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पंचतंत्र की कहानी- बड़े नाम का चमत्कार (Panchtantra Story- Bade Naam ke Chamatkar)

Panchtantra Story

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बहुत साल पहले एक जंगल में हाथियों का झुंड रहता था. उस झुंड के सरदार का नाम चतुर्दंत था, दो बहुत विशाल, पराक्रमी, गंभीर और समझदार था. सब उसके संरक्षण में सुखी थे. वह सबकी समस्याएं सुनता और उनका हल निकालता था. उसकी नज़र में छोटे-बड़े सब बराबर थे, वो सबका ख़्याल रखता था. एक बार इलाके में भयंकर सूखा पड़ा. कई सालों से बारिश नहीं होने के कारण सारे नदी-तालाब सूख गए थे. पेड़-पौधे भी मुरझा गए थे, ज़मीन फट गई, चारों और हाहाकार मच गया. हर कोई बूंद-बूंद के लिए तरसने लगा. हाथियों ने अपने सरदार से कहा, “सरदार, कोई उपाय सोचिए. वरना हम सब प्यासे मर जाएंगे. हमारे बच्चे तड़प रहे हैं.”

हाथियों का सरदार पहले से ही सारी बातें जानता था, मगर उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि इस समस्या का क्या समाधान निकाला जाए. सोचते-सोचते उसे बचपन की एक बात याद आई और सरदार चतुर्दंत ने कहा, “मुझे ऐसा याद आता हैं कि मेरे दादाजी कहते थे, यहां से पूर्व दिशा में एक तालाब है, जिसका पानी कभी नहीं सूखता. हमें वहां चलना चाहिए.” सभी को आशा की किरण नज़र आई.
हाथियों का झुंड चतुर्दंत द्वारा बताई गई दिशा की ओर चल पड़ा. बिना पानी के दिन की गर्मी में सफ़र करना कठिन था, अतः हाथी रात को सफ़र करते. पांच रातों के बाद वे उस तालाब तक पहुंच गए. सचमुच तालाब पानी से भरा था. सारे हाथियों ने खूब पानी पिया और जी भरकर तालाब में डुबकियां लगाई.

उसी इलाके में खरगोशों की भी घनी आबादी थी. हाथियों के आ जाने से उनकी शामत आ गई. ढेर सारे खरगोश हाथियों के पैरों-तले दब गए. उनके बिल भी हाथियों ने रौंद दिए. खरोगोशों के बीच हाहाकार मच गया. ज़िंदा बचे हुए खरगोशों ने एक सभा बुलाई. एक खरगोश बोला, “हमें यहां से भागना चाहिए.”
एक तेज़ स्वभाव वाला खरगोश भागने के हक़ में नहीं था. उसने कहा, “हमें अक्ल से काम लेना चाहिए. हाथी अंधविश्वासी होते हैं. हम उन्हें कहेंगे कि हम चंद्रवंशी हैं. तुम लोगों ने जो खरोगोशों को मारा है इससे देव चंद्रमा नाराज़ हैं. यदि तुम लोग यहां से नहीं गए तो चंद्रदेव तुम्हारा विनाश कर देंगे.”

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एक अन्य खरगोश ने उसका समर्थन किया, “चतुर ठीक कहता है. उसकी बात हमें माननी चाहिए. लंबकर्ण खरगोश को हम अपना दूत बनाकर चतुर्दंत के पास भेंजेगे.” इस प्रस्ताव पर सब सहमत हो गए. लंबकर्ण एक बहुत चतुर खरगोश था. सारे खरगोश समाज में उसकी चतुराई की धाक थी. बातें बनाना भी उसे खूब आता था. बात से बात निकालते जाने में उसका जवाब नहीं था. जब खरगोशों ने उसे दूत बनकर जाने के लिए कहा, तो वह तुरंत तैयार हो गया. खरगोशों पर आए संकट को दूर करके उसे ख़ुशी ही होगी. लंबकर्ण खरगोश चतुर्दंत के पास पहुंचा और दूर से ही एक चट्टान पर चढ़कर बोला, “गजनायक चतुर्दंत, मैं लंबकर्ण चंद्रमा का दूत उनका संदेश लेकर आया हूं. चंद्रमा हमारे स्वामी हैं.”
चतुर्दंत ने पूछा, “भई, क्या संदेश लाए हो तुम?”

