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आख़िर क्यों बनते हैं अमर्यादित रिश्ते? (Why Do We Have Immoral Relationships In Our Society?)

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हर रिश्ते की अपनी एक मर्यादा होती है, पर जब कोई रिश्ते की मर्यादा को लांघ देता है और उस रिश्ते को तार-तार कर देता है, तो ऐसे रिश्ते अपनी गरिमा को ही नहीं, विश्‍वास को भी खो बैठते हैैं. आख़िर क्यों बन जाते हैं ऐसे अमर्यादित रिश्ते (Extramarital Affairs)? आइए जानते हैं.में आए दिन अख़बार-टीवी पर पढ़ने-देखने को मिलते हैं कि भाभी-देवर के अनैतिक रिश्ते… अपनी ही भतीजी के साथ चाचा के संबंध… दामाद ने सास के साथ भागकर शादी कर ली… ससुर बहू के साथ बरसों से रिलेशन में है… भतीजे-बुआ समाज को दरकिनार कर लीव इन में रह रहे हैं… ऐसे में दिल में यही ख़्याल आता है कि कहां जा रहा है समाज…? क्या भाई-बहन, माता-पिता के पवित्र रिश्ते भी बेमानी होते जा रहे हैं? ऐसे कई सवाल मन में उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं. इस सिलसिले में हमने सायकोलॉजिस्ट परमिंदर निज्जर से बात की. आइए, इस पर एक नज़र डालते हैं. उनके अनुसार, रिश्तों के कलंकित होने का कोई एक कारण नहीं होता, बल्कि बहुत-सी छोटी-छोटी बातें होती हैं, जो सोसायटी में ऐसे रिश्ते को जन्म देती हैं.

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– फास्ट लाइफ इसका सबसे बड़ा कारण है. जहां हर कोई सब कुछ जल्दी और शॉर्टकट में चाह रहा है. ऐसे में सही-ग़लत के बारे में सोचने का वक़्त ही नहीं मिलता.

– इट्स माई लाइफ का फंडा भी लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है. हर कोई अपनी ज़िंदगी को अपने हिसाब से ही जीना चाहता है, जिसमें उसे किसी भी तरह की दख़लअंदाज़ी पसंद नहीं.

– कई केसेस में देखा गया है कि वे क़रीबी रिश्ते, जो अमर्यादित क़दम उठाते हैं, उनकी वजह उस शख़्स से गहरे तौर पर प्रभावित होना भी है.

– जैसे चाचा को अपनी भतीजी में वे सभी ख़ूबियां दिखाई देती हैं, जो जीवनसाथी में चाहिए होती हैं. और जब वो ख़ासियत कहीं नहीं मिलतीं, तो वे इस रिश्ते में ही बंधकर आगे बढ़ने से नहीं हिचकिचाते.

– बचपन से लड़की ही नहीं, लड़कों के भी अपने रोल मॉडल होते हैं. जब वो उन्हें अपनी सास, चाची, बुआ आदि में दिखते हैं. तब वे सब ऊंच-नीच की परवाह किए बगैर इस रिश्ते को थाम लेते हैं.

– संयुक्त परिवार का टूटना भी इन रिश्तों के पनपने का बड़ा कारण है, क्योंकि जब सब साथ रहते थे, तब हर रिश्ते में अपनापन, संस्कार, उसकी मर्यादा का निर्वाह बचपन से ही होता था. तब ऐसी ग़लती कम ही होती थी.

– पैरेंट्स की बिज़ी लाइफ भी ऐसे रिश्ते के लिए माहौल प्रदान करती है. उस पर पति-पत्नी दोनों ही अति व्यस्त व कामकाजी हैं, तो वे बच्चों को बहुत कम समय ही दे पाते हैं, जिससे उनके भटकने और बिगड़ने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं.

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रिश्तों की अहमियत को समझें…

– हम चाहे कितने भी मॉडर्न हो जाएं, पर हर रिश्ते की मर्यादा और मापदंड ज्यों का त्यों बना रहेगा. इस बात को समझें और हर रिश्ते को सम्मान दें.

