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मूवी रिव्यूः केसरी और मर्द को दर्द नहीं होता (Movie Review Of Kesari And Mard Ko Dard Nahi Hota)

 

फिल्मः केसरी
स्टार कास्टः  अक्षय कुमार, परिणीति चोपड़ा, मीर सरवर, वंश भारद्वाज
निर्देशकः  अनुराग सिंह
स्टारः 4 स्टार

Movie Review Of Kesari

कहानी: गुलिस्तान फोर्ट पर तैनात हवलदार ईशर सिंह (अक्षय कुमार) ब्रिटिश राज की सेना में कार्यरत है. ईशर को लगता है कि वहां के 21 सैनिकों में अनुशासन की कमी है. वह पहले सिपाहियों को अनुशासन का पाठ पढ़ाता है और फिर उनका सच्चा लीडर बनकर उनमें बहादुरी का जज्बा भरता है. इसी बीच उन्हें पता चलता है कि अफगानी सरगना अफगानी पठानों की एक बड़ी फौज तैयार करके सारागढ़ी पर हमला करने वाला है. अंग्रेजी हुकूमत मदद न भेज पाने की सूरत में ईशर सिंह को उसके जवानों समेत किला छोड़कर भाग जाने की सलाह देती है, मगर ईशर सिंह को याद आ जाती है उस अंग्रेज मेजर की बात, जिसने कहा था कि तुम हिंदुस्तानी कायर हो, इसीलिए हमारे गुलाम होय उस वक्त ईशर सिंह अपनी नौकरी, पैसे या अंग्रेज हुकूमत के लिए लड़ने की बजाय अपने गौरव के लिए शहीद होने का फैसला करता है और उसके इस फैसले में वो 21 जांबाज सिपाही अपने प्राणों की आहुति देने को तैयार हो जाते हैं.

निर्देशनः निर्देशक अनुराग सिंह ने फिल्म के हर एक फ्रेम पर अपनी पकड़ बनाए रखी है. असली कहानी मध्यांतर के बाद शुरू होती है, जब दस हजार अफगानी सारागढ़ी के 21 सिपाहियों पर हमला करते हैं. युद्ध के दृश्यों के स्टंट और कोरियॉग्रफी गजब की है और यह आपके रोंगटे खड़े कर देते हैं. अक्षय को ऐक्शन कुमार के नाम से भी जाना जाता है और निर्देशक ने इसमें हैरतअंगेज ऐक्शन परोसकर उनकी इमेज को खूब भुनाया है. तकनीकी तौर पर फिल्म प्रभावित करती है.

एक्टिंगः लुक और अभिनय के नजरिए से ईशर सिंह के रूप में इसे अक्षय कुमार की अब तक की सबसे उत्कृष्ट परफॉर्मेंस कहें तो गलत न होगा. परिणिती चोपड़ा का रोल बहुत छोटा है. वे कब पर्दे पर आती हैं और कब चली जाती हैं, इसका पता ही नहीं चलता. अफगान सरगना के रूप में राकेश चतुर्वेदी ओम ने अच्छा काम किया है. सिख सिपाहियों के रूप में सभी कलाकारों ने ईमानदार परफॉर्मेंस दी है.

 

फिल्मः मर्द को दर्द नहीं होता
कलाकारः राधिका मदान ,अभिमन्यु दासानी, गुलशन देवैया
निर्देशकः वासन बाला
स्टारः 3.5 स्टार

Movie Review Of Mard Ko Dard Nahi Hota
यह एक टोटल इंटरटेनिंग फिल्म है. फिल्म के निर्देशक वासन वाला ने एक डिफ्रेंट प्लाट उठाया है और उसके साथ पूरा न्याय किया है. इस फिल्म में एक्ट्रेस भाग्यश्री के बेटे अभिमन्यु दासानी डेब्यू कर रहे हैं और उन्होंने अपने अभिनय से साबित कर दिया है कि वे लंबी रेस के घोड़े हैं.

कहानीः सूर्या (अभिमन्यु दासानी) को एक दुर्लभ सुपरहीरो की बीमारी है, जिसकी वजह से उसे दर्द का भी एहसास नहीं होता. इस बीमारी की वजह से उसे सोसाइटी में कहीं भी फिट नहीं माना जाता. वह यह सोचकर बड़ा होता है कि वह एक कराटेमैन है और उसे समाज के गलत लड़कों को सबक सिखाना है.

एक्टिंगः अभिनय के मामले में अभिमन्यु और राधिका दोनों ने कमाल का काम किया है. राधिका की यह दूसरी फिल्म है. इससे पहले वे विशाल भारद्वाज की पटाखा में दिखी थीं. लेकिन इस फिल्म में उनका रोल एकदम अलग है. इस फिल्म में उन्हें ऐक्शन सीन्स करने को मिले हैं. जिसे उन्होंने बख़ूबी निभाया है.

मूवी रिव्यू: लुका छुपी/सोनचिड़िया (Movie Review Of Luka Chuppi And Sonchiriya)

 

कार्तिक आर्यन-कृति सेनन (Kartik Aryan-Kriti Sanon) स्टारर लुका छुपी (Luka Chuppi) मूवी जहां दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करने में कामयाब रही है, वहीं सोनचिड़िया (Sonchiriya) में डाकुओं की ज़िंदगी के अनकहे पहलुओं को पूरी ईमानदारी से दिखाया गया है. ये दोनों ही फिल्में अलग-अलग तरीक़ों से दर्शकों को प्रभावित करने में सफल रही हैं. इसके लिए निर्देशक लक्ष्मण उतेकर और अभिषेक चौबे बधाई के पात्र हैं.

Luka Chuppi And Sonchiriya

प्यार की लुका छुपी

कार्तिक आर्यन-कृति सेनन की फ्रेश जोड़ी ने अपनी लव व कॉमेडी के डबल डोज़ से सभी को प्रभावित किया है. लिव इन रिलेशन, छोटे शहर की मानसिकता, आज के युवापीढ़ी की सोच इन सभी का निर्देशक लक्ष्मण उतेकर ने बारीक़ी से चित्रण किया है.

