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इन क़ानूनी शब्दों को कितना समझते हैं आप? (Legal Terms Everyone Must Know About Indian Law)

क्या आप भी बाक़ी लोगों की तरह यही समझते हैं कि उम्रकैद 14 सालों के लिए होती है? अगर हां, तो आपको बता दें कि यह आपकी ग़लतफ़हमी है. ठीक इसी तरह ऐसे कई क़ानूनी शब्द हैं, जिनके बारे में लोगों को सही जानकारी नहीं है. यहां हम कुछ ऐसे ही ज़रूरी क़ानूनी शब्दों का सही मतलब बताने और कुछ क़ानूनी ग़लतफ़हमियां दूर करने की कोशिश करेंगे, ताकि क़ानूनी जागरूकता में आप पिछड़ न जाएं.

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उम्रकैद/आजीवन कारावास

–     बहुत-से लोगों को लगता है कि उम्रकैद और आजीवन कारावास दो अलग चीज़ें हैं, जबकि यह स़िर्फ भाषा का फ़र्क़ है, जहां उम्रकैद उर्दू का शब्द है, वहीं आजीवन कारावास हिंदी का शब्द है. दोनों का अर्थ भी एक ही है- बची हुई बाक़ी की पूरी ज़िंदगी जेल में बिताने की सज़ा.

–     ज़्यादातर लोगों को यही लगता है कि उम्रकैद 14 साल की सज़ा होती है, जबकि ऐसा है नहीं. उम्रकैद यानी आजीवन कारावास अपराधी के बचे हुए शेष जीवन के लिए होता है.

–     अब सवाल यह उठता है कि यह 14 साल की गुगली कहां से आई? दरअसल, क़ानून में यह प्रावधान है कि सरकार अगर चाहे, तो उम्रकैद के किसी कैदी की सज़ा को माफ़ करके उसे कम कर सकती है, पर इसके लिए भी शर्त यह है कि सरकार को ऐसा 14 साल की अवधि पूरा होने से पहले करना होगा यानी सज़ा के 14 साल पूरे होने से पहले अगर सरकार चाहे, तो आजीवन कारावास की सज़ा को माफ़ या कम कर सकती है.

–     आपको बता दें कि आईपीसी और सीआरपीसी में ऐसे प्रावधान हैं, जो राज्य सरकार या केंद्र सरकार को यह अधिकार देते हैं कि वो चाहें, तो अच्छे व्यवहार के लिए कैदियों की सज़ा माफ़ या कम कर सकती है.

–     यहां आपको एक और ज़रूरी बात बता दें कि अगर किसी अपराध के लिए मृत्युदंड और आजीवन कारावास दोनों का प्रावधान हो, पर जज ने कैदी को मृत्युदंड न देकर आजीवन कारावास की सज़ा दी हो, तो उस व्यक्ति को 14 साल पूरे होने के बाद ही माफ़ किया जा सकता है.

–     तो अब आप समझ गए किस तरह इस बात को घुमाया गया है. सज़ा माफ़ करने से पहले सरकार अपराधी के व्यवहार और आचरण का पूरा रिकॉर्ड देखती है.

–     यहां पर यह भी ध्यान दीजिएगा कि सरकार पेशेवर अपराधियों, एक से ज़्यादा हत्या के दोषी और महिलाओं के ख़िलाफ़ किए गए अपराध की सज़ा काट रहे अपराधियों को माफ़ी नहीं देती.

24 घंटे यानी दो नहीं, केवल एक दिन

बहुत-से लोगों को यह भ्रम है कि जेल में 12 घंटे को एक दिन और 24 घंटे को दो दिन गिना जाता है, जबकि ऐसा है नहीं. जेल में भी 24 घंटे का मतलब एक दिन और सात दिन का मतलब एक हफ़्ता होता है. जेल में दिन और रात को अलग-अलग जोड़ा नहीं जाता.

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ज़मानत और पैरोल

ज़मानत उस व्यक्ति को मिलती है, जिसका केस कोर्ट में चल रहा हो और जिसे सज़ा न सुनाई गई हो, जबकि पैरोल उस व्यक्ति को मिलती है, जिसे सज़ा सुनाई जा चुकी हो और वो जेल में अपनी सज़ा भुगत रहा हो.

–     पैरोल दो तरह की होती है- एक कस्टडी पैरोल और दूसरी रेग्युलर पैरोल.

–     आपने अक्षय कुमार की फिल्म द स्टेट वर्सेस जॉली एलएलबी 2 में देखा होगा कि किस तरह एक कैदी अपनी शादी के लिए पैरोल पर बाहर आता है और इस दौरान पुलिस उसके साथ रहती है, ताकि वो फरार न हो जाए. आपको बता दें कि अगर किसी कैदी के किसी क़रीबी रिश्तेदार की मौत हो जाए, किसी क़रीबी की शादी हो, पत्नी की डिलीवरी हो, तो उसे अधिकतम छह घंटे की कस्टडी पैरोल मिल सकती है.

–     बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त जब जेल में थे, तब उनकी पैरोल की ख़बरें भी मीडिया की सुर्ख़ियों में रहती थीं. आपको बता दें कि संजय दत्त रेग्युलर पैरोल के ज़रिए जेल से बाहर आते थे, जो साल में एक महीने के लिए दी जा सकती है.

–     इसके प्रावधान कमोबेश कस्टडी पैरोलवाले ही हैं, जैसे- किसी रिश्तेदार की शादी या मृत्यु, पत्नी की डिलीवरी, बीमार पत्नी की देखभाल, घर की मरम्मत आदि के लिए आप रेग्युलर पैरोल के लिए आवेदन कर सकते हैं.

–     इसके लिए ज़रूरी है कि कैदी ने जेल में एक साल की सज़ा पूरी की हो, पहले कभी पैरोल पर रिहा होने पर कोई अपराध न किया हो और जेल में उसका आचरण संतोषजनक हो, तो उसे पूरे साल में एक महीने की पैरोल मिल सकती है.

फर्स्ट इंफॉर्मेशन रिपोर्ट (एफआईआर)

हम सभी जानते हैं कि अगर हमारे साथ किसी तरह का अपराध हो, तो हमें तुरंत पुलिस में उसकी एफआईआर दर्ज करानी चाहिए. लेकिन क्या आप ये जानते हैं कि पुलिस केवल कॉग्निज़ेबल यानी संज्ञेय अपराधों के लिए ही एफआईआर दर्ज कर सकती है. इसके लिए आपको कॉग्निज़ेबल और नॉन कॉग्निज़ेबल अपराधों को समझना होगा.

