Tag Archives: learn

ज्ञानी होने का दावा (Gyani Hone Ka Dawa)

Gyani

Gyani

सीखने की कोई सीमा नहीं होती, तो भला कोई इंसान सब कुछ आने का दावा कैसे कर सकता है? दरअसल, ज्ञानी होने का दावा करना ही इस बात का प्रमाण है कि उस शख़्स के अंदर अंह का विकास हो चुका है और उसने अपनी सफलता का मार्ग ख़ुद अवरुद्ध कर दिया है. जिस दिन आपके मन में ये विचार आ गया कि अरे मुझे तो सब आता है, समझिए उस दिन से आपके आगे बढ़ने का रास्ता बंद हो गया.

मूर्ख व्यक्ति ख़ुद को बुद्धिमान मानता है, लेकिन बुद्धिमान व्यक्ति स्वयं को मूर्ख मानता है.
विलियम शेक्सपियर का ये कथन बिल्कुल सत्य है. आपने अपने आसपास भी ऐसे बहुत से लोगों को देखा होगा जो हर विषय पर ये कहने से नहीं चूकते कि अरे ये काम तो कितना आसान है, आपको ये नहीं पता मुझे तो पता है… मगर असलियत में ऐसे लोगों को आता कुछ नहीं है, दूसरों के बीच ख़ुद को बड़ा दिखाने के चक्कर में वो हर बात में हां-हां करते रहते हैं.मगर जो वाक़ई बुद्धिमान होते हैं वो चुपचाप अपना काम करते हैं. वो दस लोगों के बीच अपने ज्ञान का डंका नहीं पीटते. यहां थोथा चना बाजे घना वाली कहावत भी चरितार्थ होती है. यदि आप सच में ज्ञानी है, तो आपका बार-बार ये बताने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, लोग ख़ुद-ब-ख़ुद समझ जाते हैं.

अहंकार है जड़
इंसान के इस रवैये का कारण उसका अहंकार है. दरअसल, अहंकार ही उसे कुछ नहीं आने के बावजूद दूसरों के सामने अपनी कमियां स्वीकार करने से रोकता है. लोग उसे छोटा/मूर्ख न समझने लगे इस डर से वो सच्चाई स्वीकार नहीं कर पाता, मगर ऐसी झूठी ज़िंदगी जीकर वो अपना ही नुक़सान करते हैं और ये बात उन्हें समझ नहीं आती. उस व़क्त तो उन्हें बड़ा मज़ा आता है जब लोग उनके झूठ को सच मानकर उन्हें ज्ञानी समझ लेते हैं, मगर ख़ुद को ज्ञाता बताकर वो नई चीज़ें व नई बातें नहीं सीख पातें. नतीजतन ज़िंदगी की दौड़ में पिछड़ जाते हैं. ऐसे लोगों को अपने झूठ के बल पर नौकरी भले ही मिल जाए, मगर तऱक्क़ी नहीं मिल सकती और देर सबेर उनकी असलियत जग ज़ाहिर हो ही जाती है. आप बैंकिंग फील्ड से हैं, मगर दोस्तों के बीच यदि इंजीनियरिंग, एज्युकेशन, मेडिकल, पॉलिटिकल और इसी तरह की किसी अन्य फील्ड से जुड़ी चर्चा होती है, तो आप हर क्षेत्र के बारे में जानकारी होने का दावा करते हैं, मगर जब उस फील्ड का कोई विशेषज्ञ आपसे उससे संंबंधित कुछ पूछ ले, तो आप बगले झांकने लगते हैं. ऐसे लोग ज़िंदगी में नया सीखने की कोशिश नहीं करतें.

