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क्या आप जानते हैं सिंधु की पर्सनल लाइफ से जुड़ी ये 30 दिलचस्प बातें?(Do you know these 30 interesting things about Sindhu)

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रियो ओलिंपिक में सिल्वर मेडल जीतकर दुनियाभर में देश का नाम रोशन करनेवाली पी. वी. सिंधु बेहतरीन खिलाड़ी होने के साथ ही एक बेहतरीन इंसान भी हैं. खिलाड़ी के रूप में सिंधु का इंटरव्यू तो कई जगह छप चुका है, लेकिन मेरी सहेली अपने रिडर्स के लिए पी. वी. सिंधु की कुछ ऐसी बातें लेकर आयी है, जो आप नहीं जानते होंगे. अपने रिडर्स को पी. वी. सिंधु के एक अलग रूप से मिलवाने के लिए हमने उनसे बात की. बातचीत के दौरान लगा ही नहीं कि किसी स्टार प्लेयर से बात हो रही है. मेडल जीतने के साथ ही सिंधु ने इस छोटे से इंटरव्यू के दौरान हमारा दिल भी जीत लिया. मेरी सहेली से सिंधु ने एक ख़ास सहेली की तरह दिल खोलकर अपनी बातें कीं. पूरे इंटरव्यू के दौरान सिंधु कई बार हंसती और खिलखिलाती हुई  नज़र आईं.

अगर आप बैडमिंटन प्लेयर न होतीं, तो क्या होतीं?
हूं… जब मैं छोटी थी, तो डॉक्टर बनना चाहती थी, लेकिन अब बैडमिंटन के अलावा कोई दूसरा सपना नहींहै. इसी में आगे… बहुत आगे जाना चाहती हूं.

मैच से पहले होनेवाले स्ट्रेस को कैसे कम करती हैं आप?
मैच से पहले होनेवाले स्ट्रेस को मैं अपने कोच से शेयर करती हूं और फ्री महसूस करती हूं. उस खिलाड़ी और अपने गेम स्ट्रैटजी के बारे में अपने कोच से खुलकर बातचीत करती हूं और ख़ुद को रिलैक्स करती हूं.

आपका स्ट्रॉन्ग पॉइंट क्या है?
अटैक. मैं अपने गेम में विरोधी खिलाड़ी पर शुरुआत से ही अटैक करने की कोशिश करती हूं, ताकि शुरुआत से ही मेरा प्रेशर उस पर बना रहे.

आपका वीक पॉइंट क्या है?
(सोचते हुए) फिलहाल तो ऐसा कुछ भी नहीं है.

आपका फेवरेट फूड क्या है?
(मुस्कुराती हुई) इटैलियन. मुझे इटैलियन फूड बहुत पसंद है. इसके अलावा मुझे बिरयानी बहुत पसंद है. मां के हाथ की बिरयानी की बात ही कुछ और होती है.

लाखों प्रशंसकों की फेवरेट हैं आप. क्या आपका भी कोई फेवरेट प्लेयर है?
(हंसती हुई) हां, बिल्कुल. टेनिस स्टार रॉजर फेडरर मेरे फेवरेट प्लेयर हैं.

इंडियन प्लेयर में किसी का नाम बताइए.
विराट कोहली, धोनी और सचिन तेंदुलकर पसंद हैं.

मैच प्रैक्टिस के अलावा क्या करना अच्छा लगता है?
वैसे तो मेरा बहुत-सा समय प्रैक्टिस में ही जाता है, लेकिन इससे समय मिलने पर मैं फैमिली के साथ फिल्म देखना, कज़िंस से मिलना और दोस्तों के साथ एंजॉय करना पसंद करती हूं.

क्या आपको लगता है कि रियो में मेडल जीतने से पहले तक सायना नेहवाल और ज्वाला गुट्टा जैसी खिलाड़ियों की शैडो में आपकी पर्सनैलिटी कहीं दबी हुई सी थी?
(सोचती हुई) हूं… ऐसा नहीं है. हर खिलाड़ी का दिन होता है. इस बार मेरा था. फिलहाल मैं अपने प्रदर्शन से ख़ुश हूं. मुझे बाकी बातों से कोई फर्क़ नहीं पड़ता.

