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मल्टी टास्किंग के १० ख़तरे महिलाओं के लिए हैं हानिकारक (10 Risks of Multitasking Every Woman Must Know)

मल्टी टास्किंग के १० ख़तरे महिलाओं के लिए हानिकारक हैं. मल्टी टास्किंग महिलाओं का ख़ास गुण माना जाता है, लेकिन एक साथ बहुत सारे काम करने से कई बार उनकी हेल्थ, पर्सनल लाइफ, सोशल लाइफ पर बुरा असर पड़ने लगता है. कितनी नुक़सानदायक हो सकती है मल्टी टास्किंग? आइए, जानते हैं.

Risks Of Multitasking

1) मल्टी टास्किंग से शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ता है
आज की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में मल्टी टास्किंग यानी एक साथ कई काम करना ज़रूरी हो गया है, लेकिन ऐसा करना ख़तरनाक भी हो सकता है. महिलाओं के लिए कहा जाता है कि वो बहुत आसानी से मल्टी टास्किंग कर लेती हैं, लेकिन ऐसा करना उनके शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के बहुत नुक़सानदायक हो सकता है.

2) मल्टी टास्किंग से काम की क्वालिटी पर असर पड़ता है
मल्टी टास्किंग का असर सबसे पहले काम की क्वालिटी पर पड़ता है. आप चाहे कितने ही क़ाबिल क्यों न हों, यदि आप एक साथ बहुत सारे काम करते हैं, तो आपके काम की क्वालिटी कम होगी हो. मल्टी टास्किंग करते समय आपका ध्यान सभी कामों पर रहता है, जिससे आप किसी भी काम को पूरी लगन से नहीं कर पाते. इससे काम तो पूरा हो जाता है, लेकिन वो उतना अच्छा नहीं हो पाता, जितना आप उसे कर सकते हैं.

3) मल्टी टास्किंग से काम में ग़लतियां अधिक होती हैं
फ्रांस में हुई एक रिसर्च के मुताबिक, जो लोग एक समय पर एक से अधिक काम करते हैं, वो अपने काम में अधिक ग़लतियां करते हैं. ऐसा होना स्वाभाविक है, क्योंकि मल्टी टास्किंग करते समय हम किसी एक काम पर फोकस नहीं कर पाते, जिसके कारण काम में ग़लतियां छूट जाती हैं. कोई इंसान कितना भी अलर्ट क्यों न हो, यदि वो एक समय पर बहुत सारे काम करता है, तो उससे ग़लतियां छूटेंगी ही. कई बार काम में इतनी बड़ी ग़लती छूट जाती है कि बाद में उसे ठीक करना भी मुश्किल हो जाता है. ऐसा होने पर तनाव बढ़ जाता है, जिसका असर सेहत पर भी पड़ने लगता है.

4) मल्टी टास्किंग से काम की स्पीड (गति) कम हो जाती है
एक साथ बहुत सारे काम करने वाले लोग इस भ्रम में रहते हैं कि ऐसा करके वो समय बचा लेंगे, लेकिन असल में ऐसा होता नहीं है. जब आप एक साथ बहुत सारे काम करते हैं, तो आप किसी एक काम पर फोकस नहीं कर पाते, जिससे आपके काम की स्पीड स्लो हो जाती है. यदि आप एक-एक करके अपने सारे काम निपटाते जाएं, तो आपका काम भी अच्छा होगा और काम की स्पीड भी अच्छी होगी.

5) मल्टी टास्किंग से क्रिएटिविटी कम हो जाती है
जी हां, मल्टी टास्किंग का असर आपकी क्रिएटिविटी पर भी पड़ता है. जब आप एक समय पर एक से अधिक काम करते हैं, तो आपका पूरा ध्यान काम को निपटाने में लगा रहता है. उस समय आप ये नहीं सोच पाते कि इस काम को और रचनात्मक तरी़के से कैसे किया जाए. मल्टी टास्किंग से बहुत सारे काम निपट तो जाते हैं, लेकिन उनमें से कोई भी काम बेस्ट नहीं हो पाता. साथ ही आपको काम करने की संतुष्टि भी नहीं मिलती.

