Panchatantra

मित्र की सलाह
बहुत समय पहले की बात है, एक गांव में एक धोबी रहता था लेकिन वो बहुत कंजूस था. उसका एक गधा था, धोबी दिनभर उससे काम कराता और वो गधा दिनभर कपडों के गट्ठर इधर से उधर ढोने में लगा रहता. धोबी ना सिर्फ़ कंजूस था बल्कि निर्दयी भी था. अपने गधे को वो भूखा ही रखता था और उसके लिए चारे का प्रबंध नहीं करता था. बस रात को उसे चरने के लिए खुला छोड देता था. लेकिन पास में कोई चरागाह भी नहीं था इसलिए गधा बहुत कमज़ोर और दुर्बल हो गया था.
एक रात वो गधा चारे की तलाश में घूम रहा था तो उसकी मुलाकात एक गीदड़ से हुई. गीदड़ ने उससे पूछा कि वो इतना कमज़ोर क्यों है?
गधे ने अपना दुख उसे बताया कि कैसे उसे दिन भर काम करना पडता है और उसका मालिक उसे खाने को कुछ नहीं देता, इसलिए वो रात को अंधेरे में खाने की तलाश करता रहता है.
गीदड़ बोला, मित्र अब तुम्हें घबराने की बात नहीं, समझो अब तुम्हारे दुःख और भुखमरी के दिन ख़त्म. यहां पास में ही एक बड़ा सब्जियों और फलों का बाग़ है. वहां तरह-तरह की सब्जियां और मीठे फल उगे रहते हैं. हर तरह की सब्ज़ी और फल की बहार है. मैंने बाग़ में घुसने का गुप्त मार्ग भी बना रखा है. मैं तो हर रात अंदर घुसकर छककर खाता हूं. तुम भी मेरे साथ आया करो.
बस फिर क्या था गधा भी गीदड़ के साथ हो लिया और बाग़ में घुसकर महीनों के बाद पहली बार गधे ने भरपेट खाना खाया. अब यह हर रात का सिलसिला हो गया था. दोनों रात भर बाग़ में ही रहये और दिन निकलने से पहले गीदड़ जंगल की ओर चला जाता और गधा अपने धोबी के पास आ जाता.
धीरे-धीरे गधे की कमज़ोरी दूर होने लगी, उसका शरीर भरने लगा, बालों में चमक आने लगी और वो खुश रहने लगा, क्योंकि वो अपनी भुखमरी के दिन बिल्कुल भूल गया था.

Panchatantra Story
Photo courtesy: thesimplehelp.com

एक रात खूब खाने के बाद गधे का मूड काफ़ी अच्छा हो गया और वो झूमने लगा. वो अपना मुंह ऊपर उठाकर कान फडफडाने लगा और लोटने लगा. गीदड़ को शंका हुई तो उसने चिंतित होकर पूछा कि आख़िर तुम यह क्या कर रहे हो? तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ना?
गधा बोला आज मैं बहुत खुश हूं और फिर आंखें बंद करके मस्त स्वर में बोला कि मेरा दिल गाना गाने का कर रहा हैं. अच्छा भोजन करने के बाद मैं प्रसन्न हूं. एक गाना तो बनता है. सोच रहा हूं ढेंचू राग गाऊँ!
गीदड़ उसकी बात सुन घबरा गया और उसने तुरंत चेतावनी दी मेरे भाई ऐसा न करना, क्योंकि हम दोनों यहां चोरी कर रहे हैं ऐसे में तुम्हारा गाना सुन माली जाग जाएगा और हम मुश्किल में पड़ जाएँगे. मुसीबत को न्यौता मत दो.
गधे ने गीदड़ को देखा और बोला, तुम जंगली के जंगली ही रहोगे. हम ख़ानदानी गायक हैं, तुम संगीत के बारे में क्या जानो?
गीदड़ ने फिर समझाया कि भले ही मैं संगीत के बारे में कुछ नहीं जानता, लेकिन मैं जान बचाना जानता हूं. तुम ज़िद छोडो, उसी में हम दोनों की भलाई है, वर्ना तुम्हारी ढेंचू सुन के माली जाग जाएगा.

