Panchatantra

काफ़ी समय पहले की बात है, दिनपुर गांव में सोहन नाम का एक मिठाई वाला था. वो गांव जितना खूबसूरत था उतनी ही प्रसिद्ध थी सोहन की मिठाई की दुकान. लगभग पूरा गांव उसकी दुकान की मिठाई ही लेता था.

सोहन और उसकी पत्नी शुद्ध देसी घी की मिठाई बना कर बेचते थे, इसलिए वो मिठाई सभी को पसंद थी. काफ़ी बिक्री के कारण उसकी दुकान भी अच्छी चल रही थी जिससे उसको काफी मुनाफा भी हो रहा था. पर न जाने क्यों इतना सब होने पर भी सोहन अपनी कमाई से खुश और संतुष्ट नहीं था. वो और मुनाफ़ा चाहता था और अपनी कमाई बढ़ाने के लिए उसने एक तरकीब भी निकाली. वो शहर से एक चुम्बक का टुकड़ा ले आया, जो उसने अपने तराजू पर लगा दिया जिससे वो घपला-घोटाला कर सके और मुनाफ़ा कमा सके.

इसके बाद एक ग्राहक आया और उसने एक किलो जलेबी मांगी. सोहन ने चुम्बक को लगाकर जलेबी तोल दी और ज़्यादा मुनाफ़ा कर लिया. वो काफ़ी खुश हुआ. उसने अपनी पत्नी को ज्यादा मुनाफ़े के बारे में बताया तो उसकी पत्नी ने सोहन से इसका कारण पूछा. सोहन ने चुम्बक वाली बात बता दी. लेकिन उसकी पत्नी ने उसको समझाया कि ये सही नहीं है और ग्राहकों के साथ धोखेबाजी है. उनकी दुकान अच्छी-ख़ासी चल रही है इसलिए वह ऐसा घोटाला न करे, लेकिन सोहन पर उसका लालच हावी था और उसने पत्नी की राय को अनसुना कर ये धांधली जारी रखी.

एक दिन सोहन की दुकान पर रवि नाम का एक लड़का आया उसने सोहन से 2 किलो जलेबी मांगी. सोहन से वैसे ही जलेबी तोल कर दे दी. रवि को संदेह हुआ और उसने जब जलेबी को देखा तो सोहन को बोला यह तो कम लग रही है. क्या आप इसको दोबारा तोल सकते हो? इस पर सोहन को गुस्सा आ गया और वो रवि को बोला कि तुमको जलेबी चाहिए तो ले लो वरना जाओ क्योंकि मुझे और भी बहुत काम है.

रवि वहां से एक जलेबी लेकर चला गया लेकिन वह दूसरी दूकान में गया और उसने जलेबी को दोबारा तुलवाया, जिससे उसको पता चला की जलेबी आधा किलो कम थी. इसके बाद रवि एक तराजू लेकर सोहन की दुकान में गया और उस तराज़ू को उसने दुकान के बाहर रख दिया.

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अब रवि ने सभी गांव वालों को ज़ोर-ज़ोर से बोलकर इकट्ठा कर लिया. सोहन को घबराहट होने लगी और उसने रवि को फटकार लगाई कि वो आख़िर ये तमाशा क्यों कर रहा है? रवि ने सोहन और बाक़ी लोगों को बताया कि वो अब सबको जादू दिखाएगा. उसने कहा कि आप जो भी मिठाई सोहन की दुकान से ख़रीदोगे तो वो इस तराज़ू में अपने आप कम हो जाएगी.

इसके बाद लोगों ने मिठाइयां तुलवाई और ये पाया कि सोहन की दुकान की मिठाई का वज़न तो वाक़ई अन्य दुकानों की मिठाई से कम निकला. इसके बाद रवि ने सोहन के तराजू में लगा चुम्बक लोगों को दिखाया और सारी बात बताई. सच जानकर लोगों को बहुत ग़ुस्सा आया और उन्होंने सोहन की खूब पिटाई की. घबराए सोहन ने लोगों से वादा किया कि इस बार उसे माफ़ कर दें वो आगे से ऐसा काम कभी नहीं करेगा. उसने माना कि वो लालच में आ गया था.

लेकिन सोहन पर से अब गांववालों का विश्वास उठ गया यह और उसकी इस धोखेबाजी से पूरा गांव नाराज़ था, इसलिए लोगों ने उसकी दुकान में जाना काफी कम कर दिया था. लेकिन अब सोहन के पास पछताने के अलावा कुछ और नहीं बचा, क्योंकि उसने ज़रा से अधिक मुनाफ़े के लालच में अपना ईमान खोकर धोखा किया जिससे उसे पहले जो मुनाफ़ा हो रहा था अब उससे भी हाथ धोना पड़ा.

सीख: लालच बुरी बला है, कम समय में जल्दी और ज़्यादा मुनाफ़े के चक्कर में बड़ा नुक़सान ही उठाना पड़ता है. इसके अलावा आपका सम्मान व इज़्ज़त भी जाती है. इसलिए मेहनत और ईमानदारी की कमाई ही फलती-फूलती है.

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एक घने जंगल में एक उल्लू रहता था. उसे दिन में कुछ भी दिखाई नहीं देता था, इसलिए वह दिनभर पेड़ में ही छिपकर रहता और रात होने पर बाहर भोजन ढूंढ़ने निकलता था. वो इसी तरह नियमित रूप से अपनी दिनचर्या का पालन करता था.

एक रोज़ भरी दोपहर में कहीं से एक बंदर उस पेड़ पर आया. उस दिन बहुत तेज गर्मी थी. गर्मी से बचने के लिए वो बंदर पेड़ पर ही बैठ गया और कहने लगा कि कितनी तेज़ गर्मी है. ऐसा लग रहा है मानो आसमान में सूरज नहीं कोई आग का गोला चमक रहा है जो आग बरसा रहा है.

बंदर की बातें सुनकर उल्लू से रहा नहीं गया और वो बोला कि ये तुम क्या कह रहे हो? ये तो सरासर झूठी बात है. हां, अगर तुम सूरज नहीं चांद के चमकने की बात कहते तो मैं मान भी लेता.

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उल्लू की बातें सुन बंदर ने कहा- अरे भाई, दिन में भला चंद्रमा कैसे चमक सकता है, वो तो रात को ही आता है. दिन के समय के तो सूरज ही होता है और उसी की वजह से इतनी गर्मी भी हो रही है. बंदर ने उल्लू को अपनी बात समझाई. लेकिन उल्लू था कि अपनी ज़िद पर अड़ा रहा और बंदर से लगातार बहस किए जा रहा था.

जब दोनों के बीच तर्क-वितर्क का कोई परिणाम नहीं निकला तो उल्लू ने कहा कि ऐसा करते हैं मेरे मित्र के पास चलते हैं और उससे पूछते हैं. वही सच बताएगा.

