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Panchtantra Story

एक जंगल में पहाड़ की चोटी पर एक किला बना था. किले के एक कोने के साथ बाहर की ओर एक बड़ा देवदार का पेड़ था. किले में उस राज्य की सेना की एक टुकड़ी तैनात थी. देवदार के पेड़ पर एक उल्लू रहता था. वह खाने की तलाश में नीचे घाटी में फैले चरागाहों में आता था. चरागाहों की लंबी घास और झाड़ियों में कई छोटे-छोटे कीट-पतंग मिलते थे, जिन्हें उल्लू अपना भोजन बनाता था. पास ही एक बड़ी झील थी, जिसमें हंस रहते थे. उल्लू पेड़ पर बैठा झील को निहारता रहता. उसे हंसों का तैरना और उड़ना देखकर बहुत आनंद आता था. वह सोचता कि हंस कितना शानदार पक्षी है. एकदम दूध-सा स़फेद, गुलगुला शरीर, सुराहीदार गर्दन, सुंदर मुख और तेजस्वी आंखें. उसकी बड़ी इच्छा थी कि कोई हंस उसे अपना दोस्त बना ले.

एक दिन उल्लू पानी पीने के बहाने झील के किनारे एक झाड़ी पर उतरा. पास ही एक बहुत शालीन व सौम्य हंस पानी में तैर रहा था. हंस तैरता हुआ झाडी के पास  आया.
उल्लू ने बात करने का बहाना ढूंढ़ा, “हंस जी, आपकी आज्ञा हो तो पानी पी लूं. बहुत प्यास लगी है.” हंस ने चौंककर उसे देखा और बोला, “मित्र! पानी प्रकृति का दिया वरदान है. इस पर किसी एक का अधिकार नहीं, बल्कि सबका हक़ है.”
उल्लू ने पानी पीकर सिर हिलाया जैसे उसे निराशा हुई हो. हंस ने पूछा, “मित्र! असंतुष्ट दिख रहे हो. क्या प्यास नहीं बुझी?”
उल्लू ने कहा, “हे हंस! पानी की प्यास तो बुझ गई पर आपकी बातों से मुझे ऐसा लगा कि आप नीति व ज्ञान के सागर हैं. मुझमें उसकी प्यास जग गई है. वह कैसे बुझेगी?”
हंस मुस्कुराया, “मित्र, आप कभी भी यहां आ सकते हैं और मुझसे बात कर सकते हैं. मैं जो जानता हूं आपको बताउंगा और मैं भी आपसे कुछ सीखूंगा.”
इसके बाद हंस व उल्लू रोज़ मिलने लगे. एक दिन हंस ने उल्लू को बता दिया कि वह वास्तव में हंसों का राजा हंसराज है. अपना असली परिचय देने के बाद हंस अपने मित्र को निमंत्रण देकर अपने घर ले गया. उसके यहां शाही ठाठ थी. खाने के लिए कमल व नरगिस के फूलों के व्यंजन परोसे गए. इसके अलावा भी बहुत कुछ था. बाद में सौंफ-इलाइची की जगह मोती पेश किए गए. ये देखकर उल्लू हैरान रह गया.

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अब हंसराज रोज़ाना ही उल्लू को महल में ले जाकर खिलाने-पिलाने लगा. इससे उल्लू को डर लगने लगा कि किसी दिन उसे साधारण समझकर हंसराज उससे दोस्ती न तोड़ लें. इसलिए हंसराज की बराबरी करने के लिए उसने झूठमूठ कह दिया कि वह भी उल्लुओं का राजा  उल्लूकराज  है. झूठ कहने के बाद उल्लू को लगा कि उसका भी फर्ज़ बनता हैं कि हंसराज को अपने घर बुलाए.

एक दिन उल्लू ने दुर्ग के भीतर होनेवाली गतिविधियों को गौर से देखा और उसके दिमाग़ में एक योजना आई. उसने दुर्ग की बातों को बहुत ध्यान से समझा. सैनिकों के कार्यक्रम नोट किए. फिर वह हंसराज के पास चला गया. जब वह झील पर पहुंचा, तब हंसराज कुछ हंसनियों के साथ जल में तैर रहा थे. उल्लू को देखते ही हंस बोला, “मित्र, आप इस समय?”
उल्लू ने उत्तर दिया, “हां मित्र! मैं आपको आज अपना घर दिखाने व अपना मेहमान बनाने के लिए ले जाने आया हूं. मैं कई बार आपका मेहमान बना हूं. मुझे भी सेवा का मौक़ा दें.”
हंस ने टालना चाहा, “मित्र, इतनी जल्दी क्या हैं? फिर कभी चलेंगे.”
उल्लू ने कहा आज तो आपको लिए बिना नहीं जाऊंगा. हंसराज को उल्लू के साथ जाना ही पड़ा.

