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जब मेडिकल लापरवाही के हों शिकार, तो कहां करें शिकायत? (Medical Negligence: Consumer Rights And The Law)

Medical Consumer Rights

जब मेडिकल लापरवाही के हों शिकार, तो कहां करें शिकायत? (Medical Negligence: Consumer Rights And The Law)

एबी पॉज़िटिव मरीज़ को एबी निगेटिव का खून चढ़ाना, दाएं पैर की बजाय बाएं पैर की सर्जरी करना, मलेरिया के मरीज़ को डेंगू की दवाइयां देना, दवाइयों का इतना ओवरडोज़ कि मरीज़ की जान पर बन आए… आए दिन हमें मेडिकल लापरवाही की ऐसी ख़बरें

देखने-सुनने को मिलती हैं. क्या हो, अगर उनकी जगह हमारे परिवार का कोई सदस्य या हम ख़ुद हों? ऐसी लापरवाही किसी के साथ भी हो सकती है, इसलिए ज़रूरी है कि आप अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें, ताकि सही समय पर सही कार्रवाई कर सकें.

अपनी भलाई के लिए हम डॉक्टर की हर बात पर आंख मूंदकर भरोसा कर लेते हैं, जबकि हमें अपनी आंखें और कान हमेशा खुले रखने चाहिए. किसी ज़माने में नोबल प्रोफेशन माना जानेवाला मेडिकल प्रोफेशन आज प्रॉफिट मेकिंग बिज़नेस बन गया है. ऐसे में बहुत ज़रूरी है कि हम अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें और किसी भी तरह की मेडिकल लापरवाही होने पर सही जगह उसकी शिकायत करें.

क्या है मेडिकल लापरवाही?

यह डॉक्टर की नैतिक ज़िम्मेदारी है कि वह अपने पास आनेवाले सभी मरीज़ों का सही तरी़के से इलाज या कंस्लटेशन करे. अपने कर्त्तव्यों को ईमानदारीपूर्वक निभाए, लेकिन जब डॉक्टर अपने कर्त्तव्यों को सही तरी़के से न निभाए और उसकी लापरवाही से मरीज़ को शारीरिक क्षति पहुंचे या जान चली जाए, तो यह मेडिकल लापरवाही होगी.

किन मामलों में कर सकते हैं शिकायत?

किसी भी सर्जरी से पहले डॉक्टर्स कुछ पेपर्स पर आपके सिग्नेचर लेते हैं, ताकि कुछ गड़बड़ होने पर वो ज़िम्मेदार न ठहराए जाएं. लेकिन वो इससे पूरी तरह बच नहीं सकते. आइए देखें, कौन-से हैं वो मामले, जो मेडिकल लापरवाही की श्रेणी में आते हैं.

–   लापरवाही के कारण ग़लत दवा देना.

–    सही तरी़के से इलाज न करना.

–    मरीज़ को ऐसी जगह रखना, जिससे उसे संक्रामक रोग हो जाए.

–    अस्पताल में स्टाफ की कमी के कारण मरीज़ की सही तरी़के से देखभाल न हो पाना.

–    मरीज़ की परेशानियों को अनसुना करना.

–    बीमारी के लक्षणों को पहचानने में ग़लती करना.

–    ग़लत लक्षण के कारण बेवजह सर्जरी कर देना.

–    लक्षणों को पहचानने में बहुत ज़्यादा देर करना, जिससे मरीज़ की जान पर बन आए.

–    सर्जरी के दौरान किसी और अंग को नुक़सान पहुंचाना.

–    सर्जरी के दौरान ग़लती करना, जिससे किसी तरह का इंफेक्शन हो जाए या फिर इम्यून सिस्टम फेल हो जाए.

–    सर्जरी के दौरान किसी चीज़ का अंदर छूट जाना, सर्जरी के कारण बहुत ज़्यादा खून बहना, ग़लत बॉडी पार्ट की सर्जरी कर देना.

–    एनेस्थीसिया देने में ग़लती करना.

–    बच्चे के जन्म के दौरान किसी तरह की ग़लती से बच्चे का नर्व डैमेज होना या फिर जान पर बन आना आदि.

भले ही डॉक्टर ने लापरवाहियां ग़लती से कर दी हों, फिर भी वह दोषी माना जाएगा.

 

क्या है टाइम लिमिट?

यह जानना बहुत ज़रूरी है कि आपको मेडिकल लापरवाही के तीन साल के भीतर शिकायत दर्ज करनी है, वरना उसके बाद भले ही आपका केस कितना भी मज़बूत क्यों न हो, आपको एक पैसा नहीं मिलेगा.

–    यहां यह ध्यान देने की ज़रूरत है कि लापरवाही के बारे में आपको पता कब चला, क्योंकि ऐसे कई मामले होते हैं, जहां कई सालों बाद इसके बारे में पता चलता है. उदाहरण के लिए अगर कैंसर ट्रीटमेंट के दौरान बहुत ज़्यादा रेडिएशन का इस्तेमाल किया गया हो, तो उसका असर कुछ सालों बाद दिखेगा और जब असर दिखने लगे, तब से लेकर तीन साल के भीतर आप शिकायत कर सकते हैं.

कौन कर सकता है शिकायत?

मरीज़ या मरीज़ के परिवारवालों के अलावा कोई रजिस्टडर्र् ग़ैरसरकारी  संस्था  भी मरीज़ की तरफ़ से शिकायत दर्ज कर सकती है. मेडिकल लापरवाही को साबित करने की ज़िम्मेदारी पीड़ित पर होती है, इसलिए आपको सभी पेपर्स संभालकर रखने चाहिए.

शिकायत से पहले ध्यान में रखें ये बातें

–    अगर आपको संदेह है कि डॉक्टर सही इलाज नहीं कर रहा है, तो किसी और डॉक्टर से सलाह लें और मरीज़ को किसी अच्छे अस्पताल में भर्ती कराएं. उसके ठीक होने के बाद ही इस मामले को उठाएं. मरीज़ को प्राथमिकता दें.

–    सबसे पहले इस बात की पुष्टि के लिए कि मेडिकल लापरवाही हुई है, आपको किसी सरकारी अस्पताल के डॉक्टर या उसी फील्ड के एक्सपर्ट से एक रिपोर्ट लेनी होगी, जिसमें वो इस बात की पुष्टि करे कि मेडिकल लापरवाही हुई है.

–    आप चाहें, तो कंज़्यूमर कोर्ट में भी गुहार लगा सकते हैं कि वो अपनी तरफ़ से मेडिकल बोर्ड को जांच के आदेश दे, ताकि आपको रिपोर्ट मिल जाए.

–    शिकायत करने के लिए सबसे ज़रूरी है डॉक्यूमेंट्स. इलाज से जुड़े सभी एडमिशन पेपर्स से लेकर रिपोर्ट्स, दवाई के बिल्स वगैरह सभी जमा करके रखें.

–    अगर अस्पताल आपको मेडिकल रिकॉर्ड्स नहीं दे रहा, तो आप कोर्ट में जा सकते हैं. कोर्ट के आदेश पर उन्हें मेडिकल रिकॉर्ड्स देने ही पड़ेंगे.

Consumer Rights

कहां करें शिकायत?

मेडिकल लापरवाही के मामले में आपको सही कड़ी का इस्तेमाल करना चाहिए. सबसे पहले अस्पताल से ही शुरुआत करें, अगर वहां आपकी सुनवाई नहीं होती, तो न्याय मांगने के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने से न हिचकिचाएं.

मेडिकल सुप्रिटेंडेंट

–    डॉक्टर की लापरवाही हो या फिर स्टाफ की ग़ैरज़िम्मेदारी, उसकी शिकायत तुरंत अस्पताल के मेडिकल सुप्रिटेंडेंट से करें.

–    आप उनसे उचित कार्रवाई के साथ हर्जाने की मांग भी कर सकते हैं.

स्टेट मेडिकल काउंसिल

–   डॉक्टर या अस्पताल से जुड़ी किसी भी तरह की शिकायत आपको पहले मेडिकल काउंसिल में करनी चाहिए. वो अपने लेवल पर जांच करके उचित कार्रवाई करते हैं.

–   अगर काउंसिल की जांच में डॉक्टर्स दोषी पाए जाते हैं, तो काउंसिल उनका लाइसेंस तक रद्द कर सकती है.

–    अगर आपको लगता है कि मामले को जान-बूझकर टाला जा रहा है, तो आप अपनी शिकायत नेशनल मेडिकल काउंसिल में भी कर सकते हैं. ये दोनों ही गवर्निंग बॉडीज़ हैं, जो दोषी पाए जाने पर उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करते हैं.

कंज़्यूमर कोर्ट

जब आप किसी डॉक्टर या अस्पताल में जाकर इलाज करवाते हैं और उनकी सेवा के बदले उन्हें फीस देते हैं, तो आप उनके ग्राहक माने जाते हैं और क्योंकि आप ग्राहक हैं, तो आप मेडिकल लापरवाही के ख़िलाफ़ अपनी शिकायत कंज़्यूमर कोर्ट में कर सकते हैं.

–    आप अपनी शिकायत डिस्ट्रिक्ट फोरम में कर सकते हैं.

–    यहां आपको एक बात ध्यान में रखनी होगी किकंज़्यूमर कोर्ट में आपको स़िर्फ मुआवज़ा मिलेगा.

–    यहां आप डॉक्टर के ख़िलाफ़ किसी तरह की क्रिमिनल कार्रवाई की मांग नहीं कर सकते.

–    हाल ही में लोकसभा में कंज़्यूमर प्रोटेक्शन बिल 2018 पास हुआ है, जिसमें कई नए बदलाव किए गए हैं, ताकि ग्राहकों की शिकायत पर जल्द सुनवाई हो सके. इस बिल के क़ानून बन जाने से मेडिकल लापरवाही के मामलों को और आसानी से सुलझाया जा सकेगा.

सज़ा का प्रावधान

इंडियन पीनल कोड की धारा 304ए के तहत लापरवाही के कारण होनेवाली मौत के लिए दो  साल की जेल और जुर्माना या फिर दोनों का प्रावधान है.

ख़राब है देश में मेडिकल कंडीशन

–    मेडिकल लापरवाही में ह्यूमन एरर के कारण हर साल हमारे देश में लगभग 52 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है, जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा 44 हज़ार से 98 हज़ार का है.

–    साल 2016 में हुई एक स्टडी के मुताबिक़ हर साल इंडिया में मेडिकल लापरवाही के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं. आंकड़ों में बात की जाए, तो हर साल इन मामलों में 110% बढ़ोतरी हो रही है.

–    हमारे देश में मेडिकल बजट हमारे पड़ोसी देश नेपाल और श्रीलंका से भी बहुत कम है. देश के जीडीपी का महज़ 1% मेडिकल बजट के लिए दिया जाता है.

– अनीता सिंह

 

क्या इंफर्टिलिटी बन सकती है तलाक़ का कारण? (Is Infertility A Ground For Divorce?)

तलाक़ (Divorce) एक संवेदनशील मुद्दा है. क़ानून में तलाक़ लेने के लिए कई कारणों को विस्तारपूर्वक दिया गया है, पर आज भी बहुत से लोगों में इंफर्टिलिटी (Infertility) और इंपोटेंसी (Impotence) को लेकर ग़लतफ़हमी है. वो इन्हें एक ही प्रॉब्लम (Problem) समझने की भूल करते हैं और बेवजह रिश्तों को तोड़ने की कोशिश की जाती है. पर ये दोनों ही दो अलग चीज़ें हैं. आइए देखें, क्या है इंफर्टिलिटी और इंपोटेंसी में फ़र्क़ और इस आधार पर तलाक़ के बारे में क्या कहता है हमारे देश का क़ानून?

Infertility Problems

रिया और रजत की शादी को 10 साल हो गए थे. रिया की ओवरीज़ में सिस्ट था, जिसके कारण वो मां नहीं बन सकती थी. रजत बच्चा गोद नहीं लेना चाहता था, जिसके कारण हर रोज़ उनके घर में प्रॉब्लम्स होने लगीं. इनसे छुटकारा पाने के लिए दोनों ने तलाक़ ले लिया. तलाक़ के बाद रजत ने दूसरी शादी की और अब उसके 2 बच्चे हैं. रजत के लिए ये सब इतना आसान नहीं होता, अगर रिया ने उसे तलाक़ नहीं दिया होता. रिया ने रोज़ की परेशानियों से छुटकारा पाने के लिए ऐसा किया, लेकिन अगर वो चाहती, तो रजत को तलाक़ न देती और कोर्ट भी उसे तलाक़ नहीं दिला पाता, क्योंकि हमारे देश में इंफर्टिलिटी को तलाक़ का आधार बनाया ही नहीं जा सकता.

