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मानसिक स्वास्थ्य का सेक्स लाइफ पर असर (How Mental Health Affects Your Sex Life?)

भागदौड़ और व्यस्तता भरी ज़िंदगी में वैवाहिक दंपतियों की सेक्स लाइफ (Sex Life) में उतार-चढ़ाव आना स्वाभाविक है. ऐसे में कई बार पति-पत्नी के अंतरंग रिश्तों में रोमांस की जगह बोरियत पैदा हो जाती है. अगर पति या पत्नी में से कोई एक दिमाग़ी तौर पर तनावग्रस्त होता है तो उसका सीधा असर उनके बेडरूम में दिखाई देता है, जहां पति-पत्नी के मन में सेक्स के लिए पैशन व प्लेज़र की जगह बोरियत और नीरसता के भाव जागने लगते हैं. अधिकांश लोगों ने यह अनुभव भी किया होगा कि जब वो टेंशन फ्री होते हैं तब सेक्स को ज़्यादा एन्जॉय करते हैं, लेकिन जब वो किसी तरह की मानसिक परेशानी में होते हैं तो इसका दुष्प्रभाव उनकी सेक्स लाइफ पर भी दिखाई देता है. आख़िर मानसिक स्वास्थ्य और सेक्स लाइफ के बीच क्या कनेक्शन है? चलिए जानते हैं.

Sex Life

दिमाग़ का सेक्स से कनेक्शन

सेक्स का दिमाग़ से सीधा कनेक्शन है, क्योंकि जब हम सेक्स के बारे में सोचते हैं तब हमारा दिमाग़ मूड बनाने वाले हार्मोन सेरोटोनिन का स्राव करता है. इस हार्मोन के स्राव से हमारे यौन अंगों में ब्लड सर्कुलेशन बढ़ जाता है, लेकिन जब कोई मानसिक तौर पर अस्वस्थ या परेशान होता है या फिर दवाइयों का सेवन कर रहा है तो इसका सीधा असर उसकी सेक्स लाइफ पर दिखाई देता है. ऐसे में व्यक्ति को सेक्सुअल डिसफंक्शन या कामेच्छा में कमी जैसी समस्याएं हो सकती हैं. इसलिए हेल्दी सेक्स लाइफ के लिए स़िर्फ शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक तौर पर भी स्वस्थ रहना बेहद आवश्यक है.

1- पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर

कई अध्ययनों में यह ख़ुलासा किया गया है कि जो महिला या पुरुष पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर के शिकार होते हैं उनकी सेक्स लाइफ बुरी तरह से प्रभावित होती है. इससे पीड़ित लोगों को अपने अंतरंग रिश्तों में काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. हालांकि यह ट्रॉमा बीते समय में हुए यौन हिंसा या किसी गंभीर दुर्घटना के कारण भी हो सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे पीड़ित व्यक्ति यौन क्रिया के दौरान उत्तेजना की कमी महसूस करता है और सेक्स में उसकी सक्रियता नहीं रहती है.

2- डिप्रेशन

डिप्रेशन यानी अवसाद से पीड़ित लोग अक्सर शारीरिक ऊर्जा की कमी महसूस करते हैं, जिसके कारण सेक्स में उनकी रुचि कम होने लगती है या फिर उनकी कामेच्छा में कमी आ जाती है. ऐसे लोग सेक्सुअल डिसफंक्शन के शिकार हो जाते हैं, जिसके चलते उनमें इरेक्शन या ऑर्गेज्म की कमी जैसी समस्याएं हो जाती हैं. कई मामलों में एंटीडिप्रेसेंट दवाइयों के सेवन से भी सेक्स लाइफ पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता दिखाई देता है.

3- एंज़ायटी

कई अध्ययनों से यह पता चला है कि एंज़ायटी से पीड़ित क़रीब 75 फ़ीसदी लोगों में यौन समस्याएं होती हैं. इससे पीड़ित पुरुषों में जहां इरेक्टाइल डिसफंक्शन की समस्या देखी जाती है, वहीं महिलाओं में सेक्सुअल अवर्शन डिसऑर्डर हो सकता है, जिसमें सेक्स से डर और उससे बचने जैसी चीज़ें शामिल हैं. यह समस्या उन लोगों को भी हो सकती है जिनके साथ यौन शोषण हुआ हो, इसके अलावा सोशल एंज़ायटी से पीड़ित लोगों की कामेच्छा में भी कमी आ सकती है.

