Najam

अब न कोई शक़-ओ-शुबा है, हर ढंग से तस्तीक़ हो गई

निराशाओं से लड़ने की, मेरी बीमारी ठीक हो गई

लहू नसों में कुछ करने का, धीरे-धीरे ठंड पा गया

ज़ख़्म अभी बाकी है पर, भरने का सा निशां आ गया

उठती-गिरती धड़कन भी, इक सीधी-सी लीक हो गई

निराशाओं से लड़ने की, मेरी बीमारी ठीक हो गई

अब न जुनूं कुछ करने का, बेचैन रूह को करता है

अब न दिल में ख़्वाबों का, दरिया बेदर्द बहता है

ख़्वाब फ़ासला पा गए और हक़ीक़तें नज़दीक़ हो गई

निराशाओं से लड़ने की, मेरी बीमारी ठीक हो गई…

bhavana prakaash
भावना प्रकाश

शक-ओ-शुबा- संदेह
तस्तीक़- सत्यता प्रमाणित होना
लीक- लकीर

(इस ग़ज़ल का मतलब है कि अब ख़्वाबों को पूरा करने के लिए पागलपन की हद तक संघर्ष करते रहने की आदत ख़त्म हो रही है…)

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Gazal

सांस, ख़ुशबू गुलाब की हो

धड़कन ख़्वाब हो जाए

उम्र तो ठहरी रहे

हसरत जवान हो जाए

बहार उतरे तो कैमरा लेकर

तेरी सूरत से प्यार ले जाए

जो नाचता है मोर सावन में

तेरी सीरत उधार ले जाए

लहर गुज़रे तेरे दर से तमन्ना बनकर

तेरे यौवन का भार ले जाए

आज मौसम में कुछ नमी उतरे

तेरी परछाईं बहार ले जाए

रात ख़ामोश हो गई क्यूं कर

अपना सन्नाटा चीर दे बोलो

तेरी आंखों से प्यार ले जाए

ऐ दोस्त ‘तेरी हस्ती’ लिखूं कैसे

फ़क्र हो अगर ‘तुझ पे’

मेरी हस्ती निसार हो जाए…

– शिखर प्रयाग

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Kavya

मैं ख्वाब देखता था
तुम ख्वाब हो गए

उम्मीद के शहर में
तुम प्यास हो गए

उम्र मेरी एक दिन
लौट कर के आई

तुम आईने के लेकिन
एहसास हो गए…

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

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जब ज़िक्र फूलों का आया याद तुम आए बहुत

चांद जब बदली से निकला, याद तुम आए बहुत

Gazal

कुछ न पूछो किस तरह परदेस में जीते हैं हम

ख़त तो आया है किसी का, याद तुम आए बहुत

यार आए थे वतन से प्यार के क़िस्से लिए

दिल है धड़का बेतहाशा, याद तुम आए बहुत

मैं हूं कोसों दूर तुम से उड़ के आ सकता नहीं

जब भी चाहा है भुलाना, याद तुम आए बहुत

जब हवा पूरब से आ सरगोशियां करने लगी

दिल में एक तूफ़ां उठा था, याद तुम आए बहुत

Vedprakash Pahwa

वेद प्रकाश पाहवा ‘कंवल’

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