यह भी पढ़ें: विचारों से आती है ख़ूबसूरती


दूसरों को छोटा समझने की भूल

किसी सीनियर को ये बात बिल्कुल बर्दाशत नहीं होती कि उसका जूनियर कलिग उसे कोई सलाह दे या कुछ सिखाने की कोशिश करें. क्योंकि इससे उनके अहं को ठेस पहुंचती है, लेकिन कई बार नए/युवा लोगों के पास नए विचार/आइडिया होते हैं, जो कंपनी/बिज़नेस को आगे बढ़ाने में मदद कर सकते हैं. अतः दूसरों की बात सुन लें. किसी ने सच ही कहा है कि बुद्धिमान व्यक्ति ज़िंदगी भर सीखता रहता है और जो अपने दिमाग़ के दरवाज़े को बंद कर देते हैं, कुछ बताने वाले को भी अपने से छोटा समझने लगते हैं वो बदलते व़क्त के साथ ख़ुद को अपडेट नहीं रख पाते और आख़िरकार एक दिन उनका ज्ञान भी आउटडेटेड हो जाता है, क्योंकि ज्ञान उस नदी की तरह है जो जब तक बहती रहती है उसका पानी स्वच्छ निर्मल रहता है, मगर जब एक जगह रुक जाती है तो उसकी निर्मलता ख़त्म हो जाती है, ठहरे हुए पानी से दुर्गंध आने लगती है. ठीक उसी तरह ज्ञान भी है उसे दिमाग के कोठी में कैद रखने से उसका विकास नहीं हो पाता. ज़िंदगी में हर इंसान से आप कुछ न कुछ सीख सकते हैं, इसलिए ख़ुद को खुली किताब की तरह रखिए.

आत्मविश्लेषण है ज़रूरी
दूसरों को दिखाने या उनकी नज़रों में महान बनने की कोशिश करने की बजाय अपने आपको परखें. आत्मविश्‍लेषण करें कि आप कितने पानी में हैं? वाक़ई में आपको कितना और क्या आता है? ज़िंदगी में सफल होना चाहते हैं, तो झूठा अभिमान त्याग कर अपने ज्ञान और गुण का विश्‍लेषण करें, कमियों को स्वीकार करके उसे सुधारने का प्रयत्न करें. साथ ही हमेशा अपने फील्ड और अन्य क्षेत्र से जुड़ा कुछ नया सीखने की कोशिश करते रहें.

कंचन सिंह

अधिक जीने की कला के लिए यहां क्लिक करें: JEENE KI KALA

 

करें पढ़ाई के साथ कमाई (Earn while learn)

अपने सपनों कोे साकार करने और अपने दम पर कुछ कर दिखाने की ज़िद्द और जज़्बा ही आज की युवा पीढ़ी को पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है. ज़मानेे के साथ क़दम से क़दम मिलाकर चलने के लिए आज की युवा पीढ़ी पढ़ाई करते हुए आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो रही है. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें किस क्षेत्र में आगे अपना करियर बनाना है, इसकी शुरुआत वे पढ़ाई के दौरान ही कर देते हैं. पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी करने के क्या नफ़ा-नुक़सान हैं? बता रहे हैं करियर काउंसलर फ़रज़ाद दमानिया.

1
सही प्लानिंग
पढ़ाई के साथ नौकरी करने के लिए सबसे ज़रूरी है सही प्लानिंग, तभी आप दोनों काम अच्छी तरह कर सकते हैं. साथ ही किसी एक को दूसरे पर हावी न होने दें. पढ़ाई के बाद बचे हुए समय में ही नौकरी के बारे में सोचें. अच्छा होगा कि पढ़ाई के साथ पार्ट टाइम जॉब करें, फुल टाइम जॉब के बारे में न सोचें.

टाइम मैनेजमेंट
पढ़ाई के साथ जॉब करने के लिए सबसे ज़रूरी है टाइम मैनेजमेंट. आप अपने टाइम को जितनी कुशलता से बांटेंगे, आपको दोनों कामों में उतनी ही सफलता मिलेगी. अतः पढ़ाई के लिए पर्याप्त समय निकालकर ही पार्ट टाइम जॉब के लिए अप्लाई करें. अगर आप सुबह कॉलेज जाते हैं, तो दोपहर के बाद का समय नौकरी को दें.

फ्लैक्सिबल जॉब
पढ़ाई के दौरान नौकरी करते समय इस बात का ख़ास ध्यान रखें कि नौकरी के चलते आप पढ़ाई को बोझ न समझने लगें. पढ़ाई आपकी प्राथमिकता है, यह बात आपको हमेशा ध्यान में रखनी होगी. बेहतर होगा कि आप कोई ऐसा फ्लैक्सिबल जॉब चुनें, जिसमें पढ़ाई के हिसाब से देर से जाना या कई बार न जाना संभव हो और इससे आपकी नौकरी पर कोई आंच न आए. इस तरह का फ्लैक्सिबल जॉब आपको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगा.

