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10 महिला प्रधान फिल्में हर महिला को देखनी चाहिए (10 Women Oriented Bollywood Films Every Woman Should Watch)

10 महिला प्रधान फिल्में (Women Oriented Films) हर महिला को जरूर देखनी चाहिए, क्योंकि इन फिल्मों ने महिलाओं के जीवन के ऐसे कई पहलुओं को उजागर किया है, जिन पर इससे पहले बात तक नहीं की जाती थी. 10 महिला प्रधान फिल्मों ने कई सामाजिक मान्यताओं को तोड़ा है और समाज को नए सिरे से सोचने पर मजबूर किया है. यदि आपने अभी तक ये फिल्में नहीं देखी हैं, तो आपको ये महिला प्रधान फिल्में जरूर देखनी चाहिए.

Women Oriented Bollywood Films

1) क्वीन (Queen)
महिला प्रधान फिल्मों की बात हो और कंगना रनौत की फिल्म क्वीन का ज़िक्र न हो, ऐसा तो हो ही नहीं सकता. क्वीन फिल्म की सबसे बड़ी ख़ासियत है इस फिल्म का मैसेज. इस फिल्म में ये बताया गया है महिलाओं की चाहतें पुरुषों के सहारे की मोहताज नहीं हैं और कंगना रनौत ने अपनी अदाकरी से महिलाओं की भावनाओं को बहुत दमदार तरीके से प्रस्तुत किया है. यदि आपने अभी तक क्वीन फिल्म नहीं देखी है, तो आपको ये फिल्म ज़रूर देखनी चाहिए.

Queen

2) द डर्टी पिक्चर (The Dirty Picture) 
बॉलीवुड की मोस्ट टेलेंटेड एक्ट्रेस विद्या बालन की बेहतरीन फिल्मों में से एक द डर्टी पिक्चर 80 के दशक की दक्षिण भारतीय फिल्मों की कलाकार सिल्क स्मिता के जीवन पर आधारित थी. द डर्टी पिक्चर फिल्म में रुपहले पर्दे के की चमक के पीछे छुपे अंधेरे को उजागर किया गया. साथ ही महिला के शरीर के प्रति लोगों की मानसिकता को भी दर्शाया गया. इस फिल्म में विद्या बालन की एक्टिंग को खूब सराहा गया.

The Dirty Picture

 

3) लिपस्टिक अंडर माय बुर्का (Lipstick Under My Burka) 
विवादों से घिरी फिल्म लिपस्टिक अंडर माय बुर्का अलग-अलग उम्र की चार ऐसी महिलाओं को कहानी है, तो अपने हिसाब से आज़ादी से ज़िंदगी गुज़ारने में विश्‍वास रखती हैं. कोंकणा सेन शर्मा, रत्ना पाठक शाह, आहना कुमरा, पल्बिता बोरठाकुर ने लिपस्टिक अंडर माय बुर्का फिल्म में दमदार अभिनय किया है. हालांकि इस फिल्म को रिलीज़ होने से पहले सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट मिलने के लिए काफ़ी इंतज़ार करना पड़ा था, लेकिन जब भी महिला प्रधान फिल्म की बात की जाएगी, तो लिपस्टिक अंडर माय बुर्का फिल्म का ज़िक्र ज़रूर होगा.

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Lipstick Under My Burka

4) पार्चड (Parched) 
पार्चड यानी सूखा और इस फिल्म में गांव की तीन स्त्रियों के माध्यम से इस शब्द को भलीभांति प्रस्तुत किया गया है. पार्चड फिल्म में पुरुष प्रधान मानसिकता, महिलाओं पर अत्याचार, बाल विवाह जैसी समस्याओं का कटु सत्य को बहुत तीखे अंदाज़ में पेश किया गया है. पार्चड फिल्म को 24 इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया और इस फिल्म ने 18 अवॉर्ड्स हासिल किए.

Parched

5) ऐंग्री इंडियन गॉडेसेस (Angry Indian Goddesses)
ऐंग्री इंडियन गॉडेसेस फिल्म की कहानी पांच लड़कियों के ईर्दगिर्द घूमती है. ये लड़कियां हंसती भी हैं और रोती भी हैं, मस्ती भी करती हैं और दर्द भी झेलती हैं. इस फिल्म में लड़कियों के साथ छेड़छाड़, कोर्ट में इंसाफ न मिलना, मां-बाप का प्यार न मिलना जैसी कई सामाजिक समस्याओं को उजागर किया गया है. महिलाओं को ये फिल्म भी ज़रूर देखनी चाहिए.

