली और बलवान हैं. वो मेंढक भी अपने बच्चों को अपने बारे में बड़ाई मारनेवाली मनगढ़ंत व झूठी कहानियां सुनाता और उनके सामने शक्तिशाली होने का दिखावा करता था.

समय यूं ही बीत रहा था कि एक दिन मेंढक के बच्चे खेलते-खेलते तालाब से बाहर चले गए और जब वो पास के एक गांव में पहुंचे, तो वहां उनकी नज़र एक बैल पर पड़ी. उसे देखते ही उनकी आंखें खुली की खुली रह गईं. उन्होंने कभी इतना विशाल और बड़ा जीव नहीं देखा था. उनकी ज़िंदगी तो अब तक तालाब तक ही सीमित थी. बाहरी दुनिया से उनका कोई वास्ता नहीं था. इसलिए उस बैल को देखकर वो डर गए. वो बैल तो अपनी धुन में मज़े से घास खा रहा था, लेकिन वो बच्चे चकित होकर उस बैल को देखे जा रहे थे. इसी बीच घास खाते-खाते बैल ने ज़ोर से हुंकार लगाई. बस फिर क्या था, तीनों बच्चे डर के मारे भागकर सीधे तालाब में अपने पिता के पास आ गए. उनके घमंडी पिता ने उनके डर का कारण पूछा, तो उन्होंने अपने पिता को बताया कि आज उनकी आंखों ने क्या देखा. उन्होंने अपने पिता से कहा कि हमने आज आपसे भी बहुत बड़ा, विशाल और ताकतवर जीव को देखा.

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बच्चे आगे बोले कि हमको तो आज तक यही लगता था कि आप ही इस दुनिया में सबसे विशाल, बड़े और ताक़तवर हो! यह सुनते ही मेंढक के अहंकार को ठेस पहुंची. उसने एक लंबी सांस भरकर खुद को फुला लिया, ताकि उसका शरीर बड़ा दिखे और अपने बच्चों से कहा क्या वो उससे भी बड़ा जीव था? उसके बच्चों ने कहा, हां वो आप से बहुत बड़ा था.

मेंढक का क्रोध बढ़ गया… उसने ग़ुस्से में आकार और भी ज़्यादा सांस भरकर खुद को फुलाया और फिर पूछा, क्या अब भी वो जीव मुझसे बड़ा था? बच्चों ने कहा, हां पिताजी, ये तो कुछ भी नहीं, वो आपसे कई गुना बड़ा था. मेंढक से यह बात बर्दाश्त नहीं हुई और वो सांस फुला-फुलाकर खुद को गुब्बारे की तरह फुलाता चला गया. फिर एक वक्त आया जब उसका शरीर पूरी तरह फुल गया और वो फट गया और अपने इस झूठे अहंकार के चक्कर में वो अपनी जान से ही हाथ धो बैठा.

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सीख: झूठे दिखावे और अहंकार से दूर रहना चाहिए. किसी भी बात का घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि घमंड करने से कोई लाभ नहीं होता, बल्कि खुद का ही नुकसान होता है, जैसा कि उस घमंडी मेंढक का हुआ. विनम्र रहें और अपनी शक्ति या हुनर का सही इस्तेमाल करें, न कि झूठा दिखावा.

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एक दिन बादशाह अकबर के दरबार की कार्यवाही चल रही थी कि अचानक बादशाह को न जाने क्या सूझी और वो बीरबल के मज़े लेने की सोचने लगे. उन्होंने बीरबल से मसखरी में एक टेढ़ा सवाल पूछा कि बीरबल, बताओ ज़रा कि हथेली पर बाल क्यों नहीं उगते?

सवाल सुनते ही बीरबल की समझ में आ गया कि बादशाह मजाक करना चाहते हैं और उनके मज़े लेना चाहते हैं.

बीरबल फ़ौरन जवाब न देकर सोच में डूबे हुए थे कि बादशाह ने उनको टोका- आज क्या बात है बीरबल, वैसे तो तुम हर सवाल का जवाब तपाक से दे देते हो. आज क्या हो गया?

बीरबल ने शांत मन से कहा- कुछ नहीं हुआ जहांपनाह! मैं तो ये सोच रहा था कि किसकी हथेली पर?

अकबर अपनी हथेली दिखाते हुए बोले कि हमारी हथेली पर बीरबल.

