Najam

कहानी अपना लेखक ख़ुद खोज लेती है

जब उतरना होता है उस भागीरथी को पन्नों पर

सुनानी होती है आपबीती इस जग को

तो खोज में निकलती है अपने भागीरथ के

और सौंप देती है स्वयं को एक सुपात्र को

लेखक इतराता है, वाह मैंने क्या सोचा! क्या लिखा! कमाल हूं मैं!

कहानी को गौण कर, मद से भरा वो मन पहाड़ चढ़ता है श्रेय के

और दूर खड़ी कहानी हंसती है एक मां की तरह, उसके भोलेपन पर

भूल जाता है वो तो निमित मात्र था, कहानी की दया का पात्र था…

कहानी कृतज्ञता की अपेक्षा किए बिना लेखक का भोला मन बहलाती है

और उसे भ्रमित छोड़.. पन्नों पर, किताबों में, ध्वनियों पर आरूढ़ हो इतराती है…

दीप्ति मित्तल
दीप्ति मित्तल
Poem

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Kavita

तुम और मैं
मिले तो मुझे अच्छा लगा
गुज़रे वक़्त की कसक कुछ कम हुई
परंतु मन के डर ने कहा
तुम दूर ही अच्छे हो..

जानती हूं मैं
तुम्हारे आने से होंठो पर मुस्कान आई
और मन में उमंग भी छाई
फिर भी कहती हूं
तुम दूर ही अच्छे हो..

देखने लगी मैं
भविष्य के लिए सुनहरे सपने
सजने लगे आंखों में नई उम्मीदें
फिर भी यह लगा
तुम दूर ही अच्छे हो..

समझ गई मैं
तुम क्षणिक जीवन में विश्‍वास करते हो
परंतु मैंने शाश्वत जीवन की कल्पना की थी
इसलिए मैंने कहा
तुम दूर ही अच्छे हो..

जान गई मैं
हमसफ़र ना हुए तो क्या हुआ
ख़ूबसूरत और मीठी याद तो हो
पास होकर भी
तुम दूर ही अच्छे हो…

अमृता सिन्हा

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Kavita

नेत्र कहूं नयन कहूं या कहूं मैं चक्षु
आंखों की भाषा सिर्फ़ नहीं है अश्रु
जीवन का दर्पण है आंखें
भक्ति का अर्पण है आंखें
प्रेम की अभिव्यक्ति आंखें
तो कभी विरह का क्रन्दन बन जाती आंखें
जो अधरों से ना फूटे वो बोल है आंखें
प्रियतम की प्रीत का हसीन एहसास करती आंखें
कभी प्रेम तो कभी समर्पण आंखें
तो कभी नशे से मदहोश हो झूमती आंखें
ग़म को अश्रुओं में बहाती आंखें
तो कभी उसी ग़म को हंसी में छिपाती आंखें
दिल के दरवाज़ों में बंद राज़ को बेपरदा करती आंखें
तो कभी हर राज़ को दफ़न करती आंखें
चाहे जितना छिपाओ मन के भावों को पर
हर भाव की अभिव्यक्ति बन जाती ये आंखें
रात को ख़्वाब सजाती
दिन में हक़ीक़त से रूबरू करवाती ये आंखें
ख़ुशक़िस्मत है वो जिन पर आंखों की नेमत है
है अगर दो आंखें तो ज़िंदगी का हर लम्हा रोशन है…

Sarika Fallor
सारिका फलोर

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Kavita
Kavita

वस्त्रहरण

दौपदी का, हुआ था युगों पहले

धृतराष्ट्र के

द्यूत क्रीड़ागृह में

युगों के प्रवाह में नष्ट नहीं हुआ वो

द्यूत क्रीड़ागृह

अपितु इतना फैला

इतना फैला कि आज समूचा देश ही

बन गया है

द्यूत क्रीड़ागृह

दाँव पर लगती है

हर मासूम लड़की की ज़िंदगी

जिसने किया है गुनाह

सपने देखने का

किया है गुनाह

युगों के संवेदनहीन अंधत्व पर हंसने

और

अपनी शर्तों के साथ आत्मनिर्भर जीवन जीने का

युगों पहले कहा था

भीष्म ने सिर झुकाकर अग्निसुता से

धर्म की गति अति सूक्ष्म होती है पुत्री

नहीं है प्रावधान

धर्म में

रोकने का दुःशासन के हाथ

और मैं हूँ बंधा धर्म के साथ

विवश हूँ, क्षमा करो

और आज फिर वही

अनर्गल, नपुंसक विवशता

क़ानून की

मैं विवश हूँ, बंधा हूँ क़ानून के साथ

नहीं रोक सकता किसी नाबालिग के हाथ

पिंजरे में हैं मेरे अधिकार

और

वो है स्वतंत्र करने को, नृशंसता के सभी हदें पार

अभिभावकों, मंच पर आओ

‘ओ री चिरैया’ के गीत गाओ,

और दो आँसू बहाकर

घर जाकर

अपने आँगन की चिरैया के पर कतरकर

कर दो उसे पिंजरे में बंद

क्योंकि हम हैं विवश

अपराधियों को सड़कों पर

विचरने देने को स्वच्छंद

तो क्या

इक क्रांति युग में लाने की

सैलाब दिलों में उठाने की

अथक यात्रा ख़त्म हुई?

