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इन 10 तरीक़ों से शक्कर कर सकती है आपको बीमार (10 Reasons Why Too Much Sugar Is Bad For You)

Sugar Tips

इन 10 तरीक़ों से शक्कर कर सकती है आपको बीमार (10 Reasons Why Too Much Sugar Is Bad For You)

खाने में मिठास घोलनेवाली शक्कर (Sugar) की सच्चाई कितनी कड़वी है, इस बारे में शायद ही आपने कभी ध्यान दिया हो. शक्कर न स़िर्फ हमारी ज़िंदगी में पूरी तरह घुल-मिल गई है, बल्कि इसके साइड इफेक्ट्स (Side Effects) से हमारा स्वास्थ्य (Health) भी धीरे-धीरे घुल रहा है. रिफाइंड शक्कर का ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल कर अनजाने में ही आप कई बीमारियों को न्योता दे रहे हैं. कौन-सी हैं वो बीमारियां और कितनी हानिकारक है शक्कर, आइए देखते हैं.

मैं शक्कर हूं!

सबसे पहले तो आपको बता दें कि शक्कर एक कार्बोहाइड्रेट है. मार्केट में मिलनेवाली शक्कर गन्ने या स़फेद चुकंदर से बनी प्रोसेस्ड व रिफाइंड शक्कर होती है, जिसमें कोई भी पोषक तत्व नहीं होते. यह हमारे शरीर में स़िर्फ कैलोरीज़ जमा करती है.

क्यों हानिकारक है शक्कर?

प्रोसेसिंग के दौरान शक्कर की चमक बढ़ाने के लिए उसमें सल्फर डाइऑक्साइड, फॉस्फोरिक एसिड, कैल्शियम हाइड्रॉक्साइड, एक्टिवेटेड कार्बन जैसे ख़तरनाक केमिकल्स का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे इसके सारे पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं. यह पचने में भी इतनी हेवी होती है कि इसे पचाने के लिए शरीर को अतिरिक्त मशक्कत करनी पड़ती है. यह हमारे शरीर में धीरे-धीरे फैट के रूप में जमा होती रहती है, जो किसी न किसी बीमारी के रूप में बाहर निकलती है. यही वजह है कि इसे ‘स्लो व्हाइट पॉयज़न’ भी कहते हैं.

कहां-कहां से मिलती है शक्कर?

मार्केट में मिलनेवाली रिफाइंड शक्कर के अलावा कई और प्राकृतिक स्रोतों से भी हमें शक्कर मिलती है.

ग्लूकोज़: यह फलों और पौधों में पाया जाता है, जो फोटोसिंथेसिस के कारण बनता है. ज़रूरत पड़ने पर हमारा शरीर भी ग्लूकोज़ बनाता है.

फ्रूक्टोज़: यह फ्रूट शुगर होता है, जो फलों से मिलता है. यह गन्ने और शहद में पाया जाता है.

सुक्रोज़: यह गन्ना, स़फेद चुकंदर और कुछ ग्लूकोज़ के साथ कुछ फलों व सब्ज़ियों में भी पाया जाता है.

लैक्टोज़: दूध से मिलनेवाली इस शक्कर को हम मिल्क शुगर भी कहते हैं.

क्या होता है जब हम खाते हैं शक्कर?

जब हम किसी भी फॉर्म में शक्कर खाते हैं, तो हमारे शरीर के पास उसके लिए दो ऑप्शन्स होते हैं-

  1. उन कैलोरीज़ को बर्न करके एनर्जी में कनवर्ट करना.
  2. कार्बोहाइड्रेट्स को फैट में बदलकर फैट सेल्स में जमा करना.

हमारी बॉडी की एक्टिविटी इस बात पर निर्भर करती है कि उस दिन हमारे शरीर में कितनी शक्कर गई है. अगर शक्कर सही मात्रा में है, तो वो एनर्जी में कन्वर्ट होगी, लेकिन अगर ज़रूरत से ज़्यादा है, तो बॉडी फैट में बदल जाएगी.

कितनी शक्कर की होती है ज़रूरत?

वैसे तो हमें फलों और सब्ज़ियों से ज़रूरत के मुताबिक़ शक्कर मिल जाती है, लेकिन अगर आप रोज़ाना फल, सब्ज़ी और दूध नहीं लेते, तो अपने खाने में निम्नलिखित मात्रा से ज़्यादा शक्कर न लें.

पुरुष: रोज़ाना 9 टीस्पून या लगभग

37.5 ग्राम (150 कैलोरीज़)

महिला: रोज़ाना 6 टीस्पून या लगभग

25 ग्राम (100 कैलोरीज़)

रोज़ाना हमारे शरीर को लगभग 2000 कैलोरीज़ की ज़रूरत होती है, जिनमें से शक्कर का हिस्सा इतना ही है, लेकिन अगर आप इससे ज़्यादा शक्कर लेंगे, तो वो एक्स्ट्रा कैलोरीज़ आपको ही नुक़सान पहुंचाएंगी.

किस तरह बना सकती है रोगी?

शक्कर हमारे शरीर को कई तरह से प्रभावित करती है. किसी विशेष अंग को प्रभावित करने के साथ-साथ यह कई शारीरिक क्रियाओं पर भी नकारात्मक प्रभाव डालती है.

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Sugar Control

  1. वज़न बढ़ाकर दे सकती है मोटापा

आजकल हम जो भी पैक्ड फूड, प्रोसेस्ड फूड और शुगरी ड्रिंक्स ले रहे हैं, उनमें भारी मात्रा में शक्कर होती है. इन प्रोडक्ट्स में आमतौर पर फ्रूक्टोज़ का इस्तेमाल किया जाता है, जो शक्कर की क्रेविंग्स को और बढ़ा देता है. जो लोग सॉफ्ट ड्रिंक्स, सोडा और पैक्ड फ्रूट जूसेज़ पीते हैं, उनका वज़न बाकी लोगों के मुक़ाबले तेज़ी से बढ़ता है.

  1. प्रभावित करती है इंसुलिन की प्रक्रिया

ब्लड शुगर को कंट्रोल में रखने के लिए हमारा शरीर इंसुलिन रिलीज़ करता रहता है, लेकिन जब हम ज़रूरत से ज़्यादा शक्करवाली चीज़ें

खाने-पीने लगते हैं, तब शरीर को बहुत ज़्यादा इंसुलिन बनाना पड़ता है, जिससे इंसुलिन प्रोडक्शन का पूरा सिस्टम बिगड़ जाता है और शरीर इंसुलिन की ज़रूरत को पूरा नहीं कर पाता. इससे टाइप 2 डायबिटीज़, हार्ट डिसीज़ और मेटाबॉलिक सिंड्रोम जैसी बीमारियां जन्म लेती हैं.

  1. बढ़ा सकती है हार्ट डिसीज़ का ख़तरा

शक्कर के ओवरडोज़ से कई बीमारियां हो सकती हैं, उन्हीं में से एक है, हार्ट प्रॉब्लम्स, जो पूरी दुनिया में इस समय मौत का सबसे बड़ा कारण बन गया है. रिसर्च में यह बात साबित हो गई है कि ज़्यादा शक्कर के सेवन से ओबेसिटी,

इंफ्लेमेशन, ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर हो सकता है. ये सभी हार्ट प्रॉब्लम्स के रिस्क फैक्टर्स हैं.

  1. बढ़ाती है कैंसर के रिस्क फैक्टर्स

मोटापा और इंसुलिन की कमी दोनों ही फैक्टर्स कैंसर को ट्रिगर कर सकते हैं. एक रिसर्च में यह बात सामने आई है कि जो महिलाएं हफ़्ते में तीन बार या उससे ज़्यादा कुकीज़ और बिस्किट्स खाती हैं, उनमें इंडोमेट्रियल कैंसर का ख़तरा बाकी महिलाओं के मुक़ाबले डेढ़ गुना ज़्यादा बढ़ जाता है.

  1. फंसा सकती है एनर्जी ड्रेनिंग साइकल में

अगर कमज़ोरी महसूस कर रहे हों, तो कुछ मीठा खा लें, एनर्जी तुरंत बूस्ट हो जाती है, पर क्या आप जानते हैं कि अगर शक्कर के साथ प्रोटीन, फाइबर या फैट नहीं हो, तो वो एनर्जी टिक नहीं पाती और तुरंत नष्ट हो जाती है. जितनी तेज़ी से एनर्जी लेवल बढ़ता है, उसी तेज़ी से घट जाएगा, जिससे आप दोबारा विकनेस फील करेंगे. इस एनर्जी ड्रेनिंग साइकल से बचना चाहते हैं, तो स़िर्फ शक्करवाली चीज़ें लेना अवॉइड करें. आप लो फील कर रहे हैं, तो कोई शुगरी ड्रिंक पीने की बजाय सेब के साथ कुछ बादाम खा लें.

  1. दे सकती है आपको फैटी लिवर

लंबे समय तक हाई फ्रूक्टोज़ डायट के इस्तेमाल से फैटी लिवर का ख़तरा बढ़ जाता है. ग्लूकोज़ और अन्य तरह की शक्कर शरीर के अन्य सेल्स में घुल जाती हैं, पर फ्रूक्टोज़ स़िर्फ और स़िर्फ लिवर में घुलती है. लिवर उसे एनर्जी के रूप में इस्तेमाल करता है, लेकिन जब ज़रूरत से ज़्यादा फ्रूक्टोज़ लिवर में आने लगता है, तो वह फैट में बदलने लगता है, जिससे धीरे-धीरे लिवर फैटी होने लगता है.

  1. बढ़ने लगती हैं दांतों की बीमारियां

पिछले कुछ सालों में दांतों की बीमारियां तेज़ी से बढ़ी हैं, क्योंकि हमारे

खान-पान में शक्कर की मात्रा तेज़ी से बढ़ी है. हमारे मुंह में बहुत से हेल्दी व अनहेल्दी बैक्टीरिया रहते हैं. शक्कर एक ऐसी चीज़ है, जिसके कारण अनहेल्दी बैक्टीरिया तेज़ी से बढ़ते हैं और हमें दांतों की समस्याएं होने लगती हैं. शक्कर के कारण दांतों पर एसिड अटैक्स ज़्यादा होते हैं, जो कैविटी का मुख्य कारण बनते हैं.

  1. बढ़ाती है यूरिक एसिड की मात्रा

यूरिक एसिड बनने का मुख्य कारण फ्रूक्टोज़ है. जब शरीर में फ्रूक्टोज़ का लेवल बढ़ जाता है, तो शरीर उसे यूरिक एसिड के रूप में बाहर निकालने लगता है, जिससे हार्ट और किडनी प्रॉब्लम्स शुरू हो जाती हैं.

  1. शुगर एडिक्शन को बढ़ाती है

क्या आप जानते हैं कि शक्कर किसी ड्रग एडिक्शन से कम नहीं है? जी हां, यह हम नहीं बल्कि रिसर्चर्स कहते हैं. उनके मुताबिक़, जब हम शक्करवाली चीज़ें खाते हैं, तो हमारे ब्रेन से डोपामाइन नामक हार्मोन रिलीज़ होता है, जो हमें और शक्कर खाने के लिए उकसाता है और न चाहते हुए भी हम शक्कर का ओवरडोज़ ले लेते हैं.

  1. कम उम्र में बना सकती है अल्ज़ाइमर और डिमेंशिया का शिकार

हमारा खानपान हमारे ब्रेन के स्ट्रक्चर और फंक्शनिंग को प्रभावित करता है. रिसर्चर्स के मुताबिक़, ज़रूरत से ज़्यादा शक्कर ब्रेन की उस फंक्शनिंग को प्रभावित करती है, जो हमारी मेमोरी को कंट्रोल करती है. लगातार शक्कर का ओवरडोज़ बहुत कम उम्र में आपको अल्ज़ाइमर और डिमेंशिया का शिकार बना सकता है.

क्या हैं शक्कर के हेल्दी विकल्प?

ऑर्गैनिक शहद: इसकी एंटीफंगल, एंटीबैक्टीरियल और एंटीमाइक्रोबियल प्रॉपर्टीज़ के कारण यह बेस्ट स्वीटनर माना जाता है. यह शक्कर से ज़्यादा मीठा होता है, इसलिए कम क्वांटिटी में इस्तेमाल होता है.

गुड़: इम्यून सिस्टम को बूस्ट करने, आयरन लेवल को बढ़ाने, लिवर को डिटॉक्सिफाई करने के साथ-साथ यह सर्दी-खांसी में भी आपको राहत दिलाता है. जहां भी आपको शक्कर की ज़रूरत पड़ती हो, वहां गुड़ का इस्तेमाल करें.

खजूर: खजूर का इस्तेमाल आप हलवा, खीर जैसे डेज़र्ट्स और मिठाइयां बनाने के लिए कर सकते हैं. शक्कर की बजाय खजूर और काजू पाउडर आदि इस्तेमाल कर सकते हैं. ब्राउन शुगर की बजाय आप डेट शुगर का इस्तेमाल कर सकते हैं.

अनरिफाइंड शुगर: इसे रिफाइंड नहीं किया जाता, जिससे आयरन और मैग्नीशियम जैसे प्राकृतिक तत्व बने रहते हैं. देखने में यह भूरे रंग का होता है, जिसका स्वाद शहद जैसा होता है. रिफाइन्ड शक्कर की जगह इसका इस्तेमाल करें.

कोकोनट या पाम शुगर: यह एक बेहतरीन नेचुरल स्वीटनर है, क्योंकि इसे प्रोसेस करने के लिए किसी केमिकल का इस्तेमाल नहीं किया जाता. रोज़ाना की कुकिंग में इसे शामिल करें. चाय में डालकर आप रिफाइंड शक्कर से बच सकते हैं.