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बीरबल समझाते हुए बोले- हुज़ूर! आपकी हथेली पर बाल कैसे उगेंगे? आप दिन भर अपने हाथों से उपहार वितरित करते रहते हैं. लगातार घर्षण की वजह से आपकी हथेली पर बाल उगना मुमकिन नहीं.

ठीक है बीरबल, चलो मान लेते हैं, मगर तुम्हारी हथेली पर भी बाल नहीं है. उसका क्या कारण है? अकबर ने सोचा आज बीरबल को पूरी तरह चकरा ही देंगे और उसके खूब मज़े लेंगे.

अकबर के सवाल सुनकर दरबारियों के भी कान खड़े हो गए और उनको भी लगने लगा कि बीरबल आज बुरे फंसे और वो अब अकबर के सवाल का जवाब नहीं दे पाएंगे.

इतने में ही बीरबल ने कहा कि जहांपनाह मेरी हथेली पर बाल इसलिए नहीं क्योंकि मैं हमेशा आपसे इनाम लेता रहता हूं, तो भला मेरी हथेली पर बाल कैसे रहेंगे?

बादशाह यहीं नहीं रुके, तपाक से तीसरा सवाल कर बैठे- हमारी और तुम्हारी बात को जाने दो. हम इनाम देते हैं और तुम लेते रहते हो इसलिए हमारी हथेलियों पर बाल नहीं, लेकिन इन दरबारियों का क्या? ये तो हमसे हमेशा ईनाम नहीं लेते. ऐसे में इनकी हथेलियों पर बाल क्यों नहीं हैं?

सभी दरबारियों को लगा कि इस सवाल पर अब बीरबल फंस गए, आज उनकी हार निश्चित है, वो मन ही मन खुश हो रहे थे कि बीरबल का जवाब हाज़िर था- हुज़ूर! आप ईनाम देते रहते हैं और मैं ईनाम लेता रहता हूं और इसे देख ये सभी दरबारी ईर्ष्या में हाथ मलते रह जाते हैं, इसलिए इनकी हथेली पर भी बाल नहीं है.

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बीरबल वैसे भी अपनी तेज़ बुद्धि, हाज़िरजवाबी और वाक्पटुता के लिए प्रसिद्ध थे. हर बार की तरह इस बार भी बीरबल ने यह साबित कर दिखाया और बीरबल के जवाब से अकबर ख़ुशी से ठहाका लगा उठे, वहीं बाक़ी दरबारी फिर हाथ मलते रह गए.

सीख: ऐसा कोई सवाल नहीं और ऐसी कोई समस्या नहीं, जिसका हल नहीं हो. बस अपनी बुद्धि को हमेशा तेज़ और मन को साफ़ रखें. हाज़िरजवाबी के लिए दिमागी रूप से सतर्क होना बेहद ज़रूरी है. कभी भी कठिन से कठिन प्रश्न देख बिना कोशिश किए हथियार न डालें!

एक गांव में एक धोबी अपने गधे के साथ रहता था. वह अपनी रोज़ी-रोटी के लिए रोज सुबह अपने गधे के साथ लोगों के घरों से गंदे कपड़े लाता और उन्हें धोकर वापस दे आता. वो दिनभर इसी काम में लगा रहता और किसी तरह गुज़र-बसर कर रहा था.

वो गधा भी कई सालों से धोबी के साथ काम कर रहा था और उम्र बढ़ने के साथ व समय के साथ-साथ वह बूढ़ा हो गया था. जिसकी वजह से उसका शरीर भी कमजोर हो चला था, जिस वजह से अब वो ज्यादा कपड़ों का वजन भी नहीं उठा पाता था… उसकी उम्र के चलते उसकी कमजोरी बढ़ती चली जा रही थी.

एक दिन दोपहर के वक्त धोबी अपने गधे के साथ कपड़े धोने घाट जा रहा था. गर्मी बहुत ज़्यादा थी और कड़ी धूप की से दोनों ही बेहाल थे. चलते-चलते धूप और कमजोरी की वजह से अचानक गधे का पैर लड़खड़ाया और वह एक गहरे गड्ढे में गिर गया. इस अचानक हुए घटनाक्रम से धोबी घबरा गया. उसका गधा भी सकते में था और धोबी उसे बाहर निकालने की कोशिश में जुट गया. लेकिन गधा और धोबी दोनों नाकामयाब रहे, हालाँकि बूढ़ा और कमजोर होने पर भी गधे ने भी पूरी ताक़त लगा दी थी पर दोनो असफल हो रहे थे और उनके प्रयास नाकाफ़ी साबित हुए.