रियो अलिंपिक के बाद लाइफ कितनी बदल गई?
(हंसती हुई) ड्रीम था, जो सच हो गया. मैं बता नहीं सकती कि मैं कितनी ख़ुश हूं.

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पहली बार ओलिंपिक में हिस्सा लिया आपने और पहली बार में ही देश को सिल्वर मेडल दिलाया, लेकिन आपके कोच गोपीचंद कहते हैं कि आप अभी भी अनफिनिश्ड प्रोडक्ट हैं. क्या ये सुनकर बुरा लगता है?
बिल्कुल नहीं. अभी तो मेरी शुरुआत है. मुझे बहुत से टूर्नामेंट खेलने हैं. कोच सर जो कहते हैं सही कहते हैं.

कोर्ट पर और कोर्ट के बाहर भी आपको काफ़ी शांत प्लेयर के रूप में देखा जाता है. रियल सिंधु कैसी हैं?
हूं… सच कहूं तो रियल में भी मैं बहुत शांत हूं. हां, ये बात अलग है कि कोर्ट पर अब मैं अटैक के मूड में रहती हूं. ऐसा पहले नहीं था.

फेवरेट फिल्म कौन-सी है?
मुझे सारी फिल्में अच्छी लगती हैं. चाहे वो बॉलीवुड हो या तेलगु या तमिल.

आपका पसंदीदा बॉलीवुड ऐक्टर कौन है?
(ख़ुश होते हुए) मुझे ऋतिक रोशन पसंद हैं. और हां, रणबीर कपूर भी.

आपकी फेवरेट बॉलीवुड एक्ट्रेस कौन हैं?
दीपिका पादुकोण.

आपका फेवरेट डेस्टिनेशन क्या है?
(हंसती हुई) ओह! ये बता पाना बहुत मुश्किल है. मुझे घूमने का बहुत शौक़ है. हर जगह मुझे पसंद आ जाती है.

ख़ास मौक़ों पर क्या पहनना पसंद करती हैं आप?
मेरे मूड पर डिपेंड करता है. जब जो मूड करता है पहन लेती हूं.

क्या आपको त्योहार पसंद हैं?
हां, मुझे फेस्टिवल्स बहुत अच्छे लगते हैं. दशहरा, दीपावली और गणेश चतुर्थी मेरे पसंदीदा त्योहार हैं.

घर पर रहने पर क्या करना पसंद करती हैं आप?
टीवी देखना और गाना सुनना. इससे मुझे बहुत सुकून मिलता है.

अपने पैरेंट्स की कोई अच्छी बात बताइए.
बहुत ही सपोर्टिव हैं और प्यार करनेवाले हैं. मुझे बहुत मोटीवेट करते हैं.

बाहर जाते समय पर्स में क्या रखना पसंद करती हैं?
(हंसती हुई) पैसा. वैसे मुझे लिपग्लॉस बहुत पसंद है. मेरे पर्स में ये रहता ही है.

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टेनिस स्टार सानिया मिर्ज़ा अपने गेम के साथ ही अपनी ग्लैमरस पर्सनैलिटी से भी लोगों को अट्रैक्ट करती हैं. क्या आप भी ग्लैमराइज़्ड होने में दिलचस्पी रखती हैं?
(हंसती हुई) हा..हा..हा.. क्यों नहीं. वैसे मेरे लिए खेल पहले है. मुझे लगता है कि जैसे-जैसे मैं मैच जीतूंगी ग्लैमर अपने आप आ जाएगा. वैसे ग्लैमराइज़्ड होना कोई बुरी बात नहीं है.

क्या आप गैजेट्स लवर हैं?
(मुस्कुराती हुई) हां, मुझे मेरा मोबाइल बहुत पसंद है. रियो ओलिंपिक में मुझे इससे दूर रखा गया था.

आज की लड़कियों को क्या संदेश देना चाहेंगी?
अच्छा करो. जो जी में आए, उसी फील्ड में करियर बनाओ.