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लंबकर्ण बोला, “तुमने खरगोश समाज को बहुत हानि पहुंचाई है. चन्द्रदेव तुमसे बहुत नाराज़ हैं. इससे पहले कि वह तुम्हें श्राप दे दें, तुम यहां से अपना झुंड लेकर चले जाओ.”
चतुर्दंत को विश्वास न हुआ. उसने कहा, “चंद्रदेव कहां है? मैं खुद उनके दर्शन करना चाहता हूं.”
लंबकर्ण बोला, “उचित है. चंद्रदेव असंख्य मृत खरगोशों को श्रद्धांजलि देने स्वयं तालाब में पधारकर बैठे हैं, आईए, उनसे मिल लीजिए और ख़ुद ही देख लीजिए कि वे कितने ग़ुस्से में हैं.” चालाक लंबकर्ण चतुर्दंत को रात में तालाब पर ले आया. वो पूर्णिमा की रात थी. तालाब में चंद्रमा की परछाई दिख रही थी. इसे देखकर चतुर्दंत घबरा गया चालाक खरगोश हाथी की घबराहट ताड़ गया और विश्वास के साथ बोला, “गजनायक, ज़रा नज़दीक से चंद्रदेव का साक्षात्कार करें, तो आपको पता लगेगा कि आपके झुंड के इधर आने से हम खरगोशों पर क्या बीती है. अपने भक्तों का दुख देखकर हमारे चंद्रदेवजी के दिल पर क्या गुज़र रही है.”

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लंबकर्ण की बातों का गजराज पर जादू-सा असर हुआ. चतुर्दंत डरते-डरते पानी के पास गया और अपने सूंड से चद्रंमा के प्रतिबिम्ब (परछाई) की जांच करने लगा. सूंड पानी के निकट पहुंचने पर सूंड से निकली हवा से पानी में हलचल हुई और चद्रंमा का प्रतिबिम्ब कई हिस्सों में बंट गया और विकृत हो गया. यह देखते ही चतुर्दंत के होश उड गए. वह हड़बड़ाकर कई क़दम पीछे हट गया. लंबकर्ण तो इसी बात की ताक में था. वह चीखा, “देखा, आपको देखते ही चंद्रदेव कितने रुष्ट हो गए! वह क्रोध से कांप रहे हैं और ग़ुुस्से से फट रहे हैं. आप अपनी खैर चाहते हैं तो अपने झुंड के साथ यहां से तुरंत चले जाएं, वरना चंद्रदेव पता नहीं क्या श्राप दे दें.”

चतुर्दंत तुरंत अपने झुंड के पास लौट गया और सबको सलाह दी कि उनको यहां से तुरंत चले जाना चाहिए. अपने सरदार के आदेश को मानकर हाथियों का झुंड वापस लौट गया. खरगोशों में ख़ुशी की लहर दौड़ गई. हाथियों के जाने के कुछ ही दिन बाद आकाश में बादल आए और जमकर बारिश हुई. इससे पानी की समस्या हल हो गई और हाथियों को फिर कभी उस ओर आने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी.

 

सीख- बुद्धिमानी से काम लेकर अपने से ताकतवर दुश्मन को भी मात दी जा सकती है.

 

– आचार्य विष्णु शर्मा

पंचतंत्र की कहानी- तीन मछलियां (Panchtantra Story- The Three Fishes)

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एक नदी के किनारे उसी नदी से जुड़ा एक बड़ा जलाशय था. जलाशय में पानी गहरा होता हैं, इसलिए उसमें काई तथा मछलियों का प्रिय भोजन जलीय सूक्ष्म पौधे उगते हैं. ऐसी जगह मछलियों को बहुत पसंद आती है. उस जलाशय में भी नदी से बहुत-सी मछलियां आकर रहती थी. अंडे देने के लिए तो सभी मछलियां उस जलाशय में आती थी. वह जलाशय लंबी घास व झाडियों से घिरा होने के कारण आसानी से नज़र नहीं आता था.

उसी में तीन मछलियों का झुंड रहता था. उनका स्वभाव बहुत अलग था. अन्ना मछली संकट आने के लक्षण मिलते ही संकट टालने का उपाय करने में विश्वास रखती थी. प्रत्यु मछली कहती थी कि संकट आने पर ही उससे बचने का यत्न करो. यद्दी मछली का सोचना था कि संकट को टालने या उससे बचने की बात बेकार है. करने कराने से कुछ नहीं होता, जो क़िस्मत में लिखा है, वह होकर रहेगा.

एक दिन शाम को मछुआरे नदी में मछलियां पकड़कर घर जा रहे थे. बहुत कम मछलियां उनके जालों में फंसी थी, जिससे उनके चेहरे उदास थे. तभी उन्हें झाड़ियों के ऊपर मछलीखोर पक्षियों का झुंड जाता दिखाई दिया. सबकी चोंच में मछलियां दबी थी. वे चौंक गए.
एक ने अनुमान लगाया, “दोस्तों! लगता है झाडियों के पीछे नदी से जुड़ा जलाशय हैं, जहां इतनी सारी मछलियां पल रही हैं.”
मछुआरे ख़ुश होकर झाड़ियों में से होकर जलाशय के तट पर आ निकले और ललचाई नज़रों से मछलियों को देखने लगे.
एक मछुआरा बोला, “अहा! इस जलाशय में तो मछलियां भरी पडी हैं. आज तक हमें इसका पता ही नहीं लगा.” “यहां हमें ढेर सारी मछलियां मिलेंगी.” दूसरा बोला.
तीसरे ने कहा, “आज तो शाम घिरने वाली है, कल सुबह ही आकर यहां जाल डालेंगे.”