विविध धर्मों के विविध क़ानून

हमारा देश विविध धर्मों और संस्कृतियों का देश है. हर धर्म में तलाक़ के लिए अपने क़ानून हैं. जहां हिंदुओं, जैन, बौद्ध और सिख के लिए द हिंदू मैरिज एक्ट 1955 है, वहीं मुसलमानों के लिए द डिज़ोल्यूशन ऑफ मुस्लिम मैरिज एक्ट 1939, ईसाइयों के लिए द इंडियन डिवोर्स एक्ट 1869 और पारसियों के लिए द पारसी मैरिज और डिवोर्स एक्ट है, तो सिविल मैरिजेस के लिए स्पेशल मैरिज एक्ट है. सभी के अपने-अपने नियम हैं, पर इंफर्टिलिटी और इंपोटेंसी (नपुंसकता) पर सभी के अलग-अलग क़ानून हैं.

क्या हैं तलाक़ के आधार?

यहां हम द हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 के बारे में जानने की कोशिश करेंगे. इस एक्ट के सेक्शन 13 में तलाक़ के कारणों के बारे में विस्तारपूर्वक दिया गया है, जो इस प्रकार हैं-

–     व्यभिचार, धर्मांतरण, मानसिक विकार, कुष्ठ रोग, नपुंसकता, सांसारिक कर्त्तव्यों को त्याग देना, 7 सालों से लापता, जुडीशियल सेपरेशन (कोर्ट द्वारा अलग रहने की इजाज़त), किसी भी तरह के शारीरिक संबंध नहीं और क्रूरता या निष्ठुरता. क़ानून में कहीं भी इंफर्टिलिटी को तलाक़ का कारण नहीं बताया गया है.

क्या है लोगों की सोच?

आज भी ज़्यादातर लोगों को लगता है कि इंफर्टिलिटी और इंपोटेंसी एक ही चीज़ है. नपुंसकता को बांझपन से जोड़ देते हैं, जबकि ऐसा है नहीं. अगर किसी व्यक्ति के बच्चे नहीं हो रहे, तो लोग उसे नपुंसक यानी इंपोटेंट समझने लगते हैं, जबकि बच्चे न होने का कारण इंफर्टिलिटी भी हो सकती है.

इंफर्टिलिटी और इंपोटेंसी में अंतर?

इंफर्टिलिटी यानी बांझपन, जबकि इंपोटेंसी का अर्थ नपुंसकता है. यहां आपको बता दें कि पुरुषों में भी बांझपन हो सकता है और महिलाएं भी इंपोटेंट हो सकती हैं. इंपोटेंट व्यक्ति अपने पार्टनर को सेक्सुअल संतुष्टि नहीं दे पाता, जबकि बांझपन में ऐसा नहीं है. बांझ व्यक्ति की सेक्सुअल लाइफ संतुष्टिपूर्ण हो सकती है, उन्हें समस्या स़िर्फ बच्चे पैदा करने में हो सकती है.

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Infertility Problems
इंफर्टिलिटी नहीं बन सकती तलाक़ का कारण

कोर्ट के सामने ऐसे कई मामले आते हैं, जहां कपल्स बच्चा पैदा न होने को क्रुएल्टी बताकर तलाक़ की मांग करते हैं, जबकि हमारे देश का क़ानून कहता है कि अगर पति-पत्नी के बीच सेक्सुअल रिलेशनशिप है और दोनों ही एक-दूसरे को संतुष्ट करने में समर्थ हैं, तो विवाद का कोई मुद्दा ही नहीं, क्योंकि क़ानूनन शादी का अर्थ एक-दूसरे को सेक्सुअल संतुष्टि देना है. अगर पति-पत्नी में शारीरिक संबंध बने, तो इसका अर्थ है शादी संपूर्ण हुई. लेकिन अगर उसमें कोई कमी रह जाती है, तो आप तलाक़ ले सकते हैं. वहीं बच्चे न होना किसी का दुर्भाग्य हो सकता है, लेकिन इसके लिए किसी को दोषी ठहराकर उसे उसके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता.

न छुपाएं तथ्यों को

लीगल एक्सपर्ट्स के मुताबिक़ इंफर्टिलिटी तलाक़ का कारण नहीं बन सकती, लेकिन अगर कोई पति कोर्ट में यह साबित कर दे कि उसकी पत्नी शादी से पहले ही मां नहीं बन सकती थी और यह बात उससे छुपाई गई, तो तथ्यों को छुपाने के लिए पति को पत्नी से तलाक़ मिल सकता है.

बदलती लाइफस्टाइल में बदलते शादी के मायने

बहुत से लोग इंफर्टिलिटी को लेकर यह तर्क देते हैं कि उनका पार्टनर उन्हें उनका वारिस या अंश नहीं दे सकता, ऐसे में शादी को बनाए रखने का क्या फ़ायदा? यहां हम एक सवाल पूछना चाहते हैं कि क्या शादी का अर्थ केवल बच्चे पैदा करना है. अगर ऐसा होता, तो आज बहुत से बेऔलाद लोग एक साथ न होते. माना कि पुराने ज़माने में शादी का एकमात्र उद्देश्य परिवार व वंश को आगे बढ़ाना हुआ करता था, पर अब ऐसा नहीं है. बदलती लाइफस्टाइल में ऐसे बहुत से शादीशुदा जोड़े हैं, जो बच्चा नहीं चाहते. डबल इन्कम नो किड्स (डिंक्स) समय के साथ लोगों की ज़रूरतें भी बदली हैं.

मुस्लिम पर्सनल लॉ और इंफर्टिलिटी

भले ही हिंदू मैरिज एक्ट में इंफर्टिलिटी को तलाक़ लेने की वजह नहीं बनाया जा सकता, लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ इससे परे है. यहां इंफर्टिलिटी तलाक़ का एक बड़ा कारण बन सकती है, बशर्ते पति उस आधार पर तलाक़ लेना चाहे तो. साथ ही यह पति की दूसरी शादी के लिए भी एक बड़ा कारण बन सकता है. हालांकि दूसरी शादी के लिए उसे पहली पत्नी की इजाज़त लेनी पड़ती है, जो महज़ एक औपचारिकता होती है. लीगल एक्सपर्ट की मानें, तो मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत पति कभी भी किसी भी कारण को वजह बनाकर अपनी पत्नी से तलाक़ ले सकता है और ट्रिपल तलाक़ इसका एक जीता जागता नमूना है. हालांकि कुछ मुस्लिम महिलाओं ने ट्रिपल तलाक़ के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला है, पर जब तक सभी महिलाएं अपने हक़ के लिए आवाज़ नहीं उठाएंगी, तब तक उनके अधिकारों का यूं ही उल्लंघन होता रहेगा.

इंफर्टिलिटी के लिए ताने देना है क्रूरता

साल 2013 में मुंबई के फैमिली कोर्ट ने 52 वर्षीया महिला की तलाक़ की अर्जी पर विचार करते हुए उसे उसके पति से तलाक़ दिलाया, जहां पति पत्नी को बांझ होने के ताने देता था. इस मामले में पति-पत्नी दोनों ही बच्चे न होने के लिए एक-दूसरे को दोषी मानते थे. पति पत्नी को एक छोटे से स्टोर रूम में रखता था और उसके साथ बहुत बुरा व्यवहार भी किया जाता था. वह अपनी पत्नी को बच्चों के फोटोज़ दिखाकर ताने देता था, जो किसी भी महिला के लिए बहुत बड़ा मेंटल हरासमेंट है. कोर्ट ने कहा कि इस तरह किसी महिला को उसकी इंफर्टिलिटी के लिए ताने देना क्रुएल्टी (क्रूरता) है और इसके लिए उसे माफ़ नहीं किया जा सकता. इस मामले में सबसे चौंकानेवाला तथ्य जो सामने आया, वो यह कि जब दोनों का फर्टिलिटी टेस्ट कराया गया, तो डॉक्टर ने सर्टिफाई किया कि दोनों ही पैरेंट्स बन सकते हैं. इसके बाद कोर्ट ने पत्नी की अर्जी को मंज़ूर करते हुए उसे तलाक़ दे दिया.

इंफर्टिलिटी को समझें एक मेडिकल कंडीशन

बच्चे पैदा न कर पाना एक मेडिकल कंडीशन है, जिसके लिए किसी के मान-सम्मान को चोट पहुंचाना ग़लत है. जैसे हर व्यक्ति की बॉडी टाइप अलग-अलग होती है, ठीक वैसे ही बच्चे पैदा करने की क्षमता भी अलग-अलग होती है. महिलाओं को समझना चाहिए कि यह एक मेडिकल कंडीशन है, जिसके लिए ख़ुद को कोसना या अपने कर्मों को दोष देना ग़लत है. एक औरत के लिए मां बनना बड़े गर्व की बात है, लेकिन उस गर्व को अपने आत्मसम्मान को चोटिल न करने दें. अपने अस्तित्व को बच्चे के वजूद से जोड़कर देखना छोड़ दें.

– अनीता सिंह

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सेक्सुअल हैरेसमेंट से बचने के लिए अपनाएं ये सेफ्टी गाइडलाइन्स (Safety Guidelines For Sexual Harassment)

पूरे देश में सेक्सुअल हैरेसमेंट (Sexual Harassment) के ख़िलाफ़ मुहिम चल पड़ी है. ऐसे में यह जानना बेहद ज़रूरी है कि घर, बाहर या फिर वर्कप्लेस पर अपनी सेफ्टी को लेकर महिलाएं कितनी सतर्क और जागरूक हैं? क्या उन्हें क़ानून की सही जानकारी है? अपने साथ-साथ बच्चों की सेफ्टी के प्रति भी कितनी जागरूक हैं वो? इन्हीं विषयों पर महिलाओं को जागरूक करने के लिए हम लेकर आए हैं सेक्सुअल हैरेसमेंट से बचाव के बेस्ट सेफ्टी टिप्स (Best Safety Tips) और गाइडलाइन्स.

Sexual Harassment

क्या है सेक्सुअल हैरेसमेंट?

किसी भी तरह के ग़लत इशारे करना, ग़लत व्यवहार या टिप्पणी करना, ज़बर्दस्ती शारीरिक संबंध बनाना या बनाने के लिए कहना, शारीरिक बनावट या कपड़ों पर टिप्पणी करना, कामुक साहित्य दिखाना आदि सेक्सुअल हैरेसमेंट का हिस्सा हैं.

हर महिला को पता हो यह क़ानून

साल 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने वर्कप्लेस पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए विशाखा गाइडलाइन्स के नाम से 13 गाइडलाइन्स जारी की थीं, जिन्हें साल 2013 में क़ानून का रूप दे दिया गया. अब ये गाइडलाइन्स सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ वुमेन एट वर्कप्लेस एक्ट, 2013 का रूप ले चुकी हैं. इस एक्ट में सेक्सुअल हैरेसमेंट को परिभाषित किया गया है, साथ ही उससे बचाव और उत्पीड़न की स्थिति में होनेवाली कार्रवाई का उल्लेख किया गया है.

– सबसे ज़रूरी बात, जो हर महिला को पता होनी चाहिए, वो यह कि जिस भी संस्थान में 10 या 10 से ज़्यादा कर्मचारी काम करते हैं, वहां एम्प्लॉयर को इंटरनल कंप्लेंट्स कमिटी (आईसीसी) बनाना अनिवार्य है, जिसमें 50% महिलाएं शामिल हों.

–     इसके अलावा हर ज़िले में लोकल कंप्लेंट्स कमिटी हो, ताकि जिन कर्मचारियों के संस्थान में आईसीसी नहीं है, वो यहां शिकायत दर्ज कर सकें.

वर्कप्लेस पर सेफ्टी के लिए क्या करें महिलाएं?

आजकल शायद ही ऐसा कोई घर हो, जहां कोई महिला कामकाजी न हो. घर से बाहर निकलकर काम करने के लिए उपयुक्त माहौल मिले, इसके लिए उन्हें ही सतर्क और जागरूक रहना होगा.

–     अगर आपको लगता है कि आपके वर्कप्लेस पर कुछ पुरुषों के कारण या किसी एक व्यक्ति के कारण आप असहज महसूस कर रही हैं, तो सबसे पहले उसे ख़ुद आगाह करें.

–     अगर वो फिर भी अपनी हरकतों से बाज़ न आए, तो ऑफिस की इंटरनल कंप्लेंट्स कमिटी (आईसीसी) में शिकायत करने से न हिचकिचाएं.

–     अगर ऑफिस में आईसीसी नहीं है, तो मैनेजमेंट में उसकी शिकायत करें या फिर आप लोकल कंप्लेंट्स कमिटी में भी शिकायत कर सकती हैं.

–     अगर मैनेजमेंट उसी की तरफ़दारी करे, तो ऐसी जगह काम करने से बेहतर होगा कि आप कंपनी छोड़ दें.

–     अगर कोई आपको ग़लत मैसेज भेजता है, तो उसका स्क्रीनशॉट लेकर रख लें, ताकि शिकायत करते व़क्त सबूत के तौर पर दे सकें.

–    फोन कॉल्स की रिकॉर्डिंग करके भी आप उस व्यक्ति के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सकती हैं.

–     अपने ऑफिस रूटीन के बारे में पैरेंट्स या पार्टनर को हमेशा बताकर रखें, ताकि कभी देर-सबेर होने पर वो पूछताछ कर सकें.