लड़कियों के पैरेंट्स के लिए कोई संदेश?
हां, बेटों की ही तरह अपनी बेटियों को प्रोत्साहित कीजिए. उन्हें आपके सपोर्ट की ज़रूरत है. उन पर विश्‍वास कीजिए और उन्हें आगे बढ़ने में मदद कीजिए. वो आपको कभी निराश नहीं करेंगी.

क्या मेडल जीतने के बाद दोस्तों के बीच अब दूसरी सिंधु दिखती है?
(हंसती हुई) बिल्कुल नहीं, मैं अपने दोस्तों के लिए कभी चेंज नहीं हो सकती.

क्या आपको ड्राइविंग आती है? सचिन द्वारा गिफ्ट की गई कार को आपने चलाया?
हां, मुझे ड्राइविंग आती है, लेकिन अभी तक मैंने वो कार नहीं चलाई है.

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कम उम्र में नेम-फेम के साथ बहुत सारा पैसा भी आपने कमा लिया, तो क्या अब आप आत्मनिर्भर बनकर अलग से उन पैसों को इन्वेस्ट करेंगी या पैरेंट्स को दे दिया है?
(हंसती हुई) जी बिल्कुल भी नहीं, मैंने अपने पैरेंट्स को ये ज़िम्मेदारी दी है. उन्हें जो करना होगा वो करेंगे. मेरा काम स़िर्फ मैच खेलना है.

क्या आप चैरिटी में इंटरेस्ट रखती हैं?
जी, मुझे चैरिटी करना पसंद है, ख़ासतौर पर बूढ़े, ग़रीब, अनाथ बच्चों और लड़कियों के लिए बहुत कुछ करने की इच्छा है और मैं करती भी हूं.

रियो में कांस्य पदक जीतने वाली साक्षी मलिक की शादी की चर्चा ज़ोरों पर हैं. ऐसा लगता है साक्षी बहुत जल्द ही जीवन की दूसरी इंनिंग की शुरुआत करेंगी. क्या आपका भी ऐसा कुछ प्लान है?
(ज़ोर से हंसती हुई) वेल, अभी नहीं. अभी तो मेरा पूरा ध्यान अपनी गेम पर है और आनेवाले ओलिंपिक के साथ दूसरे टूर्नामेंट पर. शादी को अभी टाइम है.

– श्वेता सिंह

लड़की होने का एक्सक्यूज़ मत दो- साक्षी मलिक (don’t give excuse that you are a girl)

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बेटियों के पैदा होने पर भले ही समाज में ख़ुशियां न मनाई जाती हों, लेकिन अपने हुनर से एक दिन बेटियां इस मौ़के को जीने के लिए समाज को अपनी ओर झुका ही लेती हैं. कुछ ऐसा ही हुआ हरियाणा की कुश्ती क्वीन साक्षी मलिक के साथ. रियो ओलिंपिक में जाने से पहले उनकी उपलब्धियों पर लोगों का ध्यान नहीं था, लेकिन जब ओलिंपिक के 12वें दिन देश को पहला मेडल इस बेटी ने दिलाया, तो देश के कोने-कोने से साक्षी मलिक के नाम के नारे लगाए जाने लगे. हाल ही में मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान साक्षी मलिक ने हमसे शेयर की कुछ ख़ास बातें.

क्या आपको विश्‍वास था कि आप मेडल ला पाएंगी?
जी हां, मुझे ख़ुद पर विश्‍वास था कि मैं रियो ओलिंपिक में बहुत अच्छा करूंगी. मेडल तो भगवान के हाथ में था, लेकिन मैं जानती थी कि मुझे अपना बेस्ट देना है और वो मैं दूंगी. उससे मुझे कोई रोक नहीं सकता. मुझे मेरे देश के लिए कुछ ख़ास करना है. बस, इसी उम्मीद के साथ मैं खेली और देश के लिए मेडल जीता.

क्या लड़कियों के लिए कुश्ती में करियर बनाना ज़्यादा मुश्किल होता है?
भूल जाओ कि तुम लड़की हो. दुनिया का हर काम लड़कियां कर सकती हैं. लड़की होने का बहाना मत बनाओ. मुझे कभी नहीं लगा कि एक लड़की होने के नाते मुझे किसी तरह की कोई दिक्क़त हुई हो. हां, ये ज़रूर है कि हम लड़कियों की कुछ फिज़िकल प्रॉब्लम होती हैं, लेकिन उसे हम अपने रास्ते की रुकावट नहीं मान सकते. लड़की होना अच्छी बात है.