– अनीता सिंह

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रिश्तों को आजकल हुआ क्या है? (What Is Wrong With Relationship These Days?)

जिस्मों के रिश्ते हैं, आज की रूहों की यही हक़ीक़तें हैं… जज़्बात ग़ायब हैं, एहसास गुमसुम-से… हसरतें बेहिसाब हैं… वासनाओं पर मर्यादाओं का पहरा अब नहीं है, साथ जीने-मरने की क़समों का इरादा अब नहीं है… ख़ालिस मुहब्बत अब बंधन-सी लगती है, बेपनाह चाहत अब बेड़ियां बन गई हैं… अपने तरी़के से जीने का शग़ल, है हर कोई अपनी ही धुन में मगन… एक-दूसरे के साथ रहता तो है तन, पर न जाने कहां भटका हुआ है यह मन…

Relationships

–     इसे मॉडर्न होने की परिभाषा कहें या प्रैक्टिकल सोच, लेकिन सच है कि रिश्तों में अब वो पहले वाली गहराई नहीं रही.

–     ऐसा नहीं है कि लोग जुड़ते नहीं हैं, लेकिन ये जुड़ाव अब क्षणिक होता है.

–     रिश्तों में अब एडजेस्टमेंट करने की जगह न के बराबर बची है, क्योंकि दोनों पार्टनर्स में से किसी को भी कॉम्प्रोमाइज़ नहीं करना है.

–     शादी के रिश्ते में एक साथ होते हुए भी अलग-अलग हैं.

–     आज दोनों पार्टनर्स वर्किंग होते हैं, ज़ाहिर है लाइफस्टाइल इतनी बदल गई है कि रिश्तों में भी बदलाव आ गया है. लेकिन ये बदलाव इस कदर हावी हो रहा है कि हम ख़ुद भी सोचते हैं कि रिश्तों को आजकल हुआ क्या है?

–     डबल इन्कम नो किड्स से लेकर अब नौबत डबल इन्कम नो सेक्स तक पहुंच चुकी है. सेक्स के लिए न टाइम है, न एनर्जी.

–     जो बची-खुची एनर्जी है, वो सोशल मीडिया पर ज़ाया हो रही है.

–     डिनर के टेबल पर सब अपने मोबाइल फोन्स के साथ बैठते हैं. कहने को साथ खाना खा रहे हैं, पर कनेक्टेड कहीं और ही रहते हैं… बच्चे पिक्चर्स क्लिक करके फ्रेंड्स के साथ शेयर करते हैं और बड़े अपने-अपने क्रश या दोस्तों के साथ.

–     पति-पत्नी बेड पर अपने-अपने फोन्स के साथ ही होते हैं… दोनों को परवाह नहीं कि कौन, किससे बात कर रहा है, न ही इस बात की फ़िक्र है कि आपस में इतनी देर से कोई बातचीत उनके बीच नहीं हो रही.

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Relationship Problems

ऐसे में यह सवाल उठना लाज़िमी है कि रिश्तों को आजकल हुआ क्या है?

नो कमिटमेंट: लोग आकर्षित तो होते हैं, प्यार भी करते हैं, पर कमिटमेंट से डरते हैं. आजकल इतनी जल्दी रिश्ते बनते-बिगड़ते हैं कि लोग ख़ुद भी यह तय नहीं कर पाते हैं कि इस रिश्ते में उन्हें कब तक रहना है. उन्हें लगता है, जब तक चल रहा है, चलने देते हैं, कोई और मिल गया, तो वहां चले जाएंगे, क्योंकि कौन-सा हमको शादी करनी है. यही वजह है कि रिश्ते नॉन सीरियस होते जा रहे हैं.

कैल्कुलेटिव हो रहे हैं: आजकल रिश्ते ज़रूरी नहीं, बल्कि ज़रूरत के रिश्ते रह गए हैं, जिनसे हमारा स्वार्थ सिद्ध हो, वो उस समय के लिए हमारे लिए महत्वपूर्ण होते हैं. मतलब निकलने के बाद एक-दूसरे को पहचानते भी नहीं.

प्रैक्टिकल अप्रोच: हम अब प्रैक्टिकल हो गए हैं. हमारे अनुभव भी हमें यही सीख देते हैं कि इमोशनल होना स़िर्फ बेव़कूफ़ी है. बेहतर है, जितना प्रैक्टिकल रहें, उतना फ़ायदा होगा. शहरों में वर्क लाइफ के बाद स़िर्फ वीकेंड में अपने लिए समय मिलता है. उसमें हम अपनों के साथ समय बिताने की बजाय उन लोगों के साथ समय बिताना पसंद करते हैं, जिनसे हमें कोई न कोई फ़ायदा हो.

स्पेस के नाम पर बढ़ती दूरियां: ‘स्पेस…’ आजकल यह शब्द काफ़ी घर कर गया है हमारे रिश्तों में भी. हर किसी को स्पेस चाहिए यानी रिश्ते में बंधने के बाद भी कोई बंधन न हो. यह अजीब सोच है, क्योंकि प्यार के रिश्ते में एक-दूसरे से कुछ छिपाने की ज़रूरत ही नहीं होनी चाहिए. जब सब कुछ साझा है, तो छिपाना क्या है और क्यों है? पर अक्सर कपल्स को कहते सुना है कि हमें स्पेस चाहिए, वरना रिश्ते में दम घुटने लगता है. हां, यह सही है कि कोई सिर पर सवार न रहे हमेशा, न ही हर बात पर टोके, पर स्पेस के नाम पर हर बात को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता.

सेक्स, आज नहीं: काम का दबाव इतना ज़्यादा होता है कि सेक्स के लिए एनर्जी ही नहीं बचती. यहां तक कि अब तो सेक्स की इच्छा भी नहीं होती. ऑफिस में अधिकतर समय गुज़ारने के चलते कलीग्स से इतनी नज़दीकियां बढ़ जाती हैं कि पार्टनर से ज़्यादा आकर्षण उनमें नज़र आने लगता है. ऐसे में पति-पत्नी एक-दूसरे से दूरी बनाने लगते हैं. सेक्स के लिए कोई एक क़रीब आना भी चाहे, तो दूसरा बहाना बना देता है कि आज नहीं, बहुत थकान है या सुबह जल्दी उठना है… आदि.

डिजिटल रिश्ते रियल रिश्तों पर हावी: सोशल साइट्स के रिश्ते अब ज़्यादा भाने लगे हैं. उनमें अजीब-सा आकर्षण होता है. टेक्स्ट मैसेजेस, चैटिंग की लत ऐसी लग जाती है कि रियल रिश्ते बोझ लगने लगते हैं और डिजिटल वर्ल्ड की रंगीन दुनिया हसीन लगने लगती है. लेकिन यह कुछ समय का ही नशा होता है, क्योंकि ये रिश्ते हमें ठगते ज़्यादा हैं और संबल कम देते हैं.

कम्यूनिकेशन की कमी: आसपास होते हुए भी आपस में बातचीत का न तो समय है, न ही इच्छा. अपनी-अपनी दुनिया में सभी व्यस्त हैं. एक-दूसरे के सुख-दुख को जानने-समझने की फुर्सत ही नहीं रह गई. धीरे-धीरे रिश्तों में ख़ामोशी पसर जाती है और न जाने कब

एक-दूसरे से दूर हो जाते हैं. हर रिश्ते की मज़बूती के लिए बेहद ज़रूरी है आपसी बातचीत यानी कम्यूनिकेशन, पर उसकी कमी के चलते रिश्ते दम तोड़ने लगते हैं और जब तक एहसास होता है, तब तक देर हो चुकी होती है.

– योगिनी भारद्वाज

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सीखें ख़ुश रहने के 10 मंत्र (10 Tips To Stay Happy)

Happy

सीखें ख़ुश रहने के 10 मंत्र

आज की लाइफस्टाइल में खुश रहना भी किसी चुनौती से कम नहीं, पर इन टिप्स को आज़माकर आप भी रह सकते हैं खुश और पॉज़िटिव

1 आप हैं तो सबकुछ है, इसलिए सबसे पहले ख़ुद से प्यार करना सीखें.

2 अगर आप ख़ुश हैं, तो आप दूसरों को भी ख़ुश रखते हैं. इसलिए अपनी ख़ुशियों को प्राथमिकता दें.

3 यदि आपको किसी से कुछ कहना है, तो कह दीजिए, क्योंकि कह देने से मन हल्का हो जाता है. यदि आप मन की बात कह नहीं सकते, तो उसे काग़ज़ पर लिख दीजिए, ऐसा करने से भी आप हल्का महसूस करेंगे.

4 रिश्ते अनमोल होते हैं, इसलिए अपने रिश्तों की क़द्र करें और उन्हें पर्याप्त समय दें.

5 दोस्तों के साथ हम सबसे ज़्यादा ख़ुश रहते हैं, इसलिए दोस्तों के साथ समय गुज़ारें.

6 किसी भी मनमुटाव को मन में रखने से मन भारी हो जाता है और तनाव बढ़ जाता है, ख़ुश रहने के लिए माफ़ करना सीखें.

7 आपकी उम्र चाहे जो होे, अपने भीतर के बच्चे को कभी बड़ा न होने दें. उसे शरारतें करने दें, तभी आप ज़िंदगी की असली ख़ुशी महसूस कर सकेंगे.

8 आप चाहे कितने ही बिज़ी क्यों न हों, अपने शौक़ के लिए समय ज़रूर निकालें. इससे आपको कभी बोरियत नहीं महसूस होगी और आप ज़िंदगी से हमेशा प्यार करेंगे.

9 ख़ुशी पाने से कहीं ज़्यादा ख़ुशी देने से संतुष्टि मिलती है, इसलिए जीवन में ऐसे काम ज़रूर करें जिनसे आप दूसरों के चेहरे पर ख़ुशी बिखेर सकें.

10 स्वस्थ और फिट रहें, क्योंकि बीमार शरीर कभी ख़ुश नहीं  रह सकता.

– वंशज विनय

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मॉनसून में फिटनेस के लिए इंडोर एक्टिविटीज़ (Fitness Special: Indoor Activities For Monsoon)

Fitness Special
मॉनसून में फिटनेस के लिए इंडोर एक्टिविटीज़ (Fitness Special: Indoor Activities For Monsoon)

ख़ुद को फिट रखना आपका पैशन है, लेकिन बारिश की वजह से आप जिम नहीं जा पा रहे हैं. कोई बात नहीं, इंडोर एक्टिविटीज़ करके भी आप फिट रह सकते हैं. ट्रेडमिल, स्किपिंग, सूर्य नमस्कार, ऐरोबिक्स आदि बहुत सारी इंडोर एक्टिविटीज़ हैं, जिनके लिए किसी इक्विपमेंट की ज़रूरत नहीं होती और न ही जिम जाने की.

सूर्य नमस्कार
यह अपने आप में कंप्लीट एक्सरसाइज़ है. सूर्य नमस्कार करने के बाद अन्य वर्कआउट करने की ज़रूरत नहीं होती, क्योंकि इसमें इतने सारे स्टेप्स होते हैं, जिनसे पूरी बॉडी स्ट्रेच होती है और बॉडी भी शेप में रहती है. यदि आप भी मॉनसून में फिट एंड फाइन रहना चाहते हैं, तो प्रतिदिन कम से कम 20 बार सूर्य नमस्कार करें. धीरे-धीरे अपने स्टैमिना के अनुसार सूर्य नमस्कार का समय बढ़ाएं.

ब्रिस्क वॉक
मॉनसून में अगर वर्कआउट करने का मूड नहीं है, तो कोई बात नहीं. कान में ईयर फोन लगाकर म्यूज़िक सुनते हुए आप घर के अंदर ही 15-20 मिनट की ब्रिस्क वॉक कर सकते हैं.

स्किपिंग
मॉनसून में स्किपिंग करके भी आप फिट रह सकते हैं. फिटनेस एक्सपर्ट्स का मानना है कि रोज़ाना 20 मिनट स्किपिंग करने से 700 कैलोरीज़ बर्न होती है. हड्डियां व जोड़ मज़बूत होते हैं और मांसपेशियां लचीली बनती हैं.

पुशअप्स एंड प्लैंक्स
पुशअप और प्लैंक्स करने के लिए किसी इक्विपमेंट की ज़रूरत नहीं होती. इसे करने से पीठ, पेट और पैर मज़बूत होते हैं, साथ ही फिज़िकल स्टैमिना बढ़ता है. मॉनसून में अगर फिट रहना चाहते हैं, तो प्रतिदिन कम से कम 20 पुशअप एंड प्लैंक्स करें. धीरे-धीरे अपने स्टैमिना के अनुसार बढ़ाते जाएं.

ट्रेडमिल
मॉनसून वर्कआउट के बारे में सोचते ही सबसे पहला नाम ट्रेडमिल का आता है. ट्रेडमिल पर रोज़ाना 15 मिनट से 45 मिनट तक चल सकते हैं. इसके अलावा ट्रेडमिल पर आप ब्रिस्क वॉक और जॉगिंग भी कर सकते हैं.

इंडोर साइकिलिंग
पार्क जैसी खुली हवादार जगह पर साइकिलिंग करने का मज़ा ही अलग है, लेकिन बारिश में साइकिलिंग करना थोड़ा ख़तरनाक हो सकता है, पर परेशान होने की ज़रूरत नहीं है. टे्रडमिल की तरह इंडोर साइकिलिंग करके भी आप मॉनसून में एक्टिव रह सकते हैं.

होम कार्डियो वर्कआउट
जिम जाने का मूड नहीं, तो होम कार्डियो वर्कआउट करें. इस वर्कआउट की शुरुआत क्विक वॉर्मअप सेशन से करें, फिर जंपिंग जैक, डंबल्स, बाईसेप्स कर्ल, ट्राईसेप्स कर्ल, स्कवैट्स और माउंटेन क्लाइंबर भी ट्राई कर सकते हैं. इन एक्सरसाइज़ को प्रतिदिन 30 मिनट करने से बांहें और पैर मज़बूत होते हैं.