कार्तिक मथुरा के लोकल केबल चैनल का रिपोर्टर है. कृति सेनन, जो राजनेता विनय पाठक की बेटी अपनी पढ़ाई पूरी करके इंर्टनशिप के लिए कार्तिक के चैनल को ज्वॉइन करती है. दोनों एक-दूसरे को चाहने लगते हैं. कार्तिक चाहता है कि इस प्यार को रिश्ते का नाम दे दिया जाए यानी जल्द से जल्द शादी कर ली जाए. लेकिन कृति की सोच थोड़ी अलग है, वो पहले अपने जीवनसाथी को जानना-परखना चाहती है फिर किसी बंधन में बंधना चाहती है. वो लिव इन में रहकर एक-दूसरे को अच्छी तरह से समझने का प्रस्ताव रखती है. लेकिन कार्तिक संयुक्पत परिवार से है और परिवार की सोच पारंपरिक है. उसे यह ठीक नहीं लगता. इसमें उसका दोस्त अपारशक्ति खुराना आइडिया देता है कि ऑफिस के काम से उन्हें कुछ दिनों के लिए शूट के सिलसिले में ग्वालियर जाना ही है, तो क्यों ने वे अपने इस प्रयोग को वही आज़मा लें. कार्तिक-कृति को भी यह ठीक लगता है और वहां पर दोनों लिव इन में रहने लगते हैं. कहानी में ज़बरर्दस्त मोड़ तब आता है, जब कार्तिक के भाई का साला पंकज त्रिपाठी दोनों को वहां देख लेता है और कार्तिक के परिवार को वहां पर ले आता है. तब ख़ूब ड्रामा, डायलॉगबाज़ी, कभी हंसना, तो कभी रोना जैसी स्थिति बनती-बिगड़ती है, पर आख़िरकार परिवारवाले इस रिश्ते को स्वीकार कर लेते हैं.

ज़रा रुकिए, कहानी में एक और ट्विस्ट है, वो कृति के पिताजी विनय पाठक. वे प्रेम व लिव इन के सख़्त ख़िलाफ़ है. इसके लिए उन्होंने न केवल प्रेमी लोगों का बहिष्कार किया है, बल्कि मथुरा में ऐसे जोड़ों का मुंह काला करवाकर उन्हें बेइज़्ज़त भी किया जाता है.

क्या कृति के पिता कार्तिक के साथ उसके रिश्ते को स्वीकार करेंगे? क्या कार्तिक-कृति एक हो पाएंगे या फिर उनकी प्रेम कहानी अधूरी ही रह जाएगी? या फिर दोनों को लुका छुपी की तरह ही अपने रिश्ते को आगे बढ़ाना होगा? इन तमाम सवालों को जानने के लिए थिएटर में फिल्म देखना ज़रूरी है और तब ही आप सभी के उम्दा मनोरंजन का लुत्फ़ उठा पाएंगे.

फिल्म में कई गानों का रीमिक्स है, जो अलग ढंग से लुभाता है. कोका कोला… पोस्टर छपवा दो अख़बार में गाने तो पहले से हिट हो चुके हैं. तनिष्क बागची, अभिजीत वघानी, केतन सोढ़ा के संगीत मधुर हैं. सभी ने बेहतरीन एक्टिंग की है, ख़ासतौर पर अपारशक्ति खुराना, पंकज त्रिपाठी की परफेक्ट कॉमेडी दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करती है. कार्तिक आर्यन और कृति सेनन ने भी अपने सहज व सशक्त अभिनय से प्रभावित किया है. इसमें कोई दो राय नहीं कि निर्माता दिनेश विजान ने एक मनोरंजक फिल्म देने की कोशिश की है.

Luka Chuppi And Sonchiriya

डैकेतों की ज़िंदगी से रू-ब-रू कराती सोनचिड़िया

यूं तो डाकुओं के जीवन पर कई फिल्में बनी हैं, जैसे शोले, बैंडिट क्वीन, गुलामी, पान सिंह तोमर आदि. लेकिन सोनचिड़िया जैसा ट्रीटमेंट किसी में नहीं दिखा. निर्देशक अभिषेक चौबे ने बड़ी ख़ूबसूरती से डकैतों के जीवन के विभिन्न पहलुओं परिभाषित किया है. यह फिल्म ग्लैमर नहीं पेश करती, बल्कि सिक्के के दूसरे पहलू को सच्चाई के साथ दिखाती है. डाकुओं के गिरोह का बिहड़ जंगलों में रहना, खाने-पीने के लिए संघर्ष करना, उनकी भावनाएं, दर्द को बख़ूबी दर्शया गया है. साथ ही जात-पांत, भेदभाव, ऊंच-नीच, गरीबी, महिलाओं की स्थिति, पुरुषों की मर्दानगी पर भी करारा कटाक्ष किया गया है.

हर कलाकार ने फिर चाहे उसका रोल छोटा हो या बड़ा अपने क़िरदार के साथ न्याय किया है. सुशांत सिंह राजपूत दिनोंदिन अभिनय की ऊंचाइयों को छूते जा रहे हैं. वे अपने रोल में इस कदर रच-बस गए कि एकबारगी यूं लगने लगता है कि यह डाकू तो कितना इनोसेंट है, आख़िर उसके साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है. मनोज बाजपेयी, आशुतोष राणा, रणवीर शौरी, भूमि पेडनेकर अपने लाजवाब अदाकारी से कहानी को बांधे रखते हैं.

रॉनी स्क्रूवाला निर्मित सोनचिड़िया दर्शकों को अपराधियों की एक अलग ही दुनिया से रू-ब-रू कराती है. अनुज राकेश धवन की सिनेमौटोग्राफी काबिल-ए-तारीफ़ है. मेघना सेन की एडिटिंग बेजोड़ है. संगीत ठीक-ठाक है. फिल्म की कहानी अभिषेक चौबे और सुदीप शर्मा ने मिलकर लिखी है. फिल्म में अपराध, मारधाड़, एक्शन-ड्रामा सब कुछ है, जो आमतौर पर पसंद किया जाता है. वैसे डकैतों पर बनी बेहतरीन फिल्मों में से एक है सोनचिड़िया.

– ऊषा गुप्ता

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मूवी रिव्यूः टोटल धमाल मनोरंजन से मालामाल (Movie Review: Total Dhamaal Full On Comic Entertainer)

इंद्र कुमार निर्देशित टोटल धमाल (Total Dhamaal) मनोरंजन से भरपूर मसाला फिल्म है. इसमें 17 साल बाद अनिल कपूर-माधुरी दीक्षित एक बार फिर साथ दिखेंगे. अजय देवगन, रितेश देशमुख, अरशद वारसी की तिकड़ी कह सकते हैं तीन गुना कॉमेडी का तड़का देती है.

Total Dhamaal

कहानी बस इतनी-सी है कि मनोज पाहवा को करोड़ों का ख़ज़ाना मिलता है, जो वो अपने दोस्त अजय देवगन व संजय मिश्रा को धोखा देकर कहीं छिपा देता है. लेकिन जब तक अजय-संजय ख़ज़ाने तक पहुंचते हैं, तब तक कई लोगों को इसके बारे में पता चल जाता है और वे भी इसे ढूढ़ने के लिए निकल पड़ते है. इस खोजी टीम में अनिल-माधुरी, अरशद, रितेश, ईशा गुप्ता, पितोबश, जावेद, जॉनी लीवर, महेश मांजरेकर आदि हैं. उनकी इस सर्च जर्नी में उन्हें रोमांच, डर, डांस, मस्ती, एक्शन, एडवेंचर्स इन सबसे दो-चार होना पड़ता है.

