Panchatantra Stories

काफ़ी सालों पहले की बात है. एक गांव में किशन नाम का एक गरीब किसान रहता था. वह काफ़ी मेहनत करता था लेकिन फिर भी उसका गुज़र-बसर बड़ी मुश्किल से हो रहा था. वो गांव के एक ज़मींदार के खेत पर काम करके किसी तरह अपना घर चला रहा था.

एक वक्त था जब किशन की हालत ऐसी नहीं थी. पहले किशन के भी खेत थे, लेकिन उसके पिता के बीमार होने के कारण उसे अपने सारे खेत बेचने पड़े. मज़दूरी में मिलने वाले पैसों से पिता का इलाज कराना और घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था.

उसका हर दिन इसी सोच में गुज़र जाता कि कैसे घर की स्थिति को बेहतर किया जाए. एक दिन सुबह-सुबह ऐसे ही सोचते-सोचते वो ज़मींदार के खेत पर काम कर रहा था कि अचानक खुदाई करते-करते उसकी कुदाल किसी धातु से टकराई और तेज़ आवाज़ हुई. किशन ने सोचा कि आखिर ऐसा क्या है यहां ज़रा देखा जाए. उसने उस हिस्से को खोदना शुरू किया तो देखा एक बड़ा-सा पतीला है. पतीला देखकर किशन दुखी हो गया, क्योंकि किशन ने सोचा कि पतीले की जगह अगर गहने या ज़ेवरात होते तो उसके घर की हालत थोड़ी सुधर जाती. फिर किशन ने सोचा कि चलो, अब खाना ही खा लेता हूं. खाना खाने के लिए किशन ने अपने हाथ की कुदाल उस पतीले में ही फेंक दी और हाथ-मुंह धोकर खाना खाने लगा. खाना खाने के बाद जब किशन अपनी कुदाल उठाने के लिए उस पतीले के पास पहुंचा, तो वो हैरान हो गया. उस पतीले के अंदर एक नहीं, बल्कि बहुत सारे कुदाल थे. उसे कुछ समझ नहीं आया. तभी उसने अपने पास रखी एक टोकरी को भी उस पतीले में फेंक दिया. वो एक टोकरी भी पतीले के अंदर जाते ही बहुत सारी हो गईं. ये सब देखकर किशन खुश हो गया और उस चमत्कारी जादुई पतीले को अपने साथ घर लेकर चला आया.

अब वो रोज़ उस चमत्कारी पतीले में अपने कुछ औज़ार डालता और जब वो ज़्यादा हो जाते, तब उन्हें बाज़ार जाकर बेच आता. ऐसा करते-करते किशन ने काफ़ी पैसे कमाए और उसके घर की हालत सुधरने लगी. उसने अपने पिता का इलाज भी करवा लिया. एक दिन किशन ने कुछ गहने खरीदें और उन्हें भी पतीले में डाल दिया. वो गहने भी बहुत सारे बन गए. धीरे-धीरे किशन काफ़ी धनवान होने लगा और उसने ज़मींदार के यहां मज़दूरी करना भी छोड़ दिया.

किशन को इस तरह अमीर होते देख ज़मींदार मोहन को किशन पर शक़ हुआ और वो सीधे किशन के घर जा धमका. वहां उसे जादुई पतीले के बारे में पता चला. उसने किशन से पूछा- तुमने यह पतीला कब और किसके घर से चुराया सच-सच बताओ?

किशन सहम गया और डरी हुई आवाज़ में बोला- ये चमत्कारी पतीला मुझे खेत में खुदाई के समय मिला था. मैंने किसी के घर चोरी नहीं की है. बस फिर क्या था. खेत में खुदाई की बात सुनते ही ज़मींदार बोला- यह पतीला जब मेरे खेत से मिला, तो यह मेरा हुआ.

किशन ने जादुई पतीला ना लेकर जाने की बहुत मिन्नते कीं, लेकिन ज़मींदार मोहन ने उसकी एक नहीं सुनी और वो ज़बरदस्ती अपने साथ वो जादुई पतीला लेकर चला गया.

ज़मींदार ने भी किशन की ही तरह उसमें अलग-अलग सामान डालकर उन्हें बढ़ाना शुरू किया. एक दिन ज़मींदार ने अपने घर में मौजूद सारे गहने एक-एक करके उस पतीले में डाल दिए और रातोंरात वो और भी ज़्यादा धनवान हो गया.

यूं अचानक एकदम से ज़मींदार के इतने अधिक अमीर होने की खबर नगर के राजा तक भी पहुंच गई. पता लगाने पर राजा को भी जादुई पतीले की जानकारी मिली. राजा ने तुरंत अपने लोगों को भेजकर ज़मींदार के पास से वो चमत्कारी पतीला राजमहल मंगवा लिया.

उस जादुई पतीले के राजमहल में पहुंचते ही राजा ने अपने आसपास मौजूद तमाम क़ीमती सामान उसमें डालना शुरू दिया. सामान को बढ़ता देखकर राजा दंग रह गया. राजा ने सोचा कि देखने में तो ये पतीला बड़ा साधारण सा दिखता है, लेकिन इसके अंदर ज़रूर कुछ असाधारण होगा. बस फिर क्या था वो ललची राजा खुद उस पतीले के अंदर चला गया और देखते-ही-देखते उस पतीले से बहुत सारे राजा निकल आए. अब पतीले से निकला हर राजा बोलने लगा- मैं इस नगर का असली राजा हूं, तुम्हें तो इस जादुई पतीले ने बनाया है. ऐसा होते-होते सारे राजा आपस में ही लड़ने लगे और उनकी इस भयानक लड़ाई में सभी राजा लड़कर मर गए. इस लड़ाई के दौरान वो जादुई पतीला भी टूट गया.

जादुई पतीले के कारण राजमहल में हुई इस लड़ाई के बारे में नगर में सबको पता चल गया. जैसे ही ये जानकारी मज़दूर किशन और ज़मींदार को मिली तो उन्होंने राहत की सांस लेकर सोचा कि अच्छा हुआ कि हमने उस जादुई पतीले का इस्तेमाल सही तरीक़े से किया. उस राजा ने अपनी मूर्खता के कारण अपनी जान ही खो दी.

सीख: मूर्खता और लालच का अंत बुरा ही होता है, किसी मूर्ख के पास अच्छी चीज़ कभी नहीं टिकती क्योंकि वो उसका सही इस्तेमाल करने की समझ ही नहीं रखता. इसलिए किसी भी सामान का इस्तेमाल संभलकर करना चाहिए और लालच से बचना चाहिए.

काफ़ी समय पहले की बात है, दिनपुर गांव में सोहन नाम का एक मिठाई वाला था. वो गांव जितना खूबसूरत था उतनी ही प्रसिद्ध थी सोहन की मिठाई की दुकान. लगभग पूरा गांव उसकी दुकान की मिठाई ही लेता था.

सोहन और उसकी पत्नी शुद्ध देसी घी की मिठाई बना कर बेचते थे, इसलिए वो मिठाई सभी को पसंद थी. काफ़ी बिक्री के कारण उसकी दुकान भी अच्छी चल रही थी जिससे उसको काफी मुनाफा भी हो रहा था. पर न जाने क्यों इतना सब होने पर भी सोहन अपनी कमाई से खुश और संतुष्ट नहीं था. वो और मुनाफ़ा चाहता था और अपनी कमाई बढ़ाने के लिए उसने एक तरकीब भी निकाली. वो शहर से एक चुम्बक का टुकड़ा ले आया, जो उसने अपने तराजू पर लगा दिया जिससे वो घपला-घोटाला कर सके और मुनाफ़ा कमा सके.

