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लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप के फ़ायदे-नुक़सान (Long distance relationships pros and cons)

Long distance relationships pros and cons

लॉन्ग डिस्टेंस रिश्ते एक तरफ़ तो बहुत ग्लैमरस और आकर्षक लगते हैं, लेकिन जो इन रिश्तों को निभाते हैं, स़िर्फ वही जानते हैं कि इनसे जुड़ी ख़ूबियां हैं, तो ख़ामियां (Long distance relationships pros and cons) भी कम नहीं. यह बात भी सही है कि सभी को सब कुछ नहीं मिलता, लेकिन यदि कुछ ज़रूरी बातों को समझ लिया जाए, तो रिश्तों को बेहतर तरी़के से समझा व जिया जा सकता है. सब कुछ न सही, पर बहुत कुछ पाया जा सकता है.

Long distance relationships pros and cons

बेहतर करियर की चाह और तेज़ी से बढ़ते ऑप्शन्स के चलते चाहे स्त्री हो या पुरुष, अपने शहर या देश से बाहर भी नौकरी करने को तत्पर रहते हैं. तेज़ी से बढ़ती लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशन्स (Long distance relationships pros and cons) की संख्या इस बात की निशानी है. अधिक पैसा कमाना या निरंतर तऱक्क़ी करना अच्छी बात है, पर इस रिश्ते के अगर कुछ फ़ायदे हैं, तो नुक़सान भी कम नहीं हैं.

फ़ायदे

क़द्र करते हैं: जब कोई चीज़ आपके सामने होती है और उस तक पहुंचना सहज होता है, तो उसकी क़द्र हमारी नज़रों में कम हो जाती है. इस स्थिति में हम रिश्तों को बहुत ही कैज़ुअली लेने लगते हैं. लेकिन वही चीज़ जब सामने नहीं होती या जिसे पाने के लिए ज़्यादा कोशिश करनी पड़ती है, तब अपने आप चीज़ों की क़द्र करना, उसका मूल्य समझना हम शुरू कर देते हैं. आपका साथी हमेशा साथ, हमेशा सामने होता है, तो वह भी आपकी दिनचर्या का एक हिस्सा बन जाता है. पर लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशन में इसके विपरीत होता है. आप उसकी कमी महसूस करते हैं, उसे मिस करते हैं और हमेशा उससे बात करने को लालायित रहते हैं, जिसके लिए आप सोशल नेटवर्किंग साइट्स के ज़रिए या अन्य तरीक़ों से अपने साथी से चैट करने के लिए विशेष समय निकालते हैं. आप उसे बार-बार एहसास दिलाने लगते हैं कि आप उसे कितना मिस कर रहे हैं या कितना प्यार करते हैं, जबकि साथ रहते हुए आप अक्सर पर्सनल स्पेस न मिलने की ही शिकायत करते रहते हैं.

लड़ाई-झगड़े नहीं होते: साथी जब दूर बैठा हो, तो लड़ाई-झगड़े होने की संभावना न के बराबर होती है. उन्हें जो कुछ भी थोड़े-बहुत पल बात करने के लिए मिलते हैं या जब कुछ दिनों की मुलाक़ात होती है, तो वे उसे लड़ने-झगड़ने या शिकवा-शिकायत करने में बर्बाद करने से बचते हैं. समस्याओं को सुलझाने की कोशिश करते हैं, पर समाधान ढ़ूंढ़ते हुए न कि आक्षेपों के साथ कि तुम्हारी नौकरी की वजह से या तुम्हारे पर्याप्त समय न देने की वजह से ऐसा हो रहा है. उन पलों में वे ज़्यादा से ज़्यादा अपनी बात शेयर करने व साथी की बात सुनने की कोशिश करते हैं. ऐसे में लड़ना किसे याद रहता है? रूठने-मनाने में समय गंवाने का तो सवाल ही नहीं उठता है.

