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स्लिम और जवां नज़र आने के प्रेशर में बिगड़ता महिलाओं का बजट (Weight Management: Myths And Facts About Weight Loss)

घर में शादी है, किसी ख़ास पार्टी-फंक्शन में जाना है, लड़के वाले देखने आ रहे हैं… ऐसे कई बहाने हैं जो महिलाओं को झटपट स्लिम नज़र आने के लिए उकसाते हैं… फिर शुरू होती है स्लिम नज़र आने के शॉर्टकट तरीफ़ों की तलाश… स्लिम नज़र आने के शॉर्टकट तरीके जितने लुभावने होते हैं, उतने ही महंगे भी होते हैं… लेकिन महिलाओं पर स्लिम और जवां नज़र आने का इतना प्रेशर होता है कि इसके लिए वो बजट से ज़्यादा ख़र्च करने के लिए भी तैयार रहती हैं… महिलाओं की झटपट स्लिम और जवां नज़र आने की चाहत के कारण ही स्लिमिंग इंडस्ट्री ख़ूब फल-फूल रही है… आइए, जानें फिटनेस के बाज़ार के सच-झूठ.

Weight Management

महिलाओं पर ख़ूबसूरत दिखने का प्रेशर हमेशा से रहा है. ख़ूबसूरत महिलाओं की ख़ातिर बड़े-बड़े युद्ध तक हुए हैं. आज भी ख़ूबसूरती की डिमांड कम नहीं है. शादी का रिश्ता तय होते समय आज भी ख़ूबसूरत लड़कियों को प्राथमिकता मिलती है. ख़ूबसूरती के मापदंड पर स्लिम बॉडी और ख़ूबसूरत-जवां त्वचा आज भी टॉप पर हैं, इसीलिए हर महिला स्लिम और जवां नज़र आना चाहती है. लेकिन ख़ूबसूरती की इस होड़ में कई महिलाएं अपने बजट और शरीर दोनों का नुक़सान कर रही हैं. झटपट स्लिम और जवां नज़र आने के क्या साइइ इफेक्टस हैं तथा प्राकृतिक तरीके से आप कैसे स्लिम और जवां बनी रह सकती हैं, इसके बारे में बता रही हैं डायटीशियन कंचन पटवर्धन.

स्लिम नज़र आने की वजहें
डायटीशियन कंचन पटवर्धन के अनुसार, पहले तो लड़कियां ही स्लिम बॉडी के लिए डायटिंग करती थीं, लेकिन अब महिलाएं भी पीछे नहीं हैं. महिलाएं भी स्लिम-ट्रिम नज़र आने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहती हैं. लुक्स और फिटनेस को लेकर इतनी कॉम्पटीशन की कई वजहें हैं, जैसे-

* आजकल मिस, मिसेस, मिस्टर… जैसे कई ब्यूटी पेजेंट्स शुरू हो गए हैं, इनमें हिस्सा लेने के लिए अब लड़कियां, महिलाएं, पुरुष सभी अपने लुक्स और बॉडी पर ख़ास ध्यान देने लगे हैं.
* सोशल मीडिया पर फोटोज़ अपलोड करने और लाइक्स-कमेंट्स की चाह में भी लोग महंगे कपड़े, कॉस्मेटिक्स और स्लिमिंग ट्रीटमेंट्स लेने गुरेज नहीं करते.
* कम समय में झटपट स्लिम-ट्रिम बनाने का प्रलोभन देने वाले विज्ञापनों को देखकर भी महिलाओं के मन में विज्ञापन में दिखाई जाने वाली परफेक्ट बॉडी पाने की इच्छा जागने लगती है. इसके लिए वो अपने बजट से ज़्यादा पैसे खर्च करने के लिए भी तैयार रहती हैं.

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Myths About Weight Loss

 

खतरनाक हो सकता है स्लिमिंग का शॉर्टकट फॉमूला
स्लिम नज़र आने के शॉर्टकट तरीके जितने महंगे होते हैं, उतने ही लंबे भी होते हैं. जब तक आप इस गणित को समझ पाती हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. पहले आप झटपट स्लिम नज़र आने के लिए पैसे ख़र्च करती हैं, फिर उससे हुए नुक़सान की भरपाई करने के लिए ख़र्च करती हैं और ये सिलसिला चलता जाता है. ये एक तरह से साइकिल की तरह काम करता है, जिसके कारण स्लिमिंग इंडस्ट्री फल-फूल रही है. लोग डिमांड करते जा रहे हैं और स्लिमिंग इंडस्ट्री सप्लाई करती जा रही है और इसमें नुक़सान स़िर्फ आपका हो रहा है.