धोबी और गधे की ऐसी हालत देख को गांव वाले भी उसकी मदद के लिए पहुंच गए, लेकिन कोई भी उसे गड्ढे से बाहर नहीं निकाल पाया. तब सभी को यही लगा कि अब कुछ माहिर हो सकता और गांववालों ने धोबी से कहा कि ये गधा तो अब बूढ़ा हो गया है, इसलिए इसको बाहर निकलने की बजाय समझदारी इसी में है कि इस गड्ढे में मिट्टी डालकर उसे यहीं दफना दिया जाए, क्योंकि सारी कोशिशें बेकार हि होंगी. धोबी ने भी सोचा कि ये सब सही कह रहे हैं और वो भी इस बात के लिए तैयार हो गया.

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बस फिर क्या था, गांववालों ने अब गड्ढे में मिट्टी डालनी शुरू कर दी. गधा इससे पहले कि कुछ समझ पाता गांववाले अपना निर्णय ले चुके थे और जैसे ही गधे को समझ आया कि उसके साथ क्या हो रहा है, तो वहकुछ देर चिल्लाया, बहुत दुखी हुआ और उसकी आंखों से आंसू निकलने लगे, लेकिन कुछ देर बाद उसने चुप्पी साध ली और वो एकदम चुप हो गया!

लेकिन इसी बीच धोबी की नज़र गड्ढे में फ़ंसे अपने गधे की हरकत पर पड़ी, उसने देखा कि गधा कुछ अजीब सी हरकत कर रहा है. जैसे ही गांव वाले उस पर मिट्टी डालते, वो अपने शरीर से मिट्टी को नीचे गड्ढे में गिरा देता और खुद उस मिट्टी के ऊपर चढ़ जाता. वो लगातार ऐसा करत रहा, यही क्रम चलता रहा, जिससे गड्ढे में मिट्टी तो भरती रही लेकिन गधा बड़ी चतुराई से उस मिट्टी को नीचे अपने ऊपर से झटककर नीचे गिरा देता और खुद उस पर चढ़ते हुए ऊपर आता गया. गांववाले भी ये देख हैरान हो गए और अपने गधे की इस चतुराई को देखकर धोबी भी हैरान रह गया और उसकी आंखें नम हो गईं.

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सीख: कहानी से यही सीख मिलती है कि परिस्थितियाँ भले ही कितनी मुश्किल और नाज़ुक क्यों न हों, अगर बुद्धि, समझदारी और धैर्य से काम लिया जाए तो मुश्किल से मुश्किल परिस्थिति को भी पार कर सकते हैं. गड्ढा कितना भी गहरा हो यानी परेशानी कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसे समझदारी से मिट्टी की तरह हटाकर उससे पार पाने का जज़्बा बनाए रखें, सफलता ज़रूर मिलेगी!

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एक जंगल के बड़े और घने पेड़ पर एक गौरैया का जोड़ा यानी चिड़ा-चिड़ी का जोड़ा रहता था. वो उस पेड़ पर अपना घोसला बनाकर बड़ी खुशी-खुशी अपना जीवन बिता रहे थे. मौसम बदला और धीरे-धीरे आया सर्दियों का मौसम, हल्की बूंदा-बांदी से ठंड और बढ़ चुकी थी और अब हल्की ठंड कड़ाके की ठंड में बदल चुकी थी. एक दिन ठंड से बचने के लिए कुछ बंदर उस पेड़ के नीचे ठिठुरते हुए पहुंच गए. उन्होंने ठंड से बचने के लिए उस पेड़ के नीचे पनाह लेना बेहतर समझा. तेज ठंडी हवाओं से सभी बंदर कांप रहे थे और बहुत ही परेशान थे. पेड़ के नीचे बैठने के बाद वो आपस में बात करने लगे कि अगर कहीं से आग सेंकने को मिल जाती तो ठंड दूर हो जाती और उन्हें कुछ राहत मिल जाती. तभी एक बंदर ने देखा कि वहीं पास में कुछ सूखे पत्ते और सूखी लकड़ियां पड़ी हैं.

उन्हें देख उसने दूसरे बंदरों से कहा कि चलो इनको इकट्ठा करके जलाते हैं जिससे हमको ठंड नहीं लगेगी. उन बंदरों ने उनको एक जगह इकट्ठा किया और उन्हें जलाने का उपाय सोचने लगे.