4- ईटिंग डिसऑर्डर

जब कोई व्यक्ति अत्यधिक मात्रा में या बहुत कम मात्रा में खाना शुरू कर देता है तो इसे ईटिंग डिसऑर्डर कहा जाता है. यह एक तरह की मानसिक बीमारी है. इस डिसऑर्डर से पीड़ित लोगों में सेक्सुअल एंज़ायटी, सेक्स से बचना, सेक्स के प्रति उदासीनता और सेक्सुअल डिसफंक्शन जैसी समस्याएं हो सकती हैं. एक रिसर्च के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति ईटिंग डिसऑर्डर का शिकार है तो इससे उसके शरीर में कामोत्तेजना बढ़ाने वाले हार्मोन्स का उत्पादन सीधे तौर पर प्रभावित हो सकता है.

5- बाइपोलर डिसऑर्डर

बाइपोलर डिसऑर्डर एक ऐसा मानसिक विकार है जिसमें पीड़ित व्यक्ति का मूड बार-बार बदलता है. कभी उसका आत्मविश्‍वास चरम पर होता है तो कभी उसका आत्मविश्‍वास एकदम निचले स्तर पर चला जाता है. इससे पीड़ित व्यक्ति एक पल ख़ुश तो अगले ही पल दुखी और अवसादग्रस्त हो जाता है, जिसके चलते उसकी सेक्सुअल लाइफ पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. ऐसे में उनका बार-बार बदलता मूड और व्यवहार अंतरंग रिश्तों के लिए घातक बन जाता है.

6- बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर

अनुचित या अत्यधिक भावनात्मक प्रतिक्रियाएं देना, अत्यधिक आवेगपूर्ण व्यवहार करना और अस्थिर संबंधों का इतिहास इत्यादि बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर के लक्षण हो सकते हैं. इससे पीड़ित लोग न तो नौकरी में स्थिर रह पाते हैं और न ही अपने निजी रिश्तों में. यही वजह है कि इनकी सेक्सुअल लाइफ बदतर होती है, क्योंकि इससे पीड़ित व्यक्ति या तो सेक्स से बचने की कोशिश करता है या फिर वो सेक्स के दौरान अत्यधिक आवेग में आ जाता है.

7- स्किज़ोफ्रेनिया

आंकड़ों के मुताबिक़, भारत में विभिन्न डिग्री के स्किज़ोफ्रेनिया से लगभग 40 लाख लोग पीड़ित हैं. यह बीमारी एक हज़ार वयस्कों में से क़रीब 10 लोगों को अपना शिकार बनाती है और यह सबसे ज़्यादा 16 से 45 वर्ष की आयु के लोगों को प्रभावित करती है. रोग की गंभीरता के आधार पर इससे पीड़ित व्यक्ति की सेक्स क्षमता कम या सीमित हो सकती है, जिसके चलते इरेक्शन सही तरी़के से नहीं हो पाता है और ऑर्गेज्म पाने की क्रिया बिगड़ सकती है.

8- ऑब्सेसिव कंप्लसिव डिसऑर्डर (ओसीडी)

ओसीडी से पीड़ित व्यक्ति एक ही चीज़ को बार-बार करता है, जैसे- बार-बार हाथ धोना, दरवाज़े का लॉक चेक करना, साफ़-सफ़ाई पर ज़्यादा ध्यान देना इत्यादि. ऑब्सेसिव कंप्लसिव डिसऑर्डर का असर पीड़ित व्यक्ति की सेक्स लाइफ पर भी पड़ता है. इससे पीड़ित व्यक्ति अति कामुक, यौन कल्पना यानी सेक्सुअल फेंटसी और मास्टरबेशन का आदी हो सकता है. हालांकि इसके लक्षणों को कम करने के लिए उपचार और दवाइयों की मदद ली जा सकती है.

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Sex Life
क्या करें?

अगर किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या के कारण आपकी सेक्स लाइफ बाधित हो रही है तो इलाज के अलावा आपको कुछ और बातों का भी ध्यान रखना चाहिए.