खट्टे-मीठे पलों को संजोकर रखते हैं: इस रिलेशनशिप में पति-पत्नी उन पलों को धरोहर की तरह संजोकर रखते हैं, जो उन्होंने साथ बिताए थे. जबकि साथ रहने पर रूमानियत और हंसी-दिल्लगी तो जैसे सपना बन जाती है. एक आदत-सी हो जाती है उन्हें साथ रहने की, जिसकी वजह से वे अपने खट्टे-मीठे पलों को संजोने की ज़रूरत ही नहीं समझते, पर लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशन में इन्हीं पलों के सहारे उनका प्यार बढ़ता है और अकेले होने पर उन पलों को जीते हुए साथी के बग़ैर जीना थोड़ा कम मुश्किल लगता है. हाथ में हाथ डालकर बैठने या चुंबन देने का एहसास, जिसे आम युगल कभी गंभीरता से नहीं लेते हैं, उनके लिए सबसे ख़ूबसूरत पल बन जाते हैं.

इंडीविज़ुअल ग्रोथ होती है: आपके और आपके साथी के बीच की दूरी (स्थानों की) आपके व्यक्तित्व को उभारने में मदद करती है. साथ रहते हुए, हमेशा एक-दूसरे के इर्द-गिर्द घूमते हुए, दोनों का व्यक्तित्व अलग-अलग विकसित ही नहीं हो पाता है. वे हर काम एक साथ करते हैं. अक्सर चाहकर भी अलग-अलग कुछ नहीं कर पाते. हालांकि शुरू में यह बहुत अच्छा लगता है कि साथ रहने पर बहुत अच्छी अंडरस्टैंडिंग हो गई, लेकिन फिर धीरे-धीरे यही बात अखरने लगती है. साथी हावी हो रहा है वाली भावना घेरने लगती है. वैसे भी व्यक्तिगत ग्रोथ करने के लिए न तो समय मिलता है और न ही खुला आकाश. इसलिए दोनों की पहचान एक-दूसरे के अस्तित्व से परिभाषित होने लगती है. लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप में आपके पास स्वयं को खोजने का, अपनी हॉबीज़ के लिए समय होता है. आपके पास अपने ख़ुद के मूल्यों, लक्ष्यों और व्यक्तित्व को तराशने का समय होता है.

इमोशनल बॉन्ड मज़बूत होता है: लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशन का सबसे बड़ा फ़ायदा यह होता है कि इसमें इमोशनल बॉन्ड मज़बूत होता है. शारीरिक रूप से दोनों पार्टनर एक-दूसरे से दूर होते हैं, उस खालीपन को भरने के लिए वे भावनात्मक रूप से नज़दीक आते जाते हैं, क्योंकि उनके पास एक-दूसरे से बात करने के लिए अधिक समय होता है. लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशन विश्‍वास व संवाद को बढ़ावा देता है. ये दोनों ही बातें किसी भी रिश्ते के लिए महत्वपूर्ण हैं और इन्हीं से रिश्ता सहजता से चलता है.

आप विश्‍वास पैदा करते हैं: अलग-अलग शहरों या देशों में रहने के कारण एक-दूसरे को धोखा देने या झूठ बोलने के कई अवसर हो सकते हैं. वह भी इस डर के बिना कि दूसरे साथी को पता चल जाएगा. मनोवैज्ञानिक शीतल नारंग के अनुसार, “अगर आप शक करेंगे या ईर्ष्या पालेंगे कि आपका साथी किसी और से संबंध बना रहा है, तो आप तनाव में आ जाएंगे और रिश्तों में भी खटास आ जाएगी. इसलिए आपको अपने मन में साथी के प्रति एक विश्‍वास पैदा करना होगा और यह मानकर चलना होगा कि वह मेरा विश्‍वास नहीं तोड़ेगा. यही विश्‍वास रिश्ते को मज़बूती देता है.”

साथ एंजॉय करते हैं: इस रिलेशन में जब साथी हफ़्तों, महीनों या वर्षों बाद मिलते हैं, तो एक-दूसरे के साथ को बहुत ज़्यादा एंजॉय करते हैं. वे रिलैक्स महसूस करते हैं और मौज-मस्ती करने के साथ प्यार भी दोगुना करते हैं. जबकि दिन-रात साथ रहनेवालों के बीच अक्सर एक बोरियत व्याप्त हो जाती है, प्यार को भी एक रूटीन मान लेने के कारण वे उसे एंजॉय नहीं कर पाते हैं.