Panchatantra Story
Photo courtesy: youtube.com

गधे ने गीदड़ की बात का बुरा मानकर कहा, तुम मेरा अपमान कर रहे हो, तुमको मेरा राग बेसुरा लगता है जबकि हम गधे एक लय में रेंकते हैं, जो तुम जैसे मूर्खों की समझ में नहीं आ सकता.
गीदड़ बोला चलो माना कि मैं मूर्ख जंगली हूं लेकिन एक मित्र के नाते मेरी सलाह मानो और अपना मुंह मत खोलो, वर्ना मालिक भी जाग जाएगा.
गधा हंसकर बोला- अरे मूर्ख गीदड़! मेरा राग सुनकर बाग़ के चौकीदार तो क्या, बाग़ का मालिक भी फूलों का हार लेकर आएगा और मेरे गले में डालकर मेरा सम्मान करेगा.

Panchatantra Ki Kahani
Photo courtesy: momjunction.com

गीदड़ ने को लगा इस मूर्ख को समझाने से कोई फायदा नहीं, उसने चतुराई से काम लिया और हाथ जोडकर बोला, मेरे प्यारे गधे भाई, मुझे अपनी ग़लती का एहसास हो गया है, तुम महान गायक हो और मैं तुम्हारे गले में डालने के लिए फूलों की माला लाना चाहता हूं, तुम मेरे जाने के दस मिनट बाद ही गाना शुरू करना, ताकि मैं गाना समाप्त होने तक फूल मालाएं लेकर लौट सकूं.
गधे ने गर्व से सहमति में सिर हिलाया और गीदड़ वहां से जंगल की ओर भाग गया. गधे ने उसके जाने के कुछ समय बाद मस्त होकर रेंकना शुरू किया. उसकी आवाज़ सुनते ही बाग़ के चौकीदार जाग गए और लाठी लेकर दौडे. वहां पहुंचते ही गधे को देखकर चौकीदार बोला, अच्छा तो तू है, तू ही वो दुष्ट गधा है जो हमारा बाग़ में चोरी से फल सब्ज़ी खाता था.
बस उसके बाद गधे पर डंडों की बरसात होने लगी और कुछ ही देर में गधा अधमरा होकर गिरकर बेहोश हो गया!

सीख: इस कहानी से यही सीख मिलती है कि अगर कोई हमारा मित्र हमारी भलाई के लिए कुछ समझाता है, तो उसे मान लेना चाहिए. अपने हितैषियों की सलाह पर गौर करना चाहिए ना कि अपने घमंड में ग़लत रास्ता अपनाकर खुद को मुसीबत में डालना चाहिए! अपनी कमज़ोरियों को पहचानने की क्षमता रखनी चाहिए वर्ना नतीजा बुरा हो सकता है.

काफ़ी समय पहले एक गांव में एक किसान अपनी पत्नी के साथ रहता था. किसान बूढ़ा था, लेकिन उसकी पत्नी जवान थी और इसी वजह से किसान की पत्नी अपने पति से खुश नहीं थी. वो हमेशा दुखी रहती थी, क्योंकि उसके मन में एक युवा साथी का सपना पल रहा था. यही वजह थी कि वो हमेशा बाहर घूमती रहती थी.

उसकी मन की दशा एक ठग भांप गया और वो उस महिला का पीछा करने लगा और एक दिन उस ठग को मौक़ा मिल ही गया. उसने किसान की पत्नी को ठगने के इरादे से एक झूठी कहानी सुनाई. ठग ने कहा- मेरी पत्नी का देहांत हो चुका है और अब मैं अकेला हूं. मैं तुम्हारी सुंदरता पर मोहित हो गया हूं. मैं तुम्हारे साथ ही जीवन यापन करना चाहता हूं और तुम्हें अपने साथ शहर ले जाना चाहता हूं.

