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मूवी रिव्यू: उजड़ा चमन पर बहार आकर रहेगी… (Movie Review Of Ujda Chaman)

उजड़ा चमन (Ujda Chaman) नाम से ही ज़ाहिर होता है कि किसी की दुनिया लूट गई हो जैसे. हां जी, जिनके सिर पर जवानी में ही बहुत कम बाल हो यानी की वे गंजे हों, तो दर्द-ए-दास्तान कुछ ऐसी ही होती है जैसे फिल्म उजड़ा चमन के नायक की है. एक अछूते विषय को कहीं मनोरंजन, तो कहीं गंभीरता से छूने की सार्थक कोशिश की गई है.

Ujda Chaman

 

फिल्म के हीरो चमन यानी सनी सिंह दिल्ली के कॉलेज में हिंदी के शिक्षक हैं. उनके सिर पर बाल न होने पर अक्सर क्लास में उनका मज़ाक उड़ाया जाता है. वहीं वे अपनी शादी को लेकर भी परेशान रहते हैं. ऐसे में काफ़ी मशक्कत के बाद अप्सरा यानी मानवी गगरू मिलती भी है, तो वो ओवरवेट है.

दोनों परफेक्ट कपल, पर कुछ कमी के साथ हैं. गंजेपन के कारण कई रिश्तों का ठुकराया जाना, पंडितजी का अल्टीमेटम कि इस साल शादी नहीं हुई, तो ज़िदगीभर कुंवारा रहना पड़ सकता है, गंजेपन को लेकर शर्मिंदगी, तो मोटापे को लेकर जगहंसाई… इन तमाम बातों से जुड़ी भावनाओं व प्रतिक्रियाओं से होकर गुज़रती है फिल्म.

कन्नड़ फिल्म ओंदु मोट्टया कथे, जिसकी कहानी राज बी. शेट्टी ने लिखी थी, पर आधारित उजड़ा चमन अलग तरह की फिल्म है. यह इस बात पर भी कटाक्ष करती है कि आज भी हमारे देश में गंजापन और मोटापा कितना बड़ा मुद्दा बना हुआ है. ये शादी में रोड़ा होने के साथ-साथ चिंता का विषय भी बना हुआ है.

Ujda Chaman Ujda Chaman

अजय देवगन के सेक्रेटरी कुमार मंगत फिल्म के निर्माता है. उन्हीं के बेटे अभिषेक पाठक ने इस फिल्म से निर्देशन की शुरुआत की है. फिल्म के प्रमोशन में अजय देवगन, कार्तिक आर्यन, पुलकित सम्राट ने भी काफ़ी सहयोग दिया था. इसी विषय पर आयुष्मान खुराना की बाला फिल्म भी अगले हफ़्ते रिलीज होनेवाली है. दोनों ही फिल्मों को लेकर काफ़ी विवाद भी हुआ था. फिर भी यक़ीनन दोनों ही फिल्में दर्शकों का अलग तरह से मनोरंजन करने में कामयाब रहेंगी.

अन्य कलाकारों में सौरभ शुक्ला, ग्रूशा कपूर, अतुल कुमार, शारिब हाशमी, गगन अरोड़ा, करिश्मा शर्मा सभी ने अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है.

Ujda Chaman

गौरव रोशिन का संगीत ठीकठाक है. गुरु रंधावा के गीत कर्णप्रिय पर सामान्य है. सुधीर चौधरी की फोटोग्राफी ख़ूबसूरत व दर्शनीय है. सनी सिंह प्यार का पंचनामा, सोनू के टीटू की स्वीटी, टीवी आदि में अपने अभिनय का जलवा दिखा चुके हैं. यह फिल्म उनके लिए अभिनय सफ़र की एक और मज़बूत कड़ी साबित होगी. गंजापन किसी के जीवन के लिए कितना बड़ा अभिशाप बन जाता है, उजड़ा चमन इसका बेहतरीन उदाहरण है. लीक से हटकर कुछ अलग देखने की चाह हो, तो इसे ज़रूर देखें.

Ujda ChamanUjda Chaman

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फिल्म समीक्षा: लाल कप्तान, घोस्ट- कई फिल्में, अलग-अलग अंदाज़… (Movie Review: Lal Kaptaan, Ghost…)

आज प्रतिशोध, डर, प्यार-रोमांस, उलझते रिश्ते, खेल इन तमाम विषयों से जुड़ी कई फिल्में रिलीज़ हुईं. जहां दर्शक इंसानी फ़ितरत, एहसास के समंदर, भूत की दहशत, जात-पात के मकड़जाल इन तमाम स्थितियों से रू-ब-रू होते हैं. रिलीज़ फिल्मों की इस फेहरिस्त में है- लाल कप्तान, घोस्ट, प से प्यार फ से फरार, याराम, जंक्शन वाराणसी और क्रिकेट.

Lal Kaptaan and Ghost

लाल कप्तान- सैफ अली ख़ान अभिनीत इस फिल्म के पोस्टर, ट्रेलर को लोगों ने ख़ूब पसंद किया था और उन्हें सैफ के जटाधारी अघोरी के अवतार को देखते हुए इसका बेसब्री से इंतज़ार भी था. 17-18 वीं शताब्दी के समय की कहानी है. अंग्रेज़ों का राज, मराठे, नवाब, रुहेलखंडी, निजाम की आपसी लड़ाई व रंजिश के ताने-बाने के साथ प्रतिशोध, रहस्य-रोमांच से भरपूर है लाल कप्तान. यदि आप पीरियड फिल्म देखना पसंद करते हैं और सैफ के फैन हैं, तो एक बार फिल्म ज़रूर देखें. निर्देशन नवदीप सिंह ने इसे हॉलीवुड फिल्मों के अंदाज़ में बनाने की कोशिश की है, जिसमें वे सफल भी रहे हैं. सैफ तो प्रभावित करते ही हैं, साथ ही सोनाक्षी सिन्हा, मानव विज, दीपक डोबरियाल, ज़ोया हुसैन, सिमोन सिंह ने भी अपने क़िरदार के साथ न्याय किया है.

Ghost

घोस्ट- विक्रम भट्ट तो हॉरर मूवी स्पेशलिस्ट बन गए हैं. राज़, 1920 जैसी बेहतरीन डरावनी फिल्में उन्होंने बनाई है और अब घोस्ट लेकर आए हैं. वासु भगनानी की भूत की यह फिल्म सच्ची घटना पर आधारित है, जो लोगों को डराती है, तो रोमांचित भी करती है. पति पर अपनी पत्नी के क़त्ल का इल्ज़ाम है, जबकि उसका कहना है कि वो उसने नहीं किया, बल्कि भूत द्वारा उससे करवाया गया है. शिवम भार्गव व शनाया ईरानी ने अपनी पहली ही फिल्म में प्रभावशाली अभिनय किया है.