दवाइयों में बदलाव- आप जिस मनोरोग विशेषज्ञ से अपना इलाज करा रहे हैं उससे अपनी सेक्स लाइफ पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव के बारे में खुलकर बात करें और उससे दवाइयों में कुछ बदलाव करने की अपील करें, ताकि आपकी सेक्स लाइफ पर पड़ रहे नकारात्मक प्रभाव कुछ हद तक कम हो सकें.

पार्टनर से कुछ न छुपाएं- अगर आप किसी मानसिक परेशानी से गुज़र रहे हैं तो इस बारे में अपने पार्टनर से खुलकर बात करें. उससे अपनी मानसिक स्थिति और सेक्स लाइफ में आ रही परेशानियों के बारे में बात करें. इससे पार्टनर आपकी मन:स्थिति को अच्छी तरह से समझेगा और आपके रिश्ते में मज़बूती बनी रहेगी.

थेरेपिस्ट की मदद लें- हो सकता है कि इलाज के दौरान थेरेपिस्ट या विशेषज्ञ आपकी सेक्स लाइफ के बारे में न पूछें, ऐसे में आपकी मानसिक स्थिति के कारण आपकी सेक्स लाइफ किस तरह से बाधित हो रही है इसके बारे में उन्हें आपको ख़ुद बताना होगा. इसलिए अपनी हिम्मत बढ़ाएं और थेरेपिस्ट के साथ-साथ अपने पार्टनर को भी इस समस्या के बारे में बताएं.

ये चीज़ें भी हैं ज़रूरी- मानसिक बीमारी के कारण सेक्स लाइफ पर पड़ रहे दुष्प्रभाव के बारे में हरदम सोचने की बजाय अपने पार्टनर से खुलकर अपनी भावनाओं को व्यक्त करना सीखें, पार्टनर के साथ हंसी-मज़ाक करें, अपनी जीवनशैली में शामिल अन्य अच्छी चीज़ों पर भी ध्यान दें. इससे पार्टनर के साथ आपका भावनात्मक रिश्ता मज़बूत होगा और आपके अंतरंग रिश्तों में भी सुधार आने लगेगा.

– अनिता राम

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World Mental Health Day: मानसिक स्वास्थ्य सुधारने के लिए अपनाएं ये आदतें

आज वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे है. इस अवसर पर हम आपको मानसिक रुप से स्वस्थ रहने के कुछ आसान तरीक़े बता रहे हैं, जिन्हें अपनाकर आप अपने मन को शांत व स्वस्थ रख सकते हैं.

World Mental Health Day
जब किसी व्यक्ति का शरीर बीमार होता है तो वह ख़ुद को शारीरिक रूप से बहुत लाचार महसूस करता है, ठीक उसी प्रकार किसी का मानसिक रूप से अस्वस्थ होना उसके पूरे जीवन को प्रभावित कर सकता है. हालांकि व्यक्ति के व्यवहार, बोलचाल, सोच और समझ से उसकी मानसिक स्थिति का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. दरअसल, जो व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ व मज़बूत होते हैं वो जीवन के प्रति हमेशा सकारात्मक रवैया अपनाते हैं और कभी हार नहीं मानते, लेकिन कई ऐसी आदतें भी हैं जो व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं. अगर आप जंक फूड खाते हैं, ज़रूरत से ज्यादा शराब पीते हैं और
एक्सरसाइ़ज नहीं करते हैं तो इससे आपके मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है. लेकिन कुछ अच्छी आदतों को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाकर आप अपने मानसिक स्वास्थ्य को सुधार सकते हैं.

World Mental Health Day

 

1- नियमित व्यायाम
मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने में शारीरिक व्यायाम काफ़ी सकारात्मक भूमिका निभाता है. एक्सरसाइज़ या शारीरिक कसरत फील गुड यानी अच्छा महसूस कराने वाले रासायनिक प्रतिक्रियाओं का कारण बनता है, जो चिंता और तनाव को कम करने के साथ-साथ मूड को भी अच्छा बनाता है. इतना ही नहीं, नियमित रूप से व्यायाम करने पर याद्दाश्त अच्छी होती है, सोचने-समझने की क्षमता तेज़ होती है, काम में एकाग्रता बढ़ती है और तनाव से लड़ने की ताक़त मिलती है.