Panchatantra Ki Kahani
Photo Courtesy: YouTube

किसान की पत्नी यह सुनते ही खुश हो गई. वो तैयार हो गई और झट से बोली- मैं तुम्हारे साथ चलूंगी, लेकिन मेरे पति के पास बहुत धन है. पहले मैं उसे ले आती हूं. उन पैसों से हमारा भविष्य सुरक्षित होगा और हम जीवनभर आराम से रहेंगे. यह सुनकर चोर ने कहा कि ठीक है तुम जाओ और कल सुबह इसी जगह आना मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा.

किसान की पत्नी ने सारी तैयारी कर ली. जब उसने देखा कि पति गहरी नींद में है तो उसने सारे गहने और पैसों को पोटली में बांधा और ठग के पास चली गई. दोनों दूसरे शहर की ओर निकल गए. इसी बीच ठग के मन में बार बार यही विचार आता रहा कि इस महिला को साथ ले जाने में ख़तरा है, कहीं इसका पति इसे खोजते हुए पीछे ना आ जाए और मुझ तक पहुंच गया तो ये सारा धन भी हाथ से जाएगा.

Panchatantra Ki Kahani
Photo Courtesy: YouTube

ठग अब उस महिला से पीछा छुड़ाने का उपाय सोचने लगा. तभी रास्ते में एक नदी मिली. नदी को देखते ही ठग को एक तरकीब सूझी और वह महिला से बोला- यह नदी काफ़ी गहरी है, इसलिए इसे मैं तुम्हें पार करवाऊंगा, लेकिन पहले मैं यह पोटली नदी के उस पार रखूंगा फिर तुम्हें साथ ले जाऊंगा, क्योंकि दोनों को साथ ले जाना संभव नहीं. महिला ने ठग पर ज़रा भी शक नहीं किया और वो फ़ौरन मान गई, उसने कहा- हां, ऐसा करना ठीक रहेगा. इसके अलावा ठग ने महिला के पहने हुए गहने भी उतरवा के पोटली में रख लिए, उसने कहा भारी ज़ेवरों के साथ नदी पार करने में बाधा हो सकती है.

Panchatantra Ki Kahani
Photo Courtesy: YouTube

बस फिर क्या था, ठग मन ही मन खुश हुआ और पोटली में बंधा धन लेकर नदी के पार चला गया. किसान की पत्नी उसके लौटने का इंतजार करती रही, लेकिन वो फिर कभी लौटकर नहीं आया. किसान की पत्नी को अपनी बेवक़ूफ़ी पर रोना आने लगा, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी. पैसे भी गए, इज़्ज़त भी गई और वो कहीं की ना रही.

सीख : ग़लत कर्मों और धोखेबाज़ी का फल हमेशा बुरा ही होता है. रिश्तों में ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी और ख़ुशी होती है. जो जैसा बोता है, वैसा ही काटता है, जैसी करनी वैसी भरनी!

एक पर्वतीय प्रदेश में एक बड़े से पेड़ पर एक पक्षी रहता था, जिसका नाम सिंधुक था. आश्चर्य की बात थी कि उस पक्षी की विष्ठा यानी मल सोने में बदल जाती थी. यह बात किसी को भी पता नहीं थी. एक बार उस पेड़ के नीचे से एक शिकारी गुज़र रहा था. शिकारी को चूंकी सिंधुक के स्वर्ण मल के बारे में पता नहीं था, इसलिए वो आगे बढ़ता गया, लेकिन इसी बीच सिंधुक ने शिकारी के सामने ही मल त्याग कर दिया. जैसे ही पक्षी का मल ज़मीन पर पड़ा, वो सोने में बदल गया. यह देखते ही शिकारी बहुत खुश हुआ और उसने उस पक्षी को पकड़ने के लिए जाल बिछाया दिया और पक्षी को शिकारी अपने घर ले आया.

पिंजरें में बंद सिंधुक को देख शिकारी को चिंता सताने लगी कि यदि  राजा को इस बारे में पता चला, तो वो न सिर्फ पक्षी को  दरबार में पेश करने को कहेंगे बल्कि मुझे भी दंड देंगे. इसलिए  डर के मारे शिकारी खुद ही सिंधुक को राजा के दरबार में पेश करने ले गया और उसने राजा को सारी बात बताई.