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उल्लू की बात मानकर बंदर उसके साथ चल पड़ा. वो दोनों एक दूसरे पेड़ पर गए जहां एक-दो नहीं, बल्कि कई सारे उल्लुओं का झुंड था. उल्लू ने उन सबसे कहा कि ये बताओ आसमान में क्या सूरज चमक रहा है?

सभी उल्लू ज़ोर से हंस पड़े और बोले अरे तुम मूर्खों वाली बात क्यों कर रहे हो? आसमान में तो चांद ही चमक रहा है. बंदर काफ़ी हैरान था लेकिन वो भी अपनी बात पर अड़ा रहा. सभी उल्लू ने उसका खूब मज़ाक़ उड़ाया, लेकिन जब बंदर ने उनकी बात नहीं मानी तो उन सबको ग़ुस्सा आ गया और वो बंदर को मारने के लिए एक साथ उस पर झपट पड़े.

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दिन का समय था और इसी वजह से उल्लुओं को कम दिखाई दे रहा था, इसलिए बंदर किसी तरह अपनी जान बचाकर वहां से भागने में कामयाब हो पाया.

सीख: मूर्खों से बहस करना बेवक़ूफ़ी है क्योंकि वो कभी भी बुद्धिमान लोगों की बातों को सच नहीं मानते और ऐसे लोग बहुमत के चलते सत्य को भी झुठला कर असत्य साबित कर देते हैं. इसलिए ऐसे लोगों को समझने या उनसे तर्क करने का कोई फायदा नहीं.

बहुत समय पहले की बात है. एक घंटाघर में टींकू चिड़िया अपने माता-पिता और 5 भाइयों के साथ रहती थी. टींकू चिड़िया छोटी और बेहद प्यारी थी. उसके पंख बड़े मुलायम थे. उसकी मां ने उसे घंटाघर की ताल पर चहकना सिखाया था.

उसी घंटाघर के पास ही एक घर भी था, जिसमें पक्षियों से प्यार करने वाली एक भली महिला रहती थी. वह टींकू चिड़िया और उसके परिवार के लिए रोज़ खाना खिलाती थी, वो उनको कभी रोटी तो कभी ब्रेड का टुकड़ा डाल देती थी जिससे उनका पेट भर जाता था.

लेकिन फिर वो महिला बीमार पड़ गई और उसकी मृत्यु हो गई. टींकू चिड़िया और उसका पूरा परिवार उस महिला द्वारा दिए गए खाने पर निर्भर था, लेकिन महिला की मौत के बाद अब उनके पास खाने के लिए कुछ नहीं था.

लेकिन भूख से बेहाल होने पर टींकू चिड़िया के पिता ने कीड़ों का शिकार करने का फैसला किया. बहुत मेहनत और कोशिश के बाद उन्हें 3 कीड़े मिले, जो परिवार के लिए काफी नहीं थे, क्योंकि उनका परिवार बड़ा था. वे 8 लोग थे, इसलिए उन्होंने टींकू और उसके 2 छोटे भाइयों को खाना खिलाने का निर्णय लिया.

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इधर, खाने की तलाश में भटक रही टींकू, उसके भाई और उसकी मां ने एक घर की खिड़की में चोंच मारी, ताकि कुछ खाने को मिल जाए, लेकिन खाना तो दूर की बात है, उस घर के मालिक ने उन पर राख फेंक दी, जिससे उन तीनों का रंग भूरा हो गया.

उधर टींकू के पिता को आख़िरकार बड़ी मेहनत के बाद एक ऐसी जगह मिल गई जहां काफी संख्या में कीड़े थे. अब उनके कई दिनों के खाने का इंतजाम हो चुका था, इसलिए वो खुशी-खुशी ढेर सारे कीड़े लेकर घर पहुंचा, लेकिन वहां कोई नहीं था. घोंसले में किसी को भी न पाकर वो परेशान हो गया था और इतने में ही टींकू चिड़िया, उसका भाई और मां वापस लौटे, लेकिन उन पर राख गिरने के कारण भूरे रंग का होने पर पिता ने उन्हें पहचाना ही नहीं और उन्होंने सबको भगा दिया.

वो लोग निराश हो गए, लेकिन टींकू ने हार नहीं मानी. वो सब के पास के तालाब में गए और नहाकर अपने ऊपर लगी राख हटा दी. तीनों घोसले के पास आकर चहकने लगे, जिससे टींकू के पिता ने उन्हें पहचान लिया और माफी मांगी.

अब सब मिलकर खुशी-खुशी एक साथ रहने लगे. उनके पास खाने की भी कमी नहीं थी, क्योंकि उन्होंने अपनी मेहनत से खाना प्राप्त करना सीख लिया था और अब उनके पास खाने की कोई कमी नहीं थी.

सीख: अपनी ज़रूरतों के लिए कभी भी किसी पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि हम सबको खुद मेहनत करके अपना पेट भरना चाहिए और अपनी ज़रूरतें पूरी करनी चाहिए.

एक गांव में एक ब्राह्मण और उसकी पत्‍नी बड़े प्रेम से रहते थे, लेकिन ब्राह्मणी का व्यवहार ब्राह्मण के परिवार के लोगों के साथ अच्छा़ नहीं था. इसी वजह से परिवार में कलह रहता था. रोज़-रोज़ के झगड़े और कलह से मुक्ति पाने के लिए ब्राह्मण ने मां-बाप, भाई-बहन को छो़ड़कर पत्‍नी को लेकर दूर किसी दूसरे नगर में जाकर अकेले रहने का निश्चय किया.

दोनों निकल पड़े. यात्रा लंबी थी. जंगल में पहुंचने पर ब्राह्मणी को बहुत प्यास लगी. ब्राह्मण ने पानी का इंतज़ाम करने की सोची, लेकिन पानी का स्रोत दूर था, इसलिए ब्राह्मण को आने में देर हो गई. पानी लेकर वापिस आया तो ब्राह्मण ने देखा कि ब्राह्मणी तो मर चुकी है. ब्राह्मण बहुत दुखी होकर भगवान से प्रार्थना करने लगा. उसी समय आकाशवाणी हुई कि हे ब्राह्मण! यदि तू अपने प्राणों का आधा भाग इसे देना स्वीकार करे तो ब्राह्मणी जीवित हो सकती है. ब्राह्मण ने यह स्वीकार कर लिया और ब्राह्मणी फिर से जीवित हो गई. दोनों ने आगे की यात्रा शुरु कर दी.