इसके बाद एक ग्राहक आया और उसने एक किलो जलेबी मांगी. सोहन ने चुम्बक को लगाकर जलेबी तोल दी और ज़्यादा मुनाफ़ा कर लिया. वो काफ़ी खुश हुआ. उसने अपनी पत्नी को ज्यादा मुनाफ़े के बारे में बताया तो उसकी पत्नी ने सोहन से इसका कारण पूछा. सोहन ने चुम्बक वाली बात बता दी. लेकिन उसकी पत्नी ने उसको समझाया कि ये सही नहीं है और ग्राहकों के साथ धोखेबाजी है. उनकी दुकान अच्छी-ख़ासी चल रही है इसलिए वह ऐसा घोटाला न करे, लेकिन सोहन पर उसका लालच हावी था और उसने पत्नी की राय को अनसुना कर ये धांधली जारी रखी.

एक दिन सोहन की दुकान पर रवि नाम का एक लड़का आया उसने सोहन से 2 किलो जलेबी मांगी. सोहन से वैसे ही जलेबी तोल कर दे दी. रवि को संदेह हुआ और उसने जब जलेबी को देखा तो सोहन को बोला यह तो कम लग रही है. क्या आप इसको दोबारा तोल सकते हो? इस पर सोहन को गुस्सा आ गया और वो रवि को बोला कि तुमको जलेबी चाहिए तो ले लो वरना जाओ क्योंकि मुझे और भी बहुत काम है.

रवि वहां से एक जलेबी लेकर चला गया लेकिन वह दूसरी दूकान में गया और उसने जलेबी को दोबारा तुलवाया, जिससे उसको पता चला की जलेबी आधा किलो कम थी. इसके बाद रवि एक तराजू लेकर सोहन की दुकान में गया और उस तराज़ू को उसने दुकान के बाहर रख दिया.

Photo Courtesy: YouTube/onlinehindihelp.in/moral-stories-in-hindi

अब रवि ने सभी गांव वालों को ज़ोर-ज़ोर से बोलकर इकट्ठा कर लिया. सोहन को घबराहट होने लगी और उसने रवि को फटकार लगाई कि वो आख़िर ये तमाशा क्यों कर रहा है? रवि ने सोहन और बाक़ी लोगों को बताया कि वो अब सबको जादू दिखाएगा. उसने कहा कि आप जो भी मिठाई सोहन की दुकान से ख़रीदोगे तो वो इस तराज़ू में अपने आप कम हो जाएगी.

इसके बाद लोगों ने मिठाइयां तुलवाई और ये पाया कि सोहन की दुकान की मिठाई का वज़न तो वाक़ई अन्य दुकानों की मिठाई से कम निकला. इसके बाद रवि ने सोहन के तराजू में लगा चुम्बक लोगों को दिखाया और सारी बात बताई. सच जानकर लोगों को बहुत ग़ुस्सा आया और उन्होंने सोहन की खूब पिटाई की. घबराए सोहन ने लोगों से वादा किया कि इस बार उसे माफ़ कर दें वो आगे से ऐसा काम कभी नहीं करेगा. उसने माना कि वो लालच में आ गया था.

लेकिन सोहन पर से अब गांववालों का विश्वास उठ गया यह और उसकी इस धोखेबाजी से पूरा गांव नाराज़ था, इसलिए लोगों ने उसकी दुकान में जाना काफी कम कर दिया था. लेकिन अब सोहन के पास पछताने के अलावा कुछ और नहीं बचा, क्योंकि उसने ज़रा से अधिक मुनाफ़े के लालच में अपना ईमान खोकर धोखा किया जिससे उसे पहले जो मुनाफ़ा हो रहा था अब उससे भी हाथ धोना पड़ा.

सीख: लालच बुरी बला है, कम समय में जल्दी और ज़्यादा मुनाफ़े के चक्कर में बड़ा नुक़सान ही उठाना पड़ता है. इसके अलावा आपका सम्मान व इज़्ज़त भी जाती है. इसलिए मेहनत और ईमानदारी की कमाई ही फलती-फूलती है.

यह भी पढ़ें: पंचतंत्र की कहानी: मूर्खों का बहुमत (Panchatantra Story: The Majority Of Fools)

एक घने जंगल में एक उल्लू रहता था. उसे दिन में कुछ भी दिखाई नहीं देता था, इसलिए वह दिनभर पेड़ में ही छिपकर रहता और रात होने पर बाहर भोजन ढूंढ़ने निकलता था. वो इसी तरह नियमित रूप से अपनी दिनचर्या का पालन करता था.

एक रोज़ भरी दोपहर में कहीं से एक बंदर उस पेड़ पर आया. उस दिन बहुत तेज गर्मी थी. गर्मी से बचने के लिए वो बंदर पेड़ पर ही बैठ गया और कहने लगा कि कितनी तेज़ गर्मी है. ऐसा लग रहा है मानो आसमान में सूरज नहीं कोई आग का गोला चमक रहा है जो आग बरसा रहा है.

बंदर की बातें सुनकर उल्लू से रहा नहीं गया और वो बोला कि ये तुम क्या कह रहे हो? ये तो सरासर झूठी बात है. हां, अगर तुम सूरज नहीं चांद के चमकने की बात कहते तो मैं मान भी लेता.

Photo Courtesy: YouTube.com

उल्लू की बातें सुन बंदर ने कहा- अरे भाई, दिन में भला चंद्रमा कैसे चमक सकता है, वो तो रात को ही आता है. दिन के समय के तो सूरज ही होता है और उसी की वजह से इतनी गर्मी भी हो रही है. बंदर ने उल्लू को अपनी बात समझाई. लेकिन उल्लू था कि अपनी ज़िद पर अड़ा रहा और बंदर से लगातार बहस किए जा रहा था.

जब दोनों के बीच तर्क-वितर्क का कोई परिणाम नहीं निकला तो उल्लू ने कहा कि ऐसा करते हैं मेरे मित्र के पास चलते हैं और उससे पूछते हैं. वही सच बताएगा.

Photo Courtesy: YouTube.com/HindiMoralStory

उल्लू की बात मानकर बंदर उसके साथ चल पड़ा. वो दोनों एक दूसरे पेड़ पर गए जहां एक-दो नहीं, बल्कि कई सारे उल्लुओं का झुंड था. उल्लू ने उन सबसे कहा कि ये बताओ आसमान में क्या सूरज चमक रहा है?

सभी उल्लू ज़ोर से हंस पड़े और बोले अरे तुम मूर्खों वाली बात क्यों कर रहे हो? आसमान में तो चांद ही चमक रहा है. बंदर काफ़ी हैरान था लेकिन वो भी अपनी बात पर अड़ा रहा. सभी उल्लू ने उसका खूब मज़ाक़ उड़ाया, लेकिन जब बंदर ने उनकी बात नहीं मानी तो उन सबको ग़ुस्सा आ गया और वो बंदर को मारने के लिए एक साथ उस पर झपट पड़े.