– अरेंज मैरिज हो या लव मैरिज उसकी अपनी ख़ूबसूरती व सामाजिक स्वीकृति होती है. इससे अलग रिश्ते ग़लत ही होते हैं.ू

– अमर्यादित रिश्ते न जाने कितने डर, शंका-आशंका, अस्थिरता को पैदा करते हैं.

– सामाजिक बहिष्कार और अपनों से दूरियां जीवन को हाशिए पर ले आती हैं.

– ऐसे रिश्तों का अंत अक्सर आत्महत्या, हत्या या फिर मानसिक विक्षिप्तता के रूप में होता है.

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दूर रहना ही समाधान…

– तमाम केसेस को देखते हुए मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसे रिश्ते से दूर रहना ही इसका समाधान है.  ू

– यूं तो जीवन में हर किसी के क़दम कभी न कभी डगमगाते ही हैं, पर ऐसे समय में अपनों का साथ, सही काउंसलिंग, धैर्य आदि द्वारा इससे उबरा जा सकता है.

– जब कभी आपको लगे कि आप किसी अमर्यादित रिश्ते की तरफ़ झुक रहे हैं, तब आत्मविश्‍लेषण करें.

– अपने रिश्ते को रिवाइव करें. पार्टनर के साथ कुछ दिन के लिए कहीं घूमने निकल जाएं.

– शादी के दिनों को, जीवनसाथी के साथ बिताए ख़ूबसूरत लम्हों को तरोताज़ा करें.

– पार्टनर से दूर होने के कारणों को ढूंढ़ें और उन्हें सुलझाने की कोशिश करें.

– अपने किसी ख़ास दोस्त/सहेली से सलाह लें. अपनी दुविधा को बताएं.

– रिश्ते जीने का संबल होने चाहिए, न कि हर पल डर व हीनभावना का कारण.

– ख़ुद को अपने किसी शौक़ में इन्वॉल्व करें.

– आपके रिश्ते आपके बच्चों और बड़ों के लिए रोल मॉडल की तरह होते हैं. ये बात हमेशा याद रखें.

– घर-परिवार, बच्चे से जुड़ी अपनी ज़िम्मेदारियों को नए सिरे से उठाएं और ख़ुद को उनसे जुड़े रहने के लिए प्रोत्साहित करें.

– आंकड़ों के अनुसार, अमर्यादित रिश्तों का आकर्षण बस जुनून या फिर एक निश्‍चित सीमा तक रहता है. जब वो हैंगओवर उतरता है, तब सिवाय दुख, क्षोभ, पछतावे के कुछ नहीं रहता.

– ऊषा गुप्ता

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लिव इन रिलेशनशिप- रिश्तों की नई परिभाषा

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बदलते व़क्त के साथ समाज और रिश्तों की परिभाषा भी बदल गई है. ख़ासकर बड़े शहरों में लिव इन रिलेशन का कॉन्सेप्ट युवाओं को बहुत भा रहा है, मगर ऐसे रिश्तों का अंत सुखद ही हो ज़रूरी नहीं है. पति-पत्नी के रिश्तों की नई परिभाषा गढ़ते लिव इन रिलेशनशिप से जुड़े अहम् पहलुओं की पड़ताल करती पेश है हमारी ख़ास रिपोर्ट.

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने लिव इन संबंधों को स्वीकृति दे दी है यानी दो वयस्क(स्त्री-पुरुष) अपनी मर्ज़ी से लिव इन में रह रहे हैं, तो इसे अपराध नहीं माना जाएगा. लिव इन की वकालत करने वालों के लिए ये राहत की ख़बर है, मगर क्या हमारे समाज ने वाक़ई तहे दिल से ऐसे रिश्तों को स्वीकृति दी है? क्या आज कोई युवा बरेली, कानपुर, पटना, बीकानेर जैसे छोटे शहरों में इस तरह किसी के साथ रहने की हिम्मत जुटा पाता है? क्या आपने अपने आसपास, अपने पड़ोस में या सोसाइटी में ऐसे ढेरों कपल्स देखे हैं? शायद नहीं… क्योंकि लिव इन को मान्यता स़िर्फ बड़े शहरों में ही मिली है. ये वहीं खुलकर फल-फूल रहा है. छोटे शहरों या गांवों में इस कॉन्सेप्ट को खुली स्वीकृति नहीं मिली है. यदि कोई ऐसे रिश्ते में रह भी रहा है, तो इसे स्वीकार करने की हिम्मत नहीं रखता. इन सबके बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पिछले कुछ सालों में समाज के एक ख़ास वर्ग ने ऐसे रिश्ते को स्वीकार कर लिया है और ये युवाओं के बीच ख़ासा लोकप्रिय भी हो रहा है.