अनुशासन
पढ़ाई के साथ आर्थिक रूप से सक्षम होने के लिए आपको अपनी दिनचर्या से जुड़ी कुछ चीज़ों का त्याग करना होगा. उदाहरण के तौर पर, आप यदि प्रतिदिन 2 घंटे टीवी देखते हैं या बाहर दोस्तों के साथ घूमने जाते हैं, तो आपको इन पर रोक लगानी होगी. पार्ट टाइम जॉब करने पर भी आपको अपना डेली रूटीन अनुशासित रखना होगा.

पढ़ाई के साथ जॉब के फ़ायदे
करियर काउंसलर फ़रज़ाद दमानिया के अनुसार, ङ्गङ्घपढ़ाई के साथ नौकरी करना काफ़ी हद तक फ़ायदेमंद होता है. आर्थिक स्थिति ठीक न होने पर पढ़ाई के लिए ख़र्च होने वाले पैसे के लिए हमें किसी दूसरे के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ता. इतना ही ही पढ़ाई के साथ नौकरी करने से पढ़ाई पर कोई बुरा असर पड़ता है, बल्कि इससे भविष्य में स्टूडेंट्स को फ़ायदा ही मिलता है. नहीं, पढ़ाई के दौरान नौकरी करने पर बच्चे बहुत जल्दी अपनी ज़िम्मेदारियां उठाना सीख जाते हैं.फफ पढ़ाई के साथ काम करने के निम्न फ़ायदे हैंः

आर्थिक मज़बूती
पढ़ाई के साथ जॉब करना एक अच्छा विकल्प है. इससे स्टूडेंट्स को आर्थिक मज़बूती मिलती है. पैरेंट्स से जेब ख़र्च लेने की बजाय बच्चे आत्मनिर्भर होकर अपना जेब ख़र्च उठा सकते हैं. बड़े शहरों में पार्ट टाइम जॉब के कई विकल्प मौजूद हैं. इससे स्टूडेंट्स अपना ख़र्च उठाने के साथ ही परिवार की मदद भी कर पाते हैं.

आत्मविश्वास
कम उम्र में पढ़ाई के साथ नौकरी करने से स्टूडेंट्स का आत्म-विश्‍वास बढ़ता है. जिस उम्र में उनके दोस्त/सहेलियां दूसरों से बात तक करने से झिझकते हैं, उस उम्र में नौकरी करके वे कई लोगों के संपर्क में आते हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है. आगे की पढ़ाई को लेकर भी वे उतने ही उत्साहित होते हैं.

अनुभव
पढ़ाई के दौरान नौकरी करने से छात्र ऑफिस में काम करने के तौर-तरी़के सीख जाते हैं. पढ़ाई और नौकरी करते हुए वे ज़्यादा काम करने के आदी हो जाते हैं और ज़्यादा से ज़्यादा काम करना चाहते हैं. पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी ढूंढ़ते वक़्त उन्हें कोई परेशानी नहीं होती.

दमदार सीवी
पढ़ाई के साथ पार्ट टाइम नौकरी करके वर्क एक्सपीरिएंस बढ़ता है. पढ़ाई पूरी करते-करते आपके सीवी में दो से तीन साल तक का वर्क एक्सपीरिएंस जुड़ जाता है, जिससे आगे नौकरी के लिए इंटरव्यू देते समय सामने वाले पर आप अच्छी छाप छोड़ने में सफल होते हैं.

पढ़ाई के साथ जॉब के नुक़सान
पढ़ाई के साथ जॉब करते समय यदि दोनों में सही तालमेल न हो, तो फ़ायदे के साथ-साथ कुछ नुक़सान भी हो सकते हैं. पढ़ाई के दौरान जॉब करने से निम्न नुक़सान हो सकते हैंः

पढ़ाई पर बुरा असर
पढ़ाई और जॉब के बीच सही संतुलन न बिठाने पर कुछ समय बाद पढ़ाई में रुचि कम होने लगती है. थोड़े-से पैसों का लालच पढ़ाई पर हावी होने लगता है, जिसके चलते कई बार बच्चे अपनी पढ़ाई बीच में ही रोक देते हैं. ऐसे में कई बार अच्छी पढ़ाई करने वाले छात्र भी भटक जाते हैं.