2- ध्यान और योग
प्राचीन काल में बड़े-बड़े ऋषि-मुनि योग व ध्यान किया करते थे और आज के इस आधुनिक दौर में इसकी ताक़त को विज्ञान भी सलाम करता है. ध्यान और योग न स़िर्फ दिमाग़ को स्वस्थ बनाता है, बल्कि इनसे तनाव से लड़ने में भी मदद मिलती है. योग और ध्यान की मदद से आप अपने दिमाग़ के साथ-साथ शरीर को भी स्वस्थ बना सकते हैं, इसलिए कुछ देर के लिए ही सही, पर अपनी दिनचर्या में योग और ध्यान को ज़रूर शामिल करें.

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3- अच्छी नींद
नींद की कमी स़िर्फ शरीर ही नहीं, बल्कि व्यक्ति के मानसिक
स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है. इसकी कमी से चिंता,
अवसाद तथा भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में हुए एक अध्ययन के मुख्य लेखक व क्लिनिकल साइकोलॉजी के प्रोफेसरडैनियल फ्रीमैन के मुताबिक़, अच्छी और भरपूर नींद मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक समस्याओं से निपटने में मदद करती है. इसलिए उचित समय पर बिस्तर पर जाएं और 8 घंटे की भरपूर नींद लें.

4- मल्टीटास्किंग से बचें
एक अनुमान के मुताबिक़, दुनिया की कुल आबादी के 2 फ़ीसदी लोग ही प्रभावी ढंग से मल्टीटास्किंग कर सकते हैं.
मनोविज्ञान के अनुसार, दिमाग़ एक साथ दो चीज़ें करने में असमर्थ होता है. मल्टीटास्किंग होने के दो नुक़सान हो सकते हैं, एक तो यह दिमाग़ की संचित ऊर्जा को तेज़ी से कम कर सकता है और दूसरा एक साथ दो काम करना काफ़ी तनावपूर्ण हो सकता है. इसलिए बेहतर यही होगा कि एक साथ कई काम करने की बजाय एक समय में एक ही काम की आदत को अपनाएं.

5- काम और निजी जीवन में संतुलन
व्यक्ति के लिए काम और उसका पारिवारिक जीवन दोनों ही काफ़ी महत्वपूर्ण होते हैं. लेकिन अगर आपको ऐसा लगता है कि आप अपने जीवन के एक हिस्से पर अधिक ऊर्जा और समय ख़र्च कर रहे हैं, तो इससे आपके काम और निजी जीवन के बीच संतुलन बिगड़ सकता है. काम और निजी जीवन के बीच संतुलन में गड़बड़ी आपके मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती है. अतः अपने काम और जीवन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करें, ताकि आप तनाव और चिंता जैसी मानसिक समस्याओं से मुक्त रहें.
6- न करें टाल-मटोल
किसी भी काम को करने में टाल-मटोल करना तनाव की निशानी है और यह आपके मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकती है. अगर आपके पास कोई काम है जिसे करना ज़रूरी है, लेकिन आप टाल-मटोल कर रहे हैं तो ऐसा मत कीजिए और उस काम को अंजाम दे दीजिए. उस काम को अंजाम देने के बाद आप ख़ुद महसूस करेंगे कि आप जिस काम से बचने की कोशिश कर रहे थे वो इतना भी मुश्किल नहीं था और ऐसा करने से आपका तनाव भी काफ़ी हद तक कम हो जाएगा.

7- डिजिटल ब्रेक है ज़रूरी
डिजिटल ब्रेक का अर्थ यह नहीं है कि जब आपका स्मार्टफोन, लैपटॉप या कंप्यूटर जैसे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स ख़राब हो जाएं, तभी आप इनसे ब्रेक लेकर थोड़ा आराम करें. बेशक आज के इस डिजिटल दौर में इन चीज़ों के बिना रहना काफ़ी मुश्किल है, लेकिन यह भी सच है कि ये चीज़ें इंसानी रिश्तों और स्वास्थ्य दोनों पर हावी हो रही हैं. कई अध्ययनों में भी यह बात सामने आई है कि डिजिटल उपकरणों की वजह से लोगों में एकाग्रता और फोकस की कमी आई है. इसलिए अगर आप अपने रिश्तों के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाना चाहते हैं तो हफ़्ते में कम से कम एक बार इनसे ब्रेक अवश्य लें.