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दोनों यात्रा करते हुए एक नगर के द्वार पर पहुंचे. ब्राह्मण ने पत्नी से कहा- प्रिय, तुम यहीं ठहरो, मैं अभी भोजन लेकर आता हूं. ब्राह्मण के जाने के बाद ब्राह्मणी अकेली रह गई. थोड़ी देर बाद वहां एक लंगड़ा व्यक्ति आया. भले ही वो लंगड़ा था किन्तु सुन्दर जवान और तंदुरुस्त था. उसने ब्राह्मणी से हंसकर बात की और ब्राह्मणी भी उससे हंसकर बोली. दोनों में काफ़ी बात हुई और दोनों एक दूसरे की ओर आकर्षित हो गए. दोनों ने ये महसूस किया कि वो एक दूसरे को चाहने लगे और इसलिए उन्होंने जीवन भर एक साथ रहने का प्रण कर लिया.

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ब्राह्मण जब भोजन लेकर लौटा तो ब्राह्मणी ने कहा, ये बेचारा लंगड़ा व्यक्ति भी भूखा है, इसे भी अपने हिस्से में से दे दो. भोजन के बाद जब वहां से वो लोग आगे चलने लगे तो ब्राह्मणी ने ब्राह्मण से अनुरोध किया कि इस लंगड़े व्यक्ति को भी साथ ले लो. रास्ता अच्छा़ कट जाएगा, क्योंकि तुम जब कहीं जाते हो तो मैं अकेली रह जाती हूं. बात करने को भी कोई नहीं होता, ये रहेगा तो मेरा अकेलापन दूर हो जाएगा और इसके साथ रहने से कोई बात करने वाला तो रहेगा.
ब्राह्मण ने कहा, हमें अपना भार उठाना ही मुश्किल हो रहा है, इसका भार कैसे उठायेंगे भला?

ब्राह्मणी ने कहा, हम इसे पिटारी में रख लेंगे.
ब्राह्मण को पत्‍नी की बात माननी पड़ी. कुछ़ दूर जाकर ब्राह्मणी और लंगड़े ने मौक़ा पाते ही मिलकर ब्राह्मण को धोखे से कुएं में धकेल दिया और उसे मरा समझ कर वे दोनों आगे बढ़ गए.

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नगर की सीमा पर राज्य-कर वसूल करने की चौकी थी. राजपुरुषों ने ब्राह्मणी की पिटारी को खोला तो उस में वह लंगड़ा छिपा था. यह बात राज-दरबार तक पहुंची. राजा के पूछ़ने पर ब्राह्मणी ने कहा कि यह मेरा पति है. हम अपने परिवारवालों के झगड़े और कलह से परेशान होकर देश छोड़ चुके हैं और यहां रहने आए हैं. राजा ने उन्हें अपने देश में बसने की आज्ञा दे दी. 

कुछ़ दिन बाद, एक साधु ने उस ब्राह्मण को कुएं से निकाल लिया. ब्राह्मण फ़ौरन उस राज्य में पहुंच गया जहां उसकी पत्नी और वो लंगड़ा रहते थे. ब्राह्मणी ने जब उसे वहां देखा तो राजा से कहा कि यह मेरे पति का पुराना बैरी है, इसे यहां से निकालवा दीजिए या फिर इसे मरवा दिया जाए. राजा ने उसके वध का आदेश सुना दिया.

ब्राह्मण ने इस आदेश को सुनकर कहा, महाराज! इस स्त्री ने मेरा कुछ लिया हुआ है, बस वह मुझे दिलवा दीजिए. राजा ने ब्राह्मणी को कहा, देवी! तूने इसका जो कुछ लिया हुआ है, सब वापस दे दे.

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ब्राह्मणी बोली, राजन, मैंने कुछ भी नहीं लिया, ये आदमी झूठ बोल रहा है.

ब्राह्मण ने याद दिलाया कि तूने मेरे प्राणों का आधा हिस्सा लिया हुआ है. सभी देवता इसके साक्षी हैं. ब्राह्मणी ने देवताओं के डर से वह भाग वापिस करने का वचन दे दिया, किन्तु वचन देने के साथ ही वह मर गई. ब्राह्मण ने सारा वृतांत राजा को सुना दिया.

सीख: धोखा देनेवालों और विश्वासघात करने वालों का अंजाम बुरा ही होता है. किसी का विश्वास न तोड़ें और सच्चा प्यार करनेवाले को कभी धोखा न दें.

बहुत समय पहले की बात है. जंगल के पास एक पहाड़ की ऊंची चोटी पर एक बाज रहता था. वो बाज अक्सर आसपास के ख़रगोशों का शिकार कर अपना पेट आसानी से भर लेता था.

पहाड़ की तराई में बरगद के पेड़ पर एक कौआ भी अपना घोंसला बनाकर रहता था, लेकिन वो कौवा बड़ा ही चालाक और धूर्त था. वो हमेशा इसी प्रयास में लगा रहता कि बिना मेहनत किए ही उसे आसानी से खाना मिल जाए. पेड़ के आसपास जो खरगोश रहते थे, ऊँसेंट वो अक्सर बाज का शिकार होते देखता था. जब भी खरगोश बाहर आते तो बाज ऊंची उड़ान भरता और एकाध खरगोश को उठाकर ले जाता.

रोज़ ये देखते-देखते एक दिन कौए ने सोचा कि यूं तो ये चालाक खरगोश मेरे हाथ नहीं आनेवाले, लेकिन अगर इनका नर्म और स्वादिष्ट मांस खाना है, तो मुझे भी बाज की तरह करना होगा. उसकी ही नक़ल करके अपना शिकार करना होगा. मैं भी एकाएक झपट्टा मारकर खरगोश को पकड़ लूंगा.

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अगले दिन कौए ने भी एक खरगोश को दबोचने की अपनी सोच और योजना को पूरा करने की बात सोची और ऊंची उड़ान भरने की पूरी कोशिश की. फिर उसने जैसे ही खरगोश को देखा तो बाज कि तरह तेज़ रफतार से झपट्टा मारा, लेकिन कौआ तो आख़िर कौवा ही था, उसका बाज का क्या मुकाबला?

तेज़ खरगोश ने उसे देख लिया और झटपट वहां से भागकर चट्टान के पीछे छिप गया. कौवे ने देखा कि खरगोश तो वहां से हट चुका है, इसलिए उसने बिना सोचे-समझे अपनी रफ़्तार कम करनी चाही, पर तब तक देर हो चुकी थी और कौवा इससे पहले कि कुछ और सोच और समझ पाता वो वहां की बड़ी चट्टान से जा टकराया. नतीजा, उसकी चोंच और गर्दन टूट गईं. वो दर्द से तड़प उठा और गंभीर रूप से घायल हो चुका यह. उसे सबक़ भी मिल चुका था कि यूं ही बिना सोचे-समझे नक़ल करना ग़लत है, इसका नतीजा ग़लत ही निकलता है.