Lal Kaptaan

 

प से प्यार फ से फरार- यह फिल्म प्यार को लेकर जाति की दीवार पर कटाक्ष करती है. आए दिन इस पर खाप पंचायत का फरमान में देखने-सुनने मिलता है. जहां ऊंची जाति की लड़की व छोटी जाति के लड़के का प्रेम जाति-बिरादरी को पसंद नहीं आता. इसे लेकर हिंसा, ख़ून-ख़राब आम-सी बात हो गई लगती है. इसमें सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किया गया है. मनोज तिवारी के निर्देशन में जिमी शेरगिल, कुमुद मिश्रा, भावेश कुमार, संजय मिश्रा, ज्योति सिंह, बृजेंद्र काला, गिरीश कुलकर्णी ने ठीकठाक काम किया है.

#Yaaram

 

 

यारम- ट्रिपल तलाक़, दोस्ती, दोस्त की पत्नी से लगाव, फिर हर रिश्ते में उलझन से घिरी है फिल्म यारम. प्रतीक बब्बर, इशिता राज, सिद्धांत कपूर, अनीता राज, दिलीप ताहिल, शुभा राजपूत सभी के अभिनय को देख ऐसा लगता है, जैसे सभी को फिल्म को जैसे-तैसे पूरी करनी की जल्दी थी. उस पर निर्देशक ओवैस ख़ान ने गंभीर विषय को हास्यस्पद बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी.

Junction VaranasiKirket

इसी के साथ जंक्शन वाराणसीक्रिकेट फिल्म भी प्रदर्शित हुईं. एक में भोजपुरी क्रिकेट व भुखमरी से लड़ते संघर्ष को दिखाया गया है, तो  धीरज पंडित निर्देशित जंक्शन वाराणसी, जिसकी शूटिंग उत्तर प्रदेश के भदोही के पिपरी गांव में हुई है, अपना आंशिक प्रभाव ही छोड़ पाती है. देव शर्मा, जरीना वहाब, अंजन श्रीवास्तव, अंजलि अबरोल ने अपनी भूमिकाओं के साथ खानापूर्ति की है.

व्यूवर्स अलर्ट: आज रिलीज़ हुई इन सभी फिल्मों में से लाल कप्तान, घोस्ट और कुछ हद तक प से प्यार फ से फरार ही आपका मनोरंजन कर सकते हैं. अन्य बस समय बिताने के लिए कुछ न होने की स्थिति में देखा जा सकता है.

Lal Kaptaan and Ghost Reviews

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फिल्म समीक्षा: द स्काई इज़ पिंक, पर ज़िंदगी इस कदर गुलाबी नहीं होती. (Movie Review: The Sky Is Pink- Emotional And Inspirational Story)

जब भी प्रेरित करनेवाली सच्ची घटना पर फिल्म बनती है, तब वह न केवल दिलोदिमाग़ को झकझोर देती है, बल्कि ज़िंदगी के प्रति हमारे नज़रिए में भी सुधार करती है. कुछ इसी तरह की फिल्म है द स्काई इज़ पिंक. मोटिवेशनल स्पीकर आयशा चौधरी, जो मात्र 18 साल की उम्र में दर्द से जुड़कर ही सही भरपूर जीवन जीकर सभी को प्रेरणा देकर इस जहां से रुख़सत हो गईं. प्रियंका चोपड़ा, फरहान अख़्तर, ज़ायरा वसीम, रोहित सुरेश सराफ अभिनीत यह फिल्म कम ज़िंदगी का फ़लसफ़ा अधिक है. मौत से संघर्ष, बीमारी से लड़ाई, माता-पिता का अपनी बेटी को बचाने की ज़द्दोज़ेहद बहुत कुछ सोचने-समझने पर मजबूर कर देता है. निर्देशिका शोनाली बोस बधाई की पात्र हैं, जिन्होंने गंभीर विषय को सुलझे हुए तरी़के से क़ाबिल-ए-तारीफ़ बनाया.

The Sky Is Pink

आयशा चौधरी के क़िरदार में ज़ायरा वसीम सूत्रधार के रूप में अपने पैरेंट्स की प्रेम कहानी, उसकी बीमारी और मौत से उसे बचाने को लेकर संघर्ष, भाई रोहित का बहन के प्रति अटूट प्यार आदि के बारे में बताती हैं. आयशा को एससीआईडी  (सिवियर कंबाइन्ड इम्यूनो डेफिशिएंसी) बीमारी है, जिसमें इम्यून सिस्टम बिल्कुल काम नहीं करता और थोड़ा भी एलर्जी व इंफेक्शन होने पर मरीज़ का बचना मुश्किल हो जाता है. आयशा के पहले उसकी बड़ी बहन की भी इससे मृत्यु हो गई है, इसलिए उसके माता-पिता, प्रियंका-फरहान किसी भी तरह से अपनी इस बेटी आयशा को खोना नहीं चाहते. अपनी बेटी को बचाने का उनका संघर्ष दिल्ली से लेकर लंदन तक बदस्तूर चलता रहता है.

कहानी में कई भावनात्मक पड़ाव और उतार-चढ़ाव आते हैं. आयशा की दुर्लभ बीमारी, परिवार का सुख-दुख में एक-दूसरे का साथ, मां का बेटी के लिए किसी भी हद तक गुज़र जाना, पिता का सभी को हौसला बढ़ाना पर अकेले में टूटकर बिखरना… ऐसे कई मानवीय संवेदनाओं को बारीक़ी से ख़ूबसूरती के साथ दिखाया गया है.

The Sky Is Pink

फिल्म की जान इसके सभी पात्र हैं, फिर चाहे वो प्रियंका-फरहान हो या ज़ायरा-रोहित. संवाद-पटकथा सशक्त है, तो गीत-संगीत (प्रीतम) भी मधुर हैं. फिल्म आरएसवीपी मूवीज़, रॉय कपूर फिल्म्स व पर्पल पेबल पिक्चर्स के बैनर तले सिद्धार्थ रॉय कपूर, रोनी स्क्रूवाला व प्रियंका चोपड़ा द्वारा सह-निर्मित है. सच्ची घटनाओं पर आधारित बेहतरीन फिल्मों में से एक है द स्काई इज़ पिंक. दिल में ख़्याल आया कि आसमान तो नीला होता है, फिर गुलाबी से इसका क्या तात्पर्य है. शायद फिल्म का टाइटल ही यह संदेश देना चाह रहा हो कि चमत्कार भी होते हैं और जो दिखता है, ज़रूरी नहीं कि वो ही सच हो… आसमान से आगे जहां और भी है…

The Sky Is PinkThe Sky Is PinkThe Sky Is Pink

माय लिटिल एपिफैनीज किताब की युवा लेखिका आयशा चौधरी जिन पर यह फिल्म बनी है, ने यूं तो कई प्रेरणादायी भाषण दिए थे, पर उनका यह कहना कि मौत अंतिम सत्य है, पर मैंने अपने जीवन में ख़ुशी को अधिक महत्व दिया. यदि आप अपनी ज़िंदगी नहीं बदल सकते, तो आपके पास हमेशा किसी और की ज़िंदगी बेहतर बनाने का विकल्प होता है. और मैंने ख़ुद के लिए हैप्पी पल्मनरी फाइब्रोसिस को चुना… उनकी ये बातें दिल को छू जाती हैं.