–     अपने ऑफिस और सहकर्मियों के मोबाइल नंबर पैरेंट्स या पार्टनर के पास भी सेव करके रखें, ताकि ज़रूरत पड़ने पर संपर्क किया जा सके.

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Sexual Harassment
घर से बाहर सेफ्टी का यूं रखें ख़्याल

–     अजनबी लोगों पर किसी भी तरह का भरोसा न करें. ऐसे लोगों के साथ ट्रैवल भी न करें.

–     जब भी अकेले हों, सावधान रहें. आपकी बॉडी लैंग्वेज और चाल में भी कॉन्फिडेंस होना चाहिए.

     अगर रात को ऑफिस से निकलने में देरी हो जाती है, तो ट्रैवलिंग के लिए हाई हील्स न पहनें. ऐसे जूते या चप्पल पहनें, जिनमें मुसीबत के व़क्त भाग सकें.

–     अगर रात को ऑफिस या अपनी बिल्डिंग में लिफ्ट में जाना सेफ नहीं लगता, तो सीढ़ियों से जाएं.

–     कभी किसी अनजान से लिफ्ट न लें.

–     अकेले ऑटो या टैक्सी लेने की बजाय शेयरिंग में जाएं, पर अगर आपको ज़रा भी गाड़ी का माहौल संदिग्ध लगे, तो उसमें बिल्कुल न जाएं.

–     ट्रैवलिंग के दौरान किसी अजनबी या सहयात्री से अपना फोन नंबर या कोई और डिटेल शेयर न करें.

–     रास्ते में पैदल चलते हुए म्यूज़िक सुनना है, तो धीमी आवाज़ पर सुनें, ताकि अगल-बगल में हो रही एक्टीविटीज़ के बारे में पता चलता रहे.

–     अगर रात को देर से ट्रैवल करती हैं, तो अपने पर्स में हमेशा पेपर स्प्रे रखें. अगर पेपर स्प्रे नहीं हैं, तो इमर्जेंसी में आप डियो का भी इस्तेमाल कर सकती हैं.

–     दिन हो या रात, अगर कोई आपका पीछा कर रहा है, तो अपना रास्ता बदल दें और फोन करके तुरंत अपनों को सूचित करें.

–     अपने मोबाइल फोन की बैटरी हमेशा चार्ज रखें, ताकि इमर्जेंसी में संपर्क साधने में द़िक्क़त न हो.

–     हो सके तो पर्सनल सेफ्टी से जुड़े कुछ गुर सीख लें.

–     घर के अंदर भी अगर किसी रिश्तेदार की हरकतें आपको आपत्तिजनक लगती हैं, तो तुरंत पैरेंट्स या पार्टनर को बताएं.

सेक्सुअल हैरेसमेंट क़ानून में है बदलाव की ज़रूरत

–    सबसे पहले तो यह क़ानून केवल महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाया गया है, जबकि आजकल पुरुषों के उत्पीड़न की ख़बरें समाचार-पत्रों की सुर्ख़ियां बन रही हैं. इसमें पुरुषों की सुरक्षा को भी शामिल करना चाहिए.

–    सेक्सुअल हैरेसमेंट की परिभाषा को विस्तृत करने की ज़रूरत है, क्योंकि बदलती टेक्नोलॉजी के इस दौर में हैरेसमेंट के कई नए-नए रूप देखने को मिल रहे हैं.

–     आज भी बहुत-से संस्थानों में आईसीसी का गठन नहीं किया गया है, लेकिन उसके बारे में पूछनेवाला कोई नहीं है.

–     सोशल मीडिया आज एक प्लेटफॉर्म की तरह काम कर रहा है, ऐसे में ज़रूरी है कि सरकार की आईटी सेल वहां होनेवाली गतिविधियों पर नज़र रखकर मामले को सही डिपार्टमेंट में पहुंचाए, ताकि मामले की सही जांच हो सके.

–     लोकल कंप्लेंट्स कमिटी के बारे में लोगों में जागरूकता फैलाई जाए. उसे मज़बूत बनाने के लिए कड़े प्रावधान बनाए जाएं.

–     इसके तहत महिलाओं को छूट दी गई है कि वो कभी भी अपने ख़िलाफ़ होनेवाले अन्याय के लिए आवाज़ उठा सकती हैं. इसके लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है, लेकिन इन मामलों में देरी के कारण अपराध साबित कर पाना पुलिस के लिए बहुत मुश्किल हो जाता है. इसके लिए भी क़ानून में कोई प्रावधान होना चाहिए.

– अनीता सिंह     

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पैरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन्स एक्ट: बुज़ुर्ग जानें अपने अधिकार (Parents And Senior Citizens Act: Know Your Rights)

‘बेटे-बहू ने हमें नौकर बनाकर रख दिया था…’ ‘मेरा भतीजा मुझे बेरहमी से मारता था…’ ‘बेटे के घर में रोज़ मुझे स़िर्फ दो रोटी मिलती थी…’ ‘बेटा हर रोज़ पूछता था कब मरोगी…’ ये दर्द बयां किए हैं कुछ ऐसे बुज़ुर्गों ने जिनके अपनों ने उनके साथ ग़ैरों से भी बुरा सुलूक किया. पिछले कुछ सालों में हमारे समाज में ऐसा क्या हो गया है कि ख़ून के रिश्ते ही अपनों को ख़ून के आंसू रुला रहे हैं. आख़िर क्यों बढ़ रहे हैं शोषण के ये मामले और कहां जा रहा है हमारा
सभ्य समाज?

 Senior Citizens Act

 

बुज़ुर्गों के शोषण के मामले

कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो काफ़ी वायरल हुआ था, जिसमें एक बहू ने अपनी सास को बेरहमी से इसलिए पीटा,  क्योंकि उन्होंने बिना बहू को पूछे गमले से फूल तोड़ लिया था. बुज़ुर्ग महिला एम्नेज़िया (भूलने की बीमारी) से पीड़ित थीं. यह वीडियो उनकी पड़ोसन ने बनाकर सोशल मीडिया पर शेयर किया, जिसे देखकर लोगों में काफ़ी आक्रोश रहा. आजकल ऐसे कई वीडियोज़ आपको देखने को मिल जाएंगे, लेकिन कितनों की सच्चाई यूं सामने आ पाती है? क्या पता आपके पड़ोस में ही किसी बुज़ुर्ग के साथ शोषण हो रहा हो, लेकिन आपको इसकी बिल्कुल ख़बर नहीं.

शोषण के बढ़ते मामले

हेल्पएज इंडिया नामक एनजीओ द्वारा किए गए सर्वे में यह बात सामने आई कि हमारे देश में हर चार में से एक बुज़ुर्ग अपने ही परिवार द्वारा शोषण का शिकार हो रहा है.

*     देशभर के 23 शहरों में 60 साल की उम्र से अधिक के 5014 बुज़ुर्गों पर किए गए इस सर्वे में पता चला कि 25% बुज़ुर्ग रोज़ाना शोषण के शिकार हो रहे हैं.

*     इसमें यह बात भी सामने आई कि पिछले 5 सालों में बुज़ुर्गों के ख़िलाफ़ शोषण के मामले बहुत तेज़ी से बढ़े हैं.

*     सबसे चौंकानेवाली बात यह है कि 48% पुरुष और 52% महिलाएं शोषण का शिकार हो रही हैं. पुरुषों के मुक़ाबले महिलाएं इसकी ज़्यादा शिकार हैं.

*     सर्वे में मैंगलोर शहर में शोषण के सबसे ज़्यादा मामले पाए गए, वहीं अहमदाबाद, भोपाल, अमृतसर, दिल्ली, कानपुर जैसे बड़े शहर भी इस लिस्ट में शामिल हैं.

क्यों बढ़ रहे हैं मामले?

बदलती लाइफस्टाइल और सामाजिक परिवेश ने कहीं न कहीं रिश्तों में भी असंवेदनशीलता बढ़ा दी है, वरना माता-पिता को भगवान का सम्मान देनेवाले इस देश में उनके साथ इतना बुरा व्यवहार न होता.

*     एकल परिवारों के बढ़ते चलन के कारण बुज़ुर्गों की ज़िम्मेदारी कौन लेगा, इसके लिए भी बच्चों में समझौते होने लगे हैं.

*     शहरों की महंगी लाइफस्टाइल में बुज़ुर्गों पर होनेवाले मेडिकल ख़र्चों को बच्चे बोझ समझने लगे हैं.

*     अपने स्वार्थ के लिए पैरेंट्स को अपने पास रखनेवाले अपना स्वार्थ पूरा होते ही उनसे किनारा कर लेते हैं.

*     आज की पीढ़ी के पास न समय है और न ही सब्र, यही कारण है कि शोषण के मामले साल दर साल बढ़ते जा रहे हैं.

क्या कहता है क़ानून?

आज़ादी के 60 सालों बाद सरकार को बुज़ुर्गों का ख़्याल आया. ख़ैर देर से ही सही मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पैरेंट्स एंड सीनियर सिटीज़न्स एक्ट, 2007 का क़ानून लाया गया. इसके तहत अगर पैरेंट्स कोर्ट जाएं, तो कोर्ट उनके बच्चों को मेंटेनेंस देने का आदेश दे सकता है. ऐसे में बच्चे अपनी ज़िम्मेदारी से भाग नहीं पाएंगे.

*     ज़्यादातर पैरेंट्स अपनी प्रॉपर्टी बच्चों के नाम ट्रांसफर कर देते हैं, ताकि बुढ़ापे में बच्चे उनकी देखभाल करें, पर प्रॉपर्टी मिलते ही बहुत से बच्चे बदल जाते हैं और पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी से मुकरने लगते हैं, ऐसे में इस क़ानून के ज़रिए उन्हें मेंटेनेंस दिलाया जाता है.

*     बुज़ुर्ग पैरेंट्स में स़िर्फ सगे माता-पिता ही नहीं, बल्कि सौतेले

माता-पिता या फिर सीनियर सिटीज़न भी शामिल हैं.

*     बच्चों का क़ानूनन फ़र्ज़ है कि वो अपने बुज़ुर्ग पैरेंट्स की देखभाल करें. ज़िम्मेदारी पूरी न करना और उन्हें परेशान करना, शोषित करना, प्रताड़ित करना क़ानूनन अपराध है.

*     पैरेंट्स मेंटेनेंस ट्रिब्युनल या डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में याचिका दाख़िल कर सकते हैं.

*     हर महीने मिलनेवाले मेंटेनेंस से बुज़ुर्ग अपने खाने, कपड़े, रहने की व्यवस्था और मेडिकल ख़र्चों को पूरा कर पाएंगे.

*     इसके तहत हर महीने अधिकतम 10 हज़ार तक के मेंटेनेंस का प्रावधान है.

*     कोर्ट का आदेश न मानने की सूरत में बच्चों को 5 हज़ार का जुर्माना या 3 महीने की जेल हो सकती है.

*     इसके अलावा बुज़ुर्ग महिला पर अगर अत्याचार हो, तो वो घरेलू हिंसा क़ानून के तहत भी शिकायत दर्ज करवा सकती हैं.

*     महज़ 10 हज़ार के मेंटेनेंस से इस महंगाई में गुज़ारा करना बहुत मुश्किल है, इसलिए सरकार इस क़ानून में कुछ ज़रूरी संशोधन कर रही है और मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पैरेंट्स एंड सीनियर सिटिज़न्स एक्ट, 2018 का ड्राफ्ट तैयार किया जा रहा है. जल्दी ही इसे क़ानूनी जामा पहनाया जाएगा.

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Senior Citizens Rights
क्यों शिकायत नहीं करते बुज़ुर्ग?

अब सवाल यह आता है कि आख़िर क्यों पैरेंट्स इतने कमज़ोर हो जाते हैं कि कोर्ट का दरवाज़ा नहीं खटखटाते?

*     वो फाइनेंशियली और इमोशनली बेटे-बहू या बेटी-दामाद पर आश्रित होते हैं.

*     परिवार का नाम ख़राब होने का डर.

*     बेटे को लोग बुरा-भला कहेंगे, जो उन्हें अच्छा नहीं लगता.

*     ये सोच कि बुढ़ापे में यह तो सबको झेलना पड़ता है.

*     पिछले जन्म के कर्मों का फल मानकर चुपचाप सहन करते हैं.

*     क़ानूनी कार्यवाही में व़क्त लगता है, तब तक बच्चों ने घर से निकाल दिया तो कहां जाएंगे. ये डर भी रहता है.

*     10 हज़ार रुपए के लिए बेटा जेल जाए, उससे अच्छा तो वो भीख मांगकर खा लेंगे. बुढ़ापे में उनके लिए मुसीबत नहीं बनना चाहते.

अब आप ही सोचें, अगर पैरेंट्स ख़ुद को मुसीबत मानकर चुप बैठ जाएंगे, तो भला क़ानून कहां तक उनकी मदद कर पाएगा.