संज्ञेय अपराध (कॉग्निज़ेबल ऑफेंस)

ऐसे अपराध जिनके लिए आरोपी को गिरफ़्तार करने के लिए पुलिस को वॉरंट की ज़रूरत नहीं पड़ती. ये अपराध हत्या, बलात्कार, दहेज के लिए हत्या, अपहरण, चोरी आदि हैं.

ग़ैर-संज्ञेय अपराध (नॉन-कॉग्निज़ेबल ऑफेंस)

ये ऐसे अपराध हैं, जिनके लिए पुलिस को बिना वॉरंट गिरफ़्तार करने का अधिकार नहीं है, इसलिए पुलिस स़िर्फ अपने स्टेशन डायरी में इसे नोट करके रख लेती है और मजिस्ट्रेट से आदेश मिलने के बाद ही कोई कार्रवाई करती है. ये अपराध कम गंभीर होते हैं, जैसे- जालसाज़ी, धोखाधड़ी, मानहानि, हमला करना आदि.

–     अगर आपकी कोई चीज़ खो जाती है, तो पुलिस उसके लिए एनसीआर रिपोर्ट लिखती है यानी पुलिस ने स़िर्फ डॉक्यूमेंट बनाया कि आपकी कोई चीज़ खो गई है, पर उसकी जांच करने की बाध्यता उन्हें नहीं है.

–     अब आप समझ गए कि एफआईआर किन मामलों में दर्ज करानी है और किन मामलों के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना है. यहां आपको एक बात और बता दें कि अगर कॉग्निज़ेबल ऑफेंस के मामले में भी पुलिस ऑफिसर एफआईआर दर्ज नहीं करता, तो आप सुप्रीटेंडेंट या फिर मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के पास जाकर उसके लिए आदेश ला सकते हैं.

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ज़मानती और ग़ैर-ज़मानती अपराध (बेलेबल-नॉनबेलेबल ऑफेंस)

कुछ ऐसे अपराध होते हैं, जिनमें ज़मानत मिल जाती है, पर कुछ अपराध इतनेे गंभीर होते हैं, जिनमें ज़मानत नहीं मिलती. आम जनता को बलात्कार, हत्या और देशद्रोह ही ग़ैर-ज़मानती लगते हैं, जबकि इसकी सूची काफ़ी लंबी है.

ज़मानती अपराध

हमारे देश में कई ऐसे छोटे-मोटे अपराध हैं, जिनके लिए आपको आसानी से ज़मानत मिल जाती है. ये अपराध बहुत गंभीर नहीं होते, इसलिए क़ानून यहां ज़मानत की छूट देता है. वैसे तो लिस्ट काफ़ी लंबी है, पर यहां हम कुछ के बारे में बता रहे हैं- किसी ग़ैरक़ानूनी जनसमूह का सदस्य होना, उपद्रव करना, सरकारी अधिकारी के आदेश की अवहेलना करना, धोखाधड़ी के लिए सरकारी कर्मचारी की यूनीफॉर्म का ग़लत इस्तेमाल, सरकारी काम में अड़चन डालना, कोर्ट की कार्यवाही को बाधित करना, मिलावट करना, धार्मिक पूजा में शामिल जनसमूह में अशांति फैलाना आदि.

गैर-ज़मानती अपराध

ये बहुत ही गंभीर अपराध होते हैं, इसलिए क़ानून ऐसे मामलों को ग़ैर-ज़मानती रखता है. इसके कुछ उदाहरण हैं- हत्या, दहेज के लिए हत्या, हत्या का प्रयास, जानबूझकर किसी को गंभीर चोट पहुंचाना, अपहरण, बलात्कार, देशद्रोह, राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के ज़रिए राष्ट्र के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ना आदि.

भगवतगीता से शपथ लेना

अगर आप किसी आपराधिक मामले में गवाही देने कोर्ट जानेवाले हैं और भगवतगीता पर हाथ रखकर कसम खाने को लेकर काफ़ी उत्साहित हैं, तो आपको बता दें कि असली कोर्ट में ऐसा कुछ नहीं होता. ये स़िर्फ बॉलीवुड फिल्मों की करामात है. कोर्ट में द इंडियन ओथ्स एक्ट, 1873 का पालन किया जाता है. वैसे ये फिल्मी प्रथा कोरी काल्पनिक भी नहीं है, क्योंकि मुग़ल काल में इस प्रथा का इस्तेमाल किया जाता था, जहां हिंदुओं को भगवतगीता और मुसलमानों को कुरान पर हाथ रखकर सच्चाई की शपथ लेनी होती थी. यहां तक कि बॉम्बे हाई कोर्ट में भी साल 1957 तक यह प्रथा बदस्तूर जारी थी.

– अनीता सिंह

जानें हिंदू मैरिज एक्ट… समय के साथ क्या-क्या बदला? (Hindu Marriage Act: Recent Changes You Must Know)

Hindu Marriage Act Changes

साल 1955 में हमारे देश के जो हालात थे, आज स्थिति उससे बिल्कुल अलग है. आज लड़कियां भी उच्च शिक्षा प्राप्त करके सफलता के नित नए आयाम छू रही हैं, ऐसे में हमारा क़ानून भला बदलाव से अछूता कैसे रह सकता है. जब-जब महिलाओं ने अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाई, तब-तब क़ानून में महत्वपूर्ण बदलाव हुए. पिछले 63 सालों में कितना बदला हमारा हिंदू विवाह क़ानून? आइए जानते हैं.

Hindu Marriage Act Changes

कितना जानते हैं आप हिंदू मैरिज एक्ट के बारे में?

हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 में बनाया गया था. इस क़ानून के तहत सभी हिंदुओं, सिख, जैन और बौद्धों के शादी, तलाक़ और मेंटेनेंस के मामले सुलझाए जाते हैं.

–     सबसे पहले तो शादी के समय लड़की की उम्र 18 और लड़के की 21 साल होनी चाहिए. कुछ समय पहले जनहित याचिका के तहत एक वकील ने लड़के की उम्र भी 18 साल करने की मांग की थी, जिसे कोर्ट ने सिरे से ख़ारिज कर दिया.

–     हिंदू मैरिज एक्ट के तहत कोई शादीशुदा व्यक्ति पहली पत्नी के जीवित रहते, उससे तलाक़ लिए बिना दूसरी शादी नहीं कर सकता. अगर ऐसा होता है, तो उसे सात साल की जेल और जुर्माना दोनों हो सकता है. कुछ लोगों ने इसका तोड़ निकालने के लिए धर्म बदलकर शादी करनी शुरू की, जिसके ख़िलाफ़ 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने ़फैसला सुनाया कि यह क़ानूनन जुर्म है, जिसके लिए उस व्यक्ति को सज़ा हो सकती है.