Photo Courtesy: YouTube/Nadagamstories

दिन का समय था और इसी वजह से उल्लुओं को कम दिखाई दे रहा था, इसलिए बंदर किसी तरह अपनी जान बचाकर वहां से भागने में कामयाब हो पाया.

सीख: मूर्खों से बहस करना बेवक़ूफ़ी है क्योंकि वो कभी भी बुद्धिमान लोगों की बातों को सच नहीं मानते और ऐसे लोग बहुमत के चलते सत्य को भी झुठला कर असत्य साबित कर देते हैं. इसलिए ऐसे लोगों को समझने या उनसे तर्क करने का कोई फायदा नहीं.

एक जंगल के बड़े और घने पेड़ पर एक गौरैया का जोड़ा यानी चिड़ा-चिड़ी का जोड़ा रहता था. वो उस पेड़ पर अपना घोसला बनाकर बड़ी खुशी-खुशी अपना जीवन बिता रहे थे. मौसम बदला और धीरे-धीरे आया सर्दियों का मौसम, हल्की बूंदा-बांदी से ठंड और बढ़ चुकी थी और अब हल्की ठंड कड़ाके की ठंड में बदल चुकी थी. एक दिन ठंड से बचने के लिए कुछ बंदर उस पेड़ के नीचे ठिठुरते हुए पहुंच गए. उन्होंने ठंड से बचने के लिए उस पेड़ के नीचे पनाह लेना बेहतर समझा. तेज ठंडी हवाओं से सभी बंदर कांप रहे थे और बहुत ही परेशान थे. पेड़ के नीचे बैठने के बाद वो आपस में बात करने लगे कि अगर कहीं से आग सेंकने को मिल जाती तो ठंड दूर हो जाती और उन्हें कुछ राहत मिल जाती. तभी एक बंदर ने देखा कि वहीं पास में कुछ सूखे पत्ते और सूखी लकड़ियां पड़ी हैं.

उन्हें देख उसने दूसरे बंदरों से कहा कि चलो इनको इकट्ठा करके जलाते हैं जिससे हमको ठंड नहीं लगेगी. उन बंदरों ने उनको एक जगह इकट्ठा किया और उन्हें जलाने का उपाय सोचने लगे.

बंदरों की बातें और उनकी ठंड मिटाने की कोशिश को पेड़ पर बैठी गौरैया देख रही थी. ये सब देखकर उससे रहा नहीं गया और वो बंदरों से बोली कि तुम लोग कौन हो? देखने में तो तुम आदमियों की तरह लग रहे हो, हाथ-पैर भी हैं, तुम अपना घर बनाकर क्यों नहीं रहते?

गौरेया की बात सुनकर ठंड से कांप रहे बंदर ग़ुस्से में बोले, तुम अपने काम से काम रखो, हमारे बीच में बोलने की और सलाह देने कि कोई ज़रूरत नहीं. ये कहकर वो आग जलाने के बारे में सोचने लगे और इतने में बंदरों की नज़र जुगनू पर पड़ी. वो बोला कि ऊपर हवा में चिंगारी है, इसे पकड़कर आग जलाते हैं. यह सुनते ही सारे बंदर उसे पकड़ने के लिए दौड़ पड़े.

चिड़िया ये सब देख फिर बोली कि अरे ये तो जुगनू है, इससे आग नहीं जलेगी. तुम लोग दो पत्थरों को घिसकर चिंगारी निकालकर आग जला सकते हो.

Panchatantra Ki Kahani
Photo Courtesy: hindi100.com

चिड़िया की इस सलाह को भी बंदरों ने अनसुना कर दिया. उन्होंने जुगनू को पकड़ लिया और फिर उससे आग जलाने की कोशिश करने लगे, पर वो कामयाब नहीं हो पाए और जुगनू उड़ गया. इससे बंदर दुखी और निराश हो गए.

चिड़िया से रहा नहीं गया तो उसने फिर सलाह दी कि आप लोग पत्थर रगड़कर आग जला सकते हो, मेरी बात मानकर तो देखो. चिड़िया की इस बात से बंदर बेहद चिढ़ गए और एक गुस्साए बंदर ने पेड़ पर चढ़कर चिड़िया के घोसले को तोड़ दिया. यह देख चिड़िया दुखी हो गई और डरकर रोने लगी, क्योंकि उसका आशियाना उजड़ चुका था. इसके बाद वो चिड़ा-चिड़ी का जोड़ा उस पेड़ से उड़कर कहीं और चला गया.

सीख: मूर्ख और बेवक़ूफ़ को सलाह व उपदेश देने से उल्टा हम ही नुक़सान और परेशानी में आ सकते हैं. केवल बुद्धिमान और समझदार को हि सलाह देने का फल मिलता है. हर किसी को ज्ञान या उपदेश देने की बजाय उसी को सलाह देनी चाहिए जो समझदार हो और बातों को समझ सके. मूर्ख को सलाह देना अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मारने जैसा होता है.

यह भी पढ़ें: पंचतंत्र की कहानी: आलसी गधा (Panchatantra Tales: The Lazy Donkey)

एक गांव में एक मेहनती और साधारण व्यापारी रहता था. उसके पास एक गधा था. व्यापारी अपने गधे से बहुत प्यार करता था और गधा भी अपने मालिक से प्यार करता था. व्यापारी काफ़ी दयालु और अच्छा इंसान था. लेकिन उसका गधा बेहद आलसी और कामचोर था. उसे सिर्फ खाना और आराम पंसद था. वो व्यापारी रोज़ सुबह अपना सामान गधे पर रखकर बाज़ार ले जाता और शाम को बचा हुआ सामान वापस ले आता, लेकिन गधे को काम करना बिल्कुल पसंद नहीं था.

वो व्यापारी हमेशा अलग-अलग चीज़ें बाज़ार में बेचने के लिए ले जाता था. एक दिन व्यापारी को पता चला कि बाज़ार में नमक की बहुत ज़्यादा मांग है और फ़िलहाल नमक का व्यापार करने में अधिक फायदा है, तो व्यापारी ने निर्णय लिया कि अब वो नमक ही बेचेगा.

Panchatantra Tales
Photo Credit: YouTube

व्यापारी ने अगले दिन गधे की पीठ पर नमक की बोरियां लादी और बाज़ार की तरफ चल पड़ा. नमक की बोरियां बहुत भारी थीं, जिससे गधे को चलने में परेशानी हो रही थी, लेकिन किसी तरह गधा नमक की बोरियां लेकर आधे रास्ते तक आ गया.

बाज़ार जाने के रास्ते में ही बीच में एक नदी पड़ती थी, जिस पर पुल बना हुआ था, गधा जैसे ही नदी पार करने के लिए उस पुल पर चढ़ा तो लड़खड़ाकर सीधे नदी में जा गिरा. व्यापारी बहुत घबरा गया और उसने जल्दी से गधे को नदी से किसी तरह बाहर निकाला. जब गधा नदी से बाहर आया, तो उसे महसूस हुआ कि पीठ पर लदी बोरियां हल्की हो गई हैं. क्योंकि उन बोरियों में से ज्यादातर नमक पानी में घुल चुका था.