डांस
इंडोर मॉनसून वर्कआउट को एंजॉय करने का बेस्ट तरीक़ा है डांस. वर्कआउट के लिए ऐसे सॉन्ग का सिलेक्शन करें, जो हाई एनर्जीवाले हों. इन हाई एनर्जीवाले सॉन्ग पर आप सोलो डांस भी कर सकते हैं और पार्टनर के साथ भी. डांस करने से एक्स्ट्रा कैलोरीज़ बर्न होती है और मांसपेशियां भी स्ट्रेच होती हैं.

ऐरोबिक्स
ऐरोबिक्स करने का सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि आप जिम गए बिना अपना वज़न कम कर सकते हैं और अपने को फिट रख सकते हैं. इस इंडोर एक्टिविटी को करने से मसल्स टोन्ड होती हैं और आप ख़ुद को भी एक्टिव महसूस करते हैं.

योगा
बारिश के कारण अगर जिम नहीं जा पा रहे हैं, तो आप योगा करके ख़ुद को फिट रख सकते हैं. क्या आप जानते हैं कि रोज़ाना 45 मिनट योगा करने से 700 कैलोरीज़ बर्न होती हैं. इसे करने से बॉडी में फ्लेक्सिबिलिटी बढ़ती है, इम्यूनिटी स्ट्रॉन्ग होती है और श्‍वसन तंत्र में होनेवाली समस्याएं दूर होती हैं, जो मॉनसून में होना आम बात है.

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Indoor Fitness

हाउसहोल्ड एक्टिविटीज़
मॉनसून में हाउसहोल्ड एक्टिविटीज़ करके आप एक्टिव रह सकते हैं. शेल्फ्स और अलमारियां साफ़ करें, मशीन की जगह हाथों से कपड़े धोएं, पोछा लगाएं आदि. इन एक्टिविटीज़ से आप फिट भी रहेंगे और धीरे-धीरे आपका घर भी क्लीन हो जाएगा.

सीढ़ियां चढ़ना-उतरना
बारिश के मौसम में वॉकिंग या जॉगिंग करना संभव नहीं है, तो रोज़ाना 20 मिनट तक सीढ़ियां चढ़ें और उतरें. इस मौसम में एक्स्ट्रा कैलोरीज़ बर्न करने के लिए यह बेस्ट वर्कआउट है. फिटनेस एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर आप रोज़ाना 15 मिनट भी सीढ़ियां चढ़ते-उतरते हैं, तो आपका 80% तक वर्कआउट होता है. यह ट्रेडमिल पर चलने जैसा ही वर्कआउट है. अगर आपके पास ट्रेडमिल नहीं है, तो ख़रीदने की बजाय सीढ़ियां चढ़ें-उतरें. सीढ़ियां चढ़ने व उतरने से न केवल मांसपेशियां लचीली होती हैं, बल्कि मेटाबॉलिक रेट भी बढ़ता है.

स्पोर्ट्स
अगर आपके घर के आसपास कोई क्लब हाउस या जिम है, तो वहां जाकर इंडोर गेम्स भी खेल सकते हैं, जैसे- बैडमिंटन, टेबल टेनिस, स्न्वैश आदि. स्पोर्ट्स बॉडी में एकत्रित फैट्स को कम करने और ख़ुद को एनर्जेटिक रखने का बेस्ट ऑप्शन है.

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Home Fitness

बच्चों के लिए बेस्ट इंडोर एक्टिविटीज़
आर्ट एंड क्राफ्ट: इसमें बच्चों को कलरफुल क्राफ्ट पेपर की मदद से फ्लावर मेकिंग, ग्रीटिंग कॉर्ड आदि बनाना सिखा सकते हैं.
कार्ड और बोर्ड गेम्स: इन गेम्स में बच्चों को फ्रूट्स, वेजीटेबल्स, अल्फाबेट्स, एनीमल कार्ड को अलग-अलग शेप्स और डिज़ाइन में अरेंज करना सिखा सकते हैं.

फन गेम्स: चेस, कैरम, पज़ल्स, लूडो, मैकेनिकल गेम्स आदि.

मूवी टाइम: बच्चों को एनिमेटेड 3डी/4डी मूवी दिखा सकते हैं. उनके मूवी टाइम को फन टाइम बनाने के लिए स्नैक्स का अरेंजमेंट ज़रूर करें.

इंडोर गार्डनिंग: इसमें बच्चे बैंगन, टमाटर, लहसुन, प्याज़ और हरे धनिया को छोटे गमलों में उगा सकते हैं. ये पौधे मॉनसून के लिए परफेक्ट प्लान्ट्स हैं, क्योंकि इन्हें अधिक सनलाइट की आवश्यकता नहीं होती.

स्टोरी टाइम: बच्चों के लिए ऐसा स्टोरी टाइम प्लान करें, जिसे वे एंजॉय कर सकें. बड़े बच्चों को स्टोरी बुक पढ़ने के लिए कहें और छोटे बच्चों को पिक्चर बुक्स और बोर्ड बुक्स दिखाकर स्टोरी सुनाएं.

पार्टी टाइम: बिना किसी कारण के बच्चों और उनके दोस्तों के लिए इनहाउस पार्टी प्लान करें, जैसे- गुड़िया का बर्थडे, उसकी शादी, पप्पी का बर्थडे. डांस और यम्मी स्नैक्स के साथ उनकी पार्टी को सफल बनाएं.

असिस्टेंट बनाएं: बच्चों को कुकिंग, क्लीनिंग, डस्टिंग में मदद करने के लिए प्रेरित करें. रिवॉर्ड के तौर पर उन्हें मूवी दिखाएं, फेवरेट गेम और फेवरेट ट्रीट दें.

कुकिंग एंड बेकिंग: इसमें बच्चों को सलाद, सैंडविच, कपकेक बनाना सिखा सकते हैं.

– पूनम कोठारी

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महिलाओं को क्यों चाहिए मी-टाइम? (Why Women Need Me-Time?)

Women, Time

आज की स्मार्ट और समझदार महिलाएं घर-परिवार-करियर की तमाम ज़िम्मेदारियां निभाते हुए अपने मी टाइम को भी एंजॉय कर रही हैं. जी हां, महिलाएं बदल रही हैं और उनमें आए इस बदलाव को उनका परिवार और समाज भी स्वीकारने लगा है. और सबसे ख़ास बात, इस बदलाव से महिलाओं की ज़िंदगी और भी ख़ूबसूरत हो गई है. महिलाओं के लिए क्यों और कितना ज़रूरी है मी-टाइम? आइए, जानते हैं.

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ये बात तो हम सभी जानते हैं कि यदि आप ख़ुद ख़ुश नहीं हैं तो आप दूसरों को कभी ख़ुश नहीं रख सकते, इसलिए सबसे पहले आपका ख़ुश होना ज़रूरी है. आज की स्मार्ट और सुलझी हुई महिलाएं ये बात अच्छी तरह जानती हैं इसलिए वो घर-परिवार, करियर की तमाम ज़िम्मेदारियां निभाते हुए अपने लिए अलग से व़क्त निकालती हैं और अपने मी-टाइम को पूरी तरह एंजॉय करती हैं. ये टाइम स़िर्फ उनका होता है, जिसे वो अपनी फ्रेंड्स के साथ बिताना पसंद करती हैं.

महिलाओं में मी-टाइम कोई नई बात नहीं
साइकोलॉजिस्ट माधवी सेठ कहती हैं, “महिलाओं में मी-टाइम का चलन कोई नई बात नहीं है. बहुत पहले से ही, जब महिलाओं को बहुत एक्सपोज़र नहीं मिला था, तब भी उनके मी टाइम को ध्यान में रखते हुए उन्हें पीरियड्स के दौरान 5 दिनों का और बच्चे के जन्म के बाद 40 दिनों का मी टाइम दिया जाता था. इसी तरह साल में 2-3 बार त्योहार या रीति-रिवाज़ के नाम पर महिलाओं को उनके मायके भेज दिया जाता था, ताकि वो वहां पर अपना मी टाइम एंजॉय कर सकें. मोहल्ले की तमाम महिलाओं का इकट्ठा होकर गप्पे लड़ाना या गॉसिप करना भी उनका मी-टाइम ही होता था. पीरियड्स के दौरान महिलाएं अपने मी टाइम को अपनी इच्छानुसार बीताती थीं. इसी तरह जब महिलाएं अपने मायके जाती थीं, तो मायके वाले इस बात का ख़ास ध्यान रखते थे कि वो अपने इस टाइम को पूरी तरह एंजॉय कर सकें. मायके जाकर महिलाएं अपनी सहेलियों, भाभी, कज़िन्स आदि के साथ क्वालिटी टाइम बिताती थीं और रिफ्रेश होकर ससुराल लौटती थीं.”

करियर वुमन के लिए ज़्यादा ज़रूरी है मी-टाइम
जब तक महिलाओं की दुनिया घर की चारदीवारी तक सिमटी थी, तब तक तो उन्हें अपनी ननद, भाभी, पड़ोसन आदि के साथ मी टाइम बिताने का मौक़ा मिल जाता था, दिक्कत तब शुरू हुई जब महिलाओं ने घर से बाहर क़दम रखा और घर-बाहर दोनों जगहों की ज़िमेदारियां संभालनी शुरू की. धीरेधीरे महिलाओं को करियर बनाने की आज़ादी तो मिलने लगी, लेकिन उनकी घर की ज़िममेदारियों का बोझ कम नहीं हुआ. परिवार के लोगों को लगने लगा कि बहू को नौकरी पर भेजकर उन्होंने उस पर एहसान किया है इसलिए उसे करियर के साथ-साथ घर की ज़िममेदारियां भी पूरी तरह निभानी चाहिए. इसका नतीजा ये हुआ कि करियर वुमन की आर्थिक स्थिति तो सुधरने लगी, लेकिन उसका मी-टाइम छिन गया. करियर वुमन की ज़िंदगी घड़ी की सूइयों की नोक पर घूमने लगी. कॉलेज प्रोफेसर सुमन सिंह कहती हैं, “मुझे तो लगता है करियर वुमन होना किसी अभिषाप से कम नहीं. हमारी अपनी कोई ज़िंदगी ही नहीं होती. महिलाओं ने नौकरी करनी क्या शुरू की परिवार के लोगों ने उन्हें सुपर वुमन बना दिया. घर के सारे काम के अलावा बच्चों की पढ़ाई, घर के सारे बिल, बैंक के काम… धीरे-धीरे मर्दों ने अपने सारे काम महिलाओं की ओर सरका दिए. कभी-कभी तो लगता है कि हमसे सुखी वो महिलाएं थीं, जिन्हें घर के चूल्हे-चौके के अलावा और किसी काम से कोई मतलब नहीं था. महिलाओं के काम करते ही पुरुष जैसे रिलैक्स हो गए, अब उन्हें लगता है कि उनकी बीवी सबकुछ संभाल लेगी, लेकिन बीवी को कौन संभालेगा, इसकी किसी को परवाह नहीं रहती.”

…क्योंकि बदलाव ज़रूरी था
साइकोलॉजिस्ट माधवी सेठ के अनुसार, “महिलाओं ने यदि मी-टाइम की डिमांड करनी शुरू की, तो इसमें कुछ ग़लत नहीं है. अति किसी भी चीज़ की अच्छी नहीं होती. महिलाएं जब घर और करियर दोनों जगहों पर अपनी क्षमता से ज़्यादा काम करती हैं, तो इससे उनकी मेंटल और फिज़िकल हेल्थ बिगड़ने लगती है, जो न उनके लिए सही है और न ही उनके परिवार के लिए. लंबे समय तक घर-बाहर की दोहरी ज़िममेदारियां निभाते हुए महिलाओं को ये महसूस होने लगा कि उनके साथ ज़्यादती हो रही है, इसीलिए उन्होंने मी-टाइम की डिमांड करनी शुरू कर दी. आप इसे महिलाओं का मी-टाइम और शी-टाइम भी कह सकते हैं, क्योंकि अपने इस टाइम को वो परिवार के साथ नहीं, बल्कि अपनी फ्रेंड्स के साथ बिताना पसंद करती हैं. जहां न उन्हें कोई रोकने-टोकने वाला हो और न ही उन पर किसी तरह की कोई ज़िम्मेदारी हो.”

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इसलिए ज़रूरी है मी टाइम-शी टाइम
दिन-रात मेहनत करते हुए जब कुछ समय बेफिक्रे होकर अपने फ्रेंड्स के साथ बिताने का मौक़ा मिलता है, तो आप एक बार फिर से चार्जअप हो जाते हैं. इससे आपको नई ऊर्जा मिलती है और आप अपना काम और तमाम ज़िम्मेदारियां ख़ुशी-ख़ुशी पूरी कर लेते हैं. महिलाएं जब फ्रेंड्स के साथ शॉपिंग, डिनर या हॉलिडेज़ पर जाती हैं, तो उस समय उन पर किसी तरह का बोझ नहीं होता, लेकिन जब वो परिवार के साथ घूमने जाती हैं, तो उनका पूरा समय परिवार के सभी सदस्यों की सेवा-टहल में ही गुज़र जाता है और वो अपने हॉलिडेज़ को एंजॉय नहीं कर पातीं. हॉलिडेज़ पर भी परिवार के सदस्य यही उम्मीद करते हैं कि घर की महिलाएं वहां भी उनकी ज़रूरत की हर चीज़ उनके हाथ में दे. लेकिन महिलाएं जब अपनी फ्रेंड्स के साथ घूमने जाती हैं, तो वो पूरी तरह आज़ाद होती हैं और अपने हॉलिडेज़ को ज़्यादा एंजॉय कर पाती हैं.