जानें फैट बर्नर के साइड इफेक्ट्स
स्लिमिंग इंडस्ट्री में आजकल फैट बर्नर फैशन में हैं. हर कोई फैट बर्नर का प्रयोग करके स्लिम बॉडी पाना चाहता है, लेकिन कई फैट बर्नर आपके मेटाबॉलिज़्म को इतना बढ़ा देने हैं कि इसके कारण ब्लडप्रेशर, स्ट्रोक्स जैसी बीमारी होने की संभावना तक बढ़ जाती है. कुछ फैट बर्नर इंटेस्टाइन में फैट के एब्ज़ॉर्शन को रोकते हैं, जिससे आपकी बॉडी में फैट एब्ज़ॉर्ब नहीं होता. इससे थोड़े दिनों तक तो सब ठीक चलता है, क्योंकि हमारी बॉडी सुपर कंप्यूटर की तरह होती है, वो अपनी ज़रूरत की चीज़ें कहीं न कहीं से निकाल ही देती है. लेकिन थोड़े समय बाद शरीर में फैट की डेफिशियंसी बढ़ने लगती है. धीरे-धीरे शरीर में फैट की इतनी कमी हो जाती है कि विटामिन ए, डी, ई और के की कमी हो जाती है. इससे आगे चलकर कई हेल्थ प्रॉब्लम्स शुरू हो जाती हैं. विटामिन ए की कमी से इम्यूनिटी कम हो जाती है, विटामिन डी की कमी हड्डियां कमज़ोर हो जाती हैं, विटामिन ई की कमी से फर्टिलिटी और मेमोरी प्रभावित होती है, स्किन प्रॉब्मल्म होने लगती हैं. विटामिन के की कमी से खूब में थक्के जमने की समस्या हो सकती है.

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Facts About Weight Loss

कितने हेल्दी हैं प्रोटीन शेक?
आजकल प्रोटीन शेक का सेवन भोजन के विकल्प के तौर पर किया जाने लगा है. कई मल्टीनेशनल कंपनियों के महंगे प्रोटीन शेक का प्रयोग अमीर घर की महिलाएं ही नहीं, बल्कि मध्यमवर्गीय महिलाएं भी कर रही हैं. ये कंपनियां कहती हैं कि आप स़िर्फ दिन में दो बार ये प्रोटीन शेक पीयो और खाना मत खाओ. एक ग्लास प्रोटीन शेक में करीब 190 कैलोरी होती हैं और ये एक ग्लास शेक पीकर आपका पेट भर जाता है. प्रोटीन शेक पीकर आपको खाने की संतुष्टि तो मिलती है, लेकिन आपके शरीर में फैट एब्ज़ॉर्ब नहीं होता. इटपट स्लिम नज़र आने के लिए महिलाएं इन्हें ख़रीदने के लिए अपने बजट से अधिक ख़र्च तो कर लेती हैं, लेकिन कुछ समय बाद जब ये महिलाएं अपना नॉर्मल खाना खाती हैं, तो इनका वज़न दुगुनी गति से बढ़ने लगता है. ऐसे में इन्हें फिर से वही डायट शुरू करनी पड़ती है और ये साइकिल चलता रहता है. इसके अलावा फिटनेस के इस शॉर्टकट प्रोसेस में फैट से ज़्यादा मसल लॉस होता है. जब आप कम समय में ज़्यादा वज़न घटाती हैं, तो आपके शरीर और चेहरे की त्वचा लूज़ हो जाती है, जिससे जल्दी झुर्रियां आ जाती हैं, चेहरा बेजान दिखने लगता है, डबल चिन की समस्या हो जाती है. बाद में आपको स्किन टाइटनिंग के लिए अलग से खर्च करना पड़ता है, महंगे फेशियल करवाने पड़ते हैं, स्किन टाइटनिंग पैकेज लेने पड़ते हैं.