सोनाक्षी सिन्हा पर फिल्माये गए गीत मुंगडा मुंगडा मैं गुड़ की डली… पैसा ये पैसा… रीमिक्स आकर्षित करते हैं. प्रीतम चक्रवर्ती के संगीत के साथ-साथ शान, ज्योतिका टांगरी, देव नेगी, अदिति सिंह शर्मा व हार्डी संधु की मधुर आवाज़ में गाए गए ये गीत समां बांध देते हैं.

फॉक्स स्टार स्टूडियोज द्वारा प्रस्तुत अजय देवगन फिल्मस, इंद्र कुमार, अशोक ठकेरिया, अधिकारी ब्रदर्स, आनंद पंडित, फॉक्स स्टार स्टूडियोज द्वारा निर्मित व इनके अलावा कुमार मंगत पाठक व संगीता अहीर द्वारा सह-निर्मित टोटल धमाल वाकई में मनोरंजन से भरपूर मज़ेदार फिल्म है. वैसे फिल्म रिलीज़ से पहले इसके ट्रेलर ख़ास कर अलग-अलग भाषाओं में बनाए गए ट्रेलर ने भी दर्शकों का ख़ूब मनोरंजन किया था.

मल्टी स्टारर इस फिल्म में विदेशी बंदर क्रिस्टल के अलावा वनमानुष, शेर, हाथी, गेंडा, सांप आदि के भी विदेशों में फिल्माए गए मज़ेदार सीन है. क्रिस्टल ने तो कई हॉलीवुड फिल्मों में भी अपनी उछल-कूद, गुलाटियों आदि का जलवा दिखाया है.

धमाल, डबल धमाल का सीक्वल तीसरी कड़ी टोटल धमाल फुल कॉमेडी टाइमपास मूवी है. ख़ज़ाने की खोज में इतने उतार-चढ़ाव, मोड़ के साथ-साथ कलाकारों की परफेक्ट कॉमेडी को देख दर्शक हंसते-हंसते लोटपोट हो जाते हैं. सभी कलाकारों ने मनोरंजन का ज़बर्दस्त धमाका पेश किया है.

टोटल धमाल की ख़ास बात रही कलाकारों को टक्कर देता जानवरों का लाजवाब अभिनय. यदि आप भी हंसी का पागलपन व दीवानगी देखना चाहते हैं, तो तर्क-वितर्क को अलग रखते हुए इस फिल्म को देखने का लुत्फ़ उठा सकते हैं, क्योंकि यह है पैसा वसूल कॉमेडी.

– ऊषा गुप्ता

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Movie Review: वाय चीट इंडिया (Movie Review of Why Cheat India)

. स्टार कास्ट: इमरान हाशमी , श्रेया धनंवतरी

– निर्देशक: सौमिक सेन

. रेटिंगः 3 स्टार

Why Cheat India

 

इमरान हाशमी स्टारर इस फिल्म में भारतीय एजुकेशन सिस्टम से जुड़ी परेशानियों और परीक्षा के दौरान होने वाले वाली चीटिंग को दर्शाया गया है जिसे चीटिंग माफिया अंजाम देते हैं.

Why Cheat India

कहानीः राकेश सिंह उर्फ रॉकी(इमरान हाशमी) अपने परिवार और सपनों को पूरा करने के लिए चीटिंग की दुनिया में निकल पड़ता है. राकेश वह माफिया है जो शिक्षा व्यवस्था की खामियों का जमकर फायदा उठाता है. राकेश गरीब और अच्छे पढ़ने वाले स्टूडेंट्स को इस्तेमाल करता है. वो उन गरीब बच्चों से अमीर बच्चों की जगह एंट्रेंस एग्जाम्स दिलवाता है और बदले में उन्हें पैसे देता है. उसे लगता है कि अमीर बच्चों से पैसे लेकर गरीब बच्चों को उनकी जगह एग्जाम दिलाकर और उन्हें पैसे देकर वो कोई अपराध नहीं कर रहा है. लेकिन फिर तभी उसका एक गेम गलत हो जाता है और वो पुलिस के हत्ते चढ़ जाता है.

एक्टिंगः परफॉर्मेंस की बात करें तो इमरान हाशमी ने हमेशा की तरह बेहतरीन परफॉर्म किया है .इमरान ने जिस तरह खुद को राकेश के किरदार में ढाला है, वो काबिलेतारीफ हैं. फिल्म में श्रेया धनवंतरी ने भी अच्छा परफॉर्म किया है, जिनकी यह पहली फिल्म है. सहयोगी कास्ट परफेक्ट हैं.

संगीतः फिल्म में कई संगीतकारों की मौजूदगी में ‘दिल में हो तुम’, ‘कामयाब’, ‘फिर मुलाकात’ जैसे गाने अच्छे बन पड़े हैं.

क्यों देखेंः अगर आपको एजुकेशन सिस्टम में होने वाली चीटिंग के बारे में जानना है तो आप ये फिल्म देख सकते हैं.

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मूवी रिव्यू: मोहल्ला अस्सी/पीहू- दो ख़ूबसूरत प्रस्तुति- एक व्यंग्यात्मक तो दूसरी में मासूम अदाकारी (Movie Review: Mohalla Assi/Pihu- Remarkable Performances And Thought Provoking Scripts)

 

 Mohalla Assi/Pihu
मोहल्ला अस्सी- धर्म, संस्कृति, राजनीति पर करारा व्यंग्य

एक ओर सनी देओल अलग व दमदार अंदाज़ में नज़र आते हैं मोहल्ला अस्सी में, तो वहीं पीहू में दो साल की बच्ची की मासूम अदाकारी बेहद प्रभावित करती है.

हिंदी साहित्यकार काशीनाथ सिंह की काशी का अस्सी पर आधारित मोहल्ला अस्सी फिल्म धर्म, राजनीति, आस्था, परंपरा आदि के माननेवाले को बहुत पसंद आएगी. भारतीय सोच पर भी करारा व्यंग्य किया गया है. वैसे भी जो मज़ा बनारस में वो न पेरिस में है, न फारस में… इसी चरितार्थ करती है फिल्म. निर्माता विनय तिवारी की यह फिल्म चाणक्य सीरियल व पिंजर मूवी फेम डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी  के बेहतरीन निर्देशन के कारण बेहद आकर्षक व ख़ास बन गई है. बनारस के निवासी, गंगा नदी, घाट, गली-मोहल्ले, वहां के तौर-तरी़के, लोगों की विचारधारा, राजनीति का प्रभाव, धर्म, कर्मकांड सभी का ख़ूबसूरत चित्रण किया गया है.