6) मल्टी टास्किंग से याददाश्त कमज़ोर होने लगती है
जब हम एक साथ बहुत सारे काम करते हैं, तो चीज़ों को भूलने लगते हैं, जिससे हमारी याददाश्त कमज़ोर होने लगती है. उम्र बढ़ने के साथ ये समस्या तेज़ी से बढ़ने लगती है. महिलाएं एक साथ बहुत सारे कामों की ज़िम्मेदारी ओढ़ तो लेती हैं, लेकिन ऐसा करते समय जब वो चीज़ों को भूलने लगती हैं, तो उनमें चिड़चिड़ापन आ जाता है. इससे उनका स्वास्थ्य तो प्रभावित होता ही है, उनके रिश्तों में भी तनाव बढ़ने लगता है.

7) मल्टी टास्किंग से तनाव बढ़ जाता है
एक साथ बहुत सारे काम करने से काम पर से फोकस तो बिगड़ता ही है, साथ ही काम समय पर पूरा करने का प्रेशर भी बना रहता है, जिससे तनाव बढ़ जाता है. कैलिफोर्निया विश्‍वविद्यालय के शोधकर्ताओं के अध्ययन के अनुसार, एक साथ बहुत सारे काम करने से दिल की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं, जिससे तनाव बढ़ जाता है. यही वजह है कि मल्टी टास्किंग करने वाले लोग अक्सर तनाव में रहते हैं.

8) मल्टी टास्किंग से मोटापा बढ़ने लगता है
आपको जानकर अजीब लग सकता है, लेकिन ये सच है. मल्टी टास्किंग करने वाले लोग अक्सर खाते समय भी काम करते रहते हैं, जिससे उन्हें ये पता नहीं चल पाता कि उन्होंने कितना खाना खाया है. इसके अलावा एक साथ अधिक काम करने से तनाव बढ़ता है और तनाव में भूख ज़्यादा लगता है, जिसके कारण व्यक्ति ज़रूरत से ज़्यादा खाता है और उसका मोटापा बढ़ने लगता है.

9)  मल्टी टास्किंग का रिश्तों पर भी पड़ता है असर
जो लोग एक साथ बहुत सारे काम करते हैं, वो अपने काम में इतने बिज़ी रहते हैं कि अपने परिवार व क़रीबी रिश्तों के लिए भी टाइम नहीं निकाल पाते. इससे रिश्तों में तनाव और दूरियां बढ़ने लगती हैं. यही वजह है कि बहुत ज़्यादा काम करने वाले लोगों के लाइफ पार्टनर या परिवार के लोग उनसे ख़ुश नहीं रहते. ऐसे लोग अपनी पर्सनल या सोशल लाइफ के लिए टाइम नहीं निकाल पाते, जिससे उनके रिश्तों में तनाव बढ़ जाता है. ऐसे लोग आगे चलकर अकेलेपन के शिकार भी हो सकते हैं.

10) मल्टी टास्किंग की शिकार वर्किंग वुमन
एसोचैम के अध्ययन के अनुसार, 77% वर्किंग वुमन डिप्रेशन, मोटापा, डायबिटीज़, हार्ट और किडनी डिसीज़, पीठदर्द, हाइपरटेंशन जैसी लाइस्टाइल डिसीज़ की शिकार हैं. इस अध्ययन में 32 से 57 वर्ष की वर्किंग वुमन को शामिल किया गया था. एक्सपर्ट्स के अनुसार, वर्किंग वुमन घर और करियर दोनों जगह प्रेशर झेल रही हैं. करियर में उन्हें डेड लाइन का प्रेशर झेलना पड़ता है और घर में उन पर परिवार व बच्चों की ज़िम्मेदारी निभाने का दबाव रहता है. लगातर तनाव में रहने के कारण महिलाओं के शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है.

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How to Avoid Multi Tasking?

मल्टी टास्किंग से कैसे बचें?
मल्टी टास्किंग के प्रेशर से आप थोड़ी स्मार्टनेस से बच सकते हैं. मल्टी टास्किंग से बचने के लिए अपनाएं ये आसान उपाय:

* टाइम मैनेजमेंट है बेस्ट उपाय
मल्टी टास्किंग के नुक़सान से बचने का सबसे आसान तरीफ़ा है टाइम मैनेजमेंट. यदि आप अपने सभी काम समय पर करें और हर काम के लिए निश्‍चित समय तय कर लें, तो आपको मल्टी टास्किंग की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. एक समय पर एक काम करके आप अपने काम की क्वालिटी, स्पीड और क्रिएटिविटी बढ़ा सकते हैं.