ये है स्लिम और जवां नज़र आने का प्राकृतिक तरीक़ा
आप अपने मोटापे और बढ़ती उम्र के संकेतों को प्राकृतिक तरी़के से आसानी से रोक सकती हैं. इसके लिए आपको अलग से कुछ भी ख़र्च करने की ज़रूरत नहीं है. आइए, हम आपको स्लिम और जवां बने रहने के आसान और असरदार प्राकृतिक उपाय बताते हैं. स्लिम नज़र आने के शॉर्टकट तरीके अपनाने के बजाय प्राकृतिक तरीके से वज़न घटाएं, जिससे आप हमेशा स्लिम और सुंदर बनी रहेंगी.

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Myths And Facts About Weight Loss

* हेल्दी डायट का पहला मंत्र है दिनभर में थोड़ा-थोड़ा खाना इसलिए पूरे दिनभर में 5 बार खाएं. साथ ही यह भी देखें कि आप किस समय क्या खा रही हैं.
* रोज़ सुबह उठकर सबसे पहले नींबू का रस और शहद मिला गरम पानी पीएं. अगर आपको अपना कोलेस्ट्रॉल कम करना है, तो गरम पानी में दालचीनी मिला सकती हैं, डायबिटीज़ कम करना है तो मेथी दाना भिगोकर मिला सकती हैं, सर्दी है तो पानी में हल्दी मिला सकती हैं. इन चीज़ों से सेहत अच्छी रहती है, वज़न घटना है और ख़ूबसूरती बढ़ती है.
* अंकुरित अनाज, गाय का दूध, अंडे, नट्स आदि को अपने सुबह के नाश्ते में शामिल करें. इडली, डोसा, पोहा आदि भी ले सकती हैं.
* नाश्ता व दोपहर के खाने के बीच में जब थोड़ी भूख होती है, उस समय मौसमी फल खाने चाहिए. ये आपको एनर्जी के साथ-साथ विटामिन्स और मिनरल्स भी प्रदान करते हैं, जिससे रोग-प्रतिरोधक शक्ति भी बढ़ती है. फलों के नियमित सेवन से आपको कम कैलोरी में सभी न्यूट्रीएंट्स मिल जाते हैं और ये वज़न कम करने में मददगार होते हैं.

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* दोपहर के खाने में ज्वारी, बाजरा, नाचनी से बनी रोटी खाएं. साथ ही हरी सब्ज़ियां व सभी प्रकार की दालें खा सकती हैं. भोजन के साथ सलाद भी खाएं. कैलोरीज़ कम करने के लिए रोटी में घी न लगाएं. सब्ज़ियों व दाल में भी कम घी/तेल का तड़का लगाएं. मसाले जैसे- हल्दी, कालीमिर्च, हींग आदि के प्रयोग से भोजन को स्वादिष्ट बनाया जा सकता है. इन मसालों से शरीर का मेटाबॉलिज़्म भी बढ़ता है, जिससे वज़न कम होने में मदद मिलती है.
* शाम के नाश्ते में नारियल पानी, छाछ या दही लिया जा सकता है. भूने हुए चने, ब्राउन ब्रेड सैंडविच, फ्रूट आदि भी ले सकती हैं.
* रात को हल्का खाना जैसे- सूप, सलाद, खिचड़ी आदि लेने से वज़न कम होता है. रात के खाने और सोने में लगभग 3 घंटे का अंतर होना चाहिए.
* स्लिम और जवां नज़र आने के लिए हेल्दी डायट के साथ-साथ वर्कआउट भी बेहद ज़रूरी है. इसके लिए रोज़ाना एक घंटा मॉर्निंग वॉक, जॉगिंग, एक्सरसाइज़, योग, मेडिटेशन आदि के लिए ज़रूर निकालें.

– कमला बडोनी

यौन शोषण: लड़के भी हैं उतने ही अनसेफ… (Child Abuse: Myths And Facts About Sexual Abuse Of Boys)

Child Abuse

यौन शोषण: लड़के भी हैं उतने ही अनसेफ… (Child Abuse: Myths And Facts About Sexual Abuse Of Boys)

एक सर्वे के मुताबिक़ लगभग 71% पुरुषों ने यह स्वीकारा है कि बचपन में वे यौन शोषण के शिकार हो चुके हैं.