मिल रहा है परिवार का सपोर्ट
कुछ समय पहले तक जब महिलाएं स़िर्फ घर और करियर के बीच ही उलझी रहती थीं, तो उनके काम के बोझ का असर उनकी सेहत और व्यवहार पर भी पड़ने लगा, जिससे कपल्स के बीच झगड़े होना, परिवार में वाद-विवाद की स्थिति बढ़ने लगी. ऐसे में सुलझे हुए परिवार के लोगों को भी ये समझ आने लगा कि उनके घर की महिलाएं ख़ुश नहीं हैं और ऐसा होना परिवार के लिए ठीक नहीं है. ऐसे में घर की महिलाओं ने जब मी-टाइम की डिमांड करनी शुरू की, तो परिवार के लोगों को भी उनकी मांग सही लगी और उन्होंने ख़ुशी-ख़ुशी महिलाओं को अपने इस स्पेशल टाइम को एंजॉय करने की इजाज़त देनी शुरू कर दी. बस, यहीं से एक बार फिर शुरुआत हुई महिलाओं के मी-टाइम की. अब तो महिलाएं बकायदा वीकेंड पर या महीने में एक बार अपनी फ्रेंड्स के साथ मी टाइम ज़रूर बीताती हैं. साथ ही अब महिलाएं एक साथ हॉलिडेज़ पर जाने लगी हैं और उनके परिवार भी उन्हें ख़ुशी-ख़ुशी घूमने जाने देते हैं. महिलाओं में आया ये बदलाव उनकी फिज़िकल-मेंटल हेल्थ के लिए बहुत अच्छा है. रिटायर्ड बैंक ऑफिसर माधवी शर्मा ने बताया, “हमारे ज़माने में इतना ही काफ़ी था कि ससुराल वाले हमें नौकरी करने की इजाज़त दे रहे हैं. मी-टाइम के बारे में सोचने की तो कभी हिम्मत ही नहीं हुई. किसी भी महिला के लिए घर और करियर दोनों एक साथ संभलना आसान नहीं होता. सबकी इच्छाएं पूरी करते-करते महिलाएं अपने बारे में सोचना ही भूल जाती हैं. मैंने झेला है इस तकलीफ़ को इसलिए मैं अपनी बहू के साथ ऐसा नहीं होने देना चाहती. वो दिन-रात हम सबके लिए इतनी मेहनत करती है, मेरे बेटे के जितना ही कमाती भी है, तो क्या ये हमारी ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि हम भी उसकी ख़ुशी के बारे में सोचें.”

ट्रैवल कंपनियां देती हैं स्पेशल पैकेज
महिलाओं में बढ़ते मी-टाइम और शी-टाइम को देखते हुए अब ट्रैवल कंपनियां भी लेडीज़ स्पेशल ट्रैवल पैकेज देने लगी हैं, जिसमें महिलाओं की सेफ्टी और कंफर्ट का ख़ास ध्यान रखा जाता है. महिलाएं अपनी फ्रेंड्स के साथ इन ट्रैवल पैकेज का जमकर लुत्फ़ उठा रही हैं और अपने मी-टाइम को और भी ख़ास बना रही हैं. आरती अपनी चार सहेलियों के साथ हर साल एक हफ्ते के लिए घूमने का प्लान बनाती हैं और फ्रेंडस के साथ ख़ूब एंजॉय करती हैं. आरती ने बताया, “हम पांचों सहेलियां वर्किंग हैं और दिन-रात अपने काम में बहुत बिज़ी रहती हैं, लेकिन हम सब महीने में एक दिन ज़रूर मिलते हैं और उस दिन हम स़िर्फ अपने मन की करते हैं. वो एक दिन हम सबके लिए स्ट्रेस बस्टर का काम करता है और महीनेभर मेहनत करने की ऊर्जा देता है. हम सब साल में एक बार हफ्तेभर के लिए हॉलिडेज़ पर भी जाते हैं और ये हमारा गोल्डन टाइम होता है. परिवार-ऑफिस की सभी झंझटों से दूर इस एक हफ्ते को हम जी भर के जी लेते हैं. मुझे लगता है महिलाओं का मी टाइम उनकी ख़ुशी से ज़्यादा उनके मेंटल और फिज़िकल हेल्थ के लिए ज़रूरी है.

गर्लफ्रेंड के साथ घूमना इसलिए है फ़ायदेमंद
साइकोलॉजिस्ट माधवी सेठ कहती हैं, “जब एक लड़का और लड़की साथ घूमने जाते हैं, तो वो घूमना एंजॉय करने के बजाय एक-दूसरे को इंप्रेस करने में लगे रहते हैं, जिससे वो खुलकर नहीं रह पाते, लेकिन जब स़िर्फ लड़कियों या स़िर्फ लड़कों का ग्रुप कहीं घूमने जाता है, तो उनके बीच कोई फॉर्मेलिटीज़ नहीं होतीं, जिससे वो अपनी ट्रीप को पूरी तरह एंजॉय कर पाते हैं. यही वजह है कि मैरिड कपल भी एक-दूसरे के बजाय अपने फ्रेंड्स ग्रुप के साथ घूमने जाना ज़्यादा पसंद करते हैं और इसमें कुछ ग़लत नहीं है.”

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ये हैं महिलाओं में बढ़ते मी टाइम की ख़ास वजहें
* अपनी आज़ादी को महसूस करने और ख़ुशी के पल जुटाने की चाह.
* कुछ समय के लिए घर-परिवार, करियर की तमाम ज़िम्मेदारियों से ख़ुद को अलग करने की चाह.
* अपना मेंटल स्ट्रेस कम करने के लिए महिलाएं चाहती हैं मी टाइम.
* वर्किंग वुमन को कई बार काम के कमिटमेंट के कारण बच्चों की छुट्टियों में भी मायके जाने का मौक़ा नहीं मिलता इसलिए वो फ्री टाइम में फ्रेंड्स के साथ घूमना पसंद करती हैं.
* वो अपनी आर्थिक आज़ादी को महसूस करना चाहती है और ऐसा वो अपने मी टाइम में ही कर पाती है.

– कमला बडोनी

लाइफस्टाइल ने कितने बदले रिश्ते? (How Lifestyle Has Changed Your Relationships?)

How Lifestyle Has Changed Your Relationships

ज़िंदगी फास्ट ट्रैक हो गई है…. यानी तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी, मॉडर्न लाइफस्टाइलतेज़ी से बढ़ रहीं ख़्वाहिशेंइन ख़्वाहिशों के पीछे भागते हमन खाने की फ़िक्रन रिश्तों की चिंता, न सेहत की सुध, न अपनों को खोनेपाने की. नतीजा हम बहुत कुछ हासिल तो कर रहे हैं, लेकिन इसमें काफ़ी कुछ छूटता भी जा रहा है. अपने, रिश्ते, तनमन, शांति, सुकूनसब कुछ. इस सो कॉल्ड मॉडर्न लाइफस्टाइल ने हमारे रिश्तों को भी प्रभावित किया है और रिश्तों में दूरियां बढ़ा दी हैं.

How Lifestyle Has Changed Your Relationships

प्राथमिकता बदल गईः पहले ज़िंदगी की पहली ज़रूरत हुआ करती थी अपनी और अपनों की ख़ुशी, परिवार के साथ ख़ुशियों के पल. सुबह की चाय और डिनर पूरा परिवार एक साथ करता था, फेवरेट टीवी शोज़ भी पूरा परिवार एक साथ ही देखता था. इच्छाएं सीमित थीं और ख़्वाहिशें गिनती की. लेकिन अब कामयाब ज़िंदगी की चाहत और अधिक पैसा कमाने की चाह आज की लाइफस्टाइल की ज़रूरत बन गई है. अब न अपनों के लिए टाइम है और न ही इस बात की चिंता है किसी को कि परिवार के साथ टाइम बिताना भी ज़रूरी है. सुखसुविधाओं से घर भरा है, बस ख़ुशियां, अपनापन और रिश्तों से प्यार गायब हो गया है.
कम्यूनिकेशन गैपः रिश्तों में ख़ामोशी बढ़ रही है, सूनापन फैल रहा है. अपनापन सिमट रहा है. बिज़ी लाइफ, सुबह से शाम तक की भागदौड़, स्ट्रेसतनाव ने रिश्तों को भी ख़ामोश कर दिया है. मोबाइल और सोशल मीडिया पर घंटों चैटिंग करने को आज की लाइफस्टाइल की ज़रूरत माननेवाले परिवार के बीच रहकर भी उनसे बातचीत करना ज़रूरी नहीं समझते. रिश्तों में ये ख़ामोशी रिश्तों के लिए साइलेंट किलर की तरह साबित हो रही है.
नो टाइम फॉर सेक्सः बदलती लाइफस्टाइल का सबसे ज़्यादा असर सेक्स लाइफ पर पड़ा है. मॉडर्न लाइफस्टाइल यानी सारी सुविधाएं, ऐशोआराम, बिज़ी लाइफ, लेट नाइट तक काम करनाइन सबके बीच लोग भूलते ही जा रहे हैं कि वैवाहिक जीवन में सेक्स कितना महत्वपूर्ण है. नतीजा रिश्तों में दूरियां बढ़ रही हैं. वैवाहिक जीवन के बाहर प्यार की तलाश बढ़ी है, एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर बढ़ रहे हैं.
कम होता कमिटमेंटः लाइफस्टाइल ने रिश्तों में कमिटमेंट की ज़रूरत को भी ख़त्म कर दिया है. हर हाल में रिश्ते सहेजने और निभाने की बात अब पुरानी हो चुकी है. एडजस्टमेंट अब लोग एक हद तक ही करना चाहते हैं. और अगर एडजस्ट नहीं हो पाया, तो अलग हो जाना बेहतर समझते हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह है महिलाओं का इंडिपेंडेंट और फाइनेंशियली व सोशली स्ट्रॉन्ग होना. दूसरे, सोशल साइट्स पर माउस की एक क्लिक पर कई लोग स्क्रीन पर प्रेज़ेंट हो जाते हैं, जिनसे घंटों चैट करना उन्हें स्ट्रेसफ्री करता है. ऐसे में तनावपूर्ण रिश्ते में रहने से बेहतर वे ऑनलाइन रिश्ता जोड़ना अधिक पसंद करते हैं.
रिश्तों में भी बढ़ा है स्ट्रेसः इस फास्ट ट्रैक ज़िंदगी ने स्ट्रेस इतना ज़्यादा बढ़ा दिया है कि ये स्ट्रेस रिश्तों में भी नज़र आने लगा है. लोग अपने लिए ख़ुशियां, फाइनेंशियल सिक्योरिटी, कामयाबी जुटाने में इतने मशगूल हैं कि रिश्तों की फ़िक्र ही नहीं उन्हें और ये सब पाने की चाह ने उन्हें स्ट्रेस्ड बना दिया है. और ये स्ट्रेस, ग़ुस्सा, चिड़चिड़ापन उनके रिश्तों में भी नज़र आने लगा है.
सोशल रिलेशन भी बदल गए हैंः मॉडर्न लाइफस्टाइल ने सोशल रिलेशनशिप को भी बुरी तरह प्रभावित किया है. सुकून से बैठकर अपनों से बात करना अब लोगों को समय की बर्बादी लगती है. चाहे हालचाल पूछना हो या बर्थडेएनिवर्सरी विश करना हो, किसी को इनवाइट करना हो या उनके बारे में और कुछ जानना हो, सब कुछ लोग सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर निपटा देते हैं. उनका कहना है, जो काम घर बैठे फोन पर हो जाता है, उसके लिए मिलने जाना समय बर्बाद करना है. इसी तरह सोशल मीडिया ने उन्हें इतना बिज़ी कर दिया है कि न वो रिश्तेदारदोस्तों के घर आतेजाते हैं, न किसी सोशल फंक्शन का हिस्सा बनते हैं.
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नो टाइम फॉर किड्सः बच्चे जीने के मक़सद होते हैं. पतिपत्नी के रिश्ते की कड़ी होते हैं. लेकिन करियर बनाने और भविष्य को सुरक्षित करने के चक्कर में आज कपल्स के पास इतना समय ही नहीं होता कि वो बच्चा प्लान करें. सारी सुविधाएं जुटाने और पैसा कमाने में वे इतने मशगूल हैं कि बच्चे की ज़िम्मेदारी उठाने का ख़्याल ही नहीं आता उन्हें. और जब तक ख़्याल आता है, तब तक कई बार देरी हो चुकी होती है और फिर शुरू होता है एकदूसरे को दोष देने का सिलसिला, जिससे रिश्तों में कड़वाहट भी बढ़ती है.
फाइनेंशियल प्रेशर का असर रिश्तों पर भीः मॉडर्न लाइफस्टाइल ने बेतहाशा ज़रूरतें बढ़ा दी हैं और इन ज़रूरतों ने फाइनेंशियल प्रेशर बढ़ाया है. न चाहते हुए भी कई बार ये फाइनेंशियल प्रेशर रिश्तों के बीच तनाव उत्पन्न करता है. कौन कितना ख़र्च उठाएगा, किसका ख़र्च ज़्यादा है, जैसे मुद्दे कई बार विवाद का कारण बन जाते हैं.
स्पेस और आज़ादी की चाहः आजकल किसी को भी अपनी ज़िंदगी में दख़लअंदाज़ी पसंद नहीं. सबको अपनाअपना स्पेस और आज़ादी चाहिए. आज़ादी बोलने की, ज़िंदगी जीने की, उन्मुक्त रहने की, हम चाहते हैं कि हमसे कोई सवाल न करे. हम अपने ़फैसले ख़ुद लें. लेकिन स्पेस की ये चाहत हमें रिश्तों के प्रति बेपरवाह बना दे रही है. इस सो कॉल्ड स्पेस के नाम पर रिश्तों में दूरियां बढ़ती जा रही हैं. ये दूरियां रिश्तों को कैसे और कब ख़त्म करने लगती हैं, हमें एहसास भी नहीं होता. माना कि बारबार रोकटोक, हर बात में दख़लअंदाज़ी न अब लोग बर्दाश्त करेंगे, न ही ये ठीक भी है, लेकिन स्पेस का इतना ओवरडोज़ भी न हो जाए कि आपको लगने लगे कि आपको उनकी कोई परवाह ही नहीं या आपको उनकी किसी बात से फ़र्क ही नहीं पड़ता.
अपने लिए जीना हो गया है ज़रूरीः पहले हम अपना हर व्यवहार, हर बात लोगों को ध्यान में रखकर करते थे कि लोग क्या कहेंगे, अगर हम फें्रड्स के साथ लेट नाइट मूवी देखने गए, तो लोगों को बातें करने का मौक़ा मिल जाएगा. लेकिन अब लोग इन बातों की परवाह किए बिना अपने लिए, अपनी ख़ुशियों के लिए जीना सीख रहे हैं. दोस्तों के साथ पार्टी करना, कलीग के साथ मूवी देखना, पड़ोसियों या रिश्तेदारों को भले ही पसंद न आए, लेकिन अगर ख़ुद को इसमें ख़ुशी मिलती है, तो लोगों की परवाह किए बिना लोग अपने लिए इनमें ख़ुशी तलाश लेते हैं.