इस फिल्म के निर्माता और मुख्य क़िरदार के रूप में प्रियंका चोपड़ा की कोशिश लाजवाब है. शादी के बाद उनका यह कमबैक सराहनीय है. पति निक जोनस ने भी प्रियंका के काम की ख़ूब तारीफ़ की. बकौल उनके प्रियंका ने उन्हें भी इस फिल्म के ज़रिए रुलाया और हंसाया भी है. कुछ फिल्में हिट-सुपरहिट या फिर स्टार रेटिंग से परे बस अच्छी और प्रेरणास्त्रोत होती हैं और वही है द स्काई इज़ पिंक…

– ऊषा गुप्ता

The Sky Is Pink

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फिल्म रिव्यू- एक्शन, थ्रिलर, सस्पेंस-रोमांस से भरपूर साहो… (Film Review- Saaho- Action, Thriller, Suspense-Romance…)

प्रभास व श्रद्धा कपूर की साहो फिल्म आज भारतभर में तीन हज़ार स्क्रिन के साथ रिलीज़ हो गई है. इसके पहले कल यह यूईए में रिलीज़ हुई थी, जहां पर इसे दर्शकों का अच्छा प्रतिसाद मिला. सुजीत द्वारा लिखित व निर्देशित क़रीब पौने तीन घंटे की साहो मारधाड़, रहस्य-रोमांच, एक्शन, लव-रोमांस के साथ भरपूर मनोरंजन करती है. सभी की जिज्ञासा दूर करते हुए ये बता दे कि साहो का अर्थ है ‘जय हो’ यानी ‘ऑल हेल’ (सभी का स्वागत है).

Saaho

यूवी क्रिएशंस व टी-सीरीज़ द्वारा निर्मित साहो की कहानी कई बार देखी गई आम-सी है. एक शख़्स यानी एक्टर प्रभास शहर के लोगों की जान बचाने के लिए ढेरों हथियारों से लैस खलनायकों से अकेला लड़ता है. वह हर क़दम पर उनका डटकर मुक़ाबला करता है. प्रभास का एक्शन, स्टंट, फाइटिंग सीन काबिल-ए-तारीफ़ है. इसमें कई बार उसकी मदद पुलिस के रोल में श्रद्धा कपूर भी करती हैं. ज़बर्दस्त एक्शन के साथ कुछ सस्पेंस भी है, जिसे जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी. पुलिसवाली के क़िरदार में श्रद्धा कपूर ने कई लाजवाब एक्शन व फाइट सीन किए हैं. वे दुश्मनों से लड़ने में प्रभास का भरपूर साथ देती हैं. फाइटिंग के सीन के अलावा गानों में वे बेहद हॉट व दिलकश लगी हैं. इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रभास व श्रद्धा कपूर की केमेस्ट्री लाजवाब है.

Saaho

साहो में वीएफएक्स का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया है. फिल्मों में खलनायकों की भरमार है और सभी लोग दो लाख करोड़ रुपए ढूंढ़ रहे हैं.

हिंदी के अलावा तमिल व तेलगू में भी फिल्म रिलीज़ हुई है, पर गौर करनेवाली बात यह है कि यह डब नहीं हुई है, बल्कि इसे तीनों ही भाषाओं में शूट किया गया है. इसी कारण लोगों की पसंद में फ़र्क़ पड़ सकता है, क्योंकि हिंदी फिल्मों के दर्शक व साउथ फिल्मों के ऑडियंस की पसंद में थोड़ा अंतर है. इसलिए यह कहा जा सकता है कि हिंदी फिल्मों के फैन्स को भले ही फिल्म उतनी ग्रेट न लगे, पर दक्षिण भारतीयों के लिए यह प्रभास की स्पेशल फिल्म है. आख़िरकार बाहुबली 2 के बाद इस फिल्म को उन्होंने दो साल दिए हैं. उनकी मेहनत व जुनून फिल्म में दिखती है.

Saaho Reviews

चंकी पांडे विलेन की भूमिका में सभी से बाज़ी मार ले जाते हैं. अन्य कलाकारों में नील नितिन मुकेश, जैकी श्रॉफ, महेश मांजरेकर, टीनू आनंद, एवलिन शर्मा, अरुण विजय, मंदिरा बेदी, मुरली शर्मा सभी ने अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है.

इसके कई संगीतकार है, जिसमें शंकर-एहसान-लोय, गुरु रंधवा, तनिष्क बागची, बादशाह, एम. घिंबरण हैं. सभी ने अपनी तरफ़ से बेस्ट म्यूज़िक दिया है. शंकर महादेवन, बादशाह, नीति मोहन, तुलसी कुमार, हरिचरण, श्‍वेता मोहन, सिद्धार्थ महादेवन द्वारा गाए गीत सुमधुर हैं. इसमें सायको सैंया… बेहद ख़ूबसूरत बन पड़ा है. बेबी वोन्ट यू टेल मी, इन्नी सोनी, ये छोटा नुवुना, बेड बॉय गाने भी पसंद किए जा रहे हैं.

Saaho

क़रीब 350 करोड़ के बजट में बनी साहो दर्शकों को कितनी पसंद आती है, यह तो कुछ दिनों में ही पता चल जाएगा. लेकिन प्रभास के फैन इससे निराश नहीं होंगे. प्रभास का हर एक्शन, रिएक्शन, डायलॉग उन्हें ख़ूब पसंद आएगा.

Saaho

Saaho

Saaho

Saaho

Saaho

Saaho

 

– ऊषा गुप्ता

फिल्म रिव्यूः नोटबुक और जंगली (Movie Review Of Notebook And Junglee)

Notebook And Junglee

फिल्मः नोटबुक 
कलाकारः जहीर इकबाल, प्रनूतन बहल
निर्देशकः नितिन कक्कड
स्टारः 3.5 

Notebook

नोटबुक साल 2014 में आई थाई फिल्म टीचर्स डायरी का हिंदी एडाप्टेशन है. सलमान ख़ान ने नोटबुक के जरिए अपने दोस्त के बेटे जहीर इकबाल और जानी मानी अभिनेत्री नूतन की ग्रैंडडॉटर प्रनूतन बहल को बॉलीवुड से इंट्रोड्यूस किया है.

कहानीः फिल्म में जहीर इकबाल कबीर नाम के एक एक्स आर्मी अफसर के रोल में हैं जो टीचर के तौर पर कश्मीर के एक स्कूल में जॉइन करते हैं, जहां उन्हें पुरानी टीचर फिरदौस (प्रनूतन बहल) की डायरी मिलती है.  इस नोटबुक में फिरदौस ने अपने  निजी विचार लिखे हैं.  जैसे- जैसे कबीर उस डायरी को पढ़ते हैं वैसे वैसे वो फिरदौस से प्यार करने लगते हैं. फिल्म के दोनों लीड कैरेक्टर ने एक दूसरे को देखा नहीं है.

क्या देंखेंः फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसकी सिनेमाटोग्राफी है, फिल्म की शूटिंग कश्मीर में हुई है और झील के बीच में बना स्कूल बहुत खूबसूरत लगता है. लीड कैरेक्टर्स का काम भी अच्छा है है. प्रनूतन और इकबाल दोनों ने ही अपने रोल के साथ न्याय किया है.