Panchatantra Ki Kahani
Image courtesy: thesimplehelp.com

राजा ने आदेश दिया कि पक्षी को सावधानी से रखा जाए और उस पर नज़र रखी जाए. पक्षी की देखभाल में कमी ना हो. ये सब सुनने के बाद मंत्री ने राजा को कहा- आप इस बेवकूफ शिकारी की बात पर भरोसा मत कीजिये. सभी हम पर हंसेंगे. कभी ऐसा होता है कि कोई पक्षी सोने का मल त्याग करे? इसलिए, अच्छा होगा कि इसे आज़ाद कर दें.

मंत्री की बात सुनकर राजा ने को लगा कि सही कह रहे हैं मंत्री , इसलिए रजा ने पक्षी को आजाद करने का आदेश दे दिया. सिंधुक उड़ते-उड़ते राजा के द्वार पर सोने का मल त्याग करके गया. उड़ते-उड़ते सिंधुक कह गया-

Panchatantra Ki Kahani
Image courtesy: MomJunction

“पूर्वं तावदहं मूर्खो द्वितीयः पाशबन्धकः । ततो राजा च मन्त्रि च सर्वं वै मूर्खमण्डलम् ॥

अर्थात्- सबसे पहले तो मैं मूर्ख था, जो शिकारी के सामने मल त्याग किया, शिकारी मुझसे बड़ा बेवकूफ था, जो मुझे राजा के पास ले गया और राजा व मंत्री मूर्खों के सरताज निकले, क्योंकि राजा बिना सच जाने मंत्री की बात में आ गया. सभी मूर्ख एक जगह ही हैं.
हालाँकि राजा के सिपाहियों ने पक्षी को पकड़ने की चेष्टा की लेकिन तब तक देर हो चुकी थी.

सीख: बिना खुद जांचे-परखे किसी निर्णय तक ना पहुंचे. कभी भी दूसरे की बातों में नहीं आना चाहिए और अपने दिमाग से काम लेना चाहिए.

Panchtantra Story

बहुत साल पहले एक जंगल में हाथियों का झुंड रहता था. उस झुंड के सरदार का नाम चतुर्दंत था, दो बहुत विशाल, पराक्रमी, गंभीर और समझदार था. सब उसके संरक्षण में सुखी थे. वह सबकी समस्याएं सुनता और उनका हल निकालता था. उसकी नज़र में छोटे-बड़े सब बराबर थे, वो सबका ख़्याल रखता था. एक बार इलाके में भयंकर सूखा पड़ा. कई सालों से बारिश नहीं होने के कारण सारे नदी-तालाब सूख गए थे. पेड़-पौधे भी मुरझा गए थे, ज़मीन फट गई, चारों और हाहाकार मच गया. हर कोई बूंद-बूंद के लिए तरसने लगा. हाथियों ने अपने सरदार से कहा, “सरदार, कोई उपाय सोचिए. वरना हम सब प्यासे मर जाएंगे. हमारे बच्चे तड़प रहे हैं.”

हाथियों का सरदार पहले से ही सारी बातें जानता था, मगर उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि इस समस्या का क्या समाधान निकाला जाए. सोचते-सोचते उसे बचपन की एक बात याद आई और सरदार चतुर्दंत ने कहा, “मुझे ऐसा याद आता हैं कि मेरे दादाजी कहते थे, यहां से पूर्व दिशा में एक तालाब है, जिसका पानी कभी नहीं सूखता. हमें वहां चलना चाहिए.” सभी को आशा की किरण नज़र आई.
हाथियों का झुंड चतुर्दंत द्वारा बताई गई दिशा की ओर चल पड़ा. बिना पानी के दिन की गर्मी में सफ़र करना कठिन था, अतः हाथी रात को सफ़र करते. पांच रातों के बाद वे उस तालाब तक पहुंच गए. सचमुच तालाब पानी से भरा था. सारे हाथियों ने खूब पानी पिया और जी भरकर तालाब में डुबकियां लगाई.