सीख: इस कहानी से यही सीख मिलती है कि नकल करने के लिए भी अकल चाहिए. हम अक्सर दूसरों को देख उनकी तरह बनने की चाह में अंधाधुंध नक़ल करने में जुट जाते हैं बिना अपनी शक्ति, मानसिक बल और क्षमता को समझे. अगर नक़ल करनी है या किसी और की तरह बनना है तो प्रेरित हों और मेहनत से सही योजना बनाकर अंजाम दें, वर्ना लेने के देने ही पड़ेंगे!

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एक जंगल के बड़े और घने पेड़ पर एक गौरैया का जोड़ा यानी चिड़ा-चिड़ी का जोड़ा रहता था. वो उस पेड़ पर अपना घोसला बनाकर बड़ी खुशी-खुशी अपना जीवन बिता रहे थे. मौसम बदला और धीरे-धीरे आया सर्दियों का मौसम, हल्की बूंदा-बांदी से ठंड और बढ़ चुकी थी और अब हल्की ठंड कड़ाके की ठंड में बदल चुकी थी. एक दिन ठंड से बचने के लिए कुछ बंदर उस पेड़ के नीचे ठिठुरते हुए पहुंच गए. उन्होंने ठंड से बचने के लिए उस पेड़ के नीचे पनाह लेना बेहतर समझा. तेज ठंडी हवाओं से सभी बंदर कांप रहे थे और बहुत ही परेशान थे. पेड़ के नीचे बैठने के बाद वो आपस में बात करने लगे कि अगर कहीं से आग सेंकने को मिल जाती तो ठंड दूर हो जाती और उन्हें कुछ राहत मिल जाती. तभी एक बंदर ने देखा कि वहीं पास में कुछ सूखे पत्ते और सूखी लकड़ियां पड़ी हैं.

उन्हें देख उसने दूसरे बंदरों से कहा कि चलो इनको इकट्ठा करके जलाते हैं जिससे हमको ठंड नहीं लगेगी. उन बंदरों ने उनको एक जगह इकट्ठा किया और उन्हें जलाने का उपाय सोचने लगे.

बंदरों की बातें और उनकी ठंड मिटाने की कोशिश को पेड़ पर बैठी गौरैया देख रही थी. ये सब देखकर उससे रहा नहीं गया और वो बंदरों से बोली कि तुम लोग कौन हो? देखने में तो तुम आदमियों की तरह लग रहे हो, हाथ-पैर भी हैं, तुम अपना घर बनाकर क्यों नहीं रहते?

गौरेया की बात सुनकर ठंड से कांप रहे बंदर ग़ुस्से में बोले, तुम अपने काम से काम रखो, हमारे बीच में बोलने की और सलाह देने कि कोई ज़रूरत नहीं. ये कहकर वो आग जलाने के बारे में सोचने लगे और इतने में बंदरों की नज़र जुगनू पर पड़ी. वो बोला कि ऊपर हवा में चिंगारी है, इसे पकड़कर आग जलाते हैं. यह सुनते ही सारे बंदर उसे पकड़ने के लिए दौड़ पड़े.

चिड़िया ये सब देख फिर बोली कि अरे ये तो जुगनू है, इससे आग नहीं जलेगी. तुम लोग दो पत्थरों को घिसकर चिंगारी निकालकर आग जला सकते हो.

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चिड़िया की इस सलाह को भी बंदरों ने अनसुना कर दिया. उन्होंने जुगनू को पकड़ लिया और फिर उससे आग जलाने की कोशिश करने लगे, पर वो कामयाब नहीं हो पाए और जुगनू उड़ गया. इससे बंदर दुखी और निराश हो गए.

चिड़िया से रहा नहीं गया तो उसने फिर सलाह दी कि आप लोग पत्थर रगड़कर आग जला सकते हो, मेरी बात मानकर तो देखो. चिड़िया की इस बात से बंदर बेहद चिढ़ गए और एक गुस्साए बंदर ने पेड़ पर चढ़कर चिड़िया के घोसले को तोड़ दिया. यह देख चिड़िया दुखी हो गई और डरकर रोने लगी, क्योंकि उसका आशियाना उजड़ चुका था. इसके बाद वो चिड़ा-चिड़ी का जोड़ा उस पेड़ से उड़कर कहीं और चला गया.

सीख: मूर्ख और बेवक़ूफ़ को सलाह व उपदेश देने से उल्टा हम ही नुक़सान और परेशानी में आ सकते हैं. केवल बुद्धिमान और समझदार को हि सलाह देने का फल मिलता है. हर किसी को ज्ञान या उपदेश देने की बजाय उसी को सलाह देनी चाहिए जो समझदार हो और बातों को समझ सके. मूर्ख को सलाह देना अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मारने जैसा होता है.

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एक गांव में एक मेहनती और साधारण व्यापारी रहता था. उसके पास एक गधा था. व्यापारी अपने गधे से बहुत प्यार करता था और गधा भी अपने मालिक से प्यार करता था. व्यापारी काफ़ी दयालु और अच्छा इंसान था. लेकिन उसका गधा बेहद आलसी और कामचोर था. उसे सिर्फ खाना और आराम पंसद था. वो व्यापारी रोज़ सुबह अपना सामान गधे पर रखकर बाज़ार ले जाता और शाम को बचा हुआ सामान वापस ले आता, लेकिन गधे को काम करना बिल्कुल पसंद नहीं था.

वो व्यापारी हमेशा अलग-अलग चीज़ें बाज़ार में बेचने के लिए ले जाता था. एक दिन व्यापारी को पता चला कि बाज़ार में नमक की बहुत ज़्यादा मांग है और फ़िलहाल नमक का व्यापार करने में अधिक फायदा है, तो व्यापारी ने निर्णय लिया कि अब वो नमक ही बेचेगा.

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व्यापारी ने अगले दिन गधे की पीठ पर नमक की बोरियां लादी और बाज़ार की तरफ चल पड़ा. नमक की बोरियां बहुत भारी थीं, जिससे गधे को चलने में परेशानी हो रही थी, लेकिन किसी तरह गधा नमक की बोरियां लेकर आधे रास्ते तक आ गया.

बाज़ार जाने के रास्ते में ही बीच में एक नदी पड़ती थी, जिस पर पुल बना हुआ था, गधा जैसे ही नदी पार करने के लिए उस पुल पर चढ़ा तो लड़खड़ाकर सीधे नदी में जा गिरा. व्यापारी बहुत घबरा गया और उसने जल्दी से गधे को नदी से किसी तरह बाहर निकाला. जब गधा नदी से बाहर आया, तो उसे महसूस हुआ कि पीठ पर लदी बोरियां हल्की हो गई हैं. क्योंकि उन बोरियों में से ज्यादातर नमक पानी में घुल चुका था.