कमियांः  फिल्म की कहानी और स्क्रीनप्ले कमजोर है. जहां फिल्म का पहला हिस्सा ठीक है, वहीं इसके दूसरे हिस्से को जबर्दस्ती खींचा गया है, ख़ासतौर पर क्लाइमेक्स. फिल्म में कश्मीरी पंडितों के पलायन के बारे में भी बताया गया है, जिसकी ज़रूरत नहीं थी.

निर्देशनः  फिल्म के डायरेक्टर नितिन कक्कड़ ‘फिल्मिस्ता’ और ‘मित्रों’ जैसी अच्छी फिल्में बना चुके हैं लेकिन इस बार वे अपना जादू चलाने में नाकाम रहे.

फिल्मः जंगली 
कलाकारः विद्युत जामवाल, अतुल कुलकर्णी, अक्षय ओबेरॉय, आशा भट, पूजा सावंत
निर्देशकः चक रसेल
स्टारः 4 

Junglee

बॉलीवुड में जानवरों पर गिनी-चुनी फिल्में बनी हैं, मगर ‘जंगली’ न केवल आपको राजेश खन्ना की ‘हाथी मेरे साथी’ की याद दिलाएगी, बल्कि कुदरत के मनोरम दृश्यों के साथ रोंगटे खड़े कर देनेवाले ऐक्शन और हाथियों के झुंड की मासूमियत और उनके क्रिया-कलाप आपका मन मोह लेंगे.

कहानीः फिल्म की कहानी राज नायर(विद्युत जामवाल) की है जो जानवरों का डॉक्टर है. राज 10 साल बाद अपनी मां की बरसी के लिए अपने घर उड़ीसा जाता है.  राज के पिता चंद्रलिका में ही हाथियों की सेंचुरी संभालते होते हैं. जहां जाकर उसे पता चलता है कि जंगल में हाथी के दांत की तस्करी की वजह से हाथियों को मारा जा रहा है. घर लौटने के बाद राज अपने बचपन के साथी हाथियों में भोला और दीदी से मिलकर बहुत खुश होता है और पुराने दिनों को याद करता है. लेकिन इसी बीच भोला को मार दिया जाता है. जिसके बाद राज हाथी के दांत की तस्करी रोकने और हाथियों को बचाने में लग जाता है.

निर्देशनः निर्देशक चक रसेल ‘जंगली’ से अपनी बॉलीवुड पारी की शुरुआत कर रहे हैं. हॉलीवुड में ‘मास्क’, ‘स्कॉर्पियन किंग’, ‘इरेजर’ जैसी बम्पर हिट फिल्में दे चुके चक रसेल ने बॉलीवुड की नब्ज को सही ढंग से पकड़ा है. फिल्म में चक रसेल ने एनिमेशन की जगह असली जानवरों को लिया है जो फिल्म का पॉजिटिव पॉइन्ट है.

क्या देखेंः फिल्म में उड़ीसा के मनोहारी जंगलों, नदियों और हाथियों को देखकर दिल खुश हो जाता है. इसके साथ ही एक्शन सीन्स काफी जबर्दस्त हैं. फिल्म में जानवर और इंसान की दोस्ती के साथ ही हाथी के दांत की तस्करी के मुद्दे पर लोगों का ध्यान खींचा गया है.  अगर आपको जानवरों से प्यार है और एक्शन फिल्में आपको पसंद है तो आप ये फिल्म देख सकते हैं.

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मूवी रिव्यूः केसरी और मर्द को दर्द नहीं होता (Movie Review Of Kesari And Mard Ko Dard Nahi Hota)

 

फिल्मः केसरी
स्टार कास्टः  अक्षय कुमार, परिणीति चोपड़ा, मीर सरवर, वंश भारद्वाज
निर्देशकः  अनुराग सिंह
स्टारः 4 स्टार

Movie Review Of Kesari

कहानी: गुलिस्तान फोर्ट पर तैनात हवलदार ईशर सिंह (अक्षय कुमार) ब्रिटिश राज की सेना में कार्यरत है. ईशर को लगता है कि वहां के 21 सैनिकों में अनुशासन की कमी है. वह पहले सिपाहियों को अनुशासन का पाठ पढ़ाता है और फिर उनका सच्चा लीडर बनकर उनमें बहादुरी का जज्बा भरता है. इसी बीच उन्हें पता चलता है कि अफगानी सरगना अफगानी पठानों की एक बड़ी फौज तैयार करके सारागढ़ी पर हमला करने वाला है. अंग्रेजी हुकूमत मदद न भेज पाने की सूरत में ईशर सिंह को उसके जवानों समेत किला छोड़कर भाग जाने की सलाह देती है, मगर ईशर सिंह को याद आ जाती है उस अंग्रेज मेजर की बात, जिसने कहा था कि तुम हिंदुस्तानी कायर हो, इसीलिए हमारे गुलाम होय उस वक्त ईशर सिंह अपनी नौकरी, पैसे या अंग्रेज हुकूमत के लिए लड़ने की बजाय अपने गौरव के लिए शहीद होने का फैसला करता है और उसके इस फैसले में वो 21 जांबाज सिपाही अपने प्राणों की आहुति देने को तैयार हो जाते हैं.

निर्देशनः निर्देशक अनुराग सिंह ने फिल्म के हर एक फ्रेम पर अपनी पकड़ बनाए रखी है. असली कहानी मध्यांतर के बाद शुरू होती है, जब दस हजार अफगानी सारागढ़ी के 21 सिपाहियों पर हमला करते हैं. युद्ध के दृश्यों के स्टंट और कोरियॉग्रफी गजब की है और यह आपके रोंगटे खड़े कर देते हैं. अक्षय को ऐक्शन कुमार के नाम से भी जाना जाता है और निर्देशक ने इसमें हैरतअंगेज ऐक्शन परोसकर उनकी इमेज को खूब भुनाया है. तकनीकी तौर पर फिल्म प्रभावित करती है.

एक्टिंगः लुक और अभिनय के नजरिए से ईशर सिंह के रूप में इसे अक्षय कुमार की अब तक की सबसे उत्कृष्ट परफॉर्मेंस कहें तो गलत न होगा. परिणिती चोपड़ा का रोल बहुत छोटा है. वे कब पर्दे पर आती हैं और कब चली जाती हैं, इसका पता ही नहीं चलता. अफगान सरगना के रूप में राकेश चतुर्वेदी ओम ने अच्छा काम किया है. सिख सिपाहियों के रूप में सभी कलाकारों ने ईमानदार परफॉर्मेंस दी है.

 

फिल्मः मर्द को दर्द नहीं होता
कलाकारः राधिका मदान ,अभिमन्यु दासानी, गुलशन देवैया
निर्देशकः वासन बाला
स्टारः 3.5 स्टार

Movie Review Of Mard Ko Dard Nahi Hota
यह एक टोटल इंटरटेनिंग फिल्म है. फिल्म के निर्देशक वासन वाला ने एक डिफ्रेंट प्लाट उठाया है और उसके साथ पूरा न्याय किया है. इस फिल्म में एक्ट्रेस भाग्यश्री के बेटे अभिमन्यु दासानी डेब्यू कर रहे हैं और उन्होंने अपने अभिनय से साबित कर दिया है कि वे लंबी रेस के घोड़े हैं.

