love at first sight

उस दिन मैं क्लीनिक पर नहीं था. स्टाफ ने फोन पर बताया कि एक पेशेंट आपसे फोन पर बात करना चाहती है.

“उन्हें कहिए मैं बुधवार को मिलता हूं.” जबकि मैं जानता था बुधवार आने में अभी 4 दिन बाकी हैं.

शायद उसे तकलीफ ज़्यादा थी, इसलिए वह मुझसे बात करने की ज़िद कर बैठी.

जैसे ही मैंने हेलो कहा, दूसरी तरफ़ से सुरीली आवाज़ उभरी- “सर मुझे पिछले 15 दिनों से…”

वह बोल रही थी मैं सुन रहा था. एक सुर-ताल छेड़ती आवाज़ जैसे कोई सितार बज रहा हो और उसमें से कोई सुरीला स्वर निकल रहाहो. मैं उसकी आवाज़ के जादू में खो गया. जाने इस के आवाज़ में कैसी कशिश थी कि मैं डूबता चला गया. जब उसने बोलना बंद कियातब मुझे याद आया कि मैं एक डॉक्टर हूं.

मैंने उसकी उम्र पूछी, जैसा कि अक्सर डॉक्टर लोग पूछते हैं… 

“46 ईयर डॉक्टर.”

मुझे यकीन ही नहीं हुआ यह आवाज़ 45 वर्ष से ऊपर की महिला की है. वह मखमली आवाज़ मुझे किसी 20-22 साल की युवती कीलग रही थी. इस उम्र में मिश्री जैसी आवाज़… मैं कुछ समझ नहीं पाया. फिर भी उसे उसकी बीमारी के हिसाब से कुछ चेकअप करवानेको कहा और व्हाट्सएप पर पांच दिन की दवाइयां लिख दीं. 5 दिन बाद उसे अपनी रिपोर्ट के साथ आने को कह दिया.

यह पांच दिन मुझे सदियों जितने लम्बे लगे. बमुश्किल से एक एक पल गुज़ारा. सोते-जागते उसकी मखमली आवाज़ मेरे कानों में गूंजतीथी. मैं उसकी आवाज़ के सामने अपना दिल हार बैठा था. मैंने कल्पना में उसकी कई तस्वीर बना ली. उन तस्वीरों से मैं बात करने लगा. नकभी मुलाकात हुई, न कभी उसे देखा… सिर्फ एक फोन कॉल… उसकी आवाज़ के प्रति मेरी दीवानगी… मैं खुद ही कुछ समझ नहींपाया. मुझे जाने क्या हो गया… मैं न जाने किस रूहानी दुनिया में खो गया था.

मुझे उससे मिलना था. उसकी मीठी धुन फिर से सुननी थी. जब उसकी तरफ से न कोई कॉल आया, न कोई मैसेज, तो खुद ही दिल केहाथों मजबूर होकर मैसेज किया- ‘अब कैसी तबीयत है आपकी?’

‘ठीक नहीं है, आपकी दी हुई मेडिसन का कोई असर नहीं हुआ…’ उसने जवाब दिया.

‘आपने ठीक से खाई?’

‘हां, जैसा आपने कहा था, वैसे ही.’

मैं उसकी बात सुनकर चुप हो गया. मेरी उम्मीद टूटने लगी. मुझे लगा वह अब वह नहीं आयेगी. उससे मिलने का सपना खत्म हो गया.

थोड़ी देर बाद ही उसका मैसेज स्क्रीन पर चमका. ‘आज आपका अपॉइंटमेंट मिल सकता है?’ मुझे मन मांगी मुराद मिल गई.

ठीक शाम 5:00 बजे वह मेरी क्लिनिक पर अपनी रिपोर्ट और मेडिसिन के साथ थी. उसकी वही मीठी आवाज़ मेरे कानों में टकराई, “गुड इवनिंग, मैं ऋचा…”

मेरे दिल में सात सुर चहकने लगे. बरबस ही होंठों पर मुस्कान तैर गई. धड़कनें बेकाबू होने लगीं. एक कहकशां मेरे सामने थी. वह कहीं सेभी 46 साल की नहीं लग रही थी. कंधे पर झूलते स्टेप कट बाल, भूरी आंखें, गुलाबी होंठ और सादी-सी लेगिंग-कुर्ती पहने वह,, सादगीमें उसकी खूबसूरती निखर रही थी. मैं उसे एकटक देखता रह गया. जैसी मैंने ख्वाबों में उसकी तस्वीर बनाई थी, उससे कहीं ज़्यादा वहखूबसूरत थी. मैं उसके चेहरे से नज़र नहीं हटा पा रहा था, तभी वही मधुर स्वर मेरे कानों में टकराया, “क्या मैं यहां बैठ सकती हूं डॉक्टर?”