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ये भी बदला है

समय बदल गया है. लोग रिश्तों को लेकर भी प्रैक्टिकल हो गए हैं. अब लोग सोचते हैं कि जिनसे काम हो, उन्हीं से रिश्ते जोड़े रखो.

बिना मतलब के, बिना काम के रिश्ते रखना, तो अब बेव़कूफ़ी समझी जाती है.

रिश्ते निभाने का समय और इच्छा दोनों ही नहीं रहीं अब लोगों के पास. अब अपना समय लोग उन्हीं चीज़ों पर ख़र्च करते हैं, जिससे फ़ायदा हो.

बड़े शहरों में वर्क कल्चर ऐसा हो गया है कि वीकेंड में ही अपने लिए समय मिलता है, जिसे लोग अपने कलीग्स या फ्रेंड्स के साथ ही एंजॉय करना चाहते हैं.

डिजिटल वर्ल्ड ने हमें बहुत ज़्यादा ओपन स्पेस दे दिया है, जहां हम अपने रिश्तों से दूर हो गए हैं और डिजिटल रिश्तों में ज़्यादा बिज़ी हो गए हैं.

डिजिटल इफेक्ट रिश्तों पर इतना होने लगा है कि एक ही कमरे में बैठकर भी लोग मोबाइल में बिज़ी रहते हैं.

प्रतिभा तिवारी

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अनहेल्दी लाइफस्टाइल कहीं आपको बीमार तो नहीं बना रही है? (Is Your Unhealthy Lifestyle Making You Sick?)

Is Your Unhealthy Lifestyle Making You Sick

Unhealthy Lifestyle

अनहेल्दी लाइफस्टाइल (Unhealthy Lifestyle) कहीं आपको बीमार (Sick) तो नहीं बना रही है?

ब्रेकफास्ट न करना

इस बारे में डायटीशियन्स व न्यूट्रीशनिस्टस का कहना है कि ब्रेकफास्ट न करने से वज़न बढ़ना, हदय रोग, चिड़चिड़ापन, मूड स्विंग होना, एनर्जी लेवल कम होना जैसी समस्याएं हो सकती हैं. हाल ही में हुए एक अध्ययन से यह साबित हुआ है कि जो लोग ब्रेकफास्ट नहीं करते हैं, उनमें बैड कोलेस्ट्रॉल का स्तर जल्दी बढ़ता है और रोज़ाना नाश्ता करनेवाले लोगों की तुलना में उन्हें डायबिटीज़ होने की संभावना भी अधिक होती है. जो लोग डायटिंग के नाम पर ब्रेकफास्ट नहीं करते, उन्हें विशेष रूप से इस बात का ध्यान रखना चाहिए. ब्रेकफास्ट न करने पर दिनभर थकान महसूस होती है, एकाग्रता में कमी आने के साथ-साथ कार्यक्षमता भी प्रभावित होती है.

खाना चबाकर न खाना

अधिकतर लोगों में खाना अच्छी तरह से चबाकर न खाने की बुरी आदत होती है. शोधकर्ताओं के अनुसार, अच्छे स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी है कि खाने को अच्छी तरह से चबा-चबाकर खाया जाए, लेकिन जो लोग खाने को पूरी तरह से चबाकर नहीं खाते हैं, उनका पाचन तंत्र सुचारू रूप से काम नहीं करता. पाचन तंत्र के सही ढंग से काम न करने के कारण उन्हें कब्ज़, एसिडिटी और गैस की समस्या हो सकती है.

ज़्यादा कॉफी पीना

प्रतिदिन कॉफी पीने के बहुत फ़ायदे होते हैं. कॉफी में ऐसे अनेक एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो हमारी याददाश्त को बढ़ाते हैं, लेकिन ज़रूरत से ज़्यादा कॉफी का सेवन सेहत को हानि पहुंचाता है. औसतन एक व्यक्ति के लिए दो से चार कप कॉफी पीना सामान्य है, लेकिन चार से अधिक कप कॉफी पीने से एंज़ायटी, इंसोम्निया (अनिद्रा) और शरीर में कंपकंपी होने लगती है, जिसके कारण सिरदर्द, ब्लड प्रेशर, हार्ट अटैक और पाचन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं. इसके अलावा कॉफी में मौजूद कैफीन नामक तत्व बोन मास डेंसिटी को कम करता है. अधिक मात्रा में कॉफी पीने से हड्डियां कमज़ोर होती हैं और ऑस्टियोपोरोसिस होने की संभावना बढ़ जाती है.

ज़रूरत से ज़्यादा एक्सरसाइज़ करना

सही एक्सरसाइज़ आपको फिट और फ्रेश होने का एहसास कराती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ज़रूरत से ज़्यादा एक्सरसाइज़ करना भी आपको बीमार बना देता है. जी हां, ज़रूरत से ज़्यादा एक्सरसाइज़ करने से घुटनों को नुक़सान पहुंचता है, जिससे ऑस्टियोपोरोसिस होने का ख़तरा होता है. अधिक एक्सरसाइज़ करने से थकान महसूस होती है. कई बार मांसपेशियों में खिंचाव आ जाता है. एक शोध के अनुसार, ज़रूरत से ज़्यादा एक्सरसाइज़ करने से ब्लड प्रेशर बढ़ता है, जिससे दिल का दौरा पड़ने की संभावना ब़ढ़ जाती है.

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भारी बैग कैरी करना

हैवी बैग्स उठाने से क्रॉनिक बैक पेन, कंधे और गर्दन में दर्द जैसी समस्याएं होती हैं. हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, 5.5 किलोग्राम से लेकर 7 किलोग्राम तक का भारी बैग उठाने से गर्दन, कंधे व पीठ में दर्द शुरू होने लगता है, इसलिए बैग ख़रीदते समय ऐसा बैग ख़रीदें, जिसमें हैवी मटेरियल का इस्तेमाल न किया गया हो. हैवी मटेरियलवाले बैग में सामान भरने के कारण बैग और भी भारी हो जाता है और गर्दन व कंधों की मांसपेशियों में खिंचाव आने लगता है, जिसके कारण गर्दन, कंधे व पीठ में दर्द होने लगता है. इसके अलावा पतली स्ट्राइप्सवाले बैग से भी ब्लड सर्कुलेशन रुकने का ख़तरा होता है.

हाई हील पहनना

अधिकतर महिलाएं हाई हील को फैशन एक्सेसरीज़ के तौर पर अपने वॉर्डरोब में ज़रूर रखती है, यह जानते हुए भी कि हाई हील सेहत को नुक़सान पहुंचाती है. हाई हील पहनने से स़िर्फ पैरों में ही दर्द नहीं होता, बल्कि शरीर के अन्य भागों में भी तकली़फें बढ़ जाती हैं. एक अध्ययन के अनुसार, लगभग 70% महिलाएं हाई हील पहनती हैं, जिनमें से 90% महिलाओं को कंधे, पीठ, घुटने और जोड़ों के दर्द की समस्या होती है. हाई हील पहनने से सबसे ज़्यादा दबाव पैरों पर पड़ता है, जिसके कारण बॉडी पोश्‍चर बिगड़ने लगता है. हाई हील का असर स्पाइन पर भी पड़ता है, जिससे पीठ और पिंडलियों में दर्द बढ़ने लगता है.

रात को सोने से पहले ब्रश न करना

ज़्यादातर लोग रात को सोने से पहले ब्रश करने से कतराते हैं. उनकी यह आदत न केवल उनके स्वस्थ दांतों के लिए हानिकारक है, बल्कि उनके हेल्दी रिलेशिपशिप में भी दूरी का कारण बनती है.

अमेरिकन डेंटल एसोसिएशन के डेंटिस्ट किमबर्ली हाम्स के अनुसार, दांतों की अच्छी सेहत के लिए दिन में दो बार ब्रश ज़रूर करना चाहिए. क्योंकि दिनभर खाते रहने के कारण दांतों पर प्लाक की परत जम जाती है, जिसके कारण दांतों में छिपे बैक्टीरिया एक्टिव हो जाते हैं. इसलिए जब भी आप खाना खाते हैं, तो ये बैक्टीरिया एसिड का उत्पादन करना शुरू कर देते हैं, जिससे दांतों में सड़न और सांसों में दुर्गंध की समस्या होने लगती है. इन समस्याओं से बचने के लिए दिन में 2 बार ब्रश करना ज़रूरी है.

पूरी नींद न लेना

स्लीप नामक पत्रिका में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, जो लोग 6 घंटे या 6 घंटे से कम नींद लेते हैं, तो उन्हें कार्डियोेवैस्कुलर डिसीज़, जैसे- दिल की बीमारी, लो ब्लड प्रेशर, तनाव, अवसाद जैसी समस्याएं हो सकती हैं. नींद पूरी न होने के कारण पाचन क्रिया धीमी हो जाती है, जिससे खाना पचने में मुश्किल होती है. इनके अलावा एकाग्रता में भी कमी आने लगती है.

यूरिन रोकना

यूरिन रोकना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है, यह जानते हुए भी लोगों में यूरिन रोकने की बुरी आदत होती है. यूरिन के ज़रिए शरीर के विषैले तत्व बाहर निकल जाते हैं. अगर थोड़ा-सा भी यूरिन शरीर में रह जाता है, तो संक्रमण होने का ख़तरा बढ़ जाता है. 2-3 घंटे से अधिक समय तक यूरिन रोकने से किडनी स्टोन और ब्लैडर में सूजन की समस्या हो सकती है. बहुत देर तक यूरिन रोकने से यूटीआई (यूरिन ट्रैक्ट इंफेक्शन) की समस्या हो सकती है, जिसके कारण यूरिनरी ट्रैक में दर्द और यूरिन के साथ-साथ खून भी आने लगता है.

– अभिषेक शर्मा

बिगड़ती लाइफस्टाइल कहीं बिगाड़ न दे आपकी सेक्सुअल लाइफ? (Lifestyle Changes Can Ruin Your Sex Life)

Lifestyle Changes Can Ruin Your Sex Life

Lifestyle Changes Can Ruin Your Sex Life

वक़्त के साथ बहुत कुछ बदलाहमारा खानपान, रहनसहन, हालात और हमारी सोच. कमोबेश इन सबका असर हमारी सेक्स लाइफ पर भी पड़ा. कपल्स बेहतरीन सेक्सुअल लाइफ बिताना मानो भूलते जा रहे हैं. उस पर यदि दोनों वर्किंग हैं, तो स्थिति और भी बदतर हो जाती है. आख़िर किनकिन कारणों से कपल्स की सेक्स लाइफ प्रभावित हो रही है. इन सब पहलुओं पर नज़र डालते हैंआप मानें या न मानें, आपकी लाइफस्टाइल का आपके सेक्स जीवन पर सकारात्मक व नकारात्मक दोनों ही प्रभाव पड़ता है. आपका खानापीना, सोना, वर्क स्टाइलहर छोटे से छोटे पहलू आपके सेक्सुअल परफॉर्मेंस में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.कहना है सेक्सोलॉजिस्ट व मैरिज काउंसलर डॉ. राजीव आनंद का. उनके अनुसार, जो व्यक्ति छह घंटे से कम नींद लेता है, वो अधिक तनावग्रस्त, थका हुआ, क्रोधित रहता है और इन सबका असर कपल्स की कामेच्छा पर पड़ता है.

* आज की भागदौड़भरी ज़िंदगी में तनाव व परेशानी कम नहीं है. ऐसे में धूम्रपान की आदत बढ़ी है, जिसका असर उनकी सेक्स लाइफ पर पड़ता है. स्टडी के अनुसार, स्मोकर को इरेक्शन की समस्या एक आम पुरुष से दुगुनी होती है.

* अल्कोहल का प्रभाव स्त्रीपुरुष दोनों की सेक्स लाइफ पर पड़ता है. यह शरीर की संवेदनशीलता को कम करने के साथसाथ कामेच्छा को दबाता भी है. रिसर्च के अनुसार, लंबे समय तक शराब पीने से पुरुषों में नपुंसकता की संभावनाएं भी बढ़ जाती हैं.