कहानी बनारस के मोहल्ला अस्सी की है, जहां पर धर्मराज पांडे यानी सनी देओल ब्राह्मणों की बस्ती में अपनी पत्नी साक्षी तंवर और बच्चों के साथ रहते हैं. वे जजमानों की कुंडली बनाते हैं और संस्कृत भी पढ़ाते हैं. अपने धर्म व उससे जुड़ी अन्य बातों को लेकर वे इतने सख़्त रहते हैं कि अपने मोहल्ले में विदेशी सैलानियों को किराए पर घर रहने के लिए नहीं देते और न ही अन्य लोगों को ऐसा करने देते हैं. उनका मानना है कि विदेशियों के खानपान व आचरण के सब गंदा व अपवित्र हो रहा है. लेकिन हालात करवट बदलते हैं और उन्हें आख़िरकार न चाहते हुए वो सब करना पड़ता है, जिसके वे सख़्त ख़िलाफ़ थे. फिल्म में पप्पू चाय की दुकान भी है, जो किसी संसद से कम नहीं. जहां पर वहां के लोग हर मुद्दे पर गरमागरम बहस करते हैं, फिर चाहे वो राजनीति का हो या फिर कुछ और.

सनी देओल अपनी भाव-भंगिमाएं व प्रभावशाली संवाद अदाएगी से बेहद प्रभावित करते हैं. उनका बख़ूबी साथ देते हैं साक्षी तंवर, रवि किशन, सौरभ शुक्ला, राजेंद्र गुप्ता, मिथलेश चतुर्वेदी, मुकेश तिवारी, सीमा आज़मी, अखिलेंद्र मिश्रा आदि. अमोद भट्ट का संगीत स्तरीय है. विजय कुमार अरोड़ा की सिनेमाटोग्राफी क़ाबिल-ए-तारीफ़ है.

Mohalla Assi/Pihu

Pihu

 

पीहू- नन्हीं बच्ची का कमाल

निर्देशक विनोद कापड़ी की मेहनत, लगन और धैर्य की झलकियां बख़ूबी देखने मिलती है पीहू फिल्म में. आख़िरकार उन्होंने दो साल की बच्ची से कमाल का अभिनय करवाया है. कथा-पटकथा पर भी उन्होंने ख़ूब मेहनत की है. निर्माता सिद्धार्थ रॉय कपूर, रोनी स्क्रूवाला व शिल्पा जिंदल बधाई के पात्र हैं, जो उन्होंने विनोदजी और फिल्म पर अपना विश्‍वास जताया. बकौल विनोदजी यह सच्ची घटना पर आधारित है और इस पर फिल्म बनाना उनके लिए किसी चुनौती से कम न था.

फिल्म की जान है पीहू यानी मायरा विश्‍वकर्मा. उस नन्हीं-सी बच्ची ने अपने बाल सुलभ हरकतों, शरारतों, मस्ती, सादगी, भोलेपन से हर किसी का दिल जीत लेती है.

कहानी बस इतनी है कि पीहू की मां (प्रेरणा विश्‍वकर्मा) का देहांत हो चुका है और उनकी बॉडी के साथ वो मासूम बच्ची घंटों घर के कमरे में अकेले व़क्त बिताती है. उसे नहीं पता कि उसकी मां अब इस दुनिया में नहीं है, वो मासूम उनसे बात करती है, घर में इधर-उधर घूमती है, भूख लगने पर गैस जलाकर रोटी भी सेंकने की कोशिश करती है, घर को अस्त-व्यस्त, उल्टा-पुल्टा कर देती है. सीन दर सीन उत्सुकता, डर, घबराहट, बेचैनी भी बढ़ती जाती है. कम बजट में विनोदजी ने लाजवाब फिल्म बनाई है.

– ऊषा गुप्ता

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मूवी रिव्यू: ठग्स ऑफ हिंदोस्तान- अमिताभ बच्चन और आमिर ख़ान की ज़बर्दस्त जुगलबंदी (Movie Review: Thugs Of Hindostan- A Double Bonanza Of Amitabh Bachchan And Aamir Khan)

Thugs Of Hindostan

जब दो दिग्गज कलाकार आपस में टकराते हैं, तो धमाका तो होना ही है. दिवाली पर दर्शकों व अमिताभ बच्चन व आमिर ख़ान के प्रशंसकों के लिए ख़ास बंपर ऑफर के रूप में है ठग्स ऑफ हिंदोस्तान. पहली बार इन दो मंजे हुए कलाकारों ने साथ काम किया है. सिल्वर स्क्रीन पर इनकी अदाकारी देख आपका भी दिल कह उठेगा- भई वाह!… बेहतरीन… लाजवाब.

साल 1839 में फिलिप मीडोज टेलर द्वारा लिखे गए उपन्यास कन्फेशंस ऑफ ए ठग पर आधारित है यह फिल्म. कहानी तो ख़ूबसूरत है ही, उस पर विजय कृष्णा आचार्य का निर्देशन काबिल-ए-तारीफ़ है.

फिल्म में उन दिनों के बारे में दिखाया गया है, जब साल 1795 में अंग्रेज़ भारत पर राज़ कर रहे थे और उन्होंने बिज़नेस के साथ-साथ देश पर भी अपना दबदबा बना लिया. उनके इसी घुसपैठ और अत्याचार का विरोध करते हुए उनसे जब-तब मुकाबला करता रहता है आज़ाद यानी अमिताभ बच्चन, जिनका बख़ूबी साथ देती हैं फातिमा शेख. कहानी में मोड़ तब आता है, जब अंग्रेज़ों द्वारा आज़ाद के लिए बिछाए गए जाल में वे ख़ुद ही फंस जाते हैं यानी वे आमिर ख़ान को फिरंगी मल्लाह के रूप में आज़ाद से टक्कर लेने के लिए इस्तेमाल करते हैं. लेकिन शुरू में साथ देने के बाद फिरंगी को अपनी ग़लती का एहसास होता है और वो अंग्रेज़ों को छोड़ आज़ाद का साथ देने लगता है.

अमिताभ बच्चन व आमिर ख़ान की सशक्त अभिनय की जुगलबंदी का अच्छा साथ दिया है कैटरीना कैफ और फातिमा सना शेख ने.

पीरियड फिल्म होने के कारण कलाकारों के परिधान, लोकेशन, संवाद अदायगी सब कुछ बेहद आकर्षित करती है.

फिल्म में अजय-अतुल व जॉन स्टीवर्ट का संगीत सुमधुर होने के साथ कहानी को बांधे रखने में भी मदद करता है. सुखविंदर, विशाल ददलानी, श्रेया घोषाल, सुनिधि चौहान,द्वारा गाए सभी गाने कर्णप्रिय हैं, फिर चाहे वो मंज़ूरे खुदा हो या सुरैय्या…

भारतीय दर्शकों के लिए इस फेस्टिवल के मौसम में सबसे ख़ूबसूरत प्यार भरा तोहफ़ा है यह फिल्म.