उसने अपनी रिपोर्ट मेरी तरफ बढ़ा दी. मैं रिपोर्ट देखने लगा. रिपोर्ट देखकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई. मेरे चेहरे के बदलते भावों कोदेखकर वह कुछ पूछना चाह रही थी, लेकिन मैंने हाथ के इशारे से उसे रोक दिया.

मैं उसे बहुत कुछ कहना चाहता था, पर शब्द गले में अटक गए. मैं उसे कुछ नहीं कह पाया. कभी-कभी हम जो चाहते हैं, वो होता नहीं. दवाइयां लिख कर उसे 15 दिन बाद आने को कहा.

“ठीक है डॉक्टर साहब, मेरी रिपोर्ट नॉर्मल है?” उसने संशय के भाव से पूछा.

“जीऽऽजी…” मैं हकलाकर बोला.

“डॉक्टर साहब, मैं जानती हूं कि मेरी रिपोर्ट नॉर्मल नहीं है. मेरे लंग्स में इंफेक्शन आखिरी पायदान तक बढ़ चुका है. आप बताइए इलाजसंभव है या नहीं?”

“इस दुनिया में सिवाय मृत्यु के हर मर्ज का इलाज है, आप इत्मीनान रखिए. समय पर दवाइयां लीजिए. समय-समय पर चेकअपकरवाते रहिए. सब ठीक होगा.” मैंने डॉक्टरी अंदाज़ में बोला.

वह धीरे-से उठी और उसने मेरी आंखों में देखा, हल्के-से मुस्कुराई और वहां से चली गई. जब उसकी आंखें मेरी आंखों से मिली थीं, आभास हुआ मानो कह रही हो अलविदा डॉक्टर!

मेरी प्रेम कहानी अभी शुरू भी नहीं हुई थी, उसका निर्णायक मोड़ भी आ गया. कुछ कहानियां जन्म लेने से पहले ही खत्म हो जाती हैं. मैंआज तक नहीं समझ पाया, जब बिछड़ना ही तय था, तो ईश्वर उस शख्स से मिलवाता ही क्यों है?

कुछ दिन बाद वह दुनिया को अलविदा कह गई. आज भी उसकी मखमली आवाज़ मेरे कानों में गूंजती है. उसे मेरे लिए जीना चाहिएथा… उसे इस तरह नहीं जाना था… कुछ दिन और ठहरना था… मगर कैंसर की आखिरी स्टेज ठहरने का मौका कब देती है!

  • शोभा रानी गोयल

ऑफिस से निकलते ही मेरी नज़र सामने बैठे एक प्रेमी जोड़े पर पड़ी, जो एक-दूसरे से चिपककर बैठे थें. उस जोड़े को देखकर मैं ख़्यालों में खो गई. अनुष्का ने आकर जब मेरे कंधे पर हाथ रखा तब मैं वर्तमान में लौटी.

अनुष्का ने कहा, “निशा तू जिस तरह से उस कपल को देख रही है, लगता है अपने बीते दिनों की याद ताज़ा कर रही है. क्यों सच है न…” थोड़ा झेपते हुए मैंने हां कह दिया. दरअसल, मैं जब ग्यारहवी में पढ़ती थी, तो मेरे बड़े भाई का दोस्त प्रशांत अक्सर हमारे घर आता-जाता था. तब मेरी उससे बात नहीं होती थी. एक दिन उसने मेरे मोबाइल पर फोन किया और  इधर-उधर की बात करने लगा. उस दिन के बाद से फोन का ये सिलसिला काफ़ी लंबा चलता रहा.

एक दिन रोज़ डे था और उसने फोन पर ही मुझे प्रपोज़ कर दिया. मैं उसकी बात सुनकर चौंक गई, “मैंने कहा तुम मेरे भाई के दोस्त हो और मैं तुम्हें अपने भाई जैसा ही मानती हूं,” पर वो नहीं माना. रोज़ फोन करके मिन्नते करने लगा. हर बार मैं उसे मना कर देती, लेकिन उसने कोशिश करना नहीं छोड़ा. मैंने उससे कहा, “मेरे इम्तिहान आने वाले है. अतः मुझे पढ़ने दो.” उसने जवाब दिया, “तुम बस एक बार मेरे प्यार के रंग में रंगकर हां बोल दो, मैं तुम्हें डिस्टर्ब नहीं करूंगा, प्रॉमिस.” मैं फिर भी नहीं मानी.