* दूसरों की हेल्प लें
महिलाएं अमूमन घर के सारे काम अपने सिर ओढ़ लेती हैं और बाद में काम के प्रेशर में चिढ़ने लगती हैं. इससे बचने के लिए घर के कुछ काम परिवार के अन्य सदस्यों में बांट लें. इससे आपके काम का प्रेशर भी कम हो जाएगा और आपको मदद भी मिल जाएगी.

* स्टेमिना बढ़ाएं
काम का प्रेशर झेलने के लिए स्टेमिना बढ़ाना ज़रूरी है. इसके लिए आप योग, मेडिटेशन, एक्सरसाइज़, डांस या किसी खेल का सहारा ले सकते हैं. फिज़िकल एक्टिविटी से स्टेमिना भी बढ़ता है और फोकस भी, इसलिए दिनभर में कुछ समय इसके लिए ज़रूर निकालें.

* झूठी तारीफ़ से बचें
महिलाओं को अक्सर मल्टी टास्कर, सुपर वुमन आदि का ख़िताब देकर उनसे ज़रूरत से ज़्यादा काम कराया जाता है. यदि आपके साथ भी ऐसा हो रहा है, तो ऐसी झूठी तारीफ़ों के झांसे में न आएं. यदि आपके घर या ऑफिस में आपकी तारीफ़ करके आपसे ज़्यादा काम कराया जा रहा है, तो इससे ख़ुश होने के बजाय पहले ये देख लें कि आप उतना काम करने में सक्षम हैं या नहीं. यदि आपको लगता है कि ये काम आपके लिए ज़्यादा है तो साफ़ मना कर दें.

* ना कहना सीखें
कुछ लोगों को इसलिए भी ज़्यादा काम करना पड़ता है, क्योंकि वो किसी को किसी भी काम के लिए ना नहीं कह पाते. ऐसा करना ठीक नहीं है. किसी के काम आना या किसी की मदद करना अच्छी बात है, लेकिन उसके लिए अपनी सेहत को ख़तरे में डालना समझदारी नहीं है. आप जो काम नहीं कर सकते, उसके लिए ना कहना सीखें.

* अपने लिए व़क्त निकालें
हर व़क्त काम में डूबे रहने वाले लोगों की पर्सनल और सोशल लाइफ अच्छी नहीं रहती. वो लोगों से जल्दी घुल-मिल नहीं पाते, जिससे वो अक्सर अकेलेपन के शिकार हो जाते हैं. इससे बचने के लिए थोड़ा समय अपने लिए ज़रूर निकालें. इस समय में अपने शौक पूरे करें, परिवार के साथ समय बिताएं, दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलें, ऐसा करके आपको ज़रूर ख़ुशी मिलेगी.

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सुपर वुमन या ज़िम्मेदारियों का बोझ (Why women want to be a superwomen?)

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सुपर वुमन ये शब्द सुनकर एकबारगी तो बहुत अच्छा लगता है, लेकिन क्या वाक़ई ये हमारे लिए ख़िताब है या फिर ज़िम्मेदारियों का बोझ मात्र. क्या है सुपर वुमन की असल ज़िंदगी?

 

“मेरी वाइफ किसी सुपर वुमन से कम नहीं, वो कंपनी में एग्ज़क्यूटिव है. ऑफिस के साथ ही वो मेरे घर और बच्चों को भी बख़ूबी मैनेज कर लेती है.” पत्नी की तारीफ़ में दोस्तों के सामने ऐसे कसीदे पढ़ने वाले पतियों की कमी नहीं है, लेकिन समाज में वर्किंग पत्नी का गुणगान करने वाले ऐसे पति घर के अंदर आते ही रंग बदल लेते हैं. दफ्तर से थकी-हारी आई पत्नी का किचन में हाथ बंटाना ये अपनी शान के ख़िलाफ़ समझते हैं. हालांकि कुछ ऐसे पति ज़रूर हैं जो घर के काम में पत्नी की मदद कर वाक़ई उन्हें सुपर वुमन का एहसास दिलाते हैं, लेकिन ऐसे समझदार पतियों की संख्या सीमित है. ज़्यादातर पुरुष पत्नी की तारीफ़ करके ही अपनी ज़िम्मेदारियों की इतिश्री मान लेते हैं. उन्हें लगता है उनके तारीफ़ भरे शब्द से पत्नी की ज़िम्मेदारी कम हो जाएगी. उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि सुपर वुमन की कसौटी पर खरा उतरने के लिए उनकी पत्नी किस मानसिक अवसाद व आंतरिक कशमकश की स्थिति से गुज़र रही होती हैं. ऑफिस से आने के बाद वो भी थक जाती है, उसे भी थोड़ा आराम चाहिए इस ख़्याल से पति की फरमाइशें कभी कम नहीं होती.