Angry Indian Goddesses

6) चांदनी बार (Chandni Bar) 
चांदनी बार फिल्म मुंबई की बार बालाओं के जीवन पर आधारित है. मधुर भंडारकर की फिल्म चांदनी बार में तब्बू ने अपनी दमदार अदाकारी से मुंबई की बार बालाओं के जीवन को बहुत ही सटीक तरीके से प्रस्तुत किया है. चांदनी बार फिल्म के लिए तब्बू को बेस्ट एक्ट्रेस का अवॉर्ड मिला और इस फिल्म को चार राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले.

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Chandni Bar

7) फायर (Fire)
दीपा मेहता की फिल्म फायर दो महिलाओं के समलैंगिग रिश्तों पर आधारित कहानी है. इस फिल्म को दो साल तक सेंसर बोर्ड की हरी झंडी का इंतज़ार करना पड़ा और दो साल बाद इस फिल्म को एडल्ट कैटेगरी में सिनेमाघरों में दिखाया गया. इस फिल्म में शबाना आज़मी और नंदिता दास की एक्टिंग को बहुत सराहा गया था.

Fire

8) नीरजा (Neerja)
नीरजा फिल्म को सोनम कपूर की बेस्ट फिल्मों में गिना जाता है. फिल्म में प्लेन हाइजैक के दौरान एक एयर होस्टेस किस तरह बहादुरी से अपनी नैतिक और सामाजिक ज़िम्मेदारी निभाती है, इसका बेहतरीन प्रस्तुतिकरण किया गया है. नीरजा फिल्म की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इस फिल्म में कहीं से भी हीरो या अभिनेता की कमी नहीं महसूस होती.

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Neerja

9) मॉम (Mom)
बॉलीवुड की चांदनी श्रीदेवी जी भले ही आज हमारे बीच न हों, लेकिन उनकी फिल्म मॉम महिलाप्रधाान फिल्मों में खास स्थान रखती है. इस फिल्म में बताया गया है कि एक मां अपने बच्चों के लिए क्या कुछ कर सकती है. पूरी फिल्म श्रीदेवी यानी मॉम के ईर्दगिर्द घूमती है. इस फिल्म में भी हीरो की ज़रूरत महसूस नहीं होती.

Mom

10) पिंक (Pink)
तापसी पन्नू की फिल्म पिंक भी लीक से हटकर थी. इस फिल्म की कहानी तीन महिलाओं के ईर्दगिर्द घूमती है और समाज को महिलाओं के बारे में काफी कुछ सोचने पर मजबूर करती है. फिल्म पिंक में बिग बी अमिताभ बच्चन ने भी दमदार अभिनय किया है.

Pink

फिल्म रिव्यू: एक मां की इमोशनल जर्नी है ‘मॉम’ (Movie Review: Mom)

Movie Review: Mom

फिल्म- मॉम

स्टारकास्ट- श्रीदेवी, नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, अक्षय खन्ना, अदनान सिद्दिकी, सजल अली, अभिमन्यु सिंह

निर्देशक- रवि उद्यावर

रेटिंग- 3.5/5

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मॉम पूरी तरह से श्रीदेवी की फिल्म है. मॉम के रोल में श्रीदेवी के अलावा किसी और अभिनेत्री की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. मॉम की कहानी एक संजीदा विषय पर बनी है. इस फिल्म के साथ श्रीदेवी ने 300 फिल्मों के आंकड़े को छू लिया है. आइए, जानते हैं कैसी है मॉम.