उसने घर पर आना-जाना और फोन करना बंद कर दिया. अब मुझे उसकी कमी खलने लगी क्योंकि उससे बात करने की आदत जो पड़ गई थी. जब मुझसे रहा नहीं गया तो एक दिन मैंने ख़ुद उसे फोन किया और हां बोल दिया. प्रशांत बोला, “इतनी छोटी-सी बात बोलने के लिए निशा तुमने इतना टाइम लगा दिया. हमारा वैलेनटाइन डे भी निकल गया.”

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर… लव स्टोरी: छोटी-सी मुलाक़ात! (Pahla Affair… Love Story: Chhoti-Si Mulaqat)

मैंने कहा, “अगले साल मना लेंगे.” फिर पहले की तरह हमारी बात होने लगी.  हम अक्सर मिलते थे, जब मैं उसके साथ होती तो मुझे लगता कि सारी दुनियां की ख़ुशियां मेरे दामन में समा गई है. काश! व़क्त थम जाता पर व़क्त किसी के लिए नहीं थमता. एक दिन हम अलग हो गए.

दरअसल, प्रशांत के पापा इंजीनियर थे और उनका ट्रांस्फर दूसरे शहर हो गया था. जब यह ख़बर मुझे मिली तो मैं प्रशांत पर भड़क गई और प्रशांत भी गर्दन नीचे झुकाकर रोने लगा. मैंने प्रशांत को गले लगा लिया. वो बोला, “तुमसे भी ज़्यादा मैं तुम्हें प्यार करता हूं, मैं तुमसे दूर नहीं जाना चाहता, निशा मुझे अपने पास रख लो.” मगर ये संभव नहीं था. फिर प्रशांत अपने मम्मी-पापा के साथ दूसरे शहर चला गया. वहां से अक्सर उसका फोन आता, मगर धीरे-धीरे फोन का सिलसिला कम और फिर बिल्कुल बंद हो गया.

हम दोनों अपनी-अपनी दुनिया में मश्गूल हो गए. मेरी पढ़ाई पूरी होने के बाद घरवालों ने मेरी शादी तय कर दी. एक दिन लड़के वाले मुझे देखने आए. चाय का ट्रे लेकर जैसे ही मैं कमरे में दाख़िल हुई मेरी आंखे फटी की फटी रह गई… क्योंकि जिस लड़के से मेरी शादी तय हुई थी वो और कोई नहीं, बल्कि प्रशांत था. सालों बाद आख़िरकार मुझे अपना प्यार मिल ही गया. शादी के इतने सालों बाद भी जब अपनी लव स्टोरी याद आती है, तो होठों पर मुस्कान बिखर जाती है.

– नूतन जैन

वो रास्ता अब सुनसान लगता है, वो राहें अब तुझे याद करती हैं… तेरी वो नीली-नीली आंखें… अक्सर जब मेरा पीछा करती थीं, तेरी हर सांस जैसे मेरा ही इंतज़ार किया करती थी… आज याद आती हैं वो राहें जिन पर तू कभी मेरे आगे तो कभी पीछे चला करती थी… कभी मुझे छूने को तू तरसती थी, घंटों गली के उस मोड़ पर मेरी राह तका करती थी…

लेकिन ज़माने में लोगों को प्यार कहां रास आता है, यूं किसी का साथ कहां भाया है… तुझे लेकर अक्सर मुझे ताने कसे जाते थे, कहा जाता था कि क्यों इसको अपने घर तक आने का मौक़ा देते हैं हम, क्यों इसकी इतनी परवाह किया करते हैं हम… और हम हंसकर टाल दिया करते थे लोगों की बातों को, कहां पता था कि वो हमारे इस निश्छल प्रेम की गहराई को समझ नहीं सकते, हमारा साथ वो बर्दाश्त नहीं कर सकते…