बंदरों की बातें और उनकी ठंड मिटाने की कोशिश को पेड़ पर बैठी गौरैया देख रही थी. ये सब देखकर उससे रहा नहीं गया और वो बंदरों से बोली कि तुम लोग कौन हो? देखने में तो तुम आदमियों की तरह लग रहे हो, हाथ-पैर भी हैं, तुम अपना घर बनाकर क्यों नहीं रहते?

गौरेया की बात सुनकर ठंड से कांप रहे बंदर ग़ुस्से में बोले, तुम अपने काम से काम रखो, हमारे बीच में बोलने की और सलाह देने कि कोई ज़रूरत नहीं. ये कहकर वो आग जलाने के बारे में सोचने लगे और इतने में बंदरों की नज़र जुगनू पर पड़ी. वो बोला कि ऊपर हवा में चिंगारी है, इसे पकड़कर आग जलाते हैं. यह सुनते ही सारे बंदर उसे पकड़ने के लिए दौड़ पड़े.

चिड़िया ये सब देख फिर बोली कि अरे ये तो जुगनू है, इससे आग नहीं जलेगी. तुम लोग दो पत्थरों को घिसकर चिंगारी निकालकर आग जला सकते हो.

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चिड़िया की इस सलाह को भी बंदरों ने अनसुना कर दिया. उन्होंने जुगनू को पकड़ लिया और फिर उससे आग जलाने की कोशिश करने लगे, पर वो कामयाब नहीं हो पाए और जुगनू उड़ गया. इससे बंदर दुखी और निराश हो गए.

चिड़िया से रहा नहीं गया तो उसने फिर सलाह दी कि आप लोग पत्थर रगड़कर आग जला सकते हो, मेरी बात मानकर तो देखो. चिड़िया की इस बात से बंदर बेहद चिढ़ गए और एक गुस्साए बंदर ने पेड़ पर चढ़कर चिड़िया के घोसले को तोड़ दिया. यह देख चिड़िया दुखी हो गई और डरकर रोने लगी, क्योंकि उसका आशियाना उजड़ चुका था. इसके बाद वो चिड़ा-चिड़ी का जोड़ा उस पेड़ से उड़कर कहीं और चला गया.

सीख: मूर्ख और बेवक़ूफ़ को सलाह व उपदेश देने से उल्टा हम ही नुक़सान और परेशानी में आ सकते हैं. केवल बुद्धिमान और समझदार को हि सलाह देने का फल मिलता है. हर किसी को ज्ञान या उपदेश देने की बजाय उसी को सलाह देनी चाहिए जो समझदार हो और बातों को समझ सके. मूर्ख को सलाह देना अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मारने जैसा होता है.

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एक गांव में एक मेहनती और साधारण व्यापारी रहता था. उसके पास एक गधा था. व्यापारी अपने गधे से बहुत प्यार करता था और गधा भी अपने मालिक से प्यार करता था. व्यापारी काफ़ी दयालु और अच्छा इंसान था. लेकिन उसका गधा बेहद आलसी और कामचोर था. उसे सिर्फ खाना और आराम पंसद था. वो व्यापारी रोज़ सुबह अपना सामान गधे पर रखकर बाज़ार ले जाता और शाम को बचा हुआ सामान वापस ले आता, लेकिन गधे को काम करना बिल्कुल पसंद नहीं था.

वो व्यापारी हमेशा अलग-अलग चीज़ें बाज़ार में बेचने के लिए ले जाता था. एक दिन व्यापारी को पता चला कि बाज़ार में नमक की बहुत ज़्यादा मांग है और फ़िलहाल नमक का व्यापार करने में अधिक फायदा है, तो व्यापारी ने निर्णय लिया कि अब वो नमक ही बेचेगा.

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व्यापारी ने अगले दिन गधे की पीठ पर नमक की बोरियां लादी और बाज़ार की तरफ चल पड़ा. नमक की बोरियां बहुत भारी थीं, जिससे गधे को चलने में परेशानी हो रही थी, लेकिन किसी तरह गधा नमक की बोरियां लेकर आधे रास्ते तक आ गया.

बाज़ार जाने के रास्ते में ही बीच में एक नदी पड़ती थी, जिस पर पुल बना हुआ था, गधा जैसे ही नदी पार करने के लिए उस पुल पर चढ़ा तो लड़खड़ाकर सीधे नदी में जा गिरा. व्यापारी बहुत घबरा गया और उसने जल्दी से गधे को नदी से किसी तरह बाहर निकाला. जब गधा नदी से बाहर आया, तो उसे महसूस हुआ कि पीठ पर लदी बोरियां हल्की हो गई हैं. क्योंकि उन बोरियों में से ज्यादातर नमक पानी में घुल चुका था.

