nida fazli

Shayari, Nida Fazli Special
ग़ज़ल 1

गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया

होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया

इक इश्क़ नाम का जो परिंदा ख़ला में था

उतरा जो शहर में तो दुकानों में बट गया

पहले तलाशा खेत फिर दरिया की खोज की

बाक़ी का वक़्त गेहूँ के दानों में बट गया

जब तक था आसमान में सूरज सभी का था

फिर यूँ हुआ वो चंद मकानों में बट गया

हैं ताक में शिकारी निशाना हैं बस्तियाँ

आलम तमाम चंद मचानों में बट गया

ख़बरों ने की मुसव्वरी ख़बरें ग़ज़ल बनीं

ज़िंदा लहू तो तीर कमानों में बट गया

ग़ज़ल 2

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता

कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता

तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो

जहाँ उमीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता

कहाँ चराग़ जलाएँ कहाँ गुलाब रखें

छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता

ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं

ज़बाँ मिली है मगर हम-ज़बाँ नहीं मिलता

चराग़ जलते हैं बीनाई बुझने लगती है

ख़ुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता

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Hindi Shayari

निदा फ़ाज़ली की उम्दा ग़ज़ल 
बेसन की सोंधी रोटी पर 
खट्टी चटनी जैसी मां 
याद आती है चौका-बासन 
चिमटा फुकनी जैसी मां 
बाँस की खुर्री खाट के ऊपर 
हर आहट पर कान धरे 
आधी सोई आधी जागी 
थकी दोपहरी जैसी मां 
चिड़ियों के चहकार में गूंजे
राधा-मोहन अली-अली 
मुर्गे की आवाज़ से खुलती 
घर की कुंडी जैसी मां 
बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन 
थोड़ी-थोड़ी-सी सब में 
दिन भर इक रस्सी के ऊपर 
चलती नटनी जैसी मां 
बाँट के अपना चेहरा, माथा, 
आँखें जाने कहाँ गई 
फटे पुराने इक अलबम में 
चंचल लड़की जैसी मां…
मैं शायर तो नहीं… (Hindi Shayari: Main Shayer to nahi…)

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