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Personal Problems: क्या प्रेग्नेंसी में ब्लडप्रेशर की दवा लेना सेफ है? (Is It Safe To Have Blood Pressure Medicine During Pregnancy?)

Safe, Blood Pressure. Medicine During Pregnancy
मेरी नौ महीने की बेटी है, जिसे मैं ब्रेस्ट फीडिंग करती हूं. मेरी प्रेग्नेंसी रिपोर्ट पॉज़ीटिव आई है और सोनोग्राफी में 5 हफ़्ते की प्रेग्नेंसी का पता चला है. मेरे डॉक्टर ने मुझे सर्जिकल एबॉर्शन की बजाय मेडिकल एबॉर्शन की सलाह दी है. क्या यह सेफ और इफेक्टिव है?
– महिमा झा, हिसार.

स्टडीज़ में यह बात साबित हो चुकी है कि मेडिकल एबॉर्शन सेफ और इफेक्टिव तरीक़ा है. इसमें दो गोलियां दी जाती हैं. सर्जिकल प्रोसीजर भले ही कितना भी छोटा हो, फिर भी उसमें एनीस्थिसिया दिया जाता है और प्रोसीजर में कॉम्प्लीकेशंस की संभावना भी बनी रहती है, क्योंकि आपके डॉक्टर ने आपको मेडिकल एबॉर्शन की सलाह दी है, तो उन्होंने इसके बारे में आपको पूरी जानकारी भी दी होगी. इसलिए बेफिक्र रहें. ये बिल्कुल सेफ है.

 Blood Pressure Medicine During Pregnancy
मैं पहली बार मां बनी हूं और मेरी 8 महीने की प्रेग्नेंसी है. डॉक्टर ने कहा है कि मेरा ब्लड प्रेशर बढ़ रहा है, जिसे कंट्रोल करने के लिए मुझे दवा लेनी होगी. कहीं ये दवाएं मेरे बच्चे को कोई नुक़सान तो नहीं पहुंचाएंगी? मुझे क्या करना चाहिए?
– अमृता जैन, राजकोट.

पहली बार मां बननेवाली बहुत-सी महिलाओं को यह समस्या होती है, जिसे प्रेग्नेंसी के कारण होनेवाला हाइपरटेंशन कहते हैं. अगर ब्लड प्रेशर कंट्रोल न किया गया, तो यह आपके और आपके बच्चे की सेहत को नुक़सान पहुंचा सकता है. ज़्यादातर एंटी-हाइपरटेंसिव दवाएं टेस्टेड ही होती हैं, इसलिए इफेक्टिव और बच्चों के लिए सेफ हैं. अगर आपके डॉक्टर ने आपको इसकी सलाह दी है, तो वैसा ही करें.

 

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 डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]

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जानिए कौन-सी दवा के साथ क्या नहीं खाना चाहिए? (Common Foods &; Medications You Should NEVER Mix!)

Common Foods, Medications You Should NEVER Mix

दवाएं हम बीमारी को दूर करने के लिए खाते हैं और खाना स्वस्थ रहने के लिए. लेकिन ऐसे कई खाद्य पदार्थ हैं, जो वैसे तो सेहत की दृष्टि से बेहद फ़ायदेमंद होते हैं, लेकिन उन्हें कुछ दवाओं के साथ ग्रहण करने पर न स़िर्फ दवा का असर कम हो जाता है, बल्कि सेहत को नुक़सान भी पहुंच सकता है. हम आपको बता रहे हैं कि किस दवा और किस खाद्य पदार्थ के साथ मिक्स नहीं करना चाहिए.