पहाड़ की चोटी पर बने किले की ओर इशारा कर उल्लू उड़ते-उड़ते बोला वह मेरा किला है. हंस बहुत प्रभावित हुआ.वो दोनों जब उल्लू के घर वाले पेड़ पर उतरे तो किले के सैनिकों की परेड शुरू होने वाली थी. दो सैनिक बुर्ज पर बिगुल बजाने लगे. उल्लू दुर्ग के सैनिकों के रोज के कार्यक्रम को याद कर चुका था, इसलिए ठीक समय पर हंसराज को ले आया था. उल्लू बोला, “देखो मित्र, आपके स्वागत में मेरे सैनिक बिगुल बजा रहे हैं. उसके बाद मेरी सेना परेड और सलामी देकर आपको सम्मानित करेगी.”
रोज़ की तरह परेड हुई और झंडे को सलामी दी गयी. हंस समझा सचमुच उसी के लिए यह सब हो रहा है. उल्लू के इस सम्मान से गदगद होकर हंस बोला, “आप तो एक शूरवीर राजा की भांति ही राज कर रहे हो.”
उल्लू ने हंसराज पर रौब डाला, “मैंने अपने सैनिकों को आदेश दिया है कि जब तक मेरे परम मित्र राजा हंसराज मेरे अतिथि हैं, तब तक इसी प्रकार रोज बिगुल बजे व सैनिकों की परेड निकले.”

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उल्लू को पता था कि सैनिकों का यह रोज़ का काम है. हंस को उल्लू ने फल, अखरोट व बनफशा के फूल खिलाए. उनको वह पहले ही जमा कर चुका था. भोजन का महत्व नहीं रह गया. सैनिकों की परेड का जादू अपना काम कर चुका था. हंसराज के दिल में उल्लू मित्र के लिए बहुत सम्मान पैदा हो चुका था. उधर सैनिक टुकड़ी को वहां से कूच करने के आदेश मिल चुका था. दूसरे दिन सैनिक अपना सामान समेटकर जाने लगे तो हंस ने कहा, “मित्र, देखो आपके सैनिक आपकी आज्ञा लिए बिना कहीं जा रहे हैं.”

उल्लू हड़बड़ाकर बोला, “किसी ने उन्हें ग़लत आदेश दिया होगा. मैं अभी रोकता हूं उन्हें.” ऐसा कह वह ‘हूं हूं’ करने लगा.
सैनिकों ने उल्लू की आवाज़ सुनी और इसे अपशकुन समझकर जाना स्थगित कर दिया. दूसरे दिन फिर वही हुआ. सैनिक जाने लगे तो उल्लू ने फिर आवाज़ निकाली. सैनिकों के नायक ने क्रोधित होकर सैनिकों को मनहूस उल्लू को तीर मारने का आदेश दिया. एक सैनिक ने तीर छोड़ा. तीर उल्लू की बगल में बैठे हंस को लगा. तीर लगने पर हंस नीचे गिरा और फड़फड़ाकर मर गया. उल्लू उसकी लाश के पास शोकाकुल हो विलाप करने लगा, “हाय, मैंने अपनी झूठी शान के चक्कर में अपना परम मित्र खो दिया. धिक्कार है मुझ पर.”
उल्लू को आसपास की ख़बर से बेसुध होकर रोते देखकर एक सियार उस पर झपटा और उसका काम तमाम कर दिया.

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Panchtantra Hindi Short Story

बहुत समय पहले की बात हैं, एक जंगल में विशाल बरगद का पेड़ कौओं की राजधानी थी. हजारों कौए उस पर रहते थे. उसी पेड़ पर कौओं का राजा मेघवर्ण भी रहता था. बरगद के पेड़ के पास ही एक पहाड़ी थी, जिसमें कई गुफाएं थीं. उन गुफाओं में उल्लू रहते थे, उनका राजा अरिमर्दन था. अरिमर्दन बहुत पराक्रमी था. कौओं को तो उसने उल्लुओं का दुश्मन नम्बर एक घोषित कर रखा था. उसे कौओं से इतनी नफरत थी कि किसी कौए को मारे बिना वह भोजन नहीं करता था.
जब बहुत ज़्यादा कौए मारे जाने लगे तो उनके राजा मेघवर्ण को बहुत चिंता हुई. उसने इस समस्या पर विचार करने के लिए सभा बुलाई.
मेघवर्ण बोला, “मेरे प्यारे कौओं, आपको तो पता ही हैं कि उल्लुओं के आक्रमण के कारण हमारा जीवन असुरक्षित हो गया है. हमारा शत्रु शक्तिशाली हैं और अहंकारी भी. हम पर रात को हमले किए जाते हैं. हम रात को देख नहीं पाते. हम दिन में जवाबी हमला नहीं कर पाते, क्योंकि वे गुफा के अंधेरे में सुरक्षित बैठे रहते है.”
फिर मेघवर्ण ने स्याने और बुद्धिमान कौओं से अपने सुझाव देने को कहा.