71%, जी हां, आप सही पढ़ रहे हैं… यह आंकड़ा ज़ेहन को हिला देनेवाला है. अविश्‍वसनीय लग रहा है न, लेकिन यह सच है.

लड़कों (Boys) का बलात्कार (Rape) नहीं हो सकता… हमारे देश में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में कुछ ऐसी ही सोच थी कुछ समय पहले तक… दरअसल, यह एक माइंडसेट है, जो समय के साथ भी अब तक बदला नहीं है. हमें लगता है यौन शोषण (Sexual Abuse) स़िर्फ लड़कियों (Girls) का ही होता है, क्योंकि हम यह मानने को तैयार ही नहीं कि लड़के भी होते हैं शोषण के शिकार.

भारत में अब भी है चुप्पी!

–  हमारे देश में वैसे भी सेक्स, बलात्कार, शोषण आदि विषयों पर बात नहीं होती, तो लड़कों के यौन शोषण पर विचार करने तक की बात यहां कोई कैसे सोच सकता है?

–   लेकिन चूंकि अब इस विषय पर भी बात होने लगी है, तो भारत में भी कुछ वर्ग इस पर बात करने से हिचकिचाते नहीं हैं और यह ज़रूरी भी है.

–   भारत सरकार द्वारा जो रिसर्च किया गया था, उसमें भी चौंकानेवाला आंकड़ा ही सामने आया था कि 53.2% बच्चों ने सेक्सुअल एब्यूज़ की बात बताई थी, जिनमें से 52.9% लड़के थे.

–   चाइल्ड एब्यूज़ दरसअल जेंडर न्यूट्रल है. यह बात मेनका गांधी (महिला-बाल कल्याण मंत्री) ने कही थी और यह सच भी है.

–   दरअसल, चाइल्ड एब्यूज़ के शिकार लड़कों पर कभी कोई स्टडी हुई ही नहीं, क्योंकि न तो इस तरफ़ किसी का ध्यान गया और न ही किसी ने इसकी ज़रूरत समझी.

–   जो 71% पुरुष यौन शोषण के शिकार हुए थे, उनमें से 84.9% ने इस बारे में कभी भी किसी को कुछ नहीं बताया. क्योंकि इसकी मुख्य वजह थी- शर्म. इसके अलावा डर, कंफ्यूज़न और अपराधबोध की भावना भी उनके मन में थी.

–   दरअसल, हमारे समाज में यह मान्यता है कि लड़कों का रेप नहीं हो सकता. यही वजह है कि लड़के अपने यौन शोषण के बारे में कभी बात ही नहीं करते, क्योंकि उनका भरोसा कौन करेगा?

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व्यक्तित्व पर असर डालता है यह शोषण!

–   बचपन में इस तरह के शारीरिक शोषण का असर पूरे मन-मस्तिष्क पर पड़ता है.

–   सबसे पहले तो बच्चा यही सोचता है कि इससे उसे अकेले ही जूझना है.

–  चूंकि वो पुरुष है, तो उसे स्ट्रॉन्ग बनना है, इसलिए उसे अपने शोषण को स्वीकारना होगा.

–   इसका असर उनके इमोशनल व्यवहार पर भी पड़ता है.

–   वो जल्दी से किसी पर भरोसा नहीं करते. एक डर की भावना मन में बैठ जाती है. कॉन्फिडेंस पर असर पड़ता है.

–   उनमें एक तरह का अपराधबोध भी घर कर जाता है कि उन्होंने कुछ ग़लत किया है, ख़ासतौर से तब जब वो शोषण के दौरान इजैक्यूलेट करते हैं.

–   उन्हें यह भी लगता है कि लोग उनकी बातों पर भरोसा नहीं करेंगे यदि उन्होंने किसी से शेयर किया भी तो.

–   वो दोस्तों से कतराने लगते हैं. अकेलापन उन्हें बेहतर लगता है.

–   उन जगहों पर जाने से डरते हैं, जहां शोषण की यादें जुड़ी हों.

पैरेंट्स को रहना होगा अलर्ट

–   बच्चे के व्यवहार में कुछ अलग-सा नज़र आने लगे, तो उससे बात करें.

–   यदि बच्चा न बताए, तो दूसरे तरीक़ों से जानने की कोशिश करें, क्योंकि हो सकता है आपका बच्चा उन तकलीफ़ों से जूझ रहा हो, जिसकी आप कल्पना तक नहीं कर सकते.