सुपरवुमन/सुपर मॉम की कश्मकश
सुपर वुमन कहलाने वाली आजकल की ज़्यादातर कामकाजी महिलाएं दोहरे तनाव का सामना कर रही हैं. हर समय जहां उनपर पर अपने कार्यक्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ करने का दबाव रहता है, वहीं बच्चों को समय न दे पाने की गिल्ट उन्हें अंदर ही अंदर सताती रहती है. बच्चों के साथ समय न बिता पाना, घर का काम ठीक तरह से न कर पाने, पति व परिवार की अपेक्षाओं पर खरा न उतर पाने के कारण वो ख़ुद को दोषी समझने लगती हैं. घर और ऑफिस दोनों जगह अपना सौ फीसदी देने के चक्कर में वो भयंकर तनाव का तो शिकार हो ही रही हैंं, साथ ही अपनी सेहत से भी समझौता कर रही हैं.

बच्चे और किचन
आप कोई छोटी-मोटी नौकरी करती हैं या फिर किसी कंपनी की सीईओ ही क्यों न हो, लेकिन घर पहुंचकर होम मेकर के रोल में आना ही पड़ता है. आख़िर किचन और बच्चों की ज़िम्मेदारी महिलाओं के ही कंधे पर क्यों होती है? वर्किंग पत्नी की चाह रखने वाले पुरुष आख़िर क्यों नहीं किचन और बच्चों की देखभाल की ज़िम्मेदारी में अपनी पत्नी का हाथ बंटा देते हैं? अधिकतर पुरुषों का जवाब होता है ये हमारा काम नहीं है. बरसों पुरानी रूढियों से चिपके ऐसे पुरुष दोहरा मानदंड अपनाते हैं यानी जब बाहर काम की बात आती है तो ये तथाकथित मॉर्डन बनकर पत्नी के बाहर काम करने का समर्थन करते हैं, लेकिन जब बात घर के काम की हो तो ये पुरुष प्रधान समाज वाला रुख़ अख़्तियार कर लेते हैं.

वर्किंग चाहिए, मगर बराबरी नहीं
इक्कीसवी सदी के युवाओं को पत्नी वर्किंग तो चाहिए, लेकिन अपनी शर्तों पर यानी पत्नी की सैलरी और ओहदा उनसे ऊंचा न हो, यदि ऐसा हो जाए तो उनके अहं को ठेस पहुंच जाती है और वो पत्नी को मगरूर समझने लगते हैं. बात-बात पर खरी-खोटी सुनाना, बे बात झगड़ा बढ़ाकर उन्हें दोषी ठहराने का एक मौक़ा भी नहीं जाने देते. ऐसे में अपनी क़ामयाबी ही महिलाओं को कुंठित कर देती है.