कहानीः सूर्या (अभिमन्यु दासानी) को एक दुर्लभ सुपरहीरो की बीमारी है, जिसकी वजह से उसे दर्द का भी एहसास नहीं होता. इस बीमारी की वजह से उसे सोसाइटी में कहीं भी फिट नहीं माना जाता. वह यह सोचकर बड़ा होता है कि वह एक कराटेमैन है और उसे समाज के गलत लड़कों को सबक सिखाना है.

एक्टिंगः अभिनय के मामले में अभिमन्यु और राधिका दोनों ने कमाल का काम किया है. राधिका की यह दूसरी फिल्म है. इससे पहले वे विशाल भारद्वाज की पटाखा में दिखी थीं. लेकिन इस फिल्म में उनका रोल एकदम अलग है. इस फिल्म में उन्हें ऐक्शन सीन्स करने को मिले हैं. जिसे उन्होंने बख़ूबी निभाया है.

मूवी रिव्यू: लुका छुपी/सोनचिड़िया (Movie Review Of Luka Chuppi And Sonchiriya)

 

कार्तिक आर्यन-कृति सेनन (Kartik Aryan-Kriti Sanon) स्टारर लुका छुपी (Luka Chuppi) मूवी जहां दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करने में कामयाब रही है, वहीं सोनचिड़िया (Sonchiriya) में डाकुओं की ज़िंदगी के अनकहे पहलुओं को पूरी ईमानदारी से दिखाया गया है. ये दोनों ही फिल्में अलग-अलग तरीक़ों से दर्शकों को प्रभावित करने में सफल रही हैं. इसके लिए निर्देशक लक्ष्मण उतेकर और अभिषेक चौबे बधाई के पात्र हैं.

Luka Chuppi And Sonchiriya

प्यार की लुका छुपी

कार्तिक आर्यन-कृति सेनन की फ्रेश जोड़ी ने अपनी लव व कॉमेडी के डबल डोज़ से सभी को प्रभावित किया है. लिव इन रिलेशन, छोटे शहर की मानसिकता, आज के युवापीढ़ी की सोच इन सभी का निर्देशक लक्ष्मण उतेकर ने बारीक़ी से चित्रण किया है.

कार्तिक मथुरा के लोकल केबल चैनल का रिपोर्टर है. कृति सेनन, जो राजनेता विनय पाठक की बेटी अपनी पढ़ाई पूरी करके इंर्टनशिप के लिए कार्तिक के चैनल को ज्वॉइन करती है. दोनों एक-दूसरे को चाहने लगते हैं. कार्तिक चाहता है कि इस प्यार को रिश्ते का नाम दे दिया जाए यानी जल्द से जल्द शादी कर ली जाए. लेकिन कृति की सोच थोड़ी अलग है, वो पहले अपने जीवनसाथी को जानना-परखना चाहती है फिर किसी बंधन में बंधना चाहती है. वो लिव इन में रहकर एक-दूसरे को अच्छी तरह से समझने का प्रस्ताव रखती है. लेकिन कार्तिक संयुक्पत परिवार से है और परिवार की सोच पारंपरिक है. उसे यह ठीक नहीं लगता. इसमें उसका दोस्त अपारशक्ति खुराना आइडिया देता है कि ऑफिस के काम से उन्हें कुछ दिनों के लिए शूट के सिलसिले में ग्वालियर जाना ही है, तो क्यों ने वे अपने इस प्रयोग को वही आज़मा लें. कार्तिक-कृति को भी यह ठीक लगता है और वहां पर दोनों लिव इन में रहने लगते हैं. कहानी में ज़बरर्दस्त मोड़ तब आता है, जब कार्तिक के भाई का साला पंकज त्रिपाठी दोनों को वहां देख लेता है और कार्तिक के परिवार को वहां पर ले आता है. तब ख़ूब ड्रामा, डायलॉगबाज़ी, कभी हंसना, तो कभी रोना जैसी स्थिति बनती-बिगड़ती है, पर आख़िरकार परिवारवाले इस रिश्ते को स्वीकार कर लेते हैं.

ज़रा रुकिए, कहानी में एक और ट्विस्ट है, वो कृति के पिताजी विनय पाठक. वे प्रेम व लिव इन के सख़्त ख़िलाफ़ है. इसके लिए उन्होंने न केवल प्रेमी लोगों का बहिष्कार किया है, बल्कि मथुरा में ऐसे जोड़ों का मुंह काला करवाकर उन्हें बेइज़्ज़त भी किया जाता है.

क्या कृति के पिता कार्तिक के साथ उसके रिश्ते को स्वीकार करेंगे? क्या कार्तिक-कृति एक हो पाएंगे या फिर उनकी प्रेम कहानी अधूरी ही रह जाएगी? या फिर दोनों को लुका छुपी की तरह ही अपने रिश्ते को आगे बढ़ाना होगा? इन तमाम सवालों को जानने के लिए थिएटर में फिल्म देखना ज़रूरी है और तब ही आप सभी के उम्दा मनोरंजन का लुत्फ़ उठा पाएंगे.

फिल्म में कई गानों का रीमिक्स है, जो अलग ढंग से लुभाता है. कोका कोला… पोस्टर छपवा दो अख़बार में गाने तो पहले से हिट हो चुके हैं. तनिष्क बागची, अभिजीत वघानी, केतन सोढ़ा के संगीत मधुर हैं. सभी ने बेहतरीन एक्टिंग की है, ख़ासतौर पर अपारशक्ति खुराना, पंकज त्रिपाठी की परफेक्ट कॉमेडी दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करती है. कार्तिक आर्यन और कृति सेनन ने भी अपने सहज व सशक्त अभिनय से प्रभावित किया है. इसमें कोई दो राय नहीं कि निर्माता दिनेश विजान ने एक मनोरंजक फिल्म देने की कोशिश की है.

Luka Chuppi And Sonchiriya

डैकेतों की ज़िंदगी से रू-ब-रू कराती सोनचिड़िया

यूं तो डाकुओं के जीवन पर कई फिल्में बनी हैं, जैसे शोले, बैंडिट क्वीन, गुलामी, पान सिंह तोमर आदि. लेकिन सोनचिड़िया जैसा ट्रीटमेंट किसी में नहीं दिखा. निर्देशक अभिषेक चौबे ने बड़ी ख़ूबसूरती से डकैतों के जीवन के विभिन्न पहलुओं परिभाषित किया है. यह फिल्म ग्लैमर नहीं पेश करती, बल्कि सिक्के के दूसरे पहलू को सच्चाई के साथ दिखाती है. डाकुओं के गिरोह का बिहड़ जंगलों में रहना, खाने-पीने के लिए संघर्ष करना, उनकी भावनाएं, दर्द को बख़ूबी दर्शया गया है. साथ ही जात-पांत, भेदभाव, ऊंच-नीच, गरीबी, महिलाओं की स्थिति, पुरुषों की मर्दानगी पर भी करारा कटाक्ष किया गया है.