8- पौष्टिक खाएं, स्वस्थ रहें
मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में आहार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. कई अध्ययन भी बताते हैं कि आहार में पर्याप्त मात्रा में अमीनो एसिड, आवश्यक फैट, कॉम्प्लेक्स कार्ब्स, विटामिन्स और मिनरल्स की मौजूदगी से मूड अच्छा होता है और मन में दूसरों के लिए भलाई की भावना जागती है. पौष्टिक आहार मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद आवश्यक है, इसलिए पौष्टिक खाएं और स्वस्थ रहें. आप चाहें तो डायट चार्ट के लिए किसी न्यूट्रीशनिस्ट की मदद भी ले सकते हैं.

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अटेंशन पाने की चाहत आपको बना सकती है बीमार! (10 Signs Of Attention Seekers: How To Deal With Them)

अटेंशन पाने की चाहत तो सभी में होती है लेकिन जब ये चाहत ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ जाए, तो ये मेंटल डिसऑर्डर का रूप ले लेती है. अटेंशन सीकिंग बिहेवियर के शिकार लोगों से डील करना बहुत मुश्किल होता है. ऐसे लोग हर पल, हर घड़ी हर किसी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना चाहते हैं और इसके लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं. यदि आप भी हर पल लोगों का अटेंशन पाना चाहते हैं, तो संभल जाइए..! आपकी अटेंशन पाने की चाहत दूसरों के लिए आफत और आपके लिए मेंटल डिसऑर्डर का कारण बन सकती है.

Attention Seekers

अटेंशन सीकर्स यानी हर पल अटेंशन पाने की चाहत रखने वालों के ये 10 लक्षण होते हैं:

1) अटेंशन सीकिंग बिहेवियर एक पर्सनैलिटी डिसऑर्डर है. इसके शिकार लोग बहुत संवेदनशील होते हैं और हर पल अटेंशन पाना चाहते हैं. ऐसे लोग वास्तविकता से दूर अपनी काल्पनिक दुनिया में ही खोए रहना पसंद करते हैं, उनमें सच का सामना करने की हिम्मत नहीं होती. महिलाएं अटेंशन सीकिंग डिसऑर्डर की सबसे ज़्यादा शिकार होती हैं.
2) अटेंशन सीकर्स का व्यवहार काफ़ी उग्र होता है. हर पल अटेंशन पाने की चाहत रखने वाले व्यक्ति की शादीशुदा ज़िंदगी में भी दरार पड़ सकती है, क्योंकि किसी भी व्यक्ति के लिए ये संभव नहीं है कि वो 24 घंटे स़िर्फ अपने पार्टनर पर ही ध्यान दे, उसकी तारीफ़ करे या फिर हर समय उससे प्यार से ही बात करे. ऐसे में ज़रा से इग्नोरेंस से उनका स्वाभिमान आहत हो जाता है.
3) मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक, जब कोई व्यक्ति चिल्लाकर या कुछ अजीब हरकतें जैसे- झूठी बीमारी या चोट लगने का बहाना बनाकर लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करे, तो समझ लीजिए कि वो अटेंशन सीकिंग बिहेवियर यानी ASB का शिकार है.
4) अगर कोई अटेंशन सीकर्स पर ध्यान नहीं देता, तो वे असहज महसूस करने लगते हैं और अजीब हरक़तें करने लगते हैं, जैसे- कोई मनगढंत किस्सा सुनाना, जोर-जोर बातें करना आदि.
5) अटेंशन सीकर्स हर समय भावनात्मक सहारा ढूंढ़ते रहते हैं. इन्हें हर समय एक ऐसे साथी की ज़रूरत होती है, जो इनकी हां में हां मिलाए और इनकी हर बात को सही कहे. ज़रूरत से ज़्यादा अटेंशन पाने की चाह रखने वालों की निजी ज़िंदगी में समस्याएं आने लगती हैं. उनके अजीब बर्ताव के कारण धीरे-धीरे दोस्त भी उनसे दूर हो जाते हैं या फिर उनकी अनदेखी करने लगते हैं. ऐसे में व्यक्ति तनाव व अकेलेपन का शिकार हो सकता है.
6) अटेंशन सीकर्स के मुख्य लक्षण हैं- हमेशा एक्टिंग व दिखावा करना, झूठी बीमारी का बहाना, ख़ुद अपनी तारीफ़ करना, अपनी भावनाओं को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाना आदि.
7) अटेंशन सीकर्स दूसरों का ध्यान आकर्षित करने लिए भड़कीले कपड़े पहनते हैं, अजीबोगरीब हेयर स्टाइल बनाते हैं, महिलाएं लाउड मेकअप करती हैं.
8) अटेंशन सीकर्स ख़ुद से बेहतर किसी को समझते ही नहीं हैं इसलिए ये दूसरों की सफलता देख नहीं पाते और दूसरों की सफलता पर उनसे ईर्ष्या करने लगते हैं.
9) विशेषेज्ञों के मुताबिक, अटेंशन सीकर्स अपनी अयोग्यता व असुरक्षा की भावना को छुपाने के लिए अजीबोगरीब हरकतें करके दूसरों का ध्यान आकर्षित करते हैं. दरअसल, आत्मविश्‍वास की कमी के चलते अटेंशन सीकर्स ख़ुद कोे दूसरों से कम आंकते हैं. यही वजह है कि अटेंशन पाने के लिए वो कुछ भी करने को तैयार रहते हैं.
10) घमंडी और ओवरकॉन्फिडेंट लोगों को अटेंशन की ज़्यादा चाह होती है. उन्हें लगता है कि अटेंशन पाना उनका हक़ है, लेकिन इस तरह की सोच उनकी अपरिपक्वता को दर्शाती है. विशेषज्ञों के मुताबिक, इमोशनली इमैच्योर यानी भावनात्मक रूप से अपरिपक्व लोग हमेशा सेंटर ऑफ अट्रैक्शन बने रहना चाहते हैं. ऐसे लोग अटेंशन पाने के लिए छल-कपट, धोखेबाज़ी और किसी को धमकाने से भी पीछे नहीं हटते.