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हर जगह ख़ुद को साबित करना
21वीं सदी की महिलाओं को ऑफिस में अपना टारगेट अचीव करने से लेकर बच्चों की पढ़ाई और घर के काम की चिंता के बीच अपने बालों को कलर करने और फेशियल की भी चिंता सताती रहती है. दरअसल, ऑफिस में प्रेजेंटेबल दिखने की समय की मांग को देखते हुए उन्हें न स़िर्फ घर, बल्कि ख़ुद को भी मेंटेन करना पड़ता है. अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इतनी सारी ज़िम्मेदारियों के बीच ख़ुद के लिए समय निकालना इन महिलाओं के लिए कितना मुश्किल होता है. हर जगह ख़ुद को परफेक्ट साबित करने की कोशिश में आज की महिलाएं डिप्रेशन का शिकार होती जा रही हैं.
शिकागों की एक शोधकर्ता ने 10 साल तक भारतीय महिलाओं पर शोध के बाद ये नतीजा निकाला की लगभग 72 फीसदी महिलाएं गहरे अवसाद का शिकार हो रही हैं. शोधकर्ता के मुताबिक, तनाव का सबसे बड़ा कारण परिवार ख़ुद है. देखा जाए तो शोध की बात सौ फीसदी सच है एक मीडिल क्लास फैमिली की महिला ऑफिस से थकी-हारी जब घर पहुंचती है, तो उसे कोई एक ग्लास पानी तक नहीं पूछता, लेकिन काम और फरमाइशों की फेहरिस्त तैयार रहती है. सास कहती है मेरी लिए खाने में कम मसाले वाली सब्ज़ी बनाना, तो बच्चों को कुछ मीठा चाहिए रहता है और पतिदेव को नॉनवेज… अभी इतने लोगों की फरमाइश पूरी ही होती है कि उसे सुबह नाश्ते में क्या बनेगा कि चिंता भी सताने लगती है साथ ही कल ऑफिस में प्रेजेंटेशन देना है उसकी भी टेंशन. इतने तनाव व ज़िम्मेदारियों के बीच महिलाओं को अपनी पसंद-नापसंद के बारे में सोचने तक की ़फुर्सत नहीं रहती.

मर्द हूं काम क्यों करूं
हमारी मेल डॉमिनेटिंग सोसाइटी भले ही महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने का राग अलापे, लेकिन वास्त में उन्हें बराबरी का हक़ नहीं मिला है. अगर मिला होता तो रसोई से लेकर बच्चे और बुजुर्गों की देखभाल तक की सारी ज़िम्मेदारी अकेले उसे ही नहीं उठानी पड़ती. दरअसल, कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो हमारे देश में ज़्यादातर पुरुषों की सोच यही है कि मैं मर्द हूं, भला मैं क्यों काम करूं घर का काम तो औरतों के जिम्मे है. ऐसी सोच स़िर्फ कम पढ़े-लिखे युवक ही नहीं, बल्कि उच्च शिक्षित और प्रतिष्ठित नौकरी करने वाले पुरुषों की सोच भी ऐसी ही है.

मस्टीटास्किंग के नाम पर
महिलाएं तो मल्टीटास्किंग होती हैं, ये कहकर बड़े प्यार से उन्हें हर काम का जिम्मा सौंप दिया जाता है. कई बार तो महिलाएं भी इस मुग़ालते में कि पुरुष उनके हुनर व क्षमता की तारीफ़ कर रहे हैं ख़ुद को उनकी कसौटी पर खरा उतारने की कोशिश करती रहती हैं यानी सुपर वुमन बनने का हर संभव प्रयास करती हैं. सवाल ये है कि आख़िर महिलाओं को ही क्यों सुपर वुमन बनने की ज़रूरत महसूस होती है? पुरुष क्यों नहीं सुपर मैन बन जाते हैं. हमेशा ही ख़ुद को महिलाओं से श्रेष्ठ मानने वाले पुरुष क्यों नहीं उनसे मल्टीटास्किंग का गुण सीखकर उनकी तरह ही दोहरी, तीहरी ज़िम्मेदारी निभाते हैं? शायद इसलिए क्योंकि उन्हें दशकों से आराम की लत जो लग गई है जो काम पहले वो महिलाओं को डरा-धमाकाकर करते थे वही अब प्यार व तारीफ़ भरे शब्दों के तीर चलाकर कर रहे हैं.

बदलती तस्वीर
यूरोपिए देशों में हाउस हसबैंड का कॉन्सेप्ट है, यानी पुरुष घर पर रहकर परिवार व बच्चों की देखभाल की ज़िम्मेदारी उठाते हैं और महिलाएं आर्थिक मोर्चा संभालती हैं, लेकिन हमारे देश में इस तरह के कॉन्सेप्ट को समाज पचा नहीं पाएगा.

– कंचन सिंह

क्यों बढ़ रही है मल्टीटास्किंग बहुओं की डिमांड? (Why Multitasking Brides are in Demand?)