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आलसी गधे को अब अपना वज़न कम करने की तरकीब सूझ गई. वह अब रोज़ नदी में जानबूझकर गिरने लगा. जिससे नमक नदी के पानी में घुल जाता और बोरियों का भार हल्का हो जाता. लेकिन गधे की इस हरकत से व्यापारी को नुकसान उठाना पड़ रहा था. व्यापारी गधे की इस चालाकी को समझ गया. व्यापारी ने सोचा कि इस गधे को सबक़ सिखाना ही पड़ेगा.

व्यापारी ने एक तरकीब निकाली और अगले दिन गधे पर रूई की बोरियां लाद दीं और बाज़ार की तरफ चलने लगा. जब गधा पुल पर पहुंचा, तो वह फिर से जानबूझकर पानी में गिर गया, लेकिन पानी में गिरने के कारण रूई में पानी भर गया और बोरियों का वज़न पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ गया था. पीठ पर लदे वज़न के कारण गधे को बहुत ज़्यादा परेशानी होने लगी. अगले दो-तीन दिनों तक गधा जब भी पानी में गिरता तो उसपर लादा हुआ वज़न दोगुना हो जाता. आखिरकार गधे ने हार मान ली और अब वो चुपचाप बिना पानी में गिरे ही पुल पार करने लगा.

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उसके बाद से व्यापारी जब गधे को लेकर बाज़ार जाने लगा तो गधा चुपचाल बिना नदी में गिरे पुल पार कर लेता. इतना ही नहीं, उसके बाद से गधे ने कभी भी वज़न लादने में आलस नहीं दिखाया. गधे का आलसीपन ख़त्म हो गया था और धीरे-धीरे व्यापारी के सारे नुकसान की भी भरपाई होने लगी.

सीख: इस कहानी से सीख मिलती है कि कभी भी अपने काम से जी नहीं चुराना चाहिए. कर्तव्य का पालन करने में आलस नही करना चाहिए. साथ ही व्यापारी की तरह समझ और सूझ-बूझ से यह सबक़ मिलता है कि अपनी बुद्धि और सूझबूझ से किसी भी काम को आसानी से किया जा सकता है और विपरीत परिस्थितियों को भी अपने अनुकूल बनाया जा सकता है.

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एक जंगल में एक चालाक लोमड़ी रहती थी. वो इतनी चालाक थी कि अपने शिकार और भोजन के लिए पहले तो वो जानवरों से दोस्ती करती और फिर मौक़ा पाते ही उन्हें मारकर दावत उड़ाती. उस लोमड़ी की इसी आदत की वजह से उससे सभी दूर रहते और कतराते थे. एक दिन उसे कहीं भोजन नहीं मिला तो वो दूर तक शिकार की तलाश में निकल पड़ी, उसकी नज़र एक तंदुरुस्त मुर्गे पर पड़ी. वह मुर्गा पेड़ पर चढ़ा हुआ था. वह लोमड़ी मुर्गे को देखकर सोचने लगी कि कितना बड़ा और तंदुरुस्त मुर्गा है, यह मेरे हाथ लग जाए, तो कितना स्वादिष्ट भोजन मिल जाएगा मुझे. अब लोमड़ी का लालच बढ़ चुका था, वो रोज़ उस मुर्गे को देखती लेकिन वो मुर्गा पेड़ पर हि चढ़ा रहता और लोमड़ी के हाथ नहीं आता.

बहुत सोचने के बाद लोमड़ी को लगा ये ऐसे हाथ न आएगा, इसलिए उसने छल और चालाकी करने की सोची. वो मुर्गे के पास गई और कहने लगी आर मेरे मुर्गे भाई! क्या तुम्हें यह बात पता चली कि एक खुशखबरी मिली है सबको जंगल में? मुर्गे ने कहा कैसी खुशख़बरी? लोमड़ी बोली कि आकाशवाणी हुई है और खुद भगवान ने कहा ह अब से इस जंगल के सारे लड़ाई-झगड़े खत्म होंगे, आज से कोई जानवर किसी दूसरे जानवर को नुकसान नहीं पहुंचाएगा और ना ही मारकर खाएगा. सब मिलजुलकर हंसी-ख़ुशी से रहेंगे, एक दूसरे की सहायता करेंगे. कोई किसी पर हमला नहीं करेगा.

