Motivational Story

बादशाह अकबर एक रोज़ अपने घोड़े पर बैठकर शाही बाग में घूमने गए, उनके साथ बीरबल भी था.
बाग में चारों ओर हरे-भरे वृक्ष और हरी-हरी घास देखकर अकबर को बहुत आनंद आया और उनका मन प्रसन्न हो गया. लेकिन फिर उनके मन में एक ख़याल आया, उन्हें लगा कि ऐसे हरे-भरे बगीचे में सैर करने के लिए तो घोड़ा भी हरे रंग का ही होना चाहिए.

उन्होंने बीरबल से कहा- बीरबल क्या तुम्हें नहीं लगता कि इस हरे-भरे बाग का मज़ा दुगुना हो जाए, तो मुझे लगता है कि इसके लिए मुझे हरे रंग का घोड़ा चाहिए. तुम मुझे सात दिन में हरे रंग का घोड़ा ला दो. अगर तुम हरे रंग का घोड़ा न ला सके तो हमें अपनी शक्ल मत दिखाना.
वैसे बादशाह अकबर और बीरबल दोनों ही यह अच्छी तरह जानते थे कि हरे रंग का घोड़ा तो होता ही नहीं है, लेकिन बादशाह अकबर को तो बीरबल की परीक्षा लेनी थी, इसलिए उन्होंने बीरबल की बुद्धि को परखने के लिए ये शर्त रखी.

बादशाह अकबर ये देखना और परखना चाहते थे कि क्या इस प्रकार के अटपटे सवाल करने पर बीरबल अपनी हार स्वीकार करके यह कहेगा कि जहांपनाह मैं हार गया… लेकिन क्या ऐसा संभव था क्योंकि बीरबल भी अपने जैसे एक ही थे. बीरबल की तेज़ बुद्धि और हाज़िरजवाबी के सामने सभी को मुंह की ही खानी पड़ती थी. तो इस बार भी बीरबल ने चुनौती स्वीकार कर ली.

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बीरबल इस हरे रंग के छोड़ की खोज के बहाने सात दिन तक इधर-उधर घूमते रहे ताकि इस गुथी को सुलझा सकें और फिर आठवें दिन वे दरबार में हाजिर हुए और बादशाह से बोले- ‘जहांपनाह! मुझे हरे रंग का घोड़ा मिल गया है…
बादशाह बड़े हैरान हुए aur उन्होंने उत्सुकता दिखते हुए कहा कि बीरबल ‘जल्दी बताओ, कहां है हरा घोड़ा?

Akbar Aur Birbal Ki Kahani
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बीरबल ने कहा, ‘बादशाह अकबर, मैंने बड़ी मुश्किल से हरा घोड़ा खोजा है और वो घोड़ा तो आपको मिल ही जाएगा, लेकिन, उसके मालिक ने दो शर्त रखी हैं, उन्हें पूरा करने के बाद ही वो घोड़ा आपका हो सकेगा.

अकबर ने भी फ़ौरन कहा कि जल्दी बताओ कौन सी शर्तें हैं वो, हम ज़रूर पूरा करेंगे.

बीरबल ने भी फ़ौरन जवाब दिया कि पहली शर्त तो यह है कि घोड़ा लेने के लिए आपको स्वयं जाना होगा जहांपनाह!

बादशाह ने कहा-

इसमें कौन सी बड़ी बात है, यह तो बड़ी आसान शर्त है. हम स्वयं जाएंगे… अब बताओ दूसरी शर्त क्या है?

बीरबल ने मुस्कुराते हुए बताया कि जहांपनाह, ‘घोड़ा खास रंग का है, इसलिए उसे लाने का दिन भी खास ही होगा, इसलिए उसका मालिक कहता है कि सप्ताह के सात दिनों के अलावा किसी भी दिन आकर उसे ले जाओ, घोड़ा तुम्हारा होगा.

बीरबल की ये बात सुन बादशाह अकबर बीरबल का मुंह देखते रह गए… बीरबल ने भी हंसते हुए कहा कि महाराज, अब हरे रंग का घोड़ा लाना हो, तो उसकी शर्तें भी माननी ही पड़ेगी, तभी तो ख़ास रंग का घोड़ा आपका होगा.

बीरबल की चतुराई पर बादशाह अकबर खिलखिला कर हंस पड़े. बीरबल की तेज़ बुद्धि से वह खुश हुए और समझ गए कि बीरबल को मूर्ख बनाना या उससे जीत पाना असंभव है!

Akbar Aur Birbal Ki Kahani
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सीख: हर सवाल और हर समस्या का समाधान होता है, बस ज़रूरत है शांत मन से और चतुराई से अपनी बुद्धि का उपयोग कर उपाय खोजने की, जिससे मुश्किल से मुश्किल लग रहे सवाल और समस्या का भी आसानी से हल निकाला जा सकता है!

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बहुत समय पहले की बात है. जंगल के पास एक पहाड़ की ऊंची चोटी पर एक बाज रहता था. वो बाज अक्सर आसपास के ख़रगोशों का शिकार कर अपना पेट आसानी से भर लेता था.