–   कई स्कूलों में लड़कों के यौन शोषण की घटनाएं बीते सालों में प्रकाश में आ चुकी हैं. ऐसे में पैरेंट्स को सतर्क रहना चाहिए.

–   बेटी के साथ-साथ बेटे की पूरी सुरक्षा की ओर भी ध्यान देना होगा.

–   उन्हें सेक्स एजुकेशन दें और उनमें यह कॉन्फिडेंस जगाएं कि वो खुलकर आपसे हर बात शेयर कर सकें.

–   उन्हें सही-ग़लत, सेफ-अनसेफ टच के बारे में बताएं.

–   लड़का है, इसलिए उसकी कुछ बातों को इग्नोर न करें.

–  उनके छोटे-छोटे इशारों को समझने का प्रयास करें. हो सकता है उनके पीछे कोई बड़ी बात हो.

कैसे हैंडल करें शोषण के शिकार बच्चों को?

–   बेहतर होगा उनसे बहुत ज़्यादा डिटेल्स न पूछें कि कब, कहां, कैसे हुआ…

–   उन्हें डांटें नहीं कि तुमने पहले क्यों नहीं बताया, बता देते तो तुम्हें बचा लेते… ऐसी बातों से उनके मन में गिल्ट आएगा.

–   उन्हें सपोर्ट करें, लेकिन ओवर पॉज़िटिव वाक्य न बोलें, जैसे- समय के साथ-साथ बेहतर हो जाएगा सब कुछ और ऐसा होता है ज़िंदगी में… या फिर इसके बारे में तुम्हें बुरा महसूस करने या अपराधी महसूस करने की कोई ज़रूरत नहीं है, क्योंकि इस तरह के वाक्य उन्हें यह महसूस करवाएंगे कि उनके साथ बहुत ज़्यादा बुरा हुआ है.

–  बेहतर होगा आप सिंपल तरी़के से कहें कि हमें तुम पर पूरा भरोसा है और हम हैं तुम्हारे साथ हमेशा… यह उन्हें कॉन्फिडेंस देगा.

–   काउंसलर की मदद भी ज़रूर लें और उन्हें एक सामान्य माहौल देने की कोशिश करें.

– कोशिश हमारी यही होनी चाहिए कि शुरुआत में ही हमें पता चल जाए या फिर बच्चों को यह सब झेलना ही न पड़े, इसके लिए बच्चों को ही ट्रेनिंग देनी होगी, जो हर स्कूल में अनिवार्य होनी चाहिए.

– साथ ही बच्चों पर भरोसा करना होगा कि वो अगर कुछ कह रहे हैं, तो उसके पीछे कोई वजह ज़रूर होगी. बेहतर होगा उनकी बातों को भी गंभीरता से लिया जाए और लड़कों को यौन शोषण का डर नहीं, यह सोचकर उनकी अनदेखी या उनकी ओर से लापरवाह रहना छोड़ना होगा.

– गीता शर्मा

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10 क़ानूनी मिथ्याएं और उनकी हक़ीक़त (10 Common Myths About Indian Laws Busted!)

क़ानून की ऐसी कई छोटी-छोटी बारीक़ियां हैं, जिनके बारे में लोगों को पता ही नहीं होता और औरों से सुनी-सुनाई बातों पर विश्‍वास कर उसी को सच मानने लगते हैं. क़ानून से जुड़ी ऐसी ही कुछ मिथ्याओं के सच उजागर करने की हमने यहां एक कोशिश की.

Myths About Indian Laws

मिथ 1. मुझे कोर्ट में ओरिजनल डॉक्यूमेंट्स जमा करने पड़ेंगे.