ग़लत संगत
कॉलेज कैंपस के बाहर जब हम नौकरी करने के लिए जाते हैं, तो उस दौरान हम कई लोगों के संपर्क में आते हैं. उनमें से कुछ अच्छे तो कुछ बुरे भी होते हैं. ऐसे में कई बार छात्र बुरे लोगों के संपर्क में आकर ग़लत राह पर चल पड़ते हैं, जिससे न तो वे नौकरी कर पाते हैं और न ही पढ़ाई पर ध्यान दे पाते हैं.

ओवरकॉन्फिडेंस
कॉलेज के दौरान पार्ट टाइम जॉब करने पर कई छात्र ख़ुद को अपनी उम्र से ज़्यादा बड़े और समझदार समझने लगते हैं. कम उम्र में पैसा कमाने की होड़ में वे पढ़ाई को नज़रअंदाज़ करने लगते हैं, जिसके चलते वे आगे नहीं बढ़ पाते और ज़िंदगीभर उसी दायरे में सिमट कर रह जाते हैं.

पढ़ाई के दौरान कौन-सी जॉब है बेहतर?
कॉलेज की पढ़ाई के दौरान युवाओं के मन में अक्सर ये सवाल उठता है कि किस क्षेत्र में क़िस्मत आज़माएं कि आगे चलकर परेशानी न हो. आइए, हम आपको बताते हैं कि पढ़ाई के दौरान कौन-सी जॉब आपके लिए बेहतर साबित हो सकती है?

* आप अपनी क्वॉलिफिकेशन और इंटरेस्ट के हिसाब से जॉब कर सकते हैं. उदाहरण के लिए, आप यदि मैनेजमेंट और कॉमर्स की पढ़ाई कर रहे हैं, तो मार्केटिंग, सेल्स, फायनेंस और अकाउंट में काम कर सकते हैं.

* अगर तकनीकी क्षेत्र में पढ़ाई कर रहे हैं, तो टेक्निकल असिस्टेंट, कंप्यूटर प्रोग्रामर या ग्राफिक डिज़ाइनिंग में क़िस्मत आज़मा सकते हैं.

* इसी तरह आगे चलकर आप यदि टीचर बनना चाहते हैं, तो क्लासेस या फिर घर पर ट्यूशन लेकर पार्ट टाइम जॉब करके अपने करियर की शुरुआत कर सकते हैं.

क्या है युवा पीढ़ी की राय?
पढ़ाई के साथ काम करने को लेकर नई पीढ़ी में ख़ासा उत्साह देखने को मिलता है. कुछ युवा मजबूरी में, तो कुछ शौक़िया तौर पर पढ़ाई के साथ काम करते हैं.
मुंबई की कृतिका सिंह कॉलेज की पढ़ाई के साथ ही एक कॉल सेंटर में काम कर रही हैं. कृतिका कहती हैं, ”पढ़ाई के साथ पार्ट टाइम जॉब करने में मुझे कोई परेशानी नहीं होती. हां, एग्ज़ाम के दौरान मैं एक महीने का ब्रेक ले लेती हूं.”

कृतिका की ही तरह चेन्नई के सौरभ कृष्णमूर्ति कहते हैं, ”पढ़ाई और नौकरी दोनों साथ-साथ करना आसान नहीं है, लेकिन मुझे काम करना अच्छा लगता है. मैं आगे चलकर बैंक से जुड़ा काम करना चाहता हूं इसलिए उसकी प्रैक्टिस मैंने अभी से शुरू कर दी है. इसके लिए मैं पार्ट टाइम जॉब करता हूं.”

दिल्ली की प्रज्ञा जायसवाल बीकॉम फर्स्ट ईयर की छात्रा हैं और पढ़ाई के साथ शॉपिंग मॉल में कैशियर के तौर पर पार्ट टाइम जॉब भी करती हैं. प्रज्ञा के अनुसार, ”जॉब और पढ़ाई दोनों को एक साथ मैनेज करना आसान नहीं है, लेकिन पढ़ाई के साथ काम करने से एक ओर जहां हम अपनी फैमिली को आर्थिक रूप से मज़बूती देते हैं, वहीं दूसरी ओर हमारा आत्मविश्वास भी बढ़ता है. इससे आगे चलकर हमें फुल टाइम जॉब करने में मदद मिलती है.”