– ऊषा गुप्ता

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बाज़ार मूवी रिव्यू: यहां सब बिकता है- वफ़ादारी, ईमानदारी, इंसानियत… (Bazaar Movie Review: A Cut-throat Share Market Of Lies And Dishonesty)

Bazaar Movie Review

 

“यहां पैसा भगवान नहीं, पर भगवान से कम भी नहीं…” फिल्म का यह संवाद बहुत कुछ बयां कर जाता है. यूं तो बिज़नेस, पैसा, बाज़ार पर कई फिल्में बनी है, पर सैफ अली ख़ान की बाज़ार इन सबसे अलग है. शेयर मार्केट में पैसे कमाने के लिए छल, कपट, धोखा, फरेब सब कुछ दांव पर लगाते हैं सैफ. उनके लिए पैसा ही सब कुछ है और बाज़ार में टॉप पर बने रहने के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं यानी साम, दंड, भेद अपनाकर बस मुनाफ़ा कमाना उनका एकमात्र लक्ष्य है. बहुत अरसे के बाद सैफ अली ख़ान ने उम्दा अभिनय किया है. उनकी अदाकारी से ऐसा लगता है, जैसे यह भूमिका उनके सिवा कोई और बेहतरीन तरी़के कर ही नहीं सकता था.

निर्माता निखिल आडवाणी की फिल्म बाज़ार एक्शन, थ्रिलर, रोमांच से भरपूर है. गौरव के. चावला का निर्देशन लाजवाब है. जाने-माने अभिनेता विनोद मेहरा के बेटे रोहन मेहरा इस फिल्म से फिल्मी दुनिया में क़दम रख रहे हैं. अपनी पहली ही फिल्म में उन्होंने बेहद प्रभावित किया है. फिल्म में वे सैफ को बराबरी का टक्कर देते नज़र आते हैं. बहुमुखी प्रतिभा की धनी राधिका आप्टे भी ग़ज़ब की लगी हैं. चित्रागंदा सिंह हमेशा की तरह बोल्ड व ग्लैमरस से भरपूर बेजोड़ हैं. सौरभ शुक्ला, अनुप्रिया गोयनका, डेंज़िल स्मिथ, एली एवराम ने भी बेहतरीन अदाकारी का नज़ारा पेश किया है.

फिल्म में संगीतकारों का तो मेला लगा है- यो यो हनी सिंह, बिलाल सईद, कनिका कपूर आदि. लेकिन फिल्म की गति में संगीत थोड़ा-सा खटकता है, पर फिर भी ठीक है. पिछले तीन हफ़्तों से वीकेंड पर दर्शकों का भरपूर मनोरंजन हो रहा है. पहले अंधाधुन फिर बधाई हो और अब बाज़ार यानी दर्शकों को हर हफ़्ते एक ज़बर्दस्त और बेहतरीन फिल्म देखने को मिल रही है.

Kashi - In Search of Ganges

काशी- इन सर्च ऑफ गंगा

धीरज कुमार की काशी बहुत कुछ कहती है. शरमन जोशी व ऐश्‍वर्या देवन का अभिनय और मनीष किशोर की कहानी फिल्म को अंत तक बांधे रखती है. धीरज कुमार द्वारा निर्देशित यह एक एडवेंचर्स व फुल ड्रामा से भरपूर फिल्म है. शरमन जोशी अपनी लापता बहन गंगा को जब खोजने निकलता है, तब कई रहस्यों का ख़ुलासा होता है. प्रेम, भावनाएं, प्रतिशोध, एक्शन सभी का मिला-जुला मसाला परोसा गया है. वाराणसी यानी बनारस के ख़ूबसूरत लोकेशन पर शूट की गई पूरी फिल्म आकर्षित करती है. अन्य कलाकारों में मनोज पाहवा, गोविंद नामदेव, अखिलेंद्र मिश्रा, क्रांति प्रकाश झा, गौरीशंकर, मनोज जोशी भी प्रभावित करते हैं.

Dassehra

दशहरा

नील नितिन मुकेश बहुत दिनों बाद अपने एक्टिंग का जादू बिखेर रहे हैं. एक हॉस्टल में चार लोगों की आत्महत्या करने की ख़बर मिलती है, पर पुलिस द्वारा खोजबीन करने व गुत्थियां सुलझाने पर पता चलता है कि यह तो मर्डर है. नील, टीना देसाई, गोविंद नामदेव, अश्‍विनी कासलेकर, पंकज झा, निशा डे, मुरली शर्मा, शुभांगी गोखले आदि ने अपनी भूमिकाओं ठीकठाक निभाई है, पर फिर भी फिल्म अधिक प्रभावित नहीं कर पाती है. मनीष वात्सलया का निर्देशन स्तरीय है.

– ऊषा गुप्ता

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मूवी रिव्यू- बधाई हो: सचमुच बधाई की पात्र है (Movie Review- Badhai Ho: A Well-Deserving And Applause-Worthy Film)

Badhai Ho

पहली बार किसी अछूते विषय पर मनोरंजन से भरपूर फिल्म बनी है. इसके लिए फिल्म के निर्देशक अमित रविंद्रनाथ शर्मा बधाई के हक़दार है. कौशिक परिवार में तब भूकंप आ जाता है, जब दो युवा बच्चों की मां नीना गुप्ता के दोबारा मां बनने का पता चलता है. बड़ा बेटा नकुल यानी आयुष्मान खुराना अपनी गर्लफ्रेंड सान्या मल्होत्रा के साथ शादी करने की प्लानिंग कर रहा है, उस पर उसके लिए मां के मां बनने की ख़बर किसी सदमे से कम नहीं होती.

कौशिक परिवार के मुखिया गजराज राव ने लाजवाब अभिनय किया है. नीना गुप्ता के साथ उनकी जुगलबंदी देखते ही बनती है. नीनाजी की भाव-भंगिमाएं, प्रतिक्रियाएं, संवाद अदायगी दर्शकों को बांधे रखती है. आयुष्मान खुराना तो हमेशा की तरह ज़बर्दस्त व लाजवाब लगे हैं. इस तरह की भूमिकाओं के साथ वे पूरा न्याय करते हैं. उनकी दादी के रूप में बहुत समय बाद सुरेखा सिकरी को पर्दे पर देखना सुखद लगा. बेटे को लेकर शर्मिंदगी, समाज की आरोप-प्रत्यारोप का डर उन्हें हरदम परेशान करता रहता है. सान्या मल्होत्रा ख़ूबसूरत लगी हैं. कमोबेश हर कलाकार ने अपनी भूमिका को बेहतरीन तरी़के से निभाया है. मेरठ-दिल्लीवाला अंदाज़ फिल्म को और भी मजेदार बना देता है.