उसी इलाके में खरगोशों की भी घनी आबादी थी. हाथियों के आ जाने से उनकी शामत आ गई. ढेर सारे खरगोश हाथियों के पैरों-तले दब गए. उनके बिल भी हाथियों ने रौंद दिए. खरोगोशों के बीच हाहाकार मच गया. ज़िंदा बचे हुए खरगोशों ने एक सभा बुलाई. एक खरगोश बोला, “हमें यहां से भागना चाहिए.”
एक तेज़ स्वभाव वाला खरगोश भागने के हक़ में नहीं था. उसने कहा, “हमें अक्ल से काम लेना चाहिए. हाथी अंधविश्वासी होते हैं. हम उन्हें कहेंगे कि हम चंद्रवंशी हैं. तुम लोगों ने जो खरोगोशों को मारा है इससे देव चंद्रमा नाराज़ हैं. यदि तुम लोग यहां से नहीं गए तो चंद्रदेव तुम्हारा विनाश कर देंगे.”

यह भी पढ़ें: पंचतंत्र की कहानी- चापलूस मंडली

एक अन्य खरगोश ने उसका समर्थन किया, “चतुर ठीक कहता है. उसकी बात हमें माननी चाहिए. लंबकर्ण खरगोश को हम अपना दूत बनाकर चतुर्दंत के पास भेंजेगे.” इस प्रस्ताव पर सब सहमत हो गए. लंबकर्ण एक बहुत चतुर खरगोश था. सारे खरगोश समाज में उसकी चतुराई की धाक थी. बातें बनाना भी उसे खूब आता था. बात से बात निकालते जाने में उसका जवाब नहीं था. जब खरगोशों ने उसे दूत बनकर जाने के लिए कहा, तो वह तुरंत तैयार हो गया. खरगोशों पर आए संकट को दूर करके उसे ख़ुशी ही होगी. लंबकर्ण खरगोश चतुर्दंत के पास पहुंचा और दूर से ही एक चट्टान पर चढ़कर बोला, “गजनायक चतुर्दंत, मैं लंबकर्ण चंद्रमा का दूत उनका संदेश लेकर आया हूं. चंद्रमा हमारे स्वामी हैं.”
चतुर्दंत ने पूछा, “भई, क्या संदेश लाए हो तुम?”

Panchtantra Story

लंबकर्ण बोला, “तुमने खरगोश समाज को बहुत हानि पहुंचाई है. चन्द्रदेव तुमसे बहुत नाराज़ हैं. इससे पहले कि वह तुम्हें श्राप दे दें, तुम यहां से अपना झुंड लेकर चले जाओ.”
चतुर्दंत को विश्वास न हुआ. उसने कहा, “चंद्रदेव कहां है? मैं खुद उनके दर्शन करना चाहता हूं.”
लंबकर्ण बोला, “उचित है. चंद्रदेव असंख्य मृत खरगोशों को श्रद्धांजलि देने स्वयं तालाब में पधारकर बैठे हैं, आईए, उनसे मिल लीजिए और ख़ुद ही देख लीजिए कि वे कितने ग़ुस्से में हैं.” चालाक लंबकर्ण चतुर्दंत को रात में तालाब पर ले आया. वो पूर्णिमा की रात थी. तालाब में चंद्रमा की परछाई दिख रही थी. इसे देखकर चतुर्दंत घबरा गया चालाक खरगोश हाथी की घबराहट ताड़ गया और विश्वास के साथ बोला, “गजनायक, ज़रा नज़दीक से चंद्रदेव का साक्षात्कार करें, तो आपको पता लगेगा कि आपके झुंड के इधर आने से हम खरगोशों पर क्या बीती है. अपने भक्तों का दुख देखकर हमारे चंद्रदेवजी के दिल पर क्या गुज़र रही है.”