अधिक अर्थपूर्ण संवाद: कोर्नेल यूनिवर्सिटी, हांगकांग में हुए एक अध्ययन से यह बात सामने आई है कि आम युगल के बीच रोज़ संवाद
स्थापित होता है, जबकि हज़ारों मील दूर रहनेवाले युगलों के बीच निरंतर संवाद स्थापित न होने के बावजूद अधिक व अर्थपूर्ण संवाद क़ायम होता है. यही नहीं, वे एक ‘कम्युनिकेशन डायरी’ भी बनाकर रखते हैं, जिसमें उन बातों को नोट करके रखते हैं, जो उन्हें अपने पार्टनर से कहनी होती है.

Long distance relationships pros and cons
नुक़सान

अकेलापन: इस रिश्ते का सबसे बड़ा नुक़सान है अकेलापन और कई बार उससे उपजी हताशा. दूरी होने के कारण कोई पास नहीं होता, जिसके साथ साथी अपना ग़म, अपनी समस्याएं बांट सके. रोने का मन करे, तो कोई कंधा नहीं होता, जिस पर सिर रखकर रो सकें. हंसने का मन करे, तो साथ ख़ुशियां बांटनेवाला कोई नहीं होता. छोटी-छोटी बातें शेयर करनेवाला या अकेलापन बांटनेवाला कोई नहीं होता. अक्सर ऐसे युगल अवसाद का शिकार हो जाते हैं या उनका रिश्ता टूट जाता है.

डर घेरे रहता है: इस रिश्ते में चूंकि दूरी व्याप्त रहती है और मिलने का समय तय नहीं होता है, इसलिए इस बात का डर पति-पत्नी दोनों को घेरे रहता है कि कहीं उनका साथी उन्हें धोखा तो नहीं दे रहा है. उसकी ज़िंदगी में कोई और तो नहीं है. अक्सर अपने अकेलेपन को भरने या शारीरिक ज़रूरतों की पूर्ति के लिए किसी साथी के भटकने की संभावना बनी रहती है. यही डर शक को जन्म देता है. अगर नियत समय पर फोन नहीं आया या मिले हुए लंबा समय बीत गया, तो मन में अनेक तरह की आशंकाएं पैदा हो जाती हैं. एक तरफ़ किसी दुर्घटना का विचार आता है, तो दूसरी तरफ़ साथी के नज़रअंदाज़ करने का भी ख़्याल मन को डराता है.

इमोशनल और फिज़िकल स्ट्रेस: साथी के पास न होने पर ज़िम्मेदारियां बढ़ने और अकेले ही घर-बाहर और बच्चों को संभालने की वजह से फिज़िकल स्ट्रेस बहुत ज़्यादा हो जाता है. कपल्स मिलकर काम बांटते हैं, तो वह बोझ नहीं लगता. पर अकेले ही सब कुछ करना थका देता है. इमोशनली भी इंसान टूट जाता है. पति, परिवार व अपनों से दूर स्वयं के खालीपन को भरने के प्रयास में लगा रहता है और पत्नी अपने मन की बात न कहने के तनाव से जूझती रहती है.

ख़र्चे बढ़ जाते हैं: लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशन में असल में दो घर बन जाते हैं. इसका फाइनेंशियल स्थिति पर भी बहुत असर पड़ता है. अगर पत्नी कमाती न हो, तो पति पर पैसों का दबाव हमेशा बना रहता है. या तो उसे अपने ख़र्चे कम करने पड़ते हैं या पैसों की तंगी के कारण पत्नी के ताने सुनने पड़ते हैं. यही नहीं, जब पति-पत्नी बीच-बीच में एक-दूसरे से मिलने जाते हैं, तो यात्रा का ख़र्च, घूमना या शॉपिंग करना भी उनके बजट को बिगाड़ देता है.

बच्चों पर असर पड़ता है: पिता के घर से दूर रहने पर अक्सर मां उनकी कमी को भरने के लिए बच्चों को अतिरिक्त स्नेह देती है. उनकी अवांछित मांगों को भी पूरा करती है. इससे बच्चे बिगड़ सकते हैं. पिता का जो कंट्रोल बच्चों पर होता है, वह भी न होने से बच्चे ज़िम्मेदारी का पाठ नहीं पढ़ पाते हैं.

–  सुमन बाजपेयी

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