स्मार्ट टिप्स
पढ़ाई के दौरान पार्ट टाइम जॉब या एंटर्नशिप करें.

* पैसा कमाने के नज़रिए से नहीं, बल्कि सीखने के लिए जॉब करें.

* पढ़ाई और नौकरी दोनों में सही तालमेल बिठाएं.

* पैसे की लालच में पढ़ाई को दरकिनार न करें.

* पढ़ाई और जॉब का बहुत ज़्यादा दबाव न झेलें.

* काम के साथ सेहत पर भी ध्यान दें.

* ओवरकॉन्फिडेंस से बचें.

* गर्मी की छुट्टियों में पार्ट टाइम जॉब करें.

* अनुशासित होकर अपने लक्ष्य को ध्यान में रखकर ही पढ़ाई और जॉब करें.

* समय का सदुपयोग करें.

– श्वेता सिंह

पहचानें रिश्तों की लक्ष्मण रेखा (Earn to respect relationship and commitment)

relationship management

इंसानी ज़िंदगी में रिश्तों (Earn to respect relationship and commitment) की अहमियत से हम सभी वाक़िफ़ हैं, लेकिन शायद हम इस बात को कम ही समझते हैं कि हर रिश्ते की एक मर्यादा, एक लक्ष्मण रेखा होती है. इस लक्ष्मण रेखा को पार करते ही रिश्तों में दरारें आने का ख़तरा बनने लगता है, लेकिन दूसरी तरफ़ यदि इस रेखा को हम दीवार बनाने की भूल करते हैं, तो भी रिश्तों का बचना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि कैसे पहचानें अपने रिश्तों की लक्ष्मण रेखा को?

Earn to respect relationship and commitment

सम्मान: किसी भी रिश्ते के गहरे होने की पहली शर्त होती है सम्मान. स़िर्फ पति-पत्नी ही नहीं, तमाम रिश्तों से लेकर यारी-दोस्ती तक में एक-दूसरे के प्रति सम्मान बेहद अहम् है. हंसी-मज़ाक के दौरान भी यदि हम हद से आगे बढ़ जाते हैं, तो सामनेवाले को ठेस पहुंचती है. ऐसे में यह बात समझना ज़रूरी है कि हर चीज़ की हद होती है. अपने दायरों को लांघते ही जैसे ही हम हदों को पार कर जाते हैं, तो वहां सम्मान ख़त्म हो जाता है और रिश्तों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.

अपनी सीमा ख़ुद निर्धारित करें: हम स्वयं इस बात को बेहतर समझते और जानते हैं कि किस रिश्ते की सीमा क्या है और कहां आकर हमें रुकना है. जिस वक़्त हम ये जानकर भी अपनी सीमा रेखा लांघते हैं, तब समस्या शुरू हो जाती है. अगर पति-पत्नी भी एक-दूसरे को हर बात पर टोकें और मज़ाक उड़ाएं, तो एक स्टेज पर आकर उन्हें एक-दूसरे से खीझ होने लगेगी और वो शिकायत करने लगेंगे कि अब उनके बीच वो सम्मान नहीं रहा.

मज़ाक करने और मज़ाक उड़ाने के बीच के अंतर को समझें: बहुत-से लोगों की आदत होती है कि वो बात-बात पर ताने मारते हैं और फिर कहते हैं कि हम मज़ाक कर रहे थे, पर जब यही मज़ाक कोई दूसरा उनके साथ करे, तो उन्हें बुरा लग जाता है. मज़ाक करने का अर्थ होता है कि दूसरों के चेहरे पर हंसी-मुस्कुराहट आए, न कि उन्हें आहत किया जाए. अक्सर यार-दोस्तों की महफ़िल में लोग एक-दूसरे से शरारत करते हैं, पर इस शरारत में यह ध्यान ज़रूर रखें कि कहीं किसी का दिल न दुखा दें आप.