Panchatantra Ki Kahani
Photo Credit: YouTube

आलसी गधे को अब अपना वज़न कम करने की तरकीब सूझ गई. वह अब रोज़ नदी में जानबूझकर गिरने लगा. जिससे नमक नदी के पानी में घुल जाता और बोरियों का भार हल्का हो जाता. लेकिन गधे की इस हरकत से व्यापारी को नुकसान उठाना पड़ रहा था. व्यापारी गधे की इस चालाकी को समझ गया. व्यापारी ने सोचा कि इस गधे को सबक़ सिखाना ही पड़ेगा.

व्यापारी ने एक तरकीब निकाली और अगले दिन गधे पर रूई की बोरियां लाद दीं और बाज़ार की तरफ चलने लगा. जब गधा पुल पर पहुंचा, तो वह फिर से जानबूझकर पानी में गिर गया, लेकिन पानी में गिरने के कारण रूई में पानी भर गया और बोरियों का वज़न पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ गया था. पीठ पर लदे वज़न के कारण गधे को बहुत ज़्यादा परेशानी होने लगी. अगले दो-तीन दिनों तक गधा जब भी पानी में गिरता तो उसपर लादा हुआ वज़न दोगुना हो जाता. आखिरकार गधे ने हार मान ली और अब वो चुपचाप बिना पानी में गिरे ही पुल पार करने लगा.

Panchatantra Ki Kahani
Photo Credit: YouTube

उसके बाद से व्यापारी जब गधे को लेकर बाज़ार जाने लगा तो गधा चुपचाल बिना नदी में गिरे पुल पार कर लेता. इतना ही नहीं, उसके बाद से गधे ने कभी भी वज़न लादने में आलस नहीं दिखाया. गधे का आलसीपन ख़त्म हो गया था और धीरे-धीरे व्यापारी के सारे नुकसान की भी भरपाई होने लगी.

सीख: इस कहानी से सीख मिलती है कि कभी भी अपने काम से जी नहीं चुराना चाहिए. कर्तव्य का पालन करने में आलस नही करना चाहिए. साथ ही व्यापारी की तरह समझ और सूझ-बूझ से यह सबक़ मिलता है कि अपनी बुद्धि और सूझबूझ से किसी भी काम को आसानी से किया जा सकता है और विपरीत परिस्थितियों को भी अपने अनुकूल बनाया जा सकता है.

यह भी पढ़ें: अकबर-बीरबल की कहानी: जादुई गधा! 

एक जंगल में एक चालाक लोमड़ी रहती थी. वो इतनी चालाक थी कि अपने शिकार और भोजन के लिए पहले तो वो जानवरों से दोस्ती करती और फिर मौक़ा पाते ही उन्हें मारकर दावत उड़ाती. उस लोमड़ी की इसी आदत की वजह से उससे सभी दूर रहते और कतराते थे. एक दिन उसे कहीं भोजन नहीं मिला तो वो दूर तक शिकार की तलाश में निकल पड़ी, उसकी नज़र एक तंदुरुस्त मुर्गे पर पड़ी. वह मुर्गा पेड़ पर चढ़ा हुआ था. वह लोमड़ी मुर्गे को देखकर सोचने लगी कि कितना बड़ा और तंदुरुस्त मुर्गा है, यह मेरे हाथ लग जाए, तो कितना स्वादिष्ट भोजन मिल जाएगा मुझे. अब लोमड़ी का लालच बढ़ चुका था, वो रोज़ उस मुर्गे को देखती लेकिन वो मुर्गा पेड़ पर हि चढ़ा रहता और लोमड़ी के हाथ नहीं आता.

बहुत सोचने के बाद लोमड़ी को लगा ये ऐसे हाथ न आएगा, इसलिए उसने छल और चालाकी करने की सोची. वो मुर्गे के पास गई और कहने लगी आर मेरे मुर्गे भाई! क्या तुम्हें यह बात पता चली कि एक खुशखबरी मिली है सबको जंगल में? मुर्गे ने कहा कैसी खुशख़बरी? लोमड़ी बोली कि आकाशवाणी हुई है और खुद भगवान ने कहा ह अब से इस जंगल के सारे लड़ाई-झगड़े खत्म होंगे, आज से कोई जानवर किसी दूसरे जानवर को नुकसान नहीं पहुंचाएगा और ना ही मारकर खाएगा. सब मिलजुलकर हंसी-ख़ुशी से रहेंगे, एक दूसरे की सहायता करेंगे. कोई किसी पर हमला नहीं करेगा.

Panchatantra Tales
Picture Credit: momjunction.com

मुर्गे को समझ में आ गया कि हो न हो ये लोमड़ी झूठ बोल रही है, इसलिए मुर्गे ने उसकी बातों पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया और कहा कि अच्छी बात है. लोमड़ी मुर्गे की ऐसी ठंडी प्रतिक्रिया देख फिर बोली- तो मेरे भाई, इसी बात पर आओ, नीचे तो आओ, हम गले लगकर एक दूसरे को बधाई दें और साथ में ख़ुशियां बांटे.

मुर्गा अब लोमड़ी की चालाकी समझ चुका था इसलिए वो मुस्कुराते हुए बोला कि ठीक है लेकिन मेरी लोमड़ी बहना तुम पहले अपने उन दोस्तों से तो गले मिलकर बधाई ले लो जो इसी तरफ़ ख़ुशी से दौड़े चले आ रहे हैं. मुझे पेड़ से दिख रहे हैं वो.

लोमड़ी ने हैरान हो कर पूछा- मुर्गे भाई मेरे कौन से दोस्त? मुर्गे ने कहा- अरे बहन वो शिकारी कुत्ते, वो भी अब हमारे दोस्त हैं न, वो भी शायद तुम्हें बधाई देने के लिए ही इस ओर आ रहे हैं. शिकारी कुत्तों का नाम सुनते ही लोमड़ी थर-थर कांपने लगी. वो बुरी तरह डर गई क्योंकि उसे लगा कि अब अगर वो थोड़ी देर भी यहां रुकी तो ये मुर्गा भले ही उसका शिकार बने न बने लेकिन वो खुद इन शिकारी कुत्तों का शिकार ज़रूर बन जाएगी, इसलिए उसने अपनी जान बचाना ही मुनासिब समझा और आव देखा न ताव बस उल्टी दिशा में भाग खड़ी हुई.

भागती हुई लोमड़ी को मुर्गे ने हंसते हुए कहा- अरे- बहन, कहां भाग रही हो, अब तो हम सब दोस्त हैं तो डर किस बात का, थोड़ी देर रुको. लोमड़ी बोली कि भाई दोस्त तो हैं लेकिन शायद शिकारी कुत्तों को अब तक यह खबर नहीं मिली और बस यह कहते हुए लोमड़ी वहां से ग़ायब हो गई!

सीख: चतुराई, सतर्कता और सूझबूझ से आप सामने संकट आने पर भी बिना डगमगाए आसानी से उससे बच सकते हो. कभी भी किसी के ऊपर या उसकी चिकनी छुपड़ी बातों पर आंख बंद करके आसानी से विश्वास नहीं करना चाहिए, धूर्त अत और चालाक लोगों से हमेशा सतर्क व सावधान रहना चाहिए क्योंकि ऐसे लोग ना किसी के दोस्त होते हैं और ना हाई भरोसे लायक वो सिर्फ़ अपने लिए सोचते हैं और सवार्थपूर्ति के लिए किसी की भी जान के सकते हैं.