–     गोवा के फैमिली लॉ के कोड ऑफ यूसेजेस एंड कस्टम्स में गैर-ईसाई हिंदू व्यक्ति को एक से ज़्यादा शादियां करने की छूट है, बशर्ते 25 साल की उम्र तक उसकी पत्नी मां न बनी हो और 30 साल की उम्र तक उन्हें कोई बेटा न हो.

–     इसके तहत शादी के लिए किसी ख़ास रस्म का ज़िक्र नहीं किया गया है. लड़के या लड़की किसी के भी रीति-रिवाज़ों के आधार पर शादी की जा सकती है.

–     शादी के बाद पति-पत्नी दोनों को ही वैवाहिक अधिकार (सेक्सुअल रिलेशन के अधिकार) मिलते हैं. क़ानूनन शादी तभी संपन्न मानी जाती है, जब उनके बीच शारीरिक संबंध बनते हैं. अगर कोई पार्टनर दूसरे को इस अधिकार से महरूम रखता है, तो दूसरा पार्टनर कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा सकता है. कोर्ट ऐसी शादी को अमान्य या निरस्त कर सकता है.

–     इसके तहत शादी का रजिस्ट्रेशन ज़रूरी है, ताकि शादी के बाद होनेवाली लीगल डॉक्यूमेंटेशन में कोई अड़चन न आए, लेकिन आज भी बहुत से लोग मैरिज सर्टिफिकेट नहीं बनवाते, जिसके कारण कुछ लोग उसका ग़लत फ़ायदा भी उठाते हैं.

–     हिंदू मैरिज एक्ट में शादी को पवित्र बंधन माना गया है, लेकिन अगर दोनों की शादी में समस्या आ रही है, तो वो तलाक़ ले सकते हैं. तलाक़ के आधार- व्यभिचार, धर्मांतरण, मानसिक विकार, कुष्ठ रोग, नपुंसकता, सांसारिक कर्त्तव्यों को त्याग देना, सात सालों से लापता, जुडीशियल सेपरेशन (कोर्ट द्वारा अलग रहने की इजाज़त), किसी भी तरह के शारीरिक संबंध नहीं बनाना और निष्ठुरता या क्रूरता हैं. पिछले कुछ सालों में मानसिक क्रूरता (मेंटल क्रुएल्टी) के आधार पर तलाक़ के मामलों में बढ़ोतरी हुई है.

–   क़ानून ने महिलाओं को परमानेंट एलीमनी और मेंटेनेंस का अधिकार दिया है, लेकिन वो ऐसी महिलाएं हैं, जो ख़ुद अपना भरण-पोषण नहीं कर सकतीं. कामकाजी महिलाओं को मेंटेनेंस का अधिकार नहीं था, लेकिन 2011 में दिल्ली हाईकोर्ट ने अहम् ़फैसला दिया कि पति से अलग रहनेवाली कामकाजी महिलाएं भी मेंटेनेंस की हक़दार होंगी.

–     बच्चों की कस्टडी को लेकर भी नियम बनाए गए हैं. तलाक़ के बाद अगर बच्चा छोटा है, तो मां को ही उसकी कस्टडी मिलती है. बड़े बच्चों के लिए कोर्ट मामले को दोनों की आर्थिक स्थिति व परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ़फैसला करता है.

किन स्थितियों में शादी हो सकती है अमान्य?

हिंदू मैरिज एक्ट में ऐसा भी प्रावधान है कि कुछ स्थितियों में आप अपनी शादी को कोर्ट से अमान्य घोषित करा सकते हैं. ऐसे में आप तलाक़शुदा नहीं कहे जाएंगे, बल्कि ऐसा माना जाएगा कि आपकी शादी हुई ही नहीं थी.

–   अगर शादी के व़क्त लड़की किसी और पुरुष से प्रेग्नेंट हो, तो ऐसी सूरत में शादी अमान्य हो सकती है. कुछ साल पहले ऐसा एक मामला सुर्ख़ियों में आया था. उस केस में लड़की शादी के व़क्त प्रेग्नेंट थी. शादी के बाद जब उसके पति को इसका शक हुआ, तो उन्होंने सोनोग्राफी करवाई, तो पता चला कि लड़की प्रेग्नेंट है. उसके पति ने तुरंत फैमिली कोर्ट में शादी को अमान्य करने की याचिका दाख़िल की. इस मामले में आपको यह ध्यान रखना होगा कि शादी के एक साल के भीतर मामला दाख़िल करना होगा.

–     अगर नपुंसकता के कारण पति-पत्नी का रिश्ता नहीं बन पाया, तो शादी क़ानूनन पूरी नहीं मानी जाएगी और ऐसे में व्यक्ति को हक़ है कि वो शादी को अमान्य करा सके. ऐसे में आपको तलाक़ लेने की ज़रूरत नहीं, बल्कि शादी को अमान्य करा सकते हैं.

–    अगर शादी के बाद आपको पता चले कि शादी के व़क्त ही आपके पार्टनर की मानसिक स्थिति सही नहीं थी और यह बात आपसे छुपाई गई, तो आप ऐसी स्थिति में अपनी शादी को अमान्य करा सकते हैं.

यह भी पढ़ें: 10 क़ानूनी मिथ्याएं और उनकी हक़ीक़त (10 Common Myths About Indian Laws Busted!)

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विवाह विधेयक क़ानून, 2010

हिंदू मैरिज एक्ट और स्पेशल मैरिज एक्ट में कुछ बदलाव करने के उद्देश्य से साल 2010 में यह विधेयक लाया गया था. इस विधेयक में महिलाओं के ह़क़ में कई बदलाव किए गए हैं. 2013 में यह विधेयक राज्यसभा में पारित हुआ, पर लोकसभा में पारित न हो सका. इसमें प्रस्तावित कुछ बदलावों के बारे में आइए आपको बताते हैं.

–    इसमें पत्नी को यह अधिकार दिया गया है कि वो इस आधार पर अपने पति से तलाक़ ले सकती है कि अब उनकी शादी इस मुक़ाम पर पहुंच गई है कि उसे बरक़रार रखना नामुमकिन है, इसलिए वो तलाक़ चाहती है.

–     अगर पति ‘शादी पूरी तरह से टूट गई है और बरक़रार नहीं रह सकती,’ इस आधार पर तलाक़ लेना चाहता है, तो पत्नी इसका विरोध कर सकती है, पर पति के पास यह अधिकार नहीं है.

–     पत्नी को पति की चल-अचल संपत्ति में समान अधिकार मिलेगा. साथ ही उसे पति की रिहायशी संपत्ति यानी घर आदि में हिस्सा मिलेगा.