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आलसी गधे को अब अपना वज़न कम करने की तरकीब सूझ गई. वह अब रोज़ नदी में जानबूझकर गिरने लगा. जिससे नमक नदी के पानी में घुल जाता और बोरियों का भार हल्का हो जाता. लेकिन गधे की इस हरकत से व्यापारी को नुकसान उठाना पड़ रहा था. व्यापारी गधे की इस चालाकी को समझ गया. व्यापारी ने सोचा कि इस गधे को सबक़ सिखाना ही पड़ेगा.

व्यापारी ने एक तरकीब निकाली और अगले दिन गधे पर रूई की बोरियां लाद दीं और बाज़ार की तरफ चलने लगा. जब गधा पुल पर पहुंचा, तो वह फिर से जानबूझकर पानी में गिर गया, लेकिन पानी में गिरने के कारण रूई में पानी भर गया और बोरियों का वज़न पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ गया था. पीठ पर लदे वज़न के कारण गधे को बहुत ज़्यादा परेशानी होने लगी. अगले दो-तीन दिनों तक गधा जब भी पानी में गिरता तो उसपर लादा हुआ वज़न दोगुना हो जाता. आखिरकार गधे ने हार मान ली और अब वो चुपचाप बिना पानी में गिरे ही पुल पार करने लगा.

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उसके बाद से व्यापारी जब गधे को लेकर बाज़ार जाने लगा तो गधा चुपचाल बिना नदी में गिरे पुल पार कर लेता. इतना ही नहीं, उसके बाद से गधे ने कभी भी वज़न लादने में आलस नहीं दिखाया. गधे का आलसीपन ख़त्म हो गया था और धीरे-धीरे व्यापारी के सारे नुकसान की भी भरपाई होने लगी.

सीख: इस कहानी से सीख मिलती है कि कभी भी अपने काम से जी नहीं चुराना चाहिए. कर्तव्य का पालन करने में आलस नही करना चाहिए. साथ ही व्यापारी की तरह समझ और सूझ-बूझ से यह सबक़ मिलता है कि अपनी बुद्धि और सूझबूझ से किसी भी काम को आसानी से किया जा सकता है और विपरीत परिस्थितियों को भी अपने अनुकूल बनाया जा सकता है.

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एक गांव में मन्थरक नाम का जुलाहा यानी बुनकर रहता था. वो मेहनत से अपना काम करता था पर वो बेहद गरीब था. एक बार जुलाहे के उपकरण, जो कपड़ा बुनने के काम आते थे, टूट गए. जुलाहा चाहता था जल्द से जल्द उपकरण बनजाएं ताकि उसका परिवार भूखा ना रहे, लेकिन उपकरणों को फिर बनाने के लिये लकड़ी की जरुरत थी. जुलाहा लकड़ीकाटने की कुल्हाड़ी लेकर समुद्र के पास वाले जंगल की ओर चल पड़ा. बहुत ढूंढ़ने पर भी उसे अच्छी लकड़ी नहीं मिली तबउसने समुद्र के किनारे पहुंचकर एक वृक्ष देखा, उसकी लकड़ी उत्तम थी तो उसने सोचा कि इसकी लकड़ी से उसके सबउपकरण बन जाएंगे. लेकिन जैसे ही उसने वृक्ष के तने में कुल्हाडी़ मारने के लिए हाथ उठाया, उसमें से एक देव प्रकट हएऔर उसे कहा, मैं इस वृक्ष में वास करता हूं और यहां बड़े ही आनन्द से रहता हूं और यह पेड़ भी काफ़ी हराभरा है तो तुम्हेंइस वृक्ष को नहीं काटना चाहिए. 

जुलाहे ने कहा, मैं बेहद गरीब हूं और इसलिए लाचार हूं, क्योंकि इसकी लकड़ी के बिना मेरे उपकरण नहीं बनेंगे, जिससे मैंकपड़ा नहीं बुन पाऊंगा और मेरा परिवार भूखा मर जाएगा. आप किसी और वृक्ष का आश्रय ले लो. 

देव ने कहा, मन्थरक, मैं तुम्हारे जवाब से प्रसन्न हूं, इसलिए अगर तुम इस पेड़ को ना काटो तो मैं तुम्हें एक वरदान दूंगा, तुममांगो जो भी तुमको चाहिए. 

मन्थरक सोच में पड़ गया और बोला, मैं अभी घर जाकर अपनी पत्‍नी और मित्र से सलाह करता हूं कि मुझे क्या वर मांगना चाहिए. 

देव ने कहा, तुम जाओ मैं तब तक तुम्हारी प्रतीक्षा करता हूं. 

गांव में पहुंचने पर मन्थरक की भेंट अपने एक मित्र नाई से हो गई. उसने दोस्त को सारा क़िस्सा सुनाया और पूछा, मित्र, मैं तुमसे सलाह लेने ही आया हूं कि मुझे क्या वरदान मांगना चाहिए.

नाई ने कहा, क्यों ना तुम देव से एक पूरा राज्य मांग को, तुम वहां के राजा बन जाना और मैं तुम्हारा मन्त्री बन जाऊंगा. जीवन में सुख ही सुख होगा.

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मन्थरक को मित्र की सलाह अच्छी लगी लेकिन उसने नाई से कहा कि मैं अपनी पत्‍नी से सलाह लेने के बाद ही वरदान का निश्चय करुंगा. मंथरक को नाई ने कहा कि मित्र तुम्हारी पत्नी लोभी और स्वार्थी है, वो सिर्फ़ अपना भला और फायदा ही सोचेगी. 

मन्थरक ने कहा, मित्र जो भी है आख़िर मेरी पत्नी है वो तो उसकी सलाह भी ज़रूरी है. घर पहुंचकर वह पत्‍नी से बोला, जंगल में आज मुझे एक देव मिले है और वो मुझसे खुश होकर एक वरदान देना चाहते हैं, बदले में मुझे उस पेड़ को नहीं काटना है. नाई की सलाह है कि मैं राज्य मांग लूं और राजा बनकर सुखी जीवन व्यतीत करूं, तुम्हारी क्या सलाह है?

पत्‍नी ने उत्तर दिया, राज्य-शासन का काम इतना आसान नहीं है, राजा की अनेकों जिम्मेदारियाँ होती हैं, पूरे राज्य और जनता की सोचनी पड़ती है. इसमें सुख कम और कष्ट ज़्यादा हैं. 

मन्थरक को पत्नी की बात जम गई और वो बोला, बात तो बिलकुल सही है. राजा राम को भी राज्य-प्राप्ति के बाद कोई सुख नहीं मिला था, हमें भी कैसे मिल सकता है ? किन्तु राज्य की जगह वरदान में क्या मांगा जाए?

मन्थरक की पत्‍नी ने कहा, तुम सोचो कि तुम अकेले दो हाथों से जितना कपड़ा बुनते हो, उससे गुज़र बसर हो जाता है, पर यदि तुम्हारे एक सिर की जगह दो सिर हों और दो हाथ की जगह चार हाथ हों, तो तुम दुगना कपड़ा बुन पाओगे वो भी तेज़ीसे, इससे ज़्यादा काम कर पाओगे और ज़्यादा कमा भी पाओगे, जिससे पैसे ज़्यादा आएंगे और हमारी ग़रीबी दूर होजाएगी. 