यह भी पढ़ें: Kids Story: शहरी चूहा और देहाती चूहे की कहानी (The Town Mouse And The Country Mouse Story)

एक गांव में मन्थरक नाम का जुलाहा यानी बुनकर रहता था. वो मेहनत से अपना काम करता था पर वो बेहद गरीब था. एक बार जुलाहे के उपकरण, जो कपड़ा बुनने के काम आते थे, टूट गए. जुलाहा चाहता था जल्द से जल्द उपकरण बनजाएं ताकि उसका परिवार भूखा ना रहे, लेकिन उपकरणों को फिर बनाने के लिये लकड़ी की जरुरत थी. जुलाहा लकड़ीकाटने की कुल्हाड़ी लेकर समुद्र के पास वाले जंगल की ओर चल पड़ा. बहुत ढूंढ़ने पर भी उसे अच्छी लकड़ी नहीं मिली तबउसने समुद्र के किनारे पहुंचकर एक वृक्ष देखा, उसकी लकड़ी उत्तम थी तो उसने सोचा कि इसकी लकड़ी से उसके सबउपकरण बन जाएंगे. लेकिन जैसे ही उसने वृक्ष के तने में कुल्हाडी़ मारने के लिए हाथ उठाया, उसमें से एक देव प्रकट हएऔर उसे कहा, मैं इस वृक्ष में वास करता हूं और यहां बड़े ही आनन्द से रहता हूं और यह पेड़ भी काफ़ी हराभरा है तो तुम्हेंइस वृक्ष को नहीं काटना चाहिए. 

जुलाहे ने कहा, मैं बेहद गरीब हूं और इसलिए लाचार हूं, क्योंकि इसकी लकड़ी के बिना मेरे उपकरण नहीं बनेंगे, जिससे मैंकपड़ा नहीं बुन पाऊंगा और मेरा परिवार भूखा मर जाएगा. आप किसी और वृक्ष का आश्रय ले लो. 

देव ने कहा, मन्थरक, मैं तुम्हारे जवाब से प्रसन्न हूं, इसलिए अगर तुम इस पेड़ को ना काटो तो मैं तुम्हें एक वरदान दूंगा, तुममांगो जो भी तुमको चाहिए. 

मन्थरक सोच में पड़ गया और बोला, मैं अभी घर जाकर अपनी पत्‍नी और मित्र से सलाह करता हूं कि मुझे क्या वर मांगना चाहिए. 

देव ने कहा, तुम जाओ मैं तब तक तुम्हारी प्रतीक्षा करता हूं. 

गांव में पहुंचने पर मन्थरक की भेंट अपने एक मित्र नाई से हो गई. उसने दोस्त को सारा क़िस्सा सुनाया और पूछा, मित्र, मैं तुमसे सलाह लेने ही आया हूं कि मुझे क्या वरदान मांगना चाहिए.

नाई ने कहा, क्यों ना तुम देव से एक पूरा राज्य मांग को, तुम वहां के राजा बन जाना और मैं तुम्हारा मन्त्री बन जाऊंगा. जीवन में सुख ही सुख होगा.

Panchatantra Story
Image courtesy: thesimplehelp.com

मन्थरक को मित्र की सलाह अच्छी लगी लेकिन उसने नाई से कहा कि मैं अपनी पत्‍नी से सलाह लेने के बाद ही वरदान का निश्चय करुंगा. मंथरक को नाई ने कहा कि मित्र तुम्हारी पत्नी लोभी और स्वार्थी है, वो सिर्फ़ अपना भला और फायदा ही सोचेगी. 

मन्थरक ने कहा, मित्र जो भी है आख़िर मेरी पत्नी है वो तो उसकी सलाह भी ज़रूरी है. घर पहुंचकर वह पत्‍नी से बोला, जंगल में आज मुझे एक देव मिले है और वो मुझसे खुश होकर एक वरदान देना चाहते हैं, बदले में मुझे उस पेड़ को नहीं काटना है. नाई की सलाह है कि मैं राज्य मांग लूं और राजा बनकर सुखी जीवन व्यतीत करूं, तुम्हारी क्या सलाह है?

पत्‍नी ने उत्तर दिया, राज्य-शासन का काम इतना आसान नहीं है, राजा की अनेकों जिम्मेदारियाँ होती हैं, पूरे राज्य और जनता की सोचनी पड़ती है. इसमें सुख कम और कष्ट ज़्यादा हैं. 

मन्थरक को पत्नी की बात जम गई और वो बोला, बात तो बिलकुल सही है. राजा राम को भी राज्य-प्राप्ति के बाद कोई सुख नहीं मिला था, हमें भी कैसे मिल सकता है ? किन्तु राज्य की जगह वरदान में क्या मांगा जाए?

मन्थरक की पत्‍नी ने कहा, तुम सोचो कि तुम अकेले दो हाथों से जितना कपड़ा बुनते हो, उससे गुज़र बसर हो जाता है, पर यदि तुम्हारे एक सिर की जगह दो सिर हों और दो हाथ की जगह चार हाथ हों, तो तुम दुगना कपड़ा बुन पाओगे वो भी तेज़ीसे, इससे ज़्यादा काम कर पाओगे और ज़्यादा कमा भी पाओगे, जिससे पैसे ज़्यादा आएंगे और हमारी ग़रीबी दूर होजाएगी. 

मन्थरक को पत्‍नी की बात इतनी सही लगी कि वो वृक्ष के पास वह देव से बोला, मैंने सोच लिया है, आप मुझे यह वर दो कि मेरे दो सिर और चार हाथ हो जाएं. 

मन्थरक की बात सुन देव ने उसे उसका मनचाहा वरदान दे दिया और उसके अब दो सिर और चार हाथ हो गए. वो खुशहोकर गांव की तरफ़ चल पड़ा, लेकिन इस बदली हुई हालत में जब वह गांव  में आया, तो लोग उसे देखकर डर गए और लोगों ने उसे राक्षस समझ लिया. सभी लोग राक्षस-राक्षस कहकर सब उसे मारने दौड़ पड़े और लोगों ने उसको पत्थरों सेइतना मारा कि वह वहीं मर गया

सीख: यदि मित्र समझदार हो और उसकी सलाह सही लगे, तो उसे मानो. अपनी बुद्धि से काम लो और सोच-समझकर ही कोई निर्णय लो. बेवक़ूफ़ की सलाह और उसपे अमल आपको हानि ही पहुंचाएगी. 

एक गांव में युधिष्ठिर नाम का कुम्हार रहता था. एक दिन वह शराब के नशे में घर आया तो अपने घर पर एक टूटे हुए घड़े से टकराकर गिर पड़ा और उस घड़े के जो टुकड़े जमीन पर बिखरे हुए थे, उनमें से एक नुकीला टुकड़ा कुम्हार के माथे में घुस गया, जिससे उस स्थान पर गहरा घाव हो गया. वो घाव इतना गहरा था कि उसको भरने में काफ़ी लंबा समय लगा. घाव भर तो गया था लेकिन कुम्हार के माथे पर हमेशा के लिए निशान बन गया था.

कुछ दिनों बाद कुम्हार के गांव में अकाल पड़ गया था, जिसके चलते कुम्हार गांव छोड़ दूसरे राज्य में चला गया. वहां जाकर वह राजा के दरबार में काम मांगने गया तो राजा की नज़र उसके माथे के निशान पर पड़ी. इतना बड़ा निशान देख राजा ने सोचा कि अवश्य की यह कोई शूरवीर योद्धा है. किसी युद्ध के दौरान ही इसके माथे पर यह चोट लगी है.