देश की लड़कियों को क्या संदेश देना चाहेंगी?
लड़की होना बहुत अच्छी बात है. इसे एक समस्या की तरह मत लो. तुम वो सब कर सकती हो, जो तुम चाहती हो, इसलिए आगे बढ़ो.

देश के बाहर कोच का साथ न जाना किस तरह से खेल को प्रभावित करता है?
बिल्कुल सही कहा आपने. हर एक गेम में कोच का साथ होना बहुत ज़रूरी होता है. वो हमारी कमियों को बताने और विरोधी खिलाड़ी को किस तरह से मात देनी है, जैसी बातें बताते हैं. उनके साथ न रहने पर हमें बहुत परेशानी होती है. कोच, फिज़ियो आदि हमारे साथ जाने चाहिए.

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क्या मेडल संघर्ष के दिन भुला देता है?
जी… ऐसा नहीं है. कड़ी मेहनत के बाद हम मेडल जीत पाते हैं. हां, ये ज़रूर है कि कुछ पल के लिए हम उन परेशानियों को दरकिनार कर देते हैं, लेकिन हमारे भीतर हमारा संघर्ष जीवित रहता है.

आपको इंस्पीरेशन किससे मिली?
2008 में जब सुशील कुमारजी ने देश को मेडल दिया, तब मुझे लगा कि मैं भी देश को कुश्ती में मेडल दिला सकती हूं. उसके बाद जापान की दो लड़कियों ने मुझे बहुत प्रभावित किया.

क्या स़िर्फ जीत के बाद पैसों की बौछार करना सही है या शुरुआती दिनों में खिलाड़ियों को सारी सुविधाएं प्रोवाइड करानी चाहिए?
जी बिल्कुल, जब हम जीतकर आते हैं, तो सभी बहुत ख़ुश होते हैं और गिफ्ट के तौर पर हमें पैसे मिलते हैं, लेकिन मैं ये कहना चाहूंगी कि इसके साथ ही सरकार और तमाम संगठन को आगे आना चाहिए और नए खिलाड़ियों की आर्थिक मदद करनी चाहिए. उन्हें सही ट्रेनिंग, कोच, डायट आदि उपलब्ध कराना चाहिए. इससे आगे वो प्लेयर देश के लिए ज़रूर अच्छा करेंगे. कई बार आर्थिक रुकावटें कई खिलाड़ियों को आगे नहीं बढ़ने देतीं.

क्या मेडल जीतने के बाद प्रेशर बढ़ गया है?
बिल्कुल सही कहा आपने. मेडल जीतने के बाद प्रेशर बहुत बढ़ गया है. और बेहतर करने का दबाव बढ़ जाता है, लेकिन इससे मैं निराश नहीं हूं. इसे हमेशा सकारात्मक रूप से लूंगी, ताकि आगे और अच्छा कर सकूं.

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कम उम्र में सक्सेस को हैंडल करना कितना मुश्किल/आसान है?
देखिए, ये तो है कि मेडल लाने के बाद लोग मेरी बहुत प्रशंसा कर रहे हैं. कई माता-पिता अपने बच्चों को मेरे जैसा बनने की नसीहत दे रहे हैं. देश-विदेश से बधाइयां मिल रही हैं, लेकिन इसे मैं सही तरह से ले रही हूं. मैं जानती हूं कि मैं कहां हूं, इसलिए हमेशा ज़मीन से जुड़ी रहूंगी.

क्या आप जैसे खिलाड़ियों की कहानी नए खिलाड़ियों को मीडिया के माध्यम से बताई जानी चाहिए?
मुझे लगता है कि ज़रूर बताई जानी चाहिए. संघर्ष, परिश्रम, हार-जीत आदि से जुड़ी कहानी बताई जानी चाहिए. इससे नए खिलाड़ियों को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा. उनका मनोबल ऊपर उठेगा और वो बेहतर परफॉर्म कर सकेंगे.