बुज़ुर्ग पैरेंट्स जानें अपने अधिकार

*     अगर आपके बच्चे आपकी देखभाल करने की बजाय आपका शोषण करते हैं, तो आप उनके ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कर सकते हैं.

*     अगर घर आपके नाम पर है, तो यह आपकी इच्छा पर है कि आप बेटे-बहू या बेटी-दामाद को अपने साथ रखना चाहते हैं या नहीं.

*     मेंटेनेंस  एंड वेलफेयर ऑफ पैरेंट्स एंड सीनियर सिटिज़न्स, 2007 के तहत आप मेंटेनेंस का अधिकार रखते हैं.

*     अगर बच्चे आपकी प्रॉपर्टी पर ज़बर्दस्ती कब्ज़ा करने की कोशिश करें, तो आप उन्हें घर से निकाल सकते हैं.

हर बुज़ुर्ग को पता हों ये फैसले

*     हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण ़फैसला दिया, जिसमें उन्होंने सभी बुज़ुर्ग पैरेंट्स को यह अधिकार दिया है कि अगर उनका बेटा उनकी देखभाल नहीं करता और उन्होंने अपनी प्रॉपर्टी का हिस्सा गिफ्ट डीड के ज़रिए उसके नाम कर दिया है, तो वे वो प्रॉपर्टी वापस ले सकते हैं. वो गिफ्ट डीड कैंसल करवा सकते हैं.

*     एक और महत्वपूर्ण मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने यह आदेश दिया कि यह पूरी तरह से पैंरेंट्स की इच्छा पर है कि वो अपने घर में बच्चों और पोते-पोतियों को रखना चाहते हैं या नहीं. बच्चे ज़बर्दस्ती उनके घर में नहीं रह सकते. अगर घर बुज़ुर्ग पैरेंट्स के नाम पर है और बच्चे उनकी देखभाल नहीं कर रहे या उन्हें ख़र्च नहीं दे रहे, तो वे उन्हें अपने घर से निकाल सकते हैं.

*     पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण ़फैसले में बेटे-बहू को उनकी मां का घर छोड़ने का आदेश दिया, जबकि बेटे का कहना था कि पिता की प्रॉपर्टी होने के नाते उसमें उसका भी हक़ है, इसलिए वह घर खाली नहीं करेगा. कोर्ट ने बेटे को फटकार लगाते हुए कहा कि मां का शोषण करनेवालों को उनके साथ रहने का कोई हक़ नहीं है. बुज़ुर्गों को यह अधिकार है कि वो अपनी प्रॉपर्टी की सुरक्षा के लिए जिसे चाहें रखें और जिसे चाहें घर से निकाल दें.

कैसे बचें शोषण से?

*     बुज़ुर्गों के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि वो अपने बुढ़ापे के लिए कुछ बचाकर रखें, ताकि ज़रूरत पड़ने पर बच्चों पर आश्रित होना न पड़े. आर्थिक निर्भरता ही बुढ़ापे में आपकी ताक़त बनेगी.

*     सीनियर सिटीज़न पेंशन स्कीम आदि में निवेश करके रखें, ताकि रिटायरमेंट के बाद हर महीने एक तय रक़म आपको मिलती रहे.

*     भावनाओं में बहकर बच्चों के नाम प्रॉपर्टी ट्रांसफर करने की बजाय वसीयत बनाएं, जो आपके न रहने पर लागू हो.

*     आपकी सुरक्षा आपके अपने हाथ में है, अगर बच्चे आपका शोषण कर रहे हैं, तो उनके ख़िलाफ़ शिकायत करें.

*     समाज में बदनामी के डर से ख़ुद को शोषित न होने दें. आपकी जागरूकता ही आपकी सुरक्षा की गारंटी है.

ज़रूरत है सख़्त सरकारी पहल की

*     मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पैरेंट्स एंड सीनियर सिटीज़न्स एक्ट, 2007 के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए अभियान चलाए जाएं.

*     वरिष्ठ नागरिकों के लिए मेडिकल की सुविधाएं मुफ़्त होनी चाहिए.

*     सीनियर सिटीज़न होते ही बहुत-सी मेडिक्लेम सुविधाएं बंद हो जाती हैं, इसके लिए सरकार को ज़रूरी क़दम उठाने चाहिए, ताकि बुज़ुर्गों के लिए बुढ़ापा बीमारी न बने.

* शोषण करनेवाले बच्चों को कड़ी सज़ा दी जाए और समाज ख़ुद उन्हें बहिष्कृत करे.

* स्कूलों और कॉलेजेस में बुज़ुर्गों के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ानेवाले कार्यक्रम आयोजित किए जाएं.

देखभाल करनेवालों को टैक्स बेनीफिट

आर्थिक तंगी का बहाना बनाकर बुज़ुर्गों की देखभाल से कन्नी काटनेवालों के लिए महाराष्ट्र सरकार टैक्स कंसेशन प्रपोज़ल लेकर आ रही है. इसके तहत पैरेंट्स की देखभाल और ख़र्च उठानेवालों को सरकार टैक्स में 10% तक की छूट देगी. महाराष्ट्र सरकार का यह क़दम असम सरकार से प्रेरित है. असम में जो बच्चे अपने बुज़ुर्ग पैरेंट्स की देखभाल नहीं करते, उनकी तनख़्वाह से 10% काटकर उनके पैरेंट्स के अकाउंट में जमा कर दिया जाता है. उम्मीद है यह प्रपोज़ल जल्द ही लागू हो, ताकि बुज़ुर्गों की हालत में सुधार हो.

– अनीता सिंह 

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10 क़ानूनी मिथ्याएं और उनकी हक़ीक़त (10 Common Myths About Indian Laws Busted!)

क़ानून की ऐसी कई छोटी-छोटी बारीक़ियां हैं, जिनके बारे में लोगों को पता ही नहीं होता और औरों से सुनी-सुनाई बातों पर विश्‍वास कर उसी को सच मानने लगते हैं. क़ानून से जुड़ी ऐसी ही कुछ मिथ्याओं के सच उजागर करने की हमने यहां एक कोशिश की.

Myths About Indian Laws

मिथ 1. मुझे कोर्ट में ओरिजनल डॉक्यूमेंट्स जमा करने पड़ेंगे.

सच: ऐसा बिल्कुल नहीं है और आप ऐसा भूलकर भी मत करना, क्योंकि कोर्ट में उनके खोने का डर बना रहता है. सिविल प्रोसीज़र कोड, 1908 के अनुसार, कोर्ट में पेटीशन दाख़िल करते समय आपको उसके साथ एफीडेविट और ओरिजनल डॉक्यूमेंट्स की सर्टीफाइड फोटोकॉपीज़ सबूत के तौर पर जमा करनी होती हैं. हां, सुनवाई के दौरान आपको ओरिजनल डॉक्यूमेंट्स दिखाने पड़ते हैं, पर अगर उस समय भी आप ओरिजनल्स नहीं दिखा सकते, तो सर्टीफाइड फोटोकॉपीज़ भी दिखा सकते हैं. याद रखें, अटेस्टेशन किसी गैजेटेड ऑफिसर से ही करवाएं और अपनी सहूलियत के लिए हमेशा ओरिजनल्स की सर्टीफाइड फोटोकॉपीज़ के दो सेट बनाकर रखें, ताकि ज़रूरत पड़ने पर उनका इस्तेमाल कर सकें. ओरिजनल्स आप कभी किसी को न दें, अगर आप चाहें, तो अपने वकील को भी सर्टीफाइड कॉपीज़ दे सकते हैं. सेफ्टी के तौर पर ओरिजनल्स को हमेशा स्कैन करके कंप्यूटर में सेव करके रखें.

मिथ 2: मैं जब भी चाहूं कोर्ट में केस दाख़िल कर सकता हूं. 

सच: द लिमिटेशन एक्ट, 1963 के तहत सभी सिविल केसेज़ ‘टाइम बार्ड’ होते हैं यानी हर केस की एक तय समय सीमा होती है. किसी भी मामले को उस तय समय के भीतर ही कोर्ट में दाख़िल किया जा सकता है, वरना आप उसके ख़िलाफ़ कार्यवाही का मौक़ा गंवा सकते हैं. मामले के अनुसार यह समय सीमा 3 महीने से लेकर 3 साल तक की हो सकती है. हालांकि कुछ मामलों में सहूलियत मिल जाती है, बशर्ते देरी की वजह कोर्ट को वाजिब लगे, जैसे- अगर कोई 16 साल का है, जिसे पेटीशन दाख़िल करना है और उसका कोई गार्जियन नहीं है, तो उसके केस की समय सीमा उसके 18 साल के होने के बाद से शुरू होगी.

मिथ 3: अगर मैं गारंटर हूं, तो इसका यह मतलब नहीं कि मैं लोन का अमाउंट चुकाऊं. 

सच: इस मिथ की हक़ीक़त को आप जितनी जल्दी समझ लें, आपके लिए उतना ही अच्छा होगा. जब आप किसी के लिए लोन के गारंटर बनते हैं, तो अगर किसी कारणवश वह लोन नहीं चुका पाता या उसकी मृत्यु हो जाती है, जिसके बाद बैंक के पास अपना पैसा वसूलने के लिए गारंटर एकमात्र ज़रिया बचता है, तो बैंक को पूरा अधिकार है कि वह बचे हुए लोन का पूरा अमाउंट आपसे वसूल कर सकता है. इतना ही नहीं, यह भविष्य में आपके लोन लेने की योग्यता को भी प्रभावित कर सकता है. इसलिए अगली बार लोन के लिए किसी के गारंटर बनने से पहले पूरी तरह से आश्‍वस्त  हो जाएं कि वह पूरा लोन चुका पाएगा, तभी उसके गारंटर बनें.

मिथ 4: बिना किसी वकील के मैं कंज़्यूमर कोर्ट में केस नहीं कर सकता.   

सच: कंज़्यूमर कोर्ट में केस करने के लिए आपको वकील की ज़रूरत नहीं है, अगर आप अपने केस को ख़ुद पेश कर सकते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार आप ऐसा कर सकते हैं. दरअसल, वकील की लंबी-चा़ैडी फीस के बारे में सोचकर ही बहुत-से लोग कंज़्यूमर कोर्ट में जाने से कतराते हैं, क्योंकि कंज़्यूमर कोर्ट के छोटे-मोटे मामलों में मुआवज़ा बहुत ज़्यादा नहीं मिलता. ऐसे में वकील की फीस देना हर किसी को भारी पड़ता है. इसलिए अगर आपको भी किसी कंपनी ने कोई धोखा दिया है या आपको उनसेकोई शिकायत है, तो आप भी उसके ख़िलाफ़ कंज़्यूमर कोर्ट जा सकते हैं और आपको किसी वकील की भी ज़रूरत नहीं.

मिथ 5: मैं अपनी ख़ानदानी प्रॉपर्टी जिसे चाहूं, जैसे चाहूं, गिफ्ट कर सकता हूं.

सच: ख़ानदानी प्रॉपर्टी पूरे परिवार की होती है, इसलिए किसी एक को कोई हक़ नहीं होता कि वह उसे अपनी मर्ज़ी से गिफ्ट कर सके. जब तक कि परिवार का एकलौता या आख़िरी सदस्य न हो, तब तक प्रॅापर्टी स़िर्फ बांटी जा सकती है, गिफ्ट नहीं की जा सकती. हां, अगर आपके अलावा आपके ख़ानदान में प्रॉपर्टी क्लेम करनेवाला दूसरा कोई नहीं है, तो आप प्रॉपर्टी को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक बेच या गिफ्ट कर सकते हैं. यह नियम हिंदू संयुक्त परिवार में रहनेवाले जॉइंट प्रॉपर्टीवालों के लिए है.

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Myths About Indian Laws
मिथ 6: लेटर ऑफ अथॉरिटी के ज़रिए मैं किसी को भी कोई भी ज़िम्मेदारी दे सकता हूं.

सच: प्रतिनिधित्व के लिए दो डॉक्यूमेंट्स इस्तेमाल में लाए जाते हैं. एक लेटर ऑफ अथॉरिटी और दूसरा पावर ऑफ अटॉर्नी. लेटर ऑफ अथॉरिटी के ज़रिए बैंक से चेक बुक लेना, डॉक्यूमेंट्स जमा करना या लेना जैसे छोटे व आसान काम दिए जा सकते हैं, जबकि कॉम्प्लेक्स फाइनेंशियल मैटर्स, जैसे- प्रॉपर्टी बेचना, डॉक्यूमेंट्स व चेक साइन करने आदि बड़े व महत्वपूर्ण ट्रांज़ैक्शन्स के लिए पावर ऑफ अटॉर्नी का इस्तेमाल किया जाता है.

मिथ 7: कोर्ट के बाहर किए गए समझौते को मैं कोर्ट में चैलेंज नहीं कर सकता.