और एक दिन जब तेरी वो नीली आंखें नहीं दिखीं… उस मोड़ पर इंतज़ार करती जब तू भी नहीं दिखी… मन बेचैन था कि कहां गई वो, मुझसे इतना प्यार करती थी जो… दिन बीते, बेचैनी और भी बढ़ी… एक रोज़ छत पर कुछ लोगों ने बताया कि तुम्हारी अंबाबाई अब नहीं रही… किसी ने उसको ज़हर देकर हमेशा के लिए सुला दिया… उसके दो मासूम छोटे-छोटे बच्चे थे उनकी भी कोई खबर नहीं…

मन टूट गया, इतनी प्यारी, इतनी चंचल सी अंबाबाई से किसी को इतनी नफ़रत? फिर याद आया कि क्यों यहां-वहां कोने-कोने में कुछ खाना रखा जाने लगा था… किसी ने बताया उनमें ज़हर डाला जाता था, ताकि अंबाबाई आए और उसके खाकर मर जाए…

लोगों को पसंद नहीं था कि वो आती थी मेरे घर के सामने, कभी खाना तो कभी दूध मांगती थी… और मेरी गलती यही थी कि मैंने उसकी उम्मीद भरी आंखों को नाउम्मीद नहीं होने दिया, वो जब-जब आई उसे खाना और दूध भी दिया…

आज मन रोता है, उसे याद करता है… लोग खुश थे कि उनका पीछा छूटा और हम आज भी उस मोड़ पर उसकी मीठी सी आवाज़ का इंतज़ार करते हैं, पर ये कभी न ख़त्म होनेवाला इंतज़ार था… वो अब कभी वापस नहीं आएगी… अफ़सोस था, उसे आख़री बार न देख पाने का…

अब लगता है कि काश उसे और प्यार कर लिया होता, काश उसे और जी भर के देख लिया होता… ये अफ़सोस हमेशा रहेगा, अलविदा मेरी प्यारी अंबाबाई… लोगों के लिए तुम बस एक बिल्ली थी पर मेरे लिए मेरा प्यार थी… मेरे बाहर जाते ही मेरे पैरों में लिपट जाती थी तुम, खाने के डिब्बे को देख लपक जाती थी तुम, मुझे तुम पर बेहद प्यार आता था, लेकिन दुनिया को तुमसे नफ़रत थी…

आज तुम जहां हो वो यहां से बेहतर जगह होगी, वहां नफ़रत और भूख नहीं, प्यार और वफ़ा होगी… बस इतना ही कहूंगी कि मैं तुमसे बेहद प्यार करती हूं, पहले तुम मेरी राह देखती थी, आज मैं उसी मोड़ पर तुम्हारा इंतज़ार करती हूं!

  • गीता शर्मा

कॉलेज का वो दौर, वो दिन आज भी याद आते हैं मुझे. 18-19 की उम्र में भला क्या समझ होती है. मैं अपने बिंदास अंदाज़में मस्त रहती थी. कॉलेज में हम चार दोस्तों का ग्रुप था. उसमें मैं अकेली लड़की थी, लेकिन मुझे लड़कों के साथ रहने परभी कभी कुछ अटपटा नहीं लगा. उनमें से सिद्धार्थ तो सीरियस टाइप का था,पर  दूसरा था सुबीर, जो कुछ ज़्यादा ही रोमांटिक था. उसे मेरे बाल और कपड़ों की बड़ी चिंता रहती. लेकिन अजीब से रोमांटिक अंदाज़ में उसके बात करने से मुझेबड़ी चिढ़ होती थी.

लेकिन इन सबसे अलग था हमारे ग्रुप का वो तीसरा लड़का, नाम नहीं लिखना चाहती, पर हां, सुविधा के लिए अवनि कहसकते हैं.

करीब चार साल तक हमारा साथ रहा, लेकिन पढ़ाई और घर के सदस्यों के हाल चाल जानने तक तक ही हमारी बातचीतसीमित थी.

आगे भी एक साल ट्रेनिंग के दौरान भी हम साथ थे, लेकिन हमारे डिपार्टमेंट अलग थे और काफ़ी दूर-दूर थे.

वो दौर ऐसा था कि लड़के-लड़कियों का आपस में बात करना समाज की नज़रों में बुरा माना जाता था, लेकिन अवनिआधे घंटे के लंच टाइम में भी पांच मिनट निकाल कर मुझसे मिलने ज़रूर आता था, बस थोड़ी इधर-उधर की बातें करके चला जाता.