हर कलाकार ने फिर चाहे उसका रोल छोटा हो या बड़ा अपने क़िरदार के साथ न्याय किया है. सुशांत सिंह राजपूत दिनोंदिन अभिनय की ऊंचाइयों को छूते जा रहे हैं. वे अपने रोल में इस कदर रच-बस गए कि एकबारगी यूं लगने लगता है कि यह डाकू तो कितना इनोसेंट है, आख़िर उसके साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है. मनोज बाजपेयी, आशुतोष राणा, रणवीर शौरी, भूमि पेडनेकर अपने लाजवाब अदाकारी से कहानी को बांधे रखते हैं.

रॉनी स्क्रूवाला निर्मित सोनचिड़िया दर्शकों को अपराधियों की एक अलग ही दुनिया से रू-ब-रू कराती है. अनुज राकेश धवन की सिनेमौटोग्राफी काबिल-ए-तारीफ़ है. मेघना सेन की एडिटिंग बेजोड़ है. संगीत ठीक-ठाक है. फिल्म की कहानी अभिषेक चौबे और सुदीप शर्मा ने मिलकर लिखी है. फिल्म में अपराध, मारधाड़, एक्शन-ड्रामा सब कुछ है, जो आमतौर पर पसंद किया जाता है. वैसे डकैतों पर बनी बेहतरीन फिल्मों में से एक है सोनचिड़िया.

– ऊषा गुप्ता

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मूवी रिव्यूः टोटल धमाल मनोरंजन से मालामाल (Movie Review: Total Dhamaal Full On Comic Entertainer)

इंद्र कुमार निर्देशित टोटल धमाल (Total Dhamaal) मनोरंजन से भरपूर मसाला फिल्म है. इसमें 17 साल बाद अनिल कपूर-माधुरी दीक्षित एक बार फिर साथ दिखेंगे. अजय देवगन, रितेश देशमुख, अरशद वारसी की तिकड़ी कह सकते हैं तीन गुना कॉमेडी का तड़का देती है.

Total Dhamaal

कहानी बस इतनी-सी है कि मनोज पाहवा को करोड़ों का ख़ज़ाना मिलता है, जो वो अपने दोस्त अजय देवगन व संजय मिश्रा को धोखा देकर कहीं छिपा देता है. लेकिन जब तक अजय-संजय ख़ज़ाने तक पहुंचते हैं, तब तक कई लोगों को इसके बारे में पता चल जाता है और वे भी इसे ढूढ़ने के लिए निकल पड़ते है. इस खोजी टीम में अनिल-माधुरी, अरशद, रितेश, ईशा गुप्ता, पितोबश, जावेद, जॉनी लीवर, महेश मांजरेकर आदि हैं. उनकी इस सर्च जर्नी में उन्हें रोमांच, डर, डांस, मस्ती, एक्शन, एडवेंचर्स इन सबसे दो-चार होना पड़ता है.

सोनाक्षी सिन्हा पर फिल्माये गए गीत मुंगडा मुंगडा मैं गुड़ की डली… पैसा ये पैसा… रीमिक्स आकर्षित करते हैं. प्रीतम चक्रवर्ती के संगीत के साथ-साथ शान, ज्योतिका टांगरी, देव नेगी, अदिति सिंह शर्मा व हार्डी संधु की मधुर आवाज़ में गाए गए ये गीत समां बांध देते हैं.

फॉक्स स्टार स्टूडियोज द्वारा प्रस्तुत अजय देवगन फिल्मस, इंद्र कुमार, अशोक ठकेरिया, अधिकारी ब्रदर्स, आनंद पंडित, फॉक्स स्टार स्टूडियोज द्वारा निर्मित व इनके अलावा कुमार मंगत पाठक व संगीता अहीर द्वारा सह-निर्मित टोटल धमाल वाकई में मनोरंजन से भरपूर मज़ेदार फिल्म है. वैसे फिल्म रिलीज़ से पहले इसके ट्रेलर ख़ास कर अलग-अलग भाषाओं में बनाए गए ट्रेलर ने भी दर्शकों का ख़ूब मनोरंजन किया था.

मल्टी स्टारर इस फिल्म में विदेशी बंदर क्रिस्टल के अलावा वनमानुष, शेर, हाथी, गेंडा, सांप आदि के भी विदेशों में फिल्माए गए मज़ेदार सीन है. क्रिस्टल ने तो कई हॉलीवुड फिल्मों में भी अपनी उछल-कूद, गुलाटियों आदि का जलवा दिखाया है.

धमाल, डबल धमाल का सीक्वल तीसरी कड़ी टोटल धमाल फुल कॉमेडी टाइमपास मूवी है. ख़ज़ाने की खोज में इतने उतार-चढ़ाव, मोड़ के साथ-साथ कलाकारों की परफेक्ट कॉमेडी को देख दर्शक हंसते-हंसते लोटपोट हो जाते हैं. सभी कलाकारों ने मनोरंजन का ज़बर्दस्त धमाका पेश किया है.

टोटल धमाल की ख़ास बात रही कलाकारों को टक्कर देता जानवरों का लाजवाब अभिनय. यदि आप भी हंसी का पागलपन व दीवानगी देखना चाहते हैं, तो तर्क-वितर्क को अलग रखते हुए इस फिल्म को देखने का लुत्फ़ उठा सकते हैं, क्योंकि यह है पैसा वसूल कॉमेडी.

– ऊषा गुप्ता

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Movie Review: वाय चीट इंडिया (Movie Review of Why Cheat India)

. स्टार कास्ट: इमरान हाशमी , श्रेया धनंवतरी

– निर्देशक: सौमिक सेन

. रेटिंगः 3 स्टार

Why Cheat India

 

इमरान हाशमी स्टारर इस फिल्म में भारतीय एजुकेशन सिस्टम से जुड़ी परेशानियों और परीक्षा के दौरान होने वाले वाली चीटिंग को दर्शाया गया है जिसे चीटिंग माफिया अंजाम देते हैं.

Why Cheat India

कहानीः राकेश सिंह उर्फ रॉकी(इमरान हाशमी) अपने परिवार और सपनों को पूरा करने के लिए चीटिंग की दुनिया में निकल पड़ता है. राकेश वह माफिया है जो शिक्षा व्यवस्था की खामियों का जमकर फायदा उठाता है. राकेश गरीब और अच्छे पढ़ने वाले स्टूडेंट्स को इस्तेमाल करता है. वो उन गरीब बच्चों से अमीर बच्चों की जगह एंट्रेंस एग्जाम्स दिलवाता है और बदले में उन्हें पैसे देता है. उसे लगता है कि अमीर बच्चों से पैसे लेकर गरीब बच्चों को उनकी जगह एग्जाम दिलाकर और उन्हें पैसे देकर वो कोई अपराध नहीं कर रहा है. लेकिन फिर तभी उसका एक गेम गलत हो जाता है और वो पुलिस के हत्ते चढ़ जाता है.