–     पति-पत्नी द्वारा गोद लिए बच्चों को सगे बच्चों के समान प्रॉपर्टी में अधिकार मिलेगा.

–     आपसी सहमति से तलाक़ के लिए याचिका दायर करने के बाद कोई पक्ष क़ानूनी कार्यवाही से पीछे नहीं हट सकता.

छह महीने का इंतज़ार ख़त्म

इस बीच सितंबर, 2017 में हिंदू मैरिज एक्ट में एक और अहम् बदलाव आया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपसी सहमति से तलाक़ लेने के लिए लोगों को 6 महीने का इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा. कोर्ट के मुताबिक़ अगर दोनों के बीच समझौते की कोई गुंजाइश नहीं बची है और बच्चों की कस्टडी का ़फैसला भी हो गया है, तो उन्हें छह महीने के कूलिंग ऑफ पीरियड को पूरा करने की मजबूरी नहीं है. इससे दोबारा वो जल्दी अपना घर बसा सकते हैं.

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Hindu Marriage Act Changes  
 स्पेशल मैरिज एक्ट से जुड़ी 10 ज़रूरी बातें

यह क़ानून ख़ासतौर से अंतर्जातीय विवाह कर रहे लोगों की रक्षा के लिए बनाया गया है. इसके तहत अपनी शादी रजिस्टर कराने के लिए आपको कोई धार्मिक रीति-रिवाज़ निभाने नहीं पड़ते.

  1. इस एक्ट के तहत अंतर्जातीय और अलग-अलग धर्म के लोग विवाह कर सकते हैं.
  2. इसके तहत हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन या बौद्ध धर्म के लोग विवाह कर सकते हैं.
  3. शादी के लिए आपको 30 दिन पहले नोटिस देना पड़ता है. दूल्हा या दुल्हन दोनों में से कोई एक अपने इलाके के रजिस्ट्रार ऑफिस में नोटिस जमा कर सकता है.
  4. इसके तहत स़िर्फ भारतीय ही नहीं, बल्कि विदेशों में रह रहे प्रवासी भारतीय भी विवाह रजिस्टर करा सकते हैं.
  5. हिंदू मैरिज एक्ट की तरह इसमें भी कुछ नियम व शर्तें हैं, जैसे-

–     लड़के की उम्र कम से कम 21 साल और लड़की 18 साल होनी चाहिए.

–     दोनों कुंआरे हों या फिर शादीशुदा न हों यानी कोई पति-पत्नी न हों.

–     शादी के व़क्त मानसिक स्थिति अच्छी होनी चाहिए.

–     दोनों ही पक्ष प्रोहिबिटेड रिलेशनशिप की कैटेगरी में न आते हों. प्रोहिबिटेड रिलेशनशिप यानी भाई-बहन न हों, न ही सौतेले भाई-बहन हों. आपको बता दें कि सपिंडवाले भी इसके तहत शादी नहीं कर सकते. सपिंड यानी मां की तरफ़ से तीन पीढ़ी और पिता की तरफ़ से पांच पीढ़ी तक में शादी निषिद्ध मानी जाती है.

  1. 30 दिनों के लिए शादी का नोटिस रजिस्ट्रार ऑफिस के नोटिस बोर्ड पर लगाया जाता है. अगर किसी को इस शादी से आपत्ति हो, तो वो अपनी आपत्ति ज़ाहिर कर सकता है.
  2. अगर कोई आपत्ति आती है, तो रजिस्ट्रार को उसे 30 दिनों के भीतर सुलझाना होता है, लेकिन अगर कोई आपत्ति नहीं आती, तो नियत तारीख़ को तीन गवाहों की उपस्थिति में शादी संपन्न कराई जाती है.
  3. हर किसी के लिए यह जानना ज़रूरी है कि इसके तहत शादी करनेवालों के प्रॉपर्टी सक्सेशन के मामले इंडियन सक्सेशन एक्ट के तहत सुलझाए जाते हैं.
  1. यहां यह जानना भी बेहद ज़रूरी है कि आप शादी के एक साल के भीतर तलाक़ के लिए अप्लाई नहीं कर सकते. लेकिन अगर आप साबित कर सकें कि शादी बहुत बुरे हालात से गुज़र रही है, तो कोर्ट आवेदन पर अमल कर सकता है.
  2. इस एक्ट में दोबारा शादी का प्रावधान भी शामिल किया गया है, लेकिन शर्त यही है कि पहली शादी टूट चुकी हो और मामले में दोबारा अपील की गुंजाइश न बची हो.

– अनीता सिंह

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10 क़ानूनी मिथ्याएं और उनकी हक़ीक़त (10 Common Myths About Indian Laws Busted!)

क़ानून की ऐसी कई छोटी-छोटी बारीक़ियां हैं, जिनके बारे में लोगों को पता ही नहीं होता और औरों से सुनी-सुनाई बातों पर विश्‍वास कर उसी को सच मानने लगते हैं. क़ानून से जुड़ी ऐसी ही कुछ मिथ्याओं के सच उजागर करने की हमने यहां एक कोशिश की.

Myths About Indian Laws

मिथ 1. मुझे कोर्ट में ओरिजनल डॉक्यूमेंट्स जमा करने पड़ेंगे.

सच: ऐसा बिल्कुल नहीं है और आप ऐसा भूलकर भी मत करना, क्योंकि कोर्ट में उनके खोने का डर बना रहता है. सिविल प्रोसीज़र कोड, 1908 के अनुसार, कोर्ट में पेटीशन दाख़िल करते समय आपको उसके साथ एफीडेविट और ओरिजनल डॉक्यूमेंट्स की सर्टीफाइड फोटोकॉपीज़ सबूत के तौर पर जमा करनी होती हैं. हां, सुनवाई के दौरान आपको ओरिजनल डॉक्यूमेंट्स दिखाने पड़ते हैं, पर अगर उस समय भी आप ओरिजनल्स नहीं दिखा सकते, तो सर्टीफाइड फोटोकॉपीज़ भी दिखा सकते हैं. याद रखें, अटेस्टेशन किसी गैजेटेड ऑफिसर से ही करवाएं और अपनी सहूलियत के लिए हमेशा ओरिजनल्स की सर्टीफाइड फोटोकॉपीज़ के दो सेट बनाकर रखें, ताकि ज़रूरत पड़ने पर उनका इस्तेमाल कर सकें. ओरिजनल्स आप कभी किसी को न दें, अगर आप चाहें, तो अपने वकील को भी सर्टीफाइड कॉपीज़ दे सकते हैं. सेफ्टी के तौर पर ओरिजनल्स को हमेशा स्कैन करके कंप्यूटर में सेव करके रखें.