Common Foods, Medications You Should NEVER Mix

कॉफी
परहेज़ करेंः अगर आप अस्थमा के इलाज के लिए ब्रोन्को डायलेटर ले रहे हैं.
यह दवा फेफड़े के मसल्स को रिलैक्स करती है, जिससे मरीज़ को सांस लेने में आसानी होती है, लेकिन इस दवा के साइड इफेक्ट्स भी हैं. इस दवा का सेवन करने पर
कभी-कभी घबराहट होने के साथ दिल की धड़कन तेज़ हो जाती है. ऐसे में इस दवा के साथ कैफीन लेने पर साइड इफेक्ट्स होने की संभावना बढ़ जाती है. इतना ही नहीं, ज़्यादा कॉफी का सेवन करने पर दवा का असर भी घट जाता है. अतः बेहतर होगा कि अगर आप अस्थमा की यह दवा ले रहे हैं तो कॉफी न पीएं. अगर इसकी लत हो तो इस बारे में डॉक्टर को अवश्य बताएं.

केला
परहेज़ करेंः यदि आप ब्लड प्रेशर की दवा खाते हैं.
केला में भरपूर मात्रा में पोटैशियम पाया जाता है, जो कि सेहत के लिए अच्छा है. यदि आप ब्लडप्रेशर की दवाएं, जैसे-कैप्टोप्रिल, एंजियोटेनसिन इत्यादि ग्रहण करते हैं तो केला सहित अन्य पोटैशियम रिच खाद्य पदार्थ, जैसे-पत्तेदार सब्ज़ियां, संतरा इत्यादि का अत्यधिक मात्रा में सेवन न करें, क्योंकि इन दवाओं के साथ पोटैशियम रिच फूड्स का अत्यधिक मात्रा में सेवन करने से दिल की धड़कन बढ़ सकती है. इसलिए बेहतर होगा कि आप ब्लडप्रेशर की दवा के साथ केला जैसे पोटैशियम युक्त खाद्य पदार्थ का सेवन करने से पहले इस बारे में डॉक्टर को बताएं.

अल्कोहल
परहेज़ करेंः यदि आप एंटीहिस्टामाइन्स, डायबिटीज़ की दवा या पेन किलर्स खाते हैं.
आमतौर पर किसी भी दवा के साथ अल्कोहल लेने की मनाही होती है, क्योंकि अल्कोहल लिवर पर अतिरिक्त दबाव डालता है. लेकिन अल्कोहल, पैरासिटामॉल और कोडीन लिवर द्वारा अवशोषित किए जाते हैं. ऐसे में अल्कोहल और इन दवाओं के साथ ग्रहण करने पर इन्हें पचाने के लिए लिवर को
ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जिससे इन दवाओं के साइड इफेक्ट्स, जैसे सुस्ती इत्यादि होने की आशंका बढ़ जाती है. इसके अलावा लिवर के क्षतिग्रस्त होने का भी रिस्क होता है.

पत्तेदार सब्ज़ियां
परहेज़ करेंः यदि आप एंटीकॉलैगुलेंट (ख़ून को पतला करने की दवा) लेते हैं
ब्रोकोली, पालक, पत्तागोभी जैसी पत्तेदार सब्ज़ियां सेहत के लिए अच्छी होती हैं, लेकिन यदि आप वॉर्फरिन जैसी एंटीब्लड क्लॉटिंग मेडिसिन लेते हैं तो पत्तेदार सब्ज़ियों का सेवन संभलकर करें. इन सब्ज़ियों में विटामिन के की मात्रा अधिक होती है, जो ब्लड को क्लॉट करने में मदद करता है. आपको बता दें कि वॉर्फरिन का काम ख़ून को पतला करना है. ऐसे में यदि आप अधिक मात्रा में पत्तेदार सब्ज़ियों का सेवन करेंगे तो वॉर्फरिन को अपना काम करने में बाधा उत्पन्न होगी. कैनबेरी जूस और कैनबेरी के प्रोडक्ट्स लेने से भी परहेज़ करें, क्योंकि ये भी वॉर्फरिन के असर को कम करते हैं.

नारंगी
परहेज़ करेंः यदि आप स्टैटिन ग्रहण करते हैं.
यदि आप ब्लड प्रेशर कम करने के लिए स्टैटिन ग्रहण करते हैं तो आपको नारंगी या नारंगी का जूस पीने से बचना चाहिए. नारंगी में एक ऐसा केमिकल होता है, जो शरीर को स्टैटिन को अवशोषित करने से रोकता है. जिसके कारण मरीज़ को मांसपेशियों या शरीर में दर्द की शिकायत हो सकती है.