सच: यह सच नहीं है. ज़्यादातर लोग कोर्ट की लंबी कार्यवाही से बचने के लिए आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट यानी कोर्ट के बाहर ही मामले को निपटाना, को तवज्जो देते हैं. पर अगर आपको लगता है कि इस सेटलमेंट में आपके साथ धोखाधड़ी हुई है या आपके ऊपर दबाव डालकर ज़बर्दस्ती सेटलमेंट करवाया गया है, तो आप उसके ख़िलाफ़ कोर्ट में जा सकते हैं. कोर्ट एग्रीमेंट के नियम व शर्तों को देखकर अपना ़फैसला सुनाते हैं. इसके अलावा आर्बिट्रेशन (किसी और की मध्यस्थता) के ज़रिए सुलझाए गए मामले को भी लेकर आप कोर्ट जा सकते हैं. इसलिए इस ग़लतफ़हमी में बिल्कुल न रहें कि अगर कोर्ट के बाहर समझौता कर लिया है, तो उसके ख़िलाफ़ कोर्ट में नहीं जा सकते.

मिथ 8: सेकंड हैंड गाड़ी ख़रीदने पर इंश्योरेंस कंपनी को सूचित करने की कोई ज़रूरत नहीं.

सच: जब भी आप सेकंड हैंड गाड़ी ख़रीदते हैं, तो स़िर्फ गाड़ी की कंडीशन पर ही नहीं, बल्कि पेपरवर्क पर भी पूरा ध्यान दें. वेहिकल रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट, रोड टैक्स रसीद के साथ-साथ वेहिकल इश्योरेंस भी अपने नाम पर ट्रांसफर करवा लें. अगर इंश्योरेंस पेपर पर आप नाम ट्रांसफर नहीं करवाते और गाड़ी का एक्सीडेंट हो जाता है या गाड़ी चोरी हो जाती है, तो इंश्योरेंस कंपनी आपका क्लेम पास नहीं करेगी, क्योंकि पेपर्स पर आपका नाम नहीं है. इसलिए नियमानुसार गाड़ी ख़रीदने के 14 दिनों के भीतर ही इश्योरेंस पेपर्स पर अपना नाम ट्रांसफर करवा लेने में ही आपका फ़ायदा है.

मिथ 9: मेरे वारिस को मेरे सारे शेयर्स अपने आप मिल जाएंगे.

सच: यह ख़ासतौर पर उनके लिए है, जो शेयर्स आदि में इंवेस्ट करते रहते हैं. अगर आपने वसीयत में लिख दिया है कि मेरे बाद मेरा सब कुछ मेरी पत्नी या बच्चों को मिलेगा, लेकिन शेयर्स के लिए किसी और को नामांकित (नॉमिनी) किया है, तो नियमानुसार आपके बाद आपके शेयर्स नॉमिनी को मिलेंगे ना कि क़ानूनी वारिस को. द कंपनीज़ एक्ट के सेक्शन 109ए के अनुसार, अकाउंट होल्डर के बाद उसके शेयर्स क़ानूनी तौर पर नॉमिनी को मिलेंगे.एक्सपर्ट्स के अनुसार भविष्य में किसी भी तरह की परेशानी से बचने के लिए नॉमिनी का ही नाम वसीयत में भी शेयर्स के लिए लिखें.

मिथ 10: मेरे बाद मेरी प्रॉपर्टी का बंटवारा करने के लिए ऑनलाइन वसीयत काफ़ी है.

सच: डिजिटली साइन किए हुए ऑनलाइन वसीयत को हमारे देश में मान्यता नहीं मिलती. ऑनलाइन वसीयत का प्रिंटआउट लेकर आपको दो गवाहों की मौजूदगी में उसे साइन करना होता है. उसके बाद उन दोनों गवाहों को भी उस वसीयत को अटेस्ट करना पड़ता है, जिसके बिना वह वसीयत मान्य नहीं होती. हालांकि ज़रूरी नहीं फिर भी अगर आप चाहें, तो वसीयत को रजिस्टर करा सकते हैं. आजकल ऑनलाइन बहुत-सी वेबसाइट्स हैं,  जैसे- ुुु.ट-थळश्रश्र और ुुु.ङशसरलूुीळींशी.लेा जिनकी मदद से कुछ अमाउंट देकर आप अपनी वसीयत बनवा सकते हैं, पर यह काफ़ी नहीं. उस वसीयत का प्रिंटआउट लेकर, साइन और अटेस्ट कराना बहुत ज़रूरी है.  बॉक्स अगर ओरिजनल पेपर्स खो जाएं, तो डुप्लीकेट के लिए क्या करें?यहां हम जनरल प्रोसेस के बारे में बता रहे हैं, जो ज़्यादतर मामलों मेंे इस्तेमाल किया जाता है. – पुलिस में एफआईआर दर्ज कराएं.- एक इंग्लिश और स्थानीय भाषा के न्यूज़पेपर में पब्लिक नोटिस जारी करें.- ओरिजनल इश्यूअर को डुप्लीकेट बनाने के लिए अप्लाई करें.- एफआईआर और प्रेस क्लिपिंग की कॉपी सबूत के तौर पर रखें.

वसीयत के लिए कुछ ख़ास टिप्स

आप जिन लोगों को अपनी प्रॉपर्टी देना चाहते हैं, उनके नाम साफ़-साफ़ लिखें. उनके निकनेम या आधे-अधूरे नाम न लिखें.- अगर आप किसी को कुछ ऐसा देना चाहते हैं, जिसकी रक़म लिखी जा सकती है, तो वह रक़म ज़रूर लिखें.- जिन चीज़ों के लिए रक़म लिखना मुमकिन नहीं, उनके लिए प्रॉपर्टी का सही-सही डिस्क्रिप्शन लिखें.- जो दो लोग वसीयत को अटेस्ट करेंगे, उनको या उनकी पत्नी को इस वसीयत से कोई फ़ायदा नहीं मिलना चाहिए यानी वसीयत ऐसे लोगों से अटेस्ट कराएं, जिन्हें उस वसीयत से कोई लाभ नहीं मिलनेवाला. – अपनी वसीयत के लिए एक एक्ज़ीक्यूटर अपॉइंट करें, जिसकी यह ज़िम्मेदारी होगी कि वह इस बात को सुनिश्‍चित करे कि सभी बातों का वैसा ही पालन किया गया, जैसा कि वसीयत में लिखा गया था.

– अनीता सिंह

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न्यूज़ टाइम- आज की 5 ख़ास ख़बरें… (Today’s Updates: Top 5 Breaking News)

डॉक्टर बनना हुआ आसान

अब देश में डॉक्टर बनना आसान हो जाएगा, क्योंकि केंद्र सरकार ने देशभर के हर ज़िले में मेडिकल कॉलेज खोले जाने की योजना बनाई है. पहले चरण में इसकी शुरुआत बिहार के छपरा, समस्तीपुर व पूर्णिया से हो चुकी है. इसके लिए २० राज्यों के ५८ ज़िलों का सिलेक्शन हुआ है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी के अनुसार, हर ३ संसदीय क्षेत्र में १ मेडिकल कॉलेज व हॉस्पिटल होंगे. मोदीजी का यह मानना है कि स्वच्छता अभियान सेहत से भी जुड़ा है, इसलिए उन्होंने इस तरह की योजना की पहल की है.

 

केरल बाढ़ का खुलासा

नासा ने उपग्रह से मिले आंकड़ों के अनुसार, यह खुलासा किया है कि हिमालय की भौगोलिक स्थिति व पश्चिम घाट के कारण दक्षिण-पश्चिमी इलाके में मूसलाधार बारिश व बाढ़ की स्थिति बनी है. अंधाधुंध बरसात के कारण केरल त्रासदी ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया था. नासा के अनुसार, दक्षिण पश्चिम मॉनसून पर अरब सागर व उत्तरी हिंद महासागर से चलनेवाली गर्म हवाओं में मौजूद नमी इस पर्वत श्रेणियों से टकराती है, इसलिए ज़ोरदार बरसात होती है. आज ओणम के पावन अवसर पर हम सभी की यही कामना है कि केरलवासी जल्द से जल्द इस भयावह विपदा से उबर जाएं.

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कार सीट सेंसर

अक्सर लोग थके होने के कारण कार चलाते समय सुस्त हो जाते हैं या फिर उन्हें झपकी आने लगती है, जिससे एक्सीडेंट होने का ख़तरा रहता है. इसी को ध्यान में रखते हुए आईआईटी चेन्नई के वैज्ञानिकों ने कार सीट सेंसर बनाया है. यह कार चालक की हर गतिविधियों पर नज़र रखेगा. इसमें कहीं भी गड़बड़ी होने पर, ड्राइवर के नींद आने, सुस्त होने पर वेकअप अर्लाम बजने लगेगा.

 

नकली अंडों का भ्रम

एफएसएसआई ने नकली या प्लास्टिक के अंडों को लेकर लोगों में फैल रहे अफ़वाहों व भ्रम को दूर करने के लिए गाइडलाइंस जारी की है. बकौल उनके ये सभी आशंकाएं बेबुनियाद हैं. अब तक ऐसी कोई तकनीक नहीं बनी है, जो कृत्रिम या नकली अंडे बना सके. लोग अंडे इस्तेमाल करते समय कुछ बातों का ध्यान दें, जैसे- अधिक दिनों तक अंडे को फ्रिज में न रखें, अंडे को धोकर सूखने के बाद फ्रिज में रखें, अंडों से बदबू आती हो या गंदे हो, तो न ख़रीदें. फ्रेश अंडे की पहचान के लिए उसे किसी पानी भरे मग या ग्लास में डालें. यदि अंडे नीचे बैठ जाए, तो फ्रेश हैं और ऊपर तैरने लगे तो पुराने हैं.

 

सेक्स की आज़ादी

मेक्सिको के शहर ग्वादलजारा को सार्वजनिक तौर पर प्यार करने, सेक्स करने की अनुमति मिल गई है. वहां पर अक्सर पुलिस द्वारा पैसे ऐंठने, परेशान करने की शिकायतें मिलती रहती थीं. इसी को रोकने के लिए खुले में सेक्स करने के क़ानूनी प्रस्ताव को पारित किया गया है. इस क़ानून के अनुसार, अब गार्डन, कार, पब्लिक प्लेस, अन्य खुली जगहों पर सेक्सुअल एक्टीविटीज़ को क्राइम नहीं समझा जाएगा. हां, यदि कोई व्यक्ति आपत्ति करें या शिकायत करें, तो मुनासिब कार्रवाई की जा सकती है.

 

आज का आकर्षण

* इंडोनेशिया में हो रहे एशियन गेम्स में स्क्वाश में भारत की दीपिका पल्लीकल और जोशना चिन्नपा ने कांस्य पदक जीता. बधाई!

* तजिंदर सिंह तूर शॉट पुट में स्वर्ण पदक जीते. मुबारक हो.

– ऊषा गुप्ता

साइबर लॉ एक्सपर्ट: चुनौतीभरा करियर (make career in cyber law)

cyber law career

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जिस तरह से देश में इंटरनेट का विस्तार हो रहा है, उसी तरह साइबर क्राइम भी बढ़ रहा है. साइबर क्राइम से निपटने के लिए आज साइबर लॉ एक्सपर्ट की डिमांड बढ़ गई है. साइबर लॉ एक बेहद अहम और नया क्षेत्र है, जहां आप अपनी क़िस्मत आज़मा सकते हैं. कंप्यूटर से लगाव और नई-नई टेक्नोलॉजी के प्रति जागरूक लोग इस क्षेत्र में अपना कौशल दिखा सकते हैं. इस क्षेत्र में करियर बनाने के लिए कैसे करें शुरुआत? आइए, जानते हैं.

शैक्षणिक योग्यता
साइबर लॉ में करियर बनाने के लिए कम से कम 12वीं या स्नातक(ग्रैज्युएट) होना बहुत ज़रूरी है. पहले से आईटी या लॉ की पढ़ाई कर चुके लोग इसे अलग से पढ़ सकते हैं.

तकनीकी योग्यता
इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए तकनीकी तौर पर चुस्त-दुरुस्त रहना बहुत ज़रूरी है. साइबर
अपराधियों द्वारा भेजे गए कोड को तोड़ने की क्षमता और वो कहां से मैसेज भेज रहा है? आदि सूचनाएं एकत्रित करना बख़ूबी आना चाहिए.

क्या हैं कोर्सेस?
इस क्षेत्र में करियर बनाने के इच्छुक पीजी डिप्लोमा, डिप्लोमा या सर्टीफिकेट कोर्स कर सकते हैं. हालांकि बहुत कम संस्थान हैं जहां इसके लिए अलग से कोर्स कराए जाते हैं, लेकिन अधिकतर संस्थानों में इसके संबंधित एक या दो विषय पढ़ाए जाते हैं.

कोर्स के दौरान
इस कोर्स के अंतर्गत साइबर लॉ और साइबर सिक्योरिटी से जुड़ी मूल बातें, नेटवर्क सुरक्षा, हमलों के प्रकार, नेटवर्क सिक्योरिटी के ख़तरे, हमले और ख़ामियां, सुरक्षा संबंधि समाधान और उन्नत सुरक्षा प्रणाली आदि विशेष रूप से पढ़ाए जाते हैं.