क्यों भा रहा है लिव इन का कॉन्सेप्ट?
छोटे शहरों व कस्बों से करियर बनाने के लिए बड़े शहरों का रुख़ करने वाले युवाओं के लिए नए शहर में आशियाने की तलाश बहुत मुश्किल और महंगा सौदा साबित होता है. कई बार तो लोग बैचलर्स को फ्लैट देने में भी आनाकानी करते हैं. ऐसे में कोई पार्टनर मिल जाने पर उनका न स़िर्फ आर्थिक बोझ हल्का हो जाता है, बल्कि बैचलर होने के कारण आने वाली परेशानी भी दूर हो जाती है, साथ ही अनजान शहर में कोई साथी मिल जाने से दिल को सुकून मिलता है.
अभिनेता सुशांत सिंह कहते हैं, “जब मैं फिल्मों में करियर बनाने मुंबई आया, तो मोलिना भी मेरे बिना नहीं रह सकी और वो दिल्ली से मुंबई आ गई. मुझे और मोलिना को एकसाथ इसलिए रहना पड़ा, क्योंकि हमारे पास इतने पैसे नहीं थे कि हम दो अलग-अलग कमरों का किराया दे सकें. जब मैं और मोलिना साथ रहते थे, तब लिव इन रिलेशनशिप का चलन बहुत कम था. मेरे घरवालों ने इस पर न तो आपत्ति जताई और न ही कभी इसे खुले मन से स्वीकार किया. हां, मोलिना ने अपने घर पर ये बताया था कि वो अकेली रहती है. साथ रहने का नतीजा ये हुआ कि मकान मालिक ने हमें घुमा-फिराकर घर खाली करने को कह दिया. नया घर ढूंढ़ने में हमें बहुत दिक्क़त हुई. हम मकान मालिक से कहते थे कि मोलिना मेरे दोस्त की बहन है. आख़िरकार हमें शादी करनी ही पड़ी.” लिव इन रिश्ते में आप किसी के साथ जीवनसाथी की तरह रहते हुए भी अपने तरी़के से अपनी मर्ज़ी से ज़िंदगी जी सकते हैं. वुमन प्लानेट फाउंडेशन की फाउंडर व सोशल एक्टिविस्ट स्वाति वखारिया कहती हैं, “दरअसल, हर इंसान की ज़िंदगी और रिश्ते के प्रति अपने अलग विचार होते हैं. कुछ लोगों को लगता है कि साथ रहने के लिए शादी की फॉर्मैलिटी की ज़रूरत नहीं है. उन्हें लगता है कि कमिटमेंट दिल की गहराई से होना चाहिए. स़िर्फ रस्मों-रिवाज़ों में बंधे होने के कारण वो किसी के साथ न रहें, बल्कि इसलिए रहें, क्योंकि दोनों दिल से एक-दूसरे के साथ रहना चाहते हैं.”