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अटेंशन सीकिंग बिहेवियर के निम्न कारण होते हैं:

* अटेंशन सीकिंग बिहेवियर आनुवांशिक भी होता है इसलिए यदि बच्चे के पैरेंट्स अटेंशन सीकर्स हैं, तो बच्चे में भी अटेंशन सीकिंग बिहेवियरे देखा जाता है.
* अटेंशन सीकिंग बिहेवियर के लिए व्यक्ति की शिक्षा, परिवार और आस-पास का माहौल भी ज़िम्मेदार होता है.
* कई बार पैरेंट्स द्वारा समय न दिए जाने के कारण बच्चा ख़ुद को उपेक्षित महसूस करने लगता है. इसके अलावा बात-बात पर पैरेंट्स के डांटने-फटकारने, बच्चों की भावनाओं की अनदेखी करने या फिर उनके इमोशन को दबाने के कारण भी बच्चे में अटेंशन पाने की चाहत बढ़ जाती है. बड़े होने पर ऐसे ही बच्चे अटेंशन सीकिंग बिहेवियर के शिकार हो जाते हैं.

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अटेंशन सीकर्स से कैसे करें डील?

* अटेंशन सीकिंग बिहेवियर से डील करने के लिए सबसे पहले ऐसे व्यवहार के लिए ज़िम्मेदार कारणों का पता लगाकर उन्हें दूर करने की कोशिश की जानी चाहिए.
* साइकोलॉजिस्ट ऐसे व्यक्तियों को डांस, म्यूज़िक, पेंटिंग, क्रिएटिव राइटिंग जैसे एक्सप्रेसिव आर्ट में शामिल होने की सलाह देते हैं. इनके ज़रिए अपनी भावनाओं को व्यक्त करने से उन्हें ख़ुशी का अनुभव होता है और उनकी आंतरिक शक्ति बढ़ती है.
* पैरेंट्स अगर छोटी उम्र से ही बच्चों को ख़ुद से प्यार और अपना सम्मान करना सिखाएं, उनका आत्मविश्‍वास बढ़ाने की कोशिश करें, तो बड़े होने पर उनमें अटेंशन पाने की चाह या यूं कहें कि अटेंशन की भूख नहीं रहेगी.
* यदि अटेंशन सीकर्स का व्यवहार कंट्रोल में न हो और समस्या ज़्यादा गंभीर हो जाए, तो साइकोथेरेपिस्ट की मदद लेनी चाहिए.