फिर वो समय भी आ गया जब साल भर की ट्रेनिंग भी ख़त्म होने को आई और अवनि को उसके भाई ने नौकरी के लिएअरब कंट्री में बुला लिया था. उसकी कमी खल तो रही थी लेकिन हमारे बीच सिर्फ़ एक दोस्ती का ही तो रिश्ता था. वो जबभी अपने पैरेंट्स से मिलने इंडिया आता तो मुझसे भी ज़रूर मिलकर जाता.

मेरे घर में सभी लोग उससे बड़े प्यार से मिलते थे, वो था ही इतना प्यारा. निश्छल आंखें और बिना किसी स्वार्थ के दोस्तीनिभाना- ये खूबी थी उसकी. मैं अक्सर सोचती कि हम दोनों के बीच कुछ तो ख़ास और अलग है, एक लगाव सा तो ज़रूरहै, वही लगाव उसे भारत आते ही मुझ तक खींच लाता था.

वो जब भी आता मेरी लिए बहुत सारे गिफ़्ट्स भी लाता. उसे पता था कि मेकअप का शौक़ तो मुझे था नहीं, इसलिए वो मेरे लिए परफ़्यूम्स, चॉक्लेट्स और भी न जाने क्या-क्या लाता. 

इसी बीच उसकी शादी भी तय हो गई और जल्द ही उसने सात फेरे ले लिए.

मैं खुश थी उसके लिए, लेकिन उसकी शादी में मैं नहीं जा पाई. हां, अगले दिन ज़रूर गिफ्ट लेकर अवनि और उसकी पत्नीसे मिली.

इसके बाद उससे अगली मुलाकात तब हुई, जब वो अपने एक साल के बेटे को लेकर मुझसे मिलने आया. 

कुछ समय बाद मेरी भी शादी हो गई. वो भी मेरी शादी में नहीं आ पाया. फिर मैं भी घर-परिवार में इतनी खो गई कि कुछसोचने का वक़्त ही नहीं मिला. लेकिन दिल के किसी कोने में, यादों की धुंधली परतों में उसका एहसास कहीं न कहीं था. मुझे याद आया कि आख़री बार जब उससे मिली थी तो जाते समय उसने एक फिल्मी ग़ज़ल सुनाई, जिसका कुछ-कुछअर्थ था कि मैं अपना वादा पूरा नहीं कर पाया, इसलिए मुझे फिर जन्म लेना होगा… 

उसे सुनकर मैं भी अनसुलझे से सवालों में घिरी रही. अब घर-गृहस्थी में कुछ राहत पाने के बाद यूं ही अवनि का ख़यालआया और मन में हूक सी उठी. मैंने एक दिन सोशल मीडिया पर अवनि को ढूंढ़ने की कोशिश की और मैं कामयाब भी होगई. हमारे बीच थोड़ी-बहुत बात हुई और जब मैंने उससे पूछा कि इतने वक़्त से कहां ग़ायब थे, न कोई संपर्क, न हाल-चाल पूछा, मेरी इस बात पर उसने कहा, “तुम्हारी याद तो बहुत आई, पर मैंने सोचा तुम अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो, तोबेवजह डिस्टर्ब क्यों करना.”

मैं हैरान रह गई उसकी यह बात सुनकर कि अवनि इतनी भावुक बात भी कर सकता है? फिर काफ़ी दिन तक हमारी बातनहीं हुई.

एक दिन मैं अपने लैपटॉप पर कुछ देख रही थी कि अचानक अवनि का मैसेंजर पर वीडियो कॉल आया, क्योंकि अरब देशों में व्हाट्सएप्प कॉल पर बैन है. 

कॉल लिया तो देखा वो किसी अस्पताल में के बेड पर था और ढेर सारी नलियां शरीर पर लगी हुई थीं.

कहने लगा, “कैसा लगता है जब आदमी अस्पताल में अकेला होता है… किसी बेहद अपने की याद आती है…” उस समय भी वह मुस्कुरा रहा था. लेकिन उसकी आंखें बंद सी हो रही थीं. 

मैंने घबराकर पूछा, “क्या हुआ तुम्हें?” इससे पहले वो कुछ बोलता कॉल डिसकनेक्ट हो गई.

बाद में मैसेज में पूछने पर उसका जवाब आया कि मैं कुछ ठीक हूं. कोविड से रिकवर हो रहा हूं. जल्दी ही तुमसे मिलुंगा…

लेकिन वो नहीं आया, बस उसकी खबर ही आई… अभी हफ्ते भर पहले पता चला कि वो संसार छोड़ गया.

