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इन क़ानूनी शब्दों को कितना समझते हैं आप? (Legal Terms Everyone Must Know About Indian Law)

क्या आप भी बाक़ी लोगों की तरह यही समझते हैं कि उम्रकैद 14 सालों के लिए होती है? अगर हां, तो आपको बता दें कि यह आपकी ग़लतफ़हमी है. ठीक इसी तरह ऐसे कई क़ानूनी शब्द हैं, जिनके बारे में लोगों को सही जानकारी नहीं है. यहां हम कुछ ऐसे ही ज़रूरी क़ानूनी शब्दों का सही मतलब बताने और कुछ क़ानूनी ग़लतफ़हमियां दूर करने की कोशिश करेंगे, ताकि क़ानूनी जागरूकता में आप पिछड़ न जाएं.

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उम्रकैद/आजीवन कारावास

–     बहुत-से लोगों को लगता है कि उम्रकैद और आजीवन कारावास दो अलग चीज़ें हैं, जबकि यह स़िर्फ भाषा का फ़र्क़ है, जहां उम्रकैद उर्दू का शब्द है, वहीं आजीवन कारावास हिंदी का शब्द है. दोनों का अर्थ भी एक ही है- बची हुई बाक़ी की पूरी ज़िंदगी जेल में बिताने की सज़ा.

–     ज़्यादातर लोगों को यही लगता है कि उम्रकैद 14 साल की सज़ा होती है, जबकि ऐसा है नहीं. उम्रकैद यानी आजीवन कारावास अपराधी के बचे हुए शेष जीवन के लिए होता है.

–     अब सवाल यह उठता है कि यह 14 साल की गुगली कहां से आई? दरअसल, क़ानून में यह प्रावधान है कि सरकार अगर चाहे, तो उम्रकैद के किसी कैदी की सज़ा को माफ़ करके उसे कम कर सकती है, पर इसके लिए भी शर्त यह है कि सरकार को ऐसा 14 साल की अवधि पूरा होने से पहले करना होगा यानी सज़ा के 14 साल पूरे होने से पहले अगर सरकार चाहे, तो आजीवन कारावास की सज़ा को माफ़ या कम कर सकती है.

–     आपको बता दें कि आईपीसी और सीआरपीसी में ऐसे प्रावधान हैं, जो राज्य सरकार या केंद्र सरकार को यह अधिकार देते हैं कि वो चाहें, तो अच्छे व्यवहार के लिए कैदियों की सज़ा माफ़ या कम कर सकती है.

–     यहां आपको एक और ज़रूरी बात बता दें कि अगर किसी अपराध के लिए मृत्युदंड और आजीवन कारावास दोनों का प्रावधान हो, पर जज ने कैदी को मृत्युदंड न देकर आजीवन कारावास की सज़ा दी हो, तो उस व्यक्ति को 14 साल पूरे होने के बाद ही माफ़ किया जा सकता है.

–     तो अब आप समझ गए किस तरह इस बात को घुमाया गया है. सज़ा माफ़ करने से पहले सरकार अपराधी के व्यवहार और आचरण का पूरा रिकॉर्ड देखती है.

–     यहां पर यह भी ध्यान दीजिएगा कि सरकार पेशेवर अपराधियों, एक से ज़्यादा हत्या के दोषी और महिलाओं के ख़िलाफ़ किए गए अपराध की सज़ा काट रहे अपराधियों को माफ़ी नहीं देती.

24 घंटे यानी दो नहीं, केवल एक दिन

बहुत-से लोगों को यह भ्रम है कि जेल में 12 घंटे को एक दिन और 24 घंटे को दो दिन गिना जाता है, जबकि ऐसा है नहीं. जेल में भी 24 घंटे का मतलब एक दिन और सात दिन का मतलब एक हफ़्ता होता है. जेल में दिन और रात को अलग-अलग जोड़ा नहीं जाता.

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ज़मानत और पैरोल

ज़मानत उस व्यक्ति को मिलती है, जिसका केस कोर्ट में चल रहा हो और जिसे सज़ा न सुनाई गई हो, जबकि पैरोल उस व्यक्ति को मिलती है, जिसे सज़ा सुनाई जा चुकी हो और वो जेल में अपनी सज़ा भुगत रहा हो.

–     पैरोल दो तरह की होती है- एक कस्टडी पैरोल और दूसरी रेग्युलर पैरोल.

–     आपने अक्षय कुमार की फिल्म द स्टेट वर्सेस जॉली एलएलबी 2 में देखा होगा कि किस तरह एक कैदी अपनी शादी के लिए पैरोल पर बाहर आता है और इस दौरान पुलिस उसके साथ रहती है, ताकि वो फरार न हो जाए. आपको बता दें कि अगर किसी कैदी के किसी क़रीबी रिश्तेदार की मौत हो जाए, किसी क़रीबी की शादी हो, पत्नी की डिलीवरी हो, तो उसे अधिकतम छह घंटे की कस्टडी पैरोल मिल सकती है.

–     बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त जब जेल में थे, तब उनकी पैरोल की ख़बरें भी मीडिया की सुर्ख़ियों में रहती थीं. आपको बता दें कि संजय दत्त रेग्युलर पैरोल के ज़रिए जेल से बाहर आते थे, जो साल में एक महीने के लिए दी जा सकती है.

–     इसके प्रावधान कमोबेश कस्टडी पैरोलवाले ही हैं, जैसे- किसी रिश्तेदार की शादी या मृत्यु, पत्नी की डिलीवरी, बीमार पत्नी की देखभाल, घर की मरम्मत आदि के लिए आप रेग्युलर पैरोल के लिए आवेदन कर सकते हैं.