एक्टिंगः परफॉर्मेंस की बात करें तो इमरान हाशमी ने हमेशा की तरह बेहतरीन परफॉर्म किया है .इमरान ने जिस तरह खुद को राकेश के किरदार में ढाला है, वो काबिलेतारीफ हैं. फिल्म में श्रेया धनवंतरी ने भी अच्छा परफॉर्म किया है, जिनकी यह पहली फिल्म है. सहयोगी कास्ट परफेक्ट हैं.

संगीतः फिल्म में कई संगीतकारों की मौजूदगी में ‘दिल में हो तुम’, ‘कामयाब’, ‘फिर मुलाकात’ जैसे गाने अच्छे बन पड़े हैं.

क्यों देखेंः अगर आपको एजुकेशन सिस्टम में होने वाली चीटिंग के बारे में जानना है तो आप ये फिल्म देख सकते हैं.

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मूवी रिव्यू: मोहल्ला अस्सी/पीहू- दो ख़ूबसूरत प्रस्तुति- एक व्यंग्यात्मक तो दूसरी में मासूम अदाकारी (Movie Review: Mohalla Assi/Pihu- Remarkable Performances And Thought Provoking Scripts)

 

 Mohalla Assi/Pihu
मोहल्ला अस्सी- धर्म, संस्कृति, राजनीति पर करारा व्यंग्य

एक ओर सनी देओल अलग व दमदार अंदाज़ में नज़र आते हैं मोहल्ला अस्सी में, तो वहीं पीहू में दो साल की बच्ची की मासूम अदाकारी बेहद प्रभावित करती है.

हिंदी साहित्यकार काशीनाथ सिंह की काशी का अस्सी पर आधारित मोहल्ला अस्सी फिल्म धर्म, राजनीति, आस्था, परंपरा आदि के माननेवाले को बहुत पसंद आएगी. भारतीय सोच पर भी करारा व्यंग्य किया गया है. वैसे भी जो मज़ा बनारस में वो न पेरिस में है, न फारस में… इसी चरितार्थ करती है फिल्म. निर्माता विनय तिवारी की यह फिल्म चाणक्य सीरियल व पिंजर मूवी फेम डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी  के बेहतरीन निर्देशन के कारण बेहद आकर्षक व ख़ास बन गई है. बनारस के निवासी, गंगा नदी, घाट, गली-मोहल्ले, वहां के तौर-तरी़के, लोगों की विचारधारा, राजनीति का प्रभाव, धर्म, कर्मकांड सभी का ख़ूबसूरत चित्रण किया गया है.

कहानी बनारस के मोहल्ला अस्सी की है, जहां पर धर्मराज पांडे यानी सनी देओल ब्राह्मणों की बस्ती में अपनी पत्नी साक्षी तंवर और बच्चों के साथ रहते हैं. वे जजमानों की कुंडली बनाते हैं और संस्कृत भी पढ़ाते हैं. अपने धर्म व उससे जुड़ी अन्य बातों को लेकर वे इतने सख़्त रहते हैं कि अपने मोहल्ले में विदेशी सैलानियों को किराए पर घर रहने के लिए नहीं देते और न ही अन्य लोगों को ऐसा करने देते हैं. उनका मानना है कि विदेशियों के खानपान व आचरण के सब गंदा व अपवित्र हो रहा है. लेकिन हालात करवट बदलते हैं और उन्हें आख़िरकार न चाहते हुए वो सब करना पड़ता है, जिसके वे सख़्त ख़िलाफ़ थे. फिल्म में पप्पू चाय की दुकान भी है, जो किसी संसद से कम नहीं. जहां पर वहां के लोग हर मुद्दे पर गरमागरम बहस करते हैं, फिर चाहे वो राजनीति का हो या फिर कुछ और.

सनी देओल अपनी भाव-भंगिमाएं व प्रभावशाली संवाद अदाएगी से बेहद प्रभावित करते हैं. उनका बख़ूबी साथ देते हैं साक्षी तंवर, रवि किशन, सौरभ शुक्ला, राजेंद्र गुप्ता, मिथलेश चतुर्वेदी, मुकेश तिवारी, सीमा आज़मी, अखिलेंद्र मिश्रा आदि. अमोद भट्ट का संगीत स्तरीय है. विजय कुमार अरोड़ा की सिनेमाटोग्राफी क़ाबिल-ए-तारीफ़ है.

Mohalla Assi/Pihu

Pihu

 

पीहू- नन्हीं बच्ची का कमाल

निर्देशक विनोद कापड़ी की मेहनत, लगन और धैर्य की झलकियां बख़ूबी देखने मिलती है पीहू फिल्म में. आख़िरकार उन्होंने दो साल की बच्ची से कमाल का अभिनय करवाया है. कथा-पटकथा पर भी उन्होंने ख़ूब मेहनत की है. निर्माता सिद्धार्थ रॉय कपूर, रोनी स्क्रूवाला व शिल्पा जिंदल बधाई के पात्र हैं, जो उन्होंने विनोदजी और फिल्म पर अपना विश्‍वास जताया. बकौल विनोदजी यह सच्ची घटना पर आधारित है और इस पर फिल्म बनाना उनके लिए किसी चुनौती से कम न था.

फिल्म की जान है पीहू यानी मायरा विश्‍वकर्मा. उस नन्हीं-सी बच्ची ने अपने बाल सुलभ हरकतों, शरारतों, मस्ती, सादगी, भोलेपन से हर किसी का दिल जीत लेती है.

कहानी बस इतनी है कि पीहू की मां (प्रेरणा विश्‍वकर्मा) का देहांत हो चुका है और उनकी बॉडी के साथ वो मासूम बच्ची घंटों घर के कमरे में अकेले व़क्त बिताती है. उसे नहीं पता कि उसकी मां अब इस दुनिया में नहीं है, वो मासूम उनसे बात करती है, घर में इधर-उधर घूमती है, भूख लगने पर गैस जलाकर रोटी भी सेंकने की कोशिश करती है, घर को अस्त-व्यस्त, उल्टा-पुल्टा कर देती है. सीन दर सीन उत्सुकता, डर, घबराहट, बेचैनी भी बढ़ती जाती है. कम बजट में विनोदजी ने लाजवाब फिल्म बनाई है.

– ऊषा गुप्ता

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मूवी रिव्यू: ठग्स ऑफ हिंदोस्तान- अमिताभ बच्चन और आमिर ख़ान की ज़बर्दस्त जुगलबंदी (Movie Review: Thugs Of Hindostan- A Double Bonanza Of Amitabh Bachchan And Aamir Khan)

Thugs Of Hindostan

जब दो दिग्गज कलाकार आपस में टकराते हैं, तो धमाका तो होना ही है. दिवाली पर दर्शकों व अमिताभ बच्चन व आमिर ख़ान के प्रशंसकों के लिए ख़ास बंपर ऑफर के रूप में है ठग्स ऑफ हिंदोस्तान. पहली बार इन दो मंजे हुए कलाकारों ने साथ काम किया है. सिल्वर स्क्रीन पर इनकी अदाकारी देख आपका भी दिल कह उठेगा- भई वाह!… बेहतरीन… लाजवाब.