कहानी

मॉम की कहानी है एक मां और उसके बदले की. कहानी शुरू होती है बायोलॉजी की टीचर देवकी (श्रीदेवी) के साथ. देवकी के स्कूल में उसकी सौतेली बेटी आर्या (सजल अली) भी पढ़ती है. आर्या अपनी मां से बिल्कुल प्यार नहीं करती, लेकिन उसकी मां उससे बहुत प्यार करती है. आर्या के स्कूल में पढ़ने वाला एक लड़का मोहित, आर्या को अश्लील मैसेजेस भेज कर परेशान करता है. जब इस बात का पता देवकी को चलता है, तो वह उसे सज़ा देती है. मोहित बदला लेने के लिए एक दिन आर्या को किडनैप कर लेता है और उसका रेप करके सड़क पर फेंक देता है. पुलिस ऑफिसर मैथ्यू फ्रांसिस (अक्षय खन्ना) इस केस की तहकीकात करते हैं. कोर्ट केस में सबूतों के अभाव में मोहित केस जीत जाता है. लेकिन एक मां को ये फैसला नागवार गुज़रता है, वो डिटेक्टिव दयाशंकर (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी) की मदद लेती है.यहां से शुरू होता है एक मां का बदला.

यूएसपी

फिल्म की कहानी भले ही नई नहीं हो, लेकिन उसे दिखाने का अंदाज़ बहुत ही अलग है. नए डायरेक्टर रवि उद्यावर का निर्देशन काबिले तारीफ़ है. श्रीदेवी की जितनी तारीफ़ की जाए, उतनी कम है. एक मां का अपने बच्चे के लिए इमोशन और फिर उसकी बेटी का रेप करने वालों के लिए ग़ुस्सा, ये सब देखकर आप एक बार फिर श्रीदेवी के अभिनय के फैन हो जाएेंगे. नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का लुक और उनकी ऐक्टिंग देखने के बाद इस बात का एहसास होता है कि फिल्म में अपने अभिनय की छाप छोड़ने के लिए बड़े-बड़े डायलॉग्स या ज़्यादा फ्रेम्स की ज़रूरत नहीं होती है. एक छोटा-सा रोल करके भी आप पूरी फिल्म अपने नाम कर सकते हैं. पाकिस्तानी ऐक्ट्रेस सजल अली और अदनान सिद्दीकी का अभिनय भी लाजवाब है.

देखने जाएं या नहीं

ज़रूर देखने जाएं ये फिल्म. श्रीदेवी की ऐक्टिंग मिस नहीं कर सकते आप. नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी को एक नए अंदाज़ में देखने का मौक़ा बिल्कुल नहीं छोड़ना चाहिए. इस वीकेंड एक अच्छी और दमदार मैसेज वाली फिल्म आपका इंतज़ार कर रही है.

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मां से पहले मैं

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हर मां के लिए उसका बच्चा सबसे पहले होता है बाकी सब कुछ बाद में. बच्चे के लिए वो ख़ुद को भी भुला देती है. अपनी ज़रूरतों और इच्छाओं का भी उसे ख़्याल नहीं रहता, मगर वो ये भूल जाती है कि जब तक वो ख़ुद स्वस्थ और ख़ुश नहीं रहेगी, अपनी मां होने की ज़िम्मेदारी सौ फीसदी नहीं निभा पाएगी.

गैस पर चाय की केतली चढ़ाने से शुरू हुई मेरी सुबह की रफ़्तार ऑफिस जाकर थोड़ी थम जाती है. सारा दिन फाइलों और कम्प्यूटर कीबोर्ड पर उंगलियां घुमाने के बाद शाम को फिर शुरू होती है किचन की भागदौड़. पति और बच्चों की मनपसंद डिश बनाने के लिए तेज़ी से चलते मेरे हाथ शायद अब अपनी पसंद का खाना बनाना ही भूल गए हैं. टेलीविज़न प्रोग्राम से लेकर खाने का मेनू और घूमने की जगह तक में अब मेरी पसंद मायने नहीं रखती… ये कहानी तक़रीबन हर मां की होती है. बच्चे की पसंद-नापंसद और ज़रूरत का ख़्याल रखना हर मां की ज़िम्मेदारी है, मगर इन सबके साथ ही थोड़ा समय अपने लिए, अपनी पसंद का कोई काम करने के लिए निकालना भी आपके लिए ज़रूरी है. ये मत सोचिए कि कोई और आपसे आकर ये कहेगा कि जाओ, इतने घंटे तुम अपने हिसाब से बिताओ, मैं तुम्हारा बाकी काम कर दूंगी. आपको उन्हीं चौबीस घंटों में से कुछ मिनट या घंटे अपने लिए निकालने होंगे ताकि आप ख़ुद को रिफ्रेश और रिचार्ज कर सकें.