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सफल शादी के मानसिक फ़ायदे (A Happy Marriage Leads To Better Mental Health)

Marriage Leads To Better Mental Health

शादी ख़ुशहाल जीवन के लिए ज़रूरी तो है ही, साथ ही एक सर्वे के अनुसार इसके कई मानसिक फ़ायदे (Better Mental Health) भी हैं. प्रस्तुत लेख में क़ामयाब शादी से जुड़े ऐसे ही कई मानसिक फ़ायदों के बारे में बताया गया है.

Marriage Leads To Better Mental Health

वाकई में सफल शादीशुदा जीवन बिताने वाले लोग ज़्यादा ख़ुश व लंबा जीवन जीते हैं? अविवाहित लोगों की तुलना में क्या वे मानसिक रूप से अधिक संतुष्ट और सुखी होते हैं? जी हां, यह काफ़ी हद तक सच है. हाल ही में हुए एक सर्वे के अनुसार, शादी व ख़ुशी के बीच एक पॉज़ीटिव रिलेशनशिप होता है, जिससे शादीशुदा लोग अविवाहितों की तुलना में अधिक ख़ुुश भी रहते हैं. आइए, जानें क़ामयाब शादी के मानसिक फ़ायदों के बारे में.
*    सफल शादी एक सुरक्षा कवच की तरह होती है, जो पति-पत्नी दोनों को एक निश्‍चिंत जीवन जीने का आश्‍वासन देती है.
* ऐसे कपल बहुत शांत और बेफ़िक्र ढंग से न स़िर्फ परिवार को सुखमय बनाने में क़ामयाब रहते हैं, बल्कि अपने करियर में भी निरंतर आगे बढ़ते रहते हैं.
* सफल शादी में शेयरिंग करने से पति-पत्नी दोनों जहां एक तरफ़ अपनी सारी परेशानियों से बाहर निकल आते हैं, वहीं फ़ाइनेंशियली भी बहुत सिक्योर महसूस करते हैं.
*  शारीरिक संतुष्टि अगर एक तरफ़ उन्हें कुंठा से बचाती है, तो दूसरी ओर साथ होने का विश्‍वास व एहसास, उन्हें मानसिक रूप से भी सक्षम बनाता है.
*  सुख-दुख में कोई उनके साथ है, यह एहसास इतना स्ट्रॉन्ग होता है कि वे किसी भी तरह की चुनौती का सामना करने को तत्पर रहते हैं.
* यदि उनके साथ कुछ ग़लत या बुरा हो भी गया, तो उनका पार्टनर उन्हें सपोर्ट करेगा और उस स्थिति से बाहर आने में मदद करेगा, यह बात उन्हें बड़े से बड़े फैसले लेने में भी मदद करती है.
*  पार्टनर का साथ पति-पत्नी दोनों को एक कॉन्फ़िडेंस देता है, जिसके बल पर वे कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना करने के लिए भी तैयार रहते हैं.
*  सफल शादी पति-पत्नी को हमेशा ख़ुशी के एहसास से भरे रहती है, जिससे उन्हें पॉज़ीटिव इमोशन्स का अनुभव होता है और अभाव या परेशानियां होने के बावजूद वे निराश या कुंठित नहीं होते हैं.
* उन्हें इस बात का डर नहीं सताता कि यदि कल किसी वजह से वे मुसीबत से घिर जाते हैं, तो उनका भविष्य ख़राब हो सकता है.
* जीवनसाथी किसी प्रकार की दुविधा होने या निर्णय लेने की स्थिति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. उस पर आंख बंद करके विश्‍वास किया जा सकता है कि वह उसका अहित नहीं करेगा, इसलिए उसके निर्णय से उलझन को सुलझाने में मदद मिलती है.
* सफल शादी से स्ट्रेस लेवल कम होता है.
* अकेला व्यक्ति जब घंटों किसी चीज़ में उलझा रहता है, तो उसका डिप्रेशन का शिकार होना स्वाभाविक है, पर सफल विवाहित जोड़ों के साथ ऐसा नहीं होता है.
* उसकी ख़ुशी न स़िर्फ उसके चेहरे, हाव-भाव, बातचीत करने के ढंग आदि से झलकती है, बल्कि वह उसकी परफ़ॉर्मेंस में भी दिखाई देती है.
* जब तनाव न हो, तो मन शांत रहता है और काम करना बोझ नहीं लगता. फिर चाहे वह घर का काम हो या ऑफ़िस का, व्यक्ति मन लगाकर करता है.
* काम से थकने पर पार्टनर से कुछ पल बात कर वह फ्रेश हो जाता है.
* घर का टेंशन फ्री माहौल उसे हमेशा दुखी व च़िड़चिड़ा होने से बचाता है.
* जहां पति-पत्नी दोनों वर्किंग होते हैं, वहां एक पार्टनर के बीमार होने या नौकरी छूट जाने पर भी टेंशन नहीं होती. पार्टनर का इमोशनल सपोर्ट भी लगातार मिलने से उसका मनोबल नहीं टूटता. जो साथी काम कर रहा है, उसकी आय से घर चलता रहता है.
* एक सर्वे के अनुसार, जिन पुरुषों का वैवाहिक जीवन सफल होता है, वे अपने वर्कप्लेस में भी सक्सेसफुल होते हैं. वे न तो ज़्यादा छुट्टियां लेते हैं और न ही ऑफ़िस देर से पहुंचते हैं.
* सफल शादीशुदा कपल्स की मेंटल हेल्थ पऱफेक्ट होती है.