हमें पता नहीं होता कि कौन-सा सप्लीमेंट कब लें
हमारे और विदेशी खिलाड़ियों में एक जो सबसे बड़ा फर्क़ है, वो है उनका हर चीज़ में परफेक्ट होना. उनके कोच, फिज़ियो आदि उनके साथ होते हैं. वो समय के साथ चलते हैं, लेकिन हमारे साथ ऐसा नहीं होता. हमें तो बस सप्लीमेंट दे दिए जाते हैं. अब उसे कब खाना है, कैसे खाना है या कितना खाना है, वो हम पर निर्भर करता है. हमारी डायट का ख़्याल भी हमें ख़ुद ही रखना पड़ता है. इन सब से बहुत फर्क़ पड़ता है.

– श्वेता सिंह

योगेश्‍वर दत्त ने लंदन सिल्वर मेडल लेने से किया इंकार!-Hats off to yogeshwar

योगेश्‍वर के जज़्बे को सलाम !

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  • जैसाकि सब जानते हैं कि लंदन ओलिंपिक में योगेश्‍वर दत्त के कांस्य पदक को सिल्वर में अपग्रेड कर दिया गया था, क्योंकि सिल्वर मेडल विजेता रूस के पहलवान बेसिक कुदुखोव का डोप टेस्ट पॉज़िटिव पाया गया था, लेकिन योगेश्‍वर ने ट्विटर पर अपने विचार रखे कि वो चाहते हैं यह सिल्वर मेडल बेसिक के परिवार के पास ही रहे.
  • योगेश्‍वर ने अपने ट्वीट में कहा… अगर हो सके तो ये मेडल उन्हीं पे पास रहने दिया जाए. उनके परिवार के लिए सम्मानपूर्ण होगा.मेरे लिए मानवीय संवेदना सर्वोपरि है.
  • बेसिक कुदुखोव शानदार पहलवान थे. उनका मृत्यु के पश्‍चात डोप टेस्ट में फेल हो जाना दुखद है. मैं खिलाड़ी के रूप में उनका सम्मान करता हूं.

योगेश्‍वर का कांस्य पदक अब सिल्वर में तब्दील होगा!

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  • 2012 लंदन ओलिंपिक के दौरान भारतीय पहलवान योगेश्‍वर दत्त को जो कांस्य पदक हासिल हुआ था, वो अपग्रेड होकर सिल्वर में तब्दील होने जा रहा है.
  • इसकी वजह यह है कि जिस रूसी पहलवान ने उस दौरान सिल्वर मेडल हासिल किया था, उसका डोप टेस्ट पॉज़िटिव निकला.
  • 2012 में 60 किलोग्राम की फ्रीस्टाइल कुश्ती में रूस के बेसिक कुदुखोव ने सिल्वर मेडल जीता था, लेकिन उनका डोप टेस्ट पॉज़िटिव आया और अब योगेश्‍वर इस मेडल के हक़दार हैं.
  • ध्यान रहे, बेसिक कुदुखोव की वर्ष 2013 में कार दुर्घटना में मौत हो चुकी है, लेकिन इस माह रियो ओलिंपिक से पहले अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक समिति ने लंदन ओलिंपिक के दौरान एकत्र किए सैंपल्स का फिर से परीक्षण किया था. ये सैंपल्स 10 वर्ष तक सुरक्षित रखे जाते हैं और यह एक स्टैंडर्ड प्रैक्टिस है.

रियो ओलिंपिक- दिलों की विजेता रहीं… वेलडन दीपा!!

रियो ओलिंपिक

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दिलों की विजेता रहीं…
वेलडन दीपा!!

 

खेल में हार-जीत तो होती रहती है, पर अपने मेहनत-लगन, जज़्बे व जुनून से दीपा ने कामयाबी की एक नई इबारत लिख दी है. कह सकते हैं कि मेडल न जीतकर भी उन्होंने भारतीयों के प्रशंसाभरे सैकड़ों मेडल्स जीत लिए.