प्रमुख संस्थान
* डिपार्टमेंट ऑफ लॉ, दिल्ली यूनिवर्सीटी.
* एमिटी लॉ स्कूल, दिल्ली.
* आईएमटी, गाज़ियाबाद.
* नेशनल लॉ यूनिवर्सीटी, जोधपुर.
* स्कूल ऑफ लीगल स्टडीज़, शिमला.
* फैकल्टी ऑफ लॉ, लखनऊ यूनिवर्सीटी, लखनऊ.
* पश्‍चिम बंगाल नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ज्यूडिशियल साइंस, कोलकाता.
* इंडियन लॉ इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली.
* इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, इलाहाबाद.

व्यक्तिगत विशेषता
साइबर लॉ में करियर बनाने के लिए आपको आईटी स्पेशलिस्ट होने की ज़रूरत नहीं, लेकिन टेक्नीकल नॉलेज के साथ लीगल नॉलेज होना बहुत ज़रूरी है. साइबर लॉ एक्सपर्ट के लिए बहुत ज़रूरी है कि वो हमेशा नए-नए नियम व क़ानून को जानने के लिए तत्पर हों.

रोज़गार के अवसर
साइबर क्राइम का क्षेत्र बढ़ता जा रहा है. रोज़गार के अवसर देश से विदेश तक हैं. साइबर लॉ एक्सपर्ट सरकारी, निजी बैंकिंग सेक्टर, बीपीओ, आईबी, आईटी, शिक्षण संस्थान आदि जगह नौकरी कर सकते हैं. इसके अलावा बड़े-बड़े प्राइवेट फर्म भी निजी तौर पर साइबर लॉ एक्सपर्ट को अप्वाइंट करते हैं. इसके साथ ही एयरलाइंस, हेल्थकेयर, ट्रांसपोर्टेशन, इनफ्रास्ट्रक्चर, इमर्जेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम आदि जगह भी क़िस्मत आज़मा सकते हैं.

सैलरी
साइबर लॉ स्पेशलिस्ट की डिमांड तेज़ी से बढ़ रही है. इसके साथ ही इसमें सैलरी भी बहुत ज़्यादा मिलती है. शुरुआत में प्रतिमाह 15-20 हज़ार मिलते हैं. इसके बाद सैलरी की कोई सीमा नहीं. बड़े-बड़े फर्म लाख रुपए महीने भी साइबर लॉ एक्सपर्ट को देते हैं. इस क्षेत्र में फ्रीलांस काम करके भी आप मनमुताबिक पैसा कमा सकते हैं.
यदि आप साइबर क्राइम में आगे अपना करियर बनाना चाहते हैं, तो भविष्य में चुनौतियों के लिए तैयार रहें. इस जॉब में आपको हर दिन नए-नए अनुभव होना लाज़मी है. ऐसे में हाई टेक्नोलॉजी से संबंधित क्षमता के साथ-साथ सामने वाले की मानसिक स्थिति और उसके मकसद को समझना आना चाहिए.

इस क्षेत्र में काम करने का समय निश्‍चित नहीं होता. कई बार रात-रात काम करना पड़ता है और फिर भी मनमुताबिक सफलता नहीं मिलती. यह एक नया क्षेत्र है. ऐसे में पिछली व नई सूचनाओं की उपलब्धता कम होने के कारण कई बार काम पूरा करने में कई तरह की मुश्किलें आती हैं.

भारत में लगातार साइबर क्राइम की घटनाएं बढ़ रही हैं. इस क्षेत्र में सिक्योरिटी इंजीनियर्स की कमी है. माना जा रहा है कि यहां अभी क़रीब 5 लाख से ज़्यादा साइबर लॉ एक्सपर्ट की ज़रूरत है.

श्वेता सिंह 

कैसे रखें बच्चों को सुरक्षित? (Know how to secure your child)

 
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जब परिवार के सदस्य, पड़ोसी-मित्र या रिश्तेदार ही मासूम बच्चों के साथ यौन शोषण जैसी हरकतें करने लगें…. जिनके स्पर्श को बच्चे प्यार और स्नेह का स्पर्श समझते हैं, वे ही स्नेह के नाम पर उन्हें अपनी हवस का शिकार बनाने लगें तो हर माता-पिता का चिंतित होना लाज़मी है और ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए एहतियात बरतना ज़रूरी भी, ताकि उनका मासूम ऐसी हरकतों का शिकार न बनने पाए…

 
पूजा श्रीवास्तव… उम्र 15 वर्ष… पिछले 12 सालों से उसके अंकल ही उसका यौन शोषण कर रहे थे, लेकिन वो समझ ही नहीं पाई कि उसके अंकल उसके साथ कुछ ग़लत कर रहे हैं तो किसी से शिकायत का सवाल ही नहीं उठता. पर आज जब वह सब कुछ समझने लगी है तो उसे अपने आप पर शर्म आती है और बहुत गिल्ट फील होता है. जिसे वह बचपन में अंकल का स्नेह समझती थी, वो दरअसल सेक्सुअल एब्यूज़ यानी यौन शोषण था.
ये स़िर्फ पूजा की कहानी नहीं है. हमारे देश में रोज़ाना कई बच्चे इस तरह के यौन शोषण के शिकार होते हैं और उससे भी अफ़सोस की बात तो ये है कि वे चुपचाप इस शोषण का शिकार बनते रहते हैं, क्योंकि उन्हें ये भी पता नहीं होता कि उनके साथ जो कुछ हो रहा है, वो ग़लत है. तो शिकायत किस बात की करें?
हमारे देश में बाल यौन शोषण की घटनाएं तेज़ी से बढ़ी हैं और आंकड़ों पर यक़ीन करें तो भारत में बच्चे इसके सबसे ज्यादा शिकार हो रहे हैं. एक सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 53% बच्चे सेक्सुअल एब्यूज़ यानी यौन शोषण के शिकार हैं और अधिकतर इस शोषण की रिपोर्ट तक दर्ज़ नहीं कराते…
इन घटनाओं से हर माता-पिता की रातों की नींद गायब हो गई है. हर माता-पिता अपने बच्चे की सुरक्षा को लेकर डरे हुए हैं… गली-मोहल्ले, स्कूल, घर-बाहर आख़िर कहीं भी तो उनका बच्चा सुरक्षित नहीं है. उसके साथ कहीं भी कुछ भी घट सकता है. आख़िर हर व़क़्त बच्चों के साथ साया बनकर तो नहीं चला जा सकता और इस युग में, जबकि माता-पिता दोनों वर्किंग हैं तो ऐसे में हर व़क़्त बच्चे को सुरक्षा देनेवाले माता-पिता होना भी तो बेहद मुश्किल है.

ज़रा इन घटनाओं पर भी नज़र डालें

पड़ोस में रहनेवाले शर्मा अंकल 10 वर्षीय सोनू को अकेले में बहला-फुसलाकर उसके प्राइवेट पार्ट्स को सहलाते थे. सोनू ने एक दिन यूं ही बातों-बातों में मां से कहा कि शर्मा अंकल जैसे उसे प्यार करते हैं, वैसे ही उसकी मम्मी क्यों नहीं करती तो मां को सच्चाई का पता चला…

6 ठीं की छात्रा कोमल उस दिन डरी-सहमी घर लौटी और उसकी मां ने पूछा, तो वो रोते हुए बताने लगी कि उसके मैथ्स के टीचर बहुत गंदे हैं. वे होमवर्क चेक करने के बहाने उसके अंगों को छूकर मुस्कुराते हैं. इसलिए उसे मैथ्स का पीरियड अच्छा नहीं लगता.
घर-बाहर गली-नुक्कड़, स्कूल या प्लेग्राउंड… आपके बच्चे के साथ इस तरह की हरकत कहीं भी होती हो, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि फिर आपके बच्चे कहां और कितने सुरक्षित हैं?… और इस तरह की घटनाओं ने माता-पिता की चिंता और भी बढ़ा दी है कि आख़िर वो अपने बच्चों को सुरक्षित कैसे रखें, ख़ासकर कामकाजी माता-पिता, जो दिनभर घर से बाहर रहते हैं, उनकी मुश्किलें तो और बढ़ गई हैं.
अपने लाडले को, जिसे पूरी दुनिया की नज़रों से बचाकर रखती है मां कि कहीं उसे किसी की बुरी नज़र न लग जाए… वही बच्चा किसी की बुरी नज़रों… किसी की बुरी आदत का शिकार हो जाए तो… ज़रा सोचिए, उस मां पर क्या बीतती होगी?
अधिकतर माता-पिता अपने बच्चों को ये समझाकर कि ‘कोई अजनबी अंकल चॉकलेट या ग़िफ़्ट दे तो मत लेना, वो कहीं पिकनिक पर ले चलने की बात करे तो सुनना मत’ उसकी सुरक्षा के प्रति आश्‍वस्त हो जाते हैं. वे उसे सिखाते हैं कि वे स़िर्फ उन पर भरोसा करें, जिन्हें वो पहले से जानते-पहचानते हैं और बच्चा उनकी बात मानकर उन पर भरोसा करने भी लगता है. लेकिन तब क्या हो, जब यही जान-पहचान के लोग मौक़ा देखकर कभी उसके अंगों को छूकर, तो कभी उसे निर्वस्त्र कर और कभी उसके साथ बलात्कार कर उसे अपनी हवस का शिकार बना लें? जिस नौकर पर आपको पूरा भरोसा है, वही उसके अपहरण की साजिश रच डाले… या आपके कॉलोनी के जिस युवा लड़के के पास आप उसे पढ़ने भेजती थीं, वही उसके साथ ग़लत हरकत करने लगे.
दरअसल, बच्चे समाज का सबसे असुरक्षित तबका हैं और आसान टारगेट भी. इसकी वजह है कि बच्चे अपने आसपास के लोगों को, जिन्हें वे रोज़ स्कूल, घर या कॉलोनी में देखते हैं, उस पर सहज ही विश्‍वास करने लगते हैं और अनजाने ही उससे रिश्ता जोड़ लेते हैं. भरोसे के इसी रिश्ते की आड़ में ये उनका यौन शोषण करते हैं. बच्चे भी उनके कहने पर वो सब करते रहते हें, जो उनसे कहा जाता है. ये यौन अनाचारी बच्चे को रिश्ते की दुहाई देकर अपनी इच्छापूतिर्र् तो करते ही हैं, साथ ही बच्चे के मन में किसी न किसी तरह का डर पैदा करने में भी क़ामयाब हो जाते हैं, ताकि उनकी ग़लत हरकत का पता किसी को न चले और उनकी दरिंदगी का खेल यूं ही चलता रहे.
बाल मनोवैज्ञानी डॉ. प्रीति मेनन के अनुसार, “हमारे यहां कोई भी बच्चा सुरक्षित नहीं है. किसी भी बच्चे के साथ इस तरह का हादसा कभी भी हो सकता है और चूंकि इस तरह की हरकत करनेवाले घर-परिवार के लोग ही होते हैं, इसलिए इन हादसों का जल्दी पता भी नहीं चलता.” उनके अनुसार, “इसके लिए हमारे यहां का पारिवारिक ढांचा सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार है. हमारे यहां बच्चों को हमेशा सिखाया जाता है कि बड़ों का आदर करो. वो जैसा कहें, वैसा करो, उनकी बात मानो. और बस, इसी बात का फ़ायदा उठाते हैं घर-परिवार के बड़े-बुजुर्ग. वे बच्चों का शोषण करते रहते हैं और बच्चे उनकी बात मानते रहते हैं.”

लड़के भी शिकार

केवल लड़कियां ही इसकी शिकार नहीं होतीं. लड़कों के साथ यौन शोषण का ख़तरा तो और भी ज़्यादा होता है और इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि भारतीय परिवारों में लड़कों की सुरक्षा की उतनी चिंता नहीं की जाती, जितनी लड़कियों के प्रति की जाती है.

किन से हो सकता है ख़तरा?

बच्चों के साथ सेक्सुअल एब्यूज़ के कुल मामलों में से 50 प्रतिशत मामलों में दोषी पारिवारिक सदस्य ही होते हैं, जिसमें चाचा, मामा, फूफा, कज़िन, सौतेले पिता या भाई शामिल हैं. इसके अलावा दूर के रिश्तेदार, घर में नियमित आनेवाले परिचित, पारिवारिक मित्र, पड़ोसी, टीचर, कोच, केयरटेकर, डॉक्टर, घरेलू नौकर, जो बच्चों के नियमित संपर्क में रहते हैं, भी इसमें शामिल होते हैं.

बच्चे ख़ामोश क्यों रहते हैं?