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डेयरी प्रोडक्ट्स
परहेज़ करेंःयदि आप एंटीबायोटिक्स लेते है.
दूध, दही, चीज़ जैसे डेयरी प्रोडक्ट्स में पाया जानेवाला कैल्शियम सिप्रोफ्लॉक्ससिन व टेट्रासाइक्लिन जैसे एंटीबायोटिक्स को शरीर में एब्जॉर्ब होने में बाधा पहुंचाता है, जिससे उनका असर कम होता है. अच्छे रिजल्ट के लिए एंटीबायोटिक्स खाने के एक घंटे पहले पानी के साथ, या फिर खाना खाने के दो घंटे बाद ग्रहण करना चाहिए. इसलिए अगर आप दूध के साथ एंटीबायोटिक्स ग्रहण करते हैं तो ऐसा करना छोड़ दें.

नींबू
परहेज़ करेंः यदि आप कफ की दवा ले रहे हैं.
यदि आप डेक्सट्रोमेथॉर्फिन युक्त कफ की दवा ले रहे हैं तो नींबू, संतरा जैसे खट्टे खाद्य पदार्थ लेने से बचें. सिट्रस फूड्स शरीर द्वारा दवा को ब्रेक डाउन करके अवशोषित करने की प्रक्रिया में बाधा पहुंचाते हैं, जिससे सुस्ती इत्यादि जैसे साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं.

स्मोक्ड सैल्मन (मछली)
परहेज़ करेंः यदि आप एंटीडिप्रेसेंट खाते हैं.
अगर आपका एंटीडिप्रेसेंट, मोनोमाइन ऑसिडैज इंहिविटर्स (एमएओआईएस) के कैटेगरी में आता है तो किसी भी प्रकार का स्मोक्ड मीट खाने से पहले अपने डॉक्टर की सलाह अवश्य लें. मीट्स में टाइरामाइन की मात्रा अधिक होती है और इन्हें एमएओआईएस के साथ मिक्स करने पर ब्लडप्रेशर बढ़ने का ख़तरा होता है. इस रिक्स लिस्ट में प्रोसेस्ड मीट्स व फिश भी आते हैं.

सोयाबीन व अखरोट
परहेज़ करेंः यदि आप थायरॉइड की दवालेते हैं.
हाई फाइबर फूड दवा को शरीर में अवशोषित होने से रोकते हैं. अगर आप हाई फाइबर डायट ग्रहण करते हैं, तो दवा को देर शाम या रात में ग्रहण करें. एक अध्ययन में यह सिद्ध हुआ है कि नाश्ते के पहले दवा ग्रहण करने की बजाय सोने से पहले लेना ज़्यादा बेहतर होता है.

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जानें कौन-सी दवा का सेक्स लाइफ पर क्या साइड इफेक्ट होता है (Side Effects of Medicines on Sex Life)

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माना कि दवाएं दर्द-तकली़फें दूर करने के लिए होती हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि कुछ दवाएं आपकी सेक्स लाइफ़ को भी प्रभावित करती हैं. कैसे? आइए जानें.

 

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कहते हैं प्यार के इज़हार का सबसे अच्छा ज़रिया होता है- सेक्स. पति-पत्नी के रिश्ते की गहराई और मज़बूती काफ़ी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि उनकी सेक्स लाइफ़ कैसी है? लेकिन, बहुत बार कई कारणों से आपसी रिश्ते अच्छे होते हुए भी सेक्स लाइफ़ प्रभावित होने लगती है. जिसका असर रिश्तों पर पड़ने लगता है. अचानक या धीरे-धीरे आपके पार्टनर की सेक्स में रुचि कम होने लगती है और आप बस कारण ढूंढ़ते रह जाते हैं और अक्सर ग़लत नतीज़े पर पहुंचकर अपने संबंध ख़राब कर लेते हैं. ऐसे में ज़रूरी है कि सही कारणों को जानें और एक्सपर्ट की सलाह से अपने रिश्तों को मज़बूूत बनाएं.
आपको जानकर हैरानी होगी, मगर विशेषज्ञों की मानें तो ऐसी कई दवाइयां हैं, जिनके सेवन से सेक्स लाइफ़ पर असर होता है, लेकिन कई बार शर्म या झिझक के कारण लोग डॉक्टर से संपर्क नहीं करते.