निर्माता अमित शर्मा, विनीत जैन, एलेया सेन, हेमंत भंडारी को बहुत-बहुत बधाई, जो उन्होंने इस तरह के अलग सब्जेक्ट पर फिल्म बनाने का निर्णय लिया. तनिष्क बागची, रोचक कोहली, सन्नी बावरा की म्यूज़िक दिल को गुदगुदाती और सुकून देती है. बधाइयां तेनू, मोरनी बनके, नैन ना जोडीं… गीतों को गुरु रंधावा, नेहा कक्कड़, आयुष्मान खुराना, बृजेश शंडल्लय, रोमी, जॉर्डन ने दमदार आवाज़ में अच्छा साथ दिया है. शांतनु श्रीवास्तव, ज्योति कपूर व अक्षत घिल्डियाल ने कहानी पर अच्छी मेहनत की है, जो फिल्म में दिखाई देती है. कह सकते हैं कि बहुत दिनों बाद मनोरंजन से भरपूर एक पारिवारिक फिल्म देखने को मिली.

Namaste England

नमस्ते इंग्लैंड- को दूर से ही सलाम

निर्माता-निर्देशन विपुल अमृतलाल शाह की फिल्म नमस्ते लंदन को दर्शकों ने बेहद पसंद किया था. लेकिन उसी का सीक्वल मानकर चल रहे नमस्ते इंग्लैंड में वो पैनापन देखने को नहीं मिला.

परिणीती चोपड़ा के बड़े ख़्वाब हैं. विदेश में जाकर कुछ करना और बनना चाहती है. अर्जुन कपूर से मुलाक़ात, प्यार, शादी पर बाद में नौकरी को लेकर परिवार का विरोध, परिणीती को विद्रोही बना देता है और वो झूठी शादी करके विदेश चली जाती है. अर्जुन कपूर का अवैध तरी़के से पत्नी को लेने इंग्लैंड जाना और वहां पर अति नाटकीयता का सिलसिला चलता रहता है.

अजुर्न-परिणीता ने अच्छा अभिनय किया है, पर कमज़ोर पटकथा, स्तरीय निर्देशन अधिक प्रभावित नहीं कर पाती है. अन्य कलाकारों में सतीश कौशिक, आदित्य सील, अलंकृता सहाय, अनिल मांगे, मनोज आनंद, अतुल शर्मा, हितेन पटेल, डिजाना डेजानोविक आदि ने अपनी-अपनी भूमिकाएं ठीक से निभाने की कोशिश की है. पंजाब व लंदन के लोकेशन ख़ूबसूरत हैं.

रितेश शाह व सुरेश नायर की कहानी में कोई नयापन नहीं है. इयानिस की सिनेमाट्रोग्राफी आकर्षक है. भरे बाज़ार, धूम धड़ाका, तेरे लिए… गाना पहले से ही सभी को पसंद आ रहे हैं. बादशाह, विशाल ददलानी, पायल देव, अंतरा मित्रा, शाहिद माल्या, आतिफ असलम, अकांखषा भंडारी की आवाज़ ने इन गानों को और भी सुमधुर बना दिया है. प्रोपर पटोला गाने का रिक्रिएशन बढ़िया है. बादशाह, ऋषि रिच, मैननान शाह का संगीत लुभाता है.

– ऊषा गुप्ता

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मूवी रिव्यू: 4 अलग, पर लाजवाब फिल्में… (Movie Review: Fryday, Helicopter Eela, Jalebi, Tumbbad- These Movies Bring An Assortment Of Thrill And Brilliance)

Movie Review
फ्राईडे

साजिद कुरेशी और पीवीआर पिक्चर्स के बैनर तले बनी फ्राईडे फुल टाइमपास मूवी है. अभिषेक डोगरा का कमाल का निर्देशन है. गोविंदा की कमबैक के तौर पर ले सकते हैं. उनकी ग़ज़ब की कॉमेडी है और वरुण शर्मा ने भी उनका अच्छा साथ दिया है. अन्य कलाकारों में बृजेंद्र काला, दिगांगना सूर्यवंशी, प्रभलीन संधू, राजेश शर्मा, संजय मिश्रा ने भी अच्छा साथ दिया है. मनु ऋषि के संवाद बढ़िया है. मीका सिंह, अंकित तिवारी, प्रियंका गोयत, नवराज हंस के गाए गाने मज़ेदार हैं. गोविंदा के फैन के लिए यह फिल्म एक बेहतरीन तोहफ़ा है.

हेलिकॉप्टर ईला

प्रदीप सरकार का बेहतरीन निर्देशन है. आनंद गांधी के गुजराती नाटक बेटा कागड़ो पर आधारित है. इसकी कहानी आनंद गांधी और मितेश शाह ने मिलकर लिखी है.

काजोल सिंगल मदर है औरवो अपने बेटे रिद्धि सेन की अच्छी परवरिश करती है और हरदम उसके ईदगिर्द प्रोटेक्शन के तौर पर रहती है. लेकिन अति तब हो जाती है, जब वो कॉलेज में हरदम उसकी निगरानी करती रहती है. दरअसल, अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए वो बेटे के कॉलेज में ही एडमिशन लेती है. फिल्म वर्किंग व सिंगल मदर के संघर्ष को बख़ूबी बयां करती है. मां-बेटे की बॉन्डिंग, मां का अति सुरक्षात्मक रवैया, इससे बेटे की परेशानी, स्पेस के लिए बेचैन होना… सब कुछ बढ़िया बन पड़ा है. इमोशंस के साथ एक मैसेज भी देती है कि रिश्तों में स्पेस देना भी ज़रूरी है.

बेटे के रूप में रिद्धि सेन ने अपनी पहली फिल्म में प्रभावशाली अभिनय किया है. काजोल तो हमेशा से ही बेजोड़ अदाकारा रही हैं. हर सीन में वे ख़ूबसूरत, आकर्षक व बेहतरीन लगी हैं.

इनके साथ नेहा धूपिया, जाकिर हुसैन, टोटा राय चौधरी ने भी लाजवाब अभिनय किया है. अमित त्रिवेदी व राघव सच्चर का संगीत मधुर है. मम्मा की परछाई, यादों की आलमारी गाना अच्छा बना है. फिल्म में अमिताभ बच्चन, शान, और महेश भट्ट का कैमियो भी है.

 

जलेबी

मुकेश भट्ट की जलेबी वाकई में एक अर्थपूर्ण फिल्म है. पुष्पदीप भारद्वाज का तारीफ़-ए-काबिल निर्देशन है.

एक प्रेमकहानी है. जहां दो प्यार करनेवाले अलग हो जाते हैं. फिर दोनों की ट्रेन में मुलाक़ात होती है, जहां प्रेमी अपनी दूसरी पत्नी व बच्चे के साथ है. यादों का सिलसिला, आपसी जुड़ाव, ग़लती कहां हुई… आदि का सोच का दौर चलता है.