मन्थरक को पत्‍नी की बात इतनी सही लगी कि वो वृक्ष के पास वह देव से बोला, मैंने सोच लिया है, आप मुझे यह वर दो कि मेरे दो सिर और चार हाथ हो जाएं. 

मन्थरक की बात सुन देव ने उसे उसका मनचाहा वरदान दे दिया और उसके अब दो सिर और चार हाथ हो गए. वो खुशहोकर गांव की तरफ़ चल पड़ा, लेकिन इस बदली हुई हालत में जब वह गांव  में आया, तो लोग उसे देखकर डर गए और लोगों ने उसे राक्षस समझ लिया. सभी लोग राक्षस-राक्षस कहकर सब उसे मारने दौड़ पड़े और लोगों ने उसको पत्थरों सेइतना मारा कि वह वहीं मर गया

सीख: यदि मित्र समझदार हो और उसकी सलाह सही लगे, तो उसे मानो. अपनी बुद्धि से काम लो और सोच-समझकर ही कोई निर्णय लो. बेवक़ूफ़ की सलाह और उसपे अमल आपको हानि ही पहुंचाएगी. 

एक गांव में युधिष्ठिर नाम का कुम्हार रहता था. एक दिन वह शराब के नशे में घर आया तो अपने घर पर एक टूटे हुए घड़े से टकराकर गिर पड़ा और उस घड़े के जो टुकड़े जमीन पर बिखरे हुए थे, उनमें से एक नुकीला टुकड़ा कुम्हार के माथे में घुस गया, जिससे उस स्थान पर गहरा घाव हो गया. वो घाव इतना गहरा था कि उसको भरने में काफ़ी लंबा समय लगा. घाव भर तो गया था लेकिन कुम्हार के माथे पर हमेशा के लिए निशान बन गया था.

कुछ दिनों बाद कुम्हार के गांव में अकाल पड़ गया था, जिसके चलते कुम्हार गांव छोड़ दूसरे राज्य में चला गया. वहां जाकर वह राजा के दरबार में काम मांगने गया तो राजा की नज़र उसके माथे के निशान पर पड़ी. इतना बड़ा निशान देख राजा ने सोचा कि अवश्य की यह कोई शूरवीर योद्धा है. किसी युद्ध के दौरान ही इसके माथे पर यह चोट लगी है.

राजा ने कुम्हार को अपनी सेना में उच्च पद दे दिया. यह देख राजा के मंत्री और सिपाही कुम्हार से ईर्ष्या करने लगे. लेकिन वो राजा का विरोध नहीं कर सकते थे, इसलिए चुप रहे. कुम्हार ने भी भी बड़े पद के लालच में राजा को सच नहीं बताया और उसने सोचा अभी तो चुप रहने में ही भलाई है!

समय बीतता गया और एक दिन अचानक पड़ोसी राज्य ने आक्रमण कर दिया. राजा ने भी युद्ध की तैयारियां शुरू कर दी. राजा ने युधिष्ठिर से भी कहा युद्ध में भाग लेने को कहा और युद्ध में जाने से पहले उससे पूछना चाहा कि उसके माथे पर निशान किस युद्ध के दौरान बना, राजा ने कहा- हे वीर योद्धा! तुम्हारे माथे पर तुम्हारी बहादुरी का जो प्रतीक है, वह किस युद्ध में किस शत्रु ने दिया था?

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तब तक कुम्हार राजा का विश्वास जीत चुका था तो उसने सोचा कि अब राजा को सच बता भी दिया तो वो उसका पद उससे नहीं छीनेंगे क्योंकि वो और राजा काफ़ी क़रीब आ चुके थे. उसने राजा को सच्चाई बता दी कि महाराज, यह निशान मुझे युद्ध में नहीं मिला है, मैं तो एक मामूली गरीब कुम्हार हूं. एक दिन शराब पीकर जब मैं घर आया, तो टूटे हुए घड़े से टकराकर गिर पड़ा. उसी घड़े का एक नुकीले टुकड़ा मेरे माथे में गहराई तक घुस गया था जिससे घाव गहरा हो गया था और यह निशान बन गया.

राजा सच जानकर आग-बबूला हो गया. उसने कुम्हार को पद से हटा दिया और उसे राज्य से भी निकल जाने का आदेश दिया. कुम्हार मिन्नतें करता रहा कि वह युद्ध लड़ेगा और पूरी वीरता दिखाएगा, अपनी जान तक वो राज्य की रक्षा के लिए न्योछावर कर देगा, लेकिन राजा ने उसकी बात नहीं सुनी और कहा कि तुमने छल किया और कपट से यह पद पाया. तुम भले ही कितने की पराक्रमी और बहादुर हो, लेकिन तुम क्षत्रियों के कुल के नहीं हो. तुम एक कुम्हार हो . तुम्हारी हालत उस गीदड़ की तरह है जो शेरों के बीच रहकर खुद को शेर समझने लगता है लेकिन वो हाथियों से लड़ नहीं सकता! इसलिए जान की परवाह करो और शांति से चले जाओ वर्ना लोगों को तुम्हारा सच पता चलेगा तो जान से मारे जाओगे. मैंने तुम्हारी जान बख्श दी इतना ही काफ़ी है!

कुम्हार चुपचाप निराश होकर वहां से चला गया.

सीख: सच्चाई ज़्यादा दिनों तक छिप नहीं सकती इसलिए हमेशा सच बोलकर सत्य की राह पर ही चलना चाहिए. झूठ से कुछ समय के लिए फ़ायदा भले ही हो लेकिन आगे चलकर नुक़सान ही होता है. इतना ही नहीं कभी भी घमंड में और अपने फ़ायदे के लिए सुविधा देखकर सच बोलना भारी पड़ता है!