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ब्लडप्रेशर

ब्लडप्रेशर के लिए इस्तेमाल की जाने वाली क्लोनीडीन, अल्फा मिथाइल डोपर (एंडोमेंट), रेसर्पिन, ग्वानेथिडीन जैसी औषधियां कामेच्छा में कमी लाती हैं. ये औषधियां शरीर में प्रोलॅक्टीन नामक हारमोन की मात्रा बढ़ा देती हैं, जिससे पुरुष नपुंसकता का शिकार हो जाता है. इसके अलावा इंडोरॉल, बीटास्पैन, बीटा ब्लॉकर, एल्फाडोपा, डोपाजिट, आर्कामिन, केटाप्रेस आदि औषधियां लिंग के उत्थापन मेें बाधा पहुंचाती हैं, जिससे सेक्स लाइफ़ प्रभावित होती है.

एंटी-हाइपरटेंशन-   हाई ब्लडप्रेशर यानी उच्च रक्तचाप की दवाइयां सेक्स लाइफ़ को प्रभावित कर सकती हैं.
एंटी-डिप्रेसेंट- अवसाद यानी डिप्रेशन की दवाइयां.
एंटी-सायकॉटिक- अगर आप किसी मानसिक समस्या की दवा ले रहे हैं, तो हो सकता है आपकी सेक्स लाइफ़ उनसे प्रभावित हो रही हो.

अब सवाल ये उठता है कि ये दवाएं भला सेक्स लाइफ़ को कैसे प्रभावित करती हैं?
दरअसल सेक्स के लिए ज़रूरी हार्मोंस, न्यूरोट्रान्समीटर्स यानी शरीर की ज़रूरतों व संदेशों को मस्तिष्क तक पहुंचाने वाले तत्व, जैसे- डोपामाइन, सेरोटोनिन और सेक्स के अंगों के बीच तालमेल ज़रूरी होता है. मुख्यतः डोपामाइन सेक्स क्रिया को बढ़ाने में और सेरोटोनिन उसे कम करने की भूमिका निभाते हैं, वहीं टेस्टोस्टेरॉन हार्मोंस रक्त धमनियों के ज़रिए उत्तेजना उत्पन्न करने का काम करते हैं.
ऐसे में ये दवाएं हार्मोंस के स्तर में बदलाव लाकर, सेक्स की क्षमता और सेक्स में रुचि को भी कम कर देती हैं. एंटी-डिप्रेसेंट दवाएं मस्तिष्क में केमिकल्स के स्तर को बढ़ा देती हैं. कुछ दवाएं सेरोटोनिन के स्तर को बढ़ा देती है, जिससे सेक्स क्रिया प्रभावित होती है.
हालांकि हर दवा का असर अलग-अलग होता है, ऐसे में ये ज़रूरी नहीं कि स़िर्फ दवाएं ही ज़िम्मेदार हो, लेकिन यदि आपको अपनी सेक्स लाइफ़ में बदलाव महसूस हो रहा है, तो दवा बंद न करें, पहले डॉक्टर से संपर्क करें और उनकी सलाह से आगे बढ़ें.
ध्यान रहे आपकी ज़िंदगी और ज़िंदगी को बेहतर बनाना ही आपका और आपके डॉक्टर का उद्देश्य है, ऐसे में झिझक छोड़कर अपनी परेशानी डॉक्टर को बताना ज़रूरी है.