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योग्य वर के लिए योग्य कन्या की तलाश करते ज़्यादातर परिवारवालों की खोज आजकल मल्टीटास्किंग लड़कियों पर जाकर ठहर रही है. घर-गृहस्थी से लेकर ऑफिस व कारोबार तक सब बख़ूबी संभालनेवाली मल्टीटास्किंग लड़कियों की डिमांड इतनी क्यों बढ़ी है? और कैसे बदल रही है हमारे समाज की सोच? यह कौतूहल का विषय है. समाज के इसी बदलते स्वरूप को जानने व समझने की हमने यहां कोशिश की है.
समय के अनुसार बदली है डिमांड
कुछ साल पहले तक जहां लोग गोरी, लंबी, पतली व सुंदर लड़की की मांग किया करते थे, आज उसी के साथ पढ़ी लिखी, कमाऊ और घरेलू कामकाज जाननेवाली बहू की मांग बढ़ रही है. बदलते समय व बदलती लाइफस्टाइल ने वर्किंग बहुओं की डिमांड बहुत तेज़ी से बढ़ाई है. इस विषय पर हमें अधिक जानकारी दी मैट्रीमोनियल वेबसाइट में बतौर रिलेशनशिप एडवाइज़र काम करनेवाले सुजय सावंत ने. उनके मुताबिक, “समय के साथ चीज़ें बदलती रहती हैं. बहुओं के लिए जो डिमांड कल तक थी, आज वह बिल्कुल बदल गई है. ख़ासकर मेट्रोज़ में तो सबको वर्किंग बहू ही चाहिए और उसके साथ ही सुंदर, समझदार और केयरिंग तो होनी ही चाहिए. बाकी की योग्यताएं तो जैसी की तैसी ही हैं. ये देखते हुए हम कह सकते हैं कि मेट्रोज़ में वर्किंग लड़कियों की डिमांड बढ़ी है.”

कैसी बहू चाहते हैं लोग?

1. वर्किंग या कमाऊ
आज मेट्रोज़ व शहरों में रहनेवाले ज़्यादातर पैरेंट्स अपने बेटों के लिए वर्किंग या कमाऊ बहू की डिमांड करते हैं. उनके मुताबिक कामकाजी बहुएं ख़ुद के साथ-साथ घर का भी बख़ूबी ख़्याल रख सकती हैं. अपनी क्षमता और क़ाबीलियत के बल पर वे परिवार को एक बेहतर भविष्य की ओर ले जाने में अपने पति का बख़ूबी साथ निभाती हैं.

2. पार्ट टाइम वर्किंग-रेस्ट टाइम होममेकर
ख़ासकर संयुक्त परिवारों में इस तरह की बहुओं की डिमांड ज़्यादा होती है. इन्हें टीचर, ज्वेलरी डिज़ाइनर, फैशन डिज़ाइनर, कुकरी एक्सपर्ट आदि की तलाश होती है, जो पार्ट टाइम में काम करने के बाद घर व घरवालों का भी पूरा ध्यान रख सकें. इन सब में टीचर्स की डिमांड सबसे ज़्यादा है. इसी कैटेगरी में फैमिली बिज़नेसवाले भी हैं, जो ऐसी बहू घर लाते हैं, जो घर के साथ-साथ उनके बिज़नेस में भी सहयोग दे.

3. अच्छी पढ़ी-लिखी, पर घरेलू
आर्थिक स्थिति अच्छी होने की सूरत में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो पारिवारिक दायित्वों को भली-भांति पूरा करनेवाली समझदार व पढ़ी-लिखी बहू की मांग करते हैं. संयुक्त परिवार के लोग बच्चों के बेहतर भविष्य व बुज़ुर्गों की सेवा के लिए पढ़ी-लिखी व घरेलू बहुओं की मांग करते हैं.

4. सर्वगुण संपन्न बहू
ऐसी बहुओं की डिमांड हमेशा से रही है और शायद हमेशा ही रहेगी. हर कोई ऐसी बहू घर लाना चाहता है, जो घर व बाहर दोनों बख़ूबी संभाले. अब हर बहू तो सर्वगुण संपन्न नहीं हो सकती, इसलिए इनकी कमी पूरी करने के लिए कमाऊ बहुओं की मांग तेज़ी से बढ़ रही है. पब्लिक सेक्टर में काम करनेवाले अमित शिंदे ने इस विषय पर अपनी बात कुछ इस तरह रखी. बकौल अमित, “मुझे लगता है कि मेट्रोज़ में बढ़ती महंगाई ने शादी-ब्याह के मामलों में वर्किंग लड़कियों की डिमांड बढ़ा दी है. जॉब स्ट्रेस और बढ़ते