स़िर्फ शारीरिक नहीं, भावनात्मक रिश्ता भी
लिव इन में रहने वाले कपल्स पति-पत्नी के पारंपरिक रिश्ते से इतर हर काम मिल-बांटकर करते हैं, यहां पुरुष घर का मुखिया नहीं होता, बल्कि दोनों की अहमियत बराबर होती है. पिछले क़रीब 15 सालों से लिव इन में रहने वाली रूपाली (परिवर्तित नाम) कॉलेज टाइम से ही अपने प्रोफेसर से प्यार करती थी, प्रोफेसर भी उसे पसंद करते थे, मगर जब रूपाली ने शादी के लिए कहा तो प्रोफेसर ने ये कहकर इनकार कर दिया कि उन्होंने अपने कई दोस्तों की शादी टूटते देखी है, इसलिए वो इस पर विश्‍वास नहीं करते. उधर रूपाली के घरवालों ने जबरन उसकी शादी करवा दी. रूपाली मुश्किल से 7-8 महीने ही अपने पति के साथ रही. फिर पति से तलाक़ लेकर वो प्रोफेसर के साथ लिव इन में रहने लगी. एक अच्छे दोस्त की तरह दोनों एक-दूसरे को भावनात्मक सहयोग देने के साथ ही हर बात शेयर करते हैं. अपने इस रिश्ते से दोनों संतुष्ट और ख़ुश हैं. मुंबई के मनोज वशिष्ठ कहते हैं, “हम जब भी लिव इन की बात करते हैं तो सबसे पहले दिमाग़ में प्रीमैरिटल सेक्स की ही बात आती है, जबकि ये रिश्ता इससे कहीं ज़्यादा है. ऐसे रिलेशनशिप स़िर्फ एक-दूसरे के साथ फिज़िकल होना नहीं है. इसमें ज़िम्मेदारी, साथ और शादी के पहले एक-दूसरे को समझने का मौक़ा देना है, जिससे शादी की मुश्किलें कम हो जाएं. स़िर्फ मज़े (फन) और शारीरिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए साथ रहना उचित नहीं है. इसके साथ की ज़िम्मेदारियों को भी स्वीकार करना ज़रूरी है.”

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खुलकर नहीं आते सामने
कॉर्पोरेट सेक्टर से जुड़ी पूजा (परिवर्तित नाम) पिछले 3 साल से अपने बॉयफ्रेंड, जो एक फ्रीलांस राइटर हैं, के साथ लिव इन में रह रही हैं. पूजा के साथ उसके बॉयफ्रेंड के अलावा 2 लोग और रहते हैं, क्योंकि इनकी आमदनी इतनी नहीं है कि मुंबई जैसे शहर में अकेले कमरे का किराया अफोर्ड कर सकें. पूजा और उसका बॉयफ्रेंड एक कमरे में रहते हैं और बाकी दोस्त हॉल में. इन दोनों ने अपने रिश्ते के बारे में घरवालों से अभी तक कुछ नहीं कहा है यानी इनके परिवार को नहीं पता कि उनके बच्चे लिव इन में रह रहे हैं. दोनों फिलहाल शादी के बारे में सोच तो रहे हैं, मगर करेंगे या नहीं, पता नहीं. एक मीडिया हाउस से जुड़ी साधना तिवारी कहती हैं, “हमारे पड़ोस में एक लड़की रहती थी, जो एक प्रतिष्ठित बैंक में कार्यरत थी. वो यहां अकेले ही रहती थी, मगर मैंने अक्सर उसके घर में एक लड़के को आते देखा और देखा क्या हमेशा वो यहीं रहता था, मगर वो लड़की कहती थी कि वो उसका दोस्त है और पास में ही रहता है. हालांकि सच तो ये था कि दोनों लिव इन में थे, वैसे अब दोनों ने शादी कर ली है. जहां तक मुझे लगता है, कोई पैरेंट्स अपनी बेटी को ऐसे रिश्ते में जाने की इजाज़त नहीं देंगे. कुछ अपवादों को छोड़ दें तो ऐसे रिलेशनशिप में रहने वाली अधिकांश लड़कियां घरवालों से झूठ ही बोलती हैं.”