न जाने क्यों उसके चले जाने से ज़िंदगी का, दिल का एक कोना खाली और तनहा हो गया. लेकिन कुछ सवाल वो छोड़गया और मैं खुद से ही पूछ रही थी कि क्या वो मुझसे प्यार करता था… अस्पताल में अकेले में ज़िंदगी के आख़री पलों मेंउसे मेरी ही याद आई. क्या ये प्यार था?

ये सवाल मेरे मन में आज भी रह-रहकर आता है, लेकिन इसका जवाब देने वाला दूर, बहुत दूर जा चुका है…!

अलका कुलश्रेष्ट

“काजल तू यहां क्या कर रही है? आज शाम को तो शशि जा रहा है न फिर से ड्यूटी जॉइन करने, उसके साथ होना चाहिएतुझे. आख़िर शादी होने वाली है तुम दोनों की… वैसे भी शशि न सिर्फ़ तेरे भइया के साथ फ़ौज में था, उनका दोस्त था, बल्कि तेरा प्यार भी तो है.”

“नहीं भाभी, मुझे शशि से बात नहीं करनी और ना ही शादी, उसके लिए उसका काम ही सब कुछ है…”

“काजल इतनी सी बात के लिए ऐसा नाराज़ नहीं होते… मैं बस इतना कहूंगी कि प्यार भरे पलों को यूं व्यर्थ की बातों मेंबर्बाद मत करो, उनको जितना हो सके समेट लो, वक़्त का कोई भरोसा नहीं, न जाने फिर कभी किसी को मौक़ा दे, नदे…”

काजल से बात करते हुए मैं पुराने दिनों की यादों में खो गई… 

मैं और काजल बचपन के साथी थे. हम साथ ही कॉलेज के लिए निकलते थे. रोज़ की तरह आज भी मैं काजल के घर गईतो दरवाज़ा खुलते ही एक बेहद आकर्षक लड़का मेरे सामने था. मैं एक पल के लिए तो सकपका गई, फिर पूछा मैंने- “जीवो काजल?”

“काजल पास के मेडिकल स्टोर पर गई है अभी आती होगी. अंदर आ जाओ.”

मैं भीतर चली गई, घर में कोई नहीं था.

इतने में ही आवाज़ आई- “तुम ख़ुशबू हो ना?”

“हां, और आप विनोद?”

“अरे वाह! बड़ी जल्दी पहचान लिया, दरवाज़े पर तो ऐसे खड़ी थी जैसे कि भूत देख लिया हो…”

“नहीं वो इतने टाइम के बाद आपको देखा… काफ़ी बदल गए हो.”

“हां, क्या करें, फ़ौजी हूं, पोस्टिंग होती रहती है, तो यहां आना ही कम होता है, फ़िलहाल बॉर्डर पर हूं. वैसे बदल तो तुम भी गई हो, मेरा मतलब कि काफ़ी खूबसूरत हो गई हो.”

Pahla Affair

मैं झेंप गई और इतने में ही काजल भी आ गई थी.

“ख़ुशबू विनोद भइया से मिलीं?”

“हां काजल, चल अब कॉलेज के लिए देर हो रही है.”

कॉलेज से आने के बाद मैं बचपन के दिनों में खो गई. विनोद, काजल और मैं बचपन में साथ खेला करते थे. विनोद हमसे बड़े थे थोड़ा, लेकिन हमारी खूब पटती थी. उसके बाद विनोद डिफेंस फ़ोर्स में चले गए और उनसे मुलाक़ातें भी ना केबराबर हुईं. लेकिन आज विनोद को एक अरसे बाद देख न जाने मन में क्यों हलचल सी हो गई. 

शाम को विनोद घर आए, तो उनका सामना करने से झिझक सी हो रही थी. मैं सोचने लगी ये अचानक क्या हो गया मुझे? विनोद की कशिश से मैं खुद को छुड़ा ही नहीं पा रही थी. पर क्या विनोद भी मेरे लिए ऐसा ही सोचते हैं? 

उस दिन काजल का जन्मदिन था, मैं शाम को पार्टी में गई तो नज़रें विनोद को ही ढूंढ़ रही थीं. इतने में ही मेरे कानों में हल्कीसी आवाज़ आई, बहुत ख़ूबसूरत लग रही हो, नज़र न लग जाए!” विनोद की इस बात से पूरे बदन में सिहरन सी होने लगी. खाना खाने बैठे तो टेबल के नीचे से उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया. उस पूरी रात मैं सो नहीं पाई.