मिथ 2: मैं जब भी चाहूं कोर्ट में केस दाख़िल कर सकता हूं. 

सच: द लिमिटेशन एक्ट, 1963 के तहत सभी सिविल केसेज़ ‘टाइम बार्ड’ होते हैं यानी हर केस की एक तय समय सीमा होती है. किसी भी मामले को उस तय समय के भीतर ही कोर्ट में दाख़िल किया जा सकता है, वरना आप उसके ख़िलाफ़ कार्यवाही का मौक़ा गंवा सकते हैं. मामले के अनुसार यह समय सीमा 3 महीने से लेकर 3 साल तक की हो सकती है. हालांकि कुछ मामलों में सहूलियत मिल जाती है, बशर्ते देरी की वजह कोर्ट को वाजिब लगे, जैसे- अगर कोई 16 साल का है, जिसे पेटीशन दाख़िल करना है और उसका कोई गार्जियन नहीं है, तो उसके केस की समय सीमा उसके 18 साल के होने के बाद से शुरू होगी.

मिथ 3: अगर मैं गारंटर हूं, तो इसका यह मतलब नहीं कि मैं लोन का अमाउंट चुकाऊं. 

सच: इस मिथ की हक़ीक़त को आप जितनी जल्दी समझ लें, आपके लिए उतना ही अच्छा होगा. जब आप किसी के लिए लोन के गारंटर बनते हैं, तो अगर किसी कारणवश वह लोन नहीं चुका पाता या उसकी मृत्यु हो जाती है, जिसके बाद बैंक के पास अपना पैसा वसूलने के लिए गारंटर एकमात्र ज़रिया बचता है, तो बैंक को पूरा अधिकार है कि वह बचे हुए लोन का पूरा अमाउंट आपसे वसूल कर सकता है. इतना ही नहीं, यह भविष्य में आपके लोन लेने की योग्यता को भी प्रभावित कर सकता है. इसलिए अगली बार लोन के लिए किसी के गारंटर बनने से पहले पूरी तरह से आश्‍वस्त  हो जाएं कि वह पूरा लोन चुका पाएगा, तभी उसके गारंटर बनें.

मिथ 4: बिना किसी वकील के मैं कंज़्यूमर कोर्ट में केस नहीं कर सकता.   

सच: कंज़्यूमर कोर्ट में केस करने के लिए आपको वकील की ज़रूरत नहीं है, अगर आप अपने केस को ख़ुद पेश कर सकते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार आप ऐसा कर सकते हैं. दरअसल, वकील की लंबी-चा़ैडी फीस के बारे में सोचकर ही बहुत-से लोग कंज़्यूमर कोर्ट में जाने से कतराते हैं, क्योंकि कंज़्यूमर कोर्ट के छोटे-मोटे मामलों में मुआवज़ा बहुत ज़्यादा नहीं मिलता. ऐसे में वकील की फीस देना हर किसी को भारी पड़ता है. इसलिए अगर आपको भी किसी कंपनी ने कोई धोखा दिया है या आपको उनसेकोई शिकायत है, तो आप भी उसके ख़िलाफ़ कंज़्यूमर कोर्ट जा सकते हैं और आपको किसी वकील की भी ज़रूरत नहीं.

मिथ 5: मैं अपनी ख़ानदानी प्रॉपर्टी जिसे चाहूं, जैसे चाहूं, गिफ्ट कर सकता हूं.

सच: ख़ानदानी प्रॉपर्टी पूरे परिवार की होती है, इसलिए किसी एक को कोई हक़ नहीं होता कि वह उसे अपनी मर्ज़ी से गिफ्ट कर सके. जब तक कि परिवार का एकलौता या आख़िरी सदस्य न हो, तब तक प्रॅापर्टी स़िर्फ बांटी जा सकती है, गिफ्ट नहीं की जा सकती. हां, अगर आपके अलावा आपके ख़ानदान में प्रॉपर्टी क्लेम करनेवाला दूसरा कोई नहीं है, तो आप प्रॉपर्टी को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक बेच या गिफ्ट कर सकते हैं. यह नियम हिंदू संयुक्त परिवार में रहनेवाले जॉइंट प्रॉपर्टीवालों के लिए है.

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Myths About Indian Laws
मिथ 6: लेटर ऑफ अथॉरिटी के ज़रिए मैं किसी को भी कोई भी ज़िम्मेदारी दे सकता हूं.

सच: प्रतिनिधित्व के लिए दो डॉक्यूमेंट्स इस्तेमाल में लाए जाते हैं. एक लेटर ऑफ अथॉरिटी और दूसरा पावर ऑफ अटॉर्नी. लेटर ऑफ अथॉरिटी के ज़रिए बैंक से चेक बुक लेना, डॉक्यूमेंट्स जमा करना या लेना जैसे छोटे व आसान काम दिए जा सकते हैं, जबकि कॉम्प्लेक्स फाइनेंशियल मैटर्स, जैसे- प्रॉपर्टी बेचना, डॉक्यूमेंट्स व चेक साइन करने आदि बड़े व महत्वपूर्ण ट्रांज़ैक्शन्स के लिए पावर ऑफ अटॉर्नी का इस्तेमाल किया जाता है.

मिथ 7: कोर्ट के बाहर किए गए समझौते को मैं कोर्ट में चैलेंज नहीं कर सकता.

सच: यह सच नहीं है. ज़्यादातर लोग कोर्ट की लंबी कार्यवाही से बचने के लिए आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट यानी कोर्ट के बाहर ही मामले को निपटाना, को तवज्जो देते हैं. पर अगर आपको लगता है कि इस सेटलमेंट में आपके साथ धोखाधड़ी हुई है या आपके ऊपर दबाव डालकर ज़बर्दस्ती सेटलमेंट करवाया गया है, तो आप उसके ख़िलाफ़ कोर्ट में जा सकते हैं. कोर्ट एग्रीमेंट के नियम व शर्तों को देखकर अपना ़फैसला सुनाते हैं. इसके अलावा आर्बिट्रेशन (किसी और की मध्यस्थता) के ज़रिए सुलझाए गए मामले को भी लेकर आप कोर्ट जा सकते हैं. इसलिए इस ग़लतफ़हमी में बिल्कुल न रहें कि अगर कोर्ट के बाहर समझौता कर लिया है, तो उसके ख़िलाफ़ कोर्ट में नहीं जा सकते.

मिथ 8: सेकंड हैंड गाड़ी ख़रीदने पर इंश्योरेंस कंपनी को सूचित करने की कोई ज़रूरत नहीं.