साल 1839 में फिलिप मीडोज टेलर द्वारा लिखे गए उपन्यास कन्फेशंस ऑफ ए ठग पर आधारित है यह फिल्म. कहानी तो ख़ूबसूरत है ही, उस पर विजय कृष्णा आचार्य का निर्देशन काबिल-ए-तारीफ़ है.

फिल्म में उन दिनों के बारे में दिखाया गया है, जब साल 1795 में अंग्रेज़ भारत पर राज़ कर रहे थे और उन्होंने बिज़नेस के साथ-साथ देश पर भी अपना दबदबा बना लिया. उनके इसी घुसपैठ और अत्याचार का विरोध करते हुए उनसे जब-तब मुकाबला करता रहता है आज़ाद यानी अमिताभ बच्चन, जिनका बख़ूबी साथ देती हैं फातिमा शेख. कहानी में मोड़ तब आता है, जब अंग्रेज़ों द्वारा आज़ाद के लिए बिछाए गए जाल में वे ख़ुद ही फंस जाते हैं यानी वे आमिर ख़ान को फिरंगी मल्लाह के रूप में आज़ाद से टक्कर लेने के लिए इस्तेमाल करते हैं. लेकिन शुरू में साथ देने के बाद फिरंगी को अपनी ग़लती का एहसास होता है और वो अंग्रेज़ों को छोड़ आज़ाद का साथ देने लगता है.

अमिताभ बच्चन व आमिर ख़ान की सशक्त अभिनय की जुगलबंदी का अच्छा साथ दिया है कैटरीना कैफ और फातिमा सना शेख ने.

पीरियड फिल्म होने के कारण कलाकारों के परिधान, लोकेशन, संवाद अदायगी सब कुछ बेहद आकर्षित करती है.

फिल्म में अजय-अतुल व जॉन स्टीवर्ट का संगीत सुमधुर होने के साथ कहानी को बांधे रखने में भी मदद करता है. सुखविंदर, विशाल ददलानी, श्रेया घोषाल, सुनिधि चौहान,द्वारा गाए सभी गाने कर्णप्रिय हैं, फिर चाहे वो मंज़ूरे खुदा हो या सुरैय्या…

भारतीय दर्शकों के लिए इस फेस्टिवल के मौसम में सबसे ख़ूबसूरत प्यार भरा तोहफ़ा है यह फिल्म.

– ऊषा गुप्ता

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बाज़ार मूवी रिव्यू: यहां सब बिकता है- वफ़ादारी, ईमानदारी, इंसानियत… (Bazaar Movie Review: A Cut-throat Share Market Of Lies And Dishonesty)

Bazaar Movie Review

 

“यहां पैसा भगवान नहीं, पर भगवान से कम भी नहीं…” फिल्म का यह संवाद बहुत कुछ बयां कर जाता है. यूं तो बिज़नेस, पैसा, बाज़ार पर कई फिल्में बनी है, पर सैफ अली ख़ान की बाज़ार इन सबसे अलग है. शेयर मार्केट में पैसे कमाने के लिए छल, कपट, धोखा, फरेब सब कुछ दांव पर लगाते हैं सैफ. उनके लिए पैसा ही सब कुछ है और बाज़ार में टॉप पर बने रहने के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं यानी साम, दंड, भेद अपनाकर बस मुनाफ़ा कमाना उनका एकमात्र लक्ष्य है. बहुत अरसे के बाद सैफ अली ख़ान ने उम्दा अभिनय किया है. उनकी अदाकारी से ऐसा लगता है, जैसे यह भूमिका उनके सिवा कोई और बेहतरीन तरी़के कर ही नहीं सकता था.

निर्माता निखिल आडवाणी की फिल्म बाज़ार एक्शन, थ्रिलर, रोमांच से भरपूर है. गौरव के. चावला का निर्देशन लाजवाब है. जाने-माने अभिनेता विनोद मेहरा के बेटे रोहन मेहरा इस फिल्म से फिल्मी दुनिया में क़दम रख रहे हैं. अपनी पहली ही फिल्म में उन्होंने बेहद प्रभावित किया है. फिल्म में वे सैफ को बराबरी का टक्कर देते नज़र आते हैं. बहुमुखी प्रतिभा की धनी राधिका आप्टे भी ग़ज़ब की लगी हैं. चित्रागंदा सिंह हमेशा की तरह बोल्ड व ग्लैमरस से भरपूर बेजोड़ हैं. सौरभ शुक्ला, अनुप्रिया गोयनका, डेंज़िल स्मिथ, एली एवराम ने भी बेहतरीन अदाकारी का नज़ारा पेश किया है.

फिल्म में संगीतकारों का तो मेला लगा है- यो यो हनी सिंह, बिलाल सईद, कनिका कपूर आदि. लेकिन फिल्म की गति में संगीत थोड़ा-सा खटकता है, पर फिर भी ठीक है. पिछले तीन हफ़्तों से वीकेंड पर दर्शकों का भरपूर मनोरंजन हो रहा है. पहले अंधाधुन फिर बधाई हो और अब बाज़ार यानी दर्शकों को हर हफ़्ते एक ज़बर्दस्त और बेहतरीन फिल्म देखने को मिल रही है.

Kashi - In Search of Ganges

काशी- इन सर्च ऑफ गंगा

धीरज कुमार की काशी बहुत कुछ कहती है. शरमन जोशी व ऐश्‍वर्या देवन का अभिनय और मनीष किशोर की कहानी फिल्म को अंत तक बांधे रखती है. धीरज कुमार द्वारा निर्देशित यह एक एडवेंचर्स व फुल ड्रामा से भरपूर फिल्म है. शरमन जोशी अपनी लापता बहन गंगा को जब खोजने निकलता है, तब कई रहस्यों का ख़ुलासा होता है. प्रेम, भावनाएं, प्रतिशोध, एक्शन सभी का मिला-जुला मसाला परोसा गया है. वाराणसी यानी बनारस के ख़ूबसूरत लोकेशन पर शूट की गई पूरी फिल्म आकर्षित करती है. अन्य कलाकारों में मनोज पाहवा, गोविंद नामदेव, अखिलेंद्र मिश्रा, क्रांति प्रकाश झा, गौरीशंकर, मनोज जोशी भी प्रभावित करते हैं.

Dassehra

दशहरा

नील नितिन मुकेश बहुत दिनों बाद अपने एक्टिंग का जादू बिखेर रहे हैं. एक हॉस्टल में चार लोगों की आत्महत्या करने की ख़बर मिलती है, पर पुलिस द्वारा खोजबीन करने व गुत्थियां सुलझाने पर पता चलता है कि यह तो मर्डर है. नील, टीना देसाई, गोविंद नामदेव, अश्‍विनी कासलेकर, पंकज झा, निशा डे, मुरली शर्मा, शुभांगी गोखले आदि ने अपनी भूमिकाओं ठीकठाक निभाई है, पर फिर भी फिल्म अधिक प्रभावित नहीं कर पाती है. मनीष वात्सलया का निर्देशन स्तरीय है.

– ऊषा गुप्ता

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