स्ट्रेस-फ्री लाइफ़स्टाइल आपको फिज़िकली ही नहीं, मेंटली भी फ़िट रखता है.
* घर में अगर तनाव नहीं रहता, तो बाहर जाकर कुछ करने में झुंझलाहट महसूस नहीं होती है. तब पति-पत्नी दोनों की प्रतिभा खुलकर सबके सामने आती है.
सफल शादीशुदा जीवन बिताने वाली पत्नियों को होनेवाले कुछ ख़ास फ़ायदे
* जिन महिलाओं का वैवाहिक जीवन क़ामयाब रहता है, वे खुले मन और सोच के साथ काम कर पाती हैं, जिससे तरक़्क़ी करने के अवसर निरंतर उन्हें मिलते रहते हैं.
* पति का सहयोग मिलने व उनके काम की महत्ता व मांग को समझने के कारण उन्हें रात को देर से घर पहुंचने की टेंशन नहीं होती, जिससे वे अपना 100% काम को दे पाती हैं.
* सफल शादीशुदा जीवन का सबसे बड़ा मानसिक फ़ायदा यह है कि इस कारण पत्नी का एनर्जी लेवल हमेशा हाई रहता है.
* जीवन के प्रति सकारात्मक नज़रिया होने के कारण उन पर प्रेशर कम होते हैं.
* कोई घुटन या कुंठा न होने के कारण वह बेहतर ढंग से समाज में अपना योगदान दे पाती है.
* यदि पति कॉपरेटिव हो, तो पत्नी के सोशल रिलेशनशिप बेहतर होते हैं और वे अपनी क्षमताओं का प्रयोग पूरी तरह से कर पाती हैं.
* यदि पार्टनर समझदार हो, तो अधिक ज़िम्मेदारियां आसानी से पूरे किए जा सकते हैं. तब पत्नी घर व ऑफ़िस में बैलेंस बना पाती है, जिससे उसे मानसिक संतुष्टि होती है कि वह अपने उत्तरदायित्वों को ठीक से निभाने में सक्षम है.
* सुखी विवाहित महिला अपने व्यवहार व मुस्कान से सबका दिल जीत लेती है और प्रशंसा का पात्र बनती है.
* सफल विवाहित कपल्स को दूसरों को सहयोग व सम्मान देने में ख़ुशी मिलती है और इस तरह वे समाज में अपनी एक ख़ास पहचान व जगह बनाने में क़ामयाब हो पाते हैं.

– वत्सल बाजपेयी

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