यह भी पढ़ें: पंचतंत्र की कहानी- चतुर खरगोश और शेर 

लंबकर्ण की बातों का गजराज पर जादू-सा असर हुआ. चतुर्दंत डरते-डरते पानी के पास गया और अपने सूंड से चद्रंमा के प्रतिबिम्ब (परछाई) की जांच करने लगा. सूंड पानी के निकट पहुंचने पर सूंड से निकली हवा से पानी में हलचल हुई और चद्रंमा का प्रतिबिम्ब कई हिस्सों में बंट गया और विकृत हो गया. यह देखते ही चतुर्दंत के होश उड गए. वह हड़बड़ाकर कई क़दम पीछे हट गया. लंबकर्ण तो इसी बात की ताक में था. वह चीखा, “देखा, आपको देखते ही चंद्रदेव कितने रुष्ट हो गए! वह क्रोध से कांप रहे हैं और ग़ुुस्से से फट रहे हैं. आप अपनी खैर चाहते हैं तो अपने झुंड के साथ यहां से तुरंत चले जाएं, वरना चंद्रदेव पता नहीं क्या श्राप दे दें.”

चतुर्दंत तुरंत अपने झुंड के पास लौट गया और सबको सलाह दी कि उनको यहां से तुरंत चले जाना चाहिए. अपने सरदार के आदेश को मानकर हाथियों का झुंड वापस लौट गया. खरगोशों में ख़ुशी की लहर दौड़ गई. हाथियों के जाने के कुछ ही दिन बाद आकाश में बादल आए और जमकर बारिश हुई. इससे पानी की समस्या हल हो गई और हाथियों को फिर कभी उस ओर आने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी.

 

सीख- बुद्धिमानी से काम लेकर अपने से ताकतवर दुश्मन को भी मात दी जा सकती है.

 

– आचार्य विष्णु शर्मा

Panchtantra Story

एक नदी के किनारे उसी नदी से जुड़ा एक बड़ा जलाशय था. जलाशय में पानी गहरा होता हैं, इसलिए उसमें काई तथा मछलियों का प्रिय भोजन जलीय सूक्ष्म पौधे उगते हैं. ऐसी जगह मछलियों को बहुत पसंद आती है. उस जलाशय में भी नदी से बहुत-सी मछलियां आकर रहती थी. अंडे देने के लिए तो सभी मछलियां उस जलाशय में आती थी. वह जलाशय लंबी घास व झाडियों से घिरा होने के कारण आसानी से नज़र नहीं आता था.

उसी में तीन मछलियों का झुंड रहता था. उनका स्वभाव बहुत अलग था. अन्ना मछली संकट आने के लक्षण मिलते ही संकट टालने का उपाय करने में विश्वास रखती थी. प्रत्यु मछली कहती थी कि संकट आने पर ही उससे बचने का यत्न करो. यद्दी मछली का सोचना था कि संकट को टालने या उससे बचने की बात बेकार है. करने कराने से कुछ नहीं होता, जो क़िस्मत में लिखा है, वह होकर रहेगा.

एक दिन शाम को मछुआरे नदी में मछलियां पकड़कर घर जा रहे थे. बहुत कम मछलियां उनके जालों में फंसी थी, जिससे उनके चेहरे उदास थे. तभी उन्हें झाड़ियों के ऊपर मछलीखोर पक्षियों का झुंड जाता दिखाई दिया. सबकी चोंच में मछलियां दबी थी. वे चौंक गए.
एक ने अनुमान लगाया, “दोस्तों! लगता है झाडियों के पीछे नदी से जुड़ा जलाशय हैं, जहां इतनी सारी मछलियां पल रही हैं.”
मछुआरे ख़ुश होकर झाड़ियों में से होकर जलाशय के तट पर आ निकले और ललचाई नज़रों से मछलियों को देखने लगे.
एक मछुआरा बोला, “अहा! इस जलाशय में तो मछलियां भरी पडी हैं. आज तक हमें इसका पता ही नहीं लगा.” “यहां हमें ढेर सारी मछलियां मिलेंगी.” दूसरा बोला.
तीसरे ने कहा, “आज तो शाम घिरने वाली है, कल सुबह ही आकर यहां जाल डालेंगे.”

इस प्रकार मछुआरे दूसरे दिन का कार्यक्रम तय करके चले गए. तीनों मछलियों ने मछुआरे की बात सुन ली थी.
अन्ना मछली ने कहा, “साथियों! तुमने मछुआरे की बात सुन ली. अब हमारा यहां रहना ख़तरे से ख़ाली नहीं है. ख़तरे की सूचना हमें मिल गई है. समय रहते अपनी जान बचाने का उपाय करना चाहिए. मैं तो अभी ही इस जलाशय को छोडकर नहर के रास्ते नदी में जा रही हूं, उसके बाद मछुआरे सुबह आएं, जाल फेंके, मेरी बला से. तब तक मैं तो बहुत दूर अटखेलियां कर रही होऊंगी.”