मर्यादा बनाए रखने का यह मतलब नहीं कि कम्यूनिकेट ही न करें: अगर हमें बार-बार अपनी टोकने की आदत के बारे में कोई एहसास करवाए, तो हम अक्सर उस आदत को बदलने की बजाय यह तर्क देते हैं कि अगर तुम्हें मेरी बातें पसंद नहीं, तो बेहतर है हम बात ही न करें. यह अप्रोच बेहद ग़लत व नकारात्मक है. इससे रिश्तों में दीवारें पैदा होती हैं. अच्छा होगा कि आप बातचीत बंद न करें, बल्कि आपसी बातचीत को हेल्दी और पॉज़ीटिव बनाएं.

शब्दों का चयन सही करें: अपनों से बात करते वक़्त हम अक्सर अपने शब्दों के चयन पर ध्यान नहीं देते. हम यह सोचते हैं कि अपनों के साथ क्या औपचारिकता करना और इसी सोच के चलते हम अक्सर लक्ष्मण रेखा भूल जाते हैं. चाहे अपने हों या अन्य लोग, तमीज़ से, प्यार से बात करेंगे, तो सभी को अच्छा ही लगेगा. अपनों के साथ तो और भी सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि हमारे द्वारा कहा गया कोई भी कटु शब्द उन्हें ज़्यादा हर्ट कर सकता है, जिससे मन-मुटाव हो सकता है.

अपने निर्णय सब पर न थोपें: अगर आपने कोई निर्णय लिया है, तो सबकी राय और सहमति भी ले लें. अपना निर्णय सुना देना या अपनी ही मर्ज़ी सब पर थोपना भी रिश्तों की मर्यादा का उल्लंघन करना ही है. जिस बात से सब लोग सहमत न हों, उस पर दोबारा विचार करें या फिर सबको अपनी निर्णय की वजह बताकर कोशिश करें कि उन्हें आपके निर्णय से कोई आपत्ति न हो.

हर बात, हर चीज़ पर हक़ न जमाएं: बच्चे हैं, तो माता-पिता की हर चीज़ पर हक़ समझते हैं, भाई-बहन भी यही सोचते हैं कि हम एक-दूसरे की सारी चीज़ पर हक़ जमा सकते हैं और पति-पत्नी तो यह मानकर ही चलते हैं कि हमारी कोई चीज़ पर्सनल नहीं हो सकती. ऐसे में पर्सनल स्पेस खो जाती है और एक समय ऐसा आता ही है, जब हमें लगता है कि सामनेवाला अपनी सीमा रेखा लांघ रहा है. हर रिश्ते में स्पेस की ज़रूरत होती ही है और जब वो नहीं मिलती, तो घुटन होने लगती है और रिश्तों में दरार आने का डर बन जाता है.

किसी के निजी जीवन में बेवजह दख़लअंदाज़ी न करें: हम जब एक साथ रहते हैं, तो किसी का भी लेटर हो, ईमेल हो या फोन पर मैसेज हो, तो उसकी ग़ैरहाज़िरी में भी फौरन पढ़ने लगते हैं. यह व्यवहार ग़लत है. शिष्टता के चलते हमें ऐसा नहीं करना चाहिए, बल्कि सामनेवाले के आने का इंतज़ार करना चाहिए. उसके बाद वो ख़ुद-ब-ख़ुद बता ही देगा कि किसका पत्र या मेल है. अगर न भी बताए, तो इसका यह अर्थ नहीं कि आप उसे शक़ की निगाह से देखें. सबका निजी जीवन होता है, कुछ बातें ऐसी होती ही हैं, जो वो शायद इस वक़्त किसी से शेयर नहीं करना चाहता और आगे चलकर सही वक़्त आने पर करे. हर बात आपको जाननी ही है और सामनेवाला आपको बताए ही, यह कोई ज़रूरी नहीं.

अपने मन मुताबिक़ किसी को बदलने या व्यवहार करने को न कहें: आप अगर घर के मुखिया भी हैं, तो भी अपनी इच्छानुसार सबको व्यवहार करने की ज़िद न करें. हां, अगर कोई ग़लती कर रहा है, तो आपकी ज़िम्मेदारी है कि आप उसे सही रास्ता दिखाएं, लेकिन तानाशाही रवैया अपनाकर सब पर एक ही नियम लागू करने का अर्थ है कि आप अपनी उम्र, अपने ओहदे और अपने रिश्ते का नाजायज़ फ़ायदा उठा रहे हैं.