पहाड़ की तराई में बरगद के पेड़ पर एक कौआ भी अपना घोंसला बनाकर रहता था, लेकिन वो कौवा बड़ा ही चालाक और धूर्त था. वो हमेशा इसी प्रयास में लगा रहता कि बिना मेहनत किए ही उसे आसानी से खाना मिल जाए. पेड़ के आसपास जो खरगोश रहते थे, ऊँसेंट वो अक्सर बाज का शिकार होते देखता था. जब भी खरगोश बाहर आते तो बाज ऊंची उड़ान भरता और एकाध खरगोश को उठाकर ले जाता.

रोज़ ये देखते-देखते एक दिन कौए ने सोचा कि यूं तो ये चालाक खरगोश मेरे हाथ नहीं आनेवाले, लेकिन अगर इनका नर्म और स्वादिष्ट मांस खाना है, तो मुझे भी बाज की तरह करना होगा. उसकी ही नक़ल करके अपना शिकार करना होगा. मैं भी एकाएक झपट्टा मारकर खरगोश को पकड़ लूंगा.

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अगले दिन कौए ने भी एक खरगोश को दबोचने की अपनी सोच और योजना को पूरा करने की बात सोची और ऊंची उड़ान भरने की पूरी कोशिश की. फिर उसने जैसे ही खरगोश को देखा तो बाज कि तरह तेज़ रफतार से झपट्टा मारा, लेकिन कौआ तो आख़िर कौवा ही था, उसका बाज का क्या मुकाबला?

तेज़ खरगोश ने उसे देख लिया और झटपट वहां से भागकर चट्टान के पीछे छिप गया. कौवे ने देखा कि खरगोश तो वहां से हट चुका है, इसलिए उसने बिना सोचे-समझे अपनी रफ़्तार कम करनी चाही, पर तब तक देर हो चुकी थी और कौवा इससे पहले कि कुछ और सोच और समझ पाता वो वहां की बड़ी चट्टान से जा टकराया. नतीजा, उसकी चोंच और गर्दन टूट गईं. वो दर्द से तड़प उठा और गंभीर रूप से घायल हो चुका यह. उसे सबक़ भी मिल चुका था कि यूं ही बिना सोचे-समझे नक़ल करना ग़लत है, इसका नतीजा ग़लत ही निकलता है.

सीख: इस कहानी से यही सीख मिलती है कि नकल करने के लिए भी अकल चाहिए. हम अक्सर दूसरों को देख उनकी तरह बनने की चाह में अंधाधुंध नक़ल करने में जुट जाते हैं बिना अपनी शक्ति, मानसिक बल और क्षमता को समझे. अगर नक़ल करनी है या किसी और की तरह बनना है तो प्रेरित हों और मेहनत से सही योजना बनाकर अंजाम दें, वर्ना लेने के देने ही पड़ेंगे!

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एक समय की बात है बादशाह अकबर के दरबार में एक ज्ञानी पंडित आए, वो बादशाह अकबर से वह अपने कुछ प्रश्नों के उत्तर चाहते थे. ज्ञानी पंडित का दावा था कि वो प्रकांड विद्वान हैं और उनके सवालों का जवाब दे पाना किसी के बस की बात नहीं.

बात सच निकली क्योंकि बादशाह अकबर स्वयं पंडित के प्रश्नों के उत्तर देने में खुद को असक्षम महसूस कर रहे थे, इसलिए बादशाह अकबर अपने सलाहकार और अपनी चतुराई व तेज़ बुद्धि के लिए प्रसिद्ध बीरबल को ज्ञानी पंडित के प्रश्नों के उत्तर देने का आदेश दिया.

Akbar and Birbal Story
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बीरबल से ज़ाहिर है कई लोग ईर्ष्या रखते थे तो वो बेहद खुश हुए कि आज बीरबल की हार निश्चित है और अब वो लोग भी बीरबल को नीचा दिखा बदला लेंगे.

तो शुरू हुआ पंडित और बीरबल के बीच ज्ञान युद्ध. पंडित ने बीरबल से कहा कि मैं तुम्हें दो विकल्प देता हूं. पहला विकल्प ये या तो तुम मेरे 100 आसान से सवाल के जवाब दो या फिर दूसरा विकल्प ये है कि तुम मेरे एक मुश्किल सवाल का जवाब दो. बीरबल ने बहुत सोच-विचार के बाद कहा कि मैं आपके एक मुश्किल सवाल का जवाब देना चाहता हूं.

पंडित ने सोचा अब बीरबल फ़ंस गया. उसने बीरबल से पूछा, तो बताओ मुर्गी पहले आई या अंडा…?

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बीरबल ने बिना एक पल की देर किए फ़ौरन पंडित को जवाब दिया कि मुर्गी पहले आई. पंडित ने बीरबल से फिर सवाल किया कि कि तुम इतनी आसानी से कैसे बोल सकते हो कि मुर्गी ही पहले आई?