सामाजिक स्वीकृति- आसान नहीं है राह
पेशे से शिक्षक धीरज के मुताबिक़, “भले ही हम ख़ुद को कितना भी आधुनिक मान लें, मगर ऐसे रिश्ते को हमारा समाज अब भी पचा नहीं पा रहा है. इसे पश्‍चिमी देशों जैसी सामाजिक स्वीकृति मिलना बहुत दूर की कौड़ी लगती है. रिश्ते के टेस्ट-ट्रायल का जो विचार लिव इन से जुड़ा है, मैं उससे सहमत नहीं हूं. किसी के साथ कुछ दिन रहने के बाद यदि सही जीवनसाथी की तलाश करना संभव होता, तो लव मैरिज फेल नहीं होती. लव मैरिज में एक-दूसरे को सालों तक जानने के बाद भी शादी की परिणति तलाक़ के रूप में ही होती है.” सुशांत सिंह के मुताबिक़, “लिव इन को लेकर बड़े शहरों में स्थिति बेहतर है. इसकी वजह ये है कि लोगों के पास एक-दूसरे की ज़िंदगी में झांकने का टाइम नहीं है. साथ ही अब इस बारे में सुनने की लोगों को आदत हो गई है. हां, छोटे शहरों में अब भी लोग ऐसे रिश्तों को पचा नहीं पाते.” सच्चाई यही है कि हमारे समाज में भले ही लोग ऐसे रिश्ते में रहेंगे, मगर इसे खुले तौर पर स्वीकृति मिलने में लंबा व़क्त लग सकता है. इस मामले में दिल्ली के सोशल एक्टिविस्ट नितिन लता वमन के विचार थोड़े अलग हैं. उनके मुताबिक़, “धीरे-धीरे ही सही, अब स्त्रियों के अलग अस्तित्व को मान्यता मिलने लगी है. लिव इन रिलेशन इसी प्रक्रिया का एक हिस्सा है. जैसे-जैसे हमारा समाज विकसित होता जाएगा. इस तरह के कई क्रांतिकारी अधिकारों को मान्यता देनी पड़ेगी. क़ानूनी मान्यता सामाजिक मान्यता पाने का पहला क़दम है. देर-सबेर वो भी मिल जाएगी. हालांकि इसमें कई जटिलताएं भी हैं.”

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सोच समझकर करें फैसला
अंग्रेज़ी दैनिक से जुड़ी चित्रा सावंत कहती हैं, “यदि कोई महिला लिव इन में रहने का फैसला करती है, तो उसे पार्टनर का चुनाव बहुत सोच-समझकर करना चाहिए. मैंने ऐसे कई कपल्स को देखा है, जो सालों साथ रहने के बाद शादी के बंधन में बंध गए हैं. महिलाएं मैच्योर हैं, उन्हें स़िर्फ किसी से अट्रैक्ट या इमोशनली अटैच होने के कारण ही ये फैसला नहीं करना चाहिए, बल्कि सोशल व फायनांशियल सिक्युरिटी भी देखनी चाहिए. साथ ही वो क्या चाहती हैं, इसके बारे में भी क्लियर होना चाहिए. स़िर्फ फन और टाइम पास के लिए ऐसे रिश्ते में रहना सही नहीं है.”
मशहूर लेखिका डॉ. सुश्री शरद सिंह कहती हैं, “मैं जब अपने उपन्यास ‘कस्बाई सिमोन’ के लिए लिव इन रिलेशन की बारीक़ी से जांच-पड़ताल कर रही थी, तब मैंने पाया कि यदि कोई कस्बाई (छोटे शहर की) युवती लिव इन में रहती है तो किस तरह और कितनी तेज़ी से वह विवाहिता पत्नी के रूप में ढल जाती है. आसपास का सामाजिक परिवेश, भारतीय पुरुष का स्वामित्व भाव उसे समानता की पटरी से उतार कर ‘दोयम दर्जे’ पर पहुंचा देता है. भारतीय स्त्री के लिए संबंधों को तोड़ पाना अभी भी आसान नहीं है, सामाजिक ही नहीं, भावनात्मक स्तर पर भी. लिव इन रिलेशन का कॉन्सेप्ट भारतीय सामाजिक परिवेश में एक आग का दरिया है… जो तैर सके वह इसमें उतरे और जो तैरने का साहस न रखता हो, वह एक बार ठहर कर विचार करे, स्वयं को तौले, क्योंकि ऐसे संबंधों में सबसे अधिक मानसिक पीड़ा और सामाजिक प्रताड़ना यदि किसी को सहन करनी पड़ती है, तो वह है स्त्री.”