सच: जब भी आप सेकंड हैंड गाड़ी ख़रीदते हैं, तो स़िर्फ गाड़ी की कंडीशन पर ही नहीं, बल्कि पेपरवर्क पर भी पूरा ध्यान दें. वेहिकल रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट, रोड टैक्स रसीद के साथ-साथ वेहिकल इश्योरेंस भी अपने नाम पर ट्रांसफर करवा लें. अगर इंश्योरेंस पेपर पर आप नाम ट्रांसफर नहीं करवाते और गाड़ी का एक्सीडेंट हो जाता है या गाड़ी चोरी हो जाती है, तो इंश्योरेंस कंपनी आपका क्लेम पास नहीं करेगी, क्योंकि पेपर्स पर आपका नाम नहीं है. इसलिए नियमानुसार गाड़ी ख़रीदने के 14 दिनों के भीतर ही इश्योरेंस पेपर्स पर अपना नाम ट्रांसफर करवा लेने में ही आपका फ़ायदा है.

मिथ 9: मेरे वारिस को मेरे सारे शेयर्स अपने आप मिल जाएंगे.

सच: यह ख़ासतौर पर उनके लिए है, जो शेयर्स आदि में इंवेस्ट करते रहते हैं. अगर आपने वसीयत में लिख दिया है कि मेरे बाद मेरा सब कुछ मेरी पत्नी या बच्चों को मिलेगा, लेकिन शेयर्स के लिए किसी और को नामांकित (नॉमिनी) किया है, तो नियमानुसार आपके बाद आपके शेयर्स नॉमिनी को मिलेंगे ना कि क़ानूनी वारिस को. द कंपनीज़ एक्ट के सेक्शन 109ए के अनुसार, अकाउंट होल्डर के बाद उसके शेयर्स क़ानूनी तौर पर नॉमिनी को मिलेंगे.एक्सपर्ट्स के अनुसार भविष्य में किसी भी तरह की परेशानी से बचने के लिए नॉमिनी का ही नाम वसीयत में भी शेयर्स के लिए लिखें.

मिथ 10: मेरे बाद मेरी प्रॉपर्टी का बंटवारा करने के लिए ऑनलाइन वसीयत काफ़ी है.

सच: डिजिटली साइन किए हुए ऑनलाइन वसीयत को हमारे देश में मान्यता नहीं मिलती. ऑनलाइन वसीयत का प्रिंटआउट लेकर आपको दो गवाहों की मौजूदगी में उसे साइन करना होता है. उसके बाद उन दोनों गवाहों को भी उस वसीयत को अटेस्ट करना पड़ता है, जिसके बिना वह वसीयत मान्य नहीं होती. हालांकि ज़रूरी नहीं फिर भी अगर आप चाहें, तो वसीयत को रजिस्टर करा सकते हैं. आजकल ऑनलाइन बहुत-सी वेबसाइट्स हैं,  जैसे- ुुु.ट-थळश्रश्र और ुुु.ङशसरलूुीळींशी.लेा जिनकी मदद से कुछ अमाउंट देकर आप अपनी वसीयत बनवा सकते हैं, पर यह काफ़ी नहीं. उस वसीयत का प्रिंटआउट लेकर, साइन और अटेस्ट कराना बहुत ज़रूरी है.  बॉक्स अगर ओरिजनल पेपर्स खो जाएं, तो डुप्लीकेट के लिए क्या करें?यहां हम जनरल प्रोसेस के बारे में बता रहे हैं, जो ज़्यादतर मामलों मेंे इस्तेमाल किया जाता है. – पुलिस में एफआईआर दर्ज कराएं.- एक इंग्लिश और स्थानीय भाषा के न्यूज़पेपर में पब्लिक नोटिस जारी करें.- ओरिजनल इश्यूअर को डुप्लीकेट बनाने के लिए अप्लाई करें.- एफआईआर और प्रेस क्लिपिंग की कॉपी सबूत के तौर पर रखें.

वसीयत के लिए कुछ ख़ास टिप्स

आप जिन लोगों को अपनी प्रॉपर्टी देना चाहते हैं, उनके नाम साफ़-साफ़ लिखें. उनके निकनेम या आधे-अधूरे नाम न लिखें.- अगर आप किसी को कुछ ऐसा देना चाहते हैं, जिसकी रक़म लिखी जा सकती है, तो वह रक़म ज़रूर लिखें.- जिन चीज़ों के लिए रक़म लिखना मुमकिन नहीं, उनके लिए प्रॉपर्टी का सही-सही डिस्क्रिप्शन लिखें.- जो दो लोग वसीयत को अटेस्ट करेंगे, उनको या उनकी पत्नी को इस वसीयत से कोई फ़ायदा नहीं मिलना चाहिए यानी वसीयत ऐसे लोगों से अटेस्ट कराएं, जिन्हें उस वसीयत से कोई लाभ नहीं मिलनेवाला. – अपनी वसीयत के लिए एक एक्ज़ीक्यूटर अपॉइंट करें, जिसकी यह ज़िम्मेदारी होगी कि वह इस बात को सुनिश्‍चित करे कि सभी बातों का वैसा ही पालन किया गया, जैसा कि वसीयत में लिखा गया था.

– अनीता सिंह

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मरीज़ जानें अपने अधिकार (Know Your Patients Rights)

 
Patients Rights
बात कुछ साल पहले की है, जब एक सरकारी अस्पताल में जांच के बाद डॉक्टरों ने तारा को बताया कि उन्हें बे्रस्ट कैंसर है, जिसके लिए उन्हें तुरंत मैसेक्टॉमी करवानी होगी. डॉक्टरों को भगवान का दूसरा रूप माननेवाले उनके पति ने किसी और अस्पताल या एक्सपर्ट डॉक्टर से  सेकंड ओपिनियन की ज़रूरत नहीं समझी और बिना डॉक्टर से उसके बारे में अधिक जानकारी लिए सर्जरी की मज़ूरी दे दी. सर्जरी के बाद जब डॉक्टर्स ने जांच के लिए ब्रेस्ट की गांठ लैब भेजी, तो पता चला कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर था ही नहीं. बेवजह तारा ने न स़िर्फ सर्जरी की पीड़ा झेली, बल्कि उनके परिवार को भी मानसिक कष्ट हुआ. उस समय अगर तारा को या उनके पति को अपने अधिकारों का पता होता या वो थोड़े सतर्क होते, तो उन्हें यह सब न झेलना पड़ता. यह किसी एक तारा की कहानी नहीं है. आज देश में हज़ारों ऐसे लोग हैं, जिन्हें अपने अधिकारों की न तो जानकारी है और न ही वो इस दिशा में पहल कर रहे हैं. माना कि डॉक्टर्स अपनी पूरी कोशिश करके व्यक्ति को स्वस्थ करने का प्रयास करते हैं, पर कुछ ऐसे भी हैं, जो इस नोबल प्रोफेशन को बदनाम कर रहे हैं. ऐसे में आपको अपने पेशेंट्स राइट्स के बारे में पता होना चाहिए, ताकि आपके साथ ऐसा न हो.