अब बीरबल ने पंडित से कहा कि यह तो आपका दूसरा सवाल है और आपकी शर्त व विकल्प के अनुसार मुझे आपके एक सवाल का ही जवाब देना था, जो मैं दे चुका हूं.

बीरबल अपनी जगह सही था इसलिए उसकी ऐसी हाज़िरजवाबी के सामने पंडित कुछ बोल नहीं पाया और चुपचाप अपनी हार स्वीकार कर दरबार से चला गया.

Akbar Birbal Ki Khanai
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बीरबल की चतुराई और बुद्धिमानी को देखकर बादशाह अकबर फिर बहुत खुश व गौरवान्वित हुए और उन्हें यह महसूस हुआ कि वाक़ई बीरबल ने साबित कर दिया कि वो दरबार में सलाहकार के रूप में बीरबल कितनी एहमियत रखते हैं.

सीख: प्रश्न या समस्या चाहे जितनी कठिन लगे, लेकिन अपनी सोच, तर्क व समझने की शक्ति, सूझबूझ, संयम व दिमाग़ का सही इस्तेमाल करने से हर सवाल का जवाब और हर समस्या का हल बहुत आसानी से मिल सकता है. इसलिए कभी भी सवालों और समस्याओं से ये सोचकर दूर न भागें कि ये तो हल हो ही नहीं सकती. उनका सामना सूझबूझ व शांत मन-मस्तिष्क से करें.

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दो चूहे बहुत अच्छे दोस्त थे, लेकिन एक चूहा शहर में रहता था और दूसरा गांव में. दोस्त की याद आने पर एक दिन शहर के चूहे को दोस्त से मिलने का मन किया, तो वो चल पड़ा गांव की ओर. गांव पहुंचकर शहरी चूहा सोच रहा था कि ये कैसी जगह है, ना आलीशान इमारतें और ना सुख-सुविधा और साधन.

शहरी चूहा जैसे ही अपने दोस्त के यहां पहुंचा तो गांव के चूहे ने अपने दोस्त का स्वागत बहुत खुशी से किया. दोनों ने खूब सारी बातें की. उसके बाद गांव के चूहे ने कहा कि तुम हाथ-मुंह धोकर आराम करो मैं तुम्हारे लिए खाने का इंतज़ाम करता हूं. गांव का चूहा पास के बगीचे से ताज़ा फल और सब्ज़ियाँ लाया और उसने अपने दोस्त को बड़े प्यार से खाना परोसा. शहरी चूहे ने कहा कि ये कैसा खाना है, इसमें इतना स्वाद नहीं, देहाती चूहे ने कहा कि ये तो एकदम ताज़ा है, तुम्हें पसंद नहीं आया इसके लिए माफ़ी चाहता हूं.

ख़ैर खाने के बाद दोनों गांव की सैर पर निकल पड़े, शहरी चूहे ने गांव के खूबसूरत नजारे और हरियाली का आनंद लिया. शहरी चूहे ने दोस्त से विदा लेते वक्त अपने दोस्त को शहर आने का निमंत्रण दिया और कहा कि तुम वहां आकर देखना वहां का स्वादिष्ट खान-पान और सुख-सुविधा वाला रहन-सहन.

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एक दिन देहाती चूहे ने सोचा चलो शहर जाकर अपने दोस्त से मिल आता हूं और वहां का रहन-सहन देखकर मैं भी मज़े ले लेता हूं. देहाती चूहा शहर पहुंचा तो आलीशान, ऊंची-ऊंची इमारतें देख हैरान हो गया, उसने सोचा कि अब मैं भी यहीं रहूंगा. शहरी चूहा यहां एक बड़े से घर के बिल में रहता था. उतना बड़ा घर देख गांव का चूहा आश्चर्यचकित रह गया. शहरी चूहे ने दोस्त को कहा कि चलो खाना खाते हैं. उसने देखा टेबल पर कई तरह के व्यंजन और पकवान थे. दोनों चूहे खाने के लिए बैठ गए और गांव के चूहे ने पनीर का टुकड़ा चखा, उसे बड़ा स्वादिष्ट लगा, लेकिन अभी दोनों खाना खा ही रहे थे कि घर का नौकर आ गया और उनको वहां देख लकड़ी से उनको भगा दिया. शहर के चूहे ने गांव के चूहे को तुरंत बिल में छुपने को कहा. गांव का चूहा काफी डर गया था.

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शहर के चूहे ने गांव के चूहे को हिम्मत देते हुए कहा कि ये सब तो यहां के जीवन का हिस्सा है, सामान्य बात है. इसके बाद दोनों घूमने गए तो एक फ़ूड स्टोर में ढेर सारा खाना देख उनके मुंह में पानी आ गया. देहाती चूहा काफ़ी खुश हुआ तो शहरी चूहे ने शान दिखाते हुए कहा कि ये देखो इसको कहते हैं खाना, तुम्हारी गांव जैसा नहीं है यहां तो पनीर, बटर, टोस्ट, चीज़ aur ना जाने क्या-क्या है. लेकिन तभी सामने से एक बड़ी सी बिल्ली आती दिखी और चूहों को देख वो उनकी तरफ़ लपकी. शहरी चूहे ने कहा दोस्त जल्दी भागो, दोनों छुप गए और किसी तरह बच गए. देहाती चूहे ने तभी वहां एक पिंजरा देखा और उसके बारे में पूछा क्योंकि उसमें खाना था. शहरी चूहे ने कहा इस खाने के लालच में मत आना, इसमें जाओगे तो पकड़े जाओगे.