दीपा ने हमें जोड़ने का काम किया. 14 अगस्त, 2016 की शाम जैसे पूरा भारत टीवी पर एकजुट हो गया था, दीपा के परफॉर्मेंस देखने के लिए. इस खेल को लेकर बरसों बाद देशवासियों में ऐसा उत्साह दिखा.
जिम्नास्टिक्स के फाइनल में भले ही वे चौथे स्थान पर रहीं, पर भारतीय दिलों ने उन्हें शिखर पर रखा.
वे मात्र 0.15 से ब्रॉन्ज़ मेडल से चूकीं, पर उन्होंने अपना 100% दिया, जो काबिल-ए-तारीफ़ है.
अपने पहले ओलिंपिक में ही वॉल्ट इवेंट के फाइनल में पहुंचना और फिर आठ दिग्गजों के बीच चौथे स्थान पर रहना एक बड़ी उपलब्धि है.
जिम्नास्टिक जैसे जोख़िमभरे, कड़ी मेहनत वाले खेल को चुनना और उस पर ख़ासतौर प्रोडुनोवा को चुनकर दीपा ने दुनियाभर के महिला जिम्नास्टिक्स के लिए मिसाल कायम की है.
दीपा के बेहतरीन प्रयास और खेल की हर किसी ने सराहना की, फिर चाहे वो सेलिब्रिटीज़ हो या फिर आम देशवासी.
साल 2020 में टोक्यो (जापान) में होनेवाले ओलिंपिक के लिए मेडल लेकर ही रहेंगी, ऐसा वादा दीपा ने ख़ुद से किया है.

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दीपा- अनटोल्ड स्टोरी

दीपा के बचपन से फ्लैट पैर थे और जिम्नास्टिक एक्सपर्ट के अनुसार ये जिम्नास्टिक जैसे खेल के लिए सबसे बड़ी रुकावट है. इससे जंप के बाद ज़मीन पर लैंड करते समय बैलेंस बनाने में परेशानी आती है.
दीपा छह साल की उम्र से कोच बिश्‍वेशर नंदी से जिम्नास्टिक की ट्रेनिंग ले रही हैं.
दीपा ने जब पहली बार किसी जिम्नास्टिक कॉम्पटिशन में हिस्सा लिया था, तब उनके पास कॉस्टयूम व शू तक नहीं थे. उन्होंने किसी से उधार लेकर परफॉर्म किया.
उनके पिता दुलाल करमाकर, जो साई (स्पोर्ट्स में वेट लिफ्टिंग कोच है, का सपना बेटी को जिम्नास्ट खिलाड़ी बनाना ही था.
उनकी मां गीता करमाकर व बहन पूजा साहा का प्रोत्साहन भी हमेशा उनके साथ रहा.
दीपा की पंसदीदा खिलाड़ी सिमोन बिल्स हैं, पर प्रेरणास्त्रोत आशीष कुमार रहे, जिन्होंने साल 2010 के कॉमनवेल्थ गेम में मेडल जीता था.
दीपा को अपने प्रैक्ट्सि व स्टडी के अलावा अन्य किसी भी चीज़ का शौक़ नहीं है.
लेकिन बकौल दीपा के उन्हें अपने ग़ुस्से को कंट्रोल करने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है.
वैसे दीपा ने रियो ओलिंपिक के वॉल्ट्स फाइनल टेस्टिंग कॉम्पटिशन में गोल्ड जीता था.
महिलाओं की कलात्मक जिम्नास्टिक में दबदबा रखनेवाली त्रिपुरा की दीपा गोल्डन गर्ल, गुड्डू के नाम से मशहूर हैं.
दीपा ने अब तक अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय, राज्य स्तरीय विभिन्न प्रतियोगिता में 67 गोल्ड मेडल के साथ कुल 77 मेडल्स जीते हैं.
उनकी इंटरनेशनल करियर की शुरुआत साल 2014 के कॉमनवेल्थ से हुई, जिसमें उन्होंने ब्रॉन्ज़ मेडल जीता.
मेडल न जीत पाने पर दीपा ने 1.3 अरब भारतीय देशवासियों से माफ़ी भी मांगी. लेकिन देश को उनकी अब तक की उपलब्धियों पर गर्व है. हम सभी उनकी मेहनत-लगन, संघर्ष व जज़्बे को सलाम करते हैं.