सच: ऐसा बिल्कुल नहीं है और आप ऐसा भूलकर भी मत करना, क्योंकि कोर्ट में उनके खोने का डर बना रहता है. सिविल प्रोसीज़र कोड, 1908 के अनुसार, कोर्ट में पेटीशन दाख़िल करते समय आपको उसके साथ एफीडेविट और ओरिजनल डॉक्यूमेंट्स की सर्टीफाइड फोटोकॉपीज़ सबूत के तौर पर जमा करनी होती हैं. हां, सुनवाई के दौरान आपको ओरिजनल डॉक्यूमेंट्स दिखाने पड़ते हैं, पर अगर उस समय भी आप ओरिजनल्स नहीं दिखा सकते, तो सर्टीफाइड फोटोकॉपीज़ भी दिखा सकते हैं. याद रखें, अटेस्टेशन किसी गैजेटेड ऑफिसर से ही करवाएं और अपनी सहूलियत के लिए हमेशा ओरिजनल्स की सर्टीफाइड फोटोकॉपीज़ के दो सेट बनाकर रखें, ताकि ज़रूरत पड़ने पर उनका इस्तेमाल कर सकें. ओरिजनल्स आप कभी किसी को न दें, अगर आप चाहें, तो अपने वकील को भी सर्टीफाइड कॉपीज़ दे सकते हैं. सेफ्टी के तौर पर ओरिजनल्स को हमेशा स्कैन करके कंप्यूटर में सेव करके रखें.

मिथ 2: मैं जब भी चाहूं कोर्ट में केस दाख़िल कर सकता हूं. 

सच: द लिमिटेशन एक्ट, 1963 के तहत सभी सिविल केसेज़ ‘टाइम बार्ड’ होते हैं यानी हर केस की एक तय समय सीमा होती है. किसी भी मामले को उस तय समय के भीतर ही कोर्ट में दाख़िल किया जा सकता है, वरना आप उसके ख़िलाफ़ कार्यवाही का मौक़ा गंवा सकते हैं. मामले के अनुसार यह समय सीमा 3 महीने से लेकर 3 साल तक की हो सकती है. हालांकि कुछ मामलों में सहूलियत मिल जाती है, बशर्ते देरी की वजह कोर्ट को वाजिब लगे, जैसे- अगर कोई 16 साल का है, जिसे पेटीशन दाख़िल करना है और उसका कोई गार्जियन नहीं है, तो उसके केस की समय सीमा उसके 18 साल के होने के बाद से शुरू होगी.

मिथ 3: अगर मैं गारंटर हूं, तो इसका यह मतलब नहीं कि मैं लोन का अमाउंट चुकाऊं. 

सच: इस मिथ की हक़ीक़त को आप जितनी जल्दी समझ लें, आपके लिए उतना ही अच्छा होगा. जब आप किसी के लिए लोन के गारंटर बनते हैं, तो अगर किसी कारणवश वह लोन नहीं चुका पाता या उसकी मृत्यु हो जाती है, जिसके बाद बैंक के पास अपना पैसा वसूलने के लिए गारंटर एकमात्र ज़रिया बचता है, तो बैंक को पूरा अधिकार है कि वह बचे हुए लोन का पूरा अमाउंट आपसे वसूल कर सकता है. इतना ही नहीं, यह भविष्य में आपके लोन लेने की योग्यता को भी प्रभावित कर सकता है. इसलिए अगली बार लोन के लिए किसी के गारंटर बनने से पहले पूरी तरह से आश्‍वस्त  हो जाएं कि वह पूरा लोन चुका पाएगा, तभी उसके गारंटर बनें.

मिथ 4: बिना किसी वकील के मैं कंज़्यूमर कोर्ट में केस नहीं कर सकता.   

सच: कंज़्यूमर कोर्ट में केस करने के लिए आपको वकील की ज़रूरत नहीं है, अगर आप अपने केस को ख़ुद पेश कर सकते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार आप ऐसा कर सकते हैं. दरअसल, वकील की लंबी-चा़ैडी फीस के बारे में सोचकर ही बहुत-से लोग कंज़्यूमर कोर्ट में जाने से कतराते हैं, क्योंकि कंज़्यूमर कोर्ट के छोटे-मोटे मामलों में मुआवज़ा बहुत ज़्यादा नहीं मिलता. ऐसे में वकील की फीस देना हर किसी को भारी पड़ता है. इसलिए अगर आपको भी किसी कंपनी ने कोई धोखा दिया है या आपको उनसेकोई शिकायत है, तो आप भी उसके ख़िलाफ़ कंज़्यूमर कोर्ट जा सकते हैं और आपको किसी वकील की भी ज़रूरत नहीं.

मिथ 5: मैं अपनी ख़ानदानी प्रॉपर्टी जिसे चाहूं, जैसे चाहूं, गिफ्ट कर सकता हूं.