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इसके बाद दोनों घर लौट आए लेकिन तभी घर के मालिक का बेटा अपने डॉगी को लेकर आ गया. शहरी चूहे ने फिर अपने दोस्त को जल्दी से बिल में छुपने को कहा और दिलासा दिए कि थोड़ी देर में ये कुत्ता चला जाएगा. कुत्ते के जाने के बाद दोनों चूहे बिल से बाहर आए. इस बार गांव का चूहा पहले से भी ज्यादा डरा हुआ था, क्योंकि लगातार इतने डरावने हादसों से उसकी जान पे बन आई थी. गांव के चूहे ने अपने दोस्त से जाने के लिए इजाजत मांगी और कहा तुमने मेरा ख़याल रखा और स्वादिष्ट खाना भी खिलाया इसके लिए तुम्हारा बहुत-बहुत शुक्रिया, लेकिन भले ही यहां कितनी भी सुविधाएं हैं पर ये भी सच है कि यहां सुकून और शांति नहीं, क्योंकि यहां हर पल जान का जोखिम है और मैं हर दिन अपनी जान को जोखिम में डालकर नहीं रह सकता दोस्त. स्वादिष्ट भोजन और सुख-सुविधाएं अपनी जगह है लेकिन मानसिक सुकून और जान की क़ीमत से बड़ा तो कुछ भी नहीं.
उसके बाद देहाती चूहा गांव के लिए निकल गया और गांव पहुंचकर ही उसने चैन की सांस ली, क्योंकि गांव का सुकून, मानसिक शांति और ताज़ा हवा में जो बात है वो शहरी जीवन में नहीं.

सीख: जान के जोखिम और इतने खतरों से भरी आराम की जिंदगी में सुकून कहां? सुरक्षित जीवन ही सुखी जीवन है, क्योंकि सुख-सुविधाओं और तरह-तरह के टेस्टी भोजन से कहीं ज़्यादा ज़रूरी मन का संतोष और मानसिक शांति व सुकून है!

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एक बार बादशाह अकबर अपने शहजादे के साथ दरबार में पहुंचे. उनका शहज़ादा उनकी गोद में खेल रहा था जिसे देख दरबार में मौजूद हर कोई कह रहा था कि शहजादा दुनिया का सबसे खूबसूरत बच्चा है. सभी की बात सुनकर बादशाह अकबर ने भी कहा कि उनका शहजादा दुनिया का सबसे सुंदर बच्चा है. अकबर की इस बात पर सभी हामी भरते हैं, सिवा बीरबल के, तभी अकबर बीरबल से पूछते हैं कि तुम्हारा इस बारे में क्या कहना है, तुम चुप क्यों हो?

बीरबल: जहांपनाह शहजादा सुंदर है, लेकिन मेरे ख्याल से वो पूरी दुनिया का सबसे सुंदर बच्चा नहीं है.

अकबर: तो तुम्हारे कहने का क्या मतलब है कि शहजादा सुंदर नहीं है?

बीरबल: महाराज, मेरा कहने का मतलब ये नहीं कि शहज़ादा सुंदर नहीं, लेकिन दुनिया में और भी सुंदर बच्चे होंगे.

अकबर: बीरबल अगर ऐसी बात है तो तुम उसे हमारे समक्ष लेकर आओ, जो दुनिया में सबसे सुंदर बच्चा है.

बादशाह की बात सुनकर बीरबल कुछ दिन तक बच्चे की खोज करके दरबार में आते हैं. बीरबल को दरबार में अकेले देख अकबर खुश होकर कहते हैं, तुम अकेले क्यों आए हो, क्या इसका ये मतलब है कि तुम्हें शहजादे से ज़्यादा खूबसूरत बच्चा नहीं मिला? यही सच है ना?

बीरबल: जहांपनाह, मैंने सबसे सुंदर बच्चा खोज लिया है.

अकबर: अगर बच्चा मिल गया है, तो तुम उसे दरबार में क्यों नहीं लाए?

बीरबल: महाराज, मैं उसे दरबार में लेकर नहीं आ सकता, पर मैं आपको उस तक लेकर जा सकता हूं. लेकिन हमें वेष बदलना होगा.

Akbar Birbal Story

अकबर: ठीक है, जब तुम इतने आश्वस्त हो तो हम कल सुबह वेष बदलकर उस बच्चे को देखने जाएंगे.