* कम सोने से थकान, एनर्जी लेवल कम हो जाना, सेक्स में अनिच्छा आदि प्रॉब्लम्स होने लगते हैं. इसलिए पर्याप्त नींद लें.

* हेल्दी फूड की कमी और अधिक जंक फूड खाने से न केवल मोटापा बढ़ता है, बल्कि आपकी सेक्स ड्राइव भी कमज़ोर पड़ जाती है. शोध के अनुसार, सही भोजन न करने से टेस्टेस्टेरॉन हार्मोन्स में कमी होती है और स्पर्म प्रोडक्शन आदि भी प्रभावित होता है.

* स्ट्रेस यानी तनाव, ख़ासकर डिप्रेशन का हमारे शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और धीरेधीरे ये सेक्सुअल लाइफ पर भी अटैक करता है.

* आज की फास्ट लाइफ में असमय खानेपीने, सोने की आदतें लोगों को अनहेल्दी बना दिया है. इस कारण लोगों ने दवाइयों का अधिक सेवन करना शुरू कर दिया, जिसका असर सेक्स लाइफ पर पड़ा.

* आजकल अधिकतर कपल्स वर्किंग हैं. पतिपत्नी दोनों इस कदर बिज़ी हैं कि अपने लिए वे वक़्त ही नहीं निकाल पाते.

* एक्सपर्ट के अनुसार, स्त्रियों को अनियमित मासिक चक्र भी सेक्सुअल लाइफ को प्रभावित करता है.

* आज जो सबसे टॉप कारण है, वो है पार्टनर का सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताना. आज कपल्स एकदूसरे को क्वालिटी टाइम देने की बजाय फेसबुक, वॉट्सअप, इंस्टाग्राम जैसे सोशल प्लेटफार्म पर वक़्त बिताना अधिक पसंद करते हैं और इन सबका नकारात्मक प्रभाव उनकी सेक्स लाइफ पर पड़ता है.

* यदि किसी पार्टनर को कोई बीमारी, जैसेहाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल, हार्ट प्रॉब्लम (जो आज की लाइफस्टाइल की सबसे कॉमन डिसीज़ बनते जा रहे हैं) है, तो भी लव लाइफ पर इसका असर पड़ता है.

* रिसर्च के अनुसार, ओबेसिटी यानी मोटापे का सेक्स लाइफ पर, विशेषतौर पर पुरुषों पर 71% से भी अधिक असर होता है.

* टेक्नोलॉजीगैज़ेट्ससेल फोन, लैपटॉप, टैब का हर समय इस्तेमाल करना भी रिश्तों के लिए नुक़सानदायक माना गया है.

* संयुक्त परिवार की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती यह थी कि काम बंटे रहते थे. आपसी सहयोग रहता था. ऐसे माहौल में कपल्स एकदूसरे के लिए समय निकाल पाते थे. लेकिन न्युक्लियर फैमिली के कारण यह भी प्रभावित होती चली गई.

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बेटर लाइफस्टाइल बेटर सेक्स लाइफ

* डॉ. राजीव के अनुसार, यदि आप अपने सेक्स लाइफ को बेहतर बनाना चाहते हैं, तो आपको उपरोक्त सभी पहलुओं पर ग़ौर करना होगा.

हफ़्ते में एक दिन, ख़ासतौर पर वीकेंड में कपल्स शाम एकदूसरे के साथ बिताएं.

कभी मूवी देखने, तो कभी लॉन्ग ड्राइव पर निकल जाएं. इससे पार्टनर न केवल एकदूसरे के साथ अधिक समय बिता सकेंगे, बल्कि रिलैक्स भी हो सकेंगे.

चाहे आप कितने ही बिज़ी क्यों न हों, दिनभर में कुछ देर के लिए ही सही, पार्टनर से फोन पर बात करें.

वर्क लोड हो या डेडलाइन पर काम पूरा करने का टेेंशन, इसे घर पर लादकर न लाएं. घरऑफिस में फ़र्क़ होता है, इस बात को आपको गंभीरता से समझना होगा.

जॉब से जुड़े तनाव, परेशानियों को घर पर न लाएं.

आप कितने भी व्यस्त क्यों न हों, डिनर के बाद कुछ समय साथ बिताएं. हल्कीफुल्की बातें करें.

कपल्स एकदूसरे की भावनाओं, इच्छाओं का सम्मान करें. जन्मदिन व शादी की सालगिरह पर विशेष प्लानिंग करें. इससे पार्टनर को ख़ुशी होगी और रोमांटिक माहौल भी बनेगा.

Lifestyle Changes Can Ruin Your Sex Life
बोरिंग को इंट्रेस्टिंग बनाएं

* कभीकभी बेडरूम में सेक्सी दिखने के लिए भड़कीली ड्रेस पहनें.

* अपनी सेक्सुअल डिज़ायर के बारे में पार्टनर को बताएं.

* सेक्स करने का टाइम फिक्स करें. इससे सेक्स लाइफ में नया रोमांच पैदा होगा.

* सेक्सुअल रिलेशन के समय हंसीमज़ाक भी करें.

* कभीकभी पार्टनर के साथ न्यूड सोने का आनंद लें. रिसर्च के अनुसार, इससे कपल्स की बॉन्डिंग बढ़ती है.

* एकदूसरे को मसाज करें. इससे बॉडी रिलैक्स होने के साथसाथ आपसी प्यार बढ़ता है.

जब आप ख़ुद के लिए अच्छा महसूस करते हैं, तभी आप अपनी सेक्स लाइफ को भी बेहतर बना पाएंगे. साथ ही अच्छी हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाते हैं, तो यक़ीनन इन सबका सकारात्मक प्रभाव आपकी सेक्सुअल लाइफ पर होता है.

सेक्स के बाद क्या करें/क्या न करें?

सेक्सुअल रिलेशन के बाद तुरंत पानी न पीएं.

यदि चाहें, तो सेक्स के बाद गुड़, मिश्री या फिर कोई मिठाई खाकर पानी पी सकते हैं.

सेक्स के बाद कहीं बाहर घूमनेटहलने न निकलें.

अमेरिका में किए गए एक रिसर्च के अनुसार, सेक्स के बाद ऑर्गेज़्म तक पहुंचने पर महिलाएं इस कदर कामोत्तेजित हो जाती हैं कि सेक्स में होेनेवाले दर्द में भी आनंद का अनुभव करती हैं. ऑर्गेज़्म उनके ब्रेन के तक़रीबन तीस हिस्सों को प्रभावित करता है, जिसमें स्पर्श, ख़ुशी, भावनाएं, याद्दाश्त, संतुष्टि मुख्य हैं.

ऊषा गुप्ता

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कैसे सुलझाएं इन लाइफस्टाइल संबंधी सेक्स प्रॉब्लम्स को? (How To Deal With Lifestyle Related Sex Problems?)

Lifestyle Related Sex Problems

कई बार ऐसा होता है कि एक पार्टनर की सेक्स की इच्छा होती है, जबकि दूसरे की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं होती (Lifestyle Related Sex Problems). ऐसे में कपल्स कई बार हफ़्तों, महीनों तक सेेक्स लाइफ एंजॉय नहीं कर पाते और अधिकतर मामलों में ग़लतफ़हमियों के कारण भी ऐसा होता है. इसी पहलू को जानने की कोशिश करते हैं.

Lifestyle Related Sex Problems

बढ़ते तनाव से इच्छा में कमी
कुछ लोगों का मानना है कि अधिक स्ट्रेस की स्थिति से सेक्सुअल डिज़ायर में कमी आती है, लेकिन यह बात पूरी सच नहीं है. काम का बोझ, बॉस की झिड़की, प्रेज़ेंटेशन का प्रेशर और काम के बढ़ते घंटे तनाव को काफ़ी बढ़ा देते हैं और तनाव को सेक्सुअल डिज़ायर में कमी का कारण मान लिया जाता है. इससे पार्टनर के बीच ग़लतफ़हमी की दीवार खड़ी हो जाती है. उन्हें लगता है कि उनका पार्टनर अब पहले की तरह उनसे प्यार नहीं करता और न ही पार्टनर की उनमें कोई दिलचस्पी है. बस, इसी बात पर झगड़े शुरू हो जाते हैं और इन सबका परिणाम ये होता है कि पुरुष अपनी सेक्सुअल पावर पर ही शक करने लगते हैं, जिससे बात और बिगड़ जाती है.

समाधान- वैवाहिक जीवन में सेक्सुअल डिज़ायर में कमी के पड़ाव आते-जाते रहते हैं, अतः इसके लिए तनाव को पूरी तरह दोषी नहीं माना जा सकता. तनाव के अलावा बिज़ी लाइफस्टाइल और खानपान की ग़लत आदतें भी सेक्स लाइफ पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं. इसके अलावा कम्यूनिकेशन गैप भी दिलों के बीच दूरियां बढ़ा देता है. इसलिए पार्टनर के साथ कम से कम उन बातों को ज़रूर शेयर करें, जो आपको परेशान कर रही हैं. इससे तनाव कम होगा और आप रिलैक्स महसूस करेंगे. फिर भी यदि लगे कि स्ट्रेस सेक्सुअल लाइफ पर हावी हो रहा है, तो काउंसलर या सेक्स थेरेपिस्ट की सलाह लें.

हार्मोंस का असंतुलन
लोगों का यह सोचना कि महिलाओं के मूड और सेक्स की इच्छा के लिए हार्मोंस असंतुलन ही ज़िम्मेदार हैं, पूरी तरह सच नहीं है.

समाधान- आपसी झगड़े, मन-मुटाव, कम्यूनिकेशन गैप आदि भी इसके कारण हो सकते हैं. सेक्सुअल डिज़ायर की कमी की मुख्य वजह नींद पूरी न होना भी हो सकती है. हर व्यक्ति को कम से कम 6 से 7 घंटे सोना चाहिए. इसके अलावा हमारा मानसिक स्वास्थ्य, ग़लत खानपान और थकान भी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं. महिलाओं में सेक्स की इच्छा इस बात पर निर्भर करती है कि उनके अपने पार्टनर के साथ संबंध कैसे हैं? जो महिलाएं हीनभावना या नकारात्मक सोच की शिकार होती हैं, उनमें सेक्स की इच्छा कम होती है. अतः यह पुरुष पार्टनर की ज़िम्मेदारी बनती है कि उनकी नकारात्मक सोच को बदलें, उनका आत्मविश्‍वास बढ़ाएं, इसके लिए उन्हें खुलकर बातचीत करनी चाहिए, ताकि वैवाहिक संबंध मधुर बने रहें.

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हमेशा दवाइयों का इस्तेमाल
लोगों का मानना है कि दवाइयों के प्रयोग से सेक्सुअल डिज़ायर की कमी को दूर किया जा सकता है, लेकिन दवाइयों को हमेशा अंतिम विकल्प के रूप में रखा जाना चाहिए, क्योंकि कई बार इनका उल्टा असर भी होता है.

समाधान- सबसे पहले समस्या की जड़ तक जाएं और उसे दूर करने की कोशिश करें. कई बार समझाने से ही समस्या हल हो जाती है. आज की वर्किंग वुमन को पर्सनल और प्रोफेशनल लेवल पर ख़ुद को साबित करना पड़ता है. ऑफिस में बॉस और काम का टेंशन, घर में बच्चों को संभालना व गृहस्थी की ज़िम्मेदारी, इन सबको बैलेंस करते-करते वो इतनी थक जाती है कि सेक्स की इच्छा कहीं दबकर रह जाती है. ऐसे में पार्टनर यदि थोड़ी-बहुत ज़िम्मेदारी उठाए और ढेर सारा प्यार दे, तो समस्या आसानी से सुलझ सकती है. हां, इसके लिए धैर्य रखना ज़रूरी है.

इमोशनल इंटीमेसी
इमोशनल इंटीमेसी शेयर करनेवाले कपल्स ख़ुद को सेफ महसूस करते हैं, पर यह इमोशनल इंटीमेसी कई बार इतनी बढ़ जाती है कि न तो उन्हें सेक्स की ज़रूरत महसूस होती है और न ही सेक्स की इच्छा होती है. सेक्सुअल डिज़ायर की कमी के कारण वे सेक्स लाइफ को ठीक से एंजॉय नहीं कर पाते. उनके लिए सेक्स बस एक रूटीन बनकर रह जाता है.

समाधान- ऐसा न हो इसके लिए पार्टनर के साथ सेक्सी व रोमांटिक बातें करें, बेडरूम का माहौल रूमानी बनाएं, लाइट म्यूज़िक, कैंडल्स की हल्की रोशनी और सेक्सी ड्रेस पहनकर पार्टनर को इंप्रेस करें. सेक्सुअल लाइफ को रिचार्ज करने के लिए कुछ दिनों के लिए घर से दूर किसी रोमांटिक जगह पर कुछ पल साथ बिताएं.

एक की इच्छा, दूसरे की नहीं
कभी-कभी ऐसा होता है कि एक पार्टनर की सेक्स की इच्छा होती है और दूसरा नहीं चाहता. इसे सेक्सुअल डिज़ायर की कमी मान लिया जाता है. धीरे-धीरे यही प्रवृत्ति गंभीर बन जाती है.