मॉम को क्यों चाहिए मी टाइम?
आपसे आपके घर-परिवार और बच्चों की ख़ुशी जुड़ी हुई है. जब तक आप अंदर से ख़ुश नहीं रहेंगी तब तक अपने परिवार और बच्चे की सही देखभाल नहीं कर पाएंगी. माना आप अपनी ज़िम्मेदारियों से पीछे नहीं हट सकतीं, मगर अपने लिए कुछ समय तो निकाल ही सकती हैं, जब स़िर्फ आप अपने साथ हों यानी उस व़क्त आप मां या पत्नी नहीं स़िर्फ ‘मैं’ हों. मी टाइम का ये मतलब कतई नहीं है कि आप अपने बच्चे को छोड़कर 4-5 घंटे के लिए पार्लर चली जाएं या सहेलियों के साथ घंटों गप्पे मारें, बल्कि सारा काम निपटाकर आधे या एक घंटे के लिए अपने मनमुताबिक कोई भी काम करें.
साइकोथेरेपिस्ट नीता शेट्टी कहती हैं, “हर मां के लिए मी टाइम बहुत ज़रूरी है. इससे फील गुड हार्मोन रिलीज़ होता है, जो स्ट्रेस दूर करके उन्हें इमोशनली और साइकोलॉजिकली ख़ुश रखता है. जब आप ख़ुश रहेंगी, तभी अपने आसपास के लोगों को भी ख़ुश रख सकती हैं. मां चाहे कामकाजी हो या हाउसवाइफ, बच्चे के जन्म के बाद उसकी ज़िंदगी पूरी तरह बदल जाती है. बच्चे और घर-ऑफिस की ज़िम्मेदारियों में उलझकर वो अपने आप को भूल जाती है, जिससे उसका फ्रस्ट्रेशन और तनाव बढ़ने लगाता है. कई मामलों में ये डिप्रेशन का रूप भी अख़्तियार कर लेता है. मेरे पास जितनी भी क्लाइंट आती हैं, मैं उन्हें यही सलाह देती हूं कि कुछ देर के लिए ही सही अपने लिए समय ज़रूर निकालें.”

अपराधबोध क्यों?
“अरे यार दो घंटे हो गए, मेरा बेटा भूखा होगा, जल्दी शॉपिंग करो ना.” नेहा जब भी अपनी दोस्त शिवानी के साथ कहीं बाहर जाती, तो थोड़ी देर में ही जल्दी मचाने लगती थी. इससे कई बार शिवानी को बहुत ग़ुस्सा भी आता था. जल्दी के चक्कर में वो लोग न तो ठीक से शॉपिंग कर पाते हैं और न ही नेहा उस पल को एंजॉय कर पाती थी. फिर एक दिन शिवानी ने नेहा को समझाया, “माना तुम्हें बच्चे की परवाह है, मगर इसका ये मतलब नहीं है कि तुम अपने लिए जीना छोड़ दो. यदि महीने में एक बार वो 3-4 घंटे किसी और के साथ (पापा/दादी या परिवार के किसी अन्य सदस्य) है, तो इसमें गिल्टी फील करने की ज़रूरत नहीं है. तुम हमेशा उसकी हर ज़रूरत का ख़्याल रखती हो, ऐसे में कभी-कभार यदि अपने बारे में सोचती हो, तो इसमें कोई बुराई नहीं है. वैसे भी बच्चे की ज़िम्मेदारी स़िर्फ मां की नहीं, बल्कि पिता की भी होती है. जब वो दोस्तों के साथ मौज-मस्ती करते हैं, तब तुम बच्चे को खाना खिलाने और सुलाने में बिज़ी रहती हो. अगर एक दिन तुम्हारे बिज़ी रहने पर उन्होंने बच्चे को संभाल लिया, तो इसमें कोई बुराई नहीं है.”
मनीषा कहती है, “वर्किंग होने के कारण मैं अपनी बेटी के साथ मुश्किल से 2-3 घंटे बिता पाती हूं. ऑफिस से निकलते ही उसके पास पहुंचने के लिए भागती हूं और छुट्टी का पूरा दिन उसके साथ रहने की कोशिश करती हूं, लेकिन इस वजह से मेरा सोशल दायरा बिल्कुल सिमट गया. कभी शॉपिंग का मन भी होता था, तो नहीं जाती थी, जिससे धीरे-धीरे मेरी ज़िंदगी बोझिल होने लगी. फिर मैंने अपना सोशल दायरा थोड़ा बढ़ाना शुरू किया. कभी-कभार ऑफिस से निकलने के बाद दोस्तों के साथ कॉफी पी लेती या कहीं शॉपिंग के लिए निकल जाती थी. हालांकि ऐसा मैं महीने में एकाध बार ही कर पाती थी, मगर फिर भी इससे मुझे थोड़ा फ्रेश फील होने लगा. 2 घंटे घर देर से पहुंचने पर थोड़ा बुरा ज़रूर लगता, क्योंकि बेटी मेरा इंतज़ार कर रही होती थी. अतः इसकी खानापूर्ति के लिए मैं छुट्टी का पूरा दिन उसके साथ ही रहती हूं.” साइकोलॉजिस्ट मीता दोषी कहती हैं, “अपने लिए टाइम निकालने पर गिल्टी फील करने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि जब आप अपने साथ क्वालिटी टाइम बिताएंगी, ख़ुश और स्ट्रेस फ्री रहेंगी, तभी बच्चे के साथ क्वालिटी टाइम बिता पाएंगी.”