 

ये दवाएं भी हो सकती हैं सेक्स की दुश्मन

 

एंटी-डिप्रेसेंट, एंटी-सायकॉटिक और एंटी-हाइपरटेंशन के अलावा एंटी-एपिलेप्टिक और कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवाएं भी ज़िम्मेदार हो सकती हैं. साथ ही घबराहट और अनिद्रा के लिए बेंजोडायज़ेपाइन्स पेप्टिक अल्सर, एसिडिटी, प्रोस्टेट कैंसर, नशा छुड़ाने के लिए प्रयुक्त दवाएं, मितली और उल्टी, हृदय संबंधी दवाएं भी आपकी सेक्स लाइफ़ को प्रभावित कर सकती हैं.
कुछ पेनकिलर्स भी इसकी ज़िम्मेदार हो सकती है. ऐसे में ङ्गसेल्फ़ मेडिकेशनफ या सेक्स क्षमता बढ़ाने वाली दवाएं ख़ुद से न लेकर डॉक्टर को दिखाएं, क्योंकि सेक्स क्षमता बढ़ाने वाली दवाएं, इन दवाओं के साथ मिलकर कई अन्य साइड इ़फेक्ट्स उत्पन्न कर सकती हैं, जो बेहद घातक हो सकता है.

 

इरेक्शन फ्रेंड्ली दवाओं का भी उपयोग किया जा सकता है-

– वॉटर टेबलेट्स या बीटा ब्लॉकर्स के बजाय उच्च रक्तचाप में यदि कैल्शियम चैनल और एल्फा ब्लॉकर्स का प्रयोग किया जाए तो सेक्स समस्याएं कम होंगी.
– एसीएफ इंहिबिटई भी बेहतर विकल्प है.
– ट्रायसायक्लिक एंटी-डिप्रेसेंट के मुक़ाबले SSRIs और उसके बाद MAQIs (मोनो-अमाइन ऑक्सिडेस इंहिबिटर्स) सेक्स संबंधी परेशानियां ज़्यादा पैदा करते हैं.
– कोलेस्ट्रॉल को कम करने के लिए फाइब्रेट्स की जगह स्टैटिन्स कम समस्या देंगे.
यह ध्यान रहे कि डॉक्टर की सलाह के बिना कोई दवाई न खाएं और ये भी ज़रूरी नहीं कि हर कोई जो ये दवाएं ले रहा है उसे वे सेक्स संबंधी परेशानियां हों ही या अगर हो रही हों तो उनकी अन्य वजहें भी हो सकती हैं.

 

– विजयलक्ष्मी

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महंगी दवाओं का बेहतर विकल्प- जेनेरिक मेडिसिन्स

जिस देश में किसी की जान और स्वास्थ्य की क़ीमत उसकी आर्थिक स्थिति पर निर्भर करती हो, उसके विकास और विकास की दिशा का अंदाज़ा ख़ुद लगाया जा सकता है. पैसों के अभाव में इलाज और आवश्यक दवाएं तक लोगों को नसीब नहीं होतीं और ऐसे में कई मासूम ज़िंदगियां दम तोड़ देती हैं. हम सभी चाहते हैं कि यह स्थिति बदले, लेकिन हमारे देश में सरकार और प्रशासन हेल्थ केयर सेक्टर को सबसे निचले स्तर पर रखता है, जबकि अन्य देशों में यह प्राथमिकता की सूची में सबसे ऊपर है. यही वजह है कि यहां सस्ती दवाओं और इलाज के अभाव में बहुत-सी जानें जाती हैं.
ऐसे में सस्ता इलाज और जेनेरिक दवाएं यदि आसानी से सब जगह उपलब्ध हों, तो तस्वीर थोड़ी बेहतर हो सकती है.

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क्या होती हैं जेनेरिक दवाएं?

– ये महंगी और ब्रांडेड दवाओं का सस्ता विकल्प हैं, जिनका इस्तेमाल, प्रभाव, असर और साइड इफेक्ट्स भी उन्हीं ब्रांडेड दवाओं जैसा ही होता है.

– इनका कंपोज़िशन भी वही होता है, लेकिन ये दवाएं इतनी सस्ती इसीलिए होती हैं, क्योंकि इनके उत्पादक नई दवाओं की मार्केटिंग और निर्माण पर बड़ी कंपनियों व बड़े ब्रॉन्ड्स की तरह पैसा ख़र्च नहीं करते.