यह भी पढ़ें: पंचतंत्र की कहानी- एक और एक ग्यारह

यह भी पढ़ें: पंचतंत्र की कहानी: दो मुंहवाला पंछी 

प्रत्यु मछली बोली, “तुम्हें जाना हैं तो जाओ, मैं तो नहीं आ रही. अभी ख़तरा आया कहां हैं. हमें इतना घबराने की ज़रूरत नहीं है. हो सकता है संकट आए ही न. उन मछुआरों का यहां आने का कार्यक्रम रद्द हो सकता है, हो सकता हैं रात को उनके जाल चूहे कुतर जाएं, हो सकता है उनकी बस्ती में आग लग जाए. भूचाल आकर उनके गांव को नष्ट कर सकता है या रात को मूसलाधार बारिश आ सकती हैं और बाढ में उनका गांव बह सकता है, इसलिए उनका आना निश्चित नहीं है. जब वह आएंगे, तब की तब सोचेंगे. हो सकता है मैं उनके जाल में ही न फंसूं.”
यद्दी ने अपनी भाग्यवादी बात कही, “भागने से कुछ नहीं होने वाला. मछुआरों को आना है तो वह आएंगे. हमें जाल में फंसना है तो हम फंसेंगे. क़िस्मत में मरना ही लिखा है तो क्या किया जा सकता है?”

इस प्रकार अन्ना तो उसी समय वहां से चली गई. प्रत्यु और यद्दी जलाशय में ही रहीं. सुबह हुई तो मछुआरे अपना जाल लेकर आए और लगे जलाशय में जाल फेंकने और मछलियां पकड़ने. प्रत्यु ने संकट को आए देखा तो लगी जान बचाने के उपाय सोचने. उसका दिमाग़ तेज़ी से काम करने लगा. आसपास छिपने के लिए कोई जगह नहीं थी. तभी उसे याद आया कि उस जलाशय में काफ़ी दिनों से एक मरे हुए ऊदबिलाव की लाश तैर रही है. वह उसके बचाव के काम आ सकती है. जल्दी ही उसे वह लाश मिल गई. लाश सड़ने लगी थी. प्रत्यु लाश के पेट में घुस गई और सड़ती लाश की सड़ांध अपने ऊपर लपेटकर बाहर निकली. कुछ ही देर में मछुआरे के जाल में प्रत्यु फंस गई. मछुआरे ने अपना जाल खींचा और मछलियों को किनारे पर जाल से उलट दिया. बाकी मछलियां तो तड़पने लगीं, लेकिन प्रत्यु दम साधकर मरी हुई मछली की तरह पड़ी रही. मछुआरे को सडांध का भभका लगा तो मछलियों को देखने लगा. उसने बेसुध पड़ी प्रत्यु को उठाया और सूंघा “आक! यह तो कई दिनों की मरी मछली है. सड़ चुकी है.” ऐसे बडबडाकर बुरा-सा मुंह बनाकर उस मछुआरे ने प्रत्यु को जलाशय में फेंक दिया.

प्रत्यु अपनी बुद्धि का प्रयोग कर संकट से बच निकलने में सफल हो गई थी. पानी में गिरते ही उसने गोता लगाया और सुरक्षित गहराई में पहुंचकर जान की खैर मनाई.
यद्दी भी दूसरे मछुआरे के जाल में फंस गई थी और एक टोकरे में डाल दी गई थी. भाग्य के भरोसे बैठी रहने वाली यद्दी ने उसी टोकरी में अन्य मछलियों की तरह तड़प-तड़पकर प्राण त्याग दिए.

सीख- भाग्य के भरोसे हाथ पर हाथ धरकर बैठे रहने वाले का विनाश निश्‍चित है.

यह भी पढ़ें: पंचतंत्र की कहानी: कौवा और कोबरा