अगले दिन सुबह बीरबल बादशाह अकबर को एक झोपड़ी के पास लेकर जाता है, जहां एक छोटा-सा बच्चा मिट्टी में खेल रहा होता है.

बीरबल: जहांपनाह वो रहा सबसे सुंदर बच्चा.

अकबर: बीरबल, तुम्हारी यह हिम्मत कि तुमने एक बदसूरत और झोपड़ी में रहने वाले बच्चे को संसार का सबसे सुंदर बच्चा बता दिया. इस बदसूरत बच्चे का हमारे शहज़ादे से क्या मुक़ाबला?

बादशाह की बातें सुनकर बच्चा जोर-जोर से रोने लगता है, जिसे सुनकर उसकी मां झोपड़ी से आती है और गुस्से में कहती है, तुम लोगों की इतनी हिम्मत? मेरे बच्चे को बदसूरत कैसे कह दिया? मेरा बच्चा दुनिया का सबसे सुंदर बच्चा है. अगर दोबारा मेरे बच्चे को बदसूरत कहा, तो मैं तुम दोनों की हड्डी-पसली एक कर दूंगी.

उसके बाद वो मां अपने बच्चे को चुप कराकर खिलाने लगती है और कहती है, मेरा राजा बेटा… मेरा बच्चा दुनिया का सबसे सुंदर बच्चा है. मेरा बेटा सबसे प्यारा और सुंदर है.

बीरबल: महाराज अब आपको सब समझ में आ गया होगा कि मैं क्या कहना चाहता था.

अकबर: बीरबल मैं अच्छे से समझ गया हूं कि तुम्हारा क्या मतलब था.

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बीरबल: महाराज, हर बच्चा उनके माता-पिता के लिए दुनिया का का सबसे सुंदर बच्चा ही होता है. जहांपनाह, मैं बस इतना चाहता हूं कि आप शहजादे को अच्छी तालीम दें और उन्हें चापलूसों से दूर रखें.

अकबर: बीरबल, तुम वाक़ई मेरे सच्चे मित्र और हितैषी हो, तुमने बेबाक़ होकर बिना डरे सच कहा और मेरी आंखें खोल दीं. तुमने फिर साबित कर दिया कि तुम वफ़ादार हो और हमारा व राज्य का भला चाहते हो.

सीख: चापलूसों से बचकर रहना चाहिए और सच बोलने वाले पर भरोसा करना चाहिए. इतनी समझ रखो कि कौन चापलूस है और कौन हितैषी. इसके अलावा, कभी अपने औहदे या किसी चीज का घमंड नहीं करना चाहिए.

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एक गांव में युधिष्ठिर नाम का कुम्हार रहता था. एक दिन वह शराब के नशे में घर आया तो अपने घर पर एक टूटे हुए घड़े से टकराकर गिर पड़ा और उस घड़े के जो टुकड़े जमीन पर बिखरे हुए थे, उनमें से एक नुकीला टुकड़ा कुम्हार के माथे में घुस गया, जिससे उस स्थान पर गहरा घाव हो गया. वो घाव इतना गहरा था कि उसको भरने में काफ़ी लंबा समय लगा. घाव भर तो गया था लेकिन कुम्हार के माथे पर हमेशा के लिए निशान बन गया था.

कुछ दिनों बाद कुम्हार के गांव में अकाल पड़ गया था, जिसके चलते कुम्हार गांव छोड़ दूसरे राज्य में चला गया. वहां जाकर वह राजा के दरबार में काम मांगने गया तो राजा की नज़र उसके माथे के निशान पर पड़ी. इतना बड़ा निशान देख राजा ने सोचा कि अवश्य की यह कोई शूरवीर योद्धा है. किसी युद्ध के दौरान ही इसके माथे पर यह चोट लगी है.

राजा ने कुम्हार को अपनी सेना में उच्च पद दे दिया. यह देख राजा के मंत्री और सिपाही कुम्हार से ईर्ष्या करने लगे. लेकिन वो राजा का विरोध नहीं कर सकते थे, इसलिए चुप रहे. कुम्हार ने भी भी बड़े पद के लालच में राजा को सच नहीं बताया और उसने सोचा अभी तो चुप रहने में ही भलाई है!

समय बीतता गया और एक दिन अचानक पड़ोसी राज्य ने आक्रमण कर दिया. राजा ने भी युद्ध की तैयारियां शुरू कर दी. राजा ने युधिष्ठिर से भी कहा युद्ध में भाग लेने को कहा और युद्ध में जाने से पहले उससे पूछना चाहा कि उसके माथे पर निशान किस युद्ध के दौरान बना, राजा ने कहा- हे वीर योद्धा! तुम्हारे माथे पर तुम्हारी बहादुरी का जो प्रतीक है, वह किस युद्ध में किस शत्रु ने दिया था?