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एक जंगल में महाचतुरक नामक सियार रहता था. वो बहुत तेज़ बुद्धि का था और बेहद चतुर था. एक दिन जंगल में उसने एक मरा हुआ हाथी देखा, अपने सामने भोजन को देख उसकी बांछे खिल गईं, लेकिन जैसे ही उसने हाथी के मृत शरीर पर दांत गड़ाया, चमड़ी मोटी होने की वजह से, वह हाथी को चीरने में नाकाम रहा.
वह कुछ उपाय सोच ही रहा था कि उसे सामने से सिंह आता दिखाई दिया, सियार ने बिना घबराए आगे बढ़कर सिंह का स्वागत किया और हाथ जोड़कर कहा- स्वामी आपके लिए ही मैंने इस हाथी को मारकर रखा है, आप इसका मांस खाकर मुझ पर उपकार करें! सिंह ने कहा- मैं किसी और के हाथों मारे गए जीव को खाता नहीं हूं, इसे तुम ही खाओ.
सियार मन ही मन खुश तो हुआ, पर उसकी हाथी की चमड़ी को चीरने की समस्या अब भी हल न हुई थी. थोड़ी देर में उस तरफ से एक बाघ भी आता नज़र आया. बाघ ने मरे हाथी को देखकर अपने होंठ पर जीभ फिराई, तों सियार ने उसकी मंशा भांपते हुए कहा- मामा, आप इस मृत्यु के मुंह में कैसे आ गए? सिंह ने इसे मारा है और मुझे इसकी रखवाली करने को कह गया है. एक बार किसी बाघ ने उनके शिकार को जूठा कर दिया था, तब से आज तक वे बाघ जाति से नफरत करने लगे हैं. आज तो हाथी को खाने वाले बाघ को वह मार ही गिराएंगे.
यह सुनते ही बाघ डर गया और फ़ौरन वहां से भाग खड़ा हुआ. थोड़ी ही देर में एक चीता आता हुआ दिखाई दिया, तो सियार ने सोचा कुछ तो ऐसा करूं कि यह हाथी की चमड़ी भी फाड़ दे और मांस भी न खा पाए!

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उसने चीते से कहा- मेरे प्रिय भांजे, इधर कैसे? क्या बात है कुछ भूखे भी दिखाई पड़ रहे हो? सिंह ने इस मरे हुए हाथी की रखवाली मुझे सौंपी है, पर तुम इसमें से कुछ मांस खा सकते हो. मैं तुम्हें सावधान कर दूंगा, जैसे ही सिंह को आता हुआ देखूंगा, तुम्हें सूचना दे दूंगा, तुम फ़ौरन भाग जाना. ऐसे तुम्हारा पेट भी भर जाएगा और जान भी बच जाएगी!
चीते को सियार की बात और योजना अच्छी तो लगी लेकिन डर के कारण उसने पहले तो मांस खाने से मना कर दिया, पर सियार के विश्वास दिलाने पर वो तैयार हो गया. सियार मन ही मन प्रसन्न था कि चीते के तेज़ दांत उसका काम कर देंगे! चीते ने पलभर में हाथी की चमड़ी फाड़ दी पर जैसे ही उसने मांस खाना शुरू किया, दूसरी तरफ देखते हुए सियार ने घबराकर कहा- जल्दी भागो सिंह आ रहा है.
इतना सुनते ही चीता बिना देर किए सरपट भाग खड़ा हुआ. सियार बहुत खुश हुआ और उसने कई दिनों तक उस विशाल हाथी का मांस खाकर दावत उड़ाई!

उस सियार ने अपनी चतुराई और सूझ-बूझ से बड़ी ही आसानी से अपने से बलवान जानवरों का सामना करते हुए उन्हीं के ज़रिए अपनी समस्या का हल निकाल लिया!

सीख: बुद्धि का बल शरीर के बल से कहीं बड़ा होता है और अगर सूझबूझ से काम किया जाए तो कठिन से कठिन समस्या आसानी से हल हो सकती है! इसलिए समस्या देखकर या ख़तरा देखकर घबराने की बजाए चतुराई से काम लें!

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मित्र की सलाह
बहुत समय पहले की बात है, एक गांव में एक धोबी रहता था लेकिन वो बहुत कंजूस था. उसका एक गधा था, धोबी दिनभर उससे काम कराता और वो गधा दिनभर कपडों के गट्ठर इधर से उधर ढोने में लगा रहता. धोबी ना सिर्फ़ कंजूस था बल्कि निर्दयी भी था. अपने गधे को वो भूखा ही रखता था और उसके लिए चारे का प्रबंध नहीं करता था. बस रात को उसे चरने के लिए खुला छोड देता था. लेकिन पास में कोई चरागाह भी नहीं था इसलिए गधा बहुत कमज़ोर और दुर्बल हो गया था.
एक रात वो गधा चारे की तलाश में घूम रहा था तो उसकी मुलाकात एक गीदड़ से हुई. गीदड़ ने उससे पूछा कि वो इतना कमज़ोर क्यों है?
गधे ने अपना दुख उसे बताया कि कैसे उसे दिन भर काम करना पडता है और उसका मालिक उसे खाने को कुछ नहीं देता, इसलिए वो रात को अंधेरे में खाने की तलाश करता रहता है.
गीदड़ बोला, मित्र अब तुम्हें घबराने की बात नहीं, समझो अब तुम्हारे दुःख और भुखमरी के दिन ख़त्म. यहां पास में ही एक बड़ा सब्जियों और फलों का बाग़ है. वहां तरह-तरह की सब्जियां और मीठे फल उगे रहते हैं. हर तरह की सब्ज़ी और फल की बहार है. मैंने बाग़ में घुसने का गुप्त मार्ग भी बना रखा है. मैं तो हर रात अंदर घुसकर छककर खाता हूं. तुम भी मेरे साथ आया करो.
बस फिर क्या था गधा भी गीदड़ के साथ हो लिया और बाग़ में घुसकर महीनों के बाद पहली बार गधे ने भरपेट खाना खाया. अब यह हर रात का सिलसिला हो गया था. दोनों रात भर बाग़ में ही रहये और दिन निकलने से पहले गीदड़ जंगल की ओर चला जाता और गधा अपने धोबी के पास आ जाता.
धीरे-धीरे गधे की कमज़ोरी दूर होने लगी, उसका शरीर भरने लगा, बालों में चमक आने लगी और वो खुश रहने लगा, क्योंकि वो अपनी भुखमरी के दिन बिल्कुल भूल गया था.

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एक रात खूब खाने के बाद गधे का मूड काफ़ी अच्छा हो गया और वो झूमने लगा. वो अपना मुंह ऊपर उठाकर कान फडफडाने लगा और लोटने लगा. गीदड़ को शंका हुई तो उसने चिंतित होकर पूछा कि आख़िर तुम यह क्या कर रहे हो? तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ना?
गधा बोला आज मैं बहुत खुश हूं और फिर आंखें बंद करके मस्त स्वर में बोला कि मेरा दिल गाना गाने का कर रहा हैं. अच्छा भोजन करने के बाद मैं प्रसन्न हूं. एक गाना तो बनता है. सोच रहा हूं ढेंचू राग गाऊँ!
गीदड़ उसकी बात सुन घबरा गया और उसने तुरंत चेतावनी दी मेरे भाई ऐसा न करना, क्योंकि हम दोनों यहां चोरी कर रहे हैं ऐसे में तुम्हारा गाना सुन माली जाग जाएगा और हम मुश्किल में पड़ जाएँगे. मुसीबत को न्यौता मत दो.
गधे ने गीदड़ को देखा और बोला, तुम जंगली के जंगली ही रहोगे. हम ख़ानदानी गायक हैं, तुम संगीत के बारे में क्या जानो?
गीदड़ ने फिर समझाया कि भले ही मैं संगीत के बारे में कुछ नहीं जानता, लेकिन मैं जान बचाना जानता हूं. तुम ज़िद छोडो, उसी में हम दोनों की भलाई है, वर्ना तुम्हारी ढेंचू सुन के माली जाग जाएगा.