– एक तथ्य यह भी है कि इन दवाओं का असर और गुणवत्ता उतनी ही बेहतर होती है, जितनी कि नामी-गिरामी कंपनी व ब्रांडेड दवाओं की होती है. अक्सर लोगों को लगता है कि महंगी दवाओं का प्रभाव उनकी जेनेरिक दवाओं के मुक़ाबले अधिक होता है और उनकी गुणवत्ता भी अच्छी होती है.

– लेकिन सच्चाई यही है कि जेनेरिक दवाओं पर भी एफडीए के वही कड़े क़ायदे व नियम लागू होते हैं, जो बाक़ी दवाओं पर होते हैं.

– कई बड़ी कंपनियां तो ब्रांडेड और जेनेरिक दोनों ही प्रकार की दवाओं का निर्माण करती हैं.

 

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क्या है भारत की स्थिति?

भारत जेनेरिक दवाओं का बड़ा उत्पादक है. पिछले कई सालों से भारत लगभग हर चिकित्सकीय श्रेणी में जेनेरिक दवाओं के बड़े उत्पादक के रूप में उभरा है. हालांकि अन्य देशों के मुक़ाबले भारत में दवाएं काफ़ी सस्ती हैं, लेकिन भारत का एक बड़ा तबका है, जो ब्रांडेड दवाएं ख़रीदने में सक्षम नहीं है. ऐसे में जेनेरिक दवाओं की बढ़ती ज़रूरत को देखते हुए इसे बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है.

– हमारे देश में ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (डीपीसीओ) के तहत एनपीपीए यानी नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथोरिटी द्वारा रिटेल मार्केट की शेड्यूल्ड दवाओं की क़ीमतें तय और नियंत्रित की जाती हैं. इसके अलावा एनपीपीए उन दवाओं की क़ीमतों पर भी नज़र रखता है, जो डीपीसीओ की लिस्ट में नहीं हैं, ताकि इन दवाओं की क़ीमत साल में 10% से अधिक न बढ़ने पाए.

– सरकार ने दवाओं की क़ीमतों को कम और नियंत्रित रखने के लिए वैट भी कम रखा है- मात्र 4%.  लेकिन इन सबके बावजूद सच्चाई यही है कि देश में दवाएं ख़रीदने में असमर्थ होने की वजह से ग़रीबों की जान जा रही है.

– अमेरिकी जेनेरिक ड्रग्स में 40% भारतीय कंपनियों का शेयर है यानी भारत सबसे बड़ा सप्लायर है वहां. भारत से लगभग 45 हज़ार करोड़ रुपए की जेनेरिक दवाएं विदेशों में भेजते हैं, लेकिन अपने ही देश में सस्ती दवाओं के अभाव में ग़रीबों की जान जा रही है.

– डब्लूएचओ के अनुसार भारत में आज भी 65% आबादी आवश्यक दवाओं से वंचित रह जाती है, मात्र पैसों की तंगी के कारण दवा न ख़रीद पाने की वजह से ऐसा होता है. दवाओं की वास्तविक क़ीमतें बेहद कम होती हैं, लेकिन दवाओं को उनकी वास्तविक क़ीमत से 5 गुना से लेकर 20-50 गुना तक बढ़ाकर बेचा जाता है. इसकी मुख्य वजह है हमारा सिस्टम, जिसमें हर कोई कमीशन खाता है.

– कमीशन की चाह में डॉक्टर्स भी ब्रांडेड दवाएं ही लिखते हैं. उन पर बड़ी-बड़ी कंपनियां दबाव डालती हैं, अधिक कमीशन का लालच देती हैं और अपनी गुणवत्ता की दुहाई देकर उन्हें तैयार कर लेती हैं. दूसरी तरफ़ ड्रग कंपनीज़ पर कानूनी तौर पर कोई रोक नहीं है कि वो कमीशन क्यों ऑफर करती हैं डॉक्टर्स को.