अगले दिन मम्मी ने कहा आज घर पर ही रहना, तुझे लड़के वाले देखने आ रहे हैं. 

मैं हैरान-परेशान… “मम्मी मुझसे पूछ तो लिया होता, मैं अभी शादी नहीं करना चाहती.”

“बेटा, अभी कौन कह रहा है, बस बात पक्की हो जाए, फिर तू पढ़ाई पूरी करके, नौकरी लग जाए उसके बाद करना, उनकोकोई ऐतराज़ नहीं.”

“पर मां ये अचानक कहां से आ गया लड़का, कौन हैं ये लोग…”

“तू शाम को देख लेना…”

Pahla Affair

मुझे लगा ये सब क्या हो रहा है, अब विनोद को भी क्या कहूं, कैसे कहूं, हमारे बीच ऐसा रिश्ता तो अब तक बना भी नहींथा…

ख़ैर शाम हुई और मैंने देखा विनोद की फ़ैमिली हमारे घर पर थी. मेरी ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं था. 

तभी मम्मी और काजल ने कहा- “क्यों शादी के लिए अब भी तुम्हारी ना है या हां?”

हमारी सगाई हुई और विनोद की छुट्टियां ख़त्म… फ़ोन, मैसेजेस पर खूब बातें होतीं, विनोद फिर बीच में कुछ दिनों के लिएआए और तब शादी की तारीख़ भी फ़ाइनल हो गई. कार्ड्स के डिज़ाइंस से लेकर शादी की तैयारियों में दोनों परिवार व्यस्तहो गए. पर इसी बीच एक ख़बर आई कि आतंकियों से लड़ते हुए विनोद शहीद हो गए… सब कुछ बिखर गया…

“भाभी, तुम्हारी आंखों में आंसू… भइया की याद आ गई?”

काजल की आवाज़ से मैं वर्तमान में लौटी… “काजल, मैंने विनोद को खोया उस बात का तो ग़म है ही, लेकिन मुझे खुदपर भी बहुत ग़ुस्सा गई, क्योंकि हमारी आख़री मुलाक़ात में मैं विनोद से खूब झगड़ी थी, नाराज़ हुई थी वो भी सिर्फ़इसलिए कि एक तो वो लेट आए और उन्होंने ना मुझे मूवी दिखाई और ना मेरी तारीफ़ की थी… उनके जाने बाद भी उसनेमुझे सॉरी के मैसेजेस किए, फोन किए पर मैंने अपने झूठे ग़ुस्से में किसी का भी जवाब नहीं दिया… जब ग़ुस्सा ठंडा हुआतब तक उनके शहीद होने की खबर आ चुकी थी… काजल मैंने ताउम्र उनकी विधवा बने रहने का रास्ता चुना और मैंख़ुशनसीब हूं कि मेरे और तेरे घरवालों ने मेरे इस फ़ैसले का सम्मान किया, लेकिन मेरी आत्मा पर ये बोझ हमेशा रहेगा किआख़री पलों को मैंने क्यों नहीं समेटा, प्यार से उनको विदा करती तो कितना अच्छा होता…”

अचानक काजल उठकर जाने लगी तो मैंने टोका- “क्या हुआ? कहां जा रही हो?”

“अपने प्यार को समेटने भाभी…”

उसके और मेरे दोनों के चेहरे पर मुस्कान दौड़ पड़ी! 

  • परी शर्मा 

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: लॉन्ग डिसटेंस (Pahla Affair… Love Story: Long Distance)

Pahla Affair: Tohfa

पहला अफेयर: तोहफ़ा (Pahla Affair: Tohfa)

ऑफिस से लौटने के बाद मैं अक्सर वॉक पर जाता हूं. तेज़ क़दमों से वॉक करने पर ताज़गी का अनुभव होता है. घर के पास ही लगभग 1.5 किलोमीटर का वॉकिंग ट्रैक बना हुआ है, जो बेहद ख़ूबसूरत है. ट्रैक के दोनों तरफ़ हवा में झूमते बड़े-बड़े पेड़ भी हैं. ट्रैक एलईडी लाइट्स से रोशन है और ट्रैफिक भी ज़्यादा नहीं है. कुल मिलाकर वॉक के लिए परफेक्ट जगह है.