इस प्रकार मछुआरे दूसरे दिन का कार्यक्रम तय करके चले गए. तीनों मछलियों ने मछुआरे की बात सुन ली थी.
अन्ना मछली ने कहा, “साथियों! तुमने मछुआरे की बात सुन ली. अब हमारा यहां रहना ख़तरे से ख़ाली नहीं है. ख़तरे की सूचना हमें मिल गई है. समय रहते अपनी जान बचाने का उपाय करना चाहिए. मैं तो अभी ही इस जलाशय को छोडकर नहर के रास्ते नदी में जा रही हूं, उसके बाद मछुआरे सुबह आएं, जाल फेंके, मेरी बला से. तब तक मैं तो बहुत दूर अटखेलियां कर रही होऊंगी.”

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प्रत्यु मछली बोली, “तुम्हें जाना हैं तो जाओ, मैं तो नहीं आ रही. अभी ख़तरा आया कहां हैं. हमें इतना घबराने की ज़रूरत नहीं है. हो सकता है संकट आए ही न. उन मछुआरों का यहां आने का कार्यक्रम रद्द हो सकता है, हो सकता हैं रात को उनके जाल चूहे कुतर जाएं, हो सकता है उनकी बस्ती में आग लग जाए. भूचाल आकर उनके गांव को नष्ट कर सकता है या रात को मूसलाधार बारिश आ सकती हैं और बाढ में उनका गांव बह सकता है, इसलिए उनका आना निश्चित नहीं है. जब वह आएंगे, तब की तब सोचेंगे. हो सकता है मैं उनके जाल में ही न फंसूं.”
यद्दी ने अपनी भाग्यवादी बात कही, “भागने से कुछ नहीं होने वाला. मछुआरों को आना है तो वह आएंगे. हमें जाल में फंसना है तो हम फंसेंगे. क़िस्मत में मरना ही लिखा है तो क्या किया जा सकता है?”

इस प्रकार अन्ना तो उसी समय वहां से चली गई. प्रत्यु और यद्दी जलाशय में ही रहीं. सुबह हुई तो मछुआरे अपना जाल लेकर आए और लगे जलाशय में जाल फेंकने और मछलियां पकड़ने. प्रत्यु ने संकट को आए देखा तो लगी जान बचाने के उपाय सोचने. उसका दिमाग़ तेज़ी से काम करने लगा. आसपास छिपने के लिए कोई जगह नहीं थी. तभी उसे याद आया कि उस जलाशय में काफ़ी दिनों से एक मरे हुए ऊदबिलाव की लाश तैर रही है. वह उसके बचाव के काम आ सकती है. जल्दी ही उसे वह लाश मिल गई. लाश सड़ने लगी थी. प्रत्यु लाश के पेट में घुस गई और सड़ती लाश की सड़ांध अपने ऊपर लपेटकर बाहर निकली. कुछ ही देर में मछुआरे के जाल में प्रत्यु फंस गई. मछुआरे ने अपना जाल खींचा और मछलियों को किनारे पर जाल से उलट दिया. बाकी मछलियां तो तड़पने लगीं, लेकिन प्रत्यु दम साधकर मरी हुई मछली की तरह पड़ी रही. मछुआरे को सडांध का भभका लगा तो मछलियों को देखने लगा. उसने बेसुध पड़ी प्रत्यु को उठाया और सूंघा “आक! यह तो कई दिनों की मरी मछली है. सड़ चुकी है.” ऐसे बडबडाकर बुरा-सा मुंह बनाकर उस मछुआरे ने प्रत्यु को जलाशय में फेंक दिया.

प्रत्यु अपनी बुद्धि का प्रयोग कर संकट से बच निकलने में सफल हो गई थी. पानी में गिरते ही उसने गोता लगाया और सुरक्षित गहराई में पहुंचकर जान की खैर मनाई.
यद्दी भी दूसरे मछुआरे के जाल में फंस गई थी और एक टोकरे में डाल दी गई थी. भाग्य के भरोसे बैठी रहने वाली यद्दी ने उसी टोकरी में अन्य मछलियों की तरह तड़प-तड़पकर प्राण त्याग दिए.

सीख- भाग्य के भरोसे हाथ पर हाथ धरकर बैठे रहने वाले का विनाश निश्‍चित है.

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