न करें सुपर मॉम बनने की कोशिश
कोई भी इंसान हर काम में परफेक्ट नहीं हो सकता, मगर आजकल की वर्किंग मॉम सुपर/परफेक्ट मॉम बनने के चक्कर में अपना ही नुक़सान कर रही हैं. आप अच्छी मां, पत्नी और बहू नहीं बन पाईं, ये सोचकर परेशान होने की ज़रूरत नहीं है. आपने अपना काम और ज़िम्मेदारी ईमानदारी से निभाई. बस, इतना ही काफ़ी है, लोग क्या कहेंगे की परवाह मत कीजिए. यह बात हमेशा ध्यान में रखें कि आप भी इंसान हैं मशीन नहीं. आपको भी बाकी इंसानों की तरह जीने का अधिकार है. इस सच्चाई को स्वीकार कीजिए कि आप एकसाथ सारे काम नहीं कर सकतीं, जैसे- ऑफिस से आने के बाद आपको खाना भी बनाना है और बच्चे का होमवर्क भी कराना है, तो दोनों काम ख़ुद ही करने की कोशिश में तनावग्रस्त होने की बजाय पति या घर के अन्य सदस्यों की मदद ले सकती हैं. यदि आप किचन में हैं, तो पति से कहें कि वो बच्चे का होमवर्क करवा दे. दूसरों की वाहवाही पाने के चक्कर में हर काम ख़ुद ही करना आपको महंगा पड़ सकता है.

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जिएं उस पल को
काम की प्राथमिकता तय करें, कौन-सा काम ज़्यादा ज़रूरी है और कौन-सा नहीं? जैसे- बहुत दिनों बाद छुट्टी के दिन दोस्तों ने आपको किसी पार्टी में इन्वाइट किया, मगर घर की सफ़ाई करनी है, कबर्ड अरेंज करना है या घर के किसी अन्य काम की वजह से यदि आप दोस्तों को मना करती हैं, तो ये ग़लत है. मना करने के बाद आपके दिल में उनसे न मिल पाने की कसक रह जाएगी और सारा दिन आप उसी बारे में सोचकर परेशान होती रहेंगी, जिससे आप घर का काम भी सही तरह से नहीं कर पाएंगी. अतः बेहतर होगा कि दोस्तों के लिए घर के काम को टाल दें, क्योंकि सफ़ाई तो आप अगले संडे भी कर सकती हैं, मगर दोस्तों के साथ मस्ती का मौक़ा आपको फिर नहीं मिलेगा. अपने इस मी टाइम को यूं ही ज़ाया न होने दें. साथ ही बाहर जाने के बाद उस पल का पूरा मज़ा लें. बार-बार ये न सोचती रहें कि अरे यार! सिंक में पड़े बर्तन और वॉशिंग मशीन में पड़े कपड़े मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे. घर के काम से आप भाग तो नहीं सकतीं, वो तो करना ही है, मगर जब करना होगा उस बारे में तब सोचें. पहले से ही उसके बारे में सोचकर अपना पार्टी मूड क्यों ख़राब करना? घर का बोझ बाहर न ले जाएं. जब जहां हैं उस पल को एंजॉय करें. इससे तनाव दूर हो जाएगा और आप रिलैक्स महसूस करेंगी.