सच: ख़ानदानी प्रॉपर्टी पूरे परिवार की होती है, इसलिए किसी एक को कोई हक़ नहीं होता कि वह उसे अपनी मर्ज़ी से गिफ्ट कर सके. जब तक कि परिवार का एकलौता या आख़िरी सदस्य न हो, तब तक प्रॅापर्टी स़िर्फ बांटी जा सकती है, गिफ्ट नहीं की जा सकती. हां, अगर आपके अलावा आपके ख़ानदान में प्रॉपर्टी क्लेम करनेवाला दूसरा कोई नहीं है, तो आप प्रॉपर्टी को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक बेच या गिफ्ट कर सकते हैं. यह नियम हिंदू संयुक्त परिवार में रहनेवाले जॉइंट प्रॉपर्टीवालों के लिए है.

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Myths About Indian Laws
मिथ 6: लेटर ऑफ अथॉरिटी के ज़रिए मैं किसी को भी कोई भी ज़िम्मेदारी दे सकता हूं.

सच: प्रतिनिधित्व के लिए दो डॉक्यूमेंट्स इस्तेमाल में लाए जाते हैं. एक लेटर ऑफ अथॉरिटी और दूसरा पावर ऑफ अटॉर्नी. लेटर ऑफ अथॉरिटी के ज़रिए बैंक से चेक बुक लेना, डॉक्यूमेंट्स जमा करना या लेना जैसे छोटे व आसान काम दिए जा सकते हैं, जबकि कॉम्प्लेक्स फाइनेंशियल मैटर्स, जैसे- प्रॉपर्टी बेचना, डॉक्यूमेंट्स व चेक साइन करने आदि बड़े व महत्वपूर्ण ट्रांज़ैक्शन्स के लिए पावर ऑफ अटॉर्नी का इस्तेमाल किया जाता है.

मिथ 7: कोर्ट के बाहर किए गए समझौते को मैं कोर्ट में चैलेंज नहीं कर सकता.

सच: यह सच नहीं है. ज़्यादातर लोग कोर्ट की लंबी कार्यवाही से बचने के लिए आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट यानी कोर्ट के बाहर ही मामले को निपटाना, को तवज्जो देते हैं. पर अगर आपको लगता है कि इस सेटलमेंट में आपके साथ धोखाधड़ी हुई है या आपके ऊपर दबाव डालकर ज़बर्दस्ती सेटलमेंट करवाया गया है, तो आप उसके ख़िलाफ़ कोर्ट में जा सकते हैं. कोर्ट एग्रीमेंट के नियम व शर्तों को देखकर अपना ़फैसला सुनाते हैं. इसके अलावा आर्बिट्रेशन (किसी और की मध्यस्थता) के ज़रिए सुलझाए गए मामले को भी लेकर आप कोर्ट जा सकते हैं. इसलिए इस ग़लतफ़हमी में बिल्कुल न रहें कि अगर कोर्ट के बाहर समझौता कर लिया है, तो उसके ख़िलाफ़ कोर्ट में नहीं जा सकते.

मिथ 8: सेकंड हैंड गाड़ी ख़रीदने पर इंश्योरेंस कंपनी को सूचित करने की कोई ज़रूरत नहीं.

सच: जब भी आप सेकंड हैंड गाड़ी ख़रीदते हैं, तो स़िर्फ गाड़ी की कंडीशन पर ही नहीं, बल्कि पेपरवर्क पर भी पूरा ध्यान दें. वेहिकल रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट, रोड टैक्स रसीद के साथ-साथ वेहिकल इश्योरेंस भी अपने नाम पर ट्रांसफर करवा लें. अगर इंश्योरेंस पेपर पर आप नाम ट्रांसफर नहीं करवाते और गाड़ी का एक्सीडेंट हो जाता है या गाड़ी चोरी हो जाती है, तो इंश्योरेंस कंपनी आपका क्लेम पास नहीं करेगी, क्योंकि पेपर्स पर आपका नाम नहीं है. इसलिए नियमानुसार गाड़ी ख़रीदने के 14 दिनों के भीतर ही इश्योरेंस पेपर्स पर अपना नाम ट्रांसफर करवा लेने में ही आपका फ़ायदा है.