टूटी सारी आशाएँ?

मिट गए सभी भ्रम?

नहीं, नहीं, हम अग्निसुता, हम भैरवी

हम रणचंडी, हम माँ काली

हम इतने कमज़ोर नहीं

अभी नहीं मिटा है एक हमारा

उस परमशक्ति पर दृढ़ विश्‍वास

सह लेंगे हम उसी भरोसे

और कुछ वर्षों का वनवास

बाधा, विघ्नों में तप-तपकर

आत्मशक्ति को और प्रखरकर

पाएंगे हम पात्रता

हो उस महाशक्ति के हाथ हमारे रथ की डोर

फिर जोड़ेंगे महासमर

फिर होगा विप्लव गायन

देंगे फिर युग को झकझोर

शर शैया पर लेटेगा ही

इक दिन ये जर्जर क़ानून

मिटाने को अंधी संवेदनहीनता

जब होगा हर इक दिल में जुनून

लचर न्याय व्यवस्था को

जगत से जाना ही होगा

हम सबको संगठित तपस्या कर

नवयुग को लाना ही होगा…

bhavana prakash
भावना प्रकाश

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Hindi Poems

अब न कोई शक़-ओ-शुबा है, हर ढंग से तस्तीक़ हो गई

निराशाओं से लड़ने की, मेरी बीमारी ठीक हो गई

लहू नसों में कुछ करने का, धीरे-धीरे ठंड पा गया

ज़ख़्म अभी बाकी है पर, भरने का सा निशां आ गया

उठती-गिरती धड़कन भी, इक सीधी-सी लीक हो गई

निराशाओं से लड़ने की, मेरी बीमारी ठीक हो गई

अब न जुनूं कुछ करने का, बेचैन रूह को करता है

अब न दिल में ख़्वाबों का, दरिया बेदर्द बहता है

ख़्वाब फ़ासला पा गए और हक़ीक़तें नज़दीक़ हो गई

निराशाओं से लड़ने की, मेरी बीमारी ठीक हो गई…

bhavana prakaash
भावना प्रकाश

शक-ओ-शुबा- संदेह
तस्तीक़- सत्यता प्रमाणित होना
लीक- लकीर

(इस ग़ज़ल का मतलब है कि अब ख़्वाबों को पूरा करने के लिए पागलपन की हद तक संघर्ष करते रहने की आदत ख़त्म हो रही है…)

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Gazal

सांस, ख़ुशबू गुलाब की हो

धड़कन ख़्वाब हो जाए

उम्र तो ठहरी रहे

हसरत जवान हो जाए

बहार उतरे तो कैमरा लेकर

तेरी सूरत से प्यार ले जाए

जो नाचता है मोर सावन में

तेरी सीरत उधार ले जाए

लहर गुज़रे तेरे दर से तमन्ना बनकर

तेरे यौवन का भार ले जाए

आज मौसम में कुछ नमी उतरे

तेरी परछाईं बहार ले जाए

रात ख़ामोश हो गई क्यूं कर

अपना सन्नाटा चीर दे बोलो

तेरी आंखों से प्यार ले जाए

ऐ दोस्त ‘तेरी हस्ती’ लिखूं कैसे

फ़क्र हो अगर ‘तुझ पे’

मेरी हस्ती निसार हो जाए…

– शिखर प्रयाग

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Kavya

मैं ख्वाब देखता था
तुम ख्वाब हो गए

उम्मीद के शहर में
तुम प्यास हो गए

उम्र मेरी एक दिन
लौट कर के आई

तुम आईने के लेकिन
एहसास हो गए…

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

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जब ज़िक्र फूलों का आया याद तुम आए बहुत

चांद जब बदली से निकला, याद तुम आए बहुत

Gazal

कुछ न पूछो किस तरह परदेस में जीते हैं हम

ख़त तो आया है किसी का, याद तुम आए बहुत

यार आए थे वतन से प्यार के क़िस्से लिए

दिल है धड़का बेतहाशा, याद तुम आए बहुत

मैं हूं कोसों दूर तुम से उड़ के आ सकता नहीं

जब भी चाहा है भुलाना, याद तुम आए बहुत

जब हवा पूरब से आ सरगोशियां करने लगी

दिल में एक तूफ़ां उठा था, याद तुम आए बहुत

Vedprakash Pahwa

वेद प्रकाश पाहवा ‘कंवल’

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