– ऊषा गुप्ता

रियो ओलिंपिक्स… संघर्ष, पर आशाएं भी कम नहीं.

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दीपा करमाकर- जय हो!!!

उत्तर-पूर्व राज्य त्रिपुरा की दीपा ने जिम्नास्टिक्स खेल में भारत को एक नई ऊंचाई दी. उन्होंने जिम्नास्टिक्स वॉल्ट इवेंट के फाइनल में पहुंचकर इतिहास रच दिया.
+ 22 साल की दीपा ऐसा करनेवाली देश की पहली जिम्नास्ट हैं.
+ उन्होंने महिलाओं के लिए सबसे जोख़िभरा माना जानेवाला प्रोडुनोवा वॉल्ट-डबल फ्रंट
समरसाल्ट करके हर किसी को आश्‍चर्यचकित कर दिया.
+ दीपा दुनिया की उन पांच महिला जिम्नास्टिक्स में से एक हैं, जो सफलतापूर्वक प्रोडुनोवा वॉल्ट कर पाती हैं.

दीपा की उपलब्धियां

दीपा ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करनेवाली पहली भारतीय महिला जिम्नास्ट हैं.
वे चर्चा में पहली बार तब आईं, जब उन्होंने साल 2014 में ग्लास्गो कॉमनवेल्थ गेम में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता था.
2015 में एशियन चैंपियनशिप (हिरोशिमा) में ब्रॉन्ज़ मेडल जीता.
इसके अलावा वर्ल्ड चैंपियशिप के फाइनल राउंड में पांचवें स्थान पर रहीं.
दीपा अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित हो चुकी हैं.

संघर्ष भरा सफ़र

दीपा के फ्लैटफुट के कारण कभी उनमें अरुचि दिखानेवाले उनके कोच बिस्वेस्वर नंदी आज दीपा पर गर्व महसूस कर रहे हैं. वे दीपा की मेहनत-लगन और निरंतर प्रैक्टिस करते रहने की प्रतिबद्धता से बेहद प्रभावित हैं. प्रेरणास्त्रोत बन गई दीपा ने आज भारतीय जिम्नास्ट में कुछ कर गुज़रने का जज़्बा भर दिया है.
देशवासियों की अपार उम्मीदों के कारण दबाव से बचने के लिए दीपा के कोच ने उन्हें उनके कमरे और प्रैक्टिस करने तक ही सीमित रखा है. वे दीपा को उनके पैरेंट्स के अलावा किसी से भी मिलने नहीं दे रहे और दीपा को भी इसमें कोई परेशानी महसूस नहीं हो रही, क्योंकि वो सतत फाइनल की प्रैक्टिस में लगी हुई हैं.

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जीत से दो क़दम दूर…

14 अगस्त को फाइनल में दीपा के साथ विभिन्न देश के 8 प्रतियोगी होंगे, जिसमें अमेरिका, कोरिया, रूस, कनाडा, उज़्बेकिस्तान,
स्विट्ज़रलैंड और चीन शामिल है.
सिमोन बाइल्स, मारिया पसेका, जोंग उन होंग जैसी बेहतरीन जिम्नास्ट्स के साथ उनका कड़ा मुक़ाबला रहेगा.
बकौल दीपा के मुझ पर फाइनल का कोई दबाव नहीं है, मैं अपना बेस्ट देने की कोशिश करूंगी.

इतिहास पर एक नज़र

ओलिंपिक्स में अब तक भारत के केवल 11 पुरुष जिम्नास्ट ने ही हिस्सा लिया है.
इनमें साल 1952 में 2, 1956 में 3, 1964 में 4 जिम्नास्ट थे.
साल 1964 के बाद दीपा पहली भारतीय हैं, जिन्होंने जिम्नास्टिक्स के फाइनल में जगह बनाई है.
साथ ही यह पहला मौक़ा होगा जब भारतीय जिम्नास्ट मेडल के रेस में है.

हम सभी की तरफ़ से उन्हें फाइनल के लिए ऑल द बेस्ट!!

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5सचिन तेंदुलकर- आप अपने उपलब्धियों के चलते युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई हैं.