समाधान- यह बिल्कुल सामान्य समस्या है. अक्सर कई पुरुष अन्य तरी़के, जैसे- गिफ्ट देकर या मीठी-मीठी बातें करके पार्टनर का दिल बहलाने की कोशिश करते हैं, लेकिन ऐसा करते समय वे यह बात भूल जाते हैं कि महिलाएं गिफ्ट से ज़्यादा प्यार करने, बांहों में लेने और किस करने से ख़ुश होती हैं. वे पार्टनर का स्पर्श चाहती हैं, क्योंकि यही स्पर्श उन्हें प्यार का एहसास कराता है. अतः इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि अन्य किसी भी तरी़के से जताया गया प्यार फिज़िकल क्लोजनेस का पर्याय नहीं हो सकता. यदि सेक्स की इच्छा में कमी या सेक्स संबंधी कोई समस्या हो, तो उसे छुपाने की बजाय पार्टनर से इस बारे में खुलकर बात करें. इससे आप दोनों के बीच ग़लतफ़हमी नहीं होगी और आपके संबंध मधुर बने रहेंगे. यदि समस्या गहरी हो, तो डॉक्टर की सलाह लें.

प्यार में कमी
ऐसा माना जाता है कि एक पार्टनर की सेक्सुअल डिज़ायर में कमी से दूसरे पार्टनर का उसके प्रति प्यार कम होता जाता है.

समाधान- यह केवल वहम है. ऐसा कुछ भी नहीं होता. समस्या से निपटने के लिए सबसे पहले तो यह पता लगाएं कि सेक्स की इच्छा में कमी का क्या कारण है? महिलाएं शादी के कुछ सालों बाद या बच्चे के जन्म के बाद अक्सर मोटी हो जाती हैं, जिससे उनका आत्मविश्‍वास कम हो जाता है. उन्हें लगता है कि अब उनकी बॉडी सेक्सी नहीं रही. उनका बेडौल शरीर देखकर पार्टनर क्या सोचेगा? यही नकारात्मक सोच उनकी सेक्स में दिलचस्पी कम कर देता है. कई बार मोटापे के कारण पुरुषों को भी संबंध बनाने में परेशानी होती है. डायट और नियमित एक्सरसाइज़ से मोटापे को कंट्रोल किया जा सकता है. नकारात्मक विचारों को दूर करने के लिए साइकोसेक्सुअल थेरेपिस्ट या काउंसलर की सलाह ली जा सकती है.

नशे का सहारा लेना
सेक्सुअल डिज़ायर को बढ़ाने के लिए लोग अल्कोहल, सिगरेट आदि का सेवन करते हैं. ऐसे लोगों की मान्यता है कि इससे सेक्स पावर बढ़ता है.

समाधान- यह बिल्कुल ग़लत है. वैसे भी पुरुष सेक्स को बहुत महत्व देते हैं. यदि उनकी सेक्सुअल डिज़ायर में कमी आती है, तो वे परेशान हो जाते हैं और मूड बनाने के लिए कई बार नशे का सहारा लेते हैं, जिससे शरीर में कई बदलाव आते हैं और इसका असर सेक्स लाइफ पर भी पड़ता है. सिगरेट में कई प्रकार के विषैले पदार्थ होते हैं, जो नपुंसकता पैदा करते हैं. इसी तरह अल्कोहल के सेवन से भी डिज़ायर में कमी आती है, लेकिन इन तथ्यों को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है. यदि हेल्दी सेक्स लाइफ चाहते हैं, तो अल्कोहल और सिगरेट से दूर रहें.

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ज्वेलरी डिज़ाइनिंग में बनाएं करियर (Create a Career in Jewellery Designing)

Jewellery Designing

Jewellery Designing

किसी भी पार्टी, फंक्शन आदि में जाने से पहले ख़ूबसूरत कपड़ोेंं के साथ ज्वेलरी का टच पर्सनालिटी को और भी निखारता है. फैशन ने आज ग्लोबल स्तर पर लोगों के जीवन को पूरी तरह से बदल दिया है. ज्वेलरी का बढ़ता ट्रेंड ही आज युवाओं को इसमें करियर बनाने के लिए आकर्षित कर रहा है. फैशन की दुनिया में क़दम रखना चाहते हैं, तो ज्वेलरी डिज़ाइन आपके लिए बेहतर विकल्प हो सकता है. ज्वेलरी डिज़ाइन में करियर बनाने के लिए कैसे करें शुरुआत? आइए, जानते हैं.

क्या है ज्वेलरी डिज़ाइन?
तरह-तरह के गहनों को बनाने की कला को ही ज्वेलरी डिज़ाइन कहते हैं. गोल्ड, सिल्वर, पर्ल, प्लेटिनम, आदि धातुओं को तराशकर उनसे
तरह-तरह के गहने बनाए जाते हैं. इसी तरह हाथी दांत, पत्थर, सीप आदि का भी प्रयोग स्टाइलिश ज्वेलरी बनाने में किया जाता है. ज्वेलरी डिज़ाइनर उन्हें कहते हैं, जो ज्वेलरी की स्टाइल, पैटर्न आदि सेट करते हैं.

शैक्षणिक योग्यता
ज्वेलरी डिज़ाइन में करियर बनाने के लिए 12वीं पास होना बहुत ज़रूरी है. इसके बाद आप आगे के कोर्स कर सकते हैं. दसवीं पास वालों के लिए भी ज्वेलरी डिज़ाइन में बेहतरीन करियर विकल्प है. दसवीं के बाद आप शॉर्ट टर्म कोर्सेस कर सकते हैं. आगे के कोर्स के लिए इच्छुक व्यक्ति को ऐप्टीट्यूड टेस्ट देना पड़ता है. इसके बाद ही आप आगे के कोर्स के लिए आवेदन भर सकते हैं.

क्या हैं कोर्सेस?
ज्वेलरी डिज़ाइन में करियर बनाने के लिए डिप्लोमा, डिग्री या सर्टीफिकेट कोर्स कर सकते हैं.

सर्टीफिकेट कोर्सेस

  • बेसिक ज्वेलरी डिज़ाइन
  • डायमंड आइडेंटीफिकेशन एंड ग्रेडिंग
  • कैड फॉर जेम्स एंड ज्वेलरी
  • कलर्ड जेमस्टोन आइडेंटिफिकेशन

डिग्री कोर्सेस

  • बीएससी इन ज्वेलरी डिज़ाइन
  • बैचलर ऑफ ज्वेलरी डिज़ाइन
  • बैचलर ऑफ एक्सेसरीज़ डिज़ाइन
  • मास्टर्स डिप्लोमा इन ज्वेलरी डिज़ाइन एंड टेक्नोलॉजी

डिप्लोमा कोर्सेस

  • डिप्लोमा इन ज्वेलरी डिज़ाइन एंड जैमोलॉजी
  • एडवांस ज्वेलरी डिज़ाइन विद कैड
  • ज्वेलरी मैनुफैक्चरिंग

कोर्स के दौरान
तेज़ी से बढ़ते इस क्षेत्र की डिमांड लोगों को इसमें करियर बनाने के लिए आकर्षित कर रही है. ज्वेलरी डिज़ाइन कोर्स के दौरान अलग-अलग पत्थरों, ज्वेलरी बनाने में कलर कॉम्बिनेशन, डिज़ाइन थीम, प्रेज़ेंटेशन, फ्रेमिंग, कॉस्ट्म ज्वेलरी आदि सिखाया जाता है.

तकनीकी शिक्षा
ज्वेलरी डिज़ाइन कोर्स के दौरान कम्प्यूटर एडेड ज्वेलरी सॉफ्टवेयर, जैसे- ज्वेल कैड, ऑटो कैड, 3 डी स्टूडियो आदि के बारे में टेक्निकल नॉलेज भी दिया जाता है. इसके साथ ही फोटोशॉप, कोरल ड्रॉ, वेट एंड मेटल कम्पोजिशन के बारे में भी बताया जाता है.

प्रमुख संस्थान

  •  जैमोलॉजी इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, मुंबई.
  • सेंट जेवियर्स कॉलेज, मुंबई.
  •  जैमस्टोन्स आर्टिसन्स ट्रेनिंग स्कूल, जयपुर.
  • इंडियन जैमोलॉजी इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली.
  • जैम एंड ज्वेलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल, जयपुर.
  • नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी, नई दिल्ली.
  • ज्वेलरी डिज़ाइन एंड टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट, नोएडा.
  • एसएनडीटी यूनिवर्सिटी, मुंबई.

पर्सनल स्किल 
ज्वेलरी डिज़ाइन में करियर बनाने के लिए सबसे पहले इस क्षेत्र के प्रति लगाव और ज्वेलरी डिज़ाइन का सेंस होना बहुत ज़रूरी है. इसके साथ ही क्रिएटिव, कल्पनाशील, न्यू ट्रेंड का सेंस, फैशन सेंस आदि के साथ मेहनती होना बहुत आवश्यक है. ज्वेलरी डिज़ाइन में करियर बनाने की सोच रहे हैं, तो धैर्य को अपना साथी बना लें. इस काम में ईमानदारी भी बहुत ज़रूरी होती है. ख़ासतौर पर अगर आप किसी गोल्ड, डायमंड जैसी धातुओं से ज्वेलरी बनाने में लगे हैं, तो थोड़ी सी भी लापरवाही आपके व्यक्तित्व पर प्रश्‍न चिह्न लगा सकती है. ग्लोबल मार्केट और फैशन के प्रति रुचि होना बहुत ज़रूरी है.

रोज़गार के अवसर
ज्वेलरी डिज़ाइन में आगे बढ़ने के लिए बहुत स्कोप है. कोर्स करने के बाद आप फुल टाइम किसी कंपनी के साथ जुड़कर काम शुरु कर सकते हैं. ज्वेलरी डिज़ाइन हाउस, एक्सपोर्ट हाउस, फैशन हाउस आदि जगहों पर आप काम शुरु कर सकते हैं. इसके साथ ही अगर आप आर्थिक रूप से मज़बूत हैं, तो ऑफिस-कम होम से भी काम शुरु कर सकते हैं. घर से काम शुरु करने के कई फ़ायदे होते हैं. घर के काम के अलावा आप अपने करियर को भी संवार सकते हैं. इतना ही नहीं दिन में किसी ऑफिस में काम करके आप घर पर पार्ट टाइम इस काम को जारी रख सकते हैं. आप अगर किसी कंपनी से फुल टाइम नहीं जुड़ना चाहते तो फ्रीलांस के तौर पर काम शुरू कर सकते हैं. इससे आप मनमुताबिक़ पैसा कमा सकते हैं.

सैलरी
पढ़ाई के तुरंत बाद किसी कंपनी में जॉब लगने पर शुरुआत में 7 से 8 हज़ार रुपए प्रति माह आप कमा सकते हैं. अनुभव के साथ इस क्षेत्र में आप उम्मीद से ज़्यादा कमा सकते हैं. अनुभव होने पर 18 से 20 और फिर इसी तरह आगे बढ़ते रहते हैं. प्रसिद्ध ज्वेलरी डिज़ाइनर महीने का लाख रुपए भी लेते हैं.

टॉप कंपनी
ज्वेलरी डिज़ाइन का कोर्स करने के बाद आप नौकरी के लिए इन जगहों पर जा सकते हैं.

  •  तनिष्क
  •  गिली
  • नक्षत्र
  •  ज्वेलरी मेकिंग एंड डिज़ाइनिंग यूनिट्स
  • ज्वेलरी शॉप्स एंड शोरूम
  •  एंटीक एंड आर्ट ऑक्शन हाउसेस

– श्वेता सिंह 

न्यू जॉब जॉइन करने से पहले ख़ुद से करें कुछ सवाल (Make Yourself Some Questions Before Joining New Job )

joining New Job

 

Questions Before Joining New Job

अच्छी लाइफस्टाइल जीने के लिए आर्थिक मज़बूती बहुत ज़रूरी है. ऐसे में कई बार जॉब जाने की परेशानी का सामना भी आपको करना पड़ता है. बेरोज़गार होने और आर्थिक दिक्क़तों के चलते कोई भी नौकरी करने से पहले अच्छी तरह से उसके बारे में सोचें और ख़ुद से उस नौकरी से जुड़ी इन बातों को पूछें.

पर्सनल वैल्यूज़
आर्थिक तंगी के चलते पार्ट टाइम जॉब के लिए आप कुछ भी कर सकते हैं, लेकिन फुल टाइम जॉब के लिए आप उसी फर्म को चुनें, जो आपके व्यक्तित्व से मेल खाता हो. ऐसे फर्म को कभी वरियता न दें, जो आपके इंटरेस्ट से मेल न खाता हो और जहां पर ख़ुद आपकी कोई इज़्ज़त न हो. भले ही सैलरी बहुत अच्छी क्यों न हो, लेकिन इस तरह के फर्म में आप ज़्यादा दिन तक काम नहीं कर पाएंगे. बेहतर होगा पहले अपने आप से इस बारे में पूछें फिर कोई निर्णय लें.

कंपनी की रेपोटेशन
स़िर्फ पैसों के लिए किसी भी कंपनी में काम करना भविष्य में बुरा साबित हो सकता है. जिस भी कंपनी से आपको ऑफर लेटर आया है, सबसे पहले उसके बारे में अच्छी तरह से जांच-पड़ताल कर लें. मार्केट में उस कंपनी के बारे में लोगों का क्या कहना है, ये भी आपके लिए बहुत महत्व रखता है. अपनी सीवी को मज़बूत करने और ख़ुद की इज़्ज़त का ख़्याल करते हुए बेस्ट कंपनी का चुनाव करें.

भविष्य का ख़्याल
किसी भी कंपनी में जॉब के लिए आवेदन देने से पहले अपने भविष्य का ख़्याल ज़रूर रखें. अपने लक्ष्य को दिमाग़ में रखकर ही आगे बढ़ें. लॉन्ग टर्म के लिए अगर कंपनी आपके लिए उपयुक्त नहीं रहेगी और आप अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाएंगे, तो बेहतर होगा कि कुछ समय और इंतज़ार करें और दूसरी नौकरी की
तलाश करें.