शिकार बच्चे ऐसी घटनाओं को याद नहीं करना चाहते, क्योंकि वे दोबारा वो दर्द महसूस नहीं करना चाहते.
बच्चे ऐसी घटनाओं के लिए ख़ुद को ही ज़िम्मेदार मान लेते हैं और सोचते हैं कि अगर उन्होंने इस बारे में माता-पिता या दोस्तों को कुछ बताया तो वे उसे गंदा समझेंगे और उनसे प्यार करना बंद कर देंगे.
बच्चे कुछ और समझ पाएं या न समझ पाएं, इतना तो समझते ही हैं कि उनके साथ जो कुछ भी हुआ, वो शर्म की बात है. शर्म और झिझक के कारण वे इसका ज़िक्र किसी से नहीं करते.
बच्चों के मन में ये डर भी होता है कि उनकी बात पर कोई यक़ीन नहीं करेगा और उल्टे उसे ही सज़ा मिलेगी. ये डर भी उन्हें सच्चाई बताने से रोकता है.
उनका शोषण करनेवाले अक्सर उन्हें डरा-धमकाकर रखते हैं, जिस कारण वे मुंह खोलने से डरते हैं.

क़ानूनी पहलू

इस संबंध में कोई अलग से क़ानून नहीं है. धारा 376 के तहत दुष्कर्म की परिभाषा इतनी जटिल है कि इस दायरे में ऐसे बच्चे नहीं आ पाते, जिनके साथ अनाचार या यौन दुर्व्यवहार हुआ हो. दरअसल, इस दायरे में मुख्यत: ‘पेनिट्रेशन’ को रखा गया है और अपराध पूरी तरह मेडिकल सबूतों के आधार पर तय किया जाता है. लेकिन बच्चों के मामले में सबूत जुटाना मुश्किल होता है, क्योंकि बच्चों के साथ यौन दुराचार का मामला एक अकेला मामला नहीं होता, बल्कि ऐसी घटनाओं की पूरी सीरीज़ होती है, जिसके लिए सबूत जुटाना मुश्किल होता है. ऐसी स्थिति में अनाचारी के ख़िलाफ़ कोई क़ानूनी क़दम उठाना मुश्किल हो जाता है.

कैसे रखें बच्चों को यौन शोषण से सुरक्षित?

बच्चों की सुरक्षा आख़िरकार माता-पिता की ही ज़िम्मेदारी है. इसके लिए एहतियात भी उन्हें ही बरतना होगा. सबसे पहले तो ये जानने की कोशिश करें कि जिन लोगों से बच्चों को ख़तरा हो सकता है, उन्हें कैसे पहचानें?

कोई भी ऐसा शख़्स

जो बच्चे के न चाहने के बावजूद उसे गले लगाने, छूने, गुदगुदाने, खेलने या उसे पकड़ने की कोशिश करता हो.
जो अनावश्यक रूप से बच्चे में दिलचस्पी लेता हो या बच्चे के शारीरिक विकास के बारे में जब-तब बातें करता हो.
जो बच्चे के अकेले होने के मौ़के का इंतज़ार करता हो या बच्चा जब भी अकेला हो, वो उसके साथ हो लेता हो.
जो अपने फुर्सत का ज़्यादातर समय बच्चे के साथ बिताना पसंद करता हो.
बच्चे के लिए जब-तब ग़िफ़्ट लाता हो या उसे चॉकलेट वगैरह के लिए पैसे देता हो.
जो बच्चा सोता हो तो बेडरूम में घुस जाता हो या स्नान करता हो, तो बाथरूम तक में चला जाता हो.

ऐसे हर शख़्स के प्रति माता-पिता को सावधान रहना चाहिए और बच्चे को भी उससे दूर रखने की कोशिश करें. बेहतर होगा कि ऐसे लोगों का घर में आना-जाना एकदम बंद कर दें. इसके अलावा इन बातों पर भी ध्यान दें-
बच्चे से हर हाल में संवाद बनाए रखें. उसके साथ ऐसा रिश्ता रखें कि
उसके साथ कहीं-भी, कभी-भी कुछ घटा हो तो वो बेधड़क उसके बारे में आपको बता सके.
उसे सिखाएं कि गंदा स्पर्श और अच्छा स्पर्श क्या होता है. उसे उसके अंगों से परिचित कराएं.
बच्चे के जीवन में क्या घट रहा है, ये जानने की कोशिश करें.
अपने बच्चे की हर बात ध्यान से सुनें. वो परिवार के किसी सदस्य, रिश्तेदार या आसपास के लोगों के इस तरह के व्यवहार की भनक भी दे तो उसे अनदेखा न करें. या अगर आप गौर कर रही हैं कि वो इनमें से किसी से दूर रहने की कोशिश कर रहा है तो भी
उससे प्यार से इसकी वजह जानने की कोशिश करें.
ऐसी कोई भी हरकत उजागर होती है तो इ़ज़्ज़त-सम्मान के नाम पर या लोग क्या कहेंगे, सोचकर उसे दबाने की कोशिश न करें, न बच्चे की आवाज़ को ख़ामोश करने का प्रयत्न करें. ऐसे अनाचारियों को उसके किए की सज़ा दिलाएं, ताकि कोई और उसका शिकार न बनने पाए.
यदि अनाचारी परिवार का भी हो तो भी उसकी करतूतों पर परदा न डालें. उसका विरोध करें, वरना उसे और बढ़ावा मिलेगा.
किसी भी सूरत में ऐसी किसी घटना के लिए बच्चे को दोषी न ठहराएं, बल्कि उसकी तारीफ़ करें कि उसने ऐसे श़ख़्स को बेनक़ाब करने का साहस दिखाया.
बच्चे के व्यवहार में कोई असामान्यता नज़र आ रही हो तो उसे मनोचिकित्सक के पास ले जाएं.
बच्चों को अपनी भावनाओं पर यक़ीन करना सिखाएं. उन्हें समझाएं कि घर के बड़ों या परिचितों की इ़ज़्ज़त करना ज़रूरी है, लेकिन जब भी उन्हें उनकी कोई बात या व्यवहार अनुचित लगे तो ना कहने में कोई बुराई नहीं है.
यौन शोषण बच्चे के दिलोदिमाग़ पर गहरा असर छोड़ सकता है. ऐसे बच्चों को इमोशनल और बिहेवियरल प्रॉब्लम (व्यावहारिक समस्या) हो सकती है या भविष्य में इससे उनकी सेक्स लाइफ़ भी प्रभावित हो सकती है. लेकिन इसका अर्थ ये नहीं है कि ऐसे बच्चे सामान्य ज़िंदगी नहीं जी सकते. बस, ज़रूरत है माता-पिता को समझदारी से काम लेने की और थोड़ा एहतियात बरतने की, ताकि आपके बच्चे के साथ ऐसा कुछ घटे ही नहीं. इसलिए समय रहते अपने बच्चों को जागरूक और सतर्क बनाएं, ताकि वे ऐसे लोगों का आसान टारगेट न बनने पाएं.

यौन शोषण करनेवाले लोग दो तरह के होते हैं. एक तो वो जो पेडोफेलिया नामक बीमारी के शिकार होते हैं. ऐसे लोगों को हमउम्र या बड़ी उम्र के लोगों के साथ सेक्स करने में कोई दिलचस्पी नहीं होती. इनके टारगेट बच्चे ही होते हैं. इनका व्यवहार एबनॉर्मल होता है और ये सोचते हैं कि बच्चों में भी सेक्स की फीलिंग होती है, इसलिए उनके साथ सेक्स करने में कोई बुराई नहीं. इनका अपराध सुनियोजित होता है और ये ज़्यादा ख़तरनाक होते हैं. शोधों के अनुसार पेडोफेलिया का रोगी अपने पूरे जीवन में कम से कम 300 बच्चों को अपना शिकार बनाता है. दूसरी श्रेणी में वो लोग होते हैं, जो नशे की हालत में, अकेलेपन, दांपत्य रिश्तों में तनाव के चलते या कुंठा से ग्रस्त होते हैं और मौक़ा मिलते ही ऐसा अपराध कर बैठते हैं. इनका टारगेट घर-परिवार, पड़ोसी या रिश्तेदार होते हैं.
– प्रतिभा तिवारी

साइबर क्राइम- कहीं आप तो नहीं अगला शिकार? (Cyber Crime)

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इंटरनेट क्रांति की बदौलत एक क्लिक पर सारी दुनिया सिमट गई है. दोस्तों-रिश्तेदारों से चैटिंग से लेकर ख़रीददारी, बैंकिंग ट्रांजेक्शन… सब कुछ बस, एक क्लिक पर हो जाता है, मगर दुनिया को समेटता ये इंटरनेट कभी आपकी दुनिया भी बदल सकता है. सोशल साइट्स पर की गई ज़रा-सी मस्ती भारी पड़ सकती है. तेज़ी से बढ़ते साइबर क्राइम के ख़तरे के बावजूद ज़्यादातर लोग इसे हल्के में ही लेते हैं. साइबर क्राइम यानी इंटरनेट की दुनिया का ये अनदेखा-अनजाना दुश्मन आपको कितनी हानि पहुंचा सकता है? इसकी पड़ताल करती पेश है, हमारी ख़ास रिपोर्ट.
अनसोशल होते सोशल साइट्स

मुंबई की 35 वर्षीया मोनिका शर्मा (बदला हुआ नाम) के साथ सोशल साइट पर जो हुआ उसे जानने के बाद शायद एकबारगी आप भी ख़ुद को इससे दूर रखने की सोच लें. दरअसल, किसी ने मोनिका का फेसबुक (एफबी) अकाउंट हैक कर लिया और उनके नाम से उनके ऐसे
दोस्तों-रिश्तेदारों को मैसेज करने लगा जिनसे मोनिका शायद ही कभी बात करती थी. मोनिका कहती हैं, “कुछ फैमिली प्रॉब्लम्स की वजह से मैं काफ़ी दिनों से एफबी अकाउंट चेक नहीं कर पाई. क़रीब 15 दिन बाद जब मैंने लॉगिन किया, तो मेरे एक कॉलेज फ्रेंड के अजीब से मैसेज ने मेरे होश उड़ा दिए. उन मैसेज को देखकर लग रहा था कि मेरी उससे लंबी बातचीत हुई है. जब मैंने उसे बताया कि मैंने उससे बात नहीं की, तो वो मानने को तैयार ही नहीं हुआ और उसने वो पूरा चैट मुझे भेजा जिसमें किसी ने मेरे नाम से उससे बात की थी. वो चैट इतना अश्‍लील था कि देखकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई. यदि मेरे पति समझदार नहीं होते तो उस चैट को देखकर तो हमारा रिश्ता टूट ही जाता. मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि सोशल मीडिया पर मेरे साथ ऐसा कुछ हो सकता है. इस वाक़ये के बाद मैं बहुत परेशान और डिप्रेस्ड हो गई. अब मैंने अपना न स़िर्फ फेसबुक अकाउंट डिलीट कर दिया है, बल्कि हर तरह के सोशल मीडिया से दूरी बना ली है. हालांकि ये आसान नहीं है, आज सोशल मीडिया साइट्स जैसे हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुकी हैं, उनसे दूर रहने पर लगता है जैसे मैं दुनिया से कट गई हूं, मगर इस हादसे ने मुझे इस क़दर डरा दिया है कि शायद अब मैं दोबारा सोशल साइट्स से न जुड़ पाऊं.”
सोशल मीडिया पर साइबर क्राइम की शिकार होने वाली मोनिका कोई पहली शख़्स नहीं हैं, कई लोग इसकी चपेट में आ चुके हैं. इसकी वजह से कुछ को अपने रिश्ते, तो कुछ को ज़िंदगी से भी हाथ धोना पड़ा है. 2007 में अदनान नाम के एक 17 साल के लड़के का उसके ऑर्कुट अकाउंट वाले दोस्तों ने अपहरण करके उसे मौत के घाट उतार दिया था. दरअसल, अदनान (मुंबई के एक बिज़नेसमैन का बेटा) ने ऑर्कुट पर कुछ ग़लत लोगों से दोस्ती कर ली थी. सोशल साइट्स के ज़रिए होने वाले अपराधों की तादाद दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है. कभी किसी महिला की फोटे से छेड़खानी की जाती है, तो कभी उसे अश्‍लील मैसेज भेजकर परेशान किया जाता है. बावजूद इसके हम इन साइट्स का इस्तेमाल करते समय सुरक्षा मानकों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं.

महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले साइबर अपराध

साइबर क्राइम का दायरा बहुत बड़ा है. इसके निशाने पर कभी कोई कंपनी होती है, कभी कोई देश, तो कभी महिलाएं. महिलाओं को टारगेट करने वाले साइबर क्राइम निम्न हैं.

* ईमेल भेजकर हैरास (उत्पीड़ित) करना. इसमें बदमाशी, धोखा और धमकी देना शामिल है. ऐसा अक्सर फर्ज़ी आईडी से किया जाता है.

* साइबर स्टॉकिंग नए तरह का अपराध है. स्टॉकिंग का मतलब होता है छिपकर पीछा करना. साइबर स्टॉकिंग में विक्टिम (पीड़ित) को मैसेज    भेजकर, चैट रूम में प्रवेश करके और ढेर सारे ईमेल भेजकर उसे परेशान किया जाता है.

* अश्‍लील फोटो, मैग्ज़ीन, वेबसाइट आदि बनाकर महिलाओं को मेल करना.