मिथ 9: मेरे वारिस को मेरे सारे शेयर्स अपने आप मिल जाएंगे.

सच: यह ख़ासतौर पर उनके लिए है, जो शेयर्स आदि में इंवेस्ट करते रहते हैं. अगर आपने वसीयत में लिख दिया है कि मेरे बाद मेरा सब कुछ मेरी पत्नी या बच्चों को मिलेगा, लेकिन शेयर्स के लिए किसी और को नामांकित (नॉमिनी) किया है, तो नियमानुसार आपके बाद आपके शेयर्स नॉमिनी को मिलेंगे ना कि क़ानूनी वारिस को. द कंपनीज़ एक्ट के सेक्शन 109ए के अनुसार, अकाउंट होल्डर के बाद उसके शेयर्स क़ानूनी तौर पर नॉमिनी को मिलेंगे.एक्सपर्ट्स के अनुसार भविष्य में किसी भी तरह की परेशानी से बचने के लिए नॉमिनी का ही नाम वसीयत में भी शेयर्स के लिए लिखें.

मिथ 10: मेरे बाद मेरी प्रॉपर्टी का बंटवारा करने के लिए ऑनलाइन वसीयत काफ़ी है.

सच: डिजिटली साइन किए हुए ऑनलाइन वसीयत को हमारे देश में मान्यता नहीं मिलती. ऑनलाइन वसीयत का प्रिंटआउट लेकर आपको दो गवाहों की मौजूदगी में उसे साइन करना होता है. उसके बाद उन दोनों गवाहों को भी उस वसीयत को अटेस्ट करना पड़ता है, जिसके बिना वह वसीयत मान्य नहीं होती. हालांकि ज़रूरी नहीं फिर भी अगर आप चाहें, तो वसीयत को रजिस्टर करा सकते हैं. आजकल ऑनलाइन बहुत-सी वेबसाइट्स हैं,  जैसे- ुुु.ट-थळश्रश्र और ुुु.ङशसरलूुीळींशी.लेा जिनकी मदद से कुछ अमाउंट देकर आप अपनी वसीयत बनवा सकते हैं, पर यह काफ़ी नहीं. उस वसीयत का प्रिंटआउट लेकर, साइन और अटेस्ट कराना बहुत ज़रूरी है.  बॉक्स अगर ओरिजनल पेपर्स खो जाएं, तो डुप्लीकेट के लिए क्या करें?यहां हम जनरल प्रोसेस के बारे में बता रहे हैं, जो ज़्यादतर मामलों मेंे इस्तेमाल किया जाता है. – पुलिस में एफआईआर दर्ज कराएं.- एक इंग्लिश और स्थानीय भाषा के न्यूज़पेपर में पब्लिक नोटिस जारी करें.- ओरिजनल इश्यूअर को डुप्लीकेट बनाने के लिए अप्लाई करें.- एफआईआर और प्रेस क्लिपिंग की कॉपी सबूत के तौर पर रखें.

वसीयत के लिए कुछ ख़ास टिप्स

आप जिन लोगों को अपनी प्रॉपर्टी देना चाहते हैं, उनके नाम साफ़-साफ़ लिखें. उनके निकनेम या आधे-अधूरे नाम न लिखें.- अगर आप किसी को कुछ ऐसा देना चाहते हैं, जिसकी रक़म लिखी जा सकती है, तो वह रक़म ज़रूर लिखें.- जिन चीज़ों के लिए रक़म लिखना मुमकिन नहीं, उनके लिए प्रॉपर्टी का सही-सही डिस्क्रिप्शन लिखें.- जो दो लोग वसीयत को अटेस्ट करेंगे, उनको या उनकी पत्नी को इस वसीयत से कोई फ़ायदा नहीं मिलना चाहिए यानी वसीयत ऐसे लोगों से अटेस्ट कराएं, जिन्हें उस वसीयत से कोई लाभ नहीं मिलनेवाला. – अपनी वसीयत के लिए एक एक्ज़ीक्यूटर अपॉइंट करें, जिसकी यह ज़िम्मेदारी होगी कि वह इस बात को सुनिश्‍चित करे कि सभी बातों का वैसा ही पालन किया गया, जैसा कि वसीयत में लिखा गया था.

– अनीता सिंह

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