–     इसके लिए ज़रूरी है कि कैदी ने जेल में एक साल की सज़ा पूरी की हो, पहले कभी पैरोल पर रिहा होने पर कोई अपराध न किया हो और जेल में उसका आचरण संतोषजनक हो, तो उसे पूरे साल में एक महीने की पैरोल मिल सकती है.

फर्स्ट इंफॉर्मेशन रिपोर्ट (एफआईआर)

हम सभी जानते हैं कि अगर हमारे साथ किसी तरह का अपराध हो, तो हमें तुरंत पुलिस में उसकी एफआईआर दर्ज करानी चाहिए. लेकिन क्या आप ये जानते हैं कि पुलिस केवल कॉग्निज़ेबल यानी संज्ञेय अपराधों के लिए ही एफआईआर दर्ज कर सकती है. इसके लिए आपको कॉग्निज़ेबल और नॉन कॉग्निज़ेबल अपराधों को समझना होगा.

संज्ञेय अपराध (कॉग्निज़ेबल ऑफेंस)

ऐसे अपराध जिनके लिए आरोपी को गिरफ़्तार करने के लिए पुलिस को वॉरंट की ज़रूरत नहीं पड़ती. ये अपराध हत्या, बलात्कार, दहेज के लिए हत्या, अपहरण, चोरी आदि हैं.

ग़ैर-संज्ञेय अपराध (नॉन-कॉग्निज़ेबल ऑफेंस)

ये ऐसे अपराध हैं, जिनके लिए पुलिस को बिना वॉरंट गिरफ़्तार करने का अधिकार नहीं है, इसलिए पुलिस स़िर्फ अपने स्टेशन डायरी में इसे नोट करके रख लेती है और मजिस्ट्रेट से आदेश मिलने के बाद ही कोई कार्रवाई करती है. ये अपराध कम गंभीर होते हैं, जैसे- जालसाज़ी, धोखाधड़ी, मानहानि, हमला करना आदि.

–     अगर आपकी कोई चीज़ खो जाती है, तो पुलिस उसके लिए एनसीआर रिपोर्ट लिखती है यानी पुलिस ने स़िर्फ डॉक्यूमेंट बनाया कि आपकी कोई चीज़ खो गई है, पर उसकी जांच करने की बाध्यता उन्हें नहीं है.

–     अब आप समझ गए कि एफआईआर किन मामलों में दर्ज करानी है और किन मामलों के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना है. यहां आपको एक बात और बता दें कि अगर कॉग्निज़ेबल ऑफेंस के मामले में भी पुलिस ऑफिसर एफआईआर दर्ज नहीं करता, तो आप सुप्रीटेंडेंट या फिर मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के पास जाकर उसके लिए आदेश ला सकते हैं.

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ज़मानती और ग़ैर-ज़मानती अपराध (बेलेबल-नॉनबेलेबल ऑफेंस)

कुछ ऐसे अपराध होते हैं, जिनमें ज़मानत मिल जाती है, पर कुछ अपराध इतनेे गंभीर होते हैं, जिनमें ज़मानत नहीं मिलती. आम जनता को बलात्कार, हत्या और देशद्रोह ही ग़ैर-ज़मानती लगते हैं, जबकि इसकी सूची काफ़ी लंबी है.

ज़मानती अपराध

हमारे देश में कई ऐसे छोटे-मोटे अपराध हैं, जिनके लिए आपको आसानी से ज़मानत मिल जाती है. ये अपराध बहुत गंभीर नहीं होते, इसलिए क़ानून यहां ज़मानत की छूट देता है. वैसे तो लिस्ट काफ़ी लंबी है, पर यहां हम कुछ के बारे में बता रहे हैं- किसी ग़ैरक़ानूनी जनसमूह का सदस्य होना, उपद्रव करना, सरकारी अधिकारी के आदेश की अवहेलना करना, धोखाधड़ी के लिए सरकारी कर्मचारी की यूनीफॉर्म का ग़लत इस्तेमाल, सरकारी काम में अड़चन डालना, कोर्ट की कार्यवाही को बाधित करना, मिलावट करना, धार्मिक पूजा में शामिल जनसमूह में अशांति फैलाना आदि.

गैर-ज़मानती अपराध

ये बहुत ही गंभीर अपराध होते हैं, इसलिए क़ानून ऐसे मामलों को ग़ैर-ज़मानती रखता है. इसके कुछ उदाहरण हैं- हत्या, दहेज के लिए हत्या, हत्या का प्रयास, जानबूझकर किसी को गंभीर चोट पहुंचाना, अपहरण, बलात्कार, देशद्रोह, राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के ज़रिए राष्ट्र के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ना आदि.

भगवतगीता से शपथ लेना

अगर आप किसी आपराधिक मामले में गवाही देने कोर्ट जानेवाले हैं और भगवतगीता पर हाथ रखकर कसम खाने को लेकर काफ़ी उत्साहित हैं, तो आपको बता दें कि असली कोर्ट में ऐसा कुछ नहीं होता. ये स़िर्फ बॉलीवुड फिल्मों की करामात है. कोर्ट में द इंडियन ओथ्स एक्ट, 1873 का पालन किया जाता है. वैसे ये फिल्मी प्रथा कोरी काल्पनिक भी नहीं है, क्योंकि मुग़ल काल में इस प्रथा का इस्तेमाल किया जाता था, जहां हिंदुओं को भगवतगीता और मुसलमानों को कुरान पर हाथ रखकर सच्चाई की शपथ लेनी होती थी. यहां तक कि बॉम्बे हाई कोर्ट में भी साल 1957 तक यह प्रथा बदस्तूर जारी थी.

– अनीता सिंह