* ईमेल स्पूफिंग- किसी दूसरे व्यक्ति के ईमेल का इस्तेमाल करते हुए ग़लत मकसद से दूसरों को ईमेल भेजना इसके तहत आता है. इस तरह के ईमेल  के ज़रिए अक्सर पुरुष अपनी अश्‍लील फोटो महिलाओं को भेजते हैं, उनकी सुंदरता की तारीफ़ करते हैं, उन्हें डेट पर चलने के लिए कहते हैं, यहां तक  कि उनसे सर्विस चार्ज भी पूछते हैं.

* इनके अलावा एमएमएस और चैट के माध्यम से अश्‍लील संदेश भेजे जाते हैं, जिसमें कई बार पीड़ित महिला का चेहरा किसी अश्‍लील ड्रेस वाली  महिला की फोटो पर होता है, तो कभी न्यूड फोटो पर उनका चेहरा रहता है.

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साइबर क्राइम का निशाना बनते बच्चे

हाल ही में मुंबई में सोशल साइट के ज़रिए ठगी का एक मामला प्रकाश में आया, जिसमें 14 साल की एक लड़की से 10 लाख रुपए ठगे गए. इस केस में 18 साल के एक लड़के ने एफबी (फेसबुक) पर फर्ज़ी अकाउंट बनाकर लड़की से दोस्ती की और उसे अपने जाल में फंसा लिया. उसके ख़ूबसूरत चेहरे और चिकनी-चुपड़ी बातों में आकर लड़की ने उसे घर वालों से चुराकर 10 लाख रुपए दे दिए. अपनी तरह का ये कोई पहला मामला नहीं है. अक्सर एफबी पर धोखाधड़ी के मामले सामने आते रहते हैं.
दिल्ली की 15 वर्षीया छात्रा पूजा को उसके दोस्त आदित्य ने जब फोन करके पूछा कि वो उसे भद्दे मैसेज और लिंक क्यों भेज रही है, तो पूजा को कुछ समझ नहीं आया, क्योंकि वो काफ़ी समय से अपना एफबी यूज़ नहीं कर रही थी. फिर उसने फेसबुक लॉगिन करके अपना नाम सर्च किया तो उस नाम से 2-3 प्रोफाइल बने थे, जिसमें बक़ायदा उसकी फोटो भी लगी थी. साफ़ था, किसी ने उसकी आइडेंटटी चुराकर उसका ग़लत इस्तेमाल किया था.
दरअसल, आजकल टीनएजर्स धड़ल्ले से सोशल साइट्स का इस्तेमाल करके अपनी फोटो से लेकर निजी जानकारी और राय दोस्तों से शेयर करते हैं, लेकिन ये सब करते समय वो सिक्योरिटी सिस्टम को भूल जाते हैं, जिससे कोई भी हैकर आसानी से उनकी डिटेल्स चुराकर उसका ग़लत इस्तेमाल करने लगता है. इन दिनों चाइल्ड पोर्नोग्राफी से जुड़ी चीज़ें भी नेट पर बहुत उपलब्ध हैं. चाइल्ड पोर्नोग्राफी के तहत बच्चों को बहला-फुसलाकर ऑनलाइन संबंधों के लिए तैयार करना, फिर उनके साथ संबंध बनाना या बच्चों से जुड़ी यौन गतिविधियों को रिकॉर्ड करना, एमएमएस बनाना और दूसरों को भेजना आदि इसके तहत आता है. विशेषज्ञों के मुताबिक, सोशल साइट्स के ख़तरों से बच्चों को बचाने के लिए पैरेंट्स को चाहिए कि उन्हें सही उम्र से पहले स्मार्टफोन, इंटरनेट आदि से दूर रखें. इसके अलावा पैरेंट्स और बच्चे के बीच बॉन्डिंग बेहद ज़रूरी है ताकि वो अपनी हर अच्छी-बुरी बात आपसे शेयर करें. बच्चों के साथ अपराध बढ़ने का एक कारण ये भी है कि वो साइट्स के एथिक्स को फॉलो नहीं करते, जैसे एफबी पर अकाउंट ओपन करने के लिए एज लिमिट है जिसे कोई फॉलो नहीं कर रहा. बच्चों की ज़िंदगी में जिस तेज़ी से इंटरनेट की पैठ बढ़ती जा रही है, उसे देखते हुए पैरेंट्स को सतर्क रहने की ज़रूरत है.

क्या है क़ानून?

भारत में साल 2000 में सूचना तकनीक अधिनियम (आईटी एक्ट) पारित हुआ, जिसमें बाद में 2008 में कुछ संशोधन किए गए.

* आईटी एक्ट की धारा 66 ए के तहत कंप्यूटर और अन्य संचार माध्यमों के ज़रिए ऐसे संदेश भेजने की मनाही है जिससे किसी को परेशानी हो, उसका अपमान हो, उसे ख़तरा हो या उस व्यक्ति को मानसिक चोट पहुंचे, आपराधिक उकसावा मिले या दुर्भावना या शत्रुता की भावना से प्रेरित हो.

* इसका उल्लंघन करने पर 3 साल तक की सज़ा या जुर्माना हो सकता है.

* इस अपराध में आसानी से जमानत मिल जाती है.

* आईटी एक्ट 2008 (संशोधित) की धारा 67 बी के तहत चाइल्ड पोर्नोग्राफी के अपराध के लिए 5 साल की जेल या 10 लाख रुपए जुर्माने का प्रावधान  है.

एहतियाती क़दम

आज के ज़माने में ख़ुद को और बच्चों को साइबर वर्ल्ड से पूरी तरह दूर रखना नामुमक़िन है, लेकिन कुछ बातों का ध्यान रखकर आप साइबर अपराधियों का निशाना बनने से बच सकते हैं.

* सोशल साइट्स का इस्तेमाल करते समय बहुत ज़रूरी है कि आप उसके सिक्योरिटी सिस्टम को एक्टिवेट करें, किसी भी अनजान शख़्स की फ्रेंड  रिक्वेस्ट को एक्सेप्ट न करें.

* किसी के बेहुदा मैसेज का जवाब न दें. अपनी फोटो व पर्सनल डिटेल को रिस्ट्रिक्ट कर दें ताकि आपके गिने-चुने दोस्तों को छोड़कर कोई अन्य व्यक्ति  उस तक न पहुंच सके.

* ऑनलाइन निजी जानकारी (फोन नंबर, बैंक डिटेल आदि) किसी से शेयर न करें

* उत्तेजक स्क्रीन नाम या ईमेल एड्रेस का इस्तेमाल न करें.

* किसी अनजान शख़्स से ऑनलाइन फ्लर्ट या बहसबाज़ी न करें.

* अपना पासवर्ड किसी से शेयर न करें.

* एक अच्छे एंटी वायरस प्रोग्राम का इस्तेमाल करें.

* अपनी पूरी बातचीत को कंप्यूटर पर सेव रखें.

* ऑनलाइन लॉटरी जीतने वाले ईमेल का जवाब न दें.

* कोई अनजान शख़्स इंटरव्यू, नौकरी या कोई गिफ्ट देने के बहाने यदि आपकी बैंक डिटेल्स मांगता है, तो ऐसे ईमेल का भी जवाब न दें.

* समय-समय पर पासवर्ड बदलते रहें.

* सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर दोस्तों की संख्या सीमित रखें.

* सोशल साइट्स पर पर्सनल फोटो अपलोड करने से बचें.

* यदि आपके कंप्यूटर में वेबकैम लगा है तो ध्यान रखें कि इस्तेमाल न होने पर उसे अनप्लग कर दें.

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अपराध साबित करना मुश्किल

साइबर क्राइम सेल के पूर्व प्रभारी संकल्प राय मानते हैं कि साइबर अपराधियों के लिए क़ानून तो है, मगर उनके अपराध को साबित करना थोड़ा मुश्किल काम होता है. सोशल साइट्स पर वो आपके नाम से ही कई अकाउंट खोल लेते हैं और बक़ायदा आपकी फोटो भी अपलोड कर देते हैं. सोशल साइट्स पर आपको प्रधानमंत्री से लेकर बॉलीवुड स्टार्स तक के कई फर्ज़ी अकाउंट मिल जाएंगे.

साइकोलॉजिस्ट की राय

बच्चों और महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले साइबर अपराध, जैसे- साइबर बुलिंग, हैरासमेंट, ईमेल स्पूफिंग, चैट आदि के ज़रिए उत्पीड़न का शिकार होने पर वो अपमानित महसूस करते हैं, उनके मन में फोबिया बैठ जाता है जिससे वो इंटरनेट के इस्तेमाल से डरने लगते हैं. ख़ासकर बच्चों के मामले में बात डिप्रेशन और सुसाइड तक भी पहुंच जाती है. सोशल मीडिया बुरा नहीं है, लेकिन इसका इस्तेमाल सावधानी से करना ज़रूरी है. जिस तरह गैस ऑन करने के बाद उसे बंद करना ज़रूरी होता है, वैसे ही कंप्यूटर/लैपटॉप और स्मार्ट फोन इस्तेमाल करने के बाद लॉग आउट ज़रूर करें. मैंने अक्सर देखा है कि लोग फोन पर लॉग आउट नहीं करते, जो बहुत ग़लत है.

– मोना बक्षी, साइकोलॉजिस्ट

एक्सपर्ट स्पीक

साइबर बुलिंग का शिकार होने पर सबसे पहले सोशल नेटवर्किंग कंपनी को सूचित करें. साथ ही केस दर्ज करवाने के लिए आपके पास उस एसएमएस का इलेक्ट्रॉनिक सबूत होना चाहिए. यदि आपके पास ये सबूत नहीं भी है, तो संबंधित सोशल साइट्स वो मुहैया करवा सकती है. ऐसे मामलों में सोशल नेटवर्किंग कंपनियों की ज़िम्मेदारी होती है कि वो अदालत या पुलिस के सबूत मांगने पर उनकी मदद करें और ऐसा न करने पर अदालत कंपनी के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज कर सकती है.

– संकल्प राय, पूर्व प्रभारी, साइबर क्राइम सेल (रायपुर)

सेलिब्रिटी भी नहीं महफूज़

आए दिन सेलिब्रिटीज़ की फोटो से छेड़छाड़ का मामला सामने आता रहता है. इतना ही नहीं, इनके नाम से कई फर्ज़ी आईडी भी बनी रहती हैं. हाल ही में एक्ट्रेस एवलिन शर्मा ने एक इंटरटेनमेंट साइट पर उनसे जुड़ी ग़लत जानकारी वेबसाइट पर पब्लिश करने के लिए केस दर्ज करवाया है. कुछ दिनों पहले अमिताभ बच्चन के दामाद निखिल नंदा का ईमेल और फेसबुक अकाउंट भी हैक हो गया था. इससे पहले करण जौहर, महेश भट्ट, अरबाज़ ख़ान, सयाली भगत, सोनम कपूर जैसे सितारों का ट्विटर अकाउंट भी हैक हो चुका है.

सोशल साइट एडिक्शन

कुछ लोगों को जैसे सिगरेट-शराब का नशा होता है, वैसे ही सोशल साइट भी एक नशा है. लोगों की ज़िंदगी में इन सोशल साइट्स का दख़ल इस कदर बढ़ चुका है कि इनसे दूर रहने पर उन्हें लगता है जैसे उन्होंने कुछ मिस कर दिया है. कुछ लोग जब तक अपना एफबी अकाउंट चेक नहीं कर लेते, उनकी फोटो को कितने लाइक मिले हैं, उनके दोस्तों ने क्या अपडेट किए हैं आदि देख नहीं लेते, उन्हें चैन नहीं पड़ता. अपनी फोटो पर मिले कमेंट ब्यूटीफुल, अमेज़िंग, सेक्सी आदि से उत्साहित होकर कुछ महिलाएं हर दिन अपनी फोटो अपडेट करती रहती हैं. उन्हें इस बात का इल्म तक नहीं होता कि कोई उनकी फोटो से छेड़खानी करके उनकी ज़िंदगी में तूफ़ान खड़ा कर सकता है. सोशल मीडिया से जुड़े अपराधों का एक प्रमुख कारण है लोगों द्वारा अपनी निजी ज़िंदगी के हर पल सोशल साइट्स पर अपडेट करना, जिसकी बदौलत अपराधी आसानी से ऐसे लोगों को अपना निशाना बना लेते हैं.

क्या है साइबर क्राइम?

इंटरनेट के माध्यम से होने वाले अपराध साइबर क्राइम की कैटेगरी में आते हैं, जैसे- इंटरनेट से क्रेडिट कार्ड की चोरी, ब्लैक मेलिंग, कॉपीराइट और ट्रेडमार्क फ्रॉड, पोर्नोग्राफी, बैंक डिटेल या अन्य अकाउंट हैक करना, किसी सॉफ्टवेयर के ज़रिए वायरस भेजना, किसी को आपत्तिजनक/धमकी भरे मैसेज भेजना आदि. साइबर क्राइम का दायरा बहुत बड़ा है. ऐसे अपराध से निपटने के लिए साइबर क्राइम सेल बनाया गया है.

– कंचन सिंह