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मुर्गे को समझ में आ गया कि हो न हो ये लोमड़ी झूठ बोल रही है, इसलिए मुर्गे ने उसकी बातों पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया और कहा कि अच्छी बात है. लोमड़ी मुर्गे की ऐसी ठंडी प्रतिक्रिया देख फिर बोली- तो मेरे भाई, इसी बात पर आओ, नीचे तो आओ, हम गले लगकर एक दूसरे को बधाई दें और साथ में ख़ुशियां बांटे.

मुर्गा अब लोमड़ी की चालाकी समझ चुका था इसलिए वो मुस्कुराते हुए बोला कि ठीक है लेकिन मेरी लोमड़ी बहना तुम पहले अपने उन दोस्तों से तो गले मिलकर बधाई ले लो जो इसी तरफ़ ख़ुशी से दौड़े चले आ रहे हैं. मुझे पेड़ से दिख रहे हैं वो.

लोमड़ी ने हैरान हो कर पूछा- मुर्गे भाई मेरे कौन से दोस्त? मुर्गे ने कहा- अरे बहन वो शिकारी कुत्ते, वो भी अब हमारे दोस्त हैं न, वो भी शायद तुम्हें बधाई देने के लिए ही इस ओर आ रहे हैं. शिकारी कुत्तों का नाम सुनते ही लोमड़ी थर-थर कांपने लगी. वो बुरी तरह डर गई क्योंकि उसे लगा कि अब अगर वो थोड़ी देर भी यहां रुकी तो ये मुर्गा भले ही उसका शिकार बने न बने लेकिन वो खुद इन शिकारी कुत्तों का शिकार ज़रूर बन जाएगी, इसलिए उसने अपनी जान बचाना ही मुनासिब समझा और आव देखा न ताव बस उल्टी दिशा में भाग खड़ी हुई.

भागती हुई लोमड़ी को मुर्गे ने हंसते हुए कहा- अरे- बहन, कहां भाग रही हो, अब तो हम सब दोस्त हैं तो डर किस बात का, थोड़ी देर रुको. लोमड़ी बोली कि भाई दोस्त तो हैं लेकिन शायद शिकारी कुत्तों को अब तक यह खबर नहीं मिली और बस यह कहते हुए लोमड़ी वहां से ग़ायब हो गई!

सीख: चतुराई, सतर्कता और सूझबूझ से आप सामने संकट आने पर भी बिना डगमगाए आसानी से उससे बच सकते हो. कभी भी किसी के ऊपर या उसकी चिकनी छुपड़ी बातों पर आंख बंद करके आसानी से विश्वास नहीं करना चाहिए, धूर्त अत और चालाक लोगों से हमेशा सतर्क व सावधान रहना चाहिए क्योंकि ऐसे लोग ना किसी के दोस्त होते हैं और ना हाई भरोसे लायक वो सिर्फ़ अपने लिए सोचते हैं और सवार्थपूर्ति के लिए किसी की भी जान के सकते हैं.

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दो चूहे बहुत अच्छे दोस्त थे, लेकिन एक चूहा शहर में रहता था और दूसरा गांव में. दोस्त की याद आने पर एक दिन शहर के चूहे को दोस्त से मिलने का मन किया, तो वो चल पड़ा गांव की ओर. गांव पहुंचकर शहरी चूहा सोच रहा था कि ये कैसी जगह है, ना आलीशान इमारतें और ना सुख-सुविधा और साधन.

शहरी चूहा जैसे ही अपने दोस्त के यहां पहुंचा तो गांव के चूहे ने अपने दोस्त का स्वागत बहुत खुशी से किया. दोनों ने खूब सारी बातें की. उसके बाद गांव के चूहे ने कहा कि तुम हाथ-मुंह धोकर आराम करो मैं तुम्हारे लिए खाने का इंतज़ाम करता हूं. गांव का चूहा पास के बगीचे से ताज़ा फल और सब्ज़ियाँ लाया और उसने अपने दोस्त को बड़े प्यार से खाना परोसा. शहरी चूहे ने कहा कि ये कैसा खाना है, इसमें इतना स्वाद नहीं, देहाती चूहे ने कहा कि ये तो एकदम ताज़ा है, तुम्हें पसंद नहीं आया इसके लिए माफ़ी चाहता हूं.

ख़ैर खाने के बाद दोनों गांव की सैर पर निकल पड़े, शहरी चूहे ने गांव के खूबसूरत नजारे और हरियाली का आनंद लिया. शहरी चूहे ने दोस्त से विदा लेते वक्त अपने दोस्त को शहर आने का निमंत्रण दिया और कहा कि तुम वहां आकर देखना वहां का स्वादिष्ट खान-पान और सुख-सुविधा वाला रहन-सहन.