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तब तक कुम्हार राजा का विश्वास जीत चुका था तो उसने सोचा कि अब राजा को सच बता भी दिया तो वो उसका पद उससे नहीं छीनेंगे क्योंकि वो और राजा काफ़ी क़रीब आ चुके थे. उसने राजा को सच्चाई बता दी कि महाराज, यह निशान मुझे युद्ध में नहीं मिला है, मैं तो एक मामूली गरीब कुम्हार हूं. एक दिन शराब पीकर जब मैं घर आया, तो टूटे हुए घड़े से टकराकर गिर पड़ा. उसी घड़े का एक नुकीले टुकड़ा मेरे माथे में गहराई तक घुस गया था जिससे घाव गहरा हो गया था और यह निशान बन गया.

राजा सच जानकर आग-बबूला हो गया. उसने कुम्हार को पद से हटा दिया और उसे राज्य से भी निकल जाने का आदेश दिया. कुम्हार मिन्नतें करता रहा कि वह युद्ध लड़ेगा और पूरी वीरता दिखाएगा, अपनी जान तक वो राज्य की रक्षा के लिए न्योछावर कर देगा, लेकिन राजा ने उसकी बात नहीं सुनी और कहा कि तुमने छल किया और कपट से यह पद पाया. तुम भले ही कितने की पराक्रमी और बहादुर हो, लेकिन तुम क्षत्रियों के कुल के नहीं हो. तुम एक कुम्हार हो . तुम्हारी हालत उस गीदड़ की तरह है जो शेरों के बीच रहकर खुद को शेर समझने लगता है लेकिन वो हाथियों से लड़ नहीं सकता! इसलिए जान की परवाह करो और शांति से चले जाओ वर्ना लोगों को तुम्हारा सच पता चलेगा तो जान से मारे जाओगे. मैंने तुम्हारी जान बख्श दी इतना ही काफ़ी है!

कुम्हार चुपचाप निराश होकर वहां से चला गया.

सीख: सच्चाई ज़्यादा दिनों तक छिप नहीं सकती इसलिए हमेशा सच बोलकर सत्य की राह पर ही चलना चाहिए. झूठ से कुछ समय के लिए फ़ायदा भले ही हो लेकिन आगे चलकर नुक़सान ही होता है. इतना ही नहीं कभी भी घमंड में और अपने फ़ायदे के लिए सुविधा देखकर सच बोलना भारी पड़ता है!

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अकबर जानते थे कि बीरबल के पास हर सवाल का जवाब है और वो बीरबल की बुद्धिमत्ता से भी काफ़ी प्रभावित थे. फिर भी वो समय-समय पर उसे परखते रहते थे और अपने मन में आए सवालों के जवाब मांगते रहते थे. इन दोनों का ऐसा ही एक रोचक किस्सा है,  जिसमें अकबर ने बीरबल से ईश्वर से जुड़े तीन प्रश्न पूछे थे.
वो तीन प्रश्न थे-
1. ईश्वर कहां रहता है ?
2. ईश्वर कैसे मिलता है ?
3. ईश्वर करता क्या है?
जब अकबर ने ये प्रश्न पूछे तो बीरबल बहुत हैरान हुए और उन्होंने कहा कि इन प्रश्नों के उत्तर वह कल बताएंगे. इतना कहकर बीरबल घर लौट आए. बीरबल इन प्रश्नों को लेकर काफ़ी सोच-विचार कर रहे थे, जिसे देख बीरबर के पुत्र ने चिंता का कारण पूछा. बीरबल ने अकबर के तीन प्रश्नों का क़िस्सा बता दिया.

बीरबल के पुत्र ने कहा कि परेशान ना हों वह खुद कल दरबार में बादशाह को इन तीनों प्रश्नों के जवाब देगा और अगले दिन बीरबल अपने पुत्र के साथ दरबार में पहुंचे. बीरबल ने बादशाह से कहा कि आपके तीनों प्रश्नों के जवाब तो मेरा पुत्र भी दे सकता है.

अकबर ने कहा, ठीक है, तो सबसे पहले बताओ कि ईश्वर कहां रहता है?

प्रश्न सुनकर बीरबल के पुत्र ने चीनी मिला हुआ दूध मंगाया और उसने वह दूध अकबर को दिया और कहा कि चखकर बताइए दूध कैसा है?

अकबर ने दूध चखकर बताया कि यह मीठा है.

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इस पर बीरबल के पुत्र ने कहा कि क्या आपको इसमें चीनी दिख रही है?

अकबर ने कहा, नहीं, चीनी तो नहीं दिख रही है, वह तो दूध में घुली हुई है.

बीरबल के पुत्र ने कहा, जहांपनाह, ठीक इसी तरह ईश्वर भी संसार की हर चीज़ में घुला हुआ है, लेकिन दूध में घुली हुई चीनी की तरह दिखाई नहीं देता है.

बादशाह अकबर जवाब से संतुष्ट हो गए.

अकबर ने दूसरा प्रश्न पूछा, ठीक है तो अब ये बताओ कि ईश्वर कैसे मिलता है?

इस प्रश्न का जवाब देने के लिए बीरबल के पुत्र ने इस बार दही मंगवाया और अकबर को दही देते हुए कहा, जहांपनाह, क्या आपको इसमें मक्खन दिखाई दे रहा है?