राजा ने कुम्हार को अपनी सेना में उच्च पद दे दिया. यह देख राजा के मंत्री और सिपाही कुम्हार से ईर्ष्या करने लगे. लेकिन वो राजा का विरोध नहीं कर सकते थे, इसलिए चुप रहे. कुम्हार ने भी भी बड़े पद के लालच में राजा को सच नहीं बताया और उसने सोचा अभी तो चुप रहने में ही भलाई है!

समय बीतता गया और एक दिन अचानक पड़ोसी राज्य ने आक्रमण कर दिया. राजा ने भी युद्ध की तैयारियां शुरू कर दी. राजा ने युधिष्ठिर से भी कहा युद्ध में भाग लेने को कहा और युद्ध में जाने से पहले उससे पूछना चाहा कि उसके माथे पर निशान किस युद्ध के दौरान बना, राजा ने कहा- हे वीर योद्धा! तुम्हारे माथे पर तुम्हारी बहादुरी का जो प्रतीक है, वह किस युद्ध में किस शत्रु ने दिया था?

Panchatantra Ki Kahani
Photo Courtesy: momjunction.com

तब तक कुम्हार राजा का विश्वास जीत चुका था तो उसने सोचा कि अब राजा को सच बता भी दिया तो वो उसका पद उससे नहीं छीनेंगे क्योंकि वो और राजा काफ़ी क़रीब आ चुके थे. उसने राजा को सच्चाई बता दी कि महाराज, यह निशान मुझे युद्ध में नहीं मिला है, मैं तो एक मामूली गरीब कुम्हार हूं. एक दिन शराब पीकर जब मैं घर आया, तो टूटे हुए घड़े से टकराकर गिर पड़ा. उसी घड़े का एक नुकीले टुकड़ा मेरे माथे में गहराई तक घुस गया था जिससे घाव गहरा हो गया था और यह निशान बन गया.

राजा सच जानकर आग-बबूला हो गया. उसने कुम्हार को पद से हटा दिया और उसे राज्य से भी निकल जाने का आदेश दिया. कुम्हार मिन्नतें करता रहा कि वह युद्ध लड़ेगा और पूरी वीरता दिखाएगा, अपनी जान तक वो राज्य की रक्षा के लिए न्योछावर कर देगा, लेकिन राजा ने उसकी बात नहीं सुनी और कहा कि तुमने छल किया और कपट से यह पद पाया. तुम भले ही कितने की पराक्रमी और बहादुर हो, लेकिन तुम क्षत्रियों के कुल के नहीं हो. तुम एक कुम्हार हो . तुम्हारी हालत उस गीदड़ की तरह है जो शेरों के बीच रहकर खुद को शेर समझने लगता है लेकिन वो हाथियों से लड़ नहीं सकता! इसलिए जान की परवाह करो और शांति से चले जाओ वर्ना लोगों को तुम्हारा सच पता चलेगा तो जान से मारे जाओगे. मैंने तुम्हारी जान बख्श दी इतना ही काफ़ी है!

कुम्हार चुपचाप निराश होकर वहां से चला गया.

सीख: सच्चाई ज़्यादा दिनों तक छिप नहीं सकती इसलिए हमेशा सच बोलकर सत्य की राह पर ही चलना चाहिए. झूठ से कुछ समय के लिए फ़ायदा भले ही हो लेकिन आगे चलकर नुक़सान ही होता है. इतना ही नहीं कभी भी घमंड में और अपने फ़ायदे के लिए सुविधा देखकर सच बोलना भारी पड़ता है!

यह भी पढ़ें: अकबर-बीरबल की कहानी: तीन प्रश्न (Akbar-Birbal Story: The Three Questions)

एक जंगल में महाचतुरक नामक सियार रहता था. वो बहुत तेज़ बुद्धि का था और बेहद चतुर था. एक दिन जंगल में उसने एक मरा हुआ हाथी देखा, अपने सामने भोजन को देख उसकी बांछे खिल गईं, लेकिन जैसे ही उसने हाथी के मृत शरीर पर दांत गड़ाया, चमड़ी मोटी होने की वजह से, वह हाथी को चीरने में नाकाम रहा.
वह कुछ उपाय सोच ही रहा था कि उसे सामने से सिंह आता दिखाई दिया, सियार ने बिना घबराए आगे बढ़कर सिंह का स्वागत किया और हाथ जोड़कर कहा- स्वामी आपके लिए ही मैंने इस हाथी को मारकर रखा है, आप इसका मांस खाकर मुझ पर उपकार करें! सिंह ने कहा- मैं किसी और के हाथों मारे गए जीव को खाता नहीं हूं, इसे तुम ही खाओ.
सियार मन ही मन खुश तो हुआ, पर उसकी हाथी की चमड़ी को चीरने की समस्या अब भी हल न हुई थी. थोड़ी देर में उस तरफ से एक बाघ भी आता नज़र आया. बाघ ने मरे हाथी को देखकर अपने होंठ पर जीभ फिराई, तों सियार ने उसकी मंशा भांपते हुए कहा- मामा, आप इस मृत्यु के मुंह में कैसे आ गए? सिंह ने इसे मारा है और मुझे इसकी रखवाली करने को कह गया है. एक बार किसी बाघ ने उनके शिकार को जूठा कर दिया था, तब से आज तक वे बाघ जाति से नफरत करने लगे हैं. आज तो हाथी को खाने वाले बाघ को वह मार ही गिराएंगे.
यह सुनते ही बाघ डर गया और फ़ौरन वहां से भाग खड़ा हुआ. थोड़ी ही देर में एक चीता आता हुआ दिखाई दिया, तो सियार ने सोचा कुछ तो ऐसा करूं कि यह हाथी की चमड़ी भी फाड़ दे और मांस भी न खा पाए!

Panchatantra Story
Photo courtesy: Storieo

उसने चीते से कहा- मेरे प्रिय भांजे, इधर कैसे? क्या बात है कुछ भूखे भी दिखाई पड़ रहे हो? सिंह ने इस मरे हुए हाथी की रखवाली मुझे सौंपी है, पर तुम इसमें से कुछ मांस खा सकते हो. मैं तुम्हें सावधान कर दूंगा, जैसे ही सिंह को आता हुआ देखूंगा, तुम्हें सूचना दे दूंगा, तुम फ़ौरन भाग जाना. ऐसे तुम्हारा पेट भी भर जाएगा और जान भी बच जाएगी!
चीते को सियार की बात और योजना अच्छी तो लगी लेकिन डर के कारण उसने पहले तो मांस खाने से मना कर दिया, पर सियार के विश्वास दिलाने पर वो तैयार हो गया. सियार मन ही मन प्रसन्न था कि चीते के तेज़ दांत उसका काम कर देंगे! चीते ने पलभर में हाथी की चमड़ी फाड़ दी पर जैसे ही उसने मांस खाना शुरू किया, दूसरी तरफ देखते हुए सियार ने घबराकर कहा- जल्दी भागो सिंह आ रहा है.
इतना सुनते ही चीता बिना देर किए सरपट भाग खड़ा हुआ. सियार बहुत खुश हुआ और उसने कई दिनों तक उस विशाल हाथी का मांस खाकर दावत उड़ाई!