अपनी पहली ही फिल्म में वरुण मित्रा ने शानदार परफॉर्मेंस दिया है. साथ ही रिया चक्रवर्ती, दिगांगना सूर्यवंशी का अभिनय भी बेजोड़ है. यह बंगाली फिल्म प्रकटन की रीमेक है. तनिष्क बागची व जीत गांगुली का संगीत कर्णप्रिय है. गाने ख़ूबसूरत है, विशेषकर पल, तेरे नाम से… अरिजित सिंह, श्रेया घोषाल, ज़ुबिन नौटियाल, जावेद मोहसिन के गाए हर गीत मधुर हैं. कौसर मुनीर की पटकथा सशक्त है.

 

तुंबाड

निर्माता आनंद एल राय व सोहम शाह की तुंबाड फैंटेसी, हॉरर, पीरियड, हिस्टॉरिकल बेस फिल्म है. यह रहस्य, रोमांच व तिलिस्म से भरी सशक्त थ्रिल फिल्म है. सिनेमाटोग्राफी, कॉस्टयूम, आर्ट सब कुछ ख़ूबसूरत हैं.

साल 1920 के दौर की कहानी है, महाराष्ट्र के तुंबाड गांव में तीन पीढ़ियों से रह रहे ब्राह्मण परिवार की है. उनकी जमीदारी थी. वहीं पर वे बरसों से ख़ज़ाने की खोज  करते हैं, पर सफल नहीं हो पाते.

अपनी पहली ही फिल्म में राही अनिल बर्वे ने प्रशंसनीय निर्देशन दिया है. साथ ही सभी कलाकारों- सोहम शाह, हरीश खन्ना, रोजिनी चक्रवर्ती, मोहम्मद समद, ज्योति मालशे, अनीता दाते ने प्रभावशाली अभिनय किया है. रहस्य व रोमांच से भरपूर यह फिल्म दर्शकों को बांधे रखती है.  क्रिएटिव डायरेक्टर आनंद गांधी ने भी फिल्म को ख़ूबसूरत बनाने में पूरा योगदान दिया है. अजय-अतुल व जेस्पर कीड की म्यूज़िक लाजवाब है.

– ऊषा गुप्ता

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मूवी रिव्यू- अंधाधुन: रहस्य-रोमांच की धुन में दर्शक गुम… (Movie Review- Andhadhun: A Rollercoaster Of Thrills And Mystery)

बदलापुर, जॉनी गद्दार के बाद एक बार फिर श्रीराम राघवन ने साबित कर दिया कि थ्रिलर-सस्पेंस मूवी बनाने में उन्हें महारात हासिल है. अंधाधुन फिल्म की कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, परत-दर-परत आश्‍चर्य, रोमांच, रहस्य, बेचैनी भी बढ़ती चली जाती है. बहुत दिनों बाद सशक्त कथा-पटकथा और निर्देशन का संगम देखने को मिला. फ्रेंच शॉर्ट फिल्म द पियानो ट्यूनर पर आधारित फिल्म की जान है आयुष्मान खुराना और तब्बू.

Andhadhun

 

आयुष्मान ने एक नेत्रहीन संगीतकार के रूप में ग़ज़ब का अभिनय किया है. राधिका आप्टे ने उनका बख़ूबी साथ निभाया है.

किस तरह राधिका व आयुष्मान मिलते हैं, फिर राधिका उन्हें अपने पिता के पब में पियानो प्लेयर का जॉब दिलवा देती हैं. कहानी में ट्विस्ट तब आता है, जब तब्बू के पति तब्बू को सरप्राइज़ देने जाते हैं और उनका मर्डर हो जाता है. फिर तब्बू और उनका प्रेमी लाश को ठिकाने लगाने में अचानक घर पहुंचे अंधे आयुष्मान की भी मदद लेते हैं. फिर शुरू होता है- लालच, धोखा, फरेब का मायाजाल और इससे जुड़ा हर कलाकार उसमें फंसता चला जाता है.

बहुत दिनों बाद ग्रे शेड में तब्बू ने बेहद प्रभावशाली अभिनय किया है. उनकी भूमिका डर, चिढ़, घबराहट, ग़ुस्सा सब कुछ पैदा करती है. आयुष्मान का क़िरदार पूरी फिल्म में रहस्य से भरपूर रहता है. कभी लगता है कि ऐसा हो सकता है, तो कभी लगता है नहीं यह ठीक नहीं है. साथी कलाकारों में अनिल धवन, जाकिर हुसैन, अश्‍विनी कालसेकर ने भी बेहतरीन अभिनय किया है. अमित त्रिवेदी, रफ़्तार, गिरीश नकोड का संगीत यूं तो अधिक बांधे नहीं रखता, पर कहानी को फ्लो में भी ले जाता है.

Andhadhun
लवयात्री

प्यार के सफ़र में न जाने कितने मंज़र मिले..

कुछ दर्द से बंधे, कुछ दिल से मिले…

कुछ ऐसा ही महसूस होता है लवयात्री को देखकर. अब यह दर्शकों पर ही निर्भर है कि वे क्या सोचते हैं. सलमान ख़ान के बैनर तले बनी लवयात्री प्यार करनेवालों को पसंद आ जाए, इतना ही बहुत है. हीरो आयुष शर्मा की नवरात्री में हीरोइन वारिना हुसैन से मुलाक़ात, दोस्ती, प्यार, फिर घरवालों का विरोध… वही आम-सी कहानी. संगीत और कुछ सीन्स अच्छे बन पड़े हैं. आयुष-वारिना की यह पहली फिल्म है, पर दोनों ही ख़ास प्रभावित नहीं कर पाए. रोनित रॉय, राम कपूर ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है.

– ऊषा गुप्ता

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मूवी रिव्यू- सुई धागा+पटाखा- देसी टच कंप्लीट इंटरटेंमेंट (Movie Review- Sui Dhaga+Patakha: Entertaining With A Dose Of Desi)

इन दिनों देसी अंदाज़ के साथ संदेश व मनोरंजन से भरपूर कई फिल्में बन रही हैं. इसी फेहरिस्त में सुई धागा भी है. अनुष्का शर्मा और वरुण धवन अभिनीत यह फिल्म एक आम इंसान की सीधी-सादी ज़िंदगी और स्व रोज़गार को लेकर संघर्ष को बड़ी ख़ूबसूरती से उकेरती है. मेड इन इंडिया के थीम के साथ भी फिल्म न्याय करती है.

ui Dhaga and Patakha

यशराज बैनर तले मनीष शर्मा द्वारा निर्मित व लिखित यह फिल्म सेल्फ एम्प्लॉयमेंट के प्रति जागरूकता भी पैदा करती है. अनुष्का एवं वरुण ने बेहतरीन अभिनय किया है. दोनों की सादगी, संघर्ष, आपसी प्रेम, देसी लुक व अंदाज़ दिल को छू जाती है. वरुण के पिता के रूप में रघुवीर यादव और मां की भूमिका में आभा परमार ने ग़ज़ब की एक्टिंग की है.