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एक दिन देहाती चूहे ने सोचा चलो शहर जाकर अपने दोस्त से मिल आता हूं और वहां का रहन-सहन देखकर मैं भी मज़े ले लेता हूं. देहाती चूहा शहर पहुंचा तो आलीशान, ऊंची-ऊंची इमारतें देख हैरान हो गया, उसने सोचा कि अब मैं भी यहीं रहूंगा. शहरी चूहा यहां एक बड़े से घर के बिल में रहता था. उतना बड़ा घर देख गांव का चूहा आश्चर्यचकित रह गया. शहरी चूहे ने दोस्त को कहा कि चलो खाना खाते हैं. उसने देखा टेबल पर कई तरह के व्यंजन और पकवान थे. दोनों चूहे खाने के लिए बैठ गए और गांव के चूहे ने पनीर का टुकड़ा चखा, उसे बड़ा स्वादिष्ट लगा, लेकिन अभी दोनों खाना खा ही रहे थे कि घर का नौकर आ गया और उनको वहां देख लकड़ी से उनको भगा दिया. शहर के चूहे ने गांव के चूहे को तुरंत बिल में छुपने को कहा. गांव का चूहा काफी डर गया था.

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शहर के चूहे ने गांव के चूहे को हिम्मत देते हुए कहा कि ये सब तो यहां के जीवन का हिस्सा है, सामान्य बात है. इसके बाद दोनों घूमने गए तो एक फ़ूड स्टोर में ढेर सारा खाना देख उनके मुंह में पानी आ गया. देहाती चूहा काफ़ी खुश हुआ तो शहरी चूहे ने शान दिखाते हुए कहा कि ये देखो इसको कहते हैं खाना, तुम्हारी गांव जैसा नहीं है यहां तो पनीर, बटर, टोस्ट, चीज़ aur ना जाने क्या-क्या है. लेकिन तभी सामने से एक बड़ी सी बिल्ली आती दिखी और चूहों को देख वो उनकी तरफ़ लपकी. शहरी चूहे ने कहा दोस्त जल्दी भागो, दोनों छुप गए और किसी तरह बच गए. देहाती चूहे ने तभी वहां एक पिंजरा देखा और उसके बारे में पूछा क्योंकि उसमें खाना था. शहरी चूहे ने कहा इस खाने के लालच में मत आना, इसमें जाओगे तो पकड़े जाओगे.

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इसके बाद दोनों घर लौट आए लेकिन तभी घर के मालिक का बेटा अपने डॉगी को लेकर आ गया. शहरी चूहे ने फिर अपने दोस्त को जल्दी से बिल में छुपने को कहा और दिलासा दिए कि थोड़ी देर में ये कुत्ता चला जाएगा. कुत्ते के जाने के बाद दोनों चूहे बिल से बाहर आए. इस बार गांव का चूहा पहले से भी ज्यादा डरा हुआ था, क्योंकि लगातार इतने डरावने हादसों से उसकी जान पे बन आई थी. गांव के चूहे ने अपने दोस्त से जाने के लिए इजाजत मांगी और कहा तुमने मेरा ख़याल रखा और स्वादिष्ट खाना भी खिलाया इसके लिए तुम्हारा बहुत-बहुत शुक्रिया, लेकिन भले ही यहां कितनी भी सुविधाएं हैं पर ये भी सच है कि यहां सुकून और शांति नहीं, क्योंकि यहां हर पल जान का जोखिम है और मैं हर दिन अपनी जान को जोखिम में डालकर नहीं रह सकता दोस्त. स्वादिष्ट भोजन और सुख-सुविधाएं अपनी जगह है लेकिन मानसिक सुकून और जान की क़ीमत से बड़ा तो कुछ भी नहीं.
उसके बाद देहाती चूहा गांव के लिए निकल गया और गांव पहुंचकर ही उसने चैन की सांस ली, क्योंकि गांव का सुकून, मानसिक शांति और ताज़ा हवा में जो बात है वो शहरी जीवन में नहीं.

सीख: जान के जोखिम और इतने खतरों से भरी आराम की जिंदगी में सुकून कहां? सुरक्षित जीवन ही सुखी जीवन है, क्योंकि सुख-सुविधाओं और तरह-तरह के टेस्टी भोजन से कहीं ज़्यादा ज़रूरी मन का संतोष और मानसिक शांति व सुकून है!