उस सियार ने अपनी चतुराई और सूझ-बूझ से बड़ी ही आसानी से अपने से बलवान जानवरों का सामना करते हुए उन्हीं के ज़रिए अपनी समस्या का हल निकाल लिया!

सीख: बुद्धि का बल शरीर के बल से कहीं बड़ा होता है और अगर सूझबूझ से काम किया जाए तो कठिन से कठिन समस्या आसानी से हल हो सकती है! इसलिए समस्या देखकर या ख़तरा देखकर घबराने की बजाए चतुराई से काम लें!

यह भी पढ़ें: पंचतंत्र की कहानी: संगीतमय गधा (Panchatantra Story: The Musical Donkey)

मित्र की सलाह
बहुत समय पहले की बात है, एक गांव में एक धोबी रहता था लेकिन वो बहुत कंजूस था. उसका एक गधा था, धोबी दिनभर उससे काम कराता और वो गधा दिनभर कपडों के गट्ठर इधर से उधर ढोने में लगा रहता. धोबी ना सिर्फ़ कंजूस था बल्कि निर्दयी भी था. अपने गधे को वो भूखा ही रखता था और उसके लिए चारे का प्रबंध नहीं करता था. बस रात को उसे चरने के लिए खुला छोड देता था. लेकिन पास में कोई चरागाह भी नहीं था इसलिए गधा बहुत कमज़ोर और दुर्बल हो गया था.
एक रात वो गधा चारे की तलाश में घूम रहा था तो उसकी मुलाकात एक गीदड़ से हुई. गीदड़ ने उससे पूछा कि वो इतना कमज़ोर क्यों है?
गधे ने अपना दुख उसे बताया कि कैसे उसे दिन भर काम करना पडता है और उसका मालिक उसे खाने को कुछ नहीं देता, इसलिए वो रात को अंधेरे में खाने की तलाश करता रहता है.
गीदड़ बोला, मित्र अब तुम्हें घबराने की बात नहीं, समझो अब तुम्हारे दुःख और भुखमरी के दिन ख़त्म. यहां पास में ही एक बड़ा सब्जियों और फलों का बाग़ है. वहां तरह-तरह की सब्जियां और मीठे फल उगे रहते हैं. हर तरह की सब्ज़ी और फल की बहार है. मैंने बाग़ में घुसने का गुप्त मार्ग भी बना रखा है. मैं तो हर रात अंदर घुसकर छककर खाता हूं. तुम भी मेरे साथ आया करो.
बस फिर क्या था गधा भी गीदड़ के साथ हो लिया और बाग़ में घुसकर महीनों के बाद पहली बार गधे ने भरपेट खाना खाया. अब यह हर रात का सिलसिला हो गया था. दोनों रात भर बाग़ में ही रहये और दिन निकलने से पहले गीदड़ जंगल की ओर चला जाता और गधा अपने धोबी के पास आ जाता.
धीरे-धीरे गधे की कमज़ोरी दूर होने लगी, उसका शरीर भरने लगा, बालों में चमक आने लगी और वो खुश रहने लगा, क्योंकि वो अपनी भुखमरी के दिन बिल्कुल भूल गया था.

Panchatantra Story
Photo courtesy: thesimplehelp.com

एक रात खूब खाने के बाद गधे का मूड काफ़ी अच्छा हो गया और वो झूमने लगा. वो अपना मुंह ऊपर उठाकर कान फडफडाने लगा और लोटने लगा. गीदड़ को शंका हुई तो उसने चिंतित होकर पूछा कि आख़िर तुम यह क्या कर रहे हो? तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ना?
गधा बोला आज मैं बहुत खुश हूं और फिर आंखें बंद करके मस्त स्वर में बोला कि मेरा दिल गाना गाने का कर रहा हैं. अच्छा भोजन करने के बाद मैं प्रसन्न हूं. एक गाना तो बनता है. सोच रहा हूं ढेंचू राग गाऊँ!
गीदड़ उसकी बात सुन घबरा गया और उसने तुरंत चेतावनी दी मेरे भाई ऐसा न करना, क्योंकि हम दोनों यहां चोरी कर रहे हैं ऐसे में तुम्हारा गाना सुन माली जाग जाएगा और हम मुश्किल में पड़ जाएँगे. मुसीबत को न्यौता मत दो.
गधे ने गीदड़ को देखा और बोला, तुम जंगली के जंगली ही रहोगे. हम ख़ानदानी गायक हैं, तुम संगीत के बारे में क्या जानो?
गीदड़ ने फिर समझाया कि भले ही मैं संगीत के बारे में कुछ नहीं जानता, लेकिन मैं जान बचाना जानता हूं. तुम ज़िद छोडो, उसी में हम दोनों की भलाई है, वर्ना तुम्हारी ढेंचू सुन के माली जाग जाएगा.

Panchatantra Story
Photo courtesy: youtube.com

गधे ने गीदड़ की बात का बुरा मानकर कहा, तुम मेरा अपमान कर रहे हो, तुमको मेरा राग बेसुरा लगता है जबकि हम गधे एक लय में रेंकते हैं, जो तुम जैसे मूर्खों की समझ में नहीं आ सकता.
गीदड़ बोला चलो माना कि मैं मूर्ख जंगली हूं लेकिन एक मित्र के नाते मेरी सलाह मानो और अपना मुंह मत खोलो, वर्ना मालिक भी जाग जाएगा.
गधा हंसकर बोला- अरे मूर्ख गीदड़! मेरा राग सुनकर बाग़ के चौकीदार तो क्या, बाग़ का मालिक भी फूलों का हार लेकर आएगा और मेरे गले में डालकर मेरा सम्मान करेगा.

Panchatantra Ki Kahani
Photo courtesy: momjunction.com

गीदड़ ने को लगा इस मूर्ख को समझाने से कोई फायदा नहीं, उसने चतुराई से काम लिया और हाथ जोडकर बोला, मेरे प्यारे गधे भाई, मुझे अपनी ग़लती का एहसास हो गया है, तुम महान गायक हो और मैं तुम्हारे गले में डालने के लिए फूलों की माला लाना चाहता हूं, तुम मेरे जाने के दस मिनट बाद ही गाना शुरू करना, ताकि मैं गाना समाप्त होने तक फूल मालाएं लेकर लौट सकूं.
गधे ने गर्व से सहमति में सिर हिलाया और गीदड़ वहां से जंगल की ओर भाग गया. गधे ने उसके जाने के कुछ समय बाद मस्त होकर रेंकना शुरू किया. उसकी आवाज़ सुनते ही बाग़ के चौकीदार जाग गए और लाठी लेकर दौडे. वहां पहुंचते ही गधे को देखकर चौकीदार बोला, अच्छा तो तू है, तू ही वो दुष्ट गधा है जो हमारा बाग़ में चोरी से फल सब्ज़ी खाता था.
बस उसके बाद गधे पर डंडों की बरसात होने लगी और कुछ ही देर में गधा अधमरा होकर गिरकर बेहोश हो गया!

सीख: इस कहानी से यही सीख मिलती है कि अगर कोई हमारा मित्र हमारी भलाई के लिए कुछ समझाता है, तो उसे मान लेना चाहिए. अपने हितैषियों की सलाह पर गौर करना चाहिए ना कि अपने घमंड में ग़लत रास्ता अपनाकर खुद को मुसीबत में डालना चाहिए! अपनी कमज़ोरियों को पहचानने की क्षमता रखनी चाहिए वर्ना नतीजा बुरा हो सकता है.