बनें स्मार्ट मॉम
थोड़ी-सी स्मार्टनेस दिखाकर आप न स़िर्फ अपने लिए समय निकाल सकती हैं, बल्कि बच्चे का भी ख़्याल रख सकती हैं. मीनाक्षी कहती हैं, “जब भी मुझे शॉपिंग करनी होती है, तो छुट्टी के दिन अपनी बेटी को लेकर पास के एक मॉल में चली जाती हूं. उस मॉल में गेम सेक्शन हैं जहां बच्चों को एक-डेढ़ घंटे के लिए रखा जाता है. बच्चों के हाथ में स्टिकर लगा देते हैं, जिससे किसी तरह का कंफ्यूज़न नहीं होता. अपने हम उम्र बच्चों के साथ मेरी बेटी भी बहुत एंजॉय करती है और उतनी देर में मैं आराम से शॉपिंग कर लेती हूं. इस तरह हम दोनों की आउटिंग हो जाती है.”

दोस्त/रिश्तेदार आ सकते हैं काम
शहरों में न्यूक्लियर फैमिली के बढ़ते चलन के कारण बच्चों की परवरिश थोड़ी मुश्किल हो गई है. ऐसे में आपके पड़ोसी, दोस्त या नज़दीक में रहने वाले रिश्तेदार आपके बहुत काम आ सकते हैं. दिल्ली की प्रिया कहती हैं, “मेरे इनलॉज़ हमारे साथ नहीं रहते, ऐसे में कभी दोस्तों की गेट-टुगेदर या पति की ऑफिस पार्टी में साथ जाने पर मैं अपनी 4 साल की बेटी को अपनी एक सहेली, जिसका बेटा भी क़रीब 3 साल का है, उसके घर छोड़ देती हूं. उसके घर पर वो आराम से खेलती रहती है और मैं भी अपनी पार्टी एंजॉय करती हूं. मुझे लगता है, जब आपके पैरेंट्स साथ न हों, तो ऐसे दोस्त आपके बहुत काम आ सकते हैं. हां, ये बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि ताली एक हाथ से नहीं बजती, यदि आज वो हमारी मदद कर रही है, तो हमें भी उसकी मदद के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए. जब मेरी सहेली कहीं बाहर जाती है, तो उसके बेटे को मैं संभालती हूं.”

क्वालिटी टाइम है ज़रूरी
साइकोथेरेपिस्ट नीता शेट्टी कहती हैं, ”मेरे पास ऐसे कई केस आए हैं जिनमें मांएं कहती हैं कि वो बच्चे को छोड़कर अकेले कहीं नहीं जा पातीं और यदि जाती भी हैं, तो उन्हें गिल्टी फील होता है कि उन्होंने अपने लाड़ले को अकेला छोड़ दिया. दरअसल, महिलाओं की इस गिल्ट फीलिंग की वजह है हमारी सोसाइटी, जिसमें हमेशा ही महिलाओं को ही त्याग करना सिखाया जाता है. ज़रा याद कीजिए अपना बचपन, क्या आपकी मां ने कभी आपको अकेला छोड़ा था? शायद नहीं, क्योंकि उन्हें हमेशा ये एहसास दिलाया जाता था कि बच्चा स़िर्फ उनकी ज़िम्मेदारी है, मगर ये सोच ग़लत है. मां भी तो आख़िर इंसान ही है, बाकी लोगों की तरह उसे भी तो ख़ुद को रिफ्रेश करने के लिए थोड़े ब्रेक की ज़रूरत होती है. वैसे भी बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिताना ज़्यादा ज़रूरी है न कि क्वांटिटी टाइम. एक रिसर्च में भी ये बात सामने आई है कि हाउसवाइफ की तुलना में कामकाजी महिलाएं अच्छी मां साबित होती हैं, क्योंकि वो बच्चे के साथ क्वालिटी टाइम बिताती हैं, जबकि हाउसवाइफ क्वांटिटी टाइम.”

– कंचन सिंह