– सरकारों को जेनेरिक दवाओं को अधिक से अधिक आम लोगों तक, ख़ासकर ग़रीब तबके तक पहुंचाने का प्रयास करना चाहिए, ताकि कम से कम आज़ादी के 65 वर्षों बाद इलाज व दवा न ख़रीद पाने के कारण मौत के मुंह से लोगों को बचाया जा सके.

– लो कॉस्ट इंश्योरेंस स्कीम्स शुरू की जानी चाहिए, जो देश के कुछ राज्यों में काफ़ी सफलता से चल रही हैं, लेकिन जानकारों का कहना है कि दरअसल हेल्थ केयर सेक्टर एक बिज़नेस बन चुका है और जब तक यह स्थिति नहीं बदलेगी, तस्वीर नहीं बदलेगी.

– हैरानी की बात यह है कि डॉक्टरी पेशा अब मिशन या सेवा न रहकर बिज़नेस बन गया है. देश में जहां अधिक से अधिक सरकारी मेडिकल कॉलेज खुलने चाहिए थे, वहीं प्राइवेट कॉलेजेस अधिक खुलते हैं, जो भारी डोनेशन पर ही एडमिशन देते हैं और अच्छी-ख़ासी फीस भी वसूलते हैं. ज़ाहिर-सी बात है पढ़ाई पूरी होने के बाद जो युवा डॉक्टर्स अपनी प्रैक्टिस शुरू करते हैं, उनके दिमाग़ में यही बात होती है कि हमने जो पैसा लगाया है, उसे जल्द से जल्द वापस कमाना है.

– कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि सिस्टम में ही ख़ामियां हैं, तो सुधार तब तक नहीं आएगा, जब तक सिस्टम नहीं सुधरेगा. पिछले कुछ वर्षों में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया जब ख़ुद गड़बड़ियों के आरोपों में घिर चुकी है, तो परिवर्तन कैसे लाया जाए यह भी बड़ा सवाल है. बहरहाल, कोशिशें जारी हैं, बदलाव भी आएगा. सरकार के अलावा इस दिशा में बहुत-सी एनजीओ और समाजसेवा में दिलचस्पी रखनेवाले डॉक्टर्स भी अपने-अपने स्तर पर काफ़ी अच्छा व सराहनीय काम कर रहे हैं, जिससे मेडिकल सेक्टर में सकारात्मक बदलाव आए और लोगों को सस्ती दवाएं आसानी से उपलब्ध करा पाएं.

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सरकारी प्रयास

– बीपीपीआई यानी ब्यूरो ऑफ फार्मा पीएसयूज़ (पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स) ऑफ इंडिया की स्थापना करके भारत सरकार ने जन औषधि स्टोर्स के ज़रिए जेनेरिक दवाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने का प्रयास शुरू किया है.

– ब्यूरो का काम है कि जनऔषधि स्टोर्स की मार्केटिंग और कोऑर्डिनेशन के ज़रिए ज़्यादातर लोगों तक इसका लाभ पहुंचाया जाए.

– अपने प्लांट्स से दवाएं अस्पतालों, राज्यों तक व प्राइवेट सेक्टर में भी पहुंचाई जाएं. इससे संबंधित सभी ज़रूरी क़दम उठाना भी ब्यूरो का काम है.

– सभी जन औषधि स्टोर्स ठीक तरह से काम कर रहे हैं या नहीं, इसकी निगरानी रखना.

– बेहतर होगा कि अधिक जानकारी के लिए आप इस वेबसाइट पर जाएं- http://janaushadhi.gov.in

– यहां आपको तमाम राज्यों/शहरों में मौजूद जन औषधि स्टोर्स के नाम और पते मिल जाएंगे.

– इसके अलावा आपको यहां सभी जेनेरिक दवाओं के नाम और दाम की सूची भी मिल जाएगी.

– इस वेबसाइट पर नेशनल टोल फ्री हेल्पलाइन नंबर भी है, जिससे आप सहायता ले सकते हैं. ऐसे में यदि आप स्वयं या अपने आसपास किसी ग़रीब की भी सहायता करना चाहें, तो काफ़ी जानकारी इस वेबसाइट से जुटा सकते हैं.

– गीता शर्मा