सवालों के घेरे में स़िर्फ महिलाएं
कुछ सालों तक लिव इन में रहने के बाद यदि पार्टनर से पटरी नहीं बैठी तो दोनों अलग तो हो जाते हैं, मगर इस अलगाव का असर महिलाओं पर ही होता है. पुरुष या तो किसी अन्य महिला के साथ दुबारा लिव इन में रहने लगता है या फिर शादी कर लेता है, मगर ऐसी महिलाओं को समाज स्वीकार नहीं करता. उनके चरित्र पर भी उंगलियां उठने लगती हैं, जबकि पुरुषों से कोई सवाल नहीं पूछे जाते. डॉ. शरद सिंह कहती हैं, “भारतीय सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश की घनी बुनावट में विवाह की अनिवार्यता आज भी यथावत् बनी हुई है. मैं जिन युवतियों का जीवन अपने उपन्यास की नायिका में बुन रही थी, उन्हें क़दम-क़दम पर अग्नि-परीक्षा देनी पड़ी. वे किराए के मकान में सहचर (पार्टनर) के साथ रहते हुए यह खुल कर नहीं कह सकीं कि यह मेरा लिव इन पार्टनर है, अपने साथी के दफ़्तर के कलीग द्वारा ‘भाभीजी’ संबोधित करने पर आपत्ति जताते हुए यह नहीं कह सकीं कि मैं इसकी विवाहिता नहीं, इसके साथ स़िर्फ रिलेशन में रह रही हूं. यहां तक कि मोहल्ले की स्त्रियों के अनचाहे सवालों से बचने के लिए करवा चौथ का व्रत भी रखती हैं एक विवाहिता की भांति. इन सबके बाद ब्रेकअप होने पर सहचर को तो विधिवत पत्नी मिल जाती है, किंतु उन्हें मिलता है ‘फलां के साथ रही हुई’ का तमगा.”
लिव इन में रहने का फैसला किसी का भी बेहद निजी मामला है. यदि कोई महिला लिव इन में रहने का फैसला करती है, तो आगे के हालात का सामना करने के लिए ख़ुद को तैयार रखना चाहिए. मजबूरी और भावनात्मक जुड़ाव के कारण बने ऐसे रिश्तों में वो कितनी कंफर्टेबल है और इस रिश्ते को कितना लंबा निभा सकती है? इन सवालों के जवाब तलाशने के बाद ही कोई फैसला करे, तो बेहतर होगा.

लिव इन रिलेशन पर फिल्मों का असर
स्वाति वखारिया कहती हैं कि युवाओं के बीच लिव इन रिलेशन के पॉप्युलर होने की एक वजह फिल्में भी हैं. कई फिल्मों में ऐसे रिश्तों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है, जिससे कई बार यंगस्टर्स शो-ऑफ करने या ख़ुद को कूल कहलाने के चक्कर में ऐसे रिश्ते में पड़ जाते हैं, मगर उन्हें इससे जुड़ी ज़िम्मेदारियों का एहसास नहीं होता और न ही उनके लिए रिश्ते में कमिटमेंट की अहमियत होती है. हर चीज़ की तरह इस रिश्ते के भी फ़ायदे-नुक़सान हैं. अतः हालात का जायज़ा लेने के बाद ही ऐसे रिश्ते में जाएं, ख़ुद को कूल और मॉडर्न दिखाने के लिए नहीं.

 

लिव इन में रह चुके बॉलीवुड सेलिब्रेटी

सैफ़ अली ख़ान- करीना कपूर
जॉन अब्राहम- बिपाशा बासु
रणवीर शौरी- कोंकणा सेन शर्मा
लारा दत्ता- केली दोरजी
आमिर ख़ान- किरण राव
कुणाल खेमू- सोहा अली ख़ान
अभय देओल- प्रीति देसाई
सुशांत सिंह राजपूत- अंकिता लोखंडे

– कंचन सिंह