हमेशा आप ही सही होते हैं, यह सोच न बना लें: आप जो सोचते हैं, आप जो चाहते हैं और आप जो उम्मीदें रखते हैं, वो ही सही हैं और यदि कोई आपसे अलग सोच रखे, तो वो इंसान ही ग़लत है, ऐसी बात मन में न पालें. हर शख़्स का अपना अलग व्यक्तित्व होता है, उसे स्वीकार करें, उसका सम्मान करें. जिस तरह आप औरों से उम्मीद रखते हैं, दूसरे भी आपसे ठीक वैसे ही व्यवहार की आशा रखते हैं. आप जिस तरह हर्ट होते हैं, दूसरे भी हो सकते हैं. हर किसी की अपनी सोच व राय हो सकती है, जिसका हमें सम्मान करना ही चाहिए, वरना रिश्ते टूटते देर नहीं लगती.

स्वार्थी न बनें: रिश्तों में लक्ष्मण रेखा तभी पार होती है, जब हम स्वार्थी बन जाते हैं. स़िर्फ हम ही हम हैं, दूसरों को अपना जीवन अपनी तरह से जीने का कोई हक़ नहीं, यह अप्रोच नकारात्मक होती है. सबकी मर्ज़ी का ख़्याल करें और सकारात्मक सोच बनाएं, तभी आप अपने रिश्तों को शिद्दत से निभा सकते हैं.

अपनी ग़लती मानें: जब भी आप ग़लत हों, तो फ़ौरन उसे मान लें. ईगो पालकर रिश्तों को ताक पर न रखें. अपनी ग़लती के लिए किसी और को ज़िम्मेदार न ठहराएं. अक्सर हम अपनी ग़लतियां दूसरों पर थोप देते हैं और उन्हें ही इसका कारण बताकर ख़ुद को बचाने की सोचते हैं. जब सामनेवाला अपनी सफ़ाई देता है, तो हम नाराज़ हो जाते हैं कि तुम हमारा साथ नहीं दे रहे या ग़लती क्या स़िर्फ मेरी थी, जैसी बातें करने लगते हैं. यह ग़लत उम्मीद लगाना अपनी लक्ष्मण रेखा न पहचानने जैसा ही है.

Earn to respect relationship and commitment

रिश्तों में सम्मान का अर्थ क्या है?
हम रिश्तों को सम्मान दे रहे हैं या नहीं, इसे इन कसौटी पर परखें-

  •  अगर हम किसी बात पर असहमत हैं, पर हम अपनी ही बात और राय को महत्व देकर सामनेवाले को सुनना ही न चाहें और उससे भी यह उम्मीद रखें कि वो हमारी ही सुने, तो यह उसके सम्मान को आहत करेगा.
  •  अपने रिश्तेदारों या पार्टनर को सामाजिक समारोहों में या अन्य लोगों के सामने डांटते हैं या उनका मज़ाक उड़ाते हैं.
  •  हर बात पर टोकना या बात-बात पर नाराज़ हो जाना.
  •  सामनेवाले की भावनाओं के प्रति असंवेदनशील होकर उन्हें महत्व न देना.
  •  हर वक़्त स़िर्फ अपनी ज़रूरतों के बारे में ही सोचना.
  •  किसी की भी राय को महत्व न देकर मनमानी करना.
  •  अपनी सुविधानुसार नियम बदलना और दूसरों से भी अपनी सुविधानुसार ही व्यवहार करने की उम्मीद करना.
  •  सबसे मज़ाक करना, लेकिन जब कोई आपसे मज़ाक करे, तो बुरा मान जाना.
  •  हर छोटी-छोटी बात पर सफ़ाई मांगना.
  •  सामनेवाले की स्थिति को समझे बग़ैर या समझने की कोशिश किए बिना ही बात-बात पर नाराज़ हो जाना.
  •  सबसे यह उम्मीद रखना कि वो स़िर्फ आपका ही ख़्याल रखे और आपकी हर बात पर हां में हां मिलाए.
  •  विचार अलग होने पर दूसरों के विचारों को ग़लत व महत्वहीन समझना.

– कमलेश शर्मा