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आज जब धर्म को लेकर कई फिल्मी सितारे और असामाजिक तत्व बयानबाज़ी के ज़रिए राजनीति कर रहे हैं, ऐसे में अदनान सामी का यह कहना कि वे मुसलमान के तौर पर ख़ुद को भारत में बेहद सुरक्षित महसूस करते हैं, उन सभी के लिए करारा जवाब है.

Adnan Sami

अदनान सामी के गीतों, साफ़गोई व मधुरता के तो सभी दीवाने हैं ही, लेकिन अपने इस बयान से उन्होंने हिंदुस्तानियों का दिल जीत लिया. उन्होंने यह साबित कर दिखाया कि धर्म के नाम पर गंदी सोच का इस देश में कोई स्थान नहीं है. सामी ने यह भी स्पष्ट किया कि आज इस बात को समझने की ज़रूरत है कि सीएए (नागरिकता संशोधन क़ानून) भारत के लोगों के लिए नहीं, बल्कि उनके लिए है, जो भारत की नागरिकता चाहते हैं. ऐसे में समझ में यह नहीं आ रहा कि ग़लतफ़हमी कहां पर है. सब कुछ साफ़ व स्पष्ट तो है.

उनके अनुसार, मैंने भारत की नागरिकता इसलिए ली थी कि मैं ख़ुद को एक मुस्लिम के रूप में सबसे अधिक सेफ यही पर महसूस करता हूं. मुझे भारत से प्यार है.

उन्होंने अल्पसंख्यकों पर होनेवाले अत्याचारों का भी ज़िक्र किया. जब वे इस्लामाबाद के एफ सेक्टर में रहते थे, तब उन्होंने वहां पर ईसाई समुदाय के लोगों के साथ भेदभाव होते देखा था. चूंकि उन्होंने इसे जाना-समझा है, इसी कारण वे सीएए का समर्थन भी कर रहे हैं. इससे तमाम पीड़ित लोगों को मदद और उचित मान-सम्मान मिलेगा. पिछले दिनों अदनान को पद्मश्री पुरस्कार देने पर भी ख़ूब जमकर विपक्ष ने राजनीति की थी. वे भी क्या करें आदत से मजबूर हैं.

लंदन में जन्मे पाकिस्तान मूल के अदनान सामी को जब अपने लिए सुकूनभरे घर की तलाश थी, तब उन्हें सबसे सुरक्षित और प्यारा हिंदुस्तान ही लगा. देश ने भी उन्हें उतना ही प्यार व सम्मान भी दिया.

उन्होंने एक और सुलझी हुई महत्वपूर्ण बात कही कि वे एक मुसलमान हैं, पर वे सभी जाति-धर्म का सम्मान करते हैं. साथ ही वे इंसानियत का भी सम्मान करते हैं, फिर वह किसी भी रूप में क्यों न हो. आज हर किसी को अदनान सामी से प्रेरणा लेने की ज़रूरत है और सभी भेदभाव व ग़लतफ़हमियों को दरकिनार कर प्रेम, शांति व भाइचारे के साथ एकजुट होकर रहना है.

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब अदनान सामी ने देश के हित व भाईचारे पर अपनी बात रखी हो. वे इसके पहले भी कई मौक़ों पर एकता व प्रेम का संदेश देते रहे हैं.

अदनान सामी भारत में अपने सबसे चर्चित गाने थोड़ी तो लिफ्ट करा दे… से इस कदर मशहूर हुए थे कि सभी उनको पसंद करने लगे थे. उसके बाद कभी तो नज़र मिलाओ… तेरा चेहरा… गीत ने भी उन्हें ख़ास मुक़ाम दिलाया. उनके तेरी क़सम व किसी दिन एलबम भी ख़ूूब पसंद किए गए थे. अब उनका नया एलबम तू याद आया भी ख़ूब पसंद किया जा रहा है.

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Zakir Hussain

  • तबले पर उंगलियों की सुरीली थाप, देखने और सुननेवालों के कानों से टकराता रसीला संगीत… एक मस्तमौला शख़्स इन धुनों में इस क़दर खोया हुआ-सा नज़र आता है, जैसे वो और उसके तबले की थाप एक-दूसरे का अक्स हों और उनकी इसी जुगलबंदी से जैसे संगीत की दुनिया मुकम्मल हो. जी हां, तबले से निकलता संगीत जिनके छूनेभर से हो जाता है ख़ास, उन्हें हम कहते हैं उस्ताद… जी हां, उस्ताद ज़ाकिर हुसैन (Zakir Hussain ) की ही हम कर रहे हैं बात, जिनका जन्म 9 मार्च 1951 में हुआ था. उन्हें जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं!
  • ज़ाकिर हुसैन का बचपन मुंबई में ही बीता और महज़ 12 वर्ष की आयु से ही उनका तबले व संगीत से नाता जुड़ गया था. 1973 से लेकर साल 2007 तक उस्ताद ज़ाकिर हुसैन ने अपने तबले की मीठी धुनों के ज़रिये कई राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय समारोहों को मंत्रमुग्ध किया.
  • 1988 में उन्हें पद्म श्री से नवाज़ा गया और उस व़क्त यह सम्मान पानेवाले वे सबसे कम उम्र के व्यक्ति थे. उनकी उम्र तब 37 वर्ष थी.
  • साल 2002 में संगीत में उनके योगदान को देखते हुए पद्म भूषण दिया गया. वे भारत में ही नहीं, विदेशों में भी बेहद लोकप्रिय हैं.
  • अपने एलबम्स के ज़रिए उन्होंने संगीत को प्रांत, देश व सीमाओं के पार पहुंचा दिया. उनकी ख़्याति व टैलेंट का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 1992 व 2009 में उन्हें म्यूज़िक के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘ग्रैमी अवॉर्ड’ से भी नवाज़ा जा चुका है.