क्या हैं आपके पेशेंट्स राइट्स?

– मरीज़ या उसके गार्जियन को बीमारी या रोग के बारे में पूरी जानकारी मिलनी चाहिए.
– उस हेल्थ प्रॉब्लम के क्या-क्या साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं, उसका आपकी सेहत पर क्या प्रभाव पड़ेगा, आपके साथ क्या आपके परिवार को भी किसी तरह की सावधानी की ज़रूरत है आदि की पूरी जानकारी मिलनी चाहिए.
– हर मरीज़ को यह अधिकार है कि पूरे मान-सम्मान के साथ उसका इलाज
हो. उसके साथ कोई बदसलूकी नहीं कर सकता.
– अगर ऐसी कोई सरकारी योजना है, जिससे आपको फाइनेंशियल मदद मिल सकती है, तो डॉक्टर या हॉस्पिटल अथॉरिटीज़ उसके बारे में आपको सूचित करें.
– इलाज के दौरान भी ट्रीटमेंट या बीमारी के बारे में सेकंड ओपिनियन के लिए आप अपनी रिपोर्ट्स किसी और डॉक्टर को दिखा सकते हैं. इसके लिए आपको डॉक्टर से कुछ छिपाने की ज़रूरत नहीं है. आप उन्हें नि:संकोच बता सकते हैं कि आप किसी और एक्सपर्ट से राय लेना चाहते हैं.
इलाज के लिए डायग्नोसिस, ट्रीटमेंट और दवाइयों की पूरी जानकारी समय-समय पर आपको दी जानी चाहिए.
– यह अस्पताल की ज़िम्मेदारी और आपका अधिकार है कि आपकी बीमारी से जुड़ी सभी रिपोर्ट्स की जानकारी गोपनीय रखी जाए.
– इमर्जेंसी में जल्द से जल्द आपको इलाज मुहैया कराया जाए.
– आपके मेडिकल रिकॉर्ड्स की फोटोकॉपी आपको भी दी जाए.
– अस्पताल के सभी नियम-क़ायदे के साथ-साथ उनकी सभी सुविधाओं की जानकारी भी आपको दी जाए.
– अगर आपको लगता है कि कोई सबस्टैंडर्ड दवा अस्पताल ने आपको दी है, तो आप उसकी शिकायत लोकल फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन से कर सकते हैं.
– अगर डॉक्टर आपकी बीमारी के रिकॉर्ड्स को किसी मेडिकल कॉन्फ्रेंस में इस्तेमाल करना चाहते हैं, तो उसमें आपकी सहमति ज़रूरी है. ऐसा न करने पर आप उन पर गोपनीयता भंग करने का आरोप लगा सकते हैं.
– किसी भी महिला मरीज़ की जांच करते समय डॉक्टर के साथ नर्स/सिस्टर का होना ज़रूरी है.  अगर ऐसा नहीं है और आप असहज महसूस कर रही हैं, तो आप सिस्टर को साथ रखने की मांग कर सकती हैं.
– आपको पूरा अधिकार है कि आप वर्तमान डॉक्टर से इलाज न लेकर किसी और से इलाज करवा सकते हैं, पर जानलेवा बीमारियों में ऐसा करना आपके लिए ही ख़तरनाक हो सकता है.
– अगर डॉक्टर आपको एक्सपेरिमेंटल ट्रीटमेंट की सलाह देते हैं, जिसमें एक्सपेरिमेंटल थेरेपीज़, एक्सपेरिमेंटल दवाइयां या फिर अलग लाइन ऑफ ट्रीटमेंट शामिल हो, तो आप उससे इंकार कर सकते हैं.
Patients Rights
कर्त्तव्यों का भी करें पालन
– पूरी ईमानदारी से डॉक्टर द्वारा बताए गए निर्देशों का पालन करें.
डॉक्टर्स और सभी मेडिकल प्रोफेशनल्स का सम्मान करें.
– अपनी बीमारी से जुड़ी सभी रिपोर्ट्स, बिल्स और डॉक्यूमेंट्स संभालकर रखें.
– मेडिकल इंश्योरेंस है, तो ट्रीटमेंट से पहले कैशलेस या रीफंड के बारे में ज़रूरी बातें समझ लें.
– अगर ट्रीटमेंट, टेस्ट्स या दवाइयों आदि से संबंधित कोई शिकायत है, तो पहले अपने डॉक्टर से बात करें. हो सकता है कम्यूनिकेशन में कहीं प्रॉब्लम के कारण आपको ग़लतफ़हमी हुई हो. अगर डॉक्टर की लापरवाही के कारण ऐसा हुआ है, तो अस्पताल के पेशेंट रिड्रेसल सेल से संपर्क करें.
– किसी भी तरह की क़ानूनी कार्रवाई से पहले अस्पताल प्रबंधन के पास अपनी शिकायत दर्ज कराएं, क्योंकि अक्सर लोकल लेवल पर ही मामले आसानी से सुलझ जाते हैं.
– कोई भी एक्शन लेने से पहले एक बार इस बात पर ज़रूर ग़ौर करें कि डॉक्टर्स भी हमारी तरह इंसान हैं.
मेडिकल लापरवाही में यहां लगाएं गुहार
मेडिकल काउंसिल
यह एक क़ानूनी संस्था है, जो मेडिकल प्रोफेशन को मॉनिटर करने के लिए बनाई गई है. यहां पर आप शिकायत दर्ज करा सकते हैं, पर यहां आपको कोई मुआवज़ा नहीं मिल सकता. वो स़िर्फ डॉक्टर का रजिस्ट्रेशन रद्द कर सकते हैं. पर यह काउंसिल साल में स़िर्फ 2 बार लगती है.
कंज़्यूमर कोर्ट
इस मामले में यह सबसे फास्ट और स्पीडी ट्रायल कोर्ट है. मेडिकल प्रोफेशन में किसी भी तरह की शिकायत के लिए आप कंज़्यूमर कोर्ट जा सकते हैं. यहां आपको स़िर्फ मुआवज़ा मिलेगा. आपको एक सादे से पेपर पर अपनी शिकायत लिखकर मुआवज़े की मांग की रक़म के साथ जमा करनी होती है.
मुआवज़े की रक़म के मुताबिक़ आपको कोर्ट चुनना पड़ेगा.
– डिस्ट्रिक्ट कंज़्यूमर कोर्ट: 20 लाख तक का मुआवज़ा
– स्टेट कमीशन: 20 लाख से 1 करोड़
– नेशनल कमीशन: 1 करोड़ से ज़्यादा
सिविल कोर्ट
मेडिकल लापरवाही की शिकायत के लिए यहां भी केस फाइल कर सकते हैं, पर यहां पहले से ही इतने केसेस पेंडिंग हैं कि आपका केस लंबा खिंच सकता है. अगर आपके इलाज में किसी तरह की लापरवाही बरती गई, जिसके कारण आपको शारीरिक या मानसिक कष्ट हुआ, तो कंज़्यूमर कोर्ट जाना सबसे सही फैसला होगा.
रेलवे में मरीज़ों को स्पेशल छूट
– कैंसर के मरीज़ों को ट्रीटमेंट या रूटीन चेकअप के लिए जाना है, तो उन्हें स्लीपर कोच और 3 टायर एसी में 100% कंसेशन मिलता है, जबकि 2 टायर एसी और फर्स्ट क्लास में 50% तक की छूट की सुविधा है. मरीज़ के साथ के अटेंडेंट को भी स्लीपर कोच और 3 टायर एसी में 75% तक की छूट मिलती है, जबकि 2 टायर और फर्स्ट क्लास में दोनों को समान छूट मिलती है.
– अगर आप हार्ट पेशेंट हैं और हार्ट सर्जरी के लिए एक शहर से दूसरे शहर जा रहे हैं, तो
आपको सभी टिकट्स पर 50-75% तक की छूट मिलती है. आपके अटेंडेंट को भी उतनी ही छूट मिलेगी.
– किडनी के मरीज़ जो डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट सर्जरी के लिए ट्रैवेल कर रहे हैं, उन्हें और उनके अटेंडेंट को भी 50-75% तक की छूट मिलती है.
– इसके अलावा ट्यूबरकुलोसिस, थैलेसेमिया, सिकल सेल एनीमिया, नॉन इंफेक्शियस लेप्रोसी और हीमोफीलिया के मरीज़ों को भी रेलवे में 50-75% की छूट मिलती है.
– अनीता सिंह