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विजयनगर राज्य के एक गांव में रामैया नाम का व्यक्ति रहता था. गांव के सभी लोग उसे मनहूस मानते थे. उनका मानना था कि अगर सुबह उठकर किसी ने सबसे पहले रामैया का चेहरा देख लिया, तो उसका पूरा दिन ख़राब गुजरता है और पूरे दिन भोजन नसीब नहीं होता. रामैया इस बात से बेहद दुखी और आहत रहता था, क्योंकि कोई उसका सामना नहीं करना चाहता था.

जब यह बात महाराज कृष्णदेव राय तक पहुँची, तो उन्होंने निर्णय लिया कि इसकी वास्तविकता वो खुद जानने की कोशिश करेंगे. इसलिए रामैया को राजमहल बुलाया गया, उसको खाना-पीना खिलाकर महाराज के कक्ष के सामने वाले कक्ष में उसके रहने की व्यवस्था की गई. अगली सुबह महाराज कृष्णदेव रामैया के कक्ष में गए और उसका चेहरा देखा, क्योंकि अब महाराज को देखना था कि उनका दिन कैसा गुज़रता है और क्या वाक़ई रामैया मनहूस है?

इसके बाद महाराज भोजन के लिए बैठ गए लेकिन जैसे ही उन्होंने भोजन की तरफ़ हाथ बढ़ाया उन्हें अचानक किसी आवश्यक मंत्रणा हेतु दरबार में जाना पड़ा, तो वे बिना भोजन करे ही दरबार चले गए. अपना पूरे दिन का काम निपटाकर महाराज कृष्णदेव राय को ज़ोरों की भूख लग आई थी. जब उन्हें भोजन परोसा गया, तो उन्होंने देखा कि उनके भोजन पर मक्खी बैठी हुई है तो उनको खाना छोड़ना पड़ा और अब उनकी भूख भी मर चुकी थी इसलिए वो बिना भोजन किए ही अपने शयन कक्ष चले गए और सो गए.

महाराज को विश्वास हो गया कि रामैया मनहूस है और उन्होंने क्रोध में आकर उसे फांसी पर चढ़ा देने का आदेश दे दिया. ये जब रामैया को सैनिक फांसी पर लटकाने के लिए ले जा रहे थे तो उनका सामना तेनालीराम से हुआ और उन्होंने पूरा माजरा समझकर रामैया के कान में कुछ कहा.

फांसीगृह पहुंचने के बाद सैनिकों ने रामैया से उसकी अंतिम इच्छा पूछी. रामैया ने कहा कि मैं महाराज को एक संदेश भिजवाना चाहता हूं और फिर एक सैनिक द्वारा वह संदेश महाराज तक पहुंचाया गया.

Tenali Rama Story

इस संदेश को सुनकर महाराज सकते में आ गए क्योंकि संदेश इस प्रकार था- महाराज, सबका मानना है और अब आपको भी विश्वास हो चला है कि सुबह सबसे पहले मेरा चेहरा देखने से किसी को पूरे दिन भोजन नसीब नहीं होता, लेकिन महाराज मेरी अंतिम इच्छा ये है कि मैं पूरी जनता के सामने ये बताना चाहता हूं कि मेरा चेहरा देखने के बाद तो महाराज को सिर्फ़ भोजन नहीं मिला लेकिन मैंने तो सुबह सबसे पहले महाराज आपका मुंह देखा और उसको देखने पर तो मुझे जीवन से ही हाथ धोना पड़ रहा है. बताइए ऐसे में कौन ज़्यादा मनहूस हुआ?

संदेश सुनकर महाराज को अपनी अंधविश्वासी सोच पर शर्म आई और उनको लगा कि यदि ये संदेश जनता के सामने कहा गया तो क्या होगा? उन्होंने सैनिकों से कहकर रामैया को बुलवाया और पूछा कि उसे ऐसा संदेश भेजने का परामर्श किसने दिया था?

रामैया ने तेनालीराम का नाम लिया. महाराज तेनालीराम की बुद्धिमत्ता से बहुत प्रसन्न हुए. उन्होंने रमैया की फांसी की सज़ा निरस्त कर दी और तेनालीराम को पुरुस्कृत किया, क्योंकि उसकी वजह से ही ये अंधविश्वास का पर्दा उनकी आंखों पर से हटा और बेक़सूर रामैया के प्राण भी बच पाए!

सीख: अंधविश्वास से दूर रहना चाहिए वर्ना उसके चलते निर्दोष और बेक़सूर को सज़ा मिलती है!

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