काफ़ी समय पहले एक गांव में एक किसान अपनी पत्नी के साथ रहता था. किसान बूढ़ा था, लेकिन उसकी पत्नी जवान थी और इसी वजह से किसान की पत्नी अपने पति से खुश नहीं थी. वो हमेशा दुखी रहती थी, क्योंकि उसके मन में एक युवा साथी का सपना पल रहा था. यही वजह थी कि वो हमेशा बाहर घूमती रहती थी.

उसकी मन की दशा एक ठग भांप गया और वो उस महिला का पीछा करने लगा और एक दिन उस ठग को मौक़ा मिल ही गया. उसने किसान की पत्नी को ठगने के इरादे से एक झूठी कहानी सुनाई. ठग ने कहा- मेरी पत्नी का देहांत हो चुका है और अब मैं अकेला हूं. मैं तुम्हारी सुंदरता पर मोहित हो गया हूं. मैं तुम्हारे साथ ही जीवन यापन करना चाहता हूं और तुम्हें अपने साथ शहर ले जाना चाहता हूं.

Panchatantra Ki Kahani
Photo Courtesy: YouTube

किसान की पत्नी यह सुनते ही खुश हो गई. वो तैयार हो गई और झट से बोली- मैं तुम्हारे साथ चलूंगी, लेकिन मेरे पति के पास बहुत धन है. पहले मैं उसे ले आती हूं. उन पैसों से हमारा भविष्य सुरक्षित होगा और हम जीवनभर आराम से रहेंगे. यह सुनकर चोर ने कहा कि ठीक है तुम जाओ और कल सुबह इसी जगह आना मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा.

किसान की पत्नी ने सारी तैयारी कर ली. जब उसने देखा कि पति गहरी नींद में है तो उसने सारे गहने और पैसों को पोटली में बांधा और ठग के पास चली गई. दोनों दूसरे शहर की ओर निकल गए. इसी बीच ठग के मन में बार बार यही विचार आता रहा कि इस महिला को साथ ले जाने में ख़तरा है, कहीं इसका पति इसे खोजते हुए पीछे ना आ जाए और मुझ तक पहुंच गया तो ये सारा धन भी हाथ से जाएगा.

Panchatantra Ki Kahani
Photo Courtesy: YouTube

ठग अब उस महिला से पीछा छुड़ाने का उपाय सोचने लगा. तभी रास्ते में एक नदी मिली. नदी को देखते ही ठग को एक तरकीब सूझी और वह महिला से बोला- यह नदी काफ़ी गहरी है, इसलिए इसे मैं तुम्हें पार करवाऊंगा, लेकिन पहले मैं यह पोटली नदी के उस पार रखूंगा फिर तुम्हें साथ ले जाऊंगा, क्योंकि दोनों को साथ ले जाना संभव नहीं. महिला ने ठग पर ज़रा भी शक नहीं किया और वो फ़ौरन मान गई, उसने कहा- हां, ऐसा करना ठीक रहेगा. इसके अलावा ठग ने महिला के पहने हुए गहने भी उतरवा के पोटली में रख लिए, उसने कहा भारी ज़ेवरों के साथ नदी पार करने में बाधा हो सकती है.

Panchatantra Ki Kahani
Photo Courtesy: YouTube

बस फिर क्या था, ठग मन ही मन खुश हुआ और पोटली में बंधा धन लेकर नदी के पार चला गया. किसान की पत्नी उसके लौटने का इंतजार करती रही, लेकिन वो फिर कभी लौटकर नहीं आया. किसान की पत्नी को अपनी बेवक़ूफ़ी पर रोना आने लगा, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी. पैसे भी गए, इज़्ज़त भी गई और वो कहीं की ना रही.

सीख : ग़लत कर्मों और धोखेबाज़ी का फल हमेशा बुरा ही होता है. रिश्तों में ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी और ख़ुशी होती है. जो जैसा बोता है, वैसा ही काटता है, जैसी करनी वैसी भरनी!

एक पर्वतीय प्रदेश में एक बड़े से पेड़ पर एक पक्षी रहता था, जिसका नाम सिंधुक था. आश्चर्य की बात थी कि उस पक्षी की विष्ठा यानी मल सोने में बदल जाती थी. यह बात किसी को भी पता नहीं थी. एक बार उस पेड़ के नीचे से एक शिकारी गुज़र रहा था. शिकारी को चूंकी सिंधुक के स्वर्ण मल के बारे में पता नहीं था, इसलिए वो आगे बढ़ता गया, लेकिन इसी बीच सिंधुक ने शिकारी के सामने ही मल त्याग कर दिया. जैसे ही पक्षी का मल ज़मीन पर पड़ा, वो सोने में बदल गया. यह देखते ही शिकारी बहुत खुश हुआ और उसने उस पक्षी को पकड़ने के लिए जाल बिछाया दिया और पक्षी को शिकारी अपने घर ले आया.

पिंजरें में बंद सिंधुक को देख शिकारी को चिंता सताने लगी कि यदि  राजा को इस बारे में पता चला, तो वो न सिर्फ पक्षी को  दरबार में पेश करने को कहेंगे बल्कि मुझे भी दंड देंगे. इसलिए  डर के मारे शिकारी खुद ही सिंधुक को राजा के दरबार में पेश करने ले गया और उसने राजा को सारी बात बताई.

Panchatantra Ki Kahani
Image courtesy: thesimplehelp.com

राजा ने आदेश दिया कि पक्षी को सावधानी से रखा जाए और उस पर नज़र रखी जाए. पक्षी की देखभाल में कमी ना हो. ये सब सुनने के बाद मंत्री ने राजा को कहा- आप इस बेवकूफ शिकारी की बात पर भरोसा मत कीजिये. सभी हम पर हंसेंगे. कभी ऐसा होता है कि कोई पक्षी सोने का मल त्याग करे? इसलिए, अच्छा होगा कि इसे आज़ाद कर दें.

मंत्री की बात सुनकर राजा ने को लगा कि सही कह रहे हैं मंत्री , इसलिए रजा ने पक्षी को आजाद करने का आदेश दे दिया. सिंधुक उड़ते-उड़ते राजा के द्वार पर सोने का मल त्याग करके गया. उड़ते-उड़ते सिंधुक कह गया-

Panchatantra Ki Kahani
Image courtesy: MomJunction

“पूर्वं तावदहं मूर्खो द्वितीयः पाशबन्धकः । ततो राजा च मन्त्रि च सर्वं वै मूर्खमण्डलम् ॥

अर्थात्- सबसे पहले तो मैं मूर्ख था, जो शिकारी के सामने मल त्याग किया, शिकारी मुझसे बड़ा बेवकूफ था, जो मुझे राजा के पास ले गया और राजा व मंत्री मूर्खों के सरताज निकले, क्योंकि राजा बिना सच जाने मंत्री की बात में आ गया. सभी मूर्ख एक जगह ही हैं.
हालाँकि राजा के सिपाहियों ने पक्षी को पकड़ने की चेष्टा की लेकिन तब तक देर हो चुकी थी.

सीख: बिना खुद जांचे-परखे किसी निर्णय तक ना पहुंचे. कभी भी दूसरे की बातों में नहीं आना चाहिए और अपने दिमाग से काम लेना चाहिए.

×