अकबर ने कहा, दही में मक्खन तो है, लेकिन दही मथने पर ही मक्खन दिखाई देगा.

बीरबल के पुत्र ने कहा, जी हां, ठीक इसी प्रकार ईश्वर भी मन का मंथन करने पर ही मिल सकते हैं.

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बादशाह अकबर इस जवाब से भी संतुष्ट हो गए.

अकबर ने तीसरा प्रश्न पूछा, ईश्वर करता क्या है?

बीरबर के पुत्र ने कहा, इस प्रश्न के जवाब के लिए आपको मुझे गुरु मानना होगा.

बादशाह अकबर ने कहा, ठीक है, अब से तुम मेरे गुरु और मैं तुम्हारा शिष्य.

बीरबल के पुत्र ने आगे कहा, गुरु हमेशा ऊंचे स्थान पर बैठता है और शिष्य हमेशा नीचे बैठता है.

बादशाह अकबर तुरंत ही अपने सिंहासन से उठ गए और बीरबल के पुत्र को सिंहासन पर बैठाकर खुद नीचे बैठ गए.

सिंहासन पर बैठते ही बीरबल के पुत्र ने कहा, जहांपनाह, यही आपके तीसरे प्रश्न का जवाब है. ईश्वर राजा को रंक बनाता है और रंक को राजा बना देता है.

बादशाह अकबर इस जवाब से भी संतुष्ट हो गए और बीरबल के पुत्र की बुद्धिमत्ता से प्रभावित हो उसको ईनाम दिया!

सीख: धैर्य और सूझबूझ से हर प्रश्न का जवाब और हर समस्या का हल पाया जा सकता है!

एक जंगल में किसी बात को लेकर दो बकरियों में झगड़ा हो गया. उनका झगड़ा देख एक साधु वहीं रुक गया.

उसी समय वहां से एक सियार भी गुज़रा, वह बहुत भूखा था और भोजन की तलाश में ही था. जब उसने दोनों बकरियों को झगड़ते देखा, तो वो बेहद खुश हुआ क्योंकि उसको लगा कि उसके भोजन की व्यवस्था हो गई और उन बकरियों को देख उसके मुंह में पानी आ गया.

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देखते ही देखते उन बकरियों की लड़ाई इतनी बढ गई कि दोनों ने एक-दूसरे को लहूलुहान कर दिया. दोनों के शरीर से खून निकलने लगा था. उस सियार ने जब ज़मीन पर फैले खून को देखा, तो उसे चाटने लगा और धीरे-धीरे उनके करीब जाने लगा. खून चाटने के बाद उसकी भूख और लालच और भी ज़्यादा बढ़ गय. उसने सोचा क्यों ना मौक़े का फ़ायदा उठाया जाए और इनकी लड़ाई का लाभ उठाकर इनको मार गिराया जाए और अपनी भूख मिटाई जाए.

बस फिर क्या था, सियार के कदम आगे बढ़ने लगे और दूर खड़ा साधु यह सब देख रहा था. सियार को दोनों बकरियों के बीच जाते हुए जब साधु ने देखा, तो सोचा कि अगर सियार इन दोनों बकरियों के और करीब गया, तो वो मुसीबत में पड़ सकता है और उसकी जान भी जा सकती है.

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लेकिन साधु यह सोच ही रहा था कि तब तक सियार खुद को रोक नहीं पाया और वो दोनों बकरियों के बीच पहुंच गया. बस फिर क्या था, जैसे ही बकरियों ने उस सियार को अपने पास आते देखा, तो दोनों अपनी लड़ाई भूल गईं और लड़ना छोड़कर उस पर हमला कर दिया. सियार इसके लिए तैयार नहीं था. वो समझ ही नहीं पाया और अचानक हुए हमले से वो खुद को संभाल नहीं पाया.

Fighting Goats And The Jackal
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सियार इस हमले में गंभीर रूप से घायल हो गया और भाग खड़ा हुआ, जाने उसकी जान बच भी पाई या नहीं.

इसके बाद बकरियां ने भी लड़ना छोड़ दिया और अपने घर लौट गईं. साधु भी ने भी अपनी राह पकड़ ली.

सीख: अपने लालच पर क़ाबू रखना चाहिए और कभी भी दूसरों की लड़ाई में नहीं कूदना चाहिए. दूसरी ओर किसी को भी कमज़ोर नहीं आंकना चाहिए और हां आपस में भी लड़ना ग़लत है क्योंकि दूसरे इसका फ़ायदा उठा सकते हैं.

मैं उसे कभी बड़ा होने नहीं दूंगी, क्योंकि वह बच्चा मुझे ख़ुश रहना सिखाता है. मुझे ज़िंदा रखता है. मुझमें आशा का संचार करता है. मुझे हमेशा उत्साहित रखता है. मुझे बहुत छोटी-छोटी बातों पर ख़ुश होना सिखाता है.