एक डरपोक कौआ बोला, “हमें उल्लुओं से समझौता कर लेना चाहिए. वह जो शर्त रखें, हमें स्वीकार कर लेना चाहिए. अपने से ताकतवर दुश्मन से पिटते रहने का भला क्या मतलब है?”
बहुत-से कौओं ने इस बात का विरोध किया. एक गर्म दिमाग़ का कौआ चीखा, “हमें उन दुष्टों से बात नहीं करनी चाहिए. सब उठो और उन पर आक्रमण कर दो.”

एक निराशावादी कौआ बोला, “शत्रु बलवान है हमें यह स्थान छोडकर चले जाना चाहिए.”
स्याने कौए ने सलाह दी, “अपना घर छोड़ना ठीक नहीं होगा. हम यहां से गए तो बिल्कुल ही टूट जाएंगे. हमें यहीं रहकर और पक्षियों से मदद लेनी चाहिए.”
कौओं में सबसे चतुर व बुद्धिमान स्थिरजीवी नामक कौआ था, जो चुपचाप बैठा सबकी दलीलें सुन रहा था. राजा मेघवर्ण उसकी ओर मुड़े, “महाशय, आप चुप हैं, मैं आपकी राय जानना चाहता हूं.”
स्थिरजीवी बोला, “महाराज, शत्रु अधिक शक्तिशाली हो तो छलनीति से काम लेना चाहिए.”
“कैसी छलनीति? ज़रा साफ़-साफ़ बताइए,
स्थिरजीवी.” राजा ने कहा.
स्थिरजीवी बोला, “आप मुझे भला-बुरा कहिए और मुझ पर जानलेवा हमला कीजिए.”
मेघवर्ण चौंका, “यह आप क्या कह रहे हैं स्थिरजीवी?”

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स्थिरजीवी राजा मेघवर्ण वाली डाली पर जाकर कान में बोला, “छलनीति के लिए हमें यह नाटक करना पडेगा. हमारे आसपास के पेड़ों पर उल्लू जासूस हमारी इस सभा की सारी कार्यवाही देख रहे हैं. उन्हे दिखाकर हमें फूट और झगड़े का नाटक करना होगा. इसके बाद आप सारे कौओं को लेकर ॠष्यमूक पर्वत पर जाकर मेरी प्रतीक्षा करें. मैं उल्लुओं के दल में शामिल होकर उनके विनाश का सामान जुटाऊंगा. घर का भेदी बनकर उनकी लंका ढाएगा.”
फिर नाटक शुरू हुआ. स्थिरजीवी चिल्लाकर बोला, “मैं जैसा कहता हूं, वैसा कर राजा के बच्चे. क्यों हमें मरवाने पर तुला हैं?”
मेघवर्ण चीख उठा, “गद्दार, राजा से ऐसी बदतमीजी से बोलने की तेरी हिम्मत कैसे हुई?” कई कौए एकसाथ चिल्ला उठे, “इस गद्दार को मार दो.”