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गधे ने गीदड़ की बात का बुरा मानकर कहा, तुम मेरा अपमान कर रहे हो, तुमको मेरा राग बेसुरा लगता है जबकि हम गधे एक लय में रेंकते हैं, जो तुम जैसे मूर्खों की समझ में नहीं आ सकता.
गीदड़ बोला चलो माना कि मैं मूर्ख जंगली हूं लेकिन एक मित्र के नाते मेरी सलाह मानो और अपना मुंह मत खोलो, वर्ना मालिक भी जाग जाएगा.
गधा हंसकर बोला- अरे मूर्ख गीदड़! मेरा राग सुनकर बाग़ के चौकीदार तो क्या, बाग़ का मालिक भी फूलों का हार लेकर आएगा और मेरे गले में डालकर मेरा सम्मान करेगा.

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गीदड़ ने को लगा इस मूर्ख को समझाने से कोई फायदा नहीं, उसने चतुराई से काम लिया और हाथ जोडकर बोला, मेरे प्यारे गधे भाई, मुझे अपनी ग़लती का एहसास हो गया है, तुम महान गायक हो और मैं तुम्हारे गले में डालने के लिए फूलों की माला लाना चाहता हूं, तुम मेरे जाने के दस मिनट बाद ही गाना शुरू करना, ताकि मैं गाना समाप्त होने तक फूल मालाएं लेकर लौट सकूं.
गधे ने गर्व से सहमति में सिर हिलाया और गीदड़ वहां से जंगल की ओर भाग गया. गधे ने उसके जाने के कुछ समय बाद मस्त होकर रेंकना शुरू किया. उसकी आवाज़ सुनते ही बाग़ के चौकीदार जाग गए और लाठी लेकर दौडे. वहां पहुंचते ही गधे को देखकर चौकीदार बोला, अच्छा तो तू है, तू ही वो दुष्ट गधा है जो हमारा बाग़ में चोरी से फल सब्ज़ी खाता था.
बस उसके बाद गधे पर डंडों की बरसात होने लगी और कुछ ही देर में गधा अधमरा होकर गिरकर बेहोश हो गया!

सीख: इस कहानी से यही सीख मिलती है कि अगर कोई हमारा मित्र हमारी भलाई के लिए कुछ समझाता है, तो उसे मान लेना चाहिए. अपने हितैषियों की सलाह पर गौर करना चाहिए ना कि अपने घमंड में ग़लत रास्ता अपनाकर खुद को मुसीबत में डालना चाहिए! अपनी कमज़ोरियों को पहचानने की क्षमता रखनी चाहिए वर्ना नतीजा बुरा हो सकता है.

काफ़ी समय पहले एक गांव में एक किसान अपनी पत्नी के साथ रहता था. किसान बूढ़ा था, लेकिन उसकी पत्नी जवान थी और इसी वजह से किसान की पत्नी अपने पति से खुश नहीं थी. वो हमेशा दुखी रहती थी, क्योंकि उसके मन में एक युवा साथी का सपना पल रहा था. यही वजह थी कि वो हमेशा बाहर घूमती रहती थी.

उसकी मन की दशा एक ठग भांप गया और वो उस महिला का पीछा करने लगा और एक दिन उस ठग को मौक़ा मिल ही गया. उसने किसान की पत्नी को ठगने के इरादे से एक झूठी कहानी सुनाई. ठग ने कहा- मेरी पत्नी का देहांत हो चुका है और अब मैं अकेला हूं. मैं तुम्हारी सुंदरता पर मोहित हो गया हूं. मैं तुम्हारे साथ ही जीवन यापन करना चाहता हूं और तुम्हें अपने साथ शहर ले जाना चाहता हूं.

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किसान की पत्नी यह सुनते ही खुश हो गई. वो तैयार हो गई और झट से बोली- मैं तुम्हारे साथ चलूंगी, लेकिन मेरे पति के पास बहुत धन है. पहले मैं उसे ले आती हूं. उन पैसों से हमारा भविष्य सुरक्षित होगा और हम जीवनभर आराम से रहेंगे. यह सुनकर चोर ने कहा कि ठीक है तुम जाओ और कल सुबह इसी जगह आना मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा.

किसान की पत्नी ने सारी तैयारी कर ली. जब उसने देखा कि पति गहरी नींद में है तो उसने सारे गहने और पैसों को पोटली में बांधा और ठग के पास चली गई. दोनों दूसरे शहर की ओर निकल गए. इसी बीच ठग के मन में बार बार यही विचार आता रहा कि इस महिला को साथ ले जाने में ख़तरा है, कहीं इसका पति इसे खोजते हुए पीछे ना आ जाए और मुझ तक पहुंच गया तो ये सारा धन भी हाथ से जाएगा.

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ठग अब उस महिला से पीछा छुड़ाने का उपाय सोचने लगा. तभी रास्ते में एक नदी मिली. नदी को देखते ही ठग को एक तरकीब सूझी और वह महिला से बोला- यह नदी काफ़ी गहरी है, इसलिए इसे मैं तुम्हें पार करवाऊंगा, लेकिन पहले मैं यह पोटली नदी के उस पार रखूंगा फिर तुम्हें साथ ले जाऊंगा, क्योंकि दोनों को साथ ले जाना संभव नहीं. महिला ने ठग पर ज़रा भी शक नहीं किया और वो फ़ौरन मान गई, उसने कहा- हां, ऐसा करना ठीक रहेगा. इसके अलावा ठग ने महिला के पहने हुए गहने भी उतरवा के पोटली में रख लिए, उसने कहा भारी ज़ेवरों के साथ नदी पार करने में बाधा हो सकती है.

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बस फिर क्या था, ठग मन ही मन खुश हुआ और पोटली में बंधा धन लेकर नदी के पार चला गया. किसान की पत्नी उसके लौटने का इंतजार करती रही, लेकिन वो फिर कभी लौटकर नहीं आया. किसान की पत्नी को अपनी बेवक़ूफ़ी पर रोना आने लगा, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी. पैसे भी गए, इज़्ज़त भी गई और वो कहीं की ना रही.

सीख : ग़लत कर्मों और धोखेबाज़ी का फल हमेशा बुरा ही होता है. रिश्तों में ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी और ख़ुशी होती है. जो जैसा बोता है, वैसा ही काटता है, जैसी करनी वैसी भरनी!

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