 Motivational Story

एक छोटा बच्चा है, जो बहुत ख़ुश रहना चाहता है, हर दर्द, हर दुख-तकलीफ़ से दूर जीवन के हर पल का आनंद उठाना चाहता है और जानता भी है. इन बारिशों के दिनों में उसका मन करता है, सुबह-सुबह उठकर हर काम छोड़कर बारिश में ख़ूब भीगे, खेले, सोसायटी के गार्डन में लगे झूले पर बारिश में भीगते हुए ख़ूब झूले. न मिट्टी से उलझन हो, न भीगे कपड़ों से. वह बच्चा कैलोरीज़ की चिंता किए बिना मनपसंद तली-भुनी चीज़ें खाना चाहता है, इसलिए कभी-कभी बिना मन मारे खा भी लेता है.

उसका मन करता है, अपने प्रिय गाने पर उठकर सबके सामने ही ताल से ताल मिला ले, पर सबके सामने न सही अकेले में ख़ुश होकर मनपसंद संगीत पर थिरक ही उठता है. कभी-कभी अपने जैसे किसी दोस्त के साथ साफ़-सफ़ाई को दरकिनार रख सड़क किनारे खड़े हुए गोलगप्पे, कुल्फी के ठेलों पर अंदर की ख़ुशी को दबाता हुआ मुस्कुराते हुए खड़ा होकर आनंद उठा ही लेता है. अमित जब ऑफिस के लिए निकलते हैं, वह बच्चा उन्हें तब तक देखता है, जब तक वे आंखों से ओझल नहीं हो जाते और अगर अमित मोबाइल फोन पर बात करते हुए अपनी धुन में निकल जाएं, पीछे मुड़कर हाथ हिलाकर बाय न करें, तो वह देर तक उदास रहता है. सोचता है, क्या मेरे लिए उनके पास इतना भी समय नहीं कि जो यह छोटी-सी बात उस बच्चे को अच्छी लगती हो, वही बात अमित भूल जाएं. फिर वह दिनभर मन ही मन ईश्‍वर से अमित की सलामती की प्रार्थना करता रहता है. सौरभ और सुरभि को देखकर तो वह बच्चा खिलखिला उठता है. उनके उठने से लेकर रात के सोने तक वह बच्चा उनके आसपास मंडराता रहता है, उनके साथ ज़्यादा से ज़्यादा समय बिताने की चाह में. सौरभ-सुरभि जब उसे उसका मनचाहा समय न देकर अपने फोन, टीवी या लैपटॉप में लगे रहते हैं, वह बच्चा मन ही मन बहुत उदास होता है, लेकिन वह अपने चेहरे से यह ज़ाहिर नहीं होने देता. फिर वह भी चुपचाप अपने किसी काम में लग जाता है.

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उस बच्चे को कुछ नहीं चाहिए, न महंगे कपड़े, न शानदार गिफ्ट्स, वह तो बस अमित, सौरभ-सुरभि के साथ कुछ पल बिताकर ही ख़ुश हो जाता है. वह कितना भी उदास हो, अपने पास इन तीनों की उपस्थिति से ही खिल उठता है.

वह छोटा बच्चा कहीं और नहीं, मेरे मन में छुपा है, मुझमें जीता है, जो पति के साथ, बच्चों के साथ बैठकर कुछ समय बिताकर, जी भरकर हंस-बोलकर अपना जीवन बिताना चाहता है. बच्चे ही तो कई बार कहते हैं, “मॉम, ऐसा लगता है मन से आप बिल्कुल बच्ची हैं.” मैं कहती हूं, “हां, तुम दोनों ने सही अंदाज़ा लगाया है.” अमित के मुंह से भी कई बार सुना है, “सिया, इस घर में दो नहीं, तीन बच्चे हैं.” हां, सच ही तो है, अब तो मैं रात-दिन यह बात महसूस करती हूं और स्वीकार भी कि हां, एक छोटा बच्चा छुपा है मेरे अंदर, जिसे मैं चाहती भी नहीं कि वह कभी बड़ा हो. मैं उसे कभी बड़ा होने भी नहीं दूंगी, क्योंकि वह बच्चा मुझे ख़ुश रहना सिखाता है. मुझे ज़िंदा रखता है. मुझमें आशा का संचार करता है. मुझे हमेशा उत्साहित रखता है. मुझे बहुत छोटी-छोटी बातों पर ख़ुश होना सिखाता है.

कभी-कभी मुझे लगता है हम सबमें छुपा है एक बच्चा, जो व़क्त के थपेड़े खाकर कहीं गुम होता चला जाता है. उसे गुम न होने दें. उसे अंदर ही अंदर प्यार से सहलाते रहें. जानती हूं मैं वह कहीं खो गया, तो मैं भी खो जाऊंगी इस दुनिया की आपाधापी में, जीवन की भागदौड़ में.जगजीत सिंह की वह ग़ज़ल है न- ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, भले छीन लो, मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन, वो काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी… यह लिखनेवाले के दिल में भी यक़ीनन एक छोटा बच्चा था.

 

– हिना अहमद

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