राजा मेघवर्ण ने अपने पंख से स्थिरजीवी को ज़ोरदार झापड़ मारकर तने से गिरा दिया और घोषणा की, “मैं गद्दार स्थिरजीवी को कौआ समाज से निकाल रहा हूं. अब से कोई कौआ इस नीच से संबध नहीं रखेगा.”
आसपास के पेड़ों पर छिपे बैठे उल्लू जासूसों की आंखे चमक उठी. उल्लुओं के राजा को जासूसों ने सूचना दी कि कौओं में फूट पड़ गई है. मार-पीट और गाली-गलौच हो रही है. इतना सुनते ही उल्लुओं के सेनापति ने राजा से कहा, “महाराज, यही मौक़ा है कौओं पर आक्रमण करने का. इस समय हम उन्हें आसानी से हरा देंगे.”
उल्लुओं के राजा अरिमर्दन को सेनापति की बात सही लगी. उसने तुरंत आक्रमण का आदेश दे दिया. बस फिर क्या था उल्लुओं की सेना बरगद के पेड़ पर आक्रमण करने चल पड़ी, परंतु वहां एक भी कौआ नहीं मिला.
मिलता भी कैसे? योजना के अनुसार मेघवर्ण सारे कौओं को लेकर ॠष्यमूक पर्वत की ओर कूच कर गया था. पेड़ ख़ाली पाकर उल्लुओं के राजा ने थूका, “कौए हमारा सामना करने की बजाय भाग गए. ऐसे कायरों पर हज़ार थू.” सारे उल्लू “हू-हू” की आवाज़ निकालकर अपनी जीत की घोषणा करने लगे. नीचे झाड़ियों में गिरा पड़ा स्थिरजीवी कौआ यह सब देख रहा था. स्थिरजीवी ने कां-कां की आवाज़ निकाली. उसे देखकर जासूस उल्लू बोला, “अरे, यह तो वही कौआ है, जिसे इनका राजा धक्का देकर गिरा रहा था और अपमानित कर रहा था.”
उल्लुओं का राजा भी आया. उसने पूछा, “तुम्हारी यह दुर्दशा कैसे हुई?” स्थिरजीवी बोला, “मैं राजा मेघवर्ण का नीतिमंत्री था. मैंने उनको नेक सलाह दी कि उल्लुओं का नेतृत्व इस समय एक पराक्रमी राजा कर रहे हैं, इसलिए हमें उल्लुओं की अधीनता स्वीकार कर लेनी चाहिए. मेरी बात सुनकर मेघवर्ण क्रोधित हो गया और मुझे फटकार कर कौओं की जाति से बाहर कर दिया. मुझे अपनी शरण में ले लीजिए.”
उल्लुओं का राजा अरिमर्दन सोच में पड़ गया. उसके स्याने नीति सलाहकार ने कान में कहा, “राजन, शत्रु की बात का विश्‍वास नहीं करना चाहिए. यह हमारा शत्रु है. इसे मार दो.” एक चापलूस मंत्री बोला, “नहीं महाराज! इस कौए को अपने साथ मिलाने से बहुत लाभ होगा. यह कौओं के घर के भेद हमें बताएगा.”

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राजा को भी स्थिरजीवी को अपने साथ मिलाने में लाभ नज़र आया और उल्लू स्थिरजीवी कौए को अपने साथ ले गए. वहां अरिमर्दन ने उल्लू सेवकों से कहा, “स्थिरजीवी को गुफा के शाही मेहमान कक्ष में ठहराओ, इन्हें कोई कष्ट नहीं होना चाहिए.”
स्थिरजीवी हाथ जोड़कर बोला, “महाराज, आपने मुझे शरण दी, यही बहुत है. मुझे अपनी शाही गुफा के बाहर एक पत्थर पर सेवक की तरह ही रहने दीजिए. वहां बैठकर आपके गुण गाते रहने की ही मेरी इच्छा है.” इस प्रकार स्थिरजीवी शाही गुफा के बाहर डेरा जमाकर बैठ गया.
गुफा में नीति सलाहकार ने राजा से फिर से कहा,“महाराज! शत्रु पर विश्‍वास मत करो. उसे अपने घर में स्थान देना तो आत्महत्या करने समान है.” अरिमर्दन ने उसे क्रोध से देखा, “तुम मुझे ज़्यादा नीति समझाने की कोशिश मत करो. चाहो तो तुम यहां से जा सकते हो.” नीति सलाहकार उल्लू अपने दो-तीन मित्रों के साथ वहां से सदा के लिए यह कहता हुआ चला गया, “विनाशकाले विपरीत बुद्धि.”
कुछ दिनों बाद स्थिरजीवी लकड़ियां लाकर गुफा के द्वार के पास रखने लगा, “सरकार, सर्दियां आनेवाली हैं. मैं लकड़ियों की झोपड़ी बनाना चाहता हूं ताकि ठंड से बचाव हो.” धीरे-धीरे लकड़ियों का काफ़ी ढेर जमा हो गया. एक दिन जब सारे उल्लू सो रहे थे, तो स्थिरजीवी वहां से उड़कर सीधे ॠष्यमूक पर्वत पहुंचा, जहां मेघवर्ण और अन्य कौए उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे. स्थिरजीवी ने कहा, “अब आप सब निकट के जंगल से जहां आग लगी है एक-एक जलती लकड़ी चोंच में उठाकर मेरे पीछे आइए.”
कौओं की सेना चोंच में जलती लकड़ियां पकड़ स्थिरजीवी के साथ उल्लुओं की गुफाओं में आ पहुंची. स्थिरजीवी द्वारा ढेर लगाई लकड़ियों में आग लगा दी गई. सभी उल्लू जलने या दम घुटने से मर गए. राजा मेघवर्ण ने स्थिरजीवी को कौआ रत्न की उपाधि दी.

सीख- शत्रु को अपने घर में पनाह देना अपने ही विनाश का सामान जुटाना है.