उस दिन संडे था. छुट्टी के दिन मैं कुछ जल्दी ही वॉक पर निकल गया. बारिश का मौसम शुरू ही हुआ था, लेकिन उस दिन हल्के बादल छाए हुए थे. देखकर ऐसा लगा नहीं था कि तेज़ बारिश होगी. मैं बिना छतरी के ही निकल गया.

अभी आधा ट्रैक ही पार किया था कि मूसलाधार बारिश शुरू हो गई. साथ ही बिजली कड़कने लगी, बादल गरजने लगे. मौसम अचानक बदल गया. तूफ़ानी बारिश होने लगी. मन ही मन मैं ख़ुद को कोसने लगा कि क्यों बिना छतरी के निकल पड़ा. अपने आलस पर मुझे ग़ुस्सा आ रहा था. ख़ैर सबक तो मिलना ही था.

देखते ही देखते पूरा ट्रैक खाली हो गया. जिनके पास छतरियां थीं, वो आगे निकल पड़े और कुछ स्कूटर पर ही भीगते हुए हवा से बातें करते तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ गए.

आसपास कहीं कोई छिपने की जगह नहीं थी, इसलिए मैं एक घने पेड़ के नीचे ही खड़ा हो गया. सोचा कुछ तो बचाव होगा, लेकिन भीगी पत्तियों से गिरती तेज़ बूंदों ने मुझे पूरी तरह से तर-बतर कर दिया था. उस पर आसमान में चमकती तेज़ बिजली ने मंज़र को थोड़ा भयावह कर दिया था. मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूं?

तभी एक अप्रत्याशित घटना घटी. सामने से आती एक तेज़ रफ़्तार कार अचानक मेरे पास आकर रुक गई. उसमें से एक युवती निकली और अपना छाता मुझे थमाते हुए तेज़ी से कार में बैठकर बोली, “मैं आपको घर छोड़ देती, पर मैं अपने पापा को रिसीव करने एयरपोर्ट जा रही हूं, उनकी फ्लाइट का टाइम हो गया है…”

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: रूहानी रिश्ता 

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर : साया हो तुम…

इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, वो तेज़ी से आगे बढ़ गई और देखते ही देखते उसकी कार आंखों से ओझल हो गई. न मैं कुछ पूछ सका, न ही कार का नंबर नोट कर पाया. आंधी की तरह वो लड़की आई और मेरे मन में सवालों का तूफ़ान छोड़कर चली गई.

अगले तीन-चार दिन मौसम बिल्कुल साफ़ रहा, लेकिन मैं रोज़ वो छतरी लेकर जाता रहा, ताकि ‘थैंक्स’ कह सकूं, लेकिन वो नहीं दिखी. मैं निराश हो गया.

तभी एक दिन मम्मी ने कहा, “तेरे लिए एक रिश्ता आया है. शाम को लड़कीवालों के यहां चलना है.”
मैं तैयार होकर सबके साथ चला गया, तो देखा वही लड़की चाय लेकर आई. मैं उसे देखता ही रह गया और वो भी मुझे ही निहार रही थी. हम दोनों मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे. लड़की ख़ूबसूरत तो थी ही, इंजीनियर भी थी, मैं तो पहले ही उससे इंप्रेस हो गया था और अब तो बस शादी के लिए ‘हां’ कहना बाकी था.

चलते समय मैंने हौले से उससे कहा, “आज फिर मैं आपका छाता लाना भूल गया…”
“लौटाने की ज़रूरत नहीं. अपने पास ही रखिए, लेकिन शाम को उसे अपने साथ लेकर ज़रूर जाइए, जिससे कोई दूसरी लड़की आपको अपनी छतरी भेंट न कर सके.” उसके होंठों पर एक शरारतभरी मुस्कान थी. कुछ शायद उसने बिना कहे ही अधूरा छोड़ दिया था… मेरे अनुमान के लिए.

जिसने हमारी मुलाक़ात करवाई उस प्रिय छतरी के तले बरसते पानी की झमाझम में, शीतल फुहारों का आनंद उठाते मैं शाम को फिर वॉक पर निकल पड़ा… मन में पहले प्यार का मदभरा एहसास था, लबों पर गीत और आंखों में होनेवाले जीवनसाथी के प्यारभरे सपने…

– सत्य स्वरूप दत्त

पहले प्यार के मीठे एहसास से भीगे ऐसे ही अफेयर्स के लिए यहां क्लिक करें: Pahla Affair 
×