Landmark Judgement: ‘इच्छा मृत्यु’ को सुप्रीम कोर्ट ने दी हरी झंडी (Landmark Judgement: Passive Euthanasia ‘Permissible’ in India)

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‘हर किसी को सम्मान से मरने का हक़ है’ सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक जजमेंट में यह फैसला दिया. ‘लिविंग विल’ (वसीयत) के ज़रिए किसी व्यक्ति को यह अधिकार दिया गया है कि वो अपनी वसीयत में लिख सके कि अगर वह किसी लाइलाज बीमारी का शिकार हो जाता है, तो उसे जबरन लाइफ सपोर्ट सिस्टम के ज़रिए ज़िंदा न रखा जाए. उसे सुकून और शांति से मरने का पूरा हक़ दिया जाए.

हमारे देश में अब तक पैसिव इथनेशिया या इच्छा मृत्यु की इज़ाज़त नहीं थी, पर 9 मार्च, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने लैंडमार्क जजमेंट में इसे क़ानूनी कर दिया, हालांकि उसके लिए कई गाइडलाइन्स भी जारी की गई हैं, ताकि कोई उसका ग़लत फ़ायदा न उठा सके.

कैसी बनेगी लिविंग विल?
कोई भी व्यक्ति एडवांस में यह विल बनवाकर रख सकता है, ताकि जब वह अपनी रज़ामंदी देने की स्थिति में न हो, तो तब इस लिविंग विल का इस्तेमाल किया जा सके. लिविंग विल बनने की प्रक्रिया कोर्ट की निगरानी में होगी. कोई व्यक्ति डिस्ट्रिक्ट जज की तरफ़ से नियुक्त जुडिशनल मजिस्ट्रेट के सामने लिविंग विल कर सकता है, जिसे दो गवाहों की मौजूदगी में बनाया जाएगा. लिविंग विल का पूरा रिकॉर्ड डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में रखा जाएगा.

लिविंग विल न होने की स्थिति में
अगर किसी व्यक्ति ने लिविंग विल नहीं बनाई है और वह लाइलाज बीमारी से जूझ रहा है, तो परिवार वाले या रिश्तेदार उसके लिए हाई कोर्ट जा सकते हैं. हाई कोर्ट में मेडिकल बोर्ड इस बात का ़फैसला लेगा कि व्यक्ति का लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाना है या नहीं.

मेडिकल ट्रीटमेंट को कह सकते हैं ‘ना’
यहां इस बात पर सुप्रीम कोर्ट ने सहमति जताई कि लाइलाज बीमारी से जूझ रहे किसी व्यक्ति का जबरन इलाज न किया जाए. ऐसे में वह मेडिकल ट्रीटमेंट को मना कर सकता है. उसके रिश्तेदार इसमें उसकी मदद कर सकते हैं. इससे पहले ऐसा करना ग़ैरक़ानूनी था.

क्या है पैसिव इथनेशिया?
पैसिव इथनेसिया का मतलब है लाइलाज बीमारी का इलाज करा रहे किसी व्यक्ति के लाइफ सपोर्ट सिस्टम को हटाना है. ऐसा करने से व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है. आपको बता दें कि एक्टिव इथेनेशिया यानी जहरीला इंजेक्शन आदि लगाकर व्यक्ति को इच्छा मृत्यु देना है, पर अभी भी हमारे देश में यह ग़ैरक़ानूनी है. जिन देशों में एक्टिव इथनेशिया क़ानूनी है, वहां यदि कोई व्यक्ति बीमारी के असहनीय दर्द को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा, डॉक्टर की मदद से उसे इच्छा मृत्यु दी जाती है.

बेंच के जजेज़ ने यह भी कहा कि जब तक इस पर कोई क़ानून नहीं बन जाता, यह ़फैसला और गाइडलाइन्स ही क़ानून की तरह काम करेंगी. आपको बता दें कि साल 2005 में कॉमन कॉज़ नामक एनजीओ ने जनहित याचिका दाखिल की थी, जिस पर यह ऐतिहासिक ़फैसला आया है. हालांकि इससे पहले अरुणा शामबाग केस में सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में पैसिव इथनेशिया की उन्हें इजाज़त दी थी, पर उस गाइडलाइन में भी कई कमियां थीं, जिसे बाद में सुधारा गया.

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