अनु मलिक व एंड्रिया गुएरा का संगीत माहौल व मन को ख़ुशनुमा बना देता है. चाव लगा, खटर-पटर, तू ही अहम्, सब बढ़िया है… गीत कर्णप्रिय हैं. पापोन व रोन्किनी गुप्ता की सुमधुर आवाज़ इसे और भी शानदार बना देती है. सुई धागा मेड इन इंडिया, वाकई में बढ़िया सिनेमा का अनुसरण करती है.

Sui Dhaga and Patakha
पटाखा

विशाल भारद्वाज को चरण सिंह पथिक की कहानी दो बहनें इस कदर पसंद आई कि उन्होंने इस पर पटाखा बना डाली. फिल्म की पटकथा, संगीत, निर्देशन- सभी की ज़िम्मेदारी विशालजी ने ख़ुद ही संभाली है.

टीवा स्टार राधिका मदान इसके ज़रिए फिल्मी दुनिया में प्रवेश कर रही हैं. बड़ी बहन चंपा उ़र्फ बड़की के रूप में उन्होंने अपनी पहली ही फिल्म में ज़बर्दस्त अभिनय किया है. उनका साथ दंगल फेम सान्या मल्होत्रा ने गेंदा कुमारी के रूप में बख़ूबी निभाया है. दो बहनें बचपन से लेकर बड़े होने तक अक्सर लड़ाई-झगड़े करती रहती हैं. उनकी लड़ाई को बढ़ाने और उसमें आग में घी का काम करता है उनका पड़ोसी सुनील ग्रोवर. दोनों बेटियों के पिता के रूप मेंं विजय राज ने कमाल की परफॉर्मेंस दी है. सानंद वर्मा ने उनका अच्छा साथ दिया है.

निर्माताओं की टीम यानी रेखा विशाल भारद्वाज, इशान सक्सेना, अजय कपूर, धीरज वाधवान ने दर्शकों को एक अच्छी फिल्म परोसी है. गुलज़ार साहब के गीत फिल्म को और भी ख़ूबसूरत बना देते हैं. रेखा-विशाल भारद्वाज, सुनिधि चाहौन की आवाज़ की जादूगरी फिल्म को बांधे रखती है.

दोनों ही फिल्में शुद्ध देसी अंदाज़ और मनोरंजन से भरपूर है.

– ऊषा गुप्ता

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मूवी रिव्यू- दो बेहतरीन विषयों पर बनी सार्थक फिल्म: बत्ती गुल मीटर चालू/मंटो (Meaningful Cinema: Both The Movies Will Stir Your Thoughts)

आमतौर पर लोग फिल्में (Movies) मनोरंजन (Entertainment) के लिए देखना पसंद करते हैं, लेकिन कुछ ऐसे विषय भी होते हैं, जिनके बारे में जानना-समझना भी ज़रूरी होता है.

Meaningful Movies

बत्ती गुल मीटर चालू

बिजली विभाग की ग़लती और भ्रष्टाचार के चलते किस तरह एक आम इंसान को परेशानियों का सामना करना पड़ता है, इसे ही फिल्म में मुख्य रूप से दिखाया गया है. यह उत्तराखंड के टिहरी जिले में रहनेवाले तीन मित्रों- शाहिद, श्रद्धा और दिव्येंदु की कहानी है. दिव्येंदु के प्रिंटिंग प्रेस का हमेशा बेहिसाब बिजली का बिल आता रहता है. वो इससे बेहद परेशान है. कई बार बिजली विभाग के चक्कर लगाने के बावजूद न ही न्याय मिल पाता है और न ही सुनवाई होती है. आख़िरकार तंग आकर वो आत्महत्या कर लेता है. शाहिद दोस्त की मौत से सकते में आ जाता है और उसे न्याय दिलाने की ठानता है और तब शुरू होती है क़ानूनी लड़ाई व संघर्ष. चूंकि फिल्म में शाहिद कपूर वकील बने हुए है, तो वे पूरा ज़ोर लगा देते हैं अपने दोस्त को इंसाफ़ दिलाने के लिए.

श्रद्धा कपूर फैशन डिज़ाइनर हैं. दो दोस्तों के बीच में फंसी एक प्रेमिका, पर उन तीनों की बॉन्डिंग देखने काबिल है. यामी गौतम एडवोकेट की छोटी भूमिका में अपना प्रभाव छोड़ती हैं. कोर्ट के सीन्स दिलचस्प हैं. शाहिद कपूर, श्रद्धा कपूर, यामी गौतम, दिव्येंदु शर्मा सभी कलाकारों ने सहज और उम्दा अभिनय किया है. श्रीनारायण सिंह टॉयलेट- एक प्रेम कथा के बाद एक बार फिर गंभीर विषय पर सटीक प्रहार करते हैं. अनु मलिक व रोचक कोहली का संगीत और संचित-परंपरा के गीत सुमधुर हैं. अंशुमन महाले की सिनेमैटोेग्राफी लाजवाब है. निर्माताओं की टीम भूषण कुमार, कृष्ण कुमार व निशांत पिट्टी ने सार्थक विषय को पर्दे पर लाने की एक ईमानदार कोशिश की है.

मंटो

जब कभी किसी विवादित शख़्स पर फिल्म बनती है, तब हर कोई उसे अपने नज़रिए से तौलने की कोशिश करने लगता है. मंटो भी इससे जुदा नहीं है. निर्देशक नंदिता दास ने फिराक फिल्म के बाद मंटो के ज़रिए अपने निर्देशन को और भी निखारा है. उस पर मंटो की भूमिका में नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का बेमिसाल अभिनय मानो सोने पे सुहागा. मंटो की पत्नी के रूप में रसिका दुग्गल ने भी ग़ज़ब की एक्टिंग की है. वैसे फिल्म में कुछ कमियां हैं, जो मंटो को जानने व समझनेवालों को निराश करेगी.

सआदत हसन मंटो की लेखनी हमेशा विवादों के घेरे में रही, विशेषकर ठंडा गोश्त, खोल दो, टोबा टेक सिंह. उन पर उनकी लेखनी में अश्‍लीलता का भरपूर इस्तेमाल करने का आरोप ज़िंदगीभर रहा, फिर चाहे वो आज़ादी के पहले की बात हो या फिर देश आज़ाद होने पर उनका लाहौर में बस जाना हो. इसी कारण उन पर तमाम तरह के इल्ज़ामात, कोर्ट-कचहरी, अभावभरी ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव का दौर सिलसिलेवार चलता रहा. रेसुल पुक्कुटी का संगीत ठीक-ठाक है. साथी कलाकारों में ऋषि कपूर, जावेद अख़्तर, इला अरुण, ताहिर राज भसीन व राजश्री देशपांडे ने अपने छोटे पर महत्वपूर्ण भूमिकाओं के साथ न्याय किया है. निर्माता विक्रांत बत्रा और अजित अंधारे ने मंटो के ज़रिए लोगों तक उनकी शख़्सियत से रू-ब-रू कराने की अच्छी कोशिश की है.

– ऊषा गुप्ता

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