वर्कप्लेस का माहौल
दिन के आठ घंटे जहां आप काम करेंगे उसका माहौल आपके अनुसार न होने पर बहुत जल्द ही काम में मन नहीं लगता और आप नई जॉब की तलाश में लग जाते हैं. नई नौकरी जॉइन करने से पहले वहां काम करनेवालों से ऑफिस के अंदर के माहौल के बारे में पता लगाएं. सब कुछ जानने के बाद ख़ुद ही तय करें कि क्या ऐसे माहौल में आप काम कर पाएंगे?

कैसा है बॉस?
बॉस का असर आपके काम पर बहुत पड़ता है. एक अच्छे बॉस के होने से आपका काम करने में मन लगता है और इसका फ़ायदा आपके साथ आपकी कंपनी को भी होता है, लेकिन बॉस के सही न होने से कई तरह की समस्याओं से गुज़रना पड़ता है. काम का अनियमित समय, एक्स्ट्रा प्रेशर, टारगेट और मेंटल टॉर्चर जैसी कई परेशानियों के चलते प्रायः लोग जॉब छोड़ देते हैं.

सैलरी
किसी भी तरह की नौकरी करने का सबसे मुख्य कारण है कि उससे आपकी आमदनी हो. महीने के आख़िर में आपको कुछ पैसे मिल जाएं, जिससे आपकी ज़रूरतें आसानी से पूरी हो जाएं और भविष्य के लिए कुछ बचत भी कर लें. इसलिए इंटरव्यू देने के बाद और ज्वाइन करने से पहले ख़ुद से एक बार पूछें कि क्या इतनी सैलरी आपके लिए उपयुक्त होगी या फिर इस नौकरी के साथ आपको कहीं और भी कुछ करना पड़ेगा? पूरी तरह से संतुष्ट होने के बाद ही आगे बढ़ें.

घर से कंपनी की दूरी
कहीं भी जॉब ज्वाइन करने से पहले अमूमन दिमाग़ में ये बात ज़रूर आती है कि रोज़ाना घर से ऑफिस पहुंचने में कितना समय लगेगा. नई नौकरी का ऑफर लेटर हाथ में लेने से पहले आप ये सुनिश्‍चित कर लें कि क्या प्रतिदिन आप इतनी दूरी तय कर पाएंगे, क्या आसानी से और सही समय पर आप प्रतिदिन ऑफिस पहुंच पाएंगे, इस नौकरी को करने में कहीं ट्रैवलिंग में ही आपका बहुत पैसा तो नहीं लग जाएगा जैसी आदि बातों को पहले ही अपने दिमाग़ में सोच लें फिर आगे बढ़ें.

अपनी पसंद
अपनी पसंद का खाना न होने पर जब आप नहीं खाते, तो नौकरी बिना पसंद की कैसे कर सकते हैं. घर की माली हालत ठीक न होने पर भले ही मजबूरी में आप नई नौकरी के लिए हां कर दें, लेकिन कुछ ही समय के बाद आपका वहां मन नहीं लगेगा. इसलिए नई नौकरी के लिए हां करने से पहले एक नहीं, बल्कि सौ बार सोचें फिर हां करें, क्योंकि बार-बार जॉब बदलने से आपकी सीवी कमज़ोर हो जाती है और लोगों में आपकी ग़लत छवि जाती है.

आपकी क्षमता
आप कितने पानी में खड़े हैं, इसकी जानकारी होना बहुत ज़रूरी है. दूसरों के कहने और उनकी ज़ोर-ज़बर्दस्ती से बिना सोचे ही किसी भी तरह के काम को हां न करें. हर इंसान की अपनी व्यक्तिगत क्षमता होती है उससे अधिक काम होने पर तनाव होता है और फिर धीरे-धीरे सेहत बिगड़ने लगती है. इंटरव्यू टेबल पर बैठते ही आप वहां के काम और टार्गेट के बारे में जानना न भूलें.

प्राथमिकता का रखें ख़्याल
अपनी प्राथमिकता को देखते हुए सही जॉब की तलाश करना आपकी ज़िम्मेदारी है. कई बार जॉब संतुष्टि से ज़्यादा पैसों की ज़रूरत ज़्यादा होती है. ऐसे में अगर सैलरी को दिमाग़ में रखकर जॉब सिलेक्शन कर रहे हैं, तो कोई बुरी बात नहीं है.

– श्वेता सिंह 

कैसे सुलझाएं लाइफस्टाइल संबंधी सेक्स प्रॉब्लम्स? (How to Fix Lifestyle Related Sex Problems?)

Sex Problems

Sex Problems

बढ़ते तनाव से इच्छा में कमी

कुछ लोगों का मानना है कि अधिक स्ट्रेस की स्थिति से सेक्सुअल डिज़ायर में कमी आती है, लेकिन यह बात पूरी सच नहीं है. काम का बोझ, बॉस की झिड़की, प्रेज़ेंटेशन का प्रेशर और काम के बढ़ते घंटे तनाव को काफ़ी बढ़ा देते हैं और तनाव को सेक्सुअल डिज़ायर में कमी का कारण मान लिया जाता है. इससे पार्टनर के बीच ग़लतफ़हमी की दीवार खड़ी हो जाती है. उन्हें लगता है कि उनका पार्टनर अब पहले की तरह उनसे प्यार नहीं करता और न ही पार्टनर की उनमें कोई दिलचस्पी है. बस, इसी बात पर झगड़े शुरू हो जाते हैं और इन सबका परिणाम ये होता है कि पुरुष अपनी सेक्सुअल पावर पर ही शक करने लगते हैं, जिससे बात और बिगड़ जाती है.

समाधान- वैवाहिक जीवन में सेक्सुअल डिज़ायर में कमी के पड़ाव आते-जाते रहते हैं, अतः इसके लिए तनाव को पूरी तरह दोषी नहीं माना जा सकता. तनाव के अलावा बिज़ी लाइफस्टाइल और खानपान की ग़लत आदतें भी सेक्स लाइफ पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं. इसके अलावा कम्यूनिकेशन गैप भी दिलों के बीच दूरियां बढ़ा देता है. इसलिए पार्टनर के साथ कम से कम उन बातों को ज़रूर शेयर करें, जो आपको परेशान कर रही हैं. इससे तनाव कम होगा और आप रिलैक्स महसूस करेंगे. फिर भी यदि लगे कि स्ट्रेस सेक्सुअल लाइफ पर हावी हो रहा है, तो काउंसलर या सेक्स थेरेपिस्ट की सलाह लें.

हार्मोंस का असंतुलन

लोगों का यह सोचना कि महिलाओं के मूड और सेक्स की इच्छा के लिए हार्मोंस असंतुलन ही ज़िम्मेदार हैं, पूरी तरह सच नहीं है.

समाधान- आपसी झगड़े, मन-मुटाव, कम्यूनिकेशन गैप आदि भी इसके कारण हो सकते हैं. सेक्सुअल डिज़ायर की कमी की मुख्य वजह नींद पूरी न होना भी हो सकती है. हर व्यक्ति को कम से कम 6 से 7 घंटे सोना चाहिए. इसके अलावा हमारा मानसिक स्वास्थ्य, ग़लत खानपान और थकान भी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं. महिलाओं में सेक्स की इच्छा इस बात पर निर्भर करती है कि उनके अपने पार्टनर के साथ संबंध कैसे हैं? जो महिलाएं हीनभावना या नकारात्मक सोच की शिकार होती हैं, उनमें सेक्स की इच्छा कम होती है. अतः यह पुरुष पार्टनर की ज़िम्मेदारी बनती है कि उनकी नकारात्मक सोच को बदलें, उनका आत्मविश्‍वास बढ़ाएं, इसके लिए उन्हें खुलकर बातचीत करनी चाहिए, ताकि वैवाहिक संबंध मधुर बने रहें.

हमेशा दवाइयों का इस्तेमाल

लोगों का मानना है कि दवाइयों के प्रयोग से सेक्सुअल डिज़ायर की कमी को दूर किया जा सकता है, लेकिन दवाइयों को हमेशा अंतिम विकल्प के रूप में रखा जाना चाहिए, क्योंकि कई बार इनका उल्टा असर भी होता है.

समाधान- सबसे पहले समस्या की जड़ तक जाएं और उसे दूर करने की कोशिश करें. कई बार समझाने से ही समस्या हल हो जाती है. आज की वर्किंग वुमन को पर्सनल और प्रोफेशनल लेवल पर ख़ुद को साबित करना पड़ता है. ऑफिस में बॉस और काम का टेंशन, घर में बच्चों को संभालना व गृहस्थी की ज़िम्मेदारी, इन सबको बैलेंस करते-करते वो इतनी थक जाती है कि सेक्स की इच्छा कहीं दबकर रह जाती है. ऐसे में पार्टनर यदि थोड़ी-बहुत ज़िम्मेदारी उठाए और ढेर सारा प्यार दे, तो समस्या आसानी से सुलझ सकती है. हां, इसके लिए धैर्य रखना ज़रूरी है.

इमोशनल इंटीमेसी

इमोशनल इंटीमेसी शेयर करनेवाले कपल्स ख़ुद को सेफ महसूस करते हैं, पर यह इमोशनल इंटीमेसी कई बार इतनी बढ़ जाती है कि न तो उन्हें सेक्स की ज़रूरत महसूस होती है और न ही सेक्स की इच्छा होती है. सेक्सुअल डिज़ायर की कमी के कारण वे सेक्स लाइफ को ठीक से एंजॉय नहीं कर पाते. उनके लिए सेक्स बस एक रूटीन बनकर रह जाता है.

समाधान- ऐसा न हो इसके लिए पार्टनर के साथ सेक्सी व रोमांटिक बातें करें, बेडरूम का माहौल रूमानी बनाएं, लाइट म्यूज़िक, कैंडल्स की हल्की रोशनी और सेक्सी ड्रेस पहनकर पार्टनर को इंप्रेस करें. सेक्सुअल लाइफ को रिचार्ज करने के लिए कुछ दिनों के लिए घर से दूर किसी रोमांटिक जगह पर कुछ पल साथ बिताएं.

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एक की इच्छा, दूसरे की नहीं

कभी-कभी ऐसा भी होता है कि एक पार्टनर की सेक्स की इच्छा होती है और दूसरा नहीं चाहता है. इसे सेक्सुअल डिज़ायर की कमी मान लिया जाता है. धीरे-धीरे यही प्रवृत्ति गंभीर बन जाती है.

समाधान- यह बिल्कुल सामान्य समस्या है. अक्सर कई पुरुष अन्य तरी़के, जैसे- गिफ्ट देकर या मीठी-मीठी बातें करके पार्टनर का दिल बहलाने की कोशिश करते हैं, लेकिन ऐसा करते समय वे यह बात भूल जाते हैं कि महिलाएं गिफ्ट से ज़्यादा प्यार करने, बांहों में लेने और किस करने से ख़ुश होती हैं. वे पार्टनर का स्पर्श चाहती हैं, क्योंकि यही स्पर्श उन्हें प्यार का एहसास कराता है. अतः इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि अन्य किसी भी तरी़के से जताया गया प्यार फिज़िकल क्लोजनेस का पर्याय नहीं हो सकता. यदि सेक्स की इच्छा में कमी या सेक्स संबंधी कोई समस्या हो, तो उसे छुपाने की बजाय पार्टनर से इस बारे में खुलकर बात करें. इससे आप दोनों के बीच ग़लतफ़हमी नहीं होगी और आपके संबंध मधुर बने रहेंगे. यदि समस्या गहरी हो, तो डॉक्टर की सलाह लें.

प्यार में कमी

ऐसा माना जाता है कि एक पार्टनर की सेक्सुअल डिज़ायर में कमी से दूसरे पार्टनर का उसके प्रति प्यार कम होता जाता है.

समाधान- यह केवल वहम है. ऐसा कुछ भी नहीं होता. समस्या से निपटने के लिए सबसे पहले तो यह पता लगाएं कि सेक्स की इच्छा में कमी का क्या कारण है? महिलाएं शादी के कुछ सालों बाद या बच्चे के जन्म के बाद अक्सर मोटी हो जाती हैं, जिससे उनका आत्मविश्‍वास कम हो जाता है. उन्हें लगता है कि अब उनकी बॉडी सेक्सी नहीं रही. उनका बेडौल शरीर देखकर पार्टनर क्या सोचेगा? यही नकारात्मक सोच उनकी सेक्स में दिलचस्पी कम कर देता है. कई बार मोटापे के कारण पुरुषों को भी संबंध बनाने में परेशानी होती है. डायट और नियमित एक्सरसाइज़ से मोटापे को कंट्रोल किया जा सकता है. नकारात्मक विचारों को दूर करने के लिए साइकोसेक्सुअल थेरेपिस्ट या काउंसलर की सलाह ली जा सकती है.

नशे का सहारा लेना

सेक्सुअल डिज़ायर को बढ़ाने के लिए लोग अल्कोहल, सिगरेट आदि का सेवन करते हैं. ऐसे लोगों की मान्यता है कि इससे सेक्स पावर बढ़ती है.

समाधान- यह बिल्कुल ग़लत है. वैसे भी पुरुष सेक्स को बहुत महत्व देते हैं. यदि उनकी सेक्सुअल डिज़ायर में कमी आती है, तो वे परेशान हो जाते हैं और मूड बनाने के लिए कई बार नशे का सहारा लेते हैं, जिससे शरीर में कई बदलाव आते हैं और इसका असर सेक्स लाइफ पर भी पड़ता है. सिगरेट में कई प्रकार के विषैले पदार्थ होते हैं, जो नपुंसकता पैदा करते हैं. इसी तरह अल्कोहल के सेवन से भी डिज़ायर में कमी आती है, लेकिन इन तथ्यों को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है. यदि आप भी हेल्दी सेक्स लाइफ चाहते हैं, तो